भारत-ईयू एफटीए में डेयरी उत्पादों के रियायती आयात के विरोध में इंडस्ट्री

भारत और यूरोपीय यूनियन (ईयू) के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफटीए) के तहत डेयरी उत्पादों के आयात की सुविधा देने के प्रस्ताव का विरोध शुरू हो गया है। इस समय एफटीए पर वाणिज्य मंत्रालय संबंधित पक्षों के साथ बातचीत कर रहा है। डेयरी इंडस्ट्री का कहना है कि ईयू को एफटीए के तहत छूट देने का मतलब होगा, देश के करोड़ों दुग्ध उत्पादक किसानों के सामने संकट का खड़ा होना।

भारत-ईयू एफटीए में डेयरी उत्पादों के रियायती आयात  के विरोध में इंडस्ट्री

 

भारत और यूरोपीय यूनियन (ईयू) के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफटीए) के तहत डेयरी उत्पादों के आयात की सुविधा देने के प्रस्ताव का विरोध शुरू हो गया है। इस समय एफटीए पर वाणिज्य मंत्रालय संबंधित पक्षों के साथ बातचीत कर रहा है ताकि उनसे जुड़े मुद्दों पर समझौते को अंतिम रूप देने के पहले राय बनाई जा सके। यह विरोध कुछ उसी तरह का है जिस तरह के विरोध के चलते सरकार ने नवंबर, 2019 में रीजनल कांप्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप (आरसेप) में फ्री ट्रेड एग्रीमेंट में शामिल होने से इनकार कर दिया था क्योंकि उस समय भी आरसेप में शामिल न्यूजीलैंड और आस्ट्रेलिया से सस्ते डेयरी उत्पादों के आयात के कारण देश के करोड़ों डेयरी किसानों के लिए संकट पैदा होने की आशंका जताई गई थी। वाणिज्य मंत्री  पीयूष गोयल कई बार बयान दे चुके हैं कि भारत और ईयू के बीच जल्दी ही एफटीए हो जाएगा। इस समझौते के तहत ईयू के देश भारत के डेयरी और ऑटोमोबाइल बाजार में प्रवेश के लिए रियायत पर जोर दे रहे हैं।

देश के डेयरी उद्योग के लोगों का कहना है कि डेयरी क्षेत्र में ईयू को एफटीए के तहत छूट देने का मतलब होगा कि देश के करीब करोड़ों दुग्ध किसानों के सामने संकट का खड़ा होना। देश में डेयरी सेक्टर पिछले कुछ साल में लगातार किसानों की आय का बेहतर स्रोत बन रहा है। उनका कहना है कि एफटीए के मसौदे को अंतिम रूप देने के पहले हमें डेयरी किसानों के हितों को ध्यान में रखने की जरूरत है। हमें किसी भी कीमत पर किसानों के  हितों पर समझौता नहीं करना चाहिए।

इस समय देश में चीज, आइसक्रीम और यॉगर्ट का 30 फीसदी की दर आयात करने की अनुमति है। बटर और फैट पर 40 फीसदी और मिल्क पाउडर पर 60 फीसदी का आयात शुल्क लागू है। इंडस्ट्री सूत्रों का कहना है कि ऐसे में हमें अपना डेयरी मार्केट ईयू के लिए क्यों खोलना चाहिए। यही नहीं टैरिफ रेट कोटा (टीआरक्यू) के तहत हर साल दस हजार टन स्किम्ड मिल्क पाउडर (एसएमपी) का आयात 15 फीसदी के रियायती आयात शुल्क पर करने की अनुमति है। इसके उपर की मात्रा पर 60 फीसदी का आयात शुल्क लागू है।

सूत्रों के मुताबिक इस समय वाणिज्य मंत्रालय भारत-ईयू एफटीए के लिए संबंधित पक्षों के साथ विचार-विमर्श की प्रक्रिया पर काम कर रहा है। डेयरी उद्योग इन बैठकों में अपनी आशंका जाहिर कर चुका है। उसका कहना है कि यूरोपीय यूनियन के सदस्य देश डेयरी निर्यात में बड़े प्लेयर हैं और कई उत्पादों के मामले में उनके पास निर्यात बाजार की बड़ी हिस्सेदारी है। इसकी बड़ी वजह वहां पर डेयरी किसानों को मिलने वाली भारी सब्सिडी है। ऐसे में हमारे करोड़ों छोटे दूध किसानों के लिए इस प्रतिस्पर्धा में टिकना मुश्किल हो जाएगा।

असल में ईयू को चीज जैसी ऊंची कीमत वाले डेयरी उत्पाद के आयात में रियायत पर विचार किया जा रहा है। डेयरी उद्योग का कहना है कि जब पहले से ही 30 फीसदी के आयात शुल्क पर चीज की कितनी भी मात्रा का आयात किया जा सकता है तो अलग से छूट देने की क्या जरूरत है। भारत में चीज का बाजार करीब 70 हजार टन का है और यह करीब  2100 करोड़ रुपये का मार्केट है। इसमें करीब तीन चौथाई हिस्सा कंज्यूमर पैक में बिकता है जबकि बाकी पीजा हट, डोमिनो, बर्गर किंग, मैकडोनॉल्ड व केएफसी जैसी कंपनियों को जाता है। लेकिन चीज का यह मार्केट सेगमेंट काफी तेजी से बढ़ रहा है। 

उक्त सूत्र का कहना है कि सरकार ने प्रॉडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) स्कीम में निर्यात प्रोत्साहन के लिए मोजरैला चीज को शामिल किया है। इसके चलते डेयरी इंडस्ट्री चीज उत्पादन क्षमता में बढ़ोतरी कर रही है और यह क्षमता दो लाख टन के करीब पहुंच गई है।  ऐसे में ईयू से चीज के आयात पर रियायत देना सरकार की खुद की स्कीम के उद्देश्य के उलट होगा।

भारत हर साल करीब 3000 टन चीज का आयात करता है। जो ऊंची कीमत वाली श्रेणी की चीज होती है। साल 2020 के आंकड़ों के मुताबिक दुनिया के कुल 212.22 लाख टन चीज उपादन में ईयू की हिस्सेदारी 103.5 लाख टन की थी। इसी तरह दुनिया के कुल 21.62 लाख टन चीज निर्यात में ईयू की हिस्सेदारी 9.31 लाख टन थी। जो चीज के कुल वैश्विक बाजार का करीब 34 फीसदी है। वहीं ईयू के देश अपने डेयरी किसानों को भारी सब्सिडी देते हैं। जिसके चलते वहां से दूध के उत्पादों और खासतौर से मिल्क पाउडर, घी और बटर जैसे उत्पादों के सस्ते आयात का खतरा काफी बड़ा है। साथ ही एफटीए के तहत इस सब्सिडी पर चर्चा संभव नहीं है। किसी भी तरह की रियायत का मतलब है कि वहां के डेयरी उत्पादों की भारत में डंपिंग की संभावना बढ़ना। जो देश के करोड़ों डेयरी किसानों के लिए घातक साबित हो सकता है। वहीं नॉन टैरिफ बेरियर्स के जरिये ईयू हमारे डेयरी उत्पादों को अपने मार्केट में प्रवेश से रोकता है। इसलिए जब हम ईयू के साथ एफटीए पर बातचीत करें तो हमारे दिमाग में यह तथ्य होने चाहिए।

भारत ने नवंबर 2019 में आसियान, दक्षिणी कोरिया, जापान, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और चीन समेत 15 देशों वाले रीजनल कांप्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप (आरसेप) के तहत होने वाले एफटीए में शामिल होने से इनकार कर दिया था। इसकी सबसे बड़ी वजह आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड से एफटीए के तहत सस्ते डेयरी उत्पादों के आयात का डर था जो देश के करोड़ों दूध किसानों के लिए मुश्किल पैदा करने वाला साबित हो सकता था। डेयरी उद्योग सूत्रों का कहना है कि अब इसी तरह का समझौता अगर ईयू के साथ होता है तो इसे कैसे जायज ठहराया जा सकता है।