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    <title>Farmer News: Government Schemes for Farmers, Successful Farmer Stories &#45; : International</title>
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    <description>Farmer News: Government Schemes for Farmers, Successful Farmer Stories &amp;#45; : International</description>
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    <item>
        <title><![CDATA[MC14: डब्ल्यूटीओ की मंत्रिस्तरीय बैठक गतिरोध के साथ समाप्त; भारत के प्रयासों के बीच फिशरीज पर वार्ता आगे बढ़ी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/world-trade-organization-mc14-ends-in-deadlock-e-commerce-pact-collapses-fisheries-talks-advance-amid-india’s-push.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 30 Mar 2026 14:04:53 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
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        <description><![CDATA[ <p>डब्ल्यूटीओ की 14वीं मंत्रिस्तरीय बैठक (MC14) बिना किसी ठोस सहमति के समाप्त हो गई। कैमरून के याउंडे में 26-29 मार्च को आयोजित इस सम्मेलन में ई-कॉमर्स, ढांचागत सुधार और कृषि से जुड़े अहम फैसले जिनेवा के लिए टाल दिए गए। यहां बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली में गहरे मतभेद भी उजागर हुए। ई-कॉमर्स मोरेटोरियम जैसे मौजूदा सेफगार्ड प्रावधान समाप्त हो गए। फिशरीज सब्सिडी पर चर्चा, विशेष रूप से अत्यधिक क्षमता और अधिक मछली पकड़ने के मुद्दों पर केंद्र में रही। भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के नेतृत्व में भारत ने इस मुद्दे पर सक्रिय भूमिका निभाई और नीतिगत स्वतंत्रता तथा न्यायसंगत परिणामों पर जोर दिया। गोयल के हस्तक्षेप ने फिशरीज वार्ताओं के दूसरे चरण की रूपरेखा तय करने में अहम भूमिका निभाई, हालांकि इस पर भी व्यापक सहमति नहीं बन सकी।</p>
<p>डब्ल्यूटीओ की महानिदेशक नगोजी ओकोंजो-इवीला ( Ngozi Okonjo-Iweala) ने स्वीकार किया कि सदस्य देश समझौते के काफी करीब पहुंच गए थे, लेकिन सहमति बनाने में विफल रहे। उन्होंने कहा, &ldquo;हम याउंडे पैकेज के बहुत करीब हैं, लेकिन अभी पूरी तरह वहां नहीं पहुंचे हैं।&rdquo; उन्होंने यह भी बताया कि सदस्य देश डब्ल्यूटीओ सुधार, ई-कॉमर्स, ट्रिप्स के तहत नॉन-वायलेशन शिकायतें और एलडीसी पैकेज से जुड़े फैसले के मसौदे को भविष्य की जिनेवा वार्ताओं के आधार के रूप में रखेंगे। यह सम्मेलन हाल के वर्षों की सबसे अनिर्णायक मंत्रिस्तरीय बैठकों में से एक है। इससे बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था के भविष्य को लेकर गहरा विभाजन भी दिखता है।</p>
<p><strong>ई-कॉमर्स मोरेटोरियम समाप्त, शुल्क लगाने का रास्ता खुला</strong></p>
<p>गतिरोध के केंद्र में WTO का इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन पर कस्टम ड्यूटी न लगाने का मोरेटोरियम था, जो 1998 से लागू था। अमेरिका, यूरोपीय संघ और जापान इसे दीर्घकालिक या स्थायी रूप से बढ़ाने के पक्ष में थे। लेकिन भारत और अन्य विकासशील देशों ने यह तर्क देते हुए इसका विरोध किया कि इससे राजस्व हानि स्थायी हो जाएगी और तेजी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था में नीतिगत लचीलापन सीमित हो जाएगा। कृषि वार्ताओं में प्रगति न होने का हवाला देते हुए ब्राजील ने चार साल के विस्तार सहित सभी प्रस्तावों पर असहमति जताई। सहमति न बनने के कारण 26 वर्षों में पहली बार यह मोरेटोरियम समाप्त हो गया, जिससे देशों के लिए डिजिटल ट्रांसमिशन पर शुल्क लगाने का रास्ता खुल गया है।</p>
<p><strong>TRIPS सुरक्षा प्रावधान भी समाप्त</strong></p>
<p>ई-कॉमर्स मोरेटोरियम का विस्तार नहीं होने के चलते TRIPS समझौते के तहत &lsquo;नॉन-वायलेशन&rsquo; शिकायतों के खिलाफ सेफगार्ड प्रावधान भी समाप्त हो गया। विकासशील देश नीतिगत स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए इस प्रावधान पर निर्भर थे, खासकर सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में। इसके बिना WTO के अनुरूप उठाए गए कदम, जैसे अनिवार्य लाइसेंसिंग, को भी विकसित देश चुनौती दे सकते हैं। भारत के लिए इससे बौद्धिक संपदा नियमों, विशेषकर पेटेंट कानून की धारा 3(डी) से जुड़े विवादों का जोखिम बढ़ गया है।</p>
<p><strong>डब्ल्यूटीओ में सुधार पर वार्ता ठप</strong></p>
<p>डब्ल्यूटीओ में सुधार के रोडमैप पर सहमति बनाने के प्रयास भी विफल रहे। वर्ष 2028 तक सुधारों की दिशा में काम करने का प्रस्ताव आम सहमति हासिल नहीं कर सका। मतभेद साफ हैं- विकसित देश तेज निर्णय प्रक्रिया और कड़े नियम चाहते हैं, जबकि विकासशील देश नीतिगत लचीलापन और सर्वसम्मति आधारित प्रणाली को सुरक्षित रखना चाहते हैं। नतीजतन, अन्य मुद्दों की तरह सुधार वार्ता भी बिना किसी ठोस प्रगति के जिनेवा बैठक के लिए टाल दी गई है।</p>
<p><strong>निवेश समझौता अटका, बहुपक्षीय समझौतों की राह आगे बढ़ी</strong></p>
<p>निवेश सुविधा समझौता (IFDA), जिसे अधिकांश देशों का समर्थन प्राप्त है, पर भारत का विरोध है। भारत का तर्क है कि ऐसे बहुपक्षीय (प्लुरिलैटरल) समझौतों को WTO के दायरे में लाने से इसकी बहुपक्षीय प्रकृति कमजोर होगी और छोटे समूह नियम तय करने लगेंगे। भारत के इस रुख ने डब्ल्यूटीओ की सर्वसम्मति आधारित निर्णय प्रणाली के मूल सिद्धांत को सुरक्षित रखने में मदद की है। वहीं 66 देशों ने WTO के बाहर एक अलग ई-कॉमर्स समझौते को आगे बढ़ाया, जो सर्वसम्मति प्रणाली से बाहर नियम बनाने की बढ़ती प्रवृत्ति को दर्शाता है।</p>
<p><strong>कृषि गतिरोध का असर और व्यापक विफलता</strong></p>
<p>कृषि वार्ताओं में लंबे समय से जारी ठहराव से उपजी निराशा ने इस गतिरोध को और गहरा किया, जो विकासशील देशों की प्रमुख प्राथमिकता रही है। ब्राजील ने ई-कॉमर्स पर प्रगति को कृषि मुद्दों से जोड़ दिया, जिससे समझौते की संभावना लगभग समाप्त हो गई। इससे स्पष्ट होता है कि पुराने और अनसुलझे मुद्दे अब डिजिटल व्यापार जैसे नए क्षेत्रों में भी प्रगति में बाधा बन रहे हैं।</p>
<p>MC14 सिर्फ नए समझौते न कर पाने के कारण नहीं, बल्कि मौजूदा ढांचे के कमजोर पड़ने के कारण भी अलग पहचान रखता है। इससे पहले MC11 (ब्यूनस आयर्स, 2017) में नए नियमों पर मतभेद के चलते कोई घोषणा नहीं हो सकी थी, जबकि MC5 (कैनकुन, 2003) में निवेश और प्रतिस्पर्धा जैसे नए मुद्दों पर विवाद के कारण वार्ता टूट गई थी।</p>
<p>लेकिन MC14 पहली ऐसी बैठक है, जहां ई-कॉमर्स और TRIPS से महत्वपूर्ण प्रावधानों को समाप्त होने दिया गया। MC11 के विपरीत, जहां विवाद भविष्य के नियमों को लेकर था, MC14 मौजूदा व्यवस्था को भी बनाए रखने में असफल रहा। कृषि ने ई-कॉमर्स जैसे असंबंधित क्षेत्रों में भी प्रगति रोक दी।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x_69ca350c445c2.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>छोटे मछुआरों से कोई खतरा नहीं: पीयूष गोयल</strong></p>
<p>सतत विकास लक्ष्यों (SDG 14.6) के अनुरूप स्थिरता को प्राथमिकता देते हुए भारत ने जोर दिया कि फेज-II की वार्ताओं में समानता के मूल सिद्धांतों को शामिल किया जाए। इसमें विकासशील और अल्प-विकसित देशों के लिए विशेष एवं विभेदित उपचार (S&amp;DT), साझा लेकिन विभेदित जिम्मेदारियां एवं संबंधित क्षमताएं (CBDR-RC) और &lsquo;प्रदूषक भुगतान सिद्धांत&rsquo; को मान्यता देना शामिल है। इन सिद्धांतों के अनुरूप, वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने विकासशील देशों के लिए 25 वर्ष की संक्रमण अवधि, दूर समुद्री क्षेत्र में मछली पकड़ने वाले बेड़ों पर कड़े नियम, छोटे एवं पारंपरिक मछुआरों के लिए स्थायी छूट, तथा प्रति व्यक्ति सब्सिडी के आधार पर अनुशासन जैसे प्रमुख मुद्दों को रेखांकित किया, जिससे फेज-II वार्ता का दायरा और व्यापक हुआ।</p>
<p>मंत्रिस्तरीय चर्चा के दौरान गोयल ने कहा कि मत्स्य क्षेत्र भारत की खाद्य सुरक्षा और आजीविका सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभाता है। यह 90 लाख से अधिक मछुआरा परिवारों का सहारा है। इनमें अधिकांश छोटे और पारंपरिक मछुआरे हैं, जो टिकाऊ तरीकों का पालन करते हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारत में फिशरीज सब्सिडी विश्व में सबसे कम स्तर पर है। यह प्रति मछुआरा परिवार सालाना लगभग 15 डॉलर है, जबकि अन्य देशों में यह हजारों डॉलर तक पहुंचती है।</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ MC14: डब्ल्यूटीओ की मंत्रिस्तरीय बैठक गतिरोध के साथ समाप्त; भारत के प्रयासों के बीच फिशरीज पर वार्ता आगे बढ़ी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[ईरान युद्ध से उर्वरक व ऊर्जा क्षेत्र को झटका, एशिया की कृषि व अर्थव्यवस्था के लिए बढ़ा जोखिम: एडीबी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/adb-report-middle-east-conflict-triggers-fertiliser-energy-shock-raises-risks-for-asia-agriculture.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 27 Mar 2026 10:49:08 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/adb-report-middle-east-conflict-triggers-fertiliser-energy-shock-raises-risks-for-asia-agriculture.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>इजरायल-अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध (Iran war) एशिया और प्रशांत क्षेत्र में कृषि और आर्थिक स्थिरता के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है। एशियाई विकास बैंक (ADB) की एक रिपोर्ट के अनुसार ऊर्जा, उर्वरक और अन्य कृषि इनपुट की कीमतों में तेज वृद्धि से खेती की लागत बढ़ रही है और खाद्य कीमतों पर दबाव बढ़ रहा है।</p>
<p>रिपोर्ट में कहा गया है कि ऊर्जा आपूर्ति शृंखला और प्रमुख कृषि इनपुट, खासकर उर्वरकों, में व्यवधान का असर अब वैश्विक बाजारों में साफ दिख रहा है। मध्य पूर्व वैश्विक यूरिया निर्यात में लगभग आधा और अमोनिया आपूर्ति में करीब 30% हिस्सा रखता है। ये दोनों फसल उत्पादन के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। आपूर्ति बाधित होने से उर्वरकों की उपलब्धता घटने और कीमतें तेजी से बढ़ने की आशंका है।</p>
<p>इस संकट का एक प्रमुख कारण कतर में उत्पादन में कमी है, जहां दुनिया की बड़ी उर्वरक कंपनियों में से एक QAFCO ने गैस संयंत्र पर हमले के बाद उत्पादन रोक दिया। इससे वैश्विक स्तर पर उर्वरक कीमतों में तेज उछाल आया है।</p>
<p>उर्वरकों के अलावा इस संकट का असर सल्फर और पेट्रोकेमिकल्स जैसे अन्य कृषि-संबंधित इनपुट पर भी पड़ा है। ये कृषि रसायनों के उत्पादन के लिए जरूरी हैं। वैश्विक सल्फर निर्यात का लगभग 45% खाड़ी देशों से आता है, जबकि कतर दुनिया की लगभग एक-तिहाई हीलियम आपूर्ति करता है, जो उर्वरक और औद्योगिक उत्पादन में उपयोगी है।</p>
<p>ऊर्जा कीमतों में उछाल ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। कच्चे तेल की कीमतें फरवरी के अंत में युद्ध शुरू होने से पहले लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास थीं, जो बढ़कर तनाव के चरम पर 120 डॉलर तक पहुंच गई थीं। अब भी ये 100 डॉलर से ऊपर बनी हुई हैं। प्राकृतिक गैस की कीमतों में भी तेज वृद्धि हुई है, जिससे कृषि उत्पादन और परिवहन लागत बढ़ गई है।</p>
<p>एडीबी ने चेतावनी दी है कि इन बढ़ती लागतों का असर खाद्य महंगाई के रूप में सामने आ सकता है। उर्वरक महंगे होने से किसान इनके उपयोग में कमी कर सकते हैं, जिससे पैदावार घट सकती है। साथ ही परिवहन और प्रसंस्करण लागत बढ़ने से खाद्य आपूर्ति शृंखला पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा। एशिया-प्रशांत क्षेत्र इस स्थिति से खास तौर पर प्रभावित है, क्योंकि यहां ऊर्जा और कृषि इनपुट का आयात अधिक होता है।&nbsp;</p>
<p>होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों के यातायात में आई बाधा ने अनिश्चितता को और बढ़ा दिया है। इस मार्ग से जहाजों की आवाजाही में भारी गिरावट आई है, जबकि माल भाड़ा और बीमा लागत बढ़ गई है। इससे भी कृषि इनपुट का आयात महंगा हो गया है। रिपोर्ट के अनुसार आपूर्ति शृंखला में व्यवधान से उर्वरक और कृषि रसायनों की समय पर आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, जिससे बुवाई चक्र और उत्पादन पर असर पड़ेगा।&nbsp;</p>
<p>व्यापक स्तर पर भी इसका असर गंभीर हो सकता है। एडीबी का अनुमान है कि यदि संघर्ष लंबा चलता है, तो विकासशील एशिया की आर्थिक वृद्धि में 1.3 प्रतिशत अंक तक कमी आ सकती है, जबकि मुद्रास्फीति 3.2 प्रतिशत अंक तक बढ़ सकती है। खाद्य महंगाई खास तौर से बढ़ेगी।&nbsp;</p>
<p>रिपोर्ट में कहा गया है कि आयातित इनपुट पर निर्भर अर्थव्यवस्थाएं सबसे अधिक प्रभावित होंगी। किसानों की आय घट सकती है और उन पर वित्तीय दबाव बढ़ सकता है, जबकि सरकारों को खाद्य सुरक्षा बनाए रखने के लिए सब्सिडी का बोझ बढ़ाना पड़ सकता है।</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ ईरान युद्ध से उर्वरक व ऊर्जा क्षेत्र को झटका, एशिया की कृषि व अर्थव्यवस्था के लिए बढ़ा जोखिम: एडीबी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[डब्ल्यूटीओ के कृषि व्यापार नियमों में बड़े बदलाव की मांग, विशेषज्ञ समूह ने दिए अपने सुझाव]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/global-initiative-calls-for-overhaul-of-wto-farm-trade-rule-ahead-of-mc14.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 26 Mar 2026 16:52:28 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/global-initiative-calls-for-overhaul-of-wto-farm-trade-rule-ahead-of-mc14.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>कैमरून में आज से विश्व व्यापार संगठन (WTO) का 14वां मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (MC14) शुरू हो रहा है। इससे पहले एक विशेषज्ञ समूह ने मौजूदा कृषि व्यापार नियमों पर पुनर्विचार करने की मांग उठाई है। इनका कहना है कि वर्तमान ढांचा आधुनिक चुनौतियों का सामना करने में लगातार विफल हो रहा है।</p>
<p>&ldquo;एग्रीमेंट ऑन एग्रीकल्चर री-इमैजिन्ड&rdquo; (AoA ReI) नामक इस पहल ने चेतावनी दी है कि बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, युद्ध और जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों ने वैश्विक व्यापार व्यवस्था की सीमाओं को उजागर कर दिया है। इसके अनुसार, मौजूदा प्रणाली खाद्य सुरक्षा, स्थिरता और लचीलापन सुनिश्चित करने में सक्षम नहीं है।</p>
<p>इस पहल का मुख्य प्रस्ताव &ldquo;सस्टेनेबल फूड सिस्टम्स के लिए कृषि व्यापार पर मॉडल संधि&rdquo; है। यह ढांचा डब्ल्यूटीओ के मौजूदा &ldquo;एग्रीमेंट ऑन एग्रीकल्चर&rdquo; को बदलने या व्यापक रूप से पुनर्गठित करने की बात करता है, जो पिछले लगभग 30 वर्षों से वैश्विक कृषि व्यापार का आधार रहा है।</p>
<p>AoA ReI की को-लीडर कैरोलिन डोमेन के अनुसार, छोटे-मोटे सुधार अब पर्याप्त नहीं हैं। उनका कहना है कि अंतरराष्ट्रीय कृषि व्यापार को संचालित करने के लिए साहसिक और संरचनात्मक बदलाव जरूरी हैं।</p>
<p>डब्ल्यूटीओ के भीतर सुधार वार्ताएं लगातार ठप रही हैं। वर्ष 2024 में आयोजित पिछली मंत्रिस्तरीय बैठक में भी सदस्य देशों के बीच सहमति नहीं बन सकी थी। प्रमुख कृषि निर्यातकों, उभरती अर्थव्यवस्थाओं और खाद्य आयातक देशों के बीच मतभेदों के कारण घरेलू सब्सिडी, सार्वजनिक भंडारण और निर्यात प्रतिबंध जैसे अहम मुद्दों पर प्रगति रुक गई है।</p>
<p>इंस्टीट्यूट फॉर एग्रीकल्चर एंड ट्रेड पॉलिसी की कार्यकारी निदेशक और पहल की को-लीडर सोफिया मर्फी ने कहा कि मौजूदा नियम बाजार विस्तार को प्राथमिकता देते हैं, जबकि आज की जरूरत स्थिरता और लचीलापन है। उन्होंने कहा कि वैश्विक खाद्य प्रणाली जलवायु अस्थिरता, जैव विविधता ह्रास, आपूर्ति श्रृंखला संकट और बढ़ती असमानताओं से जूझ रही है।</p>
<p>पहल की को-लीडर लिसा बुर्गी बोनानोमी ने कहा कि व्यापार महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे स्थानीय खाद्य उत्पादन का पूरक होना चाहिए। वहीं, अर्थशास्त्री बिस्वजीत धर ने चेतावनी दी कि यदि वर्तमान ढांचा विफल होता रहा, तो वैश्विक कृषि व्यापार में नीतिगत शून्य उत्पन्न हो सकता है।</p>
<p>प्रस्तावित मॉडल संधि का उद्देश्य वैश्विक स्तर पर चर्चा को बढ़ावा देना है, जिसमें टिकाऊ खाद्य प्रणालियों, समान आर्थिक परिणामों और मानवाधिकार व विकास लक्ष्यों के अनुरूप व्यापार सिद्धांतों को प्राथमिकता दी जाए।</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ डब्ल्यूटीओ के कृषि व्यापार नियमों में बड़े बदलाव की मांग, विशेषज्ञ समूह ने दिए अपने सुझाव ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[MC14: डब्ल्यूटीओ का 14वां मंत्रिस्तरीय सम्मेलन आज से, पीयूष गोयल करेंगे भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/14th-ministerial-conference-of-wto-mc14-to-begin-today-piyush-goyal-to-lead-indian-delegation.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 26 Mar 2026 10:53:03 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/14th-ministerial-conference-of-wto-mc14-to-begin-today-piyush-goyal-to-lead-indian-delegation.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>विश्व व्यापार संगठन (WTO) का 14वां मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (MC14) 26 से 29 मार्च 2026 तक कैमरून के याउंडे में आयोजित किया जा रहा है। इस सम्मेलन की अध्यक्षता कैमरून के व्यापार मंत्री लुक मैगलॉयर म्बार्गा करेंगे। इसमें डब्ल्यूटीओ के सदस्य देशों के व्यापार मंत्री वैश्विक व्यापार प्रणाली से जुड़े प्रमुख मुद्दों पर चर्चा करेंगे।</p>
<p>इस सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल कर रहे हैं। प्रतिनिधिमंडल में वाणिज्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारी, जिनेवा स्थित भारत के स्थायी मिशन के अधिकारी, विभिन्न मंत्रालयों एवं विभागों के प्रतिनिधि तथा तकनीकी और कानूनी विशेषज्ञ शामिल होंगे, जो अलग-अलग वार्ता क्षेत्रों में भाग लेंगे। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अनुसार, चर्चा के प्रमुख एजेंडा में WTO सुधार, ई-कॉमर्स वर्क प्रोग्राम एंड मोरेटोरियम, विकास के लिए निवेश सुविधा (IFD), फिशरीज सब्सिडी तथा कृषि और विकास से जुड़े मुद्दे शामिल हैं।</p>
<p><strong>खाद्य सुरक्षा को प्राथमिकता</strong></p>
<p>वाणिज्य मंत्रालय ने कहा है कि भारत बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली को मजबूत करने के उद्देश्य से सार्थक WTO सुधार का समर्थन जारी रखेगा, जिसमें विकास संबंधी चिंताओं को केंद्र में रखा जाएगा। भारत डब्ल्यूटीओ के बहुपक्षीय जनादेश का सम्मान करने, खाद्य सुरक्षा को प्राथमिकता देने, छोटे किसानों और मछुआरों की आजीविका की रक्षा करने तथा विशेष रूप से डिजिटल व्यापार जैसे उभरते क्षेत्रों में विकासशील देशों के लिए पर्याप्त स्थान सुनिश्चित करने पर जोर देगा।</p>
<p><a href="https://www.ruralvoice.in/international/wto-mc14-set-to-expose-deep-divides-as-key-trade-issues-head-for-stalemate.html"><strong>यह भी पढ़ें- गहराते मतभेदों के कारण प्रमुख मुद्दों पर गतिरोध के आसार</strong></a></p>
<p>भारत एक खुले, निष्पक्ष, समावेशी और गैर-भेदभावपूर्ण बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली की आवश्यकता पर जोर देता रहा है जिसमें डब्ल्यूटीओ की केंद्रीय भूमिका हो। भारत ने माराकेश समझोते (Marrakesh Agreement) में निहित गैर-भेदभाव के सिद्धांत को डब्ल्यूटीओ ढांचे का आधार बताया है।</p>
<p><strong>पब्लिक स्टॉकहोल्डिंग पर स्थायी समाधान चाहता है भारत</strong></p>
<p>इसके साथ ही भारत ने विकास-केंद्रित एजेंडा की आवश्यकता पर भी जोर दिया है, जिसमें खाद्य सुरक्षा के लिए पब्लिक स्टॉकहोल्डिंग (PSH) पर स्थायी समाधान, विकासशील और अल्पविकसित देशों (LDCs) के लिए विशेष एवं भिन्न व्यवहार (S&amp;DT) प्रावधानों का प्रभावी कार्यान्वयन तथा एक पूर्ण रूप से कार्यशील, विवाद निपटाने के लिए स्वतः संचालित और बाध्यकारी तंत्र की बहाली शामिल है। भारत के लिए PSH पर स्थायी समाधान अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश के अधिकांश किसान कम आय और सीमित संसाधन वाले हैं। वे न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) प्रणाली पर निर्भर हैं।</p>
<p>फिशरीज सब्सिडी के मुद्दे पर भारत ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की वकालत की है, जिसमें सस्टेनेबिलिटी के साथ-साथ मछुआरों की आजीविका की सुरक्षा सुनिश्चित हो। भारत ने यह भी कहा है कि तट से दूर पानी में मछली पकड़ने वाले देशों को अपनी क्षमता में क्रमिक कमी सहित अनुपातिक जिम्मेदारियां निभानी चाहिए।</p>
<p><strong>द्विपक्षीय व्यापार वार्ताओं में भी प्रगति</strong></p>
<p>भारत अपने द्विपक्षीय व्यापार संबंधों को भी सक्रिय रूप से आगे बढ़ा रहा है। हाल में भारत ने इंग्लैंड और ओमान के साथ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) किए हैं, जबकि न्यूजीलैंड और यूरोपियन यूनियन जैसे प्रमुख साझेदारों के साथ वार्ताओं में प्रगति हुई है। कई अन्य देशों के साथ FTA वार्ताएं जारी हैं। भारत के एफटीए WTO सिद्धांतों के अनुरूप हैं और नियम-आधारित बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं।&nbsp;</p>
<p>MC14 के दौरान वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री और वाणिज्य सचिव स्तर पर कई द्विपक्षीय बैठकें भी निर्धारित हैं। इन बैठकों के माध्यम से प्रमुख मुद्दों पर विचार-विमर्श और द्विपक्षीय व्यापार संबंधों को मजबूत करने पर चर्चा की जाएगी।</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ MC14: डब्ल्यूटीओ का 14वां मंत्रिस्तरीय सम्मेलन आज से, पीयूष गोयल करेंगे भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[गरीब देशों में जलवायु परिवर्तन से मौतें अमीर देशों की तुलना में 10 गुना अधिक होने का अनुमान: रिपोर्ट]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/climate-change-deaths-in-poor-countries-estimated-to-be-10-times-higher-than-in-rich-countries-report.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 25 Mar 2026 18:42:17 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/climate-change-deaths-in-poor-countries-estimated-to-be-10-times-higher-than-in-rich-countries-report.html</guid>
        <description><![CDATA[ <section class="text-token-text-primary w-full focus:outline-none [--shadow-height:45px] has-data-writing-block:pointer-events-none has-data-writing-block:-mt-(--shadow-height) has-data-writing-block:pt-(--shadow-height) [&amp;:has([data-writing-block])&gt;*]:pointer-events-auto scroll-mt-(--header-height)" dir="auto" data-turn-id="015fc79c-c1e2-4fef-adfd-f5528437a0f5" data-testid="conversation-turn-1" data-scroll-anchor="false" data-turn="user"></section>
<section class="text-token-text-primary w-full focus:outline-none [--shadow-height:45px] has-data-writing-block:pointer-events-none has-data-writing-block:-mt-(--shadow-height) has-data-writing-block:pt-(--shadow-height) [&amp;:has([data-writing-block])&gt;*]:pointer-events-auto scroll-mt-[calc(var(--header-height)+min(200px,max(70px,20svh)))]" dir="auto" data-turn-id="request-WEB:3e4773f1-15e5-45b1-880b-246c611439cb-12" data-testid="conversation-turn-2" data-scroll-anchor="true" data-turn="assistant">
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<p data-start="106" data-end="383">एक नई रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि बढ़ते तापमान के कारण होने वाली मौतों का बोझ दुनिया के गरीब देशों पर असमान रूप से पड़ेगा। <strong><em data-start="230" data-end="253">क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब</em> </strong>की इस <strong><a href="https://impactlab.org/news-insights/climate-change-is-projected-to-cause-ten-times-more-people-to-die-in-poor-countries-than-rich-countries/">रिपोर्ट</a></strong> के अनुसार, 2050 तक गर्मी से होने वाली मौतें अमीर देशों की तुलना में गरीब देशों में लगभग 10 गुना अधिक हो सकती हैं।</p>
<p data-start="385" data-end="605">रिपोर्ट बताती है कि हर साल रिकॉर्ड तोड़ गर्मी हजारों लोगों की जान लेती हैं और भविष्य में यह संकट और गहराने वाला है। अनुमान है कि तापमान से जुड़ी 90 प्रतिशत से अधिक मौतें निम्न और मध्यम आय वाले देशों में होंगी। इन देशों में कूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, स्वास्थ्य सेवाओं और जलवायु-संवेदनशील शहरी नियोजन की कमी उनकी अनुकूलन क्षमता को सीमित करती है।</p>
<p data-start="385" data-end="605">क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब के को-फाउंडर और&nbsp;रिपोर्ट के सह-लेखक <strong>माइकल ग्रीनस्टोन</strong> के अनुसार, "यह जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक है कि जिन देशों ने इस संकट में सबसे कम योगदान दिया, वही इसके सबसे बड़े शिकार बनेंगे। सीमित संसाधनों के कारण ये देश नई जलवायु चुनौतियों से निपटने में भी पीछे हैं।"&nbsp;</p>
<p>रिपोर्ट बताती है कि समस्या केवल यह नहीं है कि गर्म क्षेत्रों में ठंडे क्षेत्रों की तुलना में अधिक मौतें होंगी, बल्कि सबसे अधिक प्रभाव उन क्षेत्रों पर पड़ेगा जो एक साथ अधिक गर्म और गरीब हैं, क्योंकि उनके पास अनुकूलन के लिए संसाधन सीमित हैं।</p>
<p data-start="871" data-end="1131">अधिक तापमान से होने वाली मौतों को कम करना काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकारें और समाज किस तरह के अनुकूलन उपाय अपनाते हैं। एयर कंडीशनिंग, कूलिंग सेंटर, और स्वास्थ्य सुरक्षा ढांचे में निवेश जैसे कदम लाखों जानें बचा सकते हैं।</p>
<p data-start="1133" data-end="1374">रिपोर्ट वैश्विक स्तर पर असमानता को उजागर करती है। उदाहरण के लिए, पश्चिम अफ्रीका का बुर्किना फासो, जहां जलवायु परिस्थितियां कुवैत जैसी हैं, वहां गर्मी से होने वाली मौतें कुवैत से दोगुनी हो सकती हैं, क्योंकि वहां अनुकूलन के संसाधन सीमित हैं।</p>
<p><strong>भारत: क्षेत्रीय असमानताएं स्पष्ट</strong></p>
<p>भारत में तापमान से जुड़ी मृत्यु दर में औसतन 2.4 मौत प्रति 1 लाख लोगों की वृद्धि का अनुमान है, जिससे देश 241 क्षेत्रों में 76वें स्थान पर है। हालांकि, यह औसत आंकड़ा देश के भीतर गहरी क्षेत्रीय असमानताओं को छुपाता है।&nbsp;&nbsp;</p>
<ul>
<li>दक्षिण-पश्चिम, पूर्वी और अत्यधिक उत्तरी क्षेत्रों में मृत्यु दर में कमी का अनुमान है।</li>
<li>कश्मीर के पदम में लगभग 25 प्रति लाख की कमी देखी जा सकती है।</li>
<li>उत्तर-पश्चिम और उत्तर-मध्य भारत में मृत्यु दर में सबसे अधिक वृद्धि का अनुमान है।</li>
<li>राजस्थान के करणपुर में यह वृद्धि 26 प्रति लाख तक हो सकती है।</li>
</ul>
<p>सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में गर्मी से होने वाली अतिरिक्त मौतें (लगभग 23-25 प्रति लाख) वर्तमान में तपेदिक और मधुमेह जैसी बीमारियों से होने वाली मृत्यु दर के बराबर हो सकती हैं।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x_69c3df124fd37.jpg" alt="" style="display: block; margin-left: auto; margin-right: auto;" /></p>
<p><strong>जलवायु परिवर्तन और असमानता&nbsp;</strong></p>
<p>रिपोर्ट रेखांकित करती है कि जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं है, बल्कि यह गहरी सामाजिक और आर्थिक असमानताओं से जुड़ा संकट भी है। गरीब क्षेत्रों में पहले से ही अधिक तापमान का सामना करना पड़ता है जहां अनुकूलन के लिए कई बाधाएं मौजूद हैं।</p>
<p data-start="2104" data-end="2348">रिपोर्ट की शोध प्रमुख <strong>तम्मा कार्लेटन</strong> का कहना है कि जिन क्षेत्रों में मृत्यु दर में सबसे अधिक वृद्धि होगी, वहीं संसाधनों और सरकारी क्षमता की सबसे अधिक कमी है और वहां अंतरराष्ट्रीय निवेश भी सीमित रहा है।&nbsp;ऐसे में सीमित संसाधनों का सही दिशा में निवेश करना तय करेगा कि भविष्य में कौन जीवित रहेगा और कौन नहीं।</p>
<p data-start="2350" data-end="2650" data-is-last-node="" data-is-only-node="">यह रिपोर्ट &ldquo;एडाप्टेशन रोडमैप&rdquo; श्रृंखला की पहली कड़ी है, जिसका उद्देश्य यह बताना है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए किन क्षेत्रों में और किस प्रकार के निवेश सबसे प्रभावी होंगे। रिपोर्ट में दुनिया भर के उन इलाकों की पहचान की गई है जहां क्लाइमेट अडैप्टेशन इन्वेस्टमेंट से सबसे ज्यादा जानें बचाई जा सकती हैं।</p>
<p data-start="2350" data-end="2650" data-is-last-node="" data-is-only-node=""></p>
</div>
</div>
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</div>
</div>
</div>
</section> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ गरीब देशों में जलवायु परिवर्तन से मौतें अमीर देशों की तुलना में 10 गुना अधिक होने का अनुमान: रिपोर्ट ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[चीन में 2026&amp;#45;27 के दौरान अनाज उत्पादन बढ़ने का अनुमान, खाद्य सुरक्षा के लिए सोयाबीन आयात भी बढ़ाएगा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/china-boosts-grain-output-expands-soybean-import-to-secure-food-and-feed-demand.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 25 Mar 2026 13:16:07 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/china-boosts-grain-output-expands-soybean-import-to-secure-food-and-feed-demand.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) की फॉरेन एग्रीकल्चरल सर्विस (FAS) के अनुसार, 2026-27 में चीन का अनाज उत्पादन बढ़ने का अनुमान है। इसमें प्रमुख भूमिका बेहतर उत्पादकता और नीतिगत समर्थन की है, न कि खेती के क्षेत्र में बड़े विस्तार की।</p>
<p>इस सीजन के दौरान चीन में मक्का उत्पादन 30.5 करोड़ टन तक पहुंचने का अनुमान है, जो बेहतर पैदावार और आनुवंशिक रूप से संशोधित किस्मों के बढ़ते उपयोग से संभव होगा। हालांकि, खपत 32.3 करोड़ टन रहने का अनुमान है, जो उत्पादन से अधिक है। इस कारण चीन 80 लाख टन मक्के का आयात कर सकता है। मक्का चीन के पशु-चारा क्षेत्र का मुख्य आधार है, जहां इसका उपयोग 24.1 करोड़ टन तक पहुंच सकता है। प्रमुख अनाजों का कुल चारा उपयोग 29.07 करोड़ टन रहने का अनुमान है।</p>
<p>चीन आयात को टैरिफ रेट कोटा (TRQ) के माध्यम से सख्ती से नियंत्रित करता है। दूसरी तरफ, घरेलू उत्पादन बढ़ाने तथा भंडार प्रबंधन पर जोर देता है। ज्वार और जौ जैसे अनाज चारा मांग को पूरा करने में महत्वपूर्ण बने हुए हैं। इस वर्ष ज्वार आयात 78 लाख टन और जौ आयात 105 लाख टन रहने का अनुमान है।</p>
<p>गेहूं उत्पादन बढ़कर 14.01 करोड़ टन रहने की संभावना है, जबकि खपत 15 करोड़ टन तक पहुंच सकती है। गेहूं की खाद्य मांग स्थिर बनी हुई है, लेकिन बदलती खान-पान आदतों और बढ़ती उम्र की आबादी के कारण पारंपरिक आटा उपयोग में कमी आ रही है, वहीं ब्रेड और बेकरी उत्पादों की मांग बढ़ रही है। चावल उत्पादन 21 करोड़ टन तक पहुंच सकता है, जबकि इसकी खपत घटकर 14.5 करोड़ टन रह सकती है। इसका कारण जनसंख्या में कमी और खान-पान की बदलती प्रवृत्तियां हैं।</p>
<p><strong>सोयाबीन का अधिक आयात करेगा चीन</strong></p>
<p>अनाज के साथ चीन सोयाबीन आयात भी बढ़ाने जा रहा है ताकि प्रोटीन युक्त चारे की बढ़ती मांग को पूरा किया जा सके। 2026-27 में सोयाबीन आयात 10.8 करोड़ टन रहने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष से 20 लाख टन अधिक होगा। यह वृद्धि विशेष रूप से पोल्ट्री और एक्वाकल्चर में मांग बढ़ने से हो रही है।</p>
<p>अमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव कम होने के बाद चीन ने अमेरिकी सोयाबीन की खरीद फिर से शुरू कर दी है, और द्विपक्षीय समझौतों के तहत बड़ी मात्रा में खरीद पहले ही की जा चुकी है। घरेलू सोयाबीन उत्पादन थोड़ा बढ़कर 202 लाख टन रहने की संभावना है, हालांकि यह मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है।</p>
<p>सोयाबीन क्रशिंग (पेराई) में भी वृद्धि का अनुमान है, हालांकि कुल क्षमता का पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा है। सरकार तिलहन में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए अनुसंधान, प्रोत्साहन और रकबा विस्तार पर काम कर रही है। इसके अलावा, कनाडा से कैनोला आयात भी फिर शुरू होने की संभावना है, क्योंकि टैरिफ में कमी की गई है। इससे तिलहन बाजार में संतुलन बनेगा और विकल्पों पर निर्भरता कम होगी।</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ चीन में 2026-27 के दौरान अनाज उत्पादन बढ़ने का अनुमान, खाद्य सुरक्षा के लिए सोयाबीन आयात भी बढ़ाएगा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[विश्व मौसम विज्ञान संगठन की चेतावनी: पृथ्वी का जलवायु असंतुलन वैश्विक खाद्य सुरक्षा और कृषि के लिए खतरा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/wmo-climate-imbalance-global-agriculture-risks.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 24 Mar 2026 17:27:17 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/wmo-climate-imbalance-global-agriculture-risks.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>पृथ्वी की जलवायु प्रणाली तेजी से &ldquo;असंतुलित&rdquo; होती जा रही है, जिसका वैश्विक कृषि, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। यह बात विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की एक नई रिपोर्ट में सामने आई है। सोमवार को जारी <strong>&lsquo;स्टेट ऑफ द ग्लोबल क्लाइमेट रिपोर्ट 2025&rsquo;</strong> में बताया गया है कि मानव-जनित जलवायु परिवर्तन से दुनिया की कृषि प्रणाली सीधे प्रभावित हो रही है।</p>
<p>इस समस्या के केंद्र में पृथ्वी का बढ़ता ऊर्जा असंतुलन है। पृथ्वी द्वारा सूर्य से अवशोषित ऊर्जा और वातावरण में वापस छोड़ी जाने वाली ऊष्मा के बीच के अंतर को ऊर्जा असंतुलन कहते हैं। ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के कारण यह असंतुलन तेजी से बढ़ रहा है, जिससे जलवायु प्रणाली में अतिरिक्त गर्मी जमा हो रही है। इस अतिरिक्त गर्मी का 90% से अधिक हिस्सा महासागर अवशोषित कर रहे हैं। इससे मौसम के पैटर्न में व्यापक बदलाव हो रहे हैं, जो कृषि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।</p>
<p>किसानों के लिए इसके प्रभाव पहले से ही दिखाई देने लगे हैं। बढ़ते तापमान के कारण फसलों के तैयार होने की अवधि कम हो रही है, जिससे गेहूं, चावल और मक्का जैसी प्रमुख खाद्य फसलों की पैदावार घट रही है। हीट स्ट्रेस का असर पशुधन की उत्पादकता, दुग्ध उत्पादन और पशुओं के स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है। उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में, जहां कृषि जलवायु पर अत्यधिक निर्भर है, इन बदलावों का प्रबंधन दिन-ब-दिन कठिन होता जा रहा है।</p>
<p>अनियमित वर्षा इस रिपोर्ट में उजागर की गई एक और बड़ी चिंता है। मानसून और मौसमी वर्षा के पैटर्न अब कम अनुमान योग्य हो गए हैं, जिससे किसानों के लिए बुवाई और कटाई की योजना बनाना मुश्किल हो गया है। लंबे सूखे के बाद अचानक भारी बारिश की घटनाएं खड़ी फसलों को नुकसान पहुंचा रही हैं, मिट्टी की सेहत को बिगाड़ रही हैं और बाढ़ के जोखिम को बढ़ा रही हैं।</p>
<p>रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि अल नीनो (El Ni&ntilde;o) और (La Ni&ntilde;a) जैसे प्राकृतिक जलवायु चक्र अब दीर्घकालिक तापमान वृद्धि के रुझानों के साथ मिलकर उनके प्रभाव को और बढ़ा रहे हैं। इसके चलते कुछ क्षेत्रों में सूखे की घटनाएं अधिक बार और अधिक तीव्र हो रही हैं, जबकि अन्य क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा और बाढ़ की स्थिति बन रही है। दोनों ही कृषि उत्पादन को बाधित करते हैं।</p>
<p>महासागरों के गर्म होने का कृषि पर परोक्ष प्रभाव भी पड़ रहा है। गर्म समुद्र अधिक शक्तिशाली चक्रवातों और चरम मौसम घटनाओं को जन्म देते हैं, जो फसलों को तबाह कर सकते हैं, सिंचाई इन्फ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचा सकते हैं और आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधित कर सकते हैं। तटीय कृषि प्रणालियां विशेष रूप से अधिक संवेदनशील हैं, क्योंकि समुद्र स्तर में वृद्धि से मिट्टी की लवणता बढ़ती है, जिससे फसल उत्पादकता घटती है।</p>
<p>रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि जलवायु परिवर्तन कीटों और बीमारियों के प्रसार को तेज कर रहा है। बढ़ते तापमान और बदलते आर्द्रता स्तर कीटों, रोगजनकों और आक्रामक प्रजातियों के लिए अनुकूल परिस्थितियां पैदा कर रहे हैं, जिससे फसल नुकसान बढ़ रहा है और कीटनाशकों पर निर्भरता भी बढ़ रही है। इससे न केवल किसानों की उत्पादन लागत बढ़ती है, बल्कि पर्यावरण और स्वास्थ्य पर भी खतरा उत्पन्न होता है।</p>
<p>इन परिवर्तनों के कारण खाद्य सुरक्षा संबंधी चिंताएं और अधिक गंभीर होती जा रही हैं। घटती पैदावार, बढ़ती उत्पादन लागत और बाजार की अस्थिरता मिलकर किसानों की आय पर दबाव डाल रही हैं। विशेष रूप से भारत जैसे विकासशील देशों के छोटे और सीमांत किसान सबसे अधिक प्रभावित हैं, क्योंकि उनके पास संसाधनों, तकनीक और जलवायु-लचीले इनपुट तक सीमित पहुंच होती है।</p>
<p>डब्ल्यूएमओ ने जोर देकर कहा है कि जलवायु अनुकूलन रणनीतियों के केंद्र में कृषि को रखा जाना चाहिए। जलवायु-लचीली फसल किस्मों को बढ़ावा देना, जल प्रबंधन में सुधार, प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करना और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाना, संवेदनशीलता कम करने के लिए महत्वपूर्ण कदम हैं। शोध और विस्तार सेवाओं में निवेश भी किसानों को बदलती परिस्थितियों के अनुरूप ढलने में अहम भूमिका निभाएगा।</p>
<p>रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि जलवायु प्रणाली में संतुलन बहाल करने के लिए सभी क्षेत्रों, विशेषकर कृषि से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना आवश्यक है। टिकाऊ भूमि उपयोग पद्धतियां, उर्वरकों का कुशल प्रबंधन और एग्रोफॉरेस्ट्री (कृषि वानिकी) जैसे उपाय शमन और अनुकूलन दोनों में योगदान दे सकते हैं।</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ विश्व मौसम विज्ञान संगठन की चेतावनी: पृथ्वी का जलवायु असंतुलन वैश्विक खाद्य सुरक्षा और कृषि के लिए खतरा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[ट्रंप ने ईरान पर 5 दिनों के लिए हमले रोकने का दिया आदेश, सकारात्मक बातचीत का दिया हवाला, लेकिन ईरान का वार्ता से इनकार]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/trump-postpones-iran-strikes-oil-prices-slide-march-2026.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 23 Mar 2026 18:16:29 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/trump-postpones-iran-strikes-oil-prices-slide-march-2026.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने ईरान के ऊर्जा ठिकानों पर अगले 5 दिनों तक हमले नहीं करने का आदेश दिया है। उन्होंने अमेरिका और ईरान के बीच हुई &ldquo;सकारात्मक बातचीत&rdquo; का हवाला देते हुए यह फैसला लिया। इससे पहले उन्होंने 48 घंटे का अल्टीमेटम देते हुए चेतावनी दी थी कि यदि वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह नहीं खोला गया, तो ईरान के ऊर्जा ठिकानों पर हमला किया जाएगा। हालांकि ईरान ने अमेरिका के साथ किसी भी तरह की बातचीत की पुष्टि नहीं की है।&nbsp;</p>
<p>अपने नए फैसले की जानकारी देते हुए उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, &lsquo;मुझे यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है कि अमेरिका और ईरान के बीच पिछले दो दिनों में मध्य पूर्व में हमारी शत्रुता के पूर्ण और समग्र समाधान को लेकर अत्यंत सकारात्मक बातचीत हुई है। इन गहन, विस्तृत और रचनात्मक चर्चाओं के स्वर और दिशा को देखते हुए, जो पूरे सप्ताह जारी रहेंगी, मैंने युद्ध मंत्रालय को निर्देश दिया है कि वह ईरान के बिजली संयंत्रों और ऊर्जा इन्फ्रास्ट्रक्चर पर प्रस्तावित सभी सैन्य हमलों को पांच दिनों के लिए स्थगित कर दे। यह निर्णय जारी बैठकों और वार्ताओं की सफलता पर निर्भर करेगा। इस विषय पर आपके ध्यान के लिए धन्यवाद!&rsquo; ट्रंप की इस घोषणा से उम्मीद बढ़ी है कि इस संघर्ष का कूटनीतिक समाधान संभव हो सकता है।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x_69c135f4635e7.jpg" alt="" /></p>
<p>इस घोषणा का वैश्विक बाजारों पर तत्काल असर पड़ा। तनाव कम होने की उम्मीदों के बीच कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट दर्ज की गई। ब्रेंट क्रूड की कीमत 6.5% गिरकर 105 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई, जबकि अमेरिकी डब्ल्यूटीआई की कीमत 5.8% घटकर 92.4 डॉलर प्रति बैरल हो गई। कच्चे तेल के दाम में गिरावट एक समय 8% तक चली गई थी।</p>
<p>दो दिन पहले अमेरिका ने ईरान को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खोलने के लिए 48 घंटे की समय सीमा तय की थी और चेतावनी दी थी कि ऐसा न होने पर सैन्य कार्रवाई की जाएगी। होर्मुज जलमार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की एक अहम धुरी है और इसमें व्यवधान अंतरराष्ट्रीय व्यापार और तेल बाजारों पर गहरा प्रभाव डाल रहा है।</p>
<p>अमेरिका की इस चेतावनी पर ईरान ने भी कड़े जवाब की चेतावनी दी थी। तेहरान ने कहा था कि वह मध्य पूर्व में ऊर्जा इन्फ्रास्ट्रक्चर को निशाना बना सकता है। यदि उसके तटों या रणनीतिक ठिकानों पर हमला हुआ, तो वह फारस की खाड़ी को अवरुद्ध करने के लिए समुद्री बारूदी सुरंगों का इस्तेमाल भी कर सकता है।</p>
<p>सैन्य टकराव में यह ताजा विराम कूटनीति के लिए एक संभावित अवसर का संकेत देता है, हालांकि क्षेत्र में अनिश्चितता अब भी बनी हुई है। विश्लेषकों का कहना है कि भले ही फिलहाल तनाव कम हुआ हो, लेकिन स्थिति अब भी नाजुक है और जारी वार्ताओं के परिणाम के आधार पर तेजी से बदल सकती है। यह सैन्य टकराव 28 फरवरी को तब शुरू हुआ जब इजरायल और अमेरिका ने ईरान पर हमले किए।</p>
<p><strong>ईरान का इनकार</strong></p>
<p>इस बीच, ईरान की तसनीम न्यूज एजेंसी ने एक वरिष्ठ ईरानी अधिकारी के हवाले से बताया कि होर्मुज जलडमरूमध्य के युद्ध-पूर्व स्थिति में लौटने की संभावना नहीं है, और वैश्विक ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता बनी रहेगी। अधिकारी ने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका के साथ फिलहाल कोई बातचीत नहीं चल रही है। रिपोर्ट के अनुसार, अधिकारी ने दावा किया कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने वित्तीय बाजारों के दबाव में ईरान के महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर हमले की योजना से पीछे हटने का फैसला किया है। उन्होंने यह भी कहा कि तेहरान तब तक अपनी रक्षात्मक रणनीति जारी रखेगा जब तक वह अपनी प्रतिरोध क्षमता को दोबारा स्थापित नहीं कर लेता।</p>
<p>ईरान की फार्स समाचार एजेंसी ने भी एक स्रोत के हवाले से बताया कि डोनाल्ड ट्रंप के साथ कोई सीधा संपर्क नहीं हुआ है, यहां तक कि किसी मध्यस्थ के जरिए भी नहीं। स्रोत ने आरोप लगाया कि ईरान द्वारा किसी भी संभावित हमले के जवाब में बिजली संयंत्रों को निशाना बनाने की चेतावनी के बाद ट्रंप पीछे हट गए।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ ट्रंप ने ईरान पर 5 दिनों के लिए हमले रोकने का दिया आदेश, सकारात्मक बातचीत का दिया हवाला, लेकिन ईरान का वार्ता से इनकार ]]></media:description>
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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[WTO MC14: गहराते मतभेदों के कारण प्रमुख व्यापारिक मुद्दों पर गतिरोध बने रहने के आसार]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/wto-mc14-set-to-expose-deep-divides-as-key-trade-issues-head-for-stalemate.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 21 Mar 2026 17:06:44 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/wto-mc14-set-to-expose-deep-divides-as-key-trade-issues-head-for-stalemate.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>विश्व व्यापार संगठन (WTO) के 166 सदस्य देशों के व्यापार मंत्री 26 से 29 मार्च तक कैमरून के याउंदे (Yaound&eacute;) में 14वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (MC14) में भाग लेंगे। यह बैठक ऐसे समय हो रही है जब वैश्विक व्यापार 35 ट्रिलियन डॉलर के पार पहुंच चुका है, लेकिन बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली गंभीर दबाव का सामना कर रही है। कृषि सब्सिडी, खाद्य सुरक्षा के लिए सार्वजनिक भंडारण, फिशरीज सब्सिडी, डिजिटल व्यापार नियम और विवाद निपटान सुधार जैसे अहम मुद्दों पर विकसित और विकासशील देशों के बीच गहरे मतभेद बने हुए हैं।</p>
<p>थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनीशिएटिव (GTRI) और रिसर्च एंड इन्फॉर्मेशन सिस्टम फॉर डेवलपिंग कंट्रीज (RIS) ने अपनी रिपोर्टों में कहा है कि प्रमुख वार्ता मसौदों पर सहमति के अभाव और दोनों पक्षों के अड़े रहने के कारण बड़े नतीजों की उम्मीद कम है। इसके बजाय, MC14 को एक &ldquo;होल्डिंग&rdquo; मंत्रिस्तरीय सम्मेलन के रूप में देखा जा रहा है, जहां ई-कॉमर्स मोरेटोरियम और खाद्य भंडारण पर पीस क्लॉज जैसे मौजूदा प्रावधानों को आगे बढ़ाने पर ध्यान रहेगा, जबकि विवादित मुद्दों को भविष्य के लिए टाल दिया जाएगा।&nbsp;</p>
<p><strong>कृषि वार्ता: प्रमुख मुद्दों पर लगातार गतिरोध</strong></p>
<p>डब्ल्यूटीओ वार्ताओं में कृषि अब भी सबसे विवादास्पद क्षेत्र बना हुआ है, जो खाद्य सुरक्षा की जरूरतों और व्यापार उदारीकरण के लक्ष्यों के बीच गहरे टकराव को दर्शाता है। चर्चाएं मुख्य रूप से सार्वजनिक भंडारण (PSH), घरेलू समर्थन, बाजार पहुंच, निर्यात प्रतिबंध, कपास और विशेष सुरक्षा तंत्र (SSM) जैसे प्रमुख मुद्दों पर केंद्रित हैं।</p>
<p>विकसित देश सभी मुद्दों को एक साथ शामिल करते हुए व्यापक वार्ता के दृष्टिकोण का समर्थन करते हैं। इसके विपरीत, भारत सहित विकासशील देश सार्वजनिक भंडारण और विशेष सुरक्षा तंत्र जैसे अनिवार्य मुद्दों को प्राथमिकता देने की मांग कर रहे हैं, क्योंकि ये सीधे खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका से जुड़े हैं।</p>
<p>सब्सिडी नियमों में संरचनात्मक असंतुलन एक बड़ा विवाद का कारण है। पहले मिले अधिकारों के कारण विकसित देशों के पास अधिक नीतिगत लचीलापन है, जबकि विकासशील देशों पर कड़े प्रतिबंध लागू हैं। इस असमानता को लंबे समय से अन्यायपूर्ण माना जाता रहा है। विभिन्न पक्षों के बीच मतभेदों के कारण, एमसी14 में कृषि वार्ताओं से ठोस समझौतों के बजाय केवल प्रक्रियात्मक परिणाम (जैसे प्रतिबद्धताओं की पुनः पुष्टि करना) ही निकलने की संभावना है।</p>
<p><strong>सार्वजनिक भंडारण: भारत के लिए प्रमुख मुद्दा</strong></p>
<p>भारत का सार्वजनिक भंडारण कार्यक्रम WTO की चर्चाओं के केंद्र में रहने की संभावना है। इस प्रणाली के तहत सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खाद्यान्न की खरीद करती है, बफर स्टॉक बनाती है और करोड़ों लोगों को सब्सिडी वाले खाद्यान्न का वितरण करती है।</p>
<p>हालांकि, WTO के नियम इस तरह के समर्थन को व्यापार को विकृत करने वाला मानते हैं और इसकी गणना 1986-88 की पुरानी संदर्भ कीमतों के आधार पर करते हैं। इससे सब्सिडी का आकलन बढ़ा-चढ़ाकर होता है और भारत जैसे देशों को, वास्तविक समर्थन कम होने के बावजूद, सीमा उल्लंघन के जोखिम का सामना करना पड़ता है।</p>
<p>भारत लगातार एक स्थायी समाधान की मांग कर रहा है, जिसमें संदर्भ मूल्य प्रणाली को अपडेट करना और खाद्य सुरक्षा कार्यक्रमों के लिए नीति में लचीलापन सुनिश्चित करना शामिल है। भारत का यह भी कहना है कि विकसित देशों के पास लगभग 95 प्रतिशत सब्सिडी का अधिकार है।</p>
<p>दूसरी ओर अमेरिका, यूरोपीय संघ और केर्न्स जैसे उद्योग समूह व्यापक छूट का विरोध करते हैं और तर्क देते हैं कि इससे व्यापार में विकृति आ सकती है। सहमति के अभाव में 2013 का अंतरिम &ldquo;शांति प्रावधान&rdquo; (पीस क्लॉज) अस्थायी सुरक्षा के रूप में जारी रहने की संभावना है।</p>
<p>मूल विवाद WTO के कृषि समझौते (Agreement on Agriculture) के तहत सब्सिडी नियमों में निहित है, जहां प्रशासनिक कीमतों पर खरीद को एंबर बॉक्स के अंतर्गत रखा जाता है। पुराने बाह्य संदर्भ मूल्य (ERP) इस समस्या को और जटिल बना देते हैं।</p>
<p>जी-33 और अफ्रीकी समूह के नेतृत्व में विकासशील देश मूल्य बेंचमार्क को अपडेट करने, कवरेज बढ़ाने और कानूनी स्पष्टता सुनिश्चित करने जैसे सुधारों की मांग कर रहे हैं। वहीं, विकसित देश पारदर्शिता और व्यापार विकृति के मुद्दों का हवाला देते हुए सतर्क रुख अपनाए हुए हैं। कोविड-19 महामारी और जलवायु संकट जैसी वैश्विक परिस्थितियों ने पीएसएच की महत्ता को और मजबूत किया है, लेकिन गहरे मतभेदों के कारण बातचीत अभी ठप पड़ी हुई है।</p>
<p><strong>फिशरीज सब्सिडी: सस्टेनेबिलिटी और आजीविका के बीच संतुलन</strong></p>
<p>फिशरीज क्षेत्र से जुड़ी वार्ताएं वर्ष 2022 में अवैध, अनियमित और गैर-रिपोर्टेड (IUU) मछली पकड़ने पर हुए समझौते के बाद एक महत्वपूर्ण चरण में प्रवेश कर चुकी हैं। वर्तमान में ध्यान उन सब्सिडी पर है जो अत्यधिक क्षमता और अधिक मछली पकड़ने (ओवरफिशिंग) को बढ़ावा देती हैं।</p>
<p>वैश्विक स्तर पर मत्स्य क्षेत्र 10 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार प्रदान करता है, जिनमें अधिकांश विकासशील देशों के छोटे पैमाने के मछुआरे शामिल हैं। हालांकि, सब्सिडी का वितरण अत्यंत असमान है और इसका बहुत कम हिस्सा इन मछुआरों तक पहुंच पाता है।</p>
<p>भारत का तर्क है कि उसकी सब्सिडी छोटे और पारंपरिक मछुआरों के समर्थन के लिए हैं और इन्हें औद्योगिक स्तर की सब्सिडी के बराबर नहीं माना जाना चाहिए। विकसित देश पर्यावरणीय क्षति को रोकने के लिए कड़े नियमों की वकालत कर रहे हैं। दोनों पक्षों के बीच गहरे मतभेदों को देखते हुए, MC14 में व्यापक फिशरीज सब्सिडी पर अंतिम समझौता होने की संभावना कम है।</p>
<p><strong>ई-कॉमर्स मोरेटोरियम: डिजिटल विभाजन को लेकर चिंता बढ़ी</strong></p>
<p>डब्ल्यूटीओ का लंबे समय से लागू इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन पर सीमा शुल्क न लगाने का मोरेटोरियम अब एक बड़ा विवादास्पद मुद्दा बन गया है। विकसित देश डिजिटल व्यापार को बढ़ावा देने के लिए इसे स्थायी बनाना चाहते हैं, जबकि विकासशील देश इसका विरोध कर रहे हैं।</p>
<p>भारत ने राजस्व में नुकसान, नीतिगत सीमाओं और घरेलू डिजिटल उद्योगों पर इसके प्रभाव को लेकर चिंता जताई है। जैसे-जैसे वैश्विक व्यापार तेजी से डिजिटल प्लेटफॉर्म की ओर बढ़ रहा है, शुल्क लगाने में असमर्थता डिजिटल विभाजन को और बढ़ा सकती है। एमसी14 में इस मुद्दे पर स्थायी समाधान की संभावना कम है और सबसे संभावित परिणाम मोरेटोरियम का अस्थायी विस्तार ही माना जा रहा है।</p>
<p><strong>विवाद निपटान प्रणाली में व्यवधान जारी</strong></p>
<p>डब्ल्यूटीओ की विवाद निपटान प्रणाली, जो कभी इसकी सबसे मजबूत आधारशिला मानी जाती थी, अब गहरे संकट में है। 2019 से अपीलीय निकाय (Appellate Body) नियुक्तियां न होने के कारण निष्क्रिय बना हुआ है। इसमें अवरोध मुख्य रूप से अमेरिका की आपत्तियों के कारण है। इससे व्यापार नियमों के प्रवर्तन पर असर पड़ा है औरअंतिम तथा बाध्यकारी फैसले नहीं हो पाते। हालांकि MPIA जैसे अंतरिम उपाय मौजूद हैं, लेकिन उन्हें सभी देशों की स्वीकृति प्राप्त नहीं है।</p>
<p>भारत एक पूर्णतः कार्यशील दो-स्तरीय विवाद निपटान प्रणाली की बहाली का समर्थन करता है। वहीं अमेरिका न्यायिक हस्तक्षेप को सीमित करने के लिए सुधारों पर जोर दे रहा है। सहमति के अभाव में MC14 से किसी बड़े समाधान की उम्मीद नहीं है, जिससे यह प्रणाली फिलहाल कमजोर बनी हुई है।</p>
<p><strong>डब्ल्यूटीओ सुधार: लचीलापन बनाए रखने पर टकराव</strong></p>
<p>संस्थागत सुधार भी डब्ल्यूटीओ में असहमति का एक प्रमुख क्षेत्र बना हुआ है। विकसित देश निर्णय लेने की अधिक लचीली व्यवस्था की वकालत करते हैं, जिसमें बहुपक्षीय (plurilateral) समझौतों को शामिल किया जा सकता है, ताकि वार्ताओं में गतिरोध को दूर किया जा सके।</p>
<p>भारत और कई विकासशील देश सहमति-आधारित प्रणाली का मजबूती से समर्थन करते हैं। उनका तर्क है कि यह व्यवस्था निष्पक्षता और सभी सदस्यों की समान भागीदारी सुनिश्चित करती है। वे यह भी चेतावनी देते हैं कि सहमति से हटने पर छोटे देशों के हित प्रभावित हो सकते हैं और विकास संबंधी प्राथमिकताएं कमजोर पड़ सकती हैं।</p>
<p>सुधार संबंधी चर्चाओं में पारदर्शिता बढ़ाने, भागीदारी को मजबूत करने और डिजिटल व्यापार व सतत विकास जैसे उभरते मुद्दों को शामिल करने पर भी जोर दिया जा रहा है। हालांकि, गहरे मतभेदों के कारण इस दिशा में ठोस प्रगति की संभावना कम दिख रही है।</p>
<p><strong>निष्कर्ष: ठोस फैसले नहीं, मतभेद सामने आने के आसार</strong></p>
<p>कृषि, मत्स्य, डिजिटल व्यापार, विवाद निपटान और संस्थागत सुधार जैसे सभी प्रमुख मुद्दों पर एमसी14 से ठोस निर्णयों की बजाय गहरे मतभेद ही सामने आने की संभावना है। भारत के लिए प्राथमिकता नीति-निर्माण की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने, खाद्य सुरक्षा कार्यक्रमों का बचाव करने और विकासशील देशों के साथ गठजोड़ मजबूत करने पर रहेगी। व्यापक स्तर पर यह सम्मेलन एक बड़ी चुनौती को रेखांकित करता है- तेजी से बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था के अनुरूप बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली को ढालना।</p>
<p>वैश्विक व्यापार 35 ट्रिलियन डॉलर के पार पहुंचने के बावजूद WTO की प्रासंगिकता और विश्वसनीयता की यह एक महत्वपूर्ण परीक्षा है, जहां एमसी14 में वर्षों से लंबित विवादों के समाधान के बजाय मौजूदा व्यवस्था को आगे बढ़ाने की संभावना ही अधिक है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ WTO MC14: गहराते मतभेदों के कारण प्रमुख व्यापारिक मुद्दों पर गतिरोध बने रहने के आसार ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[वैश्विक अनाज उत्पादन 2025&amp;#45;26 में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचेगा, खपत बढ़ने के बावजूद भंडार में सुधार की उम्मीदः आईजीसी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/global-grains-production-record-forecast-2025-2026.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 20 Mar 2026 14:37:40 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/global-grains-production-record-forecast-2025-2026.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>इंटरनेशनल ग्रेन्स काउंसिल (IGC) ने 2025-26 विपणन वर्ष में वैश्विक अनाज उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने की संभावना जताई है। इसने मक्का और गेहूं के उत्पादन में वृद्धि को प्रमुख कारण बताया है, जबकि खपत में भी बढ़ोतरी जारी रहने का अनुमान है।</p>
<p>कुल अनाज उत्पादन (गेहूं और मोटे अनाज सहित) का अनुमान महीने-दर-महीने एक करोड़ टन बढ़ाकर 247 करोड़ टन कर दिया गया है। यह वृद्धि मुख्य रूप से मक्का उत्पादन (भारत सहित) और रूस व ऑस्ट्रेलिया जैसे प्रमुख निर्यातक देशों में गेहूं उत्पादन बढ़ने के कारण है।</p>
<p>आईजीसी का कहना है कि बढ़ी हुई आपूर्ति का अधिकांश हिस्सा खपत में वृद्धि से समाहित हो जाएगा। खपत का अनुमान 80 लाख टन बढ़ाकर 242.3 करोड़ टन कर दिया है। इसके साथ ही वैश्विक भंडार भी बढ़ने का अनुमान है, और सीजन के अंत में स्टॉक 63.2 करोड़ टन रहने का अनुमान है।</p>
<p>काउंसिल के अनुसार, 2025-26 में वैश्विक अनाज उत्पादन वर्ष-दर-वर्ष आधार पर 14.3 करोड़ टन अधिक होगा, जिसमें मक्का (7.9 करोड़ टन), गेहूं (44 करोड़ टन) और जौ (1.1 करोड़ टन) में वृद्धि शामिल है। खपत भी 7.3 करोड़ टन बढ़कर रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने का अनुमान है। वैश्विक अनाज व्यापार 2.5 करोड़ टन बढ़कर 63.2 करोड़ टन तक पहुंच सकता है, जिसमें गेहूं और मक्का का बड़ा हिस्सा होगा।</p>
<p>हालांकि आईजीसी ने 2026-27 विपणन वर्ष के लिए परिस्थितियां कुछ नरम रहने का संकेत दिया है। बुवाई क्षेत्र और उत्पादकता में कमी के कारण वैश्विक अनाज उत्पादन में 2% गिरावट का अनुमान है। कुल उत्पादन 241.7 करोड़ टन रह सकता है, जो पिछले सीजन के रिकॉर्ड से 5.3 करोड़ टन कम होगा।&nbsp;</p>
<p>खपत लगातार चौथे वर्ष बढ़ने का अनुमान है और यह 244 करोड़ टन के नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच सकता है। जिसका मुख्य कारण खाद्य के अलावा और औद्योगिक उपयोग में मांग में वृद्धि है। इसके परिणामस्वरूप, वैश्विक भंडार घटकर 60.9 करोड़ टन रह सकता है, जो वर्ष-दर-वर्ष 2.3 करोड़ टन कम होगा। यह गिरावट मुख्य रूप से प्रमुख निर्यातक देशों में देखी जाएगी। व्यापार कुल मिलाकर लगभग स्थिर रहने का अनुमान है।</p>
<p>तिलहनों में 2025-26 के लिए वैश्विक सोयाबीन उत्पादन का अनुमान 20 लाख टन घटाकर 42.6 करोड़ टन कर दिया गया है, जिसका कारण ब्राजील और भारत में उत्पादन में कमी है। इसके चलते खपत और भंडार के अनुमानों में भी मामूली कमी की गई है।</p>
<p>2026-27 के लिए वैश्विक सोयाबीन उत्पादन 44.2 करोड़ टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने का अनुमान है। पर्याप्त उपलब्धता के चलते प्रसंस्करण भी नए उच्च स्तर पर पहुंच सकता है, जबकि वैश्विक भंडार लगभग स्थिर रहने की संभावना है। व्यापार 2% बढ़कर 19 करोड़ टन तक पहुंच सकता है, जिसका मुख्य कारण दक्षिण अमेरिका से एशिया को होने वाले निर्यात हैं।</p>
<p>चावल के वैश्विक बाजार में 2025-26 के दौरान आपूर्ति और मांग के अनुमान में बहुत कम बदलाव हुआ है। व्यापार 2% बढ़कर 595 लाख टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने की उम्मीद है। 2026-27 में रकबा बढ़ने और सामान्य उत्पादकता के आधार पर वैश्विक उत्पादन नए उच्च स्तर पर पहुंच सकता है।</p>
<p>खपत और व्यापार दोनों में नई ऊंचाई देखने को मिल सकती है, जिसका कारण उप-सहारा अफ्रीका और दक्षिण एशिया में जनसंख्या वृद्धि है। वैश्विक चावल भंडार में भी वृद्धि का अनुमान है, जिसमें भारत में भंडारण बढ़ने की प्रमुख भूमिका होगी। 2026-27 में चावल व्यापार 609 लाख टन तक पहुंच सकता है।</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/12/image_750x500_693d475a64202.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ वैश्विक अनाज उत्पादन 2025-26 में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचेगा, खपत बढ़ने के बावजूद भंडार में सुधार की उम्मीदः आईजीसी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/12/image_750x500_693d475a64202.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[साउथ पार्स पर इजराइली हमले के बाद ईरान का पलटवार, खाड़ी के ऊर्जा ठिकानों पर मिसाइल हमले; ट्रंप की ‘भीषण’ जवाब की चेतावनी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/iran-strikes-gulf-energy-hubs-israel-south-pars-trump.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 19 Mar 2026 15:26:04 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/iran-strikes-gulf-energy-hubs-israel-south-pars-trump.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>ईरान और इजराइल-अमेरिका (Israel-Iran War) युद्ध एक खतरनाक चरण में प्रवेश कर गया है। इजराइल की तरफ से रणनीतिक साउथ पार्स गैसफील्ड पर हमले के बाद ईरान ने खाड़ी क्षेत्र के प्रमुख ऊर्जा ठिकानों पर मिसाइल हमले शुरू कर दिए हैं। इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है। युद्ध के 20वें दिन इजराइल ने ईरान के बुशेहर प्रांत स्थित दुनिया के सबसे बड़े प्राकृतिक गैस भंडार साउथ पार्स को निशाना बनाया। इसके कुछ ही घंटों बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के तेल और गैस ठिकानों पर मिसाइलें दागीं। कतर के रास लफ्फान इंडस्ट्रियल सिटी, जो दुनिया का सबसे बड़ा एलएनजी हब है, पर हुए हमले में कई जगह आग लग गई और भारी नुकसान हुआ, हालांकि किसी के हताहत होने की खबर नहीं है।</p>
<p><strong>क्षेत्रीय असर और खाड़ी में बढ़ता तनाव</strong></p>
<p>यूएई में मिसाइल हमलों के बाद प्रमुख ऊर्जा संयंत्रों को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा। वहां इंटरसेप्ट किए गए प्रोजेक्टाइल के मलबे गिरे। सऊदी अरब ने रियाद और महत्वपूर्ण ढांचों को निशाना बनाकर दागी गई कई बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन को नष्ट किया। बहरीन और कुवैत ने भी संभावित हमलों और साजिशों के मद्देनजर सुरक्षा कड़ी कर दी है। कतर ने ईरानी दूतावास के सैन्य और सुरक्षा अधिकारियों को देश छोड़ने का आदेश देते हुए उन्हें &lsquo;पर्सोना नॉन ग्राटा&rsquo; घोषित कर दिया, जबकि सऊदी अरब ने कहा कि ईरान पर बचा-खुचा भरोसा भी पूरी तरह खत्म हो चुका है और जरूरत पड़ने पर सैन्य कार्रवाई का संकेत दिया।</p>
<p><strong>ट्रंप ने अमेरिका की भूमिका से इनकार, ईरान को चेतावनी</strong></p>
<p>बढ़ते संकट के बीच डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने इजराइल की कार्रवाई से अमेरिका को अलग करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि साउथ पार्स पर हमले में अमेरिका की कोई भूमिका नहीं थी और कतर को भी इसकी कोई जानकारी नहीं थी। हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी कि यदि ईरान कतर सहित खाड़ी के ऊर्जा ठिकानों को निशाना बनाना जारी रखता है, तो अमेरिका &ldquo;भीषण&rdquo; जवाब देते हुए पूरे साउथ पार्स गैसफील्ड को नष्ट कर सकता है। ट्रंप का यह दोहरा रुख वॉशिंगटन की स्थिति को लेकर अनिश्चितता बढ़ा रहा है।</p>
<p>हालांकि अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से आई रिपोर्ट्स में कहा गया है कि ट्रंप को इजराइल की योजना की पहले से जानकारी हो सकती थी, जिससे परोक्ष समर्थन की अटकलें तेज हो गई हैं। विश्लेषकों का मानना है कि इससे वॉशिंगटन में असहजता बढ़ रही है और यह सवाल उठ रहा है कि क्या अमेरिकी नीति पर इजराइल का प्रभाव बढ़ गया है।&nbsp;</p>
<p><strong>ऊर्जा क्षेत्र बना नया युद्धक्षेत्र</strong></p>
<p>ताजा घटनाक्रम ने युद्ध को एक नए मोड़ पर ला दिया है, जहां ऊर्जा ठिकाने सीधे निशाने पर हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि साउथ पार्स और रास लफ्फान जैसे ठिकानों पर हमले से वैश्विक एलएनजी आपूर्ति बाधित हो सकती है और ऊर्जा कीमतों में तेज उछाल आ सकता है। खाड़ी देश प्रमुख ऊर्जा निर्यातक हैं, ऐसे में लंबे समय तक हमले जारी रहने से वैश्विक बाजारों पर गहरा असर पड़ सकता है।</p>
<p>इज़राइल की तरफ से उत्तरी ईरान में हमले बढ़ाने और वरिष्ठ ईरानी अधिकारियों की लक्षित हत्याओं के बीच तनाव चरम पर है। विशेषज्ञों का मानना है कि इजराइल, ईरान की सत्ता को अस्थिर करने की कोशिश कर रहा है, जबकि ईरान के खाड़ी देशों पर हमले संघर्ष के विस्तार का संकेत देते हैं। खाड़ी देश अपने जवाब पर विचार कर रहे हैं और अमेरिका की सतर्क लेकिन आक्रामक चेतावनी के बीच पूरा क्षेत्र एक बड़े और विनाशकारी युद्ध के खतरे का सामना कर रहा है।</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ साउथ पार्स पर इजराइली हमले के बाद ईरान का पलटवार, खाड़ी के ऊर्जा ठिकानों पर मिसाइल हमले; ट्रंप की ‘भीषण’ जवाब की चेतावनी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[ईरानी मूल के यूएन वैज्ञानिक कावेह मदानी को ‘वॉटर बैंकरप्सी’ शोध के लिए 2026 का स्टॉकहोम वाटर पुरस्कार]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/iran-origin-un-scientist-kaveh-madani-wins-2026-stockholm-water-prize-for-water-bankruptcy-research.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 19 Mar 2026 14:17:03 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/iran-origin-un-scientist-kaveh-madani-wins-2026-stockholm-water-prize-for-water-bankruptcy-research.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>वैज्ञानिक उत्कृष्टता और असाधारण संघर्ष की प्रेरणा, ईरानी मूल के कावेह मदानी को संयुक्त राष्ट्र का वर्ष 2026 का प्रतिष्ठित स्टॉकहो वाटर प्राइज (Stockholm Water Prize) देने की घोषणा की गई है। इस पुरस्कार को &ldquo;पानी का नोबेल पुरस्कार&rdquo; भी कहा जाता है। मदानी इस समय संयुक्त राष्ट्र की यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट फॉर वाटर, एनवायरमेंट एंड हेल्थ के निदेशक हैं।</p>
<p>यह घोषणा पेरिस स्थित यूनेस्को मुख्यालय में विश्व जल दिवस के अवसर पर आयोजित एक विशेष समारोह में की गई। यह पुरस्कार औपचारिक रूप से अगस्त 2026 में विश्व जल सप्ताह के दौरान किंग कार्ल XVI गुस्ताफ द्वारा प्रदान किया जाएगा।</p>
<p>महज 44 वर्ष की आयु में मदानी इस पुरस्कार के 35 साल के इतिहास में सबसे कम उम्र के विजेता बन गए हैं। साथ ही, वे पहले संयुक्त राष्ट्र अधिकारी और पूर्व राजनेता हैं जिन्हें यह सम्मान मिला है। उनका जीवन सफर विज्ञान, राजनीति और पर्यावरणीय संघर्ष के अनोखे संगम को दर्शाता है।</p>
<p>1981 में तेहरान में जन्मे मदानी के जीवन पर जल संकट की समस्याओं का गहरा प्रभाव रहा। उन्होंने ईरान, स्वीडन और अमेरिका में शिक्षा प्राप्त की और जल संसाधन प्रबंधन के क्षेत्र में एक अग्रणी विशेषज्ञ के रूप में पहचान बनाई। उनका प्रमुख योगदान गेम थ्योरी और हाइड्रोलॉजी को जोड़कर मानव व्यवहार को समझने का एक नया दृष्टिकोण विकसित करना है, जिसने वैश्विक नीति निर्माण को प्रभावित किया है।</p>
<p>वर्ष 2017 में मदानी ईरान लौटे और पर्यावरणीय पद पर कार्यभार संभाला। लेकिन जल प्रबंधन में पारदर्शिता और सुधारों की उनकी पहल से सत्ता के कुछ वर्गों में असंतोष पैदा हुआ। उन्हें &ldquo;वॉटर टेररिस्ट&rdquo; और जासूस तक कहा गया, गिरफ्तार किया गया और पूछताछ का सामना करना पड़ा। अंततः 2018 में उन्हें देश छोड़कर निर्वासन में जाना पड़ा।</p>
<p>इन कठिन परिस्थितियों के बावजूद मदानी ने अपने शोध और वैश्विक कार्य को जारी रखा और बाद में संयुक्त राष्ट्र के जल थिंक टैंक माने जाने वाले UNU-INWEH के प्रमुख बने। आज वे दुनिया भर की सरकारों को जल प्रबंधन और नीतिगत सुधारों पर सलाह दे रहे हैं।</p>
<p>उनकी सबसे चर्चित अवधारणाओं में से एक &ldquo;वॉटर बैंकरप्सी&rdquo; है। उन्होंने &ldquo;जल संकट&rdquo; शब्द को चुनौती देते हुए कहा कि कई क्षेत्रों में पानी की कमी अब अस्थायी नहीं बल्कि स्थायी और अपरिवर्तनीय बन चुकी है। उनकी हालिया संयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट के अनुसार जनवरी 2026 से दुनिया &ldquo;ग्लोबल वॉटर बैंकरप्सी&rdquo; के दौर में प्रवेश कर चुकी है, जिससे वैश्विक स्तर पर बहस तेज हो गई है।</p>
<p>मदानी ने जटिल वैज्ञानिक अवधारणाओं को सरल भाषा में प्रस्तुत कर उन्हें आम लोगों तक पहुंचाया है। सोशल मीडिया और डिजिटल अभियानों के माध्यम से उन्होंने जल संकट को जन-आंदोलन का विषय बनाया और नई पीढ़ी को जागरूक किया। उनकी कूटनीतिक भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। ईरान के पर्यावरणीय राजनयिक के रूप में उन्होंने वैश्विक जल मुद्दों को जलवायु वार्ताओं के केंद्र में लाने की वकालत की।</p>
<p>इस सम्मान पर प्रतिक्रिया देते हुए मदानी ने इसे &ldquo;सत्य की जीत&rdquo; बताया और इसे अपने समर्थकों व उन पर्यावरण कार्यकर्ताओं को समर्पित किया जिन्होंने कठिन समय में उनका साथ दिया। संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों ने उनके कार्य को विश्व की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण बताया। 1991 में शुरू किया गया स्टॉकहोम वाटर प्राइज जल संसाधनों के सतत उपयोग और संरक्षण में उत्कृष्ट योगदान के लिए दिया जाता है।&nbsp;</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ ईरानी मूल के यूएन वैज्ञानिक कावेह मदानी को ‘वॉटर बैंकरप्सी’ शोध के लिए 2026 का स्टॉकहोम वाटर पुरस्कार ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[Iran War: यूरिया के बाद चीन ने दूसरे उर्वरकों के निर्यात पर भी अंकुश लगाया, घरेलू उपलब्धता बढ़ाना मकसद]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/iran-war-triggers-china-to-expand-fertilizer-export-curbs-beyond-urea.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 17 Mar 2026 17:39:30 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/iran-war-triggers-china-to-expand-fertilizer-export-curbs-beyond-urea.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के साथ वैश्विक स्तर पर उर्वरक आपूर्ति में गंभीर व्यवधान के बीच चीन ने अपने घरेलू कृषि क्षेत्र की सुरक्षा के लिए निर्यात नियंत्रण कड़े करने और सामान्य समय से पहले उर्वरक भंडार जारी करने का निर्णय लिया है। बीजिंग का यह कदम ऐसे समय पर आया है जब वहां अगली बुवाई का मौसम शुरू होने वाला है। आने वाले हफ्तों में वहां नाइट्रोजन, फॉस्फेट तथा पोटाश जैसे उर्वरकों की मांग चरम पर होगी। चीनी अधिकारियों ने कॉमर्शियल भंडार रखने वाली कंपनियों को निर्देश दिया है कि वे किसानों को पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए बाजार में आपूर्ति जारी करें। चीन ने यूरिया निर्यात पहले ही रोक रखा है, अब उसने निर्यातकों को कुछ नाइट्रोजन-पोटाश मिश्रित उर्वरकों की खेप रोकने के निर्देश दिए हैं।&nbsp;</p>
<p>चीन परंपरागत रूप से अपने उर्वरक भंडार का एक हिस्सा वाणिज्यिक संस्थाओं के माध्यम से प्रबंधित करता है। इन संस्थाओं को अधिक मांग या प्राकृतिक आपदा जैसी आपात स्थितियों के दौरान स्टॉक जारी करना होता है। हालांकि, इस वर्ष समय से पहले भंडार जारी किया जाना ईरान युद्ध और उसके व्यापक भू-राजनीतिक प्रभावों के कारण वैश्विक आपूर्ति में व्यवधान को दर्शाता है।</p>
<p>मध्य पूर्व वैश्विक उर्वरक व्यापार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, विशेष रूप से नाइट्रोजन आधारित उत्पादों और प्राकृतिक गैस जैसे कच्चे माल के लिए। इस क्षेत्र में शिपिंग मार्गों या उत्पादन में किसी भी प्रकार का व्यवधान वैश्विक कीमतों पर तुरंत असर डालता है। स्थिति को बढ़ती ऊर्जा लागत ने और गंभीर बना दिया है, क्योंकि इसका सीधा प्रभाव उर्वरक उत्पादन खर्च पर पड़ता है।</p>
<p>दुनिया के सबसे बड़े उर्वरक उत्पादकों में से एक होने के बावजूद चीन इन दबावों से अछूता नहीं है। हाल के हफ्तों में यूरिया जैसे प्रमुख इनपुट की घरेलू कीमतों में तेज वृद्धि हुई है, जो आपूर्ति में कमी और मध्य पूर्व को लेकर अनिश्चितता को दर्शाती है।&nbsp;</p>
<p>घरेलू कीमतों में उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए चीन ने उर्वरक निर्यात पर प्रतिबंधों को और कड़ा कर दिया है। बताया जा रहा है कि अधिकारियों ने निर्यातकों को कुछ नाइट्रोजन-पोटाश (NPK) मिश्रित उर्वरकों की खेप रोकने के निर्देश दिए हैं, जबकि यूरिया निर्यात पर पहले से लागू प्रतिबंध जारी रहेंगे। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीनी उर्वरकों की उपलब्धता सीमित हो जाएगी।</p>
<p>चीन की निर्यात नीतियों का वैश्विक स्तर पर बड़ा प्रभाव पड़ता है, क्योंकि वह एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका सहित कई क्षेत्रों को उर्वरक आपूर्ति करता है। चीन द्वारा निर्यात में किसी भी प्रकार की कटौती वैश्विक आपूर्ति को और सीमित कर देगी, जिससे आयातक देशों में कीमतें बढ़ने की आशंका बन गई है।</p>
<p>बाजार विश्लेषकों का कहना है कि मध्य पूर्व में आपूर्ति बाधित होने और चीन के निर्यात प्रतिबंधों के संयुक्त प्रभाव से आने वाले महीनों में उर्वरकों की कमी की स्थिति बन सकती है। आयात पर निर्भर देशों को बुवाई के मौसम की शुरुआत में ही अधिक लागत का सामना करना पड़ सकता है, जिससे फसल उत्पादन और कुल कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है। वैश्विक उर्वरक बाजार पहले से ही आपूर्ति बाधाओं के प्रभाव से जूझ रहा है। मौजूदा स्थिति ने अनिश्चितता को और बढ़ा दिया है, जिससे कीमतों में उतार-चढ़ाव तेज हो सकता है।&nbsp;</p>
<p>हालांकि, चीन द्वारा कॉमर्शियल भंडार जारी करने के निर्णय से वहां के घरेलू बाजार को स्थिरता मिल सकती है, लेकिन निर्यात में कटौती का वैश्विक स्तर पर विपरीत असर पड़ सकता है। यह काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि मध्य पूर्व का संघर्ष कितने समय तक चलता है और वैकल्पिक आपूर्ति स्रोत इस कमी को पूरा कर पाते हैं या नहीं।</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ Iran War: यूरिया के बाद चीन ने दूसरे उर्वरकों के निर्यात पर भी अंकुश लगाया, घरेलू उपलब्धता बढ़ाना मकसद ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[अमेरिका&amp;#45;इजरायल और ईरान युद्ध के बीच वैश्विक सोयाबीन तेल के दाम 1,100 डॉलर प्रति टन के पार]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/soybean-prices-firm-up-as-global-soy-oil-crosses-1100-dollars-per-tonne-on-middle-east-tensions.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 17 Mar 2026 12:38:15 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/soybean-prices-firm-up-as-global-soy-oil-crosses-1100-dollars-per-tonne-on-middle-east-tensions.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच युद्ध और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के कारण वैश्विक बाजार में सोयाबीन तेल (soyabeab oil prices) की कीमतें बढ़ी हैं। इससे सोयाबीन की कीमतों में भी तेजी का रुख बना हुआ है। सोयाबीन तेल की कीमतें 1,100 डॉलर प्रति टन से ऊपर पहुंच गई हैं। इस समय सौदे 1,080 डॉलर से 1,150 डॉलर प्रति टन के बीच हो रहे हैं। दाम इस वर्ष की शुरुआत में 1,000 डॉलर प्रति टन से नीचे चले गए थे। हालांकि मौजूदा भाव मई 2022 के उस रिकॉर्ड स्तर से कम हैं, जब कीमतें 1,800 डॉलर प्रति टन को पार कर गई थीं।</p>
<p>इस वर्तमान तेजी की मुख्य वजह होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के आसपास बढ़ता तनाव है, जो वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए एक महत्वपूर्ण मार्ग है। इस क्षेत्र में शिपिंग को लेकर उत्पन्न खतरे ने कच्चे तेल की कीमतों को बढ़ा दिया है, जिसका असर ऊर्जा से जुड़े अन्य कमोडिटी बाजारों, विशेषकर सोयाबीन तेल पर भी पड़ा है।</p>
<p>बायोडीजल के लिए एक प्रमुख कच्चा माल होने के कारण सोयाबीन तेल की कीमतें आमतौर पर कच्चे तेल के साथ चलती हैं। जैसे-जैसे ऊर्जा की कीमतें बढ़ती हैं, बायोफ्यूल विकल्पों की मांग भी मजबूत होती है। इसी का असर है कि इन दिनों सोयाबीन तेल की कीमतें बढ़ी हैं।&nbsp;</p>
<p>बेंचमार्क सोयाबीन कीमतों में भी हाल के हफ्तों में तेजी देखी गई है, क्योंकि कच्चा तेल आधारित इस रैली ने बड़े वैश्विक भंडार जैसे कारकों के प्रभाव को कम किया है। फिलहाल सोयाबीन तेल की मजबूती का पूरे तिलहन बाजार पर प्रभाव दिख रहा है।</p>
<p>हालांकि, बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि इस तेजी की स्थिरता को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। वैश्विक स्तर पर सोयाबीन के बड़े भंडार और खासकर चीन जैसे बड़े खरीदारों की तरफ से मांग में सुस्ती आगे कीमतों में बढ़त को सीमित कर सकती है। इसके अलावा, यदि मध्य पूर्व में तनाव कम होता है तो कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आ सकती है, जिससे सोयाबीन तेल में आई तेजी भी पलट सकती है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ अमेरिका-इजरायल और ईरान युद्ध के बीच वैश्विक सोयाबीन तेल के दाम 1,100 डॉलर प्रति टन के पार ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[अमेरिका में आठ वर्षों बाद नए फार्म बिल की दिशा में कदम; कीटनाशक, एथेनॉल और फूड एड प्रावधानों पर बहस तेज]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/us-house-panel-advances-new-farm-bill-after-8-years-sparks-debate-over-pesticides-ethanol-and-food-aid.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 15 Mar 2026 07:31:20 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/us-house-panel-advances-new-farm-bill-after-8-years-sparks-debate-over-pesticides-ethanol-and-food-aid.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>कई वर्षों की देरी और पुराने कानून को बार-बार विस्तार दिए जाने के बाद अमेरिका ने नए कृषि कानून को अपनाने की दिशा में पहला औपचारिक कदम उठाया है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की कृषि समिति ने प्रस्तावित कानून के मसौदे को मंजूरी दे दी है, जिसे फार्म, फूड एंड नेशनल सिक्योरिटी एक्ट 2026 नाम दिया गया है। इससे अब प्रतिनिधि सभा में इस पर बहस का रास्ता साफ हो गया है।</p>
<p>फार्म बिल अमेरिकी कृषि क्षेत्र को संचालित करने वाले सबसे महत्वपूर्ण कानूनों में से एक है। इसके तहत कई वर्षों के लिए सैकड़ों अरब डॉलर की राशि किसानों की आय सहायता योजनाओं, फसल बीमा, संरक्षण कार्यक्रमों और कम आय वाले परिवारों के लिए खाद्य सहायता योजनाओं पर खर्च की जाती है। यह कानून आम तौर पर हर पांच वर्ष में रिन्यू किया जाता है, लेकिन हाल के वर्षों में राजनीतिक मतभेदों के कारण इसमें लगातार देरी होती रही है।</p>
<p>सबसे हालिया कानून, 2018 फार्म बिल, पहले ही समाप्त हो चुका है। लेकिन कृषि कार्यक्रमों को जारी रखने के लिए इसे दो बार बढ़ाया गया है। अब सांसदों पर दबाव है कि मौजूदा विस्तार की अवधि समाप्त होने से पहले नया कानून पारित किया जाए।</p>
<p>4 मार्च को प्रतिनिधि सभा की कृषि समिति ने नए मसौदा बिल को 34-17 मतों से मंजूरी दी। इस मतदान में अधिकांश रिपब्लिकन सांसदों और कुछ डेमोक्रेट सांसदों ने समर्थन किया, जबकि बाकी डेमोक्रेट सदस्यों ने इसका विरोध किया। समिति स्तर की प्रक्रिया पूरी होने के बाद अब यह बिल बहस और मतदान के लिए प्रतिनिधि सभा के पूर्ण सदन में जाएगा।</p>
<p>इस बीच, सीनेट की कृषि समिति भी फार्म बिल का अपना अलग संस्करण तैयार कर रही है। अंततः दोनों सदनों को अपने-अपने मसौदों को मिलाकर एक संयुक्त संस्करण पारित करना होगा, जिसे राष्ट्रपति की अंतिम मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। यदि सांसद 30 सितंबर तक बिल पारित नहीं कर पाते, तो कांग्रेस 2018 के कानून को तीसरी बार बढ़ाने पर विचार कर सकती है।</p>
<p><strong>कीटनाशक निर्माता संबंधी प्रावधान पर विवाद</strong></p>
<p>समिति के प्रस्ताव में वर्तमान फार्म बिल की कई योजनाओं को जारी रखने का प्रावधान है, जबकि कुछ नीतियों में बदलाव भी किया गया है। सबसे विवादित प्रावधानों में से एक कीटनाशक निर्माताओं को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा से जुड़ा है। मसौदे में कहा गया है कि यदि किसान संघीय नियामकों द्वारा स्वीकृत निर्देशों के अनुसार कीटनाशकों का उपयोग करते हैं, तो कंपनियों को इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकेगा।</p>
<p>प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि राज्य और स्थानीय सरकारें अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (EPA) द्वारा तय नियमों से अतिरिक्त प्रतिबंध लागू नहीं कर सकेंगी। समर्थकों का कहना है कि पूरे देश में एक समान संघीय मानक होने से किसानों के लिए नियामकीय भ्रम कम होगा, जबकि आलोचकों का मानना है कि इससे स्थानीय पर्यावरणीय सुरक्षा कमजोर हो सकती है।</p>
<p>समिति की चर्चा के दौरान एक और महत्वपूर्ण मुद्दा एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से जुड़ा था। इलिनॉय के प्रतिनिधि एरिक सोरेंसन ने एक संशोधन प्रस्तावित किया था, जिसके तहत E15 ईंधन की पूरे वर्ष बिक्री की अनुमति देने की बात कही गई। इस ईंधन में 15 प्रतिशत एथेनॉल होता है और यह मुख्य रूप से मक्का से तैयार किया जाता है।</p>
<p>सोरेंसन ने तर्क दिया कि E15 की साल भर बिक्री की अनुमति देने से ऐसे समय में मक्का की घरेलू मांग बढ़ेगी जब किसान आर्थिक दबाव झेल रहे हैं। उनके अनुसार, अमेरिकी मक्का किसान लगातार चौथे वर्ष घाटे का सामना कर रहे हैं और मौजूदा विपणन वर्ष में औसतन 125 डॉलर प्रति एकड़ का नुकसान हो रहा है। हालांकि समिति ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया। कृषि समिति के अध्यक्ष जीटी थॉम्पसन ने कहा कि यह संशोधन समिति के अधिकार क्षेत्र से बाहर है।</p>
<p><strong>खाद्य सहायता पर भी बहस</strong></p>
<p>फार्म बिल के बजट का सबसे बड़ा हिस्सा पोषण संबंधी कार्यक्रमों पर खर्च होता है। आम तौर पर इस बिल के कुल खर्च का तीन-चौथाई से अधिक हिस्सा सप्लीमेंटल न्यूट्रिशन असिस्टेंस प्रोग्राम (SNAP) जैसे खाद्य सहायता कार्यक्रमों पर जाता है।</p>
<p>प्रस्तावित कानून में 2025 में पारित एक अन्य कानून के तहत लागू किए गए कड़े कार्य नियमों को बरकरार रखा गया है। इन नियमों के अनुसार, जिन सक्षम वयस्कों के आश्रित नहीं हैं, उनके लिए काम करने की अनिवार्यता की आयु सीमा 54 वर्ष से बढ़ाकर 64 वर्ष कर दी गई है। वहीं जिन लोगों के आश्रित बच्चे हैं, उनके लिए कार्य से छूट की पात्रता आयु 18 वर्ष से घटाकर 14 वर्ष कर दी गई है। समिति की चर्चा के दौरान कुछ सांसदों ने इन नियमों में ढील देने या उन्हें वापस लेने का प्रयास किया, लेकिन उन्हें पर्याप्त समर्थन नहीं मिल सका।</p>
<p>समिति में मतदान पूरा होने के बाद अब ध्यान प्रतिनिधि सभा और सीनेट की ओर है, जहां आने वाले समय में बातचीत और तेज होने की उम्मीद है। इस प्रक्रिया का परिणाम यह तय करेगा कि आने वाले वर्षों में अमेरिकी कृषि नीति, किसानों की आय सहायता और खाद्य सहायता कार्यक्रमों की दिशा क्या होगी।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ अमेरिका में आठ वर्षों बाद नए फार्म बिल की दिशा में कदम; कीटनाशक, एथेनॉल और फूड एड प्रावधानों पर बहस तेज ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[व्यापार समझौतों पर अनिश्चितता के बीच अमेरिका ने भारत सहित 16 देशों के खिलाफ धारा 301 के तहत जांच शुरू की]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/ustr-targets-india-and-15-nations-in-new-section-301-investigations-amid-trade-deal-uncertainty.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 12 Mar 2026 13:31:13 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/ustr-targets-india-and-15-nations-in-new-section-301-investigations-amid-trade-deal-uncertainty.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) ने भारत सहित 16 देशों की नीतियों को निशाना बनाते हुए धारा 301 के तहत जांच शुरू की है। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में वाशिंगटन की रेसिप्रोकल टैरिफ रणनीति को अवैध ठहरा दिया। यूएसटीआर की जांच के दायरे में शामिल देशों में भारत, चीन, यूरोपीय यूनियन, सिंगापुर, स्विट्जरलैंड, नॉर्वे, इंडोनेशिया, मलेशिया, कंबोडिया, थाईलैंड, दक्षिण कोरिया, वियतनाम, ताइवान, बांग्लादेश, मेक्सिको और जापान शामिल हैं। इस्पात, एल्युमिनियम, ऑटोमोबाइल, बैटरियां, इलेक्ट्रॉनिक्स, रसायन, मशीनरी, सेमीकंडक्र और सौर मॉड्यूल जैसे क्षेत्रों को जांच के दायरे में रखा गया है।</p>
<p><strong>भारत पर संभावित प्रभाव</strong></p>
<p>अमेरिकी जांच में भारत के कई ऐसे क्षेत्रों की पहचान की गई है जहां अतिरिक्त उत्पादन क्षमता या निर्यात सरप्लस की संभावना बताई गई है। इनमें सौर मॉड्यूल, पेट्रोकेमिकल, इस्पात, टेक्सटाइल, स्वास्थ्य संबंधी वस्तुएं, निर्माण सामग्री और वाहन उद्योग से जुड़े उत्पाद शामिल हैं।&nbsp;</p>
<p>अमेरिकी सूचना के अनुसार भारत में सौर मॉड्यूल निर्माण क्षमता पहले ही घरेलू मांग से लगभग तीन गुना अधिक हो चुकी है, जिससे निर्यात आधारित उत्पादन सरप्लस की संभावना बनती है। इसी तरह पेट्रोकेमिकल और इस्पात क्षेत्रों में तेजी से बढ़ती उत्पादन क्षमता को लेकर भी चिंता व्यक्त की गई है।</p>
<p><strong>सब्सिडी और बाजार एक्सेस में बाधाओं की जांच</strong></p>
<p>1974 के अमेरिकी व्यापार अधिनियम की धारा 301 के तहत अमेरिकी सरकार यह जांच कर सकती है कि क्या किसी देश की व्यापार नीतियां अनुचित या भेदभावपूर्ण हैं और क्या उनसे अमेरिकी बिजनेस को नुकसान पहुंच रहा है। जांच में यह परखा जाएगा कि औद्योगिक सब्सिडी, सरकार समर्थित मैन्युफैक्चरिंग विस्तार, सरकारी स्वामित्व वाले उद्यमों की गतिविधियां, मार्केट एक्सेस में बाधा, करेंसी संबंधी नीतियां या घरेलू मांग जैसी नीतियों ने मैन्युफैक्चरिंग में अतिरिक्त क्षमता पैदा की है या नहीं, जिससे अमेरिकी व्यापार पर बोझ पड़ता है। यदि ऐसे आचरण की पुष्टि होती है तो वाशिंगटन अतिरिक्त आयात शुल्क, मात्रात्मक प्रतिबंध या अन्य व्यापारिक बाधा जैसे कदम उठा सकता है।</p>
<p>यह जांच एक निर्धारित प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ेगी। लिखित प्रस्तुतियों के लिए सार्वजनिक अभिलेख (पब्लिक डॉकेट) सत्र 17 मार्च 2026 से खोले जाएंगे, जिससे कंपनियों, व्यापार संगठनों और सरकारों को अपनी टिप्पणियां प्रस्तुत करने का अवसर मिलेगा। लिखित प्रस्तुतियां और सुनवाई में भाग लेने के अनुरोध 15 अप्रैल तक दाखिल करने होंगे। सार्वजनिक सुनवाई 5 मई से 8 मई के बीच वाशिंगटन स्थित अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय व्यापार आयोग में आयोजित की जाएगी। सुनवाई समाप्त होने के सात दिनों के भीतर प्रत्युत्तर प्रस्तुतियां दाखिल करनी होंगी। संबंधित सरकारों के साथ परामर्श के बाद अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय यह तय करेगा कि जांच के दायरे में आए इन व्यवहारों पर प्रतिशोधात्मक कार्रवाई की आवश्यकता है या नहीं।</p>
<p><strong>कोर्ट के झटके के बाद नया कदम</strong></p>
<p>सेक्शन 301 के तहत इस जांच की शुरुआत ट्रंप प्रशासन की व्यापार रणनीति को लगे एक बड़े कानूनी झटके के केवल 20 दिन बाद हुई है। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने 20 फरवरी 2026 को प्रशासन की तथाकथित &ldquo;पारस्परिक शुल्क&rdquo; नीति के कानूनी आधार को खारिज कर दिया था। इस नीति का उपयोग व्यापार वार्ताओं में साझेदार देशों पर रियायतें देने के लिए दबाव बनाने में किया जा रहा था। हालांकि कोर्ट के फैसले के कुछ ही घंटों के भीतर ट्रंप ने 1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 122 के तहत सभी देशों पर समान रूप से 10 प्रतिशत का शुल्क लागू कर दिया।</p>
<p>हालांकि इस बदलाव ने नई दुविधा पैदा कर दी। पहले की शुल्क व्यवस्था के तहत कई देशों ने वाशिंगटन के साथ व्यापार संबंधी समझौते किए थे। इन समझौतों में अपेक्षाकृत अधिक निर्धारित शुल्क स्तर शामिल थे- यूरोपीय यूनियन, जापान और दक्षिण कोरिया के लिए लगभग 15 प्रतिशत, वियतनाम और ताइवान के लिए लगभग 20 प्रतिशत तथा इंडोनेशिया और थाईलैंड के लिए करीब 19 प्रतिशत।</p>
<p>जब ट्रंप प्रशासन ने सभी देशों पर समान 10 प्रतिशत शुल्क लागू किया तो इन देशों को पहले वार्ता के तहत मिले लाभ समाप्त हो गए। इससे कुछ सरकारों ने अमेरिका के साथ हुए व्यापार समझौतों के महत्व पर पुनर्विचार करना शुरू कर दिया। हालांकि राष्ट्रपति ट्रंप ने साझेदार देशों को इन व्यवस्थाओं पर दोबारा बातचीत की कोशिश न करने की चेतावनी दी है।</p>
<p>जिन देशों पर अब धारा 301 के तहत जांच हो रही है, उनमें कई ने अप्रैल 2025 के बाद अमेरिका के साथ किसी न किसी रूप में व्यापार समझौता या इसकी रूपरेखा की व्यवस्था कर ली थी। इनमें यूरोपीय यूनियन, इंडोनेशिया, जापान, मलेशिया, कंबोडिया, दक्षिण कोरिया, वियतनाम, ताइवान और बांग्लादेश शामिल हैं। चीन फिलहाल अस्थायी शुल्क व्यवस्था के तहत काम कर रहा है, जबकि सिंगापुर, स्विट्जरलैंड, नॉर्वे, थाईलैंड, मेक्सिको और भारत के साथ बातचीत जारी है।</p>
<p>भारत ने 6 फरवरी 2026 को अमेरिका के साथ एक संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर किए थे। इसके तहत कई वस्तुओं पर शुल्क घटाने, अगले पांच वर्षों में 500 अरब डॉलर से अधिक के अमेरिकी उत्पादों की खरीद करने, अमेरिकी प्रौद्योगिकी कंपनियों को प्रभावित करने वाले डिजिटल नियमों को सरल बनाने तथा अमेरिकी निर्यात के लिए कुछ नियामकीय बाधाओं को कम करने पर सहमति व्यक्त की गई थी।</p>
<p><strong>कार्रवाई के लिए प्रमाण आवश्यक</strong></p>
<p>थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के अजय श्रीवास्तव का कहना है कि धारा 301 भले ही अमेरिका का एक महत्वपूर्ण व्यापारिक उपकरण है, लेकिन यह सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निरस्त किए गए रेसिप्रोकल टैरिफ की तुलना में धीमी और अधिक कानूनी सीमाओं से बंधी हुई प्रक्रिया है। धारा 301 के तहत जांच के लिए नुकसान के ठोस प्रमाण आवश्यक होते हैं और इन्हें विशिष्ट व्यापारिक नीतियों से जोड़ा जाना जरूरी होता है।</p>
<p>अमेरिका 1962 के ट्रेड एक्सपैंशन एक्ट की धारा 232 के तहत भी शुल्क लगाने पर विचार कर सकता है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर व्यापारिक प्रतिबंध लगाने की अनुमति देती है। इस प्रावधान का उपयोग पहले इस्पात और एल्युमिनियम पर ऊंचे शुल्क लगाने के लिए किया जा चुका है और भविष्य में इसे अन्य क्षेत्रों तक भी बढ़ाया जा सकता है।</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ व्यापार समझौतों पर अनिश्चितता के बीच अमेरिका ने भारत सहित 16 देशों के खिलाफ धारा 301 के तहत जांच शुरू की ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव से मध्य पूर्व के 4.2 अरब डॉलर के डेयरी व्यापार पर खतरा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/strait-of-hormuz-tensions-threaten-4.2-billion-middle-east-dairy-trade.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 11 Mar 2026 16:52:14 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/strait-of-hormuz-tensions-threaten-4.2-billion-middle-east-dairy-trade.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान ने वैश्विक डेयरी उद्योग में चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग बाधित होता है तो अरबों डॉलर के डेयरी व्यापार पर असर पड़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों से जोड़ने वाला यह संकरा जलमार्ग खाड़ी क्षेत्र की कई अर्थव्यवस्थाओं के लिए मुख्य प्रवेश द्वार है।&nbsp;</p>
<p>मध्य पूर्व दुनिया के सबसे अधिक आयात-निर्भर डेयरी बाजारों में से एक है। वर्ष 2024 में इस क्षेत्र के देशों ने लगभग 13 लाख टन डेयरी उत्पादों का आयात किया, जिनकी कुल कीमत लगभग 4.2 अरब डॉलर रही। यह वैश्विक डेयरी आपूर्ति पर क्षेत्र की निर्भरता को दर्शाता है। हालांकि ईरान स्वयं डेयरी उत्पादों का बड़ा आयातक नहीं है, लेकिन जलडमरूमध्य की भौगोलिक स्थिति इसे खाड़ी क्षेत्र के कई देशों के लिए डेयरी आपूर्ति का महत्वपूर्ण मार्ग बनाती है।&nbsp;</p>
<p>क्षेत्र के प्रमुख डेयरी आयातकों में सऊदी अरब सबसे आगे है, जहां हर वर्ष लगभग 2.1 अरब डॉलर के डेयरी उत्पाद आयात किए जाते हैं। इसके बाद संयुक्त अरब अमीरात का स्थान है, जहां लगभग 1.5 अरब डॉलर के डेयरी उत्पाद आयात होते हैं। इराक लगभग 76.3 करोड़ डॉलर के डेयरी उत्पाद आयात करता है, जबकि कुवैत, ओमान, बहरीन और कतर भी करोड़ों डॉलर के डेयरी उत्पाद आयात करते हैं।</p>
<p>खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) देशों में ही वर्ष 2024 के दौरान डेयरी आयात लगभग 2.7 अरब डॉलर तक पहुंच गया। कुल आयात मात्रा में से लगभग 43 प्रतिशत हिस्सा अकेले संयुक्त अरब अमीरात का रहा, जिससे यह क्षेत्र का सबसे बड़ा डेयरी बाजार बन जाता है। संयुक्त अरब अमीरात औसतन प्रति व्यक्ति लगभग 170 डॉलर मूल्य के डेयरी उत्पाद हर वर्ष आयात करता है।</p>
<p>विशेषज्ञों का कहना है कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य से समुद्री परिवहन बाधित होता है, तो इससे इराक, कुवैत, बहरीन, कतर, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब के पूर्वी हिस्सों में होने वाली समुद्री आपूर्ति गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है। इन बाजारों की बड़ी निर्भरता आयातित डेयरी उत्पादों पर है। ये देश मुख्य रूप से होल मिल्क पाउडर, पनीर तथा कंडेंस्ड दूध का आयात करते हैं। ये तीनों उत्पाद मिलकर मध्य पूर्व के कुल डेयरी आयात का लगभग 68 प्रतिशत हिस्सा होते हैं।</p>
<p>खाड़ी क्षेत्र के समुद्री मार्गों में व्यवधान से जिन देशों के निर्यातकों पर असर पड़ेगा, उनमें यूरोपियन यूनियन, न्यूजीलैंड और अमेरिका प्रमुख हैं। ये देश खाड़ी बाजारों में बड़ी मात्रा में पनीर, दूध पाउडर, मक्खन और कंडेंस्ड दूध की आपूर्ति करते हैं। अकेले संयुक्त अरब अमीरात हर वर्ष लगभग 2 लाख टन होल मिल्क पाउडर का आयात करता है। वहीं पनीर संयुक्त अरब अमीरात के कुल डेयरी आयात मूल्य का लगभग 28 प्रतिशत हिस्सा है।</p>
<p>स्थिति को और जटिल बनाने वाला एक अन्य कारक बाल-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के आसपास अस्थिरता है, जो लाल सागर को हिंद महासागर से जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। यदि होर्मुज और लाल सागर दोनों मार्ग एक साथ अस्थिर हो जाते हैं, तो वैश्विक निर्यातकों को गंभीर लॉजिस्टिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।&nbsp;</p>
<p>ऐसी स्थिति में रेफ्रिजरेटेड डेयरी उत्पादों को ले जाने वाले जहाजों को अफ्रीका के दक्षिणी सिरे पर स्थित उत्तमाशा अंतरीप (Cape of Good Hope) के रास्ते लंबा चक्कर लगाकर जाना पड़ सकता है। इससे परिवहन समय और मालभाड़ा लागत में काफी वृद्धि होगी, विशेष रूप से उन डेयरी उत्पादों के लिए जो तापमान नियंत्रित आपूर्ति शृंखला पर निर्भर करते हैं।</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव से मध्य पूर्व के 4.2 अरब डॉलर के डेयरी व्यापार पर खतरा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[मई तक अल नीनो और अगस्त तक सुपर अल नीनो की संभावना, भारतीय मानसून होगा प्रभावित]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/el-nino-likely-by-may-super-el-nino-by-august-indian-monsoon-to-be-affected.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 09 Mar 2026 14:17:41 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/el-nino-likely-by-may-super-el-nino-by-august-indian-monsoon-to-be-affected.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p data-start="263" data-end="572">इस साल मार्च की शुरुआत से ही गर्मी बढ़ने लगी है। अभी से देश के कई राज्यों में अधिकतम तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंचने लगा है, जो सामान्य से 5 से 10 डिग्री अधिक है। कमजोर पश्चिमी विक्षोभ के साथ-साथ इस वर्ष अल नीनो के सक्रिय होने की संभावना भी बढ़ रही है, जो मानसून को प्रभावित कर सकता है।</p>
<p data-start="574" data-end="904">पिछले सप्ताह विश्व मौसम संगठन (WMO) ने अल नीनो (प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के तापमान में वृद्धि) की थोड़ी संभावना जताई थी। अब यूरोपियन सेंटर फॉर मीडियम-रेंज वेदर फोरकास्ट (ECMWF) का पूर्वानुमान है कि इस वर्ष मई तक प्रशांत महासागर में अल नीनो सक्रिय होने की संभावना है और अगस्त तक इसके और मजबूत होने के संकेत हैं।</p>
<p data-start="906" data-end="1235">ECMWF के एन्सेम्बल मॉडलों के आंकड़ों के अनुसार &lsquo;सुपर अल नीनो&rsquo; की 22 प्रतिशत, &lsquo;मजबूत अल नीनो&rsquo; की 80 प्रतिशत और &lsquo;मध्यम अल नीनो&rsquo; की 98 प्रतिशत संभावना जताई गई है। इस साल मई से जुलाई के बीच अल नीनो बनने की संभावना लगभग 40 प्रतिशत बताई गई है। हालांकि ये शुरुआती अनुमान हैं और इनमें बदलाव संभव है।&nbsp;</p>
<p data-start="1237" data-end="1577">मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान ला नीना (La Ni&ntilde;a) चरण के कमजोर पड़ने के साथ प्रशांत महासागर में तापमान बढ़ने की प्रक्रिया तेज हो रही है, जो अल नीनो के बनने का संकेत है। दो साल पहले अल नीनो के कारण दक्षिण-पूर्व एशिया के कई हिस्सों में सूखा पड़ा था और उसी अवधि में वैश्विक स्तर पर रिकॉर्ड उच्च तापमान भी दर्ज किया गया था।</p>
<h3 data-section-id="1e95422" data-start="1579" data-end="1611">&lsquo;सुपर अल नीनो&rsquo; की भी संभावना</h3>
<p data-start="1613" data-end="1932">अल नीनो आगे चलकर सुपर अल नीनो में भी तब्दील हो सकता है। ECMWF के मुताबिक प्रशांत महासागर में सामान्यतः पूर्व से पश्चिम की ओर बहने वाली ट्रेड विंड्स इस समय कमजोर पड़ रही हैं और उनकी जगह पश्चिम से पूर्व की ओर बहने वाली हवाएं मजबूत हो रही हैं। इससे पश्चिमी प्रशांत में जमा गर्म पानी पूर्व की ओर फैलने लगा है।</p>
<p data-start="1934" data-end="2254">अल नीनो का प्रभाव समुद्र के तापमान और वायुमंडलीय परिस्थितियों के मेल पर निर्भर करता है। समुद्र के तापमान में बदलाव से दुनिया भर में मौसम पर अलग-अलग प्रभाव पड़ सकते हैं। उदाहरण के तौर पर दक्षिणी अमेरिका में भारी बारिश हो सकती है, जबकि प्रशांत महासागर के दूसरी ओर स्थित कई इलाकों में सूखे जैसी स्थिति बन सकती है।</p>
<h3 data-section-id="phu5ar" data-start="2256" data-end="2280">भारतीय मानसून पर असर</h3>
<p data-start="2282" data-end="2525">अल नीनो आम तौर पर भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून को कमजोर करता है और कई बार सूखे जैसी स्थिति पैदा कर सकता है। हालांकि यदि इसके साथ यदि&nbsp;इंडियन ओशन डाइपोल (IOD) भी बनता है, तो यह अल नीनो के प्रभाव को काफी हद तक संतुलित कर सकता है।&nbsp;1997&ndash;98 में ऐसा ही हुआ था, जब अल नीनो के बावजूद भारत में सामान्य से बेहतर मानसून दर्ज किया गया था। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार उस समय सकारात्मक IOD ने अल नीनो के प्रभाव को संतुलित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ मई तक अल नीनो और अगस्त तक सुपर अल नीनो की संभावना, भारतीय मानसून होगा प्रभावित ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[FAO Outlook: 2026 में वैश्विक गेहूं उत्पादन लगभग 3% घटने का अंदेशा, लेकिन रिकॉर्ड स्तर पर बना रहेगा कुल अनाज उत्पादन]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/global-wheat-production-to-decline-nearly-3-in-2026-despite-record-cereal-supply-outlook.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 07 Mar 2026 13:54:12 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/global-wheat-production-to-decline-nearly-3-in-2026-despite-record-cereal-supply-outlook.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>वर्ष 2026 में वैश्विक गेहूं उत्पादन में गिरावट आने की आशंका है, हालांकि कुल अनाज उत्पादन ऐतिहासिक रूप से ऊंचे स्तर पर बना रहेगा। अनुमान है कि 2026 में वैश्विक गेहूं उत्पादन (wheat production) लगभग 3 प्रतिशत घटकर करीब 81 करोड़ टन रह जाएगा। इसका मुख्य कारण गेहूं की अपेक्षाकृत कम कीमतों के चलते बुवाई में कमी और पिछले वर्ष के उच्च स्तर के बाद पैदावार के औसत स्तर पर लौटना है। इसके बावजूद वैश्विक गेहूं उत्पादन पांच वर्षीय औसत से ऊपर बना रहेगा। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) ने अपनी नवीनतम रिपोर्ट में यह जानकारी दी है।</p>
<p>हालांकि एफएओ ने वर्ष 2025 के लिए वैश्विक अनाज उत्पादन (cereal production) के अनुमान को थोड़ा बढ़ाकर रिकॉर्ड 302.9 करोड़ टन कर दिया है। यह संशोधन मुख्य रूप से मक्का और चावल उत्पादन के बेहतर अनुमानों के कारण किया गया है। इन फसलों के मजबूत प्रदर्शन से गेहूं उत्पादन में गिरावट के बावजूद वैश्विक अनाज आपूर्ति पर्याप्त बनी रहने की उम्मीद है।</p>
<p>प्रमुख गेहूं उत्पादक क्षेत्रों में बुवाई के फैसले और मौसम की स्थिति का असर उत्पादन पर हो रहा है। यूरोपियन यूनियन में कमजोर कीमतों के कारण शीतकालीन गेहूं की बुवाई में कमी आई है। हालांकि पूर्वी और उत्तरी क्षेत्रों में ठंड का असर देखा गया, लेकिन अन्य क्षेत्रों में अपेक्षाकृत अनुकूल और हल्के मौसम के कारण पैदावार औसत से ऊपर रहने की संभावना है। इसके चलते ईयू में गेहूं उत्पादन में केवल मामूली गिरावट का अनुमान है और यह पांच वर्षीय औसत के करीब रह सकता है।</p>
<p>इंग्लैंड में किसानों ने कुछ इलाकों में जौ की जगह गेहूं की खेती की है। इसके साथ ही अनुकूल बुवाई परिस्थितियों और 2025 में सूखे के कारण प्रभावित पैदावार के बाद संभावित सुधार के चलते 2026 में गेहूं उत्पादन औसत स्तर के करीब पहुंच सकता है।</p>
<p>रूस में गेहूं उत्पादन में मामूली गिरावट का अनुमान है। वहां गेहूं के रकबे में लगातार कमी आ रही है क्योंकि किसान अधिक लाभ देने वाली तिलहनी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। बुवाई के दौरान प्रमुख क्षेत्रों में सूखे की स्थिति ने भी उत्पादन संभावनाओं को प्रभावित किया है। वहीं पड़ोसी देश यूक्रेन में गेहूं उत्पादन पिछले वर्ष के आसपास स्थिर रहने का अनुमान है। यह अपेक्षाकृत स्थिर बुवाई क्षेत्र और सामान्य पैदावार की संभावनाओं के कारण है।</p>
<p>उत्तर अमेरिका में गेहूं उत्पादन का रुख अलग-अलग देशों में भिन्न है। अमेरिका में गेहूं उत्पादन पिछले वर्ष की तुलना में घटने का अंदेशा है क्योंकि बुवाई के समय कमजोर कीमतों के कारण किसानों ने रकबा कम रखा। साथ ही पिछले वर्ष के उच्च स्तर के मुकाबले पैदावार में भी थोड़ी कमी आने की आशंका है, हालांकि कुल उत्पादन पांच वर्षीय औसत से ऊपर रह सकता है। कनाडा में गेहूं की बुवाई में हल्की वृद्धि का अनुमान है, जिसका मुख्य कारण सॉफ्ट गेहूं की खेती का विस्तार है।</p>
<p>एशिया में गेहूं उत्पादन की संभावनाएं सामान्यतः अनुकूल दिखाई दे रही हैं। भारत में सरकारी प्रोत्साहनों के कारण रिकॉर्ड बुवाई हुई है, जिससे उत्पादन पिछले वर्ष के सर्वकालिक उच्च स्तर के करीब रहने की संभावना है। हालांकि उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में सूखे और अधिक तापमान के कारण फसल के विकास पर आंशिक असर पड़ा है, फिर भी समग्र उत्पादन परिदृश्य सकारात्मक बना हुआ है। पाकिस्तान में भी पर्याप्त सिंचाई के कारण प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में स्थिति औसत से बेहतर है। चीन में फरवरी के मध्य में किए गए आकलन के अनुसार फसल की स्थिति सामान्यतः अनुकूल है और उत्पादन पिछले वर्ष के लगभग बराबर रहने की उम्मीद है।</p>
<p>गेहूं के अलावा अन्य अनाजों के उत्पादन की संभावनाएं भी मजबूत हैं। दक्षिणी गोलार्ध में प्रमुख निर्यातक देशों में मक्का उत्पादन औसत से ऊपर रहने का अनुमान है। ब्राजील में अनुकूल मौसम और मजबूत निर्यात मांग के कारण मक्का की बुवाई बढ़ी है, जिससे उत्पादन अच्छा रहने की संभावना है, हालांकि 2025 में अधिक आपूर्ति के कारण कीमतों पर कुछ दबाव बना हुआ है। अर्जेंटीना में भी अधिक बुवाई और मौसम के सामान्य रहने के अनुमान के कारण मक्का उत्पादन औसत से अधिक रहने की संभावना है।</p>
<p>दक्षिण अफ्रीका में 2026 में लगातार दूसरे वर्ष मक्का उत्पादन अच्छा रहने की संभावना है। हालांकि कुछ प्रांतों में अनियमित मौसम के कारण उत्पादन पिछले वर्ष से थोड़ा कम रह सकता है, लेकिन बड़े रकबे के कारण कुल उत्पादन औसत से काफी ऊपर रहेगा।</p>
<p>चावल उत्पादन भी मजबूत रहने का अनुमान है। 2025-26 में वैश्विक चावल उत्पादन 56.34 करोड़ टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 2.1 प्रतिशत अधिक होगा। यह वृद्धि भारत, बांग्लादेश, ब्राजील, चीन और इंडोनेशिया जैसे प्रमुख उत्पादक देशों के कारण होगी।</p>
<p>मक्का और चावल के मजबूत उत्पादन के साथ ही 2026 के अंत तक वैश्विक अनाज भंडार लगभग 94.05 करोड़ टन तक पहुंचने का अनुमान है, जिससे वैश्विक अनाज बाजार में आपूर्ति आरामदायक बनी रहने की संभावना है, भले ही गेहूं उत्पादन में गिरावट आए। 2025-26 में अंतरराष्ट्रीय अनाज व्यापार भी बढ़कर 50.17 करोड़ टन तक पहुंचने का अनुमान है, जो रिकॉर्ड के बाद दूसरा सबसे ऊंचा स्तर होगा।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ FAO Outlook: 2026 में वैश्विक गेहूं उत्पादन लगभग 3% घटने का अंदेशा, लेकिन रिकॉर्ड स्तर पर बना रहेगा कुल अनाज उत्पादन ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/06/image_750x500_66648f0a4429b.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[पांच महीने की गिरावट के बाद फरवरी में वैश्विक खाद्य कीमतों में बढ़ोतरी: एफएओ खाद्य मूल्य सूचकांक]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/global-food-prices-rise-in-february-after-five-month-decline-fao-food-price-index.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 06 Mar 2026 17:04:33 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/global-food-prices-rise-in-february-after-five-month-decline-fao-food-price-index.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>फरवरी 2026 में कई महीनों की गिरावट के बाद वैश्विक खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई। यह जानकारी संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) की तरफ से जारी जारी नवीनतम आंकड़ों में दी गई है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक रूप से कारोबार होने वाली खाद्य वस्तुओं की कीमतों में मासिक बदलाव को दर्शाने वाला एफएओ खाद्य मूल्य सूचकांक (FFPI) फरवरी में औसतन 125.3 अंक पर रहा। यह जनवरी के संशोधित स्तर की तुलना में 1.1 अंक या 0.9% अधिक है। पिछले पांच महीने में पहली बार इसमें बढ़ोतरी दर्ज की गई है।</p>
<p>हालांकि मासिक आधार पर कीमतों में वृद्धि हुई, लेकिन वैश्विक खाद्य कीमतें अब भी एक वर्ष पहले की तुलना में थोड़ी कम रहीं। फरवरी का सूचकांक पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 1.3 अंक या लगभग 1% कम रहा और मार्च 2022 में दर्ज रिकॉर्ड उच्च स्तर से करीब 22% नीचे है। तब भू-राजनीतिक तनावों के कारण वैश्विक बाजार प्रभावित हुए थे।</p>
<p>एफएओ खाद्य मूल्य सूचकांक पांच प्रमुख समूहों - अनाज, वनस्पति तेल, डेयरी उत्पाद, मांस और चीनी - के मूल्य सूचकांकों के आधार पर तैयार किया जाता है। इन घटकों को 2014-2016 की आधार अवधि के औसत निर्यात हिस्से के अनुसार भार दिया जाता है।</p>
<p>फरवरी में कुल सूचकांक में बढ़ोतरी मुख्य रूप से अनाज, मांस और वनस्पति तेल की कीमतों में वृद्धि के कारण हुई। बढ़ती मांग और बाजार संबंधी चिंताओं के कारण वैश्विक अनाज बाजार के कुछ हिस्सों में कीमतों में मजबूती आई, जिससे अनाज सूचकांक ऊपर गया। एफएओ अनाज मूल्य सूचकांक फरवरी में औसतन 108.6 अंक पर रहा, जो जनवरी की तुलना में 1.1% अधिक है, हालांकि यह पिछले वर्ष के स्तर से नीचे है।</p>
<p>डेयरी उत्पादों और चीनी की कीमतों में फरवरी के दौरान गिरावट दर्ज की गई, जिससे अन्य वस्तुओं में हुई बढ़ोतरी का असर कुछ हद तक संतुलित हो गया। एफएओ चीनी मूल्य सूचकांक फरवरी में घटकर 86.2 अंक पर आ गया, जो जनवरी की तुलना में 4.1% कम है और पिछले वर्ष की तुलना में भी काफी नीचे है। वैश्विक स्तर पर पर्याप्त आपूर्ति और बेहतर उत्पादन संभावनाओं की उम्मीदों ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीनी की कीमतों पर दबाव बनाए रखा।</p>
<p>एफएओ खाद्य मूल्य सूचकांक को वैश्विक खाद्य बाजार रुझानों का एक महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है। यह प्रमुख कृषि वस्तुओं की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बदलाव की जानकारी देता है और नीति निर्माताओं, उद्योग जगत और विश्लेषकों को खाद्य सुरक्षा, व्यापार और महंगाई से जुड़े वैश्विक रुझानों की निगरानी करने में मदद करता है। एफएओ इस सूचकांक को हर महीने जारी करता है, जिससे वैश्विक खाद्य बाजार में हो रहे बदलावों की समय पर जानकारी मिलती है।</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ पांच महीने की गिरावट के बाद फरवरी में वैश्विक खाद्य कीमतों में बढ़ोतरी: एफएओ खाद्य मूल्य सूचकांक ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[ईरान युद्ध से खाड़ी क्षेत्र की शिपिंग प्रभावित, वैश्विक कृषि और उर्वरक व्यापार में बढ़ी चिंता]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/iran-conflict-disrupts-gulf-shipping-rattles-global-agriculture-and-fertilizer-trade.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 03 Mar 2026 15:17:54 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/iran-conflict-disrupts-gulf-shipping-rattles-global-agriculture-and-fertilizer-trade.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी युद्ध होरमुज जलडमरूमध्य और आसपास के समुद्री मार्गों में शिपिंग गतिविधियों को बाधित कर रहा है। इससे अनाज, तिलहन और उर्वरकों का वैश्विक व्यापार प्रभावित हो रहा है। इसका नतीजा यह है कि प्रमुख शिपिंग कंपनियां अपने जहाजों के रूट बदल रही हैं, जबकि बीमा कंपनियां युद्ध-जोखिम कवर वापस ले रही हैं। इसके चलते वैश्विक कृषि सप्लाई चेन तथा व्यापार को लेकर चिंता बढ़ गई है।</p>
<p>युद्ध ने होरमुज जलडमरूमध्य और आसपास के समुद्री मार्गों में सुरक्षा जोखिम काफी बढ़ा दिया है। यह मार्ग केवल कच्चे तेल नहीं, बल्कि अनाज, तिलहन, उर्वरक और अन्य जिंसों की आवाजाही के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। सैन्य गतिविधियों और वाणिज्यिक जहाजों पर हमलों की खबरों के बाद कई शिपिंग कंपनियों ने अपने परिचालन की समीक्षा शुरू कर दी है। कुछ प्रमुख कंटेनर कंपनियों ने उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों से गुजरने वाले मार्गों को अस्थायी रूप से रोक दिया है या जहाजों को वैकल्पिक रास्तों पर मोड़ दिया है।</p>
<p>जॉइंट मैरिटाइम इंफॉर्मेशन सेंटर (JMlC) ने इस क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा स्थिति को बढ़ाकर &ldquo;क्रिटिकल&rdquo; कर दिया है, जो सक्रिय सैन्य खतरों की ओर संकेत करता है। ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के कमांडर-इन-चीफ के वरिष्ठ सलाहकार इब्राहिम जबारी ने एक बयान में कहा, &ldquo;होर्मुज जलडमरूमध्य बंद है। यदि कोई जहाज इससे गुजरने की कोशिश करेगा तो रिवोल्यूशनरी गार्ड्स और नौसेना के जवान उसे आग के हवाले कर देंगे।&rdquo; इन घटनाक्रमों के चलते अधिक सख्त हो गया है तथा कनसाइनमेंट में देरी या रास्ता बदलने की स्थिति पैदा हो गई है।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x_69a6aac525d76.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>स्वेज और होरमुज मार्ग से समुद्री कृषि व्यापार पर असर</strong></p>
<p>ईरान से जुड़े तनाव का बड़ा प्रभाव कृषि क्षेत्र पर पड़ने की आशंका है। वैश्विक स्तर पर समुद्री मार्ग से होने वाले अनाज और तिलहन व्यापार का लगभग 13-15 प्रतिशत तथा समुद्री मार्ग से निर्यात होने वाले उर्वरकों का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा स्वेज नहर से होकर गुजरता है। वहीं होरमुज जलडमरूमध्य क्रॉप न्यूट्रिएंट्स के बड़े परिवहन का प्रमुख मार्ग है। यदि लंबे समय तक व्यवधान बना रहता है तो मक्का, सोयाबीन, गेहूं, चीनी और पशु आहार से जुड़े उत्पादों के व्यापार की रफ्तार धीमी पड़ सकती है। उर्वरक आपूर्ति शृंखला भी प्रभावित हो सकती है, जबकि किसान पहले ही बढ़ी हुई लागत का सामना कर रहे हैं।</p>
<p>उर्वरक बाजार विशेष रूप से संवेदनशील स्थिति में है। खाड़ी क्षेत्र दुनिया के बड़े उर्वरक उत्पादन केंद्रों में शामिल है। वैश्विक स्तर पर क्रॉप न्यूट्रिएंट्स के कारोबार का बड़ा हिस्सा होरमुज मार्ग से गुजरता है। किसी भी तरह की रुकावट से आयातक देशों में उपलब्धता घट सकती है और लॉजिस्टिक्स संबंधी चुनौतियां बढ़ सकती हैं।</p>
<p>मक्का बाजार की नजर ब्राजील के निर्यात पर टिकी हुई है क्योंकि ईरान, ब्राजील के मक्का का प्रमुख खरीदार रहा है। यदि व्यापार में लंबा व्यवधान होता है, तो दुनिया के दूसरे सबसे बड़े मक्का निर्यातक ब्राजील के लिए आपूर्ति का प्रबंधन चुनौतीपूर्ण हो सकता है। वहीं गेहूं बाजार में भी शिपिंग जोखिमों को लेकर अनिश्चितता के बीच उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है।</p>
<p>अमेरिका-चीन संबंधों को लेकर अनिश्चितता ने सोयाबीन व्यापार की संभावनाओं पर भी असर डाला है, क्योंकि चीन दुनिया का सबसे बड़ा सोयाबीन आयातक है। लंबे समय तक भू-राजनीतिक तनाव बने रहने पर खरीद में देरी या बाधा आ सकती है।</p>
<p><strong>युद्ध जोखिम बीमा पॉलिसियां अब अनिवार्य</strong></p>
<p>सैन्य तनाव के बीच बीमा उद्योग ने त्वरित प्रतिक्रिया दी है। अंतरराष्ट्रीय समूह &lsquo;प्रोटेक्शन एंड इंडेम्निटी (P&amp;I) क्लब्स&rsquo; के कई प्रमुख बीमाकर्ताओं ने फारस की खाड़ी और आसपास के जलक्षेत्र में प्रवेश करने वाले जहाजों के लिए युद्ध जोखिम कवर वापस लेने की घोषणा की है। यह कदम पुनर्बीमाकर्ताओं (रीइंश्योरेंस) द्वारा इसी तरह की पॉलिसियां रद्द किए जाने के बाद उठाया गया है।&nbsp;</p>
<p>युद्ध जोखिम बीमा, जो सामान्य समुद्री बीमा से अलग खरीदा जाता है, उच्च खतरे वाले क्षेत्रों में जाने वाले जहाजों के लिए अनिवार्य माना जाता है। प्रमुख बीमाकर्ताओं के पीछे हटने से जहाज मालिकों को अधिक प्रीमियम चुकाना पड़ सकता है या सीमित कवर उपलब्ध हो सकता है। इससे अल्पावधि में नए माल लदान को लेकर हिचकिचाहट बढ़ सकती है।</p>
<p>उद्योग के अनुमानों के अनुसार, खाड़ी क्षेत्र में बीमा दरें निकट अवधि में 25 से 50 प्रतिशत तक बढ़ सकती हैं। यदि वाणिज्यिक जहाजों पर सीधे हमले बढ़ते हैं तो इसमें और तेज वृद्धि संभव है। कुछ एशियाई बीमा कंपनियों ने भी ईरान और इजरायल के आसपास के जलक्षेत्र में युद्ध जोखिम अंडरराइटिंग सीमित कर दी है।</p>
<p>जहाजों के मार्ग बदलने, बीमा लागत बढ़ने और बढ़ती भू-राजनीतिक अनिश्चितता के संयुक्त प्रभाव से ऊर्जा और कृषि बाजारों में &lsquo;वॉर प्रीमियम&rsquo; जुड़ रहा है। अब कारोबारी पारंपरिक मांग-आपूर्ति कारकों के साथ-साथ सैन्य घटनाक्रमों पर भी नजर रख रहे हैं।&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ ईरान युद्ध से खाड़ी क्षेत्र की शिपिंग प्रभावित, वैश्विक कृषि और उर्वरक व्यापार में बढ़ी चिंता ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[चावल उत्पादन में भारत के चीन को पीछे छोड़ने की असल कहानी, उत्पादकता बढ़ाना बड़ी चुनौती  ]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/the-real-story-of-how-india-surpassed-china-in-rice-production-increasing-productivity-is-a-major-challenge.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 27 Feb 2026 11:33:43 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/the-real-story-of-how-india-surpassed-china-in-rice-production-increasing-productivity-is-a-major-challenge.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p data-start="85" data-end="441">पिछले दिनों भारत के विश्व में सबसे बड़े चावल उत्पादक देश का दर्जा हासिल करने को लेकर काफी चर्चा हुई। पिछले साल देश का उत्पादन <strong>15 करोड़ टन</strong> पहुंच गया, जबकि चीन का उत्पादन 14.50 करोड़ टन रहा। यह एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन यह पूरी तस्वीर नहीं है। क्योंकि भारत में जहां चावल का रकबा रिकॉर्ड स्तर पर है, वहीं चीन ने रणनीतिक रूप से अपने चावल के रकबे में कमी की है।</p>
<p data-start="443" data-end="769">पिछले कुछ वर्षों में चीन ने चावल के रकबे में 40 लाख हेक्टेयर की कमी की है और उसे 3.2 करोड़ हेक्टेयर से घटाकर 2.8 करोड़ हेक्टेयर पर ले आया है, जबकि भारत में चावल का क्षेत्रफल 4.4 करोड़ हेक्टेयर है। अब आप समझ सकते हैं कि चीन का चावल उत्पादन क्षेत्र भारत से 1.6 करोड़ हेक्टेयर कम है, लेकिन उत्पादन का अंतर केवल 50 लाख टन का है।</p>
<p data-start="771" data-end="1058">भारत में भी लगातार यह कोशिश होती रही है कि चावल का क्षेत्रफल कम किया जाए, खासकर हरियाणा, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और तेलंगाना सहित उन क्षेत्रों में जहां पानी की अधिक खपत जल संसाधनों का संकट पैदा कर रही है। साथ ही अधिक उत्पादन के कारण केंद्रीय पूल में चावल का रिकॉर्ड भंडार मौजूद है।</p>
<p data-start="1060" data-end="1475">दुनिया में सबसे अधिक चावल उत्पादन करना उपलब्धि के साथ-साथ एक चुनौती भी है। भारत में चावल की औसत उत्पादकता 3.5 टन प्रति हेक्टेयर (धान के रूप में) और 2.3 टन प्रति हेक्टेयर (चावल के रूप में) है, जबकि चीन में चावल की उत्पादकता करीब 4 टन प्रति हेक्टेयर है। असली कहानी यही है कि चीन की उत्पादकता भारत से करीब 70 प्रतिशत अधिक है। ऐसे में केवल सबसे बड़े उत्पादक बनने की तुलना बहुत तर्कसंगत नहीं है।</p>
<p data-start="1477" data-end="1786">इसके साथ ही एक अहम तथ्य यह भी है कि जरूरत से अधिक चावल उत्पादन के चलते हम दालों और खाद्य तेलों में आयात पर अधिक निर्भर हो गए हैं। एमएसपी व्यवस्था के तहत देश के अधिकांश हिस्सों में धान की खरीद बेहतर होती है, जबकि खरीफ की अन्य फसलों में ऐसी स्थिति नहीं है। इसी कारण किसान धान उत्पादन को प्राथमिकता दे रहे हैं।</p>
<p data-start="1788" data-end="2332">अधिक उत्पादन के कारण ही हम पिछले कई वर्षों से दुनिया के सबसे बड़े चावल निर्यातक बने हुए हैं। गैर-बासमती चावल का निर्यात हम अपेक्षाकृत कम कीमतों पर करते हैं, जिसके चलते 200 लाख टन से अधिक चावल का निर्यात हो रहा है। लेकिन हाल में बांग्लादेश को किए गए निर्यात सौदे करीब 32 रुपये प्रति किलो के स्तर पर हुए, जिससे स्पष्ट है कि हम काफी कम कीमत पर चावल निर्यात कर रहे हैं, जबकि चालू खरीफ विपणन सत्र में सरकारी खरीद के तहत चावल की आर्थिक लागत करीब 40 रुपये प्रति किलो रही है। इसलिए 32 रुपये प्रति किलो की दर पर निर्यात सौदे सामान्य नहीं माने जा सकते।</p>
<p data-start="2334" data-end="2919">देश के प्रतिष्ठित चावल वैज्ञानिक और भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई), पूसा के पूर्व निदेशक <strong>डॉ. अशोक कुमार सिंह</strong> का कहना है कि चावल उत्पादन के मामले में हमें अपनी रणनीति बदलने की जरूरत है। उच्च गुणवत्ता वाले चावल, विशेषकर बासमती और अन्य गैर-बासमती खुशबूदार (एरोमैटिक) किस्मों के उत्पादन और निर्यात पर जोर दिया जाना चाहिए। वर्तमान में हम लगभग 90 हजार करोड़ रुपये मूल्य का चावल निर्यात कर रहे हैं, जिसमें करीब 50 हजार करोड़ रुपये की हिस्सेदारी बासमती चावल की है। कुल 200 लाख टन चावल निर्यात में बासमती की मात्रा लगभग 60 लाख टन है, जबकि गैर-बासमती चावल की मात्रा करीब 140 लाख टन है।</p>
<p data-start="2921" data-end="3397">इसके साथ ही बासमती चावल का रकबा बढ़ाने की भी पर्याप्त गुंजाइश है, खासकर <strong>ज्योग्राफिक इंडिकेशन (जीआई)</strong> वाले राज्यों में। <strong>पंजाब</strong> में लगभग 30 लाख हेक्टेयर में चावल की खेती होती है, लेकिन उसमें बासमती का हिस्सा केवल छह लाख हेक्टेयर है। <strong>हरियाणा</strong> में 14 लाख हेक्टेयर के कुल चावल क्षेत्र में करीब छह लाख हेक्टेयर में बासमती की खेती होती है। पंजाब में बासमती का रकबा बढ़ाया जा सकता है, जिससे किसानों की आय बढ़ेगी और गैर-बासमती धान का क्षेत्र घटाकर उसे अन्य फसलों की ओर मोड़ा जा सकता है।</p>
<p data-start="3399" data-end="3633">दूसरे विशेषज्ञ भी मानते हैं कि सबसे बड़ा उत्पादक बनने से उत्साहित होने के बजाय हमें चीन और भारत के बीच उत्पादकता के अंतर को कम करने पर ध्यान देना चाहिए। औसत उत्पादकता बढ़ाकर देश में धान का कुल रकबा घटाना अधिक व्यावहारिक रणनीति होगी।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ चावल उत्पादन में भारत के चीन को पीछे छोड़ने की असल कहानी, उत्पादकता बढ़ाना बड़ी चुनौती   ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[अब ट्रंप ने लगाया 10 फीसदी ग्लोबल टैरिफ, बोले &amp;#45; भारत से ट्रेड डील पर असर नहीं]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/trump-imposes-10-pc-global-tariff-says-trade-deal-with-india-will-not-be-affected.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 21 Feb 2026 12:47:28 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/trump-imposes-10-pc-global-tariff-says-trade-deal-with-india-will-not-be-affected.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने&nbsp;राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा पिछले साल विभिन्न देशों पर लगाए गये टैरिफ को खारिज कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए ट्रंप ने&nbsp;10 प्रतिशत का नया टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी, जो भारत समेत लगभग सभी देशों पर लागू होगा।&nbsp;</p>
<p>भारत के लिए फिलहाल राहत की बात है कि अब 18 फीसदी की बजाय 10 फीसदी टैरिफ लगेगा। ट्रंप ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भारत के साथ ट्रेड डील पर कोई असर नहीं पड़ेगा। अब भारत टैरिफ देगा, लेकिन अमेरिका टैरिफ का भुगतान नहीं करेगा।&nbsp;</p>
<h2><strong>सुप्रीम कोर्ट का फैसला</strong></h2>
<p>अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने 6-3 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर आपातकालीन कानून (IEEPA) के तहत दुनिया भर के देशों पर टैरिफ लगाने का काम किया। राष्ट्रपति को आपातकालीन स्थिति में व्यापार पर कुछ निर्णय लेना का अधिकार है, लेकिन इस तरह ग्लोबल टैरिफ लगाने का अधिकार नहीं है।&nbsp; नए कर लगाने का अधिकार केवल अमेरिकी कांग्रेस के पास है। इस फैसले से अमेरिकी संसद और राष्ट्रपति के अधिकारों को लेकर भी बहस छिड़ गई है।&nbsp;</p>
<h2><strong>ट्रंप की प्रतिक्रिया&nbsp;</strong></h2>
<p>सुप्रीम कोर्ट के फैसले को निराशाजनक करार देते हुए ट्रंप ने उनके खिलाफ निर्णय देने वाले न्यायाधीशों की कड़ी आलोचना की। साथ ही 10 फीसदी नया टैरिफ लगाने का ऐलान कर दिया। 1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 122 के तहत राष्ट्रपति 150 दिनों के लिए अधिकतम 15 प्रतिशत तक अस्थायी टैरिफ लगा सकते हैं।</p>
<p>व्हाइट हाउस के अनुसार, 24 फरवरी से लगभग सभी देशों से आयातित वस्तुओं पर 10 प्रतिशत का नया शुल्क लागू होगा। इसमें वे देश भी शामिल होंगे जिन्होंने अमेरिका के साथ व्यापार समझौते किए हैं। प्रशासन का कहना है कि 150 दिनों के भीतर कांग्रेस को हस्तक्षेप करना होगा, जिससे यह कदम फिलहाल अस्थायी है।</p>
<h2><strong>भारत पर असर&nbsp;</strong></h2>
<p>सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में राष्ट्रपति ट्रंप ने एक सवाल के जवाब में कहा कि भारत के साथ व्यापार समझौते में कुछ नहीं बदला है। हम उन्हें टैरिफ का भुगतान नहीं करेंगे। अब भारत टैरिफ का भुगतान करेगा। हमने मामला पलट दिया है।&nbsp;&nbsp;<span></span></p>
<p>ट्रंप के इस बयान के बाद विपक्षी दलों के नेताओं ने मोदी सरकार को घेरना शुरू कर दिया है और अमेरिका से ट्रेड डील को लेकर सवाल उठ रहे हैं।&nbsp;</p>
<p>गौरतलब है कि ट्रेड डील के तहत अमेरिका ने भारत पर टैरिफ 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया था। अब ट्रंप के नए आदेश के बाद सभी देशों पर टैरिफ घटकर 10 फीसदी हो गया है।&nbsp;</p>
<p>ऐसे में सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या भारत ने अमेरिका के साथ ट्रेड डील और उसकी शर्तें मानने में जल्दबाजी की। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अमेरिका ने खुद ही सब देशों पर टैरिफ कम कर दिये।&nbsp;</p>
<p>भारत के साथ अपने संबंधों के बारे में पूछे जाने पर ट्रंप ने पीएम मोदी की तारीफ करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के साथ उनके संबंध बहुत अच्छ हैं। लेकिन वे बहुत ज्यादा टैरिफ वसूल रहे थे।&nbsp;</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/02/image_750x500_69995c03a074d.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ अब ट्रंप ने लगाया 10 फीसदी ग्लोबल टैरिफ, बोले - भारत से ट्रेड डील पर असर नहीं ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप टैरिफ को गैरकानूनी करार दिया, भारत सहित विभिन्न देशों के लिए राहत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/us-supreme-court-strikes-down-trumps-global-tariffs-curbing-presidential-powers.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 20 Feb 2026 21:57:16 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/us-supreme-court-strikes-down-trumps-global-tariffs-curbing-presidential-powers.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p data-start="78" data-end="498">अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा विभिन्न देशों के खिलाफ लगाए गए ऊंचे आयात शुल्क यानी टैरिफ को अवैध करार दिया है। न्यायालय ने निचली अदालत के उस निर्णय को बरकरार रखा, जिसमें कहा गया था कि राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर आपातकाल के लिए बने कानून का गलत इस्तेमाल किया। इसके लिए ट्रंप प्रशासन ने अमेरिकी संसद (कांग्रेस) की अनुमति भी नहीं ली थी।</p>
<p data-start="500" data-end="812">अमेरिका के इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट के तहत राष्ट्रपति आपात स्थिति में विदेश व्यापार को नियंत्रित कर सकते हैं, लेकिन उन्हें व्यापक स्तर पर टैरिफ लगाने का अधिकार नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय में इस मामले की सुनवाई कर रहे न्यायाधीशों ने 6-3 के बहुमत से राष्ट्रपति के व्यापक टैरिफ लगाने को असंवैधानिक माना।</p>
<p data-start="814" data-end="940">यह फैसला अमेरिका में राष्ट्रपति और संसद के बीच शक्तियों के संतुलन को लेकर एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है। इस फैसले से ट्रंप के हाथ से टैरिफ का हंटर छिन जाएगा, जिसका असर भारत सहित विभिन्न देशों के साथ व्यापार की शर्तों पर पड़ेगा।&nbsp;</p>
<h3 data-start="942" data-end="960">वैश्विक प्रभाव</h3>
<p data-start="962" data-end="1136">यह निर्णय वैश्विक व्यापार में बनी अनिश्चितता के बीच बड़ी राहत लेकर आया है। कई अमेरिकी उद्योग संगठनों का कहना था कि इन शुल्कों से लागत बढ़ी और उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ पड़ा।</p>
<p data-start="1138" data-end="1333">भारत सहित कई निर्यातक देशों के लिए यह निर्णय सकारात्मक माना जा रहा है, क्योंकि व्यापक आयात शुल्क हटने से अमेरिकी बाजार तक पहुंच आसान हो सकती है। इससे भारत पर लागू अतिरिक्त टैरिफ समाप्त हो जाएंगे।</p>
<div dir="ltr" class="css-1k9op6x e17x9cvu0">
<p dir="ltr" class="css-d8mtc1 e1yuyadm0">रेसीप्रोकल टैरिफ समाप्त होने से अब भारत को 18 फीसदी टैक्स की बजाय पहले से लागू टैक्स देने होंगे। इस फैसले से अमेरिका के साथ भारत के व्यापार समझौते के समीकरण भी पूरी तरह बदल जाएंगे। इस फैसले के मद्देनजर ट्रंप भारत के साथ जल्द से जल्द व्यापार समझौते पर मुहर लगाना चाहते थे।&nbsp;</p>
</div>
<h3 data-start="1335" data-end="1352">क्या था विवाद</h3>
<p data-start="1354" data-end="1641">अप्रैल 2025 में राष्ट्रपति ट्रंप ने अमेरिका के बढ़ते व्यापार घाटे को राष्ट्रीय आपात स्थिति बताते हुए लगभग सभी प्रमुख व्यापारिक साझेदार देशों से आने वाले सामान पर पारस्परिक आधार पर आयात शुल्क लगा दिए थे। विभिन्न देशों से आयात होने वाले सामान पर 10% से 50% तक कर लगाने का आदेश दिया गया था।</p>
<p data-start="1354" data-end="1641">इससे पहले फरवरी 2025 में ट्रंप ने चीन, मेक्सिको और कनाडा से आने वाले सामान पर कर लगाया था। चीन, कनाडा और मेक्सिको पर लगाए गए शुल्क के पीछे फेंटानिल और अन्य अवैध नशीले पदार्थों की तस्करी को भी आधार बनाया गया था।</p>
<p data-start="1856" data-end="2090">यह विवाद तीन अलग-अलग याचिकाओं के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा। एक पारिवारिक खिलौना कंपनी ने, दूसरी एक जनहित विधिक संस्था ने छोटे कारोबारियों की ओर से, और तीसरी 12 अमेरिकी राज्यों ने मिलकर राष्ट्रपति के निर्णय को चुनौती दी थी।</p>
<p data-start="2092" data-end="2243">निचली अदालतों ने पहले ही कहा था कि राष्ट्रपति ने आपातकालीन कानून का दायरा बढ़ाकर उसका दुरुपयोग किया। इसके बाद प्रशासन ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील की।</p>
<h3 data-start="2245" data-end="2276">कौन से शुल्क रहेंगे प्रभावी</h3>
<p data-start="2278" data-end="2514">यह फैसला उन शुल्कों पर लागू नहीं होगा, जो 1962 के ट्रेड एक्सपेंशन एक्ट की धारा 232 के तहत राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर लगाए गए थे। इस प्रावधान के अंतर्गत इस्पात, एल्युमीनियम और वाहन उद्योग से जुड़े कुछ आयात शुल्क अब भी जारी रह सकते हैं।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/02/image_750x500_69989b422cb11.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप टैरिफ को गैरकानूनी करार दिया, भारत सहित विभिन्न देशों के लिए राहत ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[व्हाइट हाउस ने भारत&amp;#45;अमेरिका ट्रेड डील पर फैक्ट शीट बदली, &amp;quot;दालों&amp;quot; का उल्लेख हटाया, और भी कई बदलाव]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/white-house-updates-india-us-trade-fact-sheet-removes-mention-of-certain-pulses-and-more.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 11 Feb 2026 11:35:29 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/white-house-updates-india-us-trade-fact-sheet-removes-mention-of-certain-pulses-and-more.html</guid>
        <description><![CDATA[ <h3>फैक्ट शीट की भाषा थोड़ी नरम करते हुए इसे 7 फरवरी को जारी साझा बयान के अनुरूप बनाया गया है।&nbsp;</h3>
<p>भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर जारी आधिकारिक <strong><a href="https://www.whitehouse.gov/fact-sheets/2026/02/fact-sheet-the-united-states-and-india-announce-historic-trade-deal/">फैक्ट शीट</a></strong> में व्हाइट हाउस ने कई अहम बदलाव किए गये हैं। पहले फैक्ट शीट में जिन उत्पादों का उल्लेख था, उनमें से कुछ को बाद में हटा दिया और भाषा को नरम किया गया है। अमेरिका के साथ व्यापार समझौते में दालों को शामिल करने पर विपक्षी दल और किसान संगठन सवाल उठा रहे थे। इसे लेकर राजनीतिक विवाद खड़ा हो रहा था।&nbsp;</p>
<p>मूल फैक्ट शीट में &ldquo;certain pulses&rdquo; यानी कुछ दालों पर भारत द्वारा टैरिफ घटाने का उल्लेख था। दालों को लाल ज्वार, ट्री नट्स, सोयाबीन ऑयल, वाइन और स्पिरिट्स जैसे उत्पादों के साथ शामिल किया गया था। लेकिन संशोधित दस्तावेज में दालों का जिक्र हटा दिया गया।</p>
<p>भारत दुनिया में दालों का सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता है। यह मुद्दा दलहन किसानों की आय और खाद्य सुरक्षा से जुड़ा होने के कारण राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील है।</p>
<h3>&ldquo;Committed&rdquo; की बजाय &ldquo;Intends&rdquo;</h3>
<p>एक और अहम बदलाव उत्पाद खरीद से जुड़ा है। भारत द्वारा 500 अरब डॉलर के अमेरिकी उत्पादों की खरीद&nbsp;के लिए &ldquo;committed&rdquo; की बजाय &ldquo;intends&rdquo; यानी &ldquo;इरादा&rdquo; शब्द का इस्तेमाल किया गया है।</p>
<p>साथ ही, उत्पादों की सूची से &ldquo;agricultural&rdquo; शब्द भी हटा दिया गया। हालांकि, व्हाइट हाउस की ओर से इन संशोधनों को लेकर कोई बयान या स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है। ये बदलाव चुपचाप कर दिए गए।&nbsp;</p>
<p>संभवतः भारत की ओर से फैक्ट शीट को लेकर आपत्ति दर्ज कराए जाने के बाद इसमें बदलाव किया गया और भाषा भी सुधारी गई। इससे यह भी संकेत मिलता है कि अंतरिम समझौते पर बातचीत जारी है और इसे अभी अंतिम रूप नहीं दिया गया है।&nbsp;</p>
<p></p>
<h3></h3> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/02/image_750x500_698c1d668fd1c.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ व्हाइट हाउस ने भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर फैक्ट शीट बदली, "दालों" का उल्लेख हटाया, और भी कई बदलाव ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[भारत&amp;#45;अमेरिका व्यापार समझौते में &amp;apos;कुछ दालें&amp;apos; भी शामिल, अमेरिका ने जारी की &amp;apos;फैक्ट शीट&amp;apos;]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/certain-pulses-included-in-india-us-trade-agreement-white-house-released-fact-sheet.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 10 Feb 2026 11:54:02 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/certain-pulses-included-in-india-us-trade-agreement-white-house-released-fact-sheet.html</guid>
        <description><![CDATA[ <div dir="auto">भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार को लेकर एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। व्हाइट हाउस की ओर से सोमवार को जारी फैक्ट शीट में अमेरिकी कृषि उत्पादों पर भारत द्वारा आयात शुल्क घटाने या समाप्त करने की बात कही है, जिसमें पहली बार &ldquo;कुछ दालों (certain pulses)&rdquo; को भी शामिल किया गया है। जबकि 6 फरवरी को जारी भारत&ndash;अमेरिका के संयुक्त बयान में दालों का काई जिक्र नहीं था। लेकिन भारत अमेरिका से कुछ दालों का भी कम शुल्क पर आयात करेगा।&nbsp;</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">9 फरवरी को जारी&nbsp;<span>फैक्ट शीट</span>&nbsp;के अनुसार:</div>
<div dir="auto">"भारत सभी अमेरिकी औद्योगिक उत्पादों और खाद्य एवं कृषि उत्पादों की एक विस्तृत श्रृंखला पर शुल्क खत्म या कम करेगा। इसमें सूखे डिस्टिलर्स अनाज (DDGs), लाल ज्वार, ट्री नट्स, ताजे और प्रसंस्कृत फल,&nbsp;<strong>चुनिंदा दालें</strong>, सोयाबीन तेल, वाइन, स्पिरिट और अन्य उत्पाद शामिल हैं।"&nbsp;</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">फैक्ट शीट में भारत द्वारा 500 बिलियन डॉलर की संभावित खरीद में अमेरिकी <strong>कृषि उत्पादों</strong> को भी शामिल किया गया है। अभी तक 500 बिलियन डॉलर की खरीद में कृषि उत्पादों का उल्लेख नहीं किया गया था। रूस से तेल खरीद को लेकर दावा किया जा रहा था कि यह समझौते की अनिवार्य शर्त नहीं है। लेकिन फैक्ट शीट में लिखा है कि&nbsp;भारत ने रूस से तेल खरीद बंद करने की प्रतिबद्धता जताई है, तभी 25% अतिरिक्त टैरिफ हटाया गया। यानी रूस से तेल खरीद का मुद्दा इस व्यापार समझौते से जुड़ा है।</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">एक तरफ जहां अमेरिकी फैक्ट शीट दालों और कृषि उत्पादों पर शुल्क कटौती की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर भारत में घरेलू किसानों के हितों की सुरक्षा का सवाल खड़ा हो गया है। व्हाइट हाउस की फैक्ट शीट और भारतीय मंत्री के बयानों के बीच विरोधाभास विवाद का विषय बन सकते हैं। हालांकि, दालों के आयात को लेकर दोनों देशों के बीच शर्तों की बारीकियां अभी पूरी तरह स्पष्ट होना बाकी हैं।</div>
<p>व्यापार समझौते में दालों का उल्लेख इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि 6 फरवरी को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हुई बातचीत के बाद जारी संयुक्त बयान में दालों जैसे संवेदनशील कृषि उत्पादों पर कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिया गया था।</p>
<p>कृषि क्षेत्र से जुड़े संगठनों और दलहन किसानों के लिए यह मुद्दा खासा संवेदनशील है, क्योंकि भारत में दालें खाद्य सुरक्षा और किसानों की आय दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। आने वाले दिनों में सरकार की ओर से इस पर और स्पष्टता आने की संभावना है।</p>
<p></p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/02/image_750x500_698ad30c8107b.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में 'कुछ दालें' भी शामिल, अमेरिका ने जारी की 'फैक्ट शीट' ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[अमेरिका–भारत ट्रेड डील पर साझा बयान जारी, भारत कई अमेरिकी कृषि उत्पादों पर घटाएगा टैरिफ]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/joint-statement-issued-on-us-india-trade-deal-india-to-reduce-tariffs-on-many-us-agricultural-products.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 07 Feb 2026 12:58:31 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/joint-statement-issued-on-us-india-trade-deal-india-to-reduce-tariffs-on-many-us-agricultural-products.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अमेरिका और भारत ने एक संयुक्त बयान जारी कर दोनों देशों के बीच अंतरिम व्यापार समझौते की रूपरेखा साझा की है, जिससे दोनों देश एक व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते के और करीब आ गए हैं। अमेरिका और भारत इस फ्रेमवर्क को तुरंत लागू करेंगे और समझौते को अंतिम रूप देने की दिशा में काम करेंगे।</p>
<p>संयुक्त बयान के अनुसार, भारत सभी अमेरिकी औद्योगिक उत्पादों और&nbsp;कई अमेरिकी खाद्य व कृषि उत्पादों पर शुल्क समाप्त करेगा या उनमें कटौती करेगा। इनमें ड्राइड डिस्टिलर्स ग्रेन्स (DDGs), पशु आहार के लिए रेड सोरघम, ट्री नट्स, ताजे और प्रसंस्कृत फल, सोयाबीन तेल, वाइन और स्पिरिट्स सहित अन्य उत्पाद शामिल हैं। दोनों देशों ने आपसी हित के क्षेत्रों में एक-दूसरे को तरजीही देने और व्यापार में बाधाओं को दूर करने की प्रतिबद्धता जताई है।</p>
<p>समझौते के अनुसार, भारत के उत्पादों पर अमेरिका 18 फीसदी टैरिफ लगाएगा। इसमें वस्त्र और परिधान, चमड़ा और जूते, प्लास्टिक और रबर उत्पाद, ऑर्गेनिक केमिकल्स, होम डेकोर, हस्तशिल्प उत्पाद और कुछ मशीनरी क्षेत्र शामिल हैं। इसके अलावा, अमेरिका भारत के कई उत्पादों पर लगे टैरिफ हटाएगा, जिसमें जेनेरिक दवाइयां<span>, </span>जेम्स और डायमंड<span>,</span> एयरक्राफ्ट व एयरक्राफ्ट पार्ट्स शामिल हैं। भारत को ऑटोमोटिव पार्ट्स के लिए एक तरजीह टैरिफ रेट कोटा भी मिलेगा।</p>
<p>अंतरिम समझौते में ऊर्जा और रणनीतिक खरीद पर विशेष जोर दिया गया है। भारत ने अगले पांच वर्षों में अमेरिका से 500 अरब डॉलर के ऊर्जा उत्पादों, विमान और विमान पुर्जों, कीमती धातु, तकनीकी उत्पाद और कोकिंग कोल खरीदने की मंशा जताई है। साथ ही, दोनों देश ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स (GPU) और डेटा सेंटर में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों समेत तकनीकी उत्पादों के व्यापार और तकनीकी सहयोग को बढ़ाएंगे।</p>
<p>पिछले दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ऐलान किया था कि भारतीय उत्पादों पर रेसिप्रोकल टैरिफ 25 फीसदी से घटाकर 18 फीसदी करने किया जाएगा। क्योंकि भारत रूस से तेल खरीद बंद करेगा। इसके बाद<span>, </span>अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने के कारण भारत पर लगाया 25 फीसदी टैरिफ भी हटा दिया है।</p>
<p>प्रधानमंत्री <strong>नरेंद्र मोदी</strong> ने कहा कि यह समझौता &lsquo;मेक इन इंडिया&rsquo; को मजबूती देगा और देश के मेहनती किसानों, उद्यमियों, मछुआरों सहित अन्य वर्गों के लिए नए अवसर खोलेगा। उन्होंने कहा कि इससे महिलाओं और युवाओं के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार सृजित होंगे।</p>
<p><strong>किसान हित सुरक्षित: पीयूष गोयल </strong></p>
<p>वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री <strong>पीयूष गोयल</strong> ने दावा किया है भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में किसानों के हितों को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है। अनाज, फल, सब्जियां, मसाले, तिलहन, डेयरी, पोल्ट्री और मांस सहित संवेदनशील कृषि क्षेत्रों में कोई रियायत नहीं दी गई है। इससे घरेलू किसानों के हित सुरक्षित होंगे, स्थानीय कृषि को एक बड़े बाजार में पहुंच मिलेगी।</p>
<p>गोयल ने कहा, &ldquo;यह समझौता किसानों के हितों की रक्षा और ग्रामीण आजीविका को बनाए रखने के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। इसके तहत मक्का, गेहूं, चावल, सोया, पोल्ट्री, दूध, पनीर, एथेनॉल (ईंधन), तंबाकू, कुछ सब्जियां और मांस सहित संवेदनशील कृषि और डेयरी उत्पादों को पूरी तरह संरक्षित किया गया है।&rdquo;</p>
<p>संयुक्त बयान में यह भी कहा गया है कि अमेरिका और भारत इस फ्रेमवर्क को तुरंत लागू करेंगे और अंतरिम एग्रीमेंट को फाइनल करने की दिशा में काम करेंगे।&nbsp;</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/03/image_750x500_67cd87b7c36bf.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ अमेरिका–भारत ट्रेड डील पर साझा बयान जारी, भारत कई अमेरिकी कृषि उत्पादों पर घटाएगा टैरिफ ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/03/image_750x500_67cd87b7c36bf.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[भारत&amp;#45;अमेरिका ट्रेड डील: ट्रंप ने भारत पर टैरिफ घटाकर 18% किया, रूस से तेल खरीद बंद करेगा भारत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/india-us-trade-deal-trump-reduces-tariffs-on-india-to-18-pc-india-to-stop-buying-oil-from-russia.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 03 Feb 2026 09:05:51 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/india-us-trade-deal-trump-reduces-tariffs-on-india-to-18-pc-india-to-stop-buying-oil-from-russia.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत और अमेरिका के बीच एक बड़े व्यापार समझौते की घोषणा की गई है, जिसके तहत अमेरिका भारतीय उत्पादों पर लगाए जाने वाले आयात शुल्क (टैरिफ) को 25 फीसदी से घटाकर 18 प्रतिशत करेगा, जबकि भारत रूस से कच्चा तेल खरीदना बंद करने और अमेरिकी उत्पादों की खरीद बढ़ाने पर सहमत हुआ है।</p>
<p>अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को सोशल मीडिया पर यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी&nbsp;से फोन पर बातचीत के बाद यह फैसला लिया गया। ट्रंप ने कहा कि भारत अब रूस से तेल खरीदने के बजाय अमेरिका और संभावित रूप से वेनेजुएला से तेल खरीदेगा।</p>
<p>ट्रंप के अनुसार, इस समझौते के तहत भारत अमेरिकी ऊर्जा उत्पादों, कोयला, तकनीक, कृषि और अन्य वस्तुओं की खरीद को बढ़ाएगा। उन्होंने दावा किया कि भारत 500 अरब डॉलर से अधिक मूल्य के अमेरिकी उत्पाद खरीदेगा और &ldquo;BUY AMERICAN&rdquo; नीति को उच्च स्तर पर अपनाएगा।</p>
<p>ट्रंप ने कहा, &ldquo;भारत अमेरिका के खिलाफ अपने टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं को शून्य की ओर ले जाएगा। इससे दोनों देशों के बीच व्यापार और रणनीतिक साझेदारी और मजबूत होगी।&rdquo;</p>
<h3>मोदी का &lsquo;बिग थैंक्स&rsquo;&nbsp;</h3>
<p>प्रधानमंत्री मोदी ने भी सोशल मीडिया मंच X पर प्रतिक्रिया देते हुए इस फैसले का स्वागत किया। उन्होंने लिखा,<br />&ldquo;आज प्रिय मित्र राष्ट्रपति ट्रंप से बात कर बहुत खुशी हुई। &lsquo;मेड इन इंडिया&rsquo; उत्पादों पर अब 18 प्रतिशत का कम टैरिफ लगेगा, यह सुनकर प्रसन्नता हुई। इस महत्वपूर्ण घोषणा के लिए भारत के 1.4 अरब लोगों की ओर से राष्ट्रपति ट्रंप को बहुत-बहुत धन्यवाद।&rdquo;</p>
<p>मोदी ने कहा कि जब दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाएं और सबसे बड़े लोकतंत्र साथ काम करते हैं, तो इससे दोनों देशों के लोगों को लाभ होता है और आपसी सहयोग के नए अवसर खुलते हैं।</p>
<h3>रूसी तेल पर सख्ती</h3>
<p>रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका भारत पर लगाए गए दंडात्मक 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क को भी वापस ले रहा है, जो रूस से तेल खरीदने के कारण लगाया गया था और पहले से मौजूद 25 प्रतिशत &ldquo;पारस्परिक टैरिफ&rdquo; के ऊपर जोड़ा गया था। नए समझौते के बाद कुल अमेरिकी टैरिफ घटकर 18 प्रतिशत रह जाएगा।</p>
<p>विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता भारत&ndash;अमेरिका संबंधों को नई दिशा देगा और वैश्विक राजनीति में ऊर्जा व्यापार तथा यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण असर डालेगा। साथ ही, भारतीय निर्यातकों को अमेरिकी बाजार में बेहतर अवसर मिलेंगे, जबकि अमेरिका को भारत जैसे बड़े उपभोक्ता बाजार तक अधिक पहुंच हासिल होगी।</p>
<h3>कृषि पर नजर</h3>
<p><span>हालांकि समझौते से जुड़ी पूरी जानकारी अभी सामने नहीं आई है। अब देखना होगा कि भारत अमेरिका को कौनसी टैरिफ और नॉन टैरिफ रियायतें देता है। खासतौर पर अमेरिका से कृषि वस्तुओं के निर्यात पर नजर रहेगी, क्योंकि यह भारतीय कृषि और किसानों के भविष्य से जुड़ा मामला है। अमेरिका अपने कृषि की भारतीय बाजार में पहुंच बढ़ाना चाहता है।&nbsp;</span></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/02/image_750x500_69816e8ea60fa.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ भारत-अमेरिका ट्रेड डील: ट्रंप ने भारत पर टैरिफ घटाकर 18% किया, रूस से तेल खरीद बंद करेगा भारत ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/02/image_750x500_69816e8ea60fa.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[दुनिया के सबसे बड़े डेयरी आयातक चीन की अब निर्यात में चुनौती]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/china’s-dairy-pivot-how-the-world’s-biggest-importer-turned-into-an-export-challenger.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 01 Feb 2026 07:16:49 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/china’s-dairy-pivot-how-the-world’s-biggest-importer-turned-into-an-export-challenger.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>दशकों तक वैश्विक डेयरी बाजार एक सामान्य नियम पर चलते रहे। जब चीन अधिक खरीद करता था, तो दुनिया भर में डेयरी कीमतें बढ़ जाती थीं। दूध पाउडर का दुनिया का सबसे बड़ा आयातक होने के कारण चीन की मांग न्यूजीलैंड, यूरोपीय यूनियन, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के डेयरी किसानों की आय तय करती थी। चीन की खरीद में किसी भी तरह की सुस्ती तुरंत वैश्विक कीमतों को गिरा देती थी।&nbsp;</p>
<p>अब यह नियम टूटता नजर आ रहा है। चीन का डेयरी क्षेत्र एक गहरे संरचनात्मक बदलाव से गुजर रहा है। वह डेयरी आयातक से बदलकर अब सरप्लस उत्पादन से जूझ रहा है और निर्यात बाजारों की ओर तेजी से देख रहा है। इस बदलाव ने वैश्विक डेयरी व्यापार की दिशा बदली है, प्रतिस्पर्धा को तेज किया है और अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर दबाव बना रहा है।</p>
<p><strong>आत्मनिर्भरता के लिए एक दशक की कोशिश</strong><br />चीन के डेयरी क्षेत्र में आए बदलाव की जड़ें खाद्य आत्मनिर्भरता को लेकर की गई एक निरंतर और दीर्घकालिक नीतिगत पहल में हैं। महामारी के दौर में आपूर्ति शृंखला में आए व्यवधानों के बाद इस प्रयास को और तेज किया गया। इसके तहत बीजिंग ने बड़े पैमाने, तकनीक और औद्योगिकीकरण के जरिए घरेलू दूध उत्पादन के तेज विस्तार को बढ़ावा दिया।</p>
<p>धीरे-धीरे छोटे घरेलू डेयरी फार्मों की जगह बड़े औद्योगिक &ldquo;मेगा-फार्म&rdquo; लेते गए। उद्योग और सरकारी अनुमानों के अनुसार, अब चीन के कुल दूध उत्पादन का दो-तिहाई से अधिक हिस्सा इन्हीं औद्योगिक इकाइयों से आता है। ये फार्म अधिक उत्पादन देने वाली आयातित नस्लों, बेहतर जेनेटिक्स, दूध दुहने की स्वचालित मशीनों और केंद्रीकृत चारा प्रबंधन पर निर्भर हैं। इससे अधिकतम दक्षता हासिल करने में मदद मिली।</p>
<p>इसका नतीजा उत्पादन में तेज उछाल के रूप में सामने आया। 2023 में चीन का दूध उत्पादन लगभग 4.2 करोड़ टन तक पहुंच गया, जो सरकार के 4.1 करोड़ टन के लक्ष्य से दो साल पहले ही हासिल हो गया। नीति निर्माताओं के लिए यह आयात पर निर्भरता कम करने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि थी। <em>(तुलनात्मक रूप से भारत का दूध उत्पादन 24.5 करोड़ टन से अधिक हो चुका है, हालांकि इसका अधिकांश हिस्सा घरेलू खपत में ही उपयोग होता है।)</em></p>
<p><strong>मांग से अधिक हो गई आपूर्ति&nbsp;</strong><br />चीन में दूध उत्पादन की वृद्धि ने खपत को काफी पीछे छोड़ दिया है। हाल के वर्षों में चीन में प्रति व्यक्ति डेयरी खपत में गिरावट आई है, जो 2021 में 14.4 किलोग्राम से घटकर 2022 में 12.4 किलोग्राम रह गई। यह सुस्ती कई संरचनात्मक कारणों को दर्शाती है- कमजोर होती अर्थव्यवस्था, घरेलू खर्च में सतर्कता, बदलती खानपान की आदतें और सबसे अहम, चीन की रिकॉर्ड स्तर पर कम जन्म दर, जिससे तरल दूध और शिशु पोषण उत्पादों की मांग घट गई है। आपूर्ति और मांग के बीच यह बढ़ता अंतर घरेलू बाजार में लगातार सरप्लस की स्थिति पैदा कर रहा है।</p>
<p>कच्चे दूध की कीमतें उत्पादन लागत से नीचे चली गई हैं और यह 3.8 युआन प्रति किलोग्राम से भी कम रही हैं। यह किसानों की लागत के बराबर है। घाटे में चल रहे डेयरी ऑपरेशन को पशुओं की संख्या घटाने, विस्तार टालने या पूरी तरह कारोबार बंद करने पर मजबूर होना पड़ा है। इसका सबसे ज्यादा असर छोटे किसानों पर पड़ा है, हालांकि बड़े कॉरपोरेट उत्पादकों ने भी कटौती की है।&nbsp;</p>
<p><strong>घरेलू उत्पादन बढ़ा, आयात घटा</strong><br />घरेलू स्तर पर दूध की उपलब्धता तेजी से बढ़ने के साथ ही चीन की आयातित डेयरी उत्पादों की मांग कमजोर पड़ी है। वर्ष 2023 में कुल डेयरी आयात में करीब 12 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जबकि होल मिल्क पाउडर का आयात - जो कभी चीन के डेयरी व्यापार की रीढ़ हुआ करता था - लगभग 38 प्रतिशत तक घट गया।</p>
<p>न्यूजीलैंड अब भी चीन का सबसे बड़ा डेयरी आपूर्तिकर्ता बना हुआ है, लेकिन वहां से होने वाली आपूर्ति में तेज गिरावट आई है। यूरोपीय यूनियन और ऑस्ट्रेलिया भी इसी तरह के दबाव का सामना कर रहे हैं। लंबे समय से चीनी मांग पर निर्भर रहे निर्यातकों के लिए इस गिरावट ने अपनी बाजार रणनीतियों पर पुनर्विचार को मजबूर कर दिया है।</p>
<p><strong>चीन ने निर्यात बाजार में कदम रखा</strong><br />चीन के डेयरी सरप्लस का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यह है कि यह अब मामूली रूप से ही सही, निर्यातक के रूप में उभर रहा है। हाल के वर्षों में चीनी डेयरी उत्पादों, विशेषकर दूध पाउडर, का निर्यात तेजी से बढ़ा और 2024 में लगभग 70,000 टन तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग एक-तिहाई अधिक है। इन शिपमेंट्स का लगभग आधा हिस्सा पाउडर दूध का है, और इसके गंतव्य हांगकांग, दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ्रीका, मध्य पूर्व और मध्य एशिया के देश हैं।</p>
<p>हालांकि चीन का निर्यात वॉल्यूम न्यूजीलैंड, यूरोपीय यूनियन और अमेरिका जैसे वैश्विक दिग्गजों की तुलना में छोटा है, लेकिन यह बदलाव प्रतीकात्मक और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। जो कभी दुनिया का सबसे बड़ा खरीदार था, अब वह विशेष रूप से उभरते बाजारों में प्रतिस्पर्धा कर रहा है। यिली और मेंगनियू जैसी प्रमुख चीनी डेयरी कंपनियां विदेशी बाजारों में विस्तार कर रही हैं, अपने पैमाने और प्रतिस्पर्धी कीमतों का लाभ उठाकर नए क्षेत्रों में पैठ बनाने की कोशिश कर रही हैं।</p>
<p>चीन की डेयरी में यह बदलाव वैश्विक बाजारों में हलचल पैदा कर रहा है। चीन से अतिरिक्त आपूर्ति वैश्विक दूध पाउडर की कीमतों पर और दबाव डाल रही है। दूसरे, एशिया, अफ्रीका और मध्य पूर्व जैसे उभरते बाजारों में प्रतिस्पर्धा तीव्र हो रही है। ये क्षेत्र कभी ओशिनिया, यूरोप और अमेरिका के निर्यातकों के लिए थे। चीन की भौगोलिक नजदीकी, कम लॉजिस्टिक लागत और आक्रामक मूल्य निर्धारण पारंपरिक आपूर्तिकर्ताओं के लिए नई चुनौतियां पेश कर रहे हैं।</p>
<p>फिर भी एक विरोधाभास बरकरार है। चीन के पास तरल दूध और दूध पाउडर का सरप्लस है, फिर भी वह अभी तक उच्च मूल्य वाले डेयरी उत्पादों - विशेष किस्म के चीज, मक्खन और प्रीमियम शिशु आहार फार्मूला - के लिए आयात पर निर्भर है। शहरी उपभोक्ता विदेशी ब्रांडों को गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रतिष्ठा से जोड़ते हैं, जिससे ये आयातित उत्पाद का सेगमेंट अपेक्षाकृत स्थिर बना है।&nbsp;</p>
<p>चीन का डेयरी क्षेत्र में बदलाव केवल उसके अपने किसानों के लिए नहीं, बल्कि वैश्विक डेयरी अर्थव्यवस्था के लिए भी एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो रहा है। यह बदलाव ऐसे समय में हो रहा है जब अमेरिका और यूरोपीय यूनियन भी दूध और अन्य कृषि उत्पादों के निर्यात को वैश्विक बाजारों में बढ़ाने के दबाव में हैं। घरेलू सरप्लस, बढ़ती लागत का दबाव और उपभोक्ता खपत में धीमी वृद्धि जैसी चुनौतियों का सामना करते हुए, अमेरिका और ईयू दोनों ने एशिया, अफ्रीका और मध्य पूर्व में बाजार पहुंच सुनिश्चित करने के लिए व्यापार समझौते और निर्यात प्रोत्साहन को तेज कर दिया है। इस परिदृश्य में चीन का एक निर्यातक के रूप में उभरना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। यह सीधे पश्चिमी उत्पादकों से प्रतिस्पर्धा कर रहा है। इससे निर्यात रणनीतियां जटिल होती जा रही हैं और वैश्विक कृषि व्यापार में कीमतों पर दबाव बढ़ रहा है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ दुनिया के सबसे बड़े डेयरी आयातक चीन की अब निर्यात में चुनौती ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[भारत–ईयू व्यापार समझौता: यूरोप के किसानों की बड़ी जीत, भारतीय कृषि के लिए भी संतुलित अवसर]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/big-wins-for-european-farmers-calibrated-gains-for-indian-agriculture-in-eu-trade-deal.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 28 Jan 2026 23:05:58 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/big-wins-for-european-farmers-calibrated-gains-for-indian-agriculture-in-eu-trade-deal.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>यूरोपीय संघ (ईयू) और भारत के बीच घोषित हुए मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) से यूरोपीय किसान और कृषि-खाद्य उत्पादक प्रमुख लाभार्थियों में शामिल होंगे। ब्रसेल्स और नई दिल्ली से जारी आधिकारिक बयानों के अनुसार, यह समझौता भारतीय बाजार में कृषि पर लगने वाले कुछ सबसे ऊंचे शुल्कों को समाप्त करता है, जबकि ईयू ने अपने संवेदनशील कृषि क्षेत्रों को कड़े तौर पर सुरक्षित रखा है।</p>
<p>यह समझौता भारत में ईयू के कृषि और खाद्य निर्यात के लिए बाजार पहुंच को काफी बेहतर बनाने वाला है। भारत में कृषि उत्पादों के आयात पर औसत शुल्क अक्सर 36% से अधिक हैं, जो लंबे समय से यूरोपीय उत्पादकों के लिए एक बड़ी बाधा रहे हैं। यूरोपीय आयोग का अनुमान है कि एफटीए के पूरी तरह लागू होने पर ईयू निर्यातकों को सालाना लगभग 4 अरब यूरो तक के शुल्क की बचत हो सकती है। इससे दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते उपभोक्ता बाजारों में यूरोपीय खाद्य उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति मजबूत होगी।</p>
<p>समझौते के तहत भारत ईयू के कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों की एक व्यापक सूची पर शुल्क घटाएगा या पूरी तरह समाप्त करेगा। जैतून का तेल, मार्जरीन और अन्य वनस्पति तेलों पर अभी तक 45% तक शुल्क लगता है, इसे शून्य कर दिया जाएगा। फलों के रस और नॉन-अल्कोहलिक बीयर पर 55% तक के शुल्क भी समाप्त होंगे। इसके अलावा, ईयू से भेड़ और मेमने के मांस के निर्यात को मौजूदा 33% शुल्क से पूरी तरह मुक्त कर दिया जाएगा।</p>
<p>ब्रेड, बिस्कुट, पास्ता, चॉकलेट और पालतू पशु आहार जैसे प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद, जिन पर 50% तक शुल्क लगता है, अब भारत में बिना किसी शुल्क के आयात किये जा सकेंगे। यूरोप के लिए शराब एक महत्वपूर्ण निर्यात उत्पाद है , उसके ऊपर शुल्क में चरणबद्ध कटौती कर उसके आयात को आसान बनाया जाएगा। प्रीमियम वाइन पर 150% शुल्क घटाकर 20% और मध्यम श्रेणी की वाइन पर 30% किया जाएगा, जबकि स्पिरिट्स पर शुल्क 150% तक के स्तर से घटकर 40% रह जाएगा।</p>
<p>ईयू अधिकारियों का कहना है कि इन रियायतों से भारत में यूरोप के कृषि-खाद्य उत्पादों की मौजूदगी काफी बढ़ सकती है, जहां फिलहाल ईयू का निर्यात चीन या अमेरिका जैसे बाजारों की तुलना में कम है। भारत को होने वाला ईयू का कृषि-खाद्य निर्यात पहले ही पूरे यूरोपीय संघ में लगभग 8 लाख नौकरियों के मौके पैदा करने वाला है। ईयू को उम्मीद है कि व्यापार बढ़ने के साथ यह संख्या और बढ़ेगी।</p>
<p><strong>संवेदनशील कृषि क्षेत्रों पर ईयू की सख्त सीमा</strong></p>
<p>साथ ही, ईयू ने अपने संवेदनशील कृषि क्षेत्रों को स्पष्ट रूप से अलग रखा है। चीनी और एथनॉल, चावल और सॉफ्ट गेहूं, बीफ और पोल्ट्री, मिल्क पाउडर, केले और शहद पर भारत को कोई शुल्क रियायत नहीं दी जाएगी। टेबल अंगूर और खीरे जैसे उत्पाद, जिनमें भारतीय निर्यातक प्रतिस्पर्धी हैं, उनके लिए सीमित मात्रा के साथ कड़े टैरिफ-रेट कोटा प्रावधान लागू होंगे, जिससे ईयू बाजार में आने वाली मात्रा नियंत्रित रहेगी।</p>
<p>ईयू ने यह भी स्पष्ट किया है कि उसके उच्च स्वास्थ्य और पादप (एसपीएस) मानक पूरी तरह बरकरार रहेंगे। एफटीए के एसपीएस अध्याय के तहत पशु और पौध स्वास्थ्य तथा खाद्य सुरक्षा से जुड़े ईयू के कड़े नियम बिना किसी छूट के लागू रहेंगे। पारदर्शिता और सूचना साझा करने के लिए सहयोग तंत्र मजबूत किए जाएंगे, लेकिन नियामकीय मानकों में कोई ढील नहीं दी जाएगी।</p>
<p>व्यापार विश्लेषकों के अनुसार, ये सुरक्षा उपाय यूरोपीय किसान संगठनों का राजनीतिक समर्थन हासिल करने के लिए अहम थे, जो पहले से ही अस्थिर वैश्विक खाद्य बाजारों के बीच आयात प्रतिस्पर्धा को लेकर सतर्क रहे हैं।</p>
<p><strong>भारत को क्या मिलेगा: सीमित लेकिन रणनीतिक लाभ</strong></p>
<p>भारत के लिए कृषि क्षेत्र में लाभ अपेक्षाकृत सीमित हैं, लेकिन रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार, ईयू भारत के चाय, कॉफी, मसाले, टेबल अंगूर, गर्किंस और खीरे, सूखे प्याज, ताजे फल-सब्जियां और कुछ प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों को प्राथमिक बाजार पहुंच देगा।</p>
<p>अधिकारियों का कहना है कि कम शुल्क और स्थिर नियम भारतीय किसानों और कृषि निर्यातकों को मूल्य श्रृंखला में ऊपर जाने में मदद करेंगे और यूरोप के प्रीमियम बाजार तक पहुंच बनाएंगे, जहां ट्रेस करने योग्य और टिकाऊ तरीके से उत्पादित खाद्य पदार्थों की मांग है। हालांकि कृषि का भारत-ईयू कुल वस्तु व्यापार में हिस्सा अभी छोटा है। 2024-25 में भारत ईयूय व्यापार लगभग 136.5 अरब डॉलर का था &mdash; फिर भी नीति-निर्माता उच्च-मूल्य वाले क्षेत्रों में पर्याप्त वृद्धि की संभावना देखते हैं।</p>
<p>सबसे अहम बात यह है कि भारत ने अपने सबसे संवेदनशील कृषि क्षेत्रों को समझौते के बाहर रखा है। डेयरी, खाद्यान्न, पोल्ट्री, सोयामील और कई फल-सब्जियों को शुल्क में कटौती से बाहर रखा गया है। ग्रामीण आजीविका और खाद्य सुरक्षा को लेकर घरेलू चिंताओं के चलते ऐसा किया गया है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक है, और इस क्षेत्र पर करोड़ों छोटे किसान निर्भर हैं, इसलिए डेयरी व्यापार वार्ताओं में एक राजनीतिक &lsquo;रेड लाइन&rsquo; रही है।</p>
<p><strong>मानक और संरचना</strong></p>
<p>समझौते में कड़े &lsquo;रूल्स ऑफ ओरिजिन&rsquo; भी शामिल हैं, ताकि केवल वही उत्पाद शुल्क रियायतों का लाभ ले सकें जो भारत या ईयू में पर्याप्त रूप से उत्पादित या प्रसंस्कृत हों। इससे तीसरे देशों के जरिए माल भेजने के जोखिम को कम किया जाएगा। एसपीएस और तकनीकी बाधाओं से जुड़े प्रावधानों का उद्देश्य नियामकीय निगरानी को कमजोर किए बिना देरी और अनुपालन लागत को घटाना है।</p>
<p>एफटीए के लागू होने से पहले कानूनी जांच और यूरोपीय संसद तथा भारत की संबंधित संस्थाओं की मंजूरी जरूरी होगी। इसके लागू होने के बाद, दोनों पक्षों के अधिकारी मानते हैं कि यह कृषि व्यापार के प्रवाह को नया आकार देगा &mdash; यूरोपीय किसानों को भारतीय बाजार में बड़ी पहुंच मिलेगी, जबकि भारतीय कृषि को दुनिया के सबसे कड़े रूप से विनियमित खाद्य बाजारों में सीमित लेकिन सुनियोजित प्रवेश मिलेगा।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ भारत–ईयू व्यापार समझौता: यूरोप के किसानों की बड़ी जीत, भारतीय कृषि के लिए भी संतुलित अवसर ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[दक्षिण अमेरिका में बढ़ी आपूर्ति और कमजोर मांग से 2026 की शुरुआत में वैश्विक तिलहन कीमतों पर दबाव]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/rising-south-american-supplies-weak-demand-drag-global-oilseed-prices-into-early-2026.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 24 Jan 2026 14:58:59 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/rising-south-american-supplies-weak-demand-drag-global-oilseed-prices-into-early-2026.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>वैश्विक तिलहन बाजारों पर 2025 के अंत और 2026 की शुरुआती अवधि में लगातार दबाव बना रहा। दक्षिण अमेरिका से आपूर्ति बढ़ने की उम्मीदों और वैश्विक मांग को लेकर बढ़ती चिंताओं के चलते कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। खास कर ब्राजील में अनुकूल मौसम के कारण सप्लाई अच्छी रहने के आसार हैं।</p>
<p>15 जनवरी को जारी अपनी ग्रेन मार्केट रिपोर्ट में इंटरनेशनल ग्रेन्स काउंसिल (IGC) ने कहा कि नवंबर के अंत के बाद से वैश्विक औसत सोयाबीन निर्यात कीमतों में तेज गिरावट आई है, जिसमें दक्षिणी गोलार्ध के निर्यात केंद्रों पर सबसे ज्यादा दबाव देखा गया। यह गिरावट बेहतर फसल संभावनाओं और कमजोर मांग का परिणाम है।</p>
<p>IGC के अनुसार, शिकागो सोयाबीन स्पॉट फ्यूचर्स में तेज गिरावट आई। हाल के हफ्तों में चीन को हुई कुछ बिक्री से निर्यातकों को अस्थायी राहत मिली, लेकिन मध्यम अवधि की मांग को लेकर चिंताएं बनी रहीं। 2026 की शुरुआत में कुल निर्यात प्रतिबद्धताएं साल-दर-साल आधार पर लगभग 30% कम थीं, जिसका मुख्य कारण चीनी प्रोसेसरों की घटती खरीद रही।</p>
<p>ब्राजील में फसल की स्थिति ने भी कीमतों पर दबाव डाला। अधिकांश क्षेत्रों में अनुकूल मौसम के कारण दिसंबर से ही शुरुआती कटाई शुरू हो गई, जिससे बड़ी फसल की उम्मीद मजबूत हुई। सोया मील और सोया तेल बाजारों में कमजोरी ने भी नकारात्मक माहौल को और गहरा किया।</p>
<p>इन परिस्थितियों में अमेरिकी क्षेत्र से सोयाबीन के निर्यात मूल्य लगभग 6% गिरकर 425 डॉलर प्रति टन एफओबी पर आ गए। ब्राजील में स्पॉट कीमतें नवंबर के मध्य से करीब 10% गिरकर 405 डॉलर प्रति टन एफओबी के आसपास पहुंच गईं। अर्जेंटीना में भी निर्यात मूल्य लगभग 10% घटकर 400 डॉलर प्रति टन एफओबी रह गए।</p>
<p>अन्य तिलहनों में भी यही रुझान देखने को मिला। कनाडा में आईसीई कैनोला फ्यूचर्स में 3% की गिरावट दर्ज की गई, जिसका कारण प्रचुर आपूर्ति की संभावना और सोयाबीन बाजार की कमजोरी रही। वैंकूवर में कैनोला कीमतें 10 डॉलर घटकर 479 डॉलर प्रति टन एफओबी हो गईं, जबकि ऑस्ट्रेलिया के क्विनाना से निर्यात प्रस्ताव 20 डॉलर गिरकर 520 डॉलर प्रति टन एफओबी पर आ गए।</p>
<p>संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) ने भी दिसंबर में वैश्विक वनस्पति तेल कीमतों में 0.2% की गिरावट की पुष्टि की, जिससे सूचकांक छह महीने के निचले स्तर पर पहुंच गया। सोया, रेपसीड और सूरजमुखी तेल की कीमतों में गिरावट ने पाम ऑयल की मजबूती को पीछे छोड़ दिया। हालांकि, पूरे 2025 के लिए वनस्पति तेल मूल्य सूचकांक सालाना आधार पर 17% ऊंचा रहा।</p>
<p>इस बीच, अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) ने 2025&ndash;26 मार्केटिंग वर्ष के लिए वैश्विक सोयाबीन उत्पादन का अनुमान बढ़ाकर 42.57 करोड़ टन कर दिया है। इसमें ब्राजील और अमेरिका में बेहतर उत्पादन की अहम भूमिका है। अकेले ब्राजील का उत्पादन अनुमान 17.8 करोड़ टन तक बढ़ाया गया है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ दक्षिण अमेरिका में बढ़ी आपूर्ति और कमजोर मांग से 2026 की शुरुआत में वैश्विक तिलहन कीमतों पर दबाव ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[किसानों और व्यापारियों के लिए तंज़ानिया में संभावनाएं तलाशेगी हरियाणा सरकार]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/haryana-government-to-explore-opportunities-in-tanzania-for-farmers-and-business.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 20 Jan 2026 17:45:58 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/haryana-government-to-explore-opportunities-in-tanzania-for-farmers-and-business.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p data-start="99" data-end="543">हरियाणा और तंज़ानिया के बीच व्यापार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से हरियाणा सरकार के विदेश सहयोग विभाग एवं नागरिक उड्डयन विभाग की प्रधान सचिव अमनीत पी. कुमार की अध्यक्षता में एक अहम बैठक हुई। बैठक में व्यापारियों और प्रगतिशील किसानों के साथ तंज़ानिया में कृषि गतिविधियों के माध्यम से किसानों की आय बढ़ाने की संभावनाओं पर विचार-विमर्श किया गया। बैठक में मुख्यमंत्री के सलाहकार (विदेश सहयोग विभाग) पवन चौधरी भी विशेष रूप से उपस्थित रहे।</p>
<p data-start="99" data-end="543">हरियाणा सरकार की विज्ञप्ति के अनुसार,&nbsp;बैठक के दौरान तंज़ानिया में कृषि यंत्रों की संभावित मांग, विभिन्न क्षेत्रों के अनुरूप फसल चयन, बागवानी एवं दलहन फसलों की संभावनाएं, सिंचाई के लिए जल उपलब्धता तथा विद्युत आपूर्ति जैसे विषयों पर बिंदुवार चर्चा की गई। इसके अतिरिक्त, खनन (माइनिंग) क्षेत्र से जुड़े व्यापारियों ने अपने-अपने क्षेत्रों से संबंधित विभिन्न मुद्दे और प्रश्न भी बैठक के समक्ष रखे।</p>
<p data-start="901" data-end="1321">अमनीत पी. कुमार ने व्यापारियों और किसानों द्वारा प्रस्तुत सभी सुझावों और प्रश्नों को गंभीरता से सुना और आश्वस्त किया कि हरियाणा सरकार अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देने के लिए एक संरचित, पारदर्शी और व्यावहारिक दृष्टिकोण के साथ कार्य कर रही है। उन्होंने कहा कि सरकार का प्रयास है कि व्यापारियों और किसानों को तंज़ानिया में निवेश एवं कृषि गतिविधियों से जुड़ी सभी आवश्यक जानकारियां समयबद्ध और सटीक रूप से उपलब्ध कराई जाएं।</p>
<p data-start="1323" data-end="1693">बैठक में यह भी निर्णय लिया गया कि तंज़ानिया में संभावनाओं के आकलन हेतु सर्वेक्षण, फील्ड स्टडी तथा अन्य आवश्यक कार्यों के लिए संबंधित विभागों एवं अधिकारियों की स्पष्ट जिम्मेदारियां निर्धारित की जाएंगी, ताकि आगे की कार्ययोजना को प्रभावी रूप से क्रियान्वित किया जा सके। इस दिशा में सरकारी स्तर पर समन्वय स्थापित कर व्यापारियों एवं किसानों को हरसंभव सहयोग प्रदान किया जाएगा।</p>
<p data-start="1695" data-end="2031">बैठक में उपस्थित व्यापारियों ने हरियाणा सरकार द्वारा अंतरराष्ट्रीय व्यापार एवं निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए उठाए जा रहे कदमों की सराहना की। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की पहल से न केवल व्यापार एवं औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि हरियाणा और तंज़ानिया के बीच दीर्घकालिक, मजबूत और परस्पर लाभकारी साझेदारी को भी नई गति मिलेगी।</p>
<p data-start="2033" data-end="2184">बैठक में मुख्य रूप से उद्योगपति परविंद लोहान, आशीष तायल, सुनील जैन, राकेश बेनीवाल, विजेता एस सिंह, अमन सिंह और रमेश भादू सहित अन्य हितधारक उपस्थित रहे।</p>
<p data-start="2033" data-end="2184"></p>
<p data-start="2033" data-end="2184"></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/01/image_750x500_696f71be334e3.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ किसानों और व्यापारियों के लिए तंज़ानिया में संभावनाएं तलाशेगी हरियाणा सरकार ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/01/image_750x500_696f71be334e3.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[USDA ने अमेरिका और वैश्विक गेहूं भंडार के अनुमान बढ़ाए, कीमतों पर रहेगा दबाव]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/usda-lifts-us-global-wheat-stock-estimates-signals-bearish-outlook-for-markets.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 17 Jan 2026 13:26:21 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/usda-lifts-us-global-wheat-stock-estimates-signals-bearish-outlook-for-markets.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) ने अपनी नई रिपोर्ट में अमेरिका और वैश्विक स्तर पर गेहूं के अनुमानित भंडार को पहले से अधिक बताया है। ये आंकड़े बाजार में प्रचुर मात्रा में आपूर्ति, कमजोर घरेलू मांग और अर्जेंटीना तथा रूस जैसे प्रमुख निर्यातक देशों में बेहतर उत्पादन के कारण बढ़े हैं। इससे आने वाले समय में गेहूं के अंतरराष्ट्रीय बाजार में दाम में नरमी के संकेत भी मिलते हैं।</p>
<p>विश्व कृषि आपूर्ति एवं मांग अनुमान (WASDE) रिपोर्ट में USDA ने 1 जून 2026 को अमेरिका में गेहूं का कैरीओवर स्टॉक बढ़ाकर 92.6 करोड़ बुशल कर दिया है। यह दिसंबर के अनुमान से 2.5 करोड़ बुशल अधिक और 2025 की तुलना में 7.1 करोड़ बुशल यानी 8% ज्यादा है। यह अनुमान विश्लेषकों के पूर्वानुमानों की ऊपरी सीमा पर है। यह वृद्धि मुख्य रूप से चारे में कम उपयोग के कारण आई है।</p>
<p>USDA ने तिमाही ग्रेन स्टॉक्स रिपोर्ट के आधार पर 2025 के गेहूं कैरीओवर को भी 40 लाख बुशल बढ़ाया है। अपेक्षा से कम खपत के चलते फीड और रेजिडुअल उपयोग में 2 करोड़ बुशल की कटौती की गई, जबकि बीज उपयोग 10 लाख बुशल घटाया गया। कुल गेहूं निर्यात अनुमान 90 करोड़ बुशल पर अपरिवर्तित रखा गया, हालांकि विभिन्न किस्मों के बीच वितरण बदला गया है।</p>
<p>गेहूं की विभिन्न किस्मों में, हार्ड रेड विंटर (HRW) गेहूं का भंडार 1 जून 2026 को बढ़कर 45 करोड़ बुशल आंका गया है, जो दिसंबर के अनुमान से 2.4 करोड़ बुशल और 2025 के स्तर से 4.8 करोड़ बुशल अधिक है। यह बढ़ोतरी घरेलू खपत में कमी और निर्यात घटने की स्थिति को दर्शाती है। हार्ड रेड स्प्रिंग गेहूं का कैरीओवर मामूली रूप से बढ़ाकर 22.6 करोड़ बुशल किया गया है, जबकि कमजोर चारा मांग और कम निर्यात के कारण सॉफ्ट रेड विंटर गेहूं का भंडार बढ़कर 14.1 करोड़ बुशल रहने का अनुमान है।</p>
<p>इसके विपरीत, बेहतर निर्यात संभावनाओं के चलते व्हाइट गेहूं का कैरीओवर घटाकर 7.7 करोड़ बुशल कर दिया गया है, जबकि चारा और अवशिष्ट उपयोग बढ़ने के कारण ड्यूरम गेहूं का भंडार घटकर 3.2 करोड़ बुशल आंका गया है।</p>
<p><strong>वैश्विक स्टॉक भी बढ़ने का अनुमान</strong><br />वैश्विक स्तर पर भी USDA ने गेहूं की आपूर्ति, खपत, व्यापार और अंतिम स्टॉक के अनुमान बढ़ाए हैं। 2025-26 के लिए वैश्विक गेहूं का अंतिम भंडार 34 लाख टन बढ़ाकर 2783 लाख टन किया गया है, जिसका प्रमुख कारण अर्जेंटीना और रूस में उत्पादन में वृद्धि है। वैश्विक गेहूं उत्पादन का अनुमान अब 1.102 अरब टन लगाया गया है, जो पिछले अनुमान से 43 लाख टन अधिक है।</p>
<p>अर्जेंटीना के गेहूं उत्पादन अनुमान को 35 लाख टन बढ़ाकर 275 लाख टन किया गया है, जबकि रूस के उत्पादन में 20 लाख टन की बढ़ोतरी कर इसे 895 लाख टन आंका गया है। इन दोनों देशों में हुई वृद्धि ने तुर्की में फसल उत्पादन में आई कमी की भरपाई से भी अधिक कर दी है। कुल मिलाकर वैश्विक गेहूं उत्पादन अब पिछले वर्ष की तुलना में काफी अधिक है, जिससे गुणवत्ता को लेकर बनी चिंताओं के बावजूद कीमतों पर दबाव बढ़ गया है।</p>
<p><strong>दाम रेंज के भीतर रहेंगे</strong><br />तिमाही ग्रेन स्टॉक्स रिपोर्ट के अनुसार 1 दिसंबर 2025 को अमेरिका में गेहूं का कुल भंडार 1.68 अरब बुशल रहा, जो एक साल पहले की तुलना में 7% अधिक और पांच वर्षीय औसत से काफी ऊपर है। इन आंकड़ों के जारी होने के बाद प्रचुर आपूर्ति के संकेतों को देखते हुए गेहूं वायदा कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। इन बुनियादी कारकों की वजह से विश्लेषकों का मानना है कि निकट अवधि में गेहूं की कीमतें सीमित दायरे में ही बनी रहेंगी।&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ USDA ने अमेरिका और वैश्विक गेहूं भंडार के अनुमान बढ़ाए, कीमतों पर रहेगा दबाव ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[ईरान के साथ व्यापार पर ट्रंप टैरिफ और राजनीतिक अशांति से भारतीय बासमती निर्यात की मुश्किलें बढ़ीं]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/trump-tariffs-on-trade-with-iran-and-political-unrest-have-added-to-the-difficulties-for-indian-basmati-exports.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 15 Jan 2026 15:49:29 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/trump-tariffs-on-trade-with-iran-and-political-unrest-have-added-to-the-difficulties-for-indian-basmati-exports.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p data-start="52" data-end="396">अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर 25 प्रतिशत तक अतिरिक्त शुल्क लगाने की चेतावनी, ईरान में जारी राजनीतिक अशांति और मुद्रा अस्थिरता ने भारत के बासमती चावल निर्यात के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। इन घटनाक्रमों का असर न केवल निर्यात सौदों पर पड़ा है, बल्कि घरेलू बाजार की कीमतों पर भी दिख रहा है।</p>
<p data-start="398" data-end="835">भारत के बासमती निर्यात बाजार के लिए ईरान की अहमियत बहुत अधिक है। सऊदी अरब और इराक के बाद ईरान भारतीय बासमती का सबसे बड़ा आयातक है। पिछले साल करीब छह अरब डॉलर के बासमती निर्यात में ईरान ने भारत से 75.32 करोड़ डॉलर का बासमती आयात किया था। वहीं सऊदी अरब को 1.20 अरब ड़ॉलर और इराक को85 करोड़ डॉलर का निर्यात हुआ था। हालांकि यह निर्यात का स्तर प्रत्यक्ष निर्यात है जबकि काफी बड़ी मात्रा में ईरान को सऊदी अरब और यूएई के जरिेये बासमती निर्यात होता है। इसकी वजह प्रतिबंधों के चलते परोक्ष निर्यात को भुगतान के लिए कुछ निर्यातक सुरक्षित मानते हैं।&nbsp;</p>
<p data-start="398" data-end="835">वहीं चालू साल में अप्रैल से नवंबर के दौरान ईरान को बासमती चावल का निर्यात इराक से अधिक रहा है और इस दौरान 20.9 फीसदी की बढ़ोतरी के साथ ईरान को 5.99 लाख टन बासमती निर्यात किया गया जबकि इराक को 5.01 लाख टन और सऊदी अरब को इस दौरान 6.70 लाख टन बासमती निर्यात किया गया। इराक और सऊदी अरब को बासमती के निर्यात में पिछले साल के मुकाबले इस अवधि में गिरावट दर्ज की गई है।</p>
<p data-start="398" data-end="835">ईरान सराकर बासमती और दूसरी आवश्यक वस्तुओं के आयात के लिए रियायती दर पर विदेशी मुद्रा (डॉलर) उपलब्ध कराती थी लेकिन जनवरी से इसे बंद कर दिया गया है। इसका सीधा असर बासमती निर्यात पर पड़ेगा। वहीं&nbsp;ट्रंप की ओर से ईरान के साथ व्यापार करने पर 25 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ की चेतावनी के बाद बासमती की खेपों में देरी और भुगतान अटकने की आशंका पैदा हो गई है।&nbsp; ट्रंप के इस फैसले के बाद घरेलू बाजार में बासमती की कीमतों में गिरावट शुरू हो गई है। इस स्थिति में जिन किसानों ने बेहतर दाम की उम्मीद में बासमती धान रोक कर रखा है उनके लिए कीमतों में गिरावट नुकसानदेह साबित होगी।&nbsp;</p>
<p class="Standard" style="text-align: justify;">चावल निर्यात उद्योग से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, ईरान से जुड़े करीब 2,000 करोड़ रुपये के निर्यात भुगतान फिलहाल फंसे हुए हैं। इंटरनेट बंद होने और बैंकिंग चैनलों में दिक्कतों के कारण भारतीय निर्यातकों और ईरानी आयातकों के बीच संचार बाधित हुआ है। नतीजतन नए सौदे लगभग थम गए हैं और बंदरगाहों तथा मिल गोदामों में स्टॉक का दबाव बढ़ गया है। कुछ निर्यातक ईरान जाने वाली खेपों को यूएई जैसे मध्यस्थ रास्तों से भेजने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे लागत बढ़ रही है और भुगतान चक्र लंबा हो रहा है।</p>
<p data-start="1843" data-end="2193">ईरान से व्यापार में आई बाधा का असर घरेलू कीमतों पर भी पड़ा है। हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की प्रमुख मंडियों में थोक बासमती कीमतें पिछले एक हफ्ते में करीब 5&ndash;7 फीसदी तक गिर गई हैं। प्रमुख किस्मों के दाम में 5&ndash;10 रुपये प्रति किलो की गिरावट दर्ज की गई है। व्यापारियों का कहना है कि निर्यातकों की खरीद कमजोर पड़ने से बाजार में दबाव बना हुआ है।</p>
<p data-start="2195" data-end="2644">निर्यातकों के अनुसार, निर्यात-ग्रेड बासमती, जो इस तिमाही की शुरुआत में करीब 950 डॉलर प्रति टन पर कारोबार कर रहा था, अब 900 डॉलर प्रति टन के आसपास बोला जा रहा है। मिलर्स का कहना है कि मिड-रेंज किस्मों में गिरावट ज्यादा तेज है, जबकि प्रीमियम एज्ड बासमती को अमेरिका और यूरोप से स्थिर मांग के चलते कुछ हद तक सहारा मिला हुआ है। हालांकि, ईरान से जुड़े भू-राजनीतिक और टैरिफ जोखिम बने रहने से बासमती बाजार का निकट भविष्य फिलहाल कमजोर और अनिश्चित बना हुआ है।</p>
<p data-start="2646" data-end="3067" data-is-last-node="" data-is-only-node="">पिछले कुछ वर्षों में भारतीय बासमती निर्यात में बढ़ोतरी तो हुई है, लेकिन इसकी वृद्धि दर अधिक नहीं रही है। वहीं, यूरोप के प्रीमियम बाजार में पाकिस्तान ने बड़ा हिस्सा हासिल कर लिया है। दूसरी ओर, बासमती के निर्यात दाम बढ़े हैं, लेकिन बासमती धान उत्पादन करने वाले किसानों को मिलने वाले दाम कई साल पहले 4,000 से 4,500 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गए थे, जो अब घटकर तीन से साढ़े तीन हजार रुपये प्रति क्विंटल के बीच ही रह गए हैं।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ ईरान के साथ व्यापार पर ट्रंप टैरिफ और राजनीतिक अशांति से भारतीय बासमती निर्यात की मुश्किलें बढ़ीं ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[ऑस्ट्रेलिया ने डेयरी जेनेटिक्स के लिए नया नेशनल ब्रीडिंग ऑब्जेक्टिव लागू किया]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/australia-rolls-out-overhauled-national-breeding-objective-for-dairy-genetics.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 11 Jan 2026 11:09:05 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/australia-rolls-out-overhauled-national-breeding-objective-for-dairy-genetics.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>ऑस्ट्रेलिया ने हाल ही डेयरी पशु प्रजनन के क्षेत्र में एक बड़ा सुधार लागू किया है। इसके तहत नेशनल ब्रीडिंग ऑब्जेक्टिव (NBO) में व्यापक बदलाव किए गए हैं, जिन्हें हाल के वर्षों में आनुवंशिक मूल्यांकन प्रणाली का सबसे महत्वपूर्ण अपडेट माना जा रहा है। इन परिवर्तनों का उद्देश्य डेयरी प्रजनन को आधुनिक उत्पादन प्रणालियों, बदलती कृषि अर्थव्यवस्था और दीर्घकालिक स्थिरता लक्ष्यों के अनुरूप बनाना है।</p>
<p>संशोधित NBO के तहत एक उन्नत जेनेटिक मूल्यांकन ढांचा लागू किया गया है, जिसमें एनिमल ब्रीडिंग वैल्यू (ABV) की गणना और व्याख्या की पद्धति में बदलाव किए गए हैं। इस सुधार का सबसे अहम पहलू बेस अपडेट है, जिसके तहत अब 2020 में जन्मी गायों को संदर्भ आबादी के रूप में लिया गया है। पुराने संदर्भ समूहों की तुलना में यह बदलाव अधिक समकालीन और यथार्थवादी आधार प्रदान करता है।</p>
<p>इस बेस अपडेट के परिणामस्वरूप कई गुणों में ABV में सामान्य गिरावट देखी गई है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि इसका मतलब आनुवंशिक प्रगति में कमी नहीं है। इसके विपरीत, यह दर्शाता है कि पशुओं में पहले ही पर्याप्त आनुवंशिक सुधार हो चुका है और नए मानक उसी उन्नत स्तर को प्रतिबिंबित करते हैं। जैसे-जैसे औसत गाय का प्रदर्शन बेहतर होता है, संदर्भ आधार को आगे बढ़ाना आवश्यक हो जाता है ताकि जेनेटिक आकलन में कृत्रिम बढ़ोतरी न हो।</p>
<p>दिलचस्प बात यह है कि व्यक्तिगत गुणों में ABV घटने के बावजूद प्रमुख चयन सूचकांकों में वृद्धि दर्ज की गई है। बैलेंस्ड परफॉर्मेंस इंडेक्स (BPI), हेल्थ वेटेड इंडेक्स (HWI) और सस्टेनेबिलिटी इंडेक्स (SI) सब में सुधार हुआ है। यह बढ़ोतरी संशोधित आर्थिक वेटेज के कारण हुई है, जिसमें मौजूदा बाजार स्थितियों, दूध के मूल्य की संरचना और फैट व प्रोटीन के सापेक्ष महत्व को बेहतर ढंग से शामिल किया गया है।</p>
<p>नस्ल-विशिष्ट प्रभाव भी स्पष्ट हैं। होल्सटीन और जर्सी दोनों नस्लों में समग्र टाइप और मैमरी (थन) गुणों के ABV में सुधार देखा गया है। हालांकि, होल्सटीन में प्रजनन क्षमता (फर्टिलिटी) का ABV घटा है, जिसका कारण व्यापक आबादी में हुए सुधार से औसत स्तर का ऊपर उठना है। जर्सी नस्ल में दूध की मात्रा (मिल्क लीटर) के ABV में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है, जो मुख्य रूप से नए बेस और आर्थिक प्राथमिकताओं में बदलाव से जुड़ी है।</p>
<p>नए NBO में संरचनात्मक सुधार भी जोड़े गए हैं। इनमें टाइप गुणों (ट्रेट) के लिए ऑप्टिमम एक्सप्रेशन मार्कर शामिल हैं, जिनका उद्देश्य अत्यधिक विशेषताओं से बचते हुए संतुलित और व्यावहारिक पशुओं को बढ़ावा देना है। इसके साथ ही सर्वाइवल ABV के लिए एक नया मॉडल लागू किया गया है, जो अल्पकालिक उत्पादन की बजाय दीर्घायु और लचीलापन पर अधिक जोर देता है।</p>
<p>उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि यह अपडेट वैश्विक डेयरी जेनेटिक्स के रुझानों के अनुरूप है, जहां अब केवल उत्पादन नहीं, बल्कि लाभप्रदता, पशु स्वास्थ्य, प्रजनन क्षमता और पर्यावरणीय स्थिरता को भी समान महत्व दिया जा रहा है। संशोधित नेशनल ब्रीडिंग ऑब्जेक्टिव से डेयरी किसानों को ऐसे पशु विकसित करने में मदद मिलेगी जो अधिक उत्पादक होने के साथ-साथ मजबूत, कुशल और बदलती जलवायु व आर्थिक परिस्थितियों में टिकाऊ साबित हों।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/01/image_750x500_696337141a53c.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ ऑस्ट्रेलिया ने डेयरी जेनेटिक्स के लिए नया नेशनल ब्रीडिंग ऑब्जेक्टिव लागू किया ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[यूरोपियन यूनियन और मर्कोसुर के बीच व्यापार समझौते की राह साफ, विरोध में सड़कों पर उतरे यूरोप के किसान]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/eu-clears-path-for-landmark-mercosur-trade-deal-amid-mounting-farmer-protests-across-europe.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 10 Jan 2026 15:12:24 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/eu-clears-path-for-landmark-mercosur-trade-deal-amid-mounting-farmer-protests-across-europe.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>यूरोपियन यूनियन ने अब तक के अपने सबसे बड़े मुक्त व्यापार समझौते की दिशा में एक निर्णायक कदम बढ़ा दिया है। सदस्य देशों ने 25 वर्षों से लंबित EU&ndash;मर्कोसुर व्यापार समझौते को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है। हालांकि, इस फैसले के साथ ही यूरोप भर में किसानों के समन्वित विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं, जिससे इस समझौते को लेकर गहरे राजनीतिक और आर्थिक मतभेद नजर आ रहे हैं।</p>
<p>9 जनवरी को यूरोपियन यूनियन की सरकारों ने ब्राजील, अर्जेंटीना, उरुग्वे और पैराग्वे को शामिल करने वाले मर्कोसुर ब्लॉक के साथ व्यापक साझेदारी और व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर के लिए हरी झंडी दे दी। यह समझौता लगभग दो दशकों से बातचीत के दौर से गुजर रहा था। लागू होने पर यह दुनिया के सबसे बड़े मुक्त व्यापार क्षेत्रों में से एक का निर्माण करेगा, जिसमें 70 करोड़ से अधिक की आबादी वाला बाजार शामिल होगा।</p>
<p><strong>टैरिफ में की जाएगी कटौती</strong><br />इस समझौते के तहत दोनों पक्षों के बीच टैरिफ में व्यापक कटौती की जाएगी। मर्कोसुर देश 15 वर्षों की अवधि में यूरोपियन यूनियन के 91 प्रतिशत निर्यात पर शुल्क समाप्त करेंगे, जिसमें कारों पर लगने वाला 35 प्रतिशत तक का ऊंचा शुल्क भी शामिल है। इसके बदले में यूरोपियन यूनियन 10 वर्षों तक की अवधि में मर्कोसुर के 92 प्रतिशत निर्यात पर टैरिफ हटाएगा। कृषि क्षेत्र में भी बाजार खोले जाएंगे। मर्कोसुर यूरोपीय वाइन और स्पिरिट्स पर ऊंचे शुल्क समाप्त करेगा, जबकि यूरोपियन यूनियन बीफ, पोल्ट्री, चीनी, एथनॉल, चावल और शहद जैसे संवेदनशील कृषि उत्पादों के लिए आयात कोटा बढ़ाएगा।</p>
<p>यूरोपियन कमीशन के लिए यह समझौता भू-राजनीतिक तनाव के दौर में व्यापार संबंधों में विविधता लाने की रणनीति का अहम हिस्सा है। कमीशन का तर्क है कि दक्षिण अमेरिका के साथ आर्थिक जुड़ाव से चीन पर निर्भरता कम होगी, खासकर इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरियों में इस्तेमाल होने वाले लिथियम जैसे महत्वपूर्ण खनिजों के मामले में। आयोग का अनुमान है कि यह समझौता यूरोपियन यूनियन के निर्यातकों को हर साल 4 अरब यूरो से अधिक के टैरिफ से राहत देगा और यूरोपीय कंपनियों को मर्कोसुर देशों में सार्वजनिक खरीद निविदाओं में स्थानीय कंपनियों के समान शर्तों पर भाग लेने का अवसर मिलेगा - जो अब तक इस ब्लॉक ने किसी भी व्यापार समझौते में नहीं दिया था।</p>
<p>जर्मनी और स्पेन जैसे समर्थक देशों का मानना है कि यह समझौता अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ सहित वैश्विक व्यापार अनिश्चितताओं के बीच यूरोपीय अर्थव्यवस्था के लिए सुरक्षा कवच का काम करेगा। वे यह भी कहते हैं कि मर्कोसुर पहले से ही बड़ी मात्रा में कृषि उत्पाद यूरोपीय संघ को निर्यात करता है और मौजूदा आयात इस बात का प्रमाण हैं कि ये उत्पाद यूरोपीय मानकों को पूरा करते हैं।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/01/image_750x_69621d5424832.jpg" alt="" /></p>
<p><em>समझौते का विरोध करते पोलैंड के किसान।</em></p>
<p><strong>यूरोप के किसान कर रहे हैं विरोध</strong><br />इस समझौते ने यूरोप भर में किसानों, पर्यावरण समूहों और कई राष्ट्रीय सरकारों के बीच तीखा विरोध भी खड़ा कर दिया है। अनुमोदन प्रक्रिया आगे बढ़ने के साथ ही विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं। फ्रांस में किसानों ने इस सप्ताह ट्रैक्टरों के साथ पेरिस में प्रवेश किया, प्रमुख सड़कों को जाम किया और सरकारी इमारतों के पास प्रदर्शन किए। बेल्जियम, इटली और पूर्वी यूरोप के कई हिस्सों में भी किसान संगठनों के नेतृत्व में आंदोलन देखने को मिले हैं।</p>
<p><strong>किसानों के विरोध का कारण</strong><br />किसानों का कहना है कि दक्षिण अमेरिका से सस्ता बीफ और पोल्ट्री आयात बढ़ने से यूरोपीय उत्पादक बुरी तरह प्रभावित होंगे, जो पहले से ही ऊंची लागत, जलवायु दबाव और कड़े पर्यावरणीय नियमों से जूझ रहे हैं। हालांकि अतिरिक्त आयात यूरोपीय खपत का अपेक्षाकृत छोटा हिस्सा होंगे - बीफ के लिए लगभग 1.6 प्रतिशत और पोल्ट्री के लिए 1.4 प्रतिशत। लेकिन किसान संगठनों का तर्क है कि इतनी मात्रा भी पहले से कमजोर बाजार में कीमतों को गिराने के लिए पर्याप्त है।</p>
<p>पर्यावरण संगठनों ने भी इस समझौते पर कड़ी आपत्ति जताई है और यूरोपीय संघ पर जलवायु प्रतिबद्धताओं की अनदेखी करने का आरोप लगाया है। हालांकि समझौते में 2030 के बाद वनों की कटाई रोकने की प्रतिबद्धता शामिल है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि इसमें ठोस और लागू करने योग्य प्रावधानों की कमी है। फ्रेंड्स ऑफ द अर्थ जैसे संगठनों ने इसे &ldquo;जलवायु के लिए विनाशकारी&rdquo; करार देते हुए चेतावनी दी है कि इससे अमेजन जैसे वनों से जुड़े क्षेत्रों में कृषि क्षेत्र के विस्तार के लिए वनों की कटाई बढ़ सकती है।</p>
<p><strong>यूरोपियन यूनियन में राजनीतिक विरोध</strong><br />यूरोपियन यूनियन के भीतर राजनीतिक विरोध भी कम नहीं रहा है। फ्रांस, जो यूरोप का सबसे बड़ा बीफ उत्पादक है, इस समझौते को सिरे से खारिज कर चुका है और इसे किसानों के हितों के खिलाफ बता रहा है। इटली, हंगरी और पोलैंड ने भी विरोध जताया था, जिससे समझौते के अटकने की आशंका बढ़ गई थी। हालांकि अंतिम दौर की बातचीत में इटली के रुख में नरमी आई, जिससे समझौते को सैद्धांतिक मंजूरी मिल सकी।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/01/image_750x_69621d54a2e6c.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>समझौते में सुरक्षात्मक उपाय</strong><br />यूरोपीय कमीशन ने समझौते में कई सुरक्षा उपाय भी शामिल किए हैं। यदि किसी एक या अधिक यूरोपीय देशों में संवेदनशील कृषि उत्पादों का आयात तेजी से बढ़ता है या कीमतें गिरती हैं, तो मर्कोसुर को दी गई तरजीही पहुंच को निलंबित किया जा सकता है। हस्तक्षेप के लिए निर्धारित सीमा को 8 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया गया है। इसके अलावा आयोग ने आयात नियंत्रण कड़े करने, निर्यातक देशों में ऑडिट बढ़ाने और कीटनाशकों व पशु कल्याण जैसे मुद्दों पर उत्पादन मानकों के बेहतर तालमेल का अध्ययन करने का वादा किया है।</p>
<p>किसानों को आश्वस्त करने के लिए वित्तीय सुरक्षा उपाय भी प्रस्तावित किए गए हैं। अगले यूरोपियन यूनियन बजट में 6.3 अरब यूरो का संकट कोष रखा गया है, जिसे कृषि बाजारों में गड़बड़ी की स्थिति में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके अलावा 45 अरब यूरो की किसान सहायता राशि पहले जारी की जाएगी। आयोग ने कुछ उर्वरकों पर आयात शुल्क घटाने की भी घोषणा की है, जिनकी कीमतें हाल के वर्षों में 60 प्रतिशत तक बढ़ चुकी हैं।</p>
<p>इन तमाम उपायों के बावजूद विरोध कम होने के आसार नहीं हैं। समझौते को अब यूरोपीय संसद और संभवतः राष्ट्रीय संसदों की मंजूरी भी लेनी होगी, जिससे इसके अनुमोदन की प्रक्रिया राजनीतिक रूप से और जटिल होने की संभावना है।</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/01/image_750x500_69621d535f696.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ यूरोपियन यूनियन और मर्कोसुर के बीच व्यापार समझौते की राह साफ, विरोध में सड़कों पर उतरे यूरोप के किसान ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[दिसंबर में FAO खाद्य मूल्य सूचकांक में गिरावट, लेकिन 2025 का औसत 2024 से अधिक]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/fao-food-price-index-slips-in-december-but-2025-average-remains-above-2024.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 10 Jan 2026 13:10:32 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/fao-food-price-index-slips-in-december-but-2025-average-remains-above-2024.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>वर्ष 2025 के अंतिम महीनों में लगातार मासिक गिरावट के बावजूद FAO खाद्य मूल्य सूचकांक (FFPI) का वार्षिक औसत 2024 की तुलना में अधिक रहा। दिसंबर 2025 में सूचकांक 124.3 अंक पर रहा, जो नवंबर की तुलना में 0.6 प्रतिशत कम है। दुग्ध उत्पादों, मांस और वनस्पति तेलों की कीमतों में गिरावट ने अनाज और चीनी की बढ़ती कीमतों के प्रभाव को संतुलित कर दिया। यह सूचकांक दिसंबर 2024 की तुलना में 2.3 प्रतिशत कम और मार्च 2022 के ऐतिहासिक उच्च स्तर से 22.4 प्रतिशत नीचे रहा। हालांकि पूरे वर्ष 2025 में FFPI का औसत 127.2 अंक रहा, जो 2024 की तुलना में 4.3 प्रतिशत अधिक है।</p>
<p>दिसंबर में FAO अनाज मूल्य सूचकांक बढ़कर 107.3 अंक हो गया। ब्लैक सी क्षेत्र से निर्यात को लेकर नई चिंताओं के चलते गेहूं की अंतरराष्ट्रीय कीमतों को समर्थन मिला, लेकिन अर्जेंटीना और ऑस्ट्रेलिया में अच्छी फसल के कारण कीमतों पर दबाव बना रहा। ब्राजील और अमेरिका में मजबूत निर्यात मांग और एथनॉल उत्पादन बढ़ने से मक्का की कीमतों में तेजी आई। चावल की कीमतों में सभी श्रेणियों में वृद्धि दर्ज की गई, जिसका कारण बेहतर मांग, कटाई का दबाव कम होना और नीतिगत समर्थन रहा। पूरे वर्ष 2025 में अनाज की कीमतें 2024 की तुलना में 4.9 प्रतिशत कम रहीं, जो 2020 के बाद का सबसे निचला स्तर है।</p>
<p>पिछले महीने वनस्पति तेल मूल्य सूचकांक छह महीने के निचले स्तर पर पहुंच गया। अमेरिका से आपूर्ति बढ़ने और ऑस्ट्रेलिया व कनाडा में अधिक उत्पादन के कारण सोयाबीन, रेपसीड और सूरजमुखी तेल की कीमतों में गिरावट आई। वहीं, दक्षिण-पूर्व एशिया में मौसमी उत्पादन में कमी की आशंका के चलते पाम तेल की कीमतों में हल्की बढ़त देखी गई। बावजूद इसके, 2025 में वनस्पति तेलों का औसत मूल्य 17.1 प्रतिशत अधिक रहा, जो तीन वर्षों का उच्च स्तर है।</p>
<p>दिसंबर में सभी श्रेणियों में मांस की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई, खासकर पोल्ट्री में। हालांकि पूरे वर्ष 2025 में मांस मूल्य सूचकांक 5.1 प्रतिशत बढ़ा। डेयरी उत्पादों की कीमतों में दिसंबर में तेज गिरावट आई, विशेष रूप से मक्खन और फुल क्रीम मिल्क पाउडर में, क्योंकि यूरोप और ओशिनिया में मौसमी आपूर्ति बढ़ी। इसके बावजूद, 2025 में डेयरी मूल्य औसतन 13.2 प्रतिशत अधिक रहे।</p>
<p>दिसंबर में चीनी की कीमतों में ब्राजील में उत्पादन घटने के कारण उछाल आया, लेकिन पूरे वर्ष 2025 में यह सूचकांक 2020 के बाद सबसे निचले स्तर पर रहा। इसे वैश्विक आपूर्ति की प्रचुरता और भारत में बेहतर उत्पादन संभावनाओं ने संतुलित किया।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ दिसंबर में FAO खाद्य मूल्य सूचकांक में गिरावट, लेकिन 2025 का औसत 2024 से अधिक ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[अमेरिकी सरकार किसानों को देगी 12 अरब डॉलर का कृषि सहायता पैकेज, चावल और कपास के लिए सबसे ज्यादा मदद]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/12-billion-dollar-farm-aid-package-for-us-farmers-rice-cotton-to-receive-highest-payments.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 02 Jan 2026 18:05:19 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/12-billion-dollar-farm-aid-package-for-us-farmers-rice-cotton-to-receive-highest-payments.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p data-start="285" data-end="569">भारतीय किसानों की फसलों के दाम की सुरक्षा के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की व्यवस्था और इससे जुड़ी मांग की आलोचना करने वाले लोगों के लिए खबर है कि बढ़ती लागत और कमजोर कीमतों की भरपाई के लिए अमेरिका इस साल अपने किसानों को करीब एक लाख करोड़ रुपये (12 अरब डॉलर) की मदद देगा। जबकि अमेरिकी किसानों की संख्या सीमित है और वहां लैंड होल्डिंग हजारों हैक्टेयर में है। अमेरिकी कृषि मंत्री <strong>ब्रुक एल. रॉलिन्स</strong> ने 31 दिसंबर, 2025 को किसानों को सरकारी सहायता (एफबीए) का यह पैकेज लागू करने के कार्यक्रम की घोषणा की।</p>
<p data-start="285" data-end="569">अमेरिकी कृषि विभाग (यूएसडीए) द्वारा जारी सूचना के मुताबिक, अमेरिकी सरकार किसानों को बढ़ती लागत, खेती के घाटे और उपज कीमतों में गिरावट से राहत देने के लिए 12 अरब डॉलर (एक लाख करोड़ रुपये से अधिक) का कृषि सहायता पैकेज (FBA) देने जा रही है। पिछले महीने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वर्ष 2026 के दौरान किसानों को यह सहायता देने का ऐलान किया था।</p>
<p data-start="571" data-end="841">अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) ने विभिन्न कृषि उपजों के लिए प्रति एकड़ मिलने वाली सहायता राशि घोषित कर दी है। इसके तहत चावल उगाने वाले किसानों को सबसे अधिक 132.89 डॉलर (लगभग 12 हजार रुपये) प्रति एकड़, जबकि कपास के लिए 117.35 डॉलर प्रति एकड़ की दर से भुगतान मिलेगा।</p>
<p data-start="843" data-end="1055">यूएसडीए के अनुसार, इस कार्यक्रम के तहत कुल 12 अरब डॉलर के पैकेज में से 11 अरब डॉलर का एकमुश्त भुगतान सीधे किसानों को किया जाएगा, जबकि शेष 1 अरब डॉलर विशेष फसलों और चीनी क्षेत्र के लिए आरक्षित रखा गया है।</p>
<p data-start="1057" data-end="1270">कृषि सहायता पैकेज की दरों की घोषणा करते हुए अमेरिकी कृषि मंत्री ब्रुक एल. रॉलिन्स ने कहा कि इस कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों को ऊंची लागत और कृषि अर्थव्यवस्था में लंबे समय से बनी अनिश्चितता से उबरने में मदद करना है।</p>
<p data-start="1272" data-end="1583">रॉलिन्स ने कहा, &ldquo;राष्ट्रपति ट्रंप ने कृषि अर्थव्यवस्था में स्थिरता लाने का वादा किया है। ये भुगतान दरें किसानों को वसंत ऋतु की बुआई की योजना बनाते समय वित्तीय भरोसा देंगी। &lsquo;फार्मर्स फर्स्ट&rsquo; का मतलब है जरूरत के समय वास्तविक राहत। पात्र किसानों के बैंक खातों में 28 फरवरी 2026 तक भुगतान पहुंचने की उम्मीद है।&rdquo;</p>
<p data-start="1585" data-end="1779">USDA का कहना है कि इस सहायता से किसानों को खेती में बने रहने में मदद मिलेगी। ट्रंप प्रशासन अमेरिकी किसानों के लिए नए बाजार खोलने और कृषि सुरक्षा तंत्र को मजबूत करने की दिशा में भी काम कर रहा है।&nbsp;</p>
<h3 data-start="1781" data-end="1807">प्रति एकड़ भुगतान दरें</h3>
<p data-start="1808" data-end="2264">कार्यक्रम के तहत कई प्रमुख फसलों के लिए भुगतान दरें तय की गई हैं। इनमें चावल को सबसे अधिक $132.89 प्रति एकड़ और कपास को $117.35 प्रति एकड़ की सहायता मिलेगी। अन्य प्रमुख दरों में मक्का (कॉर्न) के लिए $44.36, गेहूं के लिए $39.35, सोयाबीन के लिए $30.88 और मूंगफली के लिए $55.65 प्रति एकड़ शामिल हैं। इसके अलावा जौ, कैनोला, चना, ज्वार, सूरजमुखी, ओट्स, तिल, फ्लैक्स, मसूर, सरसों, मटर और सैफ्लावर जैसी फसलें भी कार्यक्रम के दायरे में हैं।</p>
<p data-start="2266" data-end="2510">भुगतान का निर्धारण वर्ष 2025 में बोए गए रकबे, उत्पादन लागत के अनुमानों और वैश्विक कृषि आपूर्ति-मांग के आकलन के आधार पर किया गया है। कुल 12 अरब डॉलर के इस पैकेज में से 1 अरब डॉलर विशेष फसलों और चीनी क्षेत्र के लिए आरक्षित रखा गया है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ अमेरिकी सरकार किसानों को देगी 12 अरब डॉलर का कृषि सहायता पैकेज, चावल और कपास के लिए सबसे ज्यादा मदद ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[ओडिशा के किसानों से दुबई तक पहुंची ताज़ा सब्जियों की पहली खेप, कृषि निर्यात को बढ़ावा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/odisha-farmers-send-first-consignment-of-fresh-vegetables-to-dubai-boosting-agricultural-exports.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 26 Dec 2025 11:34:54 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/odisha-farmers-send-first-consignment-of-fresh-vegetables-to-dubai-boosting-agricultural-exports.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p data-start="134" data-end="479">ओडिशा के कालाहांडी और नबरंगपुर जिलों के किसानों ने कृषि क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। इन जिलों के किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) ने ताज़ा सब्जियों की 1,000 किलोग्राम की खेप भुवनेश्वर स्थित बीजू पटनायक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के माध्यम से दुबई भेजी। यह पहली बार है जब ओडिशा से एफपीओ के जरिए दुबई को ताज़ा सब्जियों का निर्यात किया गया है।</p>
<p data-start="481" data-end="843">इस खेप में लहसुन और फ्रेंच बीन्स के अलावा बेबी आलू, कुंदरू, परवल और पपीता शामिल थे। सभी उत्पाद एफपीओ से जुड़े किसानों से एकत्र किए गए, जहां स्तर पर ही उनकी ग्रेडिंग और गुणवत्ता जांच की गई। अधिकारियों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप ट्रेसबिलिटी और दस्तावेज़ीकरण सुनिश्चित किया गया, जो ताज़ा कृषि उत्पादों के निरंतर निर्यात के लिए आवश्यक है।</p>
<p data-start="845" data-end="1140">इस निर्यात को संभव बनाने में ओडिशा सरकार के उद्यान निदेशालय की अहम भूमिका रही। यह पहल किसान उत्पादक संगठनों को प्रोत्साहित करने की परियोजना (PSFPO) के तहत लागू की गई। परियोजना को APEDA का सहयोग प्राप्त है और इसका क्रियान्वयन कृषि एवं किसान सशक्तिकरण विभाग तथा पैलेडियम कंसल्टिंग इंडिया प्राइवेट लिमिटेड की मदद से किया गया।</p>
<p data-start="1142" data-end="1511">इस प्रक्रिया में एग्री-बिजनेस स्टार्टअप विला मार्ट प्राइवेट लिमिटेड ने एफपीओ को अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जोड़ने में अहम भूमिका निभाई, जिससे ओडिशा से वैश्विक कृषि निर्यात के लिए एक नया रास्ता खुला। पैलेडियम ने विला मार्ट को किसानों से उपज की सोर्सिंग, तथा अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए आवश्यक लाइसेंसिंग, सर्टिफिकेशन और नियामकीय अनुपालन से जुड़े मामलों में सहयोग प्रदान किया।</p>
<p data-start="1513" data-end="1950">पैलेडियम कंसल्टिंग इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के एग्री बिज़नेस विशेषज्ञ सौम्या रंजन साहू ने कहा कि यह पहल किसानों की आजीविका को मजबूत करने की दिशा में किए जा रहे प्रयासों को दर्शाती है। उन्होंने कहा कि वैश्विक निर्यात को संभव बनाकर किसानों के लिए टिकाऊ आय के अवसर तैयार किए जा रहे हैं, साथ ही ओडिशा को अंतरराष्ट्रीय कृषि बाजार में एक प्रतिस्पर्धी राज्य के रूप में स्थापित किया जा रहा है।</p>
<p data-start="1952" data-end="2142">वहीं, विला मार्ट के संस्थापक और सीईओ रमेश चंद्र बिस्वाल ने बताया कि अब तक कंपनी स्थानीय बाजारों पर केंद्रित थी, लेकिन दुबई को भेजी गई यह पायलट खेप वैश्विक बाजारों की ओर एक महत्वपूर्ण कदम है।</p>
<p data-start="2144" data-end="2616" data-is-last-node="" data-is-only-node="">अधिकारियों के अनुसार, यह निर्यात एक पायलट परियोजना के रूप में किया गया है, ताकि खेत से लेकर हवाई अड्डे और अंतरराष्ट्रीय अनुपालन तक पूरी आपूर्ति श्रृंखला की तैयारियों को परखा जा सके। भुवनेश्वर को निर्यात गेटवे के रूप में इस्तेमाल किया जाना पूर्वी भारत में उभरते एग्री-लॉजिस्टिक्स केंद्र के रूप में भी देखा जा रहा है। यह पहल ऐसे समय में सामने आई है, जब राज्य सरकार वैश्विक बाजारों से बेहतर जुड़ाव और किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से नई कृषि निर्यात नीति पर काम कर रही है।</p>
<p data-start="2144" data-end="2616" data-is-last-node="" data-is-only-node=""></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ ओडिशा के किसानों से दुबई तक पहुंची ताज़ा सब्जियों की पहली खेप, कृषि निर्यात को बढ़ावा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[न्यूज़ीलैंड के साथ मुक्त व्यापार समझौते से सेब उत्पादक चिंतित, केंद्र ने हितों की रक्षा का भरोसा दिलाया]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/apple-growers-worried-over-free-trade-agreement-with-new-zealand-centre-assures-protection-from-losses.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 25 Dec 2025 16:55:38 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/apple-growers-worried-over-free-trade-agreement-with-new-zealand-centre-assures-protection-from-losses.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत और न्यूज़ीलैंड के बीच प्रस्तावित <strong>मुक्त व्यापार समझौते</strong> (एफटीए) को लेकर देश के सेब उत्पादक किसानों में चिंता बढ़ गई है। हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड जैसे सेब उत्पादक राज्यों के किसान संगठनों को आशंका है कि रियायती सीमा शुल्क पर न्यूज़ीलैंड से सेब का आयात बढ़ा, तो घरेलू बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और देश के सेब किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।</p>
<p>मौजूदा व्यवस्था के तहत न्यूज़ीलैंड से आयात होने वाले सेब पर 50 फीसदी सीमा शुल्क लागू है। प्रस्तावित समझौते में इस शुल्क को घटाकर 25 फीसदी किए जाने का प्रावधान है। ड्यूटी कम होने से न्यूज़ीलैंड से भारत में सेब का आयात बढ़ने की आशंका है। इसे लेकर खासतौर पर हिमाचल प्रदेश के किसान चिंतित हैं।&nbsp;</p>
<p>हिमाचल प्रदेश के सेब उत्पादक तथा <strong>संयुक्त किसान मंच</strong> के संयोजक <strong>हरीश चौहान</strong> का कहना है कि बागवानों के हितों को ताक पर रखकर यह समझौता किया गया है। यह देश के सेब किसानों का <em>डेथ वारंट</em> जारी करने जैसा है। देश की सेब इंडस्ट्री को बचाने के लिए आयात शुल्क 50 फीसदी से बढ़ाकर 100 फीसदी करने की मांग उठ रही थी, लेकिन सरकार उल्टा शुल्क कम करने जा रही है। उनका कहना है कि देश के सेब उत्पादक पहले ही आयात की मार से झेल रहे हैं। अब न्यूज़ीलैंड से आयात शुल्क घटकर 25 फीसदी होने से अन्य देशों से भी सेब रियायती शुल्क पर आयात का दबाव बढ़ जाएगा।&nbsp;</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/12/image_750x_694d31fbd40f3.jpg" alt="" style="display: block; margin-left: auto; margin-right: auto;" /></p>
<p style="text-align: center;"><em>सेब उत्पादक तथा संयुक्त किसान मंच के संयोजक हरीश चौहान</em></p>
<p>इन चिंताओं के बीच केंद्र सरकार के <strong>वाणिज्य मंत्रालय</strong> ने दावा किया है कि मुक्त व्यापार समझौते में किसानों के हितों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। घरेलू किसानों के हितों की रक्षा के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय शामिल किए गए हैं। यदि आयात के कारण घरेलू बाजार में असंतुलन पैदा होता है, तो <strong>सेफगार्ड मैकेनिज्म</strong> के तहत तत्काल कदम उठाए जा सकते हैं।</p>
<p>समझौते के तहत न्यूज़ीलैंड से 25 फीसदी रियायती सीमा शुल्क पर सेब का आयात <strong>निर्धारित कोटे</strong> के भीतर ही किया जाएगा, जिसे चरणबद्ध तरीके से बढ़ाया जाएगा। इसके अलावा, 25 फीसदी की रियायती दर पर न्यूज़ीलैंड से सेब का आयात 1 अप्रैल से 31 अगस्त के बीच <em>ऑफ सीजन</em> में होगा। ताकि हिमाचल के <em>पीक सीजन</em> के दौरान न्यूज़ीलैंड से रियायती दर पर सेब आयात से बचा जा सके।</p>
<p>हालांकि, सेब किसानों का कहना है कि इससे जून-जुलाई में हिमाचल के <strong>प्रीमियम सेब</strong> को सीधी प्रतिस्पर्धा मिलेगी। क्योंकि प्रीमियम क्वालिटी का सेब <em>ऑफ सीजन</em> के दौरान कोल्ड स्टोरेज से निकाला जाता है।&nbsp;</p>
<p>सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि सेब आयात के लिए <strong>न्यूनतम आयात मूल्य (MIP)</strong> का प्रावधान रखा गया है, ताकि केवल प्रीमियम श्रेणी के सेब ही भारतीय बाजार में आएं और घरेलू कीमतें सुरक्षित रहें। जबकि सेब उत्पादकों का कहना है कि पहले से लागू 50 रुपये किलो MEP का प्रावधान जमीनी स्तर पर पूरी तरह अमल में नहीं लाया जा रहा है और देश में सस्ते सेब का खूब आयात हो रहा है।&nbsp;</p>
<p>सरकार का तर्क है कि एफटीए का उद्देश्य भारतीय किसानों को नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि दीर्घकाल में कृषि और बागवानी क्षेत्र को वैश्विक बाजारों से जोड़ना और आयात-निर्यात में विविधता लाना है। हालांकि, सेब उत्पादक राज्यों के किसान संगठनों का कहना है कि अंतिम समझौते से पहले उनकी आशंकाओं का स्पष्ट समाधान जरूरी है।&nbsp;</p>
<p></p>
<p></p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ न्यूज़ीलैंड के साथ मुक्त व्यापार समझौते से सेब उत्पादक चिंतित, केंद्र ने हितों की रक्षा का भरोसा दिलाया ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[Agri&amp;#45;Food in 2026: भूराजनीति और स्टैगफ्लेशन की चपेट में वैश्विक कृषि, अगले साल भी कृषि उद्योग में अनिश्चितता के आसार]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/geopolitics-and-stagflation-reshape-global-agriculture-as-industry-braces-for-prolonged-uncertainty-till-2026.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 21 Dec 2025 10:57:27 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/geopolitics-and-stagflation-reshape-global-agriculture-as-industry-braces-for-prolonged-uncertainty-till-2026.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>वैश्विक कृषि अब केवल मांग और आपूर्ति की गतिशीलता से संचालित नहीं हो रही है। इसके बजाय, भूराजनीतिक प्रतिद्वंद्विता, व्यापार अवरोध और सरकारी हस्तक्षेप कृषि उत्पादन, कीमतों और व्यापार को तेजी से आकार दे रहे हैं। इस समय वैश्विक कृषि उद्योग स्टैगफ्लेशन के एक लंबे चरण का सामना कर रहा है। इसे मांग में कमजोर वृद्धि, लगातार अधिक आपूर्ति और ऊंची उत्पादन लागत से समझा जा सकता है। यह स्थिति वर्ष 2026 में भी जारी रहने के आसार हैं।</p>
<p>वर्ष 2026 के लिए रैबो बैंक (Rabobank) तथा अन्य संस्थाओं की रिपोर्ट बताती है कि प्रमुख आर्थिक ब्लॉक, विशेष रूप से अमेरिका और चीन के बीच व्यापार तनाव ने कृषि जिंसों को आर्थिक नीति के रणनीतिक उपकरणों में बदल दिया है। टैरिफ, जवाबी टैरिफ और निर्यात प्रतिबंध वैश्विक खाद्य बाजारों को खंडित कर रहे हैं, क्षेत्र-विशिष्ट मूल्य विकृतियां पैदा कर रहे हैं और पारंपरिक व्यापार मार्गों को कमजोर कर रहे हैं। परिणामस्वरूप, कृषि भूराजनीतिक प्रतिस्पर्धा में उलझ गई है, जहां व्यापार प्रवाह में बाजार की दक्षता पर नीतियां भारी पड़ रही हैं।</p>
<p><strong>अधिक आपूर्ति से कीमतों और कृषि लाभप्रदता पर दबाव</strong><br />वैश्विक कमोडिटी बाजारों में अत्यधिक उत्पादन एक प्रमुख चुनौती बना हुआ है। अनाज का ऊंचा भंडार, तिलहनों की अधिकता और बागवानी फसलों व सब्जियों की अतिरिक्त आपूर्ति लगातार कीमतों पर दबाव डाल रही है। यहां तक कि जैविक उत्पाद, जो कभी प्रीमियम कीमतें हासिल करता था, उन्हें भी बेहतर रिटर्न आकर्षित करने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।</p>
<p>मजबूत उत्पादन स्तरों के बावजूद, उपभोग वृद्धि गति नहीं पकड़ पाई है। अमेरिका, यूरोप और एशिया-प्रशांत सहित प्रमुख उपभोक्ता क्षेत्रों में मांग अगले दो वर्षों में स्थिर रहने की उम्मीद है। आबादी के बूढ़े होने, वैश्विक माइग्रेशन की गति धीमी पड़ने और पुनरुत्पादन स्तर से नीचे जन्म दर जैसे संरचनात्मक जनसांख्यिकीय रुझान दीर्घकालिक खाद्य खपत वृद्धि में बाधक बन रहे हैं।</p>
<p>अमेरिका में मांग के पैटर्न जीवनशैली और नीतिगत बदलावों से भी प्रभावित हो रहे हैं, जिनमें सार्वजनिक स्वास्थ्य पहलों पर बढ़ता जोर और मोटापे से जुड़ी दवाओं का बढ़ता उपयोग शामिल है, जिससे कुल कैलोरी खपत कम हो सकती है।</p>
<p><strong>आपूर्ति श्रृंखला में स्टैगफ्लेशन का दबाव तेज</strong><br />स्थिर मांग और बढ़ती लागत ने कृषि उद्योग को स्टैगफ्लेशन के माहौल में धकेल दिया है। जहां उत्पादन ऊंचा बना हुआ है, वहीं खेत-स्तर की कीमतों पर दबाव है और इनपुट, श्रम और ऊर्जा की ऊंची लागत के कारण मार्जिन सिमट रहे हैं।</p>
<p>हालांकि कुछ आपूर्तिकर्ताओं को सीमित मार्जिन राहत मिली है, लेकिन अधिकांश अब भी परिचालन खर्चों पर महंगाई के दबाव का सामना कर रहे हैं। इनपुट कीमतों के कुछ हद तक ऊंचे बने रहने की उम्मीद है, क्योंकि वैश्विक टैरिफ, व्यापार प्रतिशोध और भूराजनीतिक अनिश्चितता अल्पकालिक उतार-चढ़ाव पैदा करती है।</p>
<p>अनेक देशों में सरकारों के स्तर पर हस्तक्षेप में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। जो प्रक्रिया टैरिफ-आधारित व्यापार विवादों से शुरू हुई थी, वह अब वैश्विक सब्सिडी प्रतिस्पर्धा में बदल गई है, जिसमें अमेरिका, यूरोप और एशिया के देश घरेलू उत्पादकों की रक्षा के लिए प्रत्यक्ष भुगतान, न्यूनतम मूल्य की गारंटी और जैव ईंधन अनिवार्यताएं लागू कर रहे हैं। ये उपाय किसानों को कम कीमतों से कुछ हद तक बचाते हैं, लेकिन साथ ही उत्पादन में कटौती को हतोत्साहित करते हैं, जिससे वैश्विक आपूर्ति ऊंची बनी रहती है और कीमतें दबाव में रहती हैं।</p>
<p><strong>वैश्विक कीमतों पर चीन की भूमिका का दबाव</strong><br />चीन की आर्थिक चुनौतियां और उसका औद्योगिक पैमाना जटिलता की एक और परत जोड़ रहे हैं। उसकी विशाल कीटनाशक निर्माण क्षमता वैश्विक फसल इनपुट कीमतों पर लगातार दबाव डाल रही है। इससे किसानों को इनपुट लागत कम होने का लाभ मिलता है, लेकिन आपूर्तिकर्ताओं और वितरकों के मार्जिन घट रहे हैं, जिससे उनकी तकनीक, सेवाओं और अवसंरचना में पुनर्निवेश की क्षमता सीमित हो रही है।</p>
<p>आपूर्ति चैनल में कम लाभप्रदता कई बाजारों में पुनर्गठन को मजबूर कर रही है, क्योंकि कंपनियां अपने संचालन का पुनर्मूल्यांकन कर रही हैं और कम-मार्जिन वाले माहौल में टिके रहने के उपाय खोज रही हैं।</p>
<p><strong>श्रमिकों की समस्या वैश्विक</strong><br />श्रम की कमी और मजदूरी में महंगाई बड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं, खासकर उन क्षेत्रों में जहां ऑटोमेशन को अपनाने की गति धीमी रही है। उत्पादन से लेकर प्रसंस्करण और लॉजिस्टिक्स तक पूरी आपूर्ति श्रृंखला में ऑटोमेशन में निवेश दक्षता बढ़ाने और लागत नियंत्रित करने के लिए बेहद अहम होता जा रहा है। उपकरण निर्माता तकनीकी उन्नयन को प्रोत्साहित करने के लिए अनुकूल वित्तीय शर्तें देकर इस बदलाव का समर्थन कर रहे हैं।</p>
<p>इसके साथ ही, अपेक्षाकृत स्थिर या बेहतर मार्जिन वाले विकासशील क्षेत्रों में विविधीकरण की गति बढ़ रही है। जैव ईंधन, नवीकरणीय इनपुट और अन्य मूल्यवर्धित कृषि प्रयोगों को कमजोर पारंपरिक कमोडिटी बाजारों के खिलाफ महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच के रूप में देखा जा रहा है।</p>
<p><strong>खंडित लेकिन टिकाऊ वैश्विक खाद्य प्रणाली</strong><br />2026 की ओर देखें तो वैश्विक कृषि उद्योग एक ऐसे परिदृश्य का सामना कर रहा है जो खंडित हो रहा है तथा अनिश्चितता की ओर बढ़ रहा है। व्यापार व्यवधान, क्षेत्रीय मूल्यों में अंतर, भारी सरकारी भागीदारी और अप्रत्याशित झटकों का जोखिम नई सामान्य स्थिति बनते जा रहे हैं। जैसे-जैसे भूराजनीति और अर्थशास्त्र का मेल बढ़ता जा रहा है, वैश्विक कृषि एक ऐसी प्रणाली में ढल रही है जहां उत्पादकता जितना ही महत्व रेजिलिएंस का हो गया है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ Agri-Food in 2026: भूराजनीति और स्टैगफ्लेशन की चपेट में वैश्विक कृषि, अगले साल भी कृषि उद्योग में अनिश्चितता के आसार ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[USDA का अनुमानः मवेशी संख्या घटने से यूरोपीय यूनियन में दूध उत्पादन 2026 में भी घटेगा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/eu-milk-output-likely-to-shrink-further-by-2026-as-number-of-dairy-animals-set-to-decline.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 20 Dec 2025 13:26:21 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/eu-milk-output-likely-to-shrink-further-by-2026-as-number-of-dairy-animals-set-to-decline.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>Milk Production in EU: अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) के नवीनतम अनुमान के अनुसार, यूरोपीय यूनियन (EU) के दूध उत्पादन में 2026 में गिरावट जारी रहने की संभावना है। इसका मुख्य कारण डेयरी गायों की संख्या में कमी और उद्योग का चीज उत्पादन पर रणनीतिक रूप से अधिक ध्यान देना है।</p>
<p>रिपोर्ट के अनुसार यूरोपीय डेयरी क्षेत्र में संरचनात्मक बदलाव देखे जा रहे हैं, जहां उत्पादक तरल दूध की बजाय अधिक मूल्य-वर्धित उत्पादों को प्राथमिकता दे रहे हैं। चीज, जो अधिक मुनाफा और बेहतर निर्यात संभावनाएं प्रदान करता है, बदलती उपभोक्ता पसंद और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के बीच उद्योग का प्रमुख केंद्र बनता जा रहा है।</p>
<p>हालिया आकलनों के अनुसार, यूरोपीय यूनियन में डेयरी पशुधन की संख्या में आगे भी कमी आने की संभावना है, जिससे कुल दूध आपूर्ति सीमित होगी। यह रुझान उत्पादन बढ़ाने के बजाय दक्षता सुधारने और बाजार की मांग के अनुरूप ढलने की दीर्घकालिक रणनीति को दर्शाता है।</p>
<p>यूएसडीए की यह रिपोर्ट उसके नियमित कृषि बाजार विश्लेषण का हिस्सा है। इसमें संकेत दिया गया है कि चीज उत्पादन पर जोर यूरोपीय डेयरी उत्पादों की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति मजबूत करने का एक सोचा-समझा कदम है। बढ़ती लागत, पर्यावरणीय दबाव और सस्टेनेबिलिटी स्थिरता से जुड़ी चुनौतियों के बीच यह रणनीति अहम मानी जा रही है।</p>
<p>हालांकि दूध उत्पादन में निरंतर गिरावट से यूरोपीय यूनियन के भीतर डेयरी उत्पादों की उपलब्धता और कीमतों पर असर पड़ सकता है। वहीं, चीज उत्पादन में वृद्धि से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में निर्यात के नए अवसर खुलने की उम्मीद है, जहां प्रीमियम और विशेष डेयरी उत्पादों की मांग बनी हुई है।</p>
<p>यह विश्लेषण दर्शाता है कि यूरोप का डेयरी उद्योग घटते पशुधन, कड़े पर्यावरणीय नियमों और बदलती खपत प्रवृत्तियों के बीच खुद को नए सिरे से ढाल रहा है। आने वाले वर्षों में चीज और अन्य मूल्य-वर्धित उत्पादों पर बढ़ता जोर इस क्षेत्र की विकास रणनीति का अहम आधार बनेगा।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/08/image_750x500_68a07e70da7fe.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ USDA का अनुमानः मवेशी संख्या घटने से यूरोपीय यूनियन में दूध उत्पादन 2026 में भी घटेगा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[अमेरिकी किसानों का ट्रंप प्रशासन से नए टैरिफ से बचने का आग्रह, लेकिन चीन पर कार्रवाई का समर्थन]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/us-farm-groups-urge-tariff-restraint-while-backing-action-on-china-trade-violations.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 20 Dec 2025 12:52:01 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/us-farm-groups-urge-tariff-restraint-while-backing-action-on-china-trade-violations.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अमेरिका और चीन के बीच व्यापार समझौते की समीक्षा के लिए आयोजित एक सार्वजनिक सुनवाई में अमेरिकी कृषि संगठनों ने संतुलित रुख अपनाते हुए एक ओर नए टैरिफ से बचने की अपील की, वहीं दूसरी ओर चीन द्वारा व्यापार प्रतिबद्धताओं के उल्लंघन पर सख्त कार्रवाई का समर्थन किया। यह सुनवाई पांच साल पहले हुए अमेरिका-चीन फेज-वन समझौते के क्रियान्वयन की समीक्षा के लिए बुलाई गई थी।</p>
<p>सोयाबीन क्षेत्र से जुड़े प्रतिनिधियों ने चेतावनी दी कि अतिरिक्त टैरिफ लगाने से पिछली व्यापार जंग जैसी स्थिति दोबारा पैदा हो सकती है, जिससे अमेरिकी किसानों को भारी नुकसान हुआ था। चीन अमेरिकी सोयाबीन का सबसे बड़ा विदेशी बाजार रहा है और कुल अमेरिकी सोयाबीन निर्यात का आधे से अधिक हिस्सा वहीं जाता था।</p>
<p>सुनवाई में पेश आंकड़ों के अनुसार 2018 में टैरिफ लागू होने के बाद चीन को अमेरिकी सोयाबीन निर्यात में तेज गिरावट आई। वर्ष 2016-17 में 361 लाख टन के रिकॉर्ड स्तर से निर्यात घटकर 2017-18 में 282 लाख टन रह गया। इसके बाद 2018-19 में यह गिरकर 134 लाख टन और 2019-20 में 161 लाख टन तक ही पहुंच सका। सरकारी आकलन बताते हैं कि व्यापार युद्ध से अमेरिकी कृषि को हुए 27 अरब डॉलर से अधिक के वार्षिक नुकसान में 71% हिस्सेदारी अकेले सोयाबीन की थी।</p>
<p>चीन की भूमिका को रेखांकित करते हुए बताया गया कि 2023-24 में उसने वैश्विक आपूर्तिकर्ताओं से लगभग 250 लाख टन सोयाबीन खरीदा। पिछले पांच वर्षों में वैश्विक सोयाबीन भंडार का औसतन 61% हिस्सा चीन ने खरीदा है। हालांकि 2018 में सेक्शन 301 टैरिफ लागू होने के बाद अमेरिकी किसानों ने इस बाजार में बड़ा हिस्सा खो दिया।</p>
<p>फेज-वन समझौते के तहत चीन ने दो वर्षों में अमेरिका से अतिरिक्त 200 अरब डॉलर के कृषि, मैन्युफैक्चरिंग, ऊर्जा और सेवा उत्पाद खरीदने का वादा किया था। कृषि क्षेत्र के लिए 2020 में 2017 की तुलना में 12.5 अरब डॉलर और 2021 में 19.5 अरब डॉलर अधिक खरीद का लक्ष्य तय किया गया था। हालांकि उत्पाद के हिसाब से खरीद लक्ष्य स्पष्ट नहीं थे।</p>
<p>इन दो वर्षों में चीन ने अमेरिका से लगभग 620 लाख टन कृषि उत्पाद आयात किए, जो तय लक्ष्य का करीब 77% था। समझौते में यह भी प्रावधान था कि खरीद बाजार भाव और व्यावसायिक जरूरतों के आधार पर होगी, जिससे लक्ष्य पूरा न होने की गुंजाइश बनी रही। कृषि संगठनों का कहना है कि इस तरह की अस्पष्ट भाषा भविष्य के समझौतों में नहीं होनी चाहिए।</p>
<p><strong>अमेरिकी एथेनॉल और डिस्टिलर्स ग्रेन्स का आयात बंद&nbsp;</strong><br />वहीं, नवीकरणीय ईंधन क्षेत्र से जुड़े प्रतिनिधियों ने सेक्शन 301 जांच का समर्थन किया और बताया कि चीन ने अमेरिकी एथेनॉल और डिस्टिलर्स ग्रेन्स का आयात लगभग पूरी तरह बंद कर दिया है। एक समय इन दोनों उत्पादों का बड़ा खरीदार रहा चीन अब कड़े टैरिफ और नीतिगत प्रतिबंधों के जरिए अपने घरेलू बायोफ्यूल उद्योग को बढ़ावा दे रहा है।</p>
<p>2016 में चीन अमेरिकी एथेनॉल का तीसरा सबसे बड़ा बाजार था और कुल निर्यात का 17% हिस्सा वहीं जाता था। लेकिन इसके बाद नीतियों में बदलाव से आयात लगभग शून्य हो गया। इसके बावजूद, कुल अमेरिकी एथेनॉल निर्यात 2024 में रिकॉर्ड 1.9 अरब गैलन तक पहुंच गया, जबकि डिस्टिलर्स ग्रेन्स का निर्यात सालाना लगभग 110 लाख टन बना रहा, जिसमें मेक्सिको, दक्षिण कोरिया और यूरोपीय संघ प्रमुख बाजार रहे।</p>
<p>कृषि और उद्योग संगठनों ने चेताया कि नए टैरिफ से चीन की जवाबी कार्रवाई हो सकती है और पहले से दबाव में चल रहे अमेरिकी किसानों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। उन्होंने मौजूदा प्रतिबद्धताओं को सख्ती से लागू करने और भविष्य के किसी भी नए समझौते में स्पष्ट, लागू करने योग्य और स्थायी बाजार पहुंच सुनिश्चित करने की मांग की।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ अमेरिकी किसानों का ट्रंप प्रशासन से नए टैरिफ से बचने का आग्रह, लेकिन चीन पर कार्रवाई का समर्थन ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[2026 में यूरोपीय यूनियन के अनाज उत्पादन में गिरावट का अनुमान; गेहूं उत्पादन घटेगा, मक्का में हल्की रिकवरी संभव: COCERAL]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/coceral-forecasts-lower-eu-grain-harvest-in-2026-wheat-output-seen-declining-corn-production-set-to-recover.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 14 Dec 2025 11:47:10 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/coceral-forecasts-lower-eu-grain-harvest-in-2026-wheat-output-seen-declining-corn-production-set-to-recover.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>2026 सीजन के लिए अपने पहले आकलन में अनाज और तिलहनों के व्यापार से जुड़ी यूरोपीय संस्था COCERAL ने EU-27 और यूके में अनाज उत्पादन में गिरावट का अनुमान जताया है। कुल उत्पादन 2,967 लाख टन रहने का अनुमान है, जो 2025 के 3,066 लाख टन के उत्पादन से कम है। इसका कारण यह है कि बेहद मजबूत वर्ष (2025) के बाद फसलों की पैदावार फिर से सामान्य स्तर पर लौटने की संभावना है।</p>
<p>ड्यूरम को छोड़कर गेहूं का उत्पादन 2026 में 1,439 लाख टन रहने का अनुमान है, जो 2025 में 1,475 लाख टन था। हालांकि पैदावार पिछले वर्ष के असाधारण स्तर से कम रहने की उम्मीद है, लेकिन हाल के महीनों में हुई बारिश से मिट्टी में नमी की स्थिति बेहतर हुई है, जिससे सर्दियों से पहले EU के कई हिस्सों में फसलों का विकास अच्छा हुआ है। गेहूं का रकबा पिछले साल के मुकाबले थोड़ा अधिक रहने की संभावना है।</p>
<p>जौ के उत्पादन में भी गिरावट का अनुमान लगाया गया है। इसका उत्पादन 2025 के 632 लाख टन की तुलना में 2026 में 582 लाख टन रहने का अनुमान है। यह गिरावट मुख्य रूप से पैदावार के औसत स्तर पर लौटने के कारण मानी जा रही है। स्पेन में सबसे ज्यादा गिरावट की आशंका है, जहां 2025 में पैदावार बेहद अच्छी रही थी, जबकि यूके में रकबे में कमी के कारण उत्पादन प्रभावित हो सकता है।</p>
<p>मक्का के मामले में, COCERAL को उम्मीद है कि 2025 में सूखे से प्रभावित फसल के बाद 2026 में कुछ सुधार देखने को मिलेगा। हालांकि, बीते वर्षों में कई क्षेत्रों में कमजोर पैदावार से किसान निराश रहे हैं, जिसके चलते मक्का का रकबा घटता जा रहा है। खासकर फ्रांस और बाल्कन देशों में किसान सूरजमुखी और सोयाबीन जैसी अन्य वसंतकालीन फसलों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे मक्का की बुवाई में और कमी आने की संभावना है।</p>
<p>यदि ये रुझान बने रहते हैं, तो EU में मक्का का रकबा 2020 की तुलना में लगभग 15 प्रतिशत कम हो जाएगा, यानी 90 लाख हेक्टेयर से घटकर 80 लाख हेक्टेयर से नीचे आ सकता है। 2026 में मक्का उत्पादन 589 लाख टन रहने का अनुमान है, जो 2025 के 571 लाख टन से थोड़ा अधिक होगा।</p>
<p>2026 में रेपसीड का उत्पादन 218 लाख टन रहने का अनुमान है, जो 2025 के स्तर के बराबर है। हालांकि 2025 की मजबूत पैदावार के बाद 2026 में पैदावार के औसत स्तर पर लौटने की संभावना है, लेकिन रकबे में उल्लेखनीय बढ़ोतरी इसकी भरपाई कर सकती है। रेपसीड का रकबा 71 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 75 लाख हेक्टेयर होने का अनुमान है। COCERAL के अनुसार, अगस्त और सितंबर में रेपसीड की बुवाई के सामान्य समय के दौरान किसानों को खेत-स्तर पर काफी आकर्षक कीमतें मिलीं, जिससे अधिक बुवाई को प्रोत्साहन मिला।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/09/image_750x500_66f3e87498e6a.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ 2026 में यूरोपीय यूनियन के अनाज उत्पादन में गिरावट का अनुमान; गेहूं उत्पादन घटेगा, मक्का में हल्की रिकवरी संभव: COCERAL ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[अमेरिका के CoBank का अनुमान&amp;#45; कमोडिटी कीमतें निचले स्तर को छू चुकी हैं, अब बढ़ सकते हैं दाम]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/the-us-cobank-signals-commodity-prices-may-have-bottomed-out.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 14 Dec 2025 10:31:08 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/the-us-cobank-signals-commodity-prices-may-have-bottomed-out.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अमेरिकी कोऑपरेटिव बैंक, CoBank द्वारा जारी अगले वर्ष के ताजा आउटलुक के अनुसार, वैश्विक स्तर पर अनाज और तिलहन की भरपूर आपूर्ति के बावजूद कमोडिटी बाजार संभवतः अपने निचले स्तर से आगे निकल चुके हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि बायोफ्यूल उत्पादन में बढ़ोतरी और निर्यात स्थितियों में धीरे-धीरे सुधार से बाजार की धारणा मजबूत हो रही है।</p>
<p>हालांकि व्यापार युद्ध में आंशिक नरमी के बाद हाल के दिनों में अमेरिका से चीन को सोयाबीन की बिक्री बढ़ी है, लेकिन रिपोर्ट का कहना है कि अमेरिकी निर्यात के पुराने रिकॉर्ड स्तर पर लौटने की संभावना कम है। ब्राज़ीलियाई सोयाबीन अब भी काफी सस्ते हैं, वहीं भौगोलिक रूप से चीन के नजदीग कजाखस्तान जैसे देशों में रिकॉर्ड तिलहन उत्पादन अमेरिका की स्थिति को और कमजोर कर रहा है।</p>
<p>वैश्विक अनाज आपूर्ति पर्याप्त बनी हुई है, क्योंकि मक्का और गेहूं के लगभग सभी प्रमुख निर्यातक देशों में फसल अच्छी रही है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ने और अमेरिकी निर्यात पर दबाव बने रहने की आशंका है। हालांकि, CoBank को उम्मीद है कि यदि चीन दोबारा अमेरिकी ज्वार की खरीद शुरू करता है, तो इससे चारा अनाज की कीमतों को जरूरी समर्थन मिल सकता है।</p>
<p>मांग के मोर्चे पर, कम कीमतों के कारण अमेरिकी अनाज और तिलहनों की खपत बढ़ने की संभावना है। अमेरिकी मक्का, गेहूं और चावल का सबसे बड़ा आयातक तथा सोयाबीन का दूसरा सबसे बड़ा गंतव्य मेक्सिको, आगे और अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। उप-सहारा अफ्रीका में गेहूं और आटे की मांग लगातार बढ़ रही है, जबकि मध्य-पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया में बढ़ते पोल्ट्री और पशुधन क्षेत्रों के लिए उच्च गुणवत्ता वाले अमेरिकी सोयाबीन और सोयामील की मांग बढ़ रही है।</p>
<p>दुनिया भर में बायोफ्यूल की बढ़ती मांग भी अनाज और तिलहनों की खपत को मजबूती दे रही है। ब्राज़ील और इंडोनेशिया में बायोमास-आधारित डीजल के लिए ऊंचे ब्लेंडिंग लक्ष्य वैश्विक वनस्पति तेल की मांग बढ़ा सकते हैं।</p>
<p>सोयामील निर्यात बाजार में प्रतिस्पर्धा तेज होने वाली है, क्योंकि अमेरिका और ब्राज़ील दोनों में बायोफ्यूल उत्पादन के लिए तेल निकालने की क्षमता बढ़ रही है। दक्षिण-पूर्व एशिया, लैटिन अमेरिका और मध्य पूर्व अमेरिका और ब्राज़ील के बीच बाजार हिस्सेदारी की प्रतिस्पर्धा हो सकती है।</p>
<p>रिपोर्ट के अनुसार, ऊंची इनपुट लागत किसानों के बुवाई फैसलों को भी प्रभावित कर सकती है। अधिकांश फसलों की मौजूदा कीमतें उत्पादन लागत से नीचे हैं, जिससे किसान मक्का का रकबा घटाकर कम लागत वाली फसलों की ओर रुख कर सकते हैं।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/12/image_750x500_693d475a64202.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ अमेरिका के CoBank का अनुमान- कमोडिटी कीमतें निचले स्तर को छू चुकी हैं, अब बढ़ सकते हैं दाम ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/12/image_750x500_693d475a64202.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[ट्रंप प्रशासन की तरफ से अमेरिकी किसानों के लिए बड़ी राहत, फसल और डेयरी क्षेत्र के लिए पैकेज की घोषणा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/us-unveils-major-farm-relief-package-to-support-crop-and-dairy-producers-amid-market-stress.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 13 Dec 2025 18:06:41 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/us-unveils-major-farm-relief-package-to-support-crop-and-dairy-producers-amid-market-stress.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत में कृषि सब्सिडी पर ऐतराज जताने वाले अमेरिका ने अपने कृषि क्षेत्र को स्थिरता देने के उद्देश्य से एक व्यापक राहत पैकेज की घोषणा की है। यह सहायता ऐसे समय में दी जा रही है, जब किसान व्यापार में बाधाओं, ऊंची इनपुट लागत और बाजार में उतार-चढ़ाव से जूझ रहे हैं। इस पैकेज के तहत फसल उत्पादन करने वाले किसानों के लिए बड़े स्तर पर वित्तीय मदद के साथ-साथ डेयरी किसानों के लिए अलग से राहत की व्यवस्था की गई है।</p>
<p>अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) के तहत किसानों को कुल 12 अरब डॉलर की एकमुश्त &lsquo;ब्रिज पेमेंट&rsquo; सहायता दी जाएगी, जिसका उद्देश्य अस्थायी व्यापारिक व्यवधानों और बढ़ती उत्पादन लागत से हुए नुकसान की भरपाई करना है। पात्र किसानों को यह भुगतान फरवरी के अंत तक मिलने की उम्मीद है।</p>
<p>इस पैकेज का बड़ा हिस्सा, करीब 11 अरब डॉलर, &lsquo;फार्मर ब्रिज असिस्टेंस प्रोग्राम&rsquo; के तहत दिया जाएगा। इसके अंतर्गत मक्का, सोयाबीन, गेहूं, चावल, कपास, ज्वार, जौ, तिलहन और दलहन जैसी प्रमुख फसलों के उत्पादक शामिल होंगे। शेष एक अरब डॉलर उन किसानों के लिए रखे गए हैं, जो इस कार्यक्रम के दायरे में नहीं आते, जिनमें चीनी जैसी विशेष फसलों के उत्पादक भी शामिल हैं। इनके लिए भुगतान का विवरण बाजार स्थितियों के आकलन के बाद तय किया जाएगा।</p>
<p>यह सहायता महंगाई, ऊंची इनपुट लागत और विदेशी प्रतिस्पर्धा के कारण निर्यात में आई दिक्कतों के बीच दी जा रही है। भुगतान की गणना रकबे, उत्पादन लागत, पैदावार और कीमतों के अनुमान के आधार पर एक समान फार्मूले से की जाएगी, ताकि 2025 फसल वर्ष में हुए आय नुकसान की आंशिक भरपाई हो सके।</p>
<p>इसके अलावा, USDA ने डेयरी किसानों के लिए 5 करोड़ डॉलर के अलग राहत पैकेज की भी घोषणा की है। इसका उद्देश्य दूध की कीमतों में उतार-चढ़ाव और चारे व श्रम लागत में बढ़ोतरी से जूझ रहे डेयरी उत्पादकों को राहत देना है। इस राशि का बड़ा हिस्सा &lsquo;डेयरी मार्जिन कवरेज&rsquo; कार्यक्रम के तहत दिया जाएगा, जो दूध कीमत और चारा लागत के बीच घटते मार्जिन से किसानों की रक्षा करता है। यह पहल अमेरिकी कृषि क्षेत्र को अल्पकालिक राहत देने और उत्पादन चक्र को बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ ट्रंप प्रशासन की तरफ से अमेरिकी किसानों के लिए बड़ी राहत, फसल और डेयरी क्षेत्र के लिए पैकेज की घोषणा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[वैश्विक अनाज उत्पादन 2025 में पहली बार 3 अरब टन के पार, भारत&amp;#45;चीन में गेहूं भंडार सबसे अधिक बढ़ने की उम्मीदः FAO]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/global-cereal-output-to-cross-3-billion-tonnes-for-first-time-stocks-reach-highest-levels-in-decades-fao.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 07 Dec 2025 08:44:42 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/global-cereal-output-to-cross-3-billion-tonnes-for-first-time-stocks-reach-highest-levels-in-decades-fao.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>वैश्विक अनाज उत्पादन 2025 में पहली बार 3 अरब टन का आंकड़ा पार करने जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के अनुसार गेहूं, मोटे अनाज और चावल की अनुमानित पैदावार पहले से अधिक मजबूत दिख रही है। FAO ने अपने नवीनतम अनुमान में विश्व अनाज उत्पादन को बढ़ाकर 300.3 करोड़ टन कर दिया है, जिसमें सबसे बड़ा योगदान अर्जेंटीना, यूरोपीय संघ और अमेरिका में बेहतर गेहूं उत्पादन का है। भारत और चीन में गेहूं भंडार सबसे अधिक बढ़ने की उम्मीद है।</p>
<p>अर्जेंटीना इस वर्ष रिकॉर्ड गेहूं उत्पादन की ओर बढ़ रहा है, जिसका कारण अधिक बुवाई क्षेत्र और अनुकूल मौसम है। यूरोपीय संघ और अमेरिका में भी गेहूं उत्पादन के अनुमान बढ़ाए गए हैं। वैश्विक मोटे अनाज उत्पादन में भी वृद्धि हुई है, मुख्यतः जौ की अधिक पैदावार के कारण। चावल के लिए, FAO ने इंडोनेशिया के अनुमान को बढ़ाया है क्योंकि वहां अधिक क्षेत्र में खेती के कारण अधिक उत्पादन की उम्मीद है। बांग्लादेश और जापान में बेहतर फसल संभावनाओं ने वैश्विक चावल उत्पादन अनुमान (2025/26) को बढ़ाकर 55.88 करोड़ टन कर दिया है जो अब तक का उच्चतम स्तर है।</p>
<p>उत्तरी गोलार्ध में 2026 की शीतकालीन गेहूं की बुवाई जारी है। अमेरिका में बुवाई लगभग पूरी हो चुकी है, हालांकि सूखे की वजह से फसल की स्थिति पिछले वर्ष से कमजोर है। यूरोपीय संघ में मौसम अनुकूल है, लेकिन इटली के कुछ हिस्सों में कम वर्षा चिंता उत्पन्न कर रही है। रूस और यूक्रेन में मिट्टी की स्थिति में सुधार हुआ है, जिससे 2026 के लिए बेहतर गेहूं क्षेत्र की उम्मीद है, हालांकि यूक्रेन का क्षेत्र 2022 के युद्ध-पूर्व स्तर से कम ही रहेगा। भारत और पाकिस्तान में भी आकर्षक कीमतों और सरकारी समर्थन से गेहूं क्षेत्र बढ़ने की संभावना है।</p>
<p>दक्षिणी गोलार्ध में मोटे अनाज की बुवाई जारी है। अर्जेंटीना में अनुकूल वर्षा और अधिक मक्का क्षेत्र के आधार पर उत्पादन में सुधार की उम्मीद है। ब्राज़ील में घरेलू और निर्यात मांग मजबूत रहने से मक्का क्षेत्र बढ़ सकता है। दक्षिण अफ्रीका में भी पीली मक्का किस्मों के अधिक रकबे के कारण हल्की बढ़ोतरी की संभावना है।</p>
<p>2025-26 में विश्व अनाज खपत 592 लाख टन (2.1%) बढ़ने की उम्मीद है, जिसमें मक्का और चावल की मांग प्रमुख है। पर्याप्त आपूर्ति और स्थिर कीमतों के कारण पशु चारे में मोटे अनाज की खपत बढ़ सकती है। चावल की कुल खपत वर्ष में 55.28 करोड़ टन के नए रिकॉर्ड पर पहुंच सकती है।</p>
<p>2026 के अंत तक विश्व अनाज भंडार बढ़कर 92.55 करोड़ टन होने का अनुमान है, जो रिकॉर्ड होगा। चीन और भारत में गेहूं भंडार सबसे अधिक बढ़ने की उम्मीद है, जबकि मोटे अनाज का स्टॉक अमेरिका और ब्राज़ील जैसे प्रमुख निर्यातकों में बढ़ने की संभावना है। प्रमुख निर्यातकों का स्टॉक-टू-यूज़ अनुपात 22.3% तक पहुंच सकता है, जो 1990 के दशक की शुरुआत के बाद सबसे ऊंचा स्तर होगा।</p>
<p>चावल का भंडार 21.68 करोड़ टन होने का अनुमान है, जिसमें इंडोनेशिया के बढ़े अनुमानों का सबसे बड़ा योगदान है। यह स्तर वैश्विक खपत के लगभग 4.6 महीनों के बराबर होगा।</p>
<p>2025-26 में अंतरराष्ट्रीय अनाज व्यापार 50.06 करोड़ टन तक बढ़ने की उम्मीद है, जो पिछले वर्ष से 3.3% अधिक है। पाकिस्तान, तुर्किये और एशिया के अन्य देशों से आयात बढ़ने के कारण गेहूं व्यापार में सुधार होने की संभावना है। मोटे अनाज के व्यापार में भी वृद्धि अपेक्षित है, जिसमें ब्राज़ील एक उभरता हुआ ज्वार निर्यातक बन रहा है। चावल का व्यापार 2026 में 612 लाख टन के आसपास स्थिर रहने का अनुमान है, हालांकि 2025 की तुलना में इसमें थोड़ी गिरावट हो सकती है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ वैश्विक अनाज उत्पादन 2025 में पहली बार 3 अरब टन के पार, भारत-चीन में गेहूं भंडार सबसे अधिक बढ़ने की उम्मीदः FAO ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[वैश्विक बाजार में नवंबर में लगातार तीसरे महीने गिरे खाद्य पदार्थों के दाम: FAO]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/global-food-prices-fall-for-third-straight-month-in-november-fao.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 06 Dec 2025 18:10:56 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/global-food-prices-fall-for-third-straight-month-in-november-fao.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के अनुसार, वैश्विक खाद्य वस्तुओं की कीमतें नवंबर में लगातार तीसरे महीने घटीं। डेयरी, मांस, चीनी और वनस्पति तेलों के दामों में गिरावट आई, जिसने अनाज कीमतों में मामूली बढ़ोतरी को पीछे छोड़ दिया। FAO फ़ूड प्राइस इंडेक्स नवंबर 2025 में औसतन 125.1 अंक रहा, जो अक्टूबर से 1.2 प्रतिशत और पिछले वर्ष की तुलना में 2.1 प्रतिशत कम है। यह सूचकांक मार्च 2022 के शीर्ष स्तर से लगभग 22 प्रतिशत नीचे बना हुआ है।</p>
<p>पिछले महीने सिर्फ अनाज श्रेणी में कीमतों में वृद्धि दर्ज की गई। FAO अनाज मूल्य सूचकांक नवंबर में 1.8 प्रतिशत बढ़ा। वैश्विक उत्पादन की अनुकूल स्थिति के बावजूद गेहूं के दाम बढ़े, जिसका कारण अमेरिका से चीन की संभावित खरीद, ब्लैक सी क्षेत्र में तनाव और रूस में कम बुवाई की आशंका रहा। मक्का के दाम ब्राज़ील से मजबूत मांग और अर्जेंटीना-ब्राज़ील में बारिश के चलते बढ़े। जौ और ज्वार की कीमतें भी ऊपर रहीं, जबकि चावल की कीमतें 1.5 प्रतिशत घटीं।</p>
<p>वनस्पति तेल कीमतों में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज हुई। इंडेक्स अक्टूबर की तुलना में 2.6 प्रतिशत घटकर पांच महीने के निचले स्तर पर पहुंच गया। मलेशिया में अपेक्षा से अधिक उत्पादन के कारण पाम तेल के दाम तेजी से गिरे। रेपसीड और सूरजमुखी तेल के दाम भी बेहतर वैश्विक आपूर्ति अनुमान के कारण घटे, जबकि सोया तेल के दाम बायोडीज़ल, विशेषकर ब्राज़ील से मजबूत मांग के कारण मामूली बढ़त में रहे। कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट ने भी वनस्पति तेलों पर दबाव डाला।</p>
<p>मांस की कीमतों में हल्की गिरावट आई। पोल्ट्री के दाम प्रचुर आपूर्ति और चीन द्वारा आयात शुल्क लगाने के बाद मांग कमजोर पड़ने से घटे।</p>
<p>डेयरी कीमतों में लगातार पांचवें महीने गिरावट दर्ज हुई। यूरोपीय संघ में बड़े स्टॉक, न्यूज़ीलैंड में मौसमी बढ़ोतरी और एशिया के कुछ हिस्सों से कमजोर मांग के बीच सभी प्रमुख डेयरी उत्पादों के दाम नीचे रहे। मक्खन और स्किम्ड मिल्क पाउडर में सबसे अधिक गिरावट देखी गई।</p>
<p>चीनी की कीमतें सभी श्रेणियों में सबसे तेज़ गिरावट के साथ 5.9 प्रतिशत घटीं, जो दिसंबर 2020 के बाद सबसे कम स्तर है। ब्राज़ील में मजबूत उत्पादन, भारत की नए सीज़न की अच्छी शुरुआत और थाईलैंड में बेहतर फसल अनुमानों ने वैश्विक आपूर्ति बढ़ने की उम्मीदों को मजबूत किया।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ वैश्विक बाजार में नवंबर में लगातार तीसरे महीने गिरे खाद्य पदार्थों के दाम: FAO ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[FAO रिपोर्ट: 2025&amp;#45;26 में गेहूं, चावल और मोटे अनाज का वैश्विक उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/global-wheat-rice-and-coarse-grain-output-set-for-record-highs-in-2025-says-fao.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 24 Nov 2025 10:44:08 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/global-wheat-rice-and-coarse-grain-output-set-for-record-highs-in-2025-says-fao.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>FAO की नवंबर 2025 की फूड आउटलुक रिपोर्ट के अनुसार गेहूं, चावल और मोटे अनाज का वैश्विक उत्पादन 2025-26 में ऐतिहासिक स्तर पर पहुंचने वाला है। बेहतर मौसम, अधिक बुवाई और बढ़ी हुई पैदावार से यह वृद्धि संभव होगी।</p>
<p>गेहूं उत्पादन 81.9 करोड़ टन रहने का अनुमान है, जो अब तक का सबसे अधिक है। यूरोपीय यूनियन में बेहतर मौसम और अधिक क्षेत्र में बुवाई से उत्पादन में वृद्धि होगी। भारत में भी आकर्षक कीमतों के कारण किसानों ने अधिक इलाके में बुवाई की। जबकि रूस में भी अनुकूल मौसम से वसंत के गेहूं की पैदावार बढ़ने के आसार हैं। ईरान, कज़ाखस्तान, पाकिस्तान और तुर्किये में कम वर्षा के कारण उत्पादन घटने के बावजूद वैश्विक स्तर पर रिकॉर्ड उत्पादन की पूरी संभावना है।</p>
<p><span style="font-weight: 400;">दुनिया भर में गेहूं का इस्तेमाल बढ़कर 80.8 करोड़ टन होने की उम्मीद है। एशिया और उत्तरी अमेरिका में जानवरों के चारे में गेहूं का इस्तेमाल बढ़ने की उम्मीद है। एशियाई देशों से आयात बढ़ने से दुनिया भर में गेहूं का व्यापार 5.1% बढ़कर 20.2 करोड़ टन होने का अनुमान है। गेहूं का स्टॉक रिकॉर्ड 32.88 करोड़ टन तक पहुंचने का अनुमान है, जिससे दुनिया भर में सप्लाई की स्थिति आरामदायक बनी रहेगी।</span></p>
<p>दूसरी ओर, वैश्विक चावल उत्पादन 55.6 करोड़ टन (मिल्ड) रहने का अनुमान है, जो अब तक का सर्वोच्च स्तर है। एशिया और लैटिन अमेरिका में रिकॉर्ड फसलें इसका प्रमुख कारण हैं। चावल की खपत के मजबूत रहने के बावजूद उत्पादन अधिक रहने से वैश्विक चावल भंडार 21.5 करोड़ टन के नए रिकॉर्ड पर पहुंच सकता है। चावल व्यापार में हल्की कमी का अनुमान है।</p>
<p>मोटे अनाज का उत्पादन 161 करोड़ टन होने का अनुमान है, जिसमें ब्राजील और अमेरिका की ऐतिहासिक मक्का फसल का सबसे बड़ा योगदान रहेगा। दक्षिणी अफ्रीका में भारी वर्षा से पैदावार में सुधार हुआ है। मोटे अनाज की खपत 157 करोड़ टन रहने की उम्मीद है, जबकि व्यापार में 2.6% वृद्धि का अनुमान है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ FAO रिपोर्ट: 2025-26 में गेहूं, चावल और मोटे अनाज का वैश्विक उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[FAO Outlook: दुनिया में उर्वरकों के इस्तेमाल में तेजी से वृद्धि, कीमतों में उतार&amp;#45;चढ़ाव जारी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/global-fertilizer-use-rebounds-but-prices-remain-volatile-fao-warns.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 23 Nov 2025 11:22:11 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/global-fertilizer-use-rebounds-but-prices-remain-volatile-fao-warns.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) ने वैश्विक उर्वरक बाजार का अपडेट जारी किया है। इसके अनुसार वर्ष 2024-25 में ग्लोबल स्तर पर उर्वरकों के इस्तेमाल में काफी वृद्धि हुई, लेकिन ऊर्जा की बढ़ती लागत, पॉलिसी की अनिश्चितता और अफोर्डेबिलिटी की चुनौतियां 2026 के आउटलुक को आकार देना जारी रखेंगी।</p>
<p>रिपोर्ट के अनुसार दो साल की गिरावट के बाद 2024 में ग्लोबल फर्टिलाइजर इस्तेमाल 6% बढ़कर 20 करोड़ टन हो गया, जो 2020 के रिकॉर्ड के करीब है। नाइट्रोजन का इस्तेमाल 11.5 करोड़ टन तक पहुंच गया, जो अब तक का रिकॉर्ड है। यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से 2024 की शुरुआत में फर्टिलाइजर की कम कीमतों और भारत में यूरिया सब्सिडी बढ़ाने और खेती के इनपुट पर GST कम करने जैसी नीतियों की वजह से हुई। चीन ने भी खेती में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए न्यूट्रिएंट्स के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया।</p>
<p>पोटाश की डिमांड भी तेजी से बढ़ी, खासकर ब्राज़ील, चीन, इंडोनेशिया और मलेशिया में, जहां किफायती दामों ने इस्तेमाल को बढ़ावा दिया। हालांकि, फॉस्फोरस की डिमांड में थोड़ी ही वृद्धि हुई और यह दक्षिण और पूर्वी एशिया में फॉस्फोरस की लगातार ऊंची कीमतों के कारण कमजोर रही।</p>
<p>सप्लाई की स्थिति देखें तो 2024-25 में नाइट्रोजन और पोटाश का उत्पादन तेजी से बढ़ा। हालांकि, फर्टिलाइजर प्लांट में इस्तेमाल का स्तर अब तक के सबसे ऊंचे लेवल से नीचे रहा क्योंकि वैश्विक स्तर पर क्षमता में बढ़ोतरी डिमांड से ज्यादा हो रही है। फॉस्फेट उत्पादन क्षमता धीरे-धीरे बढ़ी। कुल मिलाकर, न्यूट्रिएंट कैपेसिटी 2030 तक हर साल 2% बढ़ने का अनुमान है।</p>
<p>एनर्जी मार्केट एक जरूरी फैक्टर बना हुआ है, क्योंकि नेचुरल गैस नाइट्रोजन उर्वरकों और कई फॉस्फेट प्रोडक्ट के लिए एक जरूरी इनपुट है। ठंडे मौसम और कम पवन ऊर्जा उत्पादन की वजह से डच TTF गैस बेंचमार्क 2025 की शुरुआत में EUR 58/MWh तक बढ़ गया, फिर सितंबर तक LNG की अच्छी सप्लाई के बीच EUR 32&ndash;33/MWh तक गिर गया। यह उतार-चढ़ाव यूरोप में उत्पादन लागत पर असर डाल रहा है।</p>
<p>फर्टिलाइज़र की कीमतें 2022 में सबसे ज्यादा थीं और 2023-24 में कम हुईं, लेकिन 2025 की शुरुआत में फिर से बढ़ गईं। सितंबर 2025 तक, फर्टिलाइजर बास्केट की कीमत औसतन 489 डॉलर प्रति टन थी, जो साल-दर-साल 46% ज्यादा थी। हालांकि यह अब भी 2022 के 815 डॉलर प्रति टन के सबसे ऊंचे स्तर से नीचे है। 2025 के पहले नौ महीनों में नाइट्रोजन की कीमतें 23%, फॉस्फेट की 21% और पोटाश की 13% बढ़ीं।</p>
<p>भूराजनीतिक तनाव, मेंटेनेंस से जुड़ी सप्लाई में रुकावट और ब्राजील तथा भारत जैसे बड़े आयातक देशों से घटती-बढ़ती डिमांड की वजह से मार्केट में अनिश्चितता बनी हुई है। वर्ष 2025 के आखिर में, नाइट्रोजन और फॉस्फेट की कीमतें नरम पड़ गईं क्योंकि ज्यादा कीमतों ने डिमांड कम कर दी।</p>
<p>FAO ने चेतावनी दी है कि अगर कीमतें स्थिर नहीं होती हैं और एनर्जी मार्केट का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है, तो 2026 की शुरुआत में दुनिया भर में इसका इस्तेमाल कम हो सकता है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ FAO Outlook: दुनिया में उर्वरकों के इस्तेमाल में तेजी से वृद्धि, कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[भारत के बासमती पर विशेष अधिकार के दावे को न्यूजीलैंड और केन्या में बड़ा झटका]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/nz-kenya-courts-reject-india-plea-for-exclusive-basmati-rights-under-trips.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 20 Nov 2025 16:18:11 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/nz-kenya-courts-reject-india-plea-for-exclusive-basmati-rights-under-trips.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>विश्व बाजार में बासमती चावल पर विशेष अधिकार प्राप्त करने के भारत के प्रयासों को न्यूजीलैंड और केन्या में बड़ा झटका लगा है। भारत विश्व व्यापार संगठन (WTO) के बौद्धिक संपदा अधिकार संबंधी TRIPS समझौते का हवाला देकर न्यूजीलैंड में बासमती का ट्रेडमार्क हासिल करना चाहता था। जबकि केन्या में बासमती नाम की छह चावल किस्मों को ट्रेडमार्क दिए जाने पर भारत ने आपत्ति जताई थी। लेकिन दोनों देशों की अदालतों ने भारत के दावों को स्वीकार नहीं किया है लेकिन भारत ने इनके खिलाफ अपना दावा बरकरार रखा है।&nbsp;</p>
<p>भारत की दलील थी कि बासमती को भारत में भौगोलिक संकेतक (GI) प्राप्त है और TRIPS समझौते के तहत भौगोलिक संकेतक का दुरुपयोग रोकने की जिम्मेदारी भी शामिल है। इसलिए बासमती को ट्रेडमार्क देकर GI सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए।</p>
<p>भारत के ओर से कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) ने न्यूजीलैंड उच्च न्यायालय में भारत के बासमती चावल के लिए ट्रेडमार्क देने से इनकार करने वाले पिछले फैसलों को चुनौती दी थी।</p>
<p><strong>न्यूजीलैंड कोर्ट का फैसला </strong></p>
<p>गत 30 अक्टूबर को आए न्यूजीलैंड उच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार, TRIPS समझौता सदस्य देशों को अन्य देशों में पंजीकृत ऐसे भौगोलिक संकेतकों (GI) को मान्यता और सुरक्षा देने के लिए बाध्य नहीं करता है जो घरेलू कानूनों की शर्तों को पूरा नहीं करते हैं। जज ने माना कि न्यूजीलैंड का फेयर ट्रेडिंग एक्ट, 1986 बासमती जैसे उत्पादों के मूल स्थान से जुड़े भ्रामक दावों को रोकने के लिए पर्याप्त है।</p>
<p>हालिया आदेश में न्यूजीलैंड हाईकोर्ट ने बासमती के लिए ट्रेडमार्क पंजीकरण के भारत के अनुरोध को खारिज कर दिया है। अदालत ने बौद्धिक संपदा कार्यालय (IPONZ) के 2024 के उस फैसले को बरकरार रखा है जिसमें कहा गया था कि बासमती केवल भारत से संबंधित नहीं है। अदालत ने माना कि "बासमती उत्पादक क्षेत्र" भारत और पाकिस्तान दोनों में फैला हुआ है। ऐसे में भारतीय उत्पादकों को विशेष अधिकार देना अनुचित होगा। इससे पाकिस्तान के उत्पादक बासमती नाम से अपना चावल नहीं बेच पाएंगे।</p>
<p>गौरतलब है कि न्यूजीलैंड में बासमती पर विशेष अधिकार के लिए एपीडा ने 2019 में आवेदन किया था। लेकिन IPONZ ने जुलाई 2024 में इस अनुरोध को खारिज कर दिया था।</p>
<p><strong>केन्या का फैसला: </strong><strong>TRIPS </strong><strong>स्वतः लागू नहीं</strong></p>
<p>केन्या में, एपीडा ने ऐसी छह चावल किस्मों के ट्रेडमार्क पंजीकरण पर आपत्ति जताई थी जिनके नाम में &ldquo;बासमती&rdquo; शब्द का इस्तेमाल किया गया है। एपीडा का तर्क था कि TRIPS समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले देश GI के दुरुपयोग को रोकने के लिए बाध्य हैं।</p>
<p>केन्याई अदालत ने एपीडा की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि TRIPS एक स्व-निष्पादन संधि (Self-Executing Treaty) नहीं है और इसे राष्ट्रीय कानून के अनुरूप ही लागू किया जा सकता है। अदालत ने कहा कि राष्ट्रीय कानून का पालन किए बिना TRIPS को सीधे लागू करना देश की कानूनी व्यवस्था की अनदेखी होगा। &nbsp;</p>
<p><strong>फैसलों का असर </strong></p>
<p>पाकिस्तान के चावल उद्योग ने न्यूजीलैंड के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि इससे बासमती उत्पादक के रूप में उसकी वैधता को मजबूती मिलेगी। और भविष्य के अंतर्राष्ट्रीय GI विवादों में उसकी स्थिति मजबूत करता है।</p>
<p>ये फैसले बासमती के लिए विशेष अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा हासिल करने में भारत की चुनौतियों को उजागर करते हैं। भारत ने बासमती को GI टैग दिया है लेकिन बासमती की खेती पाकिस्तान में भी होती है। विश्व बाजार में भारत और पाकिस्तान दोनों को बासमती उत्पादक देश के तौर पर मान्यता प्राप्त है। प्रीमियम चावल बाजारमें &nbsp;प्रतिस्पर्धा तेज होने के साथ, ये फैसले भविष्य में बासमती-मूल विवादों को भी प्रभावित कर सकते हैं।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ भारत के बासमती पर विशेष अधिकार के दावे को न्यूजीलैंड और केन्या में बड़ा झटका ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[वैश्विक कृषि को आपदाओं से तीन दशक में 3.26 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान; FAO ने डिजिटल तकनीक को बताया प्रमुख समाधान]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/disasters-cause-3.26-trillion-dollars-loss-to-global-agriculture-fao-highlights-digital-tech-as-key-to-future-resilience.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 15 Nov 2025 13:32:31 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/disasters-cause-3.26-trillion-dollars-loss-to-global-agriculture-fao-highlights-digital-tech-as-key-to-future-resilience.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) की एक नई रिपोर्ट के अनुसार पिछले 33 वर्षों में वैश्विक कृषि क्षेत्र को आपदाओं से लगभग 3.26 ट्रिलियन (लाख करोड़) डॉलर का नुकसान हुआ है। 'द इम्पैक्ट ऑफ डिज़ास्टर्स ऑन एग्रीकल्चर एंड फूड सिक्योरिटी 2025' शीर्षक वाली यह रिपोर्ट अब तक का सबसे व्यापक मूल्यांकन प्रस्तुत करती है कि सूखा, बाढ़, कीट, तूफान और समुद्री हीटवेव जैसी घटनाएं किस प्रकार वैश्विक खाद्य सुरक्षा को प्रभावित कर रही हैं।&nbsp;</p>
<p>FAO ने पाया कि 1991 से 2023 के बीच आपदाओं ने 4.6 अरब टन अनाज, 2.8 अरब टन फल और सब्जियां और 90 करोड़ टन मांस और दुग्ध उत्पाद नष्ट कर दिए। इन नुकसानों के कारण प्रति व्यक्ति प्रतिदिन लगभग 320 किलो कैलोरी ऊर्जा की कमी आई है, जो औसत ऊर्जा आवश्यकता का लगभग 13 से 16 प्रतिशत है। इस स्तर का विनाश विशेषकर उन क्षेत्रों में खाद्य असुरक्षा को गहरा कर रहा है जहां कृषि आजीविका का प्रमुख आधार है।</p>
<p>एशिया में वैश्विक कृषि का सबसे अधिक नुकसान होता है। दुनिया का 47 प्रतिशत नुकसान यहीं होता है जिसकी वैल्यू 1.53 लाख करोड़ डॉलर है। यह क्षेत्र न केवल बड़े पैमाने पर कृषि उत्पादन करता है, बल्कि बाढ़, तूफानों और लंबे सूखे जैसी चरम घटनाओं के अत्यधिक संपर्क में भी है। अमेरिका महाद्वीप में कुल वैश्विक नुकसान का 22 प्रतिशत यानी लगभग 713 अरब डॉलर का नुकसान हुआ, जो लगातार सूखे, विनाशकारी तूफानों और अत्यधिक तापमान की घटनाओं के कारण हुआ। अफ्रीका में 611 अरब डॉलर का नुकसान दर्ज किया गया, लेकिन सबसे अधिक अनुपातिक प्रभाव यहीं पड़ा। यहां कृषि GDP का 7.4 प्रतिशत आपदाओं से नष्ट हो गया। उन अफ्रीकी अर्थव्यवस्थाओं में जहां खेती रोजगार और आय का मुख्य स्रोत है, इस नुकसान ने खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण स्थिरता पर गहरा प्रभाव डाला है।</p>
<p>छोटे द्वीपीय विकासशील देश भी दुनिया के सबसे अधिक संवेदनशील क्षेत्रों में बने हुए हैं। हालांकि इनका कृषि उत्पादन अपेक्षाकृत कम है, लेकिन बार-बार आने वाले चक्रवातों, बाढ़ और समुद्र-स्तर में वृद्धि के कारण कृषि GDP के मुकाबले आपदाओं का प्रभाव अत्यधिक रहता है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 1985 और 2022 के बीच समुद्री हीटवेव के कारण 6.6 अरब डॉलर का नुकसान हुआ, जिससे वैश्विक फिशरीज का 15 प्रतिशत प्रभावित हुआ। यह नुकसान अक्सर आपदा आकलनों में अदृश्य रह जाता है, जबकि मत्स्य क्षेत्र विश्वभर में 50 करोड़ लोगों की आजीविका का आधार है।</p>
<p>रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि डिजिटल तकनीकें आपदा जोखिम प्रबंधन में महत्वपूर्ण मोड़ ला रही हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ड्रोन, सेंसर, मोबाइल-आधारित मॉनिटरिंग सिस्टम, रिमोट सेंसिंग प्लेटफ़ॉर्म और प्रेडिक्टिव एनालिटिक्स जैसी तकनीकें किसानों और सरकारों को वास्तविक समय में जोखिमों की निगरानी करने, प्रभावों का अनुमान लगाने और नुकसान होने से पहले कार्रवाई करने में सक्षम बना रही हैं। FAO के महानिदेशक कू डोंग्यु ने कहा कि डिजिटल रूपांतरण जोखिम कम करने में मूलभूत बदलाव ला रहा है। FAO के अनुसार, 91 लाख से अधिक किसान डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से पैरामीट्रिक बीमा तक पहुंच प्राप्त कर चुके हैं</p>
<p>रिपोर्ट डिजिटल नवाचार के कई उदाहरण प्रस्तुत करती है। FAO का क्लाइमेट रिस्क टूलबॉक्स 200 से अधिक परियोजनाओं में कृषि योजना का मार्गदर्शन करने के लिए वैश्विक डेटासेट को एकीकृत करता है। रिफ़्ट वैली फीवर अर्ली वार्निंग डिसीजन सपोर्ट टूल ने पूर्वी अफ्रीका में प्रकोपों का सही पूर्वानुमान लगाया, जिससे समय पर वैक्सीनेशन संभव हुआ। FAO का सॉइल-एफईआर (SoilFER) प्लेटफ़ॉर्म मिट्टी और उर्वरक डेटा का मिलान करके टिकाऊ और कुशल खेती को बढ़ावा देता है। फॉल आर्मीवर्म मॉनिटरिंग और अर्ली वार्निंग सिस्टम 60 से अधिक देशों में कीट प्रकोपों को ट्रैक करने में मदद कर रहा है। FAO की फाइनेंसिंग फॉर शॉक-ड्रिवन फ़ूड क्राइसिस फ़ैसिलिटी भी देशों को खाद्य आपात स्थितियों के बढ़ने से पहले प्रतिक्रिया करने में मदद कर रही है।</p>
<p>हालांकि प्रगति तेज है, लेकिन रिपोर्ट चेतावनी देती है कि विश्वभर में अब भी 2.6 अरब लोग ऑफलाइन हैं, जिनमें से अधिकांश ग्रामीण किसान हैं जो आपदा और जलवायु जोखिमों के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील हैं। FAO का कहना है कि डिजिटल परिवर्तन की पूरी क्षमता तभी साकार हो सकती है जब यह मानव-केंद्रित डिजाइन, मजबूत संस्थागत क्षमता, नीतिगत सुधारों और लक्षित निवेशों पर आधारित हो। संगठन ने सरकारों, अंतर्राष्ट्रीय साझेदारों और निजी क्षेत्र से डिजिटल बुनियादी ढांचे का विस्तार करने, डिजिटल साक्षरता को मजबूत करने और इन तकनीकों को राष्ट्रीय कृषि रणनीतियों में शामिल करने का आह्वान किया। रिपोर्ट इस बात पर भी जोर देती है कि महिलाओं, युवाओं, छोटे किसानों और आदिवासी समुदायों को इन तकनीकों तक समान पहुंच मिलनी चाहिए ताकि वैश्विक कृषि-खाद्य प्रणालियाँ अधिक मजबूत बन सकें।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ वैश्विक कृषि को आपदाओं से तीन दशक में 3.26 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान; FAO ने डिजिटल तकनीक को बताया प्रमुख समाधान ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[बांग्लादेश अगले साल अमेरिका से 1.25 अरब डॉलर सोयाबीन का करेगा आयात]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/bangladesh-to-import-1.25-billion-dollar-worth-of-us-soy-to-strengthen-food-and-feed-security.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 09 Nov 2025 14:48:56 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/bangladesh-to-import-1.25-billion-dollar-worth-of-us-soy-to-strengthen-food-and-feed-security.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>बांग्लादेश की अग्रणी सोया प्रोसेसिंग कंपनियां &mdash; मेघना ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज, सिटी ग्रुप, डेल्टा एग्रोफूड इंडस्ट्रीज लिमिटेड, महबूब ग्रुप और केजीएस ग्रुप ने अमेरिकी सोयाबीन और सोया मील के आयात के लिए 1.25 अरब के समझौते किए हैं। यूएस सोयाबीन एक्सपोर्ट काउंसिल (USSEC) के अनुसार, यह समझौता दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय कृषि व्यापार में महत्वपूर्ण वृद्धि का संकेत है। दोनों पक्षों ने बाजार विकास में सहयोग करने और USSEC के &ldquo;राइट टू प्रोटीन&rdquo; अभियान के माध्यम से बांग्लादेश में प्रोटीन उपभोग को बढ़ावा देने पर भी सहमति व्यक्त की है।</p>
<p>अमेरिकी कृषि विभाग की विदेशी कृषि सेवा (FAS) के अनुसार, 2025&ndash;26 में जैसे-जैसे पशु आहार उत्पादन बढ़ेगा, बांग्लादेश में सोयाबीन क्रशिंग (प्रसंस्करण) में वृद्धि की उम्मीद है। देश के पोल्ट्री, डेयरी और मत्स्य पालन क्षेत्र लगातार तेजी से बढ़ रहे हैं, जिन्हें तैयार पशु आहार के उपयोग में वृद्धि हो रही है।</p>
<p>FAS का अनुमान है कि 2025&ndash;26 में बांग्लादेश का कुल सोयाबीन आयात 2.4 मिलियन टन तक पहुंच जाएगा, जो पिछले वर्ष की तुलना में 9% अधिक है। वर्तमान में सोया मील देश में उपयोग किए जाने वाले कुल पशु आहार का लगभग 30% है। बांग्लादेश के उद्योग जगत ने इसे घरेलू प्रसंस्करण क्षमताओं और खाद्य सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम बताया है।</p>
<p>USDA के आंकड़ों के अनुसार, 2024 में बांग्लादेश ने अमेरिका से 35 करोड़ डॉलर मूल्य का सोयाबीन आयात किया, जो देश का शीर्ष कृषि आयात था। बांग्लादेश दक्षिण एशिया में अमेरिकी सोयाबीन के लिए सबसे बड़ा बाजार बन गया है, जहां सोया मील के आयात में पिछले वर्ष की तुलना में 650% की वृद्धि हुई है। इसी दौरान 2024 में बांग्लादेश का अमेरिका को निर्यात 8.78 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया, जो दोनों देशों के बीच बढ़ते व्यापारिक संबंधों को दर्शाता है।</p>
<p>अमेरिकन सोयाबीन एसोसिएशन (ASA), जो लगभग पांच लाख अमेरिकी सोयाबीन किसानों का प्रतिनिधित्व करती है, ने इस समझौते का स्वागत किया और कहा कि यह न केवल बांग्लादेश की प्रोटीन आपूर्ति को मजबूत करता है, बल्कि अमेरिकी कृषि के लिए नए अवसर भी पैदा करता है।</p>
<p>USSEC 93 देशों में कार्यरत है और भोजन, मत्स्य पालन और पशु आहार में अमेरिकी सोया के उपयोग को बढ़ावा देता है। यह पूरे सोया मूल्य श्रृंखला &mdash; किसानों, प्रोसेसरों, निर्यातकों और एग्रीबिजनेस कंपनियों का प्रतिनिधित्व करता है और इसे सोयाचेकऑफ, USDA की विदेशी कृषि सेवा और उद्योग भागीदारों से फंडिंग मिलती है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ बांग्लादेश अगले साल अमेरिका से 1.25 अरब डॉलर सोयाबीन का करेगा आयात ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/11/image_750x500_690f0a8621d48.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[सोयाबीन के बाद चीन ने अमेरिका से गेहूं और ज्वार खरीदने का किया समझौता]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/china-resumes-buying-us-wheat-and-sorghum-after-a-year-signaling-thaw-in-trade-tensions.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 09 Nov 2025 14:18:23 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/china-resumes-buying-us-wheat-and-sorghum-after-a-year-signaling-thaw-in-trade-tensions.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>मौजूदा साल के अंतिम दो महीनों में अमेरिका से 1.2 करोड़ टन सोयाबीन आयात करने की योजना की घोषणा के बाद चीन ने अमेरिका से गेहूं और ज्वार खरीदने के लिए भी समझौते किए हैं। पिछले एक साल से भी ज़्यादा समय में अमेरिका से गेहूं की उसकी पहली खरीद है। इसके तहत वह 1.2 लाख टन नरम और वसंत गेहूं की खरीद करेगा।</p>
<p>अमेरिका और चीन के बीच इस साल की शुरुआत से व्यापार युद्ध चल रहा है। इससे अमेरिका से चीन को कृषि उत्पादों की आपूर्ति में भारी कमी आई है। पिछले हफ्ते अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई बैठक के बाद यह घोषणा की गई कि चीन 1.2 करोड़ टन सोयाबीन खरीदेगा। उसने अगले तीन वर्षों में प्रत्येक वर्ष कम से कम 2.5 करोड़ टन सोयाबीन खरीदने का वादा किया है। यह 2025-26 विपणन वर्ष में चीन द्वारा अमेरिकी सोयाबीन की पहली खरीद थी।</p>
<p><strong>पिछले साल चीन ने किया था 20 लाख टन गेहूं का आयात</strong><br />चीन ने 2024-25 में लगभग 20 लाख टन अमेरिकी गेहूं का आयात किया था। लेकिन बंपर फसल के बाद उसने इस सप्ताह की घोषणा तक चालू विपणन वर्ष में कोई गेहूं नहीं खरीदा था। अमेरिकी कृषि विभाग की विदेशी कृषि सेवा के आंकड़ों के अनुसार, पिछले साल चीन ने 14.01 करोड़ टन गेहूं उत्पादन का रिकॉर्ड बनाया था। इससे आयात घटकर 42 लाख टन रह गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 70% कम और छह वर्षों में सबसे कम है।</p>
<p><strong>चीन ने ज्वार खरीद में भी अमेरिका के विकल्प तलाशे</strong><br />ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो अमेरिका चीन का सबसे बड़ा ज्वार आपूर्तिकर्ता रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में चीन ने ऑस्ट्रेलिया और अर्जेंटीना से अधिक ज्वार खरीदा है। इसका मुख्य कारण अमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव है। चीन ने 2023-24 में अमेरिका से 56 लाख टन ज्वार खरीदा था, लेकिन उसके बाद इसमें बहुत कमी आई है।</p>
<p><strong>कृषि संगठनों ने की सौदे की सराहना</strong><br />अमेरिकी कृषि संगठनों ने दोनों देशों के बीच हालिया प्रगति पर सकारात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त की है। अमेरिकी अनाज एवं जैव उत्पाद परिषद (यूएसजीबीसी) ने कहा, &ldquo;हम ट्रंप प्रशासन की तरफ से चीन के साथ किए गए नए व्यापार समझौते से प्रसन्न हैं और इसे संभव बनाने के लिए किए गए सभी प्रयासों की सराहना करते हैं। चीन दशकों से अमेरिका के शीर्ष पांच व्यापारिक साझेदारों में से एक रहा है, और हमारे संबंध वैश्विक मूल्य श्रृंखला को लाभ पहुँचाते हैं।&rdquo;</p>
<p>अमेरिका के नेशनल सोरघम प्रोड्यूसर्स (एनएसपी) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी टिम लस्ट ने कहा, "निर्यात हमारे उद्योग के लिए महत्वपूर्ण है। हालांकि हम चाहते हैं कि चीन के साथ कम से कम 50 लाख टन प्रति वर्ष न्यूनतम खरीद का समझौता किया जाए। इससे निरंतर, विश्वसनीय मांग सुनिश्चित होगी जो अमेरिकी ज्वार उत्पादकों के लिए दीर्घकालिक निश्चितता प्रदान करेगी।"</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ सोयाबीन के बाद चीन ने अमेरिका से गेहूं और ज्वार खरीदने का किया समझौता ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/11/image_750x500_690f037ba0df9.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[संयुक्त राष्ट्र ने जैव विविधता प्रबंधन में स्थानीय समुदायों की भूमिका को दी मान्यता]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/historic-un-body-formed-to-elevate-indigenous-role-in-global-biodiversity-governance.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 02 Nov 2025 16:33:20 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/historic-un-body-formed-to-elevate-indigenous-role-in-global-biodiversity-governance.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">संयुक्त राष्ट्र ने जैव विविधता संरक्षण के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए आदिवासी और स्थानीय समुदायों को वैश्विक नीति-निर्माण में औपचारिक रूप से शामिल किया है। पनामा सिटी में 27 से 30 अक्टूबर तक आयोजित सम्मेलन में जैव विविधता पर कन्वेंशन (Convention on Biological Diversity - CBD) से संबंधित सब्सिडियरी बॉडी की पहली बैठक संपन्न हुई। यह पहली बार है जब किसी बहुपक्षीय पर्यावरण संधि के तहत आदिवासी समुदायों को एक सहायक निकाय में औपचारिक भागीदारी का अधिकार दिया गया है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">बैठक का उद्घाटन कोलंबिया की पर्यावरण मंत्री और जैव विविधता सम्मेलन की अध्यक्ष इरीन वेल्ज़ टोरेस ने किया। उन्होंने कहा कि इस निकाय की स्थापना &ldquo;पर्यावरणीय लोकतंत्र की दिशा में एक अभूतपूर्व कदम&rdquo; है, जो कुन्मिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता रूपरेखा (Kunming-Montreal Global Biodiversity Framework) के कार्यान्वयन में आदिवासी समुदायों की पूर्ण और प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करेगा।</span></p>
<p><strong>आधुनिक विज्ञान और पारंपरिक ज्ञान का संगम</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">पनामा के पर्यावरण मंत्री जुआन कार्लोस नवारो ने प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि &ldquo;संरक्षण अधिकारों के बिना संभव नहीं है, और न्याय के बिना स्थिरता संभव नहीं।&rdquo; उन्होंने कहा कि यह नया निकाय आधुनिक विज्ञान और पारंपरिक ज्ञान के बीच सेतु का कार्य करेगा तथा आदिवासी समुदायों को संसाधन प्रबंधन के निर्णयों में समान भागीदार के रूप में मान्यता देगा।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">सीबीडी की कार्यकारी सचिव एस्ट्रिड शूमाकर ने इस बैठक को &ldquo;ऐतिहासिक क्षण&rdquo; बताया और दान देने वाले देशों व आदिवासी प्रतिनिधियों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि &ldquo;सफलता का मापदंड केवल सिफारिशें नहीं होंगी, बल्कि यह होगा कि धरातल पर समुदाय कितने सशक्त होते हैं और पारिस्थितिक तंत्र कितना बहाल होता है।&rdquo;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">बैठक में टोगो के जोनास कोमी अंते को रिपोर्टर चुना गया। सात क्षेत्रीय समूहों &mdash; अफ्रीका, आर्कटिक, एशिया, प्रशांत और अन्य &mdash; से आदिवासी प्रतिनिधियों को ब्यूरो के &ldquo;मित्र&rdquo; के रूप में नामित किया गया। नॉर्वे की सामी परिषद की गुन-ब्रिट रेटर को सह-अध्यक्ष नियुक्त किया गया। उन्होंने सामी कवि निल्स-आस्लक वाल्कियापाया की पंक्तियों का उद्धरण देते हुए कहा, &ldquo;भूमि तब अलग हो जातती है जब आप जानते हैं कि यहां आपकी जड़ें और पूर्वज हैं।&rdquo;</span></p>
<p><strong>कार्यसूची और नीतिगत मसौदे</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">प्रतिनिधियों ने कई प्रमुख विषयों पर चर्चा की। इनमें पारंपरिक भूमि उपयोग और संसाधन प्रबंधन को पर्यावरणीय प्रभाव आकलन तथा स्थानिक नियोजन प्रक्रियाओं में शामिल करने के दिशा-निर्देश तैयार करना प्रमुख था। साथ ही, निकाय के काम करने तरीके पर भी विस्तृत विमर्श हुआ, जो आगे के निर्णयों का आधार बनेगा।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">बैठक में इस बात पर भी जोर दिया गया कि आदिवासी समुदायों, विशेष रूप से महिलाओं और युवाओं के लिए जैव विविधता वित्त तक समान पहुंच सुनिश्चित की जाए। वैश्विक पर्यावरण सुविधा (GEF), संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) और अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) के विशेषज्ञों ने प्रत्यक्ष वित्तपोषण के ऐसे तंत्र की सिफारिश की जो स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाए।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">प्रतिभागियों ने माना कि इस उप-संस्थागत निकाय की स्थापना केवल एक प्रक्रियात्मक कदम नहीं, बल्कि एक परिवर्तनकारी पहल है। इसने आदिवासी समुदायों को वैश्विक निर्णय-प्रक्रिया में समान स्थान देकर &ldquo;पर्यावरणीय बहुपक्षवाद&rdquo; का नया मॉडल प्रस्तुत किया है। बैठक की ड्राफ्ट रिपोर्ट, जिसमें वित्तीय तंत्र और भागीदारी शासन से संबंधित सिफारिशें शामिल हैं, अब 2026 में होने वाले सीओपी-17 (COP17) सम्मेलन में प्रस्तुत की जाएगी।</span></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/11/image_750x500_6905e893cdff3.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ संयुक्त राष्ट्र ने जैव विविधता प्रबंधन में स्थानीय समुदायों की भूमिका को दी मान्यता ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[एशिया दौरे में अमेरिकी कृषि निर्यात को नई ताकत देने में सफल रहे ट्रंप]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/trumps-trade-diplomacy-revives-us-farm-exports-through-asia-deals.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 01 Nov 2025 15:34:39 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/trumps-trade-diplomacy-revives-us-farm-exports-through-asia-deals.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने हाल के एशिया के दौरे में कई प्रमुख देशों के साथ कृषि क्षेत्र में बड़े सौदे किए हैं। इसका सबसे बड़ा असर अमेरिका-चीन व्यापार समझौते में देखने को मिला, जिससे वर्षों से टैरिफ से जूझ रहे अमेरिकी सोयाबीन और अनाज निर्यातकों के लिए रास्ता खुला है।​​</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">ट्रंप ने लंबी कूटनीतिक कवायद के बाद चीन के अलावा दक्षिण कोरिया, वियतनाम, थाईलैंड, मलेशिया और कंबोडिया के साथ कृषि समझौते किए है। चीन के साथ ऐतिहासिक डील के तहत ट्रंप ने चीन पर टैरिफ 57 प्रतिशत से घटाकर 47 प्रतिशत करने की घोषणा की। बदले में चीन अमेरिका से सोयाबीन की खरीद फिर शुरू करने पर सहमत हुआ है।​​ उसने करीब एक साल से अमेरिका से सोयाबीन खरीदना बंद कर रख था। इसकी जगह वह ब्राजील से सोया प्रोडक्ट खरीद रहा है</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अन्य देशों में थाईलैंड ने हर साल 2.6 अरब डॉलर के अमेरिकी उत्पाद - सोयाबीन मील, फीड कॉर्न, डिस्टिलर्स ग्रेन - खरीदने का समझौता किया है। वियतनाम ने अमेरिका से कॉफी आयात पर टैरिफ पूरी तरह खत्म करने पर सहमति जताई तो मलेशिया व कंबोडिया ने एथेनॉल के लिए टैक्स हटा दिए हैं। इससे अमेरिकी कृषि उत्पादकों को नए बाजार और बायोफ्यूल निर्यातकों को सहारा मिलेगा।​​</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इन समझौतों के बाद कमोडिटी बाजारों में जोरदार तेजी दिखी। सोयाबीन वायदा कीमतें 10% उछलीं और 15 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गईं, जबकि सोयमील में 15% की तेजी आई। विशेषज्ञों का मानना है कि ये सौदे वैश्विक कृषि व्यापार को पुनर्जीवित करने में मदद करेंगे। हालांकि उनका यह भी कहना है कि चीन के लिए अमेरिका की तुलना में ब्राजील का सोयाबीन सस्ता बना रहेगा।​ ब्राजीलियन सोयाबीन में प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">राष्ट्रपति ट्रंप के लिए इस डील का आर्थिक और राजनीतिक दोनों महत्व है। वर्ल्ड ग्रेन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सोयाबीन ट्रेड का फिर से शुरू होना 2025&ndash;26 मार्केटिंग साल की पहली बिक्री होग। इसमें चीन की COFCO कंपी दिसंबर-जनवरी शिपमेंट के लिए लगभग 180,000 टन की खरीद करेगी। वर्ष 2024 में चीन ने 12.6 अरब डॉलर का U.S. सोयाबीन खरीदा जो अमेरिका के कुल निर्यात का आधे से ज़्यादा था।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">मात्रा के लिहाज से चीन की खरीद की बहुत मामूली है, लेकिन इसका मतलब काफी बड़ा माना जा रहा है। विश्लेषकों को उम्मीद है कि बीजिंग 2026 के मध्य तक अपने स्ट्रेटेजिक रिज़र्व के लिए अमेरिका से सोयाबीन खरीदना जारी रखेगा। यह खरीद चार अरब डॉलर के आस पास हो सकती है। अमेरिकी ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव जैमीसन ग्रीर ने कहा कि ये डील दिखाती हैं कि अमेरिका किसानों और मैन्युफैक्चरर्स के लिए नए मार्केट खोलते हुए टैरिफ बनाए रख सकता है। </span></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ एशिया दौरे में अमेरिकी कृषि निर्यात को नई ताकत देने में सफल रहे ट्रंप ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[चीन की मांग में कमी, अमेरिका और कनाडा में नई फसल आने से विश्व बाजार में तिलहन की कीमतों पर दबाव]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/global-oilseed-prices-under-pressure-as-us-canada-harvests-rise-and-china-halts-key-imports.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 19 Oct 2025 19:58:59 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/global-oilseed-prices-under-pressure-as-us-canada-harvests-rise-and-china-halts-key-imports.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अमेरिका और कनाडा में तिलहन की फसल आने और चीन को घटते निर्यात ने हाल के हफ्तों में वैश्विक बाजारों में तिलहन कीमतों पर दबाव डाला है। भू-राजनीतिक कारणों ने भी इस रुझान को प्रभावित किया है। अमेरिकी टैरिफ के प्रतिक्रिया स्वरूप, चीन ने अमेरिकी सोयाबीन का आयात रोक दिया है, जबकि कनाडा द्वारा इलेक्ट्रिक वाहनों पर लगाए गए टैरिफ के जवाब में चीन ने कनाडाई रेपसीड आयात बंद कर दिया है।</p>
<p>इसी बीच, यूक्रेन ने सोयाबीन और रेपसीड पर 10% निर्यात कर लागू किया है, जिससे उसके शिपमेंट की रफ्तार धीमी हुई है। अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) के कीव स्थित दूतावास ने बताया कि निर्यातक अब किसानों से तिलहन की खरीद कीमतें घटा रहे हैं, ताकि वे नए करों का भुगतान कर सकें। वर्ल्ड ग्रेन की एक रिपोर्ट के अनुसार, यूरोपीय व्यापारियों ने भी नए सिस्टम की अनजान प्रक्रिया के कारण व्यापारिक गतिविधियों में मंदी की सूचना दी है।</p>
<p>अंतरराष्ट्रीय अनाज परिषद (International Grains Council - IGC) ने अपनी 18 सितंबर की रिपोर्ट में कहा कि खासकर अमेरिका और ब्राजील में मौसम और उत्पादन संबंधी चिंताओं के चलते वैश्विक निर्यात कीमतें मामूली रूप से बढ़ी हैं। शिकागो सोयाबीन वायदा में 20 अगस्त से अब तक 3% की बढ़त दर्ज की गई, जो मध्य-पश्चिम में प्रतिकूल मौसम से उत्पादन की चिंता को दर्शाती है। हालांकि इस बढ़त को चीन की कमजोर मांग ने बराबर कर दिया।&nbsp;</p>
<p>अमेरिका में सोया तेल कीमतों में मजबूती से एफओबी (FOB) कीमतें 1% बढ़कर 409 डॉलर तक पहुंची। ब्राजील की निर्यात मांग को विशेषकर चीन से समर्थन मिला। इसके अलावा स्थानीय स्तर पर जैव ईंधन उत्पादन में सोया तेल की बढ़ती खपत ने भी बाजार को सहारा दिया। पेरानागुआ पोर्ट पर निर्यात कीमतें साल-दर-साल 1% बढ़कर 448 डॉलर प्रति टन तक पहुंचीं।</p>
<p>दूसरी ओर, कनाडा में कैनोला वायदा कीमतों में 3% की मासिक गिरावट देखी गई। IGC के अनुसार, कटाई में तेजी, बेहतर उत्पादन अनुमानों और चीन की मांग में कमी की चिंताओं ने कीमतों पर दबाव डाला। वैंकूवर से रेपसीड की FOB कीमतें भी 23 डॉलर घटकर 479 डॉलर प्रति टन रह गईं।</p>
<p>संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) ने 5 सितंबर को जारी अपने फूड प्राइस इंडेक्स में बताया था कि अगस्त 2025 में वैश्विक वनस्पति तेल कीमतें जुलाई की तुलना में 1.4% अधिक रहीं और जुलाई 2022 के बाद अपने उच्चतम स्तर पर पहुंचीं। पाम, सूरजमुखी और रेपसीड तेल की बढ़ती कीमतों ने सोया तेल की मामूली गिरावट की भरपाई की।<br />FAO ने बताया कि इंडोनेशिया द्वारा 2026 में बायोडीजल ब्लेंडिंग अनुपात बढ़ाने की योजना से पाम तेल की कीमतों में लगातार तीसरे महीने वृद्धि हुई। वहीं, काला सागर क्षेत्र और यूरोप में आपूर्ति सीमित होने से सूरजमुखी और रेपसीड तेल के भाव भी बढ़े।</p>
<p>USDA की "ऑयल क्रॉप्स आउटलुक" रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका का सोयाबीन निर्यात धीमा रहा है क्योंकि ब्राजील और अर्जेंटीना ने अक्टूबर-दिसंबर के पीक सीजन में बड़े पैमाने पर शिपमेंट किए हैं। चीन ने अगस्त से कनाडा के रेपसीड और मार्च 2025 से रेपसीड उत्पादों पर टैरिफ लगा दिए हैं, जिससे वहां की क्रशिंग गतिविधियां घटी हैं।</p>
<p>रिपोर्ट के अनुसार, चीन अब कनाडा से कम रेपसीड आयात करेगा और रूस व भारत जैसे देशों से अधिक रेपसीड मील (meal) खरीदने की संभावना है। इससे वैश्विक तिलहन व्यापार पर आने वाले महीनों में और दबाव रह सकता है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ चीन की मांग में कमी, अमेरिका और कनाडा में नई फसल आने से विश्व बाजार में तिलहन की कीमतों पर दबाव ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[एग्रीवोल्टेक: खेती और सौर ऊर्जा का संगम बढ़ाएगा किसानों की आमदनी, भूमि का बेहतर उपयोग भी संभव]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/agrivoltaics-offers-dual-benefits-boosting-farm-income-and-clean-energy-generation.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 19 Oct 2025 19:39:12 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/agrivoltaics-offers-dual-benefits-boosting-farm-income-and-clean-energy-generation.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>एग्रीवोल्टेक यानी कृषि और सौर ऊर्जा उत्पादन का संयोजन खेती और स्वच्छ ऊर्जा के बीच संतुलन बनाने का एक टिकाऊ मॉडल बनकर उभर रहा है। इस प्रणाली में एक ही भूमि पर फसलें उगाई जाती हैं और सौर पैनलों से बिजली उत्पन्न की जाती है, जिससे भूमि का बेहतर उपयोग संभव होता है और किसानों की आय के नए रास्ते खुलते हैं।</p>
<p>अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) के अनुसार एग्रीवोल्टेक प्रणाली में फसलों, चरागाहों या वनस्पति के साथ सौर पैनल लगाए जाते हैं, जो रिन्यूएबल एनर्जी उत्पन्न करते हैं। हाल के वर्षों में भूमि उपयोग की चिंताओं ने इस दोहरे उपयोग की अवधारणा पर वैश्विक शोध को तेज किया है।</p>
<p>फ्राउनहोफर इंस्टीट्यूट फॉर सोलर एनर्जी सिस्टम्स के अनुसार, वैश्विक एग्रीवोल्टेक क्षमता 2012 में मात्र 5 मेगावाट थी जो 2021 में बढ़कर 14 गीगावाट तक पहुंच गई। वर्ल्ड ग्रेन की एक रिपोर्ट के मुताबिक अकेले अमेरिका में 2.8 गीगावाट से अधिक की एग्रीवोल्टेक परियोजनाएं हैं, जिनमें से अधिकतर पशुपालन या बागवानी के साथ संयोजन में हैं। यूरोप और एशिया भी इस दिशा में तेजी से बढ़ रहे हैं। फ्रांस 2026 से हर साल 2 गीगावाट तक की नई एग्रीवोल्टेक परियोजनाएं जोड़ने की योजना बना रहा है। चीन में भी इस दिशा में कदम बढ़ाए जा रहे हैं।</p>
<p>विशेषज्ञों का कहना है कि एग्रीवोल्टेक किसानों को जलवायु परिवर्तन से निपटने और आय में विविधता लाने में मदद कर सकता है। सौर पैनल मिट्टी से पानी के वाष्पीकरण को कम करते हैं, जिससे सिंचाई की जरूरत घटती है और फसलों को सूखे या अत्यधिक गर्मी में सुरक्षा मिलती है। यूनिवर्सिटी ऑफ इलिनॉय और कोलोराडो स्टेट यूनिवर्सिटी के अध्ययनों के अनुसार इस मॉडल से भूमि उपयोग दक्षता 110 से 130 प्रतिशत तक बढ़ाई जा सकती है।</p>
<p>आर्थिक रूप से भी यह मॉडल फायदेमंद है। पोलैंड के एक अध्ययन में पाया गया कि एग्रीवोल्टेक से होने वाली वार्षिक आमदनी पारंपरिक गेहूं खेती की तुलना में 15 गुना अधिक हो सकती है। हालांकि ऊंचे पैनलों की स्थापना, उपकरण लागत और कुछ फसलों में पैनल की छाया से उपज में कमी जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं।</p>
<p>इसके बावजूद विशेषज्ञ मानते हैं कि दीर्घकालिक लाभ लागत से कहीं अधिक हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ इलिनॉय के ब्रूस ब्रानहम के अनुसार, &ldquo;अगर हम एक ही भूमि से भोजन और ऊर्जा दोनों प्राप्त करें, तो भूमि उपयोग की दक्षता 50 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। यह भविष्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऊर्जा की बढ़ती मांग और सीमित कृषि भूमि के बीच, एग्रीवोल्टेक आने वाले वर्षों में टिकाऊ और संतुलित विकास का आधार बन सकता है।&rdquo;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ एग्रीवोल्टेक: खेती और सौर ऊर्जा का संगम बढ़ाएगा किसानों की आमदनी, भूमि का बेहतर उपयोग भी संभव ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[अमेरिकी कृषि क्षेत्र के सामने बढ़ते व्यापार घाटे और डेटा ब्लैकआउट का संकट, चीन के साथ तनाव भी बढ़ा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/u.s.-farm-sector-faces-mounting-trade-deficit-and-data-blackout-amid-renewed-strains-with-china.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 12 Oct 2025 11:49:55 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/u.s.-farm-sector-faces-mounting-trade-deficit-and-data-blackout-amid-renewed-strains-with-china.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><!--StartFragment --></p>
<p><span class="cf0">अमेरिका</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">का</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">कृषि</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">क्षेत्र</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">हाल</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">के</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">इतिहास</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">में</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">अपने</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">सबसे</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">अशांत</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">दौर</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">से</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">गुजर</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">रहा</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">है</span><span class="cf0">। </span><span class="cf0">नए</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">शोध</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">से</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">पता</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">चला</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">है</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">कि</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">उसका</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">कृषि</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">व्यापार</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">घाटा</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">बढ़</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">रहा</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">है</span><span class="cf0">, </span><span class="cf0">जबकि</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">सरकारी</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">कामकाज</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">ठप</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">होने</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">से</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">महत्वपूर्ण</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">बाजार</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">आंकड़े</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">जारी</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">नहीं</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">हो</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">पा</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">रहे</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">हैं</span><span class="cf0">। </span><span class="cf0">इन</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">दोनों</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">घटनाओं</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">ने</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">किसानों</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">और</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">वैश्विक</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">कमोडिटी</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">व्यापारियों</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">को</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">अनिश्चितता</span><span class="cf0">, </span><span class="cf0">आपूर्ति</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">में</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">व्यवधान</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">और</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">बढ़ते</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">प्रतिस्पर्धी</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">दबावों</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">से</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">जूझने</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">पर</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">मजबूर</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">कर</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">दिया</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">है</span><span class="cf0">।</span></p>
<p><span class="cf0">इलिनोइस</span><span class="cf0"> विश्वविद्यालय के एक </span><span class="cf0">हालिया</span><span class="cf0"> अध्ययन से पता चला है कि अमेरिका, जो कभी प्रमुख कृषि निर्यातक था, अब बढ़ते व्यापार घाटे में फंस गया है। वर्ष 2025 के अंत तक घाटा 49 अरब डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है। साथ ही, लंबे समय तक </span><span class="cf0">संघीय</span><span class="cf0"> सरकार के बंद रहने से प्रमुख कृषि रिपोर्ट रुक गई हैं। इससे </span><span class="cf0">शरद</span><span class="cf0"> ऋतु की फसल के चरम पर बाजारों को उत्पादन, निर्यात और कीमतों पर महत्वपूर्ण </span><span class="cf0">अपडेट</span><span class="cf0"> नहीं मिल पा रहे हैं।</span></p>
<p><span class="cf0">ये दोहरे झटके</span><span class="cf2">&mdash;</span><span class="cf0">निर्यात में कमी और आंकड़ों का अभाव</span><span class="cf2">&mdash;</span><span class="cf0">अमेरिकी कृषि के सामने मौजूद चुनौतियों को रेखांकित करते हैं। इन </span><span class="cf0">सबके</span><span class="cf0"> अलावा </span><span class="cf0">ट्रेड</span><span class="cf0"> वार, खासकर चीन के साथ लंबे समय से चली आ रही आपूर्ति श्रृंखलाओं और वैश्विक बाजार के विश्वास को बाधित कर रहे हैं।</span></p>
<p><strong><span class="cf0">निर्यात स्थिर, घाटा बढ़ा</span></strong></p>
<p><span class="cf0">इलिनोइस</span><span class="cf0"> विश्वविद्यालय के </span><span class="cf0">विलियम</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">रिडले</span><span class="cf0"> और </span><span class="cf0">टेक्सास</span><span class="cf0"> टेक विश्वविद्यालय के </span><span class="cf0">स्टीफन</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">डेवडॉस</span><span class="cf0"> के अध्ययन के अनुसार, अमेरिका मक्का, </span><span class="cf0">सोयाबीन</span><span class="cf0"> और कपास जैसी प्रमुख वस्तुओं का शीर्ष उत्पादक बना हुआ है, लेकिन निर्यात में वृद्धि रुक ​​गई है। पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका कृषि वस्तुओं के शुद्ध निर्यातक से शुद्ध </span><span class="cf0">आयातक</span><span class="cf0"> बन गया है। यह ऐसा उलटफेर है जो हाल के दशकों में नहीं देखा गया था।</span></p>
<p><span class="cf0">विश्लेषण में इस गिरावट का कारण लगातार व्यापार संघर्ष, बदलती वैश्विक मांग और </span><span class="cf0">ब्राजील</span><span class="cf0">, </span><span class="cf0">कनाडा</span><span class="cf0">, </span><span class="cf0">ऑस्ट्रेलिया</span><span class="cf0"> तथा </span><span class="cf0">यूक्रेन</span><span class="cf0"> जैसे देशों से कड़ी प्रतिस्पर्धा को बताया गया है। हालांकि अमेरिका की उत्पादकता स्थिर बनी हुई है, लेकिन प्रतिद्वंद्वियों ने दक्षता, </span><span class="cf0">लॉजिस्टिक्स</span><span class="cf0"> और निर्यात ढांचे में सुधार किया है। खास </span><span class="cf0">तौर</span><span class="cf0"> पर </span><span class="cf0">ब्राजील</span><span class="cf0"> ने दुनिया के सबसे बड़े </span><span class="cf0">सोयाबीन</span><span class="cf0"> निर्यातक के रूप में अमेरिका को पीछे छोड़ दिया है। चीन द्वारा अमेरिकी किसानों से खरीदे जाने वाले </span><span class="cf0">सोयाबीन</span><span class="cf0"> का अधिकांश हिस्सा अब </span><span class="cf0">ब्राजील</span><span class="cf0"> ही आपूर्ति करता है।</span></p>
<p><span class="cf0">शोध में कहा गया है कि 2020 के "पहले चरण" के व्यापार समझौते के बाद भी, जिसने अमेरिका-चीन कृषि व्यापार को अस्थायी रूप से पुनर्जीवित किया, निर्यात फिर से गिर गया। चीन ने अमेरिकी </span><span class="cf0">सोयाबीन</span><span class="cf0">, मक्का, कपास और ज्वार खरीदना लगभग बंद कर दिया है। इसके बजाय वह दक्षिण अमेरिकी </span><span class="cf0">आपूर्तिकर्ताओं</span><span class="cf0"> की ओर रुख कर रहा है। वर्तमान पूर्वानुमान अमेरिका के फसल निर्यात में </span><span class="cf0">निरंतर</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">गिरावट</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">दिखाते</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">हैं</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">और</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">संभावित</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">टैरिफ</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">समायोजन</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">के</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">बावजूद</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">सुधार</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">की</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">संभावनाएं</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">सीमित</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">हैं</span><span class="cf0">।</span></p>
<p><strong><span class="cf0">अमेरिका-चीन</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">ट्रेड</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">वार</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">का</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">प्रभाव</span></strong></p>
<p><span class="cf0">अमेरिका-चीन व्यापार विवाद से अमेरिकी किसानों को अरबों का नुकसान हुआ है। अकेले 2017 और 2018 के बीच, चीन को अमेरिका से </span><span class="cf0">सोयाबीन</span><span class="cf0"> निर्यात में 73 </span><span class="cf0">प्रतिशत</span><span class="cf0"> (लगभग 9 अरब डॉलर) की गिरावट आई, जबकि गेहूं और मक्के के निर्यात में क्रमशः 67 </span><span class="cf0">प्रतिशत</span><span class="cf0"> और 61 </span><span class="cf0">प्रतिशत</span><span class="cf0"> की गिरावट आई है। कुल मिलाकर, इस अवधि में चीन को कृषि निर्यात में लगभग 14 अरब डॉलर की गिरावट आई।</span></p>
<p><span class="cf0">इस वर्ष व्यापार तनाव और गहरा गया है। चीनी जहाजों पर अमेरिकी शुल्कों के जवाब में चीन ने पिछले हफ्ते अमेरिका से जुड़े जहाजों पर अतिरिक्त बंदरगाह शुल्क लगाने की घोषणा की है। 14 </span><span class="cf0">अक्टूबर</span><span class="cf0"> से प्रभावी नए शुल्क अमेरिकी संस्थाओं के स्वामित्व वाले, निर्मित या संचालित जहाजों पर लागू होंगे। यह शुल्क 2028 तक 1,120 </span><span class="cf0">युआन</span><span class="cf0"> प्रति टन से अधिक हो सकते हैं, जिससे </span><span class="cf0">शिपिंग</span><span class="cf0"> लागत बढ़ जाएगी और कृषि व्यापार प्रवाह पर और दबाव पड़ेगा।</span></p>
<p><span class="cf0">विश्लेषकों का कहना है कि यह कदम </span><span class="cf0">वाशिंगटन</span><span class="cf0"> के व्यापार रुख के प्रति बीजिंग के निरंतर असंतोष का संकेत देता है और इस संभावना को पुष्ट करता है कि चीन अमेरिकी कृषि उत्पादों की खरीद घटाना जारी रखेगा। टैरिफ और माल ढुलाई बाधाओं के साथ, इस नीति से मौजूदा कृषि व्यापार असंतुलन बढ़ने और वैश्विक अनाज बाजारों में अमेरिकी </span><span class="cf0">प्रतिस्पर्धात्मकता</span><span class="cf0"> कमजोर होने की आशंका है।</span></p>
<p><strong><span class="cf0">किसान और व्यापारी </span><span class="cf0">डेटा</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">ब्लैकआउट</span><span class="cf0"> से प्रभावित</span></strong></p>
<p><span class="cf0">व्यापार चुनौतियों को और बढ़ाते हुए अमेरिकी कृषि विभाग (</span><span class="cf1">USDA) </span><span class="cf0">ने </span><span class="cf0">फेडरल</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">शटडाउन</span><span class="cf0"> के कारण महत्वपूर्ण रिपोर्टों - जिनमें साप्ताहिक निर्यात बिक्री, फसल </span><span class="cf0">अपडेट</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">और</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">मासिक</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">विश्व</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">कृषि</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">आपूर्ति</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">और</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">मांग</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">अनुमान</span><span class="cf0"> (</span><span class="cf0">डब्ल्यूएएसडीई</span><span class="cf0">) </span><span class="cf0">शामिल</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">हैं</span><span class="cf0"> - </span><span class="cf0">का</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">प्रकाशन</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">रोक</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">दिया</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">है</span><span class="cf0">। </span><span class="cf0">यूएसडीए</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">की</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">अनुपस्थिति</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">ने</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">उद्योग</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">को</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">मक्का</span><span class="cf0">, </span><span class="cf0">सोयाबीन</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">और</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">पशुधन</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">जैसी</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">वस्तुओं</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">की</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">कीमत</span><span class="cf0">, </span><span class="cf0">हेजिंग</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">और</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">प्रबंधन</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">के</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">लिए</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">उपयोग</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">किए</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">जाने</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">वाले</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">प्राथमिक</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">आंकड़ों</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">से</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">वंचित</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">कर</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">दिया</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">है</span><span class="cf0">।</span></p>
<p><span class="cf0">फसल चक्र के एक महत्वपूर्ण समय पर </span><span class="cf0">शटडाउन</span><span class="cf0"> ने सामान्य व्यापारिक </span><span class="cf0">पैटर्न</span><span class="cf0"> को बाधित कर दिया है। फसल की प्रगति, पैदावार या निर्यात मात्रा के सत्यापित आंकड़े न होने के कारण, व्यापारी बाजार की दिशा जानने के लिए उपग्रह चित्रों, निजी अनुमानों और किसानों के साथ अनौपचारिक बातचीत पर निर्भर हैं। </span></p>
<p><span class="cf0">निजी </span><span class="cf0">डेटा</span><span class="cf0"> नेटवर्क वाले </span><span class="cf0">कारगिल</span><span class="cf0">, </span><span class="cf0">बंगे</span><span class="cf0"> और </span><span class="cf0">आर्चर-डैनियल्स-मिडलैंड</span><span class="cf0"> जैसे प्रमुख कृषि </span><span class="cf0">बिजनेस</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">यूएसडीए</span><span class="cf0"> की सार्वजनिक जानकारी पर निर्भर रहने वाले छोटे व्यापारियों पर बढ़त हासिल कर सकते हैं। इन परिस्थितियों में अनाज वायदा में व्यापार की मात्रा में गिरावट आई है क्योंकि निवेशक सट्टा बाजार गतिविधि पर </span><span class="cf0">कमोडिटी</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">फ्यूचर्स</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">ट्रेडिंग</span><span class="cf0"> कमीशन के साप्ताहिक आंकड़ों के बिना </span><span class="cf0">पोजीशन</span><span class="cf0"> लेने से हिचकिचाते हैं।</span></p>
<p><span class="cf0">यूएसडीए</span><span class="cf0"> के आधिकारिक आंकड़ों के अभाव में, विश्लेषकों को डर है कि नियमित </span><span class="cf0">डेटा</span><span class="cf0"> जारी होने पर कीमतों में विकृतियां और अस्थिरता बढ़ सकती है। विशेष रूप से, </span><span class="cf1">WASDE </span><span class="cf0">रिपोर्ट की अनुपस्थिति, वैश्विक बाजारों को अमेरिकी उत्पादन और वैश्विक मांग के रुझानों के बारे में </span><span class="cf0">अपडेट</span><span class="cf0"> से वंचित करती है जो </span><span class="cf0">शिकागो</span><span class="cf0"> से </span><span class="cf0">शंघाई</span><span class="cf0"> तक कीमतों को प्रभावित करते हैं।</span></p>
<p><strong><span class="cf0">बढ़ते जोखिम और वैश्विक प्रभाव</span></strong></p>
<p><span class="cf0">बढ़ते व्यापार घाटे और </span><span class="cf0">संघीय</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">डेटा</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">ब्लैकआउट</span><span class="cf0"> ने अमेरिकी कृषि प्रणाली की कमजोरियों को उजागर कर दिया है। किसानों को कम कीमतों, कमजोर निर्यात मांग और भविष्य की नीतियों व बाजार पहुंच को लेकर बढ़ती अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है। </span></p>
<p><span class="cf0">अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एशिया, दक्षिण अमेरिका और यूरोप के व्यापारियों के पास वैकल्पिक </span><span class="cf0">डेटा</span><span class="cf0"> स्रोत हैं, जिससे विदेशों में इसका प्रभाव कम होता है। हालांकि अमेरिका के लिए, समय पर और पारदर्शी </span><span class="cf0">डेटा</span><span class="cf0"> का अभाव कृषि संबंधी जानकारी के लिए एक वैश्विक मानक के रूप में उसकी भूमिका को कमजोर करता है।</span></p>
<p><span class="cf0">यह </span><span class="cf0">डेटा</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">ब्लैकआउट</span><span class="cf0"> जितना लंबा चलेगा, बाजार की जानकारी और व्यापार प्रणालियों में विश्वास बहाल करना उतना ही मुश्किल होगा। विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि जब </span><span class="cf0">डेटा</span><span class="cf0"> प्रकाशन फिर से शुरू होगा, तो निजी और आधिकारिक अनुमानों के बीच </span><span class="cf0">विसंगतियां</span><span class="cf0"> बाजारों को झकझोर सकती हैं, जिससे कीमतों में अचानक उतार-चढ़ाव आ सकता है।</span></p>
<p><strong><span class="cf0">आगे क्या उम्मीद</span></strong></p>
<p><span class="cf0">अमेरिकी राष्ट्रपति </span><span class="cf0">डोनाल्ड</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">ट्रंप</span><span class="cf0"> दक्षिण कोरिया में होने वाले एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग (</span><span class="cf1">APEC) </span><span class="cf0">शिखर सम्मेलन में चीनी नेता </span><span class="cf0">शी</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">जिनपिंग</span><span class="cf0"> से मिलने की तैयारी कर रहे हैं। ऐसे में वैश्विक कृषि क्षेत्र किसी भी सुलह के संकेत पर कड़ी नजर रखेगा। लेकिन टैरिफ, माल ढुलाई शुल्क और खोए हुए विश्वास के संयुक्त संकट को देखते हुए व्यापार संबंधों में शीघ्र सुधार की उम्मीद कम ही लोग कर रहे हैं।</span></p>
<p><span class="cf0">फिलहाल अमेरिकी किसान और व्यापारी अनिश्चितता की स्थिति में हैं। वे घरेलू स्तर पर आंकड़ों की कमी और विदेशों में घटती मांग के बीच फंसे हुए। नीतिगत निष्क्रियता और बाजार </span><span class="cf0">रिएलाइनमेंट</span><span class="cf0"> ने अमेरिकी कृषि अर्थव्यवस्था को एक अनिश्चित रास्ते पर ला खड़ा किया है, और इसकी प्रभावशाली वैश्विक बढ़त लगातार खतरे में है।</span></p>
<p><!--EndFragment --></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/10/image_750x500_68eb47fc58183.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ अमेरिकी कृषि क्षेत्र के सामने बढ़ते व्यापार घाटे और डेटा ब्लैकआउट का संकट, चीन के साथ तनाव भी बढ़ा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[बांग्लादेश में 50 हजार टन चावल निर्यात के लिए भारतीय कंपनी ने लगाई सबसे कम बोली]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/bangladesh-approves-import-of-50000-metric-tons-of-rice-from-india.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 08 Oct 2025 19:41:11 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/bangladesh-approves-import-of-50000-metric-tons-of-rice-from-india.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><strong>बांग्लादेश सरकार</strong> ने भारत की एक निजी कंपनी से 50,000 टन गैर बासमती चावल आयात की मंजूरी दे दी है। साथ ही संयुक्त राज्य अमेरिका से बांग्लादेश 2,20,000 टन गेहूं का आयात करेगा। बांग्लादेश द्वारा भारत से लगातार चावल आयात कर रहा है। यह आयात वैश्विक बाजार में जारी आयात टेंडरों के जरिये हो रहा है। इस साल बांग्लादेश द्वारा करीब चार लाख टन चावल का आयात किया जाएगा। जिस टेंडर को मंजूरी मिली है वह 50 हजार टन चावल आयात के लिए&nbsp; जारी किया गया है।&nbsp; &nbsp;&nbsp;</p>
<p>बांग्लादेश की सरकारी खरीद सलाहकार परिषद समिति (एसीसीजीपी) की बैठक में इस प्रस्ताव को मंज़ूरी दी गई।&nbsp;बांग्लादेश में हाल के महीनों में बाढ़ और अनियमित मानसून के कारण धान उत्पादन में आई गिरावट के मद्देनजर भारत से चावल आयत करने का निर्णय लिया है। इसका फायदा भारत के चावल निर्यातकों को मिलेगा।&nbsp;</p>
<p>सूत्रों के अनुसार, आयात की यह खेप दिसंबर 2025 तक चरणबद्ध रूप से बांग्लादेश पहुंचेगी। चावल की प्रति टन खरीद कीमत 359.77 डॉलर तय की गई है। सबसे कम बोली लगाने वाली भारतीय कंपनी <strong>बगरिया ब्रदर्स प्राइवेट लिमिटेड</strong> को इस अनुबंध के लिए चुना गया है। बांग्लादेश को चावल निर्यात का बड़ा हिस्सा पश्चिम बंगाल के निर्यातकों को मिलेगा। इससे कई गैर-बासमती चावल किस्मों की कीमतों में वृद्धि देखी गई है।&nbsp;</p>
<p>हाल के महीनों में बांग्लादेश में खाद्य मुद्रास्फीति की समस्या का सामना करना पड़ा है, जिसमें चावल की कीमतों में वृद्धि एक प्रमुख कारण रही है। भारत से चावल आयात का यह निर्णय घरेलू बाजार में स्थिरता लाने में सहायक साबित हो सकता है। यह कदम घरेलू उत्पादन या सरकारी खरीद में कमी के संभावित खतरों से निपटने के लिए बफर स्टॉक तैयार करने की रणनीति का हिस्सा है।</p>
<p>इससे स्पष्ट होता है कि बांग्लादेश सरकार खाद्य सुरक्षा और आपूर्ति स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्रोतों पर भरोसा कर रही है और आवश्यकतानुसार कदम उठा रही है। बाग्लादेश सरकार के इस फैसले से भारत में चावल निर्यात की मांग बढ़ने की उम्मीद है।</p>
<p>&nbsp;</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/10/image_750x500_68e670bd9f4e7.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ बांग्लादेश में 50 हजार टन चावल निर्यात के लिए भारतीय कंपनी ने लगाई सबसे कम बोली ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[भारत के गैर&amp;#45;बासमती चावल निर्यात को म्यांमार और पाकिस्तान ने किया मुश्किल]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/myanmar-and-pakistan-have-made-it-difficult-for-indian-non-basmati-rice-exports..html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 07 Oct 2025 11:53:59 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/myanmar-and-pakistan-have-made-it-difficult-for-indian-non-basmati-rice-exports..html</guid>
        <description><![CDATA[ <p data-start="211" data-end="617">भारत के 200 लाख टन गैर-बासमती चावल निर्यात की उम्मीदों पर म्यांमार और पाकिस्तान का सस्ता चावल पानी फेरता नजर आ रहा है। फसल वर्ष 2024-25 में गैर-बासमती चावल का निर्यात <strong data-start="381" data-end="410">150 लाख टन पर अटक सकता है</strong>। उद्योग सूत्रों के अनुसार, जुलाई तक के आंकड़ों के मुताबिक, गैर-बासमती चावल का निर्यात <strong data-start="496" data-end="510">135 लाख टन</strong> रहा है और यह सितंबर के अंत तक यह&nbsp;<strong data-start="541" data-end="555">150 लाख टन</strong> तक पहुंच सकता है। अक्टूबर से नया विपणन वर्ष शुरू हो गया है।</p>
<p data-start="619" data-end="902">भारत <strong data-start="624" data-end="645">366 डॉलर प्रति टन</strong> की दर से गैर-बासमती चावल के सौदे ऑफर कर रहा है, जबकि <strong data-start="699" data-end="729">म्यांमार </strong>309 डॉलर प्रति टन और <strong data-start="733" data-end="771">पाकिस्तान </strong>320 से 325 डॉलर प्रति टन की दर से निर्यात सौदे कर रहा है। ऐसे में भारतीय निर्यातकों के लिए 366 डॉलर प्रति टन की ऊंची कीमत पर सौदे करना मुश्किल हो गया है।</p>
<p data-start="904" data-end="1178">बाजार सूत्रों के मुताबिक, वैश्विक बाजार में कीमतों की यह प्रतिस्पर्धा भारत के उस रुख के कारण बनी है, जिसमें <strong data-start="1006" data-end="1035">200 लाख टन (20 मिलियन टन)</strong> चावल के निर्यात का परोक्ष लक्ष्य तय किया गया था। इसके चलते वैश्विक बाजार में अधिक आपूर्ति की आशंका बनी और कीमतों में गिरावट का दबाव बढ़ गया।</p>
<p data-start="1180" data-end="1595">इसके साथ ही सरकार ने एक अधिसूचना जारी कर <strong data-start="1221" data-end="1334">गैर-बासमती चावल </strong>के निर्यात सौदों का <strong>पंजीकरण</strong> एग्रीकल्चरल एंड प्रोसेस्ड फूड एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी (APEDA) में अनिवार्य कर दिया है। अब सभी गैर-बासमती चावल निर्यात सौदों का पंजीकरण आवश्यक होगा। अभी तक यह शर्त केवल बासमती चावल के लिए लागू थी, जबकि गैर-बासमती चावल के लिए ऐसी कोई बाध्यता नहीं थी। सूत्रों के अनुसार, इस पंजीकरण पर <strong data-start="1555" data-end="1575">8 रुपये प्रति टन</strong> शुल्क लिया जाएगा।</p>
<p data-start="1597" data-end="2164">भारत का अधिकांश गैर-बासमती चावल निर्यात एशियाई और अफ्रीकी देशों को होता है, जबकि उच्च गुणवत्ता वाला बासमती चावल मध्य पूर्व, यूरोप, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड भेजा जाता है। गैर-बासमती चावल की मांग गरीब <strong>अफ्रीकी देशों </strong>में अधिक रहती है। सूत्रों का कहना है कि इन देशों के लिए कीमत में मामूली अंतर भी बहुत मायने रखता है। ऐसे में म्यांमार के मुकाबले करीब 57 डॉलर और पाकिस्तान के मुकाबले 30&ndash;35 डॉलर महंगा भारतीय चावल वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी नहीं रह पाता और इसका असर निर्यात पर पड़ सकता है।</p>
<p data-start="2166" data-end="2323">साथ ही, <strong>पाकिस्तान</strong> का रुपया और <strong>म्यांमार</strong> की मुद्रा भारतीय रुपये की तुलना में डॉलर के मुकाबले कमजोर है, जिससे इन देशों के लिए यह सौदा और भी लाभकारी बन गया है।</p>
<p data-start="2325" data-end="2850">वर्ष 2024-25 के दौरान देश में चावल का<strong> रिकॉर्ड 1490 लाख टन </strong>उत्पादन होने का अनुमान है। केंद्रीय पूल में भी स्टॉक रिकॉर्ड स्तर पर है। दूसरी ओर, नए खरीफ विपणन सीजन (2025-26) की धान खरीद शुरू हो चुकी है। अधिक उत्पादन को सरकारी स्टॉक में रखना अब एक चुनौती बनता जा रहा है। ऐसे में बेहतर निर्यात संभावनाएं निजी क्षेत्र को बाजार से धान खरीद के लिए सक्रिय कर सकती हैं, लेकिन यदि वैश्विक बाजार अनुकूल नहीं रहा तो निजी क्षेत्र की सक्रियता प्रभावित होना तय है। आने वाले समय में चावल कारोबार की गतिविधियां सरकार और किसानों दोनों के लिए अहम साबित होने वाली हैं।</p>
<p data-start="2325" data-end="2850"></p>
<p data-start="2325" data-end="2850"></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/10/image_750x500_68e4c8da4e7b7.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ भारत के गैर-बासमती चावल निर्यात को म्यांमार और पाकिस्तान ने किया मुश्किल ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[वर्ष 2025 में वैश्विक अनाज उत्पादन रिकॉर्ड 2.97 अरब टन तक पहुंचने का अनुमानः FAO]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/global-cereal-output-set-to-hit-record-2.97-billion-tonnes-in-2025-fao.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 05 Oct 2025 23:31:24 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/global-cereal-output-set-to-hit-record-2.97-billion-tonnes-in-2025-fao.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) ने वर्ष 2025 के लिए वैश्विक अनाज उत्पादन का अनुमान 101 लाख टन बढ़ाकर 2.971 अरब टन कर दिया है। यह पिछले वर्ष की तुलना में 3.8% की वृद्धि है और 2013 के बाद से सबसे बड़ी वार्षिक वृद्धि है। गेहूं, मक्का और चावल उत्पादन में वृद्धि इस रिकॉर्ड का मुख्य कारण है।</p>
<p><strong>गेहूं और मोटे अनाज बने वृद्धि के प्रमुख कारण</strong></p>
<p>वैश्विक गेहूं उत्पादन 2025 में 80.97 करोड़ टन तक पहुंचने का अनुमान है, जो 2024 की तुलना में 1.3% अधिक है। ऑस्ट्रेलिया, यूरोपीय यूनियन और रूस में बेहतर मौसम और उपज इस वृद्धि में मुख्य भूमिका निभा रहे हैं। मोटे अनाज &nbsp;का उत्पादन 1.605 अरब टन तक पहुंचने की उम्मीद है, जो पिछले वर्ष से 917 लाख टन अधिक है। ब्राजील में बेहतर मक्का उपज, चीन और अमेरिका में भी अधिक उत्पादन अनुमान इस वृद्धि के प्रमुख कारण हैं।</p>
<p>अमेरिका का मक्का उत्पादन 42.71 करोड़ टन तक पहुंचने की उम्मीद है, जो अब तक का सबसे अधिक होगा और यह वैश्विक उत्पादन का एक-तिहाई होगा। यह 2016 के बाद सबसे अधिक हिस्सा भी होगा।</p>
<p>यूरोपीय यूनियन और मैक्सिको में मौसम के कारण उपज में कुछ कमी के बावजूद, जौ और ज्वार के उत्पादन पूर्वानुमान में सुधार हुआ है। चावल का उत्पादन 55.64 करोड़ टन तक पहुंचने की उम्मीद है। भारत में खरीफ फसलों की बेहतर बुवाई ने पाकिस्तान में बाढ़ से हुई हानि की भरपाई कर दी है।</p>
<p><strong>उपयोग और भंडार ऐतिहासिक स्तर पर</strong></p>
<p>वर्ष 2025-26 में वैश्विक अनाज उपयोग 2.93 अरब टन तक पहुंचने का अनुमान है, जो अब तक का सबसे अधिक स्तर है। मक्का और जौ के पशु चारे और औद्योगिक उपयोग में वृद्धि मुख्य कारण हैं। गेहूं की खपत 80.42 करोड़ टन तक पहुंचने की उम्मीद है, जो जनसंख्या वृद्धि के कारण होगी। चावल की खपत 55.08 करोड़ टन रहने का अनुमान है। गेहूं और चावल दोनों का उपयोग रिकॉर्ड स्तर पर होगा।</p>
<p>वैश्विक अनाज भंडार 2026 के अंत तक 90.02 करोड़ टन तक पहुंचने की उम्मीद है, जिससे स्टॉक-टू-यूज़ अनुपात 30.6% पर स्थिर रहेगा। गेहूं भंडार में 24 लाख टन की वृद्धि होगी, जबकि मक्का भंडार अमेरिका और ब्राजील में बढ़ेगा। चावल का भंडार 21.56 करोड़ टन तक पहुंच सकता है, जो अब तक का सबसे अधिक होगा।</p>
<p><strong>अनाज व्यापार में भी मजबूत रुझान</strong></p>
<p>वर्ष 2025-26 में वैश्विक अनाज व्यापार 2.5% बढ़कर 49.71 करोड़ टन तक पहुंचने का अनुमान है। गेहूं व्यापार 4.9% बढ़कर 20.21 करोड़ टन तक पहुंच सकता है। ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका से प्रचुर आपूर्ति और प्रतिस्पर्धी कीमतों से निर्यात में वृद्धि होगी। मोटे अनाज व्यापार में भी 29 लाख टन वृद्धि की उम्मीद है, जबकि वैश्विक मक्का व्यापार 18.99 करोड़ टन पर स्थिर रहने की संभावना है।&nbsp;हालांकि चावल व्यापार 1.8% घटकर 601 लाख टन रहने का अनुमान है क्योंकि आयातक देश स्थानीय फसलों और पहले किए गए बड़े पैमाने पर खरीद पर निर्भर रहेंगे।</p>
<p><strong>वैश्विक खाद्य आपूर्ति की स्थिति स्थिर</strong></p>
<p>उत्पादन, खपत और भंडारण के ऐतिहासिक स्तरों के साथ, FAO का कहना है कि वैश्विक अनाज बाजार स्थिर बना रहेगा। मक्का और चावल की पर्याप्त उपलब्धता से खाद्य सुरक्षा को मजबूती मिलेगी और बाजार में उतार-चढ़ाव कम होगा। जलवायु परिवर्तन और व्यापार पैटर्न में बदलाव जैसी चुनौतियों के बावजूद, कृषि क्षेत्र का लचीलापन वैश्विक खाद्य मांग को पूरा करने में सक्षम साबित हो रहा है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ वर्ष 2025 में वैश्विक अनाज उत्पादन रिकॉर्ड 2.97 अरब टन तक पहुंचने का अनुमानः FAO ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[सितंबर में वैश्विक खाद्य कीमतों में गिरावट, डेयरी और चीनी में सबसे तेज कमी: FAO]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/global-food-prices-dip-in-september-as-dairy-and-sugar-lead-decline-fao.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 05 Oct 2025 23:15:47 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/global-food-prices-dip-in-september-as-dairy-and-sugar-lead-decline-fao.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार सितंबर 2025 में वैश्विक खाद्य वस्तुओं की कीमतों में मामूली गिरावट दर्ज की गई है। डेयरी और चीनी की कीमतों में तेज गिरावट रही। FAO फूड प्राइस इंडेक्स (FFPI) सितंबर में औसतन 128.8 अंक पर रहा, जो अगस्त के संशोधित 129.7 अंक से कम है। हालांकि कीमतें पिछले वर्ष की तुलना में 3.4% अधिक रहीं, वे मार्च 2022 में दर्ज उच्चतम स्तर से लगभग 20% नीचे हैं। कुल मिलाकर यह गिरावट अनाज, डेयरी, चीनी और वनस्पति तेल जैसी प्रमुख खाद्य श्रेणियों में आई कमी से प्रेरित रही।</p>
<p><strong>उपलब्धता बढ़ने से अनाज कीमतों में गिरावट&nbsp;</strong><br />FAO अनाज मूल्य सूचकांक औसतन 105.0 अंक पर रहा, जो अगस्त की तुलना में 0.6% और सालाना आधार पर 7.5% कम है। रूस, यूरोप और उत्तरी अमेरिका में अच्छी फसलों और कमजोर वैश्विक मांग के कारण गेहूं की कीमतों में लगातार तीसरे महीने गिरावट आई। ब्राज़ील और अमेरिका में बेहतर आपूर्ति अनुमान तथा अर्जेंटीना द्वारा निर्यात करों में अस्थायी कमी के कारण मक्का की कीमतों में भी कमी आई। वहीं, चावल की कीमतें 0.5% घटीं, क्योंकि अधिक आपूर्ति और अफ्रीका व फिलीपींस जैसे देशों की कम खरीद ने बाजार पर दबाव डाला।</p>
<p><strong>वनस्पति तेल कीमतों में मिश्रित रुझान</strong><br />FAO वनस्पति तेल मूल्य सूचकांक 167.9 अंक पर रहा, जो अगस्त से 0.7% कम है, हालांकि यह सालाना आधार पर 18% अधिक है। गिरावट का मुख्य कारण पाम और सोया तेल की कीमतों में कमी रही, जिसने सूरजमुखी और रेपसीड तेल की बढ़ोतरी को संतुलित कर दिया। मलेशिया में उम्मीद से अधिक पाम ऑयल स्टॉक के कारण कीमतों में कमी आई, जबकि अर्जेंटीना से अधिक आपूर्ति के चलते सोया तेल कीमतों में लगातार दूसरी बार गिरावट दर्ज की गई।</p>
<p><strong>डेयरी कीमतों में लगातार गिरावट</strong><br />FAO डेयरी मूल्य सूचकांक 2.6% गिरकर 148.3 अंक पर आ गया, हालांकि यह सितंबर 2024 की तुलना में लगभग 9% अधिक है। आइसक्रीम की मांग में कमी और क्रीम की अधिक उपलब्धता के कारण मक्खन की कीमतों में 7% की तेज गिरावट आई। दूध पाउडर की कीमतें कमजोर मांग और बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण घटीं। वहीं, एशियाई मांग के चलते पनीर की कीमतों में मामूली कमी रही।</p>
<p><strong>चीनी की कीमतें चार साल के न्यूनतम स्तर पर</strong><br />FAO चीनी मूल्य सूचकांक 4.1% गिरकर 99.4 अंक पर पहुंच गया, जो मार्च 2021 के बाद सबसे निचला स्तर है। ब्राज़ील में बेहतर उत्पादन और भारत व थाईलैंड में अच्छी मानसून वर्षा के कारण बढ़िया फसल अनुमान ने कीमतों पर दबाव डाला।</p>
<p>कुल मिलाकर, सितंबर में FAO सूचकांक में आई मामूली गिरावट यह दर्शाती है कि वैश्विक खाद्य बाजार फिलहाल स्थिर हैं। हालांकि, डेयरी और चीनी जैसे कुछ क्षेत्रों में तेज उतार-चढ़ाव यह संकेत देते हैं कि मौसम, व्यापार नीतियां और मांग में बदलाव अभी वैश्विक कीमतों को गहराई से प्रभावित कर सकते हैं।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ सितंबर में वैश्विक खाद्य कीमतों में गिरावट, डेयरी और चीनी में सबसे तेज कमी: FAO ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[अमेरिका के सोयाबीन किसानों के लिए ट्रंप प्रशासन करेगा बड़े पैकेज का ऐलान, चीन के बहिष्कार से संकट गहराया]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/u.s.-pledges-major-support-for-soybean-farmers-as-china-boycott-deepens-trade-crisis.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 04 Oct 2025 11:14:11 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/u.s.-pledges-major-support-for-soybean-farmers-as-china-boycott-deepens-trade-crisis.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अमेरिकी सरकार सोयाबीन किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण सहायता पैकेज तैयार कर रही है। ये किसान चीन द्वारा अमेरिकी फसल खरीदने से लगातार इनकार के कारण भारी नुकसान झेल रहे हैं। वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा कि यह घोषणा मंगलवार को की जाएगी, जिसका उद्देश्य किसानों को दशकों के सबसे बुरे कृषि व्यापार संकटों में से एक से उबरने में मदद करना है।</p>
<p>बेसेंट ने कहा, "हम उनके साथ हैं।" उन्होंने बीजिंग पर अमेरिकी सोयाबीन किसानों को व्यापार वार्ता में "मोहरे" के रूप में इस्तेमाल करने का आरोप लगाया। उन्होंने आगे कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग चार हफ्तों में मिलेंगे, जहां सोयाबीन चर्चा का एक प्रमुख विषय होगा। बेसेंट ने कहा, "राष्ट्रपति ट्रंप के नेतृत्व और शी के मन में उनके प्रति सम्मान को देखते हुए, इस पांचवें दौर की वार्ता एक महत्वपूर्ण सफलता साबित होनी चाहिए।"</p>
<p>लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारी राहत पैकेज डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ से अमेरिका के सोयाबीन किसानों को हुए नुकसान की भरपाई नहीं कर पाएगा। अमेरिकी सोयाबीन एसोसिएशन के अध्यक्ष कालेब रैगलैंड ने एक बयान में कहा कि बेलआउट वह सुनहरा अवसर नहीं होगा, जैसा कि ट्रंप ने बताया है, क्योंकि अमेरिकी किसानों को अपने उत्पाद बेचने के लिए बाजार की आवश्यकता है।</p>
<p>रैगलैंड ने कहा, "फिलहाल, हमारे सबसे बड़े निर्यात बाजार चीन में एक भी खरीदार नहीं है। वे अकेले हमारे सभी अन्य निर्यात बाजारों के बराबर सोयाबीन खरीदते हैं। और अभी उनकी तरफ से अमेरिकी सोयाबीन की खरीद नहीं हो रही है, इससे कीमतें कम हो रही हैं &nbsp;और कुल मिलाकर काफी अनिश्चितता पैदा हो रही है।"</p>
<p>सोयाबीन अमेरिका से निर्यात किया जाने वाला सबसे बड़ी कृषि उपज है, और इसकी सबसे ज़्यादा खेती इलिनॉइस में होती हैं। अमेरिका चीन को सोयाबीन का नंबर एक आपूर्तिकर्ता रहा है। लेकिन हाल में चीन ने अमेरिका पर अपनी निर्भरता लगातार कम की है और इसके बजाय ब्राज़ील, अर्जेंटीना और अन्य आपूर्तिकर्ताओं की ओर रुख किया है।&nbsp;</p>
<p>सोयाबीन बाजार अमेरिकी कृषि व्यापार में तनाव का सबसे स्पष्ट संकेत बन गए हैं। जनवरी से अगस्त 2025 तक चीन को अमेरिका का सोयाबीन निर्यात कुल मिलाकर केवल 218 मिलियन बुशल रहा, जो 2024 के 985 मिलियन बुशल से काफी कम है। तब चीन ने अमेरिका के कुल सोयाबीन निर्यात का लगभग आधा हिस्सा खरीदा था। जून, जुलाई और अगस्त के दौरान, अमेरिका से चीन ने नहीं के बराबर सोयाबीन आयात किया।&nbsp;</p>
<p>व्यापार युद्ध ने अमेरिकी सोयाबीन को उसके सबसे बड़े बाजार से बाहर कर दिया है। दो दशक से ज़्यादा समय में पहली बार चीनी आयातकों ने शरदकालीन फसल से एक भी खेप नहीं खरीदी है। नतीजतन, अमेरिकी किसान पांच साल के निचले स्तर पर कीमतों, अरबों डॉलर की बिक्री के नुकसान और बढ़ती भंडारण लागत से जूझ रहे हैं। जनवरी और जुलाई के बीच अमेरिका से चीन को निर्यात मात्रा की दृष्टि से 39% और मूल्य की दृष्टि से 51% गिर गया, जिससे किसानों को अरबों डॉलर का नुकसान हुआ।</p>
<p>घाटे की भरपाई के लिए बेताब अमेरिकी व्यापार समूह और प्रशासन नए बाज़ार बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इन प्रयासों में नाइजीरिया में व्यापार मिशन और वियतनाम के साथ समझौता, साथ ही बांग्लादेश, मिस्र और थाईलैंड से बढ़ती खरीद शामिल हैं। हालांकि ये बाज़ार चीन की जगह लेने के लिए बहुत छोटे हैं। चीन अकेले वैश्विक सोयाबीन आयात का 60% से ज़्यादा खरीदता है। ताइवान द्वारा चार वर्षों में 10 अरब डॉलर के अमेरिकी कृषि उत्पाद खरीदने की प्रतिबद्धता भी इस कमी को पूरा करने में नाकाम रही है।</p>
<p>यह संकट अमेरिका के सबसे बड़े सोयाबीन उत्पादक राज्य इलिनॉय में सबसे ज़्यादा गंभीर है, जहां किसानों को प्रति एकड़ 8 डॉलर तक का नुकसान हो रहा है। इलिनॉय के वाटरमैन के एक किसान रयान फ्राइडर्स ने कहा, "ऐसा कोई भी बाजार नहीं है जिस पर हमने ध्यान न दिया हो और जो अचानक नया चीन बन सकता है।"</p>
<p>कभी "दुनिया की सोया राजधानी" के रूप में जाना जाने वाला इलिनॉय का डेकाटूर अब इस उपाधि को ब्राज़ील के हाथों में जाते देख रहा है, जो अर्जेंटीना के साथ मिलकर चीनी खरीदारों के लिए एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता बन गया है।</p>
<p>ब्राज़ील के सोयाबीन की तुलना में लगभग 0.90 डॉलर प्रति बुशल कम मूल्य के बावजूद, चीन के 23% आयात शुल्क के कारण अमेरिकी शिपमेंट गैर-प्रतिस्पर्धी बने हुए हैं। इस शुल्क से लागत प्रति बुशल लगभग 2 डॉलर बढ़ जाती है। सितंबर में अर्जेंटीना से चीन की खरीदारी में तेजी आई, जिससे अमेरिकी निर्यातक और भी हाशिए पर चले गए।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ अमेरिका के सोयाबीन किसानों के लिए ट्रंप प्रशासन करेगा बड़े पैकेज का ऐलान, चीन के बहिष्कार से संकट गहराया ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[अमेरिकी कृषि मंत्री ने खेती को बताया खतरे में, मदद के लिए कई उपायों की घोषणा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/us-announces-suite-of-actions-to-support-american-farmers.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 27 Sep 2025 18:35:12 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/us-announces-suite-of-actions-to-support-american-farmers.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अमेरिका की कृषि मंत्री ब्रुक एल. रोलिंस ने अमेरिका की कृषि अर्थव्यवस्था के लिए एक व्यापक कार्ययोजना का अनावरण किया है। उन्होंने चेतावनी दी है कि कृषि क्षेत्र बढ़ती उत्पादन लागत, कमोडिटी के दाम में स्थिरता और बढ़ती विदेशी प्रतिस्पर्धा के कारण "खतरे में" है। कैनसस सिटी में एग्रीकल्चर आउटलुक फोरम में रोलिंस ने कहा कि ट्रम्प प्रशासन किसानों और पशुपालकों की मदद करने और देश की खाद्य सुरक्षा के लिए नीति, वित्तीय सहायता, व्यापार पहल और नियामक सुधारों को गति दे रहा है।</p>
<p>रोलिंस ने कहा कि पिछले चार वर्षों में कृषि की लागत आसमान छू गई है, जिससे किसानों पर भारी दबाव पड़ा है। वर्ष 2020 की तुलना में बीज की कीमतों में 18%, ईंधन और तेल की कीमतों में 32%, उर्वरक की कीमतों में 37%, बिजली की कीमतों में 36% और कृषि उपकरणों की कीमतों में 45% की वृद्धि हुई है। श्रम लागत 47% बढ़ी है, जो इस वर्ष अनुमानित 54 अरब डॉलर तक पहुंच गई है, जबकि ब्याज लागत में 73% की वृद्धि हुई है। एक तरफ इनमें इतनी तीव्र वृद्धि हुई, दूसरी तरफ कमोडिटी के दाम कम हुए हैं। इसने कृषि लाभप्रदता को कम कर दिया है।</p>
<p>अमेरिकी कृषि विभाग (यूएसडीए) ने मूल्य वृद्धि की जांच और प्रतिस्पर्धा-विरोधी कानूनों को लागू करने के लिए न्याय विभाग (डीओजे) के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। रोलिंस ने कहा, "डीओजे का प्रतिस्पर्धा-विरोधी विभाग प्रतिस्पर्धी परिस्थितियों की जांच और एक निष्पक्ष बाजार सुनिश्चित करने के लिए यूएसडीए के साथ मिलकर काम करेगा।" उन्होंने किसानों को इनपुट आपूर्तिकर्ताओं, विशेष रूप से विदेशी कंपनियों द्वारा अनुचित मूल्य निर्धारण से बचाने की आवश्यकता पर जोर दिया।</p>
<p>श्रम लागत को एक और बड़ा बोझ बताते हुए रोलिंस ने घोषणा की कि यूएसडीए ने कृषि श्रम सर्वेक्षण बंद कर दिया है। जिसका इस्तेमाल पहले प्रतिकूल प्रभाव वाली मजदूरी दरें तय करने के लिए किया जाता था। कृषि विभाग, श्रम और गृह सुरक्षा विभागों के साथ मिलकर एच-2ए वीजा कार्यक्रम में सुधार कर रहा है, जिसका उद्देश्य मौसमी कृषि श्रम को और अधिक किफायती और सुलभ बनाना है।</p>
<p>उन्होंने कहा कि प्रशासन किसानों की मुश्किलें कम करने के लिए महत्वपूर्ण वित्तीय सहायता भी प्रदान कर रहा है। मार्च से यूएसडीए ने 13.5 अरब डॉलर की राहत राशि वितरित की है, जिसमें आपातकालीन वस्तु सहायता कार्यक्रम (ईसीएपी) के माध्यम से 8 अरब डॉलर से अधिक और पशुधन आपदा सहायता के रूप में 2 अरब डॉलर से अधिक शामिल हैं। इस सप्ताह 2 अरब डॉलर की अतिरिक्त ईसीएपी राशि जारी की जा रही है। पूरक आपदा राहत कार्यक्रम के तहत पहले ही 5.5 अरब डॉलर की सहायता राशि प्रदान की जा चुकी है। उन्होंने कहा कि अक्टूबर में और सहायता मिलने की उम्मीद है।</p>
<p>रोलिंस के अनुसार वैश्विक प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने के लिए सरकार व्यापार विस्तार को प्राथमिकता दे रही है। फिलीपींस, दक्षिण कोरिया, यूरोपीय यूनियन, जापान और ब्रिटेन के साथ हाल ही में हुए समझौतों का उद्देश्य अमेरिकी फसलों के लिए नए बाजार खोलना है। 2 अक्टूबर से शुरू होने वाला "अमेरिका फ़र्स्ट ट्रेड प्रमोशन प्रोग्राम" अमेरिकी कृषि निर्यात को बढ़ावा देने के लिए सालाना 28.5 करोड़ डॉलर का निवेश करेगा।</p>
<p>घरेलू मांग पर भी ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। प्रशासन जैव ईंधन उत्पादन का विस्तार कर रहा है, अमेरिकी स्रोतों से प्राप्त फीडस्टॉक्स को प्राथमिकता दे रहा है, और मक्का उत्पादकों की सहायता के लिए आपातकालीन E15 छूट दे रहा है। इसके अतिरिक्त, USDA 48 करोड़ डॉलर के अंतर्राष्ट्रीय खाद्य सहायता कार्यक्रमों के लिए 417,000 मीट्रिक टन कमोडिटी, जो 1.6 करोड़ बुशल से अधिक के बराबर है, खरीद रहा है। इससे वैश्विक भुखमरी को कम करने में मदद मिलेगी और साथ ही नए निर्यात अवसर भी पैदा होंगे।</p>
<p>योजना का अंतिम स्तंभ अमेरिकी कृषि भूमि पर विदेशी स्वामित्व को रोकना है। रोलिंस ने कहा कि करदाताओं के धन से अब प्रमुख कृषि भूमि पर विदेशी नेतृत्व वाली सौर परियोजनाओं का समर्थन नहीं किया जाएगा, और कृषि भूमि को अमेरिकियों के हाथों में रखने के लिए नीतियां मजबूत की जाएंगी। उन्होंने कहा कि अमेरिका के किसानों और पशुपालकों ने 250 वर्षों तक अच्छा काम किया है, अब उनके लिए कुछ करने की हमारी बारी है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ अमेरिकी कृषि मंत्री ने खेती को बताया खतरे में, मदद के लिए कई उपायों की घोषणा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[एफएओ की चेतावनी&amp;#45; खाद्य और कृषि संबंधी एसडीजी लक्ष्यों के आधे से भी कम में संतोषजनक प्रगति]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/fao-warns-world-off-track-on-half-of-food-and-agriculture-related-sdg-targets.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 27 Sep 2025 14:47:24 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/fao-warns-world-off-track-on-half-of-food-and-agriculture-related-sdg-targets.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) ने चेतावनी दी है कि खाद्य, कृषि और सस्टेनेबिलिटी के लक्ष्यों के मामले में वैश्विक प्रगति असमान बनी हुई है। यही नहीं, दुनिया 2030 तक कई सतत विकास लक्ष्यों (SDG) को पूरा करने की राह से भटक रही है।</p>
<p>एफएओ की नवीनतम रिपोर्ट में छह सतत विकास लक्ष्यों - भुखमरी से निजात (2), लैंगिक समानता (5), स्वच्छ जल और स्वच्छता (6), जिम्मेदारीपूर्ण उपभोग और उत्पादन (12), जल में जीवन (14) और भूमि पर जीवन (15) के 22 इंडिकेटर पर प्रगति का मूल्यांकन किया गया है। इस मूल्यांकन में महिलाओं के लिए न्यूनतम आहार विविधता (एमडीडी-डब्ल्यू) पर एक नया संकेतक भी शामिल है।</p>
<p>रिपोर्ट के अनुसार, केवल एक-चौथाई लक्ष्य हासिल होने के करीब हैं, जबकि एक-चौथाई लक्ष्य अभी बहुत दूर हैं। शेष आधे लक्ष्यों की दिशा में मध्यम प्रगति हुई है। एफएओ के चीफ स्टैटिसटिशियन जोस रोसेरो मोनकायो ने नए सिरे से प्रयास करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा, &ldquo;हमें प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा करते हुए खाद्य सुरक्षा, बेहतर पोषण और टिकाऊ कृषि की दिशा में कार्रवाई में तेजी लाने की आवश्यकता है। यह रिपोर्ट उन क्षेत्रों की पहचान करती है जहां प्रगति सबसे अधिक पिछड़ रही है और जहां हस्तक्षेप की सबसे अधिक आवश्यकता है।&rdquo;</p>
<p><strong>मुख्य निष्कर्ष:</strong><br /><strong>खाद्य असुरक्षा का बिगड़ना:</strong> वैश्विक जनसंख्या का लगभग 28% (2.3 अरब लोग) 2024 में मध्यम या गंभीर रूप से खाद्य असुरक्षा की स्थिति में थे। वर्ष 2015 में यह अनुपात 21.4% था। पिछले वर्ष लगभग 8.2% लोगों को भूख के संकट का सामना करना पड़ा।</p>
<p><strong>महिलाओं के पोषण और भूमि अधिकारों में पिछड़ापन:</strong> 2019 और 2023 के बीच, प्रजनन आयु वर्ग की केवल 65% महिलाओं ने न्यूनतम आहार विविधता हासिल की। उप-सहारा अफ्रीका और एशिया इस मामले में पीछे रहे। महिलाओं को भूमि स्वामित्व में भी भारी असमानता का सामना करना पड़ रहा है। सर्वेक्षण किए गए 80% देशों में पुरुषों के पास भूमि होने की संभावना दोगुनी है।</p>
<p><strong>खाद्य कीमतों में बढ़ती अस्थिरता:</strong> 2023 में मामूली गिरावट के बावजूद, भू-राजनीतिक तनावों और जलवायु जोखिमों के कारण खाद्य कीमतों में विसंगतियां 2015-2019 के औसत से तीन गुना अधिक बनी हुई हैं।</p>
<p><strong>छोटे किसानों को कम मेहनताना:</strong> निम्न और मध्यम आय वाले देशों में छोटे किसानों की आय बड़े किसानों की तुलना में आधी से भी कम होती है। उनकी आय अक्सर सालाना 1,500 डॉलर से भी कम होती है।</p>
<p><strong>खतरे में जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र:</strong> संरक्षण केंद्रों में पशु आनुवंशिक संसाधनों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन केवल 4.6% स्थानीय नस्लों को ही पर्याप्त रूप से संरक्षित किया जा रहा है। वन क्षेत्र लगातार घट रहा है। यह 2000 के 31.9% से घटकर 2020 में 31.2% रह गया है, जिसका मुख्य कारण कृषि का विस्तार है।</p>
<p><strong>जल उपयोग में सुधार, लेकिन तनाव बरकरार:</strong> वर्ष 2015 और 2022 के बीच वैश्विक जल-उपयोग दक्षता में 23% की वृद्धि हुई, फिर भी पश्चिमी एशिया और उत्तरी अफ्रीका जैसे क्षेत्र अभी गंभीर जल संकट का सामना कर रहे हैं।</p>
<p><strong>अत्यधिक मत्स्य पालन जारी:</strong> अवैध और अन-सस्टेनेबल मछली पकड़ने पर अंकुश लगाने के अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों के बावजूद, जैविक रूप से स्थायी स्तर के भीतर वैश्विक मत्स्य भंडार का हिस्सा 1974 के 90% से घटकर 2021 में 62.5% रह गया।</p>
<p>एफएओ की रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि आंकड़े जुटाने, जल उपयोग में दक्षता और वन प्रबंधन जैसे कुछ क्षेत्रों में प्रगति हुई है, फिर भी कई महत्वपूर्ण लक्ष्य अभी पहुंच से बाहर हैं। रिपोर्ट में नकारात्मक रुझानों को पलटने और वैश्विक खाद्य प्रणाली, पारिस्थितिकी तंत्र तथा प्राकृतिक संसाधनों को लचीला और टिकाऊ बनाए रखने के लिए तत्काल समन्वित कार्रवाई का आह्वान किया गया है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ एफएओ की चेतावनी- खाद्य और कृषि संबंधी एसडीजी लक्ष्यों के आधे से भी कम में संतोषजनक प्रगति ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[गेहूं उत्पादन और निर्यात में गिरावट से रूसी अनाज क्षेत्र में गहराया संकट, किसान सूरजमुखी की ओर कर रहे रुख]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/russian-grain-sector-faces-deepening-crisis-as-wheat-production-and-exports-decline-farmers-shifting-to-sunflower.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 20 Sep 2025 18:40:21 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/russian-grain-sector-faces-deepening-crisis-as-wheat-production-and-exports-decline-farmers-shifting-to-sunflower.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><!--StartFragment --></p>
<p><span class="cf0">रूस का अनाज क्षेत्र पिछले तीन वर्षों से गंभीर संकट से जूझ रहा है। गेहूं उत्पादन में भारी गिरावट आई है और निर्यात भी गिरा है। पिछले पांच वर्षों में लगभग 35,000 अनाज किसान दिवालिया हो चुके हैं, जो पूरे क्षेत्र में बढ़ते वित्तीय दबाव को दर्शाता है। यह संकट लंबे समय से जारी निर्यात शुल्क, सख्त कोटा मानदंड और लगातार </span><span class="cf0">चुनौतीपूर्ण</span><span class="cf0"> प्रतिस्पर्धी माहौल के संयोजन से उपजा है। मूल रूप से घरेलू खाद्य कीमतों को स्थिर करने के लिए </span><span class="cf1">COVID-19 </span><span class="cf0">महामारी के दौरान एक अस्थायी उपाय के रूप में पेश किया गया निर्यात शुल्क अभी तक लागू है। </span><span class="cf0">वर्ल्ड</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">ग्रेन</span><span class="cf0"> की एक रिपोर्ट के अनुसार उद्योग निकायों की तरफ से शुल्क को संशोधित करने या हटाने की मांग के बावजूद इस दिशा में कदम नहीं उठाए जाने से उत्पादकों पर भारी वित्तीय बोझ बढ़ रहा है।</span></p>
<p><span class="cf0">वर्ष 2024 में अनाज निर्यात शुल्क से सरकार को अनुमानित 133.9 अरब </span><span class="cf0">रूबल</span><span class="cf0"> (1.60 अरब डॉलर) प्राप्त हुए। इसका 2025 का अनुमान 187 अरब </span><span class="cf0">रूबल</span><span class="cf0"> (2.37 अरब डॉलर) से अधिक का है। पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों और वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की गिरती कीमतों के बीच यह एक महत्वपूर्ण राजस्व स्रोत बन गया है।</span></p>
<p><span class="cf0">निर्यात शुल्क के अलावा, किसानों को भारी उत्पादन लागत का भी सामना करना पड़ रहा है। पिछले एक साल में ईंधन, ऊर्जा और उर्वरक की बढ़ती कीमतों के कारण उनकी लागत 20% बढ़ गई है, जबकि थोक अनाज की कीमतें स्थिर बनी हुई हैं। असामान्य रूप से मजबूत रूसी </span><span class="cf0">रूबल</span><span class="cf0"> ने घरेलू कीमतों को और दबाने का काम किया है, जिससे रूसी अनाज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कम प्रतिस्पर्धी हो गया है। बाजार </span><span class="cf0">कंसोलिडेशन</span><span class="cf0"> ने भी समस्या को बढ़ाया है। </span><span class="cf0">अज़ोव</span><span class="cf0">-काला सागर </span><span class="cf0">बेसिन</span><span class="cf0"> से लगभग 80% निर्यात अब केवल पांच कंपनियों के नियंत्रण में है, जबकि 2020 में यह संख्या 15 थी।</span></p>
<p><span class="cf0">अनेक किसान गेहूं की खेती पूरी तरह से छोड़ रहे हैं और सूरजमुखी तथा अन्य लाभदायक फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। हालांकि इस बदलाव के अपने जोखिम हैं, जिनमें मिट्टी के पोषक तत्वों की कमी और एकल-फसल पद्धतियों के कारण कीटों और बीमारियों के प्रति अधिक संवेदनशीलता शामिल हैं। सरकार </span><span class="cf0">द्वारा</span><span class="cf0"> प्रचारित फसल बीमा </span><span class="cf0">पहलों</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">को</span><span class="cf0"> सीमित समर्थन मिला है, क्योंकि किसान वास्तव में उनके प्रभाव को लेकर संशय में हैं।</span></p>
<p><span class="cf1">2025 </span><span class="cf0">के बुवाई के आंकड़ों से पता चलता है कि वसंत मौसम के गेहूं के </span><span class="cf0">रकबे</span><span class="cf0"> में भारी गिरावट आई है और यह 118 लाख </span><span class="cf0">हेक्टेयर</span><span class="cf0"> रह गया है। यह एक दशक में सबसे कम है। कुछ क्षेत्र वैकल्पिक फसलों के बदले गेहूं की खेती को पूरी तरह से छोड़ने की योजना बना रहे हैं। कुल गेहूं उत्पादन में मामूली वृद्धि, 828 लाख टन के सरकारी अनुमानों के बावजूद उद्योग सूत्रों ने चेतावनी दी है कि यह संभव नहीं है, क्योंकि अनेक किसानों ने पैसे बचाने </span><span class="cf0">के</span><span class="cf0"> लिए उर्वरकों और </span><span class="cf0">कीटनाशकों</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">का</span><span class="cf0"> उपयोग कम कर दिया है।</span></p>
<p><span class="cf0">संकट ने संबंधित </span><span class="cf0">क्षेत्रों</span><span class="cf0"> को भी प्रभावित किया है। 2024 में कृषि मशीनरी की बिक्री में भारी गिरावट आई। </span><span class="cf0">रोस्टसेलमाश</span><span class="cf0"> जैसी कंपनियों </span><span class="cf0">ने</span><span class="cf0"> केवल 3,900 अनाज </span><span class="cf0">हार्वेस्टर</span><span class="cf0"> बेचे, जो एक दशक में सबसे कम है। कृषि उपकरणों की मांग कमजोर बनी हुई है, कुछ निर्माता अतिरिक्त सरकारी </span><span class="cf0">सहायता</span><span class="cf0"> की मांग कर रहे हैं और कम बिक्री के कारण कर्मचारियों की संख्या घटाने पर विचार कर रहे हैं।</span></p>
<p><span class="cf0">निर्यात में भी भारी गिरावट आई है। मई 2025 में रूस ने केवल 18 देशों को अनाज निर्यात किया, जो पिछले वर्ष के 50 देशों का एक-तिहाई है। इस सीजन में गेहूं का निर्यात पिछले वर्ष के 550 लाख टन से घटकर लगभग 410 लाख टन रहने का अनुमान है। इससे वैश्विक निर्यात में रूस की हिस्सेदारी 28% से घटकर 22% रह जाएगी।</span></p>
<p><span class="cf0">भविष्य की बात करें तो रूस ने 2030 तक उत्पादन 17 करोड़ टन और निर्यात 8 करोड़ टन तक पहुंचाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। लेकिन हालात को देखते हुए यह लक्ष्य खतरे में दिखाई देता है। उद्योग पर्यवेक्षकों का सुझाव है कि इस क्षेत्र को स्थिर करने के लिए निर्यात शुल्क में संशोधन, ब्याज दरों में कमी और निवेशकों का विश्वास बहाल करने के लिए </span><span class="cf0">यूक्रेन</span><span class="cf0"> के साथ एक अस्थायी </span><span class="cf0">युद्धविराम</span><span class="cf0"> या शांति समझौता करना आवश्यक होगा। भू-राजनीतिक तनावों के बीच रूसी अनाज बाजार विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर नीतिगत हस्तक्षेप लागू नहीं किए गए तो आने वाले महीनों में संकट और गहरा सकता है।</span></p>
<p><!--EndFragment --></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ गेहूं उत्पादन और निर्यात में गिरावट से रूसी अनाज क्षेत्र में गहराया संकट, किसान सूरजमुखी की ओर कर रहे रुख ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[वैश्विक अनाज उत्पादन 2025 में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने का अनुमान, मोटे अनाज के बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/global-cereal-production-forecast-hits-all-time-high-in-2025-driven-by-strong-coarse-grain-outlook.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 08 Sep 2025 12:44:28 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/global-cereal-production-forecast-hits-all-time-high-in-2025-driven-by-strong-coarse-grain-outlook.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) ने अनुमान लगाया है कि 2025 में वैश्विक अनाज उत्पादन रिकॉर्ड 296.1 करोड़ टन तक पहुंच जाएगा। संगठन ने जुलाई की तुलना में अपने अनुमान में 3.56 करोड़ टन यानी 1.2 प्रतिशत की वृद्धि की है। यह वृद्धि मोटे अनाज, विशेष रूप से मक्का और ज्वार की बेहतर संभावनाओं के कारण हुई है।</p>
<p>मोटे अनाज उत्पादन का अनुमान उल्लेखनीय रूप से बढ़ाकर 160.1 करोड़ टन कर दिया गया है, जो जुलाई के अनुमान से 3.61 करोड़ टन और 2024 के उत्पादन से 5.9 प्रतिशत अधिक है। यह वृद्धि मुख्य रूप से अमेरिका से आ रही है, जहां मक्के की बंपर फसल होने की उम्मीद है। ब्राज़ील और मेक्सिको के लिए भी सकारात्मक संशोधन किए गए हैं। ब्राज़ील में अधिक पैदावार की उम्मीद है तो मेक्सिको में रकबा बढ़ा है।&nbsp;</p>
<p>इसके विपरीत, शुष्क मौसम और औसत से अधिक तापमान के कारण यूरोपीय यूनियन में मक्के के पूर्वानुमानों में कटौती की गई है। वहां पैदावार और रकबा दोनों में कमी आने की आशंका है। वैश्विक ज्वार उत्पादन भी बढ़कर 6.66 करोड़ टन होने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 5.6 प्रतिशत अधिक होगा। जिसमें ब्राज़ील में रिकॉर्ड ज्वार उत्पादन का अनुमान है।</p>
<p><strong>गेहूं उत्पादन थोड़ा कम होगा, लेकिन चावल का रिकॉर्ड उत्पादन</strong><br />एफएओ का गेहूं उत्पादन पूर्वानुमान 80.49 करोड़ टन है। चीन में कम पैदावार और अर्जेंटीना में कम रकबे के कारण जुलाई की तुलना में इसमें थोड़ी कमी की गई है। हालांकि, यह पिछले वर्ष की तुलना में अभी भी 69 लाख टन अधिक है। यूरोपीय यूनियन के लिए गेहूं उत्पादन के अनुमान में सुधार हुआ है।</p>
<p>2025-26 में वैश्विक चावल उत्पादन का पूर्वानुमान रिकॉर्ड 55.55 करोड़ टन पर बना हुआ है। नेपाल और अमेरिका में क्रमशः कम वर्षा और बाढ़ के कारण उत्पादन में कमी देखी गई है। हालांकि, इंडोनेशिया में ज्यादा बुवाई के साथ-साथ बांग्लादेश, ब्राज़ील, चीन और भारत में रकबा बढ़ने से वैश्विक स्तर पर ग्रोथ बनी रहने की उम्मीद है।</p>
<p><strong>अनाज उपयोग 292.2 करोड़ टन तक पहुंचने का अनुमान</strong><br />2025-26 में वैश्विक अनाज उपयोग 292.2 करोड़ टन तक पहुंचने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 4.46 करोड़ टन (1.6 प्रतिशत) अधिक है। ब्राज़ील और अमेरिका में चारे में मक्का के बढ़ते उपयोग से मोटे अनाज का उपयोग 1.7 प्रतिशत बढ़कर 156.8 करोड़ टन हो जाएगा। चीन, यूरोपीय यूनियन और थाईलैंड में पशु आहार की बढ़ती मांग के साथ, गेहूं का उपयोग रिकॉर्ड 80.35 करोड़ टन तक पहुंचने का अनुमान है। चावल का उपयोग 1.9 प्रतिशत की मामूली वृद्धि के साथ रिकॉर्ड 55.06 करोड़ टन तक पहुंचने की उम्मीद है।</p>
<p>2025-26 सीजन के अंत तक वैश्विक अनाज भंडार रिकॉर्ड 89.87 करोड़ टन रहने के आसार हैं। इसमें सालाना आधार पर 3.7 प्रतिशत की वृद्धि होगी। यह वृद्धि मुख्य रूप से अमेरिका में मक्के के भंडार में वृद्धि के कारण होगी। इसके 5 करोड़ टन से अधिक पहुंचने की उम्मीद है। ईरान और यूरोपीय यूनियन में गेहूं के भंडार में थोड़ी कमी आने का अनुमान है। ब्राज़ील, चीन, भारत और थाईलैंड में वृद्धि के कारण चावल का भंडार 2 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 21.45 करोड़ टन होने की उम्मीद है।</p>
<p><strong>ब्राज़ील और अमेरिका अनाज व्यापार में अग्रणी होंगे</strong><br />2025-26 में विश्व अनाज व्यापार 49.34 करोड़ टन रहने का अनुमान है, जो 2024-25 की तुलना में 1.4 प्रतिशत और जुलाई के अनुमान से 65 लाख टन अधिक है। चीन द्वारा कम खरीद के बावजूद, ब्राज़ील और अमेरिका से मक्के का निर्यात मोटे अनाज के व्यापार को बढ़ाएगा। चीन, ईरान, पाकिस्तान, सीरिया और तुर्की से मजबूत मांग के साथ गेहूं व्यापार में 4 प्रतिशत की वृद्धि होने की उम्मीद है।</p>
<p>2025 में चावल व्यापार 6.14 करोड़ टन के नए शिखर पर पहुंचने की उम्मीद है। बांग्लादेश, घाना और गिनी-बिसाऊ देशों की तरफ से अधिक आयात अन्य देशों में आई कमी की भरपाई कर देगा।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ वैश्विक अनाज उत्पादन 2025 में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने का अनुमान, मोटे अनाज के बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[अगस्त में वैश्विक खाद्य कीमतें स्थिर, अनाज और डेयरी के दामों में वृद्धि तो मीट और खाद्य तेल हुए महंगे]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/fao-food-price-index-steady-in-august-as-meat-and-oil-prices-offset-cereal-dairy-declines.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 06 Sep 2025 10:38:53 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/fao-food-price-index-steady-in-august-as-meat-and-oil-prices-offset-cereal-dairy-declines.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अगस्त में खाद्य कीमतों का वैश्विक मानक स्थिर रहा। एफएओ खाद्य मूल्य सूचकांक (FAO Food Price Index - FFPI) औसतन 130.1 अंक रहा, जो जुलाई के 130.0 के लगभग बराबर है। अनाज और डेयरी उत्पादों की कीमतों में गिरावट के बावजूद, मीट, चीनी और वनस्पति तेल के भावों में वृद्धि ने सूचकांक को संतुलित रखा। साल-दर-साल देखें तो इंडेक्स 6.9 प्रतिशत बढ़ा, हालांकि यह मार्च 2022 के अपने उच्चतम स्तर से अब भी 18.8 प्रतिशत नीचे है।</p>
<p>पिछले महीने <strong>अनाज की कीमतों</strong> में गिरावट आई। एफएओ अनाज मूल्य सूचकांक औसतन 105.6 अंक रहा, जो जुलाई से 0.8 प्रतिशत कम है। पर्याप्त वैश्विक आपूर्ति और कम आयात मांग के कारण गेहूं की कीमतों में गिरावट आई, जबकि यूरोपीय यूनियन में भीषण गर्मी की चिंताओं और अमेरिका में चारे और इथेनॉल की बढ़ती मांग के बीच मक्के की कीमतों में लगातार तीसरे महीने तेजी आई। निर्यातकों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा के कारण चावल की कीमतों में 2 प्रतिशत की गिरावट देखने को मिली।</p>
<p><strong>वनस्पति तेल</strong> मूल्य सूचकांक 1.4 प्रतिशत बढ़कर 169.1 अंक पर पहुंच गया, जो जुलाई 2022 के बाद से इसका उच्चतम स्तर है। मजबूत वैश्विक मांग और इंडोनेशिया के बायोडीजल पर आदेश के कारण पाम तेल की कीमतों में लगातार तीसरे महीने तेज़ी आई। काला सागर और यूरोप में कम आपूर्ति के कारण सूरजमुखी और रेपसीड तेलों की कीमतों में भी बढ़ोतरी हुई, जबकि पर्याप्त आपूर्ति की संभावनाओं के कारण सोया तेल की कीमतों में गिरावट आई।</p>
<p><strong>मीट की कीमतें</strong> रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गईं। एफएओ मीट मूल्य सूचकांक 128.0 अंक पर पहुंच गया, जो जुलाई से 0.6 प्रतिशत और एक साल पहले की तुलना में 4.9 प्रतिशत अधिक है। अमेरिका के अलावा चीन से मांग बढ़ी है। ब्राजीलि से इनका निर्यात बढ़ा है।&nbsp;</p>
<p><strong>डेयरी मूल्य</strong> सूचकांक 1.3 प्रतिशत गिरकर 152.6 अंक पर आ गया, जो लगातार दूसरी मासिक गिरावट है। हालांकि यह साल-दर-साल 16.2 प्रतिशत अधिक रहा। न्यूजीलैंड और यूरोपीय यूनियन में बेहतर उत्पादन और एशियाई मांग में कमी के कारण मक्खन, पनीर और दूध पाउडर की कीमतों में गिरावट आई। हालांकि न्यूज़ीलैंड में कम आपूर्ति के कारण स्किम्ड मिल्क पाउडर की कीमतों में वृद्धि हुई।</p>
<p>एफएओ <strong>चीनी मूल्य</strong> सूचकांक 0.2 प्रतिशत बढ़कर 103.6 अंक पर पहुंच गया, जिससे पांच महीनों की गिरावट थम गई। ब्राजील में गन्ने की कम पैदावार और विशेष रूप से चीन से आयात की बढ़ती मांग को लेकर चिंताओं ने कीमतों को बढ़ा दिया। हालांकि भारत और थाईलैंड में बेहतर फसल की उम्मीदों ने इस बढ़त को सीमित करने की भूमिका निभाई।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ अगस्त में वैश्विक खाद्य कीमतें स्थिर, अनाज और डेयरी के दामों में वृद्धि तो मीट और खाद्य तेल हुए महंगे ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[अमेरिका ने भारत के निर्यात पर 50 फीसदी टैरिफ नोटिफाई किया]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/us-notify-50-percent-tariff-on-indian-exports.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 26 Aug 2025 16:17:29 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/us-notify-50-percent-tariff-on-indian-exports.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अमेरिका ने भारत से वहां होने वाले निर्यात पर 50 फीसदी टैरिफ नोटिफाई कर दिया है। यूएस होमलैंड सिक्योरिटी डिपार्टमेंट ने अमेरिका को भारत से होने वाले निर्यात पर 27 अगस्त की 12.01 बजे से 50 फीसदी टैरिफ लगाने वाले फैसले पर अमल करने की बात कही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रम्प ने भारत द्वारा रूस से कच्चा तेल आयात करने के खिलाफ यह कदम उठाने की घोषणा करते हुए 27 अगस्त से भारतीय निर्यात पर 25 फीसदी की अतिरिक्त दर लागू करने की बात कही थी। यह टैरिफ पहले से घोषित 25 फीसदी के अतिरिक्त है। कुल मिलाकर अब भारतीय निर्यात पर अमेरिका में 50 फीसदी टैरिफ लगेगा। फार्मा जैसे कुछ उत्पादों को इससे छूट दी गई है। अमेरिका के इस कदम का असर भारत से होने वाले कृषि और सहयोगी उत्पादों पर भी पड़ेगा।</p>
<p>भारत अमेरिका को छह अरब डॉलर से अधिक के कृषि उत्पादों का निर्यात करता है। इसमें सबसे अधिक निर्यात श्रिम्प (झींगा) का है। इसके अलावा बासमती चावल, मसाले, फल- सब्जियां और ऑयल एसेंस जैसे कृषि उत्पादन कृषि निर्यात का प्रमुख हिस्सा हैं। पचास फीसदी शुल्क लगने से इस निर्यात पर प्रतिकूल असर पड़ना तय है। सबसे बुरा असर तेजी से बढ़ रहे श्रिम्प उद्योग पर पड़ेगा क्योंकि इस शुल्क के बाद भारतीय श्रिम्प प्रतिस्पर्धी नहीं रह जाएगा। वहीं बासमती के मामले में भी हमें पाकिस्तान नुकसान पहुंचा सकता है क्योंकि वहां का बासमती अमेरिकी आयातकों को सस्ता पड़ेगा। भारत के प्रतिस्पर्धी देशों श्रीलंका, पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश और थाइलैंड के लिए अमेरिका की टैरिफ दरें भारत से कम हैं।</p>
<p>अन्य भारतीय उत्पादनों में टेक्सटाइल और जेम्स एंड ज्वैलरी सबसे अधिक प्रभावित होने वाले क्षेत्र होंगे। इनका निर्यात गिरने से देश में रोजगार पर असर पड़ेगा। एक्सपर्ट्स का मानना&nbsp; है कि अगर अमेरिका के साथ व्यापार वार्ता के जरिये यह टैरिफ का मुद्दा नहीं सुलझता है तो उसका भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) पर असर पड़ेगा और चालू साल की जीडीपी छह फीसदी से नीचे आ सकती है।</p>
<p>भारत और अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ावा देने के लिए समझौते पर कई माह से बातचीत कर रहे थे। लेकिन अमेरिका द्वारा भारत के कृषि उत्पादों बाजार को खोलने की मांग पर सहमत नहीं होने के चलते यह वार्ता अटक गई और अभी इसकी कोई नई तिथि भी तय नहीं हुई है। भारत अमेरिका के जीएम मक्का, जीएम सोयाबीन और डेयरी उत्पादों के लिए अपना बाजार खोलने के लिए तैयार नहीं है। भारत ने अमेरिका के अतिरिक्त टैरिफ लगाने कदम को गलत बताया है। उसका कहना है कि हम अपनी जरूरत के मुताबिक ही इनर्जी उत्पादों का आयात करते हैं और हमे यह अधिकार है कि हम कहां से कच्चे तेल का आयात करें।.&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ अमेरिका ने भारत के निर्यात पर 50 फीसदी टैरिफ नोटिफाई किया ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[वैश्विक बाजार में दूध की मांग कम लेकिन सप्लाई अधिक, दुग्ध उत्पादों के दाम में अस्थिरता के आसार]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/global-milk-glut-pressures-dairy-markets-raising-fears-of-price-instability.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 17 Aug 2025 18:21:25 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/global-milk-glut-pressures-dairy-markets-raising-fears-of-price-instability.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>वैश्विक डेयरी बाज़ार इन दिनों उथल-पुथल का सामना कर रहे हैं। प्रमुख दूध उत्पादक देशों में उत्पादन बढ़ने के कारण दुग्ध उत्पादों की कीमतें नीचे जा रही हैं। यूरोपीय संघ, अमेरिका और न्यूज़ीलैंड से आपूर्ति में वृद्धि मांग से ज़्यादा हो रही है, जिससे उत्पाद मूल्य कम हो रहे हैं। मैक्सम फ़ूड्स (Maxum Foods) ने अपनी अगस्त 2025 की एक रिपोर्ट में यह बात कही है।</p>
<p>रिपोर्ट के अनुसार इस साल की शुरुआत में कीमतों में थोड़े समय की मजबूती के बाद बाज़ार के फंडामेंटल में बदलाव आया है। यूरोपीय संघ में आपूर्ति की बाधाएँ कम हुई हैं, हालांकि वहां ग्रीष्मकाल अधिक गर्म और शुष्क होने के कारण चारे की उपलब्धता पर ख़तरा मंडरा रहा है। अमेरिका में दूध और पनीर के उत्पादन में मज़बूत वृद्धि देखी जा रही है। वहां सुस्त घरेलू मांग और निर्यात में कमी के कारण स्टॉक बढ़ रहा है और कीमतें गिर रही हैं।</p>
<p>न्यूज़ीलैंड डेयरी का बड़ा निर्यातक है। वह एक और मजबूत सीज़न की ओर अग्रसर है। वहां दूध उत्पादन पिछले साल के स्तर से थोड़ा ऊपर रहने की उम्मीद है। हालांकि वैश्विक व्यापार सक्रिय बना हुआ है, लेकिन कमजोर मांग कीमतों को प्रभावित कर रही है, जिससे निर्यात की गति पर असर पड़ रहा है।</p>
<p>हालांकि ऑस्ट्रेलिया की तस्वीर इसके विपरीत है। कुछ क्षेत्रों में बारिश में सुधार के बावजूद, दक्षिण के इलाके में लगातार चारे की कमी के कारण मई से चारे की कीमतें दोगुनी हो गई हैं। इस तनाव के कारण पिछले तीन वर्षों में सबसे ज़्यादा पशु वध दर्ज की गई है। वर्ष 2025-26 के सीज़न में मिल्क सॉलिड के उत्पादन में 2% की कमी आने का अनुमान है।</p>
<p>मैक्सम फ़ूड्स का कहना है कि भू-राजनीतिक बदलाव और अमेरिकी राजकोषीय नीति में परिवर्तन वैश्विक परिदृश्य को और जटिल बना रहे हैं। आने वाले महीनों में आपूर्ति के मांग से अधिक होने की संभावना है। रिपोर्ट में अंतरराष्ट्रीय डेयरी उद्योग के लिए बढ़ते जोखिमों का जिक्र करते हुए कहा गया है कि उत्पादन में वृद्धि से दीर्घकालिक मूल्य स्थिरता को खतरा है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ वैश्विक बाजार में दूध की मांग कम लेकिन सप्लाई अधिक, दुग्ध उत्पादों के दाम में अस्थिरता के आसार ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[ट्रंप का चीन पर अमेरिका से सोयाबीन आयात चौगुना करने का दबाव, CBOT पर कीमतों में 2% उछाल]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/trump-presses-china-to-quadruple-us-soybean-imports-price-on-cbot-rises-by-2-percent.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 16 Aug 2025 13:09:42 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/trump-presses-china-to-quadruple-us-soybean-imports-price-on-cbot-rises-by-2-percent.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अमेरिका-चीन टैरिफ वार्ताओं के बीच, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन से अमेरिकी सोयाबीन खरीद में तेजी से बढ़ोतरी करने का आग्रह किया है। ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म Truth Social पर लिखा कि बीजिंग को सोयाबीन आयात चौगुना करना चाहिए। उनका कहना था कि इससे चीन की आपूर्ति की समस्या कम होगी और दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच का व्यापार अंतर घटेगा। उन्होंने राष्ट्रपति शी जिनपिंग को इसके लिए अग्रिम धन्यवाद भी दिया।</p>
<p>अमेरिका और चीन के बीच टैरिफ युद्धविराम 12 अगस्त को समाप्त हो गया था, लेकिन दोनों देशों ने इसे 90 दिनों के लिए बढ़ाने पर सहमति जताई। चीन दुनिया का सबसे बड़ा सोयाबीन आयातक और &nbsp;खपत करने वाला देश है। अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) की फॉरेन एग्रीकल्चरल सर्विस (FAS) के अनुसार, 2025&ndash;26 में 12.44 करोड़ टन की घरेलू मांग को पूरा करने के लिए चीन को 10.6 करोड़ टन सोयाबीन आयात करने की जरूरत पड़ेगी। पिछले साल चीन ने लगभग 10.5 करोड़ टन सोयाबीन का आयात किया था, जिसमें से 2.21 करोड़ टन (करीब 12 अरब डॉलर) अमेरिका से आया।</p>
<p>हाल के वर्षों में चीन ने सोयाबीन खरीद में विविधता लाई है। वह 15 देशों से इसका आयात करता है, फिर भी ब्राज़ील और अमेरिका उसके मुख्य आपूर्तिकर्ता बने हुए हैं। कम दामों की वजह से ब्राज़ील ने बाज़ार हिस्सेदारी लगातार बढ़ाई है, जबकि अमेरिकी शिपमेंट स्थिर रहे हैं। चीन के कुल आयात का लगभग एक चौथाई अमेरिका से आता है और इसे चौगुना करने के लिए चीन को पहले से कहीं अधिक अमेरिकी सप्लाई पर निर्भर होना पड़ेगा।</p>
<p>वैसे, एक तथ्य यह भी है कि चीन में सोयाबीन की मांग की वृद्धि दर धीमी हो रही है, क्योंकि उपभोक्ता पोर्क से हटकर चिकन और मछली जैसे प्रोटीन स्रोतों की ओर बढ़ रहे हैं। ट्रंप के पहले कार्यकाल में हुए फेज़ वन ट्रेड डील के तहत चीन ने अमेरिकी कृषि आयात बढ़ाने का वादा किया था, लेकिन वह लक्ष्य हासिल नहीं हो पाया।</p>
<p>इस साल चल रहे व्यापार तनाव के बीच, चीन ने अब तक चौथी तिमाही के लिए कोई अमेरिकी सोयाबीन नहीं खरीदा है, जिससे अमेरिकी फसल निर्यात सीज़न को लेकर चिंता बढ़ गई है। इसके बावजूद, ट्रंप के बयान के बाद शिकागो बोर्ड ऑफ ट्रेड (CBOT) पर सोयाबीन वायदा कीमतों में 2% से अधिक की तेजी आई और भाव $10.11 प्रति बुशल तक पहुंच गए।</p>
<p></p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ ट्रंप का चीन पर अमेरिका से सोयाबीन आयात चौगुना करने का दबाव, CBOT पर कीमतों में 2% उछाल ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[चीन का सोयाबीन आयात रिकॉर्ड स्तर पर, वियतनाम में फीड की मांग बढ़ी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/china-soybean-imports-hit-record-pace-as-vietnam-feed-demand-surges-on-livestock-and-aquaculture-growth.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 11 Aug 2025 23:55:19 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/china-soybean-imports-hit-record-pace-as-vietnam-feed-demand-surges-on-livestock-and-aquaculture-growth.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>सोयाबीन के लिए चीन की बढ़ती मांग और वियतनाम में बढ़ती चारे की मांग एशिया में अनाज व्यापार को नया रूप दे रही है। पशुधन, एक्वाकल्चर और खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्रों की मजबूती से आयात बढ़ रहा है और वैश्विक कमोडिटी कीमतों में भी वृद्धि हो रही है।</p>
<p>जुलाई 2025 में दुनिया के सबसे बड़े सोयाबीन उपभोक्ता चीन ने लगातार दूसरा मासिक आयात का रिकॉर्ड बनाया। पिछले माह 116.7 लाख टन आयात हुआ, जो एक साल पहले के 98.5 लाख टन से 18.5% अधिक है। यह आंकड़ा जून के रिकॉर्ड 122.6 लाख टन के बाद दूसरी बड़ी मात्रा है। इसमें साल-दर-साल 10% वृद्धि हुई है।</p>
<p>वर्ल्ड ग्रेन की रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी कृषि विभाग की विदेशी कृषि सेवा (FAS) का अनुमान है कि 2025-26 के विपणन वर्ष में चीन का सोयाबीन आयात 11.2 करोड़ टन तक पहुंच जाएगा, जो दो साल पहले के रिकॉर्ड के बराबर होगा। घरेलू सोयाबीन उत्पादन भी रिकॉर्ड 210 लाख टन तक पहुंचने की उम्मीद है। लेकिन खपत रिकॉर्ड 13.3 करोड़ होने की उम्मीद है। यह पिछले वर्ष 12.69 करोड़ टन था।</p>
<p>ब्राज़ील चीन का प्रमुख आपूर्तिकर्ता बना हुआ है। वहां 2025-26 में सोयाबीन का उत्पादन 17.6 करोड़ टन होने का अनुमान है। यह जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 2% अधिक है। ब्राज़ील के व्यापार आंकड़ों से पता चलता है कि 2025 की पहली तिमाही में चीन को सोयाबीन का निर्यात कुल 169 लाख टन था, जो 2024 की इसी अवधि की तुलना में लगभग 7% अधिक है। चीन में सोयाबीन की मांग मुख्य रूप से पशु आहार और वनस्पति तेल उत्पादन से जुड़ी है।&nbsp;</p>
<p>दूसरी ओर वियतनाम में चारे की मांग में वृद्धि हुई है। एफएएस के 6 अगस्त के तिमाही अपडेट के अनुसार, वियतनाम की कुल चारे की मांग 2025 में 287 लाख टन और 2026 में 295 लाख टन तक पहुंचने का अनुमान है। मांग में इस वृद्धि का कारण पशुधन और एक्वाकल्चर दोनों में ग्रोथ है।</p>
<p>2025 की पहली छमाही में एक्वाकल्चर उत्पादन 26 लाख टन तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 4.9% अधिक है। इनका निर्यात मुख्य रूप से अमेरिका, ब्राज़ील और ट्रांस-पैसिफिक पार्टनरशिप (CPTPP) देशों को हो रहा है।&nbsp;</p>
<p>पोल्ट्री की संख्या में लगातार वृद्धि जारी है। जून 2025 में मुर्गियों की संख्या पिछले वर्ष की तुलना में 4% अधिक होने का अनुमान है और किसी भी बड़ी बीमारी के प्रकोप की सूचना नहीं है। हालांकि, घरेलू मक्के के उत्पादन में गिरावट आई है, जिससे चारा सामग्री का आयात बढ़ गया है। विपणन वर्ष 2024-25 में मक्के का आयात 122 लाख टन रहने का अनुमान है, जबकि घरेलू उत्पादन पिछले वर्ष के 43 लाख टन से घटकर 41 लाख टन रहने की उम्मीद है।</p>
<p>वियतनाम ने 2025 की पहली छमाही में 7.5 लाख टन डिस्टिलर्स ड्राइड ग्रेन्स विथ सॉल्यूबल (DDGS) का भी आयात किया, जो साल-दर-साल 13% की वृद्धि है। इस मामले में आयात पर निर्भरता बढ़ रही है। 2024-25 में मक्के की खपत 158 लाख टन होने का अनुमान है, जिसमें 85% से 88% पशु आहार के लिए उपयोग किया जाएगा।</p>
<p>चारे के अलावा खाद्य प्रसंस्करणकर्ताओं और बेकरी कंपनियों की भारी मांग के कारण, वियतनाम का गेहूं आयात 2024-25 में बढ़कर 57.2 लाख टन होने का अनुमान है। इसके मुख्य आपूर्तिकर्ता ऑस्ट्रेलिया, यूक्रेन और ब्राज़ील हैं।</p>
<p>यहां चावल का उत्पादन धीरे-धीरे कम हो रहा है क्योंकि किसान उच्च मूल्य वाली फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। चावल उत्पादन 2025-26 में घटकर 67.9 लाख टन रहने का अनुमान है। आपूर्ति की कमी आंशिक रूप से कंबोडिया से धान के अधिक आयात के माध्यम से पूरी की जा रही है, जो 2025 की पहली छमाही में 54% बढ़ गया है। एफएएस ने वियतनाम के 2024-25 के चावल निर्यात अनुमान को बढ़ाकर 85 लाख टन कर दिया है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ चीन का सोयाबीन आयात रिकॉर्ड स्तर पर, वियतनाम में फीड की मांग बढ़ी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[पहली तिमाही में भारत का कृषि निर्यात 5.8% बढ़ा, लेकिन ट्रंप टैरिफ से नुकसान की आशंका]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/agricultural-exports-grew-5.8-in-the-first-quarter-will-this-growth-continue-due-to-trump-tariffs-has-raised-doubts.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 11 Aug 2025 00:47:20 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/agricultural-exports-grew-5.8-in-the-first-quarter-will-this-growth-continue-due-to-trump-tariffs-has-raised-doubts.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p data-start="103" data-end="558">पिछले सप्ताह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि देश के किसानों के हितों पर वह आंच नहीं आने देंगे, भले ही इसके लिए उन्हें व्यक्तिगत कीमत क्यों न चुकानी पड़े। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा भारतीय निर्यात पर 50 फीसदी सीमा शुल्क (टैरिफ) लगाने के फैसले के बाद प्रधानमंत्री ने यह बात कही। इससे संकेत मिलता है कि भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार समझौते के अटकने की सबसे बड़ी वजह कृषि क्षेत्र है।</p>
<p data-start="560" data-end="1421">इस बीच, निर्यात के मोर्चे पर सकारात्मक खबर भी कृषि क्षेत्र से ही आई है। चालू वित्त वर्ष (2025-26) की पहली तिमाही में भारत का कृषि निर्यात 5.8 फीसदी बढ़ा है। वहीं, देश के कुल निर्यात की पहली तिमाही में वृद्धि दर मात्र 1.7 फीसदी रही है, और वह भी तब जबकि पिछले वित्त वर्ष का कुल निर्यात लगभग स्थिर ही रहा था। 2024-25 में देश का कुल निर्यात केवल 0.1 फीसदी बढ़कर 437.4 अरब डॉलर रहा, जबकि इसके पहले वर्ष यह 437.1 अरब डॉलर था। इसके उलट, कृषि और सहयोगी क्षेत्रों का निर्यात पिछले साल के 12.20 अरब डॉलर से 5.8 फीसदी बढ़कर इस साल अप्रैल-जून 2025 के दौरान 12.92 अरब डॉलर हो गया। वहीं, देश का कुल निर्यात इस साल पहली तिमाही में 112 अरब डॉलर रहा, जो पिछले साल के 110.1 अरब डॉलर से केवल 1.7 फीसदी अधिक है। ऐसे में, भले ही वाणिज्य मंत्री कह रहे हैं कि हमारा निर्यात ट्रैक पर है, लेकिन ट्रम्प टैरिफ के बाद यह पिछले साल के स्तर को पार कर पाएगा, यह कहना अभी मुश्किल है।</p>
<p data-start="1423" data-end="2031">पिछले वित्त वर्ष (2024-25) में कृषि निर्यात 51.9 अरब डॉलर रहा था, जो 2023-24 के 48.8 अरब डॉलर के मुकाबले 6.4 फीसदी अधिक था। यह आंकड़े एक ट्रेंड जरूर दिखा रहे हैं&mdash;कुल निर्यात में लगभग स्थिरता के बावजूद कृषि निर्यात में लगातार बेहतर वृद्धि दर्ज की जा रही है। हालांकि अभी तक कृषि निर्यात 2022-23 के 53.2 अरब डॉलर के उच्चतम स्तर तक नहीं पहुंच पाया है। अगर इस साल परिस्थितियां सामान्य रहीं, तो यह पुराने रिकॉर्ड को पार कर सकता है। इसकी मुख्य वजह देश में बेहतर कृषि उत्पादन है, जो लगातार दो सामान्य मानसून के कारण संभव हुआ है। हालांकि, ट्रम्प द्वारा 50 फीसदी टैरिफ लगाने का असर कृषि निर्यात पर पड़ सकता है।</p>
<p data-start="2033" data-end="2754">पिछले कुछ वर्षों में भारत के कृषि निर्यात की वृद्धि दर बहुत तेज नहीं रही है। इसका मुख्य कारण सरकार द्वारा घरेलू स्तर पर खाद्य उत्पादों की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए निर्यात प्रतिबंध और न्यूनतम निर्यात मूल्य लागू करने जैसे नीतिगत कदम रहे हैं। भारत से अधिकांश कृषि निर्यात कच्चे माल (कमोडिटी) के रूप में होता है, जबकि वैल्यू-एडेड उत्पादों की हिस्सेदारी इसमें काफी कम है। ऐसे में वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव और टैरिफ का असर सीधे इस पर पड़ता है। इन वजहों से ही कृषि निर्यात 2022-23 के 53.2 अरब डॉलर के स्तर को अब तक पार नहीं कर सका है। वहीं, 2002-03 से 2013-14 के दौरान भारत का कृषि निर्यात 7.5 अरब डॉलर से बढ़कर 43.3 अरब डॉलर तक पहुंचा था, लेकिन उसके बाद इसमें गिरावट आई और 2020-21 के बाद ही यह दोबारा पटरी पर लौटा।</p>
<p data-start="2756" data-end="3062">भारत के बड़े कृषि निर्यातों में चावल, चीनी, समुद्री उत्पाद (मुख्य रूप से श्रिम्प), मसाले, तंबाकू, कॉफी, भैंस का मांस और फल-सब्जियां शामिल हैं। इनमें भी चीनी का निर्यात एक समय 5.5 अरब डॉलर तक पहुंच गया था, जो पिछले साल घटकर केवल 700 मिलियन डॉलर रह गया। वहीं, कपास में हम निर्यातक से शुद्ध आयातक बन गए हैं।</p>
<p data-start="3064" data-end="3284">ट्रम्प के टैरिफ से सबसे अधिक नुकसान श्रिम्प निर्यात को हो सकता है, जो पिछले साल अमेरिका को 1.9 अरब डॉलर से अधिक था। लेकिन 50 फीसदी टैरिफ के चलते यह वेनेजुएला और वियतनाम जैसे देशों के मुकाबले प्रतिस्पर्धी नहीं रह जाएगा।</p>
<p data-start="3286" data-end="3962">जहां तक देश के कुल मर्चेंडाइज निर्यात का सवाल है, 2024-25 में भारत का व्यापार घाटा 282.8 अरब डॉलर रहा था। हालांकि कृषि उत्पादों के मामले में भारत को व्यापार अधिशेष (सरप्लस) है। पिछले साल भारत के वैश्विक कृषि व्यापार में 13.4 अरब डॉलर का सरप्लस था, हालांकि कृषि और खाद्य उत्पादों का आयात बढ़ने से यह घटा है। 2013-14 में यह अधिशेष 27.7 अरब डॉलर था। देश में खाद्य तेलों, दालों, फलों और सूखे मेवों का आयात लगातार बढ़ रहा है। पिछले साल भारत ने 38.5 अरब डॉलर के कृषि उत्पादों का आयात किया। इसमें अमेरिका से आयातित बादाम, पिस्ता और फलों की बड़ी हिस्सेदारी है। केवल सूखे मेवों का आयात ही 1 अरब डॉलर को पार कर गया है। वहीं, पिछले साल 5.5 अरब डॉलर की 73 लाख टन दालों का आयात किया गया।</p>
<p data-start="3964" data-end="4756">इन आयातों के बावजूद, निर्यात में मौजूदा वृद्धि कृषि व्यापार को अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में बनाए हुए है। लेकिन अमेरिका द्वारा लगाए गए 50 फीसदी टैरिफ से कृषि निर्यात पर प्रतिकूल असर पड़ने की संभावना है। हालांकि टैरिफ लागू होने की तारीख 27 अगस्त है, इसलिए स्थिति साफ होने का इंतजार करना होगा। दूसरी ओर, अमेरिका ने ब्राजील पर भी 50 फीसदी टैरिफ लगाया है और कई कृषि उत्पादों में ब्राजील भारत का प्रतिद्वंद्वी है। इसका असर अमेरिका के अलावा अन्य बाजारों पर भी पड़ सकता है, क्योंकि ब्राजील उन बाजारों में अपने उत्पाद बेचेगा, जहां भारत भी बेचना चाहता है, जिससे कीमतें गिर सकती हैं। इन परिस्थितियों में, आने वाले दिनों में भारत और अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर क्या रुख अपनाते हैं, यही तय करेगा कि भारत का कृषि निर्यात नया रिकॉर्ड बनाएगा या प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण इस लक्ष्य से चूक जाएगा।</p>
<p data-start="3964" data-end="4756"></p>
<p data-start="3964" data-end="4756"></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ पहली तिमाही में भारत का कृषि निर्यात 5.8% बढ़ा, लेकिन ट्रंप टैरिफ से नुकसान की आशंका ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[FAO Food Price Index: ग्लोबल मार्केट में जुलाई में अनाज, डेयरी और चीनी के दाम में गिरावट, वनस्पति तेल तीन साल के उच्चतम स्तर पर]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/fao-food-price-index-july-sees-drop-in-cereal-dairy-and-sugar-prices-but-vegetable-oils-surge.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 09 Aug 2025 17:54:52 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/fao-food-price-index-july-sees-drop-in-cereal-dairy-and-sugar-prices-but-vegetable-oils-surge.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>विश्व बाजार में खाद्य वस्तुओं की कीमतों का मानक, <strong>एफएओ खाद्य मूल्य सूचकांक</strong> (The FAO Food Price Index), जुलाई 2025 में औसतन 130.1 अंक रहा, जो जून से 1.6 प्रतिशत अधिक है। यह मुख्य रूप से मीट और वनस्पति तेलों की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय कीमतों के कारण है। इस मासिक वृद्धि के बावजूद, सूचकांक मार्च 2022 के अपने उच्चतम स्तर से 18.8 प्रतिशत नीचे है, हालांकि यह जुलाई 2024 के स्तर से 7.6 प्रतिशत अधिक है।</p>
<p><strong>एफएओ अनाज मूल्य सूचकांक</strong> औसतन 106.5 अंक रहा, जो जून की तुलना में 0.8 प्रतिशत कम है। गेहूं और ज्वार की कीमतों में गिरावट मक्का और जौ की कीमतों में वृद्धि पर भारी रही। उत्तरी गोलार्ध में मौसमी गेहूं की फसल ने कीमतों पर दबाव डाला, हालांकि उत्तरी अमेरिका के कुछ हिस्सों में प्रतिकूल परिस्थितियों ने गेहूं की कीमतों को कुछ सहारा दिया। एफएओ के सभी चावल मूल्य सूचकांक (FAO All Rice Price Index) में 1.8 प्रतिशत की गिरावट आई, जो पर्याप्त निर्यात आपूर्ति और कमज़ोर आयात मांग के कारण हुआ।</p>
<p><strong>एफएओ वनस्पति तेल मूल्य सूचकांक</strong> जुलाई में औसतन 166.8 अंक रहा, जो पिछले महीने की तुलना में 7.1 प्रतिशत की तीव्र वृद्धि दर्शाता है। यह तीन साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। यह वृद्धि पाम, सोया और सूरजमुखी तेलों के लिए ऊंचे भावों के कारण हुई। मजबूत वैश्विक मांग और बेहतर प्रतिस्पर्धात्मकता के कारण पाम ऑयल की कीमतों में वृद्धि हुई, जबकि सोया तेल को अमेरिका में जैव ईंधन क्षेत्र की मज़बूत मांग की उम्मीदों से समर्थन मिला। काला सागर क्षेत्र में निर्यात आपूर्ति में कमी के कारण सूरजमुखी तेल की कीमतों में भी वृद्धि हुई। इसके विपरीत, यूरोप में नई फसल के आगमन के साथ रेपसीड तेल की कीमतों में गिरावट आई।</p>
<p><strong>एफएओ डेयरी मूल्य सूचकांक</strong> जून की तुलना में 0.1 प्रतिशत घटकर 155.3 अंक रह गया, जो अप्रैल 2024 के बाद पहली गिरावट है। मक्खन और दूध पाउडर की कीमतों में गिरावट आई। ऐसा अधिक निर्यात आपूर्ति और विशेष रूप से एशिया से कम आयात मांग के कारण हुआ। हालांकि, एशियाई और निकट पूर्व के बाजारों में मजबूत मांग और यूरोपीय संघ में निर्यात उपलब्धता में कमी के कारण पनीर की कीमतों में वृद्धि जारी रही।</p>
<p><strong>एफएओ चीनी मूल्य सूचकांक</strong> औसतन 103.3 अंक रहा, जो पिछले महीने से 0.2 प्रतिशत कम है। लगातार पांचवें महीने इसमें गिरावट जारी रही। 2025-26 में वैश्विक उत्पादन में सुधार की उम्मीदों, खासकर ब्राज़ील, भारत और थाईलैंड में, ने कीमतों पर दबाव डाला। हालांकि वैश्विक चीनी आयात में तेज़ी के संकेतों ने गिरावट को कम किया।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ FAO Food Price Index: ग्लोबल मार्केट में जुलाई में अनाज, डेयरी और चीनी के दाम में गिरावट, वनस्पति तेल तीन साल के उच्चतम स्तर पर ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[अमेरिका के 25% टैरिफ का भारत के कृषि निर्यात पर क्या होगा असर?]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/what-will-be-the-impact-of-usa-25-pc-tariff-on-indian-agricultural-exports.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 31 Jul 2025 13:20:46 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/what-will-be-the-impact-of-usa-25-pc-tariff-on-indian-agricultural-exports.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p data-start="199" data-end="546">अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत पर लगाए गए 25% टैरिफ से भारतीय कृषि और समुद्री उत्पादों के निर्यात पर बड़ा असर पड़ने की आशंका है। बुधवार को इस टैरिफ की घोषणा के बाद भारत से बासमती चावल, मसाले, कॉफी, झींगा और तंबाकू जैसे उत्पादों का अमेरिका को निर्यात महंगा हो जाएगा। इसका लाभ उन देशों को मिल सकता है, जिन पर कम टैरिफ लगाया गया है।</p>
<p data-start="548" data-end="960">अमेरिका ने यह कदम भारत के रूस के साथ संबंधों और कृषि व डेयरी क्षेत्रों को अमेरिकी उत्पादों के लिए न खोलने की प्रतिक्रिया स्वरूप उठाया है। हालांकि फार्मास्यूटिकल्स, खनिज और सेमीकंडक्टर जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को इस टैरिफ से बाहर रखा गया है, लेकिन प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ, समुद्री उत्पाद और कृषि निर्यात इस व्यापारिक टकराव की चपेट में आ गए हैं, जिसका असर देश के किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।</p>
<p data-start="962" data-end="1192">अमेरिका को भारत से लगभग 6.25 अरब डॉलर के कृषि उत्पादों का निर्यात होता है। इसमें आधे से अधिक हिस्सेदारी समुद्री उत्पादों, मसालों और बासमती चावल की है। इन पर 25% शुल्क लगने से भारतीय निर्यातकों को नुकसान उठाना पड़ सकता है, जिसका असर देश के कृषि क्षेत्र पर भी पड़ेगा।&nbsp;</p>
<p data-start="962" data-end="1192">भारतीय निर्यातक अमेरिका में फिलहाल 10% टैरिफ, 4.5% का अतिरिक्त एंटी-डंपिंग शुल्क और 5.8% का काउंटरवेलिंग शुल्क चुका रहे हैं। अमेरिका द्वारा 1 अगस्त से 25% टैरिफ और जुर्माने की घोषणा के साथ, निर्यातकों को अधिक शुल्क देना होगा।</p>
<p data-start="1199" data-end="1237"><strong>बासमती निर्यात होगा प्रभावित</strong></p>
<p data-start="1239" data-end="1462">भारत से अमेरिका को हर वर्ष लगभग 33.7 करोड़ डॉलर मूल्य का बासमती चावल निर्यात होता है। अभी तक भारत इस क्षेत्र में पाकिस्तान को कड़ी टक्कर दे रहा था, लेकिन टैरिफ बढ़ने से भारतीय बासमती की प्रतिस्पर्धा क्षमता कमजोर हो सकती है।</p>
<p data-start="1464" data-end="1655">चावल निर्यातकों के अनुसार, अभी तक अमेरिका में बासमती चावल का निर्यात शून्य शुल्क (जीरो ड्यूटी) पर होता था। अब 25% टैरिफ लगने से इसका निर्यात महंगा हो जाएगा, जिससे पाकिस्तान को लाभ हो सकता है।</p>
<p data-start="1657" data-end="1897">यूएसडीए के अनुसार, अमेरिका हर साल लगभग 13 लाख टन चावल आयात करता है, जिसमें 60% हिस्सा बासमती (भारत व पाकिस्तान) और जैस्मीन चावल (थाईलैंड) का होता है।&nbsp;</p>
<p data-start="1904" data-end="1942"><strong>समुद्री उत्पादों को बड़ा झटका</strong></p>
<p data-start="1944" data-end="2379">अमेरिका में 25% टैरिफ से सबसे अधिक नुकसान भारत के समुद्री उत्पादों को हो सकता है। भारत से अमेरिका को कृषि निर्यात में सबसे बड़ी हिस्सेदारी इन्हीं उत्पादों की है, जिनमें मुख्य रूप से झींगा (विशेषकर 'वनामी') शामिल है। वित्त वर्ष 2024-25 में अमेरिका को भारत से 2.68 अरब डॉलर मूल्य के समुद्री उत्पादों का निर्यात हुआ। अब इन पर शुल्क बढ़ने से भारतीय निर्यातकों पर कीमतें घटाने का दबाव बढ़ेगा, और इससे इक्वाडोर जैसे देशों को लाभ मिल सकता है।</p>
<p data-start="2386" data-end="2422"><strong>मसालों, कॉफी और तंबाकू पर भी असर</strong></p>
<p data-start="2424" data-end="2631">बासमती और झींगे के अलावा मसाले, कॉफी और तंबाकू जैसे अन्य उत्पादों का निर्यात भी प्रभावित होगा। इन पर टैरिफ बढ़ने से भारत की बाजार हिस्सेदारी कम हो सकती है, जिसका सीधा लाभ दक्षिण अमेरिकी देशों को मिल सकता है।</p>
<p data-start="2633" data-end="2794">भारत से अमेरिका को हर साल लगभग 64.7 करोड़ डॉलर मूल्य के मसालों का निर्यात होता है, जो समुद्री उत्पादों के बाद अमेरिका को भारत का दूसरा सबसे बड़ा कृषि निर्यात है।</p>
<p data-start="2835" data-end="3090">निर्यातकों को आशंका है कि बढ़ी हुई लागत के कारण अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा करना कठिन होगा और इसका सीधा असर घरेलू किसानों की आय पर भी पड़ेगा। उद्योग जगत ने सरकार से मांग की है कि वह इस मसले पर रणनीतिक जवाब दे, जिससे किसानों और निर्यातकों के हितों की रक्षा की जा सके।</p>
<p data-start="2835" data-end="3090"></p>
<p data-start="2835" data-end="3090"></p>
<p data-start="2835" data-end="3090"></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ अमेरिका के 25% टैरिफ का भारत के कृषि निर्यात पर क्या होगा असर? ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[भारत&amp;#45;ब्रिटेन एफटीए से किसका फायदा? नहीं सुलझी बासमती निर्यात की पुरानी समस्या]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/who-benefits-from-india-uk-fta-the-old-problem-of-basmati-export-is-not-solved.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 30 Jul 2025 07:02:11 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/who-benefits-from-india-uk-fta-the-old-problem-of-basmati-export-is-not-solved.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत और ब्रिटेन के बीच हाल ही में मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए), जिसे <strong>कॉन्प्रिहेंसिव ट्रेड एंड इकोनॉमिक एग्रीमेंट (सीटीईए)</strong> कहा जा रहा है, पर हस्ताक्षर किये गये हैं। भारत और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री की मौजूदगी में दोनों देशों के वाणिज्य मंत्रियों ने इस पर दस्तखत किये हैं। इस समझौते को भारतीय कृषि क्षेत्र के लिए एक बड़े मौके के रूप में पेश किया जा रहा है। लेकिन हकीकत यह है कि भारत से ब्रिटेन को होने वाले प्रमुख कृषि निर्यात में शुमार चावल पर ब्रिटेन में लागू शुल्क का मुद्दा इसका हिस्सा नहीं है।</p>
<p>ब्रिटेन द्वारा भारत से आयातित व्हाइट राइस पर <strong>155 पाउंड</strong> प्रति टन का शुल्क वसूला जाता है जो इस समझौते के बावजूद लागू रहेगा। इसके चलते भारत को मजबूरन कम कीमत पर ब्राउन राइस का निर्यात करना पड़ता है। भारत से यूरोप को सालाना चार से पांच लाख टन बासमती चावल का निर्यात होता है जिसका 50 फीसदी से अधिक हिस्सा ब्रिटेन को निर्यात होता है। इस निर्यात में 98 फीसदी हिस्सा ब्राउन राइस का है। क्योंकि व्हाइट राइस का निर्यात व्यवहार्य नहीं है।&nbsp; &nbsp;</p>
<p>चावल निर्यात उद्योग के सूत्रों ने <strong><em>रूरल वॉयस</em></strong> को बताया कि उन्हें उम्मीद थी कि नये व्यापार समझौते में बासमती निर्यात का मुद्दा हल हो जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हो सका है। असल में, यूरोपीय यूनियन और ब्रिटेन भारत से व्हाइट राइस का आयात नहीं करते हैं। इसके आयात पर ब्रिटेन में 155 पाउंड का शुल्क लागू है। इसकी वजह भारत में चावल के प्रसंस्करण की गुणवत्ता बेहतर नहीं होने का तर्क दिया जाता है। वहीं, भारतीय चावल निर्यातकों का कहना है कि हमारे पास विश्व की बेहतर प्रसंस्करण मशीनें हैं और हम पिछले करीब 30 साल से इस शुल्क को हटाने की मांग कर रहे हैं। इस शुल्क के चलते भारतीय व्हाइट राइस का ब्रिटेन को निर्यात प्रतिस्पर्धी नहीं रह जाता है।&nbsp;</p>
<p>भारत से यूरोप को अधिकतर ब्राउन बासमती राइस का निर्यात होता है जिसकी कीमत 750 से 800 डॉलर प्रति टन मिलती है। वहीं, व्हाइट बासमती राइस निर्यात करने की स्थिति में कीमत 1000 डॉलर प्रति टन को पार कर जाएगी। ब्रिटेन की चावल मिलें ब्राउन राइस की प्रोसेसिंग कर अपने ब्रांड के साथ बेचती हैं और मोटा मुनाफा कमाती हैं। लेकिन भारतीय कंपनियां अपने ब्रांड के साथ चावल नहीं बेच पाती हैं। ब्राउन राइस के साथ ब्रान होने के चलते इसका तेल और खली दोनों का फायदा वहां की चावल मिलें उठाती हैं।</p>
<p>जुलाई के शुरू में <strong>ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन</strong> के पूर्व अध्यक्ष <strong>विजय सेतिया</strong> ने इस संबंध में प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री को पत्र लिखकर इस मुद्दे के हल की अपील की थी। रूरल वॉयस को मिली जानकारी के मुताबिक, वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामले विभाग ने इस संबंध में कृषि मंत्रालय को कदम उठाने के लिए लिखा था, जहां से इस मामले को उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय को भेज दिया गया।</p>
<p>उद्योग का तर्क है कि ब्राउन राइस को एक हैल्दी उत्पाद माना जाता है। अगर हमें इसे निर्यात भी करना है तो फिर सरकार को इसके बल्क निर्यात की बजाय एक और पांच किलो के कंज्यूमर पैक में ही निर्यात&nbsp; की अनुमति देनी चाहिए ताकि उसकी बेहतर कीमत हमें मिल सकेगी। इसका फायदा फिलहाल ब्रिटेन की राइस मिलें उठा रही हैं।</p>
<p>भारत-ब्रिटेन एफटीए पर हस्ताक्षर के बाद दावा किया गया कि भारत के 99 फीसदी कृषि उत्पादों का ब्रिटेन को निर्यात शुल्क मुक्त हो गया है। लेकिन इस बात का जिक्र नहीं हो रहा है कि सबसे बड़े कृषि निर्यात में शुमार बासमती चावल पर शुल्क का मामला अनसुलझा रह गया और उसे इस समझौते में कवर ही नहीं किया गया। यह भारत के किसानों और निर्यातकों के लिए एक बड़े मौके को गवां देने का मामला है।&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ भारत-ब्रिटेन एफटीए से किसका फायदा? नहीं सुलझी बासमती निर्यात की पुरानी समस्या ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[वर्ष 2025&amp;#45;26 में वैश्विक अनाज उत्पादन नए रिकॉर्ड पर पहुंचने की उम्मीद, पर पिछले अनुमान से कम: आईजीसी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/global-grain-production-set-to-hit-new-record-in-2025-26-despite-minor-forecast-cut-igc.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 20 Jul 2025 21:40:18 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/global-grain-production-set-to-hit-new-record-in-2025-26-despite-minor-forecast-cut-igc.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अंतर्राष्ट्रीय अनाज परिषद (आईजीसी) ने बताया है कि पिछले महीने के अनुमान की तुलना में मामूली गिरावट के बावजूद, 2025-26 के विपणन वर्ष के लिए वैश्विक अनाज उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने की उम्मीद है। आईजीसी ने जौ और ज्वार के उत्पादन में कमी का अनुमान जताया है। इस वजह से गेहूं और मोटे अनाज के कुल उत्पादन के पूर्वानुमान में 10 लाख टन की कटौती की है।</p>
<p>इस कटौती के बावजूद गेहूं और मक्का की अच्छी पैदावार के कारण, कुल वैश्विक अनाज उत्पादन पिछले वर्ष के रिकॉर्ड से 2.6% बढ़कर 2.376 अरब टन होने का अनुमान है। गेहूं का उत्पादन 80.8 करोड़ टन रहने का अनुमान है। इसमें साल-दर-साल 80 लाख टन की वृद्धि होगी। मक्का का उत्पादन 4.8 करोड़ टन बढ़कर 1.276 अरब टन होने की उम्मीद है।</p>
<p>आईजीसी को विभिन्न क्षेत्रों में गेहूं और मोटे अनाज के रिकॉर्ड उपयोग की भी उम्मीद है। खाद्य उपयोग में 1.3 करोड़ टन, चारे में 1.6 करोड़ टन और औद्योगिक उपयोग में 70 लाख टन की वृद्धि होगी। पिछले वर्ष की तुलना में कुल खपत में 2% की वृद्धि होगी।</p>
<p>तिलहन की बात करें तो 2025-26 में वैश्विक सोयाबीन उत्पादन में साल-दर-साल 1% की वृद्धि का अनुमान है। यह 42.8 करोड़ टन के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच जाएगा। इसका मुख्य कारण दक्षिणी गोलार्ध में अधिक पैदावार है। आईजीसी ने कहा कि आपूर्ति पर्याप्त बनी रहेगी, लेकिन बढ़ते उपयोग के कारण कैरीओवर स्टॉक में कमी आ सकती है। दक्षिण अमेरिकी देशों द्वारा वैश्विक व्यापार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के साथ वैश्विक सोयाबीन आयात में 2% की वृद्धि होने की उम्मीद है।</p>
<p>चावल उत्पादन में मामूली वृद्धि का अनुमान है, खासकर शीर्ष निर्यातक देशों में। अफ्रीका और एशिया में बढ़ती खाद्य मांग के कारण वैश्विक चावल की खपत में भी 1% की वृद्धि होने की उम्मीद है।</p>
<p>मूल्य निर्धारण के मोर्चे पर देखें तो आईजीसी अनाज और तिलहन सूचकांक (जीओआई) पिछले महीने की तुलना में 1% बढ़ा है। मक्का और सोयाबीन की कीमतों में बढ़ोतरी ने गेहूं और चावल में मामूली गिरावट को संतुलित कर दिया। हालांकि जीओआई साल-दर-साल 3.4% नीचे बना हुआ है, जिसका मुख्य कारण चावल की कीमतों में 32% की भारी गिरावट है। इसने मक्का की कीमतों में हुई बढ़ोतरी की भरपाई कर दी।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/04/image_750x500_67f123b802cc1.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ वर्ष 2025-26 में वैश्विक अनाज उत्पादन नए रिकॉर्ड पर पहुंचने की उम्मीद, पर पिछले अनुमान से कम: आईजीसी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/04/image_750x500_67f123b802cc1.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[ट्रंप के ‘मेगा बिल’ में कृषि सब्सिडी का विस्तार, लेकिन बड़े कृषि व्यवसायियों को ज्यादा समर्थन]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/megabill-reshapes-us-farm-policy-more-support-for-big-ag-less-for-low-income-families.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 19 Jul 2025 17:50:16 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/megabill-reshapes-us-farm-policy-more-support-for-big-ag-less-for-low-income-families.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>रिपब्लिकन सांसदों द्वारा पारित विवादास्पद "मेगाबिल" अमेरिका की कृषि निधि में व्यापक बदलाव लाने वाला है। इसमें पशुधन और डेयरी उत्पादकों के लिए केंद्रीय सहायता का व्यापक विस्तार किया गया है, लेकिन पोषण सहायता पर निर्भर कम आय वाले अमेरिकियों के लिए सहायता में कमी की गई है। इसमें कृषि कार्यों के लिए सब्सिडी और बीमा में महत्वपूर्ण वृद्धि की गई है, जिसकी उद्योग समूहों ने प्रशंसा की है, लेकिन खाद्य नीति से जुड़े लोगों ने इसकी आलोचना की है।</p>
<p><strong>पशुधन हानि के लिए पूर्ण मुआवजा</strong><br />इस विधेयक के सबसे प्रभावशाली प्रावधानों में से एक पशुधन क्षतिपूर्ति कार्यक्रम (LIP) का विस्तार है, जो दूसरे जानवरों द्वारा या अन्य कारणों से मारे गए पशुओं के लिए किसानों को 100% प्रतिपूर्ति प्रदान करता है, जो पहले 75% था। समर्थकों का कहना है कि यह प्रावधान बढ़ते जलवायु संबंधी जोखिमों के बीच महत्वपूर्ण राहत प्रदान करता है।</p>
<p>पशुधन चारा आपदा कार्यक्रम (Livestock Forage Disaster Program) में भी संशोधन किया गया है ताकि किसान सूखे के बाद केवल चार सप्ताह के बाद लाभ का दावा कर सकें। पहले यह सीमा आठ सप्ताह की थी। इसके अलावा, भुगतान राशि दोगुनी कर दी गई है और पहली बार अजन्मे पशुओं के नुकसान को भी कवर किया गया है। पशु स्वास्थ्य संरक्षण अधिनियम के तहत पशु रोग निवारण के लिए भी धनराशि बढ़ा दी गई है।</p>
<p><strong>बड़ी डेयरी को बड़ा बढ़ावा</strong><br />डेयरी किसानों की आय की सुरक्षा के लिए डेयरी मार्जिन कवरेज (डीएमसी) कार्यक्रम को 2031 तक बढ़ा दिया गया है। लेकिन इसमें प्रीमियम सीमा को सालाना 50 लाख पाउंड दूध से बढ़ाकर 60 लाख पाउंड कर दिया गया है। इस कदम से मुख्यतः बड़े डेयरी संचालकों को लाभ होगा।&nbsp;</p>
<p><strong>पोल्ट्री किसानों के लिए पायलट कार्यक्रम</strong><br />जलवायु संबंधी बढ़ते खर्चों को ध्यान में रखते हुए, मेगा बिल में यूएसडीए को कॉन्ट्रैक्ट वाले पोल्ट्री उत्पादकों के लिए एक पायलट बीमा कार्यक्रम बनाने का निर्देश दिया गया है। अनेक उत्पादक भारी-भरकम बिजली बिलों और कर्ज के बोझ तले दबे हुए हैं। यह नया कार्यक्रम खराब मौसम के कारण होने वाले नुकसान को कवर करने में मदद करेगा।</p>
<p><strong>फसल बीमा के साथ कर छूट बढ़ाई गई</strong><br />पशुधन और डेयरी के अलावा, इस मेगा बिल में अगले दस वर्षों में फसल बीमा निधि में 6.3 अरब डॉलर की वृद्धि शामिल है। इसमें इनकम की सीमा हटाने के साथ भुगतान की सीमा बढ़ाई गई है। संदर्भ मूल्य भी बढ़ाया गया है, जिसे बड़े उत्पादकों के लिए अनुकूल माना जा रहा है। इसके अतिरिक्त, विधेयक में किसानों को नए कर लाभ दिए हैं तथा कृषि व्यापार प्रमोशन के प्रयासों के लिए वित्तपोषण दोगुना कर दिया गया है।</p>
<p><strong>पोषण सहायता में कटौती से चिंता बढ़ी</strong><br />बड़े पैमाने पर कृषि क्षेत्र को दिए जाने वाले इन लाभों के विपरीत पूरक पोषण सहायता कार्यक्रम (SNAP) के लिए संघीय सहायता में कटौती की गई है। पात्रता मानदंड कड़े किए गए हैं और राज्य सरकारों पर वित्तीय जिम्मेदारियां बढ़ा दी गई हैं। पोषण समर्थकों का कहना है कि इन बदलावों से लाखों निम्न-आय वाले परिवारों, खासकर बच्चों और वरिष्ठ नागरिकों के लिए सेहतमंद खाद्य पदार्थों तक पहुच कम हो सकती है।</p>
<p><strong>कृषि विधेयक पर अनिश्चितता</strong><br />इस मेगा बिल के कई प्रावधान आम तौर पर व्यापक अमेरिकी कृषि विधेयक का हिस्सा हैं, जिसका रिन्युअल होना है। इसके अलग-अलग प्रावधानों को पारित कराकर सांसदों ने एक नए व्यापक कृषि विधेयक की तात्कालिकता को कम कर दिया है। इससे कई प्रमुख कृषि नीतियां अनसुलझी रह गई हैं। कुछ विश्लेषकों का सुझाव है कि इस वर्ष के अंत में एक "संक्षिप्त" कृषि विधेयक ही पारित हो सकता है, जो संरचनात्मक सुधारों को लागू करने के बजाय बुनियादी कार्यों पर केंद्रित होगा।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ ट्रंप के ‘मेगा बिल’ में कृषि सब्सिडी का विस्तार, लेकिन बड़े कृषि व्यवसायियों को ज्यादा समर्थन ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[वैश्विक अनाज ढुलाई दरों में कमी से निर्यातकों को राहत, लेकिन भूराजनीतिक तनाव के कारण अनिश्चितता बरकरार]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/global-grain-shipping-faces-low-freight-rates-but-high-uncertainty.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 19 Jul 2025 15:28:10 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/global-grain-shipping-faces-low-freight-rates-but-high-uncertainty.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अनाज जैसे कृषि उत्पादों के लिए वैश्विक शिपिंग बाजार विरोधाभासी स्थिति का सामना कर रहा है। एक ओर जहां निर्यातकों को रिकॉर्ड स्तर पर सस्ते मालभाड़े का लाभ मिल रहा है, वहीं दूसरी ओर व्यापारिक तनाव, भूराजनीतिक अनिश्चितताएं और बदलते व्यापारिक संबंध इस लाभ को खतरे में डाल रहे हैं।</p>
<p>साल की शुरुआत में भाड़े की दरों में मामूली वृद्धि हुई, लेकिन ये अब भी पिछले साल की तुलना में काफी कम हैं। इंटरनेशनल ग्रेन्स काउंसिल (IGC) के अनुसार, मई 2025 के अंत में ग्रेन्स एंड ऑयलसीड्स फ्रेट इंडेक्स (GOFI) 131 पर था, जो पिछले साल की तुलना में 15% कम है और जुलाई 2024 के उच्चतम स्तर 163 से काफी नीचे है।</p>
<p>यह गिरावट अनाज निर्यातकों के लिए राहत भरी है। पनमैक्स और सुप्रामैक्स जैसे जहाजों की भरमार ने &nbsp;भी मालभाड़ा दरों को नीचे ला दिया है। पनमैक्स जहाज आमतौर पर अमेरिका से एशिया तक लंबे मार्गों पर अनाज ढोने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। दुनिया की सबसे बड़ी शिपिंग एसोसिएशनों में से एक, बिम्को (BIMCO) का कहना है कि 2025 के दौरान ये दरें नरम बनी रहेंगी।&nbsp;</p>
<p>वर्ल्ड ग्रेन पत्रिका के अनुसार, अमेरिका के निर्यातकों के लिए यह राहत अस्थायी हो सकती है। अमेरिका-चीन के बीच लंबे समय से चले आ रहे व्यापारिक तनाव के कारण निर्यातकों को अचानक बदलती टैरिफ नीतियों से खतरा बना रहता है। मई 2025 में 90 दिनों के टैरिफ विराम की घोषणा के बाद कुछ राहत मिली, लेकिन यदि यह लंबे समय तक नहीं चला, तो इसका असर अल्पकालिक ही रहेगा।</p>
<p>इस बीच, चीन अपनी खाद्यान्न आत्मनिर्भरता नीति को तेजी से लागू कर रहा है, जिसके चलते उसने 2024 में अमेरिका से मक्का आयात में लगभग 50% की कटौती की। अमेरिका कभी चीन को प्रमुख मक्का आपूर्तिकर्ता था, अब ब्राज़ील से पिछड़ रहा है। अमेरिका की वैश्विक अनाज निर्यात हिस्सेदारी 2024 के 22% से गिरकर 2025 में 12% तक जा सकती है।</p>
<p>सोयाबीन के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ। टैरिफ की आशंका में 2025 की पहली तिमाही में चीन ने अमेरिका से आयात बढ़ा दिया, लेकिन दूसरी तिमाही में यह पूरी तरह बंद हो गया। ब्राज़ील ने इस अंतर को भरा और 2025 के विपणन वर्ष में वह चीन को 10.7 करोड़ टन सोयाबीन का निर्यात कर सकता है। जहां तक माल ढुलाई मार्गों की बात है, चीन से अमेरिका और ब्राज़ील दोनों की दूरी लगभग समान है, लेकिन ब्राज़ील की कम कीमत और कम राजनीतिक जोखिम ने उसे लाभ पहुंचाया है।</p>
<p>जहाजों की अत्यधिक आपूर्ति के कारण भी ढुलाई दरें कम हुई हैं। 2025 में पनमैक्स जहाजों की आपूर्ति 2.8% बढ़ेगी जबकि मांग केवल 3.5% बढ़ने की संभावना है। सुप्रामैक्स जहाजों के मामले में भी यही स्थिति है।</p>
<p>जहाजों की अधिक आपूर्ति का अभी तक ज्यादा असर नहीं दिख रहा है, क्योंकि रेड सी और स्वेज नहर क्षेत्र में हूती विद्रोहियों के हमलों के कारण जहाज दक्षिण अफ्रीका के निचले हिस्से, उत्तमाशा अंतरीप होकर गुजर रहे हैं। लेकिन अगर स्वेज नहर से आवागमन सामान्य होने पर शिपिंग बाजार में जहाजों की अतिरिक्त आपूर्ति होने लगेगी। स्वेज मार्ग पूरी तरह से चालू होने पर शिपिंग मांग में 2% की गिरावट आ सकती है।</p>
<p>अमेरिका ने हाल ही में चीन निर्मित जहाजों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने की योजना बनाई थी, जिससे कुछ शिपिंग कंपनियों ने अमेरिकी बंदरगाहों पर आना बंद कर दिया। हालांकि, बाद में नीति में छूट दी गई और बल्क कार्गो जहाजों को इसके दायरे से बाहर कर दिया गया।</p>
<p>इस साल अनाज की वैश्विक मांग भी कमजोर रही है। IGC के अनुसार, 2024-25 में वैश्विक गेहूं व्यापार में 10% की गिरावट होगी और यह चार वर्षों के सबसे निचला स्तर पर होगा। इसका प्रमुख कारण है कि चीन, तुर्की और इंडोनेशिया जैसे बड़े आयातक देशों की अपनी फसल भी अच्छी हुई है। मक्का की मांग अफ्रीका से बढ़ी है, जिससे थोड़ा संतुलन बना है। सोयाबीन व्यापार में 1% की मामूली वृद्धि अनुमानित है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ वैश्विक अनाज ढुलाई दरों में कमी से निर्यातकों को राहत, लेकिन भूराजनीतिक तनाव के कारण अनिश्चितता बरकरार ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[ट्रम्प टैरिफ के बीच मैक्सिको का अमेरिका से दूध पाउडर आयात में कटौती का फैसला, क्या भारत इस कमी को पूरा करेगा?]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/amid-trump-tariffs-mexico-decides-to-cut-us-milk-powder-imports-can-india-fill-the-gap.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 13 Jul 2025 09:20:36 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/amid-trump-tariffs-mexico-decides-to-cut-us-milk-powder-imports-can-india-fill-the-gap.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के टैरिफ युद्ध के बीच मैक्सिको ने अमेरिका से दूध पाउडर के आयात में तेजी से कटौती करने और देश में दूध पाउडर उत्पादन संयंत्र स्थापित करने की योजना की घोषणा की है। यह नीति मैक्सिको की कृषि-खाद्य रणनीति में एक रणनीतिक बदलाव का संकेत देती है, जिसका उद्देश्य खाद्य संप्रभुता को मजबूत करना, स्थानीय डेयरी किसानों को समर्थन देना और विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता कम करना है। इन लक्ष्यों को हासिल करने में समय लग सकता है, इसलिए दूध के सबसे बड़े उत्पादक भारत के सामने मैक्सिको को निर्यात का मौका बन सकता है।</p>
<p>मैक्सिको की यह पहल कृषि और ग्रामीण विकास मंत्रालय (SADER) द्वारा संचालित एक महत्वाकांक्षी सरकारी रणनीति का हिस्सा है। इसके तहत 1990 के दशक में निजीकरण किए गए संयंत्रों सहित, घरेलू डेयरी प्लांटों को फिर से खोलना और आधुनिक बनाया जाएगा ताकि महत्वपूर्ण प्रसंस्करण इन्फ्रास्ट्रक्चर को पुनर्स्थापित किया जा सके। किसानों को दूध का प्रीमियम मूल्य सुनिश्चित करने के साथ उपभोक्ताओं को सस्ती दरों पर दूध उपलब्ध कराया जाएगा।&nbsp;</p>
<p>मैक्सिको ने 2025 से 2030 के बीच राष्ट्रीय दूध उत्पादन को 13.3 अरब लीटर से बढ़ाकर 15 अरब लीटर वार्षिक करने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए 4.1 अरब डॉलर का निवेश किया जाएगा, जिससे वर्तमान दूध पाउडर आयात का 30% तक प्रतिस्थापित करने का लक्ष्य है। चूंकि 97% मैक्सिकन डेयरी उत्पादक छोटे किसान हैं, इसलिए सब्सिडी, तकनीकी सहायता और इन्फ्रास्ट्रक्चर में सुधार के माध्यम से छोटे और मध्यम उत्पादकों की मदद भी की जाएगी।</p>
<p>मैक्सिको की यह नीति परिवर्तन वैश्विक व्यापार में तनाव के बीच आई है। उसके इस घोषणा के बाद ही अमेरिका ने मैक्सिको और यूरोपीय संघ से आयात पर 30% टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी। अमेरिका अभी मैक्सिको का सबसे बड़ा डेयरी उत्पाद आपूर्तिकर्ता है। मैक्सिकों का यह कदम उत्तर अमेरिकी डेयरी व्यापार को नया आकार देने और भारत जैसे वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं के लिए अवसर पैदा कर सकता है।</p>
<p>हालांकि कई चुनौतियाां बनी हुई हैं। जैसे पर्याप्त निवेश, उन्नत प्रसंस्करण तकनीक और उच्च गुणवत्ता वाले कच्चे दूध की निरंतर उपलब्धता। अमेरिकी आपूर्तिकर्ताओं की तुलना में मैक्सिकन उत्पादकों को अधिक लागत का भी सामना करना पड़ता है।</p>
<p>आर्थिक पहलुओं से परे, इस पहल के भू-राजनीतिक प्रभाव भी हैं। अमेरिकी डेयरी आयात पर निर्भरता कम करके, मैक्सिको अपने व्यापार संबंधों का विविधीकरण और बाहरी नीतिगत अनिश्चितताओं के विरुद्ध लचीलापन विकसित करने का संकेत देता है।&nbsp;</p>
<p><strong>भारत के लिए अवसर?</strong><br />भारत प्रति वर्ष 240 अरब लीटर दूध उत्पादन के साथ दुनिया का अग्रणी दूध उत्पादक देश है। वैश्विक उत्पादन में इसकी लगभग एक-चौथाई हिस्सेदारी है। 2024 में अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, यूरोपीय संघ, न्यूजीलैंड और अमेरिका जैसे पांच प्रमुख डेयरी निर्यातकों ने कुल 28.89 करोड़ टन गाय के दूध का उत्पादन किया। अगले 3-5 वर्षों में, भारत अकेले इन पांच देशों के बराबर दूध उत्पादन कर सकता है।</p>
<p>दुग्ध विशेषज्ञ विपिन कक्कड़ के अनुसार, &ldquo;सामान्य वर्ष में भारतीय डेयरी उद्योग लगभग 6 लाख टन स्किम्ड मिल्क पाउडर (SMP) का उत्पादन करता है। इसमें से लगभग 3.5 लाख टन की खपत लीन सीजन में देश में ही होती है, विभिन्न खाद्य पदार्थों में 1.5 लाख टन का इस्तेमाल होता है और लगभग 1 लाख टन रोलिंग स्टॉक के रूप में बचता है। पिछले 2-3 वर्षों में कच्चे दूध की आकर्षक कीमतों, मवेशी संख्या में वृद्धि, बेहतर आहार और लीन सीजन छोटा होने के कारण 3 लाख टन से अधिक SMP का अधिशेष स्टॉक था।&rdquo;</p>
<p>उन्होंने कहा, &ldquo;मुझे लगता है कि भारत से SMP और मक्खन का निर्यात आसानी से किया जा सकता है। हमारे लिए अच्छी बात यह रही कि हमने पिछले साल (2024 में) अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धी कीमतों पर मक्खन/दूध वसा का शानदार निर्यात किया (55,000 टन), जिससे डेयरी प्रसंस्करण संयंत्रों का स्टॉक कम हुआ, कार्यशील पूंजी की आवश्यकता घटी और देश के लिए विदेशी मुद्रा भी अर्जित हुई।&rdquo;</p>
<p></p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ ट्रम्प टैरिफ के बीच मैक्सिको का अमेरिका से दूध पाउडर आयात में कटौती का फैसला, क्या भारत इस कमी को पूरा करेगा? ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[चीन और यूरोप में कहीं हीटवेव तो कहीं भीषण बारिश, फसलों को नुकसान से खाद्य सुरक्षा को लेकर चिंता]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/droughts-devastate-crops-across-china-and-europe-as-extreme-heat-and-rainfall-variability-threaten-global-food-security.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 12 Jul 2025 14:44:42 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/droughts-devastate-crops-across-china-and-europe-as-extreme-heat-and-rainfall-variability-threaten-global-food-security.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>चीन के यांग्त्जी नदी बेसिन के सूखे खेतों से लेकर उत्तरी यूरोप के खेतों तक, चरम मौसम की स्थिति वैश्विक कृषि पर भारी असर डाल रही है। जलवायु परिवर्तन के कारण लगातार बढ़ रहे और तीव्र सूखे और हीटवेव के कारण किसानों की फसलों को गंभीर नुकसान हो रहा है। नतीजा, उन पर कर्ज बढ़ रहा है और साथ ही मौसम के कारण उन्हें अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है।</p>
<p><strong>हीटवेव में झुलस रही हैं चीन की फसलें&nbsp;</strong><br />पूर्वी और मध्य चीन में हीटवेव देश के सबसे महत्वपूर्ण कृषि और औद्योगिक क्षेत्रों के बड़े हिस्से को झुलसा रही है। अनहुई, झेजियांग, हुबेई और हेनान जैसे प्रांतों में तापमान 40&deg;C से ऊपर पहुंच गया है, जो वहां मौसमी मानदंडों से कहीं अधिक है। उपोष्णकटिबंधीय उच्च दाब प्रणाली, जो आमतौर पर जुलाई के मध्य में आती है, पहले ही सक्रिय हो चुकी है। इससे सानफू सीजन, जो भारत के नौतपा की तरह पारंपरिक रूप से साल का सबसे गर्म समय होता है, खतरनाक रूप से जल्दी शुरू हो गया।</p>
<p>इस अचानक और तीव्र गर्मी ने चीनी किसानों के बीच चिंता बढ़ा दी है। लंबे समय से जारी सूखे के कारण मिट्टी की नमी कम हो रही है, फसलों पर दबाव बढ़ रहा है और सिंचाई प्रणालियों को खतरा है। एयर कंडीशनरों से बिजली की मांग पहले ही राष्ट्रीय रिकॉर्ड बना चुकी है, जिससे सिचुआन जैसे जलविद्युत पर निर्भर प्रांतों पर और दबाव बढ़ गया है, जो औसत से कम बारिश से भी जूझ रहे हैं।</p>
<p>एक तरफ पूर्वी चीन तप रहा है, तो देश के अन्य हिस्से मूसलाधार बारिश से जूझ रहे हैं, जिससे अचानक बाढ़ आ रही है और खेत जलमग्न हो रहे हैं, खासकर चेंगदू जैसे इलाकों में। यह जलवायु परिवर्तन चीन के मौसम के मिजाज की बढ़ती अनिश्चितता और कृषि पर इसके जटिल प्रभाव को रेखांकित करता है।</p>
<p><strong>सूखा गहराने से यूरोपीय किसान संकट के कगार पर</strong><br />चीन से हजारों किलोमीटर दूर, उत्तर-पश्चिमी यूरोप के किसान दशकों में सबसे शुष्क ऋतुओं में से एक का सामना कर रहे हैं। नीदरलैंड, जर्मनी और बेल्जियम जैसे देशों में अप्रैल से ही बारिश की कमी हो गई थी। वहां कम बारिश का असर फसलों पर पड़ रहा है।</p>
<p>जर्मनी का सैक्सोनी-एनहाल्ट क्षेत्र भी संघर्ष कर रहा है, जहां अपेक्षित वर्षा के आधे से भी कम बारिश हुई है। वहां के किसानों ने चेतावनी दी है कि अगर जल्द ही बारिश नहीं हुई, तो फसलों का नुकसान 30% या उससे भी अधिक हो सकता है। यहां तक कि पशुपालक किसान भी संकट का सामना कर रहे हैं। वे चारे की आपूर्ति के लिए चिंतित हैं। यूरोपीय सूखा वेधशाला (European Drought Observatory) ने महाद्वीप के लगभग एक-तिहाई हिस्से को सूखे की ऑरेंज चेतावनी के तहत रखा है, जबकि एक अंश पहले से ही रेड एलर्ट जोन में है।</p>
<p><strong>अरबों का नुकसान और अधिकांश बीमा रहित</strong><br />बीमा समूह हाउडेन की एक हालिया रिपोर्ट ने इन जलवायु-जनित घटनाओं की चौंका देने वाली वित्तीय लागत पर रिपोर्ट जारी की है। इसने बताया है कि यूरोपीय संघ के कृषि क्षेत्र को वर्तमान में चरम मौसम के कारण सालाना लगभग 28 अरब यूरो का नुकसान होता है। यह आंकड़ा वर्ष 2050 तक बढ़कर 40 अरब यूरो होने का अनुमान है। विनाशकारी वर्षों में तो कुल नुकसान 90 अरब यूरो से भी ज्यादा हो सकता है।</p>
<p>इनमें से 50% से ज्यादा नुकसान सूखे के कारण होता है, जिससे यह यूरोप में खाद्य उत्पादन के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है। स्पेन और इटली जैसे देशों में सालाना 20 अरब यूरो तक की क्षति हो सकती है, जबकि मध्य और दक्षिण-पूर्वी यूरोप की छोटी अर्थव्यवस्थाओं को चरम घटनाओं के दौरान 3% से ज्यादा की जीडीपी हानि का सामना करना पड़ता है।</p>
<p>किसानों के लिए एक और चिंताजनक बात यह है कि इन नुकसानों का केवल 20-30% ही बीमाकृत है। जिसका अर्थ है कि अधिकांश किसानों को खुद इस नुकसान का वित्तीय बोझ उठाना पड़ रहा है।</p>
<p>जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन तेज हो रहा है, वैश्विक कृषि प्रणाली लगातार कमजोर होती जा रही है। 2025 का मौसम भले ही अभी तक का सबसे बुरा मौसम न हो, लेकिन चीन और यूरोप से मिल रहे शुरुआती संकेत खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण आजीविका और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं के लिए बढ़ते खतरों की ओर इशारा करते हैं।&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ चीन और यूरोप में कहीं हीटवेव तो कहीं भीषण बारिश, फसलों को नुकसान से खाद्य सुरक्षा को लेकर चिंता ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[वर्ष 2025 में वैश्विक स्तर पर रिकॉर्ड अनाज उत्पादन का अनुमान, लेकिन जोखिम बरकरारः एफएओ]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/global-cereal-output-set-to-hit-record-in-2025-but-risks-remain-fao.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 06 Jul 2025 18:15:00 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/global-cereal-output-set-to-hit-record-in-2025-but-risks-remain-fao.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने 2025 के लिए अपने वैश्विक अनाज उत्पादन पूर्वानुमान को लगभग 1.4 करोड़ टन बढ़ाकर 292.5 करोड़ टन के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंचा दिया है। यह पिछले वर्ष की तुलना में 2.3 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। इसका मुख्य कारण गेहूं, मक्का और चावल उत्पादन की बेहतर संभावनाएं हैं।</p>
<p>FAO का जुलाई का अपडेट प्रमुख उत्पादक देशों, विशेष रूप से भारत और पाकिस्तान में अपेक्षा से अधिक मजबूत पैदावार को दर्शाता है। साथ ही ब्राजील और दक्षिण पूर्व एशिया के कुछ हिस्सों में फसल की संभावनाओं में भी बेहतरी हुई है। हालांकि, एफएओ ने यह चेतावनी भी दी है कि जलवायु संबंधी जोखिम और भू-राजनीतिक तनाव आने वाले वर्ष में उत्पादन और व्यापार दोनों के लिए अनिश्चितता पैदा करते रहेंगे।</p>
<p><strong>गेहूं, मक्का और चावल में बेहतरी</strong><br />वैश्विक गेहूं उत्पादन अब 2025 के लिए 80.53 करोड़ टन होने का अनुमान है, जो पिछले मासिक अनुमान से 0.7 प्रतिशत की वृद्धि और 2024 के स्तर से 0.9 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। यह वृद्धि मुख्य रूप से भारत और पाकिस्तान के आधिकारिक आंकड़ों के कारण हुई है। भारत में बेहतर पैदावार और रिकॉर्ड उत्पादन की संभावना है।</p>
<p>मक्का सहित मोटे अनाज के लिए भी पूर्वानुमान थोड़ा बढ़ाकर 126.2 करोड़ टन कर दिया गया है, जो पिछले साल की तुलना में 3.5 प्रतिशत अधिक है। यह श्रेणी 2025 में समग्र अनाज उत्पादन में वृद्धि का मुख्य कारण बनी हुई है। यह ब्राजील में मक्का की अच्छी पैदावार के साथ-साथ भारत में मक्के का रकबा बढ़ने का परिणाम है, जहां पशु चारा और औद्योगिक उपयोगों की बढ़ती घरेलू मांग किसानों को खेती का रकबा बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित कर रही है।</p>
<p>हालांकि, यूक्रेन और यूरोपीय संघ में उत्पादन में गिरावट का अनुमान है। यूक्रेन में चल रहे संघर्ष और शुष्क मौसम की स्थिति पैदावार को प्रभावित कर रही है, जबकि यूरोपीय संघ को कम रकबे के कारण मामूली गिरावट का सामना करना पड़ा है।</p>
<p>इस बीच, 2025-26 के लिए वैश्विक चावल उत्पादन 55.56 करोड़ टन (मिल्ड आधार पर) होने का अनुमान है। यह एक नया रिकॉर्ड है और इसमें साल-दर-साल एक प्रतिशत वृद्धि होगी। यह वृद्धि भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान और वियतनाम से प्रेरित है। इसके विपरीत, इराक और अमेरिका के लिए चावल उत्पादन के पूर्वानुमान कम कर दिए गए हैं।</p>
<p><strong>अनाज के उपयोग, स्टॉक और व्यापार में भी वृद्धि की उम्मीद&nbsp;</strong><br />रिकॉर्ड उत्पादन के साथ-साथ, 2025-26 में वैश्विक अनाज उपयोग 290 करोड़ टन तक पहुंचने की उम्मीद है, जो 2024-25 की तुलना में 0.8 प्रतिशत और पिछले महीने के पूर्वानुमान से 20 लाख टन अधिक है। उल्लेखनीय रूप से, मोटे अनाज का उपयोग 15.48 करोड़ टन होने का अनुमान है। इसमें जौ, मक्का और ज्वार की अधिक खपत होगी।</p>
<p>हालांकि चीन, मोरक्को और अमेरिका में मांग में कमी की उम्मीदों के कारण FAO ने अपने गेहूं उपयोग पूर्वानुमान को 40 लाख टन कम कर दिया। इस समायोजन के बावजूद, गेहूं के उपयोग में 2024-25 से 0.8 प्रतिशत की वृद्धि होने का अनुमान है।</p>
<p>भारत में बढ़ती खाद्य मांग और बढ़ते इथेनॉल उत्पादन की बदौलत वैश्विक चावल उपयोग 1.8 प्रतिशत बढ़कर 55.04 करोड़ टन तक पहुंचने का अनुमान है।</p>
<p>जहां तक वैश्विक अनाज भंडार की बात है, तो एफएओ को उम्मीद है कि 2025-26 के मौसम के अंत तक यह 88.91 करोड़ टन तक पहुंच जाएगा। शुरुआती स्तरों की तुलना में इसमें 2.2 प्रतिशत की वृद्धि होगी। यह सकारात्मक संशोधन मुख्य रूप से गेहूं के भंडार के कारण है। ऑस्ट्रेलिया, चीन, पाकिस्तान, रूस और अमेरिका में अधिक भंडार के कारण यह 32.1 करोड़ टन होने का अनुमान है।</p>
<p>मोटे अनाज के भंडार को मुख्य उत्पादक देशों में जौ के कम स्टॉक के कारण मामूली रूप से संशोधित किया गया है। लेकिन कुल मिलाकर इसके अब भी 3.6 प्रतिशत बढ़कर 35.36 करोड़ टन होने की उम्मीद है। चावल के भंडार का अनुमान रिकॉर्ड 21.44 करोड़ टन का है। यह भारत, बांग्लादेश, इक्वाडोर और पाकिस्तान में बेहतर उत्पादन के कारण होगा।</p>
<p><strong>व्यापार का परिदृश्य मिश्रित&nbsp;</strong><br />एफएओ का अनुमान है कि 2025-26 में वैश्विक अनाज व्यापार 1.2 प्रतिशत बढ़कर 48.69 करोड़ टन हो जाएगा। मोटे अनाज का व्यापार 0.6 प्रतिशत की मामूली गिरावट के साथ 22.66 करोड़ टन रहने की संभावना है, जबकि मक्का के निर्यात में 1.9 प्रतिशत गिरावट की उम्मीद है। यह यूक्रेन से कम आपूर्ति के कारण होगा। जौ और ज्वार के व्यापार में क्रमशः 2.8 प्रतिशत और 15.3 प्रतिशत वृद्धि होने की उम्मीद है।</p>
<p>गेहूं के व्यापार में पिछले सीजन की तुलना में 4.0 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान है, लेकिन ऑस्ट्रेलिया और यूक्रेन में लाभ के बावजूद रूस से निर्यात की कम संभावनाओं के कारण इस महीने इसे 6 लाख टन कम कर दिया गया है। कंबोडिया और वियतनाम द्वारा अपने निर्यात परिदृश्यों को बढ़ाने के साथ अंतर्राष्ट्रीय चावल व्यापार 2025 में रिकॉर्ड 6.08 करोड़ टन तक पहुंचने वाला है, जो साल-दर-साल 2 प्रतिशत अधिक है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ वर्ष 2025 में वैश्विक स्तर पर रिकॉर्ड अनाज उत्पादन का अनुमान, लेकिन जोखिम बरकरारः एफएओ ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[डेयरी और वनस्पति तेल के दाम बढ़ने से वैश्विक खाद्य मूल्य सूचकांक बढ़ा, लेकिन अनाज और चीनी की कीमतों में गिरावट]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/global-food-price-index-rises-slightly-in-june-amid-surge-in-dairy-meat-and-vegetable-oil-prices.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 05 Jul 2025 13:24:15 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/global-food-price-index-rises-slightly-in-june-amid-surge-in-dairy-meat-and-vegetable-oil-prices.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) की तरफ से जारी नवीनतम आंकड़ों के अनुसार जून 2025 में वैश्विक खाद्य मूल्य सूचकांक (FFPI) में हल्की वृद्धि दर्ज की गई। मीट, दुग्ध उत्पादों और वनस्पति तेलों की बढ़ती कीमतों के चलते सूचकांक 128.0 अंकों पर पहुंच गया, जो मई की तुलना में 0.7 अंक (0.5%) अधिक है। हालांकि यह जून 2024 से 5.8% अधिक है, फिर भी मार्च 2022 में दर्ज उच्चतम स्तर से 20.1% कम बना हुआ है।</p>
<p><strong>अनाज की कीमतों में गिरावट जारी</strong><br />हालांकि समग्र सूचकांक में वृद्धि हुई, लेकिन अलग-अलग खाद्य समूहों में मिश्रित रुझान देखने को मिले। अनाज मूल्य सूचकांक जून में 1.5% गिरकर 107.4 अंक पर आ गया और यह साल-दर-साल 6.8% कम रहा। लगातार दूसरे महीने मक्का की वैश्विक कीमतों में तीव्र गिरावट दर्ज की गई, जिसका कारण अर्जेंटीना और ब्राजील से मौसमी आपूर्ति में वृद्धि और वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा का बढ़ना रहा।</p>
<p>ज्वार और जौ की कीमतों में भी गिरावट आई, जबकि गेहूं की कीमतों में हल्की बढ़ोतरी हुई। इसकी वजह रूस, यूरोपीय संघ और अमेरिका में मौसम संबंधी चिंता रही, जो कटाई के मौसम के बावजूद कीमतों पर असर डाल रही है। मुख्यतः इंडिका किस्मों की मांग में कमी के कारण चावल की कीमतें 0.8% गिरीं।</p>
<p><strong>वनस्पति तेल की कीमतों में तेज वृद्धि</strong><br />वनस्पति तेल मूल्य सूचकांक जून में 2.3% बढ़कर 155.7 अंक पर पहुंच गया। पाम, रेपसीड और सोया तेल की कीमतों में वृद्धि इसका प्रमुख कारण रही। वैश्विक आयात मांग के कारण पाम तेल की कीमतों में लगभग 5% की वृद्धि हुई। सोया तेल की कीमतों को ब्राज़ील और अमेरिका में जैव-ईंधन नीति की घोषणाओं से बल मिला। रेपसीड तेल की कीमतें वैश्विक आपूर्ति में संभावित कमी के कारण बढ़ीं। दूसरी ओर सूरजमुखी तेल के दाम गिरे क्योंकि काला सागर क्षेत्र में इसकी अच्छी फसल की उम्मीद है।</p>
<p><strong>दुग्ध उत्पादों की कीमतों में मजबूती</strong><br />दुग्ध मूल्य सूचकांक जून में 0.5% बढ़कर 154.4 अंक पर पहुंच गया, जो जून 2024 से 20.7% अधिक है। मक्खन की कीमतों में सबसे अधिक 2.8% की वृद्धि हुई और यह 225 अंकों के नए रिकॉर्ड पर पहुंच गया। इसका कारण ओशिनिया और यूरोपीय संघ में आपूर्ति की कमी और एशिया तथा निकट पूर्व से मजबूत आयात मांग रहा।</p>
<p>यूरोपीय संघ में पर्यावरण नियमों के चलते पशुधन में कमी और ब्लूटंग वायरस के प्रभावों ने दूध उत्पादन को बाधित किया। अमेरिका में मक्खन उत्पादन कम रहा और स्टॉक पिछले साल की तुलना में घट गए, जिससे कीमतों पर दबाव बना। पनीर की कीमतों में तीसरे महीने भी वृद्धि हुई, जबकि स्किम्ड मिल्क पाउडर में 0.6% और फुल क्रीम मिल्क पाउडर में 2.3% की गिरावट आई, क्योंकि वैश्विक आपूर्ति प्रचुर और मांग कमजोर रही।</p>
<p><strong>चीनी की कीमतों में गिरावट</strong><br />चीनी मूल्य सूचकांक जून में 5.2% गिरकर 103.7 अंक पर आ गया, जो अप्रैल 2021 के बाद सबसे कम है। यह लगातार चौथा महीना है जब इसमें गिरावट दर्ज की गई। ब्राजील में शुष्क मौसम के चलते गन्ने की कटाई और प्रोसेसिंग तेज हुई, जिससे उत्पादन उम्मीद से अधिक हुआ और कीमतों पर दबाव आया। भारत और थाईलैंड में सामान्य से बेहतर मानसून और बढ़े हुए रोपाई क्षेत्र ने 2025-26 सीजन के लिए अच्छी फसल की उम्मीदें बढ़ा दीं, जिससे वैश्विक कीमतों में और गिरावट आई।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ डेयरी और वनस्पति तेल के दाम बढ़ने से वैश्विक खाद्य मूल्य सूचकांक बढ़ा, लेकिन अनाज और चीनी की कीमतों में गिरावट ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[सूखा बना वैश्विक आपदा, खाद्य, जल और ऊर्जा संकट चरम पर: यूएन रिपोर्ट]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/drought-has-become-a-global-disaster-food-water-and-energy-crisis-is-at-its-peak-un-report.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 02 Jul 2025 14:36:55 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/drought-has-become-a-global-disaster-food-water-and-energy-crisis-is-at-its-peak-un-report.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अमेरिका के नेशनल ड्रॉट मिटिगेशन सेंटर (NDMC) और यूएन कन्वेंशन टू कॉम्बैट डेजर्टिफिकेशन (UNCCD) ने सूखे पर एक रिपोर्ट जारी की है। इसमें इतिहास में सबसे गंभीर और व्यापक सूखे की घटनाओं को सूचीबद्ध किया गया है। यह रिपोर्ट 2023 से 2025 तक की अवधि के लिए है और यह जलवायु परिवर्तन से प्रेरित सूखे का एक गंभीर विवरण प्रस्तुत करती है। इसके कारण दुनिया भर में खाद्य, जल और ऊर्जा संकट, आर्थिक व्यवधान और बड़े पैमाने पर मानवीय पीड़ा हो रही है।</p>
<p>"2023-2025 में दुनिया भर में सूखे के हॉटस्पॉट" शीर्षक वाली यह रिपोर्ट इंटरनेशनल ड्रॉट रेजिलियंस एलायंस (IDRA) द्वारा समर्थित है। इसमें यह भी बताया गया है कि भारत और थाईलैंड में सूखे की स्थिति ने अमेरिका में चीनी की कीमत में वृद्धि को कैसे बढ़ावा दिया।</p>
<p>UNCCD के कार्यकारी सचिव इब्राहिम थियाव ने कहा, "सूखा एक मूक हत्यारा है। यह बढ़ रहा है और तत्काल वैश्विक सहयोग की मांग करता है। जब भोजन, पानी और ऊर्जा एक साथ खत्म होने लगते हैं, तो समाज बिखरने लगता है। यह नई सामान्य स्थिति है जिसके लिए हमें तैयार रहना चाहिए।"&nbsp;</p>
<p>एनडीएमसी के संस्थापक निदेशक डॉ. मार्क स्वोबोडा ने स्थिति को "अब तक का सबसे खराब वैश्विक सूखा परिदृश्य" बताया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यह अब अलग-अलग जगहों पर सूखे का मसला नहीं है, बल्कि यह धीमी गति से चलने वाली वैश्विक तबाही है। उन्होंने चेतावनी दी, "कोई भी देश, चाहे उसके पास कितना भी धन या बुनियादी ढांचा क्यों न हो, आत्मसंतुष्ट होने का जोखिम नहीं उठा सकता।"</p>
<p><strong>अफ्रीका: 9 करोड़ लोगों के सामने खाने का संकट</strong><br />रिपोर्ट में पूर्वी और दक्षिणी अफ्रीका को सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में से एक बताया गया है, जहां 9 करोड़ से अधिक लोग भीषण भूख संकट का सामना कर रहे हैं। दक्षिणी अफ्रीका, जो पहले से ही असुरक्षित है, में ही अगस्त 2024 में लगभग 6.8 करोड़ लोगों को खाद्य सहायता की आवश्यकता पड़ी। जिम्बाब्वे में, मक्का की फसल का नुकसान 70% तक पहुंच गया, मक्का की कीमतें दोगुनी हो गईं और 9,000 मवेशी मारे गए।&nbsp;</p>
<p>जाम्बिया को जम्बेजी नदी के जल स्तर में भारी कमी के कारण प्रतिदिन 21 घंटे तक बिजली की गंभीर कमी का सामना करना पड़ा, जिससे जलविद्युत उत्पादन में कमी आई। सोमालिया में 2022 में सूखे से संबंधित 43,000 से अधिक मौतें हुईं, जबकि 2025 की शुरुआत में 44 लाख और लोगों को भूख का खतरा है। इथियोपिया, मलावी और जाम्बिया में भी बार-बार फसल खराब होने से मानवीय चुनौतियां और भी बढ़ गईं।</p>
<p><strong>भूमध्यसागर: स्पेन, तुर्किये में बढ़ी समस्या</strong><br />स्पेन में लगातार दो वर्षों तक सूखे और अत्यधिक गर्मी के कारण सितंबर 2023 तक जैतून के तेल के उत्पादन में 50% की गिरावट आई, जिससे कीमतें दोगुनी हो गईं। मोरक्को की भेड़ों की आबादी 2016 की तुलना में 38% कम हो गई, जिससे ईद पर उनकी कुर्बानी नहीं देने की शाही अपील की गई। तुर्किये में भूजल कमी के कारण 1,600 से अधिक सिंकहोल बन गए, जिससे बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा।&nbsp;</p>
<p><strong>लैटिन अमेरिका: जोखिम में अमेजन</strong><br />अमेजन बेसिन में सूखे के कारण नदी का जलस्तर रिकॉर्ड स्तर पर घट गया, मछलियों और 200 से अधिक लुप्तप्राय नदी डॉल्फिन की सामूहिक मृत्यु हो गई, और दूरदराज के समुदायों के लिए परिवहन और पीने के पानी की कमी हो गई। महत्वपूर्ण वैश्विक व्यापार मार्ग पनामा नहर भी प्रभावित हुई। अक्टूबर 2023 और जनवरी 2024 के बीच इससे गुजरने वाले जहाजों की संख्या 38 से घटकर 24 दैनिक रह गई। इससे शिपमेंट में देरी हुई और वैश्विक कमोडिटी की कीमतें बढ़ गईं।</p>
<p><strong>दक्षिण पूर्व एशिया भी अछूता नहीं&nbsp;</strong><br />दक्षिण पूर्व एशिया में, चावल, कॉफी और चीनी उत्पादन में व्यवधान का सामना करना पड़ा। भारत और थाईलैंड में शुष्क परिस्थितियों के कारण उपलब्धता का संकट बढ़ा तो अमेरिका में चीनी की कीमतों में लगभग 9% की वृद्धि हो गई। अल नीनो घटना ने सूखे की स्थिति को और बढ़ा दिया, जिसने पारिस्थितिकी तंत्र और बुनियादी ढांचे को प्रभावित किया।</p>
<p><strong>सूखे की मानवीय कीमत</strong><br />महिलाओं, बच्चों और हाशिए पर पड़े समुदायों को इसका खमियाजा भुगतना पड़ा। पूर्वी अफ्रीका में, आर्थिक राहत के लिए दहेज के कारण बाल विवाह में वृद्धि हुई। जिम्बाब्वे में भूख और स्वच्छता की कमी के कारण बच्चों के स्कूल छोड़ने की दर बढ़ गई। अमेजन में महिलाओं को स्वच्छ पानी या चिकित्सा सहायता के बिना बच्चों को जन्म देना पड़ा।</p>
<p><strong>संकट में वन्यजीव और पारिस्थितिकी तंत्र</strong><br />सूखे ने वन्यजीवों को भी नष्ट किया है। भोजन और पानी की कमी के कारण जिम्बाब्वे के ह्वांगे पार्क में 100 से अधिक हाथी मर गए। बोत्सवाना में दरियाई घोड़े सूखी नदी के किनारों में फंस गए थे। कुछ देशों ने मानव आबादी को खिलाने और पारिस्थितिकी तंत्र को अत्यधिक चराई से रोकने के लिए वन्यजीवों को मार डाला।</p>
<p>रिपोर्ट में विभिन्न देशों से आग्रह किया गया है कि वे वास्तविक समय में सूखे की निगरानी और पूर्व चेतावनी प्रणाली में निवेश करें, जलग्रहण क्षेत्रों की बहाली जैसे प्रकृति-आधारित समाधान पर काम करें, ऑफ-ग्रिड ऊर्जा और जल प्रौद्योगिकी में सुधार करें और सीमा पार जल संसाधनों पर वैश्विक सहयोग बढ़ाएं।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ सूखा बना वैश्विक आपदा, खाद्य, जल और ऊर्जा संकट चरम पर: यूएन रिपोर्ट ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[आईजीसी का अनुमान, लगातार तीसरे साल बढ़ेगा वैश्विक अनाज उत्पादन]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/global-grain-output-to-rise-for-third-straight-year-igc.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 29 Jun 2025 16:13:11 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/global-grain-output-to-rise-for-third-straight-year-igc.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>वर्ष 2025-26 में वैश्विक अनाज उत्पादन में 3% की वृद्धि का अनुमान है। यह लगातार तीसरा साल होगा जब वैश्विक अनाज उत्पादन में वृद्धि होगी। इंटरनेशनल ग्रेन्स काउंसिल (IGC) के अनुसार 2025-26 के सीजन में 2.377 अरब टन अनाज उत्पादन रहने की संभावना है। पिछले महीने के अनुमान से इसमें 20 लाख टन की वृद्धि की गई है।</p>
<p>काउंसिल के अनुसार, सबसे ज्यादा वृद्धि मक्का के उत्पादन में होगी। इसने 2024-25 सीजन के लिए भी अपने अनुमान को 30 लाख टन बढ़ाकर 2.313 अरब टन कर दिया है। यह बढ़ोतरी भी मक्का उत्पादन में सुधार के कारण की गई है।</p>
<p>हालांकि उत्पादन बढ़ने के बावजूद वैश्विक आपूर्ति तंग रहने के आसार हैं। IGC के अनुसार, बढ़ा हुआ उत्पादन शुरुआती कम स्टॉक्स की भरपाई नहीं कर पाएगा। इसके परिणामस्वरूप वैश्विक अनाज का कैरीओवर स्टॉक 4% घटकर एक दशक के न्यूनतम स्तर पर आ सकता है। हालांकि 2025-26 सीजन के अंत तक अनाज का कुल भंडार थोड़ी वृद्धि के साथ 58.6 करोड़ टन तक पहुंच सकता है। इसका मुख्य कारण अमेरिका में मक्का स्टॉक का बढ़ना है।</p>
<p><strong>वैश्विक अनाज व्यापार परिदृश्य</strong><br />2025-26 में वैश्विक अनाज व्यापार 2% की वार्षिक वृद्धि के साथ 43 करोड़ टन तक पहुंचने की संभावना है, जिसमें गेहूं के व्यापार में वृद्धि प्रमुख कारण होगी। 2024-25 के लिए व्यापार अनुमान को भी 50 लाख टन बढ़ाकर 42.3 करोड़ टन किया गया है। हालांकि यह 2023-24 के मुकाबले 3.6 करोड़ टन कम है।</p>
<p><strong>सोयाबीन उत्पादन में एक प्रतिशत वृद्धि होगी</strong><br />दक्षिण अमेरिका में अच्छी फसल की संभावना को देखते हुए, 2025-26 में वैश्विक सोयाबीन उत्पादन 1% की वृद्धि के साथ 42.8 करोड़ टन तक पहुंच सकता है। खपत में 1.8 करोड़ टन की खपत वृद्धि के साथ वैश्विक सोयाबीन का कुल भंडार थोड़ा घट सकता है। सोयाबीन व्यापार भी 18.3 करोड़ टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने की उम्मीद है, जो वार्षिक आधार पर मामूली वृद्धि होगी।</p>
<p><strong>चावल उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर</strong><br />2025-26 में वैश्विक चावल उत्पादन 54.4 करोड़ टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच सकता है, जिसका श्रेय पांच प्रमुख उत्पादक देशों में हुई वृद्धि को जाता है। इस अतिरिक्त उपलब्धता के कारण चावल की खपत 1% बढ़ सकती है, जबकि वैश्विक भंडार में भी वृद्धि की संभावना है।</p>
<p>भारत का चावल भंडार अकेले 5 करोड़ टन तक पहुंचने की संभावना है, जो कुल वैश्विक भंडार में अहम योगदान देगा। 2026 में वैश्विक चावल व्यापार के भी 6 करोड़ टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने की उम्मीद है, जिसका प्रमुख कारण अफ्रीका से बढ़ती मांग है।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/06/image_750x500_685fbc99cffb5.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ आईजीसी का अनुमान, लगातार तीसरे साल बढ़ेगा वैश्विक अनाज उत्पादन ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[पठानकोट से क़तर के लिए लीची की पहली खेप रवाना, एपीडा ने बाजार पहुंच को आसान बनाया]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/india-flags-off-first-consignment-of-rose-scented-litchi-from-pathankot-to-qatar.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 27 Jun 2025 18:54:19 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/india-flags-off-first-consignment-of-rose-scented-litchi-from-pathankot-to-qatar.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span>देश के बागवानी निर्यात को विशेष बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार के वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के तहत कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) ने पंजाब सरकार के कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय में बागवानी विभाग के सहयोग से&nbsp;23&nbsp;जून&nbsp;2025&nbsp;को पंजाब के पठानकोट से क़तर में दोहा के लिए एक टन गुलाब की खुशबू वाली लीची की पहली खेप को रवाना करने में मदद की। वाणिज्य मंत्रालय द्वारा जारी एक प्रेस रिलीज में यह जानकारी दी गई है।</span></p>
<p><span>इसके अलावा,&nbsp;पठानकोट से दुबई को भी आधा&nbsp;टन लीची का निर्यात किया गया,&nbsp;जो दोहरी निर्यात उपलब्धि है और ताजे फलों के वैश्विक बाजारों में भारत की उपस्थिति को मजबूत करता है।</span></p>
<p><span>उपलब्धि से भरी यह पहल भारत के बागवानी उत्पादों की उत्कृष्टता को दर्शाती है और देश की बढ़ती कृषि-निर्यात क्षमताओं को उजागर करती है। यह किसानों को उनके ताजे और उच्च मूल्य वाले उत्पादों के लिए अंतर्राष्ट्रीय बाजार तक पहुंच प्रदान करके अपार अवसर प्रदान करता है।</span></p>
<p><span>केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने एक ट्वीट में कहा है कि पंजाब की लीची से बढ़ रहा भारत का व्यापार, पठानकोट के सुजानपुर से पहुंची क़तर के बाजार।</span></p>
<p><span>इस पहल को एपीडा ने पंजाब सरकार के बागवानी विभाग, लुल्लू ग्रुप और सुजानपुर के प्रगतिशील किसान प्रभात सिंह के सहयोग से संचालित किया। उन्होंने उच्च गुणवत्ता वाली उपज की आपूर्ति की।</span></p>
<p><span>राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड के अनुसार,&nbsp;वित्त वर्ष&nbsp;2023-24&nbsp;के लिए पंजाब का लीची उत्पादन&nbsp;71,490 &nbsp;टन रहा,&nbsp;जो भारत के कुल लीची उत्पादन में&nbsp;12.39&nbsp;प्रतिशत का योगदान देता है। इसी अवधि के दौरान,&nbsp;भारत ने&nbsp;639.53&nbsp;टन लीची का निर्यात किया। खेती का रकबा&nbsp;4,327&nbsp;हेक्टेयर था,&nbsp;जिसकी औसत उपज&nbsp;16,523&nbsp;किलोग्राम/हेक्टेयर रही।</span></p>
<p><span>लीची की रवाना की गई खेप में प्रीमियम पठानकोट लीची का एक रीफर पैलेट शामिल है,&nbsp;जो इस क्षेत्र के उत्पादकों के लिए एक बड़ा कदम है। प्रभात सिंह जैसे किसानों की सफलता पठानकोट की क्षमता को दर्शाती है - जो गुणवत्तापूर्ण लीची की खेती और निर्यात के लिए एक उभरते हुए केंद्र के रूप में अनुकूल कृषि-जलवायु परिस्थितियों से लाभान्वित है।</span></p>
<p><span>वित्त वर्ष&nbsp;2024-25 (अप्रैल-मार्च) के दौरान भारत का फलों और सब्जियों का निर्यात&nbsp;3.87&nbsp;अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया,&nbsp;जो पिछले वर्ष की तुलना में&nbsp;5.67&nbsp;प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। जबकि आम,&nbsp;केले,&nbsp;अंगूर और संतरे फलों के निर्यात में आगे हैं। वहीं चेरी,&nbsp;जामुन और लीची अब तेजी से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपनी जगह बना रहे हैं।</span></p>
<p><span>यह प्रयास कृषि-निर्यात का दायरा बढ़ाने, किसानों को सशक्त बनाने और भारतीय उपज की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाने के लिए भारत सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं। केंद्रित कार्यक्रमों के साथ,&nbsp;एपीडा एफपीओ,&nbsp;एफपीसी और कृषि-निर्यातकों के लिए बाजार तक पहुंच को सक्षम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। इससे कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों में दुनिया भर में अग्रणी के रूप में भारत की स्थिति मजबूत हो रही है।</span></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ पठानकोट से क़तर के लिए लीची की पहली खेप रवाना, एपीडा ने बाजार पहुंच को आसान बनाया ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[एशिया में जलवायु संकट गहराया, वैश्विक औसत से दोगुनी गति से बढ़ रहा तापमानः डब्ल्यूएमओ रिपोर्ट]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/asia-faces-climate-crisis-as-warming-doubles-global-average-wmo-report.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 23 Jun 2025 10:43:30 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/asia-faces-climate-crisis-as-warming-doubles-global-average-wmo-report.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>एशिया में तापमान वृद्धि वैश्विक औसत की तुलना में लगभग दोगुनी गति से हो रही है, जिससे चरम मौसम की घटनाएं बढ़ रही हैं और क्षेत्र की अर्थव्यवस्थाओं, पारिस्थितिकी तंत्रों और समाज के विभिन्न वर्गों पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। यह चेतावनी विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की &ldquo;एशिया में जलवायु की स्थिति 2024&rdquo; रिपोर्ट में दी गई है। रिपोर्ट के अनुसार, 2024 एशिया के इतिहास में सबसे गर्म या दूसरा सबसे गर्म वर्ष रहा।&nbsp; डब्लूएमओ की यह रिपोर्ट आज 23 जून, 2025 को ही जारी की गई है।</p>
<p>1991 से 2024 के बीच तापमान वृद्धि की दर 1961 से 1990 की अवधि की तुलना में लगभग दोगुनी रही। इस वर्ष पूरे क्षेत्र में लंबे समय तक और व्यापक स्तर पर हीटवेव (लू) देखी गईं। रिपोर्ट से पता चलता है कि पूरे महाद्वीप में औसत सतह का तापमान 1991-2020 बेसलाइन से लगभग 1.04 डिग्री सेल्सियस अधिक था।&nbsp;</p>
<p><strong>भूमि और समुद्र में गर्मी का बढ़ना</strong><br />एशिया, जिसमें आर्कटिक तक फैला दुनिया का सबसे बड़ा भूभाग है, विशेष रूप से अपने व्यापक भूमि क्षेत्र के कारण महासागरों की तुलना में तेजी से गर्म हो रहा है। 2024 में पूरे क्षेत्र में रिकॉर्ड तापमान रहा। जापान, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे देशों में कई बार मासिक तापमान के रिकॉर्ड टूटे। दक्षिण पूर्व एशिया, मध्य एशिया और मध्य पूर्व में भी भीषण गर्मी का सामना करना पड़ा। म्यांमार में तापमान 48.2 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया।</p>
<p>एशिया के आसपास के महासागरों का भी हाल कुछ बेहतर नहीं रहा। 2024 में समुद्र की सतह का तापमान अभूतपूर्व ऊंचाई पर पहुंच गया। WMO की रिपोर्ट कहती है कि तीव्र से लेकर अत्यधिक तीव्रता वाली समुद्री गर्मी (मरीन हीटवेव) की लहरों ने क्षेत्र के अधिकांश जल को प्रभावित किया है। यह 1993 में उपग्रह रिकॉर्ड शुरू होने के बाद सबसे अधिक है। अकेले अगस्त और सितंबर में लगभग 15 मिलियन वर्ग किलोमीटर समुद्र प्रभावित हुआ महासागर जो वैश्विक महासागर सतह का लगभग दसवां हिस्सा है।</p>
<p><strong>बढ़ते समुद्र और पिघलते ग्लेशियर</strong><br />उत्तरी अरब सागर, उत्तरी हिंद महासागर और जापान तथा पूर्वी चीन सागर के पास के पानी में गर्मी विशेष रूप से तीव्र थी। एशिया में औसत समुद्री सतह का तापमान प्रति दशक 0.24 डिग्री सेल्सियस बढ़ा, जो वैश्विक दर 0.13 डिग्री सेल्सियस से लगभग दोगुना है। एशिया के हिंद और प्रशांत महासागर के तटों पर समुद्र का स्तर 1993 और 2024 के बीच वैश्विक औसत से कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ा है, जिससे निचले इलाकों और घनी आबादी वाले तटीय क्षेत्रों के लिए ख़तरा बढ़ गया है।</p>
<p>क्रायोस्फीयर में भी गिरावट जारी रही। उच्च पर्वतीय एशिया में तिब्बती पठार पर केंद्रित एक क्षेत्र जिसे तीसरा ध्रुव भी कहा जाता है, ग्लेशियर तेजी से सिकुड़ रहे हैं। इस क्षेत्र में ध्रुवीय क्षेत्रों के बाहर सबसे ज्यादा बर्फ है, जो लगभग 100,000 वर्ग किलोमीटर में फैली हुई है।</p>
<p>2023-24 में जिन 24 ग्लेशियरों की निगरानी की गई, उनमें से 23 में बड़े पैमाने पर कमी आई है। यह सर्दियों में बर्फबारी में कमी और गर्मियों में अत्यधिक गर्मी के कारण हुआ है। खास तौर पर मध्य हिमालय और तियान शान पर्वतमाला में। पूर्वी तियान शान में उरुमकी ग्लेशियर नंबर 1 पर 1959 में निगरानी शुरू होने के बाद से अब तक का सबसे निगेटिव मास बैलेंस दर्ज किया गया, जिससे लाखों लोगों के लिए ग्लेशियल झील के फटने से बाढ़, भूस्खलन और लंबे समय तक पानी की असुरक्षा का जोखिम बढ़ गया है।&nbsp;</p>
<p><strong>विनाशकारी मौसमी घटनाएं&nbsp;</strong><br />जलवायु संकट ने आपदाओं की झड़ी भी लगा दी। अत्यधिक वर्षा, बाढ़, उष्णकटिबंधीय चक्रवात और सूखे ने पूरे क्षेत्र में समुदायों को तबाह कर दिया। उष्णकटिबंधीय चक्रवात यागी, जो वर्ष का सबसे शक्तिशाली तूफान था, ने वियतनाम, फिलीपींस, थाईलैंड, म्यांमार और चीन को प्रभावित किया, जिससे तबाही हुई। मध्य एशिया में, भयंकर बर्फ पिघलने और रिकॉर्ड बारिश ने 70 वर्षों में सबसे बड़ी बाढ़ ला दी, जिसके कारण कजाकिस्तान और दक्षिणी रूस में 118,000 सुरक्षित जगहों पर ले जाने की नौबत आई।</p>
<p><strong>पश्चिम एशिया भी तबाह हो गया</strong><br />संयुक्त अरब अमीरात ने केवल 24 घंटों में 259.5 मिमी बारिश दर्ज की, जो 1949 में रिकॉर्ड शुरू होने के बाद से सबसे चरम घटनाओं में से एक है। <strong>भारत में, उत्तरी केरल में 30 जुलाई को 48 घंटों में 500 मिमी की अत्यधिक वर्षा के बाद बड़े भूस्खलन हुए, जिसके परिणामस्वरूप 350 से अधिक मौतें हुईं।</strong> नेपाल में, सितंबर के अंत में रिकॉर्ड तोड़ बारिश के कारण भयंकर बाढ़ आई, जिसमें कम से कम 246 लोग मारे गए और 12.85 अरब नेपाली रुपये (9.4 करोड़ डॉलर) से अधिक का नुकसान हुआ। हालांकि, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और पूर्वानुमानित कार्रवाई ने 130,000 से अधिक लोगों को जीवन रक्षक सहायता प्रदान करने में मदद की, जिससे मौतों में उल्लेखनीय कमी आई।</p>
<p>इसके विपरीत, चीन के कुछ हिस्सों में 2024 में भयंकर सूखे का सामना करना पड़ा, जिससे 48 लाख लोग प्रभावित हुए, 3,35,200 हेक्टेयर फसलों को नुकसान पहुंचा और 40 करोड़ डॉलर का प्रत्यक्ष आर्थिक नुकसान हुआ।</p>
<p><strong>WMO की चेतावनियां</strong><br />WMO महासचिव सेलेस्टे साउलो ने कहा, &ldquo;यह रिपोर्ट एशिया में सतह के तापमान, ग्लेशियर मास और समुद्र तल जैसे प्रमुख जलवायु संकेतकों में परिवर्तनों को उजागर करती है। इन बदलावों का इस क्षेत्र के निवासियों, अर्थव्यवस्थाओं और पारिस्थितिकी तंत्रों पर बड़ा असर पड़ेगा।</p>
<p>रिपोर्ट न केवल बढ़ते जोखिमों की ओर, बल्कि तैयारी के महत्व पर भी ध्यान आकर्षित करती है। नेपाल की एक केस स्टडी ने दिखाया कि कैसे मजबूत प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और सक्रिय योजना समुदायों को जलवायु प्रभावों के अनुकूल होने में मदद कर सकती है, जिससे जीवन और आजीविका की सुरक्षा हो सकती है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ एशिया में जलवायु संकट गहराया, वैश्विक औसत से दोगुनी गति से बढ़ रहा तापमानः डब्ल्यूएमओ रिपोर्ट ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[वैश्विक दूध उत्पादन वृद्धि का नेतृत्व कर रहा एशिया, इस वर्ष ट्रेड कम रहने के आसार: FAO]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/asia-fuelling-global-milk-production-growth-but-trade-to-remain-sluggish-says-fao.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 21 Jun 2025 14:32:07 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/asia-fuelling-global-milk-production-growth-but-trade-to-remain-sluggish-says-fao.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>दुनिया भर में दूध उत्पादन 2025 में 99.27 करोड़ टन तक पहुंचने का अनुमान है। यह पिछले साल की तुलना में एक प्रतिशत अधिक रहेगा। दूध उत्पादन में लगातार दूसरे वर्ष मामूली वृद्धि होगी। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) ने अपनी द्विवार्षिक वैश्विक खाद्य रिपोर्ट में यह जानकारी दी है।&nbsp;</p>
<p>रिपोर्ट में एशिया को इस वृद्धि का प्रमुख स्रोत बताया गया है, जहां भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान में पशुधन की संख्या में बढ़ोतरी और उत्पादकता में क्रमिक सुधार से उत्पादन में वृद्धि होगी। यह वृद्धि चीन में संभावित गिरावट की भरपाई करेगी, जहां गिरते फार्मगेट मूल्य और उच्च लागत दबाव के चलते उत्पादन पर असर पड़ रहा है।</p>
<p>अमेरिका महाद्वीप में भी दुग्ध उत्पादन में सुधार की उम्मीद है। विशेषकर ब्राजील और मैक्सिको में अच्छी वृद्धि तथा अर्जेंटीना और अमेरिका में सुधार के कारण। दूसरी ओर, यूरोप और ओशिनिया में उत्पादन स्तर स्थिर रहने की संभावना है। अफ्रीका में उच्च लागत और संघर्ष-प्रभावित क्षेत्रों में व्यवधान के कारण हल्की गिरावट का अनुमान है।</p>
<p><strong>दूध के वैश्विक व्यापार में गिरावट के आसार</strong><br />दूध व्यापार की बात करें तो 2025 में वैश्विक दुग्ध व्यापार (दूध समतुल्य) में 0.8% गिरावट की संभावना है। चीन में आयात बढ़ने की उम्मीद है, जो खाद्य उद्योग की मांग और उत्पादन में कमी के चलते हो सकता है। लेकिन यह अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, कैरेबियन और निकट पूर्व में आयात में संभावित गिरावट की भरपाई नहीं कर पाएगा, जहां घरेलू उत्पादन में सुधार देखा जा रहा है।</p>
<p>निर्यात के मोर्चे पर, यूरोपीय संघ, सऊदी अरब और अमेरिका से निर्यात में कमी की आशंका है, जिसे न्यूजीलैंड और उरुग्वे से बढ़ते शिपमेंट से आंशिक रूप से संतुलित किया जा सकता है। FAO ने यह भी चेतावनी दी है कि वैश्विक व्यापार नीतियों में अनिश्चितता बनी हुई है, जो आने वाले महीनों में बाजार और व्यापार पर असर डाल सकती है।</p>
<p><strong>दुनिया के आधे दूध की खपत भारत और चीन में</strong><br />अंतरराष्ट्रीय डेयरी फेडरेशन (IDF) ने मार्च 2025 में जारी अपनी वर्ल्ड डेयरी सिचुएशन 2024 रिपोर्ट में कहा था कि एशियाई बाजार ने वैश्विक दुग्ध उद्योग में खुद को एक मजबूत शक्ति के रूप में स्थापित कर लिया है, जिसमें चीन और भारत सबसे आगे हैं। ये दोनों देश मिलकर विश्व के कुल दूध उपभोग का लगभग 50% हिस्सा साझा करते हैं, जो वैश्विक दुग्ध व्यापार की दिशा को काफी प्रभावित करता है।</p>
<p>रिपोर्ट में वार्षिक दुग्ध उत्पादन में 2.1% की वृद्धि का अनुमान लगाया गया था, जिससे कुल उत्पादन 964 मिलियन टन तक पहुंचने की संभावना जताई गई थी। यह वृद्धि मुख्य रूप से चीन और भारत में होगी, जिन्होंने वैश्विक स्तर पर गाय के दूध के शीर्ष पांच उत्पादकों में अपनी स्थिति को और मजबूत किया है। यह प्रगति इन देशों में मजबूत घरेलू मांग की वजह से संभव हुई है।</p>
<p>इसी बीच, 2025 की शुरुआत में अंतरराष्ट्रीय दुग्ध कीमतों में वृद्धि जारी रही। मक्खन की रिकॉर्ड कीमतों और पनीर की दरों में मजबूती के चलते FAO दुग्ध मूल्य सूचकांक मई में 153.5 अंक रहा, जो पिछले वर्ष की तुलना में 21.5% अधिक है। हालांकि जून 2022 में दर्ज ऐतिहासिक उच्चतम स्तर से 3% नीचे है। मक्खन और पनीर की कीमतों में वृद्धि का कारण मजबूत मांग और EU व ओशिनिया में सीमित आपूर्ति रहा। होल मिल्क पाउडर की कीमतों में भी बढ़ोतरी हुई, विशेषकर निकट पूर्व और उत्तर अफ्रीका में स्थिर मांग के कारण। इसके विपरीत, स्किम्ड मिल्क पाउडर की कीमतों पर हल्का दबाव देखा गया, जो यूरोप में ज्यादा आपूर्ति और एशिया में मांग में धीमी वृद्धि के चलते हुआ।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ वैश्विक दूध उत्पादन वृद्धि का नेतृत्व कर रहा एशिया, इस वर्ष ट्रेड कम रहने के आसार: FAO ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/06/image_750x500_685674fa6baf1.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[ईरान&amp;#45;इज़राइल संघर्ष का भारत के कृषि निर्यात पर असर, बासमती निर्यातकों को नुकसान की चिंता]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/iran-israel-conflict-impacts-india-agricultural-exports-basmati-exporters-worry-about-losses.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 17 Jun 2025 20:39:10 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/iran-israel-conflict-impacts-india-agricultural-exports-basmati-exporters-worry-about-losses.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p data-start="297" data-end="709">ईरान और इज़राइल के बीच बढ़ते सैन्य संघर्ष का असर वैश्विक व्यापार पर पड़ रहा है और भारत का कृषि निर्यात भी इससे अछूता नहीं है। ईरान, भारत के बासमती चावल और अन्य कृषि उत्पादों का बड़ा खरीदार है। वहां से ऑर्डर घटने, शिपमेंट अटकने और भुगतान में देरी के कारण निर्यात प्रभावित हो रहा है, जिसका असर किसानों पर भी पड़ सकता है।&nbsp;</p>
<p data-start="711" data-end="1160">देश का 60-70 फीसदी बासमती निर्यात मध्य एशिया में होता है। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने ईरान को लगभग ₹6,400 करोड़ मूल्य के बासमती चावल का निर्यात किया था। लेकिन पश्चिम एशिया में हालात बिगड़ने के बाद ईरान से नए ऑर्डर लगभग ठप हो गए हैं, जिसके चलते बासमती की कीमतों में गिरावट देखी जा रही है। बासमती का निर्यात मूल्य घटकर लगभग $900-950 प्रति टन रह गया है, जबकि पिछले वर्ष यह $1,200 प्रति टन से ऊपर पहुंच गया था।</p>
<p data-start="1162" data-end="1535"><strong>ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन</strong> के पूर्व अध्यक्ष <strong>विजय सेतिया</strong> ने <strong><em data-start="1231" data-end="1242">रूरल वॉयस</em></strong> को बताया कि ईरान और इज़राइल दोनों देशों से भारत का काफी व्यापार होता है। मध्य एशिया में पैदा हालात से बासमती निर्यात पर संकट मंडरा रहा है। निर्यातकों के भुगतान अटक रहे हैं और बासमती की कीमतों में गिरावट की आशंका है। मध्य एशिया में तनाव, देश के निर्यात क्षेत्र के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।</p>
<p data-start="1537" data-end="1877">ऐसे में पाकिस्तान अपनी भौगोलिक स्थिति का फायदा उठाकर ईरान से बार्टर ट्रेड के ज़रिए बासमती का निर्यात बढ़ा सकता है। गौरतलब है कि 2019 में ईरान पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद भारत को ईरान से कच्चे तेल का आयात रोकना पड़ा था। तब भारत से बासमती व अन्य वस्तुओं का निर्यात भी प्रभावित हुआ था। मौजूदा हालात ईरान के साथ व्यापार को एक नया झटका हैं।</p>
<p data-start="1537" data-end="1877">ईरान और इज़राइली के बीच बढ़ते तनाव के कारण अप्रैल में ही बासमती के दाम ₹75&ndash;80 प्रति किलोग्राम तक गिर गए थे। हालांकि ईरान व मध्य एशिया के अन्य देशों द्वारा खाद्य सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कम कीमतों पर बासमती की खरीद बढ़ाने से कीमतों में कुछ उछाल आया था। लेकिन अब हालात बिगड़ने के साथ बासमती की कीमतों में गिरावट की आशंका बढ़ गई है।</p>
<p data-start="1537" data-end="1877"><strong>व्यापार मार्ग बाधित&nbsp;</strong></p>
<p data-start="1537" data-end="1877">मध्य एशिया में युद्ध जैसे हालात के चलते लाल सागर और होर्मुज़ जलडमरूमध्य जैसे अहम समुद्री मार्गों में खतरा बढ़ गया है, जिससे शिपमेंट में देरी और बीमा प्रीमियम में 15&ndash;20% तक की वृद्धि हुई है। कई शिपमेंट के अटकने का खतरा भी मंडरा रहा है। बीमा कंपनियां अधिक जोखिम के कारण बीमा कवर देने से कतरा रही हैं।</p>
<p data-start="1537" data-end="1877">वाणिज्य मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि भारतीय निर्यात के लिहाज से महत्वपूर्ण ईरान के बंदर अब्बास से व्यापार में काफी अड़चनें आ रही हैं। इजराइल के हमलों में इस बंदरगाह को काफी नुकसान पहुंचा है।&nbsp;</p>
<p data-start="2589" data-end="2835"><strong data-start="2589" data-end="2626">पंजाब के निर्यातक और किसान चिंतित</strong><br data-start="2626" data-end="2629" />देश के बासमती निर्यात में लगभग 40% हिस्सेदारी रखने वाले पंजाब के लिए मध्य एशिया में बने हालात विशेष रूप से चिंताजनक हैं। खरीफ बुवाई सीज़न की शुरुआत में आया यह संकट बासमती धान की बुवाई पर भी असर डाल सकता है।</p>
<p data-start="2837" data-end="3143"><strong data-start="2837" data-end="2876">सोयामील, चाय और सूखे मेवे पर भी असर</strong><br data-start="2876" data-end="2879" />ईरान भारत से न केवल बासमती चावल बल्कि सोयामील, चाय, दालें और मसाले भी आयात करता है। 2024-25 में भारत ने ईरान को कुल मिलाकर ₹11,200 करोड़ के कृषि उत्पाद निर्यात किए थे। इसमें बासमती के अलावा लगभग ₹1,500 करोड़ मूल्य का सोयामील और ₹700 करोड़ मूल्य की चाय भी शामिल थी।भारत में ईरान से बड़ी मात्रा में पिस्ता और मामरा बादाम आयात होता है। लेकिन युद्ध जैसे हालात के चलते ईरान से ड्राई फ्रूट्स की आपूर्ति प्रभावित हुई है, जिससे बाज़ार में पिस्ता और मामरा बादाम के दामों में ₹50&ndash;60 प्रति किलो तक की तेजी आई है।</p>
<p data-start="3423" data-end="3951"><strong data-start="3423" data-end="3452">कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी</strong><br data-start="3452" data-end="3455" />ईरान एक प्रमुख तेल उत्पादक देश है। होर्मुज़ जलसंधि, जिसके माध्यम से भारत का लगभग दो-तिहाई कच्चा तेल और आधा एलएनजी आयात होता है, इस संघर्ष के कारण खतरे में है। ब्रेंट क्रूड की कीमतें हाल ही में $78 प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं, जिससे भारत में महंगाई बढ़ने की आशंका है। कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी समूची भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर डालेगी।</p>
<p data-start="3423" data-end="3951"></p>
<p data-start="3423" data-end="3951"></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/06/image_750x500_6851895f39cc4.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ ईरान-इज़राइल संघर्ष का भारत के कृषि निर्यात पर असर, बासमती निर्यातकों को नुकसान की चिंता ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/06/image_750x500_6851895f39cc4.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[वैश्विक अनाज व्यापार और भंडार में 2024&amp;#45;25 में गिरावट, 2025&amp;#45;26 में सुधार की उम्मीद: FAO रिपोर्ट]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/global-cereal-trade-and-stocks-decline-in-2024-25-recovery-expected-in-2025-26-fao-report.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 08 Jun 2025 14:08:27 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/global-cereal-trade-and-stocks-decline-in-2024-25-recovery-expected-in-2025-26-fao-report.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) के अनुसार मार्केटिंग वर्ष 2024-25 में वैश्विक अनाज व्यापार और भंडारण में गिरावट आई है। हालांकि इसने 2025-26 में सभी प्रमुख अनाजों के रिकॉर्ड उत्पादन के साथ व्यापार बढ़ने का अनुमान जताया है।&nbsp;</p>
<p>FAO के अनुसार 2024 में वैश्विक अनाज उत्पादन 285.3 करोड़ टन रहा, जो 2023 की तुलना में थोड़ा कम है। इसका कारण मोटे अनाज, विशेष रूप से मक्का के उत्पादन में गिरावट है। गेहूं और चावल का उत्पादन थोड़ा बढ़ा, लेकिन मक्का की कमी की भरपाई नहीं हो सकी।</p>
<p>रिपोर्ट के अनुसार 2024-25 में वैश्विक अनाज की खपत 1.2% बढ़कर 287.5 करोड़ टन हो गई, जिसका कारण मक्का, ज्वार और चावल की बढ़ती खपत है। इसके परिणामस्वरूप सीजन के अंत तक अनाज का भंडार 86.5 करोड़ टन रहने का अनुमान है। यह शुरुआती स्तर से 2% कम है। यह गिरावट मुख्यतः मक्का और जौ के भंडार में कमी के कारण है। हालांकि चावल और गेहूं के भंडार में आंशिक वृद्धि ने इसे कुछ हद तक संतुलित किया।</p>
<p>2024-25 में वैश्विक अनाज व्यापार में सबसे उल्लेखनीय गिरावट आई है, जो 6.9% घटकर 47.8 करोड़ टन रहने की संभावना है। इसका मुख्य कारण गेहूं और सभी प्रमुख मोटे अनाज के व्यापार में गिरावट है। इसके विपरीत चावल का अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पिछले वर्ष के मुकाबले बढ़ा है।</p>
<p>2025-26 के मौसम की बात करें तो इसमें बेहतर स्थिति की उम्मीद है। अनुमान है कि वैश्विक अनाज उत्पादन 291.1 करोड़ टन के नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच जाएगा, जो 2024 की तुलना में 2.1% अधिक होगा। सभी प्रमुख अनाजों में वृद्धि का अनुमान है। सबसे अधिक वृद्धि मक्का में रहेगी। इसके बाद चावल और ज्वार का स्थान होगा।</p>
<p>2025-26 में अनाज की खपत 0.8% बढ़कर 289.8 करोड़ टन तक पहुंचने का अनुमान है। खाद्य के लिए खपत और चारे के उपयोग में वृद्धि इसका मुख्य कारण हैं। कुल वैश्विक अनाज भंडार में भी 1% की मामूली वृद्धि की संभावना है, जो 87.36 करोड़ टन तक पहुंच सकता है। यह वृद्धि मुख्य रूप से मोटे अनाज के भंडार में वृद्धि के कारण होगी, जबकि गेहूं का भंडार थोड़ा कम हो सकता है।</p>
<p>वैश्विक अनाज व्यापार में 1.9% की आंशिक वृद्धि की उम्मीद है। यह 48.71 करोड़ टन तक पहुंच सकता है। गेहूं का व्यापार 3.8% बढ़ने की संभावना है। मोटे अनाजों में भी हल्की वृद्धि संभव है। हालांकि चावल के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में 0.7% की मामूली गिरावट का अनुमान है। हालांकि इन उतार-चढ़ावों के बावजूद वैश्विक अनाज स्टॉक-टू-यूज अनुपात लगभग 29.8% पर स्थिर रहने की उम्मीद है।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/06/image_750x500_6843fa7a06d51.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ वैश्विक अनाज व्यापार और भंडार में 2024-25 में गिरावट, 2025-26 में सुधार की उम्मीद: FAO रिपोर्ट ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[अनाज, वनस्पति तेल और चीनी के दाम घटने से मई में वैश्विक खाद्य कीमतों में गिरावटः FAO]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/global-food-prices-dip-in-may-led-by-cereal-vegetable-oil-and-sugar-declines.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 07 Jun 2025 13:17:05 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/global-food-prices-dip-in-may-led-by-cereal-vegetable-oil-and-sugar-declines.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) के अनुसार मई 2025 में FAO खाद्य मूल्य सूचकांक (FFPI) में मामूली गिरावट दर्ज की गई। यह सूचकांक 127.7 अंक पर रहा जो अप्रैल की तुलना में 0.8% कम है। अनाज, वनस्पति तेल और चीनी की कीमतों में गिरावट ने मांस और दुग्ध उत्पादों में हुई वृद्धि को संतुलित कर दिया। हालांकि मासिक गिरावट दर्ज की गई, लेकिन सूचकांक अब भी एक वर्ष पहले की तुलना में 6.0% अधिक है। मार्च 2022 के उच्चतम स्तर से यह 20% नीचे है।</p>
<p><strong>अनाज: मक्का की कीमतों में तेज गिरावट</strong><br />FAO का अनाज मूल्य सूचकांक मई में 1.8% गिरा। इसकी मुख्य वजह अर्जेंटीना, ब्राज़ील और अमेरिका में बेहतर फसल पूर्वानुमान और कड़ी प्रतिस्पर्धा के चलते मक्का की कीमतों में तेज गिरावट रही। गेहूं की कीमतें भी वैश्विक मांग में गिरावट और प्रमुख क्षेत्रों में बेहतर फसल परिस्थितियों के कारण घटीं। हालांकि चावल का मूल्य सूचकांक 1.4% बढ़ा, जिसकी वजह मजबूत मांग और कुछ निर्यातक देशों की मुद्राओं में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले मजबूती रही।</p>
<p><strong>वनस्पति तेल: कीमतों में नरमी बरकरार</strong><br />FAO का वनस्पति तेल मूल्य सूचकांक मई में 3.7% गिरा। पाम, सोया, रेपसीड और सूरजमुखी तेल की कीमतों में गिरावट इसका मुख्य कारण रही। दक्षिण-पूर्व एशिया में मौसमी उत्पादन में वृद्धि के कारण पाम तेल की कीमतें लगातार दूसरे महीने तेजी से गिरीं। दक्षिण अमेरिका में आपूर्ति बढ़ने और अमेरिका में जैव ईंधन की मांग कमजोर रहने से सोया तेल की कीमतों पर भी दबाव रहा।</p>
<p><strong>डेयरी: एशियाई मांग ने बढ़ाई कीमतें</strong><br />डेयरी उत्पादों की कीमतों में मई में 0.8% की वृद्धि दर्ज की गई। एशिया और मध्य पूर्व से मजबूत मांग और ऑस्ट्रेलिया में दूध की आपूर्ति में कमी से मक्खन और दूध पाउडर की कीमतों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई। पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया से मांग बढ़ने से चीज की कीमतों में लगातार दूसरे महीने वृद्धि हुई। हालांकि, स्किम्ड मिल्क पाउडर की कीमतों में थोड़ी (0.2%) गिरावट दर्ज की गई।</p>
<p><strong>चीनी: लगातार तीसरे महीने गिरावट</strong><br />चीनी की कीमतों में मई में 2.6% की गिरावट आई। इसमें लगातार तीसरे महीने गिरावट का रुख रहा है। वैश्विक मांग में कमजोरी और भारत व थाईलैंड में मानसून की जल्द शुरुआत से उत्पादन में सुधार की उम्मीदों ने कीमतों पर दबाव बनाया। इसके साथ ही वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के कारण खाद्य और पेय उद्योगों में मांग पर प्रभाव पड़ा।</p>
<p>कुल मिलाकर यह गिरावट वैश्विक खाद्य बाजार में स्थिरता का संकेत देती है, लेकिन मौसमी घटनाओं, बीमारियों के प्रकोप और मांग के बदलते रुझानों के चलते अस्थिरता बनी हुई है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ अनाज, वनस्पति तेल और चीनी के दाम घटने से मई में वैश्विक खाद्य कीमतों में गिरावटः FAO ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[वैश्विक दक्षिण में कृषि विकास और सहयोग को बढ़ावा देने के लिए ISSCA की स्थापना]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/issca-launched-to-accelerate-agricultural-innovation-and-collaboration-in-the-global-south.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 03 Jun 2025 17:03:58 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/issca-launched-to-accelerate-agricultural-innovation-and-collaboration-in-the-global-south.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) में कृषि नवाचार और सहयोग को बढ़ावा देने की दिशा में आज एक महत्वपूर्ण पहल हुई। इंटरनेशनल क्रॉप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर द सेमी-अरिड ट्रॉपिक्स (ICRISAT) और रिसर्च एंड इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर डेवलपिंग कंट्रीज़ (RIS) के संयुक्त प्रयास से "ICRISAT सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर साउथ-साउथ कोऑपरेशन इन एग्रीकल्चर (ISSCA)" की आधिकारिक शुरुआत हुई। इसका शुभारंभ नई दिल्ली में &lsquo;वैश्विक दक्षिण और त्रिकोणीय सहयोग&rsquo; विषयक सम्मेलन के दौरान किया गया।</p>
<p>इस अवसर पर ICRISAT और DAKSHIN&mdash;भारत सरकार की एक प्रमुख पहल&mdash;के बीच एक रणनीतिक समझौता ज्ञापन (MoU) पर भी हस्ताक्षर किए गए। यह साझेदारी क्षमता निर्माण और विकास सहयोग के ज़रिये दक्षिण-दक्षिण सहयोग को सशक्त बनाने पर केंद्रित है।</p>
<p>ISSCA का उद्घाटन वैश्विक कृषि विकास में एक मील का पत्थर है, जो समान कृषि, जलवायु और सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहे देशों के बीच ज्ञान, नवाचार और साझेदारी को बढ़ावा देने के लिए एक समर्पित मंच प्रदान करता है।</p>
<p>ISSCA एक उत्प्रेरक के रूप में कार्य करेगा, जो प्रमाणित कृषि समाधानों को बड़े पैमाने पर लागू करने में मदद करेगा। इसका एक डिजिटल पोर्टल भी है, जो मान्य नवाचारों का एक जीवंत भंडार है&mdash;जिससे देशों को एक-दूसरे से सीखने, साझेदारी करने और शुष्क भूमि एवं विकासशील क्षेत्रों के लिए अनुकूलित, कम लागत वाली और उच्च प्रभाव वाली तकनीकों व नीतिगत मॉडलों को साझा करने में मदद मिलेगी।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/06/image_750x_683edd9aab36d.jpg" alt="" style="display: block; margin-left: auto; margin-right: auto;" /></p>
<p>ICRISAT के महानिदेशक <strong>डॉ. हिमांशु पाठक</strong> ने इस अवसर पर कहा, &ldquo;ग्लोबल साउथ के पास नवाचार, स्थानीय विशेषज्ञता और सिद्ध समाधानों की एक समृद्ध विरासत है, लेकिन इन संसाधनों की पूर्ण क्षमता को उपयोग में लाने के लिए अधिक समन्वित रणनीति, निवेश और साझेदारी की आवश्यकता है।&rdquo;</p>
<p>उन्होंने आगे कहा, &ldquo;ISSCA की स्थापना ICRISAT की इस प्रतिबद्धता को दर्शाती है कि हम विज्ञान, मज़बूत साझेदारी और समावेशी विकास के ज़रिये वैश्विक दक्षिण के देशों को अपनी कृषि प्रणाली में परिवर्तन लाने में समर्थन देंगे।&rdquo;</p>
<p>डॉ. पाठक ने RIS और DAKSHIN की भूमिका की भी सराहना की और कहा, &ldquo;RIS एक प्रमुख संस्थागत भागीदार है, जिसकी नीतिगत नेतृत्व क्षमता और सहयोग मंचों के निर्माण में भूमिका सराहनीय है। यह साझेदारी समावेशी, सीमा-पार कृषि विकास को बढ़ावा देने की दिशा में एक अहम कदम है, ताकि कोई भी पीछे न रह जाए।&rdquo;</p>
<p>RIS के महानिदेशक <strong>प्रो. सचिन चतुर्वेदी</strong> ने कहा, &ldquo;DAKSHIN का उद्देश्य है कि वैश्विक दक्षिण के देशों के लिए व्यावहारिक और सतत समाधानों की पहचान कर उन्हें साझा किया जाए, जिससे उनकी अर्थव्यवस्थाओं और समाजों में सकारात्मक बदलाव लाया जा सके।&rdquo;</p>
<p>उन्होंने आगे कहा, &ldquo;ISSCA एक प्रभावशाली मंच है जो कृषि ज्ञान को लोकतांत्रिक बनाता है और व्यवहारिक अनुभवों को नीति में रूपांतरित करने में मदद करता है। ICRISAT और DAKSHIN की साझेदारी टिकाऊ कृषि उत्पादन प्रणालियों को मजबूत करने और डिजिटल तकनीकों के ज़रिये क्लाइमेट-स्मार्ट खेती को बढ़ावा देने के लिए एक उत्प्रेरक साबित होगी।&rdquo;</p>
<p>कृषि अनुसंधान और शिक्षा विभाग (DARE) के सचिव एवं भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक <strong>डॉ. एम.एल. जाट</strong> ने कहा, &ldquo;ICAR और ISSCA के बीच साझेदारी वैश्विक दक्षिण के देशों में विज्ञान आधारित कृषि समाधानों के प्रसार की हमारी प्रतिबद्धता को दर्शाती है।&rdquo;</p>
<p>उन्होंने कहा, &ldquo;ISSCA का डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म विकासशील देशों की विशिष्ट चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए ऐसे समाधानों को लक्षित रूप से अपनाने में सक्षम बनाएगा, जो स्केलेबल और विज्ञान-आधारित हों।&rdquo;</p>
<p>डॉ. जाट ने ICRISAT और DAKSHIN के बीच हुए MoU पर प्रसन्नता व्यक्त की और कहा, &ldquo;यह साझेदारी भारत की विशेषज्ञता, ICAR की भागीदारी और ICRISAT के अनुसंधान को मिलाकर ग्लोबल साउथ के देशों को लाभ पहुंचाने के हमारे सामूहिक प्रयास को और अधिक प्रभावशाली बनाएगी।&rdquo;</p>
<p>ISSCA को RIS के नीतिगत मार्गदर्शन और ICRISAT की दक्षिण-दक्षिण सहयोग में विशेषज्ञता प्राप्त है। ICRISAT की 50 वर्षों की वैज्ञानिक विरासत में कई ऐतिहासिक उपलब्धियाँ शामिल हैं&mdash;जैसे दुनिया की पहली व्यावसायिक अरहर हाइब्रिड, अफ्रीका की पहली पोषण-समृद्ध बाजरा किस्म, और जलवायु-स्मार्ट कृषि तकनीकें, जिन्होंने एशिया और सब-सहारा अफ्रीका में लाखों किसानों की आजीविका में सुधार किया है।</p>
<p>ISSCA की स्थापना कई अग्रणी संस्थानों के सहयोग से हुई है&mdash;जिनमें भारत सरकार का कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, ICAR, इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट (IRRI), इंटरनेशनल सेंटर फॉर एग्रीकल्चरल रिसर्च इन द ड्राई एरियाज (ICARDA), और गेट्स फाउंडेशन शामिल हैं। ये संस्थान नवाचार, समावेशन और स्थिरता के लिए प्रतिबद्ध हैं।</p>
<p>भविष्य में ISSCA सरकारों, शोध संस्थानों, विकास एजेंसियों और निजी क्षेत्र के नए साझेदारों को जोड़कर अपने नेटवर्क का विस्तार करता रहेगा, जिससे वैश्विक दक्षिण के देशों को और अधिक लाभ मिल सके।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ वैश्विक दक्षिण में कृषि विकास और सहयोग को बढ़ावा देने के लिए ISSCA की स्थापना ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[आईएमएफ के दबाव में पाकिस्तान ने बंद की गेहूं की खरीद और एमएसपी व्यवस्था]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/under-pressure-from-the-imf-pakistan-stopped-wheat-procurement-and-msp-system.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 30 May 2025 16:34:55 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/under-pressure-from-the-imf-pakistan-stopped-wheat-procurement-and-msp-system.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>आर्थिक संकट में फंसे पाकिस्तान में कृषि क्षेत्र में सुधारों का दौर चल रहा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के दबाव में पाकिस्तान ने चालू मार्केटिंग सीजन 2024-25 के लिए गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) घोषित नहीं किया और न ही गेहूं की सरकारी खरीद की। पाकिस्तान एग्रीकल्चरल स्टोरेज एंड सर्विसेज कारपोरेशन लिमिटेड (पीएएसएससीओ) ने इस साल गेहूं की कोई खरीद नहीं की है और वहां की सरकार हमारे देश में भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) की तर्ज पर काम करने वाली पाकिस्तान की इस संस्था को बंद करने की तैयारी कर रही है। आईएमएफ द्वारा एक्सटेंडेड फंड फैसिलिटी लोन के तहत पाकिस्तान को 2024-25 से 2027-28 के बीच 7.11अरब डॉलर का कर्ज दिया जाएगा। उसके लिए हुए समझौते के तहत ही पाकिस्तान में कृषि क्षेत्र से जुड़े फैसले किये जा रहे हैं।</p>
<p>पाकिस्तान द्वारा चालू साल के लिए गेहूं की एमएसपी घोषित नहीं करने के चलते वहां गेहूं का रकबा करीब पांच लाख हैक्टेयर कम हो गया है। अमेरिकी कृषि विभाग (यूएसडीए) के मुताबिक चालू साल में पाकिस्तान का गेहूं उत्पादन का रकबा &nbsp;91 लाख हैक्टेयर रह गया और नतीजतन 2024-25 मे गेहूं का उत्पादन 314.40 लाख टन से घटकर 285 लाख टन रहने का अनुमान है। यूएसडीए के मुताबिक पाकिस्तान में 2024-25 में गेहूं की खपत 315 लाख टन रहने का अनुमान है। इसके चलते पाकिस्तान को गेहूं का आयात करना पड़ेगा। वैसे पाकिस्तान ने पिछले साल भी गेहूं का आयात किया था। पाकिस्तान में प्रति व्यक्ति गेहूं की खपत 124 किलो सालाना है।</p>
<p>पाकिस्तान ने पिछले साल (2023-24) के लिए गेहूं का एमएसपी 9750 रुपये प्रति क्विंटल तय किया था जो भारतीय रुपये में करीब 3000 रुपये प्रति क्विंटल बैठता है।&nbsp; पीएएसएससीओ ने 17.9 लाख टन गेहूं की खरीद की थी। लेकिन अप्रैल, 2025 से शुरू हुए मार्केटिंग सीजन में कोई खरीद नहीं की है।</p>
<p>यही नहीं वहां पर संघीय और राज्यों के स्तर पर कृषि उत्पादों की कीमतों को तय करना और उनकी कीमतों को नियंत्रित करने की पूरी व्यवस्था को ही समाप्त किया जा रहा है। जिसे 2025 के रबी सीजन से लागू किया गया है। इस व्यवस्था बदलाव को वित्त पर्ष 2026 तक पूरा कर लिया जाएगा। पाकिस्तान के संसदीय मामलों के मंत्री तारिक फजल चौधरी ने नेशनल असेंबली को बताया कि पीएएसएससीओ को बंद करने और गेहूं की सरकारी खरीद व एमएसपी को बंद कर दिया जाएगा। यही नहीं पीएएसएससीओ के गोदामों और कार्यालयों की वैल्यूएशन के लिए टीएजीएम एंड कंपनी नाम की एक कंसल्टेंसी को नियुक्त किया गया है जो तीन माह में अपनी रिपोर्ट देगी। 1973 में स्थापित पीएएसएससीओ 51 साल पुरानी संस्था है।</p>
<p>इसके साथ ही पाकिस्तान ने आईएमएफ को भरोसा दिया है कि वह देश में कृषि उत्पादों के मार्केट में हस्तक्षेप से जुड़े कानून और नियमों की दिसंबर, 2025 तक समीक्षा करेगी।&nbsp; इसमें प्राइस कंट्रोल एंड प्रीविंशन ऑफ प्रोफिटियरिंग एंड होर्डिंग एक्ट, 1977 समेत चारों राज्यों पंजाब, बलोचिस्तान, सिंध और खैबरपख्तूनख्वा के इस तरह के कानून शामिल हैं। इसके साथ ही इन राज्यों में कृषि आय को कर मुक्त रखने वाले कानूनों को फेडरल स्तर पर व्यक्तिगत आय कर और कारपोरेट इनकम टैक्स की लाइन पर संशोधित किया जाएगा। यानी कृषि को आय कर के दायरे में लाया जाएगा जिसे जनवरी, 2025 से लागू माना जाएगा।</p>
<p>पाकिस्तान की खस्ताहाल अर्थव्यवस्था ने आईएमएफ की इन शर्तों को किसानों और कृषि क्षेत्र से जुड़े फैसलों को लागू करने की स्थिति पैदा हुई है। इन फैसलों से साबित होता है कि पाकिस्तान की प्राथमिकताओं पर वहां की सैनिक व्यवस्था काबिज है। इन फैसलों का क्या असर होगा यह आने वाले कुछ बरसों में ही साफ होगा। लेकिन यह देखना भी दिलचस्प होगा कि कृषि क्षेत्र में सब कुछ बाजार पर छोड़ने की यह व्यवस्था किस तरह के परिणाम लेकर आएगी। हमारे देश में भी कुछ अर्थविद कृषि उत्पादन और मार्केटिंग को मार्केट के भरोसे छोड़ने की वकालत करते रहे हैं।</p>
<p>ऐसा नहीं है कि भारत को कभी आईएमएफ से कर्ज नहीं लेना पड़ा, साल 1991 में बैलेंस ऑफ पेमेंट का संकट खड़ा होने की स्थिति में भारत को आईएमएफ से कर्ज लेना पड़ा था। इसके चलते देश में आर्थिक सुधारों को लागू किया गया था कृषि और खाद्य सुरक्षा के मामले में किसी तरह की कोई भी शर्त भारत नहीं मानी थी।</p>
<p>चालू साल में देश में 11.75 करोड़ टन का गेहूं उत्पादन का अनुमान है और सरकार ने रबी मार्केटिंग सीजन 2025-26 के लिए 2425 रुपये प्रति क्विंटल की एमएपी तय की है। साथ ही गेहूं की सरकारी खरीद के भी 300 लाख टन पर पहुंचने की संभावना है। सरकार ने गेहूं की सरकारी खरीद को कुछ राज्यों में 30 जून तक बढ़ा दिया है। ऐसे में भारत के उत्पादन और यहां की नीतियों की पाकिस्तान के साथ कोई तुलना नहीं की जा सकती है। गेहूं के अलावा अन्य फसलों में भी वहां के मुकाबले हमारे उत्पादन और खपत में बहुत बड़ा अंतर है। पाकिस्तान की तुलना हमारे कुछ राज्यों से ही इस मामले में की जा सकती है।</p>
<p>भारत में आईएमएफ का दबाव तो नहीं रहा लेकिन केंद्र सरकार ने जून, 2020 में कृषि क्षेत्र से जुड़े तीन केंद्रीय कानून लागू करने का फैसला लिया था। लेकिन उनके विरोध में किसान संगठनों द्वारा करीब 13 माह तक आंदोलन चलाने के चलते सरकार ने 2021 में इन कानूनों को रद्द कर दिया था। उसके बाद सरकार ने कृषि क्षेत्र सुधारों को लेकर कोई बड़ा फैसला नहीं लिया है।</p>
<p>वहीं आर्थिक संकट में फंसे पाकिस्तान को आईएमएफ की तमाम शर्तों का पालन करना पड़ा रहा है। इन कदमों के चलते पहले ही गेहूं का आयात करने वाले पाकिस्तान का आयात बढ़ेगा। यूएसडीए के मुताबिक पाकिस्तान ने 2023-24 में 35.90 लाख टन गेहूं का आयात किया था जबकि इस साल उत्पादन घटेगा और वहां गेहूं की खपत 315 लाख टन रहने का अनुमान लगाया गया है।</p>
<p>हालांकि चावल के मामले में पाकिस्तान की स्थिति बेहतर है और वह भारत, वियतनाम और थाइलैंड के बाद चौथा बड़ा चावल निर्यातक देश है। पाकिस्तान करीब 98 लाख टन चावल पैदा करता है और उसकी खपत करीब 42 लाख टन है। साल 2024-25 में पाकिस्तान ने 55 लाख टन चावल का निर्यात किया था जो उसके पहले साल 64.9 लाख टन रहा था। बासमती चावल के निर्यात बाजार में पाकिस्तान भारत का मुख्य प्रतिस्पर्धी है।&nbsp;</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/04/image_750x500_6803a7a5af4f9.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ आईएमएफ के दबाव में पाकिस्तान ने बंद की गेहूं की खरीद और एमएसपी व्यवस्था ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[तुर्की और अजरबैजान के खिलाफ भारतीय व्यापारियों में रोष, उत्पादों व पर्यटन के बहिष्कार की मांग]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/indian-traders-angry-against-türkiye-and-azerbaijan-for-supporting-pakistan-demand-for-boycott-of-products-and-tourism.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 14 May 2025 14:15:57 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/indian-traders-angry-against-türkiye-and-azerbaijan-for-supporting-pakistan-demand-for-boycott-of-products-and-tourism.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत-पाकिस्तान तनाव के बीच तुर्की और अजरबैजान द्वारा पाकिस्तान को समर्थन दिए जाने को लेकर भारत में काफी रोष देखा जा रहा है। भारतीय व्यापारियों का कहना है कि ऐसे देशों के साथ व्यापार जारी रखना उचित नहीं है जो भारत के खिलाफ आतंकी मुल्क पाकिस्तान का खुलकर साथ दे रहे हैं। &nbsp;</p>
<p>व्यापारियों का कहना है कि जब ये देश भारत विरोधी रुख अपनाते हैं और खुलेआम पाकिस्तान का समर्थन करते हैं, तो ऐसे में उनके उत्पादों को भारत में बेचना और खरीदना राष्ट्रहित के खिलाफ है। व्यापारिक संगठनों ने देशभर के व्यापारियों से अपील की है कि वे तुर्की के कपड़े, परफ्यूम, सजावटी सामान और अजरबैजान के तेल उत्पादों समेत अन्य वस्तुओं की खरीद-बिक्री बंद करें।&nbsp;</p>
<p>हालांकि, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इस बहिष्कार का भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, क्योंकि भारत इन देशों के साथ महत्वपूर्ण व्यापारिक संबंध रखता है। खासकर अजरबैजान से भारत बड़ी मात्रा में कच्चा तेल आयात करता है।</p>
<p><strong>तुर्की के सेब का आयात रोकने की मांग </strong></p>
<p>हिमाचल प्रदेश के सेब बागवानों ने तुर्की&nbsp;के सेब और अन्य उत्पादों का बहिष्कार करने की अपील की है। किसान नेता और हिमाचल प्रदेश फल-<span>सब्जियां और फूल उत्पादक संघ के अध्यक्ष <strong>हरीश चौहान</strong> ने कहा कि तुर्की जैसे देशों से सेब आयात के कारण हिमाचल के बागवानों को नुकसान उठाना पड़ रहा है। देश के बाजारों में तुर्की का सेब भरा पड़ा होने से हिमाचल के सेब को सही दाम नहीं मिल पाता है। तुर्की ने पाकिस्तान का साथ देकर भारत के साथ धोखा किया है। ऐसे में तुर्की से सेब समेत अन्य वस्तुओं के आयात पर पूरी तक से रोक लगानी चाहिए।&nbsp;</span></p>
<p><strong>महाराष्ट्र</strong> में पुणे के व्यापारियों ने भी तुर्की के सेब के बहिष्कार की मांग उठाई है। एक व्यापारी ने कहा, "हम तुर्की और अजरबैजान के सामान नहीं बेचेंगे और न ही खरीदेंगे। पाकिस्तान का साथ देने वाले देशों को सबक सिखाना जरूरी है।"</p>
<p><strong>वस्तुओं और पर्यटन के बहिष्कार की अपील&nbsp;</strong></p>
<p>कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) समेत कई व्यापारिक संगठनों ने तुर्की और अजरबैजान के उत्पादों और पर्यटन के बहिष्कार का आह्वान किया है। कैट ने अपने सदस्यों और पूरे व्यापारी समुदाय से अपील की है कि वे तुर्की और अजरबैजान से आयातित वस्तुओं की खरीद और बिक्री बंद कर दें।&nbsp;</p>
<p>कैट के महासचिव और भाजपा सांसद <strong>प्रवीण </strong><strong>खंडेलवाल</strong> ने कहा, &ldquo;जो देश भारत के हितों के खिलाफ खड़े होते हैं, उनके उत्पादों के लिए भारत में कोई जगह नहीं होनी चाहिए। हम स्थानीय व्यापार को बढ़ावा देंगे और 'वोकल फॉर लोकल' अभियान को और मजबूती देंगे।<span>&rdquo;</span></p>
<p>खंडेलवाल ने कहा कि तुर्की और अजरबैजान ने पाकिस्तान का समर्थन करके भारत की भावनाओं को ठेस पहुंचाई है। ये देश भारतीय पर्यटकों और व्यापार से होने वाली कमाई को भूल गए हैं। हम व्यापारियों और नागरिकों से अपील करते हैं कि इन देशों के उत्पादों का बहिष्कार करें। व्यापारिक संगठनों ने केंद्र सरकार से अपील की है कि इन दोनों देशों के साथ व्यापारिक संबंधों की समीक्षा की जाए और जरूरत पड़ने पर आयात पर प्रतिबंध लगाया जाए।</p>
<p><strong>आर्थिक</strong> <strong>प्रभाव</strong></p>
<div>भारत का तुर्की और अजरबैजान के साथ सालाना लगभग 12 अरब डॉलर का व्यापार है, जिसमें ट्रेड बैलेंस भारत के पक्ष में है।&nbsp;2024 में तुर्की में 3.9 लाख और अजरबैजान में 2.5 लाख से अधिक भारतीय पर्यटकों ने यात्रा की, जिससे इन देशों को अरबों रुपये की कमाई हुई। बहिष्कार के कारण इन देशों के पर्यटन और व्यापार क्षेत्र को भारी नुकसान होने की संभावना है। विशेष रूप से अजरबैजान, जहां भारत 2023 में कच्चा तेल का तीसरा सबसे बड़ा खरीदार था, को आर्थिक झटका लग सकता है। <span>तुर्की की हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री के लिए भी भारतीय पर्यटक बहुत अहम हैं।</span></div>
<p><strong>सोशल</strong> <strong>मीडिया</strong> <strong>पर</strong> <strong>अभियान</strong><br />सोशल मीडिया पर #BoycottTurkey और #BoycottAzerbaijan हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं। कई यूजर्स ने लिखा, "तुर्की और अजरबैजान ने आतंकवाद का समर्थन करने वाले पाकिस्तान का साथ दिया है। हमें इन देशों की यात्रा और उत्पादों का बहिष्कार करना चाहिए।"</p>
<p><strong>तुर्की</strong> <strong>और</strong> <strong>अजरबैजान</strong> <strong>का</strong> <strong>रुख</strong><br />तुर्की ने भारत के ऑपरेशन सिंदूर को उकसावे वाला कदम बताया था और पाकिस्तान को ड्रोन और सैन्य मदद दी। अजरबैजान का रुख भी पाकिस्तान के समर्थन में रहा है।&nbsp;</p>
<p>गौरतलब है कि 23 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 निर्दोष नागरिकों की जान चली गई थी। इसके जवाब में भारत ने <strong>'ऑपरेशन सिंदूर'</strong> के तहत पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकी ठिकानों को तबाह कर दिया था। इस कार्रवाई की तुर्की और अजरबैजान ने निंदा करते हुए पाकिस्तान का समर्थन किया। पाकिस्तान ने भारत पर जो ड्रोन हमले किए, <span>उनमें तुर्की के ड्रोन का इस्तेमाल किया गया था।</span> भारत ने तुर्की के ड्रोन इस्तेमाल पर कड़ा ऐतराज जताया है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ तुर्की और अजरबैजान के खिलाफ भारतीय व्यापारियों में रोष, उत्पादों व पर्यटन के बहिष्कार की मांग ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[चीन में सूखे के हालात से गेहूं की फसल पर संकट, इंग्लैंड के किसानों को भी नुकसान की आशंका]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/drought-conditions-in-china-risk-wheat-crops-uk-also-to-see-crop-failure.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 10 May 2025 17:06:50 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/drought-conditions-in-china-risk-wheat-crops-uk-also-to-see-crop-failure.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>लगातार बिगड़ता जलवायु संकट गेहूं की फसलों के लिए खतरा बनता जा रहा है। इस साल चीन और इंग्लैंड सूखा, अत्यधिक तापमान और घटते जल संसाधनों से जूझ रहे हैं। एशिया के प्रमख अनाज उत्पादक देश से लेकर इंग्लैंड के ग्रामीण इलाकों तक, किसान और अधिकारी फसलों और जल प्रणालियों पर बढ़ते दबाव को लेकर चेतावनी दे रहे हैं। गेहूं की फसल पर संकट को देखते हुए खाद्य असुरक्षा और आयात पर निर्भरता बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है।</p>
<p>चीन के हेनान प्रांत को देश के अन्न भंडार के रूप में जाना जाता है। वहां सरकार ने चेतावनी जारी की है कि झुलसाने वाले तापमान और सूखी हवाएं गेहूं के पौधों में दाना भरने के चरण पर असर डाल रही हैं। मौसम पूर्वानुमान के अनुसार 11 से 13 मई के बीच तापमान 35&deg;C से ऊपर रहेगा, खासकर अंयांग, पुइयांग और झेंगझोउ जैसे क्षेत्रों में। यह समय फसल की उपज और गुणवत्ता निर्धारित करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।</p>
<p>केवल हेनान प्रांत में चीन का लगभग एक-तिहाई गेहूं उत्पादन होता है। ऐसे में वहां किसी भी प्रकार की क्षति के व्यापक परिणाम हो सकते हैं। देश के जल संसाधन मंत्री ने भी हाल में उत्तर चीन के गेहूं उत्पादन क्षेत्र में लगातार बिगड़ते सूखे की स्थिति को लेकर चिंता जताई है।</p>
<p>उपग्रह और मौसम संबंधी आंकड़ों से पता चलता है कि हेबेई, आनहुई और जियांग्सू जैसे प्रमुख उत्पादन क्षेत्रों में तीन महीने से बारिश की भारी कमी है। इन क्षेत्रों में चीन की सर्दियों के गेहूं उत्पादन का 60% से अधिक होता है। हालांकि इन क्षेत्रों में सिंचाई की व्यवस्था है, फिर भी शुष्क मौसम के कारण उपज पर गंभीर असर पड़ने की आशंका है। यदि फसल खराब होती है तो चीन गेहूं का अधिक मात्रा में आयात कर सकता है। चीन पहले ही 2022 और 2023 में दुनिया का सबसे बड़ा गेहूं आयातक रहा है।</p>
<p><strong>इंग्लैंड के किसानों के सामने भी संकट</strong><br />इंग्लैंड में भी किसान पहले फसल खराब होने की आशंका से जूझ रहे हैं। वहां मौसम विभाग के अनुसार वसंत की शुरुआत पिछले 69 वर्षों में सबसे शुष्क हुई है। मार्च का महीना 1961 के बाद सबसे शुष्क रहा, और अप्रैल में भी सामान्य से केवल आधी बारिश हुई। इसलिए किसानों को सामान्य से कहीं पहले सिंचाई शुरू करनी पड़ी है। उत्तर-पूर्व और उत्तर-पश्चिम क्षेत्रों में जलाशयों का जलस्तर विशेष रूप से कम है।</p>
<p>इंग्लैंड की पर्यावरण एजेंसी ने जनता से पानी बचाने की अपील की है। तैयारियों का आकलन करने के लिए हुई बैठक में नेशनल ड्रॉट ग्रुप (NDG) ने काफी निराशाजनक तस्वीर पेश की है। उसका कहना है कि संकट से निपटने की कोई तैयारी नहीं हैं और सभी बारिश से उम्मीदे लगाए बैठे हैं। विशेषज्ञों ने मौजूदा हालात की तुलना 2022 से की है। उस साल भी इंग्लैंड के विशेष रूप से दक्षिण-पूर्व क्षेत्र में जल संकट उत्पन्न हुआ था और बड़े पैमाने पर फसलें नष्ट हुई थीं।</p>
<p>जलाशयों का जलस्तर इस समय 2022 की तुलना में भी कम है। वर्तमान में देशभर में जलस्तर औसतन 84% पर है, जबकि पिछले वर्ष इसी समय यह 90% था। उत्तरी इंग्लैंड विशेष रूप से संवेदनशील है, जहां कुछ जल कंपनियां निर्धारित समय से कई महीने पहले नदियों से जल ले रही हैं। वहां मछलियों की मृत्यु दर बढ़ गई है और नदियों का प्रवाह चिंताजनक रूप से कम है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ चीन में सूखे के हालात से गेहूं की फसल पर संकट, इंग्लैंड के किसानों को भी नुकसान की आशंका ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[डब्ल्यूटीओ सदस्यों ने पब्लिक स्टॉकहोल्डिंग मुद्दे के स्थायी समाधान की मांग दोहराई, वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए बताया अनिवार्य]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/wto-members-push-for-permanent-solution-on-public-stockholding-call-it-crucial-for-global-food-security.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 04 May 2025 08:42:10 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/wto-members-push-for-permanent-solution-on-public-stockholding-call-it-crucial-for-global-food-security.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>जैसे-जैसे वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर खतरा बढ़ता जा रहा है, विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के सदस्य देशों ने खाद्य सुरक्षा के उद्देश्य से सार्वजनिक भंडारण (Public Stockholding - PSH) पर स्थायी समाधान की मांग को फिर से दोहराया है। 30 अप्रैल को कृषि समिति की बैठक में राजनयिकों ने इस बात पर जोर दिया कि पब्लिक स्टॉकहोल्डिंग मुद्दा वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में एक अनिवार्य आवश्यकता है।</p>
<p>कृषि वार्ताओं के नवनियुक्त अध्यक्ष अली सरफराज हुसैन ने WTO के 14वें मंत्रीस्तरीय सम्मेलन (MC14), जो मार्च 2026 में होने वाला है, से पहले राजनीतिक इच्छाशक्ति को व्यावहारिक समाधान में बदलने की आवश्यकता को रेखांकित किया। उन्होंने स्वीकार किया कि सदस्य देशों के बीच मतभेद बने हुए हैं। हुसैन ने सदस्य देशों से आग्रह किया कि वे इस गंभीर विषय पर आम सहमति की ओर बढ़ें।</p>
<p>हुसैन ने कहा, &ldquo;सार्थक प्रगति के लिए ईमानदार चर्चा का कोई विकल्प नहीं है। सार्वजनिक भंडारण को केवल व्यापार का विषय नहीं, बल्कि वैश्विक खाद्य सुरक्षा नीति का मुख्य स्तंभ मानकर देखा जाना चाहिए।&rdquo;</p>
<p>पब्लिक स्टॉकहोल्डिंग की व्यवस्था खासकर विकासशील देशों को खाद्यान्न खरीदने, भंडारण करने और गरीब वर्गों को वितरित करने की अनुमति देती है। इसके समर्थकों का मानना है कि यह प्रणाली घरेलू बाजार को स्थिर करने और खाद्य पहुंच सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है, जबकि कुछ सदस्य देश इसके कारण व्यापार में विकृति की आशंका व्यक्त करते हैं। भारत इस व्यवस्था के पक्ष में है।</p>
<p>हालांकि बैठक में मतभेदों के बावजूद कई देशों ने रचनात्मक वार्ता की इच्छा जताई। कई प्रतिनिधियों ने इस मुद्दे को WTO की विश्वसनीयता की परीक्षा बताया, खासकर मौजूदा भू-राजनीतिक तनाव और जलवायु परिवर्तन के चलते कृषि पर पड़ रहे प्रभावों के संदर्भ में।</p>
<p>पब्लिक स्टॉकहोल्डिंग के अलावा, स्पेशल सेफगार्ड मेकैनिज्म (Special Safeguard Mechanism - SSM) पर भी चर्चा हुई, जो विकासशील देशों को आयात में अचानक वृद्धि या कीमतों में गिरावट की स्थिति में अस्थायी रूप से टैरिफ बढ़ाने की अनुमति देगा। हालांकि सदस्य देशों के बीच अब भी इसके बाजार पहुंच से संबंध को लेकर मतभेद हैं, लेकिन अध्यक्ष ने गतिरोध तोड़ने के लिए रचनात्मक सोच को प्रोत्साहित किया।</p>
<p>हुसैन ने MC14 की तैयारी के लिए एक रूपरेखा प्रस्तुत की जिसमें विभिन्न सदस्य समूहों से परामर्श, कृषि समिति की विशेष सत्रों में नियमित बैठकें और एक मूल्यांकन सत्र शामिल है। आगे 5-6 मई को होने वाली सस्टेनेबल कृषि पर बैठक भी इस दिशा में गति प्रदान कर सकती है।</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ डब्ल्यूटीओ सदस्यों ने पब्लिक स्टॉकहोल्डिंग मुद्दे के स्थायी समाधान की मांग दोहराई, वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए बताया अनिवार्य ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/05/image_750x500_681615d1ba3b1.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[वैश्विक गेहूं उत्पादन 79.5 करोड़ टन रहने की उम्मीद, भारत में रिकॉर्ड उत्पादन का अनुमान बरकार]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/global-wheat-output-steady-for-2025-as-fao-forecasts-mixed-cereal-trends.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 03 May 2025 17:11:46 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/global-wheat-output-steady-for-2025-as-fao-forecasts-mixed-cereal-trends.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) ने अनुमान लगाया है कि 2025 में वैश्विक गेहूं उत्पादन 79.5 करोड़ टन रहेगा, जो पिछले वर्ष के उत्पादन के बराबर है। प्रमुख गेहूं उत्पादक क्षेत्रों में मौसम संबंधी बदलावों के बाद उत्पादन के अनुमान में मामूली संशोधन किए गए हैं।</p>
<p>यूरोप के दक्षिणी देशों में अनुकूल मौसम से गेहूं पैदावार की उम्मीदें बढ़ गई हैं। इंग्लैंड और उत्तरी यूरोपीय यूनियन के देशों सहित उत्तरी क्षेत्रों में सूखे की चिंता भी कुछ हद तक कम हुई है। हालांकि, रूस में उत्पादन का पूर्वानुमान पहले जैसा है, जहां प्रतिकूल मौसम और कम बुवाई क्षेत्र के कारण उत्पादन में गिरावट की संभावना है। यूक्रेन में अप्रैल की वर्षा के बावजूद गेहूं उत्पादन औसत से नीचे रहने की संभावना है। उत्तर अमेरिका में स्थिति मिश्रित है। कनाडा का गेहूं उत्पादन पिछले वर्ष के समान रहने का अनुमान है, जबकि अमेरिका में सूखे की वजह से हल्की गिरावट की आशंका है।&nbsp;</p>
<p><strong>भारत में रिकॉर्ड उत्पादन का अनुमान बरकरार</strong><br />एशिया में, भारत में गर्म और शुष्क मौसम के कारण उत्पादन अनुमान थोड़ा घटाया गया है, लेकिन सिंचाई के व्यापक उपयोग के चलते रिकॉर्ड फसल की उम्मीद बनी हुई है। पाकिस्तान का उत्पादन पूर्वानुमान थोड़ा बढ़ाया गया है, जो पांच वर्षीय औसत से अधिक रहने की संभावना है।</p>
<p>अन्य क्षेत्रों में, ईरान और तुर्की जैसे देशों में वर्षा की कमी के कारण उत्पादन औसत से कम रहने की संभावना है। उत्तरी अफ्रीका में मिश्रित स्थिति है- मोरक्को में कमजोर फसल के आसार हैं, जबकि मिस्र और ट्यूनिशिया में सिंचाई के चलते औसत या उससे अधिक उत्पादन की उम्मीद है। दक्षिणी गोलार्ध में अर्जेंटीना में उम्मीद से बेहतर वर्षा के कारण उत्पादन अनुमान बढ़ा है, जबकि ऑस्ट्रेलिया में वार्षिक गिरावट के बावजूद उत्पादन तीन करोड़ टन से अधिक रहने की संभावना है।</p>
<p>मक्का जैसे मोटे अनाज की फसलों की कटाई दक्षिणी गोलार्ध में शुरू हो चुकी है। ब्राजील में अनुकूल मौसम और बढ़े हुए बुवाई क्षेत्र से उत्पादन बढ़ने की उम्मीद है। दक्षिण अफ्रीका में 2024 की सूखा प्रभावित फसल के बाद 2025 में सुधार की संभावना है। इसके विपरीत अर्जेंटीना में रोगों के डर से बुवाई क्षेत्र घटने के कारण उत्पादन औसत से कम रहने का अनुमान है। अमेरिका में 5% अधिक बुवाई से उत्पादन अधिक रहने की संभावना है।</p>
<p><strong>वैश्विक अनाज आउटलुक</strong><br />FAO ने 2024 में वैश्विक अनाज उत्पादन का अनुमान घटाकर 284.8 करोड़ टन कर दिया है, जो पिछले महीने की तुलना में 11 लाख टन कम और 2023 से भी थोड़ा कम है। यह खास तौर से मक्का उत्पादन में गिरावट के कारण है। हालांकि, 2024/25 में चावल उत्पादन 54.36 करोड़ टन तक पहुंचने की उम्मीद है, जो अब तक का रिकॉर्ड होगा।</p>
<p>2024/25 में वैश्विक अनाज उपयोग 287 करोड़ टन रहने का अनुमान है, जो पिछले सत्र की तुलना में 2.82 करोड़ टन (1%) अधिक है। गेहूं उपयोग थोड़ा बढ़ा है, खासकर ईयू और अर्जेंटीना में। मोटे अनाज का उपयोग स्थिर है, जबकि अफ्रीकी देशों में मांग बढ़ने से चावल उपयोग 53.94 करोड़ टन तक पहुंचने की उम्मीद है।</p>
<p>2024/25 के सीजन के अंत तक वैश्विक अनाज भंडार 86.82 करोड़ टन रहने का अनुमान है, जो 1.9% की वार्षिक गिरावट दर्शाता है। गेहूं और मोटे अनाज का भंडार ईयू, तुर्की और अमेरिका में कमी के कारण घटने की संभावना है। हालांकि चावल का भंडार बढ़कर 20.57 करोड़ टन तक पहुंच सकता है। यह वृद्धि चीन, भारत, इंडोनेशिया, और फिलीपींस के भंडारण में वृद्धि के चलते है।</p>
<p><strong>अनाज व्यापार में गिरावट, चावल व्यापार में वृद्धि</strong><br />2024/25 में वैश्विक अनाज व्यापार गिरकर 47.86 करोड़ टन रहने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 6.8% कम है। गेहूं व्यापार में 7.4% की गिरावट आएगी, विशेष रूप से रूस से निर्यात में गिरावट और तुर्की की कम मांग के कारण। चीन से कम मांग और ब्राज़ील व रूस से कम आपूर्ति के कारण मोटे अनाज व्यापार में 8.2% की गिरावट की संभावना है। 2025 में चावल व्यापार 1.2% बढ़कर 6.04 करोड़ टन तक पहुंचने की संभावना है, जो नया रिकॉर्ड होगा।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/01/image_750x500_6795e6b750b3b.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ वैश्विक गेहूं उत्पादन 79.5 करोड़ टन रहने की उम्मीद, भारत में रिकॉर्ड उत्पादन का अनुमान बरकार ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[अनाज और डेयरी उत्पादों के कारण अप्रैल में वैश्विक खाद्य कीमतें बढ़ीं, वनस्पति तेल के दाम गिरे]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/global-food-prices-rise-in-april-driven-by-surge-in-cereal-and-dairy-costs-fao.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 03 May 2025 14:10:31 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/global-food-prices-rise-in-april-driven-by-surge-in-cereal-and-dairy-costs-fao.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) की नई रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल में लगातार दूसरे महीने वैश्विक खाद्य वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि दर्ज की गई। एफएओ खाद्य मूल्य सूचकांक मार्च की तुलना में 1.0% बढ़कर 128.3 अंक पर पहुंच गया, जो एक साल पहले की तुलना में 7.6% अधिक है। यह वृद्धि मुख्य रूप से अनाज, मांस और दुग्ध उत्पादों की कीमतों में हुई बढ़ोतरी के कारण हुई। वहीं, वनस्पति तेल और चीनी की कीमतों में गिरावट देखी गई, जिससे वैश्विक खाद्य बाजार में मिश्रित रुझान सामने आए।</p>
<p>एफएओ अनाज मूल्य सूचकांक मार्च की तुलना में 1.2 प्रतिशत बढ़ा। वैश्विक गेहूं की कीमतों में हल्की बढ़ोतरी हुई, जिसका कारण रूस में निर्यात योग्य आपूर्ति की कमी है। एफएओ के चावल मूल्य सूचकांक में भी सुगंधित किस्मों की मांग बढ़ने से वृद्धि दर्ज की गई। अमेरिका में मौसमी रूप से कम स्टॉक के चलते अंतरराष्ट्रीय मक्का की कीमतें भी बढ़ीं। मुद्रा विनिमय दर में उतार-चढ़ाव ने वैश्विक बाजारों में कीमतों को प्रभावित किया, जबकि टैरिफ नीति में बदलावों ने बाजार में अनिश्चितता पैदा की।</p>
<p>एफएओ दुग्ध मूल्य सूचकांक अप्रैल में पिछले महीने की तुलना में 2.4 प्रतिशत बढ़ा और यह एक साल पहले की तुलना में 22.9 प्रतिशत अधिक रहा। इस वृद्धि का प्रमुख कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बटर की कीमतें रहीं, जो यूरोप में स्टॉक में गिरावट के कारण अब तक के उच्चतम स्तर पर पहुंच गईं।</p>
<p>इसके विपरीत, FAO वनस्पति तेल मूल्य सूचकांक में 2.3 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। हालांकि यह अब भी पिछले वर्ष की तुलना में 20.7 प्रतिशत अधिक रहा। मुख्य दक्षिण-पूर्व एशियाई उत्पादक देशों में मौसमी रूप से उत्पादन बढ़ने से पाम ऑयल की कीमतों में बड़ी गिरावट आई, जबकि वैश्विक आयात मांग मजबूत रहने से सोया और रेपसीड ऑयल की कीमतें बढ़ीं। सूरजमुखी तेल की कीमतें लगभग स्थिर रहीं।</p>
<p>चीनी मूल्य सूचकांक भी मार्च से 3.5 प्रतिशत गिर गया, जिसका मुख्य कारण वैश्विक आर्थिक परिदृश्य की अनिश्चितता और पेय पदार्थ तथा खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्रों से मांग पर संभावित असर को लेकर चिंताएं हैं। वैश्विक चीनी खपत का बड़ा हिस्सा इनमें जाता है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ अनाज और डेयरी उत्पादों के कारण अप्रैल में वैश्विक खाद्य कीमतें बढ़ीं, वनस्पति तेल के दाम गिरे ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[वैश्विक कमोडिटी कीमतें 2026 तक छह वर्षों के न्यूनतम स्तर पर पहुंचने की संभावना: विश्व बैंक]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/global-commodity-prices-likely-to-reach-six-year-low-by-2026-world-bank.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 30 Apr 2025 16:28:10 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/global-commodity-prices-likely-to-reach-six-year-low-by-2026-world-bank.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>वैश्विक आर्थिक वृद्धि की रफ्तार धीमी पड़ने और तेल की प्रचुर आपूर्ति के चलते वैश्विक कमोडिटी कीमतें 2020 <span>के बाद अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच सकती हैं। विश्व बैंक की नवीनतम </span><a href="https://openknowledge.worldbank.org/entities/publication/02d005ef-e3d9-44f5-aada-8ba42663a743"><strong><em>Commodity Markets Outlook</em></strong></a> <span>रिपोर्ट के अनुसार</span>, <span>यह गिरावट जहां निकट भविष्य में व्यापार प्रतिबंधों से उत्पन्न मुद्रास्फीति के जोखिमों को कुछ हद तक कम कर सकती है</span>, <span>वहीं यह दो-तिहाई विकासशील देशों की आर्थिक प्रगति को प्रभावित भी कर सकती है।</span></p>
<p>रिपोर्ट के अनुसार, <span><strong>वैश्विक कमोडिटी कीमतों</strong> में </span>2025 <span>में </span>12% <span>और </span>2026 <span>में अतिरिक्त </span>5% <span>की गिरावट आने की संभावना है। यद्यपि नॉमिनल टर्म में कीमतें कोविड-19 से पहले के स्तर से ऊपर रहेंगी</span>, <span>परंतु मुद्रास्फीति समायोजित कीमतें </span>2015 <span>से </span>2019 <span>की औसत कीमतों से भी नीचे आ सकती हैं। यह </span>COVID-19 <span>के बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुधार और </span>2022 <span>में यूक्रेन पर रूस के हमले से आई तेजी के अंत का संकेत है।</span></p>
<p><strong>कमजोर आर्थिक वृद्धि</strong> की यह स्थिति वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक और झटका है, <span>जो पहले से ही एक अत्यंत अस्थिर दशक से गुजर रही है। </span><strong>1970</strong> <span>के दशक के बाद से कमोडिटी कीमतों में इतनी अधिक अस्थिरता कभी नहीं देखी गई। व्यापार तनाव</span>, <span>भू-राजनीतिक जोखिम और मौसम से जुड़ी आपदाओं के कारण अस्थिरता की आशंका और बढ़ गई है। </span></p>
<p>विश्व बैंक समूह के मुख्य अर्थशास्त्री और विकास अर्थशास्त्र के वरिष्ठ उपाध्यक्ष <strong>इंदरमीत गिल </strong>ने कहा, &ldquo;<span>कमोडिटी की ऊंची कीमतें कई विकासशील देशों के लिए वरदान साबित हुई हैं</span>, <span>जिनमें से दो-तिहाई देश निर्यातक हैं। लेकिन अब हम पिछले </span>50 <span>वर्षों की सर्वाधिक अस्थिरता देख रहे हैं। इससे बचाव के लिए विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को तीन कदम उठाने होंगे: पहला</span>, <span>राजकोषीय अनुशासन बहाल करना</span>; <span>दूसरा</span>, <span>निजी पूंजी को आकर्षित करने के लिए व्यापार-अनुकूल माहौल बनाना</span>; <span>तीसरा</span>, <span>जहां भी अवसर हो</span>, <span>व्यापार को आसान बनाना। &nbsp;</span></p>
<p>वैश्विक कमोडिटी कीमतों में गिरावट 2023 से जारी है, <span>जिससे वैश्विक मुद्रास्फीति में भी कमी आई है। यह गिरावट </span>2025 <span>में और तेज होने की संभावना है</span>, <span>जिससे प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में ऊंचे टैरिफ के प्रभाव को कुछ हद तक संतुलित किया जा सकता है।</span></p>
<p>2025 <span>में <strong>ऊर्जा</strong> कीमतों में </span>17% <span>की गिरावट और </span>2026 <span>में और </span>6% <span>की गिरावट की संभावना है। ब्रेंट क्रूड ऑयल की औसत कीमत </span>2025 <span>में </span>$64 <span>प्रति बैरल रहने की संभावना है</span>, <span>जो </span>2024 <span>की तुलना में </span>$17 <span>कम है</span>, <span>और </span>2026 <span>में </span>$60 <span>प्रति बैरल तक जा सकती है। कोयले की कीमतों में इस वर्ष </span>27% <span>और </span>2026 <span>में अतिरिक्त </span>5% <span>की गिरावट की उम्मीद है</span>, <span>क्योंकि विकासशील देशों में कोयले से बिजली उत्पादन की गति धीमी हो रही है।</span></p>
<p>कमजोर आर्थिक वृद्धि के साथ-साथ वैश्विक <strong>तेल मांग</strong> में दीर्घकालिक मंदी की संभावना है। 2025 <span>में वैश्विक तेल आपूर्ति</span>, <span>मांग से प्रतिदिन </span>0.7 <span>मिलियन बैरल अधिक रहने की संभावना है। इलेक्ट्रिक वाहनों को तेजी से अपनाने के कारण भी तेल की मांग पर असर पड़ा है। विश्व के सबसे बड़े ऑटोमोबाइल बाजार चीन में पिछले साल खरीदी गई नई कारों में </span>40% <span>से अधिक बैटरी चालित या हाइब्रिड थीं। यह संख्या </span>2021 <span>के मुकाबले लगभग तीन गुना अधिक है।</span></p>
<p><strong>सोने</strong> की कीमतें 2025 में रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच सकती हैं। अगले दो वर्षों में सोने की कीमतें, महामारी पूर्व पांच वर्षों की औसत कीमतों से लगभग 150% अधिक रहने की संभावना है। इसके विपरीत, औद्योगिक धातुओं की कीमतों में गिरावट की उम्मीद है, विशेषकर चीन के रियल एस्टेट क्षेत्र में सुस्ती और व्यापार तनाव के चलते।</p>
<p><strong>खाद्य कीमतों</strong> <strong>में गिरावट की संभावना</strong>&mdash; खाद्य वस्तुओं की कीमतों में 2025 <span>में </span>7% <span>और </span>2026 <span>में </span>1% <span>की अतिरिक्त गिरावट की संभावना है। फिर भी</span>, <span>संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि विश्व स्तर पर सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्रों में विकट खाद्य असुरक्षा इस वर्ष और अधिक बढ़ जाएगी</span>, <span>जिससे 22 अत्यधिक कमजोर अर्थव्यवस्थाओं के 17 करोड़ लोग प्रभावित होंगे। मानवीय सहायता के लिए फंडिंग की कमी के बीच खाद्य कीमतों में गिरावट से मानवीय प्रयासों को कुछ मदद मिल सकती है। हालांकि</span>, <span>इससे भुखमरी की समस्या हल नहीं होगी। </span></p>
<p>विश्व बैंक की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, <span><strong>भारत</strong> का कृषि क्षेत्र वैश्विक कमोडिटी कीमतों में गिरावट</span>, <span>बढ़ते व्यापार तनाव और बढ़ते जलवायु जोखिमों के बीच अत्यधिक अनिश्चितता के दौर में प्रवेश कर रहा है। हालांकि</span>,<span> खाद्य कीमतों में अनुमानित गिरावट उपभोक्ताओं को कुछ राहत दे सकती है</span>, <span>लेकिन रिपोर्ट किसानों पर बढ़ते दबाव और जलवायु-अनुकूल नीतियों की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करती है।</span></p>
<p>&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ वैश्विक कमोडिटी कीमतें 2026 तक छह वर्षों के न्यूनतम स्तर पर पहुंचने की संभावना: विश्व बैंक ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[2025 में उर्वरक कीमतों में उछाल, ग्लोबल बाजार में महत्वपूर्ण खरीदार बना हुआ है भारत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/fertilizer-prices-surge-in-2025-squeezing-farmers-purchasing-power-says-rabobank-report.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 28 Apr 2025 17:03:02 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/fertilizer-prices-surge-in-2025-squeezing-farmers-purchasing-power-says-rabobank-report.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>राबोबैंक की नई राबो रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2025 में वैश्विक उर्वरक कीमतों में लगातार वृद्धि हो रही है। इससे दुनिया भर के किसानों की लागत बढ़ रही है और भविष्य की मांग को लेकर चिंताएं गहराती जा रही हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत वैश्विक उर्वरक बाजार में एक प्रमुख खरीदार बना हुआ है, हालांकि मौसमी मांग में कुछ नरमी आई है और भंडार भी घटते जा रहे हैं। खरीदार अब अधिक सतर्कता बरत रहे हैं और वेट एंड वॉच का नजरिया अपना रहे हैं।</p>
<p>रिपोर्ट के फर्टिलाइजर अफोर्डेबिलिटी इंडेक्स के अनुसार उर्वरकों की सुलभता अपेक्षाकृत कम होती जा रही है। राबो रिसर्च में फार्म इनपुट्स के वरिष्ठ विश्लेषक ब्रूनो फोंसेका ने कहा, "हम उर्वरक चक्र में एक स्पष्ट बदलाव देख रहे हैं, और दुर्भाग्यवश यह प्रवृत्ति घटती सुलभता की ओर बढ़ रही है।" उन्होंने कहा कि यह प्रतिकूल बाजार परिदृश्य पूरे वर्ष बने रहने के आसार हैं। रिपोर्ट के अनुसार भूराजनीतिक तनावों के बावजूद, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अमेरिका, यूरोप और अमेरिका जैसे क्षेत्रों में उर्वरक की मांग स्थिर बनी हुई है।</p>
<p>रिपोर्ट में बताया गया है कि नाइट्रोजन और फॉस्फेट आधारित उर्वरक विशेष रूप से प्रभावित हो रहे हैं। उनके दाम बढ़ने से किसानों की क्रय शक्ति घट रही है। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि उर्वरक मांग में बड़ी गिरावट तुरंत नहीं होगी, लेकिन घटती सुलभता का रुझान बताता है कि भविष्य में मांग में गिरावट अवश्य आएगी।</p>
<p>विशेष रूप से फॉस्फेट की आपूर्ति में बाधाओं के कारण दबाव और बढ़ गया है। चाइनीज उर्वरक निर्यात पर लगे प्रतिबंधों और बदलती वैश्विक बाजार स्थितियों ने फॉस्फेट और नाइट्रोजन उत्पाद, दोनों की आपूर्ति को कम कर दिया है। फोंसेका का अनुमान है कि चीन 2025 की दूसरी छमाही में घरेलू मांग में कमी आने के बाद ही निर्यात में ढील देगा।</p>
<p>उर्वरक क्षेत्र की ये चुनौतियां ऐसे समय में आ रही हैं जब कृषि जिंसों के बाजार में व्यापक स्तर पर अनिश्चितता बनी हुई है। वैश्विक भंडार की कमी के कारण मक्का बाजार में कीमतों के बढ़ने की संभावना है, जबकि सोयाबीन के दाम दबाव में हैं। इसका कारण ब्राजील में रिकॉर्ड फसल की उम्मीद और चीन को अमेरिकी सोयाबीन निर्यात में गिरावट है।</p>
<p>व्यापार को लेकर संघर्ष और टैरिफ (शुल्क) खतरों ने पिछले दो वर्षों में कृषि जिंसों की कीमतों पर भारी दबाव डाला है। फोंसेका ने कहा, "हमने पहले ही चेतावनी दी थी कि नए टैरिफ से अमेरिकी किसान सबसे अधिक प्रभावित होंगे।" उन्होंने यह भी बताया कि नीतिगत कदमों से उत्पन्न आपूर्ति संकट के चलते अमेरिका में उर्वरकों की कीमतें वैश्विक बाजारों की तुलना में अधिक रही हैं।</p>
<p>बाजार में अस्थिरता के बावजूद मक्का, सोयाबीन और गेहूं की कीमतें अभी 2024 की गर्मियों में निर्धारित दायरे के भीतर कारोबार कर रही हैं। रिपोर्ट के अनुसार, उर्वरक बाजार और कृषि जिंस दोनों ही कठिन परिस्थितियों से गुजर रहे हैं। इनकी सुलभता, आपूर्ति श्रृंखला में बाधाएं और व्यापार नीतियां वर्ष की दिशा तय करेंगी।</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/04/image_750x500_680e4e27120f7.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ 2025 में उर्वरक कीमतों में उछाल, ग्लोबल बाजार में महत्वपूर्ण खरीदार बना हुआ है भारत ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[तनाव के बीच चीन ने अमेरिका से सोयाबीन और मक्का आयात पर लगाई रोक: रिपोर्ट]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/china-halts-us-soybean-and-corn-imports-amid-trade-tensions.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 27 Apr 2025 18:02:29 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/china-halts-us-soybean-and-corn-imports-amid-trade-tensions.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>चीन ने जनवरी के मध्य से अमेरिका से सोयाबीन और मक्का की खरीद को निलंबित कर दिया है। निक्केई एशिया ने अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) के आंकड़ों का हवाला देते हुए यह रिपोर्ट दी है। चीन का यह कदम दोनों देशों के बीच व्यापार में तनाव को और बढ़ा सकता है। इस बढ़ती अनिश्चितता के बीच जापान अमेरिका से सोयाबीन की खरीद बढ़ाने पर विचार कर रहा है। यह दोनों देशों के बीच नए टैरिफ समझौते का हिस्सा होगा। जापान के मुख्य ट्रेड वार्ताकार 30 अप्रैल से 2 मई के बीच वाशिंगटन की यात्रा पर जाएंगे ताकि इस सिलसिले में बात आगे बढ़ाई जा सके।</p>
<p>दरअसल, चीन पिछले साल तक अमेरिकी कृषि उत्पादों का एक प्रमुख खरीदार था। अब वह अन्य आपूर्तिकर्ता देशों की ओर रुख कर रहा है। वर्ष 2024 में चीन ने अमेरिका से 2.7 करोड़ टन से अधिक सोयाबीन आयात किया था। इसकी कुल कीमत 12.8 अरब डॉलर थी। अमेरिका के कुल सोयाबीन निर्यात का लगभग आधा चीन ने ही खरीदा था। लेकिन बढ़ते व्यापार विवादों के बीच यह संबंध अब कमजोर होता नजर आ रहा है।</p>
<p>निक्केई की रिपोर्ट के अनुसार चीन ने इस महीने की शुरुआत में ब्राजील से 24 लाख टन सोयाबीन खरीदने के अनुबंध किए हैं। यह चीन की मासिक सोयाबीन खपत का लगभग एक-तिहाई है। ब्राजीलियन सोयाबीन प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन के अधिकारियों ने इस खरीद को असामान्य रूप से बड़ा बताया है। यह चीन की अमेरिकी से कृषि आयात से दूर होने की रणनीति का संकेत देता है। इस घटनाक्रम पर अमेरिकी सोयाबीन निर्यातकों ने चिंता व्यक्त की है।</p>
<p><strong>अमेरिका से चीन का आयात</strong><br />चीन मुख्य रूप से अमेरिका से कृषि उत्पादों का आयात करता है, जिनमें सोयाबीन, तिलहन और अनाज शामिल हैं। सोयाबीन का आयात मुख्य रूप से पशु चारे के लिए किया जाता है। इसका आयात ट्रंप के पहले कार्यकाल में भी प्रभावित हुआ था जब दोनों देशों के बीच व्यापार युद्ध छिड़ा था।</p>
<p>तब चीन ने अपने आयात स्रोतों में विविधता लाने की रणनीति अपनाई थी और अन्य देशों से कृषि उत्पाद खरीदने लगा था। अब, सभी अमेरिकी आयात पर 125% का नया टैरिफ लगने के बाद, विश्लेषकों का अनुमान है कि चीन का अमेरिका से कृषि जिंसों, विशेषकर सोयाबीन का आयात शून्य हो सकता है। वर्तमान में अमेरिकी सोयाबीन निर्यात पर चीन कुल 135% का टैरिफ लगा चुका है। इसमें मार्च में लागू 10% शुल्क और अप्रैल में घोषित 125% शुल्क शामिल हैं।</p>
<p>पहले अमेरिकी-चीन व्यापार युद्ध के दौरान, दुनिया का सबसे बड़ा सोयाबीन निर्यातक ब्राजील एक बड़े विजेता के रूप में उभरा था। चीन ने ब्राजील से बड़े पैमाने पर सोयाबीन खरीदना शुरू कर दिया था। 2010 के बाद से ब्राजील से चीन को सोयाबीन निर्यात में 280% से अधिक की वृद्धि हुई है, जबकि अमेरिकी निर्यात लगभग स्थिर रहा है। इसी संबंध को मजबूत करने के लिए चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने पिछले नवंबर में ब्राजील का राजकीय दौरा किया था। 2024 में चीन ने ब्राजील के कुल सोयाबीन निर्यात का 73% से अधिक हिस्सा खरीदा।</p>
<p>सीएनएन की एक रिपोर्ट के अनुसार, ब्राजील में सोयाबीन उत्पादन इस वर्ष रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने की संभावना है। इससे चीन ब्राजील और अर्जेंटीना जैसे अन्य दक्षिण अमेरिकी देशों से आयात बढ़ा सकता है। ब्राजील और अमेरिका के बाद अर्जेंटीना तीसरा सबसे बड़ा सोयाबीन उत्पादक है।</p>
<p>अमेरिकी सोयाबीन संघ (American Soybean Association) के अनुसार, 2018 के व्यापार युद्ध के दौरान अमेरिकी कृषि क्षेत्र को लगभग 27 अरब डॉलर का नुकसान हुआ था, जिसमें से 71% नुकसान केवल सोयाबीन से संबंधित था। आज भी अमेरिकी किसान, विशेष रूप से वे जो 2024 के चुनाव में ट्रंप के समर्थन वाले राज्यों में रहते हैं, आर्थिक नुकसान से जूझ रहे हैं। केवल इलिनॉयस, जो अमेरिका का सबसे बड़ा सोयाबीन उत्पादक राज्य है, और मिनेसोटा, जो तीसरे स्थान पर है, ने पिछले चुनाव में पूर्व उपराष्ट्रपति कमला हैरिस का समर्थन किया था।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ तनाव के बीच चीन ने अमेरिका से सोयाबीन और मक्का आयात पर लगाई रोक: रिपोर्ट ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/04/image_750x500_680e23bc9c249.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[चीन की शिपिंग इंडस्ट्री पर अंकुश लगाना चाहता है अमेरिका, लेकिन इससे अमेरिकी कृषि निर्यात को खतरा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/us-tariffs-targeting-chinese-shipping-could-undercut-american-farm-exports.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 21 Apr 2025 08:10:00 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/us-tariffs-targeting-chinese-shipping-could-undercut-american-farm-exports.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) ने वैश्विक जहाज निर्माण और बंदरगाह लॉजिस्टिक्स में चीन के प्रभुत्व को चुनौती देने के लिए ऐसा कदम उठाया है जो आखिरकार अमेरिकी किसानों के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। 17 अप्रैल को घोषित इस प्रस्ताव के तहत, सेक्शन 301 के अंतर्गत चीनी जहाजों पर अमेरिकी बंदरगाहों में प्रवेश के लिए भारी शुल्क लगाए जाएंगे। ये शुल्क 14 अक्टूबर 2025 से प्रभावी होंगे और 2028 तक बढ़कर प्रति प्रवेश 15 लाख डॉलर तक हो सकते हैं। इसके साथ ही, कुछ चीन-निर्मित पोर्ट उपकरणों पर 100% तक का शुल्क लगाने का प्रस्ताव भी दिया गया है।&nbsp;</p>
<p>चीन की हिस्सेदारी वैश्विक जहाज निर्माण में 50% और कंटेनर उत्पादन में 95% है, और USTR ने इसे अमेरिकी व्यापार के लिए खतरा बताया है। लेकिन कृषि निर्यातक इन कदमों से उपजे संभावित आर्थिक झटकों को लेकर चिंतित हैं।</p>
<p><strong>शिपिंग लागत में वृद्धि से कृषि निर्यात पर असर</strong><br />विश्लेषकों के अनुसार, चाइनीज ऑपरेटर वाले जहाजों पर प्रति प्रवेश 10 लाख डॉलर और चीन-निर्मित जहाजों पर 15 लाख डॉलर तक शुल्क लगाए जा सकते हैं। इससे शिपिंग की लागत बढ़ेगी और अमेरिकी कृषि उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा घट सकती है।</p>
<p>नेशनल ग्रेन एंड फीड एसोसिएशन (NGFA) के अनुसार, ये शुल्क अमेरिकी अनाज और तिलहन निर्यात की शिपिंग लागत को प्रति मीट्रिक टन 15 से 40 डॉलर बढ़ा सकते हैं। यानी प्रति बुशल 50 सेंट से 1.25 डॉलर तक इजाफा होगा। संगठन ने चेताया कि इससे सालाना 1.6-4.2 अरब डॉलर का अतिरिक्त खर्च हो सकता है। इससे 65 अरब डॉलर के कृषि व्यापार सरप्लस को भी खतरा हो सकता है।</p>
<p><strong>सोयाबीन, मक्का और गेहूं पर प्रभाव</strong><br />NGFA, नॉर्थ अमेरिकन एक्सपोर्ट ग्रेन एसोसिएशन और नेशनल ऑयलसीड प्रोसेसर्स एसोसिएशन ने USTR को सौंपी गई अपनी टिप्पणियों में प्रमुख कृषि उत्पादों के निर्यात पर इन प्रस्तावों के असर की चेतावनी दी है। इसमें मुख्य रूप से सोयाबीन, मक्का और गेहूं पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में बताया गया है।</p>
<p>उनके अनुमानों के अनुसार:<br />-गेहूं उत्पादन में 33% की गिरावट हो सकती है, जो निर्यात में 64% गिरावट के कारण होगी। इससे किसानों को सालाना 3 से 4 अरब डॉलर का नुकसान होगा।<br />-सोयाबीन उत्पादन 18% घट सकता है, क्योंकि निर्यात में 42% गिरावट की आशंका है। इससे सालाना 10 अरब डॉलर का नुकसान हो सकता है।<br />-मक्का उत्पादन में 3.6% गिरावट का अनुमान है और इसके निर्यात में लगभग 9% की कमी आ सकती है। इससे किसानों को 3 अरब डॉलर का सालाना नुकसान हो सकता है।</p>
<p>NGFA को डर है कि सोयाबीन निर्यात ब्राजील जैसे प्रतिस्पर्धी देशों के हाथ जा सकता है। ब्राजील का 2025 के लिए अनुमानित सोयाबीन उत्पादन 15.3 करोड़ टन है। 1 अप्रैल 2024 से अप्रैल 2025 के मध्य तक अमेरिका ने 4.5 करोड़ टन सोयाबीन का निर्यात किया है, जिसमें से 226 लाख टन (50.2%) चीन को भेजा गया। वहीं, इस अवधि में मक्का निर्यात 5.48 करोड़ टन रहा, लेकिन चीन को मात्र 10.2 लाख टन (1.86%) गया। विश्लेषकों का कहना है कि अगर व्यापार विवाद बढ़ा, तो 2025-26 में अमेरिका का सोयाबीन निर्यात 81 लाख टन तक घट सकता है।</p>
<p><strong>कृषि मूल्य श्रृंखला पर व्यापक असर</strong><br />यह नुकसान केवल किसानों तक सीमित नहीं होगा। इसका प्रभाव रेल, अन्य ट्रांसपोर्ट, प्रोसेसिंग प्लांट जैसी पूरे कृषि आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ेगा। इथेनॉल, सोयाबीन तेल, मक्का ग्लूटन फीड और सोयाबीन मील जैसे उत्पादों की मांग भी कम हो सकती है। इस स्थिति को देखते हुए, NGFA और अमेरिकन फार्म ब्यूरो जैसे संगठन USTR से कृषि क्षेत्र के लिए विशेष छूट की मांग कर रहे हैं। उनके प्रस्तावों में टैक्स क्रेडिट, अनुदान और शिपबिल्डिंग को समर्थन देने के लिए में रेगुलेशन में राहत शामिल हैं।</p>
<p><strong>वैश्विक व्यापार पर संभावित असर</strong><br />इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट (IFPRI) की एक रिपोर्ट के अनुसार, दूसरे देशों के साथ भी अमेरिका की टैरिफ वॉर शुरू हुई तो वैश्विक कृषि व्यापार में 3.3%-4.7% की कमी आ सकती है और वैश्विक जीडीपी में 0.3%-0.4% की गिरावट हो सकती है। अमेरिका की GDP में यह गिरावट 1% से 1.2% तक हो सकती है।&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ चीन की शिपिंग इंडस्ट्री पर अंकुश लगाना चाहता है अमेरिका, लेकिन इससे अमेरिकी कृषि निर्यात को खतरा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[बंपर मक्का फसल के कारण 2025&amp;#45;26 में वैश्विक अनाज उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचेगाः आईजीसी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/global-grains-output-to-hit-record-in-2025-26-amid-bumper-corn-crop-igc-says.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 20 Apr 2025 13:01:29 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/global-grains-output-to-hit-record-in-2025-26-amid-bumper-corn-crop-igc-says.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>इंटरनेशनल ग्रेन्स काउंसिल (IGC) ने अपनी नई ग्रेन मार्केट रिपोर्ट में 2025-26 मार्केटिंग वर्ष में 237.3 करोड़ टन अनाज उत्पादन का अनुमान जताया है। यह विश्व अनाज उत्पादन का अब तक का सबसे ऊंचा स्तर होगा। यह रिकॉर्ड मक्का की बंपर फसल के कारण होने की उम्मीद है। आईजीसी ने मक्का उत्पादन का अनुमान बढ़ाकर रिकॉर्ड 127.4 करोड़ टन कर दिया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 5% अधिक है। गेहूं और चावल के अनुमान पिछले महीने के समान ही बने रहे। कुल मिलाकर, अनाज उत्पादन में सालाना 3% की वृद्धि की संभावना जताई गई है।</p>
<p>आईजीसी का कहना है कि उत्पादन में वृद्धि के बावजूद खपत में समान गति से बढ़ोतरी के कारण स्टॉक का स्तर साल-दर-साल स्थिर रहने का अनुमान है। IGC के अनुसार मोटे अनाज का स्टॉक थोड़ी मात्रा में बढ़ सकता है, जबकि गेहूं का स्टॉक लगातार तीसरे वर्ष घटने के आसार हैं।</p>
<p>कुल अनाज (गेहूं, मक्का, जौ आदि) व्यापार 42.4 करोड़ टन रहने का अनुमान है, जो पिछले महीने के अनुमान से थोड़ा अधिक है। हालांकि, चीन की आयात मांग में 3.6 करोड़ टन की गिरावट के चलते कुल व्यापार औसत से कम रहने की संभावना है।</p>
<p><strong>वैश्विक अनाज बाजार में भारत की भूमिका</strong><br />IGC की नवीनतम रिपोर्ट में भारत की भूमिका काफी महत्वपूर्ण बताई गई है। 2024-25 में भारत में गेहूं की घरेलू खपत में कमी के कारण वैश्विक खाद्य उपयोग अनुमान में कटौती की गई है। वहीं, भारत के कारण चावल उत्पादन अनुमान में 30 लाख वृद्धि का संशोधन किया गया है। 2025-26 के लिए भारत की औद्योगिक मांग - विशेष रूप से एथेनॉल क्षेत्र में - वैश्विक अनाज खपत में वृद्धि का प्रमुख कारण है। भारत का चावल निर्यात 2025 और 2026 दोनों वर्षों में 230 लाख टन से अधिक रहने का अनुमान है। वैश्विक चावल व्यापार में भारत का लगभग 40% हिस्सा होगा।&nbsp;</p>
<p><strong>2024-25 की स्थिति</strong><br />वर्तमान 2024-25 सीजन में कुल अनाज उत्पादन का अनुमान 230.3 करोड़ टन है, जो पिछले महीने के अनुमान से 30 लाख टन कम है। गेहूं और बाजरे के उत्पादन अनुमानों में मामूली गिरावट आई है, लेकिन बड़ा परिवर्तन मांग के स्तर पर देखा गया। कुल खपत का अनुमान 80 लाख टन घटाकर 232.8 करोड़ टन किया गया है।</p>
<p>आईजीसी की रिपोर्ट में भारत में गेहूं की खाद्य खपत में कमी और चारे के रूप में मक्का की कमजोर मांग के बारे में बताया गया है। फिर भी 2024-25 के लिए कैरीओवर स्टॉक को पिछले महीने की तुलना में 40 लाख टन बढ़ाकर 58 करोड़ टन कर दिया गया है। हालांकि यह आंकड़ा पिछले दस वर्षों में सबसे कम है। इस सीजन में कुल व्यापार का अनुमान 41.8 करोड़ टन का है, जो पिछले अनुमान से 20 लाख टन अधिक है।</p>
<p><strong>सोयाबीन की रिकॉर्ड खपत और स्टॉक</strong><br />IGC की रिपोर्ट में 2024-25 में सोयाबीन के अनुमानों में ज्यादा बदलाव नहीं आया है। खपत और भंडारण दोनों रिकॉर्ड स्तर पर रहने की उम्मीद है। व्यापार भी रिकॉर्ड 18.1 करोड़ टन तक पहुंचने का अनुमान है, जो एक साल पहले की तुलना में 1% अधिक होगा।</p>
<p>मार्केटिंग वर्ष 2025-26 के लिए सोयाबीन उत्पादन 3% की वृद्धि के साथ 42.8 करोड़ टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने का अनुमान है। इसमें दक्षिण अमेरिका की फसलें मुख्य भूमिका निभाएंगी। खपत में भी वृद्धि की उम्मीद है, खासकर चारा, खाद्य और औद्योगिक क्षेत्रों में मांग के चलते। फिर भी स्टॉक ऊंचे स्तर पर बने रहेंगे। चीन को कम शिपमेंट के बावजूद छोटे बाजारों में बढ़ती आपूर्ति के कारण वैश्विक आयात मांग स्थिर रहने की संभावना है।</p>
<p><strong>चावल उत्पादन का अनुमान 30 लाख टन बढ़ा</strong><br />2024-25 में चावल उत्पादन के अनुमान को पिछले अनुमान से 30 लाख टन बढ़ाया गया है। इसका मुख्य कारण भारत के उत्पादन अनुमानों में सुधार है। इसके साथ ही खपत और भंडार में भी वृद्धि की उम्मीद की जा रही है। 2025-26 में चावल उत्पादन एक और रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचने की संभावना है, जिसमें प्रमुख निर्यातकों और चीन का योगदान रहेगा।</p>
<p>2026 में चावल की आयात मांग लगभग 6 करोड़ टन तक पहुंचने का अनुमान है, जो एक साल पहले की तुलना में 2% अधिक होगी। चावल की ज्यादा मांग अफ्रीकी और एशियाई देशों से होगी। वैश्विक व्यापार में भारतीय निर्यात की हिस्सेदारी लगभग 40% रहने की संभावना है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ बंपर मक्का फसल के कारण 2025-26 में वैश्विक अनाज उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचेगाः आईजीसी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कम मांग और अधिक आपूर्ति के कारण वैश्विक बाजार में चावल कीमतों में गिरावट]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/global-rice-prices-drop-amid-sluggish-demand-and-ample-supplies.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 19 Apr 2025 14:16:49 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/global-rice-prices-drop-amid-sluggish-demand-and-ample-supplies.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>हाल के हफ्तों में वैश्विक बाजार में चावल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई है। इसका मुख्य कारण कमजोर मांग और नई फसल की उपलब्धता से बढ़ी आपूर्ति है। इंटरनेशनल ग्रेन्स काउंसिल (IGC) की ग्रेन मार्केट रिपोर्ट के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय चावल कीमतों में हाल में 3% की गिरावट आई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि चावल की पर्याप्त उपलब्धता और सामान्य रूप से कमजोर खरीद ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर दबाव बनाए रखा।&nbsp;</p>
<p>थाईलैंड के 5% टूटे हुए चावल की कीमतें 10 डॉलर घटकर 403 डॉलर प्रति टन हो गईं। यह दो वर्षों से अधिक समय में सबसे निचला स्तर है। भारत और पाकिस्तान में भी व्यापार कम रहने के कारण निर्यात कीमतों में नरमी देखी गई, जबकि वियतनाम में नियमित खरीदारों से बिक्री जारी रहने से कीमतें स्थिर रहीं।</p>
<p>दक्षिण अमेरिका में कीमतों में सबसे तेज गिरावट देखी गई। IGC ने बताया कि उरुग्वे के 5% टूटे हुए चावल की कीमतें 60 डॉलर घटकर 598 डॉलर प्रति टन पर आ गईं, जो 2024-25 की फसल की बढ़ती उपलब्धता का परिणाम है।</p>
<p>यूएसडीए की इकोनॉमिक रिसर्च सर्विस (ERS) ने भी इन रुझानों की पुष्टि की है। इसकी फरवरी की 'राइस आउटलुक' रिपोर्ट में बताया गया कि थाई मिल्ड चावल की कीमतों में 10&ndash;11% की गिरावट आई है, जबकि वियतनाम में 6% की गिरावट दर्ज की गई। अन्य एशियाई निर्यातकों और दक्षिण अमेरिकी सप्लायरों के लिए कीमतों में उल्लेखनीय गिरावट आई। इनमें अर्जेंटीना की गिरावट सबसे ज्यादा थी। अमेरिका में भी लंबे दाने और मध्यम/छोटे दाने वाले चावल की कीमतों में कमी आई।</p>
<p>संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) ने कहा कि फरवरी में चावल की कीमतों में मासिक आधार पर 6.8% की गिरावट आई, जो फरवरी 2024 की तुलना में लगभग 25% कम है। कीमतों का यह स्तर अप्रैल 2022 के बाद सबसे कम है।&nbsp;</p>
<p>इंडिका किस्म के चावल की कीमतें जनवरी की तुलना में 7.7% गिरकर ढाई साल के निचले स्तर पर पहुंच गईं। एरोमैटिक और जापोनिका किस्मों की कीमतें भी कम व्यापार गतिविधि के चलते गिरीं। FAO ने कहा कि वियतनाम, भारत और थाईलैंड में फसलों की कटाई और ताजा मांग की कमी से आपूर्ति पर दबाव बना रहा। साथ ही, भारतीय रुपये के डॉलर के मुकाबले कमजोर होने और अमेरिका में व्यापारिक अनिश्चितताओं ने भी वैश्विक चावल कीमतों को प्रभावित किया।&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ कम मांग और अधिक आपूर्ति के कारण वैश्विक बाजार में चावल कीमतों में गिरावट ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[वर्ष 2024&amp;#45;25 में भारत से वस्तुओं का निर्यात मात्र 0.08 फीसदी बढ़ा, जबकि आयात में 6.62 फीसदी की बढ़ोतरी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/in-the-year-2024-25-the-export-of-goods-from-india-increased-by-only-0.08-percent-while-imports-increased-by-6.62-percent.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 16 Apr 2025 14:46:12 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/in-the-year-2024-25-the-export-of-goods-from-india-increased-by-only-0.08-percent-while-imports-increased-by-6.62-percent.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>विश्व व्यापार को लेकर पैदा अनिश्चितताओं के बीच वित्त वर्ष 2024-25 में भारत से वस्तुओं का निर्यात मात्र 0.08 प्रतिशत बढ़कर 437.42 अरब डॉलर रहा है, जबकि इस दौरान माल आयात 6.62 प्रतिशत बढ़कर 720.24 अरब डॉलर हो गया। इसके परिणामस्वरूप 282.82 अरब डॉलर का व्यापार घाटा हुआ।</p>
<p><strong>मार्च </strong><strong>2025</strong> में, <span>भारत के माल </span>निर्यात में सालाना आधार पर केवल 0.67 प्रतिशत की वृद्धि हुई और यह 41.97 अरब डॉलर रहा है, जबकि आयात में 11.36 फीसदी का बड़ा इजाफा हुआ और यह 63.51 अरब डॉलर तक पहुंच गया। इससे 21.54 अरब डॉलर का मासिक व्यापार घाटा हुआ जो पिछले साल मार्च में 15.13 अरब डॉलर और गत फरवरी में 14.05 अरब डॉलर था। देश में पेट्रोलियम और सोने के अधिक आयात के कारण मार्च में व्यापार घाटा बढ़ा है। मई, 2024 के बाद मार्च में सर्वाधिक पेट्रोलियम आयात हुआ है।</p>
<p><strong>सेवाओं के निर्यात</strong> में बढ़ोतरी के कारण वित्त वर्ष 2024-25 में भारत का <strong>कुल निर्यात</strong> (वस्तु व सेवाएं) 5.5 फीसदी बढ़कर 820.93 अरब डॉलर पर पहुंच गया, जबकि कुल आयात 6.85 फीसदी बढ़कर 915.19 अरब डॉलर रहा है। इस प्रकार कुल 94.26 अरब डॉलर का व्यापार घाटा हुआ जो पिछले साल हुए 78.39 अरब डॉलर के व्यापार घाटे से लगभग 20 फीसदी अधिक है।</p>
<p>वित्त वर्ष 2024-25 में भारत से <strong>सेवाओं का निर्यात</strong> 12.45 फीसदी बढ़कर 383.51 अरब डॉलर हो गया, जबकि सेवाओं का आयात 9.33 फीसदी बढ़कर 194.95 अरब डॉलर तक रहा है। &nbsp;</p>
<p>कुल मिलाकर वित्त वर्ष 2025 विश्व व्यापार के लिए एक मुश्किल साल रहा है। भू-राजनीतिक तनाव, समुद्री मार्ग की बाधाओं और कई देशों में मंदी की आहट से अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रभावित हुआ है। &nbsp;</p>
<p>वर्ष 2025-25 में भारत ने जिन देशों को सर्वाधिक निर्यात किया, <span>उनमें अमेरिका पहले</span>, <span>यूएई दूसरे</span>, <span>नीदरलैंड तीसरे</span>, <span>यूनाइटेड किंगडम चौथे और चीन पांचवें स्थान पर है। गत मार्च में भारत से अमेरिका को हुए निर्यात में 35 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। अमेरिका लगातार चौथे साल भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार रहा है। जबकि चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा लगातार बढ़ रहा है। अमेरिका के साथ भारत का द्विपक्षीय व्यापार </span>131.84 <span>अरब डॉलर तक पहुंच गया है। जबकि चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा बढ़कर </span>99.2 <span>अरब डॉलर हो गया। </span></p>
<p>अमेरिकी राष्ट्रपति <strong>डोनॉल्ड ट्रंप</strong> द्वारा दुनिया भर के देशों पर रैसिप्रोकल टैरिफ लगाने की घोषणा के बाद से ही विश्व व्यापार में उथल-पुथल मची है। हालांकि, <span>अमेरिका ने रैसिप्रोकल टैरिफ पर 90 दिन का अस्थायी विराम लगा दिया है और कई क्षेत्रों और उत्पादों को छूट भी दी है। लेकिन वैश्विक अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई। &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;</span></p>
<p>फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट आर्गनाइजेशन (फियो) के अध्यक्ष <strong>एससी रल्हन</strong> ने सेवा क्षेत्र के मजबूत प्रदर्शन को रेखांकित करते हुए कहा कि इसने माल निर्यात में मामूली वृद्धि को संतुलित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। रल्हन ने निर्यात की गति को बनाए रखने के लिए निर्यात क्षेत्र को समर्थन दिए जाने की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाने, उत्पादों और बाजारों में विविधता लाने और बुनियादी ढांचे की कमी को दूर करने के साथ-साथ रेगुलेटरी बोझ को कम करने तथा सस्ते ऋण मुहैया कराने की आवश्यकता है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>&nbsp;</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/04/image_750x500_67ff74ee9cf1e.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ वर्ष 2024-25 में भारत से वस्तुओं का निर्यात मात्र 0.08 फीसदी बढ़ा, जबकि आयात में 6.62 फीसदी की बढ़ोतरी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[खाद्य तेल उद्योग ने नेपाल से ड्यूटी&amp;#45;फ्री तेलों के बढ़ते आयात से सरकार को आगाह किया  ]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/edible-oil-industry-warns-government-over-rising-imports-of-duty-free-oils-from-nepal.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 14 Apr 2025 14:31:11 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/edible-oil-industry-warns-government-over-rising-imports-of-duty-free-oils-from-nepal.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत के खाद्य तेल उद्योग का प्रतिनिधित्व करने वाली प्रमुख संस्था <strong>इंडियन</strong> <strong>वेजीटेबल</strong> <strong>ऑयल प्रोड्यूसर्स </strong><strong>एसोसिएशन</strong><strong> (IVPA</strong><strong>)</strong> ने साउथ एशियन फ्री ट्रेड एरिया (SAFTA) समझौते के तहत नेपाल से ड्यूटी-फ्री खाद्य तेलों के आयात में भारी बढ़ोतरी पर चिंता जताई है। आईवीपीए ने केंद्र सरकार से इस मुद्दे की तरफ ध्यान देने और तेलों के ड्यूटी-फ्री आयात पर अंकुश लगाने की मांग की है।</p>
<p>आईवीपीए के अनुसार, 2025 की शुरुआत में नेपाल से खाद्य तेलों का आयात बहुत तेजी से बढ़ा है और जनवरी से मार्च के बीच 1.80 लाख टन से भी अधिक हो गया है, जबकि 2024 में पूरे साल के दौरान नेपाल से कुल 1.25 लाख टन खाद्य तेलों का आयात हुआ था।</p>
<p>वर्ष 2024 में नेपाल से अधिकांश खाद्य तेलों का आयात अक्टूबर-दिसम्बर 24 के दौरान हुआ था। भारत में खाद्य तेलों पर आयात शुल्क बढ़ने के बाद नेपाल के रास्ते सोया ऑयल का आयात काफी बढ़ गया है। नेपाल से जितने खाद्य तेलों का आयात हो रहा है, उतना तो नेपाल में तिलहन उत्पादन भी नहीं है। जाहिर है कि अन्य देशों से खाद्य तेल आयात कर नेपाल के रास्ते जीरो ड्यूटी पर भारत भेजा जा रहा है। इससे भारत को नुकसान पहुंच रहा है</p>
<p>एसोसिएशन ने कहा कि नेपाल से ड्यूटी-फ्री खाद्य तेलों का भारी आयात घरेलू बाजार को बिगाड़कर भारतीय प्रोसेसर्स एवं रिफाइनर्स को नुकसान पहुंच रहा है। इससे किसानों को तिलहन का सही दाम नहीं मिल पा रहा है और देश में खाद्य तेल रिफाइनरी की क्षमता का पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा है। &nbsp;</p>
<p>जीरो-ड्यूटी पर खाद्य तेलों के आयात के चलते बाजार में तिलहन की कीमतें गिर गई हैं और किसानों को एमएसपी से कम भाव पर उपज बेचनी पड़ रही है। तिलहन पर आयात शुल्क में बढ़ोतरी के बावजूद यह हो रहा है। नेपाल से सस्ते खाद्य तेलों के आयात का असर भारत सरकार के राजस्व पर भी पड़ेगा। &nbsp;</p>
<p>आईवीपीए ने संबंधित मंत्रालयों के समक्ष एक विस्तृत प्रस्ताव प्रस्तुत किया है, ताकि SAFTA के प्रावधानों को कड़ाई से लागू किया जा सके और भारत के किसानों, प्रोसेसर्स और हितों पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।&nbsp;एसोसिएशन ने संतुलित व्यापार और क्षेत्रीय सहयोग के प्रति अपने समर्थन को दोहराया है! साथ ही यह भी जोर दिया है कि खाद्य तेल क्षेत्र में निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा, मजबूत अनुपालन तंत्र और 'मेक इन इंडिया' तथा 'आत्मनिर्भर भारत' जैसे राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के साथ तालमेल अत्यंत आवश्यक है।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/04/image_750x500_67fcce71937c6.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ खाद्य तेल उद्योग ने नेपाल से ड्यूटी-फ्री तेलों के बढ़ते आयात से सरकार को आगाह किया   ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/04/image_750x500_67fcce71937c6.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[वैश्विक अनाज व्यापार 7 प्रतिशत घटने का अनुमान, उत्पादन और मांग के पैटर्न में बदलाव का असर]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/global-grain-trade-to-fall-7-percent-in-2024-25-amid-shifting-production-demand-patterns.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 13 Apr 2025 12:49:05 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/global-grain-trade-to-fall-7-percent-in-2024-25-amid-shifting-production-demand-patterns.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>वैश्विक अनाज व्यापार विपणन वर्ष 2024/25 में 7 प्रतिशत घटने का अनुमान है। यह हाल के वर्षों में सबसे तेज गिरावटों में से एक है। यह गिरावट प्रमुख खाद्य फसलों - गेहूं, चावल, मक्का और मोटे अनाज के क्षेत्र में रहेगी। अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, इस गिरावट के पीछे कारण हर अनाज के लिए अलग-अलग हैं।</p>
<p><strong>दशकों में पहली बार गेहूं व्यापार में सबसे बड़ी गिरावट की संभावना</strong><br />वैश्विक गेहूं व्यापार में 9 प्रतिशत की गिरावट का अनुमान है, जिसका कारण आयातक देशों में बढ़ती आत्मनिर्भरता और प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं के पास निर्यात योग्य भंडार की कमी है। विशेष रूप से चीन और पाकिस्तान ने घरेलू गेहूं उत्पादन में वृद्धि की है, जिससे उनकी आयात आवश्यकता कम हो गई है। वहीं तुर्की, जिसके पास गेहूं का बड़ा भंडार है, उसने नए आयात प्रतिबंध लागू कर दिए हैं।</p>
<p>आपूर्ति की दृष्टि से देखा जाए तो प्रमुख निर्यातक देशों जैसे रूस, यूरोपीय संघ और यूक्रेन में फसल का उत्पादन घटा है, जिससे वैश्विक आपूर्ति में कमी आई है। व्यापार में गिरावट के बावजूद, गेहूं की कीमतें अपेक्षाकृत स्थिर बनी हुई हैं। निर्यात मूल्यों में मिश्रित रुझान देखा गया। जहां रूस और अर्जेंटीना में वृद्धि हुई है, वहीं ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में मामूली गिरावट दर्ज की गई है।</p>
<p><strong>अमेरिका और यूक्रेन में उत्पादन में गिरावट से मक्का व्यापार घटेगा</strong><br />वैश्विक मक्का व्यापार में 5 प्रतिशत की गिरावट का अनुमान है, जिसका मुख्य कारण दुनिया के दो सबसे बड़े निर्यातकों अमेरिका और यूक्रेन में उत्पादन में आई भारी कमी है। हालांकि ब्राज़ील में उत्पादन बढ़ा है, लेकिन इथेनॉल के लिए घरेलू मांग में तेजी के चलते वहां से निर्यात की उपलब्धता सीमित हो गई है।</p>
<p>आयात के मोर्चे पर देखें तो चीन की मक्का और ज्वार की मांग में कमी आई है। पिछले वर्ष की तुलना में इन दोनों अनाजों के आयात क्रमशः 65% और 46% कम हो गए हैं। यह चीन के फीड-ग्रेन आयात में अब तक की सबसे बड़ी वार्षिक गिरावट है, जिससे वैश्विक व्यापार प्रवाह में बदलाव देखने को मिल रहा है। फिर भी USDA की ताजा रिपोर्ट में अमेरिका के मक्का निर्यात अनुमानों को संशोधित कर बढ़ाया गया है। यह अर्जेंटीना, तुर्की और पाकिस्तान से होने वाले कम निर्यात की भरपाई करेगा।</p>
<p><strong>रिकॉर्ड उत्पादन के बावजूद चावल व्यापार में हल्की गिरावट</strong><br />गेहूं और मक्का के विपरीत, वैश्विक चावल उत्पादन में इस वर्ष नया रिकॉर्ड बनने का अनुमान है। इसमें भारत, इंडोनेशिया और कंबोडिया की उल्लेखनीय बढ़ोतरी प्रमुख कारण है। भारत द्वारा पूर्व में लगाए गए निर्यात प्रतिबंधों को हटाने से वैश्विक आपूर्ति बढ़ी है। इससे बांग्लादेश और उप-सहारा अफ्रीका जैसे बाजारों को विशेष लाभ हुआ है।</p>
<p>हालांकि उत्पादन उच्च स्तर पर है, फिर भी वैश्विक चावल व्यापार में मामूली गिरावट आने की संभावना है। इसका मुख्य कारण इंडोनेशिया की घटती आयात आवश्यकता है क्योंकि वहां घरेलू उत्पादन बेहतर रहने की उम्मीद है। इसके बावजूद, वैश्विक चावल की खपत और अंतिम स्टॉक बढ़ने का अनुमान है। खासकर दक्षिण-पूर्व एशिया में जहां भंडारण गतिविधियां तेज़ हो रही हैं।</p>
<p><strong>तिलहन में बायोडीज़ल की मांग ने व्यापार की दिशा बदली</strong><br />तिलहन क्षेत्र में इस समय फोकस ब्राज़ील पर है, जहां बढ़ती बायोडीज़ल अनिवार्यताओं के चलते सोयाबीन तेल का घरेलू ईंधन बाजार में इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके चलते सोयाबीन तेल का निर्यात 13 लाख मीट्रिक टन पर स्थिर रहने की संभावना है, भले ही इसका उत्पादन रिकॉर्ड 120 लाख टन तक पहुंचने का अनुमान है।</p>
<p>यह रुझान पिछले एक दशक से बन रहा है, जिसमें ब्राज़ील में औद्योगिक स्तर पर सोयाबीन तेल की खपत दोगुनी से भी अधिक हो चुकी है। महंगाई की चिंताओं के कारण फरवरी 2025 में बायोडीज़ल मिश्रण दर बढ़ाने की योजना स्थगित कर दी गई थी, फिर भी मांग मजबूत बनी हुई है।</p>
<p>दूसरी ओर इंडोनेशिया, मलेशिया और थाईलैंड से पाम ऑयल का निर्यात बायोडीज़ल कार्यक्रमों के विस्तार के चलते सीमित रहने की संभावना है। वहीं, रेपसीड और सूरजमुखी तेल का उत्पादन बढ़ा है, लेकिन यह अभी तक पाम और सोयाबीन तेल की भरपाई नहीं कर पाया है। इसके परिणामस्वरूप, वैश्विक वनस्पति तेल की कीमतें ऊंची बनी हुई हैं, भले ही अर्जेंटीना में बड़े पैमाने पर फसल उत्पादन भविष्य में कीमतों को नियंत्रित कर सकता है।</p>
<p><strong>तिलहन व्यापार में चीन की भूमिका&nbsp;</strong><br />चीन अब रेपसीड व्यापार में प्रमुख भूमिका निभा रहा है। उसका रेपसीड आयात का अनुमान बढ़ाकर 40 लाख टन कर दिया गया है। यह मुख्य रूप से कनाडा, रूस, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और यूक्रेन से आयात किया जा रहा है। हालांकि, मार्च 2025 में शुरू हुए व्यापार विवाद के तहत कनाडाई रेपसीड उत्पादों पर 100% शुल्क लगाए जाने के बाद रेपसीड मील आयात में कमी आई है।</p>
<p>इसी दौरान ब्राज़ील और चीन में सोयाबीन प्रोसेसिंग (क्रशिंग) गतिविधि भी बढ़ रही है, जिससे सोयाबीन मील जैसे प्रोटीन फीड्स की उपलब्धता बढ़ी है, जिनकी वैश्विक खरीदारों के बीच मजबूत मांग बनी हुई है। इससे कनाडा के रेपसीड मील निर्यात में आई गिरावट की कुछ हद तक भरपाई हो रही है।</p>
<p><strong>वनस्पति तेल बाजार में सीमित आपूर्ति, कीमतें स्थिर&nbsp;</strong><br />USDA की रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण-पूर्व एशिया में पाम ऑयल उत्पादन में कमी के चलते वैश्विक स्तर पर वनस्पति तेल उत्पादन घटने का अनुमान है। इसके परिणामस्वरूप वनस्पति तेल का व्यापार और भंडार दोनों में गिरावट आने की संभावना है। पाम और सोयाबीन तेल की सीमित आपूर्ति वर्ष के अंत तक वैश्विक बाजार में कीमतों को ऊंचा बनाए रख सकती है, भले ही अर्जेंटीना में सोयाबीन की बढ़ी हुई प्रोसेसिंग से थोड़ी राहत मिले।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/12/image_750x500_65794d0866d6c.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ वैश्विक अनाज व्यापार 7 प्रतिशत घटने का अनुमान, उत्पादन और मांग के पैटर्न में बदलाव का असर ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[वैश्विक कृषि उत्पादनः USDA का भारत में रिकॉर्ड गेहूं और चावल उत्पादन का अनुमान]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/global-agricultural-outlook-usda-estimate-record-rice-and-wheat-production-in-india.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 12 Apr 2025 13:42:24 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/global-agricultural-outlook-usda-estimate-record-rice-and-wheat-production-in-india.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) ने अप्रैल की विश्व कृषि उत्पादन रिपोर्ट जारी की है, जिसमें भारत में गेहूं और चावल के रिकॉर्ड उत्पादन का अनुमान जताया गया है। रिपोर्ट में सोयाबीन, चावल, मक्का, कपास, सूरजमुखी बीज और पाम तेल जैसी प्रमुख कृषि कमोडिटी के उत्पादन अनुमानों में हुए बदलावों को दर्शाया गया है। इसके मुताबिक दुनिया में मौसम की चरम स्थितियों - सूखा, भारी वर्षा और बाढ़ - ने फसल उत्पादन को काफी प्रभावित किया है।&nbsp;</p>
<p><strong>चावल: भारत में रिकॉर्ड, कंबोडिया में शुष्क मौसम वाली फसल का विस्तार</strong><br />भारत में 2024/25 में रिकॉर्ड 14.7 करोड़ टन चावल उत्पादन का अनुमान जताया गया है। इसका प्रमुख कारण रिकॉर्ड 5.1 करोड़ हेक्टेयर में इसकी खेती है। किसान कम जोखिम और बेहतर लाभ के चलते कपास छोड़कर चावल की ओर झुके हैं। कंबोडिया में भी चावल उत्पादन बढ़ा है। वहां अब अनुमान 78 लाख टन का है। यह वृद्धि मुख्यतः शुष्क मौसम में रकबे में 8% की बढ़ोतरी और बेहतर जल प्रबंधन के कारण हुई है।</p>
<p><strong>गेहूं: भारत और चीन ने बढ़ाया वैश्विक उत्पादन</strong><br />2024/25 में वैश्विक गेहूं उत्पादन 79.68 करोड़ टन रहने की संभावना है। रकबा बढ़ने से भारत में रिकॉर्ड 11.33 करोड़ टन गेहूं उत्पादन का अनुमान है। चीन में बेहतर यील्ड के चलते 14.01 करोड़ टन उपज की उम्मीद है। वहीं रूस में उत्पादन घटकर 8.16 करोड़ टन रहने का अनुमान है। यह पिछले साल के 9.15 करोड़ टन से 11% कम है। वहां जाड़े और स्प्रिंग दोनों सीजन में गेहूं के रकबे और यील्ड में गिरावट का अंदेशा है।</p>
<p><strong>मक्का: यूरोप और दक्षिण अमेरिका में मिली-जुली स्थिति</strong><br />यूरोपीय यूनियन में मक्का उत्पादन 5.93 करोड़ टन तक पहुंच सकता है। यह पिछले माह के अनुमान से अधिक है, लेकिन पिछले साल की तुलना में 4 प्रतिशत कम है। पोलैंड, क्रोएशिया और फ्रांस में उत्पादन अनुमान में बढ़ोतरी हुई, लेकिन रोमानिया में गिरावट देखी गई। ब्राजील का 2023/24 में मक्का उत्पादन 15.45 करोड़ तक संशोधित किया गया है, जबकि 2024/25 के लिए भी सकारात्मक रुझान हैं। इसके विपरीत अर्जेंटीना में अत्यधिक वर्षा ने नुकसान पहुंचाया, और उत्पादन अब 5 करोड़ आंका गया है।</p>
<p><strong>सोयाबीन: ब्राज़ील में रिकॉर्ड, बोलिविया में बारिश ने बिगाड़ी हालत</strong><br />ब्राज़ील एक बार फिर सोयाबीन उत्पादन में शीर्ष पर है। मार्केटिंग वर्ष 2024/25 के लिए USDA ने उत्पादन अनुमान 16.90 करोड़ मीट्रिक टन पर बरकरार रखा है। हालांकि दक्षिणी राज्यों में सूखा पड़ा, पर उत्तर और मध्य-पश्चिम क्षेत्रों में अच्छी वर्षा से रिकॉर्ड उत्पादन सुनिश्चित हुआ है। वहां राष्ट्रीय स्तर पर औसत यील्ड 3.57 टन/हेक्टेयर दर्ज की गई, जो पिछले वर्ष की तुलना में 6% अधिक है।</p>
<p>दक्षिण अफ्रीका में भी शानदार बढ़ोतरी हुई, जहां उत्पादन 24 लाख टन आंका गया है। यह पिछले वर्ष की तुलना में 30% अधिक है। यहां 12 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बुआई हुई है, जो रिकॉर्ड है। वहीं बोलिविया में हालात ठीक नहीं रहे। मार्च के अंत में आई बाढ़ के कारण 37 लाख उत्पादन का अनुमान लगाया गया है, जो पिछले महीने से 10% और पिछले वर्ष से 3% कम है।</p>
<p><strong>सूरजमुखी बीज: अर्जेंटीना में देरी के बावजूद बेहतर उपज&nbsp;</strong><br />अर्जेंटीना में सूरजमुखी बीज का उत्पादन अनुमान 42 लाख टन है, जो पिछले वर्ष से 8% अधिक है। हालांकि मार्च की बारिश के कारण फसल कटाई में देरी हुई, फिर भी उत्तरी प्रांतों में उपज औसत से बेहतर रही। राष्ट्रीय औसत 2.15 टन प्रति हेक्टेयर का है।</p>
<p><strong>पाम ऑयल: मलेशिया और इंडोनेशिया में बारिश बनी बाधा</strong><br />दक्षिण-पूर्व एशिया में पाम ऑयल उत्पादन पर भारी बारिश का असर पड़ा है। मलेशिया में अनुमान घटकर 1.87 करोड़ टन हो गया है, जो पिछले वर्ष से 5% कम है। सबाह और सरावाक इलाके में बाढ़ ने यील्ड को प्रभावित किया। इंडोनेशिया में भी उत्पादन थोड़ा कम होकर 4.60 करोड़ टन आंका गया है, हालांकि यह पिछले वर्ष से 7% अधिक है। सबसे अधिक उत्पादन वाले रियाउ प्रांत में अत्यधिक वर्षा हुई जिससे हारवेस्टिंग और लॉजिस्टिक्स में बाधा आई।</p>
<p><strong>मोटे अनाज: यूरोप में मामूली सुधार, लेकिन उत्पादन औसत से नीचे</strong><br />वैश्विक स्तर पर मोटे अनाज का कुल उत्पादन 149.53 करोड़ तक पहुंचने की संभावना है। यूरोपीय यूनियन में मक्का का प्रदर्शन बेहतर रहा, जबकि जौ और ओट्स में गिरावट आई। अफ्रीका में दक्षिण अफ्रीका और तंजानिया में वर्षा के चलते मक्का और बाजरा की उपज में सुधार हुआ है।</p>
<p><strong>कपास: अर्जेंटीना में सूखे से नुकसान</strong><br />अर्जेंटीना में कपास उत्पादन घटकर 15 लाख टन गाठें (प्रति गांठ 480 पाउंड) रहने का अनुमानि है। इसके अनुमान में पिछले महीने से 10% कमी आई है। शुल्क मौसम और अत्यधिक गर्मी से यील्ड घटकर 544 किलोग्राम/हेक्टेयर रह गई। हालांकि इसका रकबा समान रहा।</p>
<p>USDA की यह रिपोर्ट दर्शाती है कि वैश्विक कृषि अब भी मौसम की मार पर निर्भर है। जहां कुछ क्षेत्रों में बारिश ने जान फूंकी, वहीं अन्य इलाकों में सूखे या बाढ़ ने फसलों को प्रभावित किया। अगले महीने फसल कटाई के अंतिम आंकड़ों के बाद और सुधार या गिरावट की उम्मीद की जा सकती है। विशेष रूप से चावल और पाम ऑयल जैसी फसलों के लिए वैश्विक खाद्य बाजारों की नजर इस पर टिकी रहेगी।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ वैश्विक कृषि उत्पादनः USDA का भारत में रिकॉर्ड गेहूं और चावल उत्पादन का अनुमान ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[2024&amp;#45;25 में वैश्विक अनाज उत्पादन में वृद्धि, लेकिन व्यापार पांच साल में सबसे कम रहने का अनुमानः एफएओ]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/global-cereal-production-up-but-trade-forecast-for-2024-25-down-to-lowest-level-since-2019-20.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 06 Apr 2025 10:41:48 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/global-cereal-production-up-but-trade-forecast-for-2024-25-down-to-lowest-level-since-2019-20.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) ने 2024-25 सीजन के लिए वैश्विक अनाज व्यापार का पूर्वानुमान घटा दिया है। इसके 47.89 करोड़ टन रहने का अनुमान है, जो 2023-24 की तुलना में 6.7 प्रतिशत कम और 2019-20 के बाद सबसे निचला स्तर है। एफएओ की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, यह गिरावट मार्च की तुलना में 53 लाख टन कम है। मुख्य रूप से मोटे अनाज और गेहूं की मांग कमजोर रहने और चावल के व्यापार में मामूली वृद्धि की संभावना है।</p>
<p>2024 में वैश्विक अनाज उत्पादन 284.9 करोड़ टन अनुमानित है, जो मार्च के अनुमान की तुलना में 71 लाख टन अधिक है। हालांकि यह आंकड़ा पिछले वर्ष की तुलना में 0.3 प्रतिशत कम है। यह वृद्धि मुख्य रूप से ऑस्ट्रेलिया और कज़ाखस्तान में गेहूं की बेहतर फसल और ऑस्ट्रेलिया में जौ के उत्पादन में मामूली वृद्धि के कारण हुई है। भारत में अधिक बुवाई और कंबोडिया, चीन, तंजानिया जैसे देशों में बेहतर स्थिति के कारण 2024-25 के लिए वैश्विक चावल उत्पादन रिकॉर्ड 54.33 करोड़ टन अनुमानित है। इससे बांग्लादेश, इंडोनेशिया और म्यांमार में मौसम के कारण उत्पादन में गिरावट की भरपाई हो सकेगी।</p>
<p>2024-25 में वैश्विक अनाज का प्रयोग 286.8 करोड़ टन रहने की संभावना है, जो पिछले महीने के अनुमान से 13 लाख टन और 2023-24 से 0.9 प्रतिशत अधिक है। यह वृद्धि मुख्य रूप से मक्का, जौ और ज्वार जैसे मोटे अनाज के उत्पादन में 27 लाख टन वृद्धि के कारण है।</p>
<p><strong>भारत में इथेनॉल के लिए चावल का औद्योगिक प्रयोग 17% बढ़ने की संभावना</strong><br />हालांकि, गेहूं प्रयोग का अनुमान 14 मिलियन टन घटाकर 79.54 करोड़ टन कर दिया गया है। ऐसा भारत में अपेक्षाकृत कम खपत के कारण हुआ है। इसके विपरीत चावल का प्रयोग 53.9 करोड़ टन अनुमानित है, जो पिछले अनुमान से 2.1 प्रतिशत अधिक है। प्रति व्यक्ति खाद्य खपत अब 53.3 किलोग्राम/वर्ष रहने का अनुमान है। भारत में इथेनॉल उत्पादन के लिए चावल के औद्योगिक उपयोग में 17 प्रतिशत की वृद्धि संभावित है।</p>
<p>2025 के अंत तक वैश्विक अनाज भंडार 1.5 प्रतिशत की गिरावट के साथ 87.33 करोड़ टन रहने का अनुमान है। स्टॉक-टू-यूज़ अनुपात 30.1 प्रतिशत रहने की संभावना है, जो 2023-24 के 30.9 प्रतिशत से कम है। यह कमी मोटे अनाज के भंडार में 6 प्रतिशत की गिरावट के कारण है, विशेष रूप से चीन में मक्का भंडार में कमी से। दूसरी ओर गेहूं का भंडार 71 लाख टन बढ़कर 32 करोड़ टन रहने की उम्मीद है। इसमें सबसे बड़ा योगदान भारत, कज़ाखस्तान और रूस का होगा। चावल का भंडार भी 3.2 प्रतिशत बढ़कर 20.59 करोड़ टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच सकता है।</p>
<p><strong>मोटे अनाज और गेहूं के व्यापार में गिरावट का अनुमान</strong><br />एफएओ ने 2024-25 के लिए मोटे अनाज के वैश्विक व्यापार के अनुमान को 37 लाख टन घटाकर 22.42 करोड़ टन कर दिया है, जो पिछले साल की तुलना में 8.2 प्रतिशत कम है। यह गिरावट मुख्य रूप से चीन द्वारा मक्का और ज्वार की कम खरीद तथा ब्राजील के मक्का और अमेरिका के ज्वार के निर्यात में कमी के कारण है।</p>
<p>गेहूं का व्यापार अब 19.5 करोड़ टन रहने का अनुमान है, जो पिछले अनुमान से 17 लाख टन और पिछले वर्ष की तुलना में 7.2 प्रतिशत कम है। कज़ाखस्तान और रूस से कम निर्यात और चीन की घटती आयात मांग के कारण इसमें कमी आएगी। इसके विपरीत वैश्विक चावल व्यापार 2025 में एक प्रतिशत बढ़कर 6 करोड़ टन तक पहुंच सकता है। इंडोनेशिया, फिलीपींस और वियतनाम से आयात में कमी आने की संभावना है, लेकिन बांग्लादेश, मेडागास्कर और नेपाल जैसे देशों की बढ़ती मांग इसे संतुलित कर सकती है।</p>
<p><strong>2025 में भारत में रिकॉर्ड गेहूं उत्पादन की संभावना</strong><br />एफएओ का 2025 के लिए गेहूं उत्पादन पूर्वानुमान 79.5 करोड़ टन पर स्थिर बना हुआ है। यह 2024 के स्तर के समान है। यूरोपीय संघ में उत्पादन 12 प्रतिशत बढ़ने की संभावना है, जबकि पूर्वी यूरोप में वर्षा की कमी से उत्पादन घटने का जोखिम है। रूस और यूक्रेन के के बीच युद्ध का उत्पादन पर असर पड़ सकता है। अमेरिका में भी सूखे के कारण गेहूं उत्पादन में गिरावट की आशंका है।</p>
<p>भारत में उत्पादन 11.54 करोड़ टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने की संभावना है। ईरान और तुर्किए में शुष्क परिस्थितियां उत्पादन को प्रभावित कर सकती हैं, हालांकि सिंचाई की उपलब्धता कुछ हद तक नुकसान को कम कर सकती है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ 2024-25 में वैश्विक अनाज उत्पादन में वृद्धि, लेकिन व्यापार पांच साल में सबसे कम रहने का अनुमानः एफएओ ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[विश्व बाजार में मार्च में अनाज और चीनी की कीमतों में गिरावट, लेकिन वनस्पति तेल के दाम 3.7% बढ़े]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/cereal-and-sugar-prices-decline-in-march-but-veg-oil-up-by-3.7-percent-in-global-market.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 05 Apr 2025 16:04:45 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/cereal-and-sugar-prices-decline-in-march-but-veg-oil-up-by-3.7-percent-in-global-market.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अंतरराष्ट्रीय बाजार में मार्च में अनाज और चीनी की कीमतें कम हुईं, लेकिन वनस्पति तेल के दामों में वृद्धि हुई। अनाज और चीनी की कीमतों में गिरावट ने मांस और वनस्पति तेल की कीमतों में हुई बढ़ोतरी की भरपाई कर दी, जबकि दुग्ध उत्पादों की कीमतें स्थिर रहीं। इसलिए संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) का फूड प्राइस इंडेक्स पिछले महीने 127.1 अंक पर रहा, जो फरवरी की तुलना में लगभग अपरिवर्तित रहा। यह इंडेक्स एक साल पहले की तुलना में 8.2 अंक (6.9%) अधिक था, लेकिन मार्च 2022 की उच्चतम सीमा से 33.1 अंक (20.7%) नीचे रहा।</p>
<p>एफएओ सीरियल प्राइस इंडेक्स मार्च में 2.6% गिरा और मार्च 2024 की तुलना में 1.1% कम रहा। उत्तरी गोलार्ध के कुछ प्रमुख निर्यातक देशों में फसलों की स्थिति को लेकर चिंताएं कम होने से वैश्विक गेहूं की कीमतों में गिरावट आई। हालांकि मुद्रा विनिमय दरों में बदलाव, रूस में आपूर्ति घटने और तुर्किये द्वारा गेहूं आयात कोटा हटाने से इस गिरावट पर थोड़ा अंकुश लगा।</p>
<p>लगातार कई महीने तक कीमतें बढ़ने के बाद मक्का की कीमतें भी मार्च में गिरीं। इसका कारण ब्राज़ील में हाल की वर्षा के कारण फसल की स्थिति में सुधार, अर्जेंटीना में कटाई की शुरुआत, अमेरिका में आगामी मौसम के लिए निराशाजनक अनुमान, चीन से अपेक्षा से कमजोर आयात मांग और विभिन्न देशों में व्यापार नीतियों में संभावित बदलाव है। अन्य मोटे अनाजों में ज्वार की कीमतें घटीं, जबकि जौ की कीमतों में थोड़ी वृद्धि हुई। वहीं, कमजोर आयात मांग और निर्यात के लिए आपूर्ति बढ़ने के कारण FAO का चावल मूल्य सूचकांक मार्च में 1.7% गिरा</p>
<p>FAO वेजिटेबल ऑयल प्राइस इंडेक्स मार्च में औसतन 161.8 अंक रहा, जो पिछले महीने की तुलना में 5.8 अंक (3.7%) अधिक था और एक साल पहले की तुलना में 23.9% ऊंचा रहा। इस इंडेक्स में लगातार वृद्धि का कारण पाम, सोया, रेपसीड और सूरजमुखी तेल की कीमतों में बढ़ोतरी रहा। विशेष रूप से दक्षिण-पूर्व एशिया के प्रमुख उत्पादक देशों में कम उत्पादन और आपूर्ति के चलते अंतरराष्ट्रीय पाम ऑयल की कीमतें लगातार दूसरे महीने बढ़ीं।</p>
<p>एफएओ डेयरी प्राइस इंडेक्स मार्च में 148.7 अंक पर स्थिर रहा, लेकिन एक साल पहले की तुलना में 24.6 अंक (19.9%) अधिक था। इंडेक्स में स्थिरता अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीज की कीमतों में गिरावट और मक्खन व दूध पाउडर की कीमतों में बढ़ोतरी के बीच संतुलन को दर्शाती है। मक्खन की कीमतें लगातार तीसरे महीने बढ़ीं, जो फरवरी की तुलना में 3.9% अधिक थीं। स्किम्ड मिल्क पाउडर की कीमतें लगातार दूसरे महीने बढ़ीं, जो मजबूत वैश्विक मांग और घटती आपूर्ति के कारण हुआ।</p>
<p>एफएओ शुगर प्राइस इंडेक्स मार्च में 1.6% गिर गया, जिसका मुख्य कारण वैश्विक मांग में कमजोरी है। ब्राज़ील के दक्षिणी क्षेत्रों में गन्ना उत्पादन क्षेत्रों में हुई हाल की बारिश ने भी कीमतों में गिरावट में योगदान दिया। हालांकि भारत में उत्पादन कम होने की आशंका ने इस गिरावट को सीमित कर दिया।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ विश्व बाजार में मार्च में अनाज और चीनी की कीमतों में गिरावट, लेकिन वनस्पति तेल के दाम 3.7% बढ़े ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[अमेरिका ने भारत पर 26% रेसिप्रोकल टैरिफ लगाया, जानिए किन सेक्टरों पर होगा असर]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/trump-announced-to-impose-26-percent-reciprocal-tariff-on-india-know-what-will-be-the-effect.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 03 Apr 2025 14:15:49 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/trump-announced-to-impose-26-percent-reciprocal-tariff-on-india-know-what-will-be-the-effect.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दुनिया भर के देशों पर <strong>रेसिप्रोकल टैरिफ</strong> लगाने का ऐलान कर दिया है। विश्व बाजार में अमेरिकी उत्पादों की पहुंच बढ़ाने और अमेरिकी उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाने के लिए यह कदम उठाया गया है, जिसका समूची वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर पड़ेगा। इस ऐलान <span>के बाद दुनिया भर में ट्रंप की आलोचना हो रही है।&nbsp;</span></p>
<p>अमेरिका ने लगभग 100 देशों की सूची जारी की है, जिन पर 'डिस्काउंटेड रेसिप्रोकल टैरिफ' लगाया गया है। इस सूची में भारत भी शामिल है जिस पर <span>26</span> फीसदी टैरिफ लगा है। ट्रंप द्वारा <span>रेसिप्रोकल टैरिफ के ऐलान से </span><span>दुनिया भर में उथल-पुथल मची और शेयर बाजारों में गिरावट आई है। जबकि सोने की कीमत रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गई है।&nbsp;</span></p>
<p><span>अमेरिका द्वारा 10% की बेसलाइन ड्यूटी 05 अप्रैल, 2025 से प्रभावी होगी जबकि विभिन्न देशों पर रेसिप्रोकल टैरिफ 09 अप्रैल, 2025 से प्रभावी होंगे।</span><span> विदेश व्यापार विशेषज्ञ और ज्वाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के पूर्व <strong>प्रोफेसर बिस्वजीत धर</strong> का कहना है कि 10% बेसलाइन ड्यूटी और 26% अतिरिक्त टैरिफ मिलाकर भारत पर कुल<strong> 36%</strong> टैरिफ लगेगा।&nbsp;</span></p>
<p><strong>व्हाइट हाउस</strong> के मुताबिक, <span>भारत अमेरिका पर </span>52 <span>फीसदी टैरिफ लगाता है। अमेरिका ने विभिन्न देशों द्वारा उस पर लगाए गये टैरिफ से लगभग आधे के बराबर </span>रेसिप्रोकल टैरिफ लगाए हैं। इस प्रकार चीन पर 34 फीसदी, जापान पर 24 फीसदी, वियतनाम पर 46 फीसदी, थाईलैंड पर 36 फीसदी और यूरोपीय संघ पर 20 फीसदी टैरिफ लगाया गया है। इसके अलावा, अमेरिका ने विदेशों में निर्मित गाड़ियों और पुर्जों पर 25 फीसदी टैरिफ का ऐलान किया है।&nbsp;</p>
<p>अमेरिका ने ब्रिटेन, <span>सिंगापुर</span>, <span>ब्राजील जैसे कुछ देशों पर मात्र </span><strong>10 </strong>फीसदी का<strong><span> बेसलाइन टैरिफ </span></strong>ही लगाया है। <span>जबकि नई टैरिफ घोषणाओं में कनाडा और मेक्सिको का जिक्र नहीं है।</span>&nbsp;<span>राष्ट्रपति ट्रंप ने ये टैरिफ एक एग्जीक्यूटिव ऑर्डर के जरिए लागू किए हैं।&nbsp;</span></p>
<p>रेसिप्रोकल टैरिफ की घोषणा करते हुए <strong>राष्ट्रपति ट्रंप</strong> ने कहा कि आज अमेरिका का लिबरेशन डे है। आज का दिन अमेरिका को फिर से समृद्ध बनने के तौर पर हमेशा याद किया जाएगा। यह हमारी आर्थिक स्वतंत्रता की घोषणा है। उन्होंने कहा कि हमारे देश और करदाताओं को 50 सालों से ठगा जा रहा है, <span>लेकिन अब ऐसा नहीं होने वाला है। ...अब हमारे समृद्ध होने का समय है।</span></p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/04/image_750x_67ee4a94a3a65.jpg" alt="" style="display: block; margin-left: auto; margin-right: auto;" /></p>
<p><strong>टैरिफ से छूट </strong></p>
<p>अमेरिका ने कई उत्पादों को रेसिप्रोकल टैरिफ से छूट भी दी है। इनमें फार्मा, <span>सेमीकंडक्टर</span>, <span>तांबा</span>, <span>ऊर्जा उत्पाद</span>, <span>लकड़ी के सामान और महत्वपूर्ण खनिज शामिल हैं। ये ऐसे उत्पाद हैं जिन पर आयात शुल्क बढ़ने से अमेरिका में जरूरी चीजें महंगी होने की आशंका है।</span><strong>&nbsp;</strong></p>
<p><strong>भारत पर असर</strong>&nbsp;</p>
<p>अमेरिका राष्ट्रपति ने भारत का जिक्र करते हुए कहा, &ldquo;प्रधानमंत्री (मोदी)<span> मेरे बहुत अच्छे दोस्त हैं। मैंने उनसे कहा कि आप मेरे दोस्त हैं लेकिन आप हमारे साथ ठीक नहीं कर रहे हैं।" भारत के बारे में ट्रंप ने कहा कि कि वे हम पर </span>52 <span>फीसदी टैरिफ लगा कर रहे हैं। कई दशकों से हम उनसे लगभग न के बराबर शुल्क ले रहे हैं।</span></p>
<p><span>अमेरिका भारत का एक प्रमुख व्यापारिक साझेदार है। भारत ने वित्त वर्ष 2023-24 में अमेरिका को 77.52 अरब डॉलर का सामान निर्यात किया था, जो इसके कुल निर्यात का लगभग 18 फीसदी है। अमेरिका द्वारा भारत पर 26% टैरिफ लगाने से भारतीय निर्यातकों को बड़ा झटका लगने की उम्मीद है। इससे भारत के सालाना निर्यात में 2 -7 अरब डॉलर तक की कमी आने का अनुमान है।&nbsp;</span></p>
<p>अधिक टैरिफ का असर उत्पादों की कीमत, मांग, निर्यात और उत्पादन पर पड़ने की संभावना है। हालांकि, <span>भारतीय फार्मा उद्योग के लिए राहत की बात है कि ट्रंप ने दवाओं को रिसिप्रोकल टैरिफ से बाहर रखा है। भारत हर साल अमेरिका को करीब 13 अरब डॉलर की दवाओं का निर्यात करता है। भारतीय जेनेरिक दवाओं के लिए अमेरिका एक प्रमुख बाजार है।&nbsp;</span></p>
<p>भारत हर साल अमेरिका को 14 <span>अरब डॉलर से अधिक के <strong>मोबाइल</strong></span><strong>, </strong><span><strong>टेलीकॉम और इलेक्ट्रॉनिक</strong> उपकरण निर्यात करता है। टैरिफ का असर इस सेक्टर पर भी पड़ेगा। डायमंड और ज्वेलरी के आयात पर टैरिफ का ऐलान किया है</span>, <span>इसका असर भारत की डायमंड इंडस्ट्री पर पड़ेगा। इसके अलावा टेक्सटाइल और फुटवियर निर्यात पर भी टैरिफ की मार पड़ेगी।</span>&nbsp;<span>दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों जैसे वियतनाम 46%, थाईलैंड, कंबोडिया 49% और ताइवान पर अधिक टैरिफ लगाने से </span><span>भारत को फायदा हो सकता है।&nbsp;</span></p>
<p>अमेरिका के टैरिफ लगाने से भारत के <strong>कृषि निर्यात</strong> पर असर पड़ने की संभावना है। इससे अमेरिका में भारतीय खाद्य उत्पाद महंगे होंगे और भारत के कृषि, <span>डेयरी</span>, सी-फूड,&nbsp;<span>मीट व अन्य फूड उद्योगों की आमदनी घट सकती है। इसका असर अंतत: किसानों पर भी पड़ेगा। आयात शुल्क में बढ़ोतरी का असर उत्पादों की कीमत, मांग, निर्यात और उत्पादन पर पड़ता है जिससे पूरी अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है।&nbsp;</span><span>&nbsp;</span></p>
<p><strong>भारत की प्रतिक्रिया </strong></p>
<div dir="ltr" class="bbc-19j92fr ebmt73l0">
<p dir="ltr" class="bbc-kl1u1v e17g058b0">भारत के <strong>वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय</strong> ने एक बयान में कहा कि अमेरिका के राष्ट्रपति द्वारा किए गए विभिन्न उपायों/घोषणाओं के निहितार्थों के असर का आकलन किया जा रहा है। भारतीय उद्योग और निर्यातकों सहित सभी हितधारकों से सलाह मशविरा किया जा रहा है। उधर, लोकसभा में विपक्ष के नेता<strong> राहुल गांधी</strong> ने टैरिफ मामले में भाजपा सरकार के रुख की आलोचना करते हुए कहा कि अमेरिकी टैरिफ भारतीय अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर देगा। इससे <span>सभी उद्योगों को खतरा है।&nbsp;</span></p>
</div>
<div dir="ltr" class="bbc-19j92fr ebmt73l0">
<p dir="ltr" class="bbc-kl1u1v e17g058b0">अमेरिका लंबे समय से भारत पर ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, बादाम, अखरोट, पिस्ता, सेब और दालों पर शुल्क कम करने का दबाव बना रहा है। द्विपक्षीय व्यापार समझौते के लिए भारतीय और अमेरिकी के बीच विचार-विमर्श चल रहा है। माना जा रहा है कि&nbsp;भारत कुछ अमेरिकी उत्पादों जैसे ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स तथा बादाम व सेब जैसे कृषि उत्पादों पर टैरिफ में कटौती कर सकता है। हालांकि,&nbsp;अमेरिका पर पलटवार कर जवाबी टैरिफ लगाना भी एक विकल्प है, लेकिन भारत के मौजूदा ऊंचे टैरिफ के चलते इसकी संभावना कम है। इससे अमेरिका के साथ संबंध बिगड़ने का भी खतरा है। अब देखना होगा कि अमेरिका के टैरिफ का भारत क्या जवाब देता है।</p>
</div>
<p><strong>क्या होता है </strong><strong>रेसिप्रोकल</strong> <strong>टैरिफ</strong><strong>?</strong></p>
<p>रेसिप्रोकल टैरिफ एक प्रकार का आयात शुल्क है जो किसी देश में आयात होने वाले उत्पादों पर लगता है। अमेरिका में रेसिप्रोकल टैरिफ बढ़ने से विभिन्न देशों के उत्पादों को अमेरिकी बाजार में पहुंचाना महंगा हो जाएगा। यहा अमेरिका के घरेलू उद्योग के लिए फायदेमंद होगा।</p>
<p>आम भाषा में इसे &ldquo;जैसे को तैसा&rdquo;<span> टैक्स कह सकते हैं। अगर कोई देश अमेरिकी सामानों पर अधिक आयात शुल्क लगाता है</span>, <span>तो बदले में अमेरिका भी उस देश से आयात होने वाली वस्तुओं पर अधिक आयात शुल्क यानी </span>रेसिप्रोकल टैरिफ लगाएगा।&nbsp;&nbsp;</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/04/image_750x500_67ee516164d5e.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ अमेरिका ने भारत पर 26% रेसिप्रोकल टैरिफ लगाया, जानिए किन सेक्टरों पर होगा असर ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/04/image_750x500_67ee516164d5e.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[यूएसटीआर की रिपोर्ट के जरिए अमेरिका की भारत पर कृषि बाजार खोलने के दबाव की कोशिश]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/ustr-report-on-trade-barriers-is-americas-strategy-to-pressure-india-to-open-agricultural-markets.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 02 Apr 2025 19:56:20 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/ustr-report-on-trade-barriers-is-americas-strategy-to-pressure-india-to-open-agricultural-markets.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप की रेसिप्रोकल टैरिफ पर 2 अप्रैल की घोषणा के ठीक पहले अमेरिकी ट्रेड रिप्रेसेंटेटेव (यूएसटीआर) द्वारा फॉरेन ट्रेड बैरियर्स पर रिपोर्ट जारी कर विदेश व्यापार से जुड़े अहम मुद्दों को उठाया गया है। इसके जरिए अमेरिका भारत समेत दुनिया भर के देशों पर अमेरिकी उत्पादों को बाजार देने का दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है।&nbsp;</p>
<p>इस रिपोर्ट में भारत पर 16 पेज में कृषि और गैर-कृषि क्षेत्रों में भारत द्वारा अमेरिकी निर्यात में अड़चने लगाने की बात कही गई है। लेकिन कृषि और सहयोगी क्षेत्र जिनमें डेयरी, पॉल्ट्री और फिशरीज के बारे में प्रमुखता से बात करते हुए भारत की न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खरीद की व्यवस्था और सरकार द्वारा जा रही सब्सिडी को मुक्त व्यापार के रास्ते में बाधक बताया गया है। इस रिपोर्ट के जरिये संकेत मिल रहा कि भारत के साथ ट्रेड समझौते के मामले में अमेरिका का रुख कृषि और सहयोगी क्षेत्र के लिए काफी सख्त रहने वाला है।</p>
<p>यूएस इंडिया ट्रेड पॉलिसी फोरम में वार्ताओं के 2005 से जारी रहने की चर्चा करते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत का मोस्ट फेवर्ड नेशन के मामले में औसत सीम शुल्क 17 फीसदी है। इसका गैर कृषि उत्पादों के लिए औसत 13.5 फीसदी है और कृषि उत्पादों के लिए 39 फीसदी है। भारत ने खाद्य तेलों, मक्का, सेब, कॉफी, नेचुरल रबर, रेजिन बादाम, अल्कोहलिक बेवरेजेज जैसे उत्पादों पर 45 फीसदी से लेकर 150 फीसदी तक का सीमा शुल्क लगा रखा है। इनके अलावा दूसरे कृषि व सहयोगी क्षेत्र के प्रसंस्कृत उत्पादों जैसे आलू, सिट्रस, अंगूर, पॉल्ट्री, फ्रोजन फ्रेंच फ्राइज, चाकलेज, कुकीज और डिब्बाबंद पीचेज जैसे तमाम उत्पादों पर ऊंची सीमा शुल्क दरें लागू हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन (डब्लूटीओ) के बाउंड रेट के मामले में भारत की दरें सबसे अधिक हैं और इनका औसत 113.1 फीसदी दी, इनका उच्चतम स्तर 300 फीसदी तक जाता है। भारत जिस तरह से सीमा शुल्क दरों में बदलाव करता है उसके अमेरिका के कामगारों, किसानों और रैंचर्स के लिए मुश्किलें खड़ी होती हैं। साल 2019 में जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रिफेरेंसेज (जीएसपी) के तहत अमेरिका द्वारा भारत के लिए प्रिफेरेंसियल टैरिफ बेनेफिट्स समाप्त करने के बाद भारत ने इसके विरोध में बादाम, सेब, अखरोट, चना और मसूर जैसे 28 उत्पादों पर 1.7 फीसदी से लेकर 20 फीसदी तक की सीमा शुल्क बढ़ोतरी कर दी।</p>
<p>रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत मानकों के आधार पर और जटिल मंजूरी प्रक्रिया के जरिये गैर टैरिफ बैरियर भी लगाता है। इसमें एथेनॉल के आयात नियमों के जरिए रोकने की बात कही गई है। वहीं जेनेटिकली मोडिफाइड (जीएम) उत्पादों के आयात के मामले में फैसले लेने में देरी और नियमों में पारदर्शिता की कमी की बात कही गई है। जाहिर सी बाद है कि अमेरिका अपनी जीएम कृषि फसलों जिसमें, मक्का, सोयाबीन और कपास के साथ ही पशुचारे में उपयोग की जाने वाली फसलों के आयात का रास्ता खोलने के लिए दबाव बनाने की कोशिश करेगा।</p>
<p>इसके साथ ही भारत में 25 फसलों पर एमएसपी देने की बात रिपोर्ट में कही गई है और खाद्य सुरक्षा के नाम पर एमएसपी खरीद के जरिये पब्लिक स्टॉक बनाने की बात करते हुए इसे मार्केट डिस्टॉर्टेड प्रेक्टिस बताया गया है। रिपोर्ट में भारत द्वारा किसानों को इनपुट सब्सिडी देने की बात कही गई है। यही नहीं इस रिपोर्ट में तमाम मुद्दों पर भारत के खिलाफ डब्लूटीओ के डिस्प्यूट सेटलमेंट पैनल (डीएसपी) में भी जाने का जिक्र किया गया है। इसमें कहा गया है कि&nbsp; भारत खाद्य सुरक्षा के नाम पर गेहूं और चावल की सरकारी खऱीद करता है जबकि वैश्विक निर्यात बाजार में चावल के मामले में भारत की हिस्सेदारी 40 फीसदी तक भी पहुची है। इसमें कहा गया है कि एमएसपी और सब्सिडी के मामले में भारत डब्लूटीओ के 2013 के एक अस्थायी राहत वाले फैसले का सहारा ले रहा है और खुद स्वीकार कर चुका है कि पिछले चार साल में चावल पर उसकी सब्सिडी का स्तर डब्लूटीओ में तय स्तर से अधिक रहा है। इस रिपोर्टे में एमएसपी और सब्सिडी पर काफी विस्तार से जानकारी दी गई है।</p>
<p>रिपोर्ट में जीएम फसलों के मामले में जहां जेनेटिकली इंजीनियर्ड अप्रेजल कमेटी (जीईएसी) के फैसलों में देरी की बात कही गई है। वहीं फूड सेफ्टी स्टेंडर्ड अथारिटी ऑफ इंडिया (एफएसएसएआई) द्वारा मानकों के निर्धारण और मंजूरी प्रक्रिया में देरी जैसे सवाल उठाते हुए डेयरी और पॉल्ट्री उत्पादों को मार्केट एक्सेस देने में देरी की बात कही गई है। वहीं डेयरी और पॉल्ट्री के मामले में एफएसएसएआई द्वारा तय मानकों और सर्टिफिकेट की शर्तों को व्यापार विरोधी करार दिया गया है।</p>
<p>लगता है कि इस रिपोर्ट में भारत के व्यापार नियमों और नीतिगत प्रावधानों पर तमाम सवाल उठाने के अमेरिका का मकसद वार्ता में भारतीय पक्ष पर दबाव बनाना है। इसके साथ ही इस रिपोर्ट में भारत पर जिन 16 पेज में बात की गई है उसका सबसे बड़ा हिस्सा कृषि और सहयोगी क्षेत्र पर केंद्रित रहा है। इससे संकेत मिलता है कि अमेरिका भारतीय कृषि और सहयोगी क्षेत्र के बाजार प्रवेश को अपने अनुकूल बनाना चाहता है। अब यह हमारे वार्ताकारों पर निर्भर है कि वह भारतीय किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए अमेरिकी उम्मीद को परवान चढ़ने से रोकते हैं।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/03/image_750x500_67cd87b5ea250.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ यूएसटीआर की रिपोर्ट के जरिए अमेरिका की भारत पर कृषि बाजार खोलने के दबाव की कोशिश ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/03/image_750x500_67cd87b5ea250.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[जलवायु परिवर्तन से समूचे विश्व में मिट्टी की नमी में गिरावट, स्थायी हो सकती है नमी में यह कमी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/global-soil-moisture-in-permanent-decline-due-to-climate-change.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 30 Mar 2025 12:57:09 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/global-soil-moisture-in-permanent-decline-due-to-climate-change.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>21वीं सदी की शुरुआत से दुनियाभर में मिट्टी की नमी के स्तर में चिंताजनक गिरावट आई है, और अनुमान है कि इसकी भरपाई भी नहीं की जा सकती है। साइंस पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में यह बात कही गई है। पृथ्वी के जल चक्र में जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले असर से यह प्रवृत्ति कृषि, पारिस्थितिक तंत्र और मानव समाज के लिए बड़े खतरे की ओर इशारा करती है।​</p>
<p>शोध में 21वीं सदी के दौरान मिट्टी की नमी के स्तर में गिरावट का संकेत मिलता है। वर्ष 2000 से 2002 के बीच नमी में तेज गिरावट शुरू हुई। इस अवधि के दौरान मिट्टी की नमी में लगभग 1,614 गीगाटन पानी की हानि हुई। 2002 से 2016 तक अतिरिक्त 1,009 गीगाटन की कमी आई। तुलनात्मक रूप से देखें तो ग्रीनलैंड की बर्फ पिघलने से 2002 से 2006 के बीच 900 गीगाटन पानी का नुकसान हुआ था। वर्ष 2021 तक मिट्टी की नमी के स्तर में कोई सुधार नहीं हुआ और वर्तमान जलवायु परिस्थितियों में इसके होने की संभावना कम है।​</p>
<p>कार्बन ब्रीफ के साथ बातचीत में मेलबर्न विश्वविद्यालय में जल विज्ञान और रिमोट सेंसिंग विशेषज्ञ और अध्ययन के प्रमुख लेखक प्रोफेसर डोंग्रेयोल रयू ने इन निष्कर्षों की गंभीरता पर जोर देते हुए कहा, "हमने पिछले दो दशकों में मिट्टी की नमी में दो बार क्रमिक गिरावट देखी। हमने पहले यह प्रवृत्ति नहीं देखी थी, इसलिए यह बहुत चिंताजनक है।"</p>
<p>अध्ययन में मिट्टी की नमी में लगातार हो रही कमी के लिए दो मुख्य कारकों की पहचान की गई है- वर्षा पैटर्न में परिवर्तन और बढ़ती इवैपोरेटिव डिमांड (evaporative demand)। इवैपोरेटिव डिमांड भूमि, वनस्पति और सतही जल से नमी निकालने की क्षमता को दर्शाती है। जैसे-जैसे वैश्विक तापमान बढ़ता है, वाष्पीकरण दर बढ़ती है और मिट्टी और अधिक सूखने लगती है।​</p>
<p>प्रोफेसर रयू ने कहा, "हमें लगता है कि बढ़ते तापमान ने 21वीं सदी में जल भंडारण और मिट्टी की नमी में गिरावट में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।"​ 2000 से 2002 के बीच देखी गई मिट्टी की नमी में प्रारंभिक तेज गिरावट कम वैश्विक वर्षा और बढ़ते वाष्पीकरण के संयोजन के कारण हुई। एक अन्य महत्वपूर्ण गिरावट 2015-2016 की अवधि के दौरान हुई, जो 2014-2016 की अल नीनो घटना से उत्पन्न सूखे के साथ मेल खाती है।​</p>
<p>मिट्टी की नमी में कमी के दूरगामी परिणाम हैं। मिट्टी में कम होती नमी सूखे की गंभीरता और आवृत्ति को बढ़ाती है। इससे मानव आबादी, पारिस्थितिक तंत्र और कृषि उत्पादकता प्रभावित होती है।​ इसके अलावा, अध्ययन से पता चलता है कि भूतल पर जल भंडारण में गिरावट ने 21वीं सदी की शुरुआत में वैश्विक समुद्र स्तर में वृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान दिया। 2000 से 2002 के बीच मिट्टी की नमी कम होने के कारण वैश्विक औसत समुद्र स्तर में लगभग 2 मिमी वार्षिक वृद्धि हुई, जो उस अवधि के दौरान ग्रीनलैंड की बर्फ पिघलने से हुई वृद्धि से काफी अधिक थी।​ स्टडी के लिए अपनाए गए क्रॉस-वैलिडेशन दृष्टिकोण ने शोधकर्ताओं को मिट्टी की नमी में गिरावट की प्रामाणिकता की पुष्टि करने में सक्षम बनाया।&nbsp;</p>
<p><strong>भविष्य के अनुमान और सिफारिशें</strong><br />अध्ययन में यह चेतावनी दी गई है कि यदि वर्तमान गर्मी की प्रवृत्तिय जारी रहती है, तो मिट्टी की नमी में देखे गए परिवर्तन स्थायी हो सकते हैं। इसमें बदलती जलवायु में मिट्टी में नमी बढ़ाने के लिए ऐसे मॉडल विकसित करने को जरूरी बताया गया है जिससे भूमि की सतह में सुधार किया जा सके।</p>
<p>सूखे को अक्सर धीमी आपदा कहा जाता है। यह धीरे-धीरे विकसित होता है लेकिन उसका प्रभाव लंबे समय तक रहता है और गंभीर होता है। प्रोफेसर रयू ने चेतावनी दी, "बाढ़ और हीटवेव के विपरीत, सूखा बहुत धीरे-धीरे आता है। इसके प्रभाव लंबे और विलंबित होते हैं। हमें पहले से तैयार रहना चाहिए क्योंकि एक बार सूखा आने पर इसका प्रभाव लंबे समय तक बना रह सकता है।"</p>
<p>इस अध्ययन के निष्कर्ष एक महत्वपूर्ण चेतावनी की तरह हैं, जो पृथ्वी के जल चक्र पर जलवायु परिवर्तन के गहरे प्रभाव को उजागर करते हैं। यह अध्ययन वैश्विक स्तर पर घटती मिट्टी की नमी से उत्पन्न चुनौतियों का सामना करने के लिए उचित उपायों की तत्काल आवश्यकता पर बल देता है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ जलवायु परिवर्तन से समूचे विश्व में मिट्टी की नमी में गिरावट, स्थायी हो सकती है नमी में यह कमी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[भारतीय बासमती किस्मों की पाकिस्तान द्वारा पाइरेसी साबित, डीएनए टेस्ट में पुष्टि]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/piracy-of-indian-basmati-varieties-by-pakistan-proved-confirmed-in-dna-test.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 25 Mar 2025 14:31:46 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/piracy-of-indian-basmati-varieties-by-pakistan-proved-confirmed-in-dna-test.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई), नई दिल्ली (पूसा संस्थान) द्वारा विकसित बासमती की किस्मों को पाकिस्तान पाइरेसी कर उगा रहा है। यह आरोप अंतरराष्ट्रीय स्तर की लैब जांच में भी साबित हो चुका है। बासमती की भारतीय किस्मों पूसा बासमती 1509, 1121, 1847, 1885 की अवैध तरीके से पाकिस्तान में खेती की जा रही है और बासमती चावल का निर्यात किया जा रहा है। भारत की <strong>एग्रीकल्चरल एंड प्रोसेस्ड फूड एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथारिटी (एपीडा) </strong>ने पाकिस्तान द्वारा उगायी गई बासमती किस्मों के सैंपल की लैबोरेट्री जांच कराई है, जिसमें पुष्टि हुई है कि ये भारतीय किस्में हैं। यह जांच यूरोप की लैबोरेट्री के साथ-साथ भारत की लेबोरेट्री में भी हुई है।&nbsp;</p>
<p>सूत्रों के मुताबिक, यूरोप की एक प्रतिष्ठित लैब में हुए डीएनए टैस्ट में यह साबित हो गया है कि पाकिस्तान भारत की बासमती किस्मों का टाइटल मोडिफाई कर गैर-कानूनी तरीके से उगा रहा है और उनका निर्यात कर रहा है। बासमती की टेस्टिंग के लिए एक प्रोटोकॉल तय है और उसी के तहत यह जांच कराई गई। इस प्रोटोकॉल को रिंग ट्रायल कहा जाता है जिसमें दुनिया की 11 लैबोरेट्री शामिल हैं। इनसे से एक लेबोरेट्री भारत में हैदराबाद में स्थित है। इस प्रकार की जांच में एक ही सैंपल को अलग-अलग लैबोरेट्री में भेजा जाता है। सभी लैब में डाटा शेयरिंग के साथ कोडिंग भी शेयर होती है। इस जांच में साबित हुआ है कि पाकिस्तान द्वारा भारत की बासमती किस्मों को उगाया जा रहा है।</p>
<p>वहीं, एपीडा ने भी बासमती को ऑथेंटिकेट करने के लिए एक प्रोसेस बनाया हुआ है। इसके तहत उत्तर प्रदेश में मोदीपुरम स्थित बासमती एक्सपोर्ट डेवलपमेंट फाउंडेशन में डीएनए टेस्टिंग की सुविधा है। इस लैब में भी यह सैंपल टेस्ट हुए हैं।</p>
<p>पाकिस्तान में उगाई जा रही बासमती किस्मों की जांच से संबंधित सभी डाटा अब सरकार के पास हैं और सरकार में उच्च स्तर पर इसकी जानकारी है। इस मामले में अब आगे बढ़ने के लिए ट्रिप्स एग्रीमेंट के तहत <strong>वर्ल्ड इंटलेक्चुअल प्रोपर्टी आर्गनाइजेशन (वाइपो)</strong> में भारत सरकार द्वारा मामला दर्ज कर पाकिस्तान को इन किस्मों को उगाने से रोकने का प्रयास किया जाएगा। साथ ही जिन देशों में पाकिस्तान इन किस्मों के चावल का निर्यात कर रहा है, वहां भी अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत मामला दर्ज कर इन किस्मों की बिक्री को रोका जा सकता है। इस मामले को भारत सरकार अंतरराष्ट्रीय फोरम में कब लेकर जाएगी, फिलहाल इसे लेकर कोई जानकारी सामने नहीं आई है।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>भारत में बासमती का भौगोलिक क्षेत्र&nbsp;</strong></p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/03/image_750x_67e271b100c5c.jpg" alt="" style="display: block; margin-left: auto; margin-right: auto;" /></p>
<p><strong>पाकिस्तान में भारतीय बासमती की पाइरेसी</strong><strong>&nbsp;</strong></p>
<p>भारत सालाना करीब 50 हजार करोड़ रुपये का बासमती निर्यात करता है। वैश्विक बाजार में बासमती चावल प्रीमियम श्रेणी में आता है और उसकी कीमत सामान्य चावल किस्मों से दोगुना तक होती है। यूरोप, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और खाड़ी के मिडिल ईस्ट देशों में बासमती बाजार में पाकिस्तान और भारत के बीच प्रतिस्पर्धा रहती है। जहां भारत में लगातार बासमती पर शोध के जरिये बेहतर उत्पादकता और गुणवत्ता की किस्में विकसित की गई हैं पाकिस्तान में इस स्तर पर काम नहीं हुआ है। यही वजह है कि&nbsp;पाकिस्तान में भारत की बासमती धान की किस्मों की पाइरेसी कर इनको अवैध तरीके से उगाया जा रहा है। जिससे भारत के बासमती कारोबार को नुकसान पहुंचा रहा है।&nbsp;</p>
<p>पाकिस्तान में भारतीय धान की पुरानी किस्मों के अलावा हाल में रिलीज नई किस्मों पूसा बासमती 1847, पूसा बासमती 1885 की खेती भी अवैध तरीके से की जा रही है। करीब डेढ़ साल पहले यह मामला सामने आया था और उसके बाद से ही भारतीय एजेंसियां सक्रिय हो गई थी। अब डीएनए जांच में पाकिस्तान द्वारा भारतीय किस्मों का उत्पादन करने की बात साबित होने से&nbsp; उसके निर्यात पर रोक लगाने में मदद मिल सकती है। इस मामले की अंतरराष्ट्रीय फोरम पर शिकायत और समाधान के प्रयास तेज होने की संभावना है।</p>
<p><strong>जीआई के तहत निर्धारित है बासमती का क्षेत्र&nbsp;</strong></p>
<p>भारत में विकसित किस्मों को<strong> सीड एक्ट, 1966</strong> और <strong>प्रोटेक्शन ऑफ प्लांट वैरायटी एंड फार्मर्स राइट्स एक्ट, 2001</strong> के तहत नोटिफाई किया जाता है। इन कानूनों के तहत केवल भारत के किसान ही इन बीजों की बुवाई कर सकते हैं। लेकिन पाकिस्तान में भारत की बासमती किस्में धड़ल्ले से उगाई जा रही हैं।&nbsp;</p>
<p>भारत सरकार द्वारा बासमती को प्रदान भौगोलिक पहचान (जीआई) के तहत देश में सात राज्यों में बासमती पैदा होता है। पंजाब में छह लाख हेक्टेयर और हरियाणा में भी करीब छह लाख हैक्टेयर में बासमती पैदा होता है। इसके अलावा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में करीब पांच लाख हैक्टेयर को बासमती के तहत लाये जाने की संभावना है। इनके अलावा दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू एवं कश्मीर में भी बासमती की खेती जीआई के तहत आती है।&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ भारतीय बासमती किस्मों की पाकिस्तान द्वारा पाइरेसी साबित, डीएनए टेस्ट में पुष्टि ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[जलवायु परिवर्तन के कारण 2012 में वैश्विक सोयाबीन फसल को एक&amp;#45;तिहाई का नुकसान: अध्ययन]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/climate-change-caused-one-third-of-global-soybean-crop-failure-in-2012-study.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 22 Mar 2025 16:03:35 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/climate-change-caused-one-third-of-global-soybean-crop-failure-in-2012-study.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>एक नए अध्ययन में खुलासा हुआ है कि 2012 में अर्जेंटीना, ब्राजील और अमेरिका में एक साथ हुए सोयाबीन फसल के नुकसान में एक-तिहाई से अधिक हिस्से के लिए जलवायु परिवर्तन जिम्मेदार था। कम्युनिकेशंस अर्थ एंड एनवायरनमेंट में प्रकाशित इस शोध में 2012 में इन तीन देशों में हुई अत्यधिक गर्मी और सूखे की स्थिति के प्रभाव का विश्लेषण किया गया। जलवायु और फसल मॉडल का उपयोग करके, शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि बिना जलवायु परिवर्तन के दुनिया में सोयाबीन की पैदावार कितनी होती। अध्ययन के निष्कर्षों से पता चला कि 2012 में उच्च तापमान और सूखी मिट्टी के कारण जलवायु परिवर्तन ने कुल पैदावार में 35% कमी ला दी।&nbsp;</p>
<p>मक्का, चावल और गेहूं के साथ-साथ सोयाबीन चार प्रमुख फसलों में से एक है, जो मिलकर वैश्विक कैलोरी खपत का लगभग 65% और दुनिया की 45% कृषि भूमि को कवर करती हैं। कार्बन ब्रीफ की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2021 में वैश्विक सोयाबीन उत्पादन लगभग 36.5 करोड़ टन तक पहुंच गया। हालांकि, इस उत्पादन का 4% से भी कम हिस्सा सीधे मानव उपभोग के लिए गया। इसका अधिकांश हिस्सा पशु चारा, वनस्पति तेल और बायोफ्यूल में इस्तेमाल किया गया।</p>
<p>सोयाबीन दुनिया में सबसे अधिक व्यापार की जाने वाली कृषि कमोडिटी है। वैश्विक कृषि व्यापार के कुल मूल्य का 10% अधिक हिस्सा इसी का है। सोयाबीन उत्पादन का अधिकांश हिस्सा अमेरिका, ब्राजील और अर्जेंटीना में केंद्रित है, जो संयुक्त रूप से लगभग 75% योगदान करते हैं। केवल तीन क्षेत्रों में इतना अधिक उत्पादन एकाग्र होने के कारण वैश्विक सोयाबीन आपूर्ति क्षेत्रीय परिस्थितियों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो जाती है। विशेष रूप से जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न झटके फसल की पैदावार को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकते हैं। इस तरह की घटनाएं वैश्विक खाद्य प्रणाली को बाधित कर सकती हैं, जिससे आपूर्ति श्रृंखलाओं में रुकावटें आती हैं और कीमतों में उछाल आता है।</p>
<p><strong>एक दशक बाद अध्ययन क्यों</strong><br />2012 में फसल को नुकसान जलवायु परिवर्तन से प्रभावित वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए एक स्पष्ट उदाहरण है। उस वर्ष, अमेरिका और दक्षिण अमेरिका के कई हिस्सों में अत्यधिक गर्मी और सूखे की स्थिति ने वैश्विक सोयाबीन उत्पादन में 10% की गिरावट ला दी, जिससे कीमतें भी रिकॉर्ड दर्ज की गईं। रिपोर्ट के प्रमुख लेखक जलवायु वैज्ञानिक डॉ. रायद हामिद ने कहा कि 2012 में हुई घटना की तीव्रता ने इसे अध्ययन के लिए एक महत्वपूर्ण मामला बना दिया, भले ही यह घटना एक दशक से अधिक पुरानी हो।</p>
<p>2012 में कम पैदावार तीन साल तक चलने वाली ला नीना घटना के अंत में आई। ला नीना अल नीनो-सदर्न ओसीलेशन (ENSO) का &lsquo;शीत चरण&rsquo; है। यह प्रशांत महासागर में ठंडे तापमान से जुड़ा है। हालांकि, यह आमतौर पर दक्षिण-पूर्वी दक्षिण अमेरिका और अमेरिका में अधिक गर्म और शुष्क परिस्थितियों को जन्म देता है। यूएस नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) के अनुसार 2012 की ला नीना घटना अब तक की तीसरी सबसे गर्म घटना थी, जिसने सोयाबीन फसलों के लिए प्रतिकूल परिस्थितियां पैदा कीं।</p>
<p><strong>क्षेत्रीय प्रभाव में अंतर</strong><br />अध्ययन ने 2012 की घटना के क्षेत्रीय प्रभावों में महत्वपूर्ण अंतर को भी उजागर किया। अमेरिका में जलवायु परिवर्तन के कारण सोयाबीन उत्पादन में 3.5% की गिरावट आई, जबकि दक्षिण-पूर्वी दक्षिण अमेरिका में उत्पादन में भारी गिरावट दर्ज की गई। दिलचस्प बात यह है कि मध्य ब्राजील में जलवायु परिवर्तन ने उत्पादन 14% तक बढ़ा दिया। यह दर्शाता है कि उस क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन का सोयाबीन पैदावार पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा।</p>
<p>यह अध्ययन जलवायु परिवर्तन के प्रति वैश्विक खाद्य प्रणालियों की संवेदनशीलता को उजागर करता है, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहां सोयाबीन जैसी प्रमुख फसलों का उत्पादन होता है। जब प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में एक साथ चरम मौसम की घटनाएं होती हैं, तो इसके प्रभाव से वैश्विक बाजार अस्थिर हो सकते हैं, खाद्य सुरक्षा को खतरा हो सकता है और कृषि-आधारित अर्थव्यवस्थाओं पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।</p>
<p>जलवायु परिवर्तन के कारण चरम मौसम की घटनाओं की पुनरावृत्ति और तीव्रता में वृद्धि होने की आशंका है, इसलिए अध्ययन में कृषि प्रणालियों में अनुकूलन उपायों और बेहतर क्लाइमेट रेजिलिएंस की तत्काल आवश्यकता पर जोर दिया गया है, ताकि वैश्विक खाद्य आपूर्ति की रक्षा की जा सके।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ जलवायु परिवर्तन के कारण 2012 में वैश्विक सोयाबीन फसल को एक-तिहाई का नुकसान: अध्ययन ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/03/image_750x500_67de824a873f2.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[अमेरिकी किसानों को सालाना 26 लाख की मदद, भारतीय किसानों को मात्र 6 हजार, मुकाबले में कैसे टिकेंगे]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/american-farmers-receive-rs-26-lakh-annually-while-indian-farmers-get-only-6000-how-will-they-compete.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 20 Mar 2025 17:34:24 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/american-farmers-receive-rs-26-lakh-annually-while-indian-farmers-get-only-6000-how-will-they-compete.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत पर अमेरिका के कृषि उत्पादों के लिए बाजार खोलने का दबाव बढ़ता जा रहा है। लेकिन दोनों देशों के किसानों को मिलने वाली सरकारी मदद में जमीन आसमान का फर्क है। ऐसे में भारत का किसान अमेरिकी किसानों के साथ प्रतिस्पर्धा में कैसे टिक पाएगा, यह बड़ा सवाल है।&nbsp;</p>
<p>पिछले पांच साल में अमेरिका के किसानों को सालाना औसतन <strong>30782 डॉलर</strong> यानी करीब 26.78 लाख की सरकारी मदद मिली है। यह पैसा सीधे उनके खाते में गया। यह जानकारी अमेरिका के <strong>गवर्नमेंट अकाउंटेबिलिटी ऑफिस (जीओए)</strong> की ओर से 17 दिसंबर, 2024 को सीनेट की कृषि और सहयोगी क्षेत्र की समिति को सौंपी गई रिपोर्ट में दी गई है। इस रिपोर्ट में 2019 से 2023 के बीच 10 लाख किसानों को अमेरिकी सरकार द्वारा दी गई 161 अरब डॉलर की मदद का विस्तृत ब्यौरा दिया गया है। इधर, भारत में परोक्ष सब्सिडी को छोड़ दें तो केंद्र सरकार से सालाना केवल 6000 रुपये की सीधे मदद किसानों को मिलती है। यह धनराशि <strong>प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना </strong><strong>(</strong><strong>पीएम-किसान</strong><strong>) </strong>के तहत पात्र किसानों के खाते में डाली जाती है, जिनकी संख्या करीब 10 करोड़ है।&nbsp;</p>
<p>यह तुलना इसलिए अहम हो जाती है क्योंकि अमेरिका भारत पर अपने कृषि उत्पादों के लिए बाजार खोलने के लिए दबाव बना रहा है। हालांकि, बाजार तो अधिकांश उत्पादों के लिए खुला हुआ है लेकिन असल मुद्दा उत्पादों के आयात पर लगने वाले सीमा शुल्क का है। अमेरिका इसमें कटौती करवाना चाहता है। अमेरिका ने इस दबावों के लिए <strong>रेसिप्रोकल टैरिफ </strong>लगाना शुरू किया है जिसके तहत कनाडा, मैक्सिको और चीन समेत कई देशों के उत्पादों पर अमेरिका ने सीमा शुल्क में बढ़ोतरी कर दी है। अमेरिकी कृषि उत्पादों का सबसे बड़े आयातक<strong> चीन</strong> भी शुल्क लागू करने के साथ बड़े पैमाने पर अमेरिकी कृषि उत्पादों का आयात घटाने के लिए घरेलू उत्पादन बढ़ाने की कोशिशों में जुट गया है, साथ ही ब्राजील जैसे अन्य देशों से कृषि उत्पादों का आयात बढ़ा रहा है। ऐसे में अमेरिका पर अपने किसानों के उत्पाद को खपाने के लिए नये बाजार तलाशने का दबाव बढ़ गया है और उसकी कोशिश होगी कि भारत के कृषि उत्पादों के बाजार में उसके लिए राह आसान हो जाए।</p>
<p><strong>अमेरिकी किसानों को सीधी मदद </strong></p>
<p>अमेरिकी सरकार द्वारा किसानों को सीधी मदद अमेरिकी संसद द्वारा 2018 में पारित <strong>फार्म बिल, 2018</strong> के प्रावधानों के तहत दी गई है। यह मदद 22 फसलों, डेयरी, पशुपालन और मत्स्य पालन के लिए <strong>प्राइस लॉस कवरेज (पीएलसी)</strong><strong>,</strong> <strong>एग्रीकल्चर रिस्क कवरेज (एआरसी)</strong> तथा अमेरिकी कृषि विभाग द्वारा चलाये जा रहे 27 कार्यक्रमों के तहत दी गई है। अमेरिका में किसान की जगह <strong>एग्रीकल्चर प्रॉड्यूसर</strong> शब्द का उपयोग किया जाता है। क्योंकि किसानों के अलावा कृषि क्षेत्र की अमेरिकी कारपोरेशन भी यह मदद पाती हैं। अमेरिका में अधिकतम मदद पाने वाले 10 प्रॉड्यूसर ने 1.77 करोड़ डॉलर से अधिक की राशि प्राप्त की और सबसे अधिक मदद 21.5 करोड़ डॉलर की मिली।&nbsp;</p>
<p>जीओए रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी सरकार द्वारा किसानों और एग्री कारपोरेशंस को दी जा रही मदद का 64 फीसदी हिस्सा मक्का, सोयाबीन, कपास, चावल, ज्वार और गेहूं जैसी फसलों के लिए दिया गया है। अमेरिका में कुल 18.2 लाख किसान हैं और वहां के किसान परिवारों की औसत आय 97984 डॉलर सालाना है जो वहां के मिडिल वैल्यू परिवारों की सालाना औसत आय 80610 डॉलर से अधिक है।&nbsp;</p>
<p><strong>विभिन्न मदों में मिलती है सहायता</strong>&nbsp;</p>
<p>अमेरिकी फार्म सर्विस एजेंसी (एफएसए), नेचुरल सिसोर्स कंजर्वेशन सर्विस और रिस्क मैनेजमेंट एजेंसी के जरिए दी जाने वाली यह सहायता कमोडिटी असिसटेंस के रूप में एग्रीकल्चर रिस्क कवरेज, डेयरी इंडेमिनिटी पेमेंट प्रोग्राम, डेयरी मार्जिन कवरेज और प्राइस लॉस कवरेज के लिए दी जाती है। इसके अलावा कंजर्वेशन, क्रॉप इंश्योरेंस, डिजास्टर असिस्टेंस और सप्लीमेंटरी असिस्टेंस के रूप में कृषि उत्पादकों को पैसा दिया जाता है।&nbsp;</p>
<p>इन प्रावधानों में <strong>इफेक्टिव रेफरेंस प्राइस (ईआरपी)</strong> का इस्तेमाल फसलों की कीमतों में गिरावट से होने वाले नुकसान को कवर करने के लिए किया जाता है। इसके अलावा बीमा के तहत प्राकृतिक आपदा या दूसरे कारणों से पैदावार या कीमतों में गिरावट को भी शामिल किया जाता है। इतना ही नहीं, कृषि उत्पादों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर अन्य देशों द्वारा लगाई जाने वाली पाबंदियों और नीतियों से होने वाले नुकसान की भरपाई भी अमेरिकी सरकार अपने किसानों को करती है।&nbsp;</p>
<p>किसानों को बीमा, कीमतों में अंतर, नीतिगत फैसलों के असर, टिकाऊ और प्राकृतिक खेती के साथ ही डेयरी उत्पादन में कमी, पशुपालकों को होने वाले नुकसान, मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन और प्लांटेशन के लिए सरकारी मदद दी जाती है। जीओए की रिपोर्ट बताती है कि वहां पिछले कुछ वर्षों में मदद पाने वाले डेयरी किसानों की संख्या तेजी से बढ़ी है।<strong>&nbsp;</strong></p>
<p><strong>कैसे मुकाबला करेंगे भारतीय किसान </strong></p>
<p>अगर भारत सरकार अमेरिका के कृषि उत्पादों को भारतीय कृषि बाजार में प्रवेश के लिए सीमा शुल्क दरों में कटौती करती है तो उसका सीधा असर हमारे किसानों पर पड़ेगा। सरकार से मामूली मदद पाने वाली भारतीय किसान सालाना औसतन 26.78 लाख रुपये की मदद हासिल करने वाले अमेरिकी कृषि उत्पादकों से कैसे प्रतिस्पर्धा करेंगे, यह बड़ा सवाल है।&nbsp;</p>
<p>पिछले दिनों भारत आये अमेरिकी सेक्रेटरी होवार्ड लटनिक ने काफी जोर देकर कहा था कि भारत को अपना कृषि बाजार अमेरिकी उत्पादों के लिए खोलना जरूरी है। अब देखना होगा कि इसे नीतिगत स्तर पर किस तरह अमल में लाया जाता है। वहीं, व्यापारिक रिश्तों में बढ़ते तनाव के बीच चीन ने जिस तरह से अमेरिकी कृषि उत्पादों के आयात को कम करना शुरू किया है, उससे अमेरिका के ऊपर दबाव है कि वह अपने किसानों को होने वाले नुकसान को कम करे और इसी रणनीति के तहत उसकी नजर भारतीय बाजार पर है। ऐसे में अगर भारत सरकार अपने किसानों को संरक्षण नहीं देती है तो यह भारतीय कृषि क्षेत्र के सामने एक नया संकट पैदा करने वाली स्थिति होगी।&nbsp;</p>
<p><strong>ग्लोबल ट्रेडवार </strong></p>
<p>चीन ने 4 मार्च से अमेरिका से आयात होने वाले सोयाबीन, ज्वार, बीफ, पोर्क, डेयरी उत्पादों, अक्वा उत्पादों, फल और सब्जियों पर 10 फीसदी सीमा शुल्क लगा दिया। वहीं गेहूं, मक्का, कपास और चिकेन पर 15 फीसदी सीमा शुल्क लगा दिया। अमेरिका द्वारा चीनी उत्पादों पर लगाये गये सीमा शुल्क के विरोध में चीन ने कृषि उत्पादों पर सीमा शुल्क लगाने का फैसला किया। इस कदम का क्या असर होगा, उसका अंदाजा अमेरिका और चीन के बीच इन वस्तुओं के आयात से लगाया जा सकता है।&nbsp;</p>
<p>साल 2024 में चीन ने 27.29 अरब डॉलर के कृषि व संबंधित उत्पादों का अमेरिका से आयात किया था। इसमें 12.76 अरब डॉलर का सोयाबीन, 1.48 अरब डॉलर का कॉटन, 1.11 अरब डॉलर का पोर्क, 1.02 अरब डॉलर का सीफूड, 58.4 करोड़ डॉलर के डेयरी उत्पाद, 49.01 करोड़ डॉलर का पोल्ट्री मीट, 55.69 करोड़ डॉलर का गेहूं, 32.79 करोड़ डॉलर का मक्का और 1.26 अरब डॉलर के दूसरे मोटे अनाज शामिल हैं।&nbsp;</p>
<p>लगता है कि यह टैरिफ वार अमेरिकी किसानों पर भारी पड़ने वाला है। लेकिन फार्म बिल 2018 के तहत मिलने वाली सीधी सहायता उनके लिए बड़ी मदद है जबकि हमारे किसान को मिलने वाली सरकारी मदद बहुत कम है। उसमें भी करीब 30 फीसदी किसान पीएम-किसान योजना के दायरे से बाहर हो जाते हैं।</p>
<p>&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ अमेरिकी किसानों को सालाना 26 लाख की मदद, भारतीय किसानों को मात्र 6 हजार, मुकाबले में कैसे टिकेंगे ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[भारत सरकार ने उड़द के शुल्क&amp;#45;मुक्त आयात को मार्च, 2026 तक बढ़ाया, कैसे बढ़ेगा दलहन उत्पादन?]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/india-extends-duty-free-urad-imports-till-march-2026-how-pulses-production-will-increase.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 11 Mar 2025 17:21:42 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/india-extends-duty-free-urad-imports-till-march-2026-how-pulses-production-will-increase.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>केंद्र सरकार ने <strong>उड़द</strong> के शुल्क-मुक्त आयात को 31 मार्च, 2026 तक बढ़ा दिया है। इस तरह अगले साल भर तक देश में उड़द का ड्यूटी-फ्री इंपोर्ट होता रहेगा। साथ ही <strong>पीली मटर</strong> के शुल्क-मुक्त आयात को सरकार ने 31 मई तक बढ़ाया है। हालांकि, <strong>मसूर</strong> के आयात पर 10 फीसदी सीमा शुल्क लगाने का फैसला किया गया है। यह शुल्क 8 मार्च 2025 से लागू होगा।&nbsp;</p>
<p><strong>विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT)</strong> की ओर से जारी अधिसूचना के अनुसार, उड़द की मुक्त आयात नीति को 31 मार्च, 2026 तक बढ़ा दिया गया है। सरकार के इस कदम से देश में दालों की उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिलेगी, लेकिन दालों का आयात घरेलू बाजार में कीमतों पर असर डालेगा। ऐसे में किसान दलहन उत्पादन के लिए कैसे प्रोत्साहित होंगे और दलहन में आत्मनिर्भरता कैसे आएगी, यह बड़ा सवाल है।</p>
<p>नए सीजन की <strong>चने</strong> की फसल बाजार में आनी शुरू हो गई है। कई इलाकों में चने के दाम न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से नीचे गिरने लगे हैं। ऐसे में केंद्र सरकार ने पीली मटर के शुल्क-मुक्त आयात को मई तक जारी रखने की अनुमति दे दी है। इससे चने की कीमतें और अधिक गिरावट की आशंका है।</p>
<p><strong>केंद्र सरकार</strong> ने पिछले महीने पेश किए आम बजट में दलहन के लिए छह वर्ष के <strong>'आत्मनिर्भरता मिशन'</strong> का ऐलान किया था। लेकिन दूसरी तरफ, दालों के शुल्क-मुक्त आयात की नीति को जारी रखा गया है। ये दोनों कदम विरोधाभासी हैं। इसी तरह की नीतियों के कारण ही पिछले कई वर्षों से देश का दलहन उत्पादन 250-260 लाख टन के आसपास अटका हुआ है। क्योंकि सस्ते आयात के कारण किसानों को दालों का सही दाम नहीं मिल पाता है। दूसरी तरफ, उपभोक्ताओं को भी सस्ते आयात का पूरा लाभ नहीं मिल पाता और उन्हें महंगा खरीदना पड़ता है।&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ भारत सरकार ने उड़द के शुल्क-मुक्त आयात को मार्च, 2026 तक बढ़ाया, कैसे बढ़ेगा दलहन उत्पादन? ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[जलवायु परिवर्तन: तापमान 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ने पर कम हो सकती है फसलों की विविधता]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/climate-change-even-2-degree-celcius-warming-could-reduce-crop-diversity.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 09 Mar 2025 12:06:14 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/climate-change-even-2-degree-celcius-warming-could-reduce-crop-diversity.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>एक नए शोध के अनुसार यदि वैश्विक तापमान 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ता है, तो दुनिया की आधी से अधिक कृषि भूमि पर उगाई जाने वाली फसलों की संख्या, यानी फसल विविधता में कमी आ सकती है। यह अध्ययन <a href="https://www.nature.com/articles/s43016-025-01135-w">नेचर</a> पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। यह दर्शाता है कि जलवायु परिवर्तन 30 प्रमुख फसलों के लिए उपयुक्त भूमि को कैसे बदल सकता है। इसका आकलन प्री-इंडस्ट्रियल समय की तुलना में चार अलग-अलग तापमान परिदृश्यों (1.5 से 4 डिग्री सेल्सियस तक) के तहत किया गया है।</p>
<p>शोध से पता चला कि 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि पर भी आधी से अधिक फसलों की खेती के क्षेत्रफल भूमि में शुद्ध रूप से कमी आएगी। सबसे अधिक प्रभावित होने वाली फसलों में गेहूं, जौ, सोयाबीन, मसूर और आलू शामिल हैं। दो डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान वृद्धि होने पर कृषि भूमि में गिरावट और अधिक स्पष्ट हो जाएगी। कुछ मामलों में 50% से अधिक की कमी देखी जा सकती है। यदि तापमान 3 डिग्री सेल्सियस बढ़ता है तो सभी 30 फसलों की कृषि योग्य भूमि कम हो जाएगी।</p>
<p>वेब पोर्टल <a href="https://www.carbonbrief.org/half-of-global-croplands-could-see-a-drop-in-suitable-crops-at-2c-of-warming/?utm_source=cbnewsletter&amp;utm_medium=email&amp;utm_term=2025-03-06&amp;utm_campaign=Daily+Briefing+05+03+2025">कार्बन ब्रीफ</a> के साथ बातचीत में वेस्ट इंडीज विश्वविद्यालय के एप्लाइड क्लाइमेट वैज्ञानिक डॉ. डेल रैंकिन इस अध्ययन में व्यापक रूप से फसलों पर फोकस किए जाने को "सराहनीय" बताते हैं। प्रेडिक्टस क्लाइमेट सॉल्यूशंस के चीफ प्रोडक्ट ऑफिसर डॉ. जोस क्लाविजो मिशेलांगेली इस बात पर जोर देते हैं कि विभिन्न फसलों के लिए शोध का विस्तार करना जलवायु परिवर्तन के वैश्विक कृषि पर पड़ने वाले पूर्ण प्रभाव को समझने के लिए आवश्यक है।</p>
<p><em><strong>चित्र: न्यूनतम वैश्विक तापमान में वृद्धि, जो वर्तमान फसल उत्पादन को जोखिम में डाल सकती है।</strong></em></p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/03/image_750x_67cd3653c04e9.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>तापमान में वृद्धि का असमान क्षेत्रीय प्रभाव</strong><br />शोध से यह भी पता चलता है कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव सभी क्षेत्रों पर समान रूप से नहीं पड़ेगा। भूमध्य रेखा के पास स्थित क्षेत्र, जैसे उप-सहारा अफ्रीका और दक्षिण एशिया में फसल विविधता में सबसे अधिक गिरावट देखी जा सकती है। यदि तापमान 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक बढ़ता है, तो इन क्षेत्रों में 70% से अधिक कृषि भूमि प्रभावित हो सकती है।</p>
<p>इसके विपरीत भूमध्य रेखा से दूर स्थित क्षेत्र, जैसे उत्तरी अमेरिका, यूरोप, मध्य एशिया और लैटिन अमेरिका में 3 डिग्री सेल्सियस तक की वार्मिंग में भी फसल विविधता में वृद्धि या स्थिरता देख सकते हैं। यह बदलाव वैश्विक खाद्य उत्पादन और सुरक्षा के लिए चुनौतियां और अवसर दोनों प्रस्तुत करता है।</p>
<p><strong>जलवायु परिवर्तन अनुकूलन और खाद्य सुरक्षा</strong><br />शोधकर्ताओं का मानना है कि बढ़ते तापमान से हाई-लैटीट्यूड क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन अनुकूलन के अवसर मिल सकते हैं। इससे कृषि विविधीकरण के साथ उत्पादकता में वृद्धि हो सकती है। हालांकि विशेषज्ञ यह चेतावनी भी देते हैं कि समशीतोष्ण (टेम्परेट) क्षेत्रों पर कृषि उत्पादन की अधिक निर्भरता खतरनाक हो सकती है।</p>
<p>डॉ. डेल रैंकिन बताते हैं कि कृषि विस्तार को समशीतोष्ण क्षेत्रों तक सीमित करने से उष्णकटिबंधीय फसलों में रुचि कम हो सकती है, जिससे वैश्विक खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ने की आशंका होगी। वे समशीतोष्ण क्षेत्रों में चरम मौसम की घटनाओं को लेकर चेतावनी देते हैं कि यदि ये क्षेत्र खाद्य उत्पादन के केंद्र बनते हैं, तो जलवायु-जनित आपदाएं वैश्विक खाद्य संकट को जन्म दे सकती हैं।</p>
<p>यह अध्ययन वैश्विक तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने की आवश्यकता को रेखांकित करता है, ताकि विशेष रूप से उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में खाद्य उत्पादन में गंभीर व्यवधानों से बचा जा सके। शोध की प्रमुख लेखिका सारा हेइकोनेन, जो फिनलैंड की आल्टो विश्वविद्यालय में डॉक्टोरल शोधकर्ता हैं, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता पर जोर देती हैं। वे कहती हैं कि इन क्षेत्रों में कृषि को होने वाले नुकसान से वैश्विक खाद्य नेटवर्क प्रभावित होंगे। ऐसे में अनुकूलन प्रयासों को बढ़ाना आवश्यक हो जाता है।</p>
<p>जलवायु परिवर्तन के कारण कृषि पर मंडरा रहे संकट को देखते हुए शोधकर्ता शमन (मिटिगेशन) रणनीति, विविध कृषि प्रणालियों और अनुकूलन प्रयासों को मजबूत करने की तात्कालिक आवश्यकता पर बल देते हैं, ताकि भावी पीढ़ियों के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ जलवायु परिवर्तन: तापमान 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ने पर कम हो सकती है फसलों की विविधता ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[2025 में वैश्विक गेहूं और चावल उत्पादन में मामूली वृद्धि का अनुमान]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/early-forecast-predicts-modest-increase-in-2025-global-wheat-and-rice-production.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 09 Mar 2025 08:33:23 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/early-forecast-predicts-modest-increase-in-2025-global-wheat-and-rice-production.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>2025 में वैश्विक गेहूं उत्पादन 79.6 करोड़ टन रहने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 1 प्रतिशत अधिक होगा। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) का यह पूर्वानुमान मुख्य रूप से यूरोपीय संघ, विशेष रूप से फ्रांस और जर्मनी में उत्पादन बढ़ने की उम्मीद पर आधारित हालांकि पूर्वी यूरोप में शुष्क परिस्थितियों और पश्चिमी क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा जैसी चुनौतियां पैदावार को प्रभावित कर सकती हैं। अमेरिका में गेहूं का रकबा बढ़ने की संभावना है, हालांकि सर्दियों की फसल पर सूखे के प्रभाव के कारण पैदावार में मामूली गिरावट आ सकती है।</p>
<p>चावल उत्पादन 2024/25 में 54.3 करोड़ टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने का अनुमान है, जो भारत में बेहतर फसल की संभावनाओं और कंबोडिया व म्यांमार में अनुकूल मौसम परिस्थितियों के कारण है। फरवरी की तुलना में FAO ने 2024/25 में वैश्विक चावल उत्पादन के पूर्वानुमान को 36 लाख टन बढ़ा दिया है।</p>
<p>मार्च में 2024 के लिए वैश्विक अनाज उत्पादन का अनुमान मामूली रूप से बढ़ाकर 284.2 करोड़ टन किया गया है, जिससे 2023 और 2024 के उत्पादन के बीच का अंतर 144 लाख टन रह गया है। 2024 के उत्पादन में किए गए संशोधन मुख्य रूप से गेहूं के कारण हैं। ईरान में गेहूं की फसल काफी अच्छी रही। चावल उत्पादन के आंकड़ों को भी संशोधित किया गया है।</p>
<p>विपणन वर्ष 2024/25 में वैश्विक अनाज खपत 286.7 करोड़ टन रहने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष की तुलना में एक प्रतिशत अधिक है। इसका मुख्य कारण रिकॉर्ड चावल खपत की उम्मीद है। गेहूं की खपत स्थिर रहने की संभावना है। खाद्य के रूप में इसकी खपत में मामूली गिरावट आएगी, लेकिन चीन में इसके औद्योगिक उपयोग में वृद्धि होगी।</p>
<p>एफएओ ने वैश्विक अनाज भंडार में 1.9 प्रतिशत की गिरावट का अनुमान लगाया है, जिससे 2025 के लिए क्लोजिंग स्टॉक 86.93 करोड़ टन रहने की संभावना है। रूस और यूक्रेन में अधिक भंडार होंगे लेकिन अन्य क्षेत्रों में कमी आएगी। एफएओ ने 2024/25 में वैश्विक अनाज व्यापार के पूर्वानुमान को 48.42 करोड़ टन तक घटा दिया है, जो पिछले सीजन से 5.6 प्रतिशत कम है। इसका कारण निर्यात के डायनेमिक्स में बदलाव बताया गया है।</p>
<p><strong>2025 में विभिन्न क्षेत्रों में फसलों का आउटलुक</strong><br />एफएओ ने अपनी नई क्रॉप प्रॉस्पेक्ट्स एंड फूड सिचुएशन रिपोर्ट में बताया है कि उत्तर अफ्रीका में लंबे समय तक शुष्क मौसम ने अनाज उत्पादन की संभावनाओं को प्रभावित किया है। दक्षिणी अफ्रीका में अनुकूल वर्षा से 2024 की भारी गिरावट के बाद फसल पैदावार में सुधार होने की उम्मीद है।</p>
<p>सुदूर पूर्व एशिया में 2025 में गेहूं उत्पादन में वृद्धि जारी रहने की संभावना है। रकबा बढ़ने और अनुकूल मौसम परिस्थितियों के कारण ऐसा होगा। एशिया के अन्य क्षेत्रों में 2024 के अंत से कम वर्षा के कारण उपज की संभावनाएं प्रभावित हुई हैं, जिससे गेहूं की पैदावार पांच साल के औसत से नीचे गिर सकती हैं।</p>
<p>दक्षिण अमेरिका में मिश्रित मौसम परिस्थिति मक्का उत्पादन को प्रभावित कर रही है, जबकि अर्जेंटीना में स्टंट रोग के प्रकोप का खतरा बना हुआ है। हालांकि, ब्राजील में बेहतर उत्पादन संभावनाओं के कारण कुल उत्पादन औसत से ऊपर रहने की संभावना है। मेक्सिको में लगातार शुष्क मौसम के कारण बुवाई में कमी आई है, जबकि अन्य क्षेत्रों में अनुकूल मौसम से पैदावार में वृद्धि की उम्मीद है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ 2025 में वैश्विक गेहूं और चावल उत्पादन में मामूली वृद्धि का अनुमान ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[फरवरी में ग्लोबल मार्केट में चीनी के दाम बढ़े, भारत&amp;#45;ब्राजील में उत्पादन घटने की आशंका]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/sugar-prices-soar-in-global-market-in-february-production-may-decline-in-india-and-brazil.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 08 Mar 2025 17:16:24 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/sugar-prices-soar-in-global-market-in-february-production-may-decline-in-india-and-brazil.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) की नई रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक खाद्य वस्तुओं की कीमतों का मानक फरवरी में बढ़ गया। इसमें चीनी, डेयरी और वनस्पति तेल की कीमतों में वृद्धि मुख्य रूप से जिम्मेदार रही। एफएओ खाद्य मूल्य सूचकांक फरवरी में औसतन 127.1 अंक पर रहा, जो पिछले महीने की तुलना में 1.6 प्रतिशत और फरवरी 2024 के स्तर से 8.2 प्रतिशत अधिक था। &nbsp;</p>
<p>इस वृद्धि का मुख्य कारण FAO चीनी मूल्य सूचकांक में 6.6 प्रतिशत की वृद्धि थी, जो तीन महीने की लगातार गिरावट के बाद फरवरी में 118.5 अंक तक पहुंच गया। यह वृद्धि 2024-25 सीजन के लिए वैश्विक आपूर्ति में संभावित कमी की आशंकाओं के कारण हुई। विशेष रूप से भारत में उत्पादन में गिरावट और ब्राजील में प्रतिकूल मौसम की स्थिति के कारण।</p>
<p>एफएओ अनाज मूल्य सूचकांक फरवरी में 0.7 प्रतिशत बढ़कर 112.6 अंक पर पहुंच गया। गेहूं की कीमतें रूस में आपूर्ति के संकट और पूर्वी यूरोप तथा उत्तरी अमेरिका में फसल की स्थिति को लेकर चिंता के कारण बढ़ीं। हालांकि कुल सूचकांक फरवरी 2024 के स्तर से थोड़ा नीचे रहा। ब्राजील में घटती आपूर्ति और अमेरिका से मजबूत निर्यात मांग के कारण मक्के की कीमतों में वृद्धि जारी रही। इसके विपरीत, वैश्विक चावल की कीमतें फरवरी में 6.8 प्रतिशत गिर गईं, जिसका कारण निर्यात के लिए पर्याप्त आपूर्ति और कमजोर आयात मांग रही। &nbsp;</p>
<p>FAO डेयरी मूल्य सूचकांक जनवरी से 4.0 प्रतिशत बढ़कर 148.7 अंक तक पहुंच गया। यह वृद्धि सभी प्रमुख डेयरी उत्पादों, जैसे पनीर और संपूर्ण दूध पाउडर की कीमतों में वृद्धि के कारण हुई, क्योंकि प्रमुख निर्यात बाजारों में उत्पादन की तुलना में आयात मांग अधिक थी। &nbsp;</p>
<p>वनस्पति तेल मूल्य सूचकांक फरवरी में 156.0 अंक पर रहा, जो जनवरी से 2.0 प्रतिशत और एक साल पहले की तुलना में 29.1 प्रतिशत अधिक था। यह वृद्धि मुख्य रूप से पाम, सोया और सूरजमुखी तेल की ऊंची कीमतों के कारण हुई। मीट प्राइस इंडेक्स फरवरी में स्थिर रहा। यह औसतन 118.0 अंक पर रहा, जो जनवरी से मामूली 0.1 प्रतिशत कम था।</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ फरवरी में ग्लोबल मार्केट में चीनी के दाम बढ़े, भारत-ब्राजील में उत्पादन घटने की आशंका ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[भारत सरकार ने 100% टूटे चावल के निर्यात पर प्रतिबंध हटाया]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/indian-government-lifts-ban-on-export-of-100-percent-broken-rice.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 08 Mar 2025 12:29:48 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/indian-government-lifts-ban-on-export-of-100-percent-broken-rice.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>केंद्र सरकार ने चावल निर्यात के मामले में ढील देते हुए 100% <span>टूटे चावल के निर्यात पर प्रतिबंध हटा दिया है। यह प्रतिबंध सितंबर</span>, 2022 <span>से लागू था</span>,<span> लेकिन अब भारत से 100</span>% <span>टूटे&nbsp;चावल का निर्यात हो सकेगा। </span>यह निर्णय देश में चावल के अत्यधिक भंडार और चावल की कीमतों में गिरावट को देखते हुए लिया गया है।</p>
<p><strong>वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय</strong> की ओर से जारी अधिसूचना में कहा कि<strong> 100% </strong><span><strong>टूटे सफेद चावल</strong> के निर्यात पर प्रतिबंध हटा लिया है</span>, <span>जो तत्काल प्रभाव से लागू होगा। टूटे चावल के निर्यात की नीति को </span>'<span>निषिद्ध</span>' <span>से </span><strong>'मुक्त' </strong>सूची में डाल दिया है।&nbsp;</p>
<p>सरकार ने यह निर्णय ऐसे समय लिया है जब वैश्विक बाजार में सुस्त मांग और अधिक स्टॉक के कारण चावल की कीमतें दो साल के निचले स्तर पर पहुंची गई हैं। देश में चावल के ऊंचे भंडार और कीमतों में गिरावट को देखते हुए टूटे चावल के निर्यात पर प्रतिबंध हटने की उम्मीद की जा रही थी। प्रतिबंध हटने से करीब 20 लाख टन चावल निर्यात की उम्मीद जताई जा रही है।&nbsp;</p>
<p><strong>प्रतिबंध हटने का क्या होगा असर?</strong></p>
<p>भारत द्वारा 100% <span>टूटे चावल के निर्यात पर प्रतिबंध हटाने से वियतनाम</span>, <span>म्यांमार और पाकिस्तान के चावल की कीमतों पर दबाव पड़ने की संभावना है। जबकि घरेलू बाजार में चावल की कीमतों को कुछ सहारा मिल सकता है। भारत सरकार के इस फैसले से अफ्रीकी देशों को कम कीमतों पर चावल खरीदने में मदद मिल सकती है</span>, <span>साथ ही एनिमल फीड और इथेनॉल उत्पादकों को भी फायदा हो सकता है।&nbsp;</span></p>
<p>खाद्य महंगाई पर लगाम लगाने के लिए भारत सरकार ने सितंबर, 2022 में 100% <span>टूटे चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगाया था। इसके बाद </span>2023 <span>में कमजोर मानसून और उत्पादन में गिरावट की आशंका को देखते हुए विभिन्न प्रकार के चावल निर्यात पर पाबंदियां लगा दी थीं।</span></p>
<p><strong>चावल निर्यात पर हटी पाबंदियां</strong></p>
<p>पिछले साल धान की अच्छी फसल और रिकॉर्ड उत्पादन को देखते हुए सितंबर, 2024 <span>से चावल निर्यात पर पाबंदियां हटाने का सिलसिला शुरू हुआ और सफेद चावल के निर्यात पर प्रतिबंध हटाया गया था। इसके बाद अक्टूबर</span>, 2024 <span>में गैर-बासमती सफेद चावल पर लागू </span>490 <span>डॉलर प्रति टन के न्यूनतम निर्यात मूल्य को हटाया गया। साथ ही चावल निर्यात पर लगी विभिन्न पाबंदियां भी हटा ली गई थीं। केवल 100% टूटे चावल पर निर्यात प्रतिबंध रह गया था।&nbsp;</span></p>
<p><span><strong>केंद्रीय पूल में भरपूर चावल</strong></span></p>
<p><span>भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के आंकड़ों के अनुसार, 1 फरवरी तक केंद्रीय पूल में कुल चावल भंडार 6.76 करोड़ टन था जो 76 लाख टन की बफर स्टॉक सीमा से कई गुना अधिक था। सरकारी भंडार में भरपूर चावल को देखते हुए टूट चावल के निर्यात पर प्रतिबंध हटाया गया है।&nbsp;</span></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/03/image_750x500_67cbec66182a3.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ भारत सरकार ने 100% टूटे चावल के निर्यात पर प्रतिबंध हटाया ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/03/image_750x500_67cbec66182a3.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[विश्व में बढ़ रही दालों की मांग, सतत कृषि में भूमिका के कारण हो रहा बाजार का विस्तार]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/global-pulse-trade-on-the-rise-as-sustainability-and-demand-drive-market-expansion.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 02 Mar 2025 15:23:56 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/global-pulse-trade-on-the-rise-as-sustainability-and-demand-drive-market-expansion.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>दालों का उत्पादन दुनियाभर में अब भी सीमित बना हुआ है। इसका सालाना वैश्विक उत्पादन लगभग 10 करोड़ &nbsp;टन है। लेकिन राबोबैंक की हाल की एक रिपोर्ट के अनुसार इनमें उत्पादन बढ़ाए जाने के साथ इनका ट्रेड बढ़ने की भी काफी संभावना है। इस रिपोर्ट में सस्टेनेबिलिटी के लाभों और उपभोक्ता रुचि में वृद्धि के कारण दालों की बढ़ती मांग को रेखांकित किया गया है।&nbsp;</p>
<p>वर्ल्ड ग्रेन पत्रिका द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट में राबोबैंक के हवाले से कहा गया है कि मिट्टी का स्वास्थ्य सुधारने वाली दालों की विशेषता तो है ही, इनमें ग्रीनहाउस गैसों को अवशोषित करने की भी क्षमता है। इससे वे टिकाऊ कृषि का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि दालें कृषि को अधिक टिकाऊ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण बन गई हैं।</p>
<p>गेहूं (120 करोड़ टन) और मक्का (80 करोड़ टन) जैसे मुख्य अनाजों की तुलना में दालों का उत्पादन कम होता है। इसके बावजूद विशेष रूप से चना, मटर और मसूर के ट्रेड और मांग में वृद्धि हो रही है। ये तीनों दालें कुल दाल उत्पादन का लगभग 40% हिस्सा होती हैं। इनके प्रमुख उत्पादक देशों में भारत (चना), रूस, अमेरिका, कनाडा, यूरोपीय संघ और यूक्रेन (मटर) और कनाडा, ऑस्ट्रेलिया तथा अमेरिका (मसूर) शामिल हैं।</p>
<p>वैश्विक दाल व्यापार विकसित हो रहा है और इसमें नए खिलाड़ी उभर रहे हैं। रूस ने सूखी मटर के निर्यात में अपनी भूमिका बढ़ाई है। मिस्र फावा बीन्स का सबसे बड़ा खरीदार बन गया है तो अर्जेंटीना ने विभिन्न प्रकार की बीन्स के निर्यात में वृद्धि की है। तुर्की ने मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में दाल प्रसंस्करण और वितरण के एक प्रमुख केंद्र के रूप में खुद को स्थापित किया है।</p>
<p>वर्ष 2015 से वैश्विक दाल व्यापार में 29% की वृद्धि हुई है। इसकी औसत वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) 3% है। इंटरनेशनल ग्रेन्स काउंसिल (IGC) का अनुमान है कि 2024 में दालों का व्यापार 2.1 करोड़ टन तक पहुंच गया, जो कुल दाल उत्पादन का लगभग 20% है। ये आंकड़े वैश्विक गेहूं व्यापार की तुलना में बहुत कम हैं। पिछले वर्ष गेहूं का व्यापार 21 करोड़ टन तक पहुंच गया था।</p>
<p>विकासशील देशों के लिए दालें किफायती प्रोटीन का स्रोत हैं और मांस तथा डेयरी प्रोडक्ट का विकल्प भी। दालें सस्टेनेबल पर्यावरण में भी महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। उनकी नाइट्रोजन-फिक्सिंग क्षमता हवा से नाइट्रोजन अवशोषित करके मिट्टी की उर्वरता में सुधार करती हैं। इससे रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता कम हो जाती है। उनकी गहरी जड़ें मिट्टी की संरचना के साथ उसकी जल धारण और उसमें वायुसंचलन की क्षमता को बढ़ाती हैं। ये जैव विविधता को भी बढ़ावा देती हैं।</p>
<p>इन लाभों के बावजूद दाल उद्योग के सामने कई चुनौतियां हैं जो इसके बाजार के विकसित होने में बाधा डालती हैं। मुख्य अनाजों के विपरीत दालों को अभी तक वैश्विक कमोडिटी के रूप में नहीं माना जाता है। इसके मूल्यों में अस्थिरता रहती है, प्राइस डिस्कवरी में पारदर्शिता की कमी है, साथ ही वैश्विक व्यापार डेटा भी सीमित है। राबोबैंक ने निवेश आकर्षित करने, व्यापार बढ़ाने और बाजार की बेहतर कार्यक्षमता के लिए पारदर्शिता बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया है।</p>
<p>दालों के कारोबार की क्षमता को पहचानते हुए कई प्रमुख एग्रीबिजनेस कंपनियों ने इस क्षेत्र में प्रवेश किया है। अमेरिका स्थित प्रमुख कंपनियां जैसे एडीएम, बंज, कारगिल, कोलंबिया ग्रेन इंटरनेशनल और रेडवुड, जर्मनी की म्यूलर'स म्यूल ने दालों के ऑपरेशंस का हाल में विस्तार किया है। नीदरलैंड्स की लुइस ड्रेफस कंपनी ने अगस्त 2024 में दालों के व्यवसायीकरण के लिए एक अलग इकाई बनाने की घोषणा की। बढ़ती मांग, बढ़ती बाजार रुचि, और सस्टेनेबिलिटी के लाभों की बढ़ती मान्यता के साथ दालें जल्द ही वैश्विक मुख्यधारा में विकसित हो सकती हैं।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ विश्व में बढ़ रही दालों की मांग, सतत कृषि में भूमिका के कारण हो रहा बाजार का विस्तार ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[बासमती को लेकर पाक का भ्रामक दावा, भारत के पास न्यूजीलैंड में ट्रेड मार्क, आस्ट्रेलिया में विचाराधीन]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/pakistan-propaganda-on-basmati-india-has-trademark-in-new-zealand-case-pending-in-australia.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 14 Feb 2025 19:35:23 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/pakistan-propaganda-on-basmati-india-has-trademark-in-new-zealand-case-pending-in-australia.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>पाकिस्तानी मीडिया ने बासमती पर अधिकार को लेकर न्यूजीलैंड और आस्ट्रेलिया में भारत का दावा खारिज होने और भारत के खिलाफ पाकिस्तान की जीत का दावा करते हुए खबरें प्रकाशित की हैं। इन खबरों में दावा किया गया है कि पाकिस्तान को न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया में बासमती पर अधिकार मिल गया है। यह खबरें पूरी तरह से बेबुनियाद और तथ्यात्मक रूप से गलत हैं।</p>
<p>भारत सरकार के उच्च पदस्थ सूत्रों ने <strong>रूरल वॉयस</strong> को बताया कि पाकिस्तानी मीडिया में कुछ दिन पहले आई खबरें पूरी तरह गलत और तथ्यों से परे हैं। यह पाकिस्तान का प्रोपेगैंडा है। जबकि हकीकत यह है कि न्यूजीलैंड और आस्ट्रेलिया में पाकिस्तान को बासमती पर उसके दावे को लेकर अभी तक कोई मंजूरी नहीं मिली है और ना ही पाकिस्तान को कोई रजिस्ट्रेशन दिया गया है। बासमती पर अधिकार को लेकर अभी मामले न्यूजीलैंड और आस्ट्रेलिया में विचाराधीन हैं।&nbsp;&nbsp;</p>
<p><strong>एग्रीकल्चरल एंड प्रोसेस्ड फूड प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट डेवलपमेंट ऑथरिटी (एपीडा)</strong> बासमती के मामले में भारत के हितों को सुरक्षित रखने के लिए सक्रिय है। एपीडा के एक वरिष्ठ अधिकारी ने <strong>रूरल वॉयस</strong> को बताया कि बासमती नाम पर भारत के दावे को लेकर ऑस्ट्रेलिया के फेडरल कोर्ट में अप्रैल में सुनवाई होनी है। जबकि बासमती ट्रेड मार्क पर भारत के दावे के खिलाफ ट्रेड डेवलपमेंट ऑथरिटी ऑफ पाकिस्तान (टीडीएपी) और राइसग्रोअर्स लिमिटेड की आपत्तियां ऑस्ट्रेलिया के इंटलेक्चुल प्रापर्टी ऑफिस में विचाराधीन हैं। पाकिस्तान की ओर से बासमती ट्रेड मार्क के लिए ऑस्ट्रेलिया के इंटलेक्चुल प्रापर्टी आफिस में किया गया आवेदन अभी परीक्षण के स्तर पर है और उसे कोई मंजूरी नहीं मिली है।&nbsp;</p>
<p>वहीं, न्यूजीलैंड में भारत को बासमती का लोगो मार्क रजिस्ट्रेशन प्राप्त है जो 28 अगस्त, 2028 तक वैध है। जबकि पाकिस्तान के पास न्यूजीलैंड मे ऐसा कोई मार्क नहीं है। बासमती नाम पर पाकिस्तान के दावे को लेकर इसी माह न्यूजीलैंड हाईकोर्ट में सुनवाई होनी है। जबकि पाकिस्तान की ओर से बासमती ट्रेड मार्क लिए न्यूजीलैंड के इंटलेक्चुल प्रॉपर्टी आफिस में किया गया आवेदन अभी परीक्षण के स्तर पर है और उसे कोई मंजूरी नहीं मिली है। यानी न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया में पाकिस्तान के पास न तो बासमती के नाम और न ही ट्रेडमार्क को लेकर कोई रजिस्ट्रेशन है।</p>
<p>उधर, भारत की ओर से यूरोपीय संघ (ईयू) में भी बासमती के लिए भौगोलिक संकेतक (जीआई) के तहत संरक्षण के लिए आवेदन किया गया है। उस पर भी अभी कोई फैसला नहीं लिया गया है। वहीं, पाकिस्तान की ओर से ईयू में इसी तरह के आवेदन पर भारत ने पिछले दिनों अपनी आपत्ति दर्ज कराते हुए विरोध किया था।</p>
<p>यूरोपीय यूनियन में भारत ने पाकिस्तान से पहले आवेदन किया था क्योंकि भारत में जीआई कानून पहले बन चुका था। जबकि पाकिस्तान में जीआई के लिए कोई कानून ही नहीं था और वहां इसके लिए कानून बनने के बाद ईयू में आवेदन किया गया। इस आवेदन पर भारत ने अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी।</p>
<p>गौरतलब है कि पाकिस्तान ने बासमती उत्पादक क्षेत्रों में पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) समेत कई ऐसे क्षेत्रों को भी शामिल किया है जहां बासमती पैदा नहीं होता है। पाकिस्तान के दावे के खिलाफ भारत ने एक विस्तृत विरोध पिछले साल ईयू में दायर किया था।</p>
<p>वैश्विक बाजार में बासमती और गैर-बासमती चावल की कीमतों में दोगुना से भी अधिक का अंतर &nbsp;है। भारत सालाना करीब 50 हजार करोड़ रुपये का बासमती चावल निर्यात करता है। यह भारत से निर्यात होने वाली सबसे प्रमुख कृषि उपज में से है जिसे लेकर वैश्विक बाजार में भारत और पाकिस्तान के बीच प्रतिस्पर्धा रहती है। बासमती पर अधिकार की लड़ाई अंतरराष्ट्रीय फोरम और अदालतों तक पहुंच चुकी है।&nbsp;</p>
<p><strong>भारत-पाक बासमती विवाद</strong>&nbsp;</p>
<p>बासमती को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच कई वर्षों से विवाद चल रहा है। पाकिस्तान ने 2022 में यूरोपीय यूनियन (ईयू) में बासमती के जीआई के लिए आवेदन किया था। तब पाकिस्तान के आवेदन पर आपत्ति जताते हुए भारत ने इसे रद्द करने की मांग की। पाकिस्तान ने अपने आवेदन में 44 जिलों में बासमती उगाने का दावा किया है। जिनमें बलूचिस्तान जैसे इलाके भी शामिल हैं जहां सामान्य चावल पैदा करना भी मुश्किल है। पाकिस्तान ने इस सूची में पाक अधिकृत कश्मीर के चार जिलों को भी शामिल किया था।</p>
<p>इससे पहले साल 2008 में बासमती के जीआई के मुद्दे पर भारत और पाकिस्तान की एक संयुक्त बैठक में एक ग्रुप बनाया गया था। इसमें दोनों देशों के संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी शामिल थे। तब तय किया गया था कि बासमती के लिए पाकिस्तान के 14 जिलों को उत्पादन क्षेत्र के रूप में स्वीकार किया जाएगा, वहीं भारत के सात राज्यों पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली और जम्मू एवं कश्मीर को बासमती उत्पादक क्षेत्र माना जाएगा। उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक, इस बैठक में तय किया गया था कि दोनों देश संयुक्त रूप से बासमती के जीआई टैग के लिए आवेदन करेंगे। लेकिन दोनों देशों के बीच आपसी संबंध बिगड़ने के चलते यह मामला ठंडे बस्ते में चला गया।</p>
<p>इस बीच, भारत ने 2018 में बासमती के जीआई टैग के लिए ईयू में आवेदन किया। लेकिन ईयू ने भारत के आवेदन को ठंडे बस्ते में डाल दिया। जबकि पाकिस्तान ने 2022 में आवेदन किया तो ईयू ने उसे फास्ट ट्रैक से आगे बढ़ाया। भौगोलिक संकेत (जीई) के तहत आवेदन की शर्त है कि मूल देश में उत्पाद को जीआई टैग के लिए अधिसूचित होना चाहिए। भारत में जीआई के लिए कानून 1999 में बन गया था। लेकिन पाकिस्तान में इसके लिए कानून ही 2022 में बना। तब जाकर पाकिस्तान ने बासमती को जीआई टैग दिया। साथ ही पाकिस्तान ने बासमती के उत्पादक जिलों की संख्या 14 से बढ़ाकर 44 कर दी।</p>
<p>इसके अलावा पाक अधिकृत कश्मीर के चार जिले भी जोड़ दिये गये और जिलों की संख्या 48 हो गई। पाकिस्तान में जीआई टैग के लिए आवेदन को पब्लिक करने का प्रावधान नहीं है इसलिए भारत को पाकिस्तान के इस कदम की पूरी जानकारी नहीं मिल पाई। लेकिन ईयू में आवेदन के बाद जब पाकिस्तान के आवेदन को आपत्तियों के लिए सार्वजनिक किया गया तो भारत को बासमती पर पाकिस्तान की चाल का पता लगा।&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ बासमती को लेकर पाक का भ्रामक दावा, भारत के पास न्यूजीलैंड में ट्रेड मार्क, आस्ट्रेलिया में विचाराधीन ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[नेपाल से सस्ते खाद्य तेलों के आयात में भारी इजाफा, उद्योग संगठन ने पीएम मोदी को लिखी चिट्ठी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/surge-in-cheap-edible-oil-imports-from-nepal-industry-urges-pm-modi-for-intervention.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 12 Feb 2025 16:12:31 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/surge-in-cheap-edible-oil-imports-from-nepal-industry-urges-pm-modi-for-intervention.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>नेपाल से जीरो ड्यूटी पर खाद्य तेलों का भारी आयात भारतीय खाद्य तेल उद्योग के लिए चिंता का सबब बन गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कैबिनेट मंत्रियों को लिखे एक पत्र में, सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एसईए) ने नेपाल से सस्ते खाद्य तेलों के आयात को नियंत्रित करने के लिए तत्काल हस्तक्षेप का आग्रह किया है।</p>
<p>एसईए ने आरोप लगाया कि नियमों का उल्लंघन कर नेपाल से साउथ एशिया फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (SAFTA) के तहत जीरो ड्यूटी पर रिफाइंड सोयाबीन और पाम तेल का बहुत आयात हो रहा है। इससे घरेलू रिफाइनर, किसानों और देश के हितों को नुकसान पहुंच रहा है। ड्यूटी फ्री होने के कारण, नेपाल से भारत में प्रति माह कम से कम 50-60 हजार टन रिफाइंड तेल आने की उम्मीद है।</p>
<p>सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने केंद्र सरकार से आग्रह किया है कि साफ्टा देशों से आयातित खाद्य तेलों पर न्यूनतम आयात मूल्य (MIP) लागू किया जाए। यह एमआईपी भारत में तिलहनों के लिए निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के आधार पर तय होना चाहिए। यानी आयातित खाद्य तेलों का दाम भारत में तिलहनों से निकलने वाले तेल के दाम से कम नहीं होना चाहिए।</p>
<p><strong>नेपाल से आयात में भारी वृद्धि</strong></p>
<p>एसईए की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक, नेपाल से भारत को खाद्य तेलों के निर्यात में अचानक भारी वृद्धि हुई है। जुलाई-अगस्त 2024 में यह निर्यात केवल 687 टन से बढ़कर 15 दिसंबर, 2024 और 15 जनवरी, 2025 के बीच 56,444 टन हो गया। यह अगस्त-सितंबर में 2,240 टन, सितंबर-अक्टूबर में 6,765 टन, अक्टूबर-नवंबर में 18,165 टन और नवंबर-दिसंबर में 32,816 टन तक पहुंच गया।</p>
<p>आरोप है कि नेपाल के व्यापारी मलेशिया, इंडोनेशिया जैसे देशों से कच्चे खाद्य तेलों का आयात कर रहे हैं और रिफाइन कर SAFTA समझौते के तहत जीरो ड्यूटी पर भारत को निर्यात कर रहे हैं।</p>
<p>15 अक्टूबर, 2024 से 15 जनवरी, 2025 के बीच नेपाल ने 1,94,974 टन खाद्य तेलों (ज्यादातर कच्चा सोयाबीन और सूरजमुखी तेल) का आयात किया। इसी अवधि में नेपाल ने भारत को 1,07,425 टन खाद्य तेलों का निर्यात किया था। जबकि नेपाल की अपनी मासिक खाद्य तेल की खपत लगभग 35,000 टन है। इससे स्पष्ट है कि नेपाल से बड़े पैमाने पर खाद्य तेलों का पुन: निर्यात किया जा रहा है।&nbsp;</p>
<p><strong>भारतीय तेल उद्योग की चिंता</strong></p>
<p>एसईए के अध्यक्ष संजीव अस्थाना ने पत्र में कहा, "नेपाल से साफ्टा समझौते के तहत जीरो ड्यूटी पर खाद्य तेलों का आयात न केवल उत्तरी और पूर्वी भारत में बल्कि अब दक्षिणी और मध्य भारत में भी नुकसान पहुंचा रहा है।" इससे घरेलू कीमतें बिगड़ रही हैं और घरेलू खाद्य तेल उद्योग और किसानों को नुकसान पहुंच रहा है। संगठन ने मांग की है कि साफ्टा देशों में आयात की कीमत और भारत को पुनः निर्यात के बीच वैल्यू एडिशन के मानकों का पालन किया जाना चाहिए।</p>
<p>अस्थाना ने जोर देकर कहा, "जो कुछ धीरे-धीरे शुरू हुआ था, वह अब खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है, जिससे न केवल रिफाइनर को खतरा है, बल्कि भारत सरकार को भी भारी राजस्व घाटा हो रहा है। खाद्य तेलों पर उच्च आयात शुल्क बनाए रखने का उद्देश्य पूरी तरह से नाकाम हो रहा है।"</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ नेपाल से सस्ते खाद्य तेलों के आयात में भारी इजाफा, उद्योग संगठन ने पीएम मोदी को लिखी चिट्ठी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[प्रमुख गेहूं उत्पादन क्षेत्रों में बाधाओं के चलते इसकी वैश्विक आपूर्ति पर गहराया संकट]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/with-disruptions-in-major-wheat-producing-regions-global-supply-faces-mounting-challenges.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 26 Jan 2025 13:11:07 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/with-disruptions-in-major-wheat-producing-regions-global-supply-faces-mounting-challenges.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भू-राजनीतिक तनाव, प्रतिकूल मौसम की स्थिति और आर्थिक दबाव एक साथ आ जाने से वैश्विक गेहूं बाजार में संकट के हालात बनते जा रहे हैं। इस संकट के केंद्र में दुनिया का सबसे बड़ा गेहूं निर्यातक रूस है। वह इस बार कई दशक में सबसे खराब सर्दियों की फसल का सामना कर रहा है। अन्य प्रमुख गेहूं उत्पादक देशों में अलग तरह की बाधाएं और रूस-यूक्रेन युद्ध अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में अनिश्चितता पैदा कर रहे हैं। इस वर्ष वैश्विक गेहूं आपूर्ति में गिरावट का अनुमान है।&nbsp;</p>
<p>रूस का अनाज उद्योग हाल के दशकों में अपने सबसे गंभीर संकट का सामना कर रहा है। इस बार वहां सर्दियों की फसल को 23 वर्षों में सबसे खराब बताया जा रहा है। लगभग 38% फसल खराब स्थिति में है। केवल 31% फसलें अच्छी स्थिति में हैं, जो पिछले वर्ष के 74% से काफी कम है।&nbsp;</p>
<p>यह संकट प्रतिकूल मौसम, टेक्नोलॉजी में गिरावट और आर्थिक दबावों का मिलाजुला परिणाम है। पहले तो अप्रैल से अक्टूबर 2024 तक चलने वाले सूखे ने फसल को गंभीर रूप से प्रभावित किया। हालांकि, रूसी अनाज यूनियन (आरजीयू) का मानना है कि यह संकट केवल मौसम के कारण नहीं है। कृषि प्रौद्योगिकी में तेज गिरावट ने स्थिति को और बिगाड़ दिया है। पश्चिमी देशों ने 2021 से उच्च गुणवत्ता वाले बीजों पर निर्यात शुल्क और आयात कोटा लगा रखा है। इसने रूस में उत्पादकता को प्रभावित किया है। रूसी बीजों की गुणवत्ता तुलनात्मक रूप से कम है।</p>
<p>कर्ज महंगा होने और आर्थिक अस्थिरता के कारण भी किसान आधुनिक कृषि मशीनरी खरीद नहीं पा रहे हैं। वहां 2024 में कृषि उपकरणों की बिक्री में 16.5% गिरावट आई, जबकि अनाज हार्वेस्टर उत्पादन 18% घटा है। ब्याज दर 21% तक बढ़ाने के निर्णय ने कॉमर्शियल लोन को लगभग असंभव बना दिया है। गेहूं उत्पादन में कभी 32.5% की रिकॉर्ड लाभप्रदता थी, वह अब घाटे में चल रहा है।</p>
<p>खर्च कम करने के लिए किसानों ने उर्वरकों का कम उपयोग, सरल कृषि तकनीकों को अपनाने और निम्न गुणवत्ता वाले बीजों का उपयोग करने जैसे कदम उठाए हैं। इन कारणों से फसल चरम मौसम की स्थिति से नहीं निपट पा रही है। इससे उत्पादन और लाभप्रदता में गिरावट का दुष्चक्र बन गया है। युद्ध के कारण सशस्त्र बलों में भर्ती और शहरी क्षेत्रों में बेहतर अवसरों के कारण श्रमिकों की भी कमी हुई है। रूस का अनाज उत्पादन 2022 के रिकॉर्ड 15.36 करोड़ टन से घटकर 2024 में 13 करोड़ टन रह गया है, जबकि सरकार ने 2030 तक 17 करोड़ टन का लक्ष्य रखा था।</p>
<p><strong>वैश्विक गेहूं बाजार की परिस्थितियां</strong></p>
<p>दुनिया के सबसे बड़े गेहूं निर्यातकों में से एक होने के नाते, रूसी आपूर्ति में कोई भी बाधा अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर प्रभाव डाल सकती है। अमेरिकी कृषि विभाग (यूएसडीए) की दिसंबर 2024 की रिपोर्ट ने 2024-25 के लिए वैश्विक गेहूं आपूर्ति, खपत और व्यापार में गिरावट का अनुमान लगाया। वैश्विक गेहूं आपूर्ति 6 लाख टन घटकर 106 करोड़ टन रहने की उम्मीद है। यूरोपीय संघ और ब्राजील में उत्पादन में कमी आई है। ईयू का उत्पादन 13 लाख टन घटकर 12.13 करोड़ टन रहने का अनुमान है।</p>
<p>दक्षिणी गोलार्ध में विशेष रूप से ऑस्ट्रेलिया में बेहतर फसल ने कुछ राहत प्रदान की है, लेकिन भू-राजनीतिक तनाव भी बाजार की स्थिरता को प्रभावित कर रहा है। युद्ध के कारण रूस और यूक्रेन निर्यात बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। रूस की तरफ से लगाए गए निर्यात कोटा और यूक्रेन के बंदरगाह संचालन में व्यवधान ने व्यापार को और जटिल बना दिया है।</p>
<p><strong>युद्ध का गेहूं पर ऐतिहासिक प्रभाव</strong></p>
<p>युद्ध के दौरान गेहूं का रणनीतिक महत्व कोई नई बात नहीं है। वर्ल्ड ग्रेन ने डेनिस वोजनेसेन्स्की की पुस्तक वॉर एंड व्हीट: नैविगेटिंग मार्केट्स ड्यूरिंग ग्लोबल कॉन्फ्लिक्ट के हवाले से लिखा है कि गेहूं ऐतिहासिक रूप से युद्धरत राष्ट्रों के लिए एक महत्वपूर्ण संसाधन रहा है। विश्व युद्धों के दौरान भी गेहूं आपूर्ति पर नियंत्रण ने आबादी और सरकारों को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। रूस-यूक्रेन युद्ध भी इस ऐतिहासिक प्रवृत्ति को दर्शाता है।</p>
<p>रूस ने यूक्रेन की उपजाऊ कृषि भूमि और बंदरगाहों पर नियंत्रण किया है। यह उसके भू-राजनीतिक दांव को उजागर करता है। युद्ध के दौरान गेहूं आपूर्ति में व्यवधान से अक्सर मूल्य वृद्धि और सामाजिक अशांति होती है। अरब स्प्रिंग के दौरान भी यह देखा गया था। वोजनेसेन्स्की चेतावनी देते हैं कि काला सागर संघर्ष का गेहूं व्यापार पर प्रभाव यदि अनसुलझा रहा तो यह व्यापक वैश्विक अस्थिरता में बदल सकता है।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/01/image_750x500_6795e6b750b3b.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ प्रमुख गेहूं उत्पादन क्षेत्रों में बाधाओं के चलते इसकी वैश्विक आपूर्ति पर गहराया संकट ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/01/image_750x500_6795e6b750b3b.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[दक्षिण अमेरिका में ला नीना जैसे हालात का खतरा, कुछ फसलें प्रभावित होने की आशंका]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/la-nina-like-conditions-threaten-south-america-safrinha-crops-could-be-impacted.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 25 Jan 2025 15:20:48 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/la-nina-like-conditions-threaten-south-america-safrinha-crops-could-be-impacted.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>ला नीना जैसे हालात दक्षिण अमेरिकी देशों अर्जेंटीना, उरुग्वे, दक्षिणी पराग्वे और ब्राजील के सुदूर दक्षिणी हिस्सों में फसलों के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं। हालांकि ला नीना अब तक विकसित नहीं हुआ है, जबकि विभिन्न पूर्वानुमान मॉडलों ने इसे आसन्न बताया था। फिर भी समुद्र की सतह के तापमान में बदलाव के कारण पारंपरिक ला नीना की परिस्थितियां दुनिया भर में दिखने लगी हैं। &nbsp;</p>
<p>वर्ल्ड ग्रेन पत्रिका ने अपने जनवरी अंक में प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया है कि ला नीना आधिकारिक रूप से शायद विकसित न हो। अगर यह विकसित होता भी है तो एक या दो महीने तक ही टिक पाएगा, क्योंकि इस सर्दी और वसंत में पूर्वी भूमध्य रेखीय प्रशांत महासागर में तापमान गर्म होने की भविष्यवाणी की गई है। दिसंबर के दौरान समुद्र की सतह के तापमान में महत्वपूर्ण बदलाव से इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीका से लेकर ब्राजील के मध्य-दक्षिण तक बारिश हुई है। वहीं अर्जेंटीना, उरुग्वे, दक्षिणी पराग्वे और ब्राजील के सुदूर दक्षिणी हिस्सों में स्थिति सूखे की बन रही है।</p>
<p>वर्ल्ड वेदर के वरिष्ठ कृषि मौसम विज्ञानी ड्रू लेर्नर की इस रिपोर्ट के अनुसार, दिसंबर के अंत में सामान्य से अधिक शुष्क परिस्थितियों ने मिट्टी की ऊपरी सतह को सख्त कर दिया, लेकिन उसके नीचे की परत में नमी के कारण फसलों को ज्यादा नुकसान नहीं हुआ। इसके विपरीत हाल ही बोई गई फसलों में ऊपरी सतह में कम नमी के कारण अंकुरण खराब हो रहा है। ऊपरी सतह में नमी अंकुरण और पौधों के विकास के लिए जरूरी है। इसमें कमी के कारण बुवाई में कुछ देरी भी हो सकती है। मिट्टी की ऊपरी सतह में नमी 31 दिसंबर को सामान्य से कुछ कम जबकि कुछ क्षेत्रों में बहुत कम थी। जनवरी की शुरुआत में गर्मी बढ़ने और बारिश लगभग न होने के कारण सूखे की प्रवृत्ति तेज होने की आशंका थी।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/01/image_750x_6794b3d01e6bc.jpg" alt="" /></p>
<p>जनवरी के मध्य में छिटपुट बारिश और गरज के साथ छींटे पड़ने की संभावना थी। लेकिन ला नीना जैसी स्थितियां बनी रहने के कारण इस महीने के अंत से मिट्टी शुष्क होने और फसलों की स्थिति फिर से बिगड़ने की आशंका अधिक है। वर्ल्ड वेदर को उम्मीद नहीं है कि मौसम में बदलाव लंबे समय तक रहेगा, और जो राहत मिलेगी वह केवल अस्थायी होगी। इस महीने के अंत में ला नीना जैसी परिस्थितियों का अधिक प्रभाव देखने को मिल सकता है, जिससे उत्पादन और फसल स्वास्थ्य पर कुछ दबाव बना रहेगा। &nbsp;</p>
<p>आमतौर पर जब ला नीना सक्रिय होता है तो अर्जेंटीना के पूर्वी हिस्सों, उरुग्वे, दक्षिणी ब्राजील और दक्षिणी पराग्वे में ग्रीष्मकालीन फसलों की पैदावार कम हो जाती है। किसी-किसी साल (विशेषकर जब ला नीना पूरी तरह से विकसित होता है) उत्पादन में भारी गिरावट हो सकती है। हालांकि इस साल स्थिति थोड़ी अलग रहने की संभावना है क्योंकि शुरुआती सीजन में फसल का विकास अत्यंत अनुकूल रहा है और फरवरी में ला नीना जैसी परिस्थितियों के कम होने की संभावना है।</p>
<p>दुर्भाग्यवश, दक्षिण अमेरिकी किसानों के लिए यह राहत तब आएगी जब शुरुआती ग्रीष्मकालीन फसलों का काफी समय बीत चुका होगा। हालांकि, देर से बोई गई फसलों को समय पर बारिश और कम भीषण गर्मी का लाभ मिलेगा, जिससे उनकी पैदावार बेहतर हो सकती है। कुल मिलाकर, दक्षिण अमेरिका में उत्पादन में गिरावट हो सकती है, लेकिन इसका प्रभाव अपेक्षाकृत हल्का होगा। बशर्ते फरवरी में परिस्थितियां अधिक प्रतिकूल न बनें। &nbsp;</p>
<p><strong>सफरीन्हा मक्का पर प्रभाव</strong></p>
<p>दक्षिण अमेरिका में बड़ा प्रभाव सफरीन्हा (दूसरे सीजन) मक्का फसल पर हो सकता है, जो आमतौर पर जनवरी और फरवरी में सोयाबीन की कटाई के बाद बोई जाती है। सफरीन्हा मक्का की कुछ फसलें देर से बोई जा सकती हैं क्योंकि मौसमी बारिश में देरी और शुरुआती सीजन की सोयाबीन की बुवाई में देरी हुई है। इसके अलावा, शुरुआती सीजन की सोयाबीन की कटाई में भी देरी हो सकती है क्योंकि जनवरी के मध्य में ब्राजील के कुछ हिस्सों में अत्यधिक बारिश भी हुई, जो ला नीना जैसी परिस्थितियों का एक और परिणाम है। सफरीन्हा मक्का की बुवाई में देरी के कारण इसका रकबा कम रह सकता है। पूर्ण ला नीना की घटना अक्सर बारिश के मौसम को बढ़ा देती है। ऐसा हुआ तो सफरीन्हा फसलों की देर से बुवाई का प्रभाव उतना गंभीर नहीं होगा।&nbsp;</p>
<p>रिपोर्ट में बताया गया है कि दक्षिण अमेरिका में अक्टूबर के अंत से मौसम की स्थिति आदर्श रही है, लेकिन जनवरी में मुश्किलें बढ़ी हैं। इससे पूर्वी अर्जेंटीना, उरुग्वे, रियो ग्रांडे डो सुल और पराग्वे की गर्मी की फसलों की पैदावार कम हो सकती है। सफरीन्हा फसल पर भी इसका असर पड़ सकता है। हालांकि इसका प्रभाव ज्यादा बुरा नहीं होगा, लेकिन अल्पकालिक मौसम से संबंधित उतार-चढ़ाव से कमोडिटी वायदा की कीमतें बढ़ जाएंगी।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ दक्षिण अमेरिका में ला नीना जैसे हालात का खतरा, कुछ फसलें प्रभावित होने की आशंका ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[वैश्विक चुनौतियों के बावजूद कृषि क्षेत्र के कारण 2025 में भारत की विकास दर मजबूत रहेगीः यूएन रिपोर्ट]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/india-agriculture-sector-key-to-economic-resilience-amid-global-challenges-wesp-2025-report.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 12 Jan 2025 15:14:43 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/india-agriculture-sector-key-to-economic-resilience-amid-global-challenges-wesp-2025-report.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>ऐसे समय जब वैश्विक अर्थव्यवस्था लगातार अनिश्चितताओं का सामना कर रही है, भारत का कृषि क्षेत्र इसकी मजबूत आर्थिक वृद्धि का आधार बना हुआ है। संयुक्त राष्ट्र की &lsquo;वर्ल्ड इकोनॉमिक सिचुएशन एंड प्रॉस्पेक्ट्स 2025&rsquo; (WESP 2025) रिपोर्ट में भारत के अनुमानित 6.6% जीडीपी विकास दर में कृषि की अहम भूमिका को रेखांकित किया गया है। इस विकास दर के साथ भारत की इकोनॉमी 2025 में सभी प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं को पीछे छोड़ देगी। यह खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने, ग्रामीण जीवन स्तर को बढ़ावा देने और वैश्विक व्यापार में योगदान देने की इस क्षेत्र की क्षमता को दर्शाता है।</p>
<p>WESP 2025 रिपोर्ट वैश्विक कृषि के लिए एक चुनौतीपूर्ण तस्वीर पेश करती है। जलवायु परिवर्तन, बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और लंबे समय तक चलने वाले आर्थिक झटके वैश्विक खाद्य प्रणालियों को बाधित कर रहे हैं। वैश्विक मुद्रास्फीति कम हो रही है, लेकिन आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और चरम मौसम की घटनाओं के कारण विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में खाद्य महंगाई बनी हुई है। अपनी विशाल कृषि अर्थव्यवस्था के साथ भारत इन वैश्विक चुनौतियों से प्रभावित भी है और उन्हें समाधान देने की अच्छी स्थिति में भी है। इस क्षेत्र की मजबूती और इनोवेशन खाद्य संकट से निपटने में इसे महत्वपूर्ण बनाती है।</p>
<p><strong>भारतीय कृषि की ताकत</strong><br />भारत का कृषि क्षेत्र मजबूत निर्यात और विविध उत्पादन के दम पर अपनी स्थिरता साबित कर रहा है। रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत चावल, चाय, मसालों और समुद्री उत्पादों का प्रमुख निर्यातक है, जो इसके व्यापार संतुलन में महत्वपूर्ण योगदान करते हैं। अपनी विशाल जनसंख्या के कारण भारत खाद्य कीमतों को स्थिर रखने और आवश्यक वस्तुओं तक पहुंच सुनिश्चित करने की नीतियों को प्राथमिकता देता है। डिजिटल मार्केट प्लेस और उन्नत सिंचाई प्रणाली जैसी प्रौद्योगिकी-आधारित पहल भारतीय किसानों को बाजारों से जोड़ने और उनकी पैदावार में सुधार करने में मदद कर रही हैं।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/01/image_750x_678351a2b7fed.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>जलवायु और महंगाई की चुनौतियां</strong><br />रिपोर्ट कृषि उत्पादकता पर जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न खतरों को भी रेखांकित करती है। अन्य विकासशील देशों की तरह भारत भी अनियमित मानसून और ला नीना जैसे प्रतिकूल मौसम की परिस्थितियों के प्रति संवेदनशील है। इनका 2025 में फसल उत्पादन पर प्रभाव पड़ने की आशंका है। इसके अलावा, खाद्य महंगाई लगातार चिंता का विषय बनी हुई है। भारत सहित आधे से अधिक विकासशील देशों में खाद्य महंगाई 5% से अधिक है, जिससे सबसे कमजोर आबादी के लिए खाद्य पदार्थों पर खर्च गंभीर मुद्दा बना हुआ है।</p>
<p><strong>नीति और निवेश के अवसर</strong><br />जैसा कि रिपोर्ट में कहा गया है, भारत सरकार कृषि क्षेत्र को लक्षित सब्सिडी, बुनियादी ढांचे के विकास और इनोवेशन के माध्यम से समर्थन दे रही है। नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश, विशेष रूप से कृषि से जुड़े क्षेत्रों जैसे सौर ऊर्जा आधारित सिंचाई में, इनपुट लागत को कम करने और टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने में मदद कर रहा है। इसके अतिरिक्त, अंतरराष्ट्रीय व्यापार में सुधार से भारत को अपना निर्यात बढ़ाने का अवसर मिलता है, विशेष रूप से प्रोसेस्ड फूड और ऑर्गेनिक प्रोडक्ट जैसे उच्च मांग वाले क्षेत्रों में।</p>
<p>WESP 2025 रिपोर्ट नवीकरणीय ऊर्जा और प्रौद्योगिकी के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण खनिजों की वैश्विक मांग पर भी जोर देती है। भारत के लिए यह कृषि प्रणालियों को कम ऊर्जा खपत वाले तरीकों, जैसे बैटरी-पावर्ड कोल्ड स्टोरेज और खराब होने वाले उत्पादों के लिए बैटरी आधारित लॉजिस्टिक्स के साथ एकीकृत करने के अवसर प्रस्तुत करता है।</p>
<p><strong>वैश्विक कृषि अर्थव्यवस्था में भारत</strong><br />रिपोर्ट में कहा गया है कि दक्षिण एशिया में भारत की नेतृत्व वाली भूमिका वैश्विक कृषि में इसके बढ़ते प्रभाव को स्पष्ट करती है। 2025 में इस क्षेत्र की अनुमानित 5.7% आर्थिक वृद्धि काफी हद तक भारत के कृषि प्रदर्शन पर निर्भर है। खाद्य सुरक्षा, प्रौद्योगिकी साझा करने और व्यापार समझौतों पर पड़ोसी देशों के साथ सहयोगात्मक प्रयास भारत की स्थिति को एक क्षेत्रीय कृषि केंद्र के रूप में और मजबूत कर सकते हैं।</p>
<p>भारत का कृषि क्षेत्र एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है। WESP 2025 रिपोर्ट जलवायु-लचीली खेती में अधिक निवेश, संसाधनों के समान वितरण और बढ़ती उत्पादन लागत पर अंकुश लगाने वाली नीतियों की आवश्यकता पर जोर देती है। इनोवेशन और सस्टेनेबिलिटी पर ध्यान केंद्रित करके भारत न केवल अपनी आबादी का पेट भरने में बल्कि वैश्विक खाद्य सुरक्षा और व्यापार में योगदान करने में भी नेतृत्व कर सकता है।&nbsp;</p>
<p><strong>भारतीय और वैश्विक अर्थव्यवस्था</strong><br />वैश्विक अर्थव्यवस्था की धीमी गति के बावजूद भारत मजबूत आर्थिक विकास का स्तंभ बना हुआ है। यह वृद्धि घरेलू खपत और निवेश की स्थिरता से प्रेरित है, जो वैश्विक रिकवरी में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करता है। WESP 2025 रिपोर्ट वैश्विक अर्थव्यवस्था की एक मिश्रित तस्वीर पेश करती है। इस वर्ष वैश्विक विकास दर 2023 और 2024 के समान, 2.8% पर स्थिर रहने की संभावना है। हालांकि मुद्रास्फीति में गिरावट है और केंद्रीय बैंकों की तरफ से मौद्रिक नीतियों में राहत दी जा रही है, लेकिन भू-राजनीतिक तनाव, भारी कर्ज का बोझ और जलवायु संबंधी चुनौतियां प्रगति को धीमा कर रही हैं। विकासशील देशों, विशेष रूप से सबसे कम विकसित देशों (LDCs) के लिए, सुधार असमान बना हुआ है, जहां सीमित राजकोषीय संसाधन और ऋण संकट उनकी विकास क्षमता को बाधित कर रहे हैं।</p>
<p>भारत की अर्थव्यवस्था 2025 में 6.6% की मजबूत विकास दर के पूर्वानुमान के साथ अलग नजर आती है। यह प्रदर्शन अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं, जैसे चीन (4.8%) और अमेरिका (1.9%) की धीमी विकास दर के विपरीत है। भारत में बुनियादी ढांचे के विकास और डिजिटल परिवर्तन पर फोकस निवेश को बढ़ावा दे रहा है, जबकि इसका युवा कार्यबल सतत आर्थिक गतिविधियों में योगदान दे रहा है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ वैश्विक चुनौतियों के बावजूद कृषि क्षेत्र के कारण 2025 में भारत की विकास दर मजबूत रहेगीः यूएन रिपोर्ट ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[2024 अब तक का सबसे गर्म साल रहा, WMO ने की पुष्टि]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/2024-confirmed-to-be-the-hottest-year-ever-by-wmo.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 11 Jan 2025 09:59:05 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/2024-confirmed-to-be-the-hottest-year-ever-by-wmo.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>संयुक्त राष्ट्र के विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने (WMO) के अनुसार, वर्ष 2024 एक नए रिकॉर्ड के साथ अब तक का सबसे गर्म साल साबित हुआ है। पिछले साल तापमान को पूर्व-औद्योगिक काल (<span>1850-1900 के औसत तापमान</span>) की तुलना में 1.55 डिग्री सेल्सियस अधिक आंका गया है। 2024 के साथ ही रिकॉर्डतोड़ तापमान का एक दशक पूरा हुआ।</p>
<p>यूएन मौसम विज्ञान एजेंसी की प्रवक्ता क्लेयर नुलिस ने बताया कि 2024 के दौरान, भूमि व समुद्री सतह पर और महासागरों का तापमान भी असाधारण रूप से अधिक दर्ज किया गया। इसके साथ ही, दुनिया भर में अनेक देश चरम मौसम घटनाओं से प्रभावित हुए, और ज़िन्दगियों, आजीविकाओं, उम्मीदों और सपनों को नुकसान पहुँचा।</p>
<p><a href="https://public.wmo.int/en" class="ext" data-extlink="" target="_blank" rel="noopener noreferrer" title="(opens in a new window)">WMO</a> प्रवक्ता नुलिस ने बताया कि जलवायु परिवर्तन के अनेक प्रभावों की वजह से समुद्र में जमे हुए हिमनदों का आकार घटा। &ldquo;यह एक असाधारण वर्ष था।&rdquo; विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने अपने विश्लेषण के लिए छह अन्तरराष्ट्रीय डेटासेट का अध्ययन किया जिनमें से चार में पिछले वर्ष वैश्विक औसत तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस अधिक होने की बात कही गई।</p>
<h2>जलवायु समझौते पर दबाव</h2>
<p>वर्ष 2015 के पेरिस समझौते में वैश्विक तापमान में वृद्धि को पूर्व औद्योगिक काल की तुलना में 2℃ से नीचे रखने और 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने का लक्ष्य है। यूएन एजेंसी के अनुसार, पेरिस समझौता अभी खत्म नहीं हो गया है, मगर इस पर गम्भीर खतरा है। इसके तहत, तापमान में दीर्घकालिक वृद्धि के रुझान को वर्षों के बजाय दशकों में मापा जाता है।&nbsp;</p>
<p>WMO की महासचिव सेलेस्त साउलो ने कहा कि जलवायु इतिहास हमारी आँखों के सामने घटित हो रहा है। हमने एक या दो रिकॉर्ड ध्वस्त करने वाले साल नहीं देखे हैं, बल्कि सिलसिलेवार ढंग से 10 साल ऐसे गुजरे हैं। उन्होंने कहा कि यह समझना अहम है कि तापमान बढ़ने की डिग्री का हर एक अंश मायने रखता है, चूँकि वैश्विक तापमान में मामूली वृद्धि से भी हमारे जीवन, अर्थव्यवस्था और पृथ्वी पर असर होता है.</p>
<h2>कैलिफोर्निया के जंगलों में आग</h2>
<p>संयुक्त राज्य अमेरिका के कैलिफोर्निया प्रान्त के जंगलों और शहरी इलाकों में धधकी आग से अभूतपूर्व बर्बादी हुई है।&nbsp;यूएन विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण ऐसी घटनाएं और गम्भीर रूप धारण कर लेती हैं, चूंकि साल में शुष्क, गर्म, तेज़ हवाओं वाले दिन बढ़ जाते हैं।&nbsp;</p>
<p>संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने विश्व मौसम संगठन के निष्कर्षों पर चिंता जताई और इसे वैश्विक तापमान वृद्धि का एक और सबूत बताया है। उन्होंने सभी सरकारों से इस वर्ष नई राष्ट्रीय जलवायु कार्रवाई योजनाएं प्रस्तुत करने का आग्रह किया, ताकि दीर्घकालिक वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखा जा सके - और विनाशकारी जलवायु प्रभावों से निपटने में सबसे कमजोर देशों की सहायता की जा सके।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ 2024 अब तक का सबसे गर्म साल रहा, WMO ने की पुष्टि ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[अनाज और चीनी की कीमतें घटने से 2024 का फूड प्राइस इंडेक्स नीचे आया, वनस्पति तेल और डेयरी के दाम बढ़े]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/cereal-and-sugar-prices-bring-fao-food-price-index-for-2024-down-but-vegetable-oil-and-dairy-prices-up.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 05 Jan 2025 17:24:39 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/cereal-and-sugar-prices-bring-fao-food-price-index-for-2024-down-but-vegetable-oil-and-dairy-prices-up.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>दिसंबर में विश्व खाद्य वस्तुओं की कीमतों का इंडेक्स पिछले महीने की तुलना में गिरा। इसमें मुख्य योगदान अंतरराष्ट्रीय चीनी कीमतों में गिरावट का रहा। यह जानकारी संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) ने दी है। एफएओ का फूड प्राइस इंडेक्स दिसंबर में 127.0 अंक पर रहा, जो नवंबर से 0.5 प्रतिशत कम और दिसंबर 2023 की तुलना में 6.7 प्रतिशत अधिक है। साल 2024 के लिए, यह इंडेक्स औसतन 122.0 अंक पर रहा, जो 2023 के औसत मूल्य से 2.1 प्रतिशत कम है। अनाज और चीनी की कीमतों में बड़ी गिरावट आई, लेकिन वनस्पति तेल, डेयरी और मांस की कीमतों में बढ़ोतरी हुई। &nbsp;&nbsp;</p>
<p>एफएओ का अनाज का सीरियल प्राइस इंडेक्स दिसंबर में नवंबर की तुलना में लगभग समान रहा, लेकिन एक साल पहले के स्तर से 9.3 प्रतिशत कम था। मक्का की कीमतों में मामूली वृद्धि ने गेहूं की कीमतों में गिरावट को संतुलित किया। 2024 में FAO का अनाज का प्राइस इंडेक्स औसतन 113.5 अंक पर रहा, जो 2023 के स्तर से 13.3 प्रतिशत कम है। यह 2022 के रिकॉर्ड स्तर से लगातार दूसरी वार्षिक गिरावट है। FAO का ऑल राइस प्राइस इंडेक्स 2023 के औसत स्तर से 0.8 प्रतिशत बढ़ा और 16 वर्षों के उच्चतम स्तर पर रहा। &nbsp;</p>
<p>एफएओ का वनस्पति तेलों का प्राइस इंडेक्स दिसंबर में नवंबर की तुलना में 0.5 प्रतिशत गिरा, लेकिन एक साल पहले के स्तर से 33.5 प्रतिशत अधिक था। पूरे 2024 के लिए FAO का वेजिटेबल ऑयल प्राइस इंडेक्स 2023 की तुलना में औसतन 9.4 प्रतिशत अधिक रहा। वैश्विक आपूर्ति में कमी के कारण इसमें बढ़ोतरी दर्ज की गई। &nbsp;</p>
<p>एफएओ का डेयरी प्राइस इंडेक्स सात महीनों की लगातार वृद्धि के बाद गिरा है। यह नवंबर की तुलना में 0.7 प्रतिशत कम हुआ, लेकिन फिर भी दिसंबर 2023 के स्तर से 17.0 प्रतिशत अधिक रहा। पूरे 2024 में एफएओ का डेयरी प्राइस इंडेक्स 2023 की तुलना में औसतन 4.7 प्रतिशत अधिक रहा। इसका मुख्य कारण मक्खन की कीमतों में तेज वृद्धि है। &nbsp;</p>
<p>एफएओ के शुगर प्राइस इंडेक्स में गिरावट आई है। नवंबर की तुलना में यह 5.1 प्रतिशत कम हुआ। मुख्य उत्पादक देशों में गन्ने की फसल बेहतर होने की संभावनाओं के कारण इसमें गिरावट आई। दिसंबर 2023 की तुलना में इसके दाम 10.6 प्रतिशत कम रहे। पूरे 2024 के लिए FAO का शुगर प्राइस इंडेक्स 2023 की तुलना में औसतन 13.2 प्रतिशत कम रहा।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/11/image_750x500_65534ef10b9b0.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ अनाज और चीनी की कीमतें घटने से 2024 का फूड प्राइस इंडेक्स नीचे आया, वनस्पति तेल और डेयरी के दाम बढ़े ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/11/image_750x500_65534ef10b9b0.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[अमेरिका की नई सत्ता और भारत पर उसका असर]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/india-and-the-new-american-global-order.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 05 Jan 2025 11:04:49 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/india-and-the-new-american-global-order.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>आने वाले ट्रंप प्रशासन की वैश्विक मामलों की दृष्टि के केंद्र में चीन का सामना करते हुए 21वीं सदी में अमेरिकी वर्चस्व बनाए रखने की इच्छा है। चीन को कुछ दशकों से अमेरिका का मुख्य सैन्य और आर्थिक प्रतिद्वंद्वी माना जा रहा है। भारत, एशिया में अमेरिका के एक रणनीतिक सहयोगी के रूप में तेजी से उभर रहा है। इस बात की पूरी संभावना है कि ट्रंप के "अमेरिका फर्स्ट" के बैनर तले विश्व व्यवस्था को फिर से आकार देने के प्रयासों में भारत को एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का मौका दिया जाएगा। हालांकि, ट्रंप प्रशासन के लिए समस्या यह है कि भारत और कई अन्य देश, जिन्हें अमेरिका का सहयोगी माना जाता है, अब भी बीजिंग के साथ किसी व्यापार युद्ध या रणनीतिक संघर्ष में शामिल होने को लेकर आशंकित हैं।&nbsp;</p>
<p>हालांकि अमेरिका की तरह यह देश भी मानते हैं कि उन्हें चीन द्वारा निर्मित विशाल अतिरिक्त उत्पादन क्षमता से खुद को बचाने के उपाय करने की आवश्यकता है, जिसके माध्यम से चीन वैश्विक बाजारों में अपने उत्पादों की बाढ़ ला रहा है। यह स्थिति वैश्विक व्यापार व्यवस्था के लिए पहले से कहीं अधिक खतरा पैदा कर रही है।</p>
<p><strong>चीन की अत्यधिक उत्पादन क्षमता विश्व के लिए सिरदर्द</strong></p>
<p>इस समस्या की जड़ यह है कि चीन अपनी घरेलू और विदेशी बाजारों की मांग से कहीं अधिक मात्रा में सामान का उत्पादन कर रहा है। इसकी वजह से दुनियाभर में बड़े पैमाने पर फैक्ट्रियों के बंद होने और भारी नुकसान की स्थिति पैदा हो गई है। अमेरिका लंबे समय से इस मुद्दे पर चीन की आलोचना करता आ रहा है। अमेरिकी वित्त मंत्री जेनेट येलेन ने हाल ही में चेतावनी दी कि चीन विश्व के लिए "इतना बड़ा हो गया है कि बाकी दुनिया उसकी विशाल उत्पादन क्षमता को नहीं संभाल सकती।" भारत ने भी अपनी चिंताएं व्यक्त की हैं, विशेष रूप से स्टील, इलेक्ट्रॉनिक्स और सोलर पैनल के बाजारों में चीनी अतिरिक्त उत्पादन के प्रभाव को लेकर। सिर्फ स्टील के क्षेत्र में ही देखें तो 2000 के दशक की शुरुआत तक, चीन का सरप्लस अमेरिका, जर्मनी और जापान के संयुक्त उत्पादन से अधिक था। 2020 के दशक तक, चीन कोयला और एल्युमिनियम से लेकर इलेक्ट्रिक वाहन बैटरी और रोबोट तक के क्षेत्रों में अत्यधिक उत्पादन करने लगा था, जिससे वैश्विक बाजारों में विकृतियां पैदा हो रही थीं।&nbsp;</p>
<p><strong>अमेरिका का टैरिफ हमला</strong></p>
<p>ट्रंप प्रशासन का चीन द्वारा अपने प्रतिद्वंद्वियों को कम कीमत पर सामान बेचने से निपटने का तरीका अक्सर टैरिफ (शुल्क) रहा है जो हमेशा प्रभावी साबित नहीं हुआ। अपने पहले कार्यकाल के दौरान, ट्रंप ने कई चीनी वस्तुओं पर 10% से 25% तक टैरिफ लगाए। चाइना इंटरनेशनल कैपिटल कॉर्प (CICC) के अनुसार, टैरिफ से अमेरिका को चीन के निर्यात में 5.5% की कमी आई और चीन की जीडीपी वृद्धि दर लगभग एक प्रतिशत घट गई। यदि ट्रंप अपने दूसरे कार्यकाल में चीनी सामान पर 60% टैरिफ लगाने की धमकी को पूरा करते हैं, तो चीन की निर्यात वृद्धि दर में 2.6 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है और जीडीपी वृद्धि दर में 0.3 प्रतिशत तक की गिरावट हो सकती है।&nbsp;</p>
<p>हाल ही में अमेरिका ने स्वच्छ ऊर्जा उत्पादों में चीन के प्रभुत्व का जवाब दोतरफा दृष्टिकोण से दिया है- चीनी आयात पर अधिक टैरिफ लगाकर और इन्फ्लेशन रिडक्शन एक्ट के माध्यम से घरेलू निवेश को बढ़ावा देकर। जहां टैरिफ का उद्देश्य सोलर पैनल और इलेक्ट्रिक वाहन जैसे चीनी सामानों के आयात को सीमित करना है, वहीं इन्फ्लेशन रिडक्शन एक्ट स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा देकर अमेरिकी स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र को प्रतिस्पर्धी बनाने की कोशिश करता है। हालांकि, यह दोहरी रणनीति अमेरिका में चीन की तरह राज्य समर्थित औद्योगिक विकास मॉडल को दोहराने का जोखिम पैदा करती है, जिससे वैश्विक बाजारों में और अधिक अस्थिरता आ सकती है।</p>
<p>भारत और अमेरिका के अन्य सहयोगी देशों के लिए समस्या यह है कि ट्रंप, चीन को निशाना बनाने के साथ-साथ उन सभी देशों को भी निशाना बना सकते हैं, जिनका अमेरिका के साथ व्यापार अधिशेष है। भारत इस सूची में 11वें स्थान पर है, जो वाशिंगटन के साथ व्यापार में सरप्लस का लाभ उठा रहा है। ट्रंप पहले ही अपने चुनावी भाषण में भारत को अमेरिकी उत्पादों पर "सबसे बड़ा कर लगाने वाला" देश करार दे चुके हैं। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि 2023-24 में भारत-अमेरिका के बीच वस्तु व्यापार लगभग 120 अरब अमेरिकी डॉलर था।</p>
<p>अमेरिका उन कुछ देशों में से एक है, जिनके साथ भारत का व्यापार घाटा नहीं है, बल्कि एक महत्वपूर्ण व्यापार अधिशेष है। भारत पर कृषि उत्पादों, प्रसंस्कृत खाद्य और पेय पदार्थ, ऑटोमोबाइल और तकनीकी उपकरणों पर शुल्क कम करने के लिए भारी दबाव पड़ने की संभावना है। इसके अलावा, अमेरिका यह मांग कर सकता है कि भारत अमेरिकी पेटेंट की सुरक्षा सुनिश्चित करे और दुनिया में जेनेरिक दवाओं के निर्यात को सीमित करे।&nbsp;</p>
<p>अमेरिका पहले ही कई वस्तुओं पर काफी टैरिफ लगा चुका है, जैसे डेयरी उत्पादों पर 188 प्रतिशत, अनाज और खाद्य उत्पादों पर 193 प्रतिशत तथा तेल और तिलहन पर 164 प्रतिशत। भारत द्वारा शुल्क कम न करने पर अमेरिका और सख्त कदम उठा सकता है। इसका हल निश्चित रूप से एक व्यापार समझौते के रूप में हो सकता है, जिसमें दोनों पक्ष टैरिफ कम करने पर सहमत हों।</p>
<p><strong>क्या अमेरिका भारत को अपने साथ रखेगा?</strong></p>
<p>नए ट्रंप प्रशासन का यह प्रयास भी होगा कि भारत को चीन का मुकाबला करने के लिए नए व्यापार और आपूर्ति श्रृंखला साझेदारियों में शामिल किया जाए। यह वास्तव में दिल्ली के लिए लाभकारी साबित हो सकता है। हालांकि ऐसे कदमों से लाभ उठाने की हमारी क्षमता सीमित है। भारत अपनी घरेलू मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों की प्रतिस्पर्धी क्षमता को लेकर चिंतित है, और इसलिए उसने प्रमुख वैश्विक व्यापार समझौतों में शामिल होने से परहेज किया है। उदाहरण के लिए, जब भारत में कुछ लोग चीन से अमेरिका के अलग होने से लाभ की उम्मीद कर रहे थे, असल में यह लाभ अन्य देशों- वियतनाम, ताइवान, मेक्सिको और कनाडा को मिला। भारत का अमेरिका को निर्यात केवल मामूली रूप से बढ़ा (2018 से 2023 तक 54%)। भारत का अमेरिका को वस्तु निर्यात 2023 में 83.77 अरब डॉलर पहुंचा, जबकि मेक्सिको का निर्यात 475.6 अरब डॉलर और वियतनाम का निर्यात 114.44 अरब डॉलर हो गया।</p>
<p>अमेरिका भारत को एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करने के लिए एक प्राकृतिक सहयोगी मानता है, फिर भी उसे भारत की तटस्थ स्थिति को लेकर चिंता है, खासकर भारत और चीन के बीच चल रही सीमा वार्ताओं को देखते हुए। ऐसे समय जब भारत ने चीन के साथ सैन्य तनाव को कम करने के लिए समझौते किए हैं, कुछ अमेरिकी पर्यवेक्षकों को लगता है कि ये समझौते दोनों एशियाई दिग्गजों के बीच एक शांतिपूर्ण संवाद की ओर बढ़ सकते हैं। फिर भी, भारत और अमेरिका के बीच संबंध हाल के वर्षों में मजबूत हुए हैं, विशेष रूप से क्वाड जैसी पहल के माध्यम से, जो अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत के बीच एक सुरक्षा संवाद है।</p>
<p>ट्रंप संभवतः क्वाड को फिर से सक्रिय करने को प्राथमिकता देंगे, लेकिन इसके साथ ही अमेरिका ने भारत समेत कुछ क्वाड सदस्य देशों की धीमी प्रतिक्रिया को लेकर निराशा भी व्यक्त की है। इस समस्या को हल करने के लिए अमेरिका ने इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर त्रिपक्षीय सुरक्षा समझौते की समानांतर रक्षा रणनीति अपनाई है। इसका उद्देश्य चीन की बढ़ती ताकत का मुकाबला करना है। हालांकि, भारत अपनी रणनीतिक स्थिति के कारण मलक्का जलडमरूमध्य, होर्मुज जलडमरूमध्य और स्वेज नहर जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गो को नियंत्रित करने में किसी भी देश के लिए एक अनमोल सहयोगी बन सकता है, खासकर वे देश जो इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में प्रभाव हासिल करना चाहते हैं। इसलिए ट्रंप शायद अपने दोस्त, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अपनी दोस्ती जारी रख सकते हैं।</p>
<p><em><strong>(जयंत राय चौधुरी प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया के पूर्व स्थानीय संपादक हैं )</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ अमेरिका की नई सत्ता और भारत पर उसका असर ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[इंडोनेशिया को 10 लाख टन चावल निर्यात को कैबिनेट की मंजूरी, खुले बाजार से होगी खरीद]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/cabinet-approves-export-of-1-million-tonnes-of-rice-to-indonesia-procurement-will-be-from-open-market.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 02 Jan 2025 17:29:57 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/cabinet-approves-export-of-1-million-tonnes-of-rice-to-indonesia-procurement-will-be-from-open-market.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत सरकार ने इंडोनेशिया को 10 लाख टन गैर-बासमती चावल निर्यात के लिए समझौता करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। बुधवार को आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति (सीसीईए) की बैठक में यह निर्णय लिया गया। इस फैसले के तहत इंडोनेशिया को 10 लाख टन गैर-बासमती चावल के निर्यात के लिए भारत सरकार के सहकारिता मंत्रालय और इंडोनेशियाई सरकार की मिनिस्ट्री ऑफ ट्रेड के बीच एक समझौता (एमओयू) किया जाएगा।&nbsp;</p>
<p>सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, सहकारिता मंत्रालय की ओर से निर्यात का जिम्मा राष्ट्रीय सहकारी निर्यात लिमिटेड (एनसीईएल) का होगा जबकि इंडोनेशिया की मिनिस्ट्री ऑफ ट्रेड की ओर से चावल आयात की जिम्मेदारी राष्ट्रीय खरीद एजेंसी BULOG को दी गई है। चावल के निर्यात पर प्रतिबंध के दौरान भी भारत सरकार ने एनसीईएल के माध्यम से परमिट प्रणाली के तहत मित्र देशों को चावल निर्यात किया था। यह राष्ट्रीय स्तर पर गठित तीन नई सहकारी समितियों में से एक है। एनसीईएल द्वारा चावल निर्यात के लिए कमर्शियल टर्म पर काम किया जाएगा और इसकी खरीद खुले बाजार से की जाएगी।</p>
<p>उल्लेखनीय है कि इंडोनेशिया को 10 लाख टन गैर-बासमती चावल निर्यात के लिए एनसीईएल केंद्र सरकार के बफर स्टॉक की बजाय खुले बाजार से चावल की खरीद करेगी। भारत सरकार ने जुलाई, 2023 में चावल की बढ़ती कीमतों को देखते हुए गैर-बासमती सफेद चावल के निर्यात पर रोक लगा दी थी। यह प्रतिबंध सितंबर, 2024 में हटा लेकिन 490 डॉलर प्रति टन का न्यूनतम निर्यात मूल्य (एमईपी) लागू कर दिया था। आखिरकार अक्टूबर में चावल निर्यात पर सभी पाबंदियां हटाई गईं।&nbsp;</p>
<p>विश्व के सबसे बड़े चावल निर्यातक भारत के इस कदम से वैश्विक बाजार में चावल की कीमतों में 10 फीसदी से अधिक की गिरावट आई थी। हालांकि, नवंबर के बाद कीमतों में सुधार हुआ है। इस साल अच्छे मानसून के कारण भारत में धान की बंपर पैदावार हुई। खरीफ सीजन 2024-25 में देश में चावल उत्पादन 11.99 करोड़ टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने का अनुमान है। जबकि खरीफ सीजन 2023-24 में चावल उत्पादन 11.32 करोड़ टन चावल तक पहुंच गया था। फिलहाल सरकारी गोदामों में चावल का पर्याप्त बफर स्टॉक है, और खुदरा कीमतें भी नियंत्रण में हैं। ऐसे में इंडोनेशिया को 10 लाख टन गैर-बासमती चावल का निर्यात देश के चावल कारोबार के लिए अच्छी खबर है। &nbsp;&nbsp;</p>
<p><strong>इंडोनेशिया के चावल उत्पादन में कमी&nbsp;</strong></p>
<p><strong>रूरल वॉयस</strong> ने 29 अक्टूबर को <a href="https://eng.ruralvoice.in/international/indonesia-plans-to-import-1-million-tons-of-rice-from-india-as-harvest-delays.html"><strong>खबर</strong></a> प्रकाशित की थी कि इंडोनेशिया 2025 में भारत से 10 लाख टन टन चावल आयात करने पर विचार कर रहा है। इंडोनेशिया में कम बारिश के कारण धान की फसल में देरी हो रही है और उत्पादन में गिरावट का अनुमान है। वर्ष 2024 में इंडोनेशिया के चावल उत्पादन में पिछले वर्ष की तुलना में 2.43% की गिरावट का अनुमान है। इंडोनेशिया की सरकारी खरीद एजेंसी BULOG ने शुरुआत में 3.40 लाख टन चावल आयात के लिए निविदा में केवल थाईलैंड, कंबोडिया, वियतनाम या पाकिस्तान से आपूर्ति की अनुमति दी थी। मगर, बाद में विस्तारित रणनीति के तहत भारत से चावल आयात का निर्णय लिया।&nbsp;</p>
<p><a href="https://eng.ruralvoice.in/international/indonesia-plans-to-import-1-million-tons-of-rice-from-india-as-harvest-delays.html"><strong>Indonesia plans to import 1 million tons of rice from India as harvest delays</strong></a></p>
<p><strong></strong></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/01/image_750x500_6776810973354.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ इंडोनेशिया को 10 लाख टन चावल निर्यात को कैबिनेट की मंजूरी, खुले बाजार से होगी खरीद ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[ट्रंप के आने से विश्व कृषि बाजार में उथल&amp;#45;पुथल की आशंका, 2025 में नई व्यापार व्यवस्था संभव]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/trumps-return-may-shake-global-agricultural-markets-in-2025-new-trade-order-likely.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 29 Dec 2024 10:22:42 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/trumps-return-may-shake-global-agricultural-markets-in-2025-new-trade-order-likely.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अंतरराष्ट्रीय कृषि बाजार के लिए 2024 प्रमुख अनाज, तिलहन और चीनी की कीमतों में गिरावट का साल रहा। इसके विपरीत कोको, कॉफी और पाम ऑयल जैसी उष्णकटिबंधीय फसलों के दाम में बढ़ोतरी हुई। इसी पृष्ठभूमि के साथ दुनियाभर के किसान नए साल में प्रवेश करेंगे। उनके सामने जलवायु परिवर्तन के साथ भूराजनीतिक अनिश्चितता का जोखिम भी रहेगा। तीन-चार दशक के वैश्वीकरण के दौर के बाद अब दुनिया आर्थिक और राजनीतिक रूप से डी-ग्लोबलाइजेशन की ओर जाने लगी है। वर्ष 2024 में इसकी गति बढ़ी और आने वाले समय में इसके और बढ़ने के आसार हैं। कुछ विशेषज्ञ अमेरिका में ट्रंप की जीत को वैश्वीकरण का अंत भी मान रहे हैं।</p>
<p><strong>विश्व कृषि व्यापार पर ट्रंप का असर</strong><br />दुनिया की इकोनॉमी में करीब एक-चौथाई हिस्सेदारी रखने वाले अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी के डोनाल्ड ट्रंप 20 जनवरी को दूसरी बार राष्ट्रपति पद की शपथ लेंगे। जिस तरह उन्होंने तमाम देशों पर टैरिफ लगाने की चेतावनी लगातार दी है, उसके जवाब में दूसरे देश भी टैरिफ लगा सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए किसानों का मार्जिन घट सकता है। अमेरिका ने 2023 में 195 अरब डॉलर मूल्य के कृषि उत्पादों का आयात किया था, जिनमें फल और सब्जियां, चीनी, चीज, वनस्पति तेल, कॉफी और कोको शामिल हैं।</p>
<p>विशेषज्ञ मान रहे हैं कि ट्रंप के पहले 100 दिनों में सभी आयातित वस्तुओं पर 5% से 10% तक शुल्क लगेगा। चीन से आयात पर यह दर 60% तक हो सकती है। जाहिर है कि ऐसे में अमेरिका के खिलाफ भी जवाबी टैरिफ लगाए जाएंगे। चीन, अमेरिकी कृषि उत्पादों का बड़ा खरीदार है। वर्ष 2023 में अमेरिका ने कुल 34 अरब डॉलर का कृषि निर्यात किया था, जिसमें 19% चीन ने खरीदा। विशेषज्ञों का कहना है कि चीन के साथ टैरिफ वार के कारण अमेरिका का कृषि निर्यात 2025 में घटकर आधा रह जाएगा। चीन दूसरे देशों से आयात बढ़ा रहा है, इससे पिछले दो वर्षों में अमेरिकी कृषि आय में 37% की गिरावट आई है।</p>
<p>चीन के जवाबी टैरिफ से अमेरिका का सोयाबीन निर्यात प्रभावित होगा। कृषि उपज के तौर पर अमेरिका से चीन सबसे अधिक सोयाबीन ही खरीदता है। पिछले एक साल के दौरान सोयाबीन की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में 25% तक गिरी हैं। चीन के कदम से अमेरिकी सोया किसानों को और नुकसान होगा। वैसे, अगर अमेरिका और यूरोपियन यूनियन (ईयू) के बीच व्यापार समझौता हुआ तो ईयू, दक्षिण अमेरिका के बजाय अमेरिका से सोयाबीन और सोयामील का आयात कर सकता है।</p>
<p>अमेरिका-चीन ट्रेड वार का सबसे अधिक फायदा ब्राजील को मिल सकता है। भूराजनीतिक कारणों से ब्राजील कई देशों को अमेरिका से ज्यादा मक्का निर्यात करने लगा है। वैश्विक गेहूं बाजार में रूस बड़ा सप्लायर बन गया है और कीमतों पर भी उसका नियंत्रण है। कभी अमेरिका के कृषि उत्पादों का सबसे बड़ा खरीदार चीन था। लेकिन ट्रंप-1 के समय टैरिफ लगाए जाने के बाद वह दक्षिण अमेरिकी देशों और रूस से बड़ी मात्रा में अनाज और सोयाबीन खरीदने लगा है। विशेषज्ञों का कहना है कि चीन कीमतों की परवाह किए बिना सप्लाई सुरक्षित कर रहा है। आगे भी कृषि व्यापार भूराजनीति से प्रभावित रहेगा और अमेरिका के निर्यात में कमी आएगी।</p>
<p><strong>ट्रंप के पहले कार्यकाल में क्या हुआ था</strong><br />ट्रंप ने 2018 में जब चीन पर टैरिफ लगाया तो चीन ने भी जवाबी टैरिफ लगाया था। तब चीन के सोयाबीन आयात में अमेरिका का हिस्सा 40% से घटकर 18% रह गया था। उस दौरान ब्राजील की हिस्सेदारी 46% से बढ़कर 76% हो गई। चीन ने अर्जेंटीना, यूक्रेन और ऑस्ट्रेलिया से भी सोया खरीद बढ़ाई है। इस बार भी चीन हो सकता है कृषि उत्पादों को निशाना बनाए।</p>
<p>कोलंबिया ग्रेन इंटरनेशनल (CGI) के सीईओ जेफ वैन पीवेनेज ने वर्ल्ड ग्रेन पत्रिका को बताया कि गेहूं, मक्का और सोया बिजनेस से जुड़े सभी लोग टैरिफ को लेकर चिंतित हैं। चीन ने 2019 में अमेरिका पर जवाबी टैरिफ लगाए थे तो उसका अमेरिकी निर्यात पर बहुत असर पड़ा था। ट्रंप के समय चीन के खिलाफ लगाए गए शुल्क बाइडन प्रशासन के दौरान भी लागू रहे, लेकिन चीन ने अपनी कार्रवाई आगे नहीं बढ़ाई। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि छह महीने तक दोनों देशों के बीच बातचीत होगी। तब तक यथास्थिति बनी रहेगी। हालांकि इस समय चीन के पास रिकॉर्ड सोयाबीन है। इसका फायदा वह बातचीत में उठाने की कोशिश करेगा।&nbsp;</p>
<p><strong>जी-7 बनाम ब्रिक्स</strong><br />नई विश्व व्यवस्था में राजनीतिक और आर्थिक शक्तियों की दो धुरी बन रही हैं। एक तरफ जी-7 देश हैं तो दूसरी तरफ ब्रिक्स देश। खास बात यह है कि ब्रिक्स देशों का दबदबा तेजी से बढ़ रहा है। विकसित देश अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान और इंग्लैंड के नेतृत्व वाले जी-7 की इकोनॉमी विश्व जीडीपी का 30% है। दूसरी तरफ ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका की अगुवाई वाले ब्रिक्स देशों की इकोनॉमी विश्व जीडीपी के 32% तक पहुंच गई है। संगठन के विस्तार के साथ इसके और बढ़ने की संभावना है।</p>
<p>रूस के कजान में आयोजित पिछले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में रूस ने नया अंतरराष्ट्रीय अनाज वायदा एक्सचेंज बनाने का प्रस्ताव रखा था। इसके बनने और कारोबार शुरू होने में समय लगेगा, लेकिन ये देश पश्चिमी बाजारों पर निर्भरता कम करना चाहते हैं। विश्व कृषि व्यापार में इन देशों की हिस्सेदारी बड़ी होने के बावजूद कोई अंतरराष्ट्रीय एक्सचेंज इन देशों में नहीं है। दुनिया का 44% अनाज उत्पादन और खपत ब्रिक्स देशों में होता है। वैश्विक अनाज निर्यात में इन देशों की 25% हिस्सेदारी है। इन देशों का चावल निर्यात में 39%, गेहूं निर्यात में 33% और मक्का निर्यात में 23% हिस्सा है।&nbsp;</p>
<p>ध्रुवीय भूराजनीतिक परिस्थितियों में अमेरिका और यूरोपियन यूनियन को इनपुट का भी नुकसान उठाना पड़ सकता है। उर्वरक में इस्तेमाल होने वाले नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश का ज्यादा उत्पादन ब्रिक्स देश ही करते हैं। जी-7 देशों के पास फॉस्फोरस की उपलब्धता तो बहुत कम है।&nbsp;</p>
<p><strong>व्यापार संबंधों में बदलाव संभव</strong><br />राबो बैंक ने &lsquo;ट्रंप 2.0: वैश्विक खाद्य और कृषि पर प्रभाव&rsquo; शीर्षक से प्रकाशित रिपोर्ट में लिखा है कि ट्रंप के नीतिगत बदलाव वैश्विक खाद्य और कृषि व्यापार के लिए एक जटिल परिदृश्य तैयार करेंगे। इन नीतियों से मौजूदा व्यापार संबंधों में बदलाव आएगा और उपभोक्ताओं तथा बिजनेस का खर्च बढ़ सकता है। महंगाई तो बढ़ेगी ही, उपभोक्ता व्यवहार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था में भी परिवर्तन संभव है। यह सब इस बात पर निर्भर करेगा कि ट्रंप कितना टैरिफ लगाते हैं। उसी पर दूसरे देशों का जवाबी टैरिफ भी निर्भर करेगा।&nbsp;</p>
<p>राबो बैंक के एक्जीक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट स्टीफन निकोलसन ने एक इंटरव्यू में कहा, ट्रंप ने पहले कार्यकाल में सीखा है, और वे जानते हैं कि काम कैसे होगा। वे अपने प्रशासन में उन लोगों को लाएंगे जो मुख्यधारा के रिपब्लिकन नहीं हैं, लेकिन उनके और उनकी नीतियों के प्रति वफादार हैं। अपने पहले कार्यकाल में चीन के साथ व्यापार युद्ध के दौरान ट्रंप ने किसानों को हुए नुकसान की भरपाई की थी। इस बार शायद वे ऐसा न करें क्योंकि अब उन्हें चुनाव में नहीं जाना है।</p>
<p>ट्रंप ने अपनी पूर्व सहायक ब्रुक रोलिंस को अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) का नेतृत्व करने के लिए चुना है। रोलिंस अभी अमेरिका फर्स्ट पॉलिसी इंस्टीट्यूट की प्रेसिडेंट और सीईओ हैं। इस थिंक टैंक को 2021 में ट्रंप की पब्लिक पॉलिसी को प्रमोट करने के लिए स्थापित किया गया था। टेक्सास ए एंड एम यूनिवर्सिटी से एग्रीकल्चरल डेवलपमेंट की पढ़ाई करने वाली रोलिंस ट्रंप के पहले कार्यकाल में भी प्रशासन में रह चुकी हैं।</p>
<p>अंतरराष्ट्रीय कृषि उद्योग के लिए एक और चिंता अमेरिका, मेक्सिको और कनाडा के बीच समझौता (USMCA) है। इस पर दो साल में फिर से बातचीत होनी है। मेक्सिको और कनाडा अमेरिका के दो सबसे बड़े व्यापारिक साझेदार हैं।</p>
<p>यूरोप से अमेरिका को निर्यात को देखें तो कुछ वस्तुओं पर टैरिफ का मामूली असर होगा, जबकि कुछ वस्तुओं पर असर ज्यादा हो सकता है। यूरोपीय निर्यातक टैरिफ के कारण बढ़ने वाली लागत का कुछ हिस्सा खुद वहन करने की स्थिति में हैं। लेकिन यदि अमेरिका ने 20% टैरिफ लगाया या दूसरी नॉन-टैरिफ बाधाएं खड़ी कीं, तो यूरोपीय निर्यातकों के लिए स्थिति बिल्कुल अलग होगी।</p>
<p><strong>भारत का प्रभाव</strong><br />भारत की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है और यहां गेहूं की कीमतें ऊंची हैं। वर्ल्ड ग्रेन पत्रिका ने लिखा है कि शिकागो में गेहूं की कीमत 5.8 डॉलर प्रति बुशल है जबकि भारत में इसकी कीमत 9 डॉलर है। इसलिए इस साल या अगले साल संभव है कि भारत गेहूं आयात को मंजूरी दे। भारत में खाद्य की बढ़ती मांग के कारण भी आयात का दबाव बन सकता है। भारत बड़े स्तर पर गेहूं आयात कर सकता है और इस तरह अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो सकती है।</p>
<p><strong>कृषि के लिए अन्य चुनौतियां</strong><br />उपकरण, ईंधन, उर्वरक और रसायनों के दाम बढ़ने से किसानों की उत्पादन लागत बढ़ रही है। वैश्विक अनाज व्यापार की मात्रा में भी गिरावट आने की उम्मीद है। आईजीसी ने 2024-25 के लिए 41.9 करोड़ टन अनाज व्यापार का अनुमान लगाया है, जो 2023-24 में 45.5 करोड़ टन था। जलवायु परिवर्तन भी वैश्विक अनाज बाजार में अनिश्चितता बढ़ा रहा है। प्रमुख उत्पादन क्षेत्र चरम मौसम घटनाओं से प्रभावित हो रहे हैं। यूरोप में अत्यधिक बारिश हुई तो ब्लैक सी क्षेत्र में सूखा पड़ा। अल नीनो ने समस्या को और बढ़ा दिया।&nbsp;</p>
<p>मौसम के मोर्चे पर देखें तो 2025 में एक कमजोर ला नीना की संभावना बन रही है। हालांकि इसकी आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन इसके कुछ प्रभाव पहले ही दिखाई दे रहे हैं। ब्राजील में बारिश में देरी हो रही है, अर्जेंटीना और अमेरिका के दक्षिणी हिस्सों में मौसम शुष्क होना ला नीना के प्रभाव हैं। वैसे इसके प्रभाव के बारे में मार्च-अप्रैल तक ही स्पष्ट जानकारी मिलेगी।</p>
<p><strong>बायोफ्यूल की बढ़ेगी वैश्विक मांग</strong><br />बायोफ्यूल की मांग एक बार फिर तेजी से बढ़ने की उम्मीद है। 2000 के दशक की शुरुआत में भी इसमें तेजी आई थी, लेकिन हाल के वर्षों में इसकी मांग बढ़ने की दर कम हो गई। वर्ल्ड ग्रेन के अनुसार, नई मांग एविएशन इंडस्ट्री से आएगी। वनस्पति तेलों, एथेनॉल, पौधों के बायोमास और अपशिष्ट उत्पादों से बने सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) की मांग बढ़ रही है। इसमें सोयाबीन-आधारित बायोडीजल और मक्का-आधारित एथेनॉल शामिल हैं। SAF को पारंपरिक ईंधन के साथ 10% से 50% की सीमा तक मिलाया जाता है। अंतर्राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन (ICAO) के अनुसार अमेरिका और यूरोप में 46 हवाई अड्डों पर 360,000 से अधिक उड़ानों में SAF का उपयोग किया गया।</p>
<p>2024 में SAF का वैश्विक उत्पादन 60 करोड़ गैलन से अधिक पहुंचने की उम्मीद है। हालांकि यह वैश्विक स्तर पर इस वर्ष उपयोग किए जाने वाले लगभग 100 अरब गैलन विमान ईंधन का बहुत छोटा हिस्सा है। तीन साल पहले बाइडेन प्रशासन ने 2030 तक तीन अरब गैलन और 2050 तक 35 अरब गैलन सस्टेनेबल विमान ईंधन उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया था। तब घरेलू विमान ईंधन की 100% जरूरत इसी से पूरी होगी।</p>
<p>लेकिन कुछ सवाल अब भी बने हुए हैं। सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि ट्रंप की नीति SAF के प्रति क्या होगी? सस्टेनेबल विमान ईंधन की लागत अभी पेट्रोलियम ईंधन का करीब तीन गुना है, क्या यह कम होगी? क्या आवश्यक फीडस्टॉक उत्पादन के लिए पर्याप्त अतिरिक्त कृषि योग्य भूमि विकसित की जा सकती है? अध्ययनों से पता चला है कि जंगल की भूमि को फसलों के लिए बदलने से मिट्टी से कार्बन रिलीज होता है। तो इसका नेट प्रभाव क्या होगा?&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ ट्रंप के आने से विश्व कृषि बाजार में उथल-पुथल की आशंका, 2025 में नई व्यापार व्यवस्था संभव ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[भारत में बंपर खरीफ उत्पादन और निर्यात पर रोक हटने से 2025 में ग्लोबल मार्केट में चावल के दाम कम रहने के आसार]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/trends-2025-pressured-by-large-harvest-and-end-to-india-export-ban-rice-prices-likely-to-come-down.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 15 Dec 2024 10:58:29 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/trends-2025-pressured-by-large-harvest-and-end-to-india-export-ban-rice-prices-likely-to-come-down.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>सफेद चावल (व्हाइट राइस) पर भारत के निर्यात प्रतिबंध हटाने, पारबॉयल्ड चावल पर निर्यात शुल्क समाप्त करने और बंपर खरीफ फसल के कारण अगले वर्ष वैश्विक चावल बाजार में कीमतें नरम रहने की उम्मीद है। एसएंडपी ग्लोबल ने अपनी नवीनतम कमोडिटी रिपोर्ट में यह जानकारी दी है। रिपोर्ट के अनुसार 2025 में चावल की आयात मांग भी कई देशों में कम रहेगी, इसका दबाव भी दाम पर दिखेगा।</p>
<p>एक भारतीय निर्यातक का हवाला देते हुए रिपोर्ट में कहा गया है, "भारतीय बाजार 2025 की पहली तिमाही तक मंदा रहेगा। जनवरी/फरवरी 2025 तक सफेद चावल का निर्यात मुख्य रूप से पाकिस्तान से होगा। उसके बाद इस बाजार पर भारत का नियंत्रण होगा। पारबॉयल्ड चावल के मामले में भी बंपर सप्लाई के बीच भारत का निर्यात प्रदर्शन अच्छा रहेगा।</p>
<p>एसएंडपी ग्लोबल कमोडिटी इनसाइट्स के विश्लेषकों का अनुमान है कि ग्लोबल बाजार में भारत की वापसी से पाकिस्तान जैसे अन्य निर्यातकों का चावल निर्यात साल-दर-साल 12% घटने का अनुमान है। भारत से सप्लाई के कारण गैर-बासमती और बासमती किस्मों की कीमतों पर पहले ही दबाव देखा जा रहा है। &nbsp;</p>
<p>हालांकि सिंगापुर के एक व्यापारी के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में अगले साल स्थानीय मांग बढ़ने की उम्मीद है, जिससे बाजार स्थिर हो सकता है। यह स्थिरता नई फसल की बंपर आपूर्ति के बावजूद संभव है, क्योंकि किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) बढ़ने से धान की कीमतें मजबूत रहने की संभावना है। &nbsp;</p>
<p>अन्य बाजारों में देखें तो म्यांमार का सफेद चावल निर्यात 2025 में कमजोर फसल के कारण गिरने की संभावना है। थाईलैंड के चावल की निर्यात कीमतें भी मार्च और अप्रैल में सफेद चावल की नई फसल आने और कमजोर मांग के कारण घटने के आसार हैं। वियतनाम से चावल निर्यात बाजार में मार्च तक सीमित आपूर्ति रहेगी। वहां अप्रैल में नई फसल आएगी। सफेद चावल की कीमतें फरवरी 2025 से आपूर्ति में वृद्धि और भारत तथा थाईलैंड के बीच प्रतिस्पर्धा के कारण भी नरम हो सकती हैं। &nbsp;</p>
<p>अमेरिका के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के जनवरी में पदभार ग्रहण करने के साथ, अमेरिकी चावल बाजार में भी बदलाव के आसार हैं। ट्रंप ने चीन से आयात पर 10% टैरिफ और मैक्सिको व कनाडा से उत्पादों पर 25% टैरिफ शामिल लगाने की बात कही है। इसका असर अमेरिकी चावल की कीमतों पर होगा। हालांकि, भारतीय से निर्यात में वृद्धि से वहां भी कीमतें स्थिर हो सकती हैं या कम हो सकती हैं।&nbsp;</p>
<p>काउंसिल ऑफ मिल्स ऑफ साउथ अमेरिका को 2025 में बंपर फसल की उम्मीद है। इसका उत्पादन अनुमान 166.6 लाख टन का है, जो 2024 से 17.5% अधिक है। रकबा 23.9 लाख हेक्टेयर तक बढ़ने की उम्मीद है। इसके साथ 6.97 मीट्रिक टन/हेक्टेयर की बेहतर उत्पादकता का भी समर्थन मिलेगा।&nbsp;</p>
<p><strong>चावल की मांग का ट्रेंड</strong><br />एसएंडपी कमोडिटी इनसाइट्स के विश्लेषकों का अनुमान है कि अल नीनो के कारण इंडोनेशिया और फिलीपींस में चावल आयात गिर सकता है। वहां सरकार के समर्थन से स्थानीय उत्पादन भी बढ़ने के आसार हैं। भारत की बंपर फसल और कम कीमत पर अधिक आपूर्ति दक्षिण अफ्रीका और थाईलैंड में मांग को प्रभावित कर सकती है। &nbsp;</p>
<p>विश्लेषकों का अनुमान है कि इंडोनेशिया का चावल आयात सालाना आधार पर 45% तक गिर सकता है। वहां 2023-24 के अंत तक स्टॉक-टू-यूज अनुपात 14% तक पहुंच गया। 2025-26 तक आयात को 20 लाख मीट्रिक टन से कम करने के लिए मंत्रालय घरेलू उत्पादन को बढ़ाने की योजना बना रहा है। &nbsp;</p>
<p>इसी तरह, कमोडिटी इनसाइट्स के विश्लेषकों का अनुमान है कि फिलीपींस का आयात 4.7% तक गिरेगा। वहां भी सरकारी समर्थन से स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा मिलने और आयात पर निर्भरता कम होने की उम्मीद है। &nbsp;</p>
<p>सबसे बड़े आयात क्षेत्रों में से एक, पश्चिम अफ्रीका के व्यापारियों ने कहा कि बाजार में अधिक आपूर्ति के कीमतों में मंदी का रुख रहेगा। कीमतें कम से कम 2025 के मध्य तक कम रहने की उम्मीद है। यहां भारत की बंपर फसल के कारण ओवर सप्लाई की स्थिति बढ़ेगी। कीमतों में कमी से दक्षिण अफ्रीका में मांग बढ़ सकती है।&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ भारत में बंपर खरीफ उत्पादन और निर्यात पर रोक हटने से 2025 में ग्लोबल मार्केट में चावल के दाम कम रहने के आसार ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[तीन दशक में पृथ्वी की तीन&amp;#45;चौथाई भूमि स्थायी रूप से शुष्क हुई, संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में खुलासा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/three-quarters-of-earths-land-permanently-drier-in-last-three-decades-un-report-reveals.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 09 Dec 2024 12:37:44 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/three-quarters-of-earths-land-permanently-drier-in-last-three-decades-un-report-reveals.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>संयुक्त राष्ट्र के कॉप 16 सम्मेलन में एक गंभीर खुलासा हुआ है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि पिछले 30 वर्षों में तीन-चौथाई से अधिक भूमि स्थायी रूप से शुष्क हो गई है। वर्ष 1990 और 2020 के बीच पृथ्वी की 77.6% भूमि इससे पहले की तीन दशकों की तुलना में अधिक शुष्क हो गई। साथ ही, सूखी भूमि का क्षेत्रफल 43 लाख वर्ग किलोमीटर तक बढ़ गया। अब सूखी भूमि पृथ्वी के 40.6% भूभाग को कवर करती है (अंटार्कटिका को छोड़कर)। सबसे चिंताजनक यह है कि लगभग 7.6% वैश्विक भूमि - जो कनाडा के आकार से भी बड़ी है - ने शुष्कता की अहम सीमा पार कर ली है। ये क्षेत्र अब अधिक शुष्क या कम आर्द्र से अधिक शुष्क श्रेणी में परिवर्तित हो गए हैं।</p>
<p>यह निष्कर्ष <em>ग्लोबल थ्रेट ऑफ ड्राईंग लैंड्स: रीजनल एंड ग्लोबल एरिडिटी ट्रेंड्स एंड फ्यूचर प्रोजेक्शन्स</em> नामक रिपोर्ट में प्रकाशित हुआ। इसे सऊदी अरब के रियाद में आयोजित कॉप 16 सम्मेलन में जारी किया गया। सम्मेलन के एक्जीक्यूटिव सेक्रेटरी इब्राहिम थियाव ने कहा, &ldquo;इस विश्लेषण ने वैश्विक शुष्कता रुझानों को लेकर अनिश्चितता दूर कर दी है। शुष्कता एक स्थायी परिवर्तन है। सूखे जलवायु से पृथ्वी पर जो प्रभाव हो रहा है, वह वापस नहीं लौटेगा जिससे पृथ्वी पर जीवन को नया रूप दिया जा सके।&rdquo;</p>
<p><strong>मानव जनित जलवायु परिवर्तन की भूमिका</strong><br />रिपोर्ट में इस बदलाव का मुख्य कारण ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को बताया गया है। बिजली उत्पादन, परिवहन, उद्योग और भूमि उपयोग परिवर्तन जैसी गतिविधियां पृथ्वी को गर्म कर रही हैं। इससे वर्षा के पैटर्न बदल रहे हैं, वाष्पीकरण दर बढ़ रही है और वनस्पति प्रभावित हो रही है। ये सब धरती की शुष्कता में योगदान कर रहे हैं।&nbsp;</p>
<p>शुष्कता से प्रभावित हॉटस्पॉट में यूरोप (95.9% प्रभावित), पश्चिमी अमेरिका, ब्राजील, दक्षिणी अफ्रीका और एशिया के बड़े क्षेत्र शामिल हैं। भूमध्यसागरीय देश, जो कभी मजबूत कृषि केंद्र थे, अब अर्ध-शुष्क परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं। दक्षिण सूडान और तंजानिया में भूमि का बड़ा हिस्सा शुष्क भूमि में बदल गया है। चीन ने सबसे बड़ा क्षेत्रीय बदलाव देखा है।</p>
<p>इसके विपरीत केवल 22.4% वैश्विक भूमि में इस अवधि में नमी बढ़ी। इसमें मध्य अमेरिका और दक्षिण पूर्व एशिया के कुछ हिस्से शामिल हैं। हालांकि, समग्र रूप से यह स्पष्ट है कि सूखी भूमि का विस्तार हो रहा है, जो पारिस्थितिक तंत्र, कृषि और मानव जीवनयापन को खतरे में डाल रहा है।</p>
<p><strong>दूरगामी परिणाम</strong><br />बढ़ती शुष्कता के प्रभाव व्यापक हैं, जो जीवन और समाज के हर पहलू को प्रभावित करते हैं:</p>
<p><strong>कृषि:</strong> शुष्कता भूमि के क्षरण का मुख्य कारण है। इससे पृथ्वी की 40% उपजाऊ भूमि प्रभावित हुई है। सिर्फ इस वजह से 1990 और 2015 के बीच अफ्रीकी देशों की जीडीपी में 12% की गिरावट आई है। वर्ष 2040 तक वैश्विक स्तर पर 2 करोड़ टन मक्का, 2.1 करोड़ टन गेहूं और 1.9 करोड़ टन चावल का नुकसान होने का अंदेशा है।</p>
<p><strong>जल संसाधन:</strong> वर्ष 2100 तक दो-तिहाई भूमि में कम पानी जमा होने का अनुमान है, भले ही उत्सर्जन मध्यम स्तर पर हो। मध्य-पूर्व जैसे क्षेत्रों में 1950 के बाद से पानी की उपलब्धता में पहले ही 75% की गिरावट आई है।</p>
<p><strong>जैव विविधता:</strong> बढ़ती शुष्कता शुष्क और आर्द्र क्षेत्रों में 55% प्रजातियों के अस्तित्व के लिए खतरा पैदा कर रही है। इससे पूरे पारिस्थितिक तंत्र के बदलने का जोखिम हो गया है। जंगलों की जगह घास के मैदान और अन्य लैंडस्केप बन सकते हैं।</p>
<p><strong>लोगों का माइग्रेशनः</strong> शुष्कता से भूमि क्षरण और पानी की कमी लोगों को पलायन के लिए मजबूर कर रही है। विशेष रूप से दक्षिणी यूरोप, मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका के अति-शुष्क और शुष्क क्षेत्रों में। वर्ष 2100 तक 5 अरब लोग शुष्क भूमि पर रहने को मजबूर हो सकते हैं। यह संख्या दुनिया की अनुमानित आबादी के आधे से अधिक होगी।</p>
<p><strong>शुष्कता का असर कम करने के लिए रोडमैप</strong><br />रिपोर्ट में शुष्कता के प्रभावों को कम करने और इसके अनुकूलन के लिए एक व्यापक रोडमैप प्रस्तुत किया गया है। इसमें कहा गया है कि शुष्कता के मानकों को सूखा निगरानी प्रणालियों में एकीकृत करना होगा ताकि शुरू में ही इसकी पहचान हो और समय पर हस्तक्षेप किया जा सके। एरिडिटी विजुअल इनफॉर्मेशन टूल जैसे उपकरण नीतिनिर्धारकों को बहुमूल्य जानकारी प्रदान कर सकते हैं। &nbsp;</p>
<p>लचीले और स्थानीय समुदायों की भागीदारी वाले समग्र भूमि प्रबंधन तरीकों को प्रोत्साहित करना होगा। अफ्रीका की ग्रेट ग्रीन वॉल जैसी पहल बड़े पैमाने पर रेस्टोरेशन प्रोजेक्ट की क्षमता दर्शाती है। यह मरुस्थलीकरण से निपटने और आर्थिक अवसर सृजित करने में सहायक हैं। वर्षा जल संचयन, ड्रिप सिंचाई और अपशिष्ट जल की रीसाइक्लिंग जैसी तकनीकें प्रभावित क्षेत्रों में जल संसाधनों के प्रबंधन के व्यावहारिक समाधान प्रदान करती हैं। &nbsp;</p>
<p>रिपोर्ट में कहा गया है कि राष्ट्रीय नीतियों को यूएनसीसीडी के लैंड डिग्रेडेशन न्यूट्रलिटी फ्रेमवर्क जैसे वैश्विक फ्रेमवर्क के साथ जोड़ना जरूरी है। ऐसे उपायों को बड़े पैमाने पर लागू करने और एकीकृत वैश्विक समाधान हासिल करने के लिए अंतर-क्षेत्रीय भागीदारी आवश्यक है। &nbsp;</p>
<p>इस मौके पर यूएनसीसीडी साइंस-पॉलिसी इंटरफेस की अध्यक्ष निकोल बार्जर ने कहा, &ldquo;वैज्ञानिक दशकों से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के गंभीर परिणामों की चेतावनी दे रहे हैं। यह रिपोर्ट वैश्विक स्तर पर समग्र प्रयास और इनोवेशन आधारित समाधान की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करती है। सवाल यह नहीं कि हमारे पास इन समस्याओं के समाधान का तरीका है या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि क्या हम समाधान की मंशा रखते हैं?&rdquo;</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/12/image_750x500_67543a8373af5.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ तीन दशक में पृथ्वी की तीन-चौथाई भूमि स्थायी रूप से शुष्क हुई, संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में खुलासा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[वैश्विक अनाज उत्पादन और ट्रेड अनुमानों में कटौती, मौसम के कारण गेहूं&amp;#45;मक्का का उत्पादन प्रभावित]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/global-cereal-output-and-trade-revised-downward-for-2024-wheat-and-maize-production-hit-by-weather-challenges.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 08 Dec 2024 13:53:45 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/global-cereal-output-and-trade-revised-downward-for-2024-wheat-and-maize-production-hit-by-weather-challenges.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने वर्ष 2024 के लिए वैश्विक अनाज उत्पादन के अनुमान में कटौती की है। उसने कहा है कि इस वर्ष कुल 28.41 करोड़ टन उत्पादन की उम्मीद है। यह पिछले साल की तुलना में 0.6 प्रतिशत कम होगा। हालांकि इसके बावजूद यह अब तक का दूसरा रिकॉर्ड उत्पादन होगा।&nbsp;</p>
<p>उत्पादन अनुमान में कटौती मुख्य रूप से मक्का और गेहूं के कारण हुई है। वैश्विक मक्का उत्पादन, जो मोटे अनाज के कुल उत्पादन का लगभग 80 प्रतिशत है, रहने का अनुमान है। यह पिछले महीने के अनुमान से थोड़ा और 2023 के स्तर से 1.9 प्रतिशत कम है। यूरोपीय संघ और अमेरिका में अपेक्षाकृत कम उपज रहने के आसार हैं।&nbsp;</p>
<p>इसी तरह, वैश्विक गेहूं उत्पादन अनुमान को थोड़ा घटाकर 78.9 करोड़ टन कर दिया गया है, जो 2023 के उत्पादन स्तर के बराबर है। गेहूं उत्पादन में गिरावट का अनुमान मुख्य रूप से यूरोपियन यूनियन के कारण है, जहां अत्यधिक बारिश के कारण कुछ हिस्सों में फसल प्रभावित हुई है।&nbsp;</p>
<p>वर्ष 2024-25 के लिए वैश्विक चावल उत्पादन अनुमान में एफएओ ने नवंबर के अनुमान में ज्यादा बदलाव नहीं किया है। वैश्विक चावल उत्पादन में 0.8 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि होगी और यह 53.88 करोड़ टन के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच जाएगा।</p>
<p><strong>2025 के लिए FAO के अनुमान</strong><br />रिपोर्ट में कहा गया है कि उत्तरी गोलार्ध में शीतकालीन गेहूं की बुवाई जारी है। हालांकि 2024 की कम कीमतें रकबा बढ़ाने में बाधक बन सकती हैं। अमेरिका में शीतकालीन गेहूं की बुवाई औसत गति से हो रही है। हाल की वर्षा से वहां गेहूं की फसल के लिए फायदेमंद होगी। नवंबर के अंत तक शीतकालीन फसलों की 55 प्रतिशत बुवाई हो चुकी थी, जो पिछले साल से 5 प्रतिशत अधिक है।&nbsp;</p>
<p>यूरोपीय यूनियन में पश्चिमी क्षेत्रों, विशेष रूप से दक्षिणी स्पेन में, वर्षा के कारण बुवाई में देरी हुई। पूर्वी यूरोप के देशों में नवंबर में शुष्क मौसम से बुवाई की गति तेज हुई, लेकिन पानी की कमी से कुछ इलाकों में देरी भी हुई। दक्षिणी रूस के प्रमुख गेहूं उगाने वाले क्षेत्रों में वर्षा कम होने के कारण मिट्टी की नमी कम है, जिसका असर बुवाई पर दिखा। यूक्रेन में युद्ध कृषि क्षेत्र के लिए एक बड़ी बाधा है। वहां मौसम ने भी बुवाई में रुकावट डाली। सुदूर पूर्वी एशिया में अधिक मूल्य और सरकारी समर्थन वाली नीतियों के साथ-साथ मिट्टी में नमी के कारण गेहूं की बुवाई का रकबा बढ़ने की संभावना है।</p>
<p>दक्षिणी गोलार्ध में मोटे अनाज की भी बुवाई जारी है। दक्षिण अमेरिका में अर्जेंटीना में मक्का की बुवाई में कमी के पहले संकेत मिल रहे हैं, क्योंकि किसान सूखी स्थितियों और पत्तियों के जरिए फैलने वाली स्टंट बीमारी के खतरे से हतोत्साहित हो गए हैं। इसने 2024 में उत्पादन पर प्रतिकूल असर डाला था। ब्राजील में फिलहाल मक्के का रकबा पिछली बार के बराबर रहने के आसार हैं। वहां केंद्रीय और दक्षिण-पूर्वी क्षेत्रों में वर्षा की वापसी ने उपज में वृद्धि की संभावना को बढ़ा दिया है।&nbsp;</p>
<p><strong>वैश्विक अनाज उपयोग का अनुमान&nbsp;</strong><br />वर्ष 2024-25 के लिए वैश्विक अनाज उपयोग का अनुमान 28.59 करोड़ टन है। यह 2023-24 से 0.6 प्रतिशत अधिक है। वैश्विक स्तर पर मोटे अनाज का उपयोग 2024-25 के लिए पिछले महीने से 12 लाख टन बढ़ाकर 15.26 करोड़ टन किया गया है। यह 2023-24 के स्तर से 0.4 प्रतिशत अधिक है। यह वृद्धि मुख्य रूप से मक्का के औद्योगिक उपयोग और पशुधन के आहार के उपयोग में वृद्धि के कारण हुई है।</p>
<p>वैश्विक गेहूं उपयोग 2024-25 में पिछले सीजन के समान, लगभग 79.6 करोड़ टन रहने का अनुमान है। एफएओ ने वैश्विक चावल उपयोग के अनुमान को नवंबर की तुलना में नौ लाख टन बढ़ा दिया है। यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से एशिया में होगी। वैश्विक चावल उपयोग अब 53.67 करोड़ टन तक पहुंचने का अनुमान है, जो 2023-24 से 2 प्रतिशत अधिक होगा। यह एक रिकॉर्ड भी होगा।</p>
<p><strong>अनाज भंडार अनुमान में कमी</strong><br />एफएओ ने 2025 के अंत तक वैश्विक अनाज भंडार के अनुमान में 142 लाख टन की कमी की है। इसका अनुमान 87.4 करोड़ टन का है, जो 0.7 प्रतिशत की गिरावट को दर्शाता है। मोटे अनाज का भंडार अब 2024-25 में 1.2 प्रतिशत की गिरावट के साथ 36 करोड़ टन रहने का अनुमान है। इसका मुख्य कारण मक्का के भंडार में कमी है, जो मुख्य रूप से यूरोपीय यूनियन और अमेरिका में घटते उत्पादन के कारण हुई है।&nbsp;</p>
<p>वैश्विक गेहूं भंडार का अनुमान भी नवंबर की रिपोर्ट की तुलना में 51 मिलियन टन कम किया गया है। इससे 2024-25 के लिए अनुमान 31 करोड़ टन हो गया है। इस गिरावट का मुख्य कारण यूरोपीय यूनियन है, जहां उत्पादन अनुमान में कमी आई है। एफएओ ने 2024-25 मार्केटिंग वर्ष के अंत में वैश्विक चावल भंडार के अनुमान में नवंबर से लगभग नौ लाख टन की कमी की है। इसके बावजूद वैश्विक चावल भंडार का अनुमान 2023-24 से 2.6 प्रतिशत बढ़कर 20.45 करोड़ टन होने का है।</p>
<p><strong>अनाज व्यापार अनुमान में भी कमी</strong><br />वर्ष 2024-25 में वैश्विक अनाज व्यापार 48.4 करोड़ टन रहने का अनुमान है, जो पिछले महीने के अनुमान से 11 लाख टन तथा 2023-24 के स्तर से 4.6 प्रतिशत कम है। 2024-25 में मोटे अनाज व्यापार का अनुमान पिछले पूर्वानुमान से 17 लाख टन कम होकर 23 करोड़ टन हो गया है। यह 2023-24 की तुलना में 5.8 प्रतिशत कम है। इस गिरावट का कारण वैश्विक मक्का व्यापार अनुमान में 20 लाख टन की कमी है। चीन से मक्का की आयात मांग कमजोर रहने के साथ ब्राजील, यूरोपीय यूनियन और अमेरिका से निर्यात में कमी की संभावना है। मक्के का ग्लोबल ट्रेड 18.6 करोड़ टन रहने की उम्मीद है, जो पिछले साल की तुलना में 6.3 प्रतिशत कम होगा।</p>
<p>गेहूं के लिए 2024-25 (जुलाई-जून) में वैश्विक व्यापार का अनुमान 19.8 करोड़ टन का है। यह नवंबर के अनुमान के लगभग बराबर है, लेकिन पिछले साल की तुलना में 5.4 प्रतिशत कम है। इसका मुख्य कारण चीन और यूरोपीय यूनियन की खरीद में गिरावट के साथ यूरोप, रूस और यूक्रेन की कम बिक्री को भी माना जा रहा है।</p>
<p>वर्ष 2025 (जनवरी-दिसंबर) में वैश्विक चावल व्यापार का अनुमान अब 556 लाख टन है। यह 2024 के संशोधित अनुमान 536 लाख टन से अधिक है। भारत ने सितंबर-अक्टूबर में चावल की कुछ किस्मों पर निर्यात की पाबंदियां हटा ली थीं। उसके बाद भारत से निर्यात बढ़ने की संभावना है, जबकि कंबोडिया, थाईलैंड और वियतनाम के लिए निर्यात संभावनाएं कम की गई हैं।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ वैश्विक अनाज उत्पादन और ट्रेड अनुमानों में कटौती, मौसम के कारण गेहूं-मक्का का उत्पादन प्रभावित ]]></media:description>
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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[नवंबर में अंतरराष्ट्रीय बाजार में वनस्पति तेल महंगे हुए, लेकिन गेहूं, चावल और चीनी की कीमतों में गिरावट का रुख]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/november-sees-rise-in-vegetable-oil-prices-in-global-market-while-wheat-rice-and-sugar-prices-decline.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 08 Dec 2024 10:00:46 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/november-sees-rise-in-vegetable-oil-prices-in-global-market-while-wheat-rice-and-sugar-prices-decline.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>विश्व खाद्य मूल्य सूचकांक नवंबर में 0.5 प्रतिशत बढ़कर अप्रैल 2023 के बाद अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में वनस्पति तेलों की कीमतों में वृद्धि के कारण ऐसा हुआ है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) ने अपनी मासिक रिपोर्ट में यह जानकारी दी है। एफएओ खाद्य मूल्य सूचकांक नवंबर में 127.5 अंक पर रहा, जो पिछले साल के मुकाबले 5.7 प्रतिशत अधिक है। हालांकि यह अब भी मार्च 2022 के उच्चतम स्तर से 20.4 प्रतिशत नीचे है।</p>
<p>नवंबर में सबसे अधिक वृद्धि वनस्पति तेलों के दाम में हुई। इसका सूचकांक अक्टूबर के मुकाबले नवंबर में 7.5 प्रतिशत बढ़ा। यह पिछले साल की तुलना में 32 प्रतिशत अधिक है। दक्षिण-पूर्व एशिया में अत्यधिक वर्षा के कारण उत्पादन अनुमान से कम होने की चिंता के बीच वैश्विक पाम ऑयल कीमतें बढ़ीं। वैश्विक आयात मांग के कारण सोया ऑयल की कीमतों में भी वृद्धि हुई। रेपसीड और सनफ्लावर ऑयल की कीमतों में बढ़ोतरी का कारण वैश्विक आपूर्ति में कमी को माना जा रहा है।</p>
<p>डेयरी मूल्य सूचकांक में नवंबर में भी वृद्धि जारी रही। इसमें अक्टूबर के मुकाबले 0.6 प्रतिशत वृद्धि हुई। इसका कारण होल मिल्क पाउडर के लिए वैश्विक आयात मांग में वृद्धि है। बटर की कीमतें पश्चिमी यूरोप में मजबूत मांग और आपूर्ति में कमी के कारण नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गईं। निर्यात उपलब्धता सीमित होने से चीज की कीमतों में भी वृद्धि हुई।</p>
<p>एफएओ के अन्य कमोडिटी मूल्य सूचकांकों में नवंबर में गिरावट दर्ज की गई। अनाज मूल्य सूचकांक अक्टूबर की तुलना में 2.7 प्रतिशत और पिछले साल की तुलना में 8.0 प्रतिशत नीचे आ गया। कमजोर अंतर्राष्ट्रीय आयात मांग और दक्षिणी गोलार्ध में फसल आपूर्ति बढ़ने के कारण गेहूं की कीमतों में गिरावट आई। मक्का की कीमतें स्थिर रहीं। ब्राजील और मेक्सिको में मक्के की मांग निकली जिसकी आपूर्ति अमेरिका से हुई। एफएओ का चावल मूल्य सूचकांक नवंबर में 4.0 प्रतिशत घटा। इसमें गिरावट बाजार प्रतिस्पर्धा, नई फसल के दबाव और मुद्रा में उतार-चढ़ाव के कारण आई।</p>
<p>चीनी मूल्य सूचकांक भी अक्टूबर के मुकाबले 2.4 प्रतिशत घटा। भारत और थाईलैंड में पेराई सीजन शुरू होने तथा ब्राजील में अगले साल की गन्ना फसल को लेकर बेहतर उम्मीदों के कारण इसके दाम गिरे। दुनिया के सबसे बड़े चीनी उत्पादकों में शुार ब्राजील में हाल की बारिश गन्ने की फसल के लिए अच्छी मानी जा रही है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ नवंबर में अंतरराष्ट्रीय बाजार में वनस्पति तेल महंगे हुए, लेकिन गेहूं, चावल और चीनी की कीमतों में गिरावट का रुख ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[COP29: सालाना 300 अरब डॉलर फाइनेंसिंग के साथ सम्मेलन खत्म, विकासशील देशों ने इसे ‘अपमान’ करार दिया]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/cop29-climate-talks-conclude-with-300-billion-dollars-pledge-developing-nations-decry-deal-as-insult.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 24 Nov 2024 20:57:59 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/cop29-climate-talks-conclude-with-300-billion-dollars-pledge-developing-nations-decry-deal-as-insult.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>संयुक्त राष्ट्र का 29वां जलवायु सम्मेलन (COP29) रविवार सुबह विवादों के साथ समाप्त हुआ। विकसित देशों ने जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद के लिए हर साल 300 अरब डॉलर देने का वादा किया। यह राशि विकासशील देशों की एक लाख करोड़ डॉलर की मांग से बहुत कम है। हालांकि, समझौते में 2035 तक 1.3 लाख करोड़ डॉलर का दीर्घकालिक लक्ष्य निर्धारित किया गया है, लेकिन अनेक देशों ने इसे बढ़ते जलवायु संकट से निपटने के लिए अपर्याप्त बताया है।</p>
<p>अजरबैजान के बाकू के विशाल स्टेडियम में दो हफ्ते की गहन वार्ता में कई समझौतों को अंजाम दिया गया। इनमें कार्बन क्रेडिट के व्यापार को बढ़ावा देने के लिए वैश्विक कार्बन बाजार के नए नियम और जलवायु नीति में लैंगिक मुद्दों पर ध्यान देना शामिल हैं।</p>
<p>सम्मेलन में न्यू कलेक्टिव क्वांटिफाइड गोल (NCQG) तय किया गया, जो 2025 में समाप्त होने वाले 100 अरब डॉलर वार्षिक लक्ष्य की जगह लेगा। हालांकि विकासशील देशों ने इस फाइनेंसिंग के वादे पर नाराजगी व्यक्त की। छोटे द्वीप राज्यों (AOSIS) और सबसे कम विकसित देशों के प्रतिनिधियों ने वार्ता के अंतिम दिनों में सम्मेलन से वाकआउट किया, जो विकसित और विकासशील देशों के बीच गहरे विभाजन को दर्शाता है।</p>
<p>संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने इस समझौते के महत्व को स्वीकार किया लेकिन इसकी सीमित महत्वाकांक्षा की आलोचना की। उन्होंने कहा, "यह समझौता एक प्रारंभिक बिंदु है, लेकिन मैंने फाइनेंसिंग और मिटिगेशन (प्रदूषण शमन) पर बेहतर परिणाम की उम्मीद की थी। देशों ने जो प्रतिबद्धताएं तय की हैं उन पर जल्दी अमल करना होगा। हमें इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सामूहिक कदम उठाने की आवश्यकता है।"</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/11/image_750x_674345e1ec4f1.jpg" alt="" /></p>
<p>संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन के कार्यकारी सचिव साइमन स्टील ने इस समझौते को &lsquo;मानवता के लिए बीमा नीति&rsquo; करार दिया और कहा कि इसका सफल होना समय पर और पूर्ण कार्यान्वयन पर निर्भर करेगा। उन्होंने कहा, यह समझौता स्वच्छ ऊर्जा की ओर बदलाव को गति देगा और अरबों लोगों की जान बचाएगा। लेकिन किसी भी बीमा की तरह यह तभी काम करता है जब प्रीमियम समय पर और पूरी तरह से चुकाए जाएं।</p>
<p><strong>अनेक देशों ने जताया असंतोष</strong><br />अनेक विकासशील देशों ने इस समझौते पर निराशा व्यक्त की। भारत ने 300 अरब डॉलर के वादे को अपर्याप्त बताया, और कहा कि यह राशि जलवायु परिवर्तन के गंभीर खतरे से निपटने के प्रयासों के प्रति विश्वास पैदा नहीं करती। कुछ छोटे द्वीप राष्ट्र, जो समुद्र के बढ़ते स्तर से अस्तित्वगत खतरों का सामना कर रहे हैं, ने भी निराशा जताई। एक देश के प्रतिनिधि ने कहा कि हम सचमुच डूब रहे हैं।</p>
<p>सिएरा लियोन के प्रतिनिधित्व में अफ्रीकी देशों ने भी असहमति जताई। उन्होंने इस सौदे को विकसित देशों की बुरी मंशा करार दिया और कहा कि यह राशि आवश्यक वित्त पोषण का केवल अंश मात्र है। यह जलवायु आपदा को रोकने के लिए पर्याप्त नहीं है।</p>
<p>आलोचनाओं के बावजूद कुछ प्रतिनिधियों ने समझौते की संभावनाओं पर जोर दिया। यूरोपीय संघ के एक प्रतिनिधि ने निजी क्षेत्र के निवेश का लाभ उठाने के अवसर पर जोर देते हुए कहा कि इस समझौते से आवश्यक निजी फाइनेंसिंग लाने और 1.3 लाख करोड़ डॉलर के लक्ष्य को हासिल करने में मदद मिलेगी। अगला जलवायु सम्मेलन, COP30 ब्राजील के बेलें में आयोजित होगा। स्टिएल ने राष्ट्रों से अपने प्रयासों को दोगुना करने और बाकू में किए गए वादों को लागू करने पर ध्यान केंद्रित करने का आग्रह किया।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ COP29: सालाना 300 अरब डॉलर फाइनेंसिंग के साथ सम्मेलन खत्म, विकासशील देशों ने इसे ‘अपमान’ करार दिया ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[12 लाख करोड़ डॉलर सालाना है वैश्विक कृषि&amp;#45;खाद्य प्रणाली की छिपी हुई लागतः एफएओ रिपोर्ट]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/hidden-costs-in-global-agrifood-systems-amount-to-12-trillion-dollars-annually.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 10 Nov 2024 16:25:37 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/hidden-costs-in-global-agrifood-systems-amount-to-12-trillion-dollars-annually.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) के एक अध्ययन में 156 देशों के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला कि वैश्विक कृषि-खाद्य प्रणाली में छिपी हुई लागत (हिडन कॉस्ट) सालाना लगभग 12 ट्रिलियन डॉलर तक होती है। इसका लगभग 70 प्रतिशत (8.1 ट्रिलियन डॉलर) अहितकर आहार से उत्पन्न होता है जिससे हृदय रोग, स्ट्रोक और मधुमेह जैसी गंभीर गैर-संचारी बीमारियां (NCD) होती हैं। यह लागत पर्यावरण को नुकसान और सामाजिक असमानताओं से होने वाले नुकसान से कहीं अधिक हैं।</p>
<p>स्टेट ऑफ फूड एंड एग्रीकल्चर 2024 (SOFA) रिपोर्ट में भोजन के उत्पादन, वितरण और उपभोग से जुड़े उन सभी लागतों और लाभों का खुलासा किया गया है जो बाजार मूल्य में नहीं दिखते। इन्हें &lsquo;छिपी हुई लागत और लाभ&rsquo; कहा जाता है। अध्ययन में बताया गया है कि वैश्विक छिपी हुई लागतों में सबसे बड़ा योगदान स्वास्थ्य से संबंधित लागत का है। इसके बाद पर्यावरण से जुड़ी छिपी लागत आती है, जो अपर मिडिल और उच्च आय वाले देशों की औद्योगिक कृषि-खाद्य प्रणालियों में देखने को मिलती है।</p>
<p>स्वास्थ्य पर प्रभाव का विश्लेषण करते हुए रिपोर्ट में 13 जोखिमों की पहचान की गई है। इनमें साबुत अनाज और फल-सब्जियों का अपर्याप्त सेवन, अत्यधिक सोडियम का सेवन, लाल और प्रसंस्कृत मांस का अधिक सेवन शामिल है।&nbsp;</p>
<p><strong>कृषि-खाद्य प्रणाली के अनुसार छिपी हुई लागत भिन्न</strong><br />ऐतिहासिक रूप से देखें तो कृषि-खाद्य प्रणाली पारंपरिक से औद्योगिक रूप में परिवर्तित हुई है। सबकी छिपी लागत अलग-अलग हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि किस प्रकार की कृषि-खाद्य प्रणाली में छिपी हुई लागत किस रूप में प्रकट होती है। इसमें कृषि-खाद्य प्रणाली को छह अलग समूहों में बांटा गया है: दीर्घकालिक संकट वाली, पारंपरिक, लगातार विस्तार वाली, विविधीकृत, औपचारिक रूप लेने वाली और औद्योगिक। इसका मकसद हर चुनौती और अवसर को गहराई से समझना है।</p>
<p>उदाहरण के लिए, अधिकांश कृषि-खाद्य प्रणालियों में साबुत अनाज (होल ग्रेन) की कमी प्रमुख आहार जोखिम का कारण है। दीर्घकालिक संकट वाली प्रणालियों (लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष, अस्थिरता और व्यापक खाद्य असुरक्षा) और पारंपरिक प्रणालियों (कम उत्पादकता, सीमित तकनीक अपनाने) में मुख्य चिंता फलों और सब्जियों का कम सेवन है।</p>
<p>सोडियम यानी नमक का अधिक सेवन चिंता का एक अहम विषय है। जब कृषि-खाद्य प्रणाली पारंपरिक से औपचारिक बनने की ओर बढ़ती है तो नमक का सेवन भी बढ़ता है, और फिर औद्योगिक प्रणालियों में घटने लगता है। इसके विपरीत, प्रसंस्कृत और लाल मांस का सेवन पारंपरिक से औद्योगिक प्रणालियों में बदलाव के दौरान लगातार बढ़ता है। वहां यह शीर्ष तीन आहार जोखिमों में से एक बन जाता है।</p>
<p><strong>गैर-टिकाऊ कृषि पद्धतियों का पर्यावरणीय प्रभाव</strong><br />गैर-टिकाऊ कृषि पद्धतियों का पर्यावरणीय प्रभाव भी छिपी लागत का बड़ा हिस्सा है। ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन, नाइट्रोजन, भूमि-उपयोग में परिवर्तन और जल प्रदूषण से जुड़ी लागत उन देशों में विशेष रूप से अधिक है, जहां कृषि-खाद्य प्रणाली में विविधता आ रही है तथा जहां तेज आर्थिक विकास के साथ खपत और उत्पादन के पैटर्न भी बदल रहे हैं। यह लागत 720 अरब डॉलर तक पहुंच गई है। लंबे समय से संकट से जूझ रहे देशों को अपने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 20 प्रतिशत के बराबर लागत का सामना करना पड़ता है।</p>
<p>गरीबी और कुपोषण समेत सामाजिक लागत का प्रभाव पारंपरिक कृषि-खाद्य प्रणालियों और लंबे समय से संकटग्रस्त देशों में सबसे अधिक हैं। गरीबी की सामाजिक लागत जीडीपी के 8 और कुपोषण की 18 प्रतिशत के आसपास है। इससे पता चलता है कि बेहतर आजीविका और इंटीग्रेटेड मानवीय विकास और शांति प्रयासों की तत्काल कितनी आवश्यकता है।</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ 12 लाख करोड़ डॉलर सालाना है वैश्विक कृषि-खाद्य प्रणाली की छिपी हुई लागतः एफएओ रिपोर्ट ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[वनस्पति तेलों के कारण एफएओ खाद्य मूल्य सूचकांक अक्टूबर में डेढ़ साल के उच्चतम स्तर पर पहुंचा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/fueled-by-vegetable-oil-fao-price-index-reaches-its-highest-level-in-18-months.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 09 Nov 2024 14:39:36 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/fueled-by-vegetable-oil-fao-price-index-reaches-its-highest-level-in-18-months.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) का खाद्य मूल्य सूचकांक अक्टूबर में 18 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से वनस्पति तेलों के दाम बढ़ने के कारण हुई है। अक्टूबर में यह सूचकांक 127.4 अंक पर रहा, जो सितंबर से 2.0 प्रतिशत और पिछले साल की तुलना में 5.5 प्रतिशत अधिक है। हालांकि यह मार्च 2022 के उच्चतम स्तर से अब भी 20.5 प्रतिशत नीचे बना हुआ है।</p>
<p>एफएओ का वनस्पति तेल मूल्य सूचकांक अक्टूबर में 7.3 प्रतिशत बढ़ा, जिससे यह दो साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। पाम, सोया, सूरजमुखी और रेपसीड तेल की बढ़ती कीमतों के कारण यह वृद्धि हुई। इन वनस्पति तेलों के उत्पादन को लेकर चिंता बनी हुई है।</p>
<p><strong>गेहूं और मक्का के दाम बढ़े, चावल में नरमी</strong><br />एफएओ के अनाज मूल्य सूचकांक में अक्टूबर में 0.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई। गेहूं और मक्का के निर्यात मूल्य में वृद्धि इसका प्रमुख कारण है। उत्तरी गोलार्ध के बड़े निर्यातक देशों में प्रतिकूल मौसम, रूस में अनधिकारिक स्तर पर न्यूनतम निर्यात मूल्य लागू करने और काला सागर क्षेत्र में बढ़ते तनाव ने वैश्विक गेहूं कीमतों को प्रभावित किया।&nbsp;</p>
<p>वैश्विक मक्का कीमतों में भी वृद्धि हुई, जिसका कारण ब्राजील में मजबूत घरेलू मांग और नदियों में जलस्तर कम होने से ढुलाई की चुनौतियां रहीं। हालांकि चावल मूल्य सूचकांक अक्टूबर में 5.6 प्रतिशत गिरा है। इसका कारण गैर-टूटे चावल पर भारत के निर्यात प्रतिबंध हटाए जाने के बाद निर्यातकों के बीच प्रतिस्पर्धा रही।</p>
<p>ब्राजील में उत्पादन को लेकर चिंता के कारण FAO चीनी मूल्य सूचकांक अक्टूबर में 2.6 प्रतिशत बढ़ा। गन्ने का इथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल बढ़ने से भी चीनी की कीमतों को बढ़ावा मिला। एफएओ डेयरी मूल्य सूचकांक अक्टूबर में 1.9 प्रतिशत बढ़ गया और यह अभी पिछले साल की तुलना में 21.4 प्रतिशत अधिक है। यह वृद्धि मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पनीर और मक्खन की ऊंची कीमतों के कारण हुई। दूध पाउडर की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई।</p>
<p><strong>चावल और गेहूं उत्पादन में वृद्धि, मक्का उत्पादन में गिरावट के आसार</strong><br />एफएओ की नई अनाज आपूर्ति और मांग रिपोर्ट के अनुसार 2024 में वैश्विक अनाज उत्पादन 0.4 प्रतिशत घटकर 284.8 करोड़ टन रहने का अनुमान है। एशिया में रकबा बढ़ने और अनुकूल मौसम के कारण वैश्विक गेहूं उत्पादन में वृद्धि की संभावना है। एशिया में बढ़ा उत्पादन यूरोप के कुछ प्रमुख उत्पादकों में बड़ी गिरावट को संतुलित करेगा। मक्का उत्पादन में गिरावट के चलते वैश्विक मोटा अनाज उत्पादन 2023 के रिकॉर्ड स्तर से कम रहने का अनुमान है। वैश्विक चावल उत्पादन 2024/25 में 53.89 करोड़ टन के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच सकता है। इस वर्ष धान की रोपाई भी रिकॉर्ड हुई है।</p>
<p>2024/25 में वैश्विक अनाज उपयोग में 0.5 प्रतिशत की वृद्धि की संभावना है। मुख्य रूप से चावल और गेहूं की खाद्य बढ़ेगी। वैश्विक अनाज भंडार में भी 0.6 प्रतिशत वृद्धि की संभावना है, जिससे भंडार 88.9 करोड़ टन का होगा। इसमें अधिकांश वृद्धि चावल के भंडार में होगी।&nbsp;</p>
<p>अंतरराष्ट्रीय अनाज व्यापार 48.5 करोड़ टन रहने का अनुमान है, जो 2023/24 स्तर से 3.9 प्रतिशत कम होगा। चावल का वैश्विक व्यापार बढ़ने की संभावना है, जबकि गेहूं और मोटा अनाज के व्यापार में गिरावट आ सकती है।</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ वनस्पति तेलों के कारण एफएओ खाद्य मूल्य सूचकांक अक्टूबर में डेढ़ साल के उच्चतम स्तर पर पहुंचा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन से संकट में 120 करोड़ लोग: विश्व बैंक]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/climate-change-impacting-over-120-crore-people-globally-according-to-world-bank-report.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 05 Nov 2024 14:09:55 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/climate-change-impacting-over-120-crore-people-globally-according-to-world-bank-report.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>दुनिया भर में 120 करोड़ लोग हीटवेव, बाढ़, तूफान और सूखे जैसे गंभीर जलवायु परिवर्तन के जोखिमों&nbsp;का सामना कर रहे हैं। विश्व बैंक द्वारा जारी एक हालिया रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आए हैं। <strong><a href="https://www.worldbank.org/en/publication/rising-to-the-challenge-climate-adaptation-resilience">'राइजिंग टू द चैलेंज'</a></strong> के शीर्षक वाली इस रिपोर्ट ने बताया गया है कि इन जोखिमों&nbsp;को कम करने के लिए तेज और सतत आर्थिक विकास और लक्षित जलवायु अनुकूल कदमों की आवश्यकता है।</p>
<p>रिपोर्ट के अनुसार, बेहतर आर्थिक वृद्धि हासिल करने वाले देश अगर जलवायु अनुकूलता पर निवेश करते हैं तो वह जलवायु परिवर्तन से प्रभावित होने वाले लोगों की संख्या को काफी कम कर सकते हैं। प्रति व्यक्ति जीडीपी में 10 फीसदी की वृद्धि से लगभग 10 करोड़ लोगों को गंभीर जलवायु खतरों से बचाया जा सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु संबंधित सटीक सूचनाओं पर आधारित नीतियां बनाने की जरूरत है। इसके लिए विकसित देशों को इस संबंध में अपनी ढांचागत सुविधाओं को सुधारना चाहिए जबकि विकासशील देशों के पास नए सिरे से जलवायु-अनुकूल सिस्टम बनाना का अवसर है।&nbsp;</p>
<p>विश्व बैंक के वरिष्ठ प्रबंध निदेशक एक्सेल वैन ट्रॉट्सबर्ग ने कहा कि जलवायु परिवर्तन का खतरा सभी देशों को प्रभावित करता है, लेकिन यह गरीब देशों को अधिक प्रभावित करता है। रिपोर्ट में खाद्य प्रणालियों, जल संसाधनों और जैव विविधता को मजबूत करने पर भी जोर दिया गया है।</p>
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<p>विश्व बैंक समूह द्वारा जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए कई कदम उठाए हैं। इनमें समुदायों की सुरक्षा के लिए प्रभावी पूर्व चेतावनी सिस्टम तैयार करना,&nbsp;बिजनेस और समुदायों को जलवायु खतरों से बीमा कवर की जानकारी देना, और संकट के समय में जल्दी स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने की प्रणाली स्थापित करना शामिल है।</p>
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<p>विश्व बैंक समूह ने जलवायु हस्तक्षेपों की प्रगति के आकलन के लिए एक नए कॉरपोरेट स्कोरकार्ड तैयार किया है। इस स्कोरकार्ड के जरिये गरीबी उन्मूलन के लिए उठाए गए कदमों और साझा समृद्धि बढ़ाने में कारगर कदमों का आकलन किया जा सकेगा। रिपोर्ट में बताया गया है कि विश्व बैंक समूह 60 से अधिक देशों को जलवायु जोखिमों की पहचान करने और उनके समाधान लागू करने में मदद कर रहा है।</p>
<p>रिपोर्ट में कुछ सफल जलवायु अनुकूलन के उदाहरण भी दिए गए हैं। इनमें अहमदाबाद हीट एक्शन प्लान को भी शामिल किया गया है, जिसके&nbsp;द्वारा 2,000 से अधिक लोगों की जान बचाई गई। नाइजर में सूखे के दौरान नकद सहायता प्रदान करने वाली प्रणाली द्वारा खाद्य सुरक्षा में सुधार और बांग्लादेश में बेहतर मौसम पूर्वानुमान द्वारा फसल के नुकसान को 75 प्रतिशत तक कम करने के उदाहरण भी रिपोर्ट में शामिल हैं।&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन से संकट में 120 करोड़ लोग: विश्व बैंक ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Brijesh Chauhan (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[वैश्विक अनाज ट्रेड में अहम साबित हो सकता है ब्रिक्स ग्रेन एक्सचेंज, फिलहाल चुनौतियां कई]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/brics-grain-exchange-could-prove-crucial-in-global-grain-trade-but-challenges-abound-for-now.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 26 Oct 2024 14:47:29 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/brics-grain-exchange-could-prove-crucial-in-global-grain-trade-but-challenges-abound-for-now.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के बाद जारी घोषणापत्र में नया ग्रेन एक्सचेंज स्थापित करने की बात कही गई है। यह प्रस्ताव रूस की तरफ से आया था, जिस पर संगठन के बाकी सदस्य देशों ने भी सहमति जताई। अगर यह एक्सचेंज स्थापित होने के बाद सफल रहा तो यह अंतरराष्ट्रीय अनाज व्यापार में अहम मोड़ साबित होगा। करीब छह महीने पहले रशियन यूनियन ऑफ ग्रेन एक्सपोर्टर्स (RUSGRAIN Union) ने यह एक्सचेंज स्थापित करने का प्रस्ताव राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को दिया था।</p>
<p>मूल रूप से देखा जाए तो ब्रिक्स के शुरुआती पांच सदस्य देशों ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका का विश्व अनाज अर्थव्यवस्था में एक अनोखा स्थान है। वे चावल, गेहूं, मक्का और जौ जैसे अनाज और इनके उत्पादों के सबसे बड़े उत्पादकों के साथ सबसे बड़े उपभोक्ताओं में भी शामिल हैं। ये प्रमुख अनाज निर्यातक के साथ बड़े आयातक भी हैं।</p>
<p>उदाहरण के तौर पर दुनिया का आधे से अधिक चावल का उत्पादन भारत और चीन करते हैं। दोनों चावल की सबसे अधिक खपत करने वाले देश भी हैं। चीन मक्का, सोयाबीन, गेहूं, जौ, सूरजमुखी का सबसे बड़ा आयातक है तो रूस दुनिया का सबसे बड़ा गेहूं निर्यातक है। यही नहीं, चीन, रूस और भारत मिलकर दुनिया का 40% से अधिक गेहूं उत्पादन करते हैं। ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका का भी गेहूं, मक्का और सोयाबीन के बड़े निर्यातकों में स्थान है।</p>
<p>अनाज के अंतरराष्ट्रीय व्यापार में ब्रिक्स देशों का अपने संगठन से बाहर भी अहम स्थान है। चीन एक बड़ा खाद्यान्न आयात है और वह आस्ट्रेलिया, अर्जेंटीना, यूरोपियन यूनियन और अमेरिका से भी गेहूं, मक्का तथा सोयाबीन का आयात करता है। इसके अलावा, ब्राजील और रूस 100 से अधिक देशों को अनाज निर्यात करते हैं। लेकिन फिलहाल इनके आयात-निर्यात की कीमतें उत्तर अमेरिका और यूरोप के एक्सचेंज से तय होती हैं। रूस सबसे बड़ा गेहूं निर्यातक तो है, लेकिन वहां अंतरराष्ट्रीय स्तर का कोई एक्सचेंज नहीं है। पश्चिमी एक्सचेंजों में सौदे होने के कारण रेट और सेटलमेंट भी ज्यादार डॉलर में होते हैं। यूक्रेन पर हमले के बाद लगे प्रतिबंधों के कारण रूस को डॉलर सौदों में परेशानी हो रही है। इसलिए वह नया एक्सचेंज स्थापित करना चाहता है।</p>
<p>ब्रिक्स देश अपने मानदंडों और हेजिंग पर आधारित अधिक पारदर्शी और निष्पक्ष अनाज व्यापार करना चाहते हैं। माना जा रहा है कि यह एक्सचेंज इन देशों को पहले अपनी-अपनी मुद्राओं में व्यापार करने और उसके बाद एक साझा ब्रिक्स मुद्रा की शुरुआत करने में सहायक हो सकता है। हालांकि इस एक्सचेंज को पहले से स्थापित अंतरराष्ट्रीय एक्सचेंजों के साथ प्रतिस्पर्धा करनी पड़ेगी।</p>
<p>अंतरराष्ट्रीय पत्रिका वर्ल्डग्रेन के अनुसार अभी इस प्रस्ताव को &lsquo;राजनीतिक अतिशयोक्ति&rsquo; कहा जा सकता है, क्योंकि इसमें ठोस कुछ नहीं है। इसमें कोई सैद्धांतिक और कार्यप्रणाली का आधार भी नहीं बताया गया है। वैश्विक अनाज व्यापारी वर्ग को इस पहल के बारे में स्पष्टता की जरूरत होगी। खासकर उन चुनौतियों के संदर्भ में जिन्हें दूर करने के लिए इस एक्सचेंज को गठित करने की बात हो रही है।&nbsp;</p>
<p>रशियन यूनियन ऑफ ग्रेन एक्सपोर्टर्स (RUSGRAIN Union) ने पहली बार दिसंबर 2023 में ब्रिक्स ग्रेन एक्सचेंज की बात कही थी और पुतिन को इसका प्रस्ताव मार्च 2024 में दिया। मॉस्को में इस साल 28 जून को ब्रिक्स कृषि मंत्रियों की 14वीं बैठक में इसे रूस की तरफ से प्रस्तुत किया गया था। तब इस एक्सचेंज को गठित करने के पीछे कृषि उपज की मांग और आपूर्ति में संतुलन बनाने, मौजूदा सप्लाई चेन को सुरक्षित करने, ब्रिक्स में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने, अनाज कीमतों पर नियंत्रण रखने और सट्टेबाजी पर लगाम लगाने को वजह बताया गया था।</p>
<p>ब्रिक्स ग्रेन एक्सचेंज स्थापित करने में अभी कई अड़चनें हैं। रूस के अलावा चार अन्य ब्रिक्स देशों ब्राजील, चीन, भारत और दक्षिण अफ्रीका में पहले ही अपने अनाज के एक्सचेंज चल रहे हैं। इनमें भारत का मल्टी-कमोडिटी एक्सचेंज, ब्राजील का मर्केंटाइल एंड फ्यूचर्स एक्सचेंज, चीन का डालियान कमोडिटी एक्सचेंज और दक्षिण अफ्रीका का जोहान्सबर्ग स्टॉक एक्सचेंज के अंतर्गत फ्यूचर्स एक्सचेंज प्रमुख हैं। रणनीतिक और तकनीकी दृष्टिकोण से ये सभी एक्सचेंज कृषि उपज की डेरिवेटिव ट्रेडिंग में रूस से काफी आगे हैं।</p>
<p>ब्रिक्स देश अक्सर घरेलू अनाज भंडार और कीमतों पर नियंत्रण लगाने के कदम उठाते रहते हैं। उदाहरण के लिए, चीन का बाजार अब भी आंशिक रूप से रूसी गेहूं और अन्य स्रोतों से आने वाले अनाज के लिए बंद है। भारत भी चावल और गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध लगाता रहता है। रूस गेहूं, मक्का और जौ पर निर्यात शुल्क लगाता है। इसके अलावा, कमोडिटी एक्सचेंज और डेरिवेटिव बाजार के नियमों पर भी ब्रिक्स देशों में एकरूपता नहीं है। बिना कोऑर्डिनेशन के कार्यान्वयन प्रक्रिया जटिल होगी। इस एक्सचेंज को सफल होने के लिए सदस्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं और संगठन के बाहर के बाजारों के साथ इंटीग्रेशन भी जरूरी है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ वैश्विक अनाज ट्रेड में अहम साबित हो सकता है ब्रिक्स ग्रेन एक्सचेंज, फिलहाल चुनौतियां कई ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत 127 देशों में 105वें स्थान पर, नेपाल और बांग्लादेश से पीछे]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/india-ranks-105th-among-127-countries-in-the-global-hunger-index-nepal-and-bangladesh-are-better-than-us.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 11 Oct 2024 19:35:27 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/india-ranks-105th-among-127-countries-in-the-global-hunger-index-nepal-and-bangladesh-are-better-than-us.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>विश्व में भुखमरी की स्थिति का आंकलन करने वाली <a href="https://www.globalhungerindex.org/"><strong>ग्लोबल हंगर इंडेक्स</strong></a> में इस साल भारत 127 देशों में <strong>105वें</strong> स्थान पर है जो गंभीर स्थिति को दर्शाता है। इस मामले में भारत कई अफ्रीकी देशों के अलावा श्रीलंका, नेपाल और बांग्लादेश से भी पीछे है, जबकि पाकिस्तान और अफगानिस्तान से बेहतर है।&nbsp;</p>
<p>ग्लोबल हंगर इंडेक्स में जो देश जितने ऊंचे पायदान पर होता है, वहां भुखमरी उतनी कम मानी जाती है। इस आधार पर चीन, चिली, कुवैत, रोमानिया, तुकी, रूस, जॉजिया, यूएई और उज्बेकिस्तान समेत 22 देश संयुक्त रूप से <strong>पहले</strong> स्थान पर हैं। यानी इन देशों में सबसे कम भुखमरी है। भुखमरी की सबसे चिंताजनक स्थिति सोमालिया, यमन, चाड, मेडागास्कर, हैती और नाइजर आदि देशों में है। ये ग्लोबल हंगर इंडेक्स में सबसे निचले स्थान पर हैं।&nbsp; &nbsp;</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/10/image_750x_67093128f2287.jpg" alt="" style="display: block; margin-left: auto; margin-right: auto;" /></p>
<p><strong>कंसर्न वर्ल्डवाइड</strong>&nbsp;और <strong>वेल्थहंगरहिल्फ</strong>&nbsp;द्वारा प्रकाशित, ग्लोबल हंगर इंडेक्स की 2024 की रिपोर्ट में भारत&nbsp;<span>27.3 स्कोर के साथ </span>105वें स्थान पर है जो भुखमरी के 'गंभीर' स्तर को दर्शाता है। इंडेक्स में इथोपिया, कीनिया, रवांडा, नामीबिया, लीबिया, म्यांमार, सेनेगल, इराक और वियतनाम की स्थिति भारत से बेहतर है। <span>नेपाल (68), श्रीलंका (56) और बांग्लादेश (84) की रैंकिंग भी भारत से बेहतर है। हालांकि, </span>पाकिस्तान (109), सूडान (110) और अफगानिस्तान (116) हंगर इंडेक्स में भारत से पीछे हैं। &nbsp;&nbsp;&nbsp;</p>
<p>ग्लोबल हंगर इंडेक्स में <strong>भारत</strong> का 2024 का स्कोर 2016 के मुकाबले कुछ सुधार दर्शाता है। रिपोर्ट की पद्धित में बदलाव और संशोधित डेटा के कारण 2023 की रिपोर्ट से इसकी तुलना नहीं की जा सकती है। <span>पिछले साल भारत 125 देशों में 111वें स्थान पर और 2022 में 121 देशों में से 107वें स्थान पर था। तब भारत सरकार ने इस रिपोर्ट को गलत और भ्रामक करार दिया था।&nbsp;</span></p>
<p><span><strong>ग्लोबल हंगर इंडेक्स</strong>&nbsp;तैयार करने में विभिन्न देशों को कुपोषण से जुड़े विभिन्न पैमानों पर शून्य से 100 तक स्कोर दिया जाता है। कम स्कोर का मतलब कम भुखमरी होता है। इंडेक्स की पद्धति और आंकड़ों का लेकर विवाद रहा है लेकिन इसमें दोराय नहीं है कि&nbsp;</span>भारत कुपोषण की समस्या से जूझ रहा है। वर्ष 2000 के बाद से देश में बाल मृत्यु दर में सुधार हुआ है, लेकिन बाल कुपोषण गंभीर चुनौती है।</p>
<p>2024 की रिपोर्ट के अनुसार, भुखमरी को कम करने में वैश्विक प्रगति वर्ष 2016 से स्थिर हो गई है, जिससे वर्ष 2030 तक भुखमरी को मिटाने का लक्ष्य असंभव होता जा रहा है। इंडेक्स में शामिल 127 देशों में से 42 देश भुखमरी की 'चिंताजनक' या 'गंभीर' स्थिति का सामना कर रहे हैं। रिपोर्ट भुखमरी, जलवायु परिवर्तन और लैंगिक असमानता के बीच एक सीधा संबंध स्थापित करती है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत 127 देशों में 105वें स्थान पर, नेपाल और बांग्लादेश से पीछे ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[रूस के गेहूं की कीमत तीन महीने के उच्चतम स्तर पर, सूखा और आपूर्ति में कटौती का असर]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/russian-wheat-price-hits-three-months-high-amid-drought-and-supply-cuts.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 06 Oct 2024 10:04:43 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/russian-wheat-price-hits-three-months-high-amid-drought-and-supply-cuts.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>रूस के गेहूं की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में तीन महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है। वहां सूखे से स्थिति बिगड़ रही है और उत्पादन का अनुमान कम हुआ है। पिछले दो हफ्तों में ही गेहूं की कीमत में 4.3% तक की बढ़ोतरी हुई है, और यह अब 26 जून 2024 के बाद से उच्चतम स्तर पर है। एसएंडपी ग्लोबल की रिपोर्ट के अनुसार, अक्टूबर के अंत से नवंबर की शुरुआत की आपूर्ति के लिए रूस के 12.5% प्रोटीन वाले गेहूं की कीमत 228.50 डॉलर प्रति मीट्रिक टन रही।</p>
<p>हाल ही रूस के ओरयोल क्षेत्र में सूखे की गंभीर स्थिति के कारण आपातकाल की घोषणा की गई है। इससे पहले मई की शुरुआत से कई क्षेत्रों में ठंढ और सूखा पड़ा था, जिससे 2024-25 के उत्पादन में कटौती हुई और इस सीजन के निर्यात की संभावनाओं पर भी असर पड़ा। रूस को 2024-25 में 821 लाख मीट्रिक टन गेहूं की पैदावार होने की उम्मीद है। उसका 470 &nbsp;लाख टन निर्यात करने का लक्ष्य है।</p>
<p>अंतरराष्ट्रीय बाजार के ट्रेडर्स का कहना है कि सूखे के कारण रूसी किसानों को गेहूं की बिक्री में भी बाधा आ रही है, जिससे उपलब्धता कम हो रही है। इसका प्रभाव 2025-26 की अगली सर्दियों की बुवाई पर भी पड़ सकता है। रिपोर्ट के अनुसार एक विक्रेता ने कहा कि अगली फसल के लिए मौसम की स्थिति खतरनाक है, अभी तक बारिश नहीं हुई है। इसलिए रूसी निर्यातकों पर शिपमेंट कम करने का भी दबाव है।</p>
<p>मिस्र ने सितंबर में रूस से 14 लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीदा है। मिस्र के खरीदार रूसी गेहूं की कीमतों को भी देख &nbsp;रहे हैं, जिन्हें यूक्रेनी गेहूं की तुलना में अधिक प्रतिस्पर्धी माना जाता है। 2 अक्टूबर को रूस का 12.5% प्रोटीन युक्त उच्च गुणवत्ता वाला गेहूं 236 डॉलर प्रति टन के भाव (सीआईएफ अलेक्जेंड्रिया पोर्ट) था, जबकि यूक्रेन का 11.5% प्रोटीन युक्त गेहूं 245 डॉलर प्रति टन था। यूक्रेन ने इस सीजन में अब तक 60 लाख मीट्रिक टन गेहूं का निर्यात किया है, जिसमें सितंबर में कुल 21.8 लाख मीट्रिक टन शामिल है। उसके प्रमुख ग्राहक इंडोनेशिया, वियतनाम और नीदरलैंड रहे।</p>
<p>यूक्रेन के गेहूं की कीमतें अधिक होने के कारण खरीदार उसे पसंद नहीं कर रहे हैं। एशिया और मध्य पूर्व, उत्तर अफ्रीका क्षेत्र भी रूस की ओर देख रहे हैं। रूस की तरह यूक्रेन के गेहूं के भी दाम बढ़ रहे हैं। पिछले दो हफ्तों में इसमें 2% की बढ़ोतरी हुई और यह 17 जून, 2024 के बाद से उच्चतम स्तर पर पहुंच गया।</p>
<p>मिस्र की सरकारी एजेंसी जीएएससी (GASC) कम कीमत पर गेहूं खरीदने की कोशिश कर रही है। सऊदी अरब की एजेंसी GFSA दिसंबर 2024-जनवरी 2025 के लिए कम से कम तीन लाख टन गेहूं खरीदना चाहती है। इसके अलावा, मोरक्को भी इस सीजन में फ्रांस के बजाय अधिक रूसी गेहूं खरीद सकता है। फ्रांस में भी इस बार फसल को नुकसान हुआ है और वह गेहूं का कम निर्यात कर रहा है।</p>
<p>तुर्की में मिलर्स सरकार से 15 अक्टूबर के बाद आयात फिर से शुरू करने की घोषणा का इंतजार कर रहे हैं। तुर्की ने जून से मध्य अक्टूबर तक स्थानीय उत्पादकों को बचाने के लिए गेहूं के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया था। दूसरी ओर रोमानिया और बुल्गारिया के गेहूं बाजार रूसी गेहूं से प्रतिस्पर्धा करने की कोशिश कर रहे हैं।&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ रूस के गेहूं की कीमत तीन महीने के उच्चतम स्तर पर, सूखा और आपूर्ति में कटौती का असर ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[यूएसडीए ने वैश्विक चावल उत्पादन का अनुमान घटाया, फिर भी इस वर्ष रिकॉर्ड प्रोडक्शन की उम्मीद]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/global-rice-production-still-set-for-record-despite-usda-downgrade.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 23 Sep 2024 11:23:00 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/global-rice-production-still-set-for-record-despite-usda-downgrade.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>हाल ही में अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) की तरफ से चावल उत्पादन अनुमान में की गई कमी के बावजूद 2024-25 में वैश्विक चावल उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने की उम्मीद है। यूएसडीए की आर्थिक अनुसंधान सेवा (ERS) ने विश्व चावल उत्पादन के अनुमान में 4,64,000 टन की कमी कर इसे 52.77 करोड़ टन किया गया है। हालांकि, यह आंकड़ा भी ऐतिहासिक उच्च स्तर पर है।&nbsp;</p>
<p>इस कमी का कारण वियतनाम, अमेरिका और यूक्रेन जैसे प्रमुख उत्पादक देशों में उत्पादन कम रहने का अंदेशा है। हालांकि इन कटौतियों की भरपाई रूस और कजाकिस्तान के बेहतर अनुमानों से की गई है। उत्पादन अनुमानों में गिरावट के बावजूद 2024 में वैश्विक चावल व्यापार 1,12,000 टन बढ़ कर 5.52 करोड़ टन होने की उम्मीद है। थाईलैंड और अमेरिका से निर्यात बढ़ने की संभावना व्यक्त की गई है।</p>
<p>रिपोर्ट में कहा गया है कि थाईलैंड से निर्यात किए जाने वाले नियमित साबुत चावल की कीमतों में पिछले महीने 1% से 2% की मामूली कमी आई है। इसके विपरीत वियतनाम के 5% टूटे चावल की कीमतों में थोड़ी वृद्धि हुई है। अर्जेंटीना को छोड़कर दक्षिण अमेरिकी चावल की कीमतों में सामान्य रूप से वृद्धि देखी गई। &nbsp;अमेरिका के लंबे और मध्यम किस्म के मिल्ड चावल की कीमतें स्थिर बनी रहीं। हालांकि वहां के कच्चे चावल की कीमतें, विशेष रूप से कैलिफोर्निया के मध्यम और छोटे दाने वाले चावल की कीमतें लगातार घट रही हैं।</p>
<p>अमेरिकी राइस प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन (USRA) के अनुसार यूएसडीए के आपूर्ति आंकड़े में कटौती के बावजूद वैश्विक चावल की उपलब्धता पिछले वर्ष की तुलना में 14% अधिक है। एसोसिएशन की राइस एडवोकेट रिपोर्ट में बताया गया है कि वियतनाम, फिलीपींस और केन्या में खपत घटने से वैश्विक खपत में थोड़ी गिरावट आई है। हालांकि ब्राजील से सप्लाई की समस्या और भारत से निर्यात पर अंकुश का असर ग्लोबल मार्केट पर हो रहा है।</p>
<p>इंटरनेशनल ग्रेंस काउंसिल (IGC) की अगस्त की ग्रेन मार्केट रिपोर्ट के अनुसार मासिक आधार पर अंतर्राष्ट्रीय बाजार में चावल की औसत कीमतें लगभग स्थिर रहीं। थाईलैंड में कमजोर खरीद के कारण सफेद और पारबॉयल्ड चावल की कीमतों में थोड़ी नरमी आई। दूसरी तरफ इंडोनेशिया और फिलीपींस को बिक्री बढ़ने के बाद वियतनाम में 5% टूटे चावल की कीमतें 14 डॉलर बढ़कर 563 डॉलर प्रति टन हो गईं।</p>
<p>एफएओ ने अगस्त 2024 के राइस प्राइस अपडेट में बताया था कि जुलाई में वैश्विक बाजार में चावल की कीमतों में 2.4% की गिरावट आई और दाम 12 महीने के निचले स्तर पर पहुंच गए। हालांकि वैश्विक चावल बाजार अस्थिर बने हुए हैं, फिर भी 2024-25 के लिए रिकॉर्ड उत्पादन के अनुमान से फिलहाल आपूर्ति को लेकर समस्या नजर नहीं आ रही है।&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ यूएसडीए ने वैश्विक चावल उत्पादन का अनुमान घटाया, फिर भी इस वर्ष रिकॉर्ड प्रोडक्शन की उम्मीद ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कृषि निर्यात बढ़ाने के लिए रूस की खेती की जमीन का विस्तार करने की योजना]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/to-boost-agricultural-exports-russia-aims-to-expand-arable-land.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 22 Sep 2024 16:17:22 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/to-boost-agricultural-exports-russia-aims-to-expand-arable-land.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>कृषि क्षेत्र में दुनिया में एक बड़ी ताकत के रूप में अपनी स्थिति को मजबूत करने और निर्यात को बढ़ावा देने के लिए रूस लाखों हेक्टेयर जमीन पर दोबारा खेती करने की योजना बना रहा है। इन जमीनों पर बहुत पहले खेती हुआ करती थी, लेकिन कई दशकों से वहां खेती बंद है। हालांकि, इस महत्वाकांक्षी पहल के लिए सरकार और निजी क्षेत्र से पर्याप्त निवेश की आवश्यकता होगी। रूस की पुतिन सरकार की यह पहल &nbsp;लाभदायक होगी या नहीं, इस पर भी अभी संदेह बना हुआ है। वर्ल्ड ग्रेन पत्रिका ने अपने नवीनतम अंक में एक लेख में यह जानकारी दी है।</p>
<p>गौरतलब है कि अक्टूबर 2023 में रूस और चीन ने 12 साल के लिए एक ऐतिहासिक समझौता किया था। उस समझौते के तहत रूस चीन को सात करोड़ टन अनाज, दालें और तिलहन की आपूर्ति करेगा। यह समझौता 25.8 अरब डॉलर का है। दोनों देशों के बीच खाद्य व्यापार के इतिहास में यह सबसे बड़ा सौदा है। इस सौदे को न्यू लैंड ग्रेन कॉरिडोर (एनएलजीसी) के अंतर्गत रखा गया है। यह कॉरिडोर रूस के सुदूर पूर्व, यूराल पर्वत और साइबेरिया में निर्माणाधीन एक लॉजिस्टिक हब है।</p>
<p>वर्ल्ड ग्रेन के अनुसार रूस के कृषि मंत्रालय ने इसी साल देश के लगभग आधे हिस्से में स्थित 36 क्षेत्रों में कृषि भूमि की संभावनाओं पर अध्ययन पूरा किया है। इस अध्ययन में 1.3 करोड़ हेक्टेयर परित्यक्त भूमि का पता चला। इसमें से 51 लाख हेक्टेयर भूमि को तत्काल खेती के लिए उपयुक्त माना गया है। मंत्रालय का लक्ष्य 2025 तक शेष क्षेत्रों में संभावनाओं का अध्ययन करना है। इन इलाकों में खेती के लिए निवेशकों को विशेष प्रोत्साहन दिए जाएंगे। उनके लिए इन भूखंडों के अधिग्रहण की प्रक्रिया को भी सरल बनाया जाएगा।</p>
<p>इन्सेंटिव देने के अलावा सरकार इस प्रक्रिया को तेज करने के लिए नियामक स्तर पर भी बदलाव कर रही है। फेडरल काउंसिल की कृषि नीति समिति के अध्यक्ष, अलेक्जेंडर द्वोयनिख ने कृषि भूमि निरीक्षण पर लगी रोक को हटाने की वकालत की है। वर्ष 2024 में रूस सरकार इस तरह की भूमि को दोबारा कृषि में इस्तेमाल करने के लिए 47 करोड़ डॉलर आवंटित करने पर विचार कर रही है। अधिकारी आर्कटिक क्षेत्र पर भी नजर गड़ाए हुए हैं, जहां जलवायु परिवर्तन और पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने से खेती के नए अवसर उत्पन्न हो रहे हैं।</p>
<p>हालांकि, विशेषज्ञ इस योजना की आर्थिक व्यवहार्यता को लेकर सतर्क हैं। उनका कहना है कि कुछ वर्षों से अनुपयोगी पड़ी भूमि का विकास करना किफायती हो सकता है, लेकिन दशकों तक परित्यक्त भूखंडों को दोबारा खेती के लिए तैयार करना महंगा साबित होगा, क्योंकि इसमें पेड़ हटाने, जल निकासी और भूमि सुधार जैसी महंगी प्रक्रियाएं शामिल होंगी। इन चुनौतियों के बावजूद, रूस की कृषि विस्तार की यह योजना इसके घरेलू और वैश्विक कृषि परिदृश्य को बदलने की दिशा में एक बड़ा कदम हो सकती है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ कृषि निर्यात बढ़ाने के लिए रूस की खेती की जमीन का विस्तार करने की योजना ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[नेपाल के रास्ते भारत में चाइनीज लहसुन की तस्करी, कई राज्यों में अवैध आपूर्ति का विरोध]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/smuggling-of-chinese-garlic-into-india-via-nepal-protest-against-illegal-supply-in-many-states.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 12 Sep 2024 18:34:22 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/smuggling-of-chinese-garlic-into-india-via-nepal-protest-against-illegal-supply-in-many-states.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत में नेपाल के रास्ते चाइनीज लहसुन की तस्करी हो रही है। हाल ही में उत्तर प्रदेश के महराजगंज में भारत-नेपाल सीमा पर कस्टम विभाग ने चाइनीज लहसुन की एक बड़ी खेप पकड़ी है। जांच में पता चला कि चीन के लहसुन को भारत में खपाने के लिए लाया जा रहा था। जब्त किए गये लहसुन का लैब टेस्ट कराया गया तो सैंपल फेल हो गये और लहसुन में फंगस पाया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि यह लहसुन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है और इसके सेवन से गंभीर बीमारियां होने का खतरा है। लेकिन जानकारी के अभाव और सस्ता होने की वजह से लोग चाइनीज लहसुन खरीद लेते हैं।</p>
<p>इस साल भारत में लहसुन उत्पादक क्षेत्रों में बारिश और बाढ़ के चलते लहसुन की पैदावार कम हुई। हाल के वर्षों में देश में लहसुन उत्पादन घटा है। इसलिए लहसुन के दाम अधिक हैं। इसका फायदा उठाकर भारत में चाइनीज लहसुन को डंप किया जा रहा है। भारत-नेपाल सीमा पर आवाजाही आसान होने से चाइनीज लहसुन की भारत में तस्करी हो रही है और यह देश की मंडियों में पहुंच रहा है।&nbsp;&nbsp;</p>
<p>भारतीय लहसुन का दाम जहां लगभग 300-400 रुपये किलो तक है वहीं, चाइनीज लहसुन 100-150 रुपये किलो बिकता है। पिछले एक महीने के दौरान नेपाल सीमा पर लगभग 16 टन चाइनीज लहसुन पकड़ा जा चुका है। जब्त किए गये लहसुन की इतनी बड़ी मात्रा को नष्ट करना भी कस्टम विभाग के लिए चुनौती बन गया है। क्योंकि इससे पूरे क्षेत्र में भयंकर दुर्गंध फैल जाती है। महराजगंज में कस्टम विभाग ने जब्त किए लहसुन को जमीन में दबा दिया था। लेकिन अधिकारियों के जाते ही लोगों ने मिट्टी खोदकर जमीन से लहसुन निकालना शुरू कर दिया। &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;</p>
<p>चाइनीज लहसुन को लेकर मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात की मंडियों में काफी विरोध हो रहा है। मध्य प्रदेश के व्यापारियों ने विरोध दर्ज करते हुए मंडियों में एक दिन नीलामी बंद रखी। व्यापारी सवाल उठा रहे हैं कि तस्करी के जरिए चाइनीज लहसुन भारत कैसे आ रहा है। जबकि पिछले कई साल से भारत में चाइनीज लहसुन पर प्रतिबंध लगा हुआ है। फेडरेशन ऑफ राजस्थान ट्रेड एंड इंडस्ट्रीज के सुरेश अग्रवाल कहते हैं, "सरकार को ध्यान देना चाहिए कि उसने जो बैन लगाया था उसके बाद भी चाइनीज लहसुन भारत की मंडियों में कैसे पहुंच रहा है।"</p>
<p>गुजरात में भी प्रतिबंधित चाइनीज लहसुन की अवैध आपूर्ति का विरोध हो रहा है। सौराष्ट्र के राजको, गोंडल और जामनगर की मंडियों में व्यापारियों ने चाइनीज लहसुन को लेकर विरोध-प्रदर्शन किया। लहसुन उत्पादक किसानों ने आरोप लगाया है कि जैसे ही लहसुन की मांग बढ़ी तो चाइनीज लहसुन लाने का प्रयास किया जा रहा है। किसानों और व्यापारियों ने सरकार ने प्रतिबंधित चीनी लहसुन के बाजार में आने पर कानूनी कार्रवाई की मांग की है। चीनी लहसुन इसी तरह देश में आता रहा तो किसानों के लहसुन के दाम नीचे गिर जाएंगे।&nbsp;</p>
<p>&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ नेपाल के रास्ते भारत में चाइनीज लहसुन की तस्करी, कई राज्यों में अवैध आपूर्ति का विरोध ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[वायु प्रदूषण कम होने से करीब 8 साल अधिक जी पाएंगे दिल्ली के निवासी: एक्यूएलआई रिपोर्ट]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/if-air-pollution-decreases-delhi-residents-will-be-able-to-live-8-years-longer-aqli-report.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 29 Aug 2024 17:57:20 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/if-air-pollution-decreases-delhi-residents-will-be-able-to-live-8-years-longer-aqli-report.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>दक्षिण एशिया में वायु प्रदूषण में गिरावट दर्ज किए जाने के कारण वैश्विक प्रदूषण में थोड़ी कमी आई है<strong><span>, </span></strong>लेकिन दुनिया के तीन-चौथाई से ज्यादा देशों ने या तो राष्ट्रीय प्रदूषण मानक निर्धारित नहीं किए हैं या उन्हें पूरा नहीं कर रहे हैं। &nbsp;<strong>&nbsp;</strong></p>
<p>साल 2022 में वैश्विक प्रदूषण थोड़ा कम हुआ था<strong><span>, </span></strong>लेकिन <strong><a href="https://aqli.epic.uchicago.edu/">वायु गुणवत्ता जीवन सूचकांक (एक्यूएलआई)</a> </strong>के नए आंकड़ों के अनुसार<strong>,</strong> मानव स्वास्थ्य के लिए वायु प्रदूषण सबसे बड़ा बाहरी खतरा बना हुआ है। अगर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के दिशा-निर्देशों को पूरा करने के लिए दुनिया महीन कणों के प्रदूषण (पीएम2.5) को स्थायी रूप से कम कर दे तो औसत मानव जीवन प्रत्याशा में <strong><span>1.9</span></strong> वर्ष की वृद्धि होगी।<strong>&nbsp;</strong></p>
<p>वायु गुणवत्ता जीवन सूचकांक (एक्यूएलआई) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में बहुत महीन कणों से होने वाला प्रदूषण <strong>(</strong>पीएम<strong><sub>2.5</sub></strong><strong>)</strong> 2021 के मुकाबले 2022 में 19.3 फीसदी घटा था। इसके बावजूद देश की 42.6 फीसदी आबादी ऐसे क्षेत्रों में रहती है जहां प्रदूषण स्तर राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानक से अधिक है। अगर पार्टिकुलेट पॉल्यूशन को डब्ल्यूएचओ मानक के हिसाब से कम किया जाए तो देश की राजधानी दिल्ली के निवासियों की जीवन प्रत्याशा में 7.8 वर्ष की बढ़ोतरी हो सकती है। &nbsp;<strong>&nbsp;</strong></p>
<p>रिपोर्ट बताती है कि पार्टिकुलेट पॉल्यूशन से औसत भारतीय की आयु 3.6 वर्ष घट रही है। उत्तर भारत का मैदानी इलाका देश का सबसे प्रदूषित क्षेत्र हैं जहां 54 करोड़ लोग (देश की 38.9 फीसदी आबादी) रहते हैं। अगर प्रदूषण वर्तमान स्तर पर बना रहता है तो इस क्षेत्र के निवासियों की जीवन प्रत्याशा में डब्ल्यूएचओ के मानक के सापेक्ष औसतन 5.4 वर्ष और राष्ट्रीय मानक के सापेक्ष औसतन 1.9 वर्ष की कमी आने का खतरा है।</p>
<p><strong>यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो</strong> के एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट <strong>(</strong>ईपीआईसी<strong>) </strong>के निदेशक और अर्थशास्त्र के&nbsp;प्रतिष्ठित प्रोफेसर <strong>माइकल ग्रीनस्टोन</strong> कहते हैं<strong>,</strong> <strong><span>"</span></strong>वायु प्रदूषण एक वैश्विक समस्या बना हुआ है। इसका सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव कुछ ही देशों में केंद्रित है। कुछ क्षेत्रों में तो जीवन <strong><span>6</span></strong> वर्षों से भी ज्यादा घट रहा है। अधिक प्रदूषण अक्सर नीति निर्धारण में कमी या मौजूदा नीतियों को लागू करने में विफलता को दर्शाता है।"<strong><span>&nbsp;</span></strong></p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/08/image_750x_66d06908ed18f.jpg" alt="" style="display: block; margin-left: auto; margin-right: auto;" /></p>
<p>रिपोर्ट के अनुसार<strong>, पार्टिकुलेट पॉल्यूशन</strong> (बहुत छोटे और महीन कणों से होने वाला प्रदूषण) का जीवन प्रत्याशा पर प्रभाव धूम्रपान के बराबर है<strong>, </strong>जो अत्यधिक शराब के सेवन से 4 गुना अधिक<strong>, </strong>सड़क दुर्घटनाओं से 5 गुना अधिक और एचआईवी/एड्स से 6 गुना अधिक है। फिर भी<strong>, </strong>दुनिया भर में प्रदूषण की चुनौती बहुत असमान है। पृथ्वी पर सबसे प्रदूषित स्थानों पर रहने वाले लोग ऐसी हवा में सांस लेते हैं जो सबसे कम प्रदूषित स्थानों पर रहने वाले लोगों की तुलना में छह गुना अधिक प्रदूषित है। इसके कारण उनका जीवन औसतन 2.7 वर्ष कम हो जाता है।<strong><span>&nbsp;</span></strong></p>
<p><strong>दक्षिण एशिया</strong> में वायु प्रदूषण घटने के कारण 2022 में वैश्विक प्रदूषण में गिरावट आई है। प्रदूषण एक दशक से भी ज्यादा समय से बढ़ रहा था<strong><span>, </span></strong>लेकिन एक साल में इसमें 18 प्रतिशत की गिरावट आई। इस गिरावट के कारणों को निश्चित रूप से जानना मुश्किल है<strong><span>, </span></strong>लेकिन मौसम संबंधी कारणों - जैसे कि सामान्य से अधिक बारिश - ने इसमें अहम भूमिका निभाई है। प्रदूषण में गिरावट के बावजूद दक्षिण एशिया दुनिया में सबसे ज्यादा प्रदूषित क्षेत्र बना हुआ है<strong><span>, </span></strong>जहां अधिक प्रदूषण के कारण कुल जीवन वर्षों में से 45 प्रतिशत की हानि होती है। अगर विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशा-निर्देशों के अनुसार प्रदूषण को स्थायी रूप से कम कर दिया जाए<strong><span>, </span></strong>तो इन देशों में रहने वाले औसत व्यक्ति की जिंदगी में 3.5 साल की वृद्धि होगी।<strong>&nbsp;</strong></p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/08/image_750x_66d06917dde08.jpg" alt="" style="display: block; margin-left: auto; margin-right: auto;" /></p>
<p>राष्ट्रीय मानक प्रभावी नीतियां तैयार करने और वायु गुणवत्ता में सुधार के लिए महत्वपूर्ण हैं। दुनिया की एक तिहाई आबादी ऐसे क्षेत्रों में रहती है जो देश अपने द्वारा निर्धारित मानकों को पूरा नहीं करते हैं। अगर वे देश अपने स्वयं के मानदंडों को पूरा कर दें तो ये 2.5 अरब लोग औसतन 1.2 साल अधिक जीवित रहेंगे।<strong>&nbsp;</strong></p>
<p>एक्यूएलआई की निदेशक <strong>तनुश्री गांगुली</strong> कहती हैं कि महत्वाकांक्षी मानक निर्धारित करना इस समस्या के हल का केवल एक हिस्सा है। उतना ही महत्वपूर्ण है नीतियों को लागू करना और निगरानी तंत्र विकसित करना। कुछ देश इसमें सफल हो रहे हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि वायु प्रदूषण की समस्या का समाधान किया जा सकता है।<strong>&nbsp;</strong></p>
<p>दुनिया में 94 देशों में से 37 देश ऐसे हैं जो वायु गुणवत्ता के अपने मानकों को पूरा नहीं करते हैं जबकि आधे से अधिक देशों ने कोई मानक तय ही नहीं किया है। कुल मिलाकर<strong>, </strong>दुनिया भर के 77 प्रतिशत देशों और क्षेत्रों ने या तो राष्ट्रीय मानक को पूरा नहीं करते या उनका कोई राष्ट्रीय मानक नहीं है।<strong>&nbsp;</strong></p>
<p>ईपीआईसी के स्वच्छ वायु कार्यक्रम की निदेशक <strong>क्रिस्टा हसेनकोफ़</strong> कहती हैं<strong>, "</strong>अत्यधिक प्रदूषित देश<strong>,</strong> जिनके पास वायु गुणवत्ता संबंधी बहुत कम आंकड़े हैं या कोई आंकड़ा नहीं है<strong>, </strong>उन्हें समस्या की सही जानकारी नहीं मिल पाती है। क्योंकि कम आंकड़े होने से इस मुद्दे पर कम ध्यान जाता है या नीति निवेश कम होता है<strong>, </strong>जिससे आंकड़ों की मांग कम होती है। यह एक दुष्चक्र है। लगातार कोशिशों और वायु गुणवत्ता संबंधी आंकड़ों के जरिए इस दुष्चक्र को तोड़ा जा सकता है। &nbsp;इस तरह के आंकड़े राष्ट्रीय मानक तय करने के लिए आवश्यक हैं।"</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/08/image_750x500_66d068f1999d2.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ वायु प्रदूषण कम होने से करीब 8 साल अधिक जी पाएंगे दिल्ली के निवासी: एक्यूएलआई रिपोर्ट ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[ब्राजील और अर्जेंटीना में सूखा रोधी एचबी4 गेहूं की किस्म की सीमित खेती]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/drought-resistant-hb4-wheat-being-planted-on-limited-basis-in-brazil-and-argentina.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 25 Aug 2024 16:41:33 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/drought-resistant-hb4-wheat-being-planted-on-limited-basis-in-brazil-and-argentina.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>दक्षिण अमेरिका में गेहूं की एक नई सूखा प्रतिरोधी किस्म महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली है। अर्जेंटीना की कंपनी बायोसेरेस ने सूरजमुखी से प्राप्त जीन का उपयोग करके गेहूं की एचबी4 (HB4) किस्म विकसित की है, जिसकी अर्जेंटीना और ब्राजील में खेती की जा रही है। वर्ल्ड ग्रेन पत्रिका ने अगस्त 2024 के अपने नवीनतम अंक में इस बारे में एक रिपोर्ट प्रकाशित की है। ब्राजील और अर्जेंटीना दक्षिण अमेरिका के प्रमुख अनाज और तिलहन उत्पादक देश हैं। अमेरिका के बाद ये दुनिया में बायोटेक फसल किस्मों के दूसरे और तीसरे सबसे बड़े उत्पादक हैं।&nbsp;</p>
<p>रिपोर्ट में कहा गया है कि बायोसेरेस द्वारा विकसित एचबी4 किस्म सूखा प्रतिरोधी है। हालांकि, अर्जेंटीना में मंजूरी ने कई किसान संगठनों और निर्यातकों के बीच चिंता पैदा कर दी, क्योंकि वे समझते हैं कि इससे अर्जेंटीना के गेहूं के निर्यात को झटका लग सकता है। इन चिंताओं को दूर करने के लिए, अर्जेंटीना की सरकार ने राष्ट्रीय बीज संस्थान (INASE) के तहत एक ऑडिट आयोग बनाया। जांच के बाद अधिकारियों ने माना कि एचबी4 गेहूं से बने आटे को दी गई जैव सुरक्षा स्वीकृति रेगुलेटरी जरूरतें पूरी करती है। अर्जेंटीना में मई 2022 में एचबी4 बीज के व्यावसायीकरण के लिए पूर्ण स्वीकृति प्रदान की गई। ब्राजील में इस किस्म को मार्च 2023 में खेती के लिए स्वीकृति मिली।</p>
<p>रिपोर्ट के अनुसार, बायोसेरेस में वैश्विक बीज और ट्रेट बिजनेस के मैनेजर मार्टिन मारियानी ने कहा, "अर्जेंटीना और ब्राजील में लगाए जा रहे एचबी4 गेहूं को हम पारंपरिक गेहूं के रिप्लेसमेंट के रूप में नहीं बल्कि एक बीमा पॉलिसी की तरह देखते हैं। क्योंकि यह पारंपरिक गेहूं उत्पादन वाले उन क्षेत्रों में उत्पादन को स्थिर कर सकता है जो लंबे समय तक और अधिक नियमित रूप से सूखे की घटनाओं का सामना कर रहे हैं। इनमें अर्जेंटीना के पम्पास के मध्य और दक्षिणी उत्पादक क्षेत्र (जो अर्जेंटीना में गेहूं उत्पादन का 95% से अधिक योगदान देते हैं) और ब्राजील के दक्षिणी राज्य (ब्राजील के गेहूं उत्पादन क्षेत्र का 90%) शामिल हैं। इन दोनों ने हाल में अपने सबसे खराब, सबसे लंबे समय तक सूखे का सामना किया है।"</p>
<p>मारियानी ने कहा, "2022-23 के मौसम में अर्जेंटीना में कुल 59 लाख हेक्टेयर में से 55,000 हेक्टेयर से ज्यादा में एचबी4 गेहूं लगाया गया। कुल मिलाकर, 2019 से लेकर आज तक अर्जेंटीना में एक लाख हेक्टेयर से ज्यादा में एचबी4 गेहूं लगाया गया है। हमने अन्य बीज कंपनियों के साथ भी सहयोग किया है जो अर्जेंटीना में एचबी4 किस्में विकसित कर रही हैं।" उन्होंने कहा कि एचबी4 गेहूं आज उपलब्ध एकमात्र सूखा-सहिष्णु गेहूं तकनीक है।&nbsp;</p>
<p>मारियानी ने कहा, "यह फसलों को पानी की कमी की स्थिति में प्रकाश संश्लेषण बनाए रखने और एंटीऑक्सीडेंट और ऑस्मोप्रोटेक्टेंट्स उत्पन्न करने में सक्षम बनाता है। इस तरह यह प्रतिकूल परिस्थितियों में अधिक उपज प्रदान करता है। यह अधिक चरम जलवायु परिस्थितियों में अनुकूलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।"&nbsp;</p>
<p>उन्होंने कहा कि एचबी4 किस्म कम पानी की परिस्थितियों में औसतन 20% अधिक उपज देता है। किसानों के दृष्टिकोण से, महत्वपूर्ण बात यह है कि जब सूखा नहीं होता है तो इस किस्म से उपज में कोई कमी नहीं आती है। यह ग्लूफ़ोसिनेट हर्बिसाइड के प्रति भी सहनशील है।</p>
<p>जेनेटिकली इंजीनियर्ड (जीई) फसलों की खेती के मामले में अर्जेंटीना दुनिया में तीसरा स्थान रखता है। यहां 260 लाख हेक्टेयर से अधिक भूमि पर आनुवंशिक रूप से इंजीनियर्ड सोयाबीन, मक्का और कपास की खेती होती है। 1996 में हर्बिसाइड-टॉलरेंट सोयाबीन की शुरूआत के साथ जीई फसलों को व्यावसायिक रूप से अपनाना शुरू हुआ और तब से इसके रकबा में काफी वृद्धि देखी गई है।</p>
<p>वर्तमान में अर्जेंटीना में लगाए जाने वाले 100% सोयाबीन, 99% मक्का और 100% कपास आनुवंशिक रूप से इंजीनियर्ड हैं। अतीत में अर्जेंटीना मुख्य रूप से फ़ीड और फाइबर के लिए जीई फसलों का उत्पादक रहा है। यह अब खाद्य उपयोग के लिए जीई गेहूं का पहला प्रमुख निर्यातक है।</p>
<p>एचबी4 गेहूं को मंजूरी से पहले, ब्राजील में वाणिज्यिक खेती के लिए 105 जीई इवेंट को मंजूरी दी गई थी। उनमें से 55 मक्का के लिए, 23 कपास के लिए, 18 सोयाबीन के लिए, छह गन्ने के लिए, दो यूकेलिप्टस के लिए और एक ड्राई एडिबल बीन की वायरस प्रतिरोधी किस्म के लिए थी।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/08/image_750x500_66cb11454db1e.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ ब्राजील और अर्जेंटीना में सूखा रोधी एचबी4 गेहूं की किस्म की सीमित खेती ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[विभिन्न देशों के संरक्षणवादी रवैये से वैश्विक कृषि व्यापार में बढ़ रही मुश्किल]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/global-agriculture-trade-faces-a-growing-protectionist-threat.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 25 Aug 2024 10:53:02 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/global-agriculture-trade-faces-a-growing-protectionist-threat.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>वैश्विक कृषि व्यापार को इन दिनों महंगाई समेत कई जटिलताओं का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि अधिकतर देश अपनी घरेलू आपूर्ति सुधारने और घरेलू बाजार में कीमतों पर नियंत्रण रखने के लिए संरक्षणवादी तरीके अपना रहे हैं। तुर्की द्वारा गेहूं के आयात पर प्रतिबंध और भारत के गैर-बासमती चावल के निर्यात पर प्रतिबंध जैसे कदमों के साथ विभिन्न देशों ने टैरिफ और कड़े सैनिटरी और फाइटोसैनिटरी नियमों तक की कार्रवाई की हैं। वैश्विक पत्रिका वर्ल्ड ग्रेन ने अपने अगस्त 2024 के अंक में प्रकाशित सुसान रीडी की एक रिपोर्ट में यह कहा है।</p>
<p>बहुपक्षीय समझौतों की जगह द्विपक्षीय और क्षेत्रीय नीतियां ले रही हैं, जिसके परिणामस्वरूप देश अलग-अलग दिशाओं में जा रहे हैं। रिपोर्ट में राबो बैंक के एक्जीक्यूटिव प्रेसिडेंट स्टीफन निकोलसन ने कहा है, "मुझे अपने करियर में संरक्षणवादी रवैये का इतना गंभीर दौर याद नहीं है। ऐसे कदम केवल व्यापार को जटिल बनाते हैं। इससे कुछ देशों को नुकसान पहुंचता है और दूसरों को लाभ।"</p>
<p>यह संरक्षणवादी रवैया कई वजहों से पैदा हो रहा है। इनमें कोविड-19 महामारी के कारण आपूर्ति श्रृंखला में आए व्यवधान, बढ़ती मुद्रास्फीति, भू-राजनीतिक तनाव, वैश्वीकरण का विरोध और इस साल उन देशों में होने वाले चुनावों के साथ राजनीतिक अनिश्चितता शामिल है, जहां दुनिया की लगभग आधी आबादी रहती है। निकोलसन कहते हैं, "कृषि में, यह तब तक ठीक है जब तक कि कुछ गलत न हो जाए, जैसे कि आपूर्ति में व्यवधान। उसके बाद मूल्य में अधिक उतार-चढ़ाव होते हैं। सप्लाई चेन महंगी होने के कारण दाम बढ़ते हैं सो अलग।"</p>
<p>कोबैंक में अनाज और तिलहन के प्रमुख अर्थशास्त्री टैनर एमके ने इस रिपोर्ट में कहा, "हालांकि संरक्षणवादी उपायों के कारण अलग-अलग देशों में अलग हैं, लेकिन कोविड-19 महामारी के कारण आपूर्ति श्रृंखला में आए झटके सहित कुछ समान कारण भी हैं। किसी भी विपरीत परिस्थिति के लिए इन्वेंट्री बनाए रखने की कोशिश हो रही है।"</p>
<p>भारत का उल्लेख करते हुए निकोलसन ने कहा, "इसने गैर-बासमती सफेद चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया और बाद में पारबॉयल्ड चावल के निर्यात पर 20% शुल्क लगाया। वर्तमान में, भारत चावल निर्यात की समीक्षा कर रहा है और गेहूं पर 40% आयात शुल्क हटाने पर भी विचार कर रहा है।"</p>
<p>एमके ने कहा, "भारत सस्ते वैश्विक गेहूं की कीमतों का लाभ उठाकर अपना सरकारी भंडार बढ़ाना चाहता है। लेकिन यह इस बात का भी संकेत है कि भारत शायद निर्यात प्रतिबंधों पर आगे नहीं बढ़ने वाला है। अभी उन्हें मौसम संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है और खाद्य मुद्रास्फीति अब भी एक समस्या है।"&nbsp;</p>
<p>रिपोर्ट में कहा गया है कि फरवरी 2022 में रूस के यूक्रेन पर आक्रमण जैसे भू-राजनीतिक मुद्दों ने व्यापार का माहौल बिगाड़ा है। यूरोपीय संघ के प्रतिबंध इस हमले का प्रत्यक्ष परिणाम थे। इस वजह से अनाज व्यापार का मार्ग बदलना पड़ा। बड़ी मात्रा में अनाज पोलैंड, स्लोवाकिया, हंगरी और रोमानिया में जमा हो हो गया, जिससे दाम घट गए और स्थानीय किसानों को नुकसान पहुंचा। तुर्की भी अपने किसानों को कम कीमतों से बचाने की कोशिश कर रहा है, क्योंकि लगातार दो रूसी गेहूं की फसलें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं।&nbsp;</p>
<p>दूसरी तरफ, सप्लाई चेन बदलने से अनाज की लागत बढ़ गई है। जैसा कि एमके कहते हैं, "भारत के चावल निर्यात प्रतिबंध के बाद, कीमतों में 20% से अधिक की वृद्धि हुई, और अफ्रीकी देश, जो चावल के लिए भारत पर बहुत अधिक निर्भर थे, नए आपूर्तिकर्ता खोजने के लिए संघर्ष कर रहे थे। मेडागास्कर के चावल आयात में 2023 में 44% की गिरावट आई, जबकि प्रतिबंध के बाद केन्या चावल आयात कर ही नहीं सका। इससे पहले, उसने लगभग 70% यानी 817,000 टन चावल का आयात भारत से किया था।"&nbsp;</p>
<p>निकोलसन ने कहा कि अल्पावधि में संरक्षणवादी उपायों से अपेक्षित लक्ष्य तो प्राप्त हो सकते हैं, लेकिन दीर्घावधि में यह अनपेक्षित परिणामों को जन्म दे सकता है। आपको लग सकता है कि आपने फिलहाल समस्या का समाधान कर दिया है, लेकिन वास्तविकता यह है कि यह दीर्घावधि में नुकसान पहुंचाने वाला है। उन्होंने कहा, "यदि आप किसी घरेलू क्षेत्र को बचाने का प्रयास करते हैं, तो दीर्घावधि में दूसरे देशों को यह लग सकता है कि यह कम कीमत पर बेचने वाला या विश्वसनीय उत्पादक नहीं है, क्योंकि यह सरकारी नीति द्वारा समर्थित है और यह बदल सकता है।"</p>
<p>निकोलसन ने कहा कि 1970 के दशक में प्रतिबंधों के बाद कृषि के दृष्टिकोण से अमेरिका को एक विश्वसनीय आपूर्तिकर्ता का रुतबा हासिल करने में काफी समय लगा। 2018-20 के अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध के बाद सोयाबीन निर्यात के साथ भी यही हुआ है। निकोलसन ने कहा कि पिछले 40 वर्षों में अमेरिका का कृषि निर्यात में हिस्सा 60% से गिरकर 21% हो गया है। यह आंशिक रूप से ब्राजील, रूस और यूक्रेन जैसे देशों के साथ बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण हुआ है। टैरिफ और प्रतिशोधात्मक कार्रवाइयों ने भी इसमें बड़ी भूमिका निभाई है।&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ विभिन्न देशों के संरक्षणवादी रवैये से वैश्विक कृषि व्यापार में बढ़ रही मुश्किल ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने लांच की आसियान&amp;#45;भारत फेलोशिप, 50 छात्रों को मिलेगा मौका]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/agriculture-minister-shivraj-singh-chauhan-launches-asean-india-fellowship-50-students-will-get-the-opportunity.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 14 Aug 2024 19:57:38 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/agriculture-minister-shivraj-singh-chauhan-launches-asean-india-fellowship-50-students-will-get-the-opportunity.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ संबंधों को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार ने कृषि विज्ञान में आसियान-भारत फेलोशिप शुरू की है। फेलोशिप की घोषणा करते हुए केंद्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि अगले पांच वर्षों में आसियान देशों के छात्रों को 50 फेलोशिप प्रदान की जाएंगी। प्रति वर्ष दस फेलोशिप प्रदान की जाएंगी। इसमें कृषि और संबद्ध क्षेत्रों में मास्टर डिग्री कार्यक्रम शामिल होंगे। पहले बैच की अंतिम तिथि 27 अगस्त है।&nbsp;</p>
<p>आसियान-भारत कोष द्वारा वित्त पोषित इस पहल में चयनित छात्रों के लिए प्रवेश शुल्क, रहने का खर्च और आकस्मिक खर्च शामिल होंगे। नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय कृषि विज्ञान केंद्र परिसर, पूसा में आयोजित कार्यक्रम में केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर तथा भागीरथ चौधरी भी उपस्थित थे।&nbsp;</p>
<p>आसियान देशों का जिक्र करते हुए शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि हम सब एक है और एक-दूसरे के बिना हमारा काम नहीं चल सकता। उन्होंने कहा कि कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और किसान इसके प्राण है। सरकार ने कृषि शिक्षा पर बहुत ध्यान दिया है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) इस काम में गंभीरतापूर्वक लगी हुई है। आईसीएआर-एयू प्रणाली की क्षमता और योग्यता को अब दुनियाभर में मान्यता मिल चुकी है। कई विकासशील देशों के छात्र भारतीय कृषि विश्वविद्यालयों में विकसित अनुसंधान और शिक्षण सुविधाओं से लाभान्वित हो रहे हैं।&nbsp;</p>
<p>केंद्रीय मंत्री ने कहा कि भारत और आसियान के सदस्य देशों के बीच कृषि सहयोग की अपार संभावनाएं हैं, क्योंकि आसियान व भारत कृषि-जलवायु क्षेत्रों के मामले में बहुत समानताएं साझा करते हैं। अब कृषि व सम्बद्ध विज्ञान में उच्च शिक्षा के लिए आसियान-भारत फेलोशिप आरंभ की जा रही है। इससे आसियान सदस्य देशों के छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शोध-आधारित शिक्षा प्राप्त करने में मदद मिलेगी, जिससे भारत और आसियान समुदाय एक-दूसरे के करीब आएंगे। फेलोशिप से आसियान राष्ट्रीयता के छात्रों को सर्वश्रेष्ठ भारतीय कृषि विश्वविद्यालयों में कृषि व सम्बद्ध विज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने हेतु सहायता प्रदान की जाएगी।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने लांच की आसियान-भारत फेलोशिप, 50 छात्रों को मिलेगा मौका ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[बांग्लादेश और भारत के बीच होता है 14 अरब डॉलर का कारोबार,  हसीना सरकार के हटने और हिंसा का होगा प्रतिकूल असर]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/trade-of-14-billion-dollars-between-bangladesh-and-india-will-have-an-impact-due-to-instability-created-in-bangladesh.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 05 Aug 2024 21:03:34 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/trade-of-14-billion-dollars-between-bangladesh-and-india-will-have-an-impact-due-to-instability-created-in-bangladesh.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>बांग्लादेश में छात्रों के आंदोलन के बाद भड़की हिंसा और उसके चलते देश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के अपना देश छोड़ने के चलते पैदा स्थिति का आर्थिक गतिविधियों पर प्रतिकूल असर पड़ना तय है। हालांकि बांग्लादेश के सेना प्रमुख ने अंतरिम सरकार का गठन किये जाने की घोषणा की है लेकिन देश में व्याप्त हिंसा, आगजनी, सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाये जाने की&nbsp; घटनाओं ने देश में अस्थिरता और अराजकता की स्थिति पैदा कर दी है।</p>
<p>सरकारी नौकरियों और शैक्षिक संस्थानों में आरक्षण के मुद्दे पर हुआ छात्रों का आंदोलन देश की सरकार को गिराने तक पहुंच जाएगा पिछले कुछ दिनों तक इसका अंदाजा लगाना मुश्किल लग रहा था। वहां पैदा हुई स्थिति के चलते भारत के लिए कई तरह की मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं और इसमें कारोबारी गतिविधियां का एक अहम पक्ष हैं क्योंकि बांग्लादेश भारत का एक बड़ा कारोबारी साझीदार है और भारत से कृषि उत्पादों का बड़ा निर्यात बांग्लादेश को होता है।</p>
<p><strong>दोनों देशों के बीच होता है 14 अरब डॉलर का कारोबार</strong></p>
<p>भारत और&nbsp; बांग्लादेश के बीच सालाना 14 अरब डॉलर का कारोबार होता है। भारत और बांग्लादेश के व्यापारिक संबंध हमेशा मजबूत रहे हैं। बांग्लादेश भारत से चावल, गेहूं चीनी, आलू और प्याज समेत तमाम कृषि उत्पादों का आयात करता है। पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के बीच व्यापार और आर्थिक संबंध लगातार बढ़े हैं। साल 2006-2027 के दौरान, दोनों देशों के बीच दो अरब डॉलर का कारोबार होता था जो 2023-24 में सात गुना बढ़कर 14 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक हो गया है।</p>
<p>ताजा घटनाक्रम के बाद से दोनों देशों के बॉर्डर पर चौकसी बढ़ा दी गई है, जिससे व्यापारिक गतिविधियां बाधित हो गई हैं। सीमा पर ट्रकों की लंबी कतारें लगी हुई हैं, जो स्थिति के सामान्य होने का इंतजार कर रही हैं।</p>
<p><strong>ठप्प पड़ सकता है रेडीमेड गारमेंट का व्यापार&nbsp;</strong></p>
<p>बांग्लादेश दुनिया के सबसे बड़े गारमेंट निर्माताओं में से एक है। बांग्लादेश हर साल रेडीमेड कपड़ों के निर्यात से लगभग 46 अरब डॉलर का कारोबार करता है। वहां पैदा हुए मौजूदा हालात से रेडीमेड गारमेंट का व्यापार ठप्प पड़ सकता है। देश में चल रहे तनाव के चलते बांग्लादेशी निर्माताओं द्वारा बुक किए गए ऑर्डरों के शिपमेंट में अब देरी हो सकती है।&nbsp; &nbsp;</p>
<p>हालांकि, इस ताजा संकट ने बांग्लादेश के आर्थिक और सामाजिक ताने-बाने को गहरा धक्का पहुंचाया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर जल्द ही स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो इसका असर बांग्लादेश की दीर्घकालिक स्थिरता पर भी पड़ सकता है और भारत-बांग्लादेश के व्यापार संबंधों पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव देखने को मिल सकता है।</p>
<p>बांग्लादेश में दो महीने से चल रहे आरक्षण विरोधी छात्र आंदोलन के बाद प्रधानमंत्री शेख हसीना ने सोमवार, 5 अगस्त को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। हिंसक माहौल के कारण शेख हसीना को देश छोड़कर भागना पड़ा और वे सेना के विमान से रवाना हुईं। वहीं, बांग्लादेश के सेना प्रमुख ने घोषणा की है कि वह एक अंतरिम सरकार बनाएंगे और देश को संभालेंगे।&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ बांग्लादेश और भारत के बीच होता है 14 अरब डॉलर का कारोबार,  हसीना सरकार के हटने और हिंसा का होगा प्रतिकूल असर ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Brijesh Chauhan (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[विश्व बाजार में जुलाई में अनाज के दाम घटे, लेकिन वनस्पति तेल और चीनी की कीमतों में वृद्धि]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/cereal-prices-dip-in-global-market-but-vegetable-oil-and-sugar-prices-up.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 03 Aug 2024 12:34:50 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/cereal-prices-dip-in-global-market-but-vegetable-oil-and-sugar-prices-up.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>जुलाई में लगातार दूसरे महीने विश्व खाद्य कमोडिटी की कीमतों का मानक कमोबेश अपरिवर्तित रहा। पिछले महीने वनस्पति तेलों, मीट और चीनी की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में वृद्धि हुई, लेकिन इसकी भरपाई अनाज के दामों में जारी गिरावट से हो गई। एफएओ खाद्य मूल्य सूचकांक जुलाई में औसतन 120.8 अंक रहा, जो जून के संशोधित 121.0 अंक से थोड़ा कम है। सूचकांक एक वर्ष पहले की तुलना में 3.1 प्रतिशत कम है।</p>
<p>एफएओ अनाज मूल्य सूचकांक में जून से 3.8 प्रतिशत की गिरावट आई। लगातार दूसरे महीने सभी प्रमुख अनाजों के वैश्विक निर्यात मूल्यों में कमी देखने को मिली। उत्तरी गोलार्ध में चल रही सर्दियों की फसलों से बढ़ती मौसमी उपलब्धता और कनाडा तथा अमेरिका में अनुकूल परिस्थितियों के कारण वर्ष के अंत में बड़े पैमाने पर गेहूं की फसल की उम्मीद है। इससे गेहूं के भाव में गिरावट आई।</p>
<p>मक्का के निर्यात मूल्यों में भी गिरावट आई क्योंकि अर्जेंटीना और ब्राजील में फसल पिछले साल से बेहतर है और अमेरिका में भी फसल की स्थिति अच्छी है। इंडिका और जैपोनिका दोनों किस्मों के लिए आम तौर पर कमजोर मांग के बीच एफएओ के चावल की कीमतों के इंडेक्स में जून से 2.4 प्रतिशत की गिरावट आई।&nbsp;</p>
<p>इसके विपरीत, एफएओ वनस्पति तेल मूल्य सूचकांक जून से 2.4 प्रतिशत बढ़कर डेढ़ साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। जैव ईंधन क्षेत्र से सोया तेल की मजबूत मांग और कई प्रमुख उत्पादक देशों में सूरजमुखी और रेपसीड की फसल बिगड़ने की आशंका के कारण पाम, सोया, सूरजमुखी और रेपसीड तेलों के लिए मांग बढ़ी।&nbsp;</p>
<p>एफएओ चीनी मूल्य सूचकांक जून से 0.7 प्रतिशत बढ़ा है, क्योंकि ब्राजील में उम्मीद से कम उत्पादन होने का अनुमान है। भारत में बेहतर मानसून वर्षा और थाईलैंड में अनुकूल मौसम के प्रभाव पर ब्राजील की परिस्थितियां भारी रहीं। एफएओ डेयरी मूल्य सूचकांक जुलाई में अपरिवर्तित रहा। पिछले महीने दूध पाउडर की मांग तो घटी, लेकिन मक्खन और पनीर की बढ़ गई।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/06/image_750x500_66648f0aaf90e.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ विश्व बाजार में जुलाई में अनाज के दाम घटे, लेकिन वनस्पति तेल और चीनी की कीमतों में वृद्धि ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[अप्रैल&amp;#45;जून के दौरान कृषि निर्यात में 3.24 फीसदी गिरावट, मक्का निर्यात 76 फीसदी घटा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/agricultural-exports-declined-by-3-percent-during-april-june-maize-exports-decreased-by-76-percent.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 20 Jul 2024 19:19:34 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/agricultural-exports-declined-by-3-percent-during-april-june-maize-exports-decreased-by-76-percent.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>चालू वित्त की पहली तिमाही यानी अप्रैल-जून के दौरान देश का कृषि निर्यात 3.24 फीसदी घटकर 588.68 करोड़ डॉलर रह गया। इस गिरावट के पीछे गैर-बासमती चावल और प्याज जैसी कृषि उपजों के निर्यात पर लागू पाबंदियों, लाल सागर में हूती हमलों और माल ढुलाई की बढ़ती लागत को वजह माना जा रहा है। कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) के आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल से जून के दौरान चावल का निर्यात मामूली रूप से घटकर 280.83 करोड़ डॉलर रह गया। बासमती और गैर-बासमती चावल के निर्यात में 0.46 प्रतिशत की गिरावट आई है।</p>
<p><strong>बढ़ा फल-सब्जियों का निर्यात </strong></p>
<p>चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में काजू का निर्यात 17.08 फीसदी घटकर 6.86 करोड़ डॉलर रह गया। हालांकि, इस दौरान फलों और सब्जियों में निर्यात में लगभग 6.47 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और यह पहली तिमाही में 84.3 करोड़ डॉलर तक पहुंच गया। मीट, डेयरी और पोल्ट्री प्रोडक्ट्स का निर्यात 0.14 फीसदी की बढ़ोतरी के साथ 101.13 करोड़ डॉलर रहा है। अप्रैल से जून के दौरान मक्का व अन्य अनाजों के निर्यात में 76 प्रतिशत की गिरावट आई और यह 6 करोड़ डॉलर रहा है। भारत में मक्का का उत्पादन बढ़ने के बावजूद घरेलू कीमतें अंतरराष्ट्रीय कीमतों से अधिक हैं जिससे मक्का के निर्यात में गिरावट आई है।</p>
<p><strong>एफपीओ को जोड़ने पर एपीडा का जोर </strong></p>
<p>कृषि निर्यात को बढ़ावा देने के लिए एपीडा किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) के साथ मिलकर कृषि निर्यात नेटवर्क को व्यापक बनाने का प्रयास कर रहा है। इसके तहत अब तक 1,200 एफपीओ को निर्यातक के रूप में पंजीकृत किया गया है। इस वित्तीय वर्ष में 2,500 एफपीओ को शामिल करने का लक्ष्य है।</p>
<p>एपीडा ने ओएनडीसी प्लेटफॉर्म के निर्यात वर्टिकल पर निर्यातकों और एफपीओ को जोड़ने के लिए एक पायलट कार्यक्रम शुरू किया है। अब तक 13 निर्यातक इस प्लेटफॉर्म से जुड़ चुके हैं। इससे एपीडा ने 250 निर्यातकों/एफपीओ को शामिल करने का लक्ष्य रखा है।&nbsp;एपीडा ने ऐसे 25 फोकस उत्पादों की भी पहचान की है, जिनके निर्यात को और बढ़ावा दिया जा सकता है। इनमें प्याज, बासमती चावल, मूंगफली, काजू, केला, आलू, घी, अनार और अनानास शामिल हैं।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/07/image_750x500_669bbfbc37995.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ अप्रैल-जून के दौरान कृषि निर्यात में 3.24 फीसदी गिरावट, मक्का निर्यात 76 फीसदी घटा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[विश्व बाजार में जून में अनाज के दाम घटे, लेकिन वनस्पति तेल, चीनी और डेयरी प्रोडक्ट महंगे हुए]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/cereal-prices-decrease-in-global-market-in-june-output-forecast-to-reach-an-all-time-high-in-2024.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 07 Jul 2024 07:37:44 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/cereal-prices-decrease-in-global-market-in-june-output-forecast-to-reach-an-all-time-high-in-2024.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>जून में विश्व खाद्य वस्तुओं की कीमतों के लिए बेंचमार्क अपरिवर्तित रहा। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार वनस्पति तेलों, चीनी और डेयरी उत्पादों के अंतरराष्ट्रीय बाजार में तो दाम बढ़े, लेकिन उसकी भरपाई अनाज की कीमतों में आई कमी से हो गई।<br />एफएओ खाद्य मूल्य सूचकांक जून में औसतन 120.6 अंक पर रहा। यह मई के संशोधित आंकड़े के समान है। हालांकि सूचकांक पिछले वर्ष जून महीने की तुलना में 2.1 प्रतिशत कम है। यह मार्च 2022 के शिखर से 24.8 प्रतिशत नीचे है।<br /><strong>अनाज और वनस्पति तेलः</strong> अलग-अलग जिंसों का देखें तो एफएओ अनाज मूल्य सूचकांक में मई की तुलना में जून में 3.0 प्रतिशत की गिरावट आई। मोटे अनाज, गेहूं और चावल सबके दाम पिछले महीने कम हुए। इसका प्रमुख कारण बड़े निर्यातक देशों में बेहतर उत्पादन की संभावना है। इसके विपरीत, एफएओ वनस्पति तेल मूल्य सूचकांक मई की तुलना में 3.1 प्रतिशत बढ़ा। इसकी वजह पाम तेल की वैश्विक आयात मांग और अमेरिका में जैव ईंधन के लिए सोया और सूरजमुखी तेलों की मांग बढ़ना है।<br /><strong>चीनीः</strong> एफएओ चीनी मूल्य सूचकांक में लगातार तीन महीने गिरावट के बाद इसमें वृद्धि हुई है। इसमें मई की तुलना में 1.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इसका मुख्य कारण ब्राजील और भारत में उत्पादन पर प्रतिकूल मौसम की आशंका है।<br /><strong>डेयरीः</strong> एफएओ डेयरी मूल्य सूचकांक में 1.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई। बटर के अंतरराष्ट्रीय भाव 24 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गए। खुदरा बिक्री में वृद्धि, पश्चिमी यूरोप में मौसमी रूप से दूध की डिलीवरी में गिरावट और ओशिनिया में कम इन्वेंटरी के चलते दाम बढ़े हैं।</p>
<p><strong>वैश्विक अनाज उत्पादन इस वर्ष उच्चतम स्तर पर पहुंचने की उम्मीद</strong><br />एफएओ ने 2024 में वैश्विक अनाज उत्पादन के लिए अपने पूर्वानुमान को भी अपडेट किया है। उसका नया अनुमान 285.4 करोड़ टन है जो एक नया रिकॉर्ड होगा। एफएओ ने अर्जेंटीना और ब्राजील के साथ-साथ तुर्किये और यूक्रेन में मक्का की फसल बेहतर होने का अनुमान लगाया है। हालांकि इंडोनेशिया, पाकिस्तान और कई दक्षिणी अफ्रीकी देशों में उत्पादन घटने के आसार हैं।<br />एशिया, विशेष रूप से पाकिस्तान में बेहतर संभावनाओं के आधार पर गेहूं उत्पादन का अनुमान बढ़ाया गया है। सीजन की शुरुआत में रूस के प्रमुख गेहूं उत्पादक क्षेत्रों में खराब मौसम के कारण उत्पादन में जो गिरावट की आशंका है, पाकिस्तान में बढ़ा उत्पादन उसकी भरपाई कर देगा। वैश्विक चावल उत्पादन रिकॉर्ड 53.51 करोड़ टन तक पहुंचने का अनुमान है।&nbsp;<br />वर्ष 2024-25 में विश्व अनाज का कुल उपयोग 285.6 करोड़ टन तक बढ़ने का अनुमान है। यह पिछले वर्ष की तुलना में 0.5 प्रतिशत अधिक होगा। ज्यादा वृद्धि चावल और मोटे अनाज की होगी। 2025 में विश्व अनाज स्टॉक में 1.3 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान है। अनाज में अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए एफएओ का अनुमान 48.1 करोड़ टन का है, जो पिछले अनुमान के बराबर है। हालांकि 2023-24 के सीजन से यह तीन प्रतिशत कम है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ विश्व बाजार में जून में अनाज के दाम घटे, लेकिन वनस्पति तेल, चीनी और डेयरी प्रोडक्ट महंगे हुए ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[बासमती पर भौगोलिक अधिकार को लेकर भारत&amp;#45;पाक में झगड़ा, अब न्यूजीलैंड ने खारिज किया आवेदन]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/dispute-between-india-and-pakistan-over-geographical-indicator-of-basmati-now-new-zealand-rejected-india-application.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 04 Jul 2024 17:37:31 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/dispute-between-india-and-pakistan-over-geographical-indicator-of-basmati-now-new-zealand-rejected-india-application.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>देश से सालाना करीब 50 हजार करोड़ रुपये के निर्यात वाले बासमती चावल पर भौगोलिक अधिकार की राह भारत के लिए मुश्किल हो रही है। बासमती के ज्योग्राफिकल इंडिकेशन (जीआई) यानि भौगोलिक पहचान को लेकर भारत और पाकिस्तान अपना-अपना दावा कर रहे हैं। इसके झगड़े के बीच न्यूजीलैंड ने बासमती के लिए भारत के ट्रेड मार्क आवेदन को खारिज कर दिया है। इसके पहले आस्ट्रेलिया भी ऐसा कर चुका है।</p>
<p>न्यूजीलैंड का कहना है कि फ्रेगरेंस राइस (खुशबू वाला चावल) अन्य देश भी उगाते हैं इसलिए इस पर किसी एक देश के दावे को स्वीकार नहीं किया जा सकता है। इंटलैक्चुअल प्रोपर्टी ऑफिस ऑफ न्यूजीलैंड (आईपीओएनजेड) ने भारत को बासमती के लिए जीआई के समान सर्टिफिकेट देने से इनकार कर दिया है। इसके लिए भारत की ओर से एग्रीकल्चरल एंड प्रोसेस्ड फूड प्रॉडक्ट्स एक्सपोर्ट डेवलपमेंट ऑथरिटी (एपीडा) ने आवेदन किया था।</p>
<p>बासमती को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच कई वर्षों से विवाद चल रहा है। पाकिस्तान ने 2022 में यूरोपीय यूनियन (ईयू) में बासमती के जीआई के लिए आवेदन किया था। जबकि पाकिस्तान के आवेदन पर आपत्ति जताते हुए भारत ने इसे रद्द करने की मांग की। बासमती के जीआई के लिए भारत के आवेदन को ईयू ने 2018 से ठंडे बस्ते में डाल रखा है। पाकिस्तान ने अपने आवेदन में 44 जिलों में बासमती उगाने का दावा किया है। जिनमें बलूचिस्तान जैसे इलाके भी शामिल हैं जहां सामान्य चावल पैदा करना भी मुश्किल है। पाकिस्तान ने इस सूची में पाक अधिकृत कश्मीर के चार जिलों को भी शामिल कर लिया है। पाकिस्तान बासमती का जीआई हासिल कर इस महंगे चावल के वैश्विक बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाना चाहता है।</p>
<p>बासमती के वैश्विक बाजार के मसले को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाने की जरूरत है। साल 2008 में बासमती के जीआई के मुद्दे पर भारत और पाकिस्तान की एक संयुक्त बैठक में एक ग्रुप बनाया गया था। इस पर दोनों देशों के संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारियों ने हस्ताक्षर किये थे। तब तय किया गया था कि बासमती के लिए पाकिस्तान के 14 जिलों को उत्पादन क्षेत्र के रूप में स्वीकार किया जाएगा, वहीं भारत के सात राज्यों पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश. उत्तराखंड, दिल्ली और जम्मू एवं कश्मीर को बासमती उत्पादक क्षेत्र को स्वीकार किया जाएगा। उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक, इस बैठक में तय किया गया था कि दोनों देश संयुक्त रूप से बासमती के जीआई टैग के लिए आवेदन करेंगे। लेकिन दोनों देशों के बीच आपसी संबंधों की बिगड़ती स्थिति के चलते मामला ठंडे बस्ते में चला गया।</p>
<p>इस बीच, भारत ने 2018 में बासमती के जीआई टैग के लिए ईयू में आवेदन किया। लेकिन ईयू ने भारत के आवेदन को ठंडे बस्ते में डाल दिया। जबकि पाकिस्तान ने 2022 में आवेदन किया और ईयू ने उसे फास्ट ट्रैक से आगे बढ़ाया। भौगोलिक पहचान (जीई) के तहत आवेदन की शर्त है कि मूल देश में उत्पाद को जीआई टैग के तहत अधिसूचित होना चाहिए। भारत में जीआई के लिए 1999 में कानून बन गया था। लेकिन पाकिस्तान में इसके लिए कानून ही 2022 में बना। तभी पाकिस्तान ने बासमती को जीआई टैग दिया। साथ ही पाकिस्तान ने बासमती के उत्पादक जिलों की संख्या 14 से बढ़ाकर 44 कर दी। इसके अलावा पाक अधिकृत कश्मीर के चार जिले भी जोड़ दिये गये और जिलों की संख्या 48 हो गई। पाकिस्तान में जीआई टैग के लिए आवेदन को पब्लिक करने का प्रावधान नहीं है इसलिए भारत को वास्तविक स्थिति का पता ही नहीं था। लेकिन ईयू में आवेदन के बाद जब पाकिस्तान के आवेदन को आपत्तियों के लिए &nbsp;सार्वजनिक किया गया तो भारत को बासमती पर पाकिस्तान की चाल का पता लगा।</p>
<p>इसके मामले के सामने आने के बाद भारत सरकार हरकत में आई और इस मुद्दे पर वाणिज्य मंत्रालय, कृषि मंत्रालय, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के वैज्ञानिकों के बीच बैठकें हुई हैं। सूत्रों के मुताबिक, वाणिज्य मंत्रालय के कुछ अधिकारियों का मत था कि भारत को भी अपने नये इलाकों को बासमती उत्पादन क्षेत्र में शामिल कर लेना चाहिए। लेकिन उच्च अधिकारी इसके पक्ष में नहीं थे। वहीं, बैठक में शामिल कृषि वैज्ञानिकों ने साफ कर दिया था कि सात राज्यों के अलावा अन्य क्षेत्रों को बासमती उत्पादन क्षेत्र में शामिल करना भारत के हित में नहीं है। जीआई का फायदा तभी है जब हम इसके लिए तय मानदंडों और दावों के आधार पर ही अपना पक्ष रखें। यही देश और किसानों के हित में है। हालांकि, भारत में चावल निर्यातकों की एक लॉबी है मध्य प्रदेश को बासमती उत्पादक क्षेत्र के रूप में शामिल कराना चाहती थी।</p>
<p>सूत्रों के मुताबिक, वाणिज्य मंत्रालय के साथ विदेश मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय के स्तर पर यह तय हुआ कि भारत बासमती पर पाकिस्तान के आवेदन का विरोध करेगा। इसके तहत रणनीति बनाई गयी है कि पाकिस्तान का आवेदन ईयू से निरस्त होने के बाद दोनों देशों के बीच बातचीत का रास्ता शुरू किया जा सकता है। लेकिन इस पर भारत का स्टैंड 2008 के संयुक्त ग्रुप में तय बातों पर ही केंद्रित रहेगा। पाकिस्तान के केवल 14 जिलों को बासमती उत्पादक क्षेत्र माना जाएगा और भारत सात राज्यों के तय उत्पादन क्षेत्रों में ही बासमती उत्पादन करेगा।</p>
<p>दिलचस्प बात यह है कि ईयू में बासमती पर पाकिस्तान के क्लेम के खिलाफ तीन आपत्तियां फाइल हुई हैं। इनमें भारत सरकार, नेपाल सरकार और मध्य प्रदेश की आपत्ति शामिल हैं। भारत में वैज्ञानिकों और अधिकारियों के बड़े वर्ग का कहना है कि भारत पहले से तय अपने सात राज्यों में मौजूदा स्तर से तीन गुना तक बासमती उत्पादन कर सकता है।हमारे देश में बासमती के तहत 60 लाख हैक्टेयर तक का क्षेत्र शामिल किये जाने की संभावना है। मसलन पंजाब में 30 लाख हैक्टेयर में धान होता है जबकि वहां बासमती का क्षेत्रफल केवल छह लाख हैक्टेयर है। इसी तरह हरियाणा में भी करीब छह लाख हैक्टेयर में बासमती होता है जिसे 12 लाख हैक्टेयर तक ले जाया जा सकता है। इसके अलावा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में करीब पांच लाख हैक्टेयर को इसके तहत लाया जा सकता है। <strong>रूरल वॉयस</strong> के साथ बातचीत में एक <strong>वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक</strong> ने कहा कि जब हमारे पास पहले से तय राज्यों में तीन गुना ज्यादा बासमती उगाने की संभावना है तो हमें इसी पर टिकना चाहिए। बासमती का उत्पादन खास भौगोलिक स्थिति, जलवायु और मिट्टी की गुणवत्ता के आधार पर होने के चलते ही केवल सात राज्यों को जीआई की श्रेणी में रखा गया है। जबकि पाकिस्तान ने बासमती के अपने सीमित क्षेत्र को बढ़ाने के लिए नये जिलों को शामिल करने का अनुचित कदम उठाया है जो कानूनी और वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है। उम्मीद है कि बासमती के बहुत व्यापक क्षेत्र में पाकिस्तान का दावा खारिज कराने में भारत कामयाब होगा।</p>
<p>आल इंडिया राइस एक्सपोर्ट्स एसोसिएशन (एआईआरईए) के पूर्व अध्यक्ष <strong>विजय सेतिया</strong> ने रूरल वॉयस को बताया कि इस मुद्दे पर हम पाकिस्तान का विरोध कर रहे हैं। सरकार के अलावा हमारे संगठन ने भी अपने कानूनी अधिकारी के जरिये अपना पक्ष रखा है। अभी तक ईयू का फैसला नहीं आया है। लेकिन न्यूजीलैंड के ताजा फैसले ने इस मुद्दे को फिर से सुर्खियों ला दिया है।</p>
<p>एक तथ्य यह भी है कि सस्ती कीमतों के चलते यूरोपीय यूनियन का बासमती का अधिकांश बाजार पाकिस्तान ने कब्जा रखा है। भारत द्वारा पिछले साल बासमती के निर्यात पर न्यूनतम निर्यात मूल्य (एमईपी) लागू करने का कदम भी बासमती निर्यात के लिए प्रतिकूल साबित हुआ। भारत से निर्यात होने वाला अधिकांश बासमती संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), ईरान और कुछ दूसरे खाड़ी देशों में अधिक जाता है। ऐसे में बासमती को जीई टैग का मुद्दा भारत के लिए काफी अहम है क्योंकि देश में बासमती उत्पादक सात राज्यों के करोड़ों किसानों को निर्यात बाजार की वजह से बेहतर दाम मिल पाता है।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/07/image_750x500_66868a2f0878c.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ बासमती पर भौगोलिक अधिकार को लेकर भारत-पाक में झगड़ा, अब न्यूजीलैंड ने खारिज किया आवेदन ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[सिर्फ 17% सतत विकास लक्ष्य पूरा होने की राह पर, 12.2 करोड़ अतिरिक्त लोगों के सामने भूख की समस्या से खाद्य सुरक्षा भी खतरे में]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/only-17-percent-sdgs-are-on-track-food-security-in-danger-as-122-mn-more-people-suffered-from-hunger.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 30 Jun 2024 10:34:01 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/only-17-percent-sdgs-are-on-track-food-security-in-danger-as-122-mn-more-people-suffered-from-hunger.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">सिर्फ 17% सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) समय पर पूरा होने की राह पर हैं, लगभग आधे लक्ष्यों में बहुत काम प्रगति हुई है और एक तिहाई से कुछ ज्यादा लक्ष्यों की दिशा में प्रगति या तो पूरी तरह रुक गई है अथवा हम और पीछे चले गए हैं। संयुक्त राष्ट्र की तरफ से जारी सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स रिपोर्ट 2024 में यह बात कही गई है। रिपोर्ट के अनुसार कोविड-19 महामारी के दुष्प्रभावों, दुनिया के अनेक के इलाकों में युद्ध, भू-राजनीतिक तनाव और जलवायु परिवर्तन ने सतत विकास लक्ष्यों की प्रगति को बुरी तरह प्रभावित किया है। इसमें बताया गया है कि वर्ष 2019 की तुलना में 2022 में 2.3 करोड़ अधिक लोग भीषण गरीबी में चले गए और 12.2 करोड़ ज्यादा लोग भूख से पीड़ित थे।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">पिछले साल सितंबर में विभिन्न देशों के प्रमुख न्यूयॉर्क में सतत विकास लक्ष्यों की प्रगति की समीक्षा के लिए बैठे और इस बात पर चर्चा की कि इस दिशा में उन्हें गति बढ़ाने की जरूरत है। सतत विकास लक्ष्यों की प्रतिबद्धता दोहराते हुए वे इस बात पर भी सहमत हुए कि इन लक्ष्यों को वर्ष 2030 तक पूरी तरह हासिल करने के लिए तत्काल और बड़े प्रयास करने की जरूरत है। उस बैठक में जारी घोषणा पत्र में सदस्य देशों ने स्वीकार किया कि सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में प्रगति खतरे में है। 2030 तक उन लक्ष्यों को हासिल करने की प्रतिबद्धता भी जताई गई।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">करीब साल भर बाद भी उन्हें लक्ष्यों पर खतरा बना हुआ है। सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स रिपोर्ट 2024 में बताया गया है कि अनेक मोर्चों पर प्रगति या तो पूरी तरह रुक गई है या हम और पीछे चले गए हैं। हालात सुधारने की बात बार-बार कहने के बावजूद यह स्थिति है। कोविड-19 के प्रभाव, युद्ध और जलवायु परिवर्तन तथा उसके आर्थिक असर ने पहले से जारी असमानता को और बढ़ाया है।</span></p>
<p><strong>12.2 करोड़ अतिरिक्त लोगों के सामने भूख की समस्या</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">सतत विकास लक्ष्य 2 जीरो हंगर है, अर्थात दुनिया में कोई भी भूखा ना रहे। लेकिन वर्ष 2022 में 69.1 से 78.3 करोड़ लोगों ने भूख का सामना किया। बीच का आंकड़ा, 73.5 करोड़ का भी लें तो 2019 की तुलना में 2022 में 12.2 करोड़ अतिरिक्त लोग भूख की समस्या से ग्रस्त थे। खाद्य असुरक्षा का स्तर काफी बढ़ा हुआ था और लगातार 2 वर्षों तक इसमें कोई बदलाव नहीं आया। अनुमान है कि दुनिया की 29.5% आबादी या 240 करोड़ लोग खाद्य असुरक्षा की समस्या से मध्यम या बुरी तरह जूझ रहे थे।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में कुपोषण की समस्या गंभीर है। इससे उनका विकास रुकने का जोखिम बढ़ गया है। पूरी दुनिया में 2022 में 5 साल से कम उम्र के 22.3%, अर्थात 14.8 करोड़ बच्चों की लंबाई उम्र के हिसाब से कम (स्टंटिंग) थी। हालांकि 2015 के 24.6% की तुलना में यह कम है। मौजूदा ट्रेंड को देखते हुए कहा जा सकता है कि 2030 में 5 साल से कम उम्र का हर पांच में से एक बच्चा, यानी 19.5% बच्चे स्टंटिंग से प्रभावित होंगे।</span></p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/06/image_750x_667fca3c06649.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>सस्टेनेबल खेती के लिए प्रयास तेज करने की जरूरत</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">रिपोर्ट में कहा गया है कि हमारी मौजूदा और भावी पीढ़ियों की जरूरतें सुनिश्चित करने के लिए प्रोडक्टिव और सस्टेनेबल खेती जरूरी है। वर्ष 2021 के आंकड़े बताते हैं कि दुनिया प्रोडक्टिव और सस्टेनेबल खेती को हासिल करने से मध्यम दूरी पर थी (5 में से 3.4 अंक)। यही नहीं 2015 से इसमें कुछ सुधार भी देखने को मिला। हालांकि क्षेत्रीय विषमता काफी अधिक है। यूरोप और उत्तरी अमेरिका के देशों में स्कोर 4.1 था जबकि सबसे कम विकसित देशों का स्कोर 2.6 रहा। मौजूदा साक्ष्य बताते हैं कि वर्ष 2030 तक प्रोडक्टिव और सस्टेनेबल खेती की दिशा में सुधार के लिए तत्काल और निरंतर प्रयास करने की जरूरत है। ऐसा नहीं करने पर हम लक्ष्य से काफी दूर रह जाएंगे।</span></p>
<p><strong>छोटे किसानों की आय बड़े किसानों के आधे से भी कम</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">रिपोर्ट में कहा गया है कि कृषि एवं खाद्य उत्पादन प्रणाली को मजबूत बनाने और भूख से लड़ने में छोटे किसानों की भूमिका महत्वपूर्ण है। उनका योगदान बड़ा होने के बावजूद ग्रामीण इलाकों के सबसे कमजोर वर्ग में वे आते हैं। पूरे एग्री फूड सिस्टम में भी उनकी उपस्थिति कमजोर ही रहती है। जितने देशों के आंकड़े उपलब्ध हैं, उनमें से 95% देशों के छोटे किसानों की आमदनी बड़े किसानों के आधे से भी कम पाई गई। यह असमानता सभी देशों में है, चाहे उसे देश की आमदनी का स्तर कुछ भी हो। महिलाओं की तुलना में पुरुष छोटे किसानों की आय अधिक होती है। करीब 50% देश में पाया गया कि महिला किसानों की तुलना में पुरुष किसानों की आमदनी 70% अधिक थी।</span></p>
<p><strong>कृषि पर सरकार का खर्च</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">वर्ष 2015 से 2022 के दौरान कृषि पर विभिन्न देशों की सरकारों के खर्च में लगातार वृद्धि हुई। वर्ष 2022 में यह रिकॉर्ड 749 अरब डॉलर पर पहुंच गई। हालांकि जीडीपी में कृषि क्षेत्र के योगदान के अनुपात में कृषि पर सरकारी खर्च कम हुआ है। इसका इंडेक्स 2015 में 0.5 था, जबकि 2021 में गिरकर 0.43 पर आ गया। वर्ष 2022 में इसमें फिर बढ़ोतरी हुई और यह 0.48 के स्तर पर पहुंच गया। महामारी के दौरान सरकारों को दूसरे सेक्टर में संसाधन लगाने पड़े इसलिए कृषि क्षेत्र पर उनके खर्च में कमी आई।</span></p>
<p><strong>60% देशों में खाद्य पदार्थों की कीमत अधिक</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">वर्ष 2022 में लगभग 60% देशों को मध्यम से अधिक खाद्य महंगाई का सामना करना पड़ा। वर्ष 2022 में 58.1% देशों में खाद्य महंगाई असामान्य रूप से अधिक थी। 2015 से 2019 के 15.2 प्रतिशत की तुलना में यह चार गुना है। मध्य एशिया, दक्षिण एशिया, पूर्वी और दक्षिण पूर्व एशिया के देशों में 2020 की तुलना में 2022 में खाद्य महंगाई कम थी, लेकिन 2015 से 2019 के औसत की तुलना में यह अधिक रही।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">रूस यूक्रेन युद्ध के बाद लॉजिस्टिक्स और खाद्य आपूर्ति चेन में बाधा पहुंचने से खाद्य पदार्थ और ऊर्जा की कीमतों में वृद्धि हुई। खासकर 2022 की पहली छमाही में ऐसा देखने को मिला। इस युद्ध से उर्वरकों की कीमतों में भी वृद्धि हुई जिससे किसानों के सामने खेती का संकट बढ़ा।</span></p>
<p><strong>जलवायु के लक्ष्यों को हासिल करने में सफलता</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">रिपोर्ट के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग दुनिया भर की खेती के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभर रही है। वर्ल्ड मेट्रोलॉजिकल आर्गेनाइजेशन ने वर्ष 2023 को अब तक का सबसे गर्म साल बताया है। औद्योगिक युग की शुरुआत से पहले की तुलना में तापमान 1.45 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है। संयुक्त राष्ट्र की एनवायरमेंट प्रोग्राम्स एमिशन गैप रिपोर्ट 2023 के अनुसार वर्ष 2022 में पूरी दुनिया में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन 57.5 गीगा टन कार्बन डाइऑक्साइड (या इक्विवेलेंट) के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। इसमें दो तिहाई उत्सर्जन जीवाश्म ईंधन और उद्योगों से पैदा हुआ।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">विभिन्न देशों की मौजूदा नीतियां अगर जारी रहीं तो विश्व तापमान तीन डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा। विभिन्न देशों ने जो अपने उत्सर्जन लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं उनका सख्ती से पालन करें तब भी ग्लोबल वार्मिंग 2.5 डिग्री सेल्सियस होगी। अगर यह देश नेट जीरो लक्ष्य को हासिल करने में कामयाब होते हैं तब भी तापमान 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ेगा। हालांकि इन लक्ष्यों को हासिल करने की संभावना बहुत कम है। इस समय ग्लोबल वार्मिंग 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने की संभावना सिर्फ 14% है। यह स्थिति मौजूदा दशक में ही उत्सर्जन कम करने के लिए बड़े कदम उठाने के महत्व को बताती है।</span></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ सिर्फ 17% सतत विकास लक्ष्य पूरा होने की राह पर, 12.2 करोड़ अतिरिक्त लोगों के सामने भूख की समस्या से खाद्य सुरक्षा भी खतरे में ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[फसल की चिंता और आपूर्ति शृंखला में व्यवधान से मई में अनाज की वैश्विक कीमतों में उछाल]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/global-cereal-prices-surge-in-may-amid-crop-concerns-and-supply-chain-disruptions.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 16 Jun 2024 15:46:55 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/global-cereal-prices-surge-in-may-amid-crop-concerns-and-supply-chain-disruptions.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">मई 2024 में अंतरराष्ट्रीय बाजार में सभी प्रमुख अनाजों की कीमतों में उछाल देखने को मिला। प्रमुख उत्पादक देशों में फसल की परिस्थितियां प्रतिकूल होने की चिंता के कारण गेहूं के निर्यात मूल्यों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई। विभिन्न कारणों से मक्का के निर्यात मूल्यों में भी उछाल आया। यह जानकारी संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) ने अपने जून 2024 के खाद्य मूल्य निगरानी और विश्लेषण (फूड प्राइस मॉनिटरिंग एनालिसिस) बुलेटिन में दी है। एफएओ ऑल राइस प्राइस इंडेक्स में भी मई में वृद्धि हुई। यह वृद्धि मुख्य रूप से इंडिका चावल के दामों में वृद्धि के कारण हुई।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">एफएओ की निगरानी वाले कई देशों में अप्रैल और मई में घरेलू बाजार में प्रमुख खाद्य पदार्थों के दाम भी ऊंचे बने रहे। प्रतिकूल मौसम की घटनाओं, आपूर्ति शृंखलाओं में युद्ध के कारण होने वाले व्यवधानों और अन्य आर्थिक कठिनाइयों के कारण खाद्य वितरण की लागत में भी इजाफा देखने को मिला।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;"><strong>भारतः</strong> रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में चावल का राष्ट्रीय औसत खुदरा मूल्य मई में महीने-दर-महीने आधार पर लगभग अपरिवर्तित रहा। लेकिन पिछले साल के स्तर से तुलना करें तो इसमें वृद्धि हुई। विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के लिए सरकार की तरफ से होने वाली बड़ी खरीद ने बाजार में आने वाली उपज को सीमित कर दिया। मई में गेहूं का राष्ट्रीय औसत खुदरा मूल्य स्थिर रहा। इसमें भी नई फसल आने के बावजूद सरकारी खरीद के कारण दाम बढ़े। सरकार ने इस वर्ष रिकॉर्ड गेहूं उत्पादन का अनुमान जताया है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;"><strong>चीन</strong> में इंडिका और जैपोनिका चावल किस्मों का थोक राष्ट्रीय औसत मूल्य पिछले महीने स्थिर रहा। यह पिछले साल के स्तर के भी करीब था। यहां 2023 की उपज की बाजार में पर्याप्त उपलब्धता है और जून से कटाई की जाने वाली फसल भी औसत से बेहतर होने की उम्मीद है। मई में गेहूं की थोक कीमतों में गिरावट आई। इसमें भी 2023 की उपज की बाजार में पर्याप्त उपलब्धता है और मई के अंत में शुरू होने वाली 2024 की फसल के लिए बेहतर संभावनाएं हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;"><strong>रूस</strong> में प्रतिकूल फसल परिस्थितियों के कारण बीते माह निर्यात के लिए गेहूं का दाम बढ़ना जारी रहा। हालांकि लगातार दो वर्षों में अच्छी फसल के कारण यह पिछले साल की तुलना में 11 प्रतिशत कम रहा। यूक्रेन में मिलिंग गेहूं (एफओबी) के निर्यात मूल्य मई में लगातार दूसरे महीने बढ़े। यहां मांग की तुलना में आपूर्ति कम रही। कजाकिस्तान में, 2024 के लिए बेहतर फसल अनुमान और कम व्यापारिक गतिविधि के कारण मई में गेहूं का निर्यात मूल्य लगातार पांचवें महीने स्थिर रहा।</span></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ फसल की चिंता और आपूर्ति शृंखला में व्यवधान से मई में अनाज की वैश्विक कीमतों में उछाल ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[मई में विश्व बाजार में अनाज और डेयरी के दाम बढ़े, चीनी और वनस्पति तेल के दामों में कमी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/cereal-and-dairy-prices-increased-in-may-in-global-market-but-sugar-and-vegetable-oil-prices-went-down.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 09 Jun 2024 10:01:00 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/cereal-and-dairy-prices-increased-in-may-in-global-market-but-sugar-and-vegetable-oil-prices-went-down.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>मई में लगातार तीसरे महीने विश्व खाद्य वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि हुई है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार चीनी और वनस्पति तेलों के दाम में तो कमी आई, लेकिन उससे कहीं अधिक अनाज और डेयरी उत्पादों के दाम बढ़ गए। एफएओ खाद्य मूल्य सूचकांक मई में 120.4 अंक पर रहा, जो अप्रैल के संशोधित स्तर से 0.9 प्रतिशत अधिक है। हालांकि एक साल पहले की तुलना में यह 3.4 प्रतिशत कम है। मार्च 2022 के शिखर से यह 24.9 प्रतिशत नीचे है।</p>
<p>एफएओ का अनाज मूल्य सूचकांक अप्रैल से 6.3 प्रतिशत बढ़ा। इसका प्रमुख कारण वैश्विक गेहूं निर्यात कीमतों में वृद्धि है। उत्तरी अमेरिका, यूरोप और काला सागर क्षेत्र के कुछ हिस्सों सहित प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण गेहूं का उत्पादन प्रभावित हुआ। मई में मक्का के निर्यात की कीमतों में भी वृद्धि हुई। अर्जेंटीना में स्पाइरोप्लाज्मा रोग (मक्का स्टंट रोग) और ब्राजील में प्रतिकूल मौसम के कारण इसके दाम बढ़े। गेहूं के बाजार का भी असर मक्के पर पड़ा। मई में एफएओ ऑल-राइस प्राइस इंडेक्स में 1.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई।</p>
<p>एफएओ डेयरी मूल्य सूचकांक में अप्रैल से 1.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई। खुदरा और फूड सर्विसेज सेक्टर से इसकी मांग बढ़ी। पश्चिमी यूरोप में दूध उत्पादन ऐतिहासिक स्तरों से नीचे गिरने की आशंका के चलते भी कीमतों को बल मिला। निकट पूर्व और उत्तरी अफ्रीका के कुछ देशों से स्पॉट सप्लाई की मांग ने भी डेयरी की कीमतों को बढ़ाया।</p>
<p>एफएओ चीनी मूल्य सूचकांक में अप्रैल से 7.5 प्रतिशत की कमी आई। ब्राजील में नए सीजन की अच्छी शुरुआत के कारण इसके दाम कम हुए हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कम कीमतों ने भी चीनी की मांग कम की जिसका असर इसकी कीमतों पर दिखा।</p>
<p>वनस्पति तेल मूल्य सूचकांक में भी अप्रैल से 2.4 प्रतिशत की गिरावट आई है। जैव ईंधन क्षेत्र से बढ़ती मांग के कारण सोया तेल के दाम बढ़े हैं। काला सागर क्षेत्र में निर्यात उपलब्धता कम होने के कारण रेपसीड और सूरजमुखी तेलों में भी मजबूती आई। लेकिन उत्पादन में वृद्धि और कमजोर वैश्विक मांग के कारण पाम ऑयल के भाव कम हुए हैं। इसने सोया तेल और रेपसीड और सूरजमुखी के दामों में वृद्धि की भरपाई कर दी।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ मई में विश्व बाजार में अनाज और डेयरी के दाम बढ़े, चीनी और वनस्पति तेल के दामों में कमी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[एफएओ ने 2024&amp;#45;25 सीजन में वैश्विक मक्का और गेहूं उत्पादन में गिरावट का अनुमान जताया, पर चावल का उत्पादन बढ़ेगा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/fao-forecasts-decline-in-global-maize-and-wheat-outputs-in-2024-25-season-production-of-rice-to-increase.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 09 Jun 2024 08:00:00 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/fao-forecasts-decline-in-global-maize-and-wheat-outputs-in-2024-25-season-production-of-rice-to-increase.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने 2024-25 सीजन के लिए अपना पहला पूर्वानुमान जारी किया है। इसके मुताबिक वैश्विक मक्का और गेहूं उत्पादन में गिरावट का अनुमान है। इसके विपरीत जौ, चावल और ज्वार के उत्पादन में वृद्धि का अनुमान है। हालांकि वैश्विक अनाज आपूर्ति और मांग की स्थिति आरामदायक रहेगी। कुल अनाज उत्पादन 284.6 करोड़ टन रहने का अनुमान है, जो 2023-24 में रिकॉर्ड उत्पादन के बराबर है। काला सागर क्षेत्र में हाल में प्रतिकूल मौसम के कारण विश्व गेहूं उत्पादन में गिरावट का अंदेशा जताया गया है।</p>
<p>2024-25 में दुनिया में अनाज का कुल उपयोग 0.5 प्रतिशत बढ़कर रिकॉर्ड 285.1 करोड़ टन पहुंचने की उम्मीद है। खाने के लिए अनाज का वैश्विक उपयोग 2023-24 से 1.1 प्रतिशत अधिक रहेगा। चावल में 1.4 प्रतिशत, मोटे अनाज में 1.2 प्रतिशत और गेहूं में 0.8 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान है। चारे के रूप में अनाज के उपयोग में भी 0.4 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान है। इसमें पशु आहार के लिए मोटे अनाज (विशेष रूप से मक्का और ज्वार) की मांग अधिक रहेगी, जबकि गेहूं और चावल दोनों के फ़ीड उपयोग में कमी आने का अनुमान है।</p>
<p>विश्व अनाज भंडार 1.5 प्रतिशत (132 लाख टन) बढ़कर रिकॉर्ड 89.7 करोड़ टन हो सकता है। इसमें मोटे अनाज (मक्का, जौ और ज्वार) और चावल का स्टॉक अधिक रहेगा। इसके विपरीत गेहूं का भंडार 2021-22 के बाद सबसे निचले स्तर पर गिर सकता है।&nbsp;</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/06/image_750x_66648f0b234f9.jpg" alt="" /></p>
<p>अनाज का विश्व व्यापार 2023-24 के स्तर से 1.3 प्रतिशत घटकर 2024-25 में 48.1 करोड़ टन रह जाएगा। मक्का के व्यापार में सबसे अधिक गिरावट का अनुमान है। साथ ही गेहूं और जौ के व्यापार में भी थोड़ी कमी के आसार हैं। इसके विपरीत, चावल के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में वृद्धि होने का अनुमान है।</p>
<p><strong>2023 में रिकॉर्ड अनाज उत्पादन का अनुमान</strong><br />एफएओ का अनुमान है कि 2023 में वैश्विक अनाज उत्पादन 284.7 करोड़ टन हुआ, जो एक नया रिकॉर्ड है। यह 2022 से 1.2 प्रतिशत अधिक है। उत्पादन में यह वृद्धि मुख्य रूप से मक्का के कारण आई है। इसके उत्पादन में वृद्धि वैश्विक ज्वार और गेहूं उत्पादन में गिरावट से अधिक है। 2023-24 में अनाज का उपयोग 283.6 करोड़ टन होने का अनुमान है, जो 2022-23 के स्तर से 1.6 प्रतिशत अधिक है। यह वृद्धि मुख्य रूप से मोटे अनाज और गेहूं के कारण है। चारे में अनाज का उपयोग बढ़ा, जबकि चावल के उपयोग में आंशिक रूप से गिरावट आई है।</p>
<p>2024 में सीजन के अंत में अनाज का स्टॉक 88.4 करोड़ टन होने का अनुमान है, जो शुरुआती स्तर से 1.4 प्रतिशत अधिक है। गेहूं के स्टॉक में तो कमी आई है, लेकिन मोटे अनाज और चावल के स्टॉक में वृद्धि हुई है। एफएओ का आकलन है कि 2023-24 में अनाज का अंतर्राष्ट्रीय व्यापार 48.7 करोड़ टन का हुआ, जो 2022-23 के स्तर से 1.7 प्रतिशत अधिक है। यह बढ़ोतरी मोटे अनाज के व्यापार में वृद्धि के कारण है। इसके विपरीत, गेहूं और चावल दोनों के व्यापार की मात्रा 2022-23 के स्तर से कम हुई है।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/06/image_750x500_66648f0a4429b.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ एफएओ ने 2024-25 सीजन में वैश्विक मक्का और गेहूं उत्पादन में गिरावट का अनुमान जताया, पर चावल का उत्पादन बढ़ेगा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कृषि खाद्य प्रणाली से होता है 31% उत्सर्जन, नेट जीरो लक्ष्य के लिए इसे कम करना जरूरीः वर्ल्ड बैंक रिपोर्ट]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/agriculture-food-system-causes-31-percent-emissions-so-it-is-necessary-to-reduce-it-for-net-zero-target-says-world-bank-report.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 26 May 2024 12:41:08 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/agriculture-food-system-causes-31-percent-emissions-so-it-is-necessary-to-reduce-it-for-net-zero-target-says-world-bank-report.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन को सीमित करने में अभी तक कृषि खाद्य प्रणाली को लक्ष्य नहीं बनाया गया है, जबकि नेट जीरो उत्सर्जन हासिल करने और ग्लोबल वार्मिंग को सीमित करने के लिए ऐसा करना जरूरी है। वैश्विक स्तर पर कृषि खाद्य प्रणाली 31 प्रतिशत उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार है। भारत के कुल उत्सर्जन में कृषि खाद्य प्रणाली का योगदान 34.1 प्रतिशत, ब्राजील में 84.9 प्रतिशत, चीन में 17 प्रतिशत, बांग्लादेश में 55.1 प्रतिशत और रूस में 21.4 प्रतिशत है।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">बड़ी आबादी के कारण भारत की कृषि खाद्य प्रणाली दुनिया में सबसे अधिक ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन करने वालों में एक है। कृषि खाद्य प्रणाली से ग्रीन हाउस गैस का सबसे अधिक उत्सर्जन करने वाले देशों में चीन और ब्राजील के बाद तीसरे स्थान पर भारत है। उसके बाद अमेरिका और इंडोनेशिया हैं।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">वर्ल्ड बैंक की &lsquo;रेसिपी फॉर ए लिवेबल प्लैनेटः एचीविंग नेट जीरो एमिशंस इन द एग्री फूड सिस्टम&rsquo; रिपोर्ट में यह बात कही गई है। इसमें उन उपायों की भी पहचान की गई है जिनसे वैश्विक खाद्य सुरक्षा को बनाए रखते हुए और कमजोर समूहों के लिए उचित परिवर्तन सुनिश्चित करते हुए कम खर्च में नेट जीरो उत्सर्जन को हासिल किया जा सकता है। इसमें कहा गया है कि उत्सर्जन के सबसे बड़े स्रोतों और सबसे कम लागत वाले विकल्पों पर ध्यान केंद्रित करके विभिन्न देश कृषि खाद्य प्रणाली से निकलने वाले ग्रीन हाउस गैसों को वायुमंडल तक पहुंचने से रोकने में सक्षम होंगे।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">रिपोर्ट में कहा गया है कि अभी तक उत्सर्जन कम करने के ज्यादातर प्रयास ऊर्जा, परिवहन और मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों पर केंद्रित रहे हैं, जहां कुछ प्रमुख टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से उत्सर्जन कम करने में सफलता भी मिली है। लेकिन उत्सर्जन का स्तर अभी उस स्तर से बहुत दूर है जहां उन्हें जलवायु आपदा को रोकने के लिए होना चाहिए। जटिलता के कारण दुनिया ने कृषि-खाद्य प्रणाली उत्सर्जन का सामना करने से लंबे समय तक परहेज किया है। लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार, अब समय आ गया है कि कृषि और भोजन को उत्सर्जन कम करने के एजेंडे में सबसे ऊपर रखा जाए, वर्ना दुनिया भावी पीढ़ियों के रहने योग्य नहीं रह जाएगी।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">यह रिपोर्ट कई कारणों से सामयिक है। आज वैश्विक कृषि खाद्य प्रणाली और इसके बढ़ते जलवायु प्रभाव के बारे में कुछ साल पहले की तुलना में कहीं अधिक जानकारी उपलब्ध है। यह भी स्पष्ट है कि 2050 तक वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के लिए कृषि खाद्य प्रणाली से नेट जीरो उत्सर्जन की आवश्यकता होगी। इसकी तत्काल जरूरत के बावजूद जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (यूएनएफसीसीसी) के तहत कृषि वार्ता रुकी हुई है, क्योंकि उत्सर्जन घटाने के मुद्दे पर विकसित और विकासशील देशों के बीच मतभेद हैं।</span></p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/05/image_750x_6652dfcd0396e.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>बिजली उत्पादन से अधिक उत्सर्जन वैश्विक कृषि खाद्य प्रणाली से&nbsp;</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कृषि खाद्य प्रणाली से उत्सर्जन पहले की तुलना में काफी अधिक है। पिछली गणनाओं में अनुमान लगाया गया था कि कृषि, वानिकी और अन्य भूमि उपयोग (एएफओएलयू) से वैश्विक उत्सर्जन का लगभग पांचवां हिस्सा आता है। लेकिन उत्पादन से पहले और बाद के उत्सर्जन को शामिल करते हुए हाल के अध्ययनों से पता चलता है कि वैश्विक कृषि खाद्य प्रणाली 31 प्रतिशत उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार है। इससे प्रति वर्ष औसतन 16 अरब मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड समकक्ष उत्पन्न होता है। तुलनात्मक रूप से देखें तो यह दुनिया में बिजली उत्पादन से होने वाले उत्सर्जन से 2.24 अरब टन या 14 प्रतिशत अधिक है। इसके बावजूद वैश्विक कृषि खाद्य प्रणाली से उत्सर्जन कम करने पर बहुत कम ध्यान दिया गया है। उदाहरण के लिए, पेरिस समझौते में शामिल केवल आधे देशों ने अपने राष्ट्रीय लक्ष्यों (नेशनली डिटरमाइंड कंट्रिब्यूशंस-एनडीसी) में कृषि-संबंधी लक्ष्यों को शामिल किया।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कृषि खाद्य प्रणाली में सबसे अधिक उत्सर्जन इन आठ प्रमुख क्षेत्रों से आता है- 1) पशुधन से संबंधित उत्सर्जन, 25.9 प्रतिशत; 2) वनों की कटाई या यूज में बदलाव, 18.4 प्रतिशत; (3) खाद्य प्रणाली में होने वाली बर्बादी, 7.9 प्रतिशत; (4) खाद्य पदार्थों का घरेलू उपभोग, 7.3 प्रतिशत; (5) उर्वरक उत्पादन और उपयोग, 6.9 प्रतिशत; (6) मिट्टी से संबंधित उत्सर्जन, 5.7 प्रतिशत; (7) खेत में ऊर्जा का उपयोग और उसकी आपूर्ति, 5.4 प्रतिशत और (8) चावल उत्पादन से निकलने वाला उत्सर्जन, 4.3 प्रतिशत।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के 80 प्रतिशत उर्वरकों की खपत मध्य आय वाले देशों में होती है। शीर्ष पांच देशों में ब्राजील, चीन, भारत और इंडोनेशिया शामिल हैं। मध्य आय वाले देशों में प्रति हेक्टेयर औसतन 168 किलो उर्वरकों का प्रयोग होता है। उच्च आय वाले देशों में यह 141 किलो और निम्न आय वाले देशों में सिर्फ 12 किलो प्रति हेक्टेयर है। मध्य आय वाले देश सबसे बड़े उर्वरक उत्पादक भी हैं। चीन, भारत और रूस दुनिया का एक-तिहाई से ज्यादा नाइट्रोजन उर्वरक का उत्पादन करते हैं। कृषि खाद्य प्रणाली के उत्सर्जन में 6.4 प्रतिशत योगदान उर्वरकों का होता है। प्री-प्रोडक्शन चरण में ये उत्सर्जन का सबसे बड़ा स्रोत हैं।</span></p>
<p><strong>कृषि खाद्य उत्सर्जन में मध्य आय वाले देशों का योगदान 68 प्रतिशत</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">मध्य आय वाले देश अभी और ऐतिहासिक रूप से सबसे अधिक कृषि खाद्य उत्सर्जन उत्पन्न करते रहे हैं, उच्च आय वाले देशों में प्रति व्यक्ति उत्सर्जन सबसे अधिक है, और कम आय वाले देशों में उत्सर्जन वृद्धि की दर सबसे ज्यादा है। आज, वैश्विक कृषि खाद्य उत्सर्जन में मध्य आय वाले देशों का योगदान 68 प्रतिशत है, जबकि उच्च आय वालों का योगदान 21 प्रतिशत और कम आय वाले देशों का 11 प्रतिशत है। दुनिया में सबसे अधिक 108 देश मध्य आय वाले ही हैं। उच्च आय वाले देशों की संख्या 77 और निम्न आय वालों की 28 है।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">उच्च आय वाले देशों में प्रति व्यक्ति अधिक उत्सर्जन मुख्य रूप से मांस और डेयरी की भारी खपत, खाद्य परिवहन, प्रसंस्करण, पैकेजिंग और खाद्य पदार्थों के नष्ट होने के कारण होता है। जनसंख्या वृद्धि दर कम होने से कृषि खाद्य उत्सर्जन में इन देशों की हिस्सेदारी में गिरावट आई है। ये देश कृषि से मैन्युफैक्चरिंग और सेवाओं में शिफ्ट हो गए हैं और वे मध्य तथा निम्न आय वाले देशों से खाद्य पदार्थ लेते हैं। उन्होंने खाद्य उत्पादकता और रिन्यूएबल एनर्जी में निवेश किया है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कम आय वाले देश कृषि खाद्य प्रणाली से सबसे कम ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन करते हैं, लेकिन 1990 के दशक की शुरुआत से वहां वृद्धि दर सबसे अधिक है। मध्य आय वाले देशों की 12.3 प्रतिशत और उच्च आय वाले देशों की 3 प्रतिशत वृद्धि की तुलना में इन देशों के उत्सर्जन में 53 प्रतिशत वृद्धि हुई है।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">गहराई से देखने पर पता चलता है कि कृषि खाद्य उत्सर्जन का बड़ा हिस्सा मुट्ठी भर देशों में केंद्रित है, जिनमें ज्यादातर मध्य आय वाले हैं। यह प्रवृत्ति जारी रहने की संभावना है क्योंकि ये देश उसी उत्सर्जन वाले विकास का अनुसरण कर रहे हैं जिसका पालन उच्च आय वाले देशों ने पहले किया था। फर्क सिर्फ इतना है कि इन मध्य आय वाले देशों की आबादी बहुत बड़ी है और बढ़ रही है।</span></p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/05/image_750x_6652dfe29a1b4.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>ग्लोबल वार्मिंग 3.2 डिग्री तक पहुंचने का डर</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">पेरिस समझौते में तय हुआ था कि प्री-इंडस्ट्रियल समय की तुलना में ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखा जाएगा। तापमान इससे अधिक बढ़ने पर जोखिम वाले देशों को अधिक खतरा होगा। तापमान दो डिग्री से अधिक बढ़ने पर खाद्य संकट बढ़ेगा और विनाशकारी तूफानों की संख्या बढ़ेगी। डेढ़ डिग्री के लक्ष्य को हासिल करने के लिए जरूरी है कि हर साल 52 गीगा टन उत्सर्जन को 2050 तक शून्य पर लाया जाए। लेकिन 2020 में निर्धारित कदमों और उनमें कोई प्रगति नहीं होने के कारण अनुमान है कि वर्ष 2100 तक ग्लोबल वार्मिंग 3.2 डिग्री तक पहुंच जाएगी।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">सालाना 52 गीगा टन उत्सर्जन में 16 गीगा टन कृषि खाद्य प्रणाली से आता है। नए शोध से पता चलता है कि दूसरे क्षेत्रों में सभी जीवाश्म ईंधन उत्सर्जन को समाप्त कर दिया जाए, तो भी अकेले कृषि खाद्य प्रणाली से होने वाला उत्सर्जन ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा से आगे ले जाने के लिए पर्याप्त होगा। यहां तक कि इससे तापमान 2.0 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है। पेरिस समझौते के मुताबिक 1.5 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य को पूरा करने के लिए 2050 तक कृषि खाद्य प्रणाली से उत्सर्जन (16 गीगाटन सालाना) को शून्य करना होगा।</span></p>
<p><strong>उत्सर्जन कम करने के लिए फाइनेंस की कमी</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">रिपोर्ट के मुताबिक कृषि खाद्य प्रणाली में उत्सर्जन कम करने के लिए वित्तपोषण की बड़ी कमी है। वैसे तो पिछले एक दशक में क्लाइमेट फाइनेंस लगभग दोगुना हुआ है, लेकिन उत्सर्जन कम करने (मिटिगेशन) और अनुकूलन (एडेप्टेशन) के लिए कुल फाइनेंसिंग की तुलना में कृषि खाद्य प्रणाली को उपलब्ध राशि सिर्फ 4.3 प्रतिशत यानी 28.5 अरब डॉलर है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">उत्सर्जन कम करने के लिए 2019-20 में तो केवल 14.4 अरब डॉलर राशि उपलब्ध कराई गई जो कुल क्लाइमेट फाइनेंस का 2.2 प्रतिशत था। अधिकांश क्लाइमेट फाइनेंस अन्य क्षेत्रों के लिए होता है। रिन्यूएबल एनर्जी को तो फाइनेंसिंग का 51 प्रतिशत और लो-कार्बन परिवहन को 26 प्रतिशत प्राप्त होता है। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि 2030 तक वर्तमान खाद्य प्रणाली उत्सर्जन को आधा करने के लिए वार्षिक निवेश 18 गुना बढ़ाकर 260 अरब डॉलर करने की आवश्यकता है।</span></p>
<p><strong>कृषि खाद्य प्रणाली में बदलाव से खाद्य सुरक्षा को खतरा</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कम उत्सर्जन वाली कृषि-खाद्य प्रणाली को अपनाने में सावधानी की जरूरत है। कुछ अध्ययनों में अनुमान लगाया गया है कि कृषि खाद्य प्रणाली में सुधार सावधानी से नहीं किया गया तो कृषि उत्पादन कम हो सकता है और खाद्य कीमतें बढ़ सकती हैं। उदाहरण के लिए, उर्वरक इस्तेमाल कम करने या जैविक खेती अपनाने से उत्सर्जन 15 प्रतिशत कम होगा, लेकिन इससे कृषि उत्पादन में 5 प्रतिशत की कमी हो सकती है और दुनिया में खाद्य कीमतें 13 प्रतिशत बढ़ सकती हैं। स्वस्थ आहार 10 प्रतिशत महंगा हो सकता है। दूसरे अध्ययन तो और निराशाजनक हैं। उनमें अनुमान लगाया गया है कि वनरोपण से 2050 तक चार करोड़ लोगों की खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। इन वजहों से नेट जीरो कृषि खाद्य प्रणाली को अपनाने का राजनीतिक विरोध संभव है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कृषि खाद्य प्रणाली की ग्लोबल प्रकृति से खाद्य कीमतों में अस्थिरता भी आती है। उदाहरण के लिए 2019 के बाद से 12.2 करोड़ लोगों को भूख का सामना करना पड़ा क्योंकि कोविड-19 के कारण आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान उत्पन्न हुआ। कारणों में मौसम की मार और यूक्रेन पर रूस का हमला भी शामिल है। कम उत्सर्जन वाली कृषि में निवेश करने और खाद्य तथा भूमि उपयोग में बदलाव करने से 2030 में 4.3 लाख करोड़ डॉलर का स्वास्थ्य, आर्थिक और पर्यावरणीय लाभ हो सकता है।</span></p>
<p><strong>शाकाहार कम करता है उत्सर्जन</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">भारत के लोगों का शाकाहार उत्सर्जन को कम भी करता है। भारत में दुनिया के किसी भी अन्य देश की तुलना में अधिक शाकाहारी हैं। भारत की जनसंख्या अमेरिका का लगभग चार गुना है, फिर भी यहां का उत्सर्जन अमेरिका से केवल 30 प्रतिशत अधिक है। ऐसा इसलिए क्योंकि प्रति व्यक्ति उत्सर्जन वैश्विक औसत से बहुत कम है। शाकाहार के अलावा इसका एक अन्य प्रमुख कारण गरीबी और कुपोषण है। आबादी का बड़ा हिस्सा अधिक उपभोग कर ही नहीं सकता है।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इससे एक विरोधाभास पैदा होता है। दुनिया के अधिकांश हिस्से में आहार में बदलाव से उत्सर्जन में कमी आएगी, लेकिन भारत में इस तरह के बदलाव से उत्सर्जन में थोड़ी वृद्धि होगी। भारत के कृषि खाद्य प्रणाली उत्सर्जन का 60 प्रतिशत हिस्सा फार्म गेट से आता है। भारत का पशुधन क्षेत्र भी बहुत अक्षम है। यहां दूध और मीट दोनों की प्रति यूनिट उत्सर्जन तीव्रता (इंटेंसिटी) दुनिया में सबसे अधिक है। इसके विपरीत, भारत के चावल उत्पादन की उत्सर्जन तीव्रता सबसे कम है। लेकिन चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा चावल उत्पादक होने के कारण यहां इससे कुल उत्सर्जन अधिक है। भारत में फार्म-गेट उत्सर्जन तो सबसे अधिक है ही, यहां उत्पादन से पहले और बाद का उत्सर्जन भी तेजी से बढ़ रहा है।&nbsp;</span></p>
<p><strong>कृषि खाद्य प्रणाली से उत्सर्जन का समाधान</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">रिपोर्ट के अनुसार, भारत में सिंचाई में इस्तेमाल होने वाले 88 लाख डीजल पंपों में से एक-चौथाई की जगह सौर ऊर्जा से चलने वाले पंप लगाए जाएं तो हर साल 115 लाख टन उत्सर्जन घटाया जा सकता है। सौर ऊर्जा चालित सिंचाई 1970 के दशक से चल रही है और भारत में इसे तेजी से अपनाया जा रहा है। दिसंबर 2020 तक भारत में 2.72 लाख सौर ऊर्जा चालित सिंचाई प्रणाली शुरू की जा चुकी थी।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कृषि क्षेत्र में चीन में 48 प्रतिशत और भारत में 63 प्रतिशत मिटिगेशन की संभावना कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन में है। मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन की संभावना सबसे अधिक मध्य आय वाले देशों में है। भारत के साथ मेक्सिको में फसलों में पोषक तत्वों का प्रयोग बेहतर करने के लिए प्रिसीजन पोषण प्रबंधन का तरीका अपनाया जा रहा है। इससे खाद्य सुरक्षा प्रभावित हुए बिना उर्वरकों का बेहतर इस्तेमाल हो रहा है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इन कदमों के बावजूद इस दिशा में कदम धीमा है। रिपोर्ट के अनुसार, नीतियों पर राजनीति हावी रहती है। भारत और बांग्लादेश में खाद्य सुरक्षा लगभग पूरी तरह चावल पर निर्भर है। यहां सरकारें चावल उत्पादन के लिए पानी, उर्वरक, कीटनाशक और बिजली पर सब्सिडी देती है। इसे खत्म करने के कदमों का जबरदस्त विरोध होता रहा है और राजनीतिक नेताओं में किसानों का वोट पाने की होड़ रहती है।&nbsp;</span></p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/05/image_750x500_6652dfab4e812.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ कृषि खाद्य प्रणाली से होता है 31% उत्सर्जन, नेट जीरो लक्ष्य के लिए इसे कम करना जरूरीः वर्ल्ड बैंक रिपोर्ट ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[भारत ने मॉरीशस को 14,000 टन गैर&amp;#45;बासमती चावल के निर्यात की अनुमति दी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/india-allows-export-of-14000-tonnes-of-non-basmati-white-rice-to-mauritius.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 07 May 2024 13:41:32 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/india-allows-export-of-14000-tonnes-of-non-basmati-white-rice-to-mauritius.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>गैर-बासमती चावल के निर्यात पर प्रतिबंध के बीच केंद्र सरकार ने मॉरीशस के लिए 14,000 टन गैर-बासमती चावल के निर्यात की मंजूरी दे दी। विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) ने की ओर से अधिसूचना के अनुसार, मॉरीशस को 14,000 टन गैर-बासमती व्हाइट राइस का निर्यात राष्ट्रीय सहकारी निर्यात लिमिटेड (एनसीईएल) के माध्यम से किया जाएगा।</p>
<p>चावल की घरेलू आपूर्ति सुनिश्चित करने और महंगाई रोकने के लिए केंद्र सरकार ने पिछले साल 20 जुलाई को गैर-बासमती चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था। लेकिन मित्र देशों की खाद्य सुरक्षा के मद्देनजर सरकार निर्यात की अनुमति देती है। प्याज के मामले में भी ऐसा हुआ था, जिसमें कुछ निर्यातकों ने बेहद सस्ते दाम पर प्याज खरीदकर खाड़ी देशों को ऊंची कीमतों पर निर्यात किया था।</p>
<p>निर्यात प्रतिबंध के बावजूद <span>भारत ने तंजानिया, जिबूती और गिनी-बिसाऊ सहित कुछ अफ्रीकी देशों को चावल निर्यात की अनुमति दी। </span><span>इसके अलावा नेपाल, कैमरून, गिनी, मलेशिया, फिलिपीन और सेशेल्स जैसे देशों को भी गैर-बासमती चावल के निर्यात की मंजूरी दी गई थी। इस प्रकार का </span>निर्यात एनसीईएल के माध्यम से किया जा रहा है। जो एक सहकारी संस्था है। इसे देश की प्रमुख सहकारी संस्थाओं जीसीएमएमएफ, इफको, कृभको, नेफेड और सरकारी संस्थान एनसीडीसी ने संयुक्त रूप से स्थापित किया है।</p>
<p>कृषि मंत्रालय ने वर्ष 2022-23 में देश में 1357.55 लाख टन चावल के रिकॉर्ड उत्पादन का दावा किया था। लेकिन दूसरी तरफ, बढ़ती खाद्य महंगाई पर नियंत्रण के लिए केंद्र सरकार ने जुलाई में गैर-बासमती चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था।&nbsp;कृषि मंत्रालय की ओर से जारी वर्ष 2023-24 के दूसरे अग्रिम अनुमान के अनुसार, इस साल देश में 1238.15 लाख टन चावल उत्पादन का अनुमान है। पिछले मानसून में कम बारिश के चलते देश के चावल उत्पादन में कमी आ सकती है, जिसके मद्देनजर निर्यात प्रतिबंध जैसे कदम उठाए गये हैं।&nbsp;</p>
<p>भारत अक्टूबर तक चावल पर निर्यात प्रतिबंध जारी रख सकता है। साल 2022-23 में भारत दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक बन गया था। लेकिन इस साल चुनाव, अनाज उत्पादन और खाद्य महंगाई की स्थिति को देखते हुए निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था।&nbsp;</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/05/image_750x_6639e4c01ea86.jpg" alt="" /></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/05/image_750x500_6639e225e5811.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ भारत ने मॉरीशस को 14,000 टन गैर-बासमती चावल के निर्यात की अनुमति दी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[टिकाऊ खाद्य प्रणाली के लिए इनोवेशन, निवेश और सही पॉलिसी की जरूरतः डब्लूआरआई]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/to-make-good-on-sustainable-food-commitments-countries-must-do-4-things-says-wri.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 27 Apr 2024 13:09:28 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/to-make-good-on-sustainable-food-commitments-countries-must-do-4-things-says-wri.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">पिछले साल दुबई में आयोजित संयुक्त राष्ट्र के जलवायु सम्मेलन (कॉप 28) में सस्टेनेबल खाद्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया था। दुनिया के 159 लीडर्स ने सस्टेनेबल एग्रीकल्चर, रेसिलियंट फूड सिस्टम एंड क्लाइमेट एक्शन (टिकाऊ कृषि, मजबूत खाद्य प्रणाली और जलवायु बचाने की दिशा में कार्रवाई) पर अमीरात डिक्लेरेशन पर अपनी सहमति जताई थी। ऐसा पहली बार हुआ था जब विभिन्न देशों ने कृषि को राष्ट्रीय जलवायु तथा अन्य नीतियों के केंद्र में रखा और टिकाऊ खाद्य प्रणाली में निवेश बढ़ाने पर वे सहमत हुए। इस बात पर भी सहमति बनी की 2025 में आयोजित होने वाले कॉप 30 में इस दिशा में प्रगति की समीक्षा की जाएगी। वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट ने एक रिपोर्ट में कहा है कि टिकाऊ खाद्य प्रणाली के लिए तमाम देशों को चार कदम उठाने की जरूरत है। ये कदम हैं- इनोवेशन, निवेश में वृद्धि, व्यवहार में बदलाव और नीतिगत कदम।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इसने कहा है कि कृषि एवं खाद्य प्रणाली दुनिया में एक तिहाई ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार है। जैव विविधता को होने वाले नुकसान और ताजे पानी में प्रदूषण का प्रमुख कारण भी यही है जिसका नकारात्मक प्रभाव खाद्य सुरक्षा और आजीविका पर पड़ता है। इसका नतीजा मानवीय संकट, संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा, माइग्रेशन और युद्ध के रूप में नजर आता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">रिपोर्ट में कहा गया है कि आने वाले समय में इस तरह के जोखिम और बढ़ेंगे क्योंकि वर्ष 2050 तक खाद्य पदार्थों की मांग 50% बढ़ जाएगी। दूसरी तरफ जलवायु परिवर्तन के कारण फसलों को नुकसान होगा तथा आपदाओं का जोखिम बढ़ेगा। इस तरह की घटनाएं घटनाओं का पूर्वानुमान लगाना भी मुश्किल होगा।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अमीरात डिक्लेरेशन में इस दिशा में प्रगति के लिए 2 साल का समय तय किया गया है। अजरबैजान के बाकू में कॉप 29 मंत्रिस्तरीय बैठक होनी है, जिसमें इस दिशा में प्रगति पर चर्चा होगी और ब्राजील के बेलेम में होने वाले कॉप 30 सम्मेलन में पूरी प्रोग्रेस रिपोर्ट रखी जाएगी।</span></p>
<p><strong>कृषि में इनोवेशन</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट ने जो चार कदम जरूरी बताए हैं उनमें पहला इनोवेशन है। इसका कहना है कि कृषि उत्पादकता बढ़ाने और बदलती जलवायु के हिसाब से अनुकूलन के लिए नए वैज्ञानिक कदम उठाने पड़ेंगे। यह इनोवेशन कृषि टेक्नोलॉजी अथवा बीज की नई वैरायटी तक सीमित नहीं होगा, हालांकि यह महत्वपूर्ण है। यह इनोवेशन डिलीवरी सर्विस में भी करने की जरूरत है जहां खाद्य प्रणाली में शामिल किसानों तथा अन्य को मदद चाहिए। इसने कहा है कि कृषि उत्पादकता में वृद्धि करने के साथ रसायन के प्रयोग से दूर हटने और एक ही फसल बार-बार लगाने से बचने की जरूरत है। इसकी जगह स्थानीय स्तर पर होने वाली विविध फसलें उपजाई जानी चाहिए। इसके लिए इसने मिलेट, मूंगफली, सोरघम, मीठा आलू जैसी फसलों को चिन्हित किया है। इसने कहा है कि मिट्टी और पानी बचाने के लिए मिश्रित खेती जरूरी है।</span></p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/04/image_750x_662cab5fac8b2.jpg" alt="" /></p>
<p><em><strong>फोटो साभारः डब्लूआरआई</strong></em></p>
<p><strong>निवेश में वृद्धि</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट का कहना है कि कम कार्बन उत्सर्जन वाली पद्धति की ओर लौटने की कीमत बहुत ज्यादा है। फूड एंड लैंड यूज कोलिशन (फोलू) की ग्रोइंग बेटर रिपोर्ट में बताया गया है कि सस्टेनेबल खाद्य प्रणाली अपनाने के लिए हर साल 300 से 350 अरब डॉलर की जरूरत है। यह बहुत बड़ी राशि है। लेकिन मौजूदा खाद्य प्रणाली की छिपी हुई नेगेटिव कॉस्ट से तुलना करें तो यह बहुत कम है। इसी साल जारी फूड सिस्टम इकोनॉमिक्स कमीशन ग्लोबल पॉलिसी रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि यह लागत सालाना 15 लाख करोड़ डॉलर है। यह हर साल उपजाई जाने वाली फसलों के कुल इकोनामिक वैल्यू से भी ज्यादा है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इसके विपरीत सस्टेनेबल खाद्य प्रणाली हमें हर साल 5 लाख करोड़ डॉलर के आर्थिक फायदे दे सकती है। फोलू की फ्यूचर फिट फॉर फूड एंड एग्रीकल्चर रिपोर्ट में दावा किया गया है कि वर्ष 2025 से 2030 तक अगर हर साल 205 अरब डॉलर (खाद्य सेक्टर के रेवेन्यू के दो प्रतिशत से भी कम) का निवेश किया जाए तो खाद्य प्रणाली से होने वाला उत्सर्जन लगभग आधा हो जाएगा तथा इसके अनेक फायदे होंगे।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">रिपोर्ट के अनुसार क्लाइमेट फाइनेंस का सिर्फ 4.3% कृषि और खाद्य प्रणाली में जाता है और इसमें भी सिर्फ 0.3 प्रतिशत छोटे किसानों को मिलता है। जहां तक सरकारी फाइनेंस की बात है तो जीवाश्म ईंधन, कृषि और फिशरीज पर इस समय हर साल 7 लाख करोड़ डॉलर की सब्सिडी दी जाती है। इसका जलवायु और प्रकृति पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।</span></p>
<p><strong>व्यवहार में बदलाव</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">यह बात स्पष्ट है कि खाद्य प्रणाली की समस्या को सिर्फ उत्पादन की पद्धति में बदलाव करके नहीं सुलझाया जा सकता है। किस चीज का उत्पादन करना है यह अक्सर खपत के पैटर्न पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए विकसित और मध्य आय वाले देशों में विशेष तौर से बीफ की बढ़ती मांग से वनों की कटाई बढ़ रही है और इसका पर्यावरण पर बड़ा बुरा असर हो रहा है। बीफ उत्पादन के लिए 20 गुना अधिक जमीन चाहिए। वनस्पति आधारित एक ग्राम प्रोटीन की तुलना में मांस आधारित एक ग्राम प्रोटीन के लिए 20 गुना अधिक उत्सर्जन होता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अभी हम जो खाद्य उत्पादन करते हैं उसका एक बड़ा हिस्सा नुकसान या बर्बाद होता है। दुनिया में हर साल जितनी खाद्य कैलोरी का उत्पादन होता है उसका लगभग 24% खाया नहीं जाता। यह नुकसान सालाना एक लाख करोड़ डॉलर के आसपास है और इससे ग्रीनहाउस गैसों का 8 से 10% उत्सर्जन होता है। अगर इस नुकसान को आधा किया जाए तो दुनिया में खाद्य पदार्थों की मांग 15% कम हो जाएगी और इन्हें उपजाने के लिए जमीन पर पड़ने वाला दबाव भी कम होगा।</span></p>
<p><strong>नीतिगत कदम</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकारी नीतियां उत्पादकों, ट्रेडरों निवेशकों तथा खाद्य प्रणाली में शामिल अन्य लोगों के लिए इंसेंटिव तय करती हैं। यही नीतियां तय करती हैं कि लोग कहां, क्या और कैसे उपजाएं, प्रोसेस्ड फूड खरीदें और कौन सी चीज खाएं। यह स्थिति हर देश में अलग होती है। दुनिया भर की सरकारें कृषि क्षेत्र को हर साल 700 अरब डॉलर से अधिक की मदद करती हैं, लेकिन इस खर्च का ज्यादा हिस्सा व्यर्थ जाता है। यह लैंड यूज में बदलाव, रसायनों के ज्यादा प्रयोग तथा मिट्टी के क्षरण जैसे नुकसानदायक प्रैक्टिस के लिए इंसेंटिव के रूप में होता है। इससे मिट्टी की सेहत और पानी की गुणवत्ता प्रभावित होती है और यह दोनों कृषि उत्पादकता को व्यापक रूप से प्रभावित करते हैं। वर्ल्ड बैंक तथा आईएफपीआरआई की रिसर्च के अनुसार कृषि पर सरकार के एक अरब डॉलर के खर्च में किसान को औसतन 0.35 डॉलर का फायदा होता है। इसके अतिरिक्त बायोफ्यूल के लिए खाद्य वाली फसलों को बढ़ावा देने की नीति से खाद्य उत्पादन की जमीन का इस्तेमाल बदल रहा है, जिसका नकारात्मक प्रभाव खाद्य सुरक्षा और जलवायु पर पड़ता है।</span></p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ टिकाऊ खाद्य प्रणाली के लिए इनोवेशन, निवेश और सही पॉलिसी की जरूरतः डब्लूआरआई ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[दुनिया के 59 देशों में हर पांच में से एक व्यक्ति गम्भीर खाद्य संकट से प्रभावित]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/acute-hunger-remains-persistently-high-in-59-countries-un-agencies.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 25 Apr 2024 14:40:36 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/acute-hunger-remains-persistently-high-in-59-countries-un-agencies.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>यूएन एजेंसियों ने ग़ाज़ा से लेकर सूडान और कई स्थानों पर अकाल के बढ़ते जोखिम और बड़े पैमाने पर मौतें होने की आशंका व्यक्त की है।</p>
<p>खाद्य संकटों पर नवीनतम वैश्विक रिपोर्ट के अनुसार, 59 देशों में हर पांच में से एक व्यक्ति यानि लगभग 20 प्रतिशत लोगों ने, वर्ष 2023 में अत्यन्त गम्भीर स्तर की खाद्य असुरक्षा का सामना किया। जबकि वर्ष 2016 में यह संख्या 48 देशों में 10 में से एक व्यक्ति यानि लगभग 10 प्रतिशत लोगों की थी।&nbsp;</p>
<p>संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन &ndash;&nbsp;<a href="http://www.fao.org/home/en/" target="_blank" rel="noopener noreferrer">FAO</a><span>&nbsp;</span>के जिनीवा स्थित सम्पर्क कार्यालय के निदेशक डोमिनीक बर्जियॉन ने कहा, &ldquo;जब हम अत्यन्त गम्भीर खाद्य असुरक्षा की बात करते हैं तो हम ऐसी अत्यन्त गम्भीर भूख स्थिति की बात करते हैं जो लोगों की आजीविकाओं और ज़िन्दगियों के लिए तत्काल जोखिम पैदा करती है।&rdquo;</p>
<p>&ldquo;ये ऐसी भूख स्थिति है जिसके अकाल में तब्दील हो जाने और इससे बड़े पैमाने पर लोगों की मौतें होने का डर है।&rdquo;</p>
<h2><strong>COVID-19 जोखिम का स्तर</strong></h2>
<p>यह रिपोर्ट खाद्य व कृषि संगठन&nbsp;(FAO) और विश्व खाद्य कार्यक्रम &ndash; (WFP), यूएन बाल कोष &ndash;&nbsp;(<a href="https://www.unicef.org/" target="_blank" rel="noopener noreferrer">UNICEF</a>) ने संयुक्त रूप से तैयार की है।&nbsp;</p>
<p>रिपोर्ट में पाया गया है कि यद्यपि वर्ष 2023 में ख़तरनाक रूप से खाद्य अभाव का सामना कर रहे लोगों की संख्या वर्ष 2022 की तुलना में 1.2 प्रतिशत कम थी, मगर कोविड-19 संकट के बाद से, समस्या गम्भीर रूप से बदतर हुई है।</p>
<p>जब वर्ष 2019 के अन्त में कोरोना वायरस ने अपना क़हर बरपाना शुरू किया था तो 55 देशों में औसतन छह में से एक व्यक्ति, खाद्य असुरक्षा के चिन्ताजनक स्तर का सामना कर रहे थे।</p>
<h2><strong>&lsquo;ग़ाज़ा में लोग भूख से मौत के मुँह में&rsquo;</strong></h2>
<p>वर्ष 2023 में खाद्य संकट में चिन्ताजनक वृद्धि हुई है। विशेष रूप से ग़ाज़ा और सूडान की स्थितियां चिंताजनक हैं। जिनीवा में<span>&nbsp;</span><a href="http://www1.wfp.org/" target="_blank" rel="noopener noreferrer">विश्व खाद्य कार्यक्रम</a><span>&nbsp;</span>के निदेशक जियान कार्लो सीरी ने कहा है कि इन स्थानों पर लोग स्पष्ट रूप से भुखमरी का शिकार हो रहे हैं।&nbsp;</p>
<p>उन्होंने कहा, इसराइल की लगभग 7 महीने की बमबारी के बाद, &ldquo;लोग अपनी बहुत ही बुनियादी खाद्य ज़रूरतें पूरी करने में असमर्थ हैं। उन्होंने भूख का सामना करने के लिए सभी उपाय और विकल्प आज़मा लिए हैं, जिनमें पशुओं का चारा खाना, भीख मांगना और भोजन ख़रीदने के लिए अपनी बुनियादी चीज़ें बेचने जैसे तरीक़े शामिल हैं।&rdquo;</p>
<p>&ldquo;उनके पास समय नहीं बचा है और उनमें से कुछ लोग तो भुखमरी के कारण मौत के मुँह में जा रहे हैं।&rdquo;</p>
<p>उन्होंने जिनीवा में पत्रकारों से कहा कि अकाल को रोकने का एक मात्र तरीक़ा यही है कि बहुत ही कम समय में पर्याप्त खाद्य सामग्री की त्वरित आपूर्ति सुनिश्चित की जाए।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/04/image_750x500_662a1d857b89d.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ दुनिया के 59 देशों में हर पांच में से एक व्यक्ति गम्भीर खाद्य संकट से प्रभावित ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/04/image_750x500_662a1d857b89d.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[भारत ने लगातार पांचवीं बार डब्ल्यूटीओ में चावल खरीद के लिए पीस क्लॉज का सहारा लिया]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/india-invokes-peace-clause-for-rice-in-wto-for-the-fifth-consecutive-time.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 09 Apr 2024 14:06:35 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/india-invokes-peace-clause-for-rice-in-wto-for-the-fifth-consecutive-time.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत ने अपनी खाद्य सुरक्षा और चावल किसानों को अतिरिक्त सहायता प्रदान करने के लिए एक बार फिर विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के पीस क्लॉज का सहारा लिया है। भारत ने चावल के लिए निर्धारित सब्सिडी सीमा का उल्लंघन करने के कारण वर्ष 2022-23 (अक्टूबर-सितंबर) में लगातार पांचवीं बार विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में पीस क्लॉज का इस्तेमाल किया।&nbsp;</p>
<p><strong>पीस क्लॉज, </strong><span>विश्व व्यापार संगठन</span><span>&nbsp;</span><span>का एक अस्थायी समाधान है </span><span>जो </span>विकासशील देशों के खाद्य खरीद कार्यक्रमों को सब्सिडी की सीमा के उल्लंघन की स्थिति में डब्ल्यूटीओ के सदस्यों की कार्रवाई से बचाता है।</p>
<p><strong>भारत</strong> ने डब्ल्यूटीओ को सूचित किया है कि वर्ष 2022-23 में भारत में चावल के कुल उत्पादन का मूल्य 52.8 बिलियन डॉलर था, जबकि किसानों को 6.39 बिलियन डॉलर की सब्सिडी दी गई थी। इसका मतलब है कि चावल सब्सिडी उत्पादन के मूल्य का 12 प्रतिशत थी, जिससे 10 प्रतिशत सब्सिडी सीमा का उल्लंघन हुआ।</p>
<p>इस उल्लंघन का कोई तत्काल प्रभाव नहीं पड़ेगा क्योंकि भारत ने <strong>पीस क्लॉज</strong> का सहारा लिया है, जिस पर 2013 में डब्ल्यूटीओ की बाली मंत्रिस्तरीय सहमति हुई थी। डब्ल्यूटीओ में अपनी लिखित दलील में भारत ने यह कहकर अपना बचाव किया कि पब्लिक स्टॉकहोल्डिंग प्रोग्राम के तहत स्टॉक को देश की गरीब आबादी की खाद्य सुरक्षा जरूरतों को पूरा करने के लिए बढ़ाया गया, न कि व्यापार को विकृत करने या अन्य देशों की खाद्य सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव डालने के लिए।"</p>
<p><strong>निर्धारित सीमा</strong> से अधिक <strong>सब्सिडी</strong> को व्यापार-विकृत करने वाले कदम के रूप में देखा जाता है। भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यह सीमा खाद्य उत्पादन के मूल्य का 10 प्रतिशत तय की गई है। भारत ने बार-बार डब्ल्यूटीओ से सार्वजनिक खाद्य भंडार के मुद्दे का स्थायी समाधान खोजने की मांग की है।&nbsp;</p>
<p><strong>पब्लिक स्टॉकहोल्डिंग</strong>&nbsp;के तहत सरकार <strong>न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी)</strong> पर किसानों से चावल और गेहूं जैसी फसलें खरीदती है और गरीबों को खाद्यान्न का वितरण करती है। वैश्विक व्यापार मानदंडों के तहत, डब्ल्यूटीओ के सदस्य देश की खाद्य सब्सिडी 1986-88 के संदर्भ मूल्य के आधार पर उत्पादन के मूल्य के 10 प्रतिशत की सीमा से अधिक नहीं होनी चाहिए। भारत खाद्य सब्सिडी सीमा की गणना के इस फॉर्मूले में संशोधन की मांग कर रहा है।</p>
<p>एक अंतरिम उपाय के रूप में, दिसंबर 2013 में <strong>बाली मंत्रिस्तरीय बैठक</strong> में डब्ल्यूटीओ के सदस्य एक तंत्र स्थापित करने पर सहमत हुए थे जिसे पीस क्लॉज कहा जाता है। <strong>पीस क्लॉज</strong> के तहत, डब्ल्यूटीओ के सदस्य विकासशील देशों द्वारा निर्धारित सीमा के किसी भी उल्लंघन को चुनौती देने से परहेज करने पर सहमत हुए। यह धारा तब तक रहेगी जब तक खाद्य भंडारण के मुद्दे का स्थायी समाधान नहीं निकाल लिया जाता है।</p>
<p>भारत <strong>2018-19</strong> से <strong>चावल</strong> की सरकारी खरीद के मामले में घरेलू समर्थन सीमा को पार कर रहा है, लेकिन पीस क्लॉज के चलते यह अपनी पब्लिक स्टॉकहोल्डिंग नीतियों को कानूनी चुनौतियों से बचाने में सफल रहा है। सवाल यह है कि भारत बार-बार चावल पर अपनी घरेलू समर्थन सीमा का उल्लंघन क्यों कर रहा है। दरअसल, यह मुख्य रूप से डब्ल्यूटीओ के पुराने और त्रुटिपूर्ण फॉर्मूले के कारण हो रहा है जो बढ़ी हुई सरकारी खरीद को गलत रूप में पेश करता है।&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ भारत ने लगातार पांचवीं बार डब्ल्यूटीओ में चावल खरीद के लिए पीस क्लॉज का सहारा लिया ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[विश्व बाजार में अनाज और चीनी के दाम में गिरावट का रुख लेकिन वनस्पति तेल महंगे हुए: एफएओ]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/higher-international-quotations-for-vegetable-oils-and-dairy-products-more-than-offset-lower-quotations-for-cereals-and-sugar.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 06 Apr 2024 07:34:53 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/higher-international-quotations-for-vegetable-oils-and-dairy-products-more-than-offset-lower-quotations-for-cereals-and-sugar.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">मार्च में अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाने-पीने की चीजों के दाम में कुल मिलाकर थोड़ी कमी देखने को मिली है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) का फूड प्राइस इंडेक्स मार्च में 118.3 अंक पर रहा जो एक साल पहले की तुलना में 7.7% कम है। हालांकि पिछले महीने वनस्पति तेल, डेयरी प्रोडक्ट और मीट के दाम बढ़े जबकि अनाज की कीमतों में गिरावट आई है। भारत में बेहतर उत्पादन की सूचना से चीनी के दाम में भी नरमी आई है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">एफएओ के अनुसार पिछले महीने वनस्पति तेलों के दाम में सबसे ज्यादा वृद्धि हुई। फरवरी के मुकाबले इसका इंडेक्स 8% बढ़ा है। पाम, सोया, सनफ्लावर और रेपसीड सभी तेलों की कीमतों में वृद्धि हुई है। ग्लोबल मार्केट में पाम तेल के दाम बढ़ने का कारण प्रमुख उत्पादक देशों में उपज में कमी आना है। इसके अलावा दक्षिण पूर्व एशिया के देशों में इसकी डिमांड भी मजबूत है। बायोफ्यूल सेक्टर में खासकर ब्राजील और अमेरिका से मांग आने के कारण सोया ऑयल कई साल के निचले स्तर से ऊपर आ गया है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">डेयरी प्राइस इंडेक्स में लगातार छठे महीने वृद्धि हुई है।&nbsp; फरवरी के मुकाबले यह 2.9% बढ़ा है। विश्व बाजार में चीज और बटर के दाम बढ़ने के कारण इस इंडेक्स में वृद्धि हुई है। फाओ का मीट प्राइस इंडेक्स भी फरवरी के मुकाबले 1.7% बढ़ा है।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इन कमोडिटी के विपरीत फाओ का अनाज मूल्य सूचकांक 2.6% कम हुआ है। मार्च 2023 से तुलना करें तो इसमें 20% की गिरावट आई है। यह गिरावट मुख्य रूप से ग्लोबल मार्केट में गेहूं के निर्यात मूल्य में कमी आने के कारण है। चीन की तरफ से गेहूं की खरीद के कुछ सौदे रद्द करने के बाद यूरोपीय यूनियन, रूस और अमेरिका में गेहूं निर्यात के लिए प्रतिस्पर्धा लगी हुई है। हालांकि मक्के की कीमतों में पिछले महीने थोड़ी वृद्धि देखने को मिली है। इसकी मुख्य वजह यूक्रेन में लॉजिस्टिक्स की समस्या बताई गई है। चावल की कीमत का इंडेक्स 1.7% कम हुआ है क्योंकि विश्व बाजार में इसकी डिमांड नरम है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">चीनी की कीमतों का इंडेक्स फरवरी की तुलना में 5.4% नीचे आया है। इसकी मुख्य वजह भारत में 2023-24 के सीजन में चीनी के उत्पादन के अनुमान में बढ़ोतरी है। इसके अलावा थाईलैंड में भी गन्ने की अच्छी फसल की खबर है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">एफएओ ने शुक्रवार को अनाज की सप्लाई और डिमांड के नए अनुमान भी जारी किए। गेहूं, मक्का और चावल के उत्पादन में वृद्धि के संभावना को देखते हुए इसने 2023-24 के सीजन में अनाज का उत्पादन का अनुमान बढ़ाकर 284.1 करोड़ टन कर दिया है। इसने इस सीजन में अनाज की खपत 282.8 करोड़ टन रहने का अनुमान जताया है। यह 2022-23 की तुलना में 1.3 प्रतिशत अधिक होगा। संगठन का अनुमान है कि 2024 के सीजन के अंत में 89.4 करोड़ टन अनाज का स्टॉक होगा। यह एक साल पहले की तुलना में 2.3 प्रतिशत अधिक रहेगा।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इसका अनुमान है कि 2024 में दुनिया में गेहूं का 79.6 करोड़ टन का उत्पादन होगा। यह पिछले साल की तुलना में एक प्रतिशत अधिक है। जहां तक मोटे अनाज की बात है तो उत्तरी गोलार्ध के देशों में जल्दी ही इनकी बुवाई शुरू होगी जबकि दक्षिणी गोलार्ध में इनकी कटाई शुरू हो चुकी है।</span></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ विश्व बाजार में अनाज और चीनी के दाम में गिरावट का रुख लेकिन वनस्पति तेल महंगे हुए: एफएओ ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[ऑस्ट्रेलिया की ला ट्रोब यूनिवर्सिटी के नए वीसी का भारत के साथ भागीदारी बढ़ाने पर जोर]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/new-vc-of-la-trobe-university-of-australia-emphasizes-on-strengthening-partnership-with-india.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 20 Mar 2024 20:58:28 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/new-vc-of-la-trobe-university-of-australia-emphasizes-on-strengthening-partnership-with-india.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>ऑस्ट्रेलिया की ला ट्रोब यूनिवर्सिटी ने नए कुलपति की भारत यात्रा के दौरान भारतीय अनुसंधान और शैक्षणिक साझेदारी को मजबूत करने पर जोर दिया है। फरवरी में यूनिवर्सिटी के नए कुलपति का पद ग्रहण करने वाले <strong>प्रोफेसर थियो फैरेल</strong> ने पांच दिवसीय भारत यात्रा के दौरान उद्योग, <span>व्यापार और सरकार के प्रतिनिधियों के साथ मुलाकात कर विभिन्न क्षेत्रों में भागीदारी की संभावनाएं तलाश कीं।&nbsp;</span></p>
<p><strong>ला ट्रोब यूनिवर्सिटी</strong> से भारत का पुराना नाता रहा है। भारत यात्रा के दौरान प्रोफेसर फैरेल ने पारस्परिक हितों के क्षेत्रों में सहयोग और नई साझेदारी की संभावनाएं तलाशने के लिए कई राउंड टेबल डिस्कशन किये और कई घोषणाएं कीं।&nbsp;</p>
<p>यूनिवर्सिटी की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, ला ट्रोब के लिए कई प्राथमिकता वाले क्षेत्र हैं जो भारत के साथ संबंधों को मजबूत करने और नई साझेदारियां विकसित करने के अवसर प्रदान करते हैं। इनमें भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच स्टूडेंट एक्सचेंज को बढ़ावा देना, <span>डिजिटल प्रौद्योगिकियों और कौशल नवाचारों पर केंद्रित अनुसंधान</span>, <span>रिसर्च कमर्शियलाइजेशन और औद्योगिक भागीदारी शामिल है। </span></p>
<p><strong>प्रोफेसर फैरेल</strong> ने कहा कि आपसी साझेदारी के मजबूत होने से स्मार्ट सिटी, टिकाऊ कृषि,<span> खाद्य सुरक्षा</span>, <span>और हेल्थकेयर जैसे क्षेत्रों में यूनिवर्सिटी की क्षमताओं में इजाफा होगा। ला ट्रोब के कई महत्वपूर्ण विश्वविद्यालय भागीदार भारत में हैं</span>, और वह भारत में उद्योग और व्यवसायों के साथ महत्वपूर्ण साझेदारी बना रहे हैं जो इन क्षेत्रों में हमारी विशेषज्ञता का लाभ उठाते हैं। बायो-इनोवेशन में उनकी विशेषज्ञता को हाल ही में दुनिया की अग्रणी बायोटेक कंपनी ने मान्यता दी है।</p>
<p><strong>स्मार्ट सिटीज से जुड़ी पहल&nbsp;</strong></p>
<p><strong>एशियन स्मार्ट सिटीज़ रिसर्च इनोवेशन नेटवर्क</strong> (ASCRIN) की लीडरशिप राउंडटेबल में सहयोग और जुड़ाव के अवसरों पर भी चर्चा की गई। यह नेटवर्क 2019 में ला ट्रोब यूनिवर्सिटी द्वारा स्थापित किया गया था। इस अंतरराष्ट्रीय अनुसंधान पहल को 43 मिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर (235 करोड़ रुपये) से अधिक का संयुक्त निवेश प्राप्त है।</p>
<p>एशियन स्मार्ट सिटीज़ रिसर्च इनोवेशन नेटवर्क (ASCRIN) के संस्थापक और आईआईटी कानपुर - ला ट्रोब यूनिवर्सिटी रिसर्च अकादमी के सह-निदेशक प्रोफेसर <strong>अनिरुद्ध देसाई</strong> ने बताया कि 250 से अधिक शोधकर्ताओं के इस नेटवर्क ने भारत के शहरों और कस्बों की क्षमता और दक्षता को बढ़ाने के उद्देश्य से कई परियोजनाएं तैयार की है। हमारा प्रयास अब इन पर आगे बढ़ने और उद्योग व सरकार के साथ जुड़ाव में तेजी लाना है।&rdquo;&nbsp;</p>
<p><strong>संस्थानों से भागीदारी</strong></p>
<p>पिछले साल टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस (टीआईएसएस), इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, कानपुर और बिड़ला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड साइंस, पिलानी भी ASCRIN नेटवर्क में शामिल हो गये। इसमें 250 से अधिक शोधकर्ता और 70 से अधिक संयुक्त-पीएचडी परियोजनाएं शामिल हैं।</p>
<p>प्रोफेसर फैरेल और टीआईएसएस के प्रो वाइस चांसलर <strong>प्रोफेसर शंकर दास</strong> ने एक <strong>संयुक्त-पीएचडी</strong> कार्यक्रम की भी घोषणा की, जो एशिया में शहरीकरण की बढ़ती चुनौतियों का समाधान करने के लिए भारतीय छात्रों को शोध करने में सहायता करेगा।</p>
<p>ला ट्रोब प्रतिनिधिमंडल <strong>टेक्नोलॉजी इन्फ्यूजन ग्रैंड चैलेंज</strong> के फाइनलिस्ट और विजेताओं को सम्मानित करेगा। भारत के 18 विश्वविद्यालयों की 67 टीमों में 130 से अधिक छात्रों ने इस चैलेंज में भाग लिया। प्रोफेसर फैरेल <strong>महिंद्रा विश्वविद्यालय</strong> का भी दौरा करेंगे, जहां ला ट्रोब ने सिविल इंजीनियरिंग में एक संयुक्त स्नातक डिग्री कार्यक्रम शुरू किया है।&nbsp;</p>
<p>2019 में ला ट्रोब यूनिवर्सिटी ने भारतीय सिने अभिनेता <strong>शाहरुख खान</strong> को डॉक्टर ऑफ लेटर्स (मानद उपाधि) की मानद उपाधि &nbsp;से सम्मानित किया था। यह हिंदी पढ़ाने वाले दो ऑस्ट्रेलियाई विश्वविद्यालयों में से एक है। यूनिवर्सिटी 2010 से मेलबर्न के <strong>भारतीय फिल्म महोत्सव</strong> की संस्थापक भागीदार है।</p>
<p><strong>दिल्ली की सुमैरा को शाहरुख खान ला ट्रोब यूनिवर्सिटी पीएचडी स्कॉलरशिप</strong></p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/03/image_750x_65faff8b3d3e6.jpg" alt="" /></p>
<p>दूसरी प्रतिष्ठित शाहरुख खान ला ट्रोब यूनिवर्सिटी पीएचडी छात्रवृत्ति दिल्ली की <strong>सुमैरा खान</strong> को प्रदान की गई। नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में ला ट्रोब विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर थियो फैरेल ने सुमैरा खान को 2.25 लाख ऑस्ट्रेलियाई डॉलर की पीएचडी छात्रवृत्ति प्रदान की। मेलबर्न के भारतीय फिल्म महोत्सव के साथ ला ट्रोब की साझेदारी के माध्यम से पीएचडी छात्रवृत्ति संभव हुई।</p>
<p>सुमैरा ऑस्ट्रेलिया में टाइप 2 मधुमेह के बढ़ते जोखिम वाली दक्षिण एशियाई प्रवासी महिलाओं के लिए स्वास्थ्य देखभाल में सुधार के तरीकों की पहचान करने के लिए चिकित्सा मानवविज्ञानी डॉ. टैरिन फिलिप्स और डॉ. कैथरीन ट्रंडल के साथ काम करेंगी।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/03/image_750x500_65fb00f542e07.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ ऑस्ट्रेलिया की ला ट्रोब यूनिवर्सिटी के नए वीसी का भारत के साथ भागीदारी बढ़ाने पर जोर ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/03/image_750x500_65fb00f542e07.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[साल 2023 में टूटे जलवायु परिवर्तन के सारे रिकॉर्ड, WMO की चेतावनी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/climate-change-indicators-reached-record-levels-in-2023-wmo.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 20 Mar 2024 10:04:55 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/climate-change-indicators-reached-record-levels-in-2023-wmo.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) की हालिया रिपोर्ट बताती है कि जलवायु परिवर्तन के <strong>मुख्य संकेतकों</strong> - ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन, पृथ्वी की सतह के तापमान, महासागर ताप व अम्लीकरण, समुद्री जल स्तर में वृद्धि, जमे हुए जल की घटती चादर व खिसकते हिमनद - ने फिर से नए रिकॉर्ड स्थापित किए हैं।</p>
<p>यूएन मौसम विज्ञान एजेंसी <strong>डब्ल्यूएमओ</strong> की <strong>स्टेट ऑफ द ग्लोबल क्लाइमेट 2023</strong> रिपोर्ट के अनुसार, हीटवेव, बाढ़, सूखा, जंगल की आग और चक्रवातों ने तबाही मचाई, जिससे लाखों लोगों का रोजमर्रा का जीवन अस्त-व्यस्त हो गया और कई अरब डॉलर का आर्थिक नुकसान हुआ।</p>
<p>संयुक्त राष्ट्र के शीर्षतम अधिकारी <strong>एंतोनियो गुटेरेश</strong> ने अपने वीडियो सन्देश में चेतावनी जारी करते हुए कहा कि हर बड़े संकेतक पर सायरन सुनाई दे रहे हैं, और इन बदलावों की गति तेज़ हो रही है।</p>
<p>यह रिपोर्ट अनेक एजेंसियों से प्राप्त डेटा के विश्लेषण पर आधारित है। इसमें पुष्टि की गई है कि <strong>वर्ष 2023</strong>, अब तक का सर्वाधिक गर्म साल था, और पूर्व-औद्योगिक काल की तुलना में औसत निकट-सतह तापमान 1.45 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया। पिछले दस साल अब तक की सबसे गर्म अवधि साबित हुए हैं।&nbsp;</p>
<p>यूएन मौसम विज्ञान एजेंसी की महासचिव <strong>सेलेस्ते साउलो</strong> ने मंगलवार को जिनेवा में रिपोर्ट जारी करते हुए कहा कि जलवायु परिवर्तन पर वैज्ञानिक ज्ञान, पिछले पाँच दशकों से अस्तित्व में है मगर हमने फिर भी अवसरों को खो दिया है। हम कभी भी जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते की 1.5 डिग्री सेल्सियस निचली सीमा के इतने करीब नहीं थे</p>
<p>उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की जवाबी कार्रवाई को भावी पीढ़ियों के कल्याण की दृष्टि से अपनाया जाना होगा, ना कि अल्पकालिक आर्थिक हितों के आधार पर</p>
<p><strong>प्रारंभिक आंकड़ों</strong> के अनुसार, पश्चिमी उत्तरी अमेरिका और यूरोप दोनों में अत्यधिक पिघलने के कारण संदर्भ ग्लेशियरों के वैश्विक समूह को रिकॉर्ड (1950 के बाद से) बर्फ का सबसे बड़ा नुकसान हुआ।</p>
<p><strong>अंटार्कटिक समुद्री बर्फ</strong> का विस्तार रिकॉर्ड पर अब तक सबसे कम था, सर्दियों के अंत में अधिकतम विस्तार पिछले रिकॉर्ड वर्ष से 1 मिलियन किमी 2 कम था - फ्रांस और जर्मनी के संयुक्त आकार के बराबर।</p>
<p><strong>दुनिया में उथल-पुथल</strong></p>
<p>यूएन विशेषज्ञों ने ध्यान दिलाया है कि जलवायु परिवर्तन केवल वायु तापमान तक ही सीमित नहीं है। महासागरों का तापमान और समुद्री जलस्तर में अभूतपूर्व स्तर पर वृद्धि हुई है, हिमनद पीछे खिसक रहे हैं और अन्टार्कटिक क्षेत्र में जमे हुए जल की चादर की मात्रा में कमी आ रही है।</p>
<p><strong>वर्ष 2023 में</strong> औसतन किसी एक दिन, महासागर सतह का लगभग एक तिहाई हिस्सा समुद्री ताप लहर की चपेट में था, जिससे अति महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र व खाद्य प्रणालियाँ प्रभावित हो रही थीं।</p>
<p>रिपोर्ट बताती है कि <strong>हिमनदों</strong> ने वर्ष 1950 से अब तक सबसे अधिक मात्रा में जमे हुए जल को खोने का रिकॉर्ड बनाया है. आरम्भिक आँकड़ों के अनुसार, पश्चिमी उत्तर अमेरिका और योरोप में बड़े पैमाने पर इनमें पिघलाव हुआ है। वहीं, ऐल्प्स क्षेत्र में भी पर्वतों की चोटियों पर अत्यधिक पिघलाव देखा गया।</p>
<p><strong>वायुमंडल</strong> में तीन मुख्य ग्रीनहाउस गैसों &ndash; कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड &ndash; की सघनता वर्ष 2022 में रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गई थी और ये रुझान 2023 में भी जारी रहा।</p>
<p><strong>वैश्विक असर</strong></p>
<p>रिपोर्ट के अनुसार, चरम जलवायु और मौसम की घटनाएँ वर्ष 2023 में विस्थापन, खाद्य असुरक्षा, जैवविविधता हानि, स्वास्थ्य प्रभावों समेत अन्य कारणों के लिए भी ज़िम्मेदार रही हैं।&nbsp;</p>
<p>एक अनुमान के अनुसार, विश्व भर में अचानक <strong>खाद्य असुरक्षा</strong> का शिकार हुए लोगों की संख्या में दोगुनी वृद्धि हुई है - कोविड-19 महामारी से पहले 14.9 करोड़ से बढ़कर यह संख्या 2023 में 33.3 करोड़ तक पहुँच गई है।</p>
<p><strong>विश्व खाद्य कार्यक्रम</strong> द्वारा 78 देशों की निगरानी की जाती है, जिसके आधार पर इस आँकड़े पर पहुँचा गया है। संगठन का कहना है कि जलवायु व मौसम जनित घटनाएँ इसकी मुख्य वजह भले ही ना हों, मगर ऐसी आपदाओं के कारण खाद्य असुरक्षा और अधिक गहरा जाती है।&nbsp;</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/03/image_750x500_65fa8ad1c8dce.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ साल 2023 में टूटे जलवायु परिवर्तन के सारे रिकॉर्ड, WMO की चेतावनी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[भारत&amp;#45;ईएफटीए व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर, किसे होगा कितना फायदा?]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/india-efta-free-trade-agreement-who-will-benefit-how-much.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 11 Mar 2024 13:09:13 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/india-efta-free-trade-agreement-who-will-benefit-how-much.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत ने रविवार को चार यूरोपीय देशों के संगठन <strong>यूरोपिन फ्री ट्रेड एसोसिएशन</strong> <strong>(</strong><strong>ईएफटीए</strong><strong>) </strong>के साथ एक व्यापार एवं आर्थिक साझेदारी समझौते <strong>(टीईपीए)</strong> पर हस्ताक्षर किए। ईएफटीए में <strong>आइसलैंड, लिकटेंस्टीन, नॉर्वे </strong>और<strong> स्विटजरलैंड</strong> शामिल हैं। समझौते के तहत इन देशों ने अगले 15 वर्षों में भारत में 100 अरब डॉलर के निवेश का वादा किया है जिससे दस लाख रोजगार पैदा होने का अनुमान है। बदले में भारत स्विस घड़ियों, चॉकलेट और डायमंड जैसे कई यूरोपीय उत्पादों को शून्य या कम आयात शुल्क पर अपने बाजार में प्रवेश देगा। इस समझौते पर सहमति बनाने में 16 साल लगे।&nbsp;</p>
<p>स्विस फेडरल काउंसलर गाइ पार्मेलिन और आइसलैंड, लिकटेंस्टीन और नॉर्वे के उनके समकक्षों ने रविवार को नई दिल्ली में व्यापार मंत्री पीयूष गोयल के साथ समझौते पर हस्ताक्षर किए। समझौते के तहत भारत ईएफटीए के देशों से औद्योगिक उत्पादों पर आयात शुल्क कम करने के लिए प्रतिबद्ध है। इससे इन देशों के उत्पादों की भारतीय बाजार में पहुंच बढ़ेगी। इसकी एवज में चारों देशों के समूह ने भारत में अगले 15 वर्षों में 100 अरब डॉलर के निवेश का वादा किया है।&nbsp;</p>
<p>प्रधानमंत्री <strong>नरेंद्र मोदी</strong> ने कहा कि यह ऐतिहासिक समझौता आर्थिक प्रगति को बढ़ावा देने तथा हमारे देश के युवाओं के लिए अवसर सृजित करने की हमारी प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है। आने वाला समय और भी अधिक समृद्धि एवं पारस्परिक विकास लाएगा क्योंकि हम ईएफटीए राष्ट्रों के साथ अपने संबंधों को मजबूत करेंगे।&nbsp;</p>
<p>वाणिज्य और उद्योग मंत्री<strong> पीयूष गोयल</strong> ने कहा कि पहली बार भारत चार विकसित देशों, जो यूरोप में एक महत्वपूर्ण आर्थिक ब्लॉक हैं, के साथ एफटीए पर हस्ताक्षर कर रहा है। एफटीए के इतिहास में पहली बार 100 बिलियन डॉलर के निवेश और दस लाख प्रत्यक्ष रोजगार की बाध्यकारी प्रतिबद्धता जताई गई है। गोयल के अनुसार, यह समझौता <strong>मेक इन इंडिया</strong> को बढ़ावा देगा तथा युवा एवं प्रतिभाशाली श्रमबल को अवसर प्रदान करेगा। इससे बड़े यूरोपीय तथा वैश्विक बाजारों तक भारतीय निर्यातकों की पहुंच बढ़ेगी।&nbsp;</p>
<p>भारत-ईएफटीए मुक्त व्यापार समझौते में निवेश प्रोत्साहन, तकनीकी बाधाएं दूर करने, बौद्धिक संपदा, व्यापार और सतत विकास और विवाद निपटान जैसे 14 अध्याय शामिल हैं। मुक्त व्यापार एवं आर्थिक एकीकरण को बढ़ावा देने के लिए 1960 में गठित ईएफटीए एक अंतर-सरकारी संगठन है। यह यूरोप में ईयू और ब्रिटेन के बाद तीसरा सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक गुट है।&nbsp;</p>
<p>ईएफटीएम में भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार <strong>स्विट्जरलैंड</strong> है, जहां पहले से ही लगभग सभी औद्योगिक वस्तुओं पर शून्य सीमा शुल्क है। इसके कारण, स्विस पक्ष वस्तुओं के मामले में कुछ नई पेशकश करने की स्थिति में नहीं है। जबकि शेष तीन देशों के साथ भारत का व्यापार कम है। भारत को प्रसंस्कृत कृषि उत्पादों पर शुल्क में रियायत मिलेगी।&nbsp;</p>
<p>ईएफटीए की ओर से स्विस फेडरल काउंसलर <strong>गाइ पार्मेलिन</strong> ने कहा कि इस समझौते से ईएफटीए देशों को एक प्रमुख ग्रोथ मार्केट तक पहुंच प्राप्त होगी। हमारी कंपनियां अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं में विविधता लाने और उन्हें सुदृढ़ बनाने का प्रयास करती हैं। बदले में, भारत ईएफटीए से अधिक विदेशी निवेश आकर्षित करेगा।</p>
<p>इस समझौते के होने से भारतीय उपभोक्ताओं को उच्च गुणवत्ता वाले स्विस उत्पाद जैसे घड़ियां, चॉकलेट और बिस्कुट कम कीमत पर उपलब्ध होंगी क्योंकि भारत 10 वर्षों में इन वस्तुओं पर सीमा शुल्क को चरणबद्ध तरीके से समाप्त कर देगा। भारत फार्मा, चिकित्सा उपकरणों और प्रसंस्कृत खाद्य जैसे कुछ उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन क्षेत्रों पर शुल्क रियायतें भी प्रदान करेगा।&nbsp;</p>
<p><strong>ईएफटीए</strong> अपनी 92.2 प्रतिशत टैरिफ लाइनों की पेशकश कर रहा है जो भारत के 99.6 प्रतिशत निर्यात को कवर करता है। ईएफटीए के बाजार पहुंच प्रस्ताव में 100 प्रतिशत गैर-कृषि उत्पाद और प्रसंस्कृत कृषि उत्पाद (पीएपी) पर टैरिफ रियायत शामिल है।&nbsp;</p>
<p><strong>भारत</strong> अपनी 82.7 प्रतिशत टैरिफ लाइनों की पेशकश कर रहा है जिसमें 95.3 प्रतिशत ईएफटीए निर्यात शामिल है। इसमें से 80 प्रतिशत से अधिक आयात सोना है। सोने पर प्रभावी शुल्क अछूता रहा है। सीमा शुल्क से छूट देते समय फार्मा, चिकित्सा उपकरणों और <strong>प्रसंस्कृत खाद्य</strong> आदि क्षेत्रों में पीएलआई से संबंधित संवेदनशीलता को ध्यान में रखा गया है। जबकि <strong>डेयरी,</strong> सोया, कोयला और संवेदनशील <strong>कृषि</strong> उत्पाद जैसे क्षेत्रों को समझौते से बाहर रखा गया है।&nbsp;</p>
<p>समझौते में प्रावधान है कि यदि प्रस्तावित निवेश किन्हीं कारणों से नहीं आएगा, तो भारत चार देशों को शुल्क रियायतों को "पुनः संतुलित या निलंबित" कर सकता है। जिन क्षेत्रों में भारतीय सेवाओं को बढ़ावा मिलेगा उनमें कानूनी, ऑडियो-विज़ुअल, आर एंड डी, कंप्यूटर, अकाउंटिंग और ऑडिटिंग शामिल हैं। जेनेरिक दवाओं में भारत के हितों और पेटेंट की एवरग्रीनिंग से संबंधित चिंताओं को पूरी तरह से संबोधित किया गया है।</p>
<p><strong>वाणिज्य मंत्रालय</strong> के अनुसार, इस समझौते से भारत में निर्मित वस्तुओं के निर्यात को बढ़ावा मिलेगा और साथ ही सेवा क्षेत्र को अधिक बाजारों तक पहुंचने के अवसर मिलेंगे। स्विट्जरलैंड के वैश्विक सेवा निर्यात का 40 प्रतिशत से अधिक यूरोपीय संघ को होता है। भारतीय कंपनियां यूरोपीय संघ तक अपने बाजार की पहुंच बढ़ाने के लिए स्विट्जरलैंड को आधार के रूप में देख सकती हैं। टीईपीए में नर्सिंग, चार्टर्ड अकाउंटेंट, आर्किटेक्ट आदि जैसी व्यावसायिक सेवाओं में पारस्परिक मान्यता समझौतों का भी प्रावधान हैं।&nbsp;</p>
<p>नॉर्वे के व्यापार और उद्योग मंत्री<strong> एन क्रिस्चियन वेस्ट्रे</strong> ने कहा कि 113 नॉर्वेजियन कंपनियां भारत में काम कर रही हैं और कई अन्य आने के इच्छुक हैं। क्लाइमेट इन्वेस्टमेंट फंड और सॉवरेन वेल्थ फंड का भारत में पर्याप्त निवेश है।&nbsp;वेस्ट्रे ने कहा, "हम यहां निवेश करने की इच्छुक कंपनियों की सहायता के लिए भारत में एक ईएफटीए कार्यालय खोलेंगे।"&nbsp;टीईपीए के तहत, नॉर्वे अगले पांच से 10 वर्षों में 98 प्रतिशत भारतीय निर्यात पर शुल्क घटाकर शून्य कर देगा।</p>
<p>यह 14वां व्यापार समझौता है जिस पर भारत ने हस्ताक्षर किए हैं। यह पीएम मोदी के नेतृत्व वाली सरकार का चौथा समझौता होगा। भारत ने मॉरीशस, संयुक्त अरब अमीरात और ऑस्ट्रेलिया के साथ समझौते पर हस्ताक्षर किए। एफटीए के लिए यूके, ओमान और पेरू के साथ बातचीत अंतिम चरण में है।</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ भारत-ईएफटीए व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर, किसे होगा कितना फायदा? ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य पदार्थों के दाम लगातार सातवें महीने घटे, लेकिन चीनी के दाम में वृद्धि]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/fao-food-price-index-declines-further-in-february-but-sugar-prices-go-up.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 09 Mar 2024 11:06:48 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/fao-food-price-index-declines-further-in-february-but-sugar-prices-go-up.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य पदार्थों के दाम लगातार सातवें महीने कम हुए हैं। फरवरी में चीनी और मीट के दामों में तो वृद्धि हुई, लेकिन सभी प्रमुख अनाज की कीमतों में गिरावट के रुख के चलते खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) का फूड प्राइस इंडेक्स नीचे आ गया। एफएओ का यह इंडेक्स अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य कमोडिटी की कीमतों में मासिक उतार-चढ़ाव पर नजर रखता है। फरवरी में इसका इंडेक्स 117.3 अंक पर रहा। यह जनवरी की तुलना में 0.7% नीचे और फरवरी 2023 की तुलना में 10.5% नीचे था।</p>
<p><br />पिछले महीने अनाज के दाम में सबसे ज्यादा गिरावट आई। एफएओ का अनाजों का प्राइस इंडेक्स जनवरी के मुकाबले 5% नीचे आ गया। फरवरी 2023 से तुलना करें तो इसमें 22.4% की गिरावट है। दक्षिण अमेरिका में अच्छी फसल होने और यूक्रेन की तरफ से प्रतिस्पर्धी कीमत ऑफर किए जाने की वजह से मक्का की कीमतों में काफी गिरावट आई है। रूस से निर्यात का दबाव बढ़ने के कारण गेहूं के दाम कम हुए हैं। चावल की कीमतों में भी पिछले महीने औसतन 1.6% की कमी आई है।</p>
<p><br />एफएओ के सब्जियों के प्राइस इंडेक्स में भी पिछले महीने 11% की कमी आई। जनवरी 2024 से तुलना करें तो इसमें 1.3 प्रतिशत की गिरावट है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोया तेल के दामों में उल्लेखनीय कमी आई है। दक्षिण अमेरिका में इसकी अच्छी फसल होने के आसार हैं। इसके अलावा सनफ्लावर और रेप सीड ऑयल की ग्लोबल मार्केट में उपलब्धता भी प्रचुर है। हालांकि उत्पादन में थोड़ी कमी के चलते पाम तेल के दाम कुछ बढ़े हैं।</p>
<p><br />अनाज और तेल के विपरीत एफएओ का चीनी का प्राइस इंडेक्स फरवरी में 3.2% बढ़ा है। ब्राजील में औसत से कम बारिश होने के चलते वहां गन्ने का उत्पादन को लेकर चिंता जताई जा रही है। इसके अलावा भारत और थाईलैंड में भी उत्पादन में कमी आने का अनुमान है। ये दोनों भी चीनी के प्रमुख निर्यातक देश हैं। मीट प्राइस इंडेक्स जनवरी की तुलना में 1.8% बढ़ा है। डेयरी प्राइस इंडेक्स में भी 1.1% की वृद्धि हुई है। बटर के लिए एशियाई देशों से दूध की मांग बढ़ी है।</p>
<p><br />एफएओ ने अनाज के उत्पादन और इसकी मांग का अनुमान भी जारी किया है। इसके मुताबिक 2023 में कुल अनाज उत्पादन 284 करोड़ टन रहने का अनुमान है। 2023-24 के सीजन में अनाज की खपत 282.3 करोड़ टन रहने की उम्मीद है। मवेशियों के चारे में मक्का और गेहूं की मांग बढ़ने के चलते खपत 1.1 प्रतिशत अधिक रहने के आसार हैं। मोटे अनाज के करण वैश्विक अनाज स्टॉक भी बढ़ने की उम्मीद है। पिछले साल के मुकाबले अनाज की ट्रेडिंग भी 1.3 प्रतिशत अधिक होने की उम्मीद है। यूक्रेन से मक्के का निर्यात बढ़ाने और चीन से इसकी अच्छी डिमांड होने के चलते ऐसा रहेगा।</p>
<p></p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य पदार्थों के दाम लगातार सातवें महीने घटे, लेकिन चीनी के दाम में वृद्धि ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[उपलब्धता बढ़ने से विश्व बाजार में गेहूं के दाम में गिरावट का रुख]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/wheat-prices-decline-in-global-market-as-supply-increases.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 25 Feb 2024 09:35:49 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/wheat-prices-decline-in-global-market-as-supply-increases.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">वैश्विक गेहूं बाजार में इस साल कमजोरी का रुख बना हुआ है। जनवरी के आखिरी सप्ताह में उत्तरी गोलार्ध में ठंड के कारण दाम में कुछ वृद्धि हुई, इसके बावजूद यूएस व्हीट एसोसिएट्स (यूएसडब्लू) का कहना है कि कीमतों में नरमी का रुख बरकरार है। इंटरनेशनल ग्रेन्स काउंसिल (आईजीसी) ने 11 जनवरी की रिपोर्ट में बताया कि नवंबर के मध्य की रिपोर्ट की तुलना में दाम एक प्रतिशत कम हुए हैं।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">आईजीसी के अनुसार पर्याप्त उपलब्धता के चलते पिछले साल के अंत में गेहूं के दाम ढाई साल के निचले स्तर पर पहुंच गए थे। उसके बाद दाम तेजी से बढ़े भी, लेकिन यह स्थिति बहुत थोड़े समय के लिए रही। निर्यात की अनिश्चितता को लेकर फ्रांस में भी दाम नीचे आए हैं।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अमेरिकी कृषि विभाग की विदेशी कृषि सेवा (एफएएस) ने पिछले महीने अपनी रिपोर्ट में अमेरिका में दिसंबर की तुलना में गेहूं के दाम घटने की बात कही है। इसका कहना है कि ग्लोबल मार्केट में पर्याप्त सप्लाई, दक्षिणी गोलार्ध के देशों की उपज बाजार में आने से बढ़ी प्रतिस्पर्धा और अमेरिकी डॉलर मजबूत होने के कारण ग्लोबल मार्केट में गेहूं के दाम नीचे आए हैं। चीन से कम मांग के चलते सॉफ्ट रेड विंटर गेहूं 14 डॉलर कम हो कर 259 डॉलर प्रति टन रह गया। हार्ड रेड वैरायटी के दाम भी भी 14 डॉलर की गिरावट आई और यह 304 डॉलर प्रति टन पर आ गया।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">वर्ल्ड ग्रेन पत्रिका ने अपने फरवरी के अंक में यूएसडब्लू के हवाले से लिखा है कि फ्रांस और जर्मनी में हाल में मौसम ने गेहूं की फसल को नुकसान पहुंचाया है। भारी बारिश के कारण खेतों में पानी भर जाने से बुवाई में भी देरी हुई। जर्मनी में जाड़ों की गेहूं की फसल का रकबा सात प्रतिशत कम रहा है। अमेरिका में भी सर्दी के मौसम ने गेहूं की खेती वाले इलाकों को प्रभावित किया है।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">आईजीसी ने वर्ष 2023-24 के लिए आटे के ग्लोबल ट्रेड अनुमान में भी संशोधन किया है। इसका कहना है कि इस वर्ष 147 लाख टन आटे का ट्रेड होने की उम्मीद है। यह अक्टूबर के पिछले अनुमान से दो लाख टन ज्यादा है। तुर्किये से उप-सहारा अफ्रीका को सप्लाई बढ़ने के कारण कुल ट्रेड में बढ़ोतरी हुई है। तुर्किये दुनिया का सबसे बड़ा आटा सप्लायर है। आईजीसी ने तुर्की से 58 लाख टन आटा निर्यात का अनुमान जताया है। यह 2022-23 में 49 लाख टन था।</span></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ उपलब्धता बढ़ने से विश्व बाजार में गेहूं के दाम में गिरावट का रुख ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[यूरोप में क्यों हो रहे किसान आंदोलन, भारत से क्या समानताएं?]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/why-are-farmers-protesting-in-europe-what-are-the-similarities-with-india.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 16 Feb 2024 12:17:28 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/why-are-farmers-protesting-in-europe-what-are-the-similarities-with-india.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>उपज की गिरती कीमत, फसलों की बढ़ती लागत, भारी-भरकम रेगुलेशन, ताकतवर रिटेलर, कर्ज का बोझ और सस्ता आयात। ये समस्याएं सिर्फ भारतीय किसानों की नहीं हैं। यूरोप के ज्यादातर देशों में कई हफ्ते से किसान प्रदर्शन कर रहे हैं। कुछ समस्याएं देश विशेष की भी हैं, लेकिन उनकी ज्यादातर समस्याएं साझा हैं। नई और प्रमुख साझा समस्या क्लाइमेट एजेंडा है, जिसमें वर्ष 2030 तक कृषि क्षेत्र में उत्सर्जन घटाने के लक्ष्य तय किए गए हैं।&nbsp;</p>
<p>पिछले कुछ दिनों में हजारों किसान ट्रैक्टर लेकर बड़े शहरों के मध्य में पहुंच गए। उन्होंने न सिर्फ ट्रैक्टर खड़े कर जाम लगा दिया, बल्कि सड़कों पर खाद उलट दी, अंडे फेंके, सुपरमार्केट में तोड़फोड़ की और पुलिस के साथ भी भिड़ गए। किसानों के तेवर देख कर यूरोपियन यूनियन के साथ-साथ कई देशों की सरकारें भी झुकी हैं। उन्होंने कई प्रावधानों पर अमल या तो टाल दिया है या उन्हें रद्द कर दिया है।</p>
<p>यहां गौर करने वाली एक और बात है कि यूरोप में किसान आंदोलन को दक्षिणपंथी पार्टियों का समर्थन मिल रहा है। यूरोपीय संसद के लिए इस साल जून में होने वाले चुनाव में दक्षिणपंथी पार्टियों का पलड़ा भारी लग रहा है। यूरोपियन यूनियन की जीडीपी में खेती का हिस्सा सिर्फ 1.4% होने के बावजूद यह राजनीतिक एजेंडा में सबसे ऊपर है। किसानों का कहना है कि ब्रसेल्स ब्यूरोक्रेसी यानी अफसरों को खेती के बारे में कुछ नहीं मालूम। इसलिए किसानों की समस्याएं वे नहीं समझ पाते।</p>
<p><strong>आंदोलन की जद में पूरा यूरोप&nbsp;</strong><br />पिछले कुछ दिनों में फ्रांस, इटली, रोमानिया, पोलैंड, ग्रीस, जर्मनी, पुर्तगाल और नीदरलैंड में किसान सड़कों पर दिखे। फ्रांस में किसानों ने सड़कें ठप करने के बाद यूक्रेन दूतावास पर मशीन से खाद की बौछार कर दी। बेल्जियम में किसानों ने यूरोप के सबसे बड़े बंदरगाहों में एक, एंटवर्प पहुंच कर कामकाज रोक दिया। जर्मनी में बर्फबारी के बीच हजारों किसानों ने पिछले महीने हैम्बर्ग, कोलोन, न्यूरेमबर्ग और म्यूनिख समेत कई शहरों में आवाजाही ठप कर दी। हर जगह किसान करीब 2000 ट्रैक्टर लेकर पहुंच गए थे। इस समय स्पेन में हजारों किसान ट्रैक्टर के साथ सड़कों पर हैं।</p>
<p>एक फरवरी को किसान यूरोपियन यूनियन के केंद्र ब्रसेल्स में पहुंच गए जहां यूक्रेन पर सम्मेलन चल रहा था। वहां किसानों ने संसद पर अंडे फेंके और एक साथ हॉर्न बजाए। फ्रांस के ल्योन और टॉलुसी शहरों में किसान सड़कों पर टेंट लगाकर बैठ गए और राजधानी पेरिस जाने का रास्ता बंद कर दिया। पिछले साल पूर्वी यूरोप के पोलैंड, रोमानिया और बुल्गारिया में किसानों ने यूक्रेन से सस्ते अनाज आयात के विरोध में प्रदर्शन किया था। यूरोप के किसान यूक्रेन से अनाज, चीनी और मीट के सस्ते आयात का विरोध कर रहे हैं।&nbsp;</p>
<p>अब यह आंदोलन इंग्लैंड भी पहुंच गया है। पिछले सप्ताह वहां कई जगहों पर किसानों ने ट्रैक्टर लेकर प्रदर्शन किया। उनका कहना है कि सस्ते आयात के कारण सुपरमार्केट उन्हें लागत से कम दाम दे रहे हैं। ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, फिनलैंड और स्वीडन ही अभी तक किसान आंदोलन से अछूते हैं।</p>
<p><strong>यूरोपियन ग्रीन डील बना सबसे बड़ा कारण</strong><br />इंग्लैंड की लैंकेस्टर यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रेनॉड फोकार्ट के अनुसार, यूरोपियन यूनियन में किसानों के प्रदर्शन के दो प्रमुख कारण हैं- जलवायु और यूक्रेन। यूनियन की नई जलवायु नीति, &lsquo;यूरोपियन ग्रीन डील&rsquo; नाम दिया गया है, में कृषि क्षेत्र के लिए कई प्रावधान हैं। इसमें खेती में रासायनिक इनपुट का इस्तेमाल कम करना और जैव-विविधता की सुरक्षा शामिल हैं। किसानों की शिकायत है कि इससे उनकी लागत और प्रशासनिक जटिलता बढ़ेगी।&nbsp;</p>
<p>यूरोपियन यूनियन के ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में 11% हिस्सा खेती का है। उत्सर्जन कम करने के लिए यूनियन ने &lsquo;फार्म टू फॉर्क&rsquo; नाम से नई नीति बनाई है, ताकि वर्ष 2050 तक पूरे ब्लॉक को कार्बन-न्यूट्रल किया जा सके। उत्सर्जन कम करने के लिए जो लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं, उनमें 2030 तक कीटनाशकों का इस्तेमाल आधा करना, उर्वरकों का इस्तेमाल 20% कम करना, खेती की कुछ जमीन परती छोड़ना या उस पर वनरोपण करना, 25% जमीन पर ऑर्गेनिक खेती करना शामिल हैं।&nbsp;</p>
<p>यूरोपीय किसान इन नीतियों को अनुचित और आर्थिक रूप से नुकसान वाला बता रहे हैं। उनका कहना है कि हमारे ऊपर जो &lsquo;क्लाइमेट एजेंडा 2030&rsquo; थोपा जा रहा है, उसके लिए न तो हमसे सहमति ली गई न हमने उसके लिए उन्हें वोट दिया। हम उनके झूठे वादों से थक गए हैं। किसानों ने इसे क्लाइमेट कम्युनिज्म नाम दिया है। उनका कहना है कि धरती को बचाने के नाम पर उन्हें दिवालिया किया जा रहा है। उनकी मांग पर्यावरण संबंधी नियमों को खत्म करने के साथ अफसरशाही कम करने की है। उनकी शिकायत है कि खेती उनके लिए अब फायदे का पेशा नहीं रह गई है।</p>
<p><strong>सरकार के फैसलों और जमीनी हकीकत में अंतर</strong><br />फरवरी 2022 में यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद यूरोपियन यूनियन के अनेक देशों में किसानों के लिए ऊर्जा, उर्वरक और ट्रांसपोर्ट का खर्च बढ़ा है। दूसरी तरफ उपभोक्ताओं के लिए महंगाई को नियंत्रित रखने के मकसद से सरकारों ने खाद्य पदार्थों के दाम घटाने के कदम उठाए हैं। यूरोस्टैट डेटा के अनुसार किसानों से खरीदी जाने वाली उपज की औसत कीमत पिछले साल नौ प्रतिशत कम हुई है।&nbsp;</p>
<p>लैंकेस्टर यूनिवर्सिटी के प्रो. फोकार्ट के अनुसार, यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद से ईयू ने यूक्रेन की अर्थव्यवस्था को मदद करने की नीति अपना रखी है। इस नीति के तहत ईयू के कृषि बाजार यूक्रेन के अनाज के लिए खुले हैं। पूर्वी यूरोप के अनेक किसानों इससे मिलने वाली प्रतिस्पर्धा की शिकायत की है।</p>
<p>दरअसल, यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद यूरोपियन यूनियन ने यूक्रेन को कोटा और आयात शुल्क से राहत दे दी। उसके बाद यूरोपीय देशों में यूक्रेन से कृषि उपज का आयात काफी बढ़ गया। इसका असर यह हुआ कि स्थानीय बाजारों में दाम गिर गए। पोलैंड के किसानों ने पिछले साल ही यूक्रेन को जोड़ने वाली सड़क पर यूक्रेन से आने वाले ट्रकों को रोकने के लिए अवरोध खड़े कर दिए। उसके बाद ब्रसेल्स ने पड़ोसी देशों को यूक्रेन के निर्यात पर कुछ दिनों के लिए अंकुश लगाने की घोषणा की। इसकी समय सीमा खत्म होने के बाद हंगरी, पोलैंड और स्लोवाकिया ने अपनी तरफ से बंदिशें लगा दीं। किसानों का कहना है कि यूक्रेन का अनाज एशियाई या अफ्रीकी देशों को जाना चाहिए, यूरोप को नहीं।&nbsp;</p>
<p>फ्रांस में भी सस्ता आयात किसानों की नाराजगी की वजह बना हुआ है। वहां न्यूजीलैंड और चिली से सस्ता आयात हो रहा है। यही नहीं, इन देशों के आयात को यूरोपीय किसानों की तरह सख्त नियमों का भी सामना नहीं करना पड़ता। सिंचाई तथा अन्य नियम यूरोपियन यूनियन में ज्यादा सख्ती से लागू किए जाते हैं।<br />यूरोपियन यूनियन और दक्षिण अमेरिका के मर्कोसुर ट्रेडिंग ब्लॉक (अर्जेंटीना, ब्राजील, पराग्वे, युरुग्वे और बोलिविया) के बीच मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) की बात चल रही है। आरोप है कि ये देश ईयू में प्रतिबंधित हॉर्मोन, एंटीबायोटिक्स और कीटनाशकों का प्रयोग करते हैं। इसने भी किसानों की नाराजगी बढ़ाई है। उनका कहना है कि हमें तो कड़े नियमों का पालन करना पड़ता है, लेकिन हमें जिनके साथ प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है उनके लिए परिस्थितियां आसान होती हैं।</p>
<p>फ्रांस की सबसे बड़ी किसान यूनियन एफएनएसईए के प्रेसिडेंट अर्नॉड रोस्यो के अनुसार, मुद्दे अनेक हैं लेकिन इन सबका मूल एक है- सरकार के फैसलों और जमीनी हकीकत में बहुत अंतर है। इंग्लैंड में &lsquo;सेव ब्रिटिश फार्मिंग&rsquo; अभियान चलाने वाली किसान लिज वेबस्टर के अनुसार वर्ष 2022 में खाद्य पदार्थों के मामले में इंग्लैंड की आत्मनिर्भरता 61% थी, अब यह उससे भी कम हो गई है। ब्रसेल्स स्थित किसान संगठन कोपा-कोजेका (Copa-Cogeca) ने कहा कि फार्म टू फॉर्क स्ट्रैटजी बहुत खराब तरीके से बनाई गई है, इसमें किसानों के लिए विकल्प बहुत सीमित हैं।</p>
<p><strong>कुछ कारण देश विशेष के भी</strong><br />किसानों की कुछ मांगें देश विशेष भी हैं। जैसे, नीदरलैंड्स में नाइट्रोजन उत्सर्जन और एनिमल फार्मिंग का मुद्दा है। जर्मनी में खेती के लिए डीजल पर टैक्स खत्म करना मुद्दा है। फ्रांस में किसानों को लगता है कि वहां ईयू के नियम अधिक सख्ती से लागू किए जाते हैं। इटली में किसान इनकम टैक्स में छूट दोबारा बहाल करने की मांग कर रहे हैं। वर्ष 2017 में शुरू की गई इस छूट की अवधि 2024 में खत्म होनी है।&nbsp;</p>
<p>इंग्लैंड में वर्ष 2021 से &lsquo;सस्टेनेबल फार्मिंग इन्सेंटिव&rsquo; नाम से स्कीम चलाई जा रही है। लेकिन किसानों का कहना है कि इसका मकसद खेती को सस्टेनेबल बनाना नहीं, बल्कि पर्यावरण के लक्ष्य हासिल करने के लिए खेती वाली जमीन कम करना है। गेहूं की खेती करने वाले किसानों को प्रति हेक्टेयर 450 पौंड का नुकसान हो रहा है, दूसरी ओर इन्सेंटिव के तहत जंगली फूल लगाने पर उन्हें प्रति हेक्टेयर 453 पौंड मिलने की गारंटी दी जा रही है।</p>
<p><strong>किसान प्रदर्शन की शुरुआत</strong><br />किसान आंदोलन की शुरुआत यूरोप में बड़ी खेती वाले देश नीदरलैंड्स से हुई। इस छोटे से देश में 11 करोड़ से ज्यादा मवेशी हैं। इसलिए वहां नाइट्रोजन उत्सर्जन भी ईयू के औसत का चार गुना है। पांच साल पहले सरकारी अधिकारियों ने इसे कम करने के लिए बड़े कदम उठाने की जरूरत बताई थी। कुछ मवेशी फार्म बंद करने का भी सुझाव दिया गया। सरकार ने मवेशियों की संख्या एक-तिहाई घटाकर 2030 तक नाइट्रोजन उत्सर्जन कम करने की योजना बनाई। उसके तत्काल बाद, अक्टूबर 2019 में देश के विभिन्न हिस्से से 2000 से ज्यादा ट्रैक्टर में भरकर किसान देश के प्रशासनिक केंद्र हेग पहुंच गए। इससे गाड़ियों की सैकड़ों किलोमीटर लंबी कतार लग गई। किसानों का नारा था &lsquo;किसान नहीं तो खाना नहीं&rsquo;।&nbsp;</p>
<p><strong>आंदोलन के बाद किसानों के पक्ष में फैसला</strong><br />फोकार्ट के अनुसार, ईयू के स्तर पर देखें तो यूरोपियन कमीशन ने अपने कई टार्गेट और कई नीतियां फिलहाल रद्द कर दी हैं। इनमें वर्ष 2040 तक कृषि से होने वाले उत्सर्जन में 2015 की तुलना में 30% कटौती करना भी शामिल है, जिसे काफी अहम माना जा रहा है। विभिन्न देशों की सरकारों ने भी ईयू के लक्ष्य के हिसाब से अपनी प्रतिबद्धताओं को स्थगित किया है या उसमें कटौती की है।<br />यूरोपियन यूनियन के स्तर पर किसानों को पहली जीत &nbsp;31 जनवरी को मिली जब ब्रसेल्स में मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने और जैव विविधता के लिए जमीन छोड़ने का नियम फिलहाल लागू नहीं करने का निर्णय लिया गया। यूरोपियन कमीशन ने नया प्रस्ताव रखा है जिसमें कहा गया कि यूक्रेन से कृषि आयात सीमित किया जाएगा और वर्ष 2024 में किसानों को सब्सिडी के लिए अपनी 4% जमीन परती रखने की अनिवार्यता से छूट मिलेगी। कमीशन ने कीटनाशक इस्तेमाल में कटौती की योजना भी पिछले हफ्ते टाल दी। ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन के प्रस्ताव में भी बदलाव किया गया है।&nbsp;</p>
<p>जर्मनी ने पिछले महीने डीजल पर सब्सिडी कटौती के फैसले पर अमल तो फ्रांस ने डीजल पर टैक्स बढ़ाने का प्रस्ताव टाल दिया है। फ्रांस ने किसानों को 15 करोड़ यूरो की मदद की भी घोषणा की है। इसके बाद फ्रांस में कुछ जगहों पर किसानों ने आंदोलन फिलहाल रोक दिया है। फ्रांस के प्रधानमंत्री ने कहा कि मर्कोसुर देशों के किसानों पर भी सख्त नियम लागू होंगे। ग्रीस ने खेती में इस्तेमाल होने वाले डीजल पर टैक्स छूट एक साल के लिए बढ़ाने का फैसला किया है। इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी पिछले हफ्ते टैक्स छूट दोबारा लागू करने पर राजी हुई हैं। हालांकि यह सिर्फ छोटे किसानों के लिए होगा।&nbsp;</p>
<p><strong>किसानों की नाराजगी देख नेताओं का बदला रुख</strong><br />किसानों के बढ़ते रोष से यूरोप के नेताओं का रुख बदला है। यूरोपियन कमीशन की प्रेसिडेंट उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने कहा, &ldquo;खेती को ज्यादा सस्टेनेबल बनाने की जरूरत है। इसमें दो राय नहीं कि किसान अनेक समस्याओं से जूझ रहे हैं। हमें उन पर अधिक भरोसा करना चाहिए।&rdquo; फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और आयरलैंड के प्रधानमंत्री लियो वरेडकर ने कहा है कि मौजूदा स्वरूप में ईयू-मर्कोसुर व्यापार समझौता नहीं होना चाहिए। फ्रांस के प्रधानमंत्री गैब्रियल अट्टल ने कहा, "ये सवाल पूरे यूरोप के लिए हैंः कैसे हम ज्यादा फसल उपजाएं, लेकिन बेहतर तरीके से? हम जलवायु परिवर्तन का सामना कैसे करें? दूसरे देशों की अनुचित प्रतिस्पर्धा से कैसे निपटें?" स्पेन के कृषि मंत्री लुइस प्लानास ने कहा, &ldquo;किसान चाहते हैं कि उन्हें सुना जाए, उनका सम्मान किया जाए। उन्हें लगता है कि खास तौर से ब्रसेल्स में और शहरी राजनीतिक हलके में उनका सम्मान नहीं होता।&rdquo;</p>
<p><strong>आगे क्या है संभावना</strong><br />फोकार्ट के अनुसार, &ldquo;मुझे लगता है कि यह आंदोलन जल्दी शांत हो जाएगा। यूरोपियन यूनियन के चुनाव होने वाले हैं और किसान जानते हैं कि उन्होंने बहुत कुछ हासिल कर लिया है। लेकिन मध्यम अवधि में देखें तो पूरे यूरोपियन यूनियन को जलवायु परिवर्तन में कृषि के योगदान पर विचार करना ही पड़ेगा क्योंकि यह प्रदूषण का एक बड़ा स्रोत है। पर्यावरण संबंधी प्रावधानों को टालने का मतलब है समस्या को टालना, यह समाधान नहीं।&rdquo;<br />साझा कृषि नीति (कॉमन एग्रीकल्चरल पॉलिसी- सीएपी) के तहत यूरोपियन यूनियन में हर साल करीब 55 अरब यूरो (लगभग 5 लाख करोड़ रुपये) की सब्सिडी दी जाती है। यह छह दशक से भी अधिक समय से जारी है। इस नीति में बड़े खेत और साझा स्टैंडर्ड पर जोर दिया गया है। इससे छोटे खेतों को मिलाकर बड़े खेत बनाने का चलन बढ़ा। इसका अंदाजा इस बात से लगता है कि वर्ष 2005 के बाद खेतों की संख्या करीब एक-तिहाई कम हो गई। लेकिन इसका एक नेगेटिव असर यह भी हुआ कि बड़े किसानों पर कर्ज भी बड़ा हो गया। दूसरी तरफ छोटे किसानों के लिए प्रतिस्पर्धा मुश्किल हो गई।</p>
<p>इसका जिक्र करते हुए फोकार्ट कहते हैं, आने वाले वर्षों में अगर यूक्रेन यूरोपियन यूनियन में शामिल होता है, तो सब्सिडी की इस राशि का इस्तेमाल डी-कपलिंग में करना पड़ेगा। डी-कपलिंग में किसानों की आर्थिक मदद भी शामिल है ताकि वे अपनी जमीन की रक्षा कर सकें और खेती छोड़ दूसरा पेशा अपना सकें। यह प्रक्रिया कुछ जगहों पर शुरू भी हो गई है। इसके साथ दूसरे सेक्टर की तरह कृषि से होने वाले प्रदूषण पर भी टैक्स लगाना पड़ेगा। यूरोपियन यूनियन से अलग होने के बाद इंग्लैंड ने यह प्रक्रिया शुरू कर दी है। हालांकि ईयू में ऐसा करना राजनीतिक रूप से ज्यादा मुश्किल है। यूनियन का विस्तार करने पर तो यह लगभग असंभव हो जाएगा। जलवायु परिवर्तन से किसान भी प्रभावित होते हैं और खेती का बेहतर तरीका ही इसका समाधान है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ यूरोप में क्यों हो रहे किसान आंदोलन, भारत से क्या समानताएं? ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[मौजूदा खाद्य प्रणाली से हर साल 15 लाख करोड़ डॉलर के बराबर नुकसान, इसमें बदलाव जरूरीः रिपोर्ट]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/our-food-system-causes-annual-loss-of-15-trillion-dollars-as-its-transformation-is-a-must-says-report.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 04 Feb 2024 20:58:07 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
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        <description><![CDATA[ <p>हमारी खाद्य प्रणाली, यानी जिस तरह से हम खाद्य पदार्थ उपजाते हैं, उनकी मार्केटिंग करते हैं तथा उन्हें खाते हैं, ने एक तरफ हमारी खाद्य ज़रूरतें पूरी की हैं तो दूसरी तरफ निरंतर अल्प पोषण, मोटापा, जैव विविधता और पर्यावरण को नुकसान तथा जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याएं भी पैदा की हैं। इन समस्याओं को अगर मूल्य में देखा जाए तो यह लगभग 15 लाख करोड़ डॉलर सालाना के आसपास होता है। हमारी खाद्य प्रणाली वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में जो योगदान करती है, यह उससे कहीं अधिक है। दूसरे शब्दों में कहें तो हमारी खाद्य प्रणाली जितना वैल्यू क्रिएट करती है, उससे कहीं अधिक का नुकसान करती है। फूड सिस्टम इकोनॉमिक्स डॉट ओआरजी (foodsystemeconomics.org) ने &lsquo;द इकोनॉमिक्स ऑफ द फूड सिस्टम ट्रांसफॉर्मेशन&rsquo; नाम से जारी रिपोर्ट में यह बात कही है।<br />इसमें कहा गया है कि अगर इस समस्या की अनदेखी की गई तो इसके नकारात्मक प्रभाव अत्यंत भीषण होंगे। इसके बावजूद जलवायु परिवर्तन जैसी नीतिगत चर्चाओं में खाद्य प्रणाली की लंबे समय से अनदेखी की जाती रही है। इसमें बदलाव से पूरी दुनिया को फायदा होगा। अगर हम अपनी खाद्य प्रणाली में बदलाव करते हैं तो इससे होने वाला लाभ प्रतिवर्ष 5 से 10 लाख करोड़ डॉलर का होगा। यह हमारी वैश्विक जीडीपी के चार से आठ प्रतिशत के बराबर होगा। खाद्य प्रणाली में बदलाव से यह भी सुनिश्चित हो सकेगा कि इस सदी के अंत तक ग्लोबल वार्मिंग 1.5 डिग्री से नीचे रहे।<br />रिपोर्ट के अनुसार 1970 के दशक से अब तक विश्व की आबादी दोगुनी हो चुकी है और हमारी खाद्य प्रणाली इनकी खाद्य जरूरतें पूरी कर रही है। लेकिन लोगों को तथा धरती को इस खाद्य प्रणाली का जो नुकसान है, वह सालाना 15 लाख करोड़ डॉलर के आसपास है। यह वर्ष 2020 में दुनिया की जीडीपी के 12% के बराबर है।<br />फूड सिस्टम इकोनॉमिक्स कमीशन के अनुसार सबसे अधिक 11 लाख करोड़ डॉलर का नुकसान स्वास्थ्य पर होता है। खाद्य प्रणाली के सेहत पर प्रभाव का आकलन श्रम उत्पादकता में कमी से किया गया है। यह कमी डायबिटीज, हाइपरटेंशन और कैंसर जैसे गैर संक्रामक रोगों के कारण हो रही है जिसके लिए हमारी खाद्य प्रणाली जिम्मेदार है। इसके अलावा दुनिया में करीब 77 करोड़ लोग मोटापे की बीमारी से ग्रस्त हैं।<br />पर्यावरण को होने वाला नुकसान तीन लाख करोड़ डॉलर सालाना के आसपास है। हमारी खाद्य प्रणाली वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में एक तिहाई के लिए जिम्मेदार है। इसमें जंगलों की कटाई से होने वाला उत्सर्जन भी शामिल है। प्रतिवर्ष 60 लाख हेक्टेयर प्राकृतिक जंगल खत्म हो रहे हैं। पर्यावरण को नुकसान में जैव विविधता को नुकसान तथा सरप्लस नाइट्रोजन से होने वाला नुकसान भी शामिल है, जो पानी में पहुंचता है और हवा को प्रदूषित करता है।<br />रिपोर्ट के अनुसार अगर सभी देश पर्यावरण उत्सर्जन घटाने के राष्ट्रीय लक्ष्यों (एनडीसी) का पालन करें तब भी हमारी खाद्य प्रणाली से होने वाला नुकसान पूरी तरह बंद नहीं होगा। अगर मौजूदा ट्रेंड जारी रहा तो वर्ष 2050 तक वैश्विक उत्सर्जन में खाद्य प्रणाली का एक तिहाई योगदान बना रहेगा। ऐसा होने पर औद्योगिक युग की शुरुआत से पहले की तुलना में इस सदी के अंत तक वातावरण का तापमान 2.7 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ मौजूदा खाद्य प्रणाली से हर साल 15 लाख करोड़ डॉलर के बराबर नुकसान, इसमें बदलाव जरूरीः रिपोर्ट ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[एफएओ ने विश्व अनाज उत्पादन का अनुमान बढ़ाया, 2023 में रिकॉर्ड 238 करोड़ टन उत्पादन]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/fao-increases-world-cereal-production-estimates-as-record-production-of-238-crore-ton-expected-in-2023.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 03 Feb 2024 14:11:36 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/fao-increases-world-cereal-production-estimates-as-record-production-of-238-crore-ton-expected-in-2023.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने वर्ष 2023 के लिए विश्व अनाज उत्पादन के अपने अनुमान में बढ़ोतरी की है। इसके मुताबिक कुल अनाज उत्पादन 132 लाख टन अधिक रहने का अनुमान है। एफएओ के अनुसार 2023 के सीजन में रिकॉर्ड 238.6 करोड़ टन अनाज का उत्पादन होगा। यह 2022 की तुलना में 1.2% यानी 333 लाख टन अधिक है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">उत्पादन में यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से मक्का के कारण है। दुनिया के कई प्रमुख मक्का उत्पादक देशों में इस वर्ष उत्पादन अधिक रहने का अनुमान है। इसके अलावा गेहूं और जौ के वैश्विक उत्पादन अनुमानों में भी बढ़ोतरी की गई है। मोटे अनाज का उत्पादन भी अब तक का रिकॉर्ड, 152.3 करोड़ टन होने का अनुमान है। कनाडा, चीन, तुर्की और अमेरिका में संशोधित अनुमानों में बढ़ोतरी के बाद एफएओ ने अपने अनुमानों में बढ़ोतरी की है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कनाडा और रूस में बेहतर फसल के चलते जौ का उत्पादन बढ़ने का अनुमान जताया गया है। 2023 के सीजन में गेहूं उत्पादन 78.5 करोड़ टन रहने का अनुमान है। यह पिछले अनुमान से 14 लाख टन अधिक है, लेकिन बीते वर्ष की तुलना में 2.2 प्रतिशत कम है। हीट वेव और अधिक बारिश के चलते ब्राजील में गेहूं का उत्पादन कम रह सकता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">जहां तक चावल की बात है तो चीन में पिछले अनुमान की तुलना में उत्पादन में कमी के आसार जताए गए हैं, लेकिन नेपाल में रिकॉर्ड उत्पादन होने की संभावना है। माले और गिनी में भी रकबा बढ़ने से चावल का अधिक उत्पादन होने का अनुमान है। एफएओ ने 2023-24 के सीजन में 52.56 करोड़ टन चावल उत्पादन का अनुमान जताया है। यह 2022-23 की तुलना में 0.6 प्रतिशत अधिक है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">वर्ष 2024 के बारे में एफएओ का अनुमान है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में दम कम होने के चलते सर्दियों में गेहूं की बुवाई का रकबा पिछले साल की तुलना में कुछ कम रह सकता है। अमेरिका में इसके रकबे में 6 प्रतिशत की कमी हुई है। यूरोपियन यूनियन में भारी बारिश के चलते देर से बुवाई हुई और रकबा भी कम है। यूक्रेन में युद्ध के चलते इनपुट लागत तो बढ़ी है लेकिन फसल के दाम पूरे नहीं मिल रहे हैं। इससे किसानों का मुनाफा कम हुआ है। इससे इस वर्ष गेहूं की बुवाई पिछले साल से भी कम रहने के आसार हैं। रूस में गेहूं की सर्दियों की फसल अभी तक अच्छी बताई जा रही है। हालांकि कुछ गेहूं उत्पादक इलाकों में तापमान बढ़ने से फसल को नुकसान भी हुआ है। भारत में मौसम अनुकूल रहने और दाम भी बेहतर मिलने के कारण गेहूं का रकबा बढ़ा है। यही स्थिति पाकिस्तान की है। चीन में गेहूं का रकबा पिछले 5 साल के औसत से अधिक बताया गया है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">एफएओ का अनुमान है कि 2024 के सीजन के अंत में विश्व अनाज स्टॉक 89.5 करोड़ टन का रहेगा। यह दिसंबर 2023 की तुलना में 89 लाख टन अधिक होगा। स्टॉक के अनुमान में बढ़ोतरी मुख्य रूप से मोटे अनाजों के कारण की गई है। इनका 37.7 करोड़ टन का स्टॉक रहने का अनुमान है। एफएओ ने गेहूं का 32 करोड़ टन का स्टॉक रहने का अनुमान जताया है।</span></p>
<p><br /><br /><br /></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ एफएओ ने विश्व अनाज उत्पादन का अनुमान बढ़ाया, 2023 में रिकॉर्ड 238 करोड़ टन उत्पादन ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[जनवरी में ग्लोबल मार्केट में गेहूं के दाम कम हुए लेकिन चावल के बढ़े, चीनी भी हुई महंगी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/fao-food-price-index-down-again-in-january-led-by-lower-wheat-and-maize-prices.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 03 Feb 2024 10:39:51 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
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        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">विश्व खाद्य कमोडिटी के बेंचमार्क इंडेक्स में जनवरी में फिर गिरावट आई है। हालांकि यह गिरावट बहुत कम है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार अनाज और मीट की कीमतों में गिरावट के चलते ऐसा हुआ, हालांकि चीनी के दाम बढ़े हैं। एफएओ खाद्य कमोडिटी की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में हर महीने उतार-चढ़ाव पर नजर रखता है। जनवरी में इसका फूड प्राइस इंडेक्स 118 अंक पड़ रहा। यह दिसंबर 2023 की तुलना में एक प्रतिशत कम है। लेकिन जनवरी 2023 से तुलना करें तो यह इसमें 10.4% की गिरावट आई है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">दिसंबर के मुकाबले अनाज की कीमतों का इंडेक्स 2.2% नीचे आया है। निर्यातकों में प्रतिस्पर्धा और दक्षिणी गोलार्ध के देश में नई फसल आने से गेहूं के दाम कम हुए हैं। मक्का की कीमतों में ज्यादा गिरावट आई है। अर्जेंटीना में इसकी फसल अच्छी है और अमेरिका में भी सप्लाई में वृद्धि हुई है। गेहूं के विपरीत चावल के दाम जनवरी में 1.2% बढ़ गए। पाकिस्तान और थाईलैंड के इंडिका क्वालिटी चावल की मांग बढ़ी है। साथ ही इंडोनेशिया ने अतिरिक्त खरीद की है। जनवरी में चीनी का प्राइस इंडेक्स 0.8% अधिक रहा। ब्राजील में औसत से कम बारिश के चलते अप्रैल में आने वाली गन्ने की फसल को लेकर चिंता है। थाईलैंड और भारत में भी हालात प्रतिकूल हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">एफएओ के वनस्पति तेलों का प्राइस इंडेक्स दिसंबर के मुकाबले 0.1% बढ़ा लेकिन एक साल पहले से तुलना करें तो यह अभी 12.8 प्रतिशत नीचे है। पाम और सनफ्लावर बीज के तेलों की कीमतों में बहुत ही मामूली वृद्धि हुई है, जबकि सोया और रेपसीड के तेल के दाम कम हुए हैं। मलेशिया में उत्पादन कुछ कम रहने और मौसम प्रतिकूल होने के चलते पाम के दाम बढ़े हैं। दक्षिण अमेरिका में सप्लाई बढ़ने और यूरोप में पर्याप्त उपलब्धता के चलते सोया और रेपसीड ऑयल की कीमतें कम हुई हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">डेरी प्राइस इंडेक्स जनवरी के बराबर ही है लेकिन एक साल पहले की तुलना में 17.8 प्रतिशत नीचे है। मीट के दामों में लगातार सातवें महीने गिरावट आई है। दिसंबर की तुलना में इसकी कीमत 1.4% कम हुई है।</span></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/02/image_750x500_65bdca8de135f.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ जनवरी में ग्लोबल मार्केट में गेहूं के दाम कम हुए लेकिन चावल के बढ़े, चीनी भी हुई महंगी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[मक्के के एथेनॉल से एविएशन फ्यूल बनाना हितकारी नहीं, इससे और अधिक कार्बन उत्सर्जन होगा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/producing-aviation-fuel-from-corn-ethanol-to-cause-more-carbon-emission.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 27 Jan 2024 12:26:43 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/producing-aviation-fuel-from-corn-ethanol-to-cause-more-carbon-emission.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">अमेरिका की एविएशन इंडस्ट्री ने वर्ष 2050 तक सस्टेनेबल एवियशन फ्यूल के जरिए नेट जीरो कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है। इस लक्ष्य की मुख्य बात यह है कि इसके लिए मक्का अथवा वनस्पति तेल के इथेनॉल से तैयार ईंधन का प्रयोग किया जाएगा। लेकिन हाल के अध्ययन बताते हैं कि फसल आधारित बायोफ्यूल वास्तव में कार्बन उत्सर्जन बढ़ाते हैं। यही नहीं, इनकी वजह से खाद्य पदार्थों के उत्पादन वाली जमीन का डायवर्जन एथेनॉल उत्पादन के लिए किया जाता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट (WRI) की एक रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी एविएशन इंडस्ट्री का यह कदम गलत दिशा में होगा। वर्ष 2019 में अमेरिका की घरेलू उड़ानों से 15 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन हुआ था। यह देश के कुल कार्बन उत्सर्जन का लगभग तीन प्रतिशत था। विमान से यात्रा जिस तेजी से बढ़ रही है, उसे देखते हुए अमेरिका और पूरे विश्व में एविएशन से उत्सर्जन 2050 तक दोगुना हो जाने की उम्मीद है।</span></p>
<p><strong>फसलों से एविएशन फ्यूल बढ़ाएगा उत्सर्जन</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अनेक वैज्ञानिकों और अंतरराष्ट्रीय रेगुलेटरी बॉडी ने रिसर्च के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला है कि एवियशन फ्यूल के लिए फसल उपजाना वास्तव में उत्सर्जन को कम नहीं करता है। इनका कहना है कि इन फसलों के उत्पादन के लिए जंगलों की कटाई करनी पड़ेगी और चरागाह वाली भूमि का भी खेती में इस्तेमाल करना पड़ेगा। जंगल अथवा चरागाह की भूमि को फसलों की पैदावार के लिए इस्तेमाल करने पर उनमें स्टोर किया हुआ कार्बन रिलीज होता है। भविष्य में उसे मिट्टी में कार्बन संग्रह भी बहुत कम होता है। इस तरह यह कदम आने वाले समय में खाद्य सुरक्षा और दुनिया भर में जंगलों को बुरी तरह प्रभावित करेगा।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अध्ययन के अनुसार फसलों से विमान का ईंधन तैयार करना आर्थिक रूप से भी व्यवहार्य नहीं लगता है। उदाहरण के लिए एक गैलन सस्टेनेबल एवियशन फ्यूल तैयार करने के लिए 1.7 गैलन मक्के का एथेनॉल चाहिए। अगर अमेरिका को लक्ष्य के मुताबिक 35 अरब गैलन सस्टेनेबल एवियशन फ्यूल चाहिए। इसे तैयार करने जितना मक्का चाहिए, उसके लिए अभी की तुलना में 20% (मक्के का रकबा) से भी ज्यादा इलाके में मक्के की खेती करनी पड़ेगी।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">रिपोर्ट के अनुसार एथेनॉल उत्पादन में पशु चारा जैसे कुछ अन्य प्रोडक्ट भी निकालते हैं। अगर इस तथ्य को शामिल करें तब भी बायोफ्यूल उत्पादन के लिए जितने मक्के की जरूरत पड़ेगी, उससे आखिरकार खाद्य पदार्थों के दाम बढ़ेंगे और भूख की समस्या भी बढ़ेगी।</span></p>
<p><strong>सोया तेल का विकल्प भी व्यवहार्य नहीं</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">सोया तेल से सस्टेनेबल एवियशन फ्यूल बनाने का प्रभाव मक्के से भी अधिक होगा, क्योंकि ऊर्जा उत्पादन के लिहाज से देखा जाए तो सोया मक्के की तुलना में काम प्रभावी होता है। इस समय जो वनस्पति तेल का नया उत्पादन होता है वह खासतौर से ऑयल पाम तथा सोयाबीन की खेती के रकबे में विस्तार से हो रहा है। लेकिन इनकी वजह से जंगलों की कटाई भी हो रही है। इस लिहाज से देखें तो वर्ष 2050 तक दुनिया में एवियशन फ्यूल की एक चौथाई जरूरत अगर वनस्पति तेलों से पूरी करनी है तो उसके लिए उनका उत्पादन दोगुना करना पड़ेगा।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अध्ययन में एक और महत्वपूर्ण बात बताई गई है। वह हवा से कार्बन निकालने की टेक्नोलॉजी के बारे में है। इसके मुताबिक 35 अरब गैलन पेट्रोलियम जेट फ्यूल से जितना उत्सर्जन होगा, उसे निकालने के लिए अपेक्षाकृत कम जमीन की जरूरत पड़ेगी। उदाहरण के लिए 35 अरब गैलन पेट्रोलियम जेट फ्यूल से हर साल 43.4 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होगा। अगर सौर ऊर्जा आधारित डायरेक्ट एयर कैप्चर (DAC) टेक्नोलॉजी का प्रयोग किया जाए, तो इसके लिए 37 लाख एकड़ जमीन की जरूरत पड़ेगी। इस तरह देखें तो एथेनॉल के लिए मक्के की खेती 30 गुना अधिक जमीन में करनी पड़ेगी।</span></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ मक्के के एथेनॉल से एविएशन फ्यूल बनाना हितकारी नहीं, इससे और अधिक कार्बन उत्सर्जन होगा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[ग्लोबल मार्केट में चावल के दामों में तेजी, दूसरे देशों के निर्यातक उठा रहे फायदा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/international-rice-prices-on-the-rise-even-as-exporters-of-other-countries-getting-benefit-of-it.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 21 Jan 2024 00:41:03 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/international-rice-prices-on-the-rise-even-as-exporters-of-other-countries-getting-benefit-of-it.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">ऐसे समय जब भारत ने चावल निर्यात पर रोक लगा रखी है, अमेरिका, वियतनाम, थाईलैंड और पाकिस्तान जैसे देशों के निर्यातक अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ी हुई कीमतों का फायदा उठा रहे हैं। वर्ल्ड ग्रेन पत्रिका की नई रिपोर्ट के मुताबिक इन देशों से चावल निर्यात की कीमत अक्टूबर 2023 की तुलना में नवंबर 2023 में 5 डॉलर से 50 डॉलर प्रति टन तक बढ़ गई है। भारत पारंपरिक रूप से चावल का बड़ा निर्यातक रहा है। एक समय विश्व चावल व्यापार में भारत की 40% हिस्सेदारी हुआ करती थी। लेकिन घरेलू बाजार में दाम बढ़ने के बाद सरकार ने चावल की ज्यादातर किस्मों के निर्यात पर अंकुश लगा दिया है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">वर्ल्ड ग्रेन के अनुसार, दुनिया के कई बाजारों में चावल की कीमतों में तेजी का रुख है। पूर्वी एशिया में देखें तो वियतनाम में तथा अमेरिकी महादेश के विभिन्न देशों में यह स्थिति बनी हुई है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन ने 8 दिसंबर को जारी राइस प्राइस इंडेक्स रिपोर्ट में बताया कि नवंबर 2023 में दुनिया भर में चावल की कीमतें अक्टूबर की तुलना में स्थिर थीं, लेकिन नवंबर 2022 से तुलना करें तो दाम 21% ऊपर थे। हालांकि भारत में चावल के बाजार का आउटलुक मंदी का है, यानी यहां दाम घटने का अनुमान है क्योंकि सरकार खाद्य महंगाई काम करने के उपाय कर रही है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">एफएओ का कहना है कि अमेरिका की कुछ किस्मों के दामों में बढ़ोतरी हुई। दक्षिण अमेरिकी देशों में भी कीमतों में तेजी का रुख है। दक्षिण अमेरिका में सप्लाई की दिक्कत चल रही है और 2024-25 में फसलों पर मौसम के प्रभाव को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। इन सब कारकों ने कीमतों को बढ़ाने का काम किया है।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अमेरिकी कृषि विभाग (यूएसडीए) ने 8 दिसंबर को ग्रेनः वर्ल्ड मार्केट्स एंड ट्रेड रिपोर्ट में कहा है कि एक महीना पहले की तुलना में अमेरिका के निर्यात की कीमत 5 डॉलर बढ़कर 765 डॉलर प्रतिटन हो गई, जबकि उरुग्वे का रेट 30 डॉलर बढ़कर 790 डॉलर प्रति टन हो गया। मजबूत डिमांड और सप्लाई की दिक्कतों की वजह से यह तेजी देखने को मिली। यूएसडीए का कहना है कि 2019 के बाद पहली बार उरुग्वे के दाम अमेरिका से भी अधिक हुए हैं।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">वियतनाम के चावल की कीमतों में 11 डॉलर की वृद्धि हुई और यह 687 डॉलर प्रति टन पहुंच गया। यहां फिलिपींस और इंडोनेशिया से डिमांड आ रही है। थाईलैंड के चावल की कीमत डॉलर 51 बढ़कर 619 डॉलर प्रति टन हो गई। यहां उन देशों से मांग अधिक आ रही है जहां पहले भारत से सप्लाई होती थी। इसके अलावा मजबूत करेंसी का भी असर देखने को मिला है। निर्यात बाजार में पाकिस्तानी चावल की कीमत 39 डॉलर बढ़कर 589 डॉलर प्रतिटन हो गई। यूएसडीए के अनुसार यहां नई फसल आने के बावजूद मजबूत डिमांड के कारण कीमतों में वृद्धि हुई है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अमेरिकी चावल उत्पादकों के संगठन ने 7 दिसंबर को जारी राइस एडवोकेट रिपोर्ट में कहा है कि पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिका लंबे दाने वाली चावल की किस्म का फिलहाल एकमात्र सप्लायर है। इसलिए कीमतें भी बढ़ी हुई हैं। पिछले साल निर्यात बाजार कमजोर था लेकिन मजबूत घरेलू मांग ने कीमतों को थाम कर रखा था। घरेलू मांग इस बार भी मजबूत बनी हुई है। आईएमएआरसी ग्रुप के अनुसार चावल का वैश्विक बाजार 2023 में 302.8 अरब डॉलर का हो गया था। इसके 2032 में 371.8 अरब डॉलर का हो जाने का अनुमान है।</span></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ ग्लोबल मार्केट में चावल के दामों में तेजी, दूसरे देशों के निर्यातक उठा रहे फायदा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[यमन में हूती के ठिकानों पर अमेरिका ने फिर किया हमला, इस संकट से भारत का निर्यात भी प्रभावित]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/us-strikes-again-on-houthi-rebels-as-the-crisis-is-affecting-exports-from-india.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 13 Jan 2024 13:57:09 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/us-strikes-again-on-houthi-rebels-as-the-crisis-is-affecting-exports-from-india.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अमेरिका ने यमन स्थित हूती विद्रोहियों पर लगातार दूसरे दिन हवाई हमले किए हैं। एक दिन पहले अमेरिका और इंग्लैंड ने मिलकर हूती के 28 ठिकानों पर हमले किए थे। लेकिन शनिवार की सुबह सिर्फ अमेरिका ने हूती की रडार फैसिलिटी पर टॉमहॉक मिसाइलें दागीं। इन हमलों के बाद दुनिया की कई बड़ी शिपिंग कंपनियों ने रेड सी (लाल सागर) के रास्ते अपने जहाज भेजना बंद कर दिया है। इससे भारत से बासमती चावल तथा अन्य वस्तुओं का निर्यात प्रभावित होने की आशंका है। निर्यात के मोर्चे पर भारत का प्रदर्शन पहले ही खराब चल रहा है।<br />इजरायल-हमास युद्ध में हमास का समर्थन करने के नाम पर हूती विद्रोही पिछले साल नवंबर से ही इस इलाके में मालवाहक जहाजों पर हमले कर रहे हैं। अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन के अनुसार इन हमलों में करीब 40 देशों को जाने वाले जहाज प्रभावित हुए हैं। दुनिया की सबसे बड़ी शिपिंग कंपनियों में शामिल एमएससी और मर्स्क ने फिलहाल रेड सी के रास्ते अपने जहाज भेजने से मना कर दिया है। नए हमले के बाद कुछ कंपनियों ने तो बीच रास्ते से अपने जहाज वापस मोड़ लिए।<br />रेड सी और स्वेज नहर के रास्ते भारत से जिन वस्तुओं का निर्यात होता है उनमें पेट्रोलियम पदार्थ के अलावा बासमती चावल और चाय प्रमुख हैं। भारत का करीब एक-तिहाई कंटेनर एक्सपोर्ट और कुल निर्यात का 15% इस मार्ग से होता है। भारत से यूरोप और अमेरिका के पूर्वी तट पर निर्यात के लिए यह रास्ता सबसे छोटा पड़ता है। निर्यातकों के संगठन फियो के अनुसार हूती के हमले शुरू होने के बाद भारत से कुछ जगहों के लिए ढुलाई का रेट दोगुना से भी ज्यादा हो गया है।&nbsp;<br />192 किलोमीटर लंबी स्वेज नहर एशिया और यूरोप के बीच सबसे छोटा मार्ग है। दूसरे वैकल्पिक मार्ग अफ्रीका के दक्षिणी छोर पर स्थित केप ऑफ गुड होप के रास्ते जाने पर 12 से 14 दिन ज्यादा लगते हैं। इससे ढुलाई का खर्च और जहाजों का बीमा प्रीमियम बढ़ गया है। इसलिए जहाजों की सुरक्षा के लिए अमेरिका की अगुवाई में कुछ देशों ने साझा ऑपरेशन &lsquo;ऑपरेशन प्रोस्पेरिटी गार्डियन&rsquo; शुरू किया है। &nbsp;<br />अमेरिका के नए हमलों का समर्थन करते हुए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमेरिका की प्रतिनिधि लिंडा थॉमस ग्रीनफील्ड ने काह कि रेड सी इलाके में स्थिरता कायम करने के लिए ये हमले किए गए हैं। अमेरिका इस क्षेत्र में और युद्ध नहीं देखना चाहता, लेकिन किसी भी देश के जहाज पर हमला स्वीकार्य नहीं होगा। राष्ट्रपति जो बाइडेन के अनुसार यह हमला ईरान और यमन के लिए एक संदेश है। अगर हूती के हमले जारी रहे तो आगे और कार्रवाई की जाएगी। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के अनुसार इन हमलों के बाद हूती विद्रोहियों ने एक मिसाइल दागी थी, लेकिन वह किसी जहाज को नहीं लगी। हालांकि हूती के ठिकानों पर बमबारी के बाद माना जा रहा है कि युद्ध का दायरा बढ़ सकता है। विद्रोहियों का कहना है कि दो दिन के हमले में उनके पांच लोग मारे गए हैं।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ यमन में हूती के ठिकानों पर अमेरिका ने फिर किया हमला, इस संकट से भारत का निर्यात भी प्रभावित ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[साल 2023 में एफएओ फूड प्राइस इंडेक्स 13.7 फीसदी नीचे रहा, लेकिन चावल प्राइस इंडेक्स में 21 फीसदी की वृद्धि]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/fao-food-price-index-declines-in-2023-rice-price-index-registered-21-per-cent-increase.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 08 Jan 2024 15:43:42 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/fao-food-price-index-declines-in-2023-rice-price-index-registered-21-per-cent-increase.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>वर्ष 2023 के दौरान खाद्य पदार्थों की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में नरमी देखने को मिली है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार पूरे साल का फूड प्राइस इंडेक्स वर्ष 2022 की तुलना में 13.7 फीसदी नीचे रहा। सिर्फ दिसंबर महीने की बात करें तो फूड प्राइस इंडेक्स नवंबर की तुलना में 1.5 फीसदी और दिसंबर 2022 की तुलना में 10.1 फीसदी नीचे आ गया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में पिछले महीने चीनी की कीमतों में तेज गिरावट आई, हालांकि पूरे साल का औसत देखें तो चीनी के दाम पिछले साल से अधिक रहे हैं।<br />एफएओ का अनाज का प्राइस इंडेक्स नवंबर की तुलना में 1.5 फीसदी बढ़ा है। इस दौरान गेहूं, मक्का, चावल और जौ के दाम में वृद्धि हुई। यह बढ़ोतरी प्रमुख निर्यातक देशों में लॉजिस्टिक्स की समस्या के कारण आई है। पूरे साल का अनाज का प्राइस इंडेक्स पिछले साल की तुलना में 15.4 फीसदी नीचे रहा। हालांकि इसमें भी सिर्फ चावल का प्राइस इंडेक्स 21 फीसदी ज्यादा रहा है। चावल उत्पादन पर अल नीनो के प्रभाव तथा निर्यात पर भारत के अंकुश लगाने की वजह से ऐसा हुआ है।<br />एफएओ का वनस्पति तेलों का प्राइस इंडेक्स नवंबर की तुलना में पिछले महीने 1.4 फीसदी कम रहा। पाम, सोया, रेपसीड और सनफ्लावर की खरीद कम हुई है, खासकर बायोडीजल सेक्टर की तरफ से। इसके अलावा ब्राजील के प्रमुख उत्पादक इलाकों में मौसम की परिस्थितियों में सुधार भी हुआ है। पूरे साल का औसत देखें तो 2023 में वनस्पति तेलों का प्राइस इंडेक्स पिछले वर्ष की तुलना में 32.7 फीसदी नीचे रहा।<br />नवंबर की तुलना में चीनी का प्राइस इंडेक्स 16.6 फीसदी नीचे आ गया और यह 9 महीने के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। हालांकि दिसंबर 2022 से तुलना करें तो दाम 14.9 फीसदी ऊपर थे। ब्राजील में उत्पादन की परिस्थितियों में सुधार और भारत में एथेनॉल उत्पादन में गन्ने का इस्तेमाल कम किए जाने के कारण कीमतों में यह गिरावट आई है।<br />डेयरी प्राइस इंडेक्स नवंबर की तुलना में दिसंबर में 1.6 फीसदी बढ़ गया। हालांकि दिसंबर 2022 की तुलना में इंडेक्स अभी 16.1 फीसदी नीचे है। मासिक आधार पर यह बढ़ोतरी पश्चिमी यूरोप में त्योहारों से पहले बटर तथा चीज की डिमांड बढ़ने के कारण आई। वैश्विक बाजार में दूध पाउडर की मांग में भी वृद्धि हुई है।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/08/image_750x500_64ec5dcd6f867.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ साल 2023 में एफएओ फूड प्राइस इंडेक्स 13.7 फीसदी नीचे रहा, लेकिन चावल प्राइस इंडेक्स में 21 फीसदी की वृद्धि ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[अनाज की वैश्विक खपत 1.1% बढ़ने, लेकिन ग्लोबल ट्रेड 1.8% घटने का अनुमान]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/world-cereal-utilization-to-increase-but-its-trade-to-decrease-says-fao.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 10 Dec 2023 08:42:23 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/world-cereal-utilization-to-increase-but-its-trade-to-decrease-says-fao.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">वर्ष 2023-24 में दुनिया में अनाज की खपत 281.3 करोड़ टन रहने का अनुमान है। यह पिछले साल की तुलना में 1.1 प्रतिशत अधिक है। यह अनुमान संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) का है। खपत का अनुमान इसके नवंबर के अनुमान से 24 लाख टन ज्यादा है। एफएओ ने 2023-24 के सीजन में अनाज का ट्रेड 1.8 प्रतिशत घटने की संभावना भी जताई है। </span>गेहूं की वैश्विक खपत का अनुमान इसने 19 लाख टन बढ़ाकर 79.14 करोड़ टन कर दिया है, जो पिछले साल से 1.8 प्रतिशत अधिक है। लोगों के खाने के साथ पशु चारे में भी इसका इस्तेमाल बढ़ने की संभावना है।</p>
<p>मोटे अनाज की खपत के अनुमान में कोई खास संशोधन नहीं किया गया है। यह पिछले साल से 1.2 प्रतिशत ज्यादा 150 करोड़ टन रहने की संभावना है। हालांकि चावल की खपत पिछले साल से सात लाख टन कम, 52.16 करोड़ टन रहने की संभावना व्यक्त की गई है। चारे में इसका प्रयोग कम होने और लोगों के खाने में बढ़ने के आसार हैं।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/12/image_750x_6574516e9e56b.jpg" alt="" /></p>
<p><span style="font-weight: 400;">एफएओ ने इस वर्ष वैश्विक अनाज उत्पादन 282.3 करोड़ टन रहने की संभावना जताई है, जो पिछले साल से 0.9 प्रतिशत अधिक है। उत्पादन और खपत के आधार पर सीजन के अंत में विश्व में अनाज का स्टॉक 53 लाख टन अधिक रहने की संभावना जताई गई है। कुल स्टॉक रिकॉर्ड 88.65 करोड़ टन का रहेगा जो पिछले सीजन की तुलना में 2.7 प्रतिशत अधिक है। इसलिए सप्लाई में कोई कमी नहीं आएगी।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">गेहूं का स्टॉक 31.93 करोड़ टन रहने की संभावना है। यह नवंबर के पिछले अनुमान से 42 लाख टन ज्यादा है। स्टॉक में वृद्धि मुख्य रूप से मिस्र, यूरोपियन यूनियन और सऊदी अरब में होगी। मोटे अनाज के स्टॉक अनुमान में कोई बड़ा संशोधन नहीं किया गया है और यह पिछले सीजन से 5.7 प्रतिशत ज्यादा 36.75 करोड़ टन रहेगा। अमेरिका में मक्का के लिए अनुमान बढ़ाया गया है, लेकिन यूरोपियन यूनियन में जौ के स्टॉक में कमी की बात भी कही गई है। चावल का स्टॉक पिछले सीजन से 1.6 प्रतिशत ज्यादा, 19.97 करोड़ टन का रहेगा।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">एफएओ के अनुसार 2023-24 में अनाज का ट्रेड 1.8 प्रतिशत घटने की संभावना है। इस सीजन में 46.84 करोड़ टन के अनाज का आयात-निर्यात होने की संभावना है। जुलाई 2023 से जून 2024 के सीजन में गेहूं का ट्रेड 19.41 करोड़ टन का रहेगा। तुर्किये और यूक्रेन से निर्यात बढ़ेगा, लेकिन अर्जेंटीना, ब्राजील और यूरोपियन यूनियन में कमी आएगी। मोटे अनाज का ट्रेड भी पिछले साल से 0.8 प्रतिशत कम रहने की संभावना है। जनवरी-दिसंबर 2024 में चावल के ट्रेड का अनुमान छह लाख टन घटाकर 5.23 करोड़ टन किया गया है।&nbsp;</span></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/06/image_750x500_649692cb2a85d.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ अनाज की वैश्विक खपत 1.1% बढ़ने, लेकिन ग्लोबल ट्रेड 1.8% घटने का अनुमान ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/06/image_750x500_649692cb2a85d.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[वैश्विक बाजार में घटे अनाजों के दाम, वनस्पति तेल एवं चीनी की कीमतों में आई तेजीः एफएओ]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/fao-food-price-index-holds-steady-in-november.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 10 Dec 2023 06:55:14 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/fao-food-price-index-holds-steady-in-november.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>इस साल वैश्विक अनाज उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर रहने के अनुमानों के बीच नवंबर में गेहूं, मक्का और मोटे अनाजों के दाम में गिरावट का रुख रहा। जबकि पाम ऑयल की कीमतों में वृद्धि की वजह से वनस्पति तेल के दाम में तेजी आई है। संयुक्त राष्ट्र के कृषि एवं खाद्य संगठन (एफएओ) के मासिक बुलेटिन के मुताबिक, नवंबर में वर्ल्ड फूड कमोडिटी प्राइस इंडेक्स 120.4 अंक पर रहा। अक्टूबर की तुलना में यह अस्थिर रहा। अक्टूबर में यह 120.6 अंक पर था, जबकि नवंबर 2022 की तुलना में इसमें 10.7 फीसदी की गिरावट आई है।</p>
<p>एफएओ के मुताबिक, अनाज की कीमतों के इंडेक्स में नवंबर में अक्टूबर की तुलना में 3 फीसदी की गिरावट आई है। मक्का के दाम में तेज गिरावट की वजह से मोटे अनाजों की कीमतों में 5.6 फीसदी की कमी आई है। वहीं गेहूं के दाम नवंबर 2.4 फीसदी घटे हैं। चावल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें इस महीने स्थिर रही हैं।</p>
<p>अनाजों के उलट वनस्पति तेलों की कीमतों में 3.4 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में पाम ऑयल की कीमतों में तेजी के चलते यह वृद्धि हुई है। नवंबर में पाम ऑयल के दाम 6 फीसदी उछले हैं। पाम ऑयल के प्रमुख उत्पादक देशों में उत्पादन की कमी और प्रमुख आयातक देशों द्वारा आयात बढ़ाए जाने का असर कीमतों पर देखने को मिला है। सूरजमुखी के तेल के दाम भी बढ़े हैं। हालांकि, सोयातेल और रैपसीड ऑयल के दाम में मामूली कमी आई है। &nbsp;</p>
<p>उत्तर पूर्वी एशियाई देशों की ओर से बटर और स्किम मिल्क पाउडर की मांग निकलने और आयात बढ़ने के चलते एफएओ का डेयरी प्राइस इंडेक्स अक्टूबर के मुकाबले 2.2 फीसदी चढ़ा है। सर्दी की छुट्टियों को देखते हुए पश्चिमी यूरोप से भी मांग में तेजी आई है। इसका भी असर डेयरी उत्पादों की कीमतों पर पड़ा है।</p>
<p>एफएओ के शुगर प्राइस इंडेक्स में भी 1.4 फीसदी वृद्धि हुई है। नवंबर 2022 की तुलना में यह 41.1 फीसदी ज्यादा है। वैश्विक बाजार में चीनी की उपलब्धता घटने की वजह से कीमतों पर दबाव है। विश्व के दो प्रमुख निर्यातक देशों भारत और थाईलैंड में चीनी उत्पादन घटने की वजह से निर्यात प्रभावित हुआ है। अल-नीनो के चलते इन दोनों देशों में मानसून की बारिश सामान्य से कम रही है जिसकी वजह से उत्पादन घटा है। &nbsp;</p>
<p>एफएओ मीट प्राइस इंडेक्स नवंबर में इससे पिछले महीने की तुलना में 0.4 फीसदी घटा है। पॉल्ट्री, सूअर और अन्य पशुओं के मांस की कीमतों में मामूली गिरावट के चलते यह कमी दर्ज की गई है।</p>
<p>&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ वैश्विक बाजार में घटे अनाजों के दाम, वनस्पति तेल एवं चीनी की कीमतों में आई तेजीः एफएओ ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[एफएओ ने 2023 के लिए अनाज उत्पादन का अनुमान 36 लाख टन बढ़ाया]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/world-2023-cereal-production-forecast-up-from-last-month-by-36-lakh-ton.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 09 Dec 2023 15:40:32 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/world-2023-cereal-production-forecast-up-from-last-month-by-36-lakh-ton.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने वर्ष 2023 के लिए अनाज उत्पादन के अनुमान में 36 लाख टन की बढ़ोतरी की है। नए अनुमान के मुताबिक इस वर्ष रिकॉर्ड उत्पादन की संभावना है। मुख्य रूप से गेहूं और कुछ हद तक मोटे अनाज का उत्पादन बेहतर होने की संभावना है। एफएओ के अनुसार इस वर्ष विश्व में 282.3 करोड़ टन अनाज उत्पादन का अनुमान है। यह पिछले साल से 0.9 प्रतिशत (259 लाख टन) अधिक रहने की संभावना है। यह 2021 के रिकॉर्ड उत्पादन से भी 104 लाख टन अधिक रहेगा।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">गेहूं के उत्पादन में पिछले अनुमान से 20 लाख टन की बढ़ोतरी की संभावना है। हालांकि इसके बावजूद यह 2022 की तुलना में 171 लाख टन, यानी 2.1 प्रतिशत कम रहेगा। इस साल के अनुमान में बढ़ोतरी रूस और तुर्किये के कारण की गई है। वहां आधिकारिक अनुमानों में बढ़ोतरी की गई है। हालांकि खराब मौसम के कारण अर्जेंटीना और ब्राजील में उत्पादन में कुछ कटौती की आशंका भी व्यक्त की गई है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">मोटे अनाज का उत्पादन 151.1 करोड़ टन रहने की संभावना है। यह पिछले साल से 3.6 प्रतिशत अधिक होगा। अमेरिका में बेहतर यील्ड के चलते वहां मक्का उत्पादन काफी अच्छा रहने की संभावना है। यूरोपियन यूनियन और मेक्सिको में गर्म मौसम के चलते उत्पादन को नुकसान होगा, उसकी भरपाई अमेरिका से हो जाएगी।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">नवंबर के अनुमानों की तुलना में चावल उत्पादन में 9 लाख टन बढ़ोतरी की संभावना व्यक्त की गई है। इंडोनेशिया और तंजानिया में खराब मौसम से पहले जितने नुकसान की आशंका व्यक्त की जा रही थी, उतना होगा नहीं। रूस, वेनेजुएला और वियतनाम में बुवाई का रकबा बढ़ने से वहां अधिक उत्पादन की संभावना है। वर्ष 2022-23 की तुलना में 2023-24 में विश्व में 52.49 करोड़ टन चावल उत्पादन का अनुमान है।</span></p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/12/image_750x_65743b587fd99.jpg" alt="" /></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अगले मौसम के बारे में एफएओ ने कहा है कि 2024 के सर्दियों की गेहूं की बुवाई उत्तरी गोलार्ध के देशों में चल रही है। हालांकि इस वर्ष रकबा में ज्यादा वृद्धि की संभावना नहीं है। अमेरिका में अनुकूल मौसम को देखते हुए इस मौसम की गेहूं की फसल का 50 प्रतिशत अच्छा से बहुत अच्छा रहने की संभावना है। पिछले साल यह अनुपात 34 प्रतिशत था। चीन में बेहतर मौसम के चलते गेहूं की बुवाई अक्टूबर में खत्म हो गई। वहां उत्पादन पिछले साल से बेहतर रहने की संभावना है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">दक्षिणी गोलार्ध के देशों में मोटे अनाजों की बुवाई चल रही है। ब्राजील में मौसम में नमी के कारण मक्के की बुवाई धीमी चल रही है। दाम भी कम चल रहे हैं। इसलिए इसका रकबा पिछले सीजन के रिकॉर्ड से पांच प्रतिशत कम रहने की संभावना है। अर्जेंटीना में भी मक्के का उत्पादन अच्छा रहने की संभावना है। दक्षिण अफ्रीका में मक्के की बुवाई के लिए मौसम अनुकूल है, लेकिन आने वाले दिनों में वहां गर्मी बढ़ने का अनुमान है जिससे यील्ड प्रभावित हो सकती है।</span></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ एफएओ ने 2023 के लिए अनाज उत्पादन का अनुमान 36 लाख टन बढ़ाया ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[एग्री फूड सिस्टम को सक्षम, समावेशी और सस्टेनेबल बनाने की जरूरतः एफएओ महानिदेशक]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/agri-food-system-needs-to-be-made-efficient-inclusive-and-sustainable-says-fao-director-general.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 03 Dec 2023 07:00:00 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/agri-food-system-needs-to-be-made-efficient-inclusive-and-sustainable-says-fao-director-general.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>एग्री फूड सिस्टम के समाधान से जलवायु, आम लोग और प्रकृति तीनों को फायदा होगा। यह कहना है संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के महानिदेशक क्यू डोंगयू का। दुबई में चल रहे जलवायु सम्मेलन कॉप 28 को शनिवार को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि हम कॉप इतिहास के एक महत्वपूर्ण समय में हैं। एग्री फूड सिस्टम इस कॉप में शीर्ष पर है। यह एक टर्निंग पॉइंट है। हमें कॉप 28 को गेमचेंजर बनाने के लिए साथ मिलकर काम करना चाहिए।&nbsp;<br />उन्होंने कहा कि सतत विकास के लक्ष्यों को तभी हासिल किया जा सकता है जब एग्री फूड सिस्टम को अधिक सक्षम, समावेशी, लचीला और सस्टेनेबल बनाया जाए। उन्होंने कहा कि बदलाव अति आवश्यक है क्योंकि दुनिया के 800 करोड़ लोग पौष्टिक भोजन नहीं पाते, 70 करोड़ से अधिक लोग भूख की समस्या से ग्रस्त हैं और दुनिया के 80% ग्रामीण गरीब परोक्ष रूप से अपनी आजीविका के लिए एग्री फूड सिस्टम पर निर्भर हैं।<br />एफएओ महानिदेशक ने जलवायु परिवर्तन के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस क्राउड सोर्सिंग पर इंटरनेशनल टेलीकम्युनिकेशन यूनियन के एक कार्यक्रम को भी संबोधित किया। उन्होंने कहा कि भविष्य को आकार देने में विज्ञान और इनोवेशन की महत्वपूर्ण भूमिका है, खासकर जलवायु संकट को देखते हुए। उन्होंने एग्री फूड सिस्टम में क्रांतिकारी बदलाव लाने में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की संभावित भूमिका पर जोर दिया और कहा कि जलवायु परिवर्तन के असर से जूझ रहे छोटी जोत के किसानों की मदद इससे की जा सकती है। उन्होंने बिग डाटा के महत्व के बारे में भी कहा कि इससे किसानों को समय पर सलाह दी जा सकती है। इससे उनका नुकसान कम होगा, एफिशिएंसी बढ़ेगी और एग्री फूड सेक्टर में सस्टेनेबिलिटी आएगी।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/12/image_750x_656b8033c81d5.jpg" alt="" /></p>
<p><br />इससे पहले 1 दिसंबर को कॉप 28 प्रेसीडेंसी ने घोषणा की कि 134 देशों के नेता महत्वपूर्ण कृषि खाद्य एवं जलवायु डिक्लेरेशन पर सहमत हो गए हैं। खाद्य सुरक्षा के लिए 2.5 अरब डॉलर की राशि जुटाने का भी ऐलान किया गया। संयुक्त अरब अमीरात की जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण मंत्री तथा कॉप 28 फूड सिस्टम की लीड मरियम बिंत मोहम्मद अलमहेरी ने कहा कि पेरिस समझौते और 1.5 डिग्री सेंटीग्रेड के लक्ष्य को हासिल करने का ऐसा कोई रास्ता नहीं जिसमें खाद्य प्रणाली, कृषि और जलवायु के बीच संबंधों पर तत्काल ध्यान ना दिया जाए। तमाम देशों को अपनी खाद्य प्रणाली तथा कृषि को जलवायु से संबंधित लक्ष्य के केंद्र में रखना चाहिए ताकि वैश्विक उत्सर्जन कम किया जा सके और किसानों का जीवन तथा उनकी आजीविका बचाई जा सके।<br />जिन 134 देशों ने इस डिक्लेरेशन पर दस्तखत किए हैं उनकी कुल आबादी 570 करोड़ है। इन देशों में कुल लगभग 50 करोड़ किसान है जो विश्व का 70% भोजन उपजाते हैं। दुनिया में खाद्य प्रणाली से जितना उत्सर्जन निकलता है उसका 76% इन्हीं देशों से आता है। यह विश्व के कुल उत्सर्जन के 25 से प्रतिशत के बराबर है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ एग्री फूड सिस्टम को सक्षम, समावेशी और सस्टेनेबल बनाने की जरूरतः एफएओ महानिदेशक ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कॉप 28 में कृषि&amp;#45;खाद्य समाधानों के साथ जलवायु एजेंडे को आकार देगा एफएओ]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/cop28-fao-shapes-climate-agenda-with-agrifood-solutions.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 28 Nov 2023 16:32:15 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/cop28-fao-shapes-climate-agenda-with-agrifood-solutions.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>जलवायु परिवर्तन से जूझ रही दुनिया को इसके समाधान को लेकर तत्काल कार्रवाई करने की जरूरत है। 30 नवंबर से शुरू हो रहे संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन कॉप 28 (COP28) में संयुक्त राष्ट्र का खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) कृषि खाद्य प्रणालियों के लिए टिकाऊ समाधान पेश करेगा। संयुक्त अरब अमीरात के दुबई स्थित एक्सपो सिटी में आयोजित यह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन 12 दिसंबर तक चलेगा।</p>
<p>एफएओ के एक बयान के मुताबिक, संगठन के डायरेक्टर जनरल क्यू डोंग्यू इसमें एफएओ के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करेंगे। इस वैश्विक सम्मेलन में 65,000 से अधिक लोगों के हिस्सा लेने की उम्मीद है। जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (यूएनएफसीसीसी) के सदस्य देशों के अलावा, विश्व के लगभग 150 नेताओं, निजी क्षेत्र के प्रतिनिधियों, युवाओं, जलवायु वैज्ञानिकों, स्वदेशी लोगों, पत्रकारों, पोप फ्रांसिस और किंग चार्ल्स जैसे प्रभावशाली लोग इसमें हिस्सा लेंगे।</p>
<p>क्यू डोंग्यू ने एक बयान में कहा, "जलवायु और खाद्य संकट एक दूसरे से अलग नहीं हैं। कृषि खाद्य प्रणालियों और ग्रामीण क्षेत्रों में निवेश करने से जलवायु संकट के प्रभावों को दूर करने का ठोस समाधान तैयार होता है। कॉप 28 में एफएओ व्यवस्थित रूप से इस बात पर रौशनी डालेगा कि कैसे जलवायु कार्रवाई को तेज करने से कृषि खाद्य प्रणालियों में परिवर्तन होता है, जो लोगों को लाभ और समृद्धि प्रदान करता है।"</p>
<p>इस वर्ष चर्चाओं और वार्ताओं में महत्वपूर्ण वर्कस्ट्रीम्स को शामिल किया जाएगा, जिसका लक्ष्य प्रमुख मुद्दों पर पर्याप्त प्रगति हासिल करना है। जलवायु प्रभावों से तत्काल निपटने में किसानों सहित कमजोर समुदायों की सहायता के लिए कॉप 27 की सहमति के नुकसान और क्षति वित्त सुविधा के विवरण को अंतिम रूप दिया जा रहा है।</p>
<p>एफएओ का एक अन्य अनिवार्य लक्ष्य विकासशील देशों को उनके जलवायु परिवर्तन के &nbsp;अनुकूल प्रयासों में समर्थन देने के लिए वैश्विक वित्त उद्देश्य की ओर आगे बढ़ना है। ऊर्जा परिवर्तन और न्यायसंगत परिवर्तन दोनों में तेजी लाने के साथ-साथ उत्सर्जन अंतर को कम करना भी महत्वपूर्ण क्षेत्र है जिन पर सम्मेलन में विचार किया जाएगा।</p>
<p>कॉप 28 में पहली बार ग्लोबल स्टॉकटेक का निष्कर्ष भी देखा जाएगा। यह देशों और हितधारकों द्वारा इसका मूल्यांकन करने की एक प्रक्रिया है कि पेरिस समझौते के लक्ष्यों को पूरा करने की दिशा में प्रगति कहाँ रुक रही है (या नहीं)। यह प्रक्रिया एक निर्णय के साथ समाप्त होगी। 2025 में होने वाली जलवायु कार्य योजनाओं (राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान) के अगले दौर की महत्वाकांक्षा को तेज करने में इसका लाभ उठाया जाएगा।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/11/image_750x500_6565c8739b745.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ कॉप 28 में कृषि-खाद्य समाधानों के साथ जलवायु एजेंडे को आकार देगा एफएओ ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/11/image_750x500_6565c8739b745.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[ग्लोबल फूड बास्केट में बीज की और अधिक किस्मों को जोड़ने पर विचार]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/more-seed-varieties-may-be-added-to-global-food-basket.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 21 Nov 2023 12:28:42 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/more-seed-varieties-may-be-added-to-global-food-basket.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेज पर अंतरराष्ट्रीय संधि के गवर्निंग बॉडी ने ग्लोबल फूड बास्केट में बीज के अधिक किस्मों को जोड़ने पर विचार करने का निर्णय लिया है। वैश्विक चुनौतियों, जैसे जैव विविधता के नुकसान और जलवायु परिवर्तन और दुनिया की प्रमुख फसलों के फूड बास्केट में अधिक विविधता की जरूरत को देखते हुए बीजों की भूमिका तेजी से फोकस में आई है। पौधों के आनुवांशिक संसाधनों की सुरक्षा करने वाली संधि के गवर्निंग बॉडी की &nbsp;बैठक में बीजों की भूमिका चर्चा के केंद्र में होगी।</p>
<p>संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) के महानिदेशक क्यू डोंगयू ने गवर्निंग बॉडी के दसवें सत्र में कहा, "पौधों के आनुवांशिकी की विविधता लचीलेपन को बढ़ावा देने, खाद्य सुरक्षा बढ़ाने और महिलाओं एवं युवाओं सहित ग्रामीण समुदायों की आजीविका का समर्थन करने के लिए सार्थक कृषि अनुसंधान और नवाचार को संभव बनाती है।"</p>
<p><strong>महत्वपूर्ण योगदान को पहचानना</strong></p>
<p>एफएओ के एक बयान के मुताबिक, क्यू ने कहा, "इस वर्ष का थीम - 'बीजों से नवोन्मेषी समाधानों तक: हमारे भविष्य की सुरक्षा' उन किसानों, पौधा प्रजनकों, कृषि शोधकर्ताओं और बीज बैंक क्यूरेटर को मान्यता देती है जो दुनिया भर में पौधों के आनुवांशिक संसाधनों के संरक्षण और सुधार के लिए काम करते हैं।"</p>
<p>पौधों का आनुवांशिक संसाधन हमारे आहार के लिए महत्वपूर्ण है और संधि का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि ये नवीन, टिकाऊ और लचीली कृषि खाद्य प्रणाली समाधानों के हिस्से के रूप में सुरक्षित और सुलभ हों। 20-24 नवंबर तक चलने वाली इस बैठक में दुनिया भर के 600 से अधिक प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं। इसमें इस पर चर्चा की जाएगी कि अंतरराष्ट्रीय संधि, जो एक बाध्यकारी समझौता है और जिसका सचिवालय एफएओ में है, जलवायु संकट के प्रभाव जैसे कारकों द्वारा लाए गए परिवर्तनों के साथ कैसे तालमेल बिठा सकता है। जलवायु संकट दुनिया भर में किसानों की फसलों को बर्बाद कर रहा है और बढ़ती आबादी को स्थायी रूप से खिलाने की क्षमता को खतरे में डाल रहा है।</p>
<p>2001 में अपनाई गई इस संधि के फूड बास्केट में 64 प्रमुख फसलों को रखा गया है। द प्लांट्स दैट फीड द वर्ल्ड नामक एक रिपोर्ट को इस कार्यक्रम से इतर पेश किया गया। उसमें बताय गया है कि गवर्निंग बॉडी की बैठक में जिन मुद्दों पर विचार किया जाएगा उनमें से एक यह है कि क्या इस सूची में और अधिक फसलों को शामिल करने के लिए इसे अपडेट करने की जरूरत है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पौधा आधारित प्रोटीन की बढ़ी हुई भूमिका, फसल की किस्मों, स्वाद और फसलों की मांग में बदलाव का फैशन के लिए देश एक-दूसरे पर अधिक निर्भर हो रहे हैं।</p>
<p>एफएओ महानिदेशक ने कहा, "अगर हमें जैव विविधता का संरक्षण करते हुए भोजन और पोषण संबंधी जरूरतों को स्थायी रूप से पूरा करना है तो हमें दुनिया के फूड बास्केट में और अधिक विविधता सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।" क्यू ने कहा कि छोटे किसानों को सशक्त बनाने के लिए इसमें उपकरणों, ज्ञान और संसाधनों के साथ सार्वजनिक और निजी भागीदारों, शिक्षाविदों और सिविल सोसायटी के बीच साझेदारी को बढ़ावा देना शामिल होगा।</p>
<p>2001 में अपनाई गई इस संधि के फूड बास्केट में 64 प्रमुख फसलों को रखा गया है। द प्लांट्स दैट फीड द वर्ल्ड नामक एक रिपोर्ट को इस कार्यक्रम से इतर पेश किया गया। उसमें बताय गया है कि गवर्निंग बॉडी की बैठक में जिन मुद्दों पर विचार किया जाएगा उनमें से एक यह है कि क्या इस सूची में और अधिक फसलों को शामिल करने के लिए इसे अपडेट करने की जरूरत है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पौधा आधारित प्रोटीन की बढ़ी हुई भूमिका, फसल की किस्मों, स्वाद और फसलों की मांग में बदलाव का फैशन के लिए देश एक-दूसरे पर अधिक निर्भर हो रहे हैं।</p>
<p>एफएओ महानिदेशक ने कहा, "अगर हमें जैव विविधता का संरक्षण करते हुए भोजन और पोषण संबंधी जरूरतों को स्थायी रूप से पूरा करना है तो हमें दुनिया के फूड बास्केट में और अधिक विविधता सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।" क्यू ने कहा कि छोटे किसानों को सशक्त बनाने के लिए इसमें उपकरणों, ज्ञान और संसाधनों के साथ सार्वजनिक और निजी भागीदारों, शिक्षाविदों और सिविल सोसायटी के बीच साझेदारी को बढ़ावा देना शामिल होगा।</p>
<p><strong>संरक्षण और साझा करना</strong></p>
<p>सत्र में कृषि पौधों और बीजों के वैश्विक संरक्षण और टिकाऊ उपयोग, उनके उपयोग से होने वाले लाभों को साझा करना, इसके विश्वव्यापी जीन पूल में वृद्धि, एक विकेन्द्रीकृत वैश्विक सूचना प्रणाली और किसानों के अधिकारों से संबंधित विषयों की एक श्रृंखला शामिल होगी। मुख्य फोकस इस बात पर होगा कि कैसे बीज वैश्विक चुनौतियों जैसे जैव विविधता के नुकसान और जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद कर सकते हैं और अपने गुणों के साथ फसलों को सूखे सहित प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करने या अनुकूलित करने में सक्षम बनाते हैं।</p>
<p>बीजों की अधिक विविधता का मतलब कृषि खाद्य प्रणालियों के लिए अधिक लचीलापन है क्योंकि स्थानीय रूप से अनुकूलित बीज की किस्में विटामिन और खनिजों से भरपूर और बेहतर पोषण प्रदान कर सकती हैं। एफएओ मुख्यालय में "द जर्नी ऑफ सीड्स" नामक एक विशेष प्रदर्शनी भी आयोजित की जाएगी, जिसमें दर्शकों को किसानों के खेतों से जीन बैंकों तक और वहां से लेकर खेतों तक और फिर बाजारों से लेकर हमारी रसोई तक बीजों के साथ दुनिया भर की यात्रा के लिए आमंत्रित किया जाएगा।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/11/image_750x500_655c54d3e1e5c.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ ग्लोबल फूड बास्केट में बीज की और अधिक किस्मों को जोड़ने पर विचार ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/11/image_750x500_655c54d3e1e5c.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में कृषि खाद्य प्रणाली के प्रभावी समाधान खोजने पर रहेगा फोकस]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/why-agrifood-systems-must-be-at-the-core-of-climate-action-cop28-preview-with-fao-climate-expert.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 20 Nov 2023 17:21:36 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/why-agrifood-systems-must-be-at-the-core-of-climate-action-cop28-preview-with-fao-climate-expert.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (सीओपी28) 2023 का समय जैसे-जैसे नजदीक आता जा रहा है, जलवायु संकट से निपटने के लिए नए-नए समाधानों की ओर दुनिया का ध्यान जा रहा है। जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (आईपीसीसी) के वैज्ञानिकों ने इस साल की शुरुआत में कहा था कि जलवायु परिवर्तन को कम करने के लिए जलवायु लचीली विकास और खाद्य एवं कृषि क्षेत्रों सहित समग्र उपायों में अनुकूल प्रभावी समाधान निहित हैं।</p>
<p>कृषि खाद्य प्रणालियां ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में लगभग एक तिहाई का योगदान करती हैं। इनमें सकारात्मक जलवायु कार्रवाई की बड़ी संभावना है। कार्बन फुटप्रिंट और पर्यावरणीय प्रभाव को कम करते हुए बढ़ती आबादी को भोजन उपलब्ध कराने के तरीके ढूंढना मुख्य चुनौती है। सीओपी28 सरकारों, कारोबारों, गैर सरकारी संगठनों और नागरिक समाज का प्रतिनिधित्व करने वाले नेताओं के लिए सहयोगात्मक रूप से ठोस समाधान तैयार करने के लिए एक गठजोड़ के रूप में काम करेगा। संयुक्त राष्ट्र का खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) इस प्रयास में सबसे आगे रहेगा।</p>
<p>बढ़ते जलवायु प्रभावों और ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में कटौती पर धीमी प्रगति के बीच टिकाऊ कृषि खाद्य प्रणाली प्रथाएं देशों और समुदायों को अनुकूल एवं लचीली बनाने और उत्सर्जन को कम करने, खाद्य सुरक्षा और पोषण सुनिश्चित करने में मदद कर सकती हैं।</p>
<p>एफएओ के ऑफिस ऑफ क्लाइमेंट चेंज, बायोडायवर्सिटी और इन्वायरमेंट (ओसीबी) के डायरेक्टर कावेह जाहेदी ने कहा, &ldquo;जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए हमारे पास पहले से ही समाधान हैं। इनमें से कई समाधान, चाहे वह कृषि वानिकी, मिट्टी को ठीक करने, टिकाऊ पशुधन या मत्स्य पालन प्रबंधन हों, के कई लाभ हैं क्योंकि वे जैव विविधता के स्थायी उपयोग का समर्थन करने के साथ-साथ मदद भी कर सकते हैं। खाद्य सुरक्षा के साथ एक ही समाधान से कई लाभ केवल कृषि और खाद्य प्रणालियां प्रदान करती हैं।&rdquo;</p>
<p>सीओपी में एफएओ उन परियोजनाओं के उदाहरणों के साथ कुछ यूनिक कृषि खाद्य प्रणाली पहलों का प्रदर्शन करेगा जो जमीन पर बदलाव ला रहे हैं। उन्होंने कहा, "हम क्लाइमेट फाइनेंस को इन समाधानों की ओर बढ़ाने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहते हैं।" जाहेदी ने चेताया कि फाइनेंस में बड़ी वृद्धि के बिना कृषि और खाद्य प्रणालियों में काम करने वाले लोगों की &nbsp;अतिसंवेदनशीलत को कम करना और क्षेत्र से उत्सर्जन को कम करना संभव नहीं होगा। अकेले 2021 में 16 अरब टन ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन हुआ था।</p>
<p><strong>कृषि खाद्य प्रणालियां और समझौते</strong></p>
<p>एफएओ उन देशों का भी समर्थन करेगा जो कृषि और खाद्य सुरक्षा पर जलवायु कार्रवाई के कार्यान्वयन पर आधिकारिक वार्ता और शर्म अल-शेख के संयुक्त कार्य के माध्यम से इन मुद्दों पर कड़ी मेहनत कर रहे हैं। जाहेदी ने कहा कि "यह संयुक्त कार्य बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह कृषि खाद्य प्रणालियों पर चर्चा को कुछ हद तक बातचीत प्रक्रिया के केंद्र में लाता है और हमें समाधानों के बारे में बात करने को प्रेरित करता है।''</p>
<p>सीओपी28 में इस संयुक्त कार्य के लिए एक कार्य योजना पर बातचीत होगी जिसमें जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC) के भीतर एक समन्वय संरचना भी शामिल है। इस दौरान वार्ताकार वित्त पोषण के अवसर भी तलाशेंगे। इस वर्ष के एजेंडे में &nbsp;एक और महत्वपूर्ण चर्चा शामिल है जो पिछले साल सीओपी27 में नुकसान और क्षति कोष बनाने पर हुई सहमति से संबंधित है। विकासशील देश दशकों से यह फंड बनाने की अपील कर रहे हैं। इस फंड का उद्देश्य उन देशों को वित्तीय सहायता प्रदान करना है जो जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित हैं लेकिन जिन्होंने जलवायु परिवर्तन में सबसे कम योगदान दिया है। इस पहल को कैसे क्रियान्वित किया जाए इस पर सीओपी28 में चर्चा होगी।</p>
<p>जाहेदी ने कहा, &ldquo;हमें उत्सर्जन में कमी लानी होगी। साथ ही हमें अनुकूलता से भी निपटना होगा क्योंकि जलवायु बदल रही है। मगर एक ऐसा समय आता है जब अनुकूलता संभव नहीं रह जाती है और यहीं पर हानि और क्षति सामने आती है। यह फंड उन लोगों, समुदायों, विशेष रूप से खेती और कृषि समुदायों की मदद करने के लिए महत्वपूर्ण होगा जो जलवायु प्रभाव की इस चुनौती से जूझने में सबसे अंतिम पायदान पर हैं।</p>
<p>इस वर्ष के सम्मेलन में सरकारें पेरिस समझौते के एक हिस्से पहले ग्लोबल स्टॉकटेक, जलवायु संकट पर दुनिया की प्रतिक्रिया का आकलन करने और आगे बढ़ने का एक बेहतर तरीका तैयार करने के प्रमुख साधन पर भी निर्णय लेंगी। यूएनएफसीसीसी ने हाल ही में एक रिपोर्ट जारी की है जो सरकारों को सीओपी28 में ग्लोबल स्टॉकटेक पर निर्णय लेने में मदद करने के लिए डिजाइन की गई है।</p>
<p>जाहेदी ने कहा कि एनर्जी स्मार्ट कृषि कृषि खाद्य क्षेत्र में उत्सर्जन को कम करने, कृषि में ऊर्जा दक्षता और स्थिरता में सुधार लाने और कृषि के सह-उत्पादों से जैव ऊर्जा उत्पादन के अवसरों को भुनाने में भी मदद कर सकती है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में कृषि खाद्य प्रणाली के प्रभावी समाधान खोजने पर रहेगा फोकस ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[जलवायु, राजनीतिक तनाव और नीतियों में अचानक बदलाव से वैश्विक खाद्य उत्पादन में जोखिम: एफएओ रिपोर्ट]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/climate-geopolitical-tension-pose-risk-before-global-food-production-fao-report.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 14 Nov 2023 13:30:50 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/climate-geopolitical-tension-pose-risk-before-global-food-production-fao-report.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>मौसम की चरम घटनाओं, बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और नीतियों में अचानक बदलाव वैश्विक खाद्य उत्पादन प्रणालियों के लिए जोखिम पैदा करते हैं और मांग-आपूर्ति संतुलन को बिगाड़ सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) की एक नई रिपोर्ट में यह बात कही गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन कारणों से व्यापार और वैश्विक खाद्य सुरक्षा की संभावनाओं को भी कमजोर कर सकते हैं। हालांकि, अधिकांश बुनियादी खाद्य पदार्थों के उत्पादन की संभावनाएं अनुकूल हैं।</p>
<p>एफएओ ने अपने नए फूड आउटलुक (द्विवार्षिक प्रकाशन) में प्रमुख खाद्य पदार्थों के उत्पादन, व्यापार, उपयोग और स्टॉक का पूर्वानुमान जारी किया है। इसमें कहा गया है कि 2023-24 में मोटा अनाज और चावल के व्यापार की मात्रा में गिरावट की उम्मीद है, जबकि ब्राजील और अमेरिका में बुवाई में बढ़ोतरी के कारण वैश्विक मक्का उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि होने का अनुमान है।</p>
<p>इस रिपोर्ट में वनस्पति तेलों और वसा के वैश्विक व्यापार में भी मामूली गिरावट आने की उम्मीद जताई गई है, जबकि इनका वैश्विक उत्पादन और खपत बढ़ने का अनुमान एफएओ ने लगाया है। आगामी वर्ष में चीनी, डेयरी उत्पादों, मांस और मछली के व्यापार की मात्रा में भी गिरावट आने की उम्मीद जताई गई है।</p>
<p><strong>वैश्विक खाद्य आयात बिल</strong></p>
<p>एफएओ ने अपने फूड आउटलुक में कहा है कि 2023 में वैश्विक खाद्य आयात बिल के 2 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। यह 2022 की तुलना में लगभग 35.3 अरब अमेरिकी डॉलर (1.8 फीसदी) अधिक है। रिपोर्ट के मुताबिक, उच्च और उच्च मध्यम आय वाले देशों की वजह से फलों-सब्जियों के साथ पेय पदार्थ और चीनी के आयात बिल में बड़ी वृद्धि होने का अनुमान है। इसके विपरीत कम आय वाले देशों के कुल खाद्य आयात बिल में 11 फीसदी की कमी देखने को मिल सकती है।</p>
<p>संयुक्त राष्ट्र के इस संगठन ने कहा है कि ये घटनाक्रम अक्सर विश्व मूल्य रुझानों को प्रतिबिंबित करते हैं क्योंकि फलों-सब्जियों और चीनी के लिए अंतरराष्ट्रीय कोटेशन में वृद्धि हुई है, जबकि पशु और वनस्पति तेलों में दौरान गिरावट आई है। फिर भी, वैश्विक खाद्य आयात बिल पर मात्रा के मुताबिक प्रभाव मूल्य अधिक होने का अनुमान है। हालांकि कॉफी, चाय, कोको और मसालों जैसे ज्यादा कीमत वाले या प्रसंस्कृत उत्पादों में वृद्धि होने का अनुमान नहीं है।</p>
<p>अल्प विकसित, विकासशील और उप-सहारा अफ्रीका के देशों द्वारा आयात में कमी किए जाने से इनके खाद्य आयात बिल में आंशिक रूप से गिरावट की उम्मीद है। कमजोर मुद्राओं, बढ़ते कर्ज स्तर और माल ढुलाई की ज्यादा लागत की वजह से भी इनके आयात में कमी आने का अनुमान है क्योंकि इनकी वजह से अंतरराष्ट्रीय खाद्य बाजारों तक पहुंचने की उनकी क्षमता बाधित हो रही है।</p>
<p>यह रिपोर्ट शुद्ध खाद्य आयात करने वाले विकासशील देशों के घरेलू मूल्य विकास पर भी रौशनी डालती है और एफएओ के वैश्विक खाद्य उपभोग मूल्य सूचकांक के रुझानों का विश्लेषण करती है।</p>
<p>&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ जलवायु, राजनीतिक तनाव और नीतियों में अचानक बदलाव से वैश्विक खाद्य उत्पादन में जोखिम: एफएओ रिपोर्ट ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[गेहूं निर्यात पर रोक अगले साल आम चुनाव के बाद ही हटने के आसारः वर्ल्ड ग्रेन]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/restriction-on-wheat-export-expected-to-be-removed-only-after-general-election-says-world-grain.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 12 Nov 2023 07:00:00 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/restriction-on-wheat-export-expected-to-be-removed-only-after-general-election-says-world-grain.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">गेहूं की बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने के लिए केंद्र सरकार ने पिछले साल इसके निर्यात पर प्रतिबंध लगाया था। प्रतिबंध के करीब 18 माह बीत जाने के बावजूद गेहूं के दाम नीचे नहीं आए हैं। दूसरी तरफ, इस प्रतिबंध के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजारों में गेहूं की उपलब्धता पर असर पड़ा। सितंबर 2023 में दाम 8 महीने के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गए थे। वर्ल्ड ग्रेन पत्रिका ने अपने नवंबर अंक में यह बात कही है। इसने अनुमान जताया है कि गेहूं निर्यात पर प्रतिबंध शायद अगले साल आम चुनाव के बाद ही खत्म होंगे।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इसने लिखा है, 2022 में जब यूक्रेन पर हमले के बाद रूस ने ब्लैक सी यानी काला सागर के बंदरगाहों से यूक्रेन से गेहूं निर्यात रोक दिया था, तब अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं के दाम बढ़ गए थे। उसे समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में पैदा हुई गेहूं की किल्लत कुछ हद तक भारत ने पूरी की थी। चीन के बाद भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गेहूं उत्पादक है और मार्च 2022 तक 12 महीने में इसने रिकॉर्ड 70 लाख टन गेहूं का निर्यात किया था। यह एक साल पहले के मार्केटिंग वर्ष की तुलना में 250 से प्रतिशत अधिक था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अगले महीने, यानी अप्रैल 2022 में कहा कि भारत के पास अपने लोगों को खिलाने के लिए पर्याप्त भोजन है, बल्कि हमारे किसान दुनिया को खिलाने में सक्षम हो गए हैं। लेकिन उनके इस बयान के कुछ हफ्ते बाद ही भारत ने गेहूं निर्यात पर तत्काल पाबंदी लगा दी। इसका मकसद भारत के घरेलू बाजार में गेहूं की बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाना था। हालांकि निर्यात पर प्रतिबंध के बावजूद गेहूं के दाम कम नहीं हुए।</span></p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/11/image_750x_654fb0512f273.jpg" alt="" /></p>
<p><span style="font-weight: 400;">पत्रिका ने रैबो रिसर्च के सीनियर रिसर्च एनालिस्ट ऑस्कर जकरा (Oscar Tjakra) के हवाले से लिखा है कि 2022-23 के मार्केटिंग वर्ष में उम्मीद से कम उत्पादन, बढ़ती महंगाई और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर गेहूं की कम खरीद के चलते सरकार ने यह कदम उठाया था। जकरा के अनुसार 2022-23 की फसल फरवरी 2022 तक अच्छी लग रही थी। इससे उम्मीद बनी थी कि लगातार दूसरे साल गेहूं की रिकार्ड उत्पादन होगा। लेकिन मार्च के मध्य में अचानक तापमान बढ़ने से गेहूं के दाने सिकुड़ गए और यील्ड घट गई। तब से लेकर 18 महीने हो गए और गेहूं निर्यात पर पाबंदी जारी है। दूसरी तरफ भारत के साथ बाकी दुनिया भी ऊंची खाद्य महंगाई दर से जूझ रही है। हालांकि विभिन्न एजेंसियां 2023-24 में विश्व स्तर पर रिकॉर्ड गेहूं उत्पादन का अनुमान जता रही हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">पत्रिका ने लिखा है कि सरकार ने अपने भंडार से सब्सिडाइज्ड दरों पर बाजार में गेहूं बेचा है। इसके बावजूद यह खाद्य महंगाई को निर्धारित स्तर पर लाने में नाकाम रही है। जकरा के अनुसार सरकार ने अप्रैल 2020 में कोविड-19 लॉकडाउन के समय करोड़ों लोगों को मुफ्त गेहूं का वितरण शुरू किया था। इससे सरकार के भंडार में गेहूं की मात्रा कम हुई। फिर 2022 और 2023 में गेहूं उत्पादन कम रहने से सरकार के भंडार की पूरी भरपाई नहीं हो सकी। 1 सितंबर 2023 को सरकार का गेहूं भंडार पिछले साल से 12 लाख टन ज्यादा, 260.4 लाख टन था लेकिन यह 10 साल के औसत से कम है। जकरा के मुताबिक गेहूं निर्यात पर प्रतिबंध के बावजूद भारत के घरेलू बाजार में गेहूं के दाम बढ़े। सितंबर 2023 में दाम 8 महीने के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गए थे। जकरा ने अनुमान जताया है कि गेहूं निर्यात पर प्रतिबंध शायद अगले साल आम चुनाव के बाद ही खत्म होंगे।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">भारत के कंज्यूमर प्राइस बास्केट में खाद्य महंगाई का हिस्सा लगभग आधा है और सितंबर में इसमें 6.56 प्रतिशत की वृद्धि हुई। अगस्त में इसमें 9.94 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। हालांकि गिरावट के बावजूद सितंबर की महंगई रिजर्व बैंक की 6% की ऊपरी सीमा से अधिक है।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">जकरा का कहना है कि बीते कुछ वर्षों के दौरान बीज के नए किस्म के प्रयोग से भारतीय गेहूं की क्वालिटी में सुधार आया है। उनका कहना है कि बीज की क्वालिटी, खेती के बेहतर तरीकों और मशीनों के प्रयोग से भारत के गेहूं में प्रोटीन की 12% से 13% मात्रा अब आम हो गई है।</span></p>
<p><strong>प्रतिबंध से भारत से 70 से 80 लाख टन चावल का निर्यात प्रभावित</strong></p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/11/image_750x_654fb050679ed.jpg" alt="" /></p>
<p><span style="font-weight: 400;">विश्व गेहूं व्यापार में भारत कभी बड़ा खिलाड़ी नहीं रहा, लेकिन चावल के निर्यात में यह शीर्ष पर है। हाल तक भारत दुनिया का 40 प्रतिशत चावल निर्यात करता था। लेकिन इसके दामों में वृद्धि के बाद भारत सरकार ने गैर बासमती चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया और पारबॉयल्ड चावल के निर्यात पर 20% की ड्यूटी लगा दी। इस प्रतिबंध से भारत से 70 से 80 लाख टन चावल का निर्यात प्रभावित हुआ है। यह विश्व के कुल चावल ट्रेड का लगभग 15% है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">वर्ल्ड क्रेन पत्रिका ने लिखा है कि बांग्लादेश, श्रीलंका, संयुक्त अरब अमीरात, यमन और फिलीपींस जैसे कई देश गेहूं के लिए भारत पर निर्भर रहे हैं। अगस्त में भारत से चावल निर्यात पर प्रतिबंध की घोषणा के बाद विश्व बाजार में इसके दाम बढ़े हैं। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) का राइस प्राइस इंडेक्स सितंबर में अगस्त की तुलना में सितंबर में 0.5% कम हुआ लेकिन सितंबर 2022 की तुलना में यह 28% ज्यादा है।</span></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ गेहूं निर्यात पर रोक अगले साल आम चुनाव के बाद ही हटने के आसारः वर्ल्ड ग्रेन ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[वैश्विक कृषि खाद्य प्रणालियों की छिपी हुई लागत सालाना 10 ट्रिलियन डॉलर: एफएओ]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/hidden-costs-of-global-agrifood-systems-worth-at-least-10-trillion-dollar-said-fao-report.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 07 Nov 2023 14:51:41 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/hidden-costs-of-global-agrifood-systems-worth-at-least-10-trillion-dollar-said-fao-report.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>मौजूदा वैश्विक कृषि खाद्य प्रणालियां छिपी हुई लागत के रूप में स्वास्थ्य, पर्यावरण और समाज पर भारी-भरकम राशि थोपती हैं। यह सालाना करीब 10 ट्रिलियन डॉलर के करीब है जो ग्लोबल जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) का लगभग 10 फीसदी है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) द्वारा किए गए एक विश्लेषण में यह जानकारी दी गई है। अपनी तरह के इस नए विश्लेषण में एफएओ ने 154 देशों को शामिल किया है।</p>
<p>द स्टेट ऑफ फूड एंड एग्रीकल्चर (एसओएफए) के 2023 संस्करण के मुताबिक, सबसे बड़ी छिपी हुई लागत (70 फीसदी से अधिक) अस्वस्थ्यकर आहार, अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों, वसा और शुगर वाले उत्पादों पर लगाए जाते हैं जिससे मोटापा और गैर-संचारी रोग होते हैं। ये खाद्य उत्पाद श्रम उत्पादकता में नुकसान के कारण हैं। ऐसे नुकसान विशेष रूप से उच्च और उच्च-मध्यम आय वाले देशों में अधिक हैं।</p>
<p>एफएओ की रिपोर्ट में कहा गया है कि कुल लागत का पांचवां हिस्सा पर्यावरण से संबंधित है, जिसमें ग्रीनहाउस गैस और नाइट्रोजन उत्सर्जन, भूमि-उपयोग परिवर्तन और पानी का उपयोग शामिल है। यह ऐसी समस्या है जो सभी देशों को प्रभावित करती है। सीमित डाटा के कारण संभवतः इसके पैमाने को कम करके आंका गया है।</p>
<p>निम्न-आय वाले देश कृषि खाद्य प्रणालियों की छिपी हुई लागतों से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं, जो उनके जीडीपी के एक चौथाई से अधिक है। वहीं मध्यम-आय वाले देशों में यह 12 फीसदी से कम और उच्च-आय वाले देशों में 8 फीसदी से कम है। कम आय वाले देशों में गरीबी और कुपोषण से जुड़ी हुई छिपी लागत सबसे महत्वपूर्ण है।</p>
<p>कृषि खाद्य प्रणालियों की छिपी हुई लागत को मापने के लिए एफएओ ने समान अनुमान तैयार करने के अन्य प्रयास भी किए हैं। हालांकि, यह रिपोर्ट इन लागतों को राष्ट्रीय स्तर पर अलग-अलग करने और यह सुनिश्चित करने वाली पहली रिपोर्ट है कि लागत श्रेणियों और देशों के बीच यह तुलनीय हो।</p>
<p>एफएओ पहली बार द स्टेट ऑफ फूड एंड एग्रीकल्चर के लगातार दो संस्करण को एक ही विषय पर समर्पित करेगा। इस वर्ष की रिपोर्ट में प्रारंभिक अनुमान लगाया गया है, जबकि अगले वर्ष की रिपोर्ट उन्हें कम करने के सर्वोत्तम तरीकों की पहचान करने के लिए लक्षित आकलन पर गहराई से ध्यान केंद्रित करेगी। कृषि खाद्य प्रणालियों को समायोजित करने और समग्र रूप से बेहतर परिणाम लाने के लिए सरकारें विभिन्न लकीरें खींच सकती हैं जिनमें टैक्स, सब्सिडी, कानून और विनियमन शामिल हैं।</p>
<p>एफएओ के डायरेक्टर जनरल क्यूयू डोंग्यू ने इस रिपोर्ट पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा, "बढ़ती वैश्विक चुनौतियों के सामने भोजन की उपलब्धता, भोजन की पहुंच और किफायती भोजन, जलवायु संकट, जैव विविधता हानि, आर्थिक मंदी और सुस्ती, &nbsp;बढ़ती गरीबी और अन्य व्यापक संकटों में हमारी कृषि खाद्य प्रणालियों का भविष्य सभी खाद्य उत्पादकों (बड़े-छोटे) की सराहना करन, इन वास्तविक लागतों को स्वीकार करने और यह समझने की हमारी इच्छा पर निर्भर करता है कि हम सभी उनमें कैसे योगदान करते हैं और हमें क्या कार्रवाई करने की आवश्यकता है। मुझे उम्मीद है कि यह रिपोर्ट नीति निर्माताओं और निजी क्षेत्रों से लेकर शोधकर्ताओं और उपभोक्ताओं तक सभी भागीदारों के लिए कार्रवाई के आह्वान के रूप में काम करेगी और सभी की भलाई के लिए हमारे कृषि खाद्य प्रणालियों को बदलने के लिए सामूहिक प्रतिबद्धता को प्रेरित करेगी।"</p>
<p>इस रिपोर्ट में दुनिया भर की सरकारों से जलवायु संकट, गरीबी, असमानता और खाद्य सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कृषि खाद्य प्रणालियों को बदलने के लिए वास्तविक लागत लगाने का अनुरोध किया गया है। इसमें कहा गया है कि लागत को वास्तविक स्तर पर रखने के लिए अनुसंधान और डाटा में नवाचारों के साथ-साथ डाटा संग्रह और क्षमता निर्माण में निवेश की आवश्यकता होगी, ताकि पारदर्शी और सुसंगत तरीके से निर्णय लेने की जानकारी दी जा सके।</p>
<p>&nbsp;</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/11/image_750x500_654a018b30923.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ वैश्विक कृषि खाद्य प्रणालियों की छिपी हुई लागत सालाना 10 ट्रिलियन डॉलर: एफएओ ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/11/image_750x500_654a018b30923.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[ग्लोबल मार्केट में गेहूं&amp;#45;चावल के दाम घटे, लेकिन चीनी एक साल पहले की तुलना में 47% महंगी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/international-quotations-for-rice-wheat-and-palm-oil-decline-but-sugar-price-is-47-percent-higher.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 04 Nov 2023 11:33:21 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/international-quotations-for-rice-wheat-and-palm-oil-decline-but-sugar-price-is-47-percent-higher.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">चावल, गेहूं और पाम ऑयल की कीमतों में कमी के चलते अक्टूबर में वर्ल्ड फूड प्राइस इंडेक्स में थोड़ी गिरावट आई है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) की तरफ से जारी मासिक बुलेटिन में कहा गया है कि वर्ल्ड फूड कमोडिटी प्राइस इंडेक्स अक्टूबर में 120.6 अंक पर था। यह सितंबर 2023 की तुलना में 0.5 प्रतिशत कम है। अक्टूबर 2022 से तुलना करें तो इसमें 10.9 प्रतिशत की गिरावट आई है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अनाज की कीमतों का इंडेक्स सितंबर 2023 की तुलना में एक प्रतिशत कम हुआ है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में चावल की कीमतों में दो प्रतिशत की कमी आई है। विश्व स्तर पर चावल की मांग में कमी आने के चलते दाम कम हुए हैं। गेहूं की कीमतों में 1.9 प्रतिशत की गिरावट आई है। अमेरिका से गेहूं की सप्लाई बढ़ने तथा निर्यातकों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ने के चलते ऐसा हुआ है। हालांकि मोटे अनाजों के इंडेक्स में मामूली बढ़ोतरी हुई है, खासकर मक्के की वजह से। अर्जेंटीना से इसकी सप्लाई घटने लगी है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">सितंबर के मुकाबले एफएओ का वनस्पति तेल प्राइस इंडेक्स 0.7 प्रतिशत और चीनी का 2.2 प्रतिशत कम हुआ है। वनस्पति तेलों के इंडेक्स में कमी पाम ऑयल के दाम घटने की वजह से आई है। सीजन में सप्लाई बढ़ने और आयात मांग कम रहने के कारण ऐसा हुआ है। हालांकि सोया, सनफ्लावर और रेपसीड तेल के दाम बढ़े हैं। चीनी की कीमतों का इंडेक्स सितंबर की तुलना में भले ही 2.2 प्रतिशत बढ़ा हो, लेकिन अक्टूबर 2022 की तुलना में 46.6 प्रतिशत ज्यादा है। ब्राज़ील में उत्पादन अच्छा होने के कारण पिछले महीने इसमें गिरावट आई है। हालांकि आने वाले महीनों में वैश्विक सप्लाई कम रहने के आसार बने हुए हैं। डेयरी प्राइस इंडेक्स पिछले महीने 2.2 प्रतिशत बढ़ा है। इसमें 9 महीने से लगातार गिरावट आ रही थी। आयात मांग बढ़ने के चलते मिल्क पाउडर के दाम बढ़े हैं।</span></p>
<p><strong>इस वर्ष 281.9 करोड़ टन अनाज उत्पादन का अनुमान</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">एफएओ ने अनाज की सप्लाई और डिमांड के भी आंकड़े जारी किए हैं। संगठन का अनुमान है कि मौजूदा वर्ष में 281.9 करोड़ टन अनाज का उत्पादन होगा जो अब तक का रिकॉर्ड है। हालांकि इसने देश और क्षेत्र के आधार पर उत्पादन अनुमान में कुछ बदलाव किए हैं। चीन और पश्चिमी अफ्रीका में मोटे अनाज का उत्पादन बढ़ने का अनुमान है तो अमेरिका और यूरोपियन यूनियन में गिरावट का अंदेशा है। इराक और अमेरिका के लिए गेहूं उत्पादन का अनुमान बढ़ाया गया है जबकि यूरोपियन यूनियन और कजाकिस्तान के लिए इसमें कमी की गई है। इस वर्ष चावल का उत्पादन पिछले साल की तुलना में थोड़ा अधिक रहने की संभावना है। इसमें भारत में बेहतर उत्पादन का योगदान रहेगा।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">2023-24 में अनाज की खपत 281 करोड़ टन रहने के आसार हैं। गेहूं और मोटे अनाज की खपत 2022-23 की तुलना में अधिक रहने जबकि चावल की पिछले सीजन के बराबर ही रहने की संभावना है। 2023-24 में अनाज का ग्लोबल ट्रेड 46.9 करोड़ टन का रहने की संभावना है। यह पिछले साल की तुलना में 1.6 प्रतिशत कम रहेगा।</span></p>
<p><strong>युद्ध से खाद्य असुरक्षा बढ़ने का खतरा</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">एफएओ ने कहा है कि युद्ध के कारण खाद्य असुरक्षा बढ़ रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य कमोडिटी के दाम भले ही कम हुए हों लेकिन ज्यादातर कम आय वाले देशों में इनकी वैल्यू गिरी है, जिससे उन्हें कमोडिटी के दाम घटने का फायदा नहीं मिल पाएगा। अफ्रीका के 33 देशों समेत दुनिया के 46 देश खाद्य पदार्थों के लिए बाहरी मदद पर निर्भर हैं। इसने कहा है कि गाजा पट्टी में आधे से ज्यादा लोग 2022 में ही गंभीर खाद्य असुरक्षा से जूझ रहे थे। अभी जो युद्ध चल रहा है उससे हालात और गंभीर होंगे। इससे लेबनान में भी खाद्य असुरक्षा की स्थिति खराब होगी।</span></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ ग्लोबल मार्केट में गेहूं-चावल के दाम घटे, लेकिन चीनी एक साल पहले की तुलना में 47% महंगी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[ब्रसेल्स में आयोजित हुआ प्लांट&amp;#45;बेस्ड फूड का अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन, भारत ने की शिरकत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/india-takes-stage-at-int’l-plant-based-foods-summit-in-brussels.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 17 Oct 2023 14:48:05 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/india-takes-stage-at-int’l-plant-based-foods-summit-in-brussels.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अंतरराष्ट्रीय प्लांट-आधारित फूड्स वर्किंग ग्रुप (आईपीबीएफडब्ल्यूजी) के दूसरे शिखर सम्मेलन में वैश्विक प्लांट-आधारित खाद्य उद्योग के सामने आने वाली गंभीर चुनौतियों का समाधान करने पर चर्चा हुई। "एक सतत खाद्य प्रणाली में परिवर्तन में पादप खाद्य पदार्थों की भूमिका" विषय पर बेल्जियम की राजधानी ब्रुसेल्स में 12-13 अक्टूबर को इस सम्मेलन का आयोजन किया गया।</p>
<p>इस सम्मेलन में दुनिया भर से आए उद्योग के प्रतिनिधियों ने नई रणनीतियों का पता लगाने, अंतर्दृष्टि साझा करने और उद्योग की आगे की राह पर चर्चा करने के लिए बैठक की। आईपीबीएफडब्ल्यूजी कई देशों का प्रतिनिधित्व करने वाले अंतरराष्ट्रीय प्लांट-आधारित व्यापार संघों का एक संगठन है। प्लांट बेस्ड फूड्स इंडस्ट्री एसोसिएशन (पीबीएफआईए), भारत से संजय सेठी, प्लांट बेस्ड फूड्स एसोसिएशन (यूएसए) से राचेल ड्रेस्किन, यूरोपियन प्लांट बेस्ड फूड एलायंस से सिस्का पोटी, यूरोपियन प्लांट-बेस्ड फूड्स एसोसिएशन से मिशेला बिसोनी, प्लांट बेस्ड फूड्स कनाडा से लेस्ली इविंग, चाइना प्लांट बेस्ड फूड्स एसोसिएशन से लैरी ली, प्लांट बेस्ड फ़ूड एलायंस यूके से मारिसा हीथ, ऑस्ट्रेलेशियन प्लांट बेस्ड एसोसिएशन से ब्रूस मैकइंटायर, मैक्सिकन एसोसिएशन ऑफ वेगन एंटरप्रेन्योर्स से रोशियो कैवाज़ोस, टर्की प्लांट बेस्ड फूड्स एसोसिएशन से एब्रू अकदाग, साउथ अफ्रीका प्लांट बेस्ड फूड्स एसोसिएशन से डोनोवन विल स्वस्थ, अधिक टिकाऊ और लचीली खाद्य प्रणाली को बढ़ावा देने के लिए समर्पित हैं।</p>
<p>पीबीएफआईए के कार्यकारी निदेशक संजय सेठी ने उद्योग की चुनौतियों से निपटने के लिए दूरदर्शी पहल और दूरदर्शी योजनाओं के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा, "प्लांट-प्रोटीन क्लस्टर घटक उत्पादन और सोर्सिंग को बढ़ाने के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीति है। दुनिया के देशों को नवाचार को बढ़ावा देने के लिए दुनिया भर के वैज्ञानिकों के बीच वर्चुअल कनेक्शन विकसित करने की आवश्यकता पर जोर देते हुए उत्कृष्टता केंद्रों के निर्माण को भी प्राथमिकता देनी चाहिए।" उन्होंने चुनौतियों से निपटने के लिए संवाद स्थापित करने में मदद करने के लिए डेयरी क्षेत्र के साथ चर्चा की सुविधा प्रदान करने के लिए नेस्ले के मार्जोलिजन निगेब्रुगे से अपील की। उन्होंने बताया कि पीबीएफआईए ने बातचीत शुरू करने और समानांतर उद्योग के बीच संबंधों को बढ़ावा देने के लिए पिछले महीने एक मंच पर भारतीय डेयरी एसोसिएशन के अध्यक्ष को आमंत्रित किया था।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/10/image_750x_652e51297ee2d.jpg" alt="" /></p>
<p>इस कार्यक्रम में उद्योग के प्रतिनिधियों ने दुनिया भर में पौधे आधारित खाद्य पदार्थों से संबंधित नामकरण, सुदृढ़ीकरण और बाजार विकास रणनीतियों की आवश्यकता जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा करने की। ओटली के सस्टेनेबल ईटिंग एंड पब्लिक अफेयर्स के डायरेक्टर सेसिलिया मैकलेवी, अपफील्ड के वरिष्ठ वैश्विक नीति प्रमुख पेरन हेरी, जीएफआई यूरोप के वरिष्ठ नीति प्रबंधक एलेक्स होल्स्ट, नेस्ले और अन्य कंपनियों के प्रतिनिधि चर्चा में शामिल हुए।</p>
<p>पौधा-आधारित खाद्य उद्योग नवाचार से भरपूर है मगर कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। इन चुनौतियों में पूंजी से जुड़े एक जटिल नियामक ढांचे का नेविगेशन, लेबलिंग और नामकरण पर प्रतिबंध अक्सर सहयोगी सरकारी प्रणालियों की कमी के कारण बढ़ जाते हैं। एसोसिएशन द्वारा मान्यता प्राप्त मुख्य जिम्मेदारियों में से एक ऐसे माहौल को बढ़ावा देना है जो रोजगार के अवसरों को बढ़ावा देते हुए स्टार्टअप को इस क्षेत्र में स्थापित निगमों के समान सफलता के स्तर तक चढ़ने के लिए सशक्त बनाता है। ये एसोसिएशन प्रतिबंधात्मक लेबलिंग कानूनों से पौधे-आधारित खाद्य पदार्थों की रक्षा करने की दिशा में काम करते हैं और बाजार रणनीतियों और भविष्य की योजना के साथ सदस्य कंपनियों का समर्थन करते हैं।</p>
<p>इस शिखर सम्मेलन में यूरोपीय आयोग के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकारों के समूह के सदस्य और स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एरिक लैंबिन मुख्य वक्ताओं में शामिल थे। उनके अलावा यूरोपीय आयोग के डायरेक्टर जनरल (रिसर्च एंड इनोवेशन। सिंडी शूमाकर, बायोइकोनॉमी एंड फूड सिस्टम्स यूनिट में नीति अधिकारी और प्रोवेग इंटरनेशनल के ग्लोबल सीईओ जैसमिजन डी बू और कई अन्य वक्ता शामिल थे।</p>
<p>आईपीबीएफडब्ल्यूजी शिखर सम्मेलन का उद्देश्य पौधे-आधारित खाद्य आंदोलन और उसके सदस्यों के सामने आने वाली वर्तमान और भविष्य की चुनौतियों के समाधान की पहचान करना है। शिखर सम्मेलन में लेबलिंग नियमों को नेविगेट करने से लेकर संयंत्र-आधारित खाद्य क्षेत्र में उपभोक्ता अपेक्षाओं को पूरा करने तक कई विषयों पर चर्चा हुई। विचार-मंथन सत्रों में उन अवसरों और चुनौतियों को उजागर करने की कोशिश की गई, जिन्हें पौधे-आधारित खाद्य व्यापार संघों को सामूहिक रूप से संबोधित करना चाहिए।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ ब्रसेल्स में आयोजित हुआ प्लांट-बेस्ड फूड का अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन, भारत ने की शिरकत ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[रूस को ब्लैक सी ग्रेन इनीशिएटिव से हटने का फायदा, अगस्त में अनाज निर्यात 27% बढ़ा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/in-absence-of-black-sea-grain-initiative-russian-grain-exports-are-nearing-record-highs.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 15 Oct 2023 11:21:05 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/in-absence-of-black-sea-grain-initiative-russian-grain-exports-are-nearing-record-highs.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">ब्लैक सी यानी काला सागर क्षेत्र में सुरक्षित निर्यात को लेकर बढ़ी चिंता और आर्थिक प्रतिबंधों के दबाव के बावजूद रूस से अनाज निर्यात रिकॉर्ड स्तर के करीब है। वर्ल्ड ग्रेन ने अपने अक्टूबर माह के अंक में बताया है कि 1 अगस्त से 27 अगस्त तक रूस ने 64 लाख टन अनाज का निर्यात किया है। यह एक साल पहले की तुलना में 27 प्रतिशत ज्यादा है। रशियन ग्रेन यूनियन के हवाले से इसने लिखा है कि इसमें गेहूं का निर्यात 29 प्रतिशत बढ़कर 53 लाख टन, जौ का 15% बढ़कर 9.1 लाख टन और मक्के का 60% बढ़कर 1.66 लाख टन पहुंच गया है। रूस ने 17 जुलाई को ब्लैक सी ग्रीन इनीशिएटिव को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया था। उसके बाद मध्य पूर्व, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका से उसके अनाज की मांग काफी बढ़ गई है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">रिपोर्ट के अनुसार पिछले एक साल में निर्यात का भूगोल काफी बदला है। उदाहरण के लिए रूस से अनाज खरीदने में दूसरे स्थान पर रहने वाले अल्जीरिया ने आयात की मात्रा 6 गुना बढ़ाकर 5.18 लाख टन कर दी है। अफ्रीका में केन्या ने रूस से अनाज का आयात 9 गुना बढ़ा दिया है। उसने 3.2 लाख टन अनाज का आयात रूस से किया है। सूडान का आयात 150 प्रतिशत बढ़कर 1.8 लाख टन हो गया है। लैटिन अमेरिका को भी रूस से अनाज का निर्यात बढ़ा है। अगस्त 2023 में रूस ने ब्राजील को 2.24 लाख टन, मेक्सिको को 1.25 लाख टन, वेनेजुएला को 59 हजार टन और पेरू को 55000 टन अनाज का निर्यात किया। लैटिन अमेरिका के इन देशों ने अगस्त 2022 में रूस से अनाज का कोई आयात नहीं किया था।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">दक्षिण पूर्व एशिया में भी रूस के अनाज की मांग बढ़ी है। अगस्त 2023 में रूस से बांग्लादेश को अनाज निर्यात 47 गुना बढ़कर 2.63 लाख टन हो गया। इंडोनेशिया ने अगस्त 22 में रूस से बहुत थोड़ी मात्रा मे अनाज खरीदा था, लेकिन इस वर्ष अगस्त में उसने 1.33 लाख टन की खरीद की है। मांग बढ़ने से रूस के अनाज की कीमतें भी बढ़ी हैं। वर्ल्ड ग्रेन के अनुसार अगस्त 2023 में रूस से औसतन 250 डॉलर प्रतिटन के भाव पर अनाज का निर्यात किया गया।</span></p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/10/image_750x_652a62bf53e2b.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>स्रोतः </strong>वर्ल्ड ग्रेन, अक्टूबर 2023</p>
<p><strong></strong></p>
<p><strong>रूसी निर्यातक ब्लैक सी इनीशिएटिव खत्म होने से खुश</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">रूस के अनाज उद्योग ने ब्लैक सी ग्रीन इनीशिएटिव खत्म होने का स्वागत किया है। उसका कहना है कि इसकी वजह से उन्हें डिस्काउंट पर निर्यात करना पड़ रहा था, जिससे निर्यातकों को नुकसान हो रहा था। यह डिस्काउंट आमतौर पर 10 से 20 डॉलर प्रतिटन होता था लेकिन यह बीच में 70 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गया था। एक कारोबारी के हवाले से वर्ल्ड ग्रेन ने लिखा है, &ldquo;हमने विश्व अनाज बाजार में 2002 में प्रवेश किया। इस तरह के डिस्काउंट से मुक्ति पाने के लिए हम 10 वर्षों तक लड़ते रहे। तब हमें ग्लोबल औसत कीमत की तुलना में 10 डॉलर का डिस्काउंट देना पड़ता था।&rdquo; पिछले साल रूस ने लगभग 90% अनाज का निर्यात ब्लैक सी ग्रीन इनिशिएटिव के तहत किया था।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">हालांकि ब्लैक सी ग्रीन इनीशिएटिव खत्म होने से रूसी अनाज निर्यातकों के लिए ढुलाई और बीमा का खर्च बढ़ गया है, क्योंकि जहाजों पर ड्रोन से हमले का खतरा है। रूस को निर्यात के लिए पश्चिमी देशों से जहाज भी नहीं मिल रहे हैं। अब वह अपने पुराने जहाजों के जरिए निर्यात कर रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि विदेशी जहाजों की गैर मौजूदगी में रूस को 60000 टन क्षमता वाले 34 जहाजों और 40000 टन क्षमता वाले 27 जहाजों की जरूरत पड़ेगी। रूस के शिपयार्ड में नए जहाजों का निर्माण भी चल रहा है, लेकिन उनसे तत्काल समस्या का समाधान नहीं होगा।</span></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/10/image_750x500_652a6033bd019.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ रूस को ब्लैक सी ग्रेन इनीशिएटिव से हटने का फायदा, अगस्त में अनाज निर्यात 27% बढ़ा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[आपदाओं से 30 वर्षों में दुनियाभर में 31 लाख अरब रुपये से अधिक के फसलों का हुआ नुकसान, भारतीय अर्थव्यवस्था से भी है ज्यादा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/disasters-cause-crop-loss-totalling-3-point-8-trillion-dollar-in-over-30-years-said-fao-report.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 14 Oct 2023 06:53:25 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/disasters-cause-crop-loss-totalling-3-point-8-trillion-dollar-in-over-30-years-said-fao-report.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>प्राकृतिक और मानव निर्मित आपदाओं के कारण पूरी दुनिया में पिछले 30 वर्षों में 3.8 ट्रिलियन डॉलर (करीब 31.6 लाख अरब रुपये) की फसल और पशुधन का नुकसान हुआ है। यह लगभग भारतीय अर्थव्यवस्था के बराबर है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) ने शुक्रवार को जारी एक रिपोर्ट में यह जानकारी दी है। फसलों और पशुधन के नुकसान की जानकारी वाली यह रिपोर्ट एफएओ द्वारा पहली बार जारी की गई है। भारतीय अर्थव्यस्था का आकार मौजूदा समय में 3 ट्रिलियन डॉलर से कुछ ज्यादा है।</p>
<p>एफएओ की रिपोर्ट में कहा गया है कि बाढ़, सूखा, कीट संक्रमण, तूफान, बीमारी और युद्ध के कारण 1991 और 2021 के बीच खाद्य उत्पादन में सालाना लगभग 123 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है। यह कुल उत्पादन के पांच फीसदी के बराबर है जो सालाना 50 करोड़ लोगों को खिलाने के लिए पर्याप्त है। यह पहली बार है कि संयुक्त राष्ट्र के इस संगठन ने वैश्विक और व्यक्तिगत दोनों स्तरों पर आपदाओं से होने वाले नुकसान को ध्यान में रखते हुए इस तरह के अनुमान को संकलित करने का प्रयास किया है।</p>
<p>एफएओ के सांख्यिकी विभाग के उप प्रमुख पिएरो कॉनफोर्टी ने कहा, "अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस तथ्य का जायजा ले रहा है कि 1970 के दशक के बाद से आपदाएं बहुत तेजी से बढ़ रही हैं और खाद्य उत्पादन पर इसका असर बढ़ रहा है।"</p>
<p>एफएओ ने पाया है कि आपदाओं की गंभीरता के साथ-साथ उनके आने की फ्रीक्वेंसी बढ़ रही हैं। 1970 के दशक में जहां सालाना 100 आपदाएं आती थीं, वहीं पिछले 20 वर्षों में सालाना लगभग 400 आपदाएं आती हैं। जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ मानव और पशुधन संबंधी बीमारियां भी इस तेजी के लिए जिम्मेदार हैं।</p>
<p>एफएओ ने कहा, "बाढ़, पानी की कमी, सूखा, कृषि उपज और मत्स्य संसाधनों में गिरावट, जैविक विविधता की हानि और पर्यावरणीय गिरावट जैसे कई खतरों के कारण दुनिया भर में कृषि बाधित होने का खतरा बढ़ रहा है।" एफएओ ने जलवायु परिवर्तन, महामारियों और सशस्त्र संघर्षों के रूप में "आपदा जोखिम के प्रणालीगत चालकों" की पहचान की। इससे नुकसान तेजी से बढ़ता है।</p>
<p>रिपोर्ट में कहा गया है कि अनाजों का औसत नुकसान सालाना 6.9 करोड़ टन तक पहुंच गया है जो फ्रांस के वार्षिक उत्पादन के बराबर है। लगभग 4 करोड़ टन फल और सब्जी उत्पादन और 1.6 करोड़ टन मांस, मछली और अंडे का नुकसान होता है। विभिन्न आपदाओं के कारण कृषि क्षेत्र को लगभग 23 फीसदी हानि हुई।</p>
<p>एफएओ ने पाया है कि गरीब देशों को अपने कृषि उत्पादन के संदर्भ में चरम घटनाओं के कारण सबसे अधिक नुकसान हुआ जो 10 फीसदी तक था। इस मामले में एशिया सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र है जहां आपदाओं के कारण कुल कृषि हानि का 45 फीसदी नुकसान होता है और इसके कृषि उत्पादन के चार प्रतिशत के बराबर नुकसान होता है। अफ्रीकी देश जो नियमित रूप से सूखे से प्रभावित होते हैं, उनकी फसल उत्पादन में औसतन 15 फीसदी की हानि हुई है।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/10/image_750x500_652936b5e76b4.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ आपदाओं से 30 वर्षों में दुनियाभर में 31 लाख अरब रुपये से अधिक के फसलों का हुआ नुकसान, भारतीय अर्थव्यवस्था से भी है ज्यादा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/10/image_750x500_652936b5e76b4.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[विकासशील देशों में महंगे हो गए बुनियादी खाद्य उत्पाद: अंकटाड]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/basic-staple-food-products-become-costlier-in-developing-nations-unctad-report.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 09 Oct 2023 06:28:45 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/basic-staple-food-products-become-costlier-in-developing-nations-unctad-report.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>खाद्य पदार्थों की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में हालिया बढ़ोतरी का सबसे ज्यादा असर विकासशील देशों पर पड़ा है। संयुक्त राष्ट्र के संगठन अंकटाड (संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन) की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने से पहले ही अंतरराष्ट्रीय खाद्य कीमतें ऐतिहासिक ऊंचाई पर पहुंच गई थीं। इससे खाद्य आयात बिल में नाटकीय रूप से वृद्धि हुई, लागत में लगभग दो तिहाई वृद्धि विकासशील देशों में केंद्रित थी।</p>
<p>रिपोर्ट में कहा गया है कि यूक्रेन युद्ध की शुरुआत के चलते अंतरराष्ट्रीय खाद्य कीमतों में और बढ़ोतरी के कारण कई विकासशील देशों को सबसे बुनियादी मुख्य खाद्य उत्पादों के लिए ऊंची कीमतें चुकीनी पड़ी। इसके अलावा, यूक्रेन और रूस से अनाज, विशेष रूप से गेहूं, मक्का और सूरजमुखी की आपूर्ति और परिवहन में व्यवधान का प्रभाव अफ्रीकी और मध्य पूर्वी देशों के लिए काफी गंभीर साबित हुआ। अफ्रीकी और मध्य पूर्वी देश अपनी बुनियादी खाद्य जरूरतों को पूरा करने के लिए यूक्रेन और रूस पर निर्भर हैं।</p>
<p>हालांकि इनमें से कई खाद्य उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय कीमतें मई 2023 तक पिछले 12 महीनों में कम हो गई हैं। गेहूं, मक्का और सूरजमुखी तेल की कीमतों में क्रमशः 25, 21, और 51 फीसदी की गिरावट आई है। काला सागर समझौता और दक्षिण अमेरिका एवं अन्य उत्पादक देशों से आपूर्ति में वृद्धि का भी इसमें योगदान है। फिर भी अंतरराष्ट्रीय खाद्य कीमतें ऐतिहासिक रूप से उच्च स्तर पर बनी हुई हैं और अंतरराष्ट्रीय कीमतों में कमी का असर घरेलू कीमतों पर बहुत पड़ा है। वास्तव में कई विकासशील देशों में जून 2023 में बुनियादी खाद्य पदार्थों की घरेलू कीमतें पिछले वर्ष के स्तर से ऊपर रहीं और खाद्य सुरक्षा पर दबाव बना रहा।</p>
<p>जिन कारकों ने घरेलू कीमतों को ऊंचे स्तर पर बनाए रखा है उनमें उर्वरकों की ज्यादा लागत, प्रतिकूल मौसम, वितरण की ज्यादा लागत, कर्ज की मजबूती के साथ-साथ घरेलू मुद्रा की कमजोरियां शामिल हैं। खाद्य बाजारों का वित्तीयकरण और बड़े कमोडिटी व्यापारियों का मूल्य निर्धारण व्यवहार अन्य योगदान कारक रहे हैं। इसकी वजह दुनिया भर में लगभग 35 करोड़ लोग जिनमें उप-सहारा अफ्रीका के 10 करोड़ से अधिक लोग शामिल हैं, 2023 में उनकी खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ने का अनुमान है जो 2020 की संख्या से दोगुनी है।</p>
<p>दूसरी ओर, ऊंची खाद्य कीमतें देशों के भीतर आय वितरण पर भी प्रभाव डालती हैं। जहां उत्पादन अधिक पूंजी पर निर्भर है जैसा कि बड़े खेतों में होता है और जहां जमीन अधिक केंद्रित होती है जिसके लिए ज्यादा किराया देना होता है, जो अमीर व्यक्तियों और बड़े भूस्वामियों के पक्ष में होती हैं, वह खाद्य कीमतों को बढ़ावा देती हैं। इसके अलावा, जहां खाद्य आपूर्ति श्रृंखलाएं अत्यधिक केंद्रित हैं और छोटे किसानों के पास सौदेबाजी की कोई शक्ति नहीं है, वैश्विक स्तर पर खाद्य कीमतों में बढ़ोतरी पर खाद्य व्यापार, भंडारण, प्रसंस्करण और खुदरा कीमतों को नियंत्रित करने वाले बड़े निगमों द्वारा पूरी तरह से कब्जा किया जा सकता है।</p>
<p>रिपोर्ट में कहा गया है कि 1990-2020 की अवधि के 126 देशों (82 विकासशील और 44 विकसित) के डाटा के विश्लेषण से पता चला है कि खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतें विकासशील देशों में बढ़ती असमानता से जुड़ी हैं, जबकि विकसित देशों में प्रभाव सांख्यिकीय रूप से महत्वहीन पाया गया। यह खाद्य पदार्थों के उत्पादकों और उपभोक्ताओं दोनों को सुरक्षा प्रदान करने में सरकारी नीतियों द्वारा निभाई गई भूमिका के महत्व पर प्रकाश डालता है। उदाहरण के लिए, संयुक्त राज्य अमेरिका उपभोक्ताओं की सुरक्षा के लिए पूरक पोषण सहायता कार्यक्रम (एसएनएपी) लागू करता है जिसे पहले फूड स्टैम्प कार्यक्रम के रूप में जाना जाता था और संघीय फसल बीमा कार्यक्रम किसानों की आय को आपदाओं या कम कीमतों के कारण होने वाले नुकसान से बचाता है। कोविड-19 और यूक्रेन युद्ध ने खाद्य कीमतों में अस्थिरता को तेज कर दिया है और वैश्विक खाद्य असुरक्षा बढ़ गई है।</p>
<p>अंकटाड के मुताबिक, स्थानीय संघर्षों और राष्ट्रीय आर्थिक संकटों के साथ-साथ इस वृद्धि का मुख्य कारण स्पष्ट रूप से जलवायु परिवर्तन के रूप में पहचाना गया है। आम तौर पर तेजी से बदलती जलवायु, राजनीतिक उथल-पुथल और व्यापक आर्थिक झटकों के साथ-साथ कमोडिटी व्यापारियों के सट्टा व्यवहार ने खाद्य बाजारों में और अधिक अस्थिरता और अनिश्चितता पैदा कर दी है। चूंकि अंतर्राष्ट्रीय तनाव बना हुआ है और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव तेजी से स्पष्ट हो रहे हैं, खाद्य असुरक्षा में अपेक्षित वृद्धि का मुकाबला करने के लिए तत्काल उपायों की आवश्यकता है जो पहले से ही बढ़ती गरीबी और असमानता में योगदान दे रही है, खासकर विकासशील देशों में।</p>
<p>कमजोर परिवारों को खाद्य कीमतों में वृद्धि से बचाने और किसानों को अंतरराष्ट्रीय खाद्य मूल्य अस्थिरता से बचाने के लिए पुनर्वितरण सामाजिक कार्यक्रमों को मजबूत करने की तत्काल आवश्यकता है। हालांकि, रिपोर्ट में कहा गया है कि कृषि पर डब्ल्यूटीओ समझौते के कुछ प्रावधानों की वजह से नीतिगत फैसले लेने पर गंभीर रूप से पाबंदी है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ विकासशील देशों में महंगे हो गए बुनियादी खाद्य उत्पाद: अंकटाड ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[चीनी के अंतरराष्ट्रीय दाम 13 साल की ऊंचाई पर, लेकिन गेहूं&amp;#45;चावल और खाद्य तेलों में गिरावट]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/sugar-prices-at-13-year-high-in-global-market-but-wheat-rice-and-vegetable-oil-prices-come-down.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 08 Oct 2023 06:42:21 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/sugar-prices-at-13-year-high-in-global-market-but-wheat-rice-and-vegetable-oil-prices-come-down.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">अंतरराष्ट्रीय बाजार में सितंबर में खाद्य तेलों, डेयरी और मीट के दाम में कमी आई है, लेकिन चीनी और मक्का के दाम बढ़ गए। चीनी के दाम नवंबर 2010 के बाद सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गए हैं। हालांकि गेहूं और चावल के दामों में गिरावट का रुख रहा। कुछ खाद्य कमोडिटी की कीमतों में वृद्धि और कुछ में गिरावट के चलते खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) का फूड प्राइस इंडेक्स पिछले महीने स्थिर रहा। अगस्त के 121.4 अंकों की तुलना में सितंबर में यह इंडेक्स 121.5 रहा। यह सितंबर 2022 से 10.7% कम होने के साथ मार्च 2022 के सर्वोच्च स्तर से 24% नीचे है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">एफएओ के अनुसार चीनी के दाम अगस्त की तुलना में 9.8 प्रतिशत बढ़े हैं। इसका इंडेक्स नवंबर 2010 के बाद सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है। आने वाले सीजन में ग्लोबल सप्लाई कम रहने की आशंका के चलते इस कमोडिटी के दाम बढ़ रहे हैं। शुरुआती अनुमानों के अनुसार भारत और थाईलैंड में इस साल उत्पादन घटने का अंदेशा है। इन दोनों प्रमुख उत्पादक देशों में अल नीनो के कारण उत्पादन प्रभावित हुआ है। हालांकि ब्राजील में अभी गन्ना कटाई चल रही है और मौसम भी अनुकूल बना हुआ है, वर्ना दाम और बढ़ सकते थे।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">एफएओ के अनुसार बीते माह अंतरराष्ट्रीय बाजार में मक्का के दाम 7 प्रतिशत बढ़ने के कारण अनाज मूल्य सूचकांक 1.0 प्रतिशत बढ़ा है। मक्का के दाम में बढ़ोतरी ब्राजील में मांग बढ़ने, अर्जेंटीना में किसानों की तरफ से कम बिक्री किए जाने और माल भाड़े में वृद्धि के कारण हुई। अमेरिका की मिसीसिपी नदी में पानी का स्तर कम होने के कारण वहां किराया बढ़ा है। मक्का के विपरीत गेहूं के दाम 1.6 प्रतिशत गिर गए। ऐसा आपूर्ति बढ़ने और रूस में इस साल अच्छे उत्पादन की उम्मीदों के चलते हुआ है। आयात मांग कम रहने के चलते एफएओ के चावल मूल्य सूचकांक में भी 0.5 प्रतिशत की कमी आई है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अगस्त की तुलना में वनस्पति तेलों का मूल्य सूचकांक सितंबर में 3.9 प्रतिशत नीचे आया है। वनस्पति तेलों में पाम, सूरजमुखी, सोया और रेपसीड- सबकी कीमतों में कमी आई। उत्पादन का सीजन होने के कारण ग्लोबल स्तर पर इनकी सप्लाई बढ़ी है। एफएओ के मुताबिक डेयरी प्राइस इंडेक्स अगस्त की तुलना में 2.3 प्रतिशत कम हुआ है। इसमें लगातार नौवें महीने गिरावट आई है। वैश्विक आयात मांग कम रहने और यूरोप के प्रमुख उत्पादक देशों में पर्याप्त स्टॉक के चलते इसके दाम कम हुए हैं। अमेरिकी डॉलर की तुलना में यूरो कमजोर होने का भी असर पड़ा है। कमजोर मांग के चलते मीट प्राइस इंडेक्स भी 0.1 प्रतिशत कम रहा।</span></p>
<p><strong>अनाज का रिकॉर्ड स्टॉक रहने की संभावना</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">एफएओ ने 2023 में विश्व अनाज उत्पादन के अनुमान में बढ़ोतरी की है। इसका कहना है कि इस वर्ष 281.9 करोड़ टन अनाज उत्पादन होगा। यह पिछले साल से 0.9 प्रतिशत अधिक रहेगा। पिछले अनुमानों की तुलना में रूस और यूक्रेन में उत्पादन बेहतर रहने के आसार हैं। वहां मौसम भी अनुकूल है। हालांकि कनाडा में खेती वाले प्रमुख इलाकों में मौसम लगातार शुष्क रहने से वहां उत्पादन में गिरावट की आशंका है। एफएओ ने वैश्विक गेहूं उत्पादन 78.5 करोड़ टन, मोटे अनाज का उत्पादन 151.1 करोड़ टन और चावल का उत्पादन 52.3 करोड़ टन रहने का अनुमान जताया है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">खपत के संशोधित अनुमान में कटौती की गई है, फिर भी 2023-24 में 280.4 करोड़ टन खपत होगी। इसमें पिछले साल से 0.8 फीसदी वृद्धि के आसार हैं। खाने में गेहूं की मांग बढ़ेगी, लेकिन चावल की मांग खाने के अलावा दूसरे कामों में भी निकलेगी। इसकी कुल 52 करोड़ टन खपत होने की उम्मीद है।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">2024 के सीजन के अंत में विश्व अनाज स्टॉक 88.4 करोड़ रहने का अनुमान है। यह ओपनिंग स्टॉक से तीन प्रतिशत अधिक होने के साथ रिकॉर्ड भी है। 2023-24 में विभिन्न अनाजों का व्यापार 46.6 करोड़ टन का होगा और 2022-23 के स्तर से इसमें 1.7 प्रतिशत की गिरावट आएगी।</span></p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ चीनी के अंतरराष्ट्रीय दाम 13 साल की ऊंचाई पर, लेकिन गेहूं-चावल और खाद्य तेलों में गिरावट ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[सतत विकास लक्ष्यों के विपरीत दिशा में जा रही है दुनियाः एफएओ]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/multiple-shocks-keep-pushing-world-further-away-from-development-targets.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 16 Sep 2023 11:09:57 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/multiple-shocks-keep-pushing-world-further-away-from-development-targets.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">वर्ष 2030 के सतत विकास यानी सस्टेनेबल डेवलपमेंट एजेंडा का लगभग आधा समय बीत गया है, लेकिन परेशानी की बात यह है कि खाद्य और कृषि से संबंधित जो लक्ष्य तय किए गए थे, उसे दिशा में आगे बढ़ना या तो ठहर गया है या हम पीछे आने लगे हैं। इससे गरीबी और भूख दूर करने, स्वास्थ्य एवं पोषण बेहतर बनाने और जलवायु परिवर्तन से लड़ने में हमारी चुनौतियां बढ़ गई हैं। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) की ताजा रिपोर्ट में यह बात कही गई है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">&lsquo;ट्रैकिंग प्रोग्रेस ऑन फूड एंड एग्रीकल्चर रिलेटेड एसडीजी इंडिकेटर 2023&rsquo; शीर्षक से यह रिपोर्ट ऐसे समय प्रकाशित की गई है जब दुनिया भर के नेता न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र के एसडीजी समिट में भाग लेने के लिए जमा होने वाले हैं। इस सम्मेलन में एजेंडा के 17 सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) की प्रगति की समीक्षा की जाएगी।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">रिपोर्ट लॉन्च करते हुए एफएओ के स्टैटिसटिक्स डिवीजन के डायरेक्टर जोश रोजेरो मोनकायो ने कहा, इस समय हम जो लक्ष्य के विपरीत दिशा में चल रहे हैं, एसडीजी सम्मेलन में उसे सुधारने के लिए सही कदमों और नतीजों की उम्मीद रहेंगी। ऐसा करने के लिए दुनिया के नेताओं को आंकड़ों की जरूरत पड़ेगी जिसके आधार पर वे फैसला ले सकें और प्राथमिकताएं तय कर सकें।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">रिपोर्ट के जो मुख्य नतीजे बताए गए हैं, उनमें प्रमुख है कि दुनिया एसडीजी के लक्ष्य को हासिल करने के रास्ते से 2020 से पहले ही भटक गई थी। बीते कुछ वर्षों में कई बड़े झटके लगे हैं जिनकी वजह से हम कुछ लक्ष्यों के विपरीत दिशा में चलने लगे हैं। इन झटकों में कोविड-19 महामारी का प्रभाव, दुनिया में जगह-जगह युद्ध, अत्यधिक महंगाई और जलवायु संकट का बढ़ता प्रभाव शामिल हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">रिपोर्ट में कहा गया है कि एसडीजी इंडिकेटर में खाद्य और कृषि से संबंधित जो लक्ष्य तय किए गए थे, उनकी स्थिति ज्यादा शोचनीय है। वर्ष 2015 में दुनिया की 7.9% आबादी भूख के भीषण संकट से जूझ रही थी, वर्ष 2022 में ऐसे लोगों की संख्या बढ़कर 9.2% हो गई। एफएओ का आकलन है कि 2022 में 69.01 करोड़ से 78.3 करोड़ लोग भूख की समस्या से जूझ रहे थे। यही नहीं, कृषि में निवेश थम गया है, पशुओं के जेनेटिक संसाधनों को संरक्षित करने की दिशा में कोई प्रगति नहीं हो रही है और दुनिया में वन क्षेत्र का घटना लगातार जारी है। हालांकि पौधों के जेनेटिक संसाधनों के संरक्षण, पानी के बेहतर इस्तेमाल और अवैध तरीके से मछली पकड़ना रोकने जैसे मामलों में कुछ सकारात्मक ट्रेंड भी देखने को मिले हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">रिपोर्ट में बताया गया है कि दुनिया में अल्प पोषण की समस्या कोविड-19 महामारी से पहले के स्तर की तुलना में अब भी बहुत ज्यादा है। इसी तरह खाद्य असुरक्षा भी काफी बढ़ गई है। वर्ष 2019 में विश्व की 25.3% आबादी खाद्य असुरक्षा का सामना कर रही थी, जो 2022 में बढ़कर 29.6% हो गई।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">वर्ष 2021 में खाद्य पदार्थों की मॉडरेट से लेकर अत्यधिक कीमतों का सामना 21.5% देश कर रहे थे। वर्ष 2020 में ऐसे देशों की संख्या रिकॉर्ड 48% पहुंच गई थी। एक साल में इसमें उल्लेखनीय कमी आई है। हालांकि इससे परेशान देशों की संख्या 2015-19 के औसत 15% से अब भी ज्यादा है। इससे पता चलता है कि खाद्य पदार्थों के दाम लगातार ऊंचे बने हुए हैं। इसकी प्रमुख वजह उर्वरक और ऊर्जा महंगे होने के कारण उत्पादन और परिवहन का खर्च बढ़ना है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">प्राकृतिक आपदाओं की वजह से 2021 में 19.3 अरब डॉलर के कृषि उत्पादों का नुकसान हुआ। यह आंकड़ा 22 देश से मिले इनपुट के आधार पर है। खेतों में फसल कटाई के बाद, परिवहन, भंडारण, थोक और प्रोसेसिंग के स्तर पर दुनिया में 2021 में 13.2% कृषि उपज नष्ट हो गई। 2016 में यह आंकड़ा 13% था।</span></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ सतत विकास लक्ष्यों के विपरीत दिशा में जा रही है दुनियाः एफएओ ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[वैश्विक जल संकट और खाद्य सुरक्षा का समाधान करने में कृषि सक्षम : एफएओ]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/agriculture-holds-solutions-to-global-water-crisis-food-security-said-fao.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 12 Sep 2023 13:58:23 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/agriculture-holds-solutions-to-global-water-crisis-food-security-said-fao.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) ने कहा है कि दुनिया के संकटग्रस्त जल संसाधनों को संरक्षित करने में कृषि मददगार साबित हो सकती है और यह सुनिश्चित कर सकती है कि हमारे पास खाने और पीने के लिए पर्याप्त पानी है। 18वें जल कांग्रेस के उद्घाटन मौके पर एफएओ की उप महानिदेशक मारिया हेलेना सेमेदो ने यह बात कही है।</p>
<p>अपने संबोधन में उन्होंने कहा, "दक्षता बढ़ाकर, नकारात्मक प्रभावों को कम करके और अपशिष्ट जल का फिर से उपयोग करके वैश्विक जल संकट के समाधान के साथ-साथ कृषि वैश्विक जल एवं खाद्य सुरक्षा हासिल करने और 2030 के सतत विकास के एजेंडा के मकसद को पूरा करने की भी क्षमता रखती है।" एफएओ ने एक बयान में कहा है कि विश्व में मौजूद मीठे पानी के 70 फीसदी से ज्यादा हिस्से का इस्तेमाल कृषि क्षेत्र में किया जाता है। घटते संसाधनों, जलवायु परिवर्तन और अन्य क्षेत्र में पानी के बढ़ते इस्तेमाल के कारण खेती के लिए पानी की उपलब्धता &nbsp;व्यापक रूप से खतरे में है। एफएओ के एजेंडे में पानी सबसे ऊपर है।</p>
<p><strong>पानी पर एफएओ की पहलों की श्रृंखला</strong></p>
<p>बयान के मुताबिक, सेमेडो ने संगठन की "नई जल यात्रा" के हिस्से के रूप में कृषि और खाद्य सुरक्षा के लिए एकीकृत जल संसाधनों पर ध्यान केंद्रित करने और कई सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति में योगदान देने के लिए जल-संबंधी पहलों की एक श्रृंखला की रूपरेखा तैयार की है:</p>
<p>- एफएओ ने डेटा और सूचना के साथ देशों का समर्थन करने के लिए एफएओ जल उत्पादकता ओपन-एक्सेस पोर्टल (WaPOR) और कृषि में पानी की कमी पर वैश्विक फ्रेमवर्क (WASAG) प्लेटफार्मों की स्थापना की है। एफएओ ने अनौपचारिक और परंपरागत जल उपयोगकर्ताओं को पहचानने, सभी उपयोगकर्ताओं के लिए अधिक न्यायसंगत और सटीक रूप से हिसाब देने के तरीके का पता लगाने के लिए जल कार्यकाल पर वैश्विक संवाद शुरू किया है।</p>
<p>- पिछले साल रोम जल संवाद में पेश 2030 एजेंडा के प्रति राष्ट्रीय जल रोडमैप पर एफएओ की पहल स्थायी जल उपयोग सुनिश्चित करने के लिए एकीकृत रणनीतियों और नीतियों को विकसित करने में सदस्य देशों का समर्थन करती है।</p>
<p>- एफएओ की नई जल यात्रा पानी के आसपास बढ़ती जटिलताओं को दूर करने के लिए अगले महीने दूसरे रोम जल संवाद के साथ जारी रहेगी और यह मिट्टी और पानी पर वैश्विक संगोष्ठी के साथ जुड़ जाएगी।</p>
<p>- कृषि और ग्रामीण विकास पर भविष्य के जलवायु प्रभावों से निपटने के लिए देशों को समेकित जानकारी और तकनीकी अंतर्दृष्टि प्रदान करने के लिए एफएओ सिंचाई आवश्यकताओं और सिंचाई क्षमता पर एक वैश्विक मूल्यांकन भी शुरू करेगा। साथ ही कृषि और ग्रामीण इलाकों पर बाढ़ के प्रभाव पर एक वैश्विक मूल्यांकन भी शुरू करेगा।</p>
<p>- एफएओ सम्मेलन के 43वें सत्र में आम बहस का विषय एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन था और यह 2024-25 में एफएओ गवर्निंग बॉडी के द्विवार्षिक सम्मेलन का भी विषय है।</p>
<p>- "जल ही जीवन है, जल ही भोजन है, कोई पीछे न छूटे'' यह इस वर्ष 16 अक्टूबर के विश्व खाद्य दिवस का विषय है।</p>
<p><strong>प्रतिबद्धताएं और बड़े पैमाने पर प्रभाव</strong></p>
<p>संयुक्त राष्ट्र 2023 जल सम्मेलन में सहमति के अनुसार एफएओ वैश्विक जल कार्रवाई एजेंडा के लिए प्रतिबद्ध है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सभी के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध हो और यह जैव विविधता बनाए रखने के लिए पर्याप्त मात्रा में और बेहतर गुणवत्ता का हो।</p>
<p>सेमेडो ने इस बात पर जोर दिया कि पारिस्थितिकी तंत्र-आधारित समाधान और प्राकृतिक संसाधनों का टिकाऊ प्रबंधन प्रमुख हैं। कृषि और मत्स्य पालन और जलीय कृषि के लिए हरे और नीले बुनियादी ढांचे को प्राथमिकता देने से पानी की गुणवत्ता बढ़ सकती है, जैव विविधता बनाए रखी जा सकती है और कृषि खाद्य प्रणालियों और ग्रामीण क्षेत्रों को अन्य लाभ प्रदान किए जा सकते हैं।</p>
<p>प्रत्येक की सफलता समग्र रूप से और सुसंगत रूप से सहमत कार्यों के हिस्से के रूप में स्थायी जल प्रबंधन को एकीकृत करने पर निर्भर करती है, खासकर कृषि खाद्य प्रणालियों में। उन्होंने कहा, "हमें समावेशी और टिकाऊ योजना, वित्तपोषण, शासन और कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के लिए सरकारों, अंतर्राष्ट्रीय संगठनों, शिक्षाविदों, अनुसंधान संस्थानों, स्थानीय समुदायों और निजी क्षेत्र के बीच सहयोगी ढांचे की आवश्यकता है।" सेमेडो ने कहा कि जैसे-जैसे संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों के लिए 2030 की समयसीमा नजदीक आ रही है हमें लोगों और पृथ्वी के लिए जल प्रवाह बनाने की जरूरत है।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/09/image_750x500_65002107d4946.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ वैश्विक जल संकट और खाद्य सुरक्षा का समाधान करने में कृषि सक्षम : एफएओ ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/09/image_750x500_65002107d4946.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[भारत ने अमेरिकी कृषि उत्पादों और पॉल्ट्री आयात के लिए खोले दरवाजे, डब्ल्यूटीओ विवाद सुलझाने पर सहमति, भारतीय किसानों को झटका]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/india-opens-its-market-for-american-agricultural-products-settles-wto-disputes-reduce-import-tariffs.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 10 Sep 2023 15:03:07 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/india-opens-its-market-for-american-agricultural-products-settles-wto-disputes-reduce-import-tariffs.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>पूरा देश और दुनिया जब जी-20 सम्मेलन की उपलब्धियों और सफलता पर अपनी निगाह टिकाए थी, उसी समय भारत ने अमेरिकी कृषि और पॉल्ट्री उत्पादों के लिए अपना बाजार खोलने का फैसला ले लिया। इस फैसले के चलते अमेरिकी किसान रियायती आयात शुल्क के तहत अपने कृषि और पॉल्ट्री उत्पाद भारत के बाजार में निर्यात कर सकेंगे। अमेरिकी ट्रेड रिप्रजेंटेटिव (यूएसटीआर) कैथरीन ताइ के दो दिन पहले अमेरिका में जारी वक्तव्य के जरिये यह बात सामने आई है। हालांकि अभी भारत ने इस बारे में कोई सूचना जारी नहीं की है। यूएसटीआर ने कहा है कि भारत और अमेरिका विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में कई साल से जारी अपने विवाद सुलझाने में कामयाब हो गये हैं। इस समझौते के तहत भारत अमेरिकी उत्पादों फ्रोजन टर्की, फ्रोजन डक, फ्रैश ब्लूबैरी और क्रेनबैरी, फ्रोजन ब्लूबैरी और कैनबैरी, ड्राई ब्लूबैरी और क्रेनबैरी और प्रसंस्कृत ब्यूबैरी और क्रैनबैरी के आयात पर शुल्क कम करने के लिए सहमत हो गया है। भारत द्वारा इन उत्पादों पर आयात शुल्क दरों को कम करने से अमेरिकी उत्पादों के लिए भारत के महत्वपूर्ण बाजार में मौकों में बढ़ोतरी होगी।&nbsp;</p>
<p>भारत द्वारा अमेरिकी कृषि उत्पादों के आयात के लिए राह आसान करने वाले इस समझौते पर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ फॉरेन ट्रेड (आईआईएफटी) के डब्ल्यूटीओ सेंटर के पूर्व प्रमुख व इंटरनेशनल ट्रेड मामलों के प्रतिष्ठित एक्सपर्ट प्रोफेसर बिस्वजीत धर ने <strong>रूरल वॉयस</strong> के साथ एक बातचीत में कहा कि यह समझौता घरेलू पॉल्ट्री किसानों और दूसरे किसानों के लिए काफी नुकसानदेह साबित हो सकता है। उन्होंने कहा कि डब्ल्यूटीओ में जारी विवाद में भारत के जीतने की संभावना बहुत कम थी, लेकिन हमें कुछ रास्ता निकालने की जरूरत थी। यह समझौता अमेरिकी किसानों और अमेरिकी कंपनियों के लिए फायदेमंद रहेगा।</p>
<p>यूएसटीआर के वक्तव्य में कहा गया है कि दिल्ली में जी-20 बैठक के मौके पर अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच बैठक के अवसर पर यह घोषणा की जा रही है। इसके पहले भारत के वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल और यूएसटीआई ताइ के बीच जी-20 ट्रेड एवं इनवेस्टमेंट मंत्रियों की बैठक के दौरान भारत और अमेरिका के बीच डब्ल्यूटीओ में जारी विवाद को जल्दी हल करने पर सहमति जताई गई थी।</p>
<p>यूएसटीआर ने कहा है कि डब्ल्यूटीओ विवाद का हल होना भारत और अमेरिका के बीच व्यापार संबंधों में एक मील के पत्थर की तरह है। भारत द्वारा अमेरिकी उत्पादों पर आयात शुल्क कम करने से अमेरिकी कृषि उत्पादकों के लिए भारत के महत्वपूर्ण बाजार में पहुंच आसान हो जाएगी। यह घोषणा भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जून में हुई अमेरिका यात्रा और अमेरिकी राष्ट्रपति की इस सप्ताह की भारत यात्रा के साथ जुड़ी हुई है और दोनों देशें के बीच परस्पर व्यापार भागीदारी को मजबूत करती है। मैं भारतीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के साथ मिलकर दोनों देशों के बीच आर्थिक संभावनाओं के बेहतर परिणामों पर काम करती रहूंगी।&nbsp;</p>
<p><a href="https://eng.ruralvoice.in/national/india-to-import-american-agricultural-poultry-products-as-it-is-a-shock-for-domestic-farmers.html" title="American agri products" target="_blank" rel="noopener"><strong>अंग्रेजी में भी पढ़ेंः&nbsp;India to import American agricultural, poultry products at lower duty, agreed to resolve WTO dispute with US</strong></a></p>
<p>जून में भारत और अमेरिका डब्ल्यूटीओ में जारी छह विवादों को समाप्त करने पर सहमत हो गये थे। इस समझौते के तहत भारत द्वारा अमेरिकी उत्पादों चना, मसूर दाल, बादाम, अखरोट, सेब, बोरिक एसिड और डायगनोस्टिक रीजेंट्स पर सीमा शुल्क घटाने पर सहमत हो गया था। आज के समझौते के साथ भारत बकाया विवादों को सुलझाने पर सहमत हो गया है जो भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय सहयोग का एक नया अध्याय और दोनों देशकों बीच व्यापार संबंधों को मजबूत करेगा।&nbsp;</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ भारत ने अमेरिकी कृषि उत्पादों और पॉल्ट्री आयात के लिए खोले दरवाजे, डब्ल्यूटीओ विवाद सुलझाने पर सहमति, भारतीय किसानों को झटका ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[चावल के वैश्विक दाम 15 साल के उच्च स्तर पर, अल&amp;#45;नीनो के चलते चीनी 34 फीसदी हुई महंगी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/global-rice-prices-at-15-year-high-sugar-costlier-by-34-pc-due-to-el-nino.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 09 Sep 2023 08:55:28 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/global-rice-prices-at-15-year-high-sugar-costlier-by-34-pc-due-to-el-nino.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत द्वारा गैर बासमती चावल के निर्यात पर प्रतिबंध के चलते वैश्विक बाजार में अगस्त में चावल के दाम 15 साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गए हैं। जबकि अल-नीनो के असर के चलते थाइलैंड में चीनी उत्पादन पर प्रतिकूल असर पड़ने से चीनी की कीमत पिछले एक साल के मुकाबले इस साल अगस्त में 34.1 फीसदी अधिक रही है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) द्वारा शुक्रवार को जारी फूड इंडेक्स में यह जानकारी दी गई है। इन दोनों उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी के पीछे भारत मुख्य वजह है क्योंकि भारत ने अप्रैल में चीनी निर्यात भी बंद कर दिया था। जबकि पिछले कई साल से भारत बड़े चीनी निर्यातक के रूप में उभरा था।</p>
<p>हालांकि, एफएओ फूड प्राइस इंडेक्स जुलाई के मुकाबले अगस्त में 2.1 फीसदी घटकर 121.3 अंकों पर आ गया जो मार्च, 2022 के उच्चतम स्तर के मुकाबले 24 फीसदी कम है। एफएओ की ओर जारी बयान में कहा गया है कि खाद्य तेलों और चावल को छोड़कर अधिकांश खाद्यान्नों की कीमतों में कमी आई है जिसकी वजह आपूर्ति का बेहतर रहना है। मगर इनके उलट एफएओ ऑल राइस प्राइस इंडेक्स जुलाई के मुकाबले अगस्त में 9.8 फीसदी बढ़ गया जिसकी वजह चावल की कीमतों के 15 साल के उच्च स्तर पर पहुंचना है। इस वृद्धि की वजह विश्व के सबसे बड़े चावल निर्यातक भारत द्वारा इंडिका व्हाइट राइस के निर्यात पर प्रतिबंध लगाया जाना है। यह प्रतिबंध कब तक जारी रहेगा इसको लेकर अनिश्चितता कायम रहने से स्टॉक, कांट्रैक्ट्स पर दोबारा समझौता, बातचीत और नए सौदों की कीमतों को लेकर अनिश्चितता और सौदों के आकार भी छोटे हो गए हैं।</p>
<p>वहीं अल-नीनो के प्रभाव के चलते दुनिया के सबसे चीनी निर्यातकों में शुमार थाइलैंड में चीनी उत्पादन पर प्रतिकूल असर पड़ने से चीनी की कीमतें पिछले साल के मुकाबले इस साल अगस्त में 34.1 फीसदी अधिक रही है। जुलाई के मुकाबले अगस्त में एफएओ शुगर प्राइस इंडेक्स में 1.3 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।</p>
<p>बाकी खाद्य उत्पादों के मोर्चे पर आपूर्ति बेहतर होने के चलते कीमतें कम हुई हैं। एफएओ का वेजिटेबल ऑयल प्राइस इंडेक्स जुलाई के मुकाबले अगस्त में 3.1 फीसदी कम हुआ है। जबकि जुलाई में यह 12.1 फीसदी बढ़ गया था। इसमें कमी आने की वजह अगस्त में खाद्य तेलों की आयात मांग घटने के चलते सूरजमुखी तेल की कीमतों में आठ फीसदी की कमी आना रहा है। अमेरिका में सोयाबीन की फसल के बेहतर उत्पादन अनुमानों के चलते भी सोयाबीन तेल की कीमतों में कमी आई है। जबकि दक्षिण-पूर्व एशिया में बेहतर उत्पादन के चलते पॉम ऑयल की कीमतों में भी मामूली कमी आई है।</p>
<p>एफएओ का सीरियल प्राइस इंडेक्स अगस्त में 0.7 फीसदी कम रहा है। वैश्विक बाजार में आपूर्ति बढ़ने से गेहूं की कीमतों में 3.8 फीसदी की कमी आई है। वहीं मोटे अनाजों की कीमतों में भी 3.4 फीसदी की कमी&nbsp; है। इसकी वजह अमेरिका और ब्राजील में मक्का के रिकॉर्ड उत्पादन के चलते वैश्विक बाजार में आपूर्ति बढ़ना रहा है।</p>
<p>वहीं एफएओ डेयरी प्राइस इंडेक्स में जुलाई के मुकाबले अगस्त में 4 फीसदी की कमी दर्ज की गई है। होल मिल्क पाउडर, चीज और बटर की आपूर्ति में भारी बढ़ोतरी के चलते इनकी कीमतों में कमी आई है। वहीं एफएओ मीट इंडेक्स में भी जुलाई के मुकाबले अगस्त में तीन फीसदी की कमी आई है क्योंकि अधिकांश मीट उत्पादों के दाम गिरे हैं।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ चावल के वैश्विक दाम 15 साल के उच्च स्तर पर, अल-नीनो के चलते चीनी 34 फीसदी हुई महंगी ]]></media:description>
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	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[बेंगलुरु में अगले महीने होगा 5वां विश्व कॉफी सम्मेलन, एशिया में हो रहा पहली बार]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/bengaluru-to-host-5th-world-coffee-meet-first-time-in-asia.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 01 Aug 2023 17:07:59 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/bengaluru-to-host-5th-world-coffee-meet-first-time-in-asia.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अंतरराष्ट्रीय कॉफी संगठन (आईसीओ) अगले महीने की 25-28 तारीख को बेंगलुरु में 5वां विश्व कॉफी सम्मेलन (डब्ल्यूसीसी) आयोजित कर रहा है। डब्ल्यूसीसी के लिए अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित टेनिस खिलाड़ी रोहन बोपन्ना को ब्रांड एम्बेसडर बनाया गया है। सोमवार को बेंगलुरु के एक कार्यक्रम में आयोजन के लोगो, थीम और कॉफी क्षेत्र के अपेक्षित कार्यक्रमों के प्रमुख बिंदुओं की जानकारी के साथ आयोजन के तारीखों की घोषणा की गई।</p>
<p>इस सम्मेलन का आयोजन केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के कॉफी बोर्ड, कर्नाटक सरकार और कॉफी इंडस्ट्री के सहयोग से किया जा रहा है। सम्मेलन के लोग और थीम- &ldquo;सर्कुलर अर्थव्यवस्था और रीजेनरेटिव कृषि के माध्यम से सस्टेनेबिलिटी&rdquo; को जारी करने के मौके पर कर्नाटक के वाणिज्य एवं उद्योग विभाग के प्रधान सचिव डॉ. एस. सेल्वकुमार ने कहा, &ldquo;कर्नाटक निर्विवाद रूप से भारत की कॉफी राजधानी है। इस राज्य में दुनिया की कुछ सबसे बेहतरीन कॉफी के उत्पादन की एक समृद्ध विरासत है। कॉफी के पूरे वैल्यू चेन- बीज से लेकर उपकरण निर्माता कंपनियों के कप, कॉफी बनाने वाली मशीनें, घुलनशील कॉफी ब्रांड्स और कैफे चेन तक- में निवेश के बेहतर अवसर मौजूद हैं। इससे खेते से लेकर कैफे तक हमारी प्रतिभा के लिए रोजगार के अवसरों में वृद्धि होगी। इस आयोजन का मेजबान राज्य होना हमारे लिए सम्मान की बात है।&rdquo;</p>
<p>भारतीय कॉफी बोर्ड के सीईओ और सचिव डॉ. के.जी. जगदीश ने कहा, &ldquo;डब्ल्यूसीसी एशिया में पहली बार आयोजित होने जा रहा है। इस सम्मेलन से भारत के कॉफी किसानों को काफी लाभ होगा। इससे वैश्विक मंच पर भारत की कॉफी को बढ़ावा मिलेगा और किसानों के लिए नए अवसर एवं बाजार उपलब्ध होंगे।&rdquo; इससे पहले यह सम्मेलन इंग्लैंड (2001), ब्राजील (2005), ग्वाटेमाला (2010) और इथियोपिया (2016) में हो चुका है।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/08/image_750x_64c8ee2fc0dc5.jpg" alt="" /></p>
<p>डब्ल्यूसीसी 2023 का ब्रांड एम्बेसडर बनने पर रोहन बोपन्ना ने कहा, &ldquo;मेरा जीवन एक कॉफी उत्पादक का पुत्र और एक पेशवर टेनिस खिलाड़ी होने का अद्वितीय मिश्रण है। कूर्ग के कॉफी बागानों की मनोरम सुन्दरता के बीच पलने-बढ़ने के कारण मेरा कॉफी से गहरा लगाव रहा है। प्रतिष्ठित डब्ल्यूसीसी से जुड़कर मुझे रोमांच और गर्व हो रहा है। भारत खुद को एक फलते-फूलते कॉफी गंतव्य के रूप में स्थापित कर रहा है। इस आयोजन से कॉफी उद्योग में वृद्धि और सहयोग को प्रोत्साहन मिलने की भारी संभावना है।&rdquo;</p>
<p>इस सम्मेलन में 80 से अधिक देशों के 2000 से अधिक प्रतिनिधि और 90 वक्ता भाग लेंगे। साथ ही 150 से अधिक प्रदर्शकों के हिस्सा लेने के कारण लोगों को कॉफी उद्योग में विविध उत्पादों और नवाचारों की जानकारी प्राप्त करने का अवसर मिलेगा। इसके अलावा, कॉफी क्षेत्र में साझेदारियां और सहयोग विकसित करने के लिए &nbsp;200 से अधिक बी2बी (बिजनेस टू बिजनेस) मीटिंग होंगे।</p>
<p>इंटरनेशनल कॉफी ऑर्गेनाइजेशन (आईसीओ) कॉफी व्यापार को बढ़ावा देने के लिए कॉफी का उत्पादन एवं खपत करने वाले देशों के बीच सहयोग को प्रोत्साहन देने के प्रति समर्पित अंतरराष्ट्रीय संगठन है। वर्ष 1963 में स्थापित आईसीओ ने वैश्विक कॉफी उद्योग के विकास में अहम भूमिका निभाई है। जबकि केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के तहत आने वाला कॉफी बोर्ड ऑफ इंडिया कॉफी उत्पादकों को सहयोग, अनुसंधान के संचालन, भारतीय कॉफी के विश्वव्यापी प्रोत्साहन और विभिन्न नीतियों एवं कार्यक्रमों को लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ बेंगलुरु में अगले महीने होगा 5वां विश्व कॉफी सम्मेलन, एशिया में हो रहा पहली बार ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[रूस से खफा अफ्रीकी देशों ने किया ग्रेन डील जारी रखने का आग्रह]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/african-countries-ask-for-continuation-of-black-sea-grain-deal.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 29 Jul 2023 12:38:53 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/african-countries-ask-for-continuation-of-black-sea-grain-deal.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">ब्लैक सी ग्रेन डील से रूस के अलग होने के कारण उसके कुछ करीबी देश भी नाराज हो गए लगते हैं। उन्होंने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से डील पर दोबारा राजी होने का आग्रह किया है। एक दिन पहले ही सेंट पीटर्सबर्ग में आयोजित रूस-अफ्रीका सम्मेलन में मिस्र के नेता अब्दुल फतह अल सिसी ने पुतिन की मौजूदगी में कहा कि डील को पुनर्जीवित करने के लिए समझौते पर सहमति आवश्यक है। पिछले साल जुलाई में ब्लैक सी ग्रेन डील के बाद यूक्रेन से 330 लाख टन अनाज अंतरराष्ट्रीय बाजार में आया था। इसमें से बड़ा हिस्सा अफ्रीका के विकासशील देशों को गया। संयुक्त राष्ट्र और तुर्की की पहल के बाद यह समझौता हुआ था। मिस्र दुनिया का सबसे बड़ा अनाज आयातक है। वह 80% अनाज रूस और यूक्रेन से ही आयात करता रहा है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">रूस का कहना है कि वह इस समझौते से इसलिए अलग हुआ क्योंकि पश्चिमी देशों ने उसके कृषि निर्यात पर पाबंदी लगा रखी है। मिस्र और केन्या समेत कई अफ्रीकी देश रूस से बड़े पैमाने पर अनाज का आयात करते रहे हैं। एक तो रूस का अनाज अंतरराष्ट्रीय बाजार में कम पहुंच रहा है और दूसरा, उसके ब्लैक सी ग्रेन डील से अलग हो जाने के बाद यूक्रेन का अनाज भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहुंचना बंद हो गया है। केन्या ने रूस के इस कदम को पीठ में छुरा घोंपना बताया है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अपने संबोधन में मिस्र के नेता अल सिसी ने कहा, खाद्य पदार्थ और उर्वरक उचित कीमत पर उपलब्ध कराने के लिए तत्काल समाधान तलाशे जाने चाहिए ताकि अफ़्रीका को संकट की घड़ी में मदद मिल सके। मैं अनाज निर्यात समझौते पर ऐसी सहमति की उम्मीद करता हूं जिसमें सभी पक्षों की मांगों और हितों पर गौर किया गया हो ताकि अनाज की लगातार बढ़ती कीमतों पर लगाम लग सके।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इस बीच पुतिन ने गुरुवार को अफ्रीका के 6 देशों बुर्किना फासो, सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक, एरिट्रिया, माली सोमालिया और जिंबाब्वे को मुफ्त में अनाज देने की घोषणा की है। पुतिन ने कहा कि मानवीय आधार पर यह अनाज दिया जा रहा है। इनमें से सोमालिया के अलावा बाकी पांच देश रूस के करीबी माने जाते हैं। 55 देशों की अफ्रीकी यूनियन के प्रमुख ने कहा कि अनाज और उर्वरक की समस्या सबके लिए है। जब तक रूस-यूक्रेन के बीच शांति नहीं होती तब तक यह यूनियन ब्लैक सी ग्रेन डील को जारी रखने की अपेक्षा करता है।</span></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/07/image_750x500_64c4baf8e45be.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ रूस से खफा अफ्रीकी देशों ने किया ग्रेन डील जारी रखने का आग्रह ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/07/image_750x500_64c4baf8e45be.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[मछली उत्पादन पर पर्यावरणीय अनिश्चितताओं और नियामकीय जोखिम का अगले दस साल में पड़ सकता है असर]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/environmental-uncertainty-regulatory-risks-may-hit-fish-output-said-oecd-fao-agriculture-outlook-2032.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 28 Jul 2023 14:59:03 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/environmental-uncertainty-regulatory-risks-may-hit-fish-output-said-oecd-fao-agriculture-outlook-2032.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अगले दस साल में दुनिया भर में मछली पालन और जलीय कृषि क्षेत्र (एक्वाकल्चर) को पर्यावरण संबंधी चिंताओं, नीतियों में बदलाव और प्रभावशाली शासन प्रणालियों की चुनौतियों सहित महत्वपूर्ण अनिश्चितताओं की वजह से खामियाजा भुगतना पड़ेगा। ओईसीडी-एफएओ कृषि आउटलुक 2023-32 में यह आशंका जताई गई है। हालांकि, रिपोर्ट में यह भी उम्मीद जताई गई है कि इस दौरान उत्पादन में ज्यादातर वृद्धि जलीय कृषि क्षेत्र में ही होगी। सरकारी नीतियों में बदलाव, खासकर पर्यावरणीय प्रभावों से संबंधित बदलाव के चलते वितरण और वृद्धि दर बढ़ सकती है।</p>
<p>आर्गनाइजेशन ऑफ इकोनॉमिक कोआपरेशन एंड डेवलपमेंट (ओईसीडी) और संयुक्त राष्ट्र के कृषि एवं खाद्य संगठन (एफएओ) द्वारा तैयार ओईसीडी-एफएओ एग्रीकल्चरल आउटलुक 2023-32 रिपोर्ट में कहा गया है कि जलीय कृषि और मछली पालन दोनों क्षेत्र में दुनिया के सबसे बड़े उत्पादक चीन में किसी भी नीतिगत बदलाव का वैश्विक उत्पादन पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा। 15वीं पंचवर्षीय योजना 2026-30 की अवधि के दूसरे भाग में अनिश्चितता ज्यादा रहेगी। जलवायु परिवर्तन का मछली पालन और जलीय कृषि दोनों पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ेगा। शायद यह अगले दशक में मछली उत्पादन के लिए अनिश्चितता के सबसे बड़े कारणों में से एक है जिसका अनुमान लगाना मुश्किल है।</p>
<p>रिपोर्ट के मुताबिक, मछली पालन पर जलवायु परिवर्तन के प्रत्यक्ष प्रभावों में स्टॉक के बदलते भौगोलिक वितरण और समुद्री पारिस्थितिक तंत्र में प्रजातियों की संरचना, टर्नओवर, बहुतायत और विविधता में परिवर्तन शामिल हैं। जलवायु परिवर्तन न केवल मछुआरों के लिए उपलब्ध संसाधनों को प्रभावित करेगा, बल्कि मछली पालन प्रबंधकों का काम भी जटिल बना देगा और साझा स्टॉक की संख्या में वृद्धि होगी। इससे सहकारी प्रबंधन व्यवस्थाओं की आवश्यकता बढ़ जाएगी।</p>
<p>रिपोर्ट में कहा गया है कि जलीय कृषि पर जलवायु प्रेरित तापमान, वर्षा, समुद्र के अम्लीकरण, हाइपोक्सिया की घटना और समुद्र के स्तर में वृद्धि, जंगली बीजों की उपलब्धता के साथ-साथ वर्षा में कमी के कारण मीठे पानी के लिए बढ़ती प्रतिस्पर्धा आदि के कारण लंबे समय तक असर पड़ने की संभावना है। जलवायु परिवर्तन का असर हर जगह एक समान नहीं होगा, समशीतोष्ण क्षेत्रों की तुलना में उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में बड़े बदलाव की उम्मीद है।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/03/image_750x_640db20d76b31.jpg" alt="" /></p>
<p>जलवायु परिवर्तन मछली पालन और जलीय कृषि दोनों के लिए कई नियामक जोखिम भी पैदा करता है। जैसे-जैसे सरकारों पर खाद्य प्रणाली से जीएचजी उत्सर्जन को कम करने और इसे शून्य करने का दबाव बढ़ रहा है, मछली पालन (जैसे डीजल ईंधन) और जलीय कृषि (जैसे बिजली) के प्रमुख ऊर्जा स्रोत की कीमतें बढ़ सकती हैं। इससे उत्पादन के प्रकार और बेड़े की संरचना जैसी कुछ गतिविधियों के मुनाफे पर असर पड़ सकता है। इन नीतियों का&nbsp;कृषि बाजारों पर पड़ने वाला प्रभाव अनिश्चितता का एक अन्य कारण है।</p>
<p>सरकारों को इन चुनौतियों को समझने और सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा करने में मदद करने के लिए ओईसीडी की दो नई पहलें हैं- पहला, मछली पालन के लिए नीति निर्माण पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से संबंधित है और दूसरा, वैश्विक स्तर पर खाद्य प्रणालियों के सामने आने वाली चुनौतियों का सामना करने में जलीय कृषि की भूमिका से संबंधित हैं। &nbsp;एफएओ का ब्लू ट्रांसफॉर्मेशन जलवायु परिवर्तन के विनाशकारी प्रभावों को कम करने में कमजोर देशों को मदद करने के लिए पर्यावरणीय स्थिरता, खाद्य सुरक्षा और आजीविका प्राथमिकताओं में सामंजस्य स्थापित करके भूख में कमी और महासागरों, समुद्रों और समुद्री संसाधनों के स्थायी प्रबंधन के लिए एक मार्ग प्रदान कर सकता है।</p>
<p>ब्लू ट्रांसफॉर्मेशन मछली पालन और जलीय कृषि दोनों से अधिक कुशल, समावेशी, लचीला और टिकाऊ ब्लू फूड सिस्टम पर ध्यान केंद्रित करता है जिसे एकीकृत विज्ञान आधारित प्रबंधन, तकनीकी नवाचार और निजी क्षेत्र की भागीदारी के लिए बेहतर नीतियों और कार्यक्रमों के माध्यम से बढ़ावा दिया जाता है। <strong>इसके तीन मुख्य उद्देश्य हैं:</strong> टिकाऊ जलीय कृषि का विस्तार और गहनता, मछली पालन का प्रभावी प्रबंधन और उन्नत मूल्य श्रृंखलाएं। ब्लू ट्रांसफॉर्मेशन के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए समग्र और अनुकूल दृष्टिकोण की आवश्यकता है। खाद्य प्रणालियों के वैश्विक और स्थानीय घटकों के बीच जटिल बातचीत पर विचार कर और बहु-हितधारक हस्तक्षेप से आजीविका को सुरक्षित और बढ़ाने, लाभों के समान वितरण को बढ़ावा देने और पर्याप्त उपयोग और संरक्षण प्रदान करने तथा जैव विविधता एवं पारिस्थितिकी तंत्र को संरक्षित करने की जरूरत है।</p>
<p>अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने वर्ष 2022 में डब्ल्यूटीओ में मछली पालन सब्सिडी पर बाध्यकारी अनुशासन पर सहमति जताई है जो मछली उत्पादन की अनिश्चितताओं का एक अन्य कारण है। यह समझौता अन्य बातों के साथ-साथ मछली के ज्यादा स्टॉक वाले क्षेत्र में मछली पकड़ने की गतिविधि, अवैध रूप से असूचित और अनियमित मछली पकड़ने और आरएफएमओ की क्षमता क्षेत्र के बाहर गहरे समुद्र में मछली पकड़ने पर सब्सिडी को प्रतिबंधित करता है। इस समझौते में प्रारंभिक समझौते के लागू होने के चार वर्षों के भीतर अधिक व्यापक विषयों को अपनाने के प्रावधान भी शामिल हैं। इसकी वजह से संभावित रूप से इस अवधि में अधिक कठोर अनुशासन लागू किया जा सकता है जिससे आगे अनिश्चितताएं पैदा हो सकती हैं।</p>
<p>व्यापार के नजरिये से देखें तो भविष्य के नीतिगत निर्णय अनुमानों को प्रभावित कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, यूक्रेन पर हमले के बाद रूस पर प्रतिबंध लागू हैं, ऐसे में किसी भी बदलाव की भविष्यवाणी करना मुश्किल है और इसका अपेक्षित व्यापारिक संबंधों पर असर पड़ सकता है।</p>
<p>अमेरिका और चीन के बीच चल रहे तनाव से मत्स्य उत्पादों के व्यापार पर असर बढ़ सकता है, खासकर यदि प्रशांत क्षेत्र में व्यापार और मछली पकड़ने की गतिविधियां प्रभावित होती हैं। लंबी अवधि में प्रतिबंध, टैरिफ और व्यापार प्रतिबंध लगने से स्थापित बाजारों में बदलाव आ सकता है जिससे व्यापार में कमी आ सकती है और कुछ क्षेत्रों में उपभोक्ताओं के लिए कीमतें बढ़ सकती हैं।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ मछली उत्पादन पर पर्यावरणीय अनिश्चितताओं और नियामकीय जोखिम का अगले दस साल में पड़ सकता है असर ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[2032 तक दुनिया के गेहूं&amp;#45;चावल उत्पादन वृद्धि में सबसे अधिक योगदान भारत का होगाः ओईसीडी&amp;#45;एफएओ आउटलुक]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/india-to-contribute-the-most-in-global-wheat-and-rice-production-in-the-next-10-years.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 24 Jul 2023 08:06:46 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/india-to-contribute-the-most-in-global-wheat-and-rice-production-in-the-next-10-years.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">अगले एक दशक में, यानी वर्ष 2032 तक दुनिया में गेहूं और चावल के उत्पादन में जो वृद्धि होगी, उसमें सबसे अधिक योगदान भारत का होगा। ओईसीडी और एफएओ के एग्रीकल्चरल आउटलुक 2023-32 में यह अनुमान जताया गया है। इसके मुताबिक, दुनिया में गेहूं का उत्पादन 2032 तक 7.6 करोड़ टन बढ़कर 85.5 करोड़ टन हो जाने की संभावना है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा गेहूं उत्पादक है और उत्पादन में वृद्धि सबसे ज्यादा यहीं होगी। अगले एक दशक में दुनिया में गेहूं का उत्पादन जितना बढ़ेगा, उसका एक-चौथाई भारत से होगा। इसका मुख्य कारण बेहतर किस्मों का इस्तेमाल और रकबे में वृद्धि होगी। रूस, कनाडा, अर्जेंटीना और पाकिस्तान में भी उत्पादन में अच्छी खासी वृद्धि होने की संभावना है। वर्ष 2032 तक यूरोपियन यूनियन के सबसे बड़ा गेहूं उत्पादन बनने के आसार हैं। वह चीन को इस मामले में पीछे छोड़ देगा।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">चावल के उत्पादन में अगले एक दशक में 5.5 करोड़ टन की वृद्धि होने की संभावना है और कुल उत्पादन 2032 तक 57.7 करोड़ टन पहुंच जाएगा। इस वृद्धि में सबसे अधिक हिस्सा भारत का होगा। चीन दुनिया का सबसे बड़ा चावल उत्पादक है। वहां बीते एक दशक के दौरान जिस गति से उत्पादन बढ़ा है, अगले दशक में भी उसके बरकरार रहने की संभावना है। दुनिया में मक्के का उत्पादन 2032 तक 16.5 करोड़ टन बढ़कर 1.36 अरब टन हो जाने की संभावना है। सबसे अधिक वृद्धि अमेरिका, ब्राज़ील, अर्जेंटीना और भारत में होगी। मोटे अनाज का उत्पादन 2.3 करोड़ टन बढ़कर 33 करोड़ टन हो जाने के आसार हैं। इस वृद्धि में 75% हिस्सा अफ्रीकी देशों का होगा।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">रिपोर्ट में कहा गया है कि 2032 तक दुनिया में अनाज का उत्पादन 32 करोड़ टन बढ़कर 3.1 अरब टन हो जाने की संभावना है। इस वृद्धि में ज्यादातर हिस्सा चावल और मक्के का होगा। पिछले दशक की तरह उत्पादन में ज्यादातर वृद्धि एशियाई देशों में होगी। कुल वृद्धि का 45% इस क्षेत्र से होगा। अफ्रीका में ज्यादातर वृद्धि मक्का तथा अन्य मोटे अनाज के मामलों में होगी। यह क्षेत्र पिछले दशक की तुलना में विश्व अनाज उत्पादन वृद्धि में अधिक योगदान करेगा। लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई देश मुख्य रूप से मक्के के मामले में योगदान करेंगे।</span></p>
<p><strong>अनाज की मांग धीमी गति से बढ़ेगी</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">आउटलुक में कहा गया है कि अगले 10 वर्षों के दौरान दुनिया में अनाज की मांग पिछले दशक की तुलना में धीमी गति से बढ़ेगी। चारा, बायोफ्यूल और उद्योगों में अनाज की मांग की वृद्धि दर कम होने के कारण ऐसा होगा। ओईसीडी और एफएओ के एग्रीकल्चरल आउटलुक 2023-32 के अनुसार अनेक देशों में प्रति व्यक्ति खाद्य खपत ज्यादातर अनाजों के मामले में अपने शीर्ष स्तर पर पहुंच गई है। इसलिए कुल मांग में वृद्धि अधिक नहीं होगी। खाद्य पदार्थों की मांग में ज्यादातर वृद्धि प्रत्यक्ष रूप से आबादी में वृद्धि से जुड़ी है। आबादी कम तथा मध्य आय वाले देशों में बढ़ रही है। आबादी के कारण एशिया में गेहूं और चावल की खपत तथा अफ्रीका में मिलेट और मक्के की खपत बढ़ेगी। अफ्रीका में प्रति व्यक्ति चावल की खपत भी बढ़ने के आसार हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अगले एक दशक में दुनिया में अनाज उत्पादन में वृद्धि ज्यादा उत्पादकता और खेती की मौजूदा जमीन पर सघन कृषि की वजह से होगी। नई और बेहतर किस्म के बीज उपलब्ध होंगे, इनपुट का इस्तेमाल ज्यादा प्रभावी तरीके से होगा और खेती के तौर-तरीकों में भी सुधार होगा। हालांकि कुछ देशों में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों, नई टेक्नोलॉजी की पहुंच ना होने तथा कृषि क्षेत्र में कम निवेश के कारण उत्पादन में वृद्धि प्रभावित होगी। इसके अलावा पर्यावरण को लेकर जागरूकता बढ़ने तथा नई पर्यावरण नीतियों से भी ग्रोथ पर असर पड़ेगा।</span></p>
<p><strong>2032 तक अनाज ट्रेड 11% बढ़ेगा&nbsp;</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">वर्ष 2022 में विश्व में 17% अनाज उत्पादन की ट्रेडिंग हुई। हालांकि अलग-अलग अनाज में यह अनुपात अलग है। चावल के 10% तो गेहूं के 25% उत्पादन की ट्रेडिंग हुई। यह अनुपात अगले दशक में भी बने रहने की संभावना है। एशिया के सबसे बड़ा चावल निर्यातक क्षेत्र बने रहने के आसार हैं। लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई क्षेत्र के देश मुख्य रूप से गेहूं आयात करेंगे और मक्के का निर्यात करेंगे। अनेक अफ्रीकी तथा एशियाई देशों की अगले दशक में अनाज आयात पर निर्भरता बढ़ेगी।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अनुमान है कि 2032 तक दुनिया में अनाज का ट्रेड 11% बढ़कर 53 करोड़ टन हो जाएगा। इस वृद्धि में गेहूं का योगदान सबसे अधिक 43%, मक्के का 34% और चावल का 20% रहेगा। मोटे अनाजों का हिस्सा&nbsp; 3% रहने की संभावना है। रूस सबसे बड़ा गेहूं निर्यातक बना रहेगा। 2032 में दुनिया के कुल गेहूं निर्यात में 23% हिस्सेदारी उसकी होगी। इसी तरह अमेरिका भी सबसे बड़ा मक्का निर्यातक बना रहेगा, उसके बाद ब्राजील होगा। यूरोपियन यूनियन मुख्य रूप से मोटे अनाज का निर्यातक रहेगा। भारत, थाईलैंड और वियतनाम चावल के बड़े निर्यातक बने रहेंगे। बीते वर्षों की तरह चीन में चारे की डिमांड अनाज बाजार में बड़ी भूमिका निभाएगी। अनुमान है कि चीन में मक्का और गेहूं का आयात थोड़ा कम होगा। 2032 में वहां मक्के का आयात 1.9 करोड़ टन और गेहूं का 75 लाख टन रहने का अनुमान है। 2023-24 के सीजन में अनाज की कीमतों में वृद्धि जारी रहेगी, लेकिन आने वाले समय में उत्पादकता बढ़ने और भू राजनीतिक स्थिरता आने के बाद कीमतों में कमी आएगी और वह ट्रेंड 2032 तक बना रहेगा।&nbsp;</span></p>
<p><strong>इस वर्ष गेहूं उत्पादन बढ़ने, चावल का घटने का अनुमान</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">2022-23 के सीजन में गेहूं और मोटे अनाज की बाजार परिस्थितियां पिछले सीजन के मुकाबले बेहतर हैं। वैश्विक उत्पादन अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच गया है और दुनिया में इसका स्टॉक बढ़ रहा है। दूसरी तरफ से मक्का तथा अन्य मोटे अनाजों का उत्पादन इतना नहीं हो रहा कि मांग पूरी हो रके। इसलिए 2023 के सीजन के अंत में दुनिया में मोटे अनाजों का स्टॉक कम होने के आसार हैं। ब्लैक सी ग्रेन इनीशिएटिव के चलते अप्रैल 2023 तक 1.5 करोड़ टन अनाज की सप्लाई हुई तथा इससे अनाज बाजार में अनिश्चितता कुछ हद तक कम हुई। (रूस ने जुलाई 2023 में इस समझौते को खत्म करने की घोषणा की।)</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">जहां तक चावल की बात है तो लगातार कई वर्षों तक बंपर उत्पादन होने के बाद मौसम के प्रभाव तथा उत्पादन लागत में वृद्धि के चलते 2022-23 के सीजन में दुनिया में इसका उत्पादन कम होने की आशंका है। उत्पादन घटने तथा नीतियों में बदलाव के चलते दुनिया में चावल का इस्तेमाल भी कम होगा तथा 2023 में इसकी ट्रेडिंग कम होगी। हालांकि कुछ देश अपने यहां चावल स्टॉक बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, इसलिए सीजन के अंत में ग्लोबल स्टॉक दूसरे सबसे ऊंचे स्तर पर होगा।</span></p>
<p><strong>40% अनाज का इस्तेमाल भोजन में होगा</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अनाज की सबसे अधिक खपत खाने में और उसके बाद चारे के रूप में होगी। वर्ष 2032 में कुल अनाज उत्पादन का 40% प्रत्यक्ष रूप से लोगों के खाने में जाएगा, 37% उत्पादन पशुओं के चारे में इस्तेमाल होगा, बाकी 23% बायोफ्यूल तथा अन्य कार्यों में इस्तेमाल किया जाएगा। हालांकि यह अनुपात फसलों के हिसाब से अलग-अलग है। गेहूं और चावल मुख्य रूप से भोजन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। मक्का तथा अन्य मोटे अनाज चारे के रूप में प्रयोग होते हैं। दुनिया में अनाज का मौजूदा इस्तेमाल 2.8 अरब टन के आसपास है, जिसके 2032 तक 3.1 अरब टन तक पहुंचने का अनुमान है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">लोगों के खाने में अनाज की मांग का इस्तेमाल 14.8 करोड़ टन बढ़ेगा जबकि चारे में इस्तेमाल 13 करोड़ टन बढ़ने के आसार हैं। डिमांड में अधिक वृद्धि एशियाई देशों से आएगी। चारे के रूप में अनाज की मांग में वृद्धि सबसे अधिक मक्के में 1.3% प्रतिवर्ष, गेहूं में 0.9% तथा मोटे अनाज में 0.6% प्रतिवर्ष रहेगी। भोजन में अनाज के प्रयोग में वृद्धि की दर पिछले दशक की तुलना में कम रहने की संभावना है। हालांकि गेहूं की मांग 2025 तक 11% बढ़ने के आसार हैं। इसमें से 40% वृद्धि भारत, पाकिस्तान, मिस्र और चीन से आएगी। लोगों के भोजन में गेहूं का इस्तेमाल 5.7 करोड़ टन बढ़ेगा लेकिन कुल खपत की तुलना में इसके 66% पर स्थिर रहने की संभावना है।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">भोजन के रूप में गेहूं की खपत में वृद्धि चारे की तुलना में तीन गुना होगी। यह वृद्धि मुख्य रूप से एशिया से आएगी जहां नूडल जैसे प्रोसेस्ड फूड की मांग बढ़ने की संभावना है। अगले एक दशक के दौरान मक्के की खपत हर साल 1.2% की दर से बढ़ने की संभावना है, जबकि पिछले दशक में इसमें 2.3% की दर से वृद्धि हुई थी। मोटे अनाजों की मांग में वृद्धि की दर अधिक होगी। वर्ष 2032 तक के उनके डिमांड सालाना 0.8% की दर से बढ़ने की संभावना है जबकि पिछले दशक में हर साल 0.2% की दर से वृद्धि हुई थी। चावल की डिमांड की वृद्धि दर अधिक रहेगी। हर साल इसकी खपत 1.1% बढ़ने के आसार हैं। मांग में जो वृद्धि होगी, उसका 66% एशियाई देशों से निकलेगी। इसकी प्रमुख वजह प्रति व्यक्ति खपत बढ़ना नहीं बल्कि आबादी में वृद्धि होगी।</span></p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ 2032 तक दुनिया के गेहूं-चावल उत्पादन वृद्धि में सबसे अधिक योगदान भारत का होगाः ओईसीडी-एफएओ आउटलुक ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[बेहतर उत्पादकता से अगले दशक में कृषि उत्पादन हर साल 1.1% बढ़ेगाः ओईसीडी&amp;#45;एफएओ एग्रीकल्चरल आउटलुक]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/better-yield-to-increase-agricultural-production-in-the-next-decade-says-oecd-fao-outlook.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 23 Jul 2023 08:52:53 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/better-yield-to-increase-agricultural-production-in-the-next-decade-says-oecd-fao-outlook.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">अगले एक दशक में दुनिया का कुल कृषि उत्पादन हर साल 1.1% बढ़ने की संभावना है। ज्यादातर वृद्धि मध्य तथा कम आय वाले देशों में होगी। अगर ऊर्जा और कृषि इनपुट, खासकर उर्वरकों की कीमतें बढ़ती हैं तो इससे उत्पादन लागत बढ़ेगी और इसका असर खाद्य पदार्थों की महंगाई और विश्व खाद्य सुरक्षा पर पड़ेगा। ओईसीडी-एफएओ एग्रीकल्चरल आउटलुक 2023-32 में यह बात कही गई है। खास बात यह है कि उत्पादन में ज्यादातर वृद्धि उत्पादकता बढ़ने के कारण होगी, कृषि योग्य खेती के विस्तार का असर कम होगा। इसलिए उत्पादकता बढ़ाने और बेहतर फार्म मैनेजमेंट पर निवेश जरूरी है। वैश्विक कृषि उत्पादन में वृद्धि का 79% प्लांट ब्रीडिंग और उत्पादन प्रणाली के कारण, 15% खेती योग्य भूमि के विस्तार के कारण और 6% ज्यादा क्रॉपिंग इंटेंसिटी के कारण होगा। आयल पाम तथा रेपसीड जैसी फसलों की उत्पादकता प्रमुख उत्पादक देशों में एक दशक के दौरान नहीं बढ़ी है, इस दिशा में निवेश बढ़ाने की जरूरत है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">फसलों की तरह मवेशी तथा मछली में भी उत्पादकता बढ़ने के कारण सालाना 1.3% उत्पादन बढ़ने के आसार हैं। वैश्विक मीट उत्पादन में आधी हिस्सेदारी पोल्ट्री क्षेत्र की होगी। दुनिया में अगले एक दशक के दौरान दूध का उत्पादन तेजी से बढ़ने की उम्मीद है। इसमें से आधी वृद्धि भारत और पाकिस्तान में होगी।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">रिपोर्ट के अनुसार, कृषि इनपुट की कीमतों में बीते दो वर्षों में जो वृद्धि हुई है उसने वैश्विक खाद्य सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। उर्वरकों की बढ़ती कीमत से खाद्य पदार्थों के दाम बढ़ सकते हैं। ओईसीडी-एफएओ एगलिंक-कॉसिमो मॉडलिंग के अनुसार उर्वरक की कीमतों में हर एक प्रतिशत वृद्धि से कृषि कमोडिटी के दाम 0.2% बढ़ेंगे। यह बढ़ोतरी उन फसलों में ज्यादा होगी जिनमें उर्वरकों का प्रयोग सीधे इनपुट के साथ पर होता है। मवेशियों के मामले में असर कम होगा, लेकिन पोल्ट्री पर असर अधिक होगा क्योंकि यह क्षेत्र कंपाउंड चारे पर काफी हद तक निर्भर करता है। उर्वरकों के अलावा ऊर्जा, बीज और मशीनरी की कीमत भी खाद्य पदार्थों की कीमतों को प्रभावित करेंगी।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कैलोरी के लिहाज से वैश्विक खाद्य खपत अगले एक दशक के दौरान हर साल 1.3% बढ़ने का अनुमान है। हालांकि यह पिछले एक दशक की तुलना में यह वृद्धि कम होगी। इसकी प्रमुख वजह आबादी के बढ़ने की रफ्तार और प्रति व्यक्ति आय की वृद्धि दर में कमी है। कृषि कमोडिटी का दूसरा सबसे अधिक इस्तेमाल मवेशियों तथा मछलियों के लिए चारे में होता है। कम तथा मध्य आय वाले देशों में इनका पालन तेजी से बढ़ेगा जिससे अगले एक दशक के दौरान चारे की मांग भी काफी तेजी से बढ़ेगी। इसके विपरीत उच्च आय तथा चीन जैसे उच्च मध्य आय वाले देशों में मवेशियों का पालन अपेक्षाकृत कम तेजी से बढ़ेगा, इसलिए वहां पिछले दशक की तुलना में चारे की मांग में वृद्धि कम होगी।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इस अवधि में बायोफ्यूल के लिए कृषि फसलों की मांग में वृद्धि अपेक्षाकृत धीमी रहेगी। ज्यादातर मांग भारत और इंडोनेशिया से निकलेगी क्योंकि वहां वाहन ईंधन की मांग के साथ ब्लेंडिंग के लिए बायोफ्यूल की मांग बढ़ेगी। अन्य प्रमुख बाजारों में यूरोपियन यूनियन में वाहनों के लिए ईंधन की मांग में कमी आने से बायोफ्यूल की मांग भी कम होने का अनुमान है। कुल मिलाकर बायोफ्यूल के लिए गन्ना और वनस्पति तेल की मांग बढ़ने का अनुमान है जबकि मक्के की मांग में गिरावट की संभावना है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">जहां तक कृषि से ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन का सवाल है तो अगले दशक में उसमें 7.6% वृद्धि की आशंका है। यह कृषि उत्पादन में 12.8% वृद्धि की तुलना में कम है। इससे अंदाजा मिलता है कि कृषि उत्पादन में कार्बन इंटेंसिटी में तेजी से गिरावट आएगी। हालांकि जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने के लिए मवेशी क्षेत्र में कार्बन उत्सर्जन कम करने की जरूरत है। कृषि क्षेत्र में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में जो वृद्धि होगी उसका 80% मवेशी क्षेत्र से ही होगा।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">प्राथमिक कृषि जिंसों तथा प्रसंस्कृत उत्पादों का व्यापार अगले एक दशक में इनके उत्पादन के अनुपात में ही बढ़ने की संभावना है। कोविड-19 महामारी के दौरान दुनिया में व्यापार में कमी आई लेकिन कृषि जिंसों के व्यापार पर कुछ खास असर नहीं हुआ। रूस-यूक्रेन युद्ध जरूर कृषि जिंसों के कारोबार, खासकर यूक्रेन से होने वाले निर्यात तथा कीमतों को प्रभावित कर रहा है। निर्यात पर प्रतिबंधों से कीमतों में अनिश्चितता बढ़ती है और विश्व खाद्य सुरक्षा पर अल्पावधि में नकारात्मक असर होता है।</span></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/07/image_750x500_64bbd80cac369.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ बेहतर उत्पादकता से अगले दशक में कृषि उत्पादन हर साल 1.1% बढ़ेगाः ओईसीडी-एफएओ एग्रीकल्चरल आउटलुक ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[काला सागर अनाज समझौता टूटने से वैश्विक बाजारों में गेहूं की कीमतें बढ़ी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/wheat-prices-soar-in-global-markets-as-black-sea-grain-deal-collapses.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 20 Jul 2023 19:12:26 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/wheat-prices-soar-in-global-markets-as-black-sea-grain-deal-collapses.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>काला सागर अनाज समझौते से रूस के हाथ खींच लेने के बाद एक बार फिर से खाद्यान्नों की अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ सकती हैं और दुनिया पर खाद्यान्न संकट का खतरा मंडरा सकता है। अंतरराष्ट्रीय वायदा कारोबार में बुधवार को गेहूं के भाव में लगभग 9 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई। यह तीन सप्ताह में अपने उच्च स्तर पर पहुंचने की राह पर है क्योंकि यूक्रेन से अनाज के निर्यात की अनुमति देने वाले इस महत्वपूर्ण सौदे से रूस के बाहर निकलने के आश्चर्यजनक फैसले के बाद यूरोप में तनाव बढ़ गया है।</p>
<p>इसका असर मक्का के वायदा भाव पर भी देखा जा रहा है। व्यापारियों को आशंका है कि इस सौदे के टूटने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं की आपूर्ति प्रभावित होगी। इस वजह से मक्का के वायदा भाव में भी 2 फीसदी की तेजी आई। रूस के युद्धकालीन समझौते से हटने से दुनिया भर के उपभोक्ताओं के लिए खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ने का खतरा है। इससे लाखों लोग भूखमरी का शिकार हो सकते हैं। यह सौदा दुनिया भर में खाद्य पदार्थों की कीमतों को कम करने के लिए "महत्वपूर्ण" था। पिछले साल फरवरी में रूस द्वारा यूक्रेन पर हमले के बाद खाद्य पदार्थों की वैश्विक कीमतें बढ़ गई थी। बुधवार को दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ गया जिससे काला सागर से निर्यात होने वाले महत्वपूर्ण वस्तुओं का सौदा फिर से शुरू होने की संभावना सीमित हो गई।</p>
<p>रूसी रक्षा मंत्रालय ने बुधवार को दावा किया कि दक्षिणी यूक्रेन के ओडेसा पर उसके हमलों में सैन्य और ईंधन बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया गया। यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमिर ज़ेलेंस्की ने कहा है कि रूस ने "जानबूझकर अनाज सौदे के बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया है।" रूस के हमले में ओडेसा के बंदरगाह पर "औद्योगिक सुविधा" के साथ-साथ "एक अनाज और तेल टर्मिनल" भी तबाह हो गया।</p>
<p>हालांकि, गेहूं की कीमतें अभी भी मार्च 2022 के अपने उच्चत्तम स्तर से 50 फीसदी नीचे है। &nbsp;काला सागर समझौता मूल रूप से तुर्किये और संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से हुआ था। इसके तहत दुनिया के उन हिस्सों में यूक्रेनी बंदरगाहों से अनाज ले जाने वाले जहाजों का सुरक्षित मार्ग सुनिश्चित किया गया था जहां लाखों लोग भूखे रह रहे हैं। मगर रूस ने 17 जुलाई को इस सौदे को निलंबित कर दिया जिससे खाद्य पदार्थों की ऊंची कीमतों और अधिक भूखमरी का खतरा पैदा हो गया है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ काला सागर अनाज समझौता टूटने से वैश्विक बाजारों में गेहूं की कीमतें बढ़ी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[भारत के छोटे शहरों में व्यापार विस्तार की संभावना तलाश रहा चिली, हेल्दी प्रॉडक्ट्स को देगा बढ़ावा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/chile-arrives-in-india-to-strengthen-ties-and-increase-its-offer-of-healthy-products-with-a-seal-of-origin.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 21 Jun 2023 19:06:28 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/chile-arrives-in-india-to-strengthen-ties-and-increase-its-offer-of-healthy-products-with-a-seal-of-origin.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>चिली की योजना भारत के छोटे शहरों में अपनी बाजार मौजूदगी का विस्तार करने की है। इन शहरों में स्वस्थकर उत्पादों को बढ़ावा देकर अपनी पैठ बढ़ाने की उसकी योजना है। इसके लिए चिली के वरिष्ठ आर्थिक अधिकारियों का एक प्रतिनिधिमंडल इन दिनों भारत के दौरे पर है। प्रतिनिधिमंडल ने नई दिल्ली में सरकारी अधिकारियों के साथ बैठक की है। इसके अलावा मुंबई में वाणिज्य दूतावास के आधिकारिक उद्घाटन के साथ चिली के आर्थिक कार्यालय की शुरुआत की जाएगी।</p>
<p>प्रोचिली के जनरल डायरेक्टर इग्नासियो फर्नांडीज की अगुवाई में यह प्रतिनिधिमंडल भारत आया हुआ है। प्रोचिली चिली के विदेश मंत्रालय से संबंधित इकाई है जिसके पास निर्यात को बढ़ावा देने की जिम्मेदारी है। प्रतिनिधिमंडल में चिली के विभिन्न उत्पादक क्षेत्रों के व्यापार संघ एसओएफओएफए के प्रतिनिधि भी शामिल हैं। भारत के साथ व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने वाला चिली पहला लैटिन अमेरिकी देश है।</p>
<p>इग्नासियो फर्नांडीज ने कहा कि चिली का लक्ष्य भारत के टियर-2 और टियर-3 शहरों के बाजारों में संभावना तलाशना है। प्रोचिली भारत में नए बाजारों और अवसरों की पहचान करने के लिए स्थानीय आयातकों और व्यवसायों के साथ विचार-विमर्श कर रहा है। चिली ने पहले ही प्रमुख भारतीय शहरों में कृषि-उत्पाद खंड में खुद को स्थापित कर लिया है और अब छोटे शहरों में अखरोट और अन्य सूखे मेवों जैसे अपने प्रीमियम उत्पादों को बढ़ावा देना चाहता है। अपने उत्पादों के बारे में भारतीय ग्राहकों को जानकारी देने के लिए चिली वाइन और अन्य कार्यक्रमों पर एक मास्टरक्लास सहित एक ब्रांड-बिल्डिंग अभियान शुरू करने की भी योजना है।</p>
<p>वर्तमान में, चिली भारत को अखरोट, वाइन, चेरी, कीवी और प्रून जैसे विभिन्न उत्पादों का निर्यात करता है। दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते के तहत शामिल खाद्य उत्पादों की श्रेणी का विस्तार करने के लिए चिली उत्सुक है। चिली का उद्देश्य अपने मौजूदा व्यापार समझौते का लाभ उठाकर और सहयोग एवं व्यापार विस्तार के अवसरों की खोज करके भारत के साथ अपने व्यापार संबंधों को मजबूत करना और बढ़ाना है।</p>
<p>भारत में चिली के राजदूत जुआन एंगुलो ने इस तरह की बैठकों को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा, "भारत इस क्षेत्र में हमारे लिए एक महत्वपूर्ण सहयोगी साबित हुआ है। यहां की सांस्कृतिक समृद्धि, इसकी क्षेत्रीय विविधता और हजारों साल पुराना इतिहास हमें संबंधों को मजबूत करने के लिए खुलेपन को बढ़ावा देते हुए अपने निर्यात पोर्टफोलियो का विस्तार करने की अनुमति देता है।"</p>
<p>इग्नासियो फर्नांडीज ने कहा, "हमारे लिए यह बेहद महत्वपूर्ण है कि हम अपने वाणिज्यिक आदान-प्रदान को बढ़ाने के लिए भारतीय आयातकों के साथ हर दिन जो काम करते हैं वह दिखाई दे। हम लगातार अपने शिपिंग समय को अनुकूलित करने के तरीकों की तलाश कर रहे हैं, अपने प्रस्तावों को नया रूप दे रहे हैं और अधिक आकर्षक पैकेजिंग के साथ उच्च गुणवत्ता वाले और असाधारण स्वाद वाले उत्पादों के अनुरोध को पूरा कर रहे हैं।"</p>
<p>2016 में भारत और चिली के बीच तरजीही व्यापार समझौते के विस्तार पर नई दिल्ली में हस्ताक्षर किए गए थे। इससे समझौते का दायरा 474 वस्तुओं से बढ़कर 2829 हो गया। 2021 से दोनों देश इसे मजबूत बनाने के लिए तरजीही व्यापार समझौते के और विस्तार पर बातचीत कर रहे हैं। अगर विस्तार पर सहमति बन जाती है तो करीब 10 हजार उत्पादों तक चिली की पहुंच हो जाएगी।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ भारत के छोटे शहरों में व्यापार विस्तार की संभावना तलाश रहा चिली, हेल्दी प्रॉडक्ट्स को देगा बढ़ावा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[ग्लोबल मार्केट में ज्यादातर खाद्य कमोडिटी के दामों में गिरावट, लेकिन चावल और चीनी के दाम बढ़े]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/global-prices-of-food-products-fell-but-rice-and-sugar-are-exception.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 02 Jun 2023 15:06:51 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/global-prices-of-food-products-fell-but-rice-and-sugar-are-exception.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खाद्य कमोडिटी के दामों में मई में गिरावट आई है। ज्यादातर अनाज, वनस्पति तेल और डेयरी प्रोडक्ट के दाम घटे हैं। हालांकि चावल, चीनी और मीट की कीमतों में बढ़ोतरी भी हुई है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने गुरुवार को मई का फूड प्राइस इंडेक्स जारी किया जिसमें यह जानकारी दी गई है।<br />एफएओ के प्राइस इंडेक्स में फूड कमोडिटी की कीमतों में मासिक उतार-चढ़ाव को दर्ज किया जाता है। मई में यह इंडेक्स 124.3 पर रहा। अप्रैल की तुलना में इसमें 2.6% की गिरावट आई है। मार्च 2022 के सर्वकालिक उच्चतम स्तर से देखें तो यह 22.1% नीचे है।<br />एफएओ का सिरियल (अनाज) प्राइस इंडेक्स 4.8% कम हुआ है। उत्पादन के बेहतर आंकड़ों तथा आयात में कमी के चलते मक्के की कीमतों में 9.8% की कमी आई है। गेहूं के दाम में 3.5% कमी आई है। ब्लैक सी ग्रेट इनीशिएटिव के तहत गेहूं की पर्याप्त सप्लाई होने के चलते ऐसा हुआ है। हालांकि एशियाई देशों की मांग तथा वियतनाम और पाकिस्तान जैसे देशों से सप्लाई कम होने के कारण पिछले महीने चावल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बढ़ोतरी हुई है।<br />एफएओ का वेजिटेबल ऑयल प्राइस इंडेक्स 8.7% नीचे आया है। एक साल पहले से तुलना करें तो यह गिरावट 48.2% है। अप्रैल की तुलना में पाम ऑयल की कीमतों में खासी गिरावट आई है क्योंकि इसकी आयात मांग कम है। दूसरी तरफ प्रमुख उत्पादक देशों में उत्पादन के आंकड़े अच्छे हैं। सोया ऑयल की कीमतों में लगातार छठे महीने गिरावट आई है। ब्राजील में सोयाबीन की बंपर फसल हुई है और अमेरिका में इसका स्टॉक उम्मीद से अधिक है। ग्लोबल सप्लाई बढ़ने से सनफ्लावर और रेपसीड आयल के दामों में भी गिरावट का रुख बना हुआ है।<br />एफएओ डेयरी प्राइस इंडेक्स अप्रैल की तुलना में 3.2% नीचे आया है। उत्तरी गोलार्ध में दूध का उत्पादन बढ़ने और के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीज की कीमतों में कमी आई है। हालांकि बटर बनाने में इस्तेमाल होने वाले मिल्क पाउडर की कीमतों में बढ़ोतरी है। चीनी की कीमतों में लगातार चौथे महीने वृद्धि हुई है। अप्रैल की तुलना में यह 5.5% ज्यादा है। एक साल पहले की तुलना में अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीनी के भाव 31% ज्यादा हैं।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ ग्लोबल मार्केट में ज्यादातर खाद्य कमोडिटी के दामों में गिरावट, लेकिन चावल और चीनी के दाम बढ़े ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कुछ यूरोपीय देशों के लिए चावल निर्यात के नियमों में ढील]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/rice-export-norms-to-certain-european-countries-eased.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 30 May 2023 17:27:02 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/rice-export-norms-to-certain-european-countries-eased.html</guid>
        <description><![CDATA[ <div dir="auto">भारत सरकार ने कुछ यूरोपीय देशों के लिए बासमती और गैर बासमती चावल के निर्यात के लिए एक्सपोर्ट इंस्पेक्शन एजेंसी द्वारा जारी किया जाने वाले सर्टिफिकेट ऑफ इंस्पेक्शन की अनिवार्यता को छह माह के लिए स्थगित कर दिया है।</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">डायरेक्टरेट जनरल ऑफ फॉरेन ट्रेड (डीजीएफटी) ने कहा है कि वह 17 अगस्त, 2022 के उस नोटिफिकेशन को संशोधित कर रहा है जिसके तहत यूरोपीय यूनियन (ईयू) और कुछ दूसरे यूरोपीय देशों को बासमती और गैर-बासमती चावल के निर्यात के लिए एक्पोर्ट इंस्पेक्शन काउंसिल और एक्सपोर्ट इंसपेक्शन एजेंसी से सर्टिफिकेट ऑफ इंस्पेक्शन लेना होता है।&nbsp;</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">उस समय ईयू के अलावा यूरोप के अन्य देशों में आइसलैंड, नार्वे, स्विटजरलैंड, लिचेंस्टीन और ब्रिटेन के लिए यह नोटिफिकेशन लागू किया गया था।&nbsp;</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">डीजीएफटी ने अधिसूचना में कहा था कि इन अधिसूचना के जारी होने के छह माह तक बाकी यूरोपीय देशोें को निर्यात के&nbsp; लिए सर्टिफिकेट ऑफ इंस्पेक्शन की जरूरत नहीं होगी। इसके पहले कहा गया था कि जनवरी से इन देशों को निर्यात करने के लिए सर्टिफिकेट अनिवार्य है।&nbsp;</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">भारत से निर्यात के लिए ईआईसी सर्टिफिकेट जारी करने वाली आधिकारिक संस्था है। जो देश से निर्यात होने वाले उत्पादों की गुणवत्ता और सुरक्षा संबंधी नियमों के पालन को लागू करने का काम करती है।&nbsp;</div> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/01/image_750x500_63bb0c6bda775.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ कुछ यूरोपीय देशों के लिए चावल निर्यात के नियमों में ढील ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[खाद्य असुरक्षा और कुपोषण की चुनौतियों से निपटने में जुटे हैं जी20 के कृषि वैज्ञानिक]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/g20-meeting-of-agricultural-chief-scientists-grapples-with-food-insecurity-malnutrition.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 29 Apr 2023 17:32:47 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/g20-meeting-of-agricultural-chief-scientists-grapples-with-food-insecurity-malnutrition.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत खाद्य असुरक्षा और कुपोषण को समाप्त करने के लिए विभिन्न चुनौतियों का सामना कर रहा है। जी20 देशों के प्रमुख कृषि वैज्ञानिक (एमएसीएस) इन ज्वलंत मुद्दों से निपटने और इसका समाधान खोजने में जुटे हुए हैं। हाल ही में बनारस में आयोजित जी20 देशों के प्रमुख कृषि वैज्ञानिकों की बैठक में इन मसलों पर विस्तार से चर्चा की गई है। इसके अलावा इसी साल अगस्त में एक अलग तकनीकी कार्यशाला की योजना बनाई जा रही है।</p>
<p>इसके एजेंडा पेपर में कहा गया है कि कोविड-19 महामारी ने हमारे कृषि-खाद्य प्रणालियों की कमजोरियों को और उजागर किया है। विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार सभी स्तरों पर साक्ष्य-आधारित निर्णय लेने के शक्तिशाली घटक हैं। साथ ही तालमेल, व्यापार-नापसंद की पहचान करने, कृषि-खाद्य प्रणालियों को बदलने और सतत विकास लक्ष्यों (Sustainable Development Goals) को प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण हैं। इसी के मुताबिक, सतत विकास के लिए 2030 के एजेंडा में एसडीजी (Sustainable Development Goals) के कार्यान्वयन के प्रमुख माध्यम के रूप में विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार (एसटीआई) को स्थान दिया गया है। 2021 में संयुक्त राष्ट्र खाद्य प्रणाली शिखर सम्मेलन (यूएनएफएसएस) में एसडीजी के लिए विज्ञान और नवाचार में निवेश करने की आवश्यकता जरूरत महसूस की गई थी।</p>
<p>विज्ञान और नवाचार का परिदृश्य लगातार विकसित हो रहा है और एजेंडा 2030 को हासिल करने के लिए नए अवसर प्रदान कर रहा है। जी20 देशों के प्रमुख कृषि वैज्ञानिकों की अगली बैठक में इस बात पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा कि विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार कैसे योगदान दे सकते हैं और सामाजिक और नैतिक आयामों पर उचित विचार के साथ खाद्य सुरक्षा और पोषण प्राप्त करने के लिए नए समाधान प्रदान कर सकते हैं ताकि कोई पीछे न छूट जाए।</p>
<p><a href="https://www.ruralvoice.in/national/nafed-opens-millets-outlet-in-delhi-haat-millets-dishes-and-products-will-be-available-here.html" title="मिलेट्स आउटलेट" target="_blank" rel="noopener"><strong>यह भी पढ़ेंः दिल्ली हाट में नैफेड ने खोला मिलेट्स आउटलेट, मोटा अनाज से बने व्यंजनों एवं उत्पादों का उठा सकेंगे लुत्फ</strong></a></p>
<p>कृषि वैज्ञानिकों को लगता है कि वैज्ञानिक ज्ञान को साझा करने और सभी स्तरों पर विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार के प्रभावी उपयोग के लिए जी20 के सदस्यों द्वारा समन्वित कार्यों की आवश्यकता है। स्थायी कृषि और खाद्य सुरक्षा हासिल करने के लिए समेकित और विश्वसनीय वैज्ञानिक जानकारी के मुख्य स्रोतों में से एक के रूप में जी20 के सदस्यों की भूमिका महत्वपूर्ण है।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/04/image_750x_644d068081771.jpg" alt="" /></p>
<p>प्रमुख कृषि वैज्ञानिकों की बैठक की एक मुख्य विशेषता यह पता लगाना है कि जी20 देश स्थायी कृषि-खाद्य प्रणाली और खाद्य सुरक्षा और पोषण प्राप्त करने के लिए विज्ञान-आधारित तकनीकी और नवीन समाधानों को कैसे साझा कर सकते हैं, कैसे विज्ञान और प्रौद्योगिकी के मोर्चे कृषि-खाद्य प्रणालियों को बदलने में सार्थक भूमिका निभा सकते हैं और खाद्य सुरक्षा और पोषण प्राप्त करने में मदद कर सकते हैं।</p>
<p>कृषि वैज्ञानिकों के सामने एक अन्य प्रमुख एजेंडा यह है कि मोटे अनाज और अन्य पोषक-अनाज वाली फसलों पर शोध और जागरूकता को किस तरह से बेहतर बनाया जा सकता है। जी20 सदस्यों के लिए एक बैकग्राउंड पेपर कहता है कि कुछ प्रमुख डिलिवरेबल्स में जी20 सदस्यों के बीच विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार पर ज्ञान साझा करना और ठोस कार्यों की आवश्यकता पर प्रकाश डालना शामिल है। साथ ही जी20 मिलेट्स और अन्य प्राचीन अनाज अंतरराष्ट्रीय अनुसंधान पहल (महर्षि) की शुरुआत करना है।</p>
<p><a href="https://www.ruralvoice.in/latest-news/govt-decision-to-ban-sugar-exports-notification-soon.html" title="चीनी निर्यात पर पाबंदी" target="_blank" rel="noopener"><strong>यह भी पढ़ेंः चीनी निर्यात पर प्रतिबंध, अधिसूचना जल्द, उत्पादन में 32 लाख टन गिरावट का अनुमान</strong></a></p>
<p>'वन हेल्थ' एक एकीकृत दृष्टिकोण है जिसका उद्देश्य करीब से जुड़े हुए और एक दूसरे पर निर्भर लोगों, पौधों, जानवरों और पारिस्थितिक तंत्रों के स्वास्थ्य को स्थायी रूप से संतुलित और अनुकूलित करना है। कोविड-19 महामारी के वैश्विक प्रभाव और प्रतिक्रिया, जानवरों से निकले एक वायरस के कारण मानव स्वास्थ्य संकट, स्वास्थ्य की रक्षा और खाद्य प्रणालियों में व्यवधान को रोकने के लिए समन्वित कार्रवाई की आवश्यकता पर यह प्रकाश डालता है। इसमें एक्टर्स का स्पेक्ट्रम शामिल है और टिकाऊ कृषि, पशु, पौधे, वन और जलीय कृषि स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, रोगाणुरोधी प्रतिरोध (एएमआर), खाद्य सुरक्षा, पोषण और आजीविका पर काम करता है।</p>
<p>जानवरों और मनुष्यों के बीच फैलने वाली बीमारियों का पूर्वानुमान लगाने, रोकने, पता लगाने और उसे नियंत्रित करने, एएमआर से निपटने, खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने, पर्यावरण से संबंधित मानव और पशु स्वास्थ्य खतरों को रोकने के साथ-साथ कई चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए 'वन हेल्थ' दृष्टिकोण सुनिश्चित करना आवश्यक है। सतत विकास लक्ष्यों (Sustainable Development Goals-SDGs) को प्राप्त करने के लिए भी ऐसा दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है। इस विषय पर विस्तार से चर्चा करने के लिए अगस्त 2023 में एक अलग तकनीकी कार्यशाला की योजना बनाई जा रही है।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/04/image_750x500_644d0648ada6d.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ खाद्य असुरक्षा और कुपोषण की चुनौतियों से निपटने में जुटे हैं जी20 के कृषि वैज्ञानिक ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/04/image_750x500_644d0648ada6d.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[एफएओ की रिपोर्टः कृषि खाद्य प्रणालियों में बढ़ी महिला समानता]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/womens-equality-improved-in-agrifood-systems-said-fao-report.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 15 Apr 2023 13:31:40 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/womens-equality-improved-in-agrifood-systems-said-fao-report.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>कृषि खाद्य प्रणालियों में आजीविका के लिए लैंगिक असमानताओं को कम करना, संसाधनों तक महिलाओं की पहुंच में सुधार करना और लचीलापन को बढ़ावा देना लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इसमें संपत्ति, प्रौद्योगिकी और संसाधनों तक उनकी पहुंच से संबंधित अंतर को खत्म &nbsp;करना शामिल है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) की एक नई रिपोर्ट में यह बात कही गई है।</p>
<p>विश्व स्तर पर महिलाओं को रोजगार देने के मामले में कृषि खाद्य प्रणाली प्रमुख है। कई देशों में तो पुरुषों की तुलना में महिलाओं के लिए यह आजीविका का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है। एफएओ की रिपोर्ट में कहा गया है कि महिलाओं की उत्पादकता में सुधार के हस्तक्षेप तब सफल होते हैं जब उनकी देखभाल की जाती है, उनके &nbsp;अवैतनिक घरेलू काम के बोझ कम होते हैं, उन्हें शिक्षा और प्रशिक्षण दिया जाता है और उनकी भूमि-काश्तकारी सुरक्षा को मजबूत किया जाता है। बच्चों की देखभाल से भी माताओं के रोजगार पर बड़ा सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों ने महिलाओं के रोजगार और लचीलेपन को बढ़ाया है।</p>
<p>रिपोर्ट में कहा गया है कि लैंगिक समानता के प्रति परिवर्तनकारी दृष्टिकोण भेदभावपूर्ण मानदंडों में बदलाव दिखाते हैं जो ज्यादा रिटर्न के साथ लागत प्रभावी हैं। एफएओ की रिपोर्ट में लिंग, आयु, सामाजिक और आर्थिक भेदभावों द्वारा अलग किए गए उच्च गुणवत्ता वाले डाटा की निरंतर कमी को दूर करने की सिफारिश की गई है। यह कृषि खाद्य प्रणालियों में लैंगिक समानता की दिशा में प्रगति की निगरानी और तेजी लाने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है। रिपोर्ट में शामिल कुछ प्रमुख निष्कर्षों के मुताबिक दुनिया के 46 में से 40 देशों में महिलाओं की तुलना में पुरुषों के पास कृषि भूमि पर अधिक स्वामित्व है या उन पर उनका सुरक्षित अधिकार है।</p>
<p><a href="https://www.ruralvoice.in/latest-news/el-nino-at-the-beginning-of-monsoon-season-may-impact-rain-adversely-in-india.html" title="अल-नीनो मानसून" target="_blank" rel="noopener"><strong>यह भी पढ़ेंः मानसून सीजन की शुरूआत में ही अल-नीनो की बढ़ी संभावना, बारिश घटने की आशंका</strong></a></p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/08/image_750x_62f8d278103fd.jpg" alt="" /></p>
<p>रिपोर्ट में कहा गया है कि 2017 से 2021 के बीच कम और मध्यम आय वाले देशों में मोबाइल इंटरनेट तक महिलाओं की पहुंच में लैंगिक अंतर 25 फीसदी से घटकर 16 फीसदी हो गया है। जबकि बैंक खातों तक पहुंच का लैंगिक अंतर 9 फीसदी से घटकर 6 फीसदी रह गया है। हालांकि, पुरुषों और महिलाओं के बीच खाद्य असुरक्षा का अंतर 2019 में 1.7 फीसदी अंक था जो 2021 में बढ़कर 4.3 फीसदी अंक हो गया। जबकि 68 देशों के कृषि और ग्रामीण विकास से संबंधित 75 फीसदी नीतिगत दस्तावेजों में महिलाओं की भूमिका एवं कृषि में महिलाओं की चुनौतियों और ग्रामीण विकास को मान्यता दी गई है। इन देशों में केवल 19 फीसदी नीतिगत लक्ष्य लिंग से संबंधित थे।</p>
<p>एफएओ की रिपोर्ट से पता चलता है कि कृषि खाद्य प्रणालियों में लैंगिक असमानताओं से निपटने और महिलाओं को सशक्त बनाने से भुखमरी कम होती है, अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलता है और जलवायु परिवर्तन एवं कोविड-19 जैसी महामारी के झटकों को झेलने के प्रति मजबूत मिलती है। वर्ष 2010 के बाद एग्रीफूड सिस्टम्स में महिलाओं की स्थिति पर यह अपनी तरह की पहली रिपोर्ट है। यह रिपोर्ट एग्रीफूड सिस्टम (उत्पादन से लेकर वितरण और खपत तक), जो कृषि से इतर है, में काम करने वाली महिलाओं की स्थिति की एक व्यापक तस्वीर प्रदान करती है।</p>
<p><a href="https://www.ruralvoice.in/latest-news/edible-oil-import-rises-8-pc-to-11-lakh-tonnes-in-march.html" title="खाद्य तेल आयात बढ़ा" target="_blank" rel="noopener"><strong>यह भी पढ़ेंः खाद्य तेलों का आयात 8% बढ़ा, इंडस्ट्री की क्रूड पाम ऑयल पर ड्यूटी बढ़ाने की मांग</strong></a></p>
<p>रिपोर्ट में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि विश्व स्तर पर कृषि खाद्य प्रणालियों में 36 फीसदी महिलाएं और 38 फीसदी कामकाजी पुरुष हैं। हालांकि, महिलाएं हाशिये पर होती हैं। उनके काम करने की स्थिति पुरुषों की तुलना में खराब रहने की संभावना रहती है। जैसे कि उन्हें अनियमित, अनौपचारिक, अंशकालिक, कम-कुशल, या श्रम आधारित काम मिलता है। इसी तरह, कृषि क्षेत्र में मजदूरी करने वाली महिलाओं को पुरुषों को मिलने वाले प्रत्येक एक डॉलर की तुलना में 82 सेंट ही मजदूरी मिलती है।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/02/image_750x_6210869bb0c2f.jpg" alt="" /></p>
<p>साथ ही महिलाओं की भूमि पर कम सुरक्षित कार्यकाल, क्रेडिट और प्रशिक्षण तक पहुंच कम है। उन्हें पुरुषों के लिए डिजाइन की गई तकनीक के साथ काम करना पड़ता है। भेदभाव के साथ-साथ ये असमानताएं समान आकार के खेतों में महिला और पुरुष किसानों के बीच उत्पादकता में 24 फीसदी का लैंगिक अंतर पैदा करती हैं।</p>
<p>यह अध्ययन खासकर इस बात को रेखांकित करता है कि कई देशों में कृषि खाद्य प्रणालियां पुरुषों की तुलना में महिलाओं के लिए आजीविका का अधिक महत्वपूर्ण स्रोत हैं। उदाहरण के लिए उप-सहारा अफ्रीका में 60 फीसदी पुरुषों की तुलना में 66 फीसदी महिलाओं को इस क्षेत्र में रोजगार मिला हुआ है। जबकि दक्षिणी एशिया में महिलाएं कृषि खाद्य प्रणालियों में काफी संख्या में काम करती हैं (71 फीसदी महिलाएं बनाम 47 फीसदी पुरुष)। हालांकि पुरुषों की तुलना में महिला श्रमिक कम हैं।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ एफएओ की रिपोर्टः कृषि खाद्य प्रणालियों में बढ़ी महिला समानता ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कृषि खाद्य व्यवस्था पर जीवनयापन के लिए निर्भर है दुनिया की आधी आबादीः एफएओ]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/half-of-world-population-lives-on-agrifood-systems-fao.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 04 Apr 2023 10:22:51 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/half-of-world-population-lives-on-agrifood-systems-fao.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>दुनिया की करीब आधी आबादी जीवनयापन के लिए कृषि खाद्य व्यवस्था पर निर्भर है। अपनी आजीविका के लिए कृषि खाद्य व्यवस्था पर निर्भर 3.83 अरब लोगों में से 2.36 अरब लोग एशिया में और 94 करोड़ लोग अफ्रीका में रहते हैं। 1.23 अरब लोगों को यह व्यवस्था सीधे तौर पर रोजगार देती है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के नए अध्ययन में यह बात सामने आई है। एफएओ ने इस अध्ययन की रिपोर्ट सोमवार को जारी की है। &nbsp;</p>
<p>कृषि खाद्य व्यवस्था में खाद्य और गैर-खाद्य उत्पादों का प्राथमिक उत्पादन, गैर-कृषि खाद्यों का उत्पादन, उत्पादकों से उपभोक्ताओं तक की खाद्य आपूर्ति श्रृंखला और अंतिम उपभोक्ता शामिल हैं। वैश्विक स्तर पर ये व्यवस्था सालाना लगभग 11 अरब टन खाद्य उत्पादन करती है और कई देशों की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। रोम स्थित एफएओ के नए शोध के मुताबिक, 2019 में दुनिया की कृषि खाद्य व्यवस्था में लगभग 1.23 अरब लोग कार्यरत थे। इस आंकड़े से तीन गुना से अधिक या दुनिया की आबादी का लगभग आधा एग्रीफूड सिस्टम पर निर्भर हैं।</p>
<p>रिपोर्ट में बताया गया है कि 1.23 अरब लोगों में से 85.7 करोड़ लोग प्राथमिक कृषि उत्पादन से जुड़े थे, जबकि 37.5 करोड़ लोग कृषि खाद्य प्रणाली के दूसरे क्षेत्र (गैर-उत्पादन क्षेत्र) में कार्यरत थे। यह अपनी तरह का पहला व्यवस्थित और दस्तावेजी वैश्विक अनुमान है जो कई स्रोतों से प्राप्त हुए हैं। इस क्षेत्र में अंशकालिक या मौसमी रोजगार के व्यापक उपयोग को भी इसमें शामिल किया गया है। ये आंकड़े कृषि क्षेत्रों के अलावा कृषि खाद्य प्रणालियों का भी उल्लेख करते हैं। साथ ही दुनिया की लगातार बढ़ती आबादी जो अभी 8 अरब है, का पेट भरने के लिए गैर-कृषि गतिविधियों के बढ़ते महत्व को दर्शाता हैं।</p>
<p>एफएओ के समावेशी ग्रामीण परिवर्तन और लैंगिक समानता विभाग के निदेशक और इस रिपोर्ट के प्रमुख लेखक बेन डेविस ने कहा &ldquo;कृषि खाद्य प्रणालियां एकीकृत तरीके से चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर नीतिगत और व्यावहारिक एजेंडे की जरूरत है। इसे बनाए रखने के लिए डाटा को कृषि रोजगार जैसे साइलो-आधारित धारणाओं से आगे बढ़ना चाहिए और उपभोक्ताओं के लिए प्रसंस्करण एवं परिवहन से लेकर वह सब कुछ जो हम खाते हैं, उसे खाद्य उत्पादन की पूरी प्रक्रिया में शामिल करना चाहिए।" एफएओ के इस अध्ययन को "एस्टीमेटिंग ग्लोबल एंड कंट्री लेवल एम्प्लॉयमेंट इन एग्रीफूड सिस्टम्स" नाम से संगठन के सांख्यिकी विभाग द्वारा वर्किंग पेपर के रूप में प्रकाशित किया गया था।</p>
<p>एफएओ की यह नई कवायद अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के डाटा के आधार पर इकोनोमेट्रिक मॉडलिंग का उपयोग करके एक सामंजस्यपूर्ण दृष्टिकोण अपनाती है। वर्किंग पेपर में बताया गया है कि एफएओ की ग्रामीण आजीविका सूचना प्रणाली (आरयूएलआईएस) डाटाबेस से पारिवारिक सर्वे के साथ यह मान्य है।</p>
<p>रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्षों में कहा गया है कि कृषि खाद्य व्यवस्था में कार्यरत लोगों की सबसे बड़ी संख्या एशिया में है। यहां के 79.3 करोड़ लोग इसमें कार्यरत हैं। इसके बाद अफ्रीका में लगभग 29 करोड़ लोगों को इसमें रोजगार मिला हुआ है। कम आय वाले देशों में आर्थिक रूप से सक्रिय अधिकांश आबादी, खासकर अफ्रीका में कम से कम एक लोग कृषि खाद्य प्रणालियों में नौकरी करते हैं या इससे जुड़ी गतिविधियों में शामिल हैं। अफ्रीका का 62 फीसदी रोजगार कृषि खाद्य प्रणालियों से जुड़े व्यापार और परिवहन गतिविधियों में है। जबकि एशिया में यह 40 फीसदी और अमेरिका में 23 फीसदी है। कुल रोजगार में कृषि खाद्य प्रणाली रोजगार का हिस्सा जो सीधे कृषि क्षेत्रों में नहीं है, यूरोप में 8 फीसदी से लेकर अफ्रीका में 14 फीसदी तक है। कुल कृषि खाद्य प्रणाली में 15 से 35 वर्ष की उम्र के लोगों की हिस्सेदारी करीब आधी है। खाद्य प्रसंस्करण और सेवाओं में उनकी हिस्सेदारी आमतौर पर अधिक है।</p>
<p>कोविड-19 महामारी के पहले वर्ष में कृषि खाद्य प्रणालियों में कार्यरत लोगों की संख्या में 6.8 फीसदी की कमी आई। कोविड-19 का प्रभाव लैटिन अमेरिका में सबसे अधिक था जहां रोजगार में 18.8 फीसदी की गिरावट आई। 13 अप्रैल को एफएओ एग्रीफूड सिस्टम्स में महिलाओं की स्थिति पर एक अलग रिपोर्ट प्रकाशित करेगा जिसमें एग्रीफूड सिस्टम्स में महिलाओं के रोजगार का डाटा दिया जाएगा।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ कृषि खाद्य व्यवस्था पर जीवनयापन के लिए निर्भर है दुनिया की आधी आबादीः एफएओ ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2021/11/image_750x500_6193598436146.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[दुनिया की 26 फीसदी आबादी पीने के सुरक्षित पानी से वंचित, 46 फीसदी के पास साफ&amp;#45;सफाई के लिए नहीं है सुविधाः यूएन रिपोर्ट]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/un-report-said-26-pc-of-world-population-lacks-clean-drinking-water-46-pc-sanitation.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 22 Mar 2023 17:59:59 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/un-report-said-26-pc-of-world-population-lacks-clean-drinking-water-46-pc-sanitation.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>दुनिया की 26 फीसदी आबादी आज भी पीने के साफ और सुरक्षित पानी से वंचित है, जबकि 46 फीसदी आबादी के पास साफ-सफाई के लिए पानी की सुविधा नहीं है। पानी पर संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है। आज विश्व जल दिवस है। लोगों को पानी का महत्व बताने और इसका संरक्षण करने के लिए हर साल इसी तारीख को विश्व जल दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा विश्व जल दिवस पर सालाना सम्मेलन आयोजित होता है जो इस बार 22 से 24 मार्च तक न्यूयॉर्क में हो रहा है। इसका मकसद लोगों में जल संरक्षण को लेकर जागरूकता फैलाना है। पानी को लेकर संयुक्त राष्ट्र 45 वर्ष बाद बड़ा सम्मेलन आयोजित कर रहा है।</p>
<p>विश्व जल दिवस की पूर्व संध्या पर जारी संयुक्त राष्ट्र विश्व जल विकास रिपोर्ट 2023 में 2030 तक सभी के लिए पीने का साफ पानी और साफ-सफाई के लिए पानी की उपलब्धता तक पहुंच सुनिश्चित करने का लक्ष्य रखा गया है। रिपोर्ट में पानी की अनुपलब्धता के विशाल अंतर की स्पष्ट तस्वीर पेश की गई है। रिपोर्ट के प्रधान संपादक रिचर्ड कॉनर ने कहा कि लक्ष्यों को पूरा करने की अनुमानित लागत 600 अरब अमेरिकी डॉलर से 1 खरब डॉलर के बीच है। समान रूप से महत्वपूर्ण निवेशकों, फाइनेंसरों, सरकारों और जलवायु परिवर्तन समुदायों के साथ संयुक्त राष्ट्र साझेदारी कर रहा है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि पर्यावरण को बनाए रखने के तरीकों और उन 2 अरब लोगों को पीने योग्य पानी और 3.6 अरब लोगों को स्वच्छता के लिए पानी उपलब्ध कराने पर निवेश किया जाए जिन्हें इसकी जरूरत है। &nbsp;</p>
<p>रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले 40 वर्षों में विश्व स्तर पर लगभग एक फीसदी सालाना की दर से पानी का उपयोग बढ़ रहा है। जनसंख्या वृद्धि, सामाजिक-आर्थिक विकास और पानी की खपत के तरीके में परिवर्तन के बावजूद 2050 तक इसी दर से इसके बढ़ने की उम्मीद है। कॉनर के मुताबिक, मांग में वास्तविक वृद्धि विकासशील देशों और उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में हो रही है जहां औद्योगिक विकास और विशेष रूप से शहरों की जनसंख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है। शहरी क्षेत्र वास्तव में मांग में बड़ी वृद्धि कर रहे हैं।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/03/image_750x_641af3ebec8b2.jpg" alt="" /></p>
<p>उन्होंने कहा कि वैश्विक स्तर पर 70 फीसदी पानी का उपयोग कृषि क्षेत्र में हो रहा है। फसलों की सिंचाई के लिए ज्यादा कारगर तरीके अपनाने की जरूरत है ताकि पानी की बचत हो सके। कुछ देशों में अब ड्रिप सिंचाई का इस्तेमाल होता है जिससे पानी की बचत होती है। इससे शहरों को पानी उपलब्ध हो सकेगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से बारिश के पानी की कमी उन क्षेत्रों में बढ़ेगी जहां यह वर्तमान में प्रचुर मात्रा में है जैसे कि मध्य अफ्रीका, पूर्वी एशिया और दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों में। जबकि पश्चिम एशिया और अफ्रीका के सहारा क्षेत्रों में स्थिति और भी बदतर हो जाएगी जहां पहले से पानी की कमी है।</p>
<p>यूनेस्को, यूएन एजुकेशनल, साइंटिफिक और सांस्कृतिक संगठन द्वारा जारी इस रिपोर्ट में कहा गया है कि &nbsp;वैश्विक आबादी की औसतन 10 फीसदी आबादी ज्यादा या गंभीर जल संकट वाले देशों में रहती है। दुनिया के करीब 3.5 अरब लोग साल में कम से कम एक महीने पानी के संकट की स्थिति में रहते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2000 के बाद से उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में बाढ़ की समस्या चार गुना बढ़ गई है, जबकि उत्तरी मध्य अक्षांशों में बाढ़ 2.5 गुना बढ़ गई है। सूखे के रुझान को प्रमाणित करना अधिक कठिन है। हालांकि जलवायु परिवर्तन के प्रत्यक्ष परिणाम के रूप में अधिकांश क्षेत्रों में सूखे की तीव्रता या आवृत्ति और गर्मी में तेज वृद्धि की उम्मीद की जा सकती है।</p>
<p>कॉनर ने कहा कि जहां तक ​​जल प्रदूषण की बात है तो प्रदूषण का सबसे बड़ा स्रोत गंदे पानी को बिना साफ किए प्राकृतिक जल स्रोतों में छोड़ा जाना है। वैश्विक स्तर पर 80 फीसदी गंदा पानी बिना साफ किए ही नदियों, तालाबों, समुद्रों जैसे प्राकृतिक स्रोतों में छोड़ दिया जाता है। कई विकासशील देशो में तो 99 फीसदी तक गंदा पानी इन जल स्रोतों में बहा दिया जाता है।&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ दुनिया की 26 फीसदी आबादी पीने के सुरक्षित पानी से वंचित, 46 फीसदी के पास साफ-सफाई के लिए नहीं है सुविधाः यूएन रिपोर्ट ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/03/image_750x500_641af3afdcebe.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[रूस ने यूक्रेन से अनाज निर्यात की अनुमति 60 दिन बढ़ाई, गेहूं के वैश्विक दाम में नरमी संभव]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/russia-will-extend-ukraine-grain-deal-for-60-days-bringing-down-wheat-prices.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 18 Mar 2023 17:37:23 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/russia-will-extend-ukraine-grain-deal-for-60-days-bringing-down-wheat-prices.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">रूस ने यूक्रेन से ब्लैक सी (काला सागर) के रास्ते अनाज निर्यात की अवधि बढ़ाने की अनुमति दे दी है। उसने तुर्की और यूक्रेन से कहा है कि यह अनुमति 60 दिनों के लिए होगी, यानी 18 मई 2023 तक। पिछले साल जुलाई में संयुक्त राष्ट्र और तुर्की की मध्यस्थता के बाद रूस ने पहली बार काला सागर के तीन बंदरगाहों के रास्ते यूक्रेन से अनाज और उर्वरकों के निर्यात की इजाजत दी थी। रूस के इस फैसले से विश्व बाजार में गेहूं की कीमतों में नरमी आने की संभावना है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">उस समय रूस ने जो अनुमति दी थी उसकी अवधि नवंबर में खत्म हो गई थी। उसी समय उसे 4 महीने के लिए रिन्यू किया गया था। वह अवधि भी शनिवार को खत्म हो रही थी। संयुक्त राष्ट्र ने मानवीय आधार पर इसे बढ़ाने की गुहार लगाई थी। समझौते के मुताबिक दोनों पक्षों में से अगर कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराता है तो समझौता और 120 दिनों के लिए बढ़ जाएगा, लेकिन रूस ने इस पर आपत्ति जताई थी।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">संयुक्त राष्ट्र के मानवीय मामलों के अंडर सेक्रेट्री जनरल मार्टिन ग्रिफिथ्स ने सुरक्षा परिषद की बैठक में कहा कि पिछले साल लागू किए गए ग्रेन इनीशिएटिव के तहत अगस्त 2022 से अभी तक लगभग 2.5 करोड़ टन अनाज का निर्यात किया गया है। संयुक्त राष्ट्र के वर्ल्ड फूड प्रोग्राम ने अफगानिस्तान, इथोपिया, केन्या, सोमालिया और यमन को मानवीय आधार पर 5 लाख टन से अधिक गेहूं भेजा है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">ग्रिफिथ्स के अनुसार इस दिशा में काफी प्रगति हुई है लेकिन अब भी कई बाधाएं हैं, खासकर पेमेंट सिस्टम को लेकर। हालांकि रूस ने बैठक में कहा कि यह समझौता काम नहीं कर रहा है। उसने यह भी कहा कि यूक्रेन से अनाज निर्यात का जो समझौता हुआ था वह विकासशील देशों को मानवीय आधार पर मदद के लिए था क्योंकि उन देशों को अनाज के दाम बढ़ने से काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था। लेकिन यह पहल वास्तव में एक कमर्शियल डील बन गई जिससे दुनिया की चार बड़ी एग्रीबिजनेस कंपनियों को फायदा हो रहा है। यह कंपनियां पश्चिमी देशों की हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इसलिए रूस ने तुर्की और यूक्रेन को आधिकारिक तौर पर सूचित किया है कि वह ब्लैक सी ग्रेन इनीशिएटिव को आगे बढ़ाने के लिए तैयार है लेकिन सिर्फ 60 दिनों के लिए। रूस के अनुसार अगर ब्रुसेल्स, वाशिंगटन, लंदन वास्तव में यूक्रेन से मानवीय आधार पर अनाज का निर्यात जारी रखना चाहते हैं तो उनके पास रूस के कृषि क्षेत्र समेत पूरी चेन को प्रतिबंध से छूट देने के लिए 2 महीने का समय है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अमेरिका ने कहा, पूरी दुनिया जानती है कि रूस से खाद्य पदार्थों का निर्यात युद्ध से पहले के स्तर पर पहुंच गया है। रूस की सरकार भले कह रही है कि उसे अनाज और उर्वरकों का निर्यात नहीं करने दिया जा रहा है, लेकिन आंकड़े कुछ और कहते हैं। अमेरिका ने यूक्रेन के बंदरगाहों से जहाजों के रवाना होने में देरी के लिए भी रूस की आलोचना की है और कहा है कि इससे ट्रांसपोर्टेशन का खर्चा बढ़ रहा है।</span></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/06/image_750x500_62bc976da46a7.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ रूस ने यूक्रेन से अनाज निर्यात की अनुमति 60 दिन बढ़ाई, गेहूं के वैश्विक दाम में नरमी संभव ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/06/image_750x500_62bc976da46a7.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कृषि निर्यात के  रिकार्ड 50 अरब डॉलर को पार करने की संभावना, आयात बढ़ने से ट्रेड सरप्लस अभी भी 2013&amp;#45;14  से कम रहेगा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/agri-exports-may-surpass-50-billion-dollar-trade-surplus-will-be-lower-than-2014-due-to-import-surge.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 13 Feb 2023 00:16:54 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/agri-exports-may-surpass-50-billion-dollar-trade-surplus-will-be-lower-than-2014-due-to-import-surge.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>चालू वित्त वर्ष (2022-23) में कृषि उत्पादों का निर्यात पिछले साल के 50 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर को पार कर सकता है। लेकिन इसके साथ ही जिस तरह से आयात बढ़े हैं उसके चलते कृषि उत्पादों का ट्रेड सरप्लस अभी भी 2013-14 से कम रहेगा। वहीं आने वाले साल में कृषि उत्पादों के निर्यात की वृद्धि कमजोर रहने के आसार हैं। खाद्य तेलों के आयात के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने के साथ कॉटन में भी हम निवल आयातक बन गये हैं।</p>
<p>वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल से दिसंबर, 2022 के बीच देश से 39 अरब डॉलर के कृषि उत्पादों का निर्यात हुआ जो इसके पहले साल की समान अवधि के 36.2 अरब डॉलर के निर्यात से 7.9 फीसदी अधिक है। वहीं जिस गति से निर्यात बढ़ रहा है उसके चलते चालू साल में कृषि और सहयोगी क्षेत्र के उत्पादों के निर्यात का 2021-22 के रिकॉर्ड स्तर को पार करना तय है।</p>
<p>चालू साल में जिस तेजी से निर्यात बढ़ा है उसी तेजी से कृषि उत्पादों का आयात भी बढ़ा है। अप्रैल से दिसंबर, 2022 के दौरान कृषि उत्पादों का आयात 27.8 अरब डॉलर रहा है जो पिछले साल की इसी अवधि के 24.1 अरब डॉलर के आयात के मुकाबले 15.4 फीसदी अधिक है। इसके चलते ट्रेड सरप्लस में गिरावट आ रही है। साल 2020-21 में ट्रेड सरप्लस 20.2 अरब डॉलर रहा था जो 2021-22 में कम होकर 17.8 अरब डॉलर रह गया था। वहीं इसके दस साल पहले 2012-12 में कृषि उत्पादों का ट्रेड सरप्लस 22.7 अरब डॉलर था जो 2013-14 में बढ़कर 27.7 अरब डॉलर पर पहुंच गया था जो अभी तक का रिकॉर्ड स्तर है।</p>
<p>जहां तक निर्यात की बात है तो उसमें दो सबसे अहम उत्पाद चावल और चीनी हैं। 2021-22 में भारत से 212.10 लाख टन चावल का निर्यात हुआ जिसकी कीमत 9.66 अरब डॉलर थी। इसमें 6.12 अरब डॉलर का 176 लाख टन गैर बासमती चावल का निर्यात और 3.54 रब डॉलर के 39.50 लाख टन बासमती चावल का निर्यात शामिल है। चालू वित्त वर्ष में चावल निर्यात में वृद्धि का मुख्य कारक बासमती निर्यात है। चालू साल में अप्रैल से दिसंबर, 2022 के दौरान बासमती निर्यात में 40.3 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है और इस दौरान 3.34 अरब डॉलर का बासमती चावल निर्यात हुआ जो पिछले साल की इसी अवधि में 2.38 अरब डॉलर रहा था। वही निर्यात की मात्रा में 16.6 फीसदी की वृद्धि हुई है और यह अप्रैल से दिसंबर, 2021 के 27.40 लाख टन के मुकाबले बढ़कर 32 लाख टन पर पहुंच गया। वहीं गैर-बासमती चावल के निर्यात में केवल 3.3 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है। अप्रैल से दिसंबर, 2022 के दौरान 4.66 अरब डॉलर के 131.70 लाख टन गैर-बासमती चावल का निर्यात हुआ&nbsp; जबकि अप्रैल से दिसंबर, 2021 के बीच 4.51 अरब डॉलर के 126 लाख टन गैर बासमती चावल का निर्यात हुआ। कीमत के मामले में गैर बासमती चावल के निर्यात में 3.3 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है और मात्रा के मामले में 4.6 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।</p>
<p>&nbsp;निर्यात में दूसरा अहम उत्पाद चीनी रहा है। साल 2021-22 में 4.60 अरब डॉलर की चीनी निर्यात हुई थी। पिछले तीन साल में चीनी निर्यात में लगातार बढ़ोतरी हुई है जो 2020-21 में 2.79 अरब डॉलर रहा था। इसके पहले साल 1.97 अरब डॉलर और उसके पहले साल 1.36 अरब डॉलर की चीनी का निर्यात हुआ था। वहीं चालू साल (2022-23) में अप्रैल से दिसंबर के दौरान चीनी का निर्यात 43.6 फीसदी बढ़कर 3.99 अरब डॉलर पर पहुंच गया जो अप्रैल से दिसंबर 2021 में 2.78 अरब डॉलर रहा था। चालू साल में चावल का निर्यात 11 अरब डॉलर और चीनी का निर्यात 6 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। समुद्री उत्पादों का निर्यात भी पिछले साल के 7.77 अरब डॉलर को पार कर सकता है। अप्रैल से दिसंबर 2022 के दौरान समुद्री उत्पादों का निर्यात 2.77 फीसदी बढ़कर 6.29 अरब डॉलर रहा जो पिछले साल की इसी अवधि में 6.12 अरब डॉलर रहा था।</p>
<p>लेकिन मीट, मसालों और कपास के साथ ही गेहूं का निर्यात भी पिछले साल से कम रहने की संभावना है। बफैलो मीट का निर्यात अप्रैल से दिसंबर, 2022 के दौरान 2.39 अरब डॉलर रहा जो 2021 की इसी अवधि के 2.51अरब डॉलर मुकाबले 5.1 फीसदी कम है। इसके साथ ही मसालों का निर्यात भी चालू साल में अप्रैल से दिसंबर, 2022 के दौरान पिछले साल की इसी अवधि के 2.95 अरब डॉलर के मुकाबले 6.7 फीसदी गिरकर 2.75 अरब डॉलर रह गया। हालांकि अप्रैल से दिसंबर, 2022 के दौरान गेहूं का निर्यात 3.9 फीसदी बढ़कर 1.51 अरब डॉलर रहा जो इसके पहले साल इसी अवधि में 1.45 अरब डॉलर रहा था। लेकिन इसके पिछले साल की पूरी अवधि के 2.12 अरब डॉलर के 72.30 लाख टन गेहूं निर्यात के स्तर पर पहुंचने की संभावना बहुत कम है। सरकार ने गेहूं की सरकारी खरीद के लक्ष्य से आधे से भी कम रहने और उत्पादन में गिरावट के चलते मई में इसके निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था।</p>
<p>दूसरी ओर चालू वित्त वर्ष में कृषि उत्पादों का आयात काफी बढ़ा है। खाद्य तेलों का आयात 2020-21 में 11.09 अरब डॉलर था जो 2021-22 में बढ़कर 18.99 अरब डॉलर पर पहंच गया था। लेकिन चालू वित्त वर्ष (2022-23) में खाद्य तेलों का आयात अप्रैल से दिसंबर, 2022 के दौरान 14.7 फीसदी बढ़कर 16.10 अरब डॉलर रहा जो इसके पहले साल इसी अवधि में 14.04 अरब डॉलर रहा था। सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन (एसईए) के आंकड़ों के मुताबिक 2021-22 तेल वर्ष (नवंबर से अक्तूबर) के दौरान खाद्य तेलों का आयात 140.30 लाख टन रहा। वहीं नवंबर और दिसंबर 2022 में खाद्य तेलों का आयात इसके पहले साल के इन दो माह के 23.60 लाख टन से 30.9 फीसदी बढ़कर 30.80 लाख टन रहा। इसके चलते खाद्य तेलों का आयात देश की कुल खपत करीब 230 लाख टन के 60 फीसदी तक पहुंच गया है।</p>
<p>वहीं एक समय में रिकॉर्ड स्तर को छूने वाले कपास निर्यात में लगातार गिरावट के बाद हम निवल आयातक हो गये हैं। 2011-12 में देश से 4.33 अरब डॉलर का कॉटन निर्यात हुआ था। जिसमें इसके बाद गिरावट आई और 2021-22 में देश से 2.82 अरब डॉलर का निर्यात हुआ। चालू वित्त वर्ष में अप्रैल से दिसंबर, 2022 के दौरान कॉटन निर्यात केवल 51.20 करोड़ डॉलर का रहा है जबकि 2021 की इसी अवधि में कॉटन निर्यात 1.97 अरब डॉलर रहा था। वहीं इस दौरान कॉटन आयात पिछले साल के 41.45 करोड़ डॉलर के मुकाबले बढ़कर 1.32 अरब डॉलर पर पहुंच गया। इस आधार पर चालू साल में भारत कॉटन का निवल आयातक बन जाएगा।</p>
<p>वहीं अप्रैल से दिसंबर, 2022 के दौरान काजू का आयात 64.6 फीसदी बढ़कर 1.64 अरब डॉलर पर पहुंच गया जो इसके पहले साल 99.64 करोड़ डॉलर रहा था। वहीं काजू का निर्यात अप्रैल से दिसंबर, 2022 के दौरान 25.97 करोड़ रह गया जो इसके पहले साल इसी अवधि में 34.46 करोड़ डॉलर रहा था। मसालों के निर्यात में भी पिछले साल के मुकाबले गिरावट दर्ज की गई है। मसालों का निर्यात 2.95 अरब डॉलर से घटकर 2.75 अरब डॉलर रहा है। वहीं इस दौरान मसालों का आयात पिछले साल के 95.57 करोड़ डॉलर से बढ़कर 1.03 अरब डॉलर रहा है।</p>
<p>वहीं वैश्विक बाजार में कृषि उत्पादों की कीमतों में आई गिरावट के चलते भारतीय निर्यात में भी गिरावट आ सकती है। पिछले कुछ बरसों में वैश्विक बाजार में कीमतें बढ़ने के साथ ही हमारे निर्यात बढ़े हैं वहीं कीमतों में गिरावट के बाद हमारे निर्यात भी कमजोर रहे हैं। यूनाइटेड नेशंस के फूड एंड एग्रीकल्चर आर्गनाइजेशन (एफएओ) के फूड प्राइस इंडेक्स का स्तर जब 2012-13 में 122.5 और 2013-14 में 119.1 अंकों के स्तर पर था तो हमारे निर्यात बढ़े। लेकिन 2015-16 और 2016-17 में जब इंडेक्स घटकर 90-95 पर आ गया तो हमारे कृषि निर्यात भी कम हो गये थे। वहीं रूस-यूक्रेन के बीच युद्ध शुरू होने के बाद जब मार्च 2022 में जब एफएओ फूड प्राइस इंडेक्स बढ़कर 159.7 अंकों के स्तर पर पहुंच गया था। उससे संकेत मिलते हैं कि वैश्विक बाजार में कृषि उत्पादों के दाम बढ़ने का हमें फायदा हुआ। लेकिन अब इसमें गिरावट आ रही है और जनवरी, 2023 में एफएओ फूड प्राइस इंडेक्स कम होकर 131.2 अंकों पर आ गया जो सितंबर, 2021 के बाद का सबसे कम स्तर है। इससे यह बात के संकेत मिलते हैं अगर कीमतों गिरावट का ट्रेंड बना रहता है तो आने वाले साल में हमारा कृषि निर्यात कमजोर रह सकता है।</p>
<p>&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ कृषि निर्यात के  रिकार्ड 50 अरब डॉलर को पार करने की संभावना, आयात बढ़ने से ट्रेड सरप्लस अभी भी 2013-14  से कम रहेगा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[बढ़ती आबादी को भोजन उपलब्ध कराने की दुनिया की क्षमता खतरे मेंः एफएओ]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/new-un-report-warns-that-global-food-crises-likely-to-increase-in-the-future-without-wider-systemic-change.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 03 Dec 2022 09:12:20 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/new-un-report-warns-that-global-food-crises-likely-to-increase-in-the-future-without-wider-systemic-change.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">बढ़ती आबादी को भोजन उपलब्ध कराने की विश्व की क्षमता खतरे में पड़ती जा रही है। अगर बड़े पैमाने पर सामाजिक-आर्थिक और पर्यावरण बदलाव नहीं किए गए तो दीर्घकालिक कृषि खाद्य प्रणाली को हासिल कर पाना नामुमकिन होगा। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) ने शुक्रवार को जारी एक रिपोर्ट में यह बात कही है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">खाद्य एवं कृषि का भविष्य (द फ्यूचर ऑफ फूड एंड एग्रीकल्चर) शीर्षक से प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2050 तक कृषि क्षेत्र पर दुनिया की 10 अरब आबादी को खिलाने का बोझ होगा। अगर मौजूदा ट्रेंड को बदलने के विशेष प्रयास नहीं किए गए तो इतनी बड़ी आबादी के लिए भोजन उपलब्ध करा पाना बड़ी चुनौती होगी।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">रिपोर्ट में कृषि खाद्य प्रणाली की मौजूदा और उभरते ट्रेंड का विश्लेषण किया गया है। साथ ही इसमें यह भी आकलन करने की कोशिश की गई है कि भविष्य में ट्रेंड कैसा रह सकता है। रिपोर्ट में उन मुद्दों और समस्याओं की भी पहचान की गई है जिनका आने वाले दिनों में खाद्य पदार्थों के उपभोग और कृषि उत्पादन पर असर होगा।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">रिपोर्ट में नीति नियंताओं से यह आग्रह किया गया है कि वे अल्पावधि की जरूरतों से ऊपर उठकर सोचें। इसके मुताबिक दूरदृष्टि की कमी, टुकड़ों-टुकड़ों में अपनाए गए दृष्टिकोण और महज तात्कालिक समाधान के उपाय सबके लिए भारी पड़ेंगे। इसलिए एक ऐसे दृष्टिकोण की जरूरत है जिसमें दीर्घकालिक लक्ष्य और सस्टेनेबिलिटी को प्राथमिकता दी गई हो।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इसमें कहा गया है कि बढ़ती आबादी, बढ़ता शहरीकरण, मैक्रोइकोनॉमिक अस्थिरता, गरीबी और असमानता, भू राजनीतिक तनाव और युद्ध, प्राकृतिक संसाधनों को लेकर बढ़ती प्रतिस्पर्धा और जलवायु परिवर्तन सामाजिक आर्थिक प्रणाली को बुरी तरह प्रभावित कर रहे हैं और पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहे हैं। सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल (टिकाऊ विकास के लक्ष्य) के अनेक बिंदुओं की तरफ हम नहीं बढ़ रहे हैं। इन लक्ष्यों को तभी हासिल किया जा सकता है जब कृषि खाद्य प्रणाली को उचित तरीके से बदला जाए।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">रिपोर्ट में 18 सामाजिक-आर्थिक और पर्यावरण कारकों की पहचान की गई है जिन्हें &lsquo;ड्राइवर&rsquo; कहा गया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि कैसे यह कारक कृषि खाद्य प्रणाली में होने वाली विभिन्न गतिविधियों को आकार देते हैं। इनमें खेती के अलावा खाद्य प्रसंस्करण और खाद्य पदार्थों का उपभोग भी शामिल है। इसमें गरीबी और असमानता, भू-राजनैतिक अस्थिरता, संसाधनों की कमी तथा जलवायु परिवर्तन को महत्वपूर्ण कारकों में रखा गया है और कहा गया है कि भविष्य का खाद्य कैसा होगा वह इस बात पर निर्भर करेगा कि हम इन कारकों का प्रबंधन किस तरीके से करते हैं। अगर हालात अभी की तरह बने रहे तो खाद्य असुरक्षा, संसाधनों की कमी और अस्थिर आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलेगा।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि विकास के टिकाऊ लक्ष्य (एसडीजी) को हासिल करने के रास्ते से दुनिया काफी अलग हट गई है। इसमें कृषि खाद्य के लक्ष्य को हासिल करना भी शामिल है। ऐसे अनेक कारण हैं जो निराशा बढ़ाने वाले हैं, लेकिन रिपोर्ट में यह उम्मीद भी जताई गई है कि अगर सरकारें, उपभोक्ता, बिजनेस, अकादमिक जगत और अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब भी गंभीरता पूर्वक कार्य करें तो दीर्घकालिक बदलाव लाना संभव है।</span></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ बढ़ती आबादी को भोजन उपलब्ध कराने की दुनिया की क्षमता खतरे मेंः एफएओ ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[दुनिया में बढ़ता खाद्य संकट जी&amp;#45;20 सम्मेलन में  चर्चा का मुख्य मुद्दा रहा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/spiralling-food-crisis-key-topic-at-g20-summit.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 17 Nov 2022 20:16:11 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/spiralling-food-crisis-key-topic-at-g20-summit.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p style="text-align: justify;">एक तरफ जहां रूस और यूक्रेन में एक दुसरे से लड़ाई चल रही है &nbsp;दूसरी तरफ &nbsp;जी 20 शिखर सम्मेलन के मौके पर बढ़ते खाद्य संकट लेकर चर्चा हुई। विशेषज्ञों का मानना ​​है कि दुनिया के दो सबसे बड़े अनाज आपूर्तिकर्ताओं के बीच युद्ध ने वैश्विक खाद्य आपूर्ति की संकट को बढ़ा दिया है। उत्पन्न&nbsp; खाद्य संकट खतरे को चर्चा करते हुए प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने बाली में जी-20 नेताओं को खाद और खाद्यान्न दोनों की 'स्थिर' आपूर्ति श्रृंखला की आवश्यकता के बारे में आगाह करते कहा कि आज किसी भी उर्वरक की कमी कल एक खाद्य संकट उत्पन्न हो सकता है।</p>
<p style="text-align: justify;">प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में इस बात पर प्रकाश डाला कि कैसे भारत ने कई देशों को खाद्यान्न की आपूर्ति करते हुए कोविड -19 महामारी के दौरान अपने 130 करोड़ नागरिकों के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की ।उन्होंने खाद और खाद्यान्न दोनों की आपूर्ति श्रृंखला को बनाए रखने के लिए एक आपसी समझौते की जरूरत &nbsp;पर जोर दिया और कहा कि भारत प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दे रहा है और टिकाऊ खाद्य सुरक्षा के लिए बाजरा जैसे पौष्टिक और पारंपरिक खाद्यान्नों को फिर से लोकप्रिय बना रहा है। उन्होंने कहा, "हम सभी को अगले साल अंतर्राष्ट्रीय मिलेट्स वर्ष को बड़े उत्साह के साथ मनाना चाहिए उन्होंने कहा कि बाजरा वैश्विक कुपोषण और भूख को भी हल कर सकता है।</p>
<p style="text-align: justify;">मोदी ने शिखर सम्मेलन में कहा कि&nbsp; मौजूदा कमी भी खाद्य सुरक्षा के मामले में एक बहुत बड़ा संकट है। आज की उर्वरक की कमी कल का खाद्य संकट है, जिसका समाधान दुनिया के पास नहीं होगा। इस शिखर सम्मेलन में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ब्रिटिश प्रधान मंत्री त्रृषि सुनक और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों भी &nbsp;शामिल थे &nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">यूक्रेन पर रूसी आक्रमण के कारण दुनिया के विभिन्न हिस्से खाद्य सुरक्षा की चुनौती का सामना कर रहा हैं। यूक्रेन गेहूं का एक प्रमुख उत्पादक देश है और मुख्य खाद्य के निर्यात देश &nbsp;निर्यात में ठहराव के काऱण वैश्विक स्तर पर गेहूं की &nbsp;कमी हो गई &nbsp;है।</p>
<p style="text-align: justify;">जी-20&nbsp; वैश्विक आर्थिक सहयोग के लिए एक प्रभावशाली मंच &nbsp;है क्योंकि यह वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 85 प्रतिशत, वैश्विक व्यापार का 75 प्रतिशत से अधिक की&nbsp; भागीदारी के साथ दुनिया&nbsp; की लगभग दो-तिहाई आबादी का प्रतिनिधित्व करता है।जी -20 समूह दुनिया की प्रमुख विकसित और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं का एक अंतर-सरकारी मंच है। इसमें अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, कनाडा, चीन, फ्रांस, जर्मनी, भारत, इंडोनेशिया, इटली, जापान, कोरिया गणराज्य, मैक्सिको, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, तुर्की, यूके, अमेरिका और यूरोपीय संघ शामिल हैं। .</p>
<p style="text-align: justify;">भारत वर्तमान में जी -20&nbsp; ट्रोइका&nbsp; (वर्तमान, पिछली और आने वाली जी-20 &nbsp;प्रेसीडेंसी) का हिस्सा है जिसमें इंडोनेशिया, इटली और भारत शामिल हैं। वैश्विक और क्षेत्रीय खाद्य सुरक्षा पर कई वर्षों से जी -20 के प्राथमिकता वाले एजेंडे में विचार-विमर्श किया जा रहा &nbsp;है। 2021 में, मटेरा घोषणा के माध्यम से जी-20 &nbsp;मंत्रियों ने माना कि गरीबी उन्मूलन, खाद्य सुरक्षा और स्थायी खाद्य प्रणालियाँ &nbsp;भूखमरी को समाप्त करने की कुंजी हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">भारत ने कहा था कि मटेरा घोषणापत्र छोटे और मध्यम किसानों के कल्याण, स्थानीय खाद्य संस्कृतियों को बढ़ावा देने और कृषि-विविधता को मान्यता देने&nbsp; जैसी चीजों को लेकर उसकी चिंता को दर्शाता है। मटेरा घोषणा पत्र में अंतरराष्ट्रीय खाद्य व्यापार को खुला रखने और सुरक्षित, ताजा और पौष्टिक भोजन के लिए वैश्विक, क्षेत्रीय और स्थानीय विविध मूल्य श्रृंखलाओं को मजबूत करने के साथ-साथ विज्ञान आधारित समग्र व स्वास्थ्य दृष्टिकोण को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया गया।</p>
<p style="text-align: justify;">खाद्य सुरक्षा के मामले में भारत की भूमिका खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि को बनाए रखने और खाद्य प्रणालियों में सुधार के रास्ते पर अलोकन करना काफी &nbsp;महत्वपूर्ण है। सभी नागरिकों को भोजन सुनश्चित के लिए भारत के सबसे बड़े योगदानों में से एक राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 है जो सार्वजनिक वितरण प्रणाली, मध्याह्न भोजन योजना और एकीकृत बाल विकास सेवाओं का आधार प्रदर्शित करता है। आज भारत का खाद्य सुरक्षा तंत्र सामूहिक रूप से एक अरब से अधिक लोगों तक पहुँचता है।</p>
<p style="text-align: justify;">आजादी के बाद से भारत ने नीतिगत उपाय, भूमि सुधार, सार्वजनिक निवेश, संस्थागत बुनियादी ढांचे, नई नियामक प्रणाली, सार्वजनिक मदद और कृषि-बाजारों और कीमतों और कृषि-अनुसंधान और विस्तार में कार्य किया। साल 1991-2015 की अवधि &nbsp;के दौरान बागवानी, डेयरी, पशुपालन और मत्स्य पालन क्षेत्रों पर अधिक ध्यान देने के साथ कृषि मे विविधीकरण पर ध्यान दिया गया। जिसके काऱण पोषण स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा और स्थिरता के तत्व शामिल हुए।</p>
<p style="text-align: justify;">पिछले तीन वर्षों में कोराना महामारी के दौरान संकट के समय भारत ने प्रधान मंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना लाकर लोगों खाद्य सुरक्षा देने का एक वैश्विक उदाहरण प्रस्तुत किया। कोराना महामारी के दौरान अपनी मजबूत सार्वजनिक वितरण प्रणाली का उपयोग करके किसानों से सरकार ने अनाज की खरीद की प्राणली के माध्यम से तत्काल&nbsp; लोगों को&nbsp; राहत प्रदान की और आपूर्ति श्रृंखला में कोई व्यवधान नहीं आया जो आर्थिक झटके से बचने की क्षमता पैदा कर सका।&nbsp;दशकों से, भारत सरकार ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के लिए रणनीतिक भंडार के रूप में किसानों और खाद्य भंडार से अनाज खरीदने को संस्थागत रूप दिया है।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/11/image_750x500_637648d778c19.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ दुनिया में बढ़ता खाद्य संकट जी-20 सम्मेलन में  चर्चा का मुख्य मुद्दा रहा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>jpagrimedia73@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कोल्ड चेन के अभाव में हर साल 52.6 करोड़ टन खाद्य पदार्थ नष्ट होते हैंः यूएन रिपोर्ट]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/new-un-report-highlights-how-lack-of-effective-refrigeration-directly-results-in-the-loss-of-526-million-tons-of-food-production.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 14 Nov 2022 09:06:10 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/new-un-report-highlights-how-lack-of-effective-refrigeration-directly-results-in-the-loss-of-526-million-tons-of-food-production.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">खाद्य असुरक्षा और ग्लोबल वार्मिंग बढ़ने के साथ सरकारों, अंतरराष्ट्रीय विकास संस्थानों और इंडस्ट्री को सस्टेनेबल फूड कोल्ड चेन में निवेश बढ़ाना चाहिए, ताकि भूख की समस्या कम की जा सके, लोगों को आजीविका मुहैया कराई जा सके और जलवायु परिवर्तन के असर को कम किया जा सके। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) और खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) की तरफ से शनिवार को जारी सस्टेनेबल फूड कोल्ड चेन रिपोर्ट में यह बात कही गई है। यह रिपोर्ट मिस्र के शर्म अल शेख में चल रहे 27वे जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (COP27) के दौरान जारी की गई। इसके मुताबिक रेफ्रिजरेशन सुविधाओं के अभाव में हर साल 52.6 करोड़ टन खाद्य नष्ट हो जाते हैं, जो कुल वैश्विक उत्पादन का 12 प्रतिशत है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसे समय जब अंतरराष्ट्रीय समुदाय को जलवायु और खाद्य संकट की समस्या के समाधान के लिए आगे बढ़ना चाहिए, सस्टेनेबल फूड कोल्ड चेन इसमें बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। यूएनईपी की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर इंगर एंडरसन के अनुसार सस्टेनेबल फूड कोल्ड चेन हमें खाद्य पदार्थों के नुकसान को कम करने, खाद्य सुरक्षा बढ़ाने, ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने, नई नौकरियां सृजित करने, गरीबी घटाने इन सब में मदद कर सकते हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">रिपोर्ट के मुताबिक भूख की समस्या से पीड़ित लोगों की संख्या पिछले साल 82.8 करोड़ पहुंच गई। 2020 की तुलना में इसमें 4.6 करोड़ की वृद्धि हुई है। वर्ष 2020 के दौरान 3.1 अरब लोगों के पास स्वस्थ भोजन करने लायक सुविधा नहीं थी। 2019 की तुलना में यह संख्या 11.2 करोड़ बढ़ी है। कोविड-19 के कारण लोगों पर हुए आर्थिक असर और महंगाई इसकी प्रमुख वजह हैं। इस वर्ष रूस यूक्रेन युद्ध से अनाज की कीमतें बढ़ी हैं। इससे भी खाद्य सुरक्षा को खतरा बढ़ा है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">यह सब ऐसे समय हो रहा है जब मनुष्य की खपत के लिए उपजाए गए खाद्य पदार्थों का लगभग 14% लोगों तक पहुंचने से पहले ही नष्ट हो जाता है। इसका प्रमुख कारण एक सक्षम कोल्ड चेन का अभाव है, जिससे खाद्य पदार्थों की क्वालिटी और पोषण वैल्यू को सुरक्षित नहीं रखा जा सकता है। रिपोर्ट के अनुसार अगर विकासशील देशों में विकसित देशों के बराबर कोल्ड चेन इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित हो जाए तो वे देश हर साल 14.4 करोड़ टन खाद्य पदार्थ नष्ट होने से बचा सकते हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">फसल तैयार होने के बाद जो नुकसान होता है उससे दुनिया के 47 करोड़ छोटे किसानों की आमदनी 15% कम हो जाती है। ऐसा खासकर विकासशील देशों में ही होता है। सस्टेनेबल फूड कोल्ड चेन में निवेश करने से इन किसान परिवारों को गरीबी से निकालने में मदद मिलेगी।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">फूड कोल्ड चेन का जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। रेफ्रिजरेशन के अभाव में जो खाद्य पदार्थों का नुकसान होता है और कचरा बनता है उससे होने वाला उत्सर्जन 2017 में एक गीगा टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर था। यह उस वर्ष कुल ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन का लगभग 2% था। इससे खासकर मीथेन गैस का उत्सर्जन होता है इसलिए इस पर ध्यान देकर वातावरण में मीथेन की मात्रा कम की जा सकती है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">सस्टेनेबल फूड कोल्ड चेन किस तरह अंतर पैदा कर रहे हैं, इसके कुछ उदाहरण भी दिए गए हैं। जैसे भारत में कोल्ड चेन पायलट प्रोजेक्ट से कीवी फल का नुकसान 76% कम हो गया। नाइजीरिया में 54 ऑपरेशन कोल्ड हब प्रोजेक्ट से 42000 टन खाद्य पदार्थों को नष्ट होने से बचाया जा सका। इससे 5240 छोटे किसानों, रिटेलर और होलसेल विक्रेताओं की आमदनी 50% बढ़ गई। लेकिन इस तरह के कदम अभी इक्का-दुक्का जगहों पर ही हो रहे हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">रिपोर्ट में नीति निर्माताओं के लिए कुछ सुझाव भी दिए गए हैं। इसमें कहा गया है कि कूलिंग टेक्नॉलॉजी को अपनाना ही काफी नहीं है, कोल्ड चेन में व्यापक नजरिया अपनाने की जरूरत है। अभी फूड कोल्ड चेन में कितनी ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन होता है और कितनी ऊर्जा की खपत होती है उसे देखते हुए उसकी मात्रा भी कम करने के उपाय तलाशे जाने चाहिए।</span></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ कोल्ड चेन के अभाव में हर साल 52.6 करोड़ टन खाद्य पदार्थ नष्ट होते हैंः यूएन रिपोर्ट ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[COP27: कृषि क्षेत्र जलवायु परिवर्तन में योगदान करने के साथ उसका शिकार भी है]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/agriculture-sector-both-a-victim-of-and-contributor-to-climate-change.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 12 Nov 2022 00:00:00 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/agriculture-sector-both-a-victim-of-and-contributor-to-climate-change.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">मिस्र के शर्म अल शेख में 27वां जलवायु सम्मेलन आयोजित हो रहा है। यह 2016 के बाद अफ्रीका में आयोजित होने वाला पहला वैश्विक जलवायु सम्मेलन है। साथ ही यह पहला सम्मेलन है जिसमें खाद्य एवं कृषि पर अधिक फोकस किया गया है। सम्मेलन का स्थान और इसका फोकस दोनों काफी महत्वपूर्ण हैं। अफ्रीका इन दिनों लगातार मानवीय संकट का केंद्र बना हुआ है। इस संकट का मुख्य कारण खाद्य उत्पादन पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">यह बड़े ही दुर्भाग्य की बात है कि जलवायु पर होने वाली चर्चाओं में कृषि और खाद्य को हमेशा नजरअंदाज किया गया। जलवायु परिवर्तन के लिए कुल सार्वजनिक फंडिंग में सिर्फ 3% कृषि और खाद्य के लिए होता है। हालांकि यह सेक्टर लगभग एक तिहाई ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार है।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">संयुक्त राष्ट्र के प्रत्येक जलवायु परिवर्तन कॉन्फ्रेंस में यह देखने को मिलता है कि गैर सरकारी संगठन (एनजीओ), वैज्ञानिक और यहां तक कि अंतरराष्ट्रीय संस्थान भी किस कृषि क्षेत्र के खिलाफ यह आलोचना करते हैं।</span> <span style="font-weight: 400;">ज्यादातर चर्चाओं में कृषि और खाद्य को सामने नहीं रखा जाता है, जबकि किसान ही जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">दरअसल कृषि क्षेत्र जलवायु परिवर्तन में भागीदार होने के साथ-साथ इसका शिकार भी है। अगर पेरिस समझौते को मानते हुए प्री-इंडस्ट्रियल युग की तुलना में ग्लोबल वार्मिंग को 2 डिग्री सेल्सियस से कम रखना है तो कृषि क्षेत्र की अनदेखी नहीं की जा सकती है।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">लेकिन सच्चाई यही है कि ट्रांसपोर्ट अथवा ऊर्जा क्षेत्र को जितनी तवज्जो दी जा रही है उतनी कृषि को नहीं। अभी तक जलवायु परिवर्तन पर होने वाली चर्चाओं में खाद्य की चर्चा मामूली रूप से होती है। जलवायु सम्मेलन में पहली बार कृषि के लिए पूरा दिन निर्धारित किया गया है। 12 नवंबर को सिर्फ इसी विषय पर चर्चा होगी और उससे पहले उच्चस्तरीय राउंडटेबल बैठक भी होगी।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">रूस-यूक्रेन युद्ध ने ग्लोबल फूड सिस्टम के असंतुलन को रेखांकित किया है। इस वर्ष अत्यधिक सूखे ने अनेक देशों में फसलों को प्रभावित किया है। पाकिस्तान और नाइजीरिया में जलवायु संकट का असर भीषण बाढ़ के रूप में सामने आया। दुर्भाग्य की बात है कि जलवायु पर होने वाली चर्चाओं में इन मुद्दों का समाधान तलाशने का अवसर खो दिया गया।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">लेकिन सीओपी 27 (COP27) के खाद्य एवं कृषि पेवेलियन में खाद्य एवं कृषि पर विशेष चर्चा की जाएगी। इस चर्चा का आयोजन संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) एवं सीजीआईएआर और रॉकफेलर फाउंडेशन कर रहे हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">यह घटनाक्रम ऐसे महत्वपूर्ण समय में हो रहा है जब यूरोप, अमेरिका और अफ्रीका में अभूतपूर्व सूखे की स्थिति है। भारत में गेहूं की फसल को हीटवेव से नुकसान हुआ और पाकिस्तान तथा चीन में बाढ़ और सूखे की नौबत आई। यह सब घटनाएं बताती हैं कि एक्सट्रीम वेदर की परिस्थिति में खाद्य उत्पादन का जोखिम कितना बड़ा है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">दुनिया के 35 करोड़ किसानों और उत्पादकों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठनों ने 7 नवंबर को विश्व नेताओं को एक खुला पत्र लिखा था। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर सरकार छोटे स्तर पर उत्पादन के लिए एडेप्टेशन फाइनेंस को बढ़ावा नहीं देती है और कम लागत वाली विविध खेती को प्रमोट नहीं करती है तो वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए संकट उत्पन्न होगा। जलवायु संकट के प्रभावों से बचने के लिए दी जाने वाली मदद को एडेप्टेशन फाइनेंस कहते हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कृषि जलवायु परिवर्तन का शिकार तो है ही, यह एक तिहाई से अधिक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के लिए भी जिम्मेदार है। कई निजी संस्थाओं के संगठन ग्लोबल एलायंस फॉर द फ्यूचर ऑफ फूड ने हाल ही एक रिपोर्ट में कहा है कि जलवायु से संबंधित सिर्फ 3% सार्वजनिक फंडिंग कृषि और खाद्य के लिए है। यह इस क्षेत्र के महत्व को देखते हुए बहुत कम है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">सरकारें भी इस सेक्टर के महत्व को कमतर आंकती हैं। विकसित देशों की बात करें तो 62% देशों ने 2030 तक प्रदूषण कम करने के अपने राष्ट्रीय लक्ष्य (nationally determined contributions - NDC) में खाद्य प्रणाली से जुड़ा कोई उपाय नहीं किया है। विकासशील देशों में उनकी वित्तीय जरूरतों का सिर्फ 4% खाद्य प्रणाली में बदलाव के लिए रखा गया है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">किसी ने सोचा भी नहीं था कि भारत में गेहूं और चावल की कमी होगी। लेकिन यह ऐसा वर्ष है जब जलवायु परिवर्तन का फसलों पर प्रभाव सबके सामने है। विशेषज्ञ मानते हैं कि कृषि क्षेत्र से जो उत्सर्जन होता है उसका ज्यादातर औद्योगिक कृषि के कारण है। वह एग्रो इकोलॉजी (कृषि पारिस्थितिकी) में बदलाव की जरूरत भी बताते हैं। नई कृषि पारिस्थितिकी ऐसी हो जिसमें प्रकृति और स्थानीय समुदाय को साथ लेकर खाद्य सुरक्षा, आजीविका और जैव विविधता सुनिश्चित की जाए।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">विशेषज्ञों का कहना है कि हम जिस तरह खाना खाते हैं, जैसी खेती करते हैं और खाद्य पदार्थों का वितरण करते हैं उसे पूरी तरह बदलने की जरूरत है।</span></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ COP27: कृषि क्षेत्र जलवायु परिवर्तन में योगदान करने के साथ उसका शिकार भी है ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>jpagrimedia73@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[रूस के रुख से ग्लोबल मार्केट में गेहूं के दाम में काफी उतार&amp;#45;चढ़ाव]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/roller-coaster-in-global-wheat-prices-as-russia-changes-its-stand.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 08 Nov 2022 09:56:42 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/roller-coaster-in-global-wheat-prices-as-russia-changes-its-stand.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">यूक्रेन से अनाज निर्यात पर रूस के रुख को देखते हुए अंतरराष्ट्रीय बाजार में पिछले दिनों गेहूं के दाम में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला। पहले तो 29 अक्टूबर 2022 को यह खबर आई कि रूस काला सागर के रास्ते यूक्रेन से खाद्यान्न निर्यात (ब्लैक सी ग्रेन इनीशिएटिव) के समझौते से पीछे हट गया है। इस खबर से पिछले हफ्ते की शुरुआत में शिकागो के सीबॉट (CBOT) में गेहूं के दाम बढ़ कर 9.78 डॉलर प्रति बुशल पर पहुंच गए।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">यूक्रेन ने क्रीमिया में रूसी ठिकानों पर ड्रोन से हमला किया था। उसके बाद तीन महीने से चल रहे &lsquo;ग्रेन कॉरीडोर डील&rsquo; पर खतरे के बादल मंडराने लगे थे। लेकिन गुरुवार को रूस ने स्पष्ट किया कि वह इस डील पर बातचीत में फिर से हिस्सा लेगा। उसके बाद गेहूं की कीमत भी 9.3 डॉलर प्रति बुशल के पुराने स्तर के आसपास लौट आई। यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद मई के मध्य में दाम 12.8 डॉलर तक पहुंच गए थे। अक्टूबर में भी यूक्रेन पर रूस का हमला तेज होने के बाद गेहूं के दाम में वृद्धि हुई थी।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">गेहूं के दाम बढ़ने से रूस के मित्र देशों के लिए भी संकट बढ़ गया था। तुर्की, यूक्रेन से काफी गेहूं आयात करता है और पिसाई करके अफ्रीकी देशों को निर्यात भी करता है। चीन, यूक्रेन से तो गेहूं आयात नहीं करता, लेकिन दूसरे देशों से करता है। यूक्रेन का गेहूं नहीं आने पर अंतरराष्ट्रीय बाजार में दाम बढ़ते जिससे चीन को महंगा गेहूं खरीदना पड़ता। इसलिए माना जा रहा है कि मित्र देशों के दबाव में रूस ने नरमी दिखाई है।</span></p>
<p><b>डील पर संशय अभी बरकरार</b></p>
<p><span style="font-weight: 400;">लेकिन गेहूं के ग्लोबल ट्रेड पर खतरे के बादल अभी पूरी तरह नहीं छंटे हैं। तुर्की और संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता के बाद रूस से जो डील हुई थी, उसके तहत रूस ने 19 नवंबर तक यूक्रेन से गेहूं निर्यात की अनुमति दी थी। रूस उसे आगे बढ़ाएगा या नहीं, अभी यह स्पष्ट नहीं है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय गेहूं बाजार में फिलहाल अनिश्चितता का माहौल है। डील का आगे बढ़ना बहुत कुछ 15 नवंबर से इंडोनेशिया में होने वाले जी20 सम्मेलन पर निर्भर करेगा। भारत ने गेहूं निर्यात पर प्रतिबंध लगा रखा है, इसलिए यहां घरेलू बाजार पर रूसी घटनाक्रम का कोई कसर दिखने की संभावना कम ही है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">यूक्रेन का कहना है कि ब्लैक सी ग्रेन इनीशिएटिव के तहत 43 देशों को एक करोड़ टन कृषि उत्पाद निर्यात करने पर सहमति बनी है। यूक्रेन ने मुख्य रूप से स्पेन, तुर्की और इटली को गेहूं और मक्के का निर्यात किया है। अक्टूबर तक यूक्रेन करीब 68 लाख टन अनाज का निर्यात कर चुका है। यह उसके कुल स्टॉक का लगभग एक तिहाई है।</span></p>
<p><b>तुर्की की मध्यस्थता से पटरी पर वार्ता</b></p>
<p><span style="font-weight: 400;">रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने 2 नवंबर को अपने अधिकारियों के साथ बैठक में कहा कि काला सागर के रास्ते यूक्रेन को मानवीय आधार पर अनाज निर्यात की जो अनुमति दी गई थी, यूक्रेन उसका दुरुपयोग कर रहा है और वहां तैनात रूसी बेड़े पर हमला कर रहा है। दरअसल रूस इस बात का आश्वासन चाहता था कि उसने यूक्रेन को अनाज निर्यात की जो अनुमति दी है, उसका कोई और इस्तेमाल नहीं होगा। इस घटनाक्रम के बाद तुर्की ने मध्यस्थता की।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">उक्त बैठक में पुतिन ने कहा, रूसी रक्षा मंत्रालय को तुर्की से आश्वासन मिला कि मानवीय कॉरिडोर का कोई सैनिक इस्तेमाल नहीं किया जाएगा। पुतिन के अनुसार, &ldquo;मैंने रक्षा मंत्रालय को पूर्ण सहयोग करने का निर्देश दिया। हालांकि अगर यूक्रेन इस गारंटी का उल्लंघन करता है तो रूस भी इस व्यवस्था से खुद को अलग कर सकता है।&rdquo;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">रूस का कहना है कि यूक्रेन से जिन गरीब देशों को अनाज का निर्यात हो रहा था, उसकी आपूर्ति करने के लिए वह तैयार है। रूस का यह भी दावा है कि यूक्रेन से अनाज का जो निर्यात हुआ उसका सिर्फ 4% गरीब देशों को गया, बाकी ज्यादातर गेहूं यूरोपियन यूनियन के देशों को भेजा गया है। पुतिन के अनुसार अगर यूक्रेन समझौता तोड़ता है तो रूस उन गरीब देशों को मुफ्त में गेहूं निर्यात करने के लिए तैयार है।</span></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/06/image_750x500_62bc976da46a7.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ रूस के रुख से ग्लोबल मार्केट में गेहूं के दाम में काफी उतार-चढ़ाव ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[भारत ने संयुक्त अरब अमीरात के समक्ष कृषि क्षेत्र और चावल निर्यात से संबंधित मुद्दों  को उठाया]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/india-raised-issues-related-to-agriculture-sector-and-rice-export-before-uae..html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 02 Nov 2022 10:06:29 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/india-raised-issues-related-to-agriculture-sector-and-rice-export-before-uae..html</guid>
        <description><![CDATA[ <p style="text-align: justify;">भारत ने संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के साथ बैठक में कृषि क्षेत्र और चावल निर्यातकों की सामने आने &nbsp;समस्याओं को प्रमुखता से उठाया। कुछ मुद्दों पर दोनो देशों के बीच सहमति भी बन गई है। भारत-यूएई परिषद के अध्यक्ष और भारत-यूएई संयुक्त कार्यबल के सदस्य एस. विक्रमजीत सिंह ने संयुक्त अरब अमीरात के विदेश व्यापार राज्य मंत्री डॉ. थानी बिन अहमद अल जयादी से मुलकात की। उनके साथ बैठक के दौरान दोनों देशों के द्विपक्षीय सहयोग के कई मुद्दों पर चर्चा की।&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">विक्रमजीत सिंह ने कहा कि यूएई के साथ समझौतों से द्विपक्षीय व्यापार नई ऊंचाईयों को छू रहा है। उन्होंने खाड़ी देशों में भारतीय कृषि निर्यातकों के सामने आने वाले मुद्दों को भी हल करने की जरूरत पर जोर दिया।&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">विक्रमजीत सिंह ने &nbsp;बताया कि व्यापक आर्थिक सहयोग समझौते (सीईपीए) और मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) के संदर्भों के तहत&nbsp; दोनों देशों के बीच वार्ता हुई। जिसमें भारत और संयुक्त अरब अमीरात के बीच व्यापार के संबंध में &nbsp;दोनों पक्षों के बीच प्रमुख चर्चा हुई।</p>
<p style="text-align: justify;">विक्रमजीत सिंह&nbsp; ने &nbsp;कहा&nbsp; कि भारतीय निर्यातकों द्वारा कीटनाशकों की उपस्थिति के लिए चावल को अस्वीकार करने का मुद्दा उठाया गया। उन्होंने दोनों देशों के लिए स्वीकार्य मानकों और &nbsp;लैब की स्थापना&nbsp; और फार्मा उत्पादों की शीघ्र स्वीकृति पर जोर दिया। उन्होंने&nbsp; संयुक्त अरब अमीरात &nbsp;मंत्री से स्वास्थ्य और अन्य क्षेत्रों में 100<span> प्रतिशत स्वामित्व के लिए निवेश की न्यूनतम सीमा को कम करने का भी अनुरोध किया</span>&nbsp;<span>जो वर्तमान में&nbsp; 10 करोड़ &nbsp;दिहरम है।</span></p>
<p style="text-align: justify;">विक्रमजीत सिंह ने भारत और संयुक्त अरब अमीरात के मंत्री से संयुक्त उपक्रमों के कामकाज को कारगर बनाने के लिए संयुक्त अरब अमीरात-भारत द्विपक्षीय निवेश संधि को जल्द पूरा करने के लिए अनुरोध किया। यूएई के विदेश व्यापार राज्य मंत्री ने भारत के साथ व्यापार की स्थिति पर संतोष व्यक्त किया। साथ ही भारत में निवेश करने का वादा किया।</p>
<p style="text-align: justify;">विक्रमजीत सिंह ने पंजाब के मुख्यमंत्री के प्रतिनिधि के रूप में राज्य और संयुक्त अरब अमीरात के बीच महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की। उन्होंने पंजाब के बुनियादी ढांचे, <span>बासमती निर्यात</span>, <span>कृषि प्रसंस्करण क्षेत्र में निवेश पर चर्चा की।</span></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2021/08/image_750x500_611cf1fb79917.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ भारत ने संयुक्त अरब अमीरात के समक्ष कृषि क्षेत्र और चावल निर्यात से संबंधित मुद्दों  को उठाया ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>jpagrimedia73@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[‘वन सीजीआईएआर’ से विकासशील देशों में खाद्य संकट बढ़ने का खतराः माइकल फाखरी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/one-cgiar-poses-great-risks-for-food-security-and-sovereignty-says-un-special-rapporteur-michael-fakhri.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 03 Oct 2022 13:56:07 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/one-cgiar-poses-great-risks-for-food-security-and-sovereignty-says-un-special-rapporteur-michael-fakhri.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कृषि अनुसंधान को बढ़ावा देने वाली संस्था सेंटर ऑफ द कंसल्टेटिव ग्रुप ऑन इंटरनेशनल एग्रीकल्चरल रिसर्च (CGIAR) में कुछ ऐसे बदलाव की पहल हो रही है, जो एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के विकासशील देशों के लिए नुकसानदायक हो सकता है। अभी सीजीआईएआर के दुनिया भर में 15 क्षेत्रीय केंद्र हैं, जो स्वतंत्र रूप से कार्य करते हैं। लेकिन इन केंद्रों के ट्रस्टी बोर्ड में पुनर्गठन किया जा रहा है। भोजन के अधिकार पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिवेदक माइकल फाखरी का कहना है कि इस पुनर्गठन के गंभीर परिणाम होंगे। फाखरी के अनुसार इस पुनर्गठन से अनेक देशों में खाद्य सुरक्षा और सार्वभौमिकता को खतरा उत्पन्न होगा जाएगा। अफ्रीका और एशिया के देशों में इसका असर अधिक होगा। ये देश पहले ही खाद्य संकट और भारी-भरकम राष्ट्रीय कर्ज का सामना कर रहे हैं। फाखरी ने इस पहल के खिलाफ एक खुला पत्र लिखा है, जिसकी मुख्य बातें इस प्रकार हैं-</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">सीजीआईएआर के ग्लोबल साउथ केंद्रों (एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कम और मध्य वर्ग के देश) के पुनर्गठन से हजारों जर्मप्लाज्म कलेक्शन पर लोगों की पहुंच कम हो जाएगी। वन सीजीआईएआर के नाम से जो पुनर्गठन किया जा रहा है उससे सार्वजनिक कृषि एक्सटेंशन और मदद कार्यक्रमों की तुलना में निजी कंपनियों का प्रभुत्व बढ़ेगा। इसके अलावा क्षेत्रीय सीजीआईएआर रिसर्च केंद्रों में भी अनेक देशों का प्रभाव और उनकी भूमिका कम हो जाएगी।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">यह पुनर्गठन अनेक देशों, वहां के किसानों तथा अन्य संबंधित पक्षों के साथ समझौते या मशविरे के बगैर किया जा रहा है। वन सीजीआईएआर में जो प्रक्रिया अपनाई जा रही है वह देशों के स्व-निर्णय के अधिकार तथा उनके कृषि अनुसंधान एजेंडा, खाद्य सार्वभौमिकता तथा खाद्य प्रणाली पर स्थानीय समुदायों के नियंत्रण को चुनौती है। यह क्षेत्रीय खाद्य सुरक्षा को भी चुनौती है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">सीजीआईएआर की स्थापना 1971 में हुई थी। दुनिया भर में इसके 15 अनुसंधान केंद्र हैं जो गैर-मुनाफाकारी संस्थान के तौर पर कार्य करते हैं। इन 15 सीजीआईएआर अनुसंधान केंद्रों के पास प्लांट जर्मप्लाज्म, मवेशियों और जलीय जीवों के जर्मप्लाजम का सबसे बड़ा संग्रह है। यह संग्रह खाद्य और पोषण की पर्याप्त आपूर्ति के लिए आवश्यक है। हर अनुसंधान केंद्र अपने आप में स्वतंत्र है और सीजीआईएआर का सदस्य है। ये केंद्र आर्थिक मदद, मूल्यांकन और प्रशासनिक व्यवस्था के लिए सीजीआईएआर पर ही निर्भर हैं। ये केंद्र जिन देशों में हैं वहां की सरकारों के साथ उनका कानूनी समझौता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">सीजीआईएआर के प्रमुख वित्तीय मददगारों, जिनमें बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन, वर्ल्ड बैंक और कुछ द्विपक्षीय एजेंसियां शामिल हैं, ने 2020 में सीजीआईएआर के अनुसंधान केंद्रों के विलय का प्रस्ताव दिया। इन केंद्रों को गवर्नेंस के नए ढांचे, वन सीजीआईएआर के लिए वोट देने को आमंत्रित किया गया। नए ढांचे में सभी कार्यक्रम, फाइनेंस और प्रशासनिक व्यवस्था फ्रांस के मोंटपेलियर स्थित मुख्यालय में केंद्रित हो जाएंगी। मुख्यालय ही हर केंद्र के बोर्ड ऑफ ट्रस्टी की नियुक्ति करेगा। इससे उन केंद्रों के गवर्नेंस का ढांचा काफी बदल जाएगा और वे वन सीजीआईएआर की सब्सिडियरी बनकर रह जाएंगे। इन केंद्रों के महानिदेशक तथा अन्य वरिष्ठ स्टाफ को मुख्यालय से मिलने वाले फंड से ही वेतन दिया जाएगा, क्योंकि अभी जो फंड का प्रवाह सीधे क्षेत्रीय केंद्रों में होता है वह सीधे मुख्यालय में होने लगेगा। इन केंद्रों के अपने अलग दानकर्ता (डोनर) हैं। केंद्रीकृत व्यवस्था में क्षेत्रीय केंद्रों का स्वतंत्र डोनर आधार खत्म हो सकता है। जिन देशों में यह केंद्र स्थापित हैं उनकी और उस क्षेत्र की भूमिका भी सीमित हो जाएगी।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अभी 15 केंद्रों में से कम से कम 7 के गवर्नेंस का ढांचा भविष्य में क्या होगा इसे लेकर संदेह है। अनेक देश यह चिंता जाहिर कर चुके हैं कि वन सीजीआईएआर उनके साथ हुए समझौते का उल्लंघन है। कई केंद्रों ने इससे जुड़ने से इनकार कर दिया है और उनकी कानूनी स्थिति को लेकर अभी ऊहापोह बना हुआ है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">पुनर्गठन से मानवाधिकार से जुड़े तात्कालिक और लॉन्ग टर्म चिंताएं बढ़ी हैं, खासकर भोजन के अधिकार के संभावित उल्लंघन को लेकर। यह पुनर्गठन खाद्य प्रणाली पर स्थानीय नियंत्रण के लिए खतरा है। इसमें गवर्नेंस का ढांचा एक केंद्रीकृत व्यवस्था में आ जाएगा जिसमें फंड उपलब्ध कराने वालों का प्रभुत्व रहेगा। जबकि मौजूदा ढांचा स्थानीय अनुसंधान केंद्रों के नेटवर्क का है जिसमें क्षेत्रीय जरूरतें प्राथमिकता रखती हैं। इन केंद्रों के विलय से अमीर डोनर का खाद्य प्रणाली पर नियंत्रण हो जाएगा और कृषि एजेंडा तय करने में सरकारों की भूमिका कम हो जाएगी।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">नई व्यवस्था में इन क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्रों के अधिकार छिन जाएंगे। खासकर अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका में स्थित केंद्रों के। यह अधिकार मोंटपेलियर मुख्यालय स्थित चंद हाथों तक सीमित होकर रह जाएगा। क्षेत्रीय केंद्रों की आर्थिक और राजनीतिक स्वतंत्रता भी काफी हद तक कम हो जाएगी। अभी यह केंद्र स्थानीय, राष्ट्रीय और क्षेत्रीय जरूरतों के आधार पर कार्य करते हैं, वह भी सीमित हो जाएगा। इसलिए अमीर दानकर्ताओं की भूमिका कम की जानी चाहिए। सीजीआईएआर केंद्र आखिरकार आम लोगों के प्रति जवाबदेह हैं दानकर्ताओं के प्रति नहीं। दानकर्ताओं को ऐसी स्थिति उत्पन्न करने से बचना चाहिए जहां उनकी मदद राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर फैसले लेने की प्रक्रिया को प्रभावित करने लगे।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">यह विलय ग्लोबल साउथ में खाद्य उत्पादन के भविष्य के साथ भी खिलवाड़ है तथा इससे भोजन के अधिकार को पूरा करने में देशों की क्षमता प्रभावित होगी। यदि वन सीजीआईएआर को लागू किया जाता है तो अनेक देशों के लिए अपने यहां भूख, अकाल और कुपोषण को दूर करना मुश्किल हो जाएगा। जीन बैंक पर अमीर दानकर्ताओं के नियंत्रण से ना सिर्फ बीज प्रजातियों के लिए खतरा उत्पन्न होगा बल्कि जीवन के अधिकार को भी यह चुनौती देगा।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">उदाहरण के लिए अफ्रीका में किसानों और मवेशी पालने वालों ने 11 क्षेत्रीय रिसर्च केंद्रों के अंतर्राष्ट्रीय जीन बैंकों को लाखों ब्रीडिंग की सुविधाएं दी हैं। किसानों ने अफ्रीका के साथ-साथ विश्व की खाद्य सुरक्षा के लिए इसे महत्वपूर्ण माना। यह अमूल्य योगदान साझी जिम्मेदारी के भाव के तहत किया गया था। वन सीजीआईएआर का ढांचा इन जीन बैंकों पर अफ्रीका के अधिकारों को खत्म कर सकता है। इंटरनेशनल ट्रीटी ऑन प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेस फॉर फूड एंड एग्रीकल्चर और बायोडायवर्सिटी पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन के नागोया प्रोटोकोल के तहत मुनाफे में हिस्सा लेने में भी इन देशों को परेशानी होगी। वन सीजीआईएआर से अफ्रीका में कृषि के भविष्य पर बाहरी तत्वों का अधिकार बढ़ेगा। यह सार्वजनिक निजी भागीदारी को बढ़ावा देगा और इस तरह अफ्रीका के प्राकृतिक संसाधन बहुराष्ट्रीय एग्रीबिजनेस के हाथों में चले जाएंगे।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">सीजीआईएआर के अंतरराष्ट्रीय जीन बैंकों के गवर्नेंस पर अस्पष्टता का असर अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों पर भी होगा। जीन बैंक अगर सीजीआईएआर से बाहर होंगे तो एफएओ के प्रति उनकी जवाबदेही भी कम होगी। सीजीआईएआर के हर जीन बैंक का जर्मनी स्थित ग्लोबल प्राइवेट सिटी ट्रस्ट के साथ समझौता है। यह ट्रस्ट जीन बैंकों को तकनीकी और वित्तीय मदद उपलब्ध कराता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इस पुनर्गठन प्रक्रिया से पहले ना तो एफएओ के साथ कोई सलाह-मशविरा किया गया और न ही ग्लोबल क्रॉप डायवर्सिटी ट्रस्ट के साथ।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">सीजीआईएआर को केंद्रीकृत करने से इसके केंद्रों की अनुसंधान क्षमता भी प्रभावित होगी जो हमारी बदलती खाद्य प्रणाली को देखते हुए आवश्यक है। अधिकतर खाद्य प्रणाली को भोजन के अधिकार के महत्व को समझते हुए यथाशीघ्र बदलना चाहिए। ऐसे अनुसंधान जिनसे वास्तव में भूख को दूर किया जा सकता है, उसके लिए अनुसंधानकर्ताओं को बड़े बिजनेस के बजाए छोटे किसानों, कर्मचारियों, स्थानीय लोगों तथा उपभोक्ताओं के साथ काम करना चाहिए। इसके लिए सार्वजनिक फंडिंग वाले अनुसंधान की आवश्यकता है। जब अनुसंधान मुनाफे अथवा अमीर दानकर्ताओं के प्रभाव से प्रेरित होंगे तो खाद्य सुरक्षा से प्रभावित लोगों से उसकी दूरी बढ़ेगी। उनकी आवश्यकताओं को वे नहीं समझेंगे। स्थानीय समझ और जानकारी दरकिनार कर दी जाएगी और इन सबकी जगह महंगे तकनीकी समाधान उपलब्ध कराए जाएंगे।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">समस्याओं के तकनीकी समाधान की बड़ी समस्या यह है कि उनसे असमानता बढ़ती है, ग्रामीण इलाकों में गरीबी में इजाफा होता है और पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचता है। मुनाफे से प्रेरित अनुसंधान में अक्सर खाद्य पदार्थों का उत्पादन बढ़ाने अथवा सिस्टम की क्षमता बढ़ाने पर फोकस किया जाता है। इसमें भोजन के प्रति लोगों की सांस्कृतिक, सामाजिक, पारिस्थितिकीय और आध्यात्मिक संबंधों को दरकिनार कर दिया जाता है। सार्वजनिक फंडिंग वाले स्वतंत्र वैज्ञानिक अनुसंधानकर्ताओं की आवश्यकता इसलिए भी है क्योंकि वह पारंपरिक ज्ञान पर आधारित तथा स्थानीय समुदायों की मदद से नए समाधान लेकर आ सकते हैं। वे मानवाधिकार और लोगों की जरूरतों में समन्वय स्थापित करते हुए तकनीकी इनोवेशन भी कर सकते हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">वन सीजीआईएआर पहल को रोकने तथा अंतर्राष्ट्रीय सार्वजनिक कृषि अनुसंधान के भविष्य पर विचार में क्षेत्रीय वार्ताओं को शामिल करने की बात कही है। इसका उद्देश्य सरकारों, अनुसंधानकर्ताओं, छोटे किसानों, खेतों में काम करने वालों, स्थानीय लोगों, उपभोक्ताओं तथा अन्य सभी संबंधित पक्षों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करना है। वे सब मिलकर एक विकल्प तलाशेंगे और बेहतर प्रणाली विकसित करेंगे जिससे सबका भला होगा। क्षेत्रीय केंद्रों को सरकारों के समर्थन के बिना वन सीजीआईएआर मिशन नाकाम हो जाएगा।</span></p>
<p><em><strong>(माइकल फाखरी, भोजन के अधिकार पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिनिधि हैं। उन्हें मार्च 2020 में मानवाधिकार परिषद ने इस पद पर नियुक्त किया था। फाखरी यूनिवर्सिटी आफ ओरेगॉन में स्कूल आफ लॉ के प्रोफेसर हैं जहां वे मानवाधिकार, खाद्य कानून, विकास और कमर्शियल कानून विषयों पर पढ़ाते हैं। वह एनवायरमेंटल एंड नेचुरल रिसोर्सेज लॉ सेंटर में फूड रेजिलिएंसी प्रोजेक्ट के डायरेक्टर भी हैं)</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ ‘वन सीजीआईएआर’ से विकासशील देशों में खाद्य संकट बढ़ने का खतराः माइकल फाखरी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[छोटे व सीमांत किसानों के फायदे के लिए भारत सरकार कटिबद्धः नरेंद्र सिंह तोमर]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/government-of-india-is-committed-for-the-benefit-of-small-and-marginal-farmers-say-union-agriculture-minister.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 29 Sep 2022 18:10:14 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/government-of-india-is-committed-for-the-benefit-of-small-and-marginal-farmers-say-union-agriculture-minister.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p style="text-align: justify;">केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा है&nbsp; कि भारत कृषि और खाद्य प्रणालियों की स्थिरता से संबंधित चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार है और उन्हें हल करने के लिए कई महत्वपूर्ण पहल की गई हैं। उन्होंने कहा कि भारत सरकार छोटे और सीमांत किसानों के लाभ के लिए प्रतिबद्ध है और उनके कल्याण के लिए कई बड़ी योजनाएं लागू की जा रही हैं। बाली में जी-20 देशों की बैठक के विभिन्न सत्रों में भारत का पक्ष रखते हुए तोमर ने यह बातें कहीं।</p>
<p style="text-align: justify;">जी-20 बैठक में अनुकूल और टिकाऊ कृषि और खाद्य प्रणालियों के निर्माण के विषय पर कृषि&nbsp; मंत्री तोमर ने कहा कि भारत किसानों को इनपुट, प्रौद्योगिकी और बाजारों तक उनकी पहुंच में सुधार करके वर्तमान और भविष्य के संकटों का सामना करने के लिए सशक्त बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। अपने किसानों की आर्थिक अनुकलता बढ़ाने के लिए भारत ने छोटे और सीमांत किसानों को समूहों में एक साथ लाने, कृषि बुनियादी ढांचे में निवेश करने और दुनिया के सबसे बड़े फसल बीमा कार्यक्रम को शुरू करने, कृषि-स्टार्टअप को बढ़ावा देने और कृषि के डिजिटलीकरण को सुविधाजनक बनाने जैसी विभिन्न गतिविधियां शुरू की हैं। भारत ने जलवायु-स्मार्ट कृषि परियोजनाओं में राष्ट्रीय स्तर के नवाचार की शुरुआत की है, जिसका उद्देश्य जलवायु-स्मार्ट कृषि&nbsp; सिस्टम के कार्यान्वयन और विभिन्न फसलों की जलवायु-अनुकूल किस्मों के विकास के माध्यम से किसानों को लाभ पहुंचाना है।</p>
<p style="text-align: justify;">तोमर ने कहा कि भारत चरम जलवायु परिस्थितियों के प्रति सहनशीलता के साथ-साथ इसके पोषण संबंधी लाभों के कारण बाजरा की खेती को बढ़ावा दे रहा है। बाजरा के इन गुणों को पहचानते हुए संयुक्त राष्ट्र ने भारत के प्रस्ताव पर वर्ष 2023 को पोषक अनाज का अंतर्राष्ट्रीय वर्ष घोषित किया है। उन्होंने खाद्य विविधता प्रदान करने और बाजरे की खपत को बढ़ावा देने की पहल में सभी के समर्थन और सक्रिय भागीदारी का अनुरोध किया, जिसे दुर्लभ संसाधनों में उगाया जा सकता है।</p>
<p style="text-align: justify;">तोमर ने कहा कि भारत अपने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए बड़े पैमाने पर जैविक और प्राकृतिक कृषि पद्धतियों को बढ़ावा दे रहा है। कृषि मंत्री ने कहा कि आने वाली चुनौतियों को देखते हुए यह जरूरी है कि सभी मिलकर कृषि उत्पादन को लगातार बढ़ायें, खाद्य हानि को कम करें, वैश्विक खाद्य आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करें, ताकि हमारे छोटे और सीमांत किसानों की पर्याप्त आय सुनिश्चित हो सके। साथ में, हमें पारंपरिक ज्ञान का उपयोग करना चाहिए, उभरती प्रौद्योगिकियों और सर्वोत्तम प्रथाओं के मिलकर को मजबूत करना चाहिए, और कृषि पारिस्थितिकी तंत्र को बदलने के लिए एक सक्षम नीति वातावरण बनाना चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;">सभी को भोजन की उपलब्धता और सस्ता भोजन सुनिश्चित करने के लिए खुले और पारदर्शी कृषि व्यापार को बढ़ावा देने के सत्र में, तोमर ने कहा कि भारत आज कृषि व्यापार में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। एक समय था जब भारत खाद्यान्न का आयातक था लेकिन कृषि क्षेत्र के निरंतर विकास के कारण, भारत तेजी से कृषि उत्पादों के शुद्ध निर्यातक के रूप में उभरा है और पिछले कुछ वर्षों में भारत कृषि उत्पादों में व्यापार अधिशेष बनाए रखा है भारत से कृषि और संबद्ध उत्पादों का निर्यात वित्तीय वर्ष 2020-21 में कोरोना महामारी से उत्पन्न लॉजिस्टिक चुनौतियों के बावजूद जारी रहा, जिसमें पिछले वर्ष की तुलना में 18 फीसदी &nbsp;की भारी वृद्धि दर्ज की गई थी। वैश्विक महामारी के बीच 2021-22 में भारत का कृषि निर्यात 50.21 बिलियन अमरीकी डॉलर के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया। तोमर ने कहा कि भारत की कृषि और खाद्य आपूर्ति प्रणाली न केवल आत्मनिर्भर हो गई है, बल्कि महामारी की शुरुआत से ही अन्य देशों में भारत का योगदान असाधारण रहा है और भारत ने संकट के इस समय में अन्य लोगों को खाद्यान्न भेजकर हर संभव सहायता प्रदान की है। देश। इस प्रकार भारत ने महामारी के दौरान हुए नुकसान की भरपाई के लिए वसुधैव कुटुम्बकम की भावना के साथ कदम आगे बढ़ाया है।</p>
<p style="text-align: justify;">तोमर ने कहा कि हमें बड़े राष्ट्रों की खाद्य सुरक्षा जरूरतों का भी समाधान खोजना चाहिए, जो बड़ी आबादी का पेट भरते हैं, और भारत जैसे विकासशील देशों की सार्वजनिक वितरण प्रणाली के मामले पर उनकी नीतियों और कार्यक्रमों पर विचार करें। नीतियों में किसानों से सुनिश्चित कीमतों पर खाद्यान्न की खरीद, पीडीएस प्रणाली के माध्यम से भंडारण और आपूर्ति शामिल है ताकि अनिश्चितता को दूर किया जा सके और बिचौलियों द्वारा हेरफेर को रोका जा सके, किसानों के लिए उत्पादन बढ़ाया जा सके और इसे बाजार में लाया जा सके और भारतीयों के लिए सस्ते भोजन की उपलब्धता और उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके। के लिए मजबूत तंत्र प्रदान करना विकासशील देशों को दुनिया के अन्य कमजोर क्षेत्रों में खाद्य सुरक्षा में योगदान करने के साथ-साथ आत्मनिर्भर तरीके से पर्याप्त भोजन का उत्पादन करने में मदद करने के लिए उपकरण, प्रौद्योगिकियां और विशेषज्ञ दिए जाने चाहिए। पोषण के प्रति संवेदनशील सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को बढ़ाने, नई प्रौद्योगिकियों को पेश करने, उर्वरकों के कुशल उपयोग को बढ़ाने और स्थायी खाद्य और पोषण सुरक्षा में निवेश के माध्यम से खाद्य प्रणालियों को मजबूत करने के कार्यक्रमों के माध्यम से दुनिया को छोटे- सीमांत &nbsp;किसानो के &nbsp;भऱण पोषण &nbsp;और &nbsp;अधिक आजीविका प्रदान करने में मदद करेगा। दुनिया भर में खाद्य सुरक्षा, उपलब्धता और वहनीयता सुनिश्चित करना एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है जिसके लिए हमें प्रयास करना चाहिए। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि कृषि व्यापार सभी देशों, विशेष रूप से विकासशील देशों को, बड़ी संख्या में छोटे और सीमांत किसानों को समान अवसर प्रदान हो</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ छोटे व सीमांत किसानों के फायदे के लिए भारत सरकार कटिबद्धः नरेंद्र सिंह तोमर ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>jpagrimedia73@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[फसल विविधता पर दिल्ली में 19 से 24 सितंबर तक सम्मेलन, 202 देशों के प्रतिनिधि होंगे शामिल]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/governing-body-of-itpgrfa-9th-conference-to-be-held-in-delhi-from-19th-to-24th-september-2022.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 18 Sep 2022 12:25:15 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/governing-body-of-itpgrfa-9th-conference-to-be-held-in-delhi-from-19th-to-24th-september-2022.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">खाद्य और कृषि के लिए प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेज पर अंतर्राष्ट्रीय संधि (आईटीपीजीआरएफए) की गवर्निंग बॉडी का नौवां सम्मेलन 19 से 24 सितंबर 2022 तक दिल्ली में आयोजित किया जाएगा। इस गवर्निंग बॉडी की बैठक हर दो साल में होती है। नई दिल्ली में होने वाली बैठक की थीम फसल विविधता के अनाम संरक्षकों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता दिलाना है।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इस सम्मेलन में 202 देशों के प्रतिनिधि, विभिन्न देशों के 50-60 कृषि मंत्री, संयुक्त राष्ट्र और विशिष्ट एजेंसियों के 20 प्रतिनिधि, 43 अंतर सरकारी संगठन, 75 अंतर्राष्ट्रीय गैर सरकारी संगठन और अंतर्राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान पर 13 सलाहकार समूह भाग ले रहे हैं। आठवां सम्मेलन 2019 में रोम में आयोजित किया गया था। उसी सम्मेलन में नौवां सम्मेलन भारत में 2021 में आयोजित करने की घोषणा की गई थी। लेकिन कोविड-19 महामारी के कारण पिछले साल इसका आयोजन नहीं हो सका।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) की तरफ से जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि दुनिया इस समय जलवायु परिवर्तन, जैव विविधिता को नुकसान और बढ़ती खाद्य असुरक्षा का सामना कर रही है। इस परिदृश्य में फसलों की विविधता को संरक्षित करना भविष्य के लिए जरूरी हो जाता है। फसल विविधता में कई साझीदार होते हैं- किसान, स्थानीय समुदाय, जीन बैंक मैनेजर और शोधकर्ता जो साथ मिलकर काम करते हैं। लेकिन उनकी कहीं चर्चा नहीं होती है। दुनिया भर में स्थापित जीन बैंक बीजों को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हमें विविध प्रकार के खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराने में किसानों और स्थानीय समुदायों की भूमिका अहम होती है। इसलिए जरूरी है कि फसल विविधता के संरक्षकों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पहचान मिले।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">&lsquo;अंतरराष्ट्रीय मोटे अनाज वर्ष 2023&rsquo; के देखते हुए इस सम्मेलन में मोटे अनाज पर विशेष सत्र होगा। इसमें कहा गया है कि कोरोना महामारी और हाल ही में रूस-यूक्रेन युद्ध ने हमारी कमजोरियों को उजागर कर दिया है। इसलिए फसल विविधता को बचाना महत्वपूर्ण है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">आईटीपीजीआरएफए को नवंबर 2001 में एफएओ के सम्मेलन के 31वें सत्र में अपनाया गया था। 29 जून, 2004 को लागू हुई संधि को भारत सहित 149 देशों ने अनुमोदित किया है। कृषि में हर देश का अपना जर्मप्लाज्म और अपनी जैव विविधता है। इसका संरक्षण, पहुंच, लाभ साझा करना और किसानों के अधिकारों की सुरक्षा - इन सभी मुद्दों पर सम्मेलन में चर्चा की जाएगी।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इस सम्मेलन से पहले कृषि में किसान कल्याण मंत्रालय ने 16 सितंबर को एक कार्यक्रम का आयोजन किया। इस मौके पर कृषि सचिव ने कहा कि किसानों के अधिकारों की रक्षा के लिए जैव विविधता की रक्षा करना जरूरी है। आईसीएआर के महानिदेशक डॉ. हिमांशु पाठक ने कहा कि विभिन्न देशों के पास उपलब्ध प्लांट जेनेटिक रिसोर्स नई किस्मों के लिए बेस मैटेरियल का काम करेंगे ताकि बेहतर क्वालिटी और उत्पादकता वाले बीज तैयार किए जा सकें।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">आईटीपीजीआरएफए के सचिव केंट नंदोजी ने कहा कि यह सम्मेलन सभी भागीदार देशों को प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेज के संरक्षण के लिए साझा मंच उपलब्ध कराएगा। इससे किसानों को फायदा होगा। उन्होंने यह भी कहा कि विभिन्न देशों में तकनीकी विकास को साझा करने से जलवायु परिवर्तन के विपरीत प्रभावों के असर को कम करने में मदद मिलेगी।</span></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/09/image_750x500_63249de0aa71c.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ फसल विविधता पर दिल्ली में 19 से 24 सितंबर तक सम्मेलन, 202 देशों के प्रतिनिधि होंगे शामिल ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>jpagrimedia73@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[आयरलैंड और कनाडा में कृषि से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन घटाने के लक्ष्य का व्यापक विरोध]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/farmers-of-canada-and-ireland-oppose-the-target-of-cut-in-greenhouse-gas-emissions.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 30 Jul 2022 18:45:35 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/farmers-of-canada-and-ireland-oppose-the-target-of-cut-in-greenhouse-gas-emissions.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>आयरलैंड और कनाडा ने कृषि क्षेत्र में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करने की घोषणा की है, लेकिन दोनों देशों की सरकारों के फैसले का वहां व्यापक विरोध हो रहा है। कनाडा में प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने नाइट्रोजन उत्सर्जन घटाने के लिए उर्वरकों का इस्तेमाल कम करने का फैसला किया है। इसका कनाडा के विभिन्न राज्यों के कृषि मंत्री ही विरोध कर रहे हैं। दूसरी तरफ आयरलैंड में सरकार ने वर्ष 2030 तक कृषि क्षेत्र से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन 25 फ़ीसदी घटाने की प्रतिबद्धता जताई है। इसे लेकर किसानों, बिजनेस समूहों और पर्यावरणविदों के बीच लड़ाई शुरू हो गई है।</p>
<p>अमेरिका की सीमा से लगते कनाडा के सास्काचेवन राज्य के कृषि मंत्री डेविड मेरिट और अल्बर्टा राज्य के कृषि मंत्री नेट हॉर्नर ने प्रधानमंत्री ट्रूडू के फैसले पर निराशा जताई है। मेरिट ने एक बयान में कहा, हम मनमाने लक्ष्य को लेकर काफी चिंतित हैं। ट्रूडू सरकार ने तेल एवं गैस उद्योग को निशाना बनाने के बजाय किसानों को निशाना बनाने का फैसला कर लिया है। हॉर्नर ने कहा, दुनिया वैश्विक खाद्य संकट के समाधान और कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए कनाडा की ओर देख रही है।</p>
<p>कनाडा सरकार ने दिसंबर 2020 में उत्सर्जन घटाने की योजना जारी की थी। उसमें लक्ष्य रखा गया था कि 2020 में उर्वरकों से जो नाइट्रस ऑक्साइड का उत्सर्जन होता है, वर्ष 2030 तक उसमें 30 फ़ीसदी की कटौती की जाएगीष उस योजना पर अब अमल किया जा रहा है। कनाडा के कृषि विभाग ने एक बयान में कहा है कि कृषि क्षेत्र की सफलता में उर्वरकों की बड़ी भूमिका है। पिछले दशक में रिकॉर्ड उपज, उत्पादकता बढ़ाने और अनाज के निर्यात में उर्वरकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालांकि नाइट्रस ऑक्साइड का उत्सर्जन भी तेजी से बढ़ा है। इसलिए कनाडा सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर उर्वरकों से होने वाले उत्सर्जन में कटौती करने का लक्ष्य रखा है। यह 2030 तक कनाडा में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में 40 से 45 फ़ीसदी कटौती की कनाडा की प्रतिबद्धता का ही हिस्सा है।</p>
<p>कृषि विभाग के इस बयान से यह भी स्पष्ट है कि नाइट्रोजन उर्वरकों का इस्तेमाल कम करने से अगले दशक में फसलों की उत्पादकता में भी गिरावट आएगी। इससे कृषि क्षेत्र तो को नुकसान तो होगा ही, उससे भी बड़ी बात है कि इससे किसान प्रभावित होंगे। उर्वरक निर्माताओं, थोक विक्रेताओं और डिस्ट्रीब्यूटरों के संगठन फर्टिलाइजर कनाडा का कहना है कि देश में फसलों की उत्पादकता का उर्वरकों के इस्तेमाल से सीधा संबंध है। उर्वरकों से उत्सर्जन 2020 की तुलना में 30 फ़ीसदी कम करने का मतलब है कृषि उत्पादकता भी 2020 के स्तर से नीचे पहुंच जाएगी। उनका आकलन है कि 1000 एकड़ में कनोला और इतनी ही जमीन में गेहूं की खेती करने वाले किसान का मुनाफा सालाना 38000 से 40000 डॉलर कम हो जाएगा।</p>
<p>दूसरी तरफ आयरलैंड ने 2020 तक कृषि से ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन 25 फ़ीसदी घटाने का फैसला किया है। वैसे, 2030 तक सभी क्षेत्रों से कुल कार्बन उत्सर्जन 51 फ़ीसदी कम करने का लक्ष्य है, लेकिन इस लक्ष्य को हासिल करना मुश्किल लगता है क्योंकि प्रति व्यक्ति सबसे अधिक उत्सर्जन करने वाले इस देश में उत्सर्जन कटौती लक्ष्य पहले भी अधूरे रहे हैं। आयरलैंड के कुल उत्सर्जन में कृषि का हिस्सा 37 फ़ीसदी होता है। किसान संगठन 22 फ़ीसदी कटौती की उम्मीद में थे जबकि पर्यावरणविद और दूसरे सेक्टर के प्रतिनिधि इसमें 30 फ़ीसदी कटौती चाहते थे। सरकार ने इन दोनों के बीच 25 फ़ीसदी का लक्ष्य तय किया है।</p>
<p>आयरलैंड में कृषि उत्सर्जन कम करना स्वैच्छिक बनाया जाएगा और इसके लिए किसानों को इंसेंटिव भी मिलेगा। हालांकि मवेशी पालने वाले किसानों पर मवेशियों को खत्म करने का दबाव बढ़ेगा। इसलिए वहां के दुग्ध संगठन आयरिश क्रीमरी मिल्क सप्लायर्स एसोसिएशन ने इस डील की आलोचना करते हुए कहा है कि इससे खेती मुनाफे की नहीं रह जाएगी। यह भी सच है कि कृषि क्षेत्र के लक्ष्य की भरपाई के लिए दूसरे सेक्टर के लक्ष्य ज्यादा रखे गए हैं। ट्रांसपोर्ट सेक्टर के लिए 50 फ़ीसदी, कमर्शियल और पब्लिक बिल्डिंग के लिए 40 फ़ीसदी और इंडस्ट्री के लिए 35 फ़ीसदी का लक्ष्य रखा गया है।&nbsp;</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ आयरलैंड और कनाडा में कृषि से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन घटाने के लक्ष्य का व्यापक विरोध ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[रूस की सहमति के बाद यूक्रेन से दो करोड़ टन गेहूं निर्यात का रास्ता खुला, वैश्विक अनाज संकट में सुधार की उम्मीद]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/russia-agrees-on-export-of-grains-from-ukraine.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 23 Jul 2022 10:59:08 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/russia-agrees-on-export-of-grains-from-ukraine.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>युद्धरत रूस और यूक्रेन आखिरकार अनाज खास कर गेहूं का निर्यात करने पर राजी हो गए हैं। शुक्रवार को इस्तांबुल में हुई बैठक में दोनों देशों के प्रतिनिधियों ने इस पर सहमति जताई। समझौते के अनुसार यूक्रेन में काला सागर के बंदरगाहों पर जो 20 करोड़ टन से अधिक का अनाज निर्यात के लिए रुका पड़ा है, रूस उनका निर्यात करने की इजाजत देगा। फरवरी में यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद इनका निर्यात रुक जाने के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं का संकट हो गया है और इनके दाम भी काफी बढ़ गए हैं। इससे अफ्रीका समेत कई महाद्वीपों के देशों के लिए स्थिति विकट हो गई है जो गेहूं के लिए पूरी तरह से आयात पर निर्भर हैं। कई देशों में अकाल तो कई जगह राजनीतिक अस्थिरता की नौबत आ गई है। इस समझौते के बाद हालात धीरे-धीरे सुधरने की उम्मीद है।</p>
<p>संयुक्त राष्ट्र और तुर्की के हस्तक्षेप और लगातार कई हफ्तों तक चली बातचीत के बाद यह सफलता मिली है। संयुक्त राष्ट्र ने रूस को आश्वासन दिया है कि वह भी अपने अनाज और उर्वरकों का निर्यात कर सकेगा। हालांकि यह निर्यात कब शुरू होगा अभी यह स्पष्ट नहीं है क्योंकि माना जा रहा है कि काला सागर में जहाजों का आवागमन रोकने के लिए रूस ने बारूदी सुरंगें बिछा रखी हैं। उन्हें हटाने के बाद ही जहाज उस इलाके से गुजर सकते हैं। यूक्रेन ने भी अपने बंदरगाहों के इर्द-गिर्द सुरंगे बिछा रखी हैं ताकि रूसी नौसैनिक जहाज वहां तक ना पहुंच सके। हालांकि रूस और यूक्रेन में सीजफायर पर कोई सहमति नहीं बन सकी है इसलिए जहाजों के लिए खतरा फिलहाल बना रहेगा।</p>
<p>समझौते के मुताबिक यूक्रेन तुर्की के रास्ते अनाज का निर्यात करेगा। यूक्रेन के ओडेसा समेत तीन बंदरगाहों से अनाज लेकर जहाज तुर्की जाएंगे। वहां उनकी अनलोडिंग होगी और फिर वहां से दूसरे देशों को भेजा जाएगा। तुर्की से जो जहाज यूक्रेन के बंदरगाहों पर लौटेंगे उनकी संयुक्त राष्ट्र, तुर्की, यूक्रेन और रूस की टीम जांच करेगी और यह देखेगी कि उनमें यूक्रेन के लिए हथियार तो नहीं हैं। यह समझौता 4 महीने के लिए है। हर महीने 50 लाख टन अनाज का निर्यात यूक्रेन करेगा। इस तरह 4 महीने में दो करोड़ टन गेहूं का निर्यात होने की उम्मीद है।</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ रूस की सहमति के बाद यूक्रेन से दो करोड़ टन गेहूं निर्यात का रास्ता खुला, वैश्विक अनाज संकट में सुधार की उम्मीद ]]></media:description>
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        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[काला सागर में खड़े हैं यूक्रेन के गेहूं से लदे 130 जहाज, निर्यात के लिए चल रही है रूस से बातचीत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/130-ships-laden-with-ukrainian-wheat-waiting-for-approval-of-russia.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 15 Jul 2022 10:55:24 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/130-ships-laden-with-ukrainian-wheat-waiting-for-approval-of-russia.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>ऐसे समय जब दुनिया के कई देश खाद्यान्न संकट से गुजर रहे हैं यूक्रेन में गेहूं से लदे 130 मालवाहक जहाज काला सागर में आगे बढ़ने का इंतजार कर रहे हैं। दरअसल संयुक्त राष्ट्र और तुर्की यूक्रेन से अनाज के निर्यात को लेकर रूस के साथ बातचीत कर रहे हैं। यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद वहां से होने वाला निर्यात लगभग ठप पड़ा हुआ है। अगर रूस मंजूरी देता है तो ये जहाज रोमानिया के बंदरगाहों तक जाएंगे। वहां से दुनिया के अन्य देशों को अनाज का निर्यात किया जाएगा।</p>
<p>ब्रिटिश अंग्रेजी अखबार द गार्डियन की एक रिपोर्ट के अनुसार रूसी सेना ने यूक्रेन के दक्षिणी तट पर बारूदी सुरंगे बिछा रखी हैं। इस वजह से उस रास्ते जहाजों का आना-जाना खतरनाक हो गया है। दूसरी तरफ यूक्रेन का गेहूं अंतरराष्ट्रीय बाजार में नहीं पहुंचने के कारण खासकर अफ्रीका के कई देशों में अकाल की नौबत आने की आशंका बन गई है। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय बाजार में अनाज के दाम भी बढ़ गए हैं। यूक्रेन दुनिया में गेहूं के बड़े निर्यातकों में है। दुनिया में जितने गेहूं का व्यापार होता है उसका 9 फ़ीसदी यूक्रेन निर्यात करता है। इसके अलावा 42 फ़ीसदी सनफ्लावर ऑयल का निर्यात भी यही करता है। दुनिया का 16 फ़ीसदी मक्का उत्पादन भी यूक्रेन में ही होता है।</p>
<p>गेहूं से लदे ये जहाज सुलिना और बाइस्त्रे कैनाल के रास्ते रोमानिया जा सकते हैं। बाइस्त्रे कैनाल हाल तक बंद पड़ा था लेकिन रूसी सैनिकों के हटने के बाद उसे खोल दिया गया है। लेकिन इस रास्ते सिर्फ छोटे जहाज ही जा सकते हैं। यूक्रेन सरकार के मुताबिक जून में वहां से 25 लाख टन सामान का निर्यात किया गया जबकि उसने 80 लाख टन निर्यात का लक्ष्य रखा था। काला सागर के बंदरगाहों पर रूस का नियंत्रण होने और बारूदी सुरंगे बिछाए जाने के कारण यूक्रेन से दो से ढाई करोड़ टन गेहूं का निर्यात अटका हुआ है।</p>
<p>तुर्की के इस्तांबुल में इसी हफ्ते रूस और यूक्रेन के अधिकारी संयुक्त राष्ट्र और तुर्की के अधिकारियों से मिले। मार्च के बाद रूस और यूक्रेन के अधिकारियों की यह पहली बैठक थी। अमेरिकी स्पेस एजेंसी के अनुसार यूक्रेन की 22 फ़ीसदी खेती की जमीन पर रूस का नियंत्रण हो गया है। यह आरोप भी लग रहे हैं कि उन खेतों में तैयार गेहूं का रूस निर्यात करना चाहता है।</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ काला सागर में खड़े हैं यूक्रेन के गेहूं से लदे 130 जहाज, निर्यात के लिए चल रही है रूस से बातचीत ]]></media:description>
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        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[चीन को पछाड़ कर भारत 2023 में सबसे बड़ी आबादी वाला देश बन जाएगा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/india-will-become-the-most-populous-country-in-2023-after-china..html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 12 Jul 2022 11:46:40 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/india-will-become-the-most-populous-country-in-2023-after-china..html</guid>
        <description><![CDATA[ <p style="text-align: justify;">विश्व जनसंख्या प्रास्पेक्ट्स रिपोर्ट 2022 के अनुसार 15 नवंबर 2022 तक दुनिया की जनसंख्या 8 अरब तक पहुंचने का अनुमान है। रिपोर्ट के मुताबिक साल &nbsp;2023 में चीन से आगे निकलकर भारत दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश बन जाएगा। इस वर्ष विश्व जनसंख्या दिवस की थीम, &nbsp;सभी 8 अरब लोगों के लिए लचीला भविष्य, अवसर, अधिकार और विकल्प सुनिश्चित करना है। रिपोर्ट में चिंता व्यक्त की गई है कि आठ अरब लोगों में धिकारों और समानता से बड़ी जनसंख्या दूर है जिसको दूर करने की जरूरत है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा वर्ल्ड पापुलेशन डे पर जारी की गई वर्ल्ड पॉपुलेशन प्रॉस्पेक्ट्स 2022 में यह जानकारी दी गई है।</p>
<p style="text-align: justify;">संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतरेस ने कहा है कि इस साल का वर्ल्ड पॉपुलेशन डे ऐसे एक माइलस्टोन साल में आ रहा जब दुनिया का आठ अरबवां निवासी पैदा होने वाला है। यह हमारी विविधता, एकरूप मानवता के रूप में पहचान के साथ ही स्वास्थ्य के मोर्चे पर सफलता के साथ मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में कमी लाकर जीवन काल को बढ़ाने की उपलब्धि हासिल करने का मौका है।&nbsp; उन्होंने कहा कि हम जिस ग्रह यानि पृथ्वी पर रहते हैं यह हम सबकी साझा जिम्मेदारी है कि पृथ्वी को सुरक्षित रखने के लिए सब मिलकर काम करें। इसलिए यह हम सभी लोगों की सोचने की जिम्मेदारी है कि हम एक दूसरे के प्रति जिम्मेदारी को निभाएं।</p>
<p style="text-align: justify;">दुनिया की जनसंख्या 1950 के बाद अभी तक की अपनी सबसे धीमी दर से बढ़ रही है जो 2020 की तुलना में एक फीसदी कम हो गई है। संयुक्त राष्ट्र के नवीनतम अनुमानों से पता चलता है कि दुनिया की आबादी साल 2030 में लगभग 8.5 अरब और 2050 में 9.7 अरब हो सकती है। 2080 के दशक के दौरान लगभग 10.4 अरब होने का अनुमान है। विश्व जनसंख्या संभावव्यता रिपोर्ट&nbsp; 2022 में यह भी कहा गया है कि हाल के दशकों में कई देशों में प्रजनन क्षमता में उल्लेखनीय गिरावट आई है। आज पूरी दुनिया का दो-तिहाई आबादी ऐसे देशों में रहती है जहां कम मृत्यु दर वाली आबादी है। वहां पर प्रति महिला आजीवन प्रजनन क्षमता 2.1 से कम है। 61 देशों की आबादी में 2022 और 2050 के बीच प्रजनन क्षमता के निरंतर निम्न स्तर के कारण एक फीसदी या उससे अधिक की कमी होने का अनुमान है।</p>
<p style="text-align: justify;">साल 2050 तक वैश्विक जनसंख्या में अनुमानित वृद्धि का आधे से अधिक आठ देशों में केंद्रित होगा। जिसमें भारत, कांगो लोकतत्रिक गणराज्य, मिस्र, इथियोपिया, नाइजीरिया, पाकिस्तान, फिलीपींस और संयुक्त गणराज्य तंजानिया हैं। अफ्रीका के देशों से आधे से अधिक जनसंख्या के योगदान की उम्मीद है। संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक मामलों के अवर&nbsp; महासचिव लियू जेनमिन ने कहा कि जनसंख्या वृद्धि और सतत विकास के बीच संबंध जटिल है। तेजी से जनसंख्या वृद्धि गरीबी उन्मूलन, भूख और कुपोषण का मुकाबला करना और स्वास्थ्य और शिक्षा प्रणालियों के कवरेज को और अधिक कठिन बना देती है। इसके विपरीत सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करना विशेष रूप से स्वास्थ्य, शिक्षा और लैंगिक समानता से संबंधित, प्रजनन स्तर को कम करने और वैश्विक जनसंख्या वृद्धि को धीमा करने में योगदान देगा।</p>
<p style="text-align: justify;">अफ्रीका के अधिकांश देशों में साथ ही साथ एशिया, लैटिन अमेरिका और कैरिबियन के कुछ हिस्सों में काम करने की उम्र (25 से 64 वर्ष के बीच) में जनसंख्या का हिस्सा प्रजनन क्षमता में कमी के कारण बढ़ रहा है। दुनिया में 65 वर्ष और उससे अधिक आयु में वैश्विक जनसंख्या का हिस्सा 2022 में 10 प्रतिशत से बढ़कर 2050&nbsp; में 16 प्रतिशत होने का अनुमान है। उस समय यह उम्मीद की जाती है कि 65 वर्ष या उससे अधिक आयु के व्यक्तियों की संख्या दुनिया भर में दोगुने से अधिक होगी। 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों की संख्या और 12 वर्ष से कम आयु के बच्चों की संख्या के बराबर होगी।</p>
<p style="text-align: justify;">कोराना महामारी ने जनसंख्या परिवर्तन के सभी तीन घटकों को प्रभावित किया है। जन्म के समय वैश्विक जीवन प्रत्याशा 2021 में गिरकर 71 वर्ष हो गई। कुछ देशों में, महामारी की लगातार लहरों ने गर्भधारण और जन्म की संख्या में अल्पकालिक कमी पैदा की है। पिछले कई दशकों में यह दिन एक उत्सव के रूप में मनाया जाता था और निरंतर विकास की दुहाई दी जाती थी। लेकिन,अब लगातार बढ़ रही आबादी के चलते यह दिन चिंता जताने और जागरूकता फैलाने का अवसर बन गया है।</p>
<p style="text-align: justify;">इस साल की वर्ल्ड पॉपुलेशन डे थीम भी इसी पर केंद्रित है। इस दिन पूरी दुनिया में जनसंख्या को नियंत्रित करने के लिए विभिन्न उपायों से लोगों को परिचित कराया जाता है। साथ ही परिवार नियोजन के मुद्दे पर भी गहरी और सार्थक बातचीत की जाती है। इस दिन जगह-जगह जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम होते हैं और उन कार्यक्रमों के जरिये लोगों को जागरूक करने की हर संभव कोशिश की जाती हैजिससे बढ़ती हुई जनसंख्या पर लगाम लगाई जा सके।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ चीन को पछाड़ कर भारत 2023 में सबसे बड़ी आबादी वाला देश बन जाएगा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>jpagrimedia73@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[रिकॉर्ड ऊंचाई से 27 फ़ीसदी नीचे आई गेहूं की कीमत, यूक्रेन संकट के बावजूद विश्व बाजार में घटे दाम]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/despite-ukraine-crisis-wheat-prices-in-global-markets-down-by-27-percent.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 30 Jun 2022 09:08:59 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/despite-ukraine-crisis-wheat-prices-in-global-markets-down-by-27-percent.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में पैदा हुआ गेहूं का संकट अभी खत्म नहीं हुआ है, इसके बावजूद इस कमोडिटी के दाम में हाल में तेज गिरावट आई है। मंगलवार, 28 जून को गेहूं की कीमत 9.39 डॉलर प्रति बुशल (लगभग 313 डॉलर प्रति टन) रह गई जबकि 7 मार्च को इसकी कीमत 12.94 डॉलर प्रति बुशल (लगभग 431 डॉलर प्रति टन) पर पहुंच गई थी। इस तरह रिकॉर्ड ऊंचाई से दाम 27 फीसदी गिर चुके हैं। वैसे एक साल पहले जुलाई 2021 में दाम 6 डॉलर प्रति बुशल के आसपास थे।</p>
<p>अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं के दाम रूस-यूक्रेन युद्ध से पहले से ही ऊंचे चल रहे थे। कोविड-19 के कारण सप्लाई चेन बाधित हो गई थी। इसलिए अनेक देशों में इसकी किल्लत हो गई और दाम बढ़ने लगे। युद्ध के कारण स्थिति और बिगड़ गई। दुनिया का 30 फीसदी गेहूं निर्यात रूस और यूक्रेन ही करते हैं।</p>
<p>गेहूं के दाम में इस गिरावट का प्रमुख कारण रूस का आश्वासन है। रूस और तुर्की ने कहा है कि वे काला सागर के रास्ते यूक्रेन का गेहूं निकालने पर चर्चा के लिए तैयार हैं। दरअसल, पिछले दिनों जर्मनी में जी7 देशों की बैठक में भी यह मुद्दा उठा और इन देशों ने रूस से इस पर विचार करने का आग्रह किया।</p>
<p>युद्ध शुरू होने के तत्काल बाद भारत ने गेहूं निर्यात को बढ़ावा देने की कोशिश की थी। तब यहां किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की तुलना में 30 से 40 फीसदी ज्यादा भाव मिले थे। लेकिन जल्दी ही पता चला कि मार्च में अचानक तापमान बढ़ने से उत्तरी राज्यों में गेहूं की फसल को नुकसान हुआ है। सरकारी खरीद भी पिछले साल के 434 लाख टन के मुकाबले 187.46 लाख टन पर अटक गया।</p>
<p>देश में गेहूं संकट की आशंका बनती देख सरकार ने 13 मई को इसके निर्यात पर पाबंदी लगाने का फैसला किया। हालांकि उसके बाद सवा महीने में करीब 18 लाख टन गेहूं का निर्यात किया गया। यह निर्यात बांग्लादेश समेत कई देशों की सरकारों के आग्रह पर किया गया।</p>
<p>उधर, युद्ध के कारण यूक्रेन के बंदरगाहों पर गेहूं और अन्य अनाज बड़ी मात्रा में जमा हो गए हैं। रूसी सेना ने इन बंदरगाहों पर या तो कब्जा कर लिया है या वहां तक आना-जाना रोक दिया है। हालांकि यूक्रेन से तत्काल निर्यात की उम्मीद नहीं है क्योंकि रूसी बमबारी में बंदरगाहों को भी नुकसान पहुंचा है। इसके अलावा समुद्र में जो बारूदी सुरंगें बिछाई गई हैं उन्हें भी हटाना पड़ेगा।</p>
<p>गेहूं के अलावा मक्का और सोयाबीन की कीमतों में भी गिरावट आने लगी है। इन फसलों की वैश्विक पैदावार अच्छी होने की उम्मीद में इनके दाम घटे हैं। ग्लोबल मार्केट में अन्य कृषि जिंसों की कीमतों में भी नरमी का रुख है। कुछ विशेषज्ञ यह मान रहे हैं कि कृषि जिंसों की महंगाई शायद अपने शीर्ष पर पहुंच गई है। चीन में कोविड लॉकडाउन हटने से वहां से भी दूसरे बाजारों में सप्लाई में सुधार आया है। इसका असर भी कीमतों पर दिखने लगा है।</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ रिकॉर्ड ऊंचाई से 27 फ़ीसदी नीचे आई गेहूं की कीमत, यूक्रेन संकट के बावजूद विश्व बाजार में घटे दाम ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[इजराइल के सहयोग से बागवानी के उत्कृष्टता केंद्रों का बेहतर संचालनः तोमर]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/tomar-appreciates-steps-in-horticulture-with-the-help-of-israel.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 12 May 2022 10:06:06 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/tomar-appreciates-steps-in-horticulture-with-the-help-of-israel.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत और इजराइल कृषि, जल प्रबंधन, पर्यावरण व ग्रामीण विकास के क्षेत्र में आधुनिक कृषि तकनीक, क्षमता निर्माण, ज्ञान हस्तांतरण व समर्थन जैसे क्षेत्रों में सहयोग कर सकते हैं। बुधवार को यरुशलम में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और इजराइल के कृषि और ग्रामीण विकास मंत्री ओडेड फोरर के बीच गोलमेज बैठक में इन विषयों पर चर्चा हुई। इस दौरान तोमर ने कहा कि इजराइल के सहयोग से भारत में उत्कृष्टता केंद्रों का बेहतर संचालन हो रहा है, जो आगे सभी राज्यों में स्थापित किए जा सकेंगे।</p>
<p>बातचीत के दौरान, माशाव के कृषि सहयोग कार्यक्रमों और भारत में अन्य हितधारकों के पेशेवर प्रशिक्षण गतिविधियों की सराहना की गई। तोमर ने कहा कि भारत सरकार को क्षमता निर्माण और ज्ञान के हस्तांतरण पर ध्यान केंद्रित करते हुए भारत में माशाव की गतिविधियों को अपनाने की संभावनाओं का पता लगाना है, जिसके लिए प्रत्येक राज्य में उत्कृष्टता केंद्र स्थापित किए जाएंगे।</p>
<p>उन्होंने कहा कि पिछले दो दिनों में मैंने प्रतिनिधिमंडल सहित कृषि में इजराइल की मजबूती और नवाचार को देखा है। इजराइल के रेगिस्तानी क्षेत्रों को वेजिटेबल बास्केट में बदलने के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि भारत सरकार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में प्रौद्योगिकी, मशीनीकरण, स्मार्ट व टिकाऊ पद्धतियों और कृषि व्यवसाय मॉडल के साथ किसानों को सशक्त बनाकर कृषि क्षेत्र में तेजी से परिवर्तन ला रही है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ इजराइल के सहयोग से बागवानी के उत्कृष्टता केंद्रों का बेहतर संचालनः तोमर ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[रूस&amp;#45;यूक्रेन तनाव से जौ और उर्वरकों की सप्लाई बाधित होने की आशंका]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/supply-of-several-commodities-could-be-hit-due-to-tension-between-russia-and-ukraine.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 23 Feb 2022 10:30:58 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/supply-of-several-commodities-could-be-hit-due-to-tension-between-russia-and-ukraine.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>रूस और यूक्रेन के बीच तनाव अब युद्ध के कगार पर पहुंच गया है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने यूक्रेन के पूर्वी क्षेत्र के दोनेत्स्क और लुहान्स्क इलाके को मान्यता देते हुए वहां सेना भेजने का फैसला किया है। पुतिन ने इसे शांति सेना बताया है। अभी यह खुली जंग तो नहीं है, लेकिन अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों को आशंका है कि पुतिन जल्दी ही युद्ध की शुरुआत कर सकते हैं।</p>
<p>रूस और यूक्रेन के बीच बढ़ते तनाव के चलते ग्लोबल बाजार में कमोडिटी के दामों में पहले ही तेजी देखने को मिल रही है। आने वाले दिनों में इसका और अधिक असर हो सकता है। गर्मियां आने वाली हैं और गर्मियों में बियर की खपत अधिक होती है। दुनिया में ज्यादातर बियर जौ (जई) से ही बनती है। इसकी कीमत में 30 <span>फ़ीसदी हिस्सा जौ का होता है। बीते एक साल में इसकी कीमत पहले ही </span>60 <span>फ़ीसदी से अधिक बढ़ चुकी है। रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध होने पर जौ की ग्लोबल सप्लाई बाधित होगी और दाम और बढ़ेंगे। इसके अलावा, कच्चा तेल महंगा होने से ढुलाई महंगी हो गई। युद्ध का खतरा बढ़ने से बीमा प्रीमियम भी बढ़ गया है। इसलिए रूस और यूक्रेन से आयात करने में दूसरे देश बच सकते हैं और दूसरे देशों का रुख कर सकते हैं।</span></p>
<p><strong>रूस सबसे बड़ा जौ उत्पादक, यूक्रेन चौथे नंबर पर</strong></p>
<p>रूस जौ का सबसे बड़ा उत्पादक है। वहां सालाना उत्पादन 1.8 <span>करोड़ टन के आसपास है। यूक्रेन चौथे नंबर पर है जहां उत्पादन </span>95 <span>लाख के आसपास है। भारत में जौ का उत्पादन 16-17 लाख टन के आसपास रहता है। राजस्थान और उत्तर प्रदेश इसके सबसे बड़े उत्पादक हैं। भारत में कुछ प्रीमियम ब्रांड को छोड़ दें तो बेवरेज कंपनियां घरेलू बाजार से ही जौ खरीदती हैं। लेकिन रूस और यूक्रेन से सप्लाई बाधित होने पर ग्लोबल मार्केट में दाम बढ़ेंगे और उसका असर घरेलू बाजार में भी कीमतों पर दिखेगा। </span></p>
<p><strong>बेवरेज कंपनियां फरवरी-मार्च में ही ज्यादा जौ खरीदती हैं</strong></p>
<p>दुनिया में 90 <span>फ़ीसदी माल्ट उत्पादन जौ से ही होता है। माल्ट से बियर, व्हिस्की और अन्य अल्कोहलिक बेवरेज बनाए जाते हैं। इसके अलावा जौ का इस्तेमाल फूड प्रोसेसिंग और पशु चारे में भी होता है। गर्मियों को ध्यान में रखते हुए अनेक बेवरेज कंपनियां फरवरी-मार्च के महीने में ही जौ अधिक मात्रा में खरीदती हैं। इसलिए अभी सप्लाई बाधित होने या दाम बढ़ने पर उसका असर सीधा उत्पादन और कीमत पर पड़ेगा।</span></p>
<p><strong>रूस और यूक्रेन खाद्य और ऊर्जा के बड़े निर्यातक</strong></p>
<p>रूस-यूक्रेन तनाव का असर दूसरी कमोडिटी पर भी पड़ना तय है। मेनयूलाइफ इन्वेस्टमेंट मैनेजमेंट के अनुसार रूस और यूक्रेन दोनों खाद्य और ऊर्जा, जिनमें तेल, गैस, अनाज और कुकिंग ऑयल शामिल हैं, के बड़े निर्यातक हैं। पश्चिमी देशों ने रूस पर पाबंदी लगाने की चेतावनी दे रखी है। पाबंदी का दुनिया के कमोडिटी बाजार पर गहरा असर हो सकता है। एक तो इन दोनों देशों से पारंपरिक रूप से आयात करने वाले देशों को नए विक्रेता तलाशने पड़ेंगे। इसके अलावा सप्लाई कम होने से कमोडिटी के दाम में भी बढ़ोतरी होगी।</p>
<p><strong>रूस-यूक्रेन करते हैं दुनिया का </strong><strong>21<span> फीसदी गेहूं, जौ और मक्का निर्यात </span></strong></p>
<p>रूस दुनिया का 17.1 <span>फ़ीसदी प्राकृतिक गैस का उत्पादन करता है। यह गैस का सबसे बड़ा निर्यातक है। कच्चे तेल के निर्यात में सऊदी के बाद यह दूसरे नंबर पर है। रूस और यूक्रेन मिलकर दुनिया का </span>21<span> फीसदी गेहूं, जौ और मक्का का निर्यात करते हैं। सनफ्लावर आयल की ग्लोबल सप्लाई में इन दोनों देशों की हिस्सेदारी </span>60 <span>फ़ीसदी है। रूस और बेलारूस उर्वरकों के निर्यात में भी </span>20 <span>फ़ीसदी हिस्सेदारी रखते हैं। इसके अलावा कुछ धातुओं के निर्यात में भी इनकी प्रमुख हिस्सेदारी है जिन जिनका इस्तेमाल इलेक्ट्रॉनिक्स सामान में किया जाता है।</span></p>
<p><strong>पुतिन का सेना भेजने का आदेश, अमेरिका-ब्रिटेन ने लगाया प्रतिबंध</strong></p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/02/image_750x_6215bf7d0ee79.jpg" alt="" /></p>
<p>यूक्रेन के पूर्वी क्षेत्र के दोनेत्स्क और लुहान्स्क क्षेत्र में रूसी भाषा बोलने वाले अधिक हैं। इस क्षेत्र ने 2014 में ही खुद को यूक्रेन से अलग घोषित कर दिया था। रूस वर्षों से इसे अपना हिस्सा बताता रहा है। आरोप है कि यहां के अलवागवादी गुटों को वह समर्थन देता है। बीते आठ वर्षों में रूस समर्थित अलगाववादियों और यूक्रेन की सेना के बीच लड़ाई में 14,000 से अधिक लोग मारे गए हैं। अब राष्ट्रपति पुतिन ने इस इलाके को मान्यता देते हुए वहां सेना भेजने का आदेश दिया है। एक बयान में पुतिन ने कहा कि यूक्रेन कभी अलग देश नहीं रहा। पुतिन के इस फैसले के बाद अमेरिका ने कई रूसी वित्तीय संस्थाओं और वहां रह रहे अमीर रूसियों पर प्रतिबंध लगा दिया है। ब्रिटेन ने रूस के पांच बैंकों और तीन अरबपतियों पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है। यूरोपियन यूनियन के सदस्य देशों में भी रूसी बैंकों पर प्रतिबंध लगाने पर सहमति बन गई है। रूस के सबसे बड़े प्राकृतिक गैस खरीदार जर्मनी ने रूस से नई गैस पाइपलाइन प्रोजेक्ट पर रोक लगा दी है।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/02/image_750x500_6215bf4013780.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ रूस-यूक्रेन तनाव से जौ और उर्वरकों की सप्लाई बाधित होने की आशंका ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[आत्मनिर्भर भारत और वोकल फॉर लोकल अभियान के बावजूद चीन के साथ व्यापार रिकॉर्ड ऊंचाई पर]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/despite-atmanirbhar-bharat-and-vocal-for-local-initiatives-trade-with-china-is-at-record-high.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 19 Feb 2022 08:20:35 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/despite-atmanirbhar-bharat-and-vocal-for-local-initiatives-trade-with-china-is-at-record-high.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत और चीन के बीच संबंधों के राजनीतिक निहितार्थ चाहे जो भी हों, हाल के आंकड़े बताते हैं कि दोनों देशों के बीच व्यापार ऐतिहासिक ऊंचाई पर है। यह मई 2020 <span>में लद्दाख में चीन की घुसपैठ के बाद द्विपक्षीय व्यापार में आई गिरावट के ठीक विपरीत है। उस घुसपैठ के बाद देश की अखंडता को बनाए रखने में कई सैनिक शहीद हो गए थे। उसके बाद दोनों पड़ोसी देशों के बीच आर्थिक संबंध </span>1962 <span>के युद्ध के बाद सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए थे। </span></p>
<p>उस घटनाक्रम पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए भारत सरकार ने अपने सबसे बड़े व्यापारिक साझीदार के साथ आर्थिक संबंध को कम करने के लिए कई ठोस कदम उठाए थे। चीन और हांगकांग से निवेश की स्क्रूटनी बढ़ा दी गई थी और सैकड़ों चाइनीज ऐप पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। कई नागरिक संगठनों ने सरकार के इन कदमों का स्वागत करते हुए चीनी उत्पादों के बहिष्कार की आवाज दी। ये सभी कदम आत्मनिर्भर भारत अभियान और वोकल फॉर लोकल के सरकार के अभियान को बढ़ावा देने वाले थे। दुनिया की फैक्ट्री कहे जाने वाले चीन पर फार्मास्युटिकल्स और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे महत्वपूर्ण सेक्टर में अत्यधिक निर्भरता कम करने के मकसद से सरकार ने कई फैसले लिए थे।</p>
<p>लेकिन उन फैसलों के ऐलान के बाद डेढ़ साल से भी कम समय में चीन के साथ भारत का व्यापार अभूतपूर्व तेजी से बढ़ा है। वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय व्यापार 2021 <span>में </span>110.5 <span>अरब डॉलर का था। महत्वपूर्ण बात यह भी है कि दोनों देशों के बीच आपसी व्यापार पहली बार तीन अंकों में पहुंचा। एक साल पहले की तुलना में देखें तो ट्रेड वैल्यू </span>42 <span>फ़ीसदी बढ़ गई। </span></p>
<p>एक और खास बात यह रही कि 2021 <span>में चीन से भारत का आयात </span>88 <span>अरब डॉलर के करीब पहुंच गया। यह पिछले वर्षों के दौरान कुल द्विपक्षीय व्यापार से भी अधिक है। भारत से चीन को निर्यात में भी अच्छी खासी बढ़ोतरी हुई। </span>2020 <span>की तुलना में पिछले वर्ष भारत से चीन को निर्यात </span>21 <span>फ़ीसदी बढ़ गया। उससे पहले यह करीब एक दशक से स्थिर बना हुआ था। हालांकि आयात अधिक होने के कारण भारत का व्यापार घाटा </span>63 <span>फ़ीसदी बढ़कर </span>65 <span>अरब डॉलर हो गया।</span></p>
<p><strong>भारत-चीन द्विपक्षीय व्यापार (अरब डॉलर में)</strong>&nbsp;</p>
<table>
<tbody>
<tr>
<td>
<p><strong>वर्ष</strong></p>
</td>
<td>
<p><strong>चीन को निर्यात</strong></p>
</td>
<td>
<p><strong>चीन से आयात</strong></p>
</td>
<td>
<p><strong>कुल व्यापार</strong></p>
</td>
</tr>
<tr>
<td>
<p>2018</p>
</td>
<td>
<p>16.5</p>
</td>
<td>
<p>73.9</p>
</td>
<td>
<p>90.4</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td>
<p>2019</p>
</td>
<td>
<p>17.1</p>
</td>
<td>
<p>68.4</p>
</td>
<td>
<p>85.5</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td>
<p>2020</p>
</td>
<td>
<p>19.0</p>
</td>
<td>
<p>58.7</p>
</td>
<td>
<p>77.7</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td>
<p>2021</p>
</td>
<td>
<p>23.0</p>
</td>
<td>
<p>87.5</p>
</td>
<td>
<p>110.5</p>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<p><strong>(स्रोतः वाणिज्य मंत्रालय)</strong></p>
<p>लेकिन यहां एक पेंच है। भारत के वाणिज्य मंत्रालय के जो आंकड़े हैं उसकी तुलना में चीन के आधिकारिक आंकड़े काफी अधिक हैं। चीन के जनरल एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ कस्टम्स (जीएसी) के अनुसार 2021 <span>में दोनों देशों के बीच </span>126 <span>अरब डॉलर का आयात-निर्यात हुआ। यह </span>2020 <span>की तुलना में </span>45 <span>फ़ीसदी अधिक है। जीएसी के आंकड़ों के मुताबिक भारत से चीन का आयात </span>2021 <span>में </span>34 <span>फ़ीसदी बढ़कर </span>28 <span>अरब डॉलर हो गया, जबकि चीन ने भारत को लगभग </span>98 <span>अरब डॉलर का निर्यात किया। आंकड़ों में इस बड़े अंतर के बावजूद यह बात तो तय है कि आयात और निर्यात दोनों मामले में चीन पर भारत की निर्भरता बढ़ी है। भारत से सबसे अधिक आयात चीन ही करता है और चीन से आयात करने वाले देशों में भारत तीसरे स्थान पर है।</span></p>
<p><strong>भारत-चीन व्यापार (अरब डॉलर में)</strong></p>
<table>
<tbody>
<tr>
<td>
<p><strong>वर्ष</strong></p>
</td>
<td>
<p><strong>चीन से आयात </strong></p>
</td>
<td>
<p><strong>चीन को निर्यात</strong></p>
</td>
<td>
<p><strong>कुल व्यापार</strong></p>
</td>
</tr>
<tr>
<td>
<p>2018</p>
</td>
<td>
<p>76.7</p>
</td>
<td>
<p>18.8</p>
</td>
<td>
<p>95.5</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td>
<p>2019</p>
</td>
<td>
<p>74.8</p>
</td>
<td>
<p>18.0</p>
</td>
<td>
<p>92.8</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td>
<p>2020</p>
</td>
<td>
<p>66.7</p>
</td>
<td>
<p>20.9</p>
</td>
<td>
<p>87.6</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td>
<p>2021</p>
</td>
<td>
<p>97.5</p>
</td>
<td>
<p>28.1</p>
</td>
<td>
<p>125.6</p>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<p><strong>(स्रोतः जनरल एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ कस्टम्स, चीन)&nbsp;</strong></p>
<p>यहां अहम बात यह है कि द्विपक्षीय व्यापार दोनों देशों को किस तरह लाभान्वित कर रहा है, <span>उसका एक शुरुआती आकलन किया जाना चाहिए। इसके लिए किन वस्तुओं का आयात-निर्यात अधिक होता है उस पर गौर करना बेहतर होगा। अभी नवंबर </span>2021 <span>तक दोनों देशों के बीच आयात-निर्यात के अलग-अलग आंकड़े उपलब्ध हैं। इन आंकड़ों के उचित मूल्यांकन से पता चल सकता है कि दोनों व्यापारिक साझेदारों को किस तरह फायदा हो रहा है।</span></p>
<p>कोविड-19 <span>महामारी से पहले </span>2019 <span>में, जिसे महामारी से पहले का सामान्य वर्ष भी कहा जा सकता है</span>, <span>भारत से चीन को आयरन ओर और कंसंट्रेट, आयरन और स्टील प्रोडक्ट</span>, <span>अनरॉट अल्युमिनियम</span>, <span>नॉन बासमती चावल का निर्यात अधिक हुआ। इन प्राथमिक और मध्यवर्ती वस्तुओं के अलावा भारत ऑर्गेनिक केमिकल और टेलीकम्युनिकेशन प्रोडक्ट का निर्यात बढ़ाने में भी सफल रहा। टेलीकॉम प्रोडक्ट के निर्यात में तो </span>2020 <span>की तुलना में </span>2021 <span>के दौरान </span>300 <span>फ़ीसदी की वृद्धि हुई। गौर करने वाली बात यह है कि भारत की मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री पर महामारी की लंबी काली छाया के बावजूद एक टेक्नोलॉजी सघन इंडस्ट्री चीन में अपना बाजार बढ़ाने में सफल रही। बावजूद इसके कि चीन आयात पर कृत्रिम बैरियर लगाने के लिए जाना जाता है।</span></p>
<p>भारत में चीन से जिन वस्तुओं का आयात बढ़ा उनमें दो तरह के प्रोडक्ट खास हैं। एक तो इलेक्ट्रॉनिक प्रोडक्ट, जिनमें कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स एंड टेलीकम्युनिकेशन प्रोडक्ट दोनों शामिल हैं। दूसरा, एक्टिव फार्मास्यूटिकल इनग्रेडिएंट यानी वे कच्चे माल जिनसे दवाएं बनती हैं। वर्ष 2021 <span>में भारत ने जिन चीजों का एक अरब डॉलर से अधिक का आयात किया उनमें ज्यादातर यही दो तरह के प्रोडक्ट हैं। इससे पता चलता है की दो महत्वपूर्ण क्षेत्रों में चीन पर भारत की निर्भरता लगातार बनी हुई है।</span></p>
<p>बीते दो वर्षों के दौरान प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) स्कीम के माध्यम से भारत सरकार ने देश में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में तेजी लाने की पहल की है। ऐसे समय जब चीन से आयात रिकॉर्ड स्तर पर हो रहा है, <span>सरकार और इंडस्ट्री को अगला कदम चीन पर भारत की निर्भरता को देखते हुए मिलकर उठाना चाहिए।</span></p>
<p><em><strong>(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज के सेंटर फॉर इकोनॉमिक स्टडीज एंड प्लानिंग के प्रोफेसर हैं)</strong></em></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/02/image_750x500_62105ab22ce1c.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ आत्मनिर्भर भारत और वोकल फॉर लोकल अभियान के बावजूद चीन के साथ व्यापार रिकॉर्ड ऊंचाई पर ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[भारत&amp;#45;ऑस्ट्रेलिया में एफटीए की खुली राह, 30 दिनों में होगा अर्ली हार्वेस्ट एग्रीमेंट]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/india-australia-to-finalise-early-harvest-agreement-in-30-days.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 11 Feb 2022 16:13:29 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/india-australia-to-finalise-early-harvest-agreement-in-30-days.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) राह खुलती नजर आ रही है। दोनों देशों ने तय किया है कि अगले 30 दिनों के भीतर अर्ली हार्वेस्ट एग्रीमेंट को अंतिम रूप दे दिया जाएगा। अर्ली हार्वेस्ट एग्रीमेंट मुक्त व्यापार समझौते से पहले का चरण माना जाता है। इसमें दो देश टैरिफ लिबरलाइजेशन के लिए कुछ प्रोडक्ट की पहचान करते हैं। टैरिफ लिबरलाइजेशन का मतलब कुछ वस्तुओं के आयात और निर्यात पर कस्टम ड्यूटी कम करना या खत्म करना होता है। इसके अलावा सर्विसेज का व्यापार बढ़ाने के लिए नियमों को भी आसान बनाया जाता है।</p>
<p>गुरुवार को वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने ऑस्ट्रेलिया के व्यापार मंत्री डैन टेहन के साथ मुलाकात के दौरान यह घोषणा की। टेहन प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते पर आगे की बातचीत के लिए भारत में हैं। इसे दोनों देशों ने व्यापक आर्थिक सहयोग समझौता (सीईसीए) नाम दिया है। दोनों देश काफी दिनों से लंबित इस समझौते को 2022 के अंत तक पूरा करना चाहते हैं। गोयल ने कहा कि कृषि, खनन, फार्मा, शिक्षा, एजुकेशन टेक्नोलॉजी, रिन्यूएबल, रेलवे ज्वैलरी, पर्यटन, रक्षा, टेक्सटाइल और गेमिंग के क्षेत्र में अनेक अवसर हैं।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/02/image_750x_62063dad65554.jpg" alt="" /></p>
<p>गोयल ने कहा, "मैं आपको आश्वस्त करना चाहता हूं कि आप बहुत ही मजबूत साझेदारी करने जा रहे हैं। इसे अगले 30 दिनों में अंतिम रूप दे दिया जाएगा। मंत्री टेहन और मैंने मिलकर अपनी टीम के लिए यह समय सीमा तय की है। दोनों टीमों के लिए अगले 30 दिन रात-दिन एक करने वाले होंगे।" वाणिज्य मंत्री के अनुसार यह भारत या ऑस्ट्रेलिया का सबसे कम समय में किया गया मुक्त व्यापार समझौता होगा।</p>
<p>गोयल ने कहा कि अली हार्वेस्ट समझौते में अनेक मुद्दे शामिल हैं। बल्कि यह कहा जा सकता है कि दोनों देशों की जिन क्षेत्रों में रुचि है उनमें ज्यादातर इसमें शामिल हैं। कुछ संवेदनशील मुद्दे ही सीईसीए के लिए बाकी रहेंगे। उन्हें भी हम अर्ली हार्वेस्ट समझौते के बाद एक से डेढ़ साल के भीतर पूरा करने की उम्मीद रखते हैं। इस मौके पर टेहन ने कहा कि हम जल्दी लेकिन क्वालिटी समझौता चाहते हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाना दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद है। दोनों देश एक दूसरे की डिग्री को मान्यता देने पर भी विचार कर सकते हैं।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/02/image_750x500_62063d7003fd9.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ भारत-ऑस्ट्रेलिया में एफटीए की खुली राह, 30 दिनों में होगा अर्ली हार्वेस्ट एग्रीमेंट ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/02/image_750x500_62063d7003fd9.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[ब्रिटेन में जीन एडिटिंग के लिए आसान हुए नियम, भारत में अभी फैसले का इंतजार]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/gene-editing-rules-simplified-for-uk-researchers-india-yet-to-decide.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 30 Jan 2022 09:38:05 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/gene-editing-rules-simplified-for-uk-researchers-india-yet-to-decide.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>इंग्लैंड में जीन एडिटिंग के मामलों में गैरजरूरी लालफीताशाही को कम करने के लिए नया कानून बनाया जाएगा। इससे इंग्लैंड के किसानों को बेहतर रोग प्रतिरोधी, पौष्टिक और अधिक उपज देने वाली फसलें उगाने में मदद मिलेगी। यह जानकारी इंग्लैंड के पर्यावरण, खाद्य और ग्रामीण मामलों के विभाग (डीईएफआरए) की तरफ से दी गई है। इस कानून के आने से इंग्लैंड के कृषि वैज्ञानिक जीन एडिटिंग जैसी आनुवांशिक तकनीकों का उपयोग करके पौधों से संबंधित अनुसंधान और विकास में मजबूत हो सकेंगे। यह नया नियम यूरोपीय संघ से इंग्लैंड के अलग होने यानी ब्रेक्सिट के बाद संभव हुआ है।</p>
<p>जीन एडिटिंग के माध्यम से पौधों के प्रजनन पर प्रतिबंध लगाने वाले यूरोपीय न्यायालय के 2018 के फैसले के बाद इस पर रोक लगा दी गई थी। न्यायालय के फैसले का आधार 2001 का यूरोपियन यूनियन का वह निर्देश था जिसमें जेनेटिकली मोडिफाइड ऑर्गेनिज्म (जीएमओ) पर प्रतिबंध लगाया गया था। हालांकि, ऐसे अध्ययन हैं जो कहते हैं कि "जीएमओ निर्देश नई तकनीकों के मुताबिक नहीं हैं।" लेकिन यूरोपीय संघ में पर्यावरणविदों और जैविक किसानों का कहना है कि संशोधित पौधों को जीएमओ के रूप में लेबल करना जारी रखना चाहिए।</p>
<p>विभाग के अनुसार, नए नियम ब्रिटेन में उन पौधों पर लागू होंगे जहां जीन संपादन का उपयोग नई किस्मों को बनाने के लिए किया जाता है। प्रकृति द्वारा प्रदान किए गए जेनेटिक संसाधनों का जेनेटिक प्रौद्योगिक के जरिए उपयोग करने से किसानों को बेहतर फसल उगाने के अवसर मिलेंगे। यह हानिकारक रसायनों, कीटनाशकों और दवाओं के उपयोग को कम करके पर्यावरण की रक्षा के नए तरीकों में मदद करेगा। अन्य संभावित लाभों में फसलों को प्रतिकूल मौसम और जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक प्रतिरोधी बनाना शामिल है।</p>
<p>ब्रिटेन के एग्री इनोवेशन मंत्री जो चर्चिल कहते हैं, नई आनुवंशिक प्रौद्योगिकी हमें खाद्य सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता के नुकसान जैसी बड़ी चुनौतियों से निपटने में मदद कर सकती हैं। हालांकि, आनुवंशिक प्रौद्योगिकी पर अनुसंधान करने वाले सभी वैज्ञानिकों को किसी भी शोध और परीक्षण के लिए विभाग को सूचित करना जारी रखना होगा। फिलहाल आनुवंशिक रूप से संशोधित पौधों को जीएमओ के रूप में ही वर्गीकृत किया जाएगा। इन पौधों की व्यावसायिक खेती और उनसे प्राप्त किसी भी खाद्य उत्पाद को मौजूदा नियमों के अनुसार अधिकृत करने की आवश्यकता होगी।</p>
<p>जीन एडिटिंग, जेनेटिक मॉडिफिकेशन से इस मायने में भिन्न है, कि इस प्रौद्योगिकी से ब्रीडर और वैज्ञानिक प्राकृतिक प्रजनन जैसा ही तरीका अपना सकते हैं। जीन-एडिटिंग की तकनीक वायरस येलो प्रतिरोधी चुकंदर, बिना शतावरी फफूंदी गेहूं, प्रतिरोधी टमाटर और रोग प्रतिरोधी केले जैसी फसलों के उत्पादन में उपयोगी साबित होगी।</p>
<p>भारत में जीन एडिटिंग की नीति राजनीति का शिकार होती दिख रही है। जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) के दिशानिर्देशों के अनुसार &nbsp;एसडीएन1 और एसडीएन2 श्रेणियों को जेनेटिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति (जीईएसी) के मूल्यांकन से छूट दी जानी चाहिए। इससे भारतीय कृषि को विज्ञान से मिलने वाले लाभ की प्रक्रिया में तेजी आएगी। ट्रांसजेनिक फसलों के विपरीत, एसडीएन1 और एसडीएन2 श्रेणियों में कोई विदेशी जीन शामिल नहीं है।</p>
<p>दुर्भाग्यवश पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय इस पर विश्वास नहीं कर पा रहा है। इस विभाग के लिए फील्ड ट्रायल में राज्य की सहमति भी जरूरी है। इसलिए उसने इस संबंध में राज्यों को एक पत्र भेजकर उनकी राय मांगी है। लेकिन लगता है मामला अटका हुआ है। भारत में नीति निर्माताओं को यह तय करने की आवश्यकता है कि हमें इंग्लैंड के रास्ते जाना चाहिए या यूरोपीय संघ की तरह प्रतीक्षा करनी चाहिए। ऐसा नहीं है कि जब समृद्धि की बात आती है तो हम यूरोपीय संघ की तुलना में कहीं भी खड़े होते हैं। भारत के लिए समय सबसे महत्वपूर्ण है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ ब्रिटेन में जीन एडिटिंग के लिए आसान हुए नियम, भारत में अभी फैसले का इंतजार ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>jpagrimedia73@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[अमेरिकी सांसदों ने कहा गेहूं सब्सिडी पर भारत के खिलाफ कदम उठाए बाइडेन प्रशासन]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/america-might-complain-against-india-in-wto-over-wheat-subsidy.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 23 Jan 2022 11:02:09 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/america-might-complain-against-india-in-wto-over-wheat-subsidy.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत में गेहूं किसानों को सब्सिडी के मसले पर अमेरिका डब्लूटीओ में जा सकता है। अमेरिका के कुछ सांसदों ने जो बाइडेन प्रशासन से डब्लूटीओ में भारत के खिलाफ इस मसले पर शिकायत दर्ज कराने का आग्रह किया है। उनका कहना है कि भारत सरकार गेहूं के कुल उत्पादन की वैल्यू के आधा से ज्यादा की सब्सिडी देती है। दरअसल, अमेरिका के गेहूं उत्पादकों का संगठन &lsquo;व्हीट एसोसिएट्स&rsquo; इस मसले पर लंबे समय से भारत के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहा है। उसने अमेरिकी सांसदों के इस कदम का स्वागत किया है। अभी तक भारत की तरफ से इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।</p>
<p>बाइडेन प्रशासन को अमेरिकी कांग्रेस के 28 सांसदों ने चिट्ठी लिखी है। इसमें कहा गया है कि भारत सरकार अपने किसानों को बहुत अधिक सब्सिडी देती है, जो अमेरिकी गेहूं उत्पादक किसानों के लिए नुकसानदायक है। सांसदों के अनुसार, &ldquo;भारत अंतरराष्ट्रीय व्यापार नीति का उल्लंघन कर रहा है। डब्लूटीओ के नियमों के मुताबिक कोई भी देश उत्पादन की वैल्यू के अधिकतम 10 फीसदी&nbsp; ही तक सब्सिडी दे सकता है। अमेरिका भारत को अपनी समर्थन मूल्य व्यवस्था बदलने के लिए लगातार दबाव बना रहा है, लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ है। इसे रोकने के लिए जल्द से जल्द कार्रवाई की जाए।&rdquo;</p>
<p>अमेरिकी सांसदों ने यह पत्र 13 जनवरी को लिखा है। इससे करीब एक महीने पहले 18 सीनेट (ऊपरी सदन) सदस्यों ने भी ऐसा ही पत्र लिखा था और बाइडेन प्रशासन से गेहूं और चावल उत्पादन में समर्थन मूल्य की व्यवस्था के खिलाफ डब्लूटीओ में शिकायत दर्ज कराने का आग्रह किया था।</p>
<p>नेशनल एसोसिएशन ऑफ व्हीट ग्रोअर्स इन अमेरिका के सीईओ चैंडलर गाउले ने कहा है कि डब्लूटीओ का सदस्य होने के नाते जरूरी है कि भारत उसके नियमों का पालन करे। अपने घरेलू उत्पादकों को गैर-जरूरी लाभ पहुंचाकर वह विश्व व्यापार को नुकसान न पहुंचाए।</p>
<p>अमेरिकी सरकार के कृषि विभाग का आकलन है कि भारत 30 जून, 2022 को खत्म होने वाले मार्केटिंग वर्ष में करीब 50 लाख टन गेहूं बेचेगा, जिससे विश्व बाजार में दूसरे देशों को नुकसान होगा। टेक्सास एएंडएम यूनिवर्सिटी की एक स्टडी रिपोर्ट के हवाले से दावा किया गया है कि भारत के सब्सिडी देने से अमेरिकी किसानों को हर साल 50 करोड़ डॉलर से अधिक का नुकसान उठाना पड़ता है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ अमेरिकी सांसदों ने कहा गेहूं सब्सिडी पर भारत के खिलाफ कदम उठाए बाइडेन प्रशासन ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[संयुक्त राष्ट्र  की डब्ल्यूईएसपी रिपोर्ट के अनुसार  2022 में भारत की जीडीपी 6.7 फीसदी  की दर से बढ़ेगी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/united-nations-say-india-gdp-will-grow-by-six-point-seven-percent-in-this-year.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 15 Jan 2022 00:06:51 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/united-nations-say-india-gdp-will-grow-by-six-point-seven-percent-in-this-year.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी वर्ल्ड इकोनॉमिक सिचुएशन एंड प्रॉस्पेक्ट्स (डब्ल्यूईएसपी) &nbsp;द्वारा 14 जनवरी &nbsp;प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, <span>भारत कोविड-19 महामारी के दौरान तेजी से टीकाकरण अभियान शुरू करके विकास की </span>' मजबूत राह ' <span>पर है। भारत की जीडीपी 2022 में 6.7 </span>फीसदी की दर से बढ़ने का अनुमान है, <span>जबकि 2021 में यह नौ फीसदी थी। ऐसा इसलिए है क्योंकि कोविड काल में हुए संकुचन का तुलनात्मक आधार प्रभाव अब समाप्त हो गया है। पूर्व और दक्षिण एशिया में रिकवरी मध्यम रूप से मजबूत बनी हुई है। &nbsp;</span></p>
<p style="text-align: justify;">रिपोर्ट में कहा गया है कि कोराना&nbsp; संक्रमण की नई लहरों, <span>लगातार श्रम बाजार की चुनौतियों</span>, <span>आपूर्ति-श्रृंखला की चुनौतियों और बढ़ते मुद्रास्फीति के दबाव के बीच वैश्विक आर्थिक सुधार को महत्वपूर्ण बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है। 2021 में 5.फीसदी&nbsp; की वृद्धि के बाद</span>, <span>वैश्विक उत्पादन 2022 में केवल 4.0 फीसदी&nbsp; और 2023 में 3.5 फीसदी बढ़ने का अनुमान है।</span></p>
<p style="text-align: justify;">संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक मामलों के विभाग के अवर महासचिव लियू जेनमिन ने कहा, <span>महामारी विश्व अर्थव्यवस्था की समावेशी और स्थायी वसूली के लिए सबसे बड़ा जोखिम जारी रखेगी। एक समन्वित और निरंतर वैश्विक दृष्टिकोण के बिनाइसमें कोराना महामारी शामिल है जिसमें टीकों की सार्वभौमिक पहुंच शामिल है</span>।</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>पूर्व और दक्षिण एशिया में विकास की संभावनाएं</strong></p>
<p style="text-align: justify;">पूर्वी एशिया में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि का अनुमान 2021 में 6.7 फीसदी और 2022 में 4.9 फीसदी रहने का अनुमान है। मजबूत नीति प्रोत्साहन और बाहरी मांग द्वारा समर्थित, <span>पूर्वी एशियाई अर्थव्यवस्थाओं ने महामारी के सबसे बुरे दौर से वापसी की है। हालांकि</span>, <span>विकास में नरमी का अनुमान है</span>, <span>क्योंकि श्रम बाजारों की धीमी वसूली खपत पर भार डालती है और निर्यात वृद्धि भी &nbsp;धीमी हो जाती है। कम मुद्रास्फीति और अभी भी कम सार्वजनिक ऋण स्तर नीति निर्माताओं के लिए उदार मौद्रिक और राजकोषीय नीतियों को जारी रखने के लिए जगह प्रदान करते हैं।</span></p>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">2021 में 7.8 प्रतिशत के अनुमानित विस्तार के बाद, <span>2022 में चीन की अर्थव्यवस्था का 5.2 प्रतिशत विस्तार करने का अनुमान है।</span>COVID-<span>19 संक्रमणों की नई लहरों और संपत्ति बाजार की नीति-प्रेरित शीतलन के बीच 2021 की पहली छमाही में तेजी से रिकवरी ने गति खो दी है।रिपोर्ट में कहा गया है कि खपत आधारित विकास और कम कार्बन वाली अर्थव्यवस्था की ओर चीन के संक्रमण से धीमी लेकिन अधिक टिकाऊ विकास की उम्मीद है।</span></p>
<p style="text-align: justify;">कोराना संक्रमण के बाद, <span>मजबूत प्रेषण प्रवाह और व्यापक रूप से सहायक नीतिगत रुखों के बीच</span>, <span>दक्षिण एशिया में रिकवरी अपनी गति को बनाए रखती है 2021 में 7.4 प्रतिशत के अनुमानित विस्तार के बाद</span>,<span>2022 में क्षेत्रीय जीडीपी के 5.9 प्रतिशत की अधिक मध्यम गति से विस्तार करने का अनुमान है। हालांकि</span>, <span>रिकवरी अभी भी नाजुक और असमान है।आर्थिक गतिविधि और रोजगार में निरंतर सुधार चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है</span>, <span>क्योंकि मौद्रिक और राजकोषीय नीति स्थान अधिक विवश हो जाते हैं।</span></p>
<p style="text-align: justify;">हालांकि संयुक्त राष्ट्र डब्ल्यूईएसपी 2022 भारत में मजबूत निर्यात वृद्धि और सार्वजनिक निवेश के साथ विकास की एक सकारात्मक तस्वीर पेश करता है, <span>लेकिन यह सावधानी का एक नोट भी लगता है: उच्च तेल की कीमतें और कोयले की कमी निकट अवधि में आर्थिक गतिविधियों पर ब्रेक लगा सकती है। सुधार से परे समावेशी विकास का समर्थन करने के लिए निजी निवेश को प्रोत्साहित करना महत्वपूर्ण रहेगा। हालाँकि</span>, <span>रिपोर्ट इस बात की सराहना करती है कि भारत ने 2030 तक अक्षय स्रोतों से आने वाले अपने ऊर्जा मिश्रण का 50 प्रतिशत और 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन तक पहुँचने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है।</span></p>
<p style="text-align: justify;">वैश्विक विकास की संभावनाओ को प्रमुख जोखिमों का सामना करना पडता हैं। संक्रमण की नई लहरें और कोरोना वायरस के नए रूपों का खतरा इस आपदा से उभरने के काम को और मुश्किल बना रहा है। लंबे समय से चल रही यह कोरोना महामारी आपूर्ति-श्रृंखला में व्यवधान और बढ़ती मुद्रास्फीति जैसे अन्य मुश्किलो को न्यौता दे रही है । वैश्विक तौर पर तेजी से बिगडती वित्तीय स्थितियों&nbsp; से वित्तीय स्थिरता पर चिंताएं भी बढ़ सकती हैं, जिसमें ऋण संकट का जोखिम भी शामिल है।</p>
<p style="text-align: justify;">पूर्व और दक्षिण एशियाई अर्थव्यवस्थाएं भी महामारी द्वारा लगाए गए अनिश्चितताओं और जोखिमों के प्रति संवेदनशील हैं, विशेष रूप से कम टीकाकरण दर वाले देश। इसके अलावा &nbsp;वैश्विक स्थर पर बढ रही मौद्रिक नीतियो मे सख्ती अस्थिरता को बढ़ा सकती है, पूंजी के बहिर्वाह को तेजी से बढा सकती है और ऋण वृद्धि को बाधित कर सकती है, विशेष रूप से ऊंचे कर्ज और बड़ी वित्तपोषण जरूरतों वाले देशों में।</p>
<p style="text-align: justify;">दक्षिण एशिया प्रमुख &nbsp;जोखिमों का सामना कर रही है। &nbsp;धीमी गती से हो रहे टीकाकरण प इस क्षेत्र को कोरोना के नए रूपों और उससे जुडे प्रकोपों ​​​​के प्रति और कमजोर बनाती है। वित्तीय बाधाओं और अपर्याप्त वैश्विक टीके की आपूर्ति कुछ देशों में उभरने की प्रक्रिया को धीमी कर रही &nbsp;है। दिसंबर 2021 की शुरुआत में, बांग्लादेश, नेपाल और पाकिस्तान में 26 प्रतिशत से भी कम आबादी को पूरी तरह से टीका लगाया गया था। इसके विपरीत, भूटान, मालदीव और श्रीलंका में पूरी तरह से टीकाकृत जनसंख्या 64 फीसदी &nbsp;से अधिक है। भारत में, डेल्टा संस्करण के साथ संक्रमण की एक घातक लहर ने अप्रैल और जून के बीच 240,000 लोगों की जान ले ली और आर्थिक सुधार को बाधित किया। तेजी से फैल रहा ओमीक्रोन वायरस के चलते आने वाले समय मे भी ऐसे दृश्य दिख सकते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">2008-2009 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद की स्थिति की तुलना में भारत अभी &nbsp;वित्तीय अशांति को नेविगेट करने के लिए बेहतर स्थिति में है। यह विदेश मे एक मजबूत &nbsp;स्थिति और बैंक बैलेंस शीट के जोखिम को कम करने के लिए किए गए उपायों के कारण संभव हो पाया है। मध्यम अवधि में, उच्च सार्वजनिक और निजी ऋण या श्रम बाजारों पर स्थायी प्रभावों से होने वाले दुर्लभ प्रभाव संभावित विकास और गरीबी में कमी लाने की संभावनाओं को कम कर सकते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ संयुक्त राष्ट्र  की डब्ल्यूईएसपी रिपोर्ट के अनुसार  2022 में भारत की जीडीपी 6.7 फीसदी  की दर से बढ़ेगी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>jpagrimedia73@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[भारत को  डब्ल्यूटीओ की  दोषपूर्ण सब्सिडी व्यवस्था को जल्द चुनौती  देने की जरूरत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/india-must-go-early-appeal-against-wto-flawed-subsidy-regime.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 01 Jan 2022 14:25:24 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/india-must-go-early-appeal-against-wto-flawed-subsidy-regime.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारतीय किसानों ने अपने हक़ के लिए लंबा संषर्ष कर विवादास्पद कृषि कानूनों को वापस लेने पर सरकार को मज़बूर किया है और साथ ही न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के लिए आवाज़ बुलंद कर रहे हैं। अब इसी बीच गन्ने और चीनी पर किसानों को दी जा रही सब्सिडी पर विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) ने भारत को दोषी ठहराया है।&nbsp;</p>
<p>विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के डिस्प्यूट सेटलमेंट पैनल ने गन्ने और चीनी पर भारत में दी जा सब्सिडी को लेकर भारत को नियमों के उल्लंघन का दोषी पाया है। भारतीय किसानों&nbsp; ने अभी तीन विवादास्पद कृषि कानूनों को निरस्त करने के लिए केंद्र सरकार को मजबूर किया था और कृषि उत्पादों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इसी बीच भारतीय किसानों को विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) से एक और चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। डब्ल्यूटीओ विवाद निपटान पैनल ने 14 दिसंबर 2021 को जारी अपनी रिपोर्ट में भारत पर साल 2014-15 से 2018-19 की अवधि के दौरान गन्ना उत्पादकों को मूल्य समर्थन और चीनी को निर्यात सब्सिडी देने का दोषी करार दिया है।&nbsp;</p>
<p>इसमें कहा गया है कि इन वर्षों के दौरान भारत कृषि पर समझौते (एओए) के तहत अपनी प्रतिबद्धताओं का उल्लंघन कर रहा था। बता दें कि यह पहली बार है कि देश के किसानों को समर्थन देने की सरकार की नीतियों को विश्व व्यापार संगठन में चुनौती दी गई है। और इस विवाद के निहितार्थ भारत की कृषि सब्सिडी व्यवस्था के लिए दूरगामी हो सकते हैं।</p>
<p>डब्ल्यूटीओ विवाद निपटान पैनल 2019 उस वक्त स्थापित किया गया था, जब ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया और ग्वाटेमाला ने डब्ल्यूटीओ के विवाद निपटान निकाय से शिकायत की थी कि भारत सरकार और कई राज्य सरकारों द्वारा प्रदान की गई मूल्य समर्थन प्रणाली डब्ल्यूटीओ-असंगत थी और इसलिए इसे बंद कर दिया जाना चाहिए। इसके बाद, कनाडा, चीन, अमेरिका और यूरोपीय संघ सहित विश्व व्यापार संगठन के 14 सदस्य तीसरे पक्ष के रूप में विवाद में शामिल हुए।</p>
<p>तीन शिकायतकर्ताओं ने केंद्र सरकार के उचित और लाभकारी मूल्य (एफआरपी), भारतीय चीनी मिलों को भारतीय गन्ना उत्पादकों को भुगतान की जाने वाली न्यूनतम कीमत, साथ ही संबंधित भारतीय राज्यों में स्थित चीनी मिलों के लिए आवश्यक राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) को लक्षित किया था। (संबंधित राज्य में गन्ना उत्पादकों को मिलों को दिए गए किसी भी उत्पादन के लिए भुगतान करने के लिए)। एफआरपी न्यूनतम मूल्य है जो मिलों को गन्ना उत्पादकों को चुकाना होता है। एफआरपी कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) की सिफारिशों के आधार पर, राज्य सरकारों के परामर्श से और चीनी उद्योग संघों से प्रतिक्रिया प्राप्त करने के बाद तय किया जाता है। दूसरी ओर एसएपी राज्य सरकारों द्वारा तय किया जाता है और आमतौर पर एफआरपी से अधिक होता है।</p>
<p>शिकायतकर्ताओं ने एफआरपी/एसएपी प्रणाली के निर्बाध कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए वर्ष 2014-15 से 2018-19 के बीच केंद्र और 12 राज्य सरकारों द्वारा किए गए सभी उपायों को लक्षित किया। शिकायतकर्ताओं के अनुसार ये उपाय कृषि समझौते (एओए) के तहत भारत की प्रतिबद्धताओं के विपरीत था। उनका विचार था कि भारत किसी भी कृषि उत्पाद पर दी जाने वाली सब्सिडी को उसके उत्पादन मूल्य (न्यूनतम स्तर) के 10 प्रतिशत तक सीमित करने के लिए सहमत हो गया था। लेकिन चीनी पर सब्सिडी वर्षों के दौरान इस सीमा से अधिक हो गई थी, और इसलिए भारत ने एओए के तहत अपनी प्रतिबद्धताओं का उल्लंघन किया। यही कारण भारत के खिलाफ विवाद आधार बना।</p>
<p>इसके अलावा, शिकायतकर्ताओं ने तर्क दिया कि केंद्र सरकार और राज्य सरकारें चीनी निर्यात के लिए सब्सिडी भी दे रही थीं, जो एओए के तहत भारत की प्रतिबद्धताओं का एक और उल्लंघन था। क्योंकि भारत के पास कृषि उत्पादों को सीधे निर्यात सब्सिडी देने का कोई अधिकार नहीं था। ऑस्ट्रेलिया ने निर्यात को बढ़ावा देने के लिए सरकार की निम्नलिखित चार योजनाओं पर सवाल उठाया। सवालों में उत्पादन सहायता योजना, बफर स्टॉक योजना, विपणन और परिवहन योजना और चीनी के लिए शुल्क मुक्त आयात प्राधिकरण (डीएफआईए) योजना शामिल थी। शिकायतकर्ताओं ने माना कि भारत ने निर्यात प्रदर्शन के आधार पर सब्सिडी प्रदान की थी, जो डब्ल्यूटीओ के तहत असंगत सब्सिडी है।</p>
<p><strong>गन्ने के लिए उचित और लाभकारी मूल्य (एफआरपी) और राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) के खिलाफ तर्क</strong></p>
<p>गन्ना किसानों को एफआरपी/एसएपी के अनुदान के खिलाफ शिकायतकर्ताओं का मुख्य तर्क यह था कि एओए द्वारा शुरू किए गए घरेलू समर्थन उपायों पर अनुशासन इन उपायों पर लागू था और भारत ने अनुशासन का उल्लंघन किया था। भारत द्वारा एओए के घरेलू समर्थन विषयों के समझौते का उल्लंघन किया गया।&nbsp;</p>
<p>शिकायतकर्ताओं के तर्क निम्नलिखित थे। जब एओए को औपचारिक रूप दिया जा रहा था, तब भारत ने घोषणा की थी कि घरेलू समर्थन विषयों को शुरू करने के प्रयोजनों के लिए अपनाई गई संदर्भ अवधि के दौरान, जो कि 1986-88 की अवधि थी, अपनी कृषि के लिए कोई सब्सिडी नहीं दी थी। यह घोषणा एओए में अपनाई गई सब्सिडी की गणना की पद्धति पर आधारित थी, जिसके अनुसार, भारत ने 1986-88 के दौरान प्रमुख अनाज, दालें, तिलहन, कपास, जूट, तंबाकू और चीनी सहित 17 फसलों के लिए प्रशासित कीमतों की घोषणा की थी। इसके तहत दी गई सब्सिडी के मूल्य का निर्धारण करने के लिए उनकी संगत अंतरराष्ट्रीय कीमतों के साथ तुलना की गई थी। चूंकि इसकी प्रशासित कीमतें अंतरराष्ट्रीय कीमतों से कम थीं, इसलिए भारत ने एओए पद्धति के अनुसार सब्सिडी का मूल्य 19,861 करोड़ रुपये या कृषि उत्पादन के मूल्य का 18 प्रतिशत था। इस आंकड़े में उर्वरक, ऋण, बिजली और सिंचाई जैसे कृषि आदानों पर सब्सिडी शामिल है। दूसरे शब्दों में, भारत कृषि पर सब्सिडी देने के बजाय अपने किसानों पर कर लगा रहा था, क्योंकि उनकी मूल्य प्राप्ति अंतरराष्ट्रीय बाजारों में प्रचलित मूल्य से कम थी। यहां यह उल्लेख किया जा सकता है कि यह पद्धति आज तक अपरिवर्तित बनी हुई है। इसका मतलब है कि 2021 में दी गई सब्सिडी की गणना के लिए वर्तमान प्रशासित कीमतों की तुलना अब भी 1986-88 की संदर्भ अवधि में कीमतों के साथ की जाती है। यानि की 35 साल पहले की कीमतों पर की जा रही है।&nbsp;</p>
<p>इस पद्धति के आधार पर, एओए विषयों के दो सेट पेश करता है। पहला यह कि विकासशील देश कृषि उत्पादन के मूल्य के 10 प्रतिशत से अधिक की सब्सिडी नहीं दे सकते। और दूसरी बात, भारत जैसे देशों के लिए, जिन्होंने घोषित किया था कि उन्होंने 1986-88 के दौरान कोई सब्सिडी नहीं दी थी, व्यक्तिगत फसलों को दी गई सब्सिडी उनके उत्पादन के मूल्य के 10 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती। भारत की चीनी सब्सिडी के खिलाफ शिकायतकर्ताओं ने तर्क दिया कि वर्ष 2014-15 और 2018-19 के बीच दी गई सब्सिडी का मूल्य इस 10 प्रतिशत सीमा से अधिक हो गया था। इस प्रकार एओए अनुशासन का उल्लंघन हुआ।</p>
<p>विवाद निपटान पैनल ने अधिकतर शिकायतकर्ताओं और विवाद में तीसरे पक्ष के अधिकार रखने वालों के विचारों से सहमति व्यक्त की &nbsp;कि एफआरपी और एसएपी बाजार मूल्य समर्थन हैं, जिन्हें सब्सिडी के रूप में माना जाना चाहिए। हालांकि, भारत ने इस दृष्टिकोण का विरोध करते हुए तर्क दिया कि एओए के अनुबंध 3 में कहा गया है कि "सब्सिडी केवल वहां मौजूद हो सकती है जहां बजटीय परिव्यय या सरकारों या उनके एजेंटों द्वारा राजस्व छोड़ दिया गया है"। जिसका अर्थ केवल तभी होता है जब खर्च सरकारी खजाने से किया जाता है। भारत ने स्पष्ट किया कि केंद्र और राज्य सरकारें गन्ना नहीं खरीदती हैं या किसानों को ... एफआरपी और एसएपी का भुगतान नहीं करती हैं और किसानों को भुगतान चीनी मिलों द्वारा किया जाता है, जो कि निजी संस्थाएं हैं।</p>
<p>हालांकि, विवाद निपटान पैनल भारत के इस तर्क से असहमत था कि FRP और SAP को सब्सिडी के रूप में नहीं माना जा सकता है। पैनल का तर्क था कि कृषि उत्पाद का "बाजार मूल्य" बाजार में एक उत्पाद की कीमत है, और "मूल्य समर्थन" का अर्थ है "आपूर्ति की परवाह किए बिना एक निश्चित स्तर पर कीमतों को बनाए रखने में सरकार या अन्य आधिकारिक निकाय से सहायता" या मांग।" इसलिए, सरकार द्वारा निर्धारित एक अनिवार्य न्यूनतम मूल्य भले ही चीनी मिलों द्वारा भुगतान किया गया हो, कृषि उत्पादकों को "घरेलू समर्थन" का गठन करना प्रतीत होगा।</p>
<p>पैनल इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि एफआरपी और एसएपी सब्सिडी के रूप हैं, इस पर कई तरह से सवाल उठाए जा सकते हैं। पहला वैधानिक न्यूनतम मूल्य तय करने के पीछे के कारकों की समझ की कमी है जो किसान चीनी मिलों से प्राप्त करने के हकदार हैं। पैनल के विचार के विपरीत कि एफआरपी और एसएपी का उद्देश्य आपूर्ति और मांग के बाजार तंत्र की अवहेलना करना है, कीमतों का वास्तविक इरादा जो केंद्र और राज्य सरकारें चीनी मिलों को किसानों को भुगतान करने का निर्देश देती हैं, यह सुनिश्चित करती है कि बाद वाले को उचित मूल्य मिले पूर्व से। इस प्रकार, केंद्र और राज्य सरकारों की मंशा उन किसानों की आजीविका में सुधार करना है, जो पहले से ही काफी संकट में हैं। अपना फैसला देते हुए, पैनल इस वास्तविकता से अनभिज्ञ लग रहा था कि चीनी मिलों के मुकाबले गन्ना किसान प्रतिकूल सौदेबाजी की स्थिति में हैं और इसलिए सरकारों के लिए यह सुनिश्चित करना अनिवार्य हो जाता है कि किसानों को गन्ने का लाभकारी मूल्य मिले। विकासशील देशों ने लंबे समय से तर्क दिया है कि एओए के सब्सिडी विषयों में उनकी कृषि की वास्तविकताओं के कारक नहीं है और इस स्थिति को विवाद निपटान पैनल द्वारा दिए गए फैसलों ने स्थिति को बदतर बना दिया गया है जैसे कि यहां चर्चा की जा रही है।</p>
<p>भारत के खिलाफ पैनल के फैसले के साथ दूसरी समस्या यह है कि एफआरपी और एसएपी मूल्य समर्थन उपायों या सब्सिडी के रूप हैं। जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, पैनल ने भारत के इस तर्क को खारिज कर दिया कि एओए के अनुसार, सब्सिडी केवल वहीं मौजूद हो सकती है जहां सरकारों या उनके विभागों द्वारा बजटीय परिव्यय या राजस्व छोड़ दिया गया हो। इसके बजाय, इसने अपने विचार को बनाए रखा कि सरकार द्वारा निर्धारित अनिवार्य न्यूनतम मूल्य, जिसका भुगतान निजी संस्थाओं द्वारा किया गया था, कृषि उत्पादकों के लिए "घरेलू समर्थन" का गठन करने के लिए "प्रतीत होगा"। पैनल की यह व्याख्या डब्ल्यूटीओ समझौते में सब्सिडी और काउंटरवेलिंग उपायों (एएससीएम) में दी गई सब्सिडी की परिभाषा को उलट देती है। यह समझौता सब्सिडी को निम्नानुसार परिभाषित करता है:&nbsp;</p>
<p>(i) किसी सदस्य के क्षेत्र में सरकार या किसी सार्वजनिक निकाय द्वारा वित्तीय योगदान;&nbsp;</p>
<p>(ii) &nbsp;एक सरकारी अभ्यास में निधियों का प्रत्यक्ष हस्तांतरण, निधियों या देनदारियों के संभावित प्रत्यक्ष हस्तांतरण शामिल हैं; और&nbsp;</p>
<p>(iii) सरकारी राजस्व जो अन्यथा देय है उसे छोड़ दिया गया है या एकत्र नहीं किया गया है।&nbsp;</p>
<p>इसके अलावा, ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी द्वारा दी गई परिभाषा में सब्सिडी का अर्थ इस प्रकार है, "किसी उद्योग या व्यवसाय को किसी वस्तु या सेवा की कीमत कम रखने में मदद करने के लिए सार्वजनिक धन से दी गई राशि"। जब चीनी मिलों जैसी गैर-सरकारी संस्थाएं किसानों को एफआरपी और एसएपी का भुगतान करती हैं, तो पैनल ने इन भुगतानों को सब्सिडी के रूप में वर्गीकृत करने के लिए खुद को क्यों बढ़ाया?</p>
<p>सब्सिडी की सीमा की गणना करने के लिए समग्र कार्यप्रणाली पर एक अंतिम टिप्पणी की जानी चाहिए जो तब होती है जब डब्ल्यूटीओ सदस्य मूल्य समर्थन उपायों पर निर्भर करता है। जैसा कि पहले बताया गया है, मूल्य समर्थन उपायों से उत्पन्न होने वाली सब्सिडी की सीमा को वस्तुओं की वर्तमान प्रशासित कीमतों की तुलना 1986-88 में प्रचलित उनके निश्चित बाहरी संदर्भ कीमतों से किया जाता है। यह पद्धति किसी भी आर्थिक तर्क से पूरी तरह से रहित है: वर्तमान प्रशासित कीमतों की तुलना 35 वर्ष पुरानी कीमतों के सेट से क्यों की जानी चाहिए? और फिर भी, विकसित देशों ने निश्चित बाहरी संदर्भ कीमतों को हाल की अवधि में स्थानांतरित करने से इनकार कर दिया है, जिससे मूल्य समर्थन उपायों के कारण होने वाली सब्सिडी का वास्तविक मूल्यांकन करने की अनुमति मिलती। यदि एओए में यह महत्वपूर्ण संशोधन नहीं होता है, तो भारत की कृषि सब्सिडी पर विवाद आम हो जाएगा।</p>
<p><strong>भारत की निर्यात सब्सिडी के खिलाफ तर्क</strong></p>
<p>शिकायतकर्ताओं ने तर्क दिया कि भारत निम्नलिखित चार योजनाओं के माध्यम से चीनी पर विश्व व्यापार संगठन-असंगत निर्यात सब्सिडी प्रदान कर रहा था:&nbsp;</p>
<p>(i) उत्पादन सहायता योजना,&nbsp;</p>
<p>(ii) बफर स्टॉक योजना;&nbsp;</p>
<p>(iii) विपणन और परिवहन योजना; और&nbsp;</p>
<p>(iv) चीनी के लिए शुल्क मुक्त आयात प्राधिकरण योजना&nbsp;</p>
<p>इसके अलावा, केंद्र सरकार ने चीनी उद्योग के साथ इन्वेंट्री स्तर को कम करने और इसकी वित्तीय तरलता की स्थिति को सुविधाजनक बनाने के लिए प्रत्येक चीनी मिल के लिए न्यूनतम संकेतक निर्यात कोटा (एमआईईक्यू) तय करने की नीति अपनाई थी। इसके अलावा, अधिकतम स्वीकार्य निर्यात मात्रा (एमएईक्यू) योजना के तहत, केंद्र सरकार प्रबंधन, उन्नयन और अन्य प्रसंस्करण लागत और अंतरराष्ट्रीय और आंतरिक परिवहन की लागत सहित विपणन लागत पर खर्च के लिए एकमुश्त निर्यात सब्सिडी प्रदान करके चीनी के निर्यात के लिए एक योजना लागू कर रही थी। और चीनी के निर्यात पर भाड़ा प्रभार। शिकायतकर्ताओं ने तर्क दिया कि चूंकि वह निर्यात को बढ़ावा देने के लिए योजनाएं थीं, एमआईईक्यू और एमएईक्यू दोनों ही निषेधात्मक सब्सिडी थीं, जैसा कि सब्सिडी और काउंटरवेलिंग उपायों (एएससीएम) पर समझौते द्वारा परिभाषित किया गया था।</p>
<p>इन तर्कों ने भारत के लिए दो तरह की समस्याएं खड़ी कर दीं। पहला, भारत को निर्यात सब्सिडी देने का अधिकार नहीं है, क्योंकि उसने एओए की औपचारिकता के दौरान घोषित किया था कि उसने कोई निर्यात सब्सिडी नहीं रखी है। दूसरे, चूंकि भारत की निर्यात सब्सिडी योजनाएं निषेधात्मक सब्सिडी थीं, इसलिए उन्हें बिना किसी देरी के वापस लेना पड़ा। हालांकि, पैनल ने भारत को अपनी रिपोर्ट को अपनाने की तारीख से 120 दिनों की अवधि दी। तर्कों के वजन को देखते हुए भारत के पास चीनी पर अपनी निर्यात सब्सिडी वापस लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।</p>
<p><strong>भारत के सामने क्या रास्ता है</strong><strong>?&nbsp;</strong></p>
<p>घरेलू समर्थन और क्रमशः गन्ना और चीनी के लिए निर्यात सब्सिडी व्यवस्था के खिलाफ निर्णय भारत की कृषि सब्सिडी व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण क्षण हो सकता है। लेकिन ये शिकायतें विशेष रूप से एफआरपी और एसएपी के खिलाफ दर्शाती हैं कि एओए द्वारा उस पर थोपी गई दोषपूर्ण और भेदभावपूर्ण सब्सिडी व्यवस्था से भारत पर कितना प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। मूल्य समर्थन उपायों के कारण होने वाली सब्सिडी की सीमा एक ऐसी पद्धति का उपयोग करती है जो आर्थिक तर्क को धता बताती है, जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है। भारत को यह मुद्दा उठाना चाहिए कि 1986-88 की निश्चित आधार अवधि में कीमतों को सब्सिडी की सीमा की गणना के आधार के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है। यदि निश्चित आधार अवधि अपरिवर्तित रहती है, तो जल्द से जल्द, भारत में मौजूद संपूर्ण प्रशासित मूल्य तंत्र को विश्व व्यापार संगठन-असंगत माना जाएगा। डब्ल्यूटीओ को सौंपे गए भारत के हालिया घरेलू समर्थन अधिसूचनाओं से पता चलता है कि चावल पर सब्सिडी पहले से ही 10 प्रतिशत के न्यूनतम स्तर से अधिक है और डब्ल्यूटीओ की कृषि समिति में चर्चा में सवाल पूछे गए हैं कि चावल पर सब्सिडी क्यों बंद नहीं की जानी चाहिए।</p>
<p>चीनी पर सब्सिडी के खिलाफ पैनल के इस फैसले के खिलाफ अपील करने की भारत की तत्काल प्रतिक्रिया होनी चाहिए। वर्तमान में अपील की सुनवाई करने वाला अपीलीय निकाय (एबी) निष्क्रिय है क्योंकि इसमें सामान्य रूप से कार्य करने के लिए कर्मी नहीं हैं। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की अध्यक्षता में संयुक्त राज्य अमेरिका ने 7-सदस्यीय एबी में नए सदस्यों को नियुक्त करने से इनकार कर दिया था और अब जो बाइडन प्रशासन भी उसी राह पर है। अपील प्रक्रिया में देरी से भारत को कृषि सब्सिडी व्यवस्था पर व्यापक रूप से पुनर्विचार करने और विश्व व्यापार संगठन की त्रुटिपूर्ण और भेदभावपूर्ण कृषि सब्सिडी व्यवस्था के खिलाफ एक मजबूत मामला बनाने का मौका मिलेगा।</p>
<p><em><strong>(डॉ. बिश्वजीत धर, जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज के सेंटर फॉर इकोनॉमिक स्टडीज एंड प्लानिंग में प्रोफेसर हैं )&nbsp;</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ भारत को  डब्ल्यूटीओ की  दोषपूर्ण सब्सिडी व्यवस्था को जल्द चुनौती  देने की जरूरत ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कोप 26 ग्लास्गो सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन के नाम पर देश की खाद्य सुरक्षा पर समझौता नहीं होना चाहिए]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/indias-food-security-should-be-non-negotiable-at-glasgow-cop26.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 31 Oct 2021 10:45:57 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/indias-food-security-should-be-non-negotiable-at-glasgow-cop26.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p style="text-align: justify;">क्लाइमेट क्राइसिस की ताजा चेतावनियों के बीच, <span>दुनिया भर के देश स्कॉटलैंड के ग्लासगो में एकत्रित हो रहे हैं। कोप </span>26<span> जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन का </span>26<span>वां सम्मेलन है।</span>&nbsp;<span>जब प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी </span>31<span> अक्टूबर से यूनाइटेड किंगडम के ग्लासगो में संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यूनएफसीसीसी </span>) <span>में कोप </span>26<span> वें सम्मेलन को संबोधित करेंगे</span>, <span>तो वह निश्चित रूप से वैश्विक नेताओं के साथ साझा करेंगे कि भारत बड़ी युवा आबादी के साथ एक &nbsp;महत्वाकांक्षी अर्थव्यवस्था के लिए हरित मार्ग के साथ पर्यावरण की रक्षा करने में सबसे आगे है। कोप </span>26<span> के अध्यक्ष</span>, <span>प्रधान मंत्री बोरिस जॉनसन के मंत्रिमंडल में&nbsp; भारतीय मूल के ब्रिटिश राज्य मंत्री आलोक शर्मा इस बात ध्यान से सुन रहे होंगे।</span></p>
<p style="text-align: justify;">आगरा में जन्मे आलोक शर्मा, कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए प्रतिबद्धताओं पर वैश्विक वार्ताओं का संचालन करेंगे।<span> वह भारत और अन्य विकासशील और अल्प विकसित देशों के लिए बहुत सहानुभूति रखते हैं</span><span>। पृथ्वी के बढ़ते तापमान के इस स्तर तक ले जाने के लिए जिम्मेदार कारक कौन है और&nbsp; यह जीवन और आजीविका के लिए कैसे खतरा है</span><span>। जब विश्व उत्सर्जन का भार उठाने की बात आती है तो विकसित राष्ट्र चाहते हैं कि विकासशील देश और अल्प विकसित राष्ट्र समान दायित्व के </span>साथ आर्थिक बोझ में समान रूप से साझीदार हों। इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं ऐसा जरूर होगा ।</p>
<p style="text-align: justify;">आलोक शर्मा ने एक कोप 26 के आधिकारिक प्रकाशन में कहा है कि उत्सर्जन को कम करना पर्याप्त नहीं है। कई देशों के लिए तो तस्वीर और भी धुंधली है। मैं भारत में पैदा हुआ था और एक समय के लिए मैंने अंतरराष्ट्रीय सहायता के लिए जिम्मेदार यूके सरकार के मंत्री के रूप में कार्य किया मैं अल्प विकसित देशों के साथ वास्तविक सहानुभूति है &nbsp;जिनका मानना है बडे़ देश ही इस समस्या का निवारण कर सकते हैं ।</p>
<p style="text-align: justify;">अभी तक सब कुछ अच्छा चला है अपने देश के पर्यावरण, <span>वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव की अध्यक्षता वाली भारतीय वार्ता टीम को भारत के मुद्दे को उठाना चाहिए जहां आलोक शर्मा इसे छोड़ते हैं। कृषि और ग्रामीण परिदृश्य पर केंद्रित करने के लिए</span>&nbsp;<span>भारतीय टीम को वैश्विक स्तर पर चीजों को उस परिप्रेक्ष्य में रखना चाहिए जो जमीनी वास्तविकता को दर्शाता है न कि हमें जैव-विविधता पर फैंसी नेरेटिव बातें करनी है। कश्मीर से कन्या कुमारी तक भारत में एक विशाल जैव विविधता है जिसे हमें वैसे भी संरक्षित करने की जरुरत है।अगर केरल में इलायची और पंजाब में गेहूं और सरसों उगाने के लिए सही जलवायु है</span>&nbsp;<span>तो जैव विविधता के नाम पर किसी आर्डर के साथ छेड़छाड़ नहीं की जा सकती है।</span></p>
<p style="text-align: justify;">जिन चीजों के बारे में बात होने जा रही है उनमें से एक खाद्य उत्पादन के अपने पैटर्न को बदलने के लिए देशों पर बहुपक्षीय दायित्वों को शामिल करना है। कोप 26<span> के अध्यक्ष को भी इस बारे में बात करनी चाहिए कि इस अगर हम गंभीर हैं तो </span><span>तापमान को </span>1.5<span> डिग्री तक बढ़ने और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के देखते हुए हमें अपने नजरिए को बदलना होगा और अपने भोजन को विकसित करने के तरीके को बदलना होगा। यदि हम दुनिया की जैव विविधता की रक्षा और उसे पुनर्स्थापित करना चाहते हैं यह सब जरूरी है।</span></p>
<p style="text-align: justify;">भारत जो 130<span> करोड़ लोगों का देश है और हमेशा अपने किसानों का अभारी रहेगा जिन्होंने खाद्य सुरक्षा में उसे आत्मनिर्भर बनाया। यही नहीं बल्कि जितनी जरूरत है उससे कहीं अधिक उत्पादन किया है। इस अतिरिक्त आनाज के कारण ही कोराना महामारी के दौरान 80 करोड़ लोगों को सरकार मुफ्त खाद्यान्न उपलब्ध करा पाई।&nbsp; वह भी उस समय जब दुनिया कई हिस्से खाने की कमी से जुझ रहे थे।&nbsp; </span></p>
<p style="text-align: justify;">जैव-विविधता के नाम पर <span>किसी भी बहुपक्षीय प्रतिबद्धताओं को लेकर भारतीय वार्ताकारों को बेहद सतर्क रहना चाहिए जो हमें खाद्य उत्पादन और उपलब्धता में नये नियमों के लिए बाध्य कर सकती हैं। अच्छी बात यह है कि पर्यावरण मंत्री यादव ने भारत की बातचीत की रणनीति को गोपनीय रखा है और&nbsp; खुलासा नहीं किया है। उम्मीद है कि हम </span>2050<span> तक </span>'<span>नेट जीरो एमिशन</span>' <span>के विचार पर अति उत्साह नहीं दिखाएंगे</span>, <span>जिसका रोडमैप </span>2030<span> तक तैयार किया जाना है। विकसित दुनिया के कुछ शीर्ष नेताओं के मधुर और लुभावने उद्धरण हो सकते हैं</span>, <span>कि भारत को अपने नेतृत्व के महत्व को दिखाते हुए जलवायु परिवर्तन का नायक बनना चाहिए। यह ठीक है</span>&nbsp;<span>लेकिन भारत को अपनी खाद्य सुरक्षा की कीमत पर हीरो नहीं बनना चाहिए।</span></p>
<p style="text-align: justify;">हमारी कृषि में एक प्रकार का विरोधाभास है। जब जलवायु परिवर्तन प्राकृतिक आपदाओं को में बढ़ोतरी करता है <span>तो किसानों को सबसे ज्यादा नुकसान होता है। साथ ही बदलते मौसम के मिजाज से फसल की पैदावार पर असर पड़ना लाजमी है। इसलिए</span>&nbsp;<span>हमें निश्चित रूप से एक चैंपियन बनने और परिवर्तन का एजेंट बनने की आवश्यकता है</span>&nbsp;<span>लेकिन पहले दायित्व उन लोगों पर डालें जिन्होंने पृथ्वी को सबसे ज्यादा प्रदूषित किया है। सबसे विकसित ओईसीडी देश जिन्होंने बेलगाम तरीके से प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया है</span>, <span>उन्हें जलवायु परिवर्तन की दिशा में सालाना </span>100<span> अरब डॉलर के योगदान के अपने वादे पर खरा उतरना चाहिए। लेकिन अब हम जो देख रहे हैं वह वित्तीय बाजीगरी है जिसमें वाणिज्यिक ऋणों को भी उनके यूएनएफसीसीसी दायित्व को पूरा करने के लिए जोड़ा जा रहा है।</span></p>
<p style="text-align: justify;">अगले 12-13 <span>दिन अहम होने जा रहे हैं। जहां भारत को वैश्विक जलवायु परिवर्तन एजेंडा में शीर्ष पर बने रहना है</span>,<span> बिना किसी लुभावने जाल में फंसे जो उन कदमों के लिए हमें मजबूर करता हो जो हमारे किसानों के लिए हानिकारक हों। हमारे देश के किसानों की संस्कृति हमेशा से पहाड़ों, वृक्षों और नदियों को संरक्षित रखने और महत्व देने की परपंरा रही है।</span></p>
<p style="text-align: justify;"><em><strong>(प्रकाश चावला सीनियर इकोनामिक जर्नलिस्ट हैं और आर्थिक नीतियों पर लिखते हैं)</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ कोप 26 ग्लास्गो सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन के नाम पर देश की खाद्य सुरक्षा पर समझौता नहीं होना चाहिए ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>jpagrimedia73@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[उच्च पोषण वाले  विदेशी फलों और स्वदेशी  फलों का उत्पादन बढ़ाने पर जोरः तोमर]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/government-is-focusing-on-high-nutritional-value-fruits-production.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 31 Oct 2021 00:12:19 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/government-is-focusing-on-high-nutritional-value-fruits-production.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><em><strong>नई दिल्ली</strong></em></p>
<p style="text-align: justify;">केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि किसान कल्याण मंत्रालय ने व्यावसायिक महत्व के 10<span> विदेशी फलों और उच्च पोषण और उच्च पोषण वाले </span>10<span> महत्वपूर्ण स्वदेशी फलों की पहचान की है। राज्य के बागवानी विभागों को भी इन पोषण गुण वाली फसलों के क्षेत्रफल विस्तार के संबंध में वर्ष </span>2021-22<span> का लक्ष्य दिया गया है। चालू वर्ष के दौरान विदेशी फलों के लिए </span>8951<span> हेक्टेयर और देशी फलों के लिए </span>7154<span> हेक्टेयर क्षेत्र को खेती के दायरे में लाया जाएगा।</span></p>
<p style="text-align: justify;">फल-सब्जियों के उत्पादन में भारत दूसरे स्थान &nbsp;पर पहुंचा गया है भारत बागवानी का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, <span>जो फलों और सब्जियों के वैश्विक उत्पादन का लगभग </span>12 फीसदी<span> है। केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के तत्वाधान में हार्टिकल्चर उत्पादों के अंतर्राष्ट्रीय वर्ष, </span>2021 पर आयोजित एक कार्यक्रम में यह जानकारी दी।&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">इस मौके पर तोमर ने कहा कि फल और सब्जियां प्रकृति की देन हैं, <span>स्वास्थ्य की दृष्टि से भी इनका सेवन बढ़ाना जरूरी है। यह भारत के लिए गर्व की बात है कि हमने पिछले कुछ वर्षों में बागवानी उत्पादन को दोगुना कर दिया है और कमी से लाभ की ओर बढ़ रहे हैं। सर्वोत्तम प्रथाओं को अपनाकर</span>, <span>उन्हें दुनिया के साथ साझा करके</span>, <span>हम न केवल फल और सब्जी उत्पादन में सुधार कर रहे हैं</span>, <span>बल्कि एक स्थायी और बेहतर भविष्य की मशाल भी थामे हुए हैं।</span></p>
<p style="text-align: justify;">उन्होंने कहा कि बागवानी फसलों की भौगोलिक विशेषज्ञता के आधार पर एक क्लस्टर विकास दृष्टिकोण आवश्यक है, <span>जिसके लिए एक कार्यक्रम शुरू किया गया है।साइलो</span>, <span>पैक हाउस के लिए संग्रह स्थलों के वित्तपोषण के लिए </span>1<span> लाख करोड़ रुपये का कृषि इंफ्रा फंड शुरू किया गया है। छँटाई और ग्रेडिंग इकाइयाँ</span>, <span>पैकिंग इकाइयाँ</span>, <span>कोल्ड चेन</span>, <span>प्राथमिक प्रसंस्करण केंद्र और संबंधित रसद सुविधाएं।</span></p>
<p style="text-align: justify;">तोमर ने कहा कि सार्वजनिक-निजी भागीदारी में हमारी सक्रिय भूमिका ने हमें कटाई के बाद के बुनियादी ढांचे में सुधार करने में मदद की है क्योंकि हम बागवानी में उभरते खिलाड़ियों और कृषि स्टार्टअप के साथ काम कर रहे हैं, <span>जो कि भारतीय कृषि परिदृश्य का उज्ज्वल भविष्य है।</span></p>
<p style="text-align: justify;">केंद्रीय मंत्री तोमर ने कहा कि स्टार्टअप, <span>वैल्यू चेन लीडर्स</span>, <span>किसानों या अनुसंधान संस्थानों के साथ साझेदारी पिछले कुछ वर्षों में अंतराल को भरने में प्रधान मंत्री द्वारा मील का पत्थर बन रही है।</span></p>
<p style="text-align: justify;">तोमर को उम्मीद है कि हम न केवल विशेष भोजन बल्कि दैनिक आवश्यकताओं के लिए सबसे गरीब से सबसे गरीब तक एक प्लेट पर फल और सब्जियां पहुंचाने के अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। उन्होंने वर्ष 2021<span> को अंतर्राष्ट्रीय फल और सब्जियों का वर्ष घोषित करने के लिए यूएनओ और एफएओ को धन्यवाद दिया।</span></p>
<p style="text-align: justify;">केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के सचिव संजय अग्रवाल ने कहा कि बागवानी भारतीय कृषि का विकास इंजन बन गया है। फलों और सब्जियों का अंतर्राष्ट्रीय वर्ष हमारे दैनिक जीवन में फलों और सब्जियों के महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाने के साथ-साथ किसानों की आय को दोगुना करने के लिए संयुक्त राष्ट्र का एक प्रयास है। इस आयोजन का लक्ष्य न केवल स्वदेशी पर ध्यान केंद्रित करना है, <span>बल्कि इसे वैश्विक बनाना भी है। इसे हासिल करने के लिए मिलकर काम करने की जरूरत है।</span></p>
<p style="text-align: justify;"></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ उच्च पोषण वाले  विदेशी फलों और स्वदेशी  फलों का उत्पादन बढ़ाने पर जोरः तोमर ]]></media:description>
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        <author>jpagrimedia73@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[जलवायु परिवर्तन  और अचानक मौसम बदलाव के काऱण कमजोर हो रही है खाद्य सुरक्षा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/food-security-is-increasingly-vulnerable-to-climate-change-induced-weather-events.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 19 Oct 2021 21:26:31 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/food-security-is-increasingly-vulnerable-to-climate-change-induced-weather-events.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p style="text-align: justify;">इकोनॉमिक्स इम्पैक्ट ने 10वां वार्षिक वैश्विक खाद्य सुरक्षा सूचकांक (जीएफएसआई) जारी किया है इस रिपोर्ट के अनुसार &nbsp;लगातार दूसरे साल भी &nbsp;वैश्विक खाद्य सुरक्षा में गिरावट का उल्लेख किया गया है। इस बात पर जोर देते हुए कहा गया है वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए जलवायु परिवर्तन के असर को करने के लिए जरूरी उपाय और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा सबसे महत्वपुर्ण है।</p>
<p style="text-align: justify;">कोर्टेवा एग्रीसाइंस द्वारा प्रयोजित जीएफएसआई का उद्देश्य अधिक लचीला और सुरक्षित खाद्य प्रणाली को सक्षम करने के लिए एक संसाधन के रूप में कार्य करती है। यह रिपोर्ट पिछले एक दशक के डाटा की मदद से खाद्य सुऱक्षा पर मिली महत्वपूर्ण सीख &nbsp;के बारे में बताती है और और भूखमरी को समाप्त करने के लिए दुनिया भर में लड़ाई के भविष्य के लिए इसका क्या अर्थ है, <span>इस पर प्रकाश डालती है।</span></p>
<p style="text-align: justify;">कोर्टेवा एग्रीसांइस ग्लोबल स्तर पर &nbsp;एक सार्वजनिक रूप से कारोबार करने <span>वाली एग्री बिजनेस कंपनी है जो दुनिया भर के किसानों को उद्योग में सबसे पूर्ण पोर्टफोलियो प्रदान करती है।</span></p>
<p style="text-align: justify;">जीएफएसआई 113 देशों में खाद्य सुरक्षा की अंतर्निहित विशेषताओं को मापता है, <span>जो कि सामर्थ्य</span>, <span>उपलब्धता</span>, <span>गुणवत्ता और सुरक्षा</span>, <span>और प्राकृतिक संसाधनों और लचीलेपन के कारकों पर आधारित है। यह आय और आर्थिक असमानता</span>, <span>लैंगिक असमानता</span>, <span>और पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों की असमानता सहित 58 &nbsp;यूनिक खाद्य सुरक्षा संकेतकों पर विचार करता है </span>जिसका मुख्य उद्देश्य है 2030 तक जीरो हंगर के लिए संयुक्त राष्ट्र सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) &nbsp;की दिशा में प्रगति में तेजी लाने के लिए आवश्यक प्रणालीगत कार्यों पर ध्यान देना।</p>
<p style="text-align: justify;">कोर्टेवा एग्रीसाइंस के कार्यकारी उपाध्यक्ष और मुख्य वाणिज्यिक अधिकारी टिम ग्लेन ने कहा कि <span>जीएफएसआई दुनिया भर में खाद्य असुरक्षा को प्रभावित करने वाले अंतर्निहित कारकों की पहचान करके भूखमरी से छुटकारा पाने की दिशा में काम करना है। कोर्टेवा न अपनी रिपोर्ट में कई चुनौतियों जिक्र किया है, जिनका दुनिया सामना कर रही है। इसके लिए जरूरी है कि किसानों को इनोवेटिव तरीके प्रदान करके उनके उत्पादकता लक्ष्यों को स्थायी रूप प्रदान किया जाय और खाद्य प्रणालियों को मजबूत करने के लिए जरुरत है कि दुनिया भर के सहयोगियों के साथ मिलकर काम किया जाय। </span></p>
<p style="text-align: justify;">जीएफएसआई की प्रमुख प्रतिमा सिंह ने कहा कि <span>जो लोग दुनिया भर में खाद्य सुरक्षा की प्रगति पर कार्य करते हैं उनके लिए पिछले दशक में जीएफएसआई ने खाद्य पदार्थों और कार्यक्रमों को तैयार करने के लिए आवश्यक डाटा ड्राइवर इनसाइट और साक्ष्य के साथ खाद्य प्रणाली के ग्लोबल लीडर और हितधारकों को प्रदान किया है। उन्होंने कहा कि ईआई "सूचकांक से पता चलता है कि</span>&nbsp;<span>सभी देशों ने पिछले दस वर्षों में खाद्य असुरक्षा कम &nbsp;करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की है। जबकि खाद्य प्रणालियां आर्थिक</span>, <span>जलवायु और भू-राजनीतिक झटकों के प्रति संवेदनशील बनी हुई हैं। इसलिए सभी के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए &nbsp;स्थानीय</span>, <span>राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर&nbsp; कार्रवाई अनिवार्य है जिससे भूख और कुपोषण को समाप्त किया जा सके</span></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>2021 जीएफएसआई से प्रमुख निष्कर्ष</strong></p>
<p style="text-align: justify;">2021 जीएफएसआई के रिपोर्ट के निष्कर्ष बताते हैं एसडीजी की दिशा में सात साल की प्रगति के बाद&nbsp; भी वैश्विक खाद्य सुरक्षा में लगातार दूसरे वर्ष कमी आई है। ईआई वैश्विक रिपोर्ट में कहा गया है कोरोना &nbsp;महामारी, जलवायु संबंधी कारकों को तेजी करना, पोषण और भोजन की कीमत में अस्थिरता <span>और खाद्य सुरक्षा में त्वरित कमी और सरकारी कृषि निवेश की कमी इत्यादि इन निम्नलिखित कारकों के साथ सहसंबंध के कारण &nbsp;चक्रवृद्धि प्रभाव सूचकांक में लगातार स्कोर बढ़ा रहा है </span></p>
<p style="text-align: justify;">इस सूचकांक से पता चलता है कि खाद्य सुरक्षा के कारक व्यापक हैं और अब एक प्रणालीगत, <span>बहुराष्ट्रीय चुनौती का प्रतिनिधित्व करते हैं</span>&nbsp;<span>जिसका प्रभाव निम्न और उच्च आय वाले और संसाधन संपन्न दोनों देशों में है।</span></p>
<p style="text-align: justify;">कोर्टेवा वैश्विक खाद्य प्रणालियों को सुरक्षित रखने और दुनिया भर में कृषि की दीर्घकालिक स्थिरता को सक्षम करने के अपने अंतिम लक्ष्य के साथ किसानों को स्थानीय उत्पादकता में सुधार करने में मदद करने पर ध्यान केंद्रित करता है इसके लिए लगातार ग्लोबल इनोवेशन और विशेषज्ञता का लाभ&nbsp; प्रदान करता है।&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">ईआई के रिपोर्ट 2021 केअनुसार पिछले 10 वर्षों जैसा, <span>जलवायु अस्थिरता और बिगड़ते प्राकृतिक संसाधनों से खतरे भविष्य की सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती है। इसकी &nbsp;स्थिरता के लिए कोर्टेवा एग्रीसाइंस की दीर्घकालिक प्रतिबद्धता किसानों को वैश्विक जनसंख्या मांगों को पूरा करने के लिए आवश्यक समाधान मुहैया कराने में मदद करती है।</span></p>
<p style="text-align: justify;">अपनी वैश्विक रिपोर्ट में, ईआई ने कहा है कि सूचकांक से पता चलता है कि &nbsp;वर्तमान में उभरती भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए खाद्य सुरक्षा में निवेश की आवश्यकता है। जलवायु परिवर्तन को ध्यान में रखकर फसल पैदावार में इनोवेशन से लेकर सबसे कमजोर लोगों की सहायता के लिए कार्यक्रमों में निवेश करना होगा।</p>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p>
<h1></h1> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ जलवायु परिवर्तन  और अचानक मौसम बदलाव के काऱण कमजोर हो रही है खाद्य सुरक्षा ]]></media:description>
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        <author>jpagrimedia73@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[भारतीय बाजार में चिली के अखरोट लांच]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/chilean-walnuts-will-be-available-in-indian-markets.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 03 Oct 2021 08:49:31 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/chilean-walnuts-will-be-available-in-indian-markets.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><strong><em>नई दिल्ली</em></strong></p>
<p>चिली नट के उत्पादक और निर्यातक संघ ने चिली के &nbsp;विदेश मंत्रालय की संस्था एडिग वैल्यू एण्ड डाइवर्सिफिकेशन टू द कंट्री कल्चर प्रोडक्ट एण्ड सर्विस (प्रोचिले)&nbsp; के सहयोग से भारतीय &nbsp;बाजार में &nbsp;चिली में उत्पादित अखरोट &nbsp;लॉन्च किया है। चिली के अखरोट &nbsp;आने वाले महीनों में त्यौहारों के अवसर पर भारत के &nbsp;बाजारों में उपलब्ध होंगे। भारत में चिली के राजदूत जुआन अंगुलो ने भारत में चिली अखरोट के व्यापार के लिए &nbsp;नई दिल्ली में अपने आवास पर 1 अक्तूबर को आयोजित एक समारोह में इसके लिए प्रचार अभियान की शुरुआत की।&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">प्रोचिले चिली के&nbsp; विदेश मंत्रालय के साथ काम करने वाला वहां का एक एक निकाय है। इसका मिशन अपने देश के उत्पादों और सेवाओं के निर्यात को बढ़ावा देना, <span>विदेशी निवेश के प्रसार और पर्यटन को बढ़ावा देने के अलावा मुख्य रूप से खाद्य</span>, <span>सेवाओं और उद्योगों को बढ़ावा देना है।</span></p>
<p style="text-align: justify;">इस अवसर पर चिली के राजदूत ने कहा कि चिली और भारत रणनीतिक साझेदार हैं और दोनों देश मिलकर द्विपक्षीय व्यापार बढ़ाने के लिए काम कर रहे हैं। उन्होंने इस बात की जानकारी दी कि चिली दुनिया के दक्षिणी गोलार्द्ध मे स्थित होने के कारण भारतीय उत्पादन अवधि के लिए पूरी तरह से पूरक है। जब अन्य देशों&nbsp; में &nbsp;उत्पाद की आपूर्ति अनुपलब्ध होती है तो काउंटर सीजन में भारतीय उपभोक्ता ताजा चिली उत्पादों की खरीदारी कर &nbsp;उपयोग कर सकते हैं । चिली के अखरोट को हल्के रंग, <span>ताजगी और इसकी उच्च उपज के लिए पूरी दुनिया में सबसे अच्छा माना जाता है। </span></p>
<p style="text-align: justify;">इस मौके पर मीडिया से बात करते हुए <span>चिलीनट के चेयरमैन &nbsp;एडमंडो वाल्डेरामा ने कहा </span><span>कि चिली दक्षिणी गोलार्ध में अखरोट का सबसे बड़ा निर्यातक देश है और दुनिया में अखरोट का &nbsp;दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक है । चिली के अखरोट 70 से अधिक देशों में निर्यात किए जा रहे हैं और अब भारत हमारे सबसे तेजी से उभरते हुआ बाजारों में से एक है।</span></p>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;प्रोचिले की व्यापार आयुक्त मार्सेला ज़ुनिगा एलेग्रिया ने इस अवसर पर जानकारी दी कि चिली में अद्वितीय प्राकृतिक स्थितियां हैं जिसके कारण वहां बहुत उच्च गुणवत्ता वाले अखरोट की पैदावार होती हैं जो दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं। चिली&nbsp; के पूर्व में एंडीज, <span>पश्चिम में प्रशांत महासागर</span>, <span>उत्तर में अटाकामा रेगिस्तान और दक्षिण में अंटार्कटिका चिली में प्राकृतिक अवरोध पैदा करके वहां के बगीचों को किसी भी &nbsp;प्रकार के नुकसान होने से बचाते हैं। मुझे यकीन है कि भारतीय उपभोक्ताओं को इन अखरोटों का स्वाद पसंद आएगा</span>, <span>जो पहले ही दुनिया भर में काफी पसंद &nbsp;किए जाते है।</span></p>
<p style="text-align: justify;">इसके भारत में कंट्री मार्केटिंग प्रतिनिधि&nbsp; सु<span>मित सरन ने कहा &nbsp;कि</span>&nbsp;<span>हम भारत में चिली अखरोट की अपार संभावनाएं देखते हैं। यहां उच्च गुणवत्ता वाले अखरोट की मांग लगातार बढ़ रही है। चिली की एक महत्वपूर्ण भूमिका होगी क्योंकि चिली में अखरोट का उत्पादन भारतीय अखरोटों के लिए 100 फीसदी काउंटर मौसमी है। उन्होंने कहा कि चिली के अखरोट की फसल मई-जुलाई महीने के दौरान होती है। हमारा अखरोट भारत में अगस्त के बाद उपलब्ध होगा जो यहां के पड़ने वाले महत्वपूर्ण उत्सव और त्यौहारों के सीजन में उपल्बध रहेंगे। सरन ने कहा कि इसके लिए हमने व्यापक व्यापार और मीडिया रणनीति तैयार की है। यह अखरोट खुदरा विक्रेताओं और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म दोनों पर उपलब्ध होंगे।</span></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ भारतीय बाजार में चिली के अखरोट लांच ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>jpagrimedia73@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[अंकटाड रिपोर्ट के मुताबिक 2021 में भारत की जीडीपी वृद्धि दर 7.2 फीसदी और 2022 में 6.7 फीसदी रहेगी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/india-gdp-is-projected-to-reach-7.2-percent-in-2021-and-6.7-percent-in-2022.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 16 Sep 2021 20:47:18 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/india-gdp-is-projected-to-reach-7.2-percent-in-2021-and-6.7-percent-in-2022.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p style="text-align: justify;"><span>संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास सम्मेलन (अंकटाड) रिपोर्ट, 2021 में कहा गया है कि </span>2020<span> में शुरू हुए से सफल वैक्सीन रोल-आउट नीतिगत हस्तक्षेपों की निरंतरता और उन्नत अर्थव्यवस्थाओं की बदौलत इस साल वैश्विक अर्थव्यवस्था में उछाल आएगा। अंकटाड के मुताबिक </span>2020<span> में </span>3.5<span> फीसदी की गिरावट के बाद </span><span>&nbsp;इस साल वैश्विक विकास दर </span>5.3<span> फीसदी &nbsp;तक पहुंच जाएगी</span>, <span>जो पांच दशकों में लगभग सबसे तेज वृद्धि&nbsp; दर होगी। अगर &nbsp;भारत की &nbsp;बात करें तो 2021 में आर्थिक विकास दर 7.2 फीसदी औऱ&nbsp; </span>2022<span> में आर्थिक विकास दर </span>6.7<span> फीसदी रहने का अनुमान है। लेकिन</span><span>&nbsp;</span>6.7<span> फीसदी की विकास दर के बावजूद</span>&nbsp;<span>भारत अगले साल दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना रहेगा। </span></p>
<p style="text-align: justify;">भारत में कोराना महामारी से उबरने के लिए आर्थिक लागत के कारण निजी खपत पर खाद्य मूल्य मुद्रास्फीति पर&nbsp; नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। भारत में <span>महामारी से पहले ही मुद्रास्फीति 6 प्रतिशत पर थी यह कोराना महामारी के चलते कीमतों में अस्थायी गिरावट का कारण बना था </span>,<span>लेकिन जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था में सुधार हुआ वैसे-वैसे खाद्य कीमतों में तेजी आई है वहीं दुसरी तरफ&nbsp; निर्यात के कारण विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ रहा है। </span><span>महामारी के कारण आपूर्ति की समस्याओं के बावजूद पेट्रोलियम की खपत और ऑटो बिक्री में लगातार सुधार के कारण&nbsp; भारत तेजी से रिकवर कर रहा है।</span></p>
<p style="text-align: justify;">अंकटाड की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार दुनिया केअर्थव्यवस्था में जो रिकवरी आई है वह भौगोलिक और क्षेत्रीय आधार पर असमान रही है ।&nbsp; मजबूत हो रही इस अर्थव्यवस्था में उच्च वर्ग के लोगों की इनकम में तो इजाफा हुआ है लेकिन मध्य वर्ग औऱ कम कमाने वाले संघर्ष कर रहे हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">बहुत से विकासशील देशों को वित्तीय स्वायत्तता की कमी और वैक्सीन तक पहुँच नहीं होने के कारण भी उन्हें आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। वैश्विक अर्थव्यस्था में आ रहे&nbsp; उछाल के साथ&nbsp; विकसित और विकासशील देशो के अर्थव्य़वस्था के बीच एक लम्बी खाई बन रही है।&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">अंकटाड की महासचिव रेबेका ग्रीनस्पैन ने कहा कि <span>महामारी के दौर में घरेलू और अंतरराष्ट्रीय तौर पर फैली आय में असमानताओं को रोका नहीं गया तो विकास लग्जरी लाइफ औऱ सुख और आनंद केवल कुछ लोग के पास ही सीमित रह जाएंगे। </span></p>
<p style="text-align: justify;">कोराना महामारी से सबक लेते हुए अंकटाड ने प्रस्ताव दिया है कि&nbsp; विकासशील देशों का समेकित ऋण राहत और यहां तक ​​कि कर्जो को माफ कर देना भी शामिल है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में राजकोषीय नीति की भूमिका का पुनर्मूल्यांकन, और व्यवस्थित रूप से महत्वपूर्ण अर्थव्यवस्थाओं में बेहतर नीति समन्वय बनाना साथ टीकाकरण के लिए विकासशील देशों को मजबूत तरीके से सहयोग देना&nbsp; चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;">रिपोर्ट के अनुसार&nbsp; साल 2022 में&nbsp; वैश्विक विकास दर <span>&nbsp;</span>3.6<span> फीसदी रहने की शंका जताई है। साल 2020 से 22 तक&nbsp; दुनिया को 13 ट्रिलियन डालर की हानि होने का अनुमान लगाया गया है। नीति-निर्माताओं ने समझदारी से काम नहीं लिया तो</span><span>&nbsp;</span><span>वृद्धि की दर अनुमानों से कम भी हो सकती है।</span></p>
<p style="text-align: justify;">इस विज्ञप्ति में कहा गया है कि कोराना महामारी से दुनिया भर में,<span>वैश्विक वित्तीय संकट (जीएफसी </span>) बढ़ा है खासतौर <span>से विकासशील देशों को जिसमे मुख्य रूप से अफ्रिका और एशिया के देश सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं।</span></p>
<p style="text-align: justify;">दुनिया पर आए इस संकट के झटके को छोड़ दिया जाय तो 2016 से लेकर 2019 में जो विकास दर थी वह साल 2030 तक लौटने की उम्मीद &nbsp;है&nbsp; यानि&nbsp; कोरोना महामारी के पहले जो विकास दर प्रवृति थी वह भी अंसतोषजनक थी।&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>महामारी से चार मुख्य सबक</strong></p>
<p style="text-align: justify;">अंकटाड रिपोर्ट, 2021 से कोराना महामारी से चार मुख्य सबक लेने की बात उभर कर आती है। सबसे पहले विकासशील देशों में वित्तीय लचीलेपन की कोई भी बात समय से पहले होनी चाहिए क्योंकि कई मामलों में वित्तीय निवेश करने का क्रम होता वह अस्थिर रहता है और ऊपर से कर्ज का बोझ असहनीय होता है। हालांकि 2020<span> में बढ़ते हुए बड़े त्रृण संकट से बचा गया था मगर विकासशील देशों की बाहरी कर्ज की स्थिरता बनी रही जिससे स्थिति और भी खराब हो गई।</span></p>
<p style="text-align: justify;">विकासशील देशों पर कर्ज की अधिकता के बोझ को कम करने से बीते हुए दशक जैसी स्थिति ना बने इसके लिए ठोस ऋण राहत और कुछ मामलों में एकमुश्त कर्ज को माफ करने का करने का प्रस्ताव दिया है।</p>
<p>दूसरा, <span>महामारी में इस बात पर आम सहमति देखी गयी की पब्लिक सेक्टर के हस्तक्षेप की जरूरत है</span>,<span> मगर उससे संबंधित सारे संसाधन उपाय पब्लिक&nbsp; सेक्टर से जुड़े इस पर कम लोगो की सहमति है क्योकि पब्लिक सेक्टर इस तरह आपदा के समय जरूरी है मगर लम्बे समय के विकास के लिए इसकी जरूरत नही है।</span></p>
<p>रिपोर्ट के अनुसार&nbsp; वैश्विक अर्थव्यवस्था में राजकोषीय नीति की भूमिका का पुनर्मूल्यांकन करना जरुरी है क्योकि महामारी के दौरान अर्थव्यवस्था मे जिन वजह से असमनाताएं बढ़ी है उस &nbsp;राजनीतिक विचार स्थान के साथ उन प्रथाओं को समाप्त करने का आह्वान किया है।</p>
<p>तीसरा, बेहतर भविष्य निर्माण के लिए जरूरी सहायता प्रदान करने के लिए&nbsp; महत्वपूर्ण अर्थव्यवस्थाओं में व्यवस्थित रूप से बहुत अधिक नीतिगत समन्वय की जरुरत है। जैसे 2008-09<span> के संकट के बाद अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संरचना में सुधार का वादा किया गया था</span>, <span>मगर बड़े विकसित देशों&nbsp; के विऱोध के चलते जल्दी ही उस रास्ते पर चलना छोड़ दिया गया ।</span></p>
<p>यहां तक कि विकसित अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों में मौजूदा मज़बूत पुनर्बहाली के बावजूद, <span>मूल्यों में टिकाऊ वृद्धि के कोई संकेत नज़र नहीं आ रहे हैं। दूसरी तरफ विकसित देशों&nbsp; द्वारा टीके पर छूट न देने के कारण विकासशील देशों पर कर्ज का बोझ बढ़ेगा </span>हाल के एक अनुमान के अनुसार, 2025<span> तक टीकाकरण की संचयी लागत </span>2.3<span> ट्रिलियन डॉलर हो जाएगी</span>, <span>जिसमें विकासशील देश इस लागत का बड़ा हिस्सा वहन करेगें।&nbsp;</span></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ अंकटाड रिपोर्ट के मुताबिक 2021 में भारत की जीडीपी वृद्धि दर 7.2 फीसदी और 2022 में 6.7 फीसदी रहेगी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>jpagrimedia73@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[वायु प्रदूषण  से भारतीयों का जीवन काल नौ साल कम हो सकता है&amp;#45; इपीक]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/air-pollution-may-reduce-life-expectancy-of-indians-by-nine-years-sayepic.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 02 Sep 2021 00:28:43 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/air-pollution-may-reduce-life-expectancy-of-indians-by-nine-years-sayepic.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p style="text-align: justify;">एक सितम्बर को शिकागो यूनिवर्सिटी की एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट ( इपीक ) के द्वारा एयर क्वालिटी लाइफ इंडेक्स&nbsp; पर&nbsp; जारी&nbsp; वार्षिक रिपोर्ट से एक बात स्पष्ट हो गया है कि&nbsp; दुनिया के कई देश के सर्वाधिक प्रदूषित शहर जहां वायु प्रदूषण के धुंध के कारण&nbsp; असामान दिखाई नही देता था वहां पिछले एक वर्ष में कोविड महामारी चलते पूरी दुनिया लगे लॉक डाउनों के वजह से उन शहरों में भी नीला असामान साफ दिखाई देने लगा था। जबकि हाल के दिनो में जंगलो में&nbsp; लगे&nbsp; आग&nbsp; जो&nbsp; सूखी और गर्म जलवायु के कारण तेज हुई है जिससे हजारों किलोमीटर दूर के उन महानगरों में धुआं भर दिया जहां पर आसमान साफ रहता था । ऐसी परस्पर विपरीत घटनाएं भविष्य&nbsp; के बारे में दो नजरिया प्रस्तुत कर रही हैं। दोनों&nbsp; चुनौतियां एक ही&nbsp; अपराध&nbsp; या कहे गलती जो इंसान द्वारा&nbsp; हो रही है वह हैं जीवाश्म ईंधन&nbsp; का अधिक उत्सर्जन किया जाना,&nbsp; जिसे बिजली संयंत्रों ,<span>वाहनों और अन्य औद्योगिक स्रोतों&nbsp; से किया जाता&nbsp; है।&nbsp; इसलिए&nbsp; पहले से कही आज के वक्त में&nbsp; दुनिया के देशों को जीवाश्म ईंधन पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए अधिक मजबूत नीतियां को बनाने की जरूरत है ।</span></p>
<p style="text-align: justify;">एयर क्वालिटी लाइफ इंडेक्स&nbsp; के डाटा इस बात को दर्शाता है कि अगर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लू एचओ) के दिशानिर्देश को पूरा करने के लिए&nbsp; मजबूत प्रदूषण नियंत्रण नीतियां बनानी होगी, जिससे&nbsp; वायु प्रदूषण के पार्टिकुलेट को घटा दिया जाय ,नही तो इंसान के जीवन काल में&nbsp; लगभग 2.2 साल की कमी आ जाएगी औऱ दुनिया के सबसे&nbsp; अधिक प्रदूषित शहरों में इंसान के जीवन काल में लगभग 5 साल की कमी आ जाएगी।&nbsp; वायु प्रदूषण के पार्टिकुलेट&nbsp; के वजह से लोगों में क्षय रोग , <span>एच आई बी</span>, <span>फेफड़े संबधी रोग ज्यादा होता है।</span></p>
<p style="text-align: justify;">वहीं दूसरी तऱफ इस तरह कहा जा सकता है कि स्वच्छ वायु नीतियां जो जीवाश्म ईंधन के उत्सर्जन को घटा सकती हैं जलवायु परिवर्तन की प्रबलता में सहायता कर सकती है,<span>वह सर्वाधिक प्रदूषित क्षेत्रों के निवासियों के जीवन में पांच वर्षों की बढ़ोतरी कर&nbsp; सकती हैं जबकि वैश्विक स्तर पर लोगों के जीवन में औसतन दो वर्षों की वृध्दि हो सकती है। जो लोग प्रदूषित गंंदी&nbsp; हवाओं में जीवनयापन और सांस लेते थे जब उन लोगों ने लॉकडाउन के वजह से स्वच्छ हवाओं में सांस लिया औऱ स्वच्छ हवाओं के फायदे का अनुभव किया और वही दुसरी तऱफ कुछ लोगों जो स्वस्थ हवाओं में अपने&nbsp; जीवन यापन और सांस लेने के&nbsp; लिए अभयस्थ थे वे&nbsp; जंगलो के आग के वजह से प्रदुूषित हवाओं का अनुभव किया।&nbsp; इस घटनाओं से&nbsp; एक बता तो&nbsp; &nbsp;एक दम&nbsp;&nbsp; स्पष्ट&nbsp; जाती है इसअप्रत्याशित साल मेंजीवाश्म ईंधन के उत्सर्जन को घटाने में नीति&nbsp; से स्थानीय वायु प्रदूषण औऱ जलवायु परिवर्तन&nbsp; को कम करने में&nbsp; कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;</span></p>
<p style="text-align: justify;">इस बात को माइकल ग्रीनस्टोन ने कहा है जो एक अमेरिकी अर्थशास्त्री औऱ शिकागो विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र औऱ हैऱिस स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी में मिल्टन फ्रीडमैन विशिष्ट सेवा प्रोफेसर है।उन्होंने कहा कि &ldquo;<span>एएलक्यूआई डाटा बताता है कि वायु प्रदूषण रोकने वाली की नीतियों का हमारे स्वास्थ्य को सुधारने और आयु बढ़ाने में किस प्रकार लाभ दे सकती है।</span></p>
<p style="text-align: justify;">एक्यूएलआई की नई रिपोर्ट के अनुसार, <span>दक्षिण एशिया में पृथ्वी के सर्वाधिक प्रदूषित देश- बांग्लादेश</span>, <span>भारत</span>, <span>नेपाल और पाकिस्तान जिनमें दुनिया की&nbsp; जनसंख्या का करीब एक चौथाई हिस्सा इस क्षेत्र में निवास करता है और लगातार दुनिया की सर्वाधिक प्रदूषित पांच शीर्ष देशों में बने हुए हैं</span>, <span>एक्यूएलआई के अनुसार</span>, <span>समूचे उत्तर भारत में इसका प्रभाव कहीं अधिक आंका गया है।</span>&nbsp;<span>इस क्षेत्र में वायु प्रदूषण का दुनिया में सबसे उच्चतम स्तर पर है अगर प्रदूषण की सांद्रता 2019 के स्तर पर लगातार बनी रही तो इस क्षेत्र जिसमें दिल्ली और कोलकाता जैसे विशाल महानगर&nbsp; शामिल हैं। यहां पर रहने वाले निवासियों के जीवन-काल लगभग&nbsp; में&nbsp; 9 वर्षों से </span>अधिक की क्षति होगी। भारत में वायु प्रदूषण का उच्च स्तर समय के साथ भौगोलिक रूप से फैला है दो दशक पहले की तुलना में कणीय (पार्टिकुलेट) प्रदूषण&nbsp; अब केवल&nbsp; गंगा के मैदानी क्षेत्र&nbsp; तक ही&nbsp; सीमीत नही रहा बल्कि अब यह महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में भी इस तरह बढ़ा रहा है।&nbsp; इससे इन राज्यों के साल 2000 की तुलना की&nbsp; जाय तो इस क्षेत्र के औसत व्यक्ति की जीवन-काल&nbsp; में&nbsp; लगभग 2.5 से 2.9 साल का&nbsp; नुकसान हो रहा है।</p>
<p style="text-align: justify;">इस सबके बीच चीन एक महत्वपूर्ण मॉडल बनकर उभरा है जो अपने नीतियों के जरिए कम समय में ही अपने यहां वह प्रदूषण में तेजी से कमी लाया है। चीन ने साल 2013 में प्रदूषण के खिलाफ जंग की&rdquo; <span>शुरूआत&nbsp; की थी&nbsp; जिसके बाद उसके वहां कणीय (पार्टिकुलेट पॉल्यूसन)&nbsp; में 29 प्रतिशत कमी आई है जो वैश्विक स्तर पर वायु प्रदूषण में कमी का तीन-चौथाई हिस्सा है। चीन की यह यह सफलता&nbsp; इस बात का संकेत देती है कि दुनिया&nbsp; के सर्वाधिक प्रदूषित देशों में भी इस तरह का प्रगति संभव है। दक्षिण एशिया के क्षेत्र में एक्यूएलआई आंकड़ा बताता है कि अगर प्रदूषण को डब्लूएचओ निर्देशावली के अनुसार घटा दिया जाए तो औसत व्यक्ति की&nbsp; आयु 5 वर्ष से अधिक बढ़ जाएगी। </span></p>
<p style="text-align: justify;">स्वच्छ वायु नीतियों का फायदा उत्तर भारत जैसे प्रदूषण के हॉट स्पॉट्स वाले क्षेत्रों में कहीं अधिक है जहां 480 मिलियन लोग जिस वायु में सांस लेते हैं,<span>उसका प्रदूषण स्तर विश्व के किसी भी इलाके प्रदूषण स्तर से दस गुना अधिक है। एक्यूएलआई के निर्देशक केन ली ने कहा कि </span>&ldquo;<span>बुरी खबर है कि वायु प्रदूषण का सर्वाधिक असर दक्षिण एशिया में केन्द्रीत हैअच्छी खबर यह है कि इस क्षेत्र की सरकारें समस्या की गंभीरता को स्वीकार करने लगी हैं और अब कार्रवाई करना शुरु कर रही हैं।</span>&rdquo; <span>उन्होंने कहा कि भारत सरकार की राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) स्वच्छ वायु और लंबा जीवन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है इसने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु गुणवत्ता प्रबंधन के लिए एक नया कमीशन स्थापित किया&nbsp; है।</span></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ वायु प्रदूषण  से भारतीयों का जीवन काल नौ साल कम हो सकता है- इपीक ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>jpagrimedia73@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[किसानों, कृषि से जुड़ी महिलाओं और  युवाओं को मजबूत कर रही है सरकार&amp;#45;  तोमर]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/Government-is-strengthening-farmers-women-associated-with-agriculture-and-rural-youth.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 12 Aug 2021 17:44:43 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/Government-is-strengthening-farmers-women-associated-with-agriculture-and-rural-youth.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><strong><em>नई दिल्ली</em></strong></p>
<p style="text-align: justify;">भारत सरकार नई तकनीकों औऱ पद्तियों को विकसित करके इनको प्रयोगशाला से जमीनी स्तर अपनाने की &nbsp;पहल कर &nbsp;किसानों, <span>कृषि से जुड़ी महिलाओं और ग्रामीण युवाओं को सशक्त करने के दृष्टिकोण को आगे बढ़ा रही है। यह बात भारत सरकार के केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने &nbsp;शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ</span>) <span>के सदस्य देशों के कृषि मंत्रियों की दुशांबे (ताजिकिस्तान) में आयोजित छठी बैठक की वर्चुअल चर्चा में इस बात कही। </span></p>
<p style="text-align: justify;">चर्चा के दौरान केन्द्रीय कृषि मंत्री ने &nbsp;कहा &nbsp;कि कोविड के दौरान भी भारत ने कृषि क्षेत्र में काफी अच्छा प्रदर्शन किया है। खाद्यान्न उत्पादन के साथ-साथ वैश्विक खाद्य सुरक्षा में योगदान करते हुए निर्यात में भी महत्वपूर्ण वृद्धि दर्ज की है। गरीबी-भुखमरी खत्म करने और खाद्य सुरक्षा व पोषण हासिल करने के सतत विकास लक्ष्य को हासिल&nbsp; करने के लिए भारत की प्रतिबद्धता जताते हुए कृषि मंत्री ने कहा कि जैव-प्रबलीकृत किस्में सूक्ष्मपोषक तत्वों से भरपूर मुख्य आहार का स्रोत हैं, <span>जिन्हें कुपोषण दूर करने के लिए बढ़ावा दिया जा रहा है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद इस कार्य के &nbsp;लिए जुटी हुई है। </span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>कृषि मंत्री ने इस बात की भी जानकारी दी कि भारत ने </span>16<span> अक्टूबर, </span>2020<span> को एफएओ के </span>75<span> साल पूरे होने पर </span>17<span> जैव-प्रबलीकृत किस्में भी जारी की। इसके अलावा</span>, <span>वर्ष </span>2022<span> तक किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य को पाने के &nbsp;लिए </span>&nbsp;<span>भारत सरकार कृषि में कई क्षेत्रों पर एक साथ काम कर रही है। कृषि के&nbsp; इन्फ्रास्ट्रकचर निर्माण</span>, <span>जैविक खेती आदि के अलावा </span>जल संसाधनों का समुचित उपयोग बढ़ाने, <span>सिंचाई के लिए नए बुनियादी ढांचे का निर्माण करने</span>,<span>उर्वरकों के संतुलित उपयोग के साथ मिट्टी की उर्वरता को संरक्षित करने</span>, <span>खेत से बाजार तक कनेक्टिविटी प्रदान करने</span>, <span>सूचना एवं प्रसार प्रौद्योगिकी लिंकेज जैसे अनेक कार्यक्रम शुरू किए हैं।</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span>तोमर ने कहा कि भारतीय कृषि सफलता के अनेक पायदान चढ़ी है। भारत में हरित क्रांति</span>,<span>श्वेत क्रांति</span>, <span>नीली क्रांति के अलावा सार्वजनिक वितरण प्रणाली तथा किसानों के लिए मूल्य समर्थन प्रणाली विश्व में अद्वितीय हैं। यह नीति-निर्माताओं की दूरदर्शिता</span>, <span>हमारे कृषि वैज्ञानिकों के कौशल व किसानों के अथक परिश्रम का ही परिणाम है कि भारत खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बन चुका </span>है <span>बल्कि सरप्लस भी है।</span></p>
<p style="text-align: justify;">श्री तोमर ने कहा कि भारत एससीओ का पूर्ण सदस्य है, <span>इस नाते भारत ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई </span>है। भारत इस क्षेत्र में बहुपक्षीय, <span>राजनीतिक</span>, <span>सुरक्षा</span>, <span>आर्थिक तथा जन-जन के बीच इंटरेक्शन को बढ़ावा देने में शंघाई सहयोग संगठन के साथ अपने संबंधों को महत्व देता है और उनका सम्मान करता है।&nbsp; उन्होंने&nbsp; कहा कि </span><span>भारत</span>, <span>कृषि क्षेत्र में अपने व्यापक विकास पथ के साथ</span>, <span>द्विपक्षीय रूप से और साथ ही अंतरराष्ट्रीय संगठनों के सहयोग से अन्य विकासशील देशों की सर्वोत्तम परिपाटियों को साझा करना व क्षमता निर्माण जारी रखेगा ताकि वे भी आत्मनिर्भर व खाद्यान्न की दृष्टि से सुरक्षित बन सकें। इस बैठक में ताजिकिस्तान के कृषि मंत्री&nbsp; ज़ियोज़ोदा सुलेमोन रिज़ोई</span>, <span>चीनी गणराज्य के कृषि </span>व ग्रामीण मामलों के मंत्री तांग रेंजियन, <span>शंघाई कोआपरेशन आर्गेनाइजेशन के महासचिव नोरोव </span>व्लादिमीर ईमामोविच, <span>एफएओ के महानिदेशक श्री क्यू डोंग्यू और ताजिकिस्&zwj;तान गणराज्&zwj;य सरकार </span>की खाद्य सुरक्षा समिति के अध्&zwj;यक्ष श्री फेजुल्&zwj;लोजोदा मोहम्&zwj;मद अद हुवेईदुल्&zwj;लो सहित विभिन्न देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ किसानों, कृषि से जुड़ी महिलाओं और  युवाओं को मजबूत कर रही है सरकार-  तोमर ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>jpagrimedia73@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[आईपीसीसी की रिपोर्ट ग्लोबल वार्मिंग पर दुनिया के लिए चेतावनी, खेती भी होगी प्रभावित]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/IPCC-report-is-a-warning-for-India-on-global-warming.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 10 Aug 2021 13:43:34 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/IPCC-report-is-a-warning-for-India-on-global-warming.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p></p>
<p style="text-align: justify;">जलवायु परिवर्तन के दुनिया की प्रतिष्ठित संस्था&nbsp; इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेंट चेंज&nbsp; (आईपीसीसी ) ने अपनी छठी मूल्यांकन रिपोर्ट में कहा है जलवायु में आए परिवर्तन वर्तमान औऱ भविष्य&nbsp; दोनों के लिए बेहद डरावना हैं क्योंकि ग्लोबल वार्मिंग&nbsp; वर्तमान औऱ भविष्य पर नकरात्मक प्रभाव डाल रही है। पूर्व अनुमानों को लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव&nbsp; एंटोनियो गुटरेस ने कहा है कि यह रिपोर्ट मानवता के लिए खतरे की घंटी है औऱ इसे नजरअंदाज करना नामुकिन है। जीवाश्म ईंधन (फोसिल फ्यूएल) के&nbsp; जलने से उत्सर्जित ग्रीनहाउस गैसें और&nbsp; कटते जंगलों से दुनिया का दम घुट रहा है जिसके चलते दुनिया भर में बढ़ती आगजानी, अत्यधिक गर्मी औऱ बारिश की घटनाओं के कारण विनाशकारी बाढ़ और समुद्र तल के नीचे बदलते तापमान के चलते चक्रवात की घटनाएं देखने को मिलती रही हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">असल में जलवाय़ु परिवर्तन के कारण देश की खाद्य सुरक्षा के लिए एक अहम चुनौती बन रही है । लागातार सूखा, बाढ़, चक्रवात,&nbsp; औऱ शीतलहर के कारण कृषि पर विपरीत प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। एक अनुमान के अनुसार अगर 2040 तक &nbsp;तापमान 1.5 डिग्री तक बढ़ता है तो फसलों की पैदावार पर इसका &nbsp;गंभीर प्रभाव पडेगा । उच्च तापमान, छोटी फसल अवधि, प्रकाश संश्लेशण में बदलाव के कारण फसलों की बढ़वार प्रभावित होती है । दूसरी तरफ कीट&nbsp; रोगों का प्रकोप बढ़ेगा । जलवाय़ु परिवर्तन &nbsp;पोषक तत्वों को जैविक से गैर जैविक में बदलता है और तापमान के बढ़ोत्तरी से पौधों की वाष्प सर्जन &nbsp;बढ़ती है, जिससे फसलों की अधिक जल मांग बढ़ेगी । इस तरह से प्राकृतिक संसाधनो के नुकसान के साथ साथ किसानों जलवायु परिवर्तन का प्रभाव प्रत्यक्ष औऱ परोक्ष रूप से फसल, पानी औऱ मिट्टी पर पड़ता है । साल&nbsp; 2017&ndash;18 के आर्थिक सर्वेक्षण में चेतावनी दी गई धी की जलवायु परिवर्तन के कारण &nbsp;वार्षिक कमाई में 15 से 18 प्रतिशत आ सकती है और इससे खाद्य सुरक्षा और स्वा्स्थ्य पक प्रतिकूल असर पड़ेगा।&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">कृषि पद्धतियां पूरी तरह मौसम की परिस्थितियों पर आधारित हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार अनुमान लगाया गया है कि अगर इसी तरह तापमान बढ़ेगा तो &nbsp;दक्षिण एशियाई देशों में&nbsp; कृषि पैदावार में 30 प्रतिशत तक गिरावट आने का अनुमान है । मिसाल के तौर पर भारत में अगर तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोत्तरी हुई तो देश में वर्षा एक मिली मिलीमटर कम होगी औऱ धान की पैदवार में 3 से 15 फीसदी तक कमी आ जाएगी।</p>
<p style="text-align: justify;">जिस तरह तापमान में बढोत्तरी हो रही है उससे ग्लेसियर पिघलेंगे, तापमान बढ़ेगा । एक तरफ जहां बाढ़ आएगी दूसरी तापमान बढ़ने से &nbsp;कृषि वैज्ञानिको का मानना है कि, पर्वतीय फलो पर सेब ,खुवानी चेरी फल झुलसेंगे और उनमें दरारे आएंगी। और अगर ओजोन 50 पीपीबी पहुंच गया तो सब्जियों की पैदावार में 15 से 20 फीसदी की गिरावट आएगी ।तापमान की बढ़ोत्तरी से पशुओं के शरीर के क्रिया पर भी प्रभाव पड़ता है&nbsp; जिससे दूध के उत्पादन और अंडा उत्पादन पर विपरीत प्रभाव पड़ता है ।</p>
<p style="text-align: justify;">आईपीसीसी के रिपोर्ट पर पर्यावरणविद सुनीता नरायण ने कहा है कि इस चेतावनी को भविष्य की महज एक संभावना की तरह नहीं देखा जाना चाहिए बल्कि अगर हम अभी नही संभले तो यह खतरा निश्चित है । उन्होंने कहा है कि दुनिया 2040 तक 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि की तरफ बढ़ रही है। जलवायु परिवर्तन का मुख्य कारण मानव गतिविधियां हैं और घटती हरियाली के कारण वतावरण में बढ़ता कार्बन। इस मुसीबत को एक देश दूसरे पर टाल कर और केवल बड़ी- बड़ी बातें कहकर कि यह मुसीबत 2050 तक खत्म हो जाएगी ,अपने आप को धोखा दे रहे हैं।&nbsp; &nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">उन्होंने कहा है कि अगर ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम नहीं किया गया तो धरती का तापमान &nbsp;2040 तक 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ सकता है । 1980 के बाद दुनिया में जिस तरह औद्योगिक क्रांति बढ़ी और दुनिया &nbsp;में विकास भी हुआ लेकिन विकास के साथ- साथ धरती का तामपान 1.09 डिग्री तक बढ़ा है। जिसके परिणाण स्वरूप देश और दुनिया में प्राकृतिक आपदाएं और तबाही आई । &nbsp;विकास और विज्ञान का यह काल बहुत सारी गंभीर समस्याओं को भी लेकर आया है । देश- दुनिया के सभी लोगों को आज से ही समझने और सोचने की जरूरत है कि जलवायु परिवर्तन के कारण भविष्य में &nbsp;आने &nbsp;वाले खतरे से &nbsp;कैसे &nbsp;निपटेंगे ।</p>
<p style="text-align: justify;">इन सब खतरों को कम करने के लिए संयुक्त राष्ट संघ के महासचिव ने&nbsp; कार्बन के उत्सर्जन को कम करने के लिए कहा है। उन्होंने सभी देशों विशेषकर जी-20 देशों से आग्रह किया है कि गीन हाउस गैस के उत्सर्जन को कम करें । इसके लिए उन्होंने कोयले और जीवाश्म ईंधन के रूप में एनर्जी सेक्टर को चिन्हित किया है।</p>
<p style="text-align: justify;">&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ आईपीसीसी की रिपोर्ट ग्लोबल वार्मिंग पर दुनिया के लिए चेतावनी, खेती भी होगी प्रभावित ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>jpagrimedia73@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[भारत व इजराइल के बीच कृषि में सहयोग बढ़ाने के लिए तीन वर्षीय कार्यक्रम का करार]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/india-israel-sign-a-three-year-work-program-for-development-agriculture.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 24 May 2021 14:42:15 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/india-israel-sign-a-three-year-work-program-for-development-agriculture.html</guid>
        <description><![CDATA[ <div style="display: none;"></div>
<p><em><strong>नई दिल्&zwj;ली</strong>,<strong> 24 </strong><strong>मई </strong><strong>2021</strong></em></p>
<p>भारत और इजराइल के बीच कृषि क्षेत्र में निरंतर बढ़ रही भागीदारी को आगे ले जाने के लिए करार हुआ है। दोनों सरकारों ने द्विपक्षीय भागीदारी का समर्थन करते हुए और द्विपक्षीय संबंधों में कृषि तथा जल क्षेत्रों पर केंद्रित रहने की जरूरत को स्&zwj;वीकार करते हुए कृषि क्षेत्र में सहयोग और अधिक बढ़ाने पर सहमति व्&zwj;यक्&zwj;त की है।</p>
<p>भारत-इजराइल &lsquo;&rsquo;इंडो-इजराइल एग्रीकल्&zwj;चरल प्रोजेक्&zwj;ट सेंटर्स ऑफ एक्&zwj;सीलेन्&zwj;स&rsquo;&rsquo; और &lsquo;&rsquo;इण्&zwj;डो-इजराइल विलेजि़ज़ ऑफ एक्&zwj;सीलेन्&zwj;स&rsquo;&rsquo;कार्यक्रम कार्यान्वित कर रहे हैं। कृषि एवं किसान कल्&zwj;याण मंत्रालय, भारत सरकार के एकीकृत बागवानी विकास मिशन और अंतर्राष्&zwj;ट्रीय विकास सहयोग के लिए इज़राइल की एजेंसी &lsquo;मशाव&rsquo;, इज़राइल के जी-2-जी सहयोग कार्यक्रम का नेतृत्&zwj;व कर रहे हैं। इसके अंतर्गत, स्&zwj;थानीय जलवायु परिस्थितियों को ध्&zwj;यान में रखते इजराइल की कृषि-तकनीक से तैयार उन्&zwj;नत-सघन कृषि फार्मों को कार्यान्वित करने के लिए भारत के 12 राज्&zwj;यों में 29 सेन्&zwj;टर्स ऑफ एक्&zwj;सीलेन्&zwj;स (सीओई) कार्य कर रहे हैं। सीओई ज्ञान सृजन, सर्वोत्&zwj;तम पद्धतियों के प्रदर्शन व किसानों को प्रशिक्षित करने का कार्य करते हैं। हर साल ये सीओई ढाई करोड़ से अधिक गुणवत्&zwj;तायुक्&zwj;त सब्&zwj;जी व 3.87 लाख से ज्यादा फल के पौधों का उत्&zwj;पादन करते हैं&nbsp; और बागवानी क्षेत्र में नवीनतम तकनीक के बारे में हर साल 1.2 लाख से ज्यादा किसानों को प्रशिक्षित करते हैं।</p>
<p>कार्यक्रम में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्&zwj;याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि भारत कृषि को प्रधानता देकर काम कर रहा है। भारत सरकार की कृषि हितैषी नीतियों से किसानों के जीवन में निश्चित बदलाव आ रहा है और कृषि क्षेत्र मुनाफे की ओर बढ़ रहा है। किसानों की आय बढ़े, यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दृढ़ संकल्प है। कृषि क्षेत्र में वर्ष 1993 से भारत व इजराइल के द्विपक्षीय संबंध रहे हैं। यह 5वां आईआईएपी बागवानी क्षेत्र में कृषक समुदाय के लाभ के लिए, कृषि क्षेत्र में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों व परस्&zwj;पर सहयोग को और अधिक मजबूत करेगा। सबसे पहले आईआईएपी पर वर्ष 2008 में 3 साल के लिए हस्&zwj;ताक्षर किए गए थे। अब तक हम 4 कार्ययोजनाएं सफलतापूर्वक पूरी कर चुके हैं। इजरायली तकनीकों पर आधारित इन कार्ययोजनाओं के अंतर्गत स्&zwj;थापित सीओई अब तक बहुत सफल रहे हैं व किसानों की आय दोगुनी करने में महत्&zwj;वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। भारत व इजराइल के बीच तकनीक के आदान-प्रदान से उत्&zwj;पादकता व बागवानी की गुणवत्&zwj;ता में बहुत सुधार होगा, जिससे किसानों की आय बढ़ेगी।&nbsp;</p>
<p>इस अवसर पर, कृषि सचिव संजय अग्रवाल ने कहा कि ये सीओई, बागवानी के क्षेत्र में परिवर्तन के मुख्&zwj;य केंद्र बन गए हैं। नए कार्यक्रम के दौरान हमारा ध्&zwj;यान,<span> इन कार्यक्रमों के व्&zwj;यापक प्रसार के माध्&zwj;यम से</span>,<span> इन सीओई के आसपास के गांवों को विलेजि़ज़ ऑफ एक्&zwj;सीलेन्&zwj;स में बदलने पर केंद्रित रहेगा। </span>भारत में इजराइल के राजदूत डॉ. रोन मलका ने कहा कि यह तीन-वर्षीय कार्यक्रम हमारी बढ़ती भागीदारी की मज़बूती को दर्शाता है। इससे स्&zwj;थानीय किसानों को लाभ पहुंचेगा।</p>
<p>इस कार्यक्रम का लक्ष्&zwj;य मौजूदा सीओई को बढ़ाना,<span> नए केंद्र स्&zwj;थापित करना</span>,<span> सी.ओ.ई. की वेल्&zwj;यू चेन को बढ़ाना</span>,<span> सेन्&zwj;टर्स ऑफ एक्&zwj;सीलेन्&zwj;स को आत्मनिर्भर बनाना और निजी क्षेत्र की कम्&zwj;पनियों तथा सहयोग को प्रोत्&zwj;साहित करना है। </span>&lsquo;&rsquo;<span>इण्&zwj;डो-इजराइल विलेजि़ज़ ऑफ एक्&zwj;सीलेन्&zwj;स</span>&rsquo;&rsquo;<span> एक नई संकल्&zwj;पना है, जिसका लक्ष्&zwj;य 8 राज्&zwj;यों में 75 गांवों में 13 </span>सी.ओ.ई. के समीप कृषि में इकोसिस्&zwj;टम विकसित करना है। इससे परंपरागत फार्म आईआईए<span>पी मानकों के आधार पर आधुनिक-सघन फार्मों में बदल जाएंगे। इजराइल की नवीन तकनीकों और कार्यपद्धतियों में समाहित बड़े-पैमाने पर और आर्थिक स्थिरता के साथ सम्&zwj;पूर्ण वैल्यू चैन दृष्टिकोण को स्&zwj;थानीय जलवायु परिस्थितियों के अनुसार बनाया जाएगा। </span>&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ भारत व इजराइल के बीच कृषि में सहयोग बढ़ाने के लिए तीन वर्षीय कार्यक्रम का करार ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[शहरों में पलायन से नहीं , बेहतर टेक्नोलॉजी और कनेक्टिविटी से  ग्रामीण आबादी का विकास संभव: वर्ल्ड सोशल रिपोर्ट 2021]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/Better-Tech-not-migration-is-core-for-rural-development-World-Social-Report-2021.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 21 May 2021 07:25:15 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/Better-Tech-not-migration-is-core-for-rural-development-World-Social-Report-2021.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएन) का कहना है कि नई तकनीक गांव के लाखों लोगों को गरीबी से बाहर निकालने के लिए और&nbsp; बेहतर रोजगार के साथ बेहतर जीवन जीने&nbsp; के लिए अवसर प्रदान कर सकती हैं । 20 मई को न्यूयार्क में साल&nbsp;2021 की जारी की गई यएन की विश्व सामाजिक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि दुनिया भर के गावों में रहने वाले 3.4 &nbsp;अरब लोगों का &nbsp;शहरो में बिना पलायन किए ही इंटरनेट कनेक्टिविटी के माध्यम से उनके जीवन स्तर को सुधार कर &nbsp;ऊंचा किया जा सकता है ।&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;</p>
<p>संयुक्त राष्ट संघ द्वारा जारी रिपोर्ट में&nbsp; कहा गया है कि पहले से ही गरीबी और असमानताओं के साथ जीवन जी रही ग्रामीण आबादी की प्रगति में कोरोना महामारी कई अड़चने डाल रही है । लेकिन दूसरी तरफ इस कोरोना महामारी ने प्रगति के लिए एक रास्ता दिखा दिया है कि कैसे नई तकनीक के माध्यम से ग्रामीण आबादी का विकास करके गांव और शहरी आबादी के बीच खिंची असमानता की रेखा &nbsp;को मिटा सकते हैं।</p>
<p>संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने कहा कि नई तकनीकों ने ग्रामीण विकास के लिए नए अवसर खोले हैं। जिसमे सभी श्रेणी के लोगों के लिए अपना &nbsp;भविष्य बनाने का सुनहरा अवसर मौजूद है । उनका कहना है कि इस महामारी के अनुभव&nbsp;से हमें यह&nbsp;सीख मिली है कि अच्छी अच्छी नौकरियां केवल शहर में रहकर ही नहीं की जा सकती है बल्कि &nbsp;अगर&nbsp; अच्छी इंटरनेट कनेक्टिविटी के साथ सुविधाजनक व्यवस्था हो तो इस धारणा को बदला जा सकता है और इस प्रकार की नौकरियां &nbsp;गांव &nbsp;में भी आसानी पूर्वक की जा सकती हैं ।</p>
<p>उभरती हुई नई डिजिटल टेक्नोलॉजी &nbsp;शहरी और ग्रामीण &nbsp;एरिया के बीच मे जो खाई को भरने का काम करेगी । &nbsp;डिजिटल टेक्नालॉजी के माध्यम से ग्रामीण आबादी वित्तीय अदान &ndash;प्रदान कर सकेगी साथ ही फसल की बेहतर उपज के लिए सही उपकरण का इस्तेमाल भी किया जा सकेगा औऱ &nbsp;दूर रह कर&nbsp; भी गांव से ग्रामीण लोग नौकरिया कर सकेंगे ।&nbsp;</p>
<p><strong>भूमि क्षरण और </strong><strong>रोगों</strong> <strong>की उत्पत्ति</strong></p>
<p style="text-align: left;">&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; कम आय वाले देशो में लगभग 67 प्रतिशत जबकि निम्न मध्यम आय वाले देशो में ग्रामीण आबादी&nbsp; 60&nbsp; प्रतिशत&nbsp; &nbsp;है। &nbsp;अंतरराष्ट्रीय गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों में से दुनिया के लगभग 80 प्रतिशत लोग&nbsp; &nbsp;ग्रामीण क्षेत्रों में ही रहते हैं जिसमे से लगभग &nbsp;20 प्रतिशत ग्रामीण लोग अत्यधिक गरीबी में जीवन यापन करते हैं । यह आंकड़ा शहरी आबादी की तुलना में चार गुना अधिक है औऱ इस आबादी को उचित शिक्षा, स्वास्थ्य संबंधी और अन्य आवश्यक सेवाएं कम ही पहुंच पाती है।</p>
<p>ग्रामीण महिलाओं,&nbsp;वृद्ध व्यक्तियों के साथ-साथ स्थानीय लोगों को भूमि अधिकारों और रोजगार के मामले में भेदभाव का सामना करना पड़ता है। अधिकांश प्राकृतिक पूंजी &nbsp;ग्रामीण क्षेत्रों में ही समाहित है,&nbsp;जो अभी के समय में धीरे -धीरे समाप्त हो रही या घट रही है । &nbsp;वहीं दूसरी तरफ वनों की कटाई अनियमित तरीके&nbsp; से&nbsp;बदलते खेती के तरीकों के कारण&nbsp; जलवायु परिवर्तन और&nbsp; घातक रोगों का प्रसार हो रहा है&nbsp;।&nbsp;</p>
<p>इस &nbsp;रिपोर्ट मे &nbsp;ऐसे रणनीतियां पेश की गई हैं जिनसे ये सुनिश्चित किया जा सके की दुनिया की लगभग आधी आबादी, जो ग्रामीण है वह पीछे न रहे। दुनिया की अर्थव्यवस्था सही रहे उसके लिए जरूरी है कि असमानताओं को कम करने और जलवायु संकट से निपटने के &nbsp;प्रयासों को&nbsp; और बढ़ावा मिले । इस रिपोर्ट की माने तो लोगों का जीवन सुधारना है तो सबसे पहले &nbsp;ग्रामीण जीवन स्तर में सुधार &nbsp;लाने की जरूरत है ।</p>
<p><strong>ग्रामीण एरिया में हो शहरी लाभ का विस्तार</strong></p>
<p>ग्रामीण आबादी शहरी आबादी के जैसे जीवन स्तर का &nbsp;आनंद ले सके वह भी बिना शहरी दुष्प्रभावों &nbsp;के &nbsp;ऐसे ही दृष्टिकोण को &ldquo;इन सीटू शहरीकरण&rdquo; कहा जाता है । इस रिपोर्ट में बताया&nbsp; गया है कि &nbsp;श्रीलंका, जापान और चीन जैसे देशों में ग्रामीण क्षेत्र में बेहतर शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य &nbsp;सुविधाओं को उपल्बध कराने के साथ ग्रामीण बुनियादी ढांचे में &nbsp;अधिक निवेश करके &nbsp;ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच आय असमानता को कम&nbsp; किया जा सका है और ग्रामीण आबादी को बेहतर जीवन स्तर का सुअवसर प्रदान किया है ।&nbsp;</p>
<p>इस रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन, भारत और इंडोनेशिया में जहां साल 2000 से लेकर साल 2015 के बीच ग्रामीण गरीबी तो कम हुई, वहीं दूसरी तरफ ग्रामीणों के बीच असमानता बढ़ी। इसलिए ग्रामीण क्षेत्रों मे गरीबी को कम करने &nbsp;के साथ- साथ सामाजिक प्रगति को बढ़ावा देने के लिए, असमानताओं को दूर करने पर ध्यान केन्द्रित करना जरूरी है। इसके लिए नई भूमि सुधार नीतियां, विस्तारित सामाजिक सुरक्षा के साथ-साथ भेदभावपूर्ण कानूनों को निरस्त करना जरूरी है ताकि ग्रामीण महिलाए, स्थानीय लोग और अन्य कमजोर वर्ग की आबादी फैली असमानता से प्रभावी ढंग से निपट सके। इस रिपोर्ट के अनुसार&nbsp; प्राकृतिक संपदा को कृषि भूमि में बदलने से कुल 60 प्रतिशत से 70 &nbsp;प्रतिशत जैव विविधता का नुकसान हुआ है और ऐसा माना जाता है कि जंगलों &nbsp;के नुकसान से &nbsp;ही&nbsp; कोरोना जैसे जूनोटिक रोग की उत्पति हुई है । इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज का कहना है कि बदलते कृषि प्रयोग और बदलते भूमि के उपयोग के कारण&nbsp; वैश्विक ग्रीनहाउस गैस का लगभग &nbsp;31 प्रतिशत गैस उत्सर्जन होता है। जलवायु परिवर्तन के कारण ग्रामीण आजीविका पर पड़ने&nbsp;&nbsp; वाले&nbsp; प्रभाव को&nbsp; कम करने के लिए नीतियां बनानी&nbsp; पड़ेगी । इस&nbsp; रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि फसलों की ऐसी किस्मों को विकसित किया जाय जो कम जमीन में अधिक उपज&nbsp; दे&nbsp; सके। इसके अलावा मिश्रित खेती&nbsp; को बढ़ावा दिया जाए और&nbsp; चक्रीय अर्थव्यवस्था&nbsp; की तरफ कदम&nbsp; बढ़ाया&nbsp; जाय ।&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; एक अनुमान के अनुसार की सन 2030 तक लगभग 30 प्रतिशत तक पानी की कमी हो जाएगी और अगर मौजूदा ग्रामीण विकास की प्रणाली जारी रही तो सन् 2050 तक&nbsp; &nbsp;दुनिया के लगभग 95 प्रतिशत उपयोगी भूमि&nbsp; क्षेत्र&nbsp; बेकार हो जाएंगे । संसाधनों के सही उपयोग के साथ-साथ खाद्य सुरक्षा को बढ़ाना बढ़ावा देने वाली नीतियों&nbsp; पर विचार करना जरूरी है।</p>
<p>कृषि विविधीकरण ग्रामीण सुधार के लिए बहुत ही अहम कड़ी है।&nbsp; गैर कृषि गतिविधियों का विस्तार करना बहुत ज़रूरी है क्योंकि&nbsp; युवाओं&nbsp; के लिए यह आय का एक संभावित स्रोत्र हो सकता है। इसीलिए गैर कृषि गतिविधियों के विस्तार के लिए बन रही नई रणनीतियों में शामिल करना आवश्यक है।</p>
<p><strong>&nbsp;कृषि और कृषि&nbsp; उद्योगों को बढ़ावा&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; </strong></p>
<p>ऐसे देश जहां 50 करोड़ से ज्यादा कृषि श्रमिक रहते हैं &zwnj; वह देश 2030 तक कृषि उत्पादकता और छोटे किसानों की आय को दुगना करने के सतत विकास लक्ष्यों ( एस. डी.जी) को पाने में &zwj;मौजूदा समय में असमर्थ दिखाई पड़ते हैं । रिपोर्ट &zwnj;&zwnj;&zwnj; मे यह माना गया है कि कृषि उत्पादकता में&nbsp; बढ़ोतरी&nbsp; लाने के लिए&nbsp; अभी और &zwnj; प्रभावी कदम उठाने पड़ेंगे &zwnj;&zwnj;&zwnj;&zwnj;जैसे बुनियादी ढांचे में सुधार , सही उपकरणों का इस्तेमाल , &zwnj;&zwj;प्रोत्साहन देना , अधिक&nbsp; निवेश इत्यादि । साथ ही ऐसे कृषि&nbsp; मॉडलों पर भी ध्यान केंद्रित करना जरूरी है &zwnj;&zwnj; जो देश विशिष्ट हैं और छोटे धारकों को समर्थन देते हैं।</p>
<p>&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ शहरों में पलायन से नहीं , बेहतर टेक्नोलॉजी और कनेक्टिविटी से  ग्रामीण आबादी का विकास संभव: वर्ल्ड सोशल रिपोर्ट 2021 ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[पाकिस्तान में चीनी की कीमत 96 रुपये किलो, फिर भी भारत से आयात का फैसला पलटा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/Sugar-price-in-Pakistan-making-new-records-ban-on-import-from-India-continue.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 02 Apr 2021 10:01:51 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/Sugar-price-in-Pakistan-making-new-records-ban-on-import-from-India-continue.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>बुधवार को पाकिस्तान की इकोनॉमिक कोआर्डिनेशन काउंसिल (ईसीसी) के भारत से पांच लाख टन चीनी आयात करने फैसले के बाद से दो दिन भारत और पाकिस्तान के कारोबारी रिश्ते कुछ हलचल भरे थे। लेकिन गुरुवार को पाकिस्तान सरकार द्वारा इस पर रोक लगाने के फैसले के बाद पहले से जारी ठहराव ने फिर अपनी जगह ले ली है। कूटनीतिक मसलों पर पाकिस्तान के अड़ियल रुख के चलते भारत और पाकिस्तान के बीच चीनी के कारोबार की मिठास बढ़ने से पहले ही गायब हो गई। वहीं&nbsp; 96 से 100 रुपये किलो (भारतीय रुपये में करीब 50 रुपये) के महंगे दामों पर चीनी खरीदने के लिए मजबूर पाकिस्तानी नागरिकों को महंगे दाम से राहत मिलने की उम्मीद भी कमजोर हो गई है। 12 अप्रैल से शुरू हो रहे रमजान के महीने में चीनी की कीमतों पर अंकुश लगाने के मकसद से पाकिस्तान की इकोनॉमिक कोआर्डिनेशन काउंसिल&nbsp; (ईसीसी) ने बुधवार को भारत से पांच लाख टन चीनी के आयात की घोषणा की थी। लेकिन उसके बाद गुरुवार शाम को ही खबरें आ गई कि पाकिस्तान की कैबिनेट ने इस फैसले को अस्वीकार कर दिया है। उत्पादन घटने के चलते पाकिस्तान में चीनी की कीमतों में भारी तेजी का दौर है। उसके इस संकट का हल भारत के पास है लेकिन ईसीसी के भारत से पांच लाख टन चीनी आयात करने के फैसले के अगले ही दिन वहां की सरकार ने इस आयात संभावना पर विराम लगा दिया।</p>
<p>घरेलू चीनी उद्योग संगठन इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (इस्मा) ने भी गुरुवार को एक प्रेस रिलीज में कहा था कि हम पाकिस्तान को चीनी निर्यात करने के इच्छुक हैं, लेकिन शाम होते-होते पाकिस्तान के कैबिनेट ने भारत से चीनी आयात की संभावना को खारिज कर दिया।</p>
<p>चीनी उद्योग सूत्रों ने <strong>रुरल वॉयस</strong>&nbsp; को बताया कि पाकिस्तान की इकोनॉमिक कोआर्डिनेशन काउंसिल (ईसीसी) ने आयात का फैसला लिया था। इसके पीछे वजह यह थी कि पाकिस्तान में चीनी की कीमतें 96 से 100 रुपये किलो के बीच चल रही हैं। 12 अप्रैल से रमजान का महीना शुरू होने वाला है। उसके चलते कीमतों में और अधिक तेजी आ सकती है। ऐसे में पाकिस्तान के पास कीमतों को नियंत्रित करने का सबसे व्यवहारिक तरीका भारत से चीनी का आयात करना है। भारत से चीनी वाघा बार्डर से ट्रकों के जरिये पाकिस्तान जा सकती है और उसके चलते वहां बाजार तक इसे पहुंचाने में कम से कम समय लगेगा। इससे कीमतों में तेजी से कमी लाई जा सकती है। असल में पाकिस्तान में चीनी उत्पादन 2018-19 के &nbsp;52 लाख टन से घटकर 2019-20 में &nbsp;48.19 लाख टन रह गया। पाकिस्तान शुगर मिल्स एसोसिएशन के मुताबिक गन्ने में चीनी की रिकवरी और उत्पादकता घटने के चलते चीनी उत्पादन में यह गिरावट आई है। जबकि उसकी सालाना घरेलू चीनी की खपत करीब 55 लाख टन है। इसका नतीजा कीमतों में भारी तेजी के रूप में सामने आ गया। सितंबर, 2020 से ही कीमतें 95 रुपये के आसपास पहुंच गई थी। भारतीय रुपये में भी यह कीमत करीब करीब 50 रुपये किलो बैठती हैं। जबकि भारतीय बाजार में खुली चीनी की रिटेल कीमत 37 से 38 रुपये किलो चल रही हैं।</p>
<p>पाकिस्तान के पास दूसरा विकल्प ब्राजील से चीनी आयात करने का है, ब्राजील ही भारत के बराबर या उससे अधिक चीनी का उत्पादन करने वाला दूसरा देश है। वहीं एशियाई देशों में निर्यात बाजार में दखल रखने वाले देश के रूप में भारत के अलावा थाइलैंड है, लेकिन इस साल थाइलैंड में चीनी उत्पादन गिर गया है और उसके चलते भारत को इंडोनेशिया जैसे बाजार में निर्यात का अच्छा मौका मिला है। चीनी उद्योग के सूत्रों का कहना है कि अगर पाकिस्तान ब्राजील से चीनी का आयात करता है तो वहां से पाकिस्तान के बाजार में चीनी पहुंचने में कम से कम 45 दिन लगेंगे। वहीं इस समय ब्राजील कोविड-19 के महामारी के भयानक संक्रमण दौर से गुजर रहा है। कोविड की वजह से वहां से जहाजों की उपलब्धता में बड़ी दिक्कतें सामने आ रही है। इसलिए यह स्थिति पाकिस्तान के संकट को और बढ़ाएगी। ऐसे में पाकिस्तान की ईसीसी का फैसला व्यवहारिक था।</p>
<p>अंतरराष्ट्रीय बाजार में इस साल चीनी की बेहतर मांग को देखते हुए भारतीय चीनी मिलें करीब 45 लाख टन के निर्यात सौदे कर चुकी हैं। सरकार ने चालू सीजन में 60 लाख टन चीनी निर्यात का कोटा तय किया है। चीनी मिलों का कहना है कि हमारे लिए अभी आठ माह का समय बाकी है ऐसे में 60 लाख चीनी निर्यात का कोटा पूरा करना मुश्किल नहीं होगा। इसलिए पाकिस्तान द्वारा भारत से चीनी आयात पर रोक लगाने से हमारे निर्यात लक्ष्य को हासिल करने में कोई दिक्कत नहीं है। यह बात सही है कि अगर पाकिस्तान भारत से चीनी आयात करने के फैसले को कायम रखता तो उसमें उसका काफी फायदा होता।</p>
<p>इस समय देश से चीनी निर्यात पर चीनी मिलों को करीब 24 से 25 रुपये किलो की एक्स मिल कीमत मिल रही है। सरकार चीनी मिलों को निर्यात पर छह रुपये किलो सब्सिडी दे रही है। ऐसे में मिलों को 30 से 31 रुपये किलो की कमाई निर्यात से हो रही है। पिछले दिनों अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों के बेहतर रहने के चलते एक्स मिल कीमत 26 से 27 रुपये किलो तक मिल रही थी। सरकार ने घरेलू बाजार के लिए चीनी का 31 रुपये किलो का न्यूनतम बिक्री मूल्य (एमएसपी) तय कर रखा है। &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ पाकिस्तान में चीनी की कीमत 96 रुपये किलो, फिर भी भारत से आयात का फैसला पलटा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[क्या डब्ल्यूटीओ की पहली महिला प्रमुख वैश्विक कृषि सब्सिडी में भेदभाव को समाप्त  कर सकेंगी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/Can-WTOs-first-woman-chief-address-inequities-in-global-farm-subsidies.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 22 Mar 2021 09:43:48 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/Can-WTOs-first-woman-chief-address-inequities-in-global-farm-subsidies.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अमेरिका के ट्रंप प्रशासन के हठ के चलते महीनों के गतिरोध के बाद डॉ. नगोजी ओकोंजो इवेला विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) की महानिदेशक नियुक्त की गईं। वह न सिर्फ डब्ल्यूटीओ की पहली महिला एग्जीक्यूटिव प्रमुख हैं, बल्कि इस पद पर बैठने वाली अफ्रीका महाद्वीप से आने वाली पहली शख्सीयत हैं। वह ऐसे समय इस पद पर बैठी हैं जब ज्यादातर देशों, खासकर विकासशील जगत को अपनी अर्थव्यवस्थाओं में सुधार के लिए विश्व बाजार से मदद की जरूरत है। सवाल है कि क्या डेवलपमेंट इकोनॉमिस्ट रह चुकीं डॉ. इवेला विश्व व्यापार प्रणाली में व्याप्त असमानता को खत्म करने के डब्ल्यूटीओ के मौलिक लक्ष्य को हासिल करने में मदद करेंगी?</p>
<p>डब्ल्यूटीओ के तहत जितने भी समझौते हुए हैं उनमें कृषि समझौता (एओए) सबसे अधिक असमान है। हालांकि अनेक विकासशील देशों में कामकाजी वर्ग का बड़ा हिस्सा कृषि पर निर्भर है, इसके बावजूद कृषि उत्पादों के विश्व बाजार में अमेरिका और यूरोपियन यूनियन के सदस्य देशों का बोलबाला है। इस विकृत और प्रतिकूल परिस्थिति के कारण ही डब्ल्यूटीओ के दो सबसे मजबूत सदस्य अपने यहां कृषि व्यवसाय को भारी-भरकम सब्सिडी दे रहे हैं।</p>
<p>डब्ल्यूटीओ के कृषि समझौते का मकसद प्रतिबंधों और विकृतियों को दूर कर विश्व कृषि व्यापार को अनुशासित और पूर्वानुमान योग्य बनाना था। इसका उद्देश्य ढांचागत सरप्लस में भी सुधार करना था ताकि विश्व कृषि बाजार में अनिश्चितता, असंतुलन और अस्थिरता कम की जा सके। खास तौर से कृषि सब्सिडी के मामले में इस समझौते से उम्मीद की जा रही थी कि यह सभी प्रत्यक्ष और परोक्ष सब्सिडी को, तथा कृषि व्यापार को प्रभावित करने वाले सभी तौर-तरीकों को नियंत्रित करके एक प्रतिस्पर्धी माहौल बनाएगा। लेकिन 1992 में जब अमेरिका और यूरोपियन यूनियन ने आपसी मतभेदों को भुलाकर ब्लेयर हाउस समझौते पर मुहर लगाई, तो उन्होंने यह सुनिश्चित कर लिया था कि उनके अपने कृषि क्षेत्र को पर्याप्त सब्सिडी जारी रहे।</p>
<p>डब्ल्यूटीओ के कृषि समझौते में सब्सिडी को इस तरह निर्धारित किया गया है कि अमेरिका और यूरोपियन यूनियन की तरफ से दी जाने वाली सब्सिडी, इससे जुड़े सख्त नियमों के दायरे से बाहर चली गई हैं। उदाहरण के लिए, अमेरिका में अतीत में दिया जाने वाला प्रत्यक्ष आय समर्थन, जो यूरोपियन यूनियन में इस समय सब्सिडी का बड़ा रूप है, और जो तथाकथित ग्रीन बॉक्स का हिस्सा माना जाता है, उस पर खर्च की कोई सीमा नहीं है। इसी तरह, अमेरिका में कमजोर वर्ग को फूड स्टांप और ऐसी अन्य योजनाओं के जरिए दशकों से चल रही खाद्य वितरण व्यवस्था पर भी खर्च की कोई सीमा नहीं है। यूरोपियन यूनियन में जारी प्रोडक्शन लिमिटिंग प्रोग्राम जिसमें सप्लाई मैनेजमेंट के लिए मदद दी जाती है, वह भी कृषि समझौते में निर्धारित खर्च के दायरे से बाहर है।</p>
<p>इसकी तुलना में भारत में परिस्थिति विपरीत है। यहां सरकार कृषि क्षेत्र के लिए मुख्य रूप से दो तरीके से सब्सिडी देती है। पहला इनपुट सब्सिडी और दूसरा प्रशासित मूल्य समर्थन जिसे न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) &nbsp;कहा जाता है। यह दोनों सब्सिडी डब्ल्यूटीओ के कृषि समझौते में निर्धारित खर्च की सीमा में आती हैं। भारत किसी भी वर्ष कृषि उत्पादन के कुल मूल्य के 10 फीसदी से अधिक रकम की सब्सिडी नहीं दे सकता है। हालांकि कम आय वाले या संसाधनहीन उत्पादकों को दी जाने वाली कृषि इनपुट सब्सिडी को इस खर्च की सीमा से बाहर रखने का प्रावधान है। इस प्रावधान के तहत भारत सरकार ने डब्ल्यूटीओ में बताया है कि यहां 99.43 फीसदी खेत कम आय वाले और संसाधनहीन किसान (10 हेक्टेयर या उससे कम) जोतते हैं। इस लिहाज से देखा जाए तो सब्सिडी पर खर्च की सीमा का फिलहाल भारत पर असर नहीं होना चाहिए। लेकिन विश्व कृषि बाजार के बड़े खिलाड़ियों, जिनमें अमेरिका, यूरोपियन यूनियन और ऑस्ट्रेलिया भी शामिल हैं, इतनी बड़ी संख्या में किसानों को कम आय वाला और संसाधनहीन बताने पर सवाल करते हैं। भारत सरकार पर डब्ल्यूटीओ में कृषि पर होने वाली भावी वार्ताओं में इस परिभाषा को बदलने के लिए काफी दबाव रहेगा।</p>
<p>सब्सिडी पर डब्ल्यूटीओ के नियमों में सबसे बुरी बात प्रशासित मूल्य समर्थन यानी एमएसपी में सब्सिडी की गणना का तरीका है। हर साल विभिन्न फसलों के लिए जो एमएसपी की घोषणा की जाती है, उसकी तुलना 1986-88 के अंतरराष्ट्रीय मूल्यों के साथ होती है, जिसे संदर्भ मूल्य माना जाता है। डब्ल्यूटीओ का कृषि समझौता 1995 में लागू होने के तत्काल बाद से ही भारत और अन्य विकासशील देश इस पर सवाल उठा रहे हैं। इन देशों का कहना है कि मौजूदा मूल्य की तुलना तीन दशक पुराने संदर्भ मूल्य से करना कतई उचित नहीं है। इन देशों का कहना है कि प्रशासित मूल्य व्यवस्था का असर मापने का तरीका पूरी तरह गलत है।</p>
<p>शुरू में कई वर्षों तक भारत सरकार डब्ल्यूटीओ को फसलों का एमएसपी अमेरिकी डॉलर में रिपोर्ट करती थी। इसलिए इस गलत तरीके का भारत पर कोई असर नहीं होता था। डॉलर की तुलना में रुपए की कीमत में लगातार गिरावट से चावल को छोड़कर अन्य सभी फसलों का एमएसपी हाल के वर्षों तक बाहरी संदर्भ मूल्य से नीचे ही रहता था। लेकिन 2018-19 में गेहूं को छोड़कर सभी कमोडिटी का एमएसपी बाहरी संदर्भ मूल्य से अधिक हो गया। हालांकि कृषि सब्सिडी पर खर्च की जाने वाली कुल रकम अभी तक निर्धारित 10 फीसदी की सीमा से कम ही है, लेकिन जल्दी ही यह है उस सीमा को पार कर सकती है।</p>
<p>कृषि समझौते में सब्सिडी के मामले में एक और बड़ा असंतुलन घरेलू खाद्य मदद योजनाओं के रूप में है। इसमें भारत जैसे विकासशील देशों के हितों के आकलन में दोहरा मानदंड अपनाया जाता है। जैसा कि पहले बताया गया है, अमेरिका और यूरोपियन यूनियन में जारी घरेलू खाद्य मदद योजनाएं डब्ल्यूटीओ के कृषि समझौते में सब्सिडी के प्रावधान से बाहर हैं। लेकिन भारत की सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) उसके दायरे में आती है, जबकि पीडीएस देश में कमजोर वर्ग को सस्ता खाद्य मुहैया कराने का तरीका है।</p>
<p>भारत के मामले में यह फर्क इसलिए है क्योंकि अनाजों का सरकार के स्तर पर भंडारण करना कृषि समझौते के दायरे में आता है और भारत का पीडीएस सरकारी भंडारण व्यवस्था से ही चलता है। समझौते में कहा गया है कि अगर सरकार अनाज का भंडारण करती है तो डब्ल्यूटीओ के सदस्य देश प्रशासित मूल्य (एमएसपी) पर अनाज खरीद और बेच सकते हैं। लेकिन अगर इस अनाज का बिक्री मूल्य, खरीद मूल्य से कम हुआ तो उस अंतर को सब्सिडी बिल में शुमार किया जाएगा। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो सरकार राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत कमजोर वर्ग के लोगों को जो सस्ता अनाज उपलब्ध कराती है, वह सब्सिडी की गणना में शामिल होता है। जैसा कि पहले बताया गया है,&nbsp; किसी वर्ष दी जाने वाली कृषि सब्सिडी उस वर्ष के कृषि उत्पादन के मूल्य के 10 फीसदी से अधिक नहीं हो सकती है। सरकार ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत खर्च के लिए 2021-22 में 2.42 लाख करोड़ रुपए का प्रावधान किया है। यह कृषि उत्पादन के मूल्य के 10 फीसदी से अधिक हो जाएगा। यानी भारत को समाज कल्याण योजनाओं पर खर्च में जबरन कटौती करनी पड़ेगी।</p>
<p>2015 में डब्ल्यूटीओ के सदस्य देश भारत को अस्थायी रूप से मोहलत देने पर सहमत हुए थे। तब तय हुआ था कि अस्थायी क्लॉज के तहत भारत पर राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत खर्च घटाने का दबाव नहीं होगा। डब्ल्यूटीओ को भारत के मामले में इस समस्या का स्थायी समाधान निकालना था, ताकि कमजोर वर्ग के लोगों को सस्ता अनाज उपलब्ध कराया जा सके, लेकिन इस दिशा में कोई पहल नहीं की गई है।</p>
<p>इसमें संदेह नहीं कि डब्ल्यूटीओ के कृषि समझौते में सब्सिडी की व्यवस्था में असंतुलन समय के साथ बढ़ता गया है। विकासशील देश इसके विकृत प्रावधानों में बदलाव के लिए कई बार प्रयास कर चुके हैं, लेकिन हर बार विकसित देशों ने उस पर वीटो लगा दिया। इसलिए जब एक अफ्रीकी महिला डब्ल्यूटीओ की महानिदेशक नियुक्त हुईं, तब यह उम्मीद बढ़ गई कि यह संगठन विकासशील जगत की आवश्यकताओं को बेहतर समझेगा। लेकिन इवेला की शुरुआती प्रतिक्रियाएं इन उम्मीदों पर पानी फेरने वाली हैं। उनके एजेंडे में विकसित देशों का एजेंडा ही प्रमुख रूप से शामिल है। विकासशील देश डब्ल्यूटीओ के जिन नियमों, खासकर कृषि समझौते से जुड़े नियमों में सुधार की मांग वर्षों से कर रहे हैं, वह उनकी प्राथमिकता में नहीं दिखता है। ऐसे में डब्ल्यूटीओ में विकासशील देशों की चुनौतियां अब ज्यादा कठिन जान पड़ती हैं।</p>
<p><strong>(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज के सेंटर फॉर इकोनॉमिक स्टडीज एंड प्लानिंग में प्रोफेसर हैं)&nbsp;</strong></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ क्या डब्ल्यूटीओ की पहली महिला प्रमुख वैश्विक कृषि सब्सिडी में भेदभाव को समाप्त  कर सकेंगी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[पहले नौ माह में निर्यात 15.5 फीसदी गिरा लेकिन कृषि निर्यात 9.8 फीसदी बढ़ा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/in-first-9-month--overall-export-contracted-15.5-per-cent-farm-export-registered--9.8-per-cent-growth.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 04 Feb 2021 20:10:28 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
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        <description><![CDATA[ <p>इस समय देश की अर्थव्यवस्था को सबसे अधिक बूस्ट कृषि क्षेत्र से ही मिल रहा है। चालू वित्त वर्ष के पहले नौ माह में अप्रैल, 2020 से दिसंबर, 2020 के दौरान देश के मर्चेंडाइज निर्यात में 15.5 फीसदी गिरावट दर्ज की गई है। लेकिन इसी दौरान कृषि उत्पादों का निर्यात 9.8 फीसदी बढ़ा है। कोविड-19 महामारी के चलते जब देश की अर्थव्यवस्था के अधिकांश क्षेत्र भारी मंदी के शिकार रहे उस समय भी कृषि क्षेत्र बेहतर नतीजे लेकर आ रहा था। महत्वपूर्ण बात यह है कि इस महामारी के दौरान देश में कृषि उत्पादन रिकार्ड बना रहा था वहीं दुनिया भर में कृषि उत्पादों के उत्पादन में गिरावट के चलते इनकी कीमतों ने तेजी का रुख ले लिया और बढ़ती महंगाई के चलते दुनिया के कई देशों ने निर्यात पर पाबंदी लगा दी है, इन देशों में अर्जेंटीना और रूस शामिल हैं। विदेश व्यापार के ताजा जारी आंकड़ों के आधार पर निर्यात की यह तसवीर उभरती है।</p>
<p>अगर यह सिलसिला जारी रहता तो यह सरकार और आंदोलनरत किसानों को राहत दे सकता है क्योंकि जिस तरह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कृषि उत्पादों की कीमतें बढ़ रही हैं वह देश में इसकी बेहतर कीमतों की स्थिति बना सकती हैं। वहीं सामान्य मानसून के चलते जहां खरीफ में बेहतर उत्पादन हुआ है उसी तरह का उत्पादन चालू रबी सीजन में भी होने का अनुमान है। हालांकि इस अच्छे मौके को भुनाने के लिए सरकार को इस मोर्चे पर अधिक ध्यान देना होगा।</p>
<p>वाणिज्य मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक चालू वित्त वर्ष (2020-21) में अप्रैल से दिसंबर के दौरान देश के सभी उत्पादों का कुल निर्यात 201.30 अरब डॉलर रहा। जबकि इसके पहले वित्त वर्ष की इसी अवधि में निर्यात 238.27 अरब डॉलर रहा था। लेकिन इसके उलट इसी अवधि में कृषि उत्पादों का निर्यात 26.34 अरब डॉलर से बढ़कर 28.91 अरब डॉलर हो गया। अप्रैल से दिसंबर, 2020 के दौरान कृषि उत्पादों का आयात 5.5 फीसदी घट गया और उसके चलते कृषि उत्पादों के विदेश व्यापार में सरप्लस 13.07 अरब डॉलर पर पहुंच गया जबकि 2019-20 की इसी अवधि में यह 9.57 अरब डॉलर रहा था।</p>
<p>कृषि उत्पादों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार में सरप्लस की एक बड़ी वजह निर्यात वृद्धि के साथ दालों के आयात में कमी भी है क्योंकि देश में बेहतर कीमतों की नीति अपनाये जाने और उनकी सरकारी खरीद करने के चलते दालों का उत्पादन बढ़ा है जो हमारी कुल खपत के काफी करीब पहुंच गया है। हालांकि खाद्य तेलों के आयात के मामले में यह स्थिति नहीं बन पाई है।</p>
<p>निर्यात में सबसे अधिक बढ़ोतरी गैर-बासमती चावल में रही तो 110 फीसदी रही। चीनी का निर्यात 46 फीसदी और कपास का निर्यात 95.6 फीसदी रहा है। वहीं ऑयलमील का निर्यात 45 फीसदी और प्रोसेस्ड फल और सब्जियों का निर्यात 17.38 फीसदी बढ़ा है।&nbsp; हालांकि गेहूं के निर्यात में 428 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है लेकिन इसकी मात्रा बहुत अधिक नहीं है। वहीं बासमती निर्यात में 1.03 फीसदी की मामूली गिरावट दर्ज की गई है।</p>
<p>भारतीय कृषि उत्पादों के निर्यात में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कृषि उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी होना मुख्य वजह रहा है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने गुरुवार 4 फरवरी को फूड प्राइस इंडेक्स (एफपीआई) के जो आंकड़े जारी किये हैं उनके मुताबिक मई, 2020 से जनवरी, 2021 के दौरान यह 78 माह के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है। जुलाई 2014 के बाद की यह सबसे अधिक बढ़ोतरी रही है।</p>
<p>असल में कोविड-19 महामारी के बाद दुनिया के अधिकांश देशों में आर्थिक गतिविधियों के बढ़ने के चलते स्थिति सामान्य हो रही है और उसके चलते इन उत्पादों की मांग निकल रही हैं। वहीं ब्राजील, अर्जेंटीना, यूक्रेन, रूस, थाइलैंड और वियतनाम जैसे कई देशों में सूखा पड़ा है। लेकिन भारत में लगातार सामान्य मानसून आने से बेहतर बारिश हुई है और उत्पादन बढ़ा है। वहीं अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में इजाफा होने के चलते हमारे कई कृषि उत्पाद जिनमें चीनी, गैर-बासमती चावल, कपास ऑयलमील &nbsp;अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धी स्थिति में पहुंच गये हैं और इसके चलते इनका निर्यात बढ़ रहा है। लंबे समय बाद गेहूं की कीमतें भी प्रतिस्पर्धी हो गई हैं, लेकिन गैर बासमती चावल की तरह हम गेहूं का बड़ा निर्यात कर पाएंगे या नहीं यह अभी नहीं कहा जा सकता है क्योंकि इसका बड़ा हिस्सा सेंट्रल पूल के स्टॉक में है। उसे खाद्य सुरक्षा के नाम पर खरीदा गया है। कुछ एक्सपर्ट्स का कहना है कि पब्लिक स्टॉक से निर्यात करना मुश्किल होगा क्योंकि इसके लिए हमने विश्व व्यापार संगठन में जो पीस क्लॉज लिया है वह खाद्य सुरक्षा के नाम पर लिया है। इसलिए इस स्टॉक से निर्यात पर मामला डब्लूटीओं मे जा सकता है। इसके पहले ही निर्यात प्रोत्साहन के चलते चीनी के निर्यात करने के सरकार के फैसले के खिलाफ कई देश डब्लूटीओ विवाद निस्तारण प्रक्रिया में मामला ले चुके हैं और 2021 में इस पर फैसला आ सकता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में इजाफे की एक बड़ी वजह चीन द्वारा कृषि उत्पादों की बड़े पैमाने पर खरीदारी भी है।</p>
<p>जहां तक देश से कृषि उत्पादों के निर्यात की बात है तो यह उतार-चढ़ाव देखता रहा है। यूपीए सरकार के कार्यकाल में इसमें रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई थी। 2003-04 से 2013-14 के दौरान देश से कृषि उत्पादों का निर्यात 7.53 अरब डॉलर से बढ़कर 43.25 अरब डॉलर पर पहुंच गया था। लेकिन इसके बाद इसमें गिरावट का दौर शुरू हुआ और 2015-16 में यह गिरकर 32.81 अरब डॉलर पर आ गया था। 2019-20 में देश से कुल कृषि उत्पदों का कुल निर्यात 35.60 अरब डॉलर रहा था।</p>
<p>निर्यात में बढ़ोतरी का मौजूदा रुख अगर बरकरार रहता है तो इसका फायदा किसानों को बेहतर कीमतों के रूप में मिल सकता है। बेहतर मौसम और फसलों की रिकॉर्ड बुआई के चलते चालू रबी सीजन में भी उत्पादन बेहतर होने की संभावना है। अगर कीमतें बेहतर रहती हैं तो यह किसानों और सरकार दोनों के लिए अच्छा रहेगा।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ पहले नौ माह में निर्यात 15.5 फीसदी गिरा लेकिन कृषि निर्यात 9.8 फीसदी बढ़ा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    <item>
        <title><![CDATA[एग्री डिप्लोमेसी पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/We-should-focus-on-agri-diplomacy.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 28 Dec 2020 09:50:03 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/We-should-focus-on-agri-diplomacy.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">कूटनीति यानी डिप्लोमेसी का साथ कृषि को कभी कभार ही मिलता है। असल में पेशेवर विदेश मामलों पर काम करने वाले हमारे डिप्लोमेट अपनी दक्षता का पूरा इस्तेमाल राजनीतिक चुनौतियों और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को बेहतर बनाये रखने के प्रबंधन पर करते हैं। हां यह भी एक बदलाव है कि पिछले कुछ बरसों में इकोनॉमिक डिप्लोमेसी यानी आर्थिक मसलों पर केंद्रित कूटनीति ने अच्छी खासी अहमियत हासिल की है। लेकिन इसके केंद्र में मैन्यूफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर की ओर ही विदेशियों का ध्यान खींचने पर रहा है। देश के कृषि क्षेत्र को लेकर विदेश नीति और कूटनीति का क्या फायदा हो सकता है इसको लेकर कोई अहमियत शायद ही दी जाती है। विदेश मामलों पर और कूटनीति पर टिप्पणी करने वाले और उस पर लिखने वाले लोगों ने भी कृषि क्षेत्र को लेकर होने वाले घटनाक्रम को अक्सर नजरअंदाज ही किया है।&nbsp; भारत जैसे कृषि आधारित सामाजिक और आर्थिक स्थिति वाले देश के मामले में यह चौंकाने वाली बात है। यह बात तब है जब देश की 60 फीसदी से अधिक आबादी कृषि और सहयोगी क्षेत्रों से आजीविका कमाती है और इस पर निर्भर है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">तमाम विशेषज्ञों का मानना कि सरकार के आत्मनिर्भर भारत के उद्देश्य को हासिल करने में सक्षम और आत्मनिर्भर कृषि क्षेत्र की अहम भूमिका है। यह केवल कृषि उत्पादों के निर्यात से अर्जित होने वाले विदेशी मुद्रा भंडर तक ही सीमित नहीं है बल्कि किसानों और ग्रामीण उत्पादकों को अंतरराष्ट्रीय बाजार मुहैया कराकर उनकी आय में इजाफा करने के लिए भी अहम है। जो सरकार और नीति निर्धारकों के लिए आज सबसे बड़ी&nbsp; चुनौतियों में से एक है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">विश्व व्यापार संगठन (डल्यूटीओ) के विदेश व्यापार आंकड़ों के मुताबिक विश्व के कुल कृषि व्यापार में भारत के कृषि निर्यात की हिस्सेदारी 2.27 फीसदी और आयात में हिस्सेदारी 1.90 फीसदी है। हालांकि साल 2020 में इसके पहले साल के मुकाबले कृषि उत्पादों के निर्यात में 23 फीसदी का इजाफा हुआ। वहीं कृषि जीडीपी के अनुपात में कृषि निर्यात भी 2019 के 9.4 फीसदी के मुकाबले बढ़कर 2020 में 9.9 फीसदी पर पहुंच गया। वहां आधिकारिक आंकड़ों में कृषइ उत्पदों का आयात इस दौरान 5.7 फीसदी से घटकर 4.9 फीसदी पर आ गया। जो इस बात का सुबूत है कि कृषि उत्पादों के आयात पर देश की निर्भरता घट रही है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इस क्षेत्र के जानकारों&nbsp; का कहना है कि पिछले 15 साल में कृषि उत्पादों के निर्याता खासी बढ़ोतरी हुई है। लेकिन इसके बावजूद कई कृषि उत्पादों के उत्पादन में भारत के दुनिया में सबसे बड़े उत्पादक के रूप में शुमार होने के बावजूद कृषि उत्पादों के निर्यात में हम दुनिया के सबसे बड़े निर्यातक का स्थान नहीं रखते हैं। गेहूं के निर्यात के मामले में हम दुनिया में 34वें स्थान पर हैं। इसी तरह दुनिया में तीसरे सबसे बड़े सब्जी उत्पादक होने के बावजूद निर्यात में हम 14वें स्थान पर हैं और फलों के उत्पादन में दूसरे स्थान पर होने के बावजूद इनके निर्यातकों में हम 23वें स्थान पर आते हैं।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इसकी एक सबसे वजह हमारे किसानों के बीच जानकारी का अभाव है और इसी तरह विदेशियों को हमारे कृषि उत्पादन के बारे में जानकारी की कमी होना है। भारत में दुनिया के 180 देशों के डिप्लोमेटिक मिशन हैं। इनमें अधिकांश डिप्लोमेट राजनीति और आर्थिक कूटनीति पर पना ध्यान केंद्रित रखते हैं। लेकिन एक बड़ी तादाद ऐसे डिप्लोमेट और अधिकारियों की भी है जो कृषि के जुड़े मामले देखते हैं। सरकार के बहुत सारी एजेंसियां और विभाग कृषि से जुड़े मामलों को लेकर उनके साथ विभिन्न स्तरों पर चर्चा और विचार-विमर्श भी करते हैं लेकिन देश के किसानों और इन डिप्लोमेट के बीच सीधे कोई संवाद नहीं है और ही कोई ऐसा माध्यम है जो उनको आपस में जोड़ता हो। दोनों एक दूसरे की जानकारी के लिए सरकारी एजेंसियों के भरोसे ही रहते हैं।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">यहां पर रुरलवॉयस डॉट इन नाम के इस न्यूज प्लेटफार्म की भूमिका शुरू होती है। विदेशी मिशन और वहां की कृषि क्षेत्र की दुनिया और भारतीय कृषि क्षेत्र और किसानों को एक दूसरे से जोड़ने वाले पुल का काम रुरल वायस करेगा। जो दोनों पक्षों की सूचना, नालेज और जरूरी घटनाक्रम और तथ्यों को एक दूसरे तक सटीक रूप में पहुंचाएगा। यह इनके बीच मजबूत सहयोग और एक दूसरे साथ काम करने की स्थितियों को बेहतर करने की भूमिका निभा सकेगा।&nbsp; इन देशों में कृषि उत्पादन, व्यापार, आयात-निर्यात की नीतियां, सरकारों द्वारा किये जाने वाले फैसले, टेक्नोलॉजी पर लगातार खबरों और आर्टिकल्स व कमेंट प्रकाशित होने का मतलह है कि जहां दूसरे देशों को देश की कृषि अर्थव्यवस्था के साथ जुड़ने में आसानी होगी वहीं भारत के किसानों के लिए भी सूचना पर आधारित फैसले लेने से नये मौकों के दरवाजे खुलेंगे। इस नालेज आधारित एक्सचेंज के जरिये जहां हमारे किसानों को बेहतर तकनीक का उपयोग कर उत्पादों की गुणवत्ता बढाने और नये बाजार तलाशने के विकल्प मिलेंगे वहीं दूसरे देशों को भी भारत में किस तरह की भूमिका उनके कृषि क्षेत्र और किसानों व कंपनियों के लिए उपलब्ध है इसे समझने में आसानी होगी। इसलिये यह कहने में कोई दोराय नहीं है कि एग्री डिप्लोमेसी को मुख्यधारा में लाकर सरकार भारतीय किसानों और कृषि क्षेत्र को आर्थिक रूप से मजबूत कर सकती है। लेकिन इसके लिए इसकी अहमियत को समझना जरूरी है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">.(<strong>लेखक RuralVoice.in के कंसल्टिंग एडीटर हैं)</strong></span></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ एग्री डिप्लोमेसी पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कृषि सब्सिडी को लेकर डब्ल्यूटीओ में नए मॉडल की जरूरत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/Need-new-model-in-wto-on-agriculture-subsidy.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 23 Dec 2020 07:29:45 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/Need-new-model-in-wto-on-agriculture-subsidy.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p></p>
<p>भारत में खेती पर दी जाने वाली सब्सिडी कृषि पर समझौते (AoA) के तहत विश्व व्यापार संगठन (WTO) में विवाद का विषय बन गई है। कृषि पर समझौते को एक निष्पक्ष और मार्केट ओरिएंटेड कृषि व्यापार प्रणाली स्थापित करने के लिए अपनाया गया था, जिसमें प्रोडक्शन से जुड़ी एक्टिविटी के लिए सब्सिडी को कम किए जाने के अलावा एक्सपोर्ट सब्सिडी को कम किया जाना था। एक ओर जबकि विश्व व्यापार संगठन के सदस्यों ने निर्यात सब्सिडी को काफी कम कर दिया है और आयात शुल्क को भी कुछ हद तक कम कर दिया है। दूसरी ओर विशेष रूप से बड़े देशों जिसमें अमेरिका और यूरोपीय संघ (ईयू) के सदस्य शामिल हैं, द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी की मात्रा उच्च स्तर पर बनी हुई है।<br /><br />इनमें से अधिकांश सब्सिडी का उपयोग अन्य देशों में कृषि उत्पादकों की कीमत पर व्यावसायिक लाभ बढ़ाने के लिए किया जाता है. इस पेपर में कहा गया है कि सब्सिडी पर कृषि पर समझौते के विषयों पर फिर से काम करने की आवश्यकता है; सब्सिडी का लेवल जो डब्ल्यूटीओ सदस्य &nbsp;सब्सिडी दे सकते हैं, वह उपयोग करने के औचित्य से संबंधित होनी चाहिए. इस तरह से सब्सिडी पर अंकुश लगाना चाहिए क्योंकि इसमें अन्य विश्व व्यापार संगठन के सदस्यों में कृषि को अस्थिर करने की क्षमता है।<br /><br />अमेरिका सभी विश्व व्यापार संगठन के सदस्यों के बीच घरेलू समर्थन का सबसे बड़ा प्रोवाइडर &nbsp;रहा है. 2017 के डाटा के अनुसार यूएस का घरेलू समर्थन खर्च 131 बिलियन डॉलर से अधिक हो गया था. हालांकि 2013 में 147 बिलियन डॉलर के पीक स्तर पर पहुंचने के बाद से इसकी कृषि सब्सिडी में लगातार गिरावट आ रही है. 2017 में घरेलू समर्थन खर्च 1995 में दी जाने वाली सब्सिडी के मुकाबले दोगुना हो गया. दूसरी ओर यूरोपीय यूनियन ने अपनी कृषि सब्सिडी को 2009/10 तक कम कर दी थी लेकिन तब से इसकी सब्सिडी लगभग स्थिर बनी हुई है. इससे पता चलता है कि यूरोपीय संघ अपनी सब्सिडी पर लगाम लगाने में सक्षम थात्र इस घटना का एक और सबूत यह है कि 1995 में, यूरोपीय यूनियन की सदस्यता 15 थी, जबकि 2017/18 में, इसकी सदस्यता बढ़कर 28 हो गई थी।<br /><br />यूरोपीय संघ/अमेरिकी घरेलू समर्थन कार्यक्रमों का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कमोडिटीज पर उनका फोकस रहा है, जिसमें 2 डब्ल्यूटीओ सदस्यों की वैश्विक बाजारों में मजबूत उपस्थिति है. टेबल्स 5 और 6 उन उत्पादों की सूची है जिन्हें अमेरिका और यूरोपीय संघ में हाई लेवल का मूल्य समर्थन मिला है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>टेबल: अमेरिका &nbsp;(सभी आंकड़े अमेरिकी डॉलर में हैं)</p>
<p>&nbsp;</p>
<p></p>
<table width="571">
<tbody>
<tr>
<td width="137">उत्पाद</td>
<td width="56">
<p><strong>1995</strong></p>
</td>
<td width="68">
<p><strong>2000</strong></p>
</td>
<td width="56">
<p><strong>2005</strong></p>
</td>
<td width="68">
<p><strong>2010</strong></p>
</td>
<td width="73">
<p><strong>2015</strong></p>
</td>
<td width="56">
<p><strong>2016</strong></p>
</td>
<td width="56">
<p><strong>2017</strong></p>
</td>
</tr>
<tr>
<td width="137">
<p>मक्का</p>
</td>
<td width="56">
<p>32.1</p>
</td>
<td width="68">
<p>2756.7</p>
</td>
<td width="56">
<p>4490.0</p>
</td>
<td width="68">
<p>15.1</p>
</td>
<td width="73">
<p>2362.1</p>
</td>
<td width="56">
<p>2344.8</p>
</td>
<td width="56">
<p>2198.8</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td width="137">
<p>चीनी</p>
</td>
<td width="56">
<p>1090.9</p>
</td>
<td width="68">
<p>1177.5</p>
</td>
<td width="56">
<p>1199.2</p>
</td>
<td width="68">
<p>1267.3</p>
</td>
<td width="73">
<p>1524.9</p>
</td>
<td width="56">
<p>1517.3</p>
</td>
<td width="56">
<p>1576.7</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td width="137">
<p>सोयाबीन</p>
</td>
<td width="56">
<p>16.3</p>
</td>
<td width="68">
<p>3606.4</p>
</td>
<td width="56">
<p>69.2</p>
</td>
<td width="68">
<p>4.5</p>
</td>
<td width="73">
<p>1391.5</p>
</td>
<td width="56">
<p>1207.2</p>
</td>
<td width="56">
<p>1626.7</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td width="137">
<p>गेहूं</p>
</td>
<td width="56">
<p>5.0</p>
</td>
<td width="68">
<p>847.2</p>
</td>
<td width="56">
<p>28.9</p>
</td>
<td width="68">
<p>111.9</p>
</td>
<td width="73">
<p>854.9</p>
</td>
<td width="56">
<p>911.5</p>
</td>
<td width="56">
<p>603.8</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td width="137">
<p>कपास</p>
</td>
<td width="56">
<p>32.0</p>
</td>
<td width="68">
<p>1049.8</p>
</td>
<td width="56">
<p>1620.7</p>
</td>
<td width="68">
<p>81.2</p>
</td>
<td width="73">
<p>853.1</p>
</td>
<td width="56">
<p>833.7</p>
</td>
<td width="56">
<p>952.1</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td width="137">
<p>ज्वार</p>
</td>
<td width="56">
<p>0.5</p>
</td>
<td width="68">
<p>83.8</p>
</td>
<td width="56">
<p>139.8</p>
</td>
<td width="68">
<p>0.0</p>
</td>
<td width="73">
<p>210.4</p>
</td>
<td width="56">
<p>167.4</p>
</td>
<td width="56">
<p>125.1</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td width="137">
<p>चावल</p>
</td>
<td width="56">
<p>11.6</p>
</td>
<td width="68">
<p>624.4</p>
</td>
<td width="56">
<p>132.5</p>
</td>
<td width="68">
<p>9.6</p>
</td>
<td width="73">
<p>60.1</p>
</td>
<td width="56">
<p>86.2</p>
</td>
<td width="56">
<p>64.9</p>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<p>&nbsp;</p>
<p>टेबल: ईयू (सभी आंकड़े यूरो में हैं)</p>
<p>&nbsp;</p>
<table width="578">
<tbody>
<tr>
<td width="141">
<p><strong>उत्पाद</strong></p>
</td>
<td width="60">
<p><strong>1995/96</strong></p>
</td>
<td width="74">
<p><strong>2000/2001</strong></p>
</td>
<td width="60">
<p><strong>2004/05</strong></p>
</td>
<td width="60">
<p><strong>2009/10</strong></p>
</td>
<td width="60">
<p><strong>2014/15</strong></p>
</td>
<td width="60">
<p><strong>2015/16</strong></p>
</td>
<td width="60">
<p><strong>2016/17</strong></p>
</td>
</tr>
<tr>
<td width="141">
<p>मक्का</p>
</td>
<td width="60">
<p>4209.7</p>
</td>
<td width="74">
<p>4443.5</p>
</td>
<td width="60">
<p>4084.1</p>
</td>
<td width="60">
<p>2723.0</p>
</td>
<td width="60">
<p>2850.4</p>
</td>
<td width="60">
<p>2976.6</p>
</td>
<td width="60">
<p>3075.9</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td width="141">
<p>गेहूं</p>
</td>
<td width="60">
<p>2593.1</p>
</td>
<td width="74">
<p>2270.7</p>
</td>
<td width="60">
<p>1842.4</p>
</td>
<td width="60">
<p>1917.5</p>
</td>
<td width="60">
<p>2213.7</p>
</td>
<td width="60">
<p>2273.6</p>
</td>
<td width="60">
<p>2119.9</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td width="141">
<p>स्किम दूध पाउडर</p>
</td>
<td width="60">
<p>1806.2</p>
</td>
<td width="74">
<p>1507.6</p>
</td>
<td width="60">
<p>1215.7</p>
</td>
<td width="60">
<p>953.5</p>
</td>
<td width="60">
<p>1476.4</p>
</td>
<td width="60">
<p>1558.5</p>
</td>
<td width="60">
<p>1549.3</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td width="141">
<p>दूध</p>
</td>
<td width="60">
<p>N.A.</p>
</td>
<td width="74">
<p>N.A.</p>
</td>
<td width="60">
<p>176.2</p>
</td>
<td width="60">
<p>671.9</p>
</td>
<td width="60">
<p>183.3</p>
</td>
<td width="60">
<p>593.9</p>
</td>
<td width="60">
<p>210.4</p>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<p>&nbsp;</p>
<p>जैसा कि टेबल से देखा जा सकता है, यूरोपीय संघ ने कुछ महत्वपूर्ण डेयरी उत्पादों और गेहूं को हाई लेवल सब्सिडी प्रोवाइड किया. पिछले दशक के मध्य तक, चीनी के उत्पादकों को ज्यादा सब्सिडी दी गई थी. विश्व व्यापार संगठन विवाद निपटान निकाय ने पाया कि चीनी पर यूरोपीय संघ की सब्सिडी कृषि पर समझौते के तहत अपनी प्रतिबद्धता के अनुरूप नहीं थी, चीनी सब्सिडी की नीति बंद कर दी गई थी । अमेरिका ने सभी प्रमुख अनाज पर लगातार सब्सिडी दी है. यूएस में सब्सिडी का मुख्य फोकस काउंटरसाइक्लिकल यानी प्रतिचक्रिय उपायों पर किया गया था, क्योंकि अमेरिका में रिसोर्स इंटेसिव प्रोड्यूसर्स को इन वस्तुओं की कीमतें कम होने पर व्यवसाय में बने रहने के लिए हाई लेवल की सब्सिडी प्रदान की जानी थी. वास्तव में देखें तो ज्यादा सब्सिडी प्रदान करने के पीछे तर्क यह है कि यूरोपीय संघ और अमेरिका को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपनी हिस्सेदारी ज्यादा बनाए रखनी थी.</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>टेबल : ज्यादा सब्सिडी दी जाने वाले प्रोडक्ट पर ईयू की ग्लोबल एक्सपोर्ट में हिस्सेदारी (%)</p>
<table width="449">
<tbody>
<tr>
<td width="169">
<p>उत्पाद</p>
</td>
<td width="56">
<p>1995</p>
</td>
<td width="56">
<p>2000</p>
</td>
<td width="56">
<p>2005</p>
</td>
<td width="56">
<p>2010</p>
</td>
<td width="56">
<p>2016</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td width="169">
<p>मक्खन</p>
</td>
<td width="56">
<p>64.1</p>
</td>
<td width="56">
<p>55.3</p>
</td>
<td width="56">
<p>61.9</p>
</td>
<td width="56">
<p>58.3</p>
</td>
<td width="56">
<p>57.4</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td width="169">
<p>गेहूं</p>
</td>
<td width="56">
<p>31.7</p>
</td>
<td width="56">
<p>27.8</p>
</td>
<td width="56">
<p>27.6</p>
</td>
<td width="56">
<p>35.0</p>
</td>
<td width="56">
<p>36.0</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td width="169">
<p>स्किम्ड मिल्क पाउडर</p>
</td>
<td width="56">
<p>76.5</p>
</td>
<td width="56">
<p>69.9</p>
</td>
<td width="56">
<p>63.1</p>
</td>
<td width="56">
<p>62.4</p>
</td>
<td width="56">
<p>56.4</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td width="169">
<p>दूध</p>
</td>
<td width="56">
<p>94.2</p>
</td>
<td width="56">
<p>93.0</p>
</td>
<td width="56">
<p>90.4</p>
</td>
<td width="56">
<p>90.6</p>
</td>
<td width="56">
<p>85.8</p>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<p>&nbsp;</p>
<p>टेबल : ज्यादा सब्सिडी दी जाने वाले प्रोडक्ट पर अमेरिका की ग्लोबल एक्सपोर्ट में हिस्सेदारी (%)&nbsp;</p>
<table width="449">
<tbody>
<tr>
<td width="169">
<p>उत्पाद</p>
</td>
<td width="56">
<p>1995</p>
</td>
<td width="56">
<p>2000</p>
</td>
<td width="56">
<p>2005</p>
</td>
<td width="56">
<p>2010</p>
</td>
<td width="56">
<p>2016</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td width="169">
<p>मक्का</p>
</td>
<td width="56">
<p>77.0</p>
</td>
<td width="56">
<p>58.2</p>
</td>
<td width="56">
<p>50.1</p>
</td>
<td width="56">
<p>46.8</p>
</td>
<td width="56">
<p>38.0</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td width="169">
<p>सोयाबीन</p>
</td>
<td width="56">
<p>71.5</p>
</td>
<td width="56">
<p>57.4</p>
</td>
<td width="56">
<p>39.2</p>
</td>
<td width="56">
<p>43.5</p>
</td>
<td width="56">
<p>42.8</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td width="169">
<p>गेहूं</p>
</td>
<td width="56">
<p>31.9</p>
</td>
<td width="56">
<p>23.7</p>
</td>
<td width="56">
<p>22.6</p>
</td>
<td width="56">
<p>19.0</p>
</td>
<td width="56">
<p>13.1</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td width="169">
<p>कपास</p>
</td>
<td width="56">
<p>35.1</p>
</td>
<td width="56">
<p>26.8</p>
</td>
<td width="56">
<p>38.6</p>
</td>
<td width="56">
<p>38.2</p>
</td>
<td width="56">
<p>36.4</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td width="169">
<p>ज्वार</p>
</td>
<td width="56">
<p>83.6</p>
</td>
<td width="56">
<p>77.4</p>
</td>
<td width="56">
<p>85.2</p>
</td>
<td width="56">
<p>61.4</p>
</td>
<td width="56">
<p>79.2</p>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<p>&nbsp;</p>
<p><br />यूरोपीय यूनियन और अमेरिका ने कमोडिटीज के वैश्विक निर्यात में अपेक्षाकृत ज्यादा हीस्सेदारी बनाए रखी, जिसमें उन्होंने प्रोडक्ट स्पेसिफिक सपोर्ट के महत्वपूर्ण स्तर की सूचना दी. हालांकि, उपर के टेबल में लिस्ट अधिकांश उत्पादों में, इन दोनों विश्व व्यापार संगठन के सदस्यों ने अपने निर्यात शेयरों को खो दिया. अमेरिका ने सोयाबीन और गेहूं में अपने शेयर में गिरावट को दर्ज किया. ऐसा ब्राजील और रूसी संघ की वजह से हुआ.<br /><br />यह साक्ष्य दिखाता है कि यूरोपीय संघ और अमेरिका में एग्रीकल्चर सेक्टर दोनों देशों के उनके हितों से प्रेरित हैं. अधिकांश प्रमुख कमोडिटीज में और विशेष रूप से अनाज के मामले में, यूरोपीय संघ और अमेरिका के पास हाई एक्सपोर्ट डिपेंडेंसी रेश्यो यानी उच्च निर्यात निर्भरता अनुपात है. दो सबसे बड़े विकासशील देशों, चीन और भारत से संबंधित आंकड़ों के साथ तुलना करने पर ये आंकड़े और भी अधिक स्पष्ट हो जाते हैं. नीचे दिया गया टेबल तीन मुख्य अनाज के लिए एक्सपोर्ट टू प्रोडक्शन रेश्यो को बताता है.<br /><br /><br />टेबल: एक्सपोर्ट टू प्रोडक्शन रेश्यो, चावल (%)</p>
<p>&nbsp;</p>
<table width="387">
<tbody>
<tr>
<td style="width: 77px;">
<p><strong>साल</strong></p>
</td>
<td style="width: 74px;"><strong>यूरोपीय संघ</strong></td>
<td style="width: 73px;">
<p><strong>भारत</strong></p>
</td>
<td style="width: 75px;">
<p><strong>अमेरिका</strong></p>
</td>
<td style="width: 72px;">
<p><strong>चीन</strong></p>
</td>
</tr>
<tr>
<td style="width: 77px;">
<p>1995</p>
</td>
<td style="width: 74px;">
<p>54.9</p>
</td>
<td style="width: 73px;">
<p>4.3</p>
</td>
<td style="width: 75px;">
<p>38.6</p>
</td>
<td style="width: 72px;">
<p>0.0</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td style="width: 77px;">
<p>2000</p>
</td>
<td style="width: 74px;">
<p>57.4</p>
</td>
<td style="width: 73px;">
<p>1.2</p>
</td>
<td style="width: 75px;">
<p>31.0</p>
</td>
<td style="width: 72px;">
<p>1.6</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td style="width: 77px;">
<p>2005</p>
</td>
<td style="width: 74px;">
<p>60.3</p>
</td>
<td style="width: 73px;">
<p>3.0</p>
</td>
<td style="width: 75px;">
<p>37.5</p>
</td>
<td style="width: 72px;">
<p>0.4</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td style="width: 77px;">
<p>2010</p>
</td>
<td style="width: 74px;">
<p>61.3</p>
</td>
<td style="width: 73px;">
<p>1.5</p>
</td>
<td style="width: 75px;">
<p>34.0</p>
</td>
<td style="width: 72px;">
<p>0.3</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td style="width: 77px;">
<p>2016</p>
</td>
<td style="width: 74px;">
<p>65.9</p>
</td>
<td style="width: 73px;">
<p>6.0</p>
</td>
<td style="width: 75px;">
<p>32.6</p>
</td>
<td style="width: 72px;">
<p>0.2</p>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<p>&nbsp;</p>
<p>टेबल: एक्सपोर्ट टू प्रोडक्शन रेश्यो, गेहूं (%)&nbsp;</p>
<table width="280">
<tbody>
<tr>
<td width="56">
<p>साल</p>
</td>
<td width="56">
<p>यूरोपीय संघ</p>
</td>
<td width="56">भारत</td>
<td width="56">
<p>अमेरिका</p>
</td>
<td width="56">
<p>चीन</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td width="56">
<p>1995</p>
</td>
<td width="56">
<p>26.9</p>
</td>
<td width="56">
<p>1.0</p>
</td>
<td width="56">
<p>54.6</p>
</td>
<td width="56">
<p>0.0</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td width="56">
<p>2000</p>
</td>
<td width="56">
<p>24.4</p>
</td>
<td width="56">
<p>1.1<br /><br /></p>
</td>
<td></td>
<td></td>
</tr>
</tbody>
</table>
<p>&nbsp;</p>
<p>&nbsp;ऊपर दिए गए टेबल से साफ संकेत मिलता है कि बड़े विकासशील देशों जैसे भारत और चीन में अनाज का उत्&zwj;पादन उनकी घरेलू मांग को पूरा करता है। वहीं औद्योगिक तौर पर विकसित हो चुके देशों में हालात इसके विपरीत हैं। इस बात पर गौर किया जाना चाहिए कि चीन और भारत चावल के सबसे बड़े उत्&zwj;पादक देश हैं और ये देश गेहूं का उत्&zwj;पादन भी बड़े पैमाने पर करते हैं। लेकिन अगर इन जिंसो के निर्यात की बात करें तो कुल उत्&zwj;पादन में निर्यात का हिस्&zwj;सा बहुत छोटा है। ऐसे में ऊपर की गई चर्चा से यह निष्&zwj;कर्ष निकाला जाना चाहिए कि विकसित देश जहां कृषि क्षेत्र को सब्सिडी वैश्विक बाजार में निर्यात की संभावनाओं को बेहतर बनाने के लिए देते हैं वहीं विकासशील देश कृषि क्षेत्र को सब्सिडी घरेलू खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और ग्रामीण इलाकों में आजीविका को बढ़ावा देने के लिए देते हैं।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>&nbsp;एओए अपनी प्रस्&zwj;तावना में इस बात को मान्&zwj;यता देता है कि समझौते के तहत कृषि से जुड़ी नीतियों में सुधार को इस तरह से आगे बढ़ाया जाए जहां सभी सदस्&zwj;यों के साथ बराबरी का व्&zwj;यवहार हो। इसके तहत खाद्य सुरक्षा सहित गैर व्&zwj;यापार चिंताओं पर गौर किया जाना चाहिए। लेकिन समझौते के तहत पेश किए गए नियम और व्&zwj;यवस्&zwj;थाएं किसी भी तरह से गैर व्&zwj;यापार चिंताओं को क्रियाशील नहीं करते। एओए के तहत सुधार प्रक्रिया को जारी रखने के लिए तैयार किया गया एजेंडा, जिसे समझौते के अनुच्&zwj;छेद 20 में परिभाषित भी किया गया है , कहता है कि वार्ता के दौरान गैर व्&zwj;यापार चिंताओं, &nbsp;विकासशील सदस्&zwj;य देशों के लिए विशेष और अलग तरह के व्&zwj;यवहार और उचित व बाजार उन्&zwj;मुख कृषिगत ट्रेडिंग सिस्&zwj;टम को स्&zwj;थापित करने के मकसद को ध्&zwj;यान में रखा जाना चाहिए।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>दोहा मंत्रिस्&zwj;तरीय घोषणापत्र विकासशील देशों में कृषि के विशेष चरित्र को मान्&zwj;यता देता है। सदस्&zwj;य देशों के मंत्री इस बात पर सहमत हुए थे कि विकासशीले देशों के लिए विशेष और अलग तरह का व्&zwj;यवहार वार्ता के सभी तत्&zwj;वों का अभिन्&zwj;न हिस्&zwj;सा होगा। इसके अलावा इसे रियायतों और प्रतिबद्धताओं के शेड्यूल में समाविष्&zwj;ट किया जाएगा। नियम और व्&zwj;यवस्&zwj;थाएं तय करते समय इस का ध्&zwj;यान रखा जाएगा कि विकासशील देश खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण विकास सहित विकास से जुड़ी अपनी जरूरतों को पूरा कर पाएं।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>2003 में कांकन मंत्रिस्&zwj;तीय सम्&zwj;मेलन की असफलता ने दोहा डेवलपमेंट एजेंडा को बाधित कर दिया। इसके बाद डब्&zwj;ल्&zwj;यूटीओ सदस्&zwj;य कथित 1 अगस्&zwj;त फैसले के जरिए पूरी प्रक्रिया को वापस पटरी पर लाए। और इस फैसले में भी विकासशील देशों के लिए उचित कृषिगत नीतियों अपनाने की जरूरत पर जोर दिया गया। &ldquo; कृषि विकासशील देशों के आर्थिक विकास के लिए बेहद अहम है और ऐसी व्&zwj;यवस्&zwj;था होनी चाहिए जिससे ये देश ऐसी कृषि नीतियों पर अमल कर सकें जो उनके विकास से जुड़े लक्ष्&zwj;यों, गरीबी उन्&zwj;मूलन के प्रयासों, खाद्य सुरक्षा और आजीविका की चिंताओं को दूर करने में मददगार साबित हो।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>इस परिप्रेक्ष्&zwj;य में इस बात पर गौर किया जाना चाहिए कि दोहा दौर की वार्ता में एओए नियमों में संशोधन के प्रस्&zwj;तावों पर विचार किया गया था। ये प्रस्&zwj;ताव विकासशील देशों में खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण विकास की जरूरतों के बारे में थे। वार्ता में दो प्रस्&zwj;ताव पर काफी प्रगति हुई थी और ये प्रस्&zwj;ताव बाजार पहुंच के क्षेत्र से जुड़े थे। इनके नाम विशेष उत्&zwj;पाद नामित करने और विशेष सुरक्षा उपाय तंत्र के लिए प्रस्&zwj;&zwj;ताव थे। एक तरफ जहां विकासशील देशों के किसानों को वैश्विक बाजार की अनिश्चितता से बचाने की जरूरत पर चर्चा की गई वहीं तथ्&zwj;य यह है कि विकासशील देशों में गैर व्&zwj;यापार चिंताओं जैसे खाद्य सुरक्षा और अजीविका की जरूरतों को पूरा करने के लिए इन किसानों को अपनी सरकार से समुचित समर्थन की दरकार है, इस बात पर ज्&zwj;यादा ध्&zwj;यान नहीं दिया गया।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>चर्चा से एक बात स्&zwj;पष्&zwj;ट हो जाती है कि डब्&zwj;ल्&zwj;यूटीओ सदस्&zwj;यों द्वारा मुहैया कराई जा रही कृषि सब्सिडी को इस आधार पर अलग तरीके से देखने की जरूरत है कि क्&zwj;या देश में उत्&zwj;पादन तंत्र व्&zwj;यावसायिक हितों को बढ़ावा देने में लगा है या घरेलू खाद्य सुरक्षा की जरूरतों को पूरा करने में। मौजूदा समय में एओए की सब्सिडी व्&zwj;यवस्&zwj;थाएं कृषि से जुड़े बाजार पर घरेलू समर्थन उपायों के प्रभाव अथवा सब्सिडी से फायदा उठाने वाले उत्&zwj;पादकों की कैटेगरीज को नहीं मानतीं हैं। इनके नाम हैं छोटे पैमाने पर पर उत्&zwj;पादन करने वाले अथवा एग्री बिजनेस। इसलिए विकासशील देशों को उन सिद्धांतों में बदलाव करने के लिए कदम उठाने की जरूरत है जिन सिद्धांतों पर एओए ने सब्सिडी की व्&zwj;यवस्&zwj;थाओं को तय किया है। इसके अलावा यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि सब्सिडी विकासशील देशों में खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका के दोहरे मकसद को पूरा करने में योगदान करे। कृषि सब्सिडी के क्षेत्र में वास्&zwj;तविक सुधार तभी हो सकता है जब एओए अपनी सरकारों के समर्थन से विस्&zwj;तार कर रहे एग्री बिजनेस को रोकने में सक्षम हो जाए।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>&nbsp;(<strong>लेखक जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज के सेंटर फॉर इकोनॉमिक स्टडीज एंड प्लानिंग में प्रोफेसर हैं</strong>)</p>
<p>&nbsp;</p>
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<p>&nbsp;</p>
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<p>&nbsp;</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2020/12/image_750x500_5fe2f1a29d6e3.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ कृषि सब्सिडी को लेकर डब्ल्यूटीओ में नए मॉडल की जरूरत ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[डब्ल्यूटीओ के नाम पर और चीनी उद्योग की लाबिंग गन्ना मूल्य नीति को बदलने का दबाव]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/how-the-sugar-industry-will-get-benefit-on-the-name-of-farmers.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 20 Dec 2020 09:09:01 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/how-the-sugar-industry-will-get-benefit-on-the-name-of-farmers.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>चीनी उद्योग और सरकार के बीच बेहतर जुगलबंदी चल रही है। कृषि सुधारों के दौर में एक और बड़े बदलाव की दिशा में बढ़ने तैयारी हो रही है यह है गन्ना मूल्य निर्धारण के मामले में केंद्र और राज्य सरकारों की नीति में बदलाव की। देश की निजी चीनी मिलों के संगठन इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (इस्मा) की 19 दिसंबर 2020 को हुई सालाना बैठक में इसके अध्यक्ष द्वारा कही गयी बातों में इसकी झलक दिखती है। जहां इस्मा अध्यक्ष का सबसे अधिक जोर इस बात पर था कि देश में गन्ना मूल्य निर्धारण का फार्मूला बदलने&nbsp; वक्त आ गया है। केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा तय किया जाने वाला गन्ना मूल्य काफी अधिक है। प्रतिस्पर्धी दुनिया में दूसरे देशों की चीनी मिलों के मुकाबले भारत की चीनी मिलें 50 फीसदी तक अधिक गन्ना मूल्य भुगतान करती हैं। जबकि रंगराजन समिति समिति और रमेश चंद समिति इसे चीनी के बिक्री मूल्य के 70 से 75 फीसदी पर निर्धारित करने की सिफारिश कर चुकी हैं।</p>
<p>असल में इस मसले पर देश में सबसे अधिक चीनी उत्पादन करने वाले राज्य उत्तर प्रदेश की सरकार परोक्ष रूप&nbsp; से अमल भी कर रही है। कई दशकों तक गन्ने के केंद्र सरकार द्वारा तय किये जाने वाले गन्ने के स्टेचुरी मिनिमम प्राइस (एसएमपी) जिसे पर बदल कर फेयर एंड रिम्यूनिरेटिव प्राइस (एफआरपी) कर दिया गया है के मुकाबले उत्तर प्रदेश समेत कई दूसरे राज्यों द्वारा स्टेट एडवाइज्ड प्राइस (एसएपी) के बीच दस से 20 फीसदी तक का अंतर रहा है। लेकिन उद्योग के दबाव में उत्तर प्रदेश की मौजूदा भाजपा सरकार और इसके पहले वाली अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री काल वाली समाजवादी पार्टी सरकार&nbsp; एसएपी और एफआरपी के अंतर को पाटने में अहम भूमिका निभाई है। पिछले सात साल में उत्तर प्रदेश में गन्ने के एसएपी में केवल 35 रुपये प्रति क्विंटल ही इजाफा हुआ है। जबकि इस दौरान एफआरपी में कुल बढ़ोतरी इससे कहीं अधिक है। साल 2012 में सत्ता में आई अखिलेश यादव सरकार ने पहले साल और अंतिम साल में ही गन्ना के एसएपी में बढ़ोतरी की। वहीं मौजूदा भाजपा सरकार ने केवल पहले साल ही दस रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की। इस तरह&nbsp; से 2013 से 2020 तक हुई दो बार की बढ़ोतरी केवल 35 रुपये प्रति क्विटंल ही रही है। चालू पेराई सीजन को करीब दो माह हो चुके हैं और राज्य सरकार ने अभी तक एसएपी निर्धारण का कोई फैसला नहीं लिया है।</p>
<p>वैधानिक रूप से गन्ने की आपूर्ति के 14 दिन के भीतर किसानों को भुगतान हो जाना चाहिए लेकिन अभी तो चालू पेराई सीजन (अक्तूबर 2020 से सितंबर 2021) के लिए एसएपी ही तय नहीं हुआ है तो भुगतान कैसे हो। हालांकि कुछ चीनी मिलों ने पिछले साल की कीमत&nbsp; 325 रुपये प्रति क्विटंल के आधार पर आंशिक भुगतान शुरू किया है लेकिन यह कुछ चुनिंदा मिलों ने ही किया है। हो सकता है कि देशभर में चल रहे किसान आंदोलन के दबाव में उत्तर प्रदेश की राज्य सरकार एसएपी में कुछ बढ़ोतरी कर दे। हरियाणा ने हाल ही में बढ़ोतरी कर गन्ने के एसएपी को 350 रुपये प्रति क्विटंल कर दिया है।</p>
<p>अहम बात यह है कि मौजूदा एफआरपी पर 10 फीसदी रिकवरी के बाद मिलने वाले बोनस को जोड़ दें तो अब उत्तर प्रदेश के एसएपी और केंद्र द्वारा तय एफआरपी में कोई अंतर नहीं रह जाता है। दूसरी ओर चीनी मिलों का कहना है कि केंद्र सरकार द्वारा फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एसएमपी) के लिए अपनाये गये फार्मूले ए2 प्लस एफएल के आधार पर गणना करने पर गन्ने का एफआरपी ए2प्लस एफएल से 100 फीसदी ज्यादा है। जबकि अन्य फसलो में यह अधिकतम 70 फीसदी तक ही है। इस तरह से गन्ना किसानों को सबसे बेहतर दाम मिल रहा है। एक तरह से चीनी मिलें गन्ने के मूल्य में बढ़ोतरी के खिलाफ अपने पक्ष को मजबूत कर रही हैं। वहीं अप्रैल 2004&nbsp; में सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ द्वारा राज्य सरकारों को एसएपी निर्धारण का अधिकार देने के फैसले को सात सदस्यीय पीठ में ले जाने का मामला भी चीनी मिलें सुप्रीम कोर्ट में उठा रही हैं और इस पर सुनवाई चल रही है।</p>
<p>इस तरह से देखा जाए तो चीनी मिलों का लक्ष्य गन्ना मूल्य को चीनी की कीमत से जोड़ने के फार्मूले पर केंद्र सरकार को तैयार करने पर है। इसके साथ ही इस मामले में अब डब्ल्यूटीओ के विवाद निस्तारण पैनल में भारत के खिलाफ चल रहे केस से भी जोड़ा जा रहा है। वहां पर चीनी के निर्यात पर केंद्र सरकार द्वारा दी जा रही सब्सिडी और गन्ना मूल्य के लिए सरकार के कदमों को वैश्विक व्यापार के मानदंडों के खिलाफ बताया जा गया है। भारत&nbsp; खिलाफ तीन याचिकाओं पर जांच चल रही है। जिनमें ब्राजील, थाइलैंड, आस्ट्रेलिया के साथ ही करीब दर्जन भर अन्य देश शामिल हैं। वैसे सरकार ने पिछले सीजन में 60 लाख टन चीनी निर्यात के लिए 10.42 रुपये प्रति किलो की निर्यात सब्सिडी दी थी जिसके आधार पर करीब 58 लाख टन चीनी का निर्यात हुआ जो अभी तक रिकार्ड है। चालू पेराई सीजन में भी 60 लाख टन चीनी निर्यात के लिए छह रुपये किलो की सब्सिडी देने का फैसला सरकार ने हाल ही में लिया है जिस पर 3500 करोड़ रुपये चीनी मिलों को मिलेंगे।</p>
<p>इस फैसले की घोषणा करते हुए सरकार ने कहा है कि सब्सिडी का यह पैसा सीधे किसानों के खाते में जाएगा। जिसका कोई आधार नहीं है क्योंकि यह पैसा चीनी मिलों को ही निर्यात के लिए तय शर्तें पूरी होने के बाद मिलता है। जिसमें पिछले सीजन के निर्यात की पूरी सब्सिडी चीनी मिलों को अभी तक नहीं मिली है। इसलिए सरकार तय बयान बेबुनियाद है। हालांकि तमाम चीनी मिलें अच्छा मुनाफा कमा रही हैं। यह सब गन्ना किसानों को भुगतान करने के नाम पर ही होता है। महाराष्ट्र&nbsp; में अधिकांश चीनी मिलों ने एफआरपी के आधार पर लगभग पूरा भुगतान कर दिया है। लेकिन चीनी के सबसे बड़े उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश&nbsp; में 11 दिसंबर तक चीनी मिलों पर गन्ना किसानों का पिछले सीजन (2019-20) का 3673.92 करोड़ रुपये&nbsp; का बकाया था। उसके बाद के आंकड़े अभी तक सार्वजनिक नहीं किये गये हैं। वहीं चालू पेराई सीजन का करीब एकतिहाई सीजन भी बीत गया है लेकिन अभी तक जब दाम ही तय नहीं है तो बकाया की गणना नहीं हो रही है। उपलब्ध आंकडों के अनुसार 11 दिसंबर तक 178.86 लाख टन गन्ने की पेराई हुई थी पिछले साल के एसएपी के आधार पर ही इसका मूल्य 5800 करोड़ रुपये बनता है। इस तरह से राज्य में गन्ना किसानों का चीनी मिलों पर बकाया दस हजार के आसपास पहुंच है। इस सबके बीच सरकार रिकार्ड भुगतान के दावे कर रही है जबकि हकीकत कुछ ओर ही है। वहीं चीनी मिलों की गन्ना मूल्य का फार्मूला बदलवाने की रणनीति भी अगर कामयाब हो जाए तो उस पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इसकी वजह अभी भी गन्ना किसानों का अपने हक के लिए मजबूती से मुखर नहीं होना है. भले ही किसान केंद्र सरकार द्वारा लाये गये तीन कृषि संबंधी कानूनो को लेकर देशव्यापी आंदोलन चला रहे है लेकिन उत्तर प्रदेश के मामले में अभी भी गन्ना मूल्य का निर्धारण और उसका भुगतान ही सबसे बड़ा मुद्दा है। हो सकता है कि मौजूदा आंदोलन के साथ यह मुद्दा भी बड़ा बनकर उभरे।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ डब्ल्यूटीओ के नाम पर और चीनी उद्योग की लाबिंग गन्ना मूल्य नीति को बदलने का दबाव ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    <item>
        <title><![CDATA[कृषि मंत्री बोले&amp;#45;  किसानों से अनौपचारिक वार्ता जारी, नए साल से पहले निकल जाएगा हल]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/narendra-tomar-on-famrers-talk.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 19 Dec 2020 00:09:20 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/narendra-tomar-on-famrers-talk.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span>सरकार को नए साल से पहले तीन नए कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे आंदोलन का समाधान होने की उम्मीद है। केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर ने शुक्रवार को कहा कि मौजूदा संकट को दूर करने के लिए विरोध करने वाले संगठनों से अनौपचारिक बातचीत चल रही है। साल खत्म होने से पहले नतीजा निकलने की उम्मीद है। हालांकि, संगठन कह रहे हैं कि उन्हें कानूनों को वापस लेने से कम कुछ भी मंजूर नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर किसान अपनी आपत्तियों के बारे में हमें समझा पाए तो कानूनों में बदलाव पर विचार करेंगे।</span></p>
<p>मंत्री ने कहा कि (नरेंद्र) मोदी सरकार कृषक समुदाय की सभी वाजिब चिंताओं को दूर करने के लिए प्रतिबद्ध है और यह किसी भी वक्त औपचारिक वार्ता फिर से शुरू करने को इच्छुक है. हालांकि, उन्होंने जोर देते हुए कहा कि किसानों के कंधों पर बंदूक रख कर चलाने वालों से बात करने का कोई मतलब नहीं है।<span></span></p>
<p>उन्होंने किसानों को गुमराह करने के लिए विपक्षी पार्टियों को जिम्मेदार ठहराया और उन पर आरोप लगाया कि वे सुधार प्रक्रिया पर अपने रुख में बदलाव कर रही हैं तथा मुद्दे को राजनीतिक रंग दे रही हैं। तोमर ने पीटीआई से एक साक्षात्कार में कहा कि तीनों नये कृषि कानून किसानों के लिए लाभकारी हैं और सरकार लिखित में यह आश्वासन देने को तैयार है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तथा मंडी प्रणाली जारी रहेगी।</p>
<p>यह पूछे जाने पर कि क्या 2020 से पहले किसानों के मुद्दे का समाधान हो जाएगा, तोमर ने कहा, &lsquo;&lsquo;हां. मुझे पूरी उम्मीद है। हर किसी का अपना एजेंडा है। मेरा एजेंडा किसान है. मुझे बताइए कि कृषि कानूनों का कौन सा प्रावधान किसानों को नुकसान पहुंचा रहा है , मुझे समझाइए जरा. हम चर्चा के लिए तैयार है। &rsquo;&rsquo; तोमर, खाद्य मंत्री पीयूष गोयल तथा वाणिज्य राज्य मंत्री सोम प्रकाश के साथ करीब 40 किसान संघों से बातचीत में केंद्र का नेतृत्व कर रहे हैं। इस बीच कई प्रदर्शनकारी किसानों के कई नेताओं ने अपना आंदोलन तेज करने की धमकी दी है और कहा है कि वे अगले साल गणतंत्र दिवस समारोह दिल्ली की सीमाओं पर अपनी ट्रैक्टर रैलियों के साथ मनाने के लिए तैयार हैं.</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ कृषि मंत्री बोले-  किसानों से अनौपचारिक वार्ता जारी, नए साल से पहले निकल जाएगा हल ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[चीनी निर्यात के लिए 3500 करोड़ रुपये सब्सिडी की मंजूरी, कैबिनेट की मंजूरी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/central-government-approve-sugar-subsidy.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 18 Dec 2020 23:46:03 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/central-government-approve-sugar-subsidy.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>मोदी सरकार ने गन्ना किसानों के लिए एक अहम फैसला किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट कमेटी आन इकोनॉमिक अफेयर्स (CCEA) की बैठक में 3,500 करोड़ रुपये की निर्यात सब्सिडी को मंजूरी दे दी गई है। यह सब्सिडी चीनी मिलों&nbsp; को मार्केटिंग वर्ष 2020-21 के दौरान 60 लाख टन चीनी के निर्यात के लिए मिलेगी। इससे गन्ना किसानों के बकाया भुगतान में मदद मिलेगी। सरकार के इस फैसले से करीब 5 करोड़ गन्ना किसानों को लाभ मिल सकता है। इसके तहत प्रति किलो ग्राम 6 रुपये की सब्सिडी की मंजूरी दी गई है। जबकि पिछले साल सरकार ने 10.50 रुपये की प्रति किलो सब्सिडी दी थी।</p>
<p>कैबिनेट की फैसले की जानकारी देते हुए केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि सीसीईए ने 60 लाख टन चीनी निर्यात के लिए 3500 करोड़ रुपये की सब्सिडी को मंजूरी दी है। सब्सिडी की यह रकम सीधे किसानों को दी जाएगी। उनका कहना है कि इस फैसले से करीब 5 करोड़ गन्ना किसानों और चीनी मिलों व संबंधित गतिविधियों में शामिल 5 लाख कामगारों को फायदा होगा।</p>
<p>&nbsp;जावड़ेकर का कहना है कि इस समय चीनी उद्योग और गन्ना किसाना दोनों संकट में है। इसकी बड़ी वजह अधिक चीनी का उत्पादन है। 260 लाख टन की मांग के मुकाबले घरेलू उत्पादन 310 लाख टन है। इसके पहले मार्केटिंग वर्ष 2019-20 में सरकार ने 10,448 रुपये प्रति टन की&nbsp; निर्यात सब्सिडी दी थी। इससे सरकारी खजाने पर 6,268 करोड़ रुपये का बोझ पड़ा था। चालू मार्केटिंग वर्ष के दौरान सरकार ने पिछले साल के मुकाबले कम निर्यात सब्सिडी का प्रस्ताव किया गया है।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2020/12/image_750x500_5fdd8c7490271.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ चीनी निर्यात के लिए 3500 करोड़ रुपये सब्सिडी की मंजूरी, कैबिनेट की मंजूरी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[इंडिया के लिए भारत में सुधार]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/how-to-revive-agriculture-sector.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 15 Dec 2020 23:11:11 GMT]]></pubDate>
		<category>international</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/how-to-revive-agriculture-sector.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>सरकार कई मोर्चों पर कुछ सुधार लागू करने के लिए मशक्कत कर रही है। जाहिर है<span>, </span>आर्थिक मंदी की चिंता में दुबली होती जा रही सरकार के सुधारों की शुरुआत किसानों के मोर्चे से हो सकती है। वैसे भी सरकार ने किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए हाइपावर्ड <span>&lsquo;</span>कमेटी ऑफ चीफ मिनिस्टर्स फॉर ट्रांसफॉर्मेशन फॉर इंडियन एग्रीकल्चर<span>&rsquo; </span>बना रखी है। इस नौ सदस्यीय समिति के संयोजक महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस हैं<span>, </span>जो कृषि क्षेत्र की सेहत सुधारने और किसानों की आमदनी में इजाफा करने के लिए जरूरी सुधारों की सिफारिश करेगी। समिति को दो महीने के भीतर अपनी सिफारिशें देनी हैं। दो महीने कुछ दिनों में पूरे होने वाले हैं और समिति की दो बैठकें ही हो पाई हैं। हालांकि सरकार के एक अतिरिक्त सचिव ओहदे के व्यक्ति की समिति को किसानों की आमदनी दो गुना करने के लिए सिफारिश देने में बरसों लग गए थे। राजधानी दिल्ली समेत कई स्थानों पर बड़ी बैठकें और कॉन्फ्रेंस की गईं। कृषि मंत्रालय के विभागों से लेकर शोध संस्थानों तक सभी इस कवायद में शामिल रहे थे और उसके बाद कई वॉल्यूम की रिपोर्ट तैयार हुई थी। लेकिन किसानों की आमदनी बढ़ाने का कोई फार्मूला फिट नहीं बैठा<span>, </span>ऊपर से वह घट गई है।</p>
<p>जहां तक सुधारों की बात<span>, </span>तो इस मोर्चे पर मामला काफी गंभीर है। इसलिए एक समय सबसे विवादास्पद और सख्त माने जाने वाले आवश्यक वस्तु अधिनियम को रुखसत किया जा सकता है। कृषि मंत्रालय के अधिकारियों का मानना है कि यह कानून कृषि उत्पादों के विपणन के सरलीकरण में बाधक है। देश में अब खाने-पीने की वस्तुओं की कोई ऐसी किल्लत भी नहीं है कि इस तरह के कानून की जरूरत पड़े। अब तो कृषि उपजों की मार्केटिंग की समस्या बड़ी है<span>, </span>क्योंकि किसानों को उनकी फसलों के वाजिब दाम मिलना काफी मुश्किल है। वैसे<span>, </span>आवश्यक वस्तु अधिनियम में सुधार का सिलसिला करीब <span>22</span> साल पहले एच.डी. देवेगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल के प्रधानमंत्रित्व काल की संयुक्त मोर्चा सरकार में शुरू हुआ था और बड़े पैमाने पर कई वस्तुओं को इस कानून से बाहर किया गया था। लेकिन बढ़ती महंगाई के चलते कृषि उत्पादों के मामले में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के शासन काल में एनडीए की पहली सरकार ने इसे सख्त बनाने के साथ ही इसके प्रावधानों को हटाने और लागू करने के अधिकार राज्यों से केंद्र सरकार के पास ले लिए थे। इसके लिए कानून में संशोधन किया गया था। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार इसे हटाएगी तो जाहिर है कि इससे <span>&lsquo;</span>ईज ऑफ डुइंग बिजनेस<span>&rsquo; </span>तो होगा ही<span>, </span>शायद किसानों को भी कुछ फायदा हो।</p>
<p>एक सुधार फार्मर्स प्राेड्यूसर्स ऑर्गनाजेशन (एफपीओ) के मामले में भी हो सकता है। यहां नीति आयोग भी सक्रिय है। वह देश में काम कर रहे एफपीओ पर एक स्टडी करा रहा है। कृषि मंत्रालय के एक अधिकारी के मुताबिक यह स्टडी अमेरिकी कंपनी माइक्रोसाॅफ्ट के मालिक बिल गेट्स की संस्था बिल ऐंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन कर रही है। अब मंत्रालय में एक मंथन यह भी चल रहा है कि किसानों को सामूहिक रूप से कृषि उपज और विपणन करने के लिए सहकारी या एफपीओ में से क्या मॉडल रखना है<span>, </span>यह किसानों पर छोड़ देना चाहिए और दोनों को समान रूप से प्रोत्साहित करना चाहिए। लेकिन चमत्कृत करने वाला मॉडल तो एफपीओ ही दिख रहा है<span>, </span>इसीलिए बजट में भी दस हजार एफपीओ बनाने की बात की गई है। अब देखते हैं<span>, </span>कि इसके मौजूदा प्रावधानों में भी कुछ सुधार होता है या नहीं।</p>
<p>नीति आयोग खेती-किसानी से जुड़े सुधारों में काफी दिलचस्पी ले रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहली सरकार के आखिरी महीनों में नीति आयोग में को-ऑपरेटिव सेक्टर के सुधारों के लिए एक अहम बैठक भी हुई थी<span>, </span>लेकिन इसमें इस क्षेत्र में काम कर रही संस्थाओं के प्रतिनिधियों के मुकाबले अधिकारी ज्यादा थे। बैठक में बड़े सुधारों की सिफारिशें आईं<span>, </span>जिनमें से अधिकांश इस सेक्टर पर अधिकारियों की ताकत बढ़ाने वाली थीं। अब सुधार अगर सरलीकरण के बजाय सरकारी नियंत्रण बढ़ाने का ही दूसरा नाम है<span>, </span>तो इस क्षेत्र का भला इन सुधारों से कैसे होगा<span>? </span>हालांकि<span>, </span>यह मामला अभी पेंडिंग है लेकिन सहकारिता क्षेत्र में इसने कुछ हलचल जरूर मचा दी। अब कृषि मंत्रालय इन सुधारों पर कितना आगे बढ़ता है<span>, </span>यह तो आने वाले दिनों में ही पता लगेगा। तब तक मुख्यमंत्रियों की समिति की सिफारिशों का इंतजार किया जा सकता है।</p>
<p><span>&nbsp;</span></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ इंडिया के लिए भारत में सुधार ]]></media:description>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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