पहले नौ माह में निर्यात 15.5 फीसदी गिरा लेकिन कृषि निर्यात 9.8 फीसदी बढ़ा

चालू वित्त वर्ष के पहले नौ माह में अप्रैल, 2020 से दिसंबर, 2020 के दौरान देश के मर्चेंडाइज निर्यात में 15.5 फीसदी गिरावट दर्ज की गई है। लेकिन इसी दौरान कृषि उत्पादों का निर्यात 9.8 फीसदी बढ़ा है। कोविड-19 महामारी के चलते जब देश की अर्थव्यवस्था के अधिकांश क्षेत्र भारी मंदी के शिकार रहे उस समय भी कृषि क्षेत्र बेहतर नतीजे लेकर आ रहा था।

पहले नौ माह में निर्यात 15.5 फीसदी गिरा लेकिन कृषि निर्यात 9.8 फीसदी बढ़ा

इस समय देश की अर्थव्यवस्था को सबसे अधिक बूस्ट कृषि क्षेत्र से ही मिल रहा है। चालू वित्त वर्ष के पहले नौ माह में अप्रैल, 2020 से दिसंबर, 2020 के दौरान देश के मर्चेंडाइज निर्यात में 15.5 फीसदी गिरावट दर्ज की गई है। लेकिन इसी दौरान कृषि उत्पादों का निर्यात 9.8 फीसदी बढ़ा है। कोविड-19 महामारी के चलते जब देश की अर्थव्यवस्था के अधिकांश क्षेत्र भारी मंदी के शिकार रहे उस समय भी कृषि क्षेत्र बेहतर नतीजे लेकर आ रहा था। महत्वपूर्ण बात यह है कि इस महामारी के दौरान देश में कृषि उत्पादन रिकार्ड बना रहा था वहीं दुनिया भर में कृषि उत्पादों के उत्पादन में गिरावट के चलते इनकी कीमतों ने तेजी का रुख ले लिया और बढ़ती महंगाई के चलते दुनिया के कई देशों ने निर्यात पर पाबंदी लगा दी है, इन देशों में अर्जेंटीना और रूस शामिल हैं। विदेश व्यापार के ताजा जारी आंकड़ों के आधार पर निर्यात की यह तसवीर उभरती है।

अगर यह सिलसिला जारी रहता तो यह सरकार और आंदोलनरत किसानों को राहत दे सकता है क्योंकि जिस तरह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कृषि उत्पादों की कीमतें बढ़ रही हैं वह देश में इसकी बेहतर कीमतों की स्थिति बना सकती हैं। वहीं सामान्य मानसून के चलते जहां खरीफ में बेहतर उत्पादन हुआ है उसी तरह का उत्पादन चालू रबी सीजन में भी होने का अनुमान है। हालांकि इस अच्छे मौके को भुनाने के लिए सरकार को इस मोर्चे पर अधिक ध्यान देना होगा।

वाणिज्य मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक चालू वित्त वर्ष (2020-21) में अप्रैल से दिसंबर के दौरान देश के सभी उत्पादों का कुल निर्यात 201.30 अरब डॉलर रहा। जबकि इसके पहले वित्त वर्ष की इसी अवधि में निर्यात 238.27 अरब डॉलर रहा था। लेकिन इसके उलट इसी अवधि में कृषि उत्पादों का निर्यात 26.34 अरब डॉलर से बढ़कर 28.91 अरब डॉलर हो गया। अप्रैल से दिसंबर, 2020 के दौरान कृषि उत्पादों का आयात 5.5 फीसदी घट गया और उसके चलते कृषि उत्पादों के विदेश व्यापार में सरप्लस 13.07 अरब डॉलर पर पहुंच गया जबकि 2019-20 की इसी अवधि में यह 9.57 अरब डॉलर रहा था।

कृषि उत्पादों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार में सरप्लस की एक बड़ी वजह निर्यात वृद्धि के साथ दालों के आयात में कमी भी है क्योंकि देश में बेहतर कीमतों की नीति अपनाये जाने और उनकी सरकारी खरीद करने के चलते दालों का उत्पादन बढ़ा है जो हमारी कुल खपत के काफी करीब पहुंच गया है। हालांकि खाद्य तेलों के आयात के मामले में यह स्थिति नहीं बन पाई है।

निर्यात में सबसे अधिक बढ़ोतरी गैर-बासमती चावल में रही तो 110 फीसदी रही। चीनी का निर्यात 46 फीसदी और कपास का निर्यात 95.6 फीसदी रहा है। वहीं ऑयलमील का निर्यात 45 फीसदी और प्रोसेस्ड फल और सब्जियों का निर्यात 17.38 फीसदी बढ़ा है।  हालांकि गेहूं के निर्यात में 428 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है लेकिन इसकी मात्रा बहुत अधिक नहीं है। वहीं बासमती निर्यात में 1.03 फीसदी की मामूली गिरावट दर्ज की गई है।

भारतीय कृषि उत्पादों के निर्यात में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कृषि उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी होना मुख्य वजह रहा है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने गुरुवार 4 फरवरी को फूड प्राइस इंडेक्स (एफपीआई) के जो आंकड़े जारी किये हैं उनके मुताबिक मई, 2020 से जनवरी, 2021 के दौरान यह 78 माह के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है। जुलाई 2014 के बाद की यह सबसे अधिक बढ़ोतरी रही है।

असल में कोविड-19 महामारी के बाद दुनिया के अधिकांश देशों में आर्थिक गतिविधियों के बढ़ने के चलते स्थिति सामान्य हो रही है और उसके चलते इन उत्पादों की मांग निकल रही हैं। वहीं ब्राजील, अर्जेंटीना, यूक्रेन, रूस, थाइलैंड और वियतनाम जैसे कई देशों में सूखा पड़ा है। लेकिन भारत में लगातार सामान्य मानसून आने से बेहतर बारिश हुई है और उत्पादन बढ़ा है। वहीं अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में इजाफा होने के चलते हमारे कई कृषि उत्पाद जिनमें चीनी, गैर-बासमती चावल, कपास ऑयलमील  अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धी स्थिति में पहुंच गये हैं और इसके चलते इनका निर्यात बढ़ रहा है। लंबे समय बाद गेहूं की कीमतें भी प्रतिस्पर्धी हो गई हैं, लेकिन गैर बासमती चावल की तरह हम गेहूं का बड़ा निर्यात कर पाएंगे या नहीं यह अभी नहीं कहा जा सकता है क्योंकि इसका बड़ा हिस्सा सेंट्रल पूल के स्टॉक में है। उसे खाद्य सुरक्षा के नाम पर खरीदा गया है। कुछ एक्सपर्ट्स का कहना है कि पब्लिक स्टॉक से निर्यात करना मुश्किल होगा क्योंकि इसके लिए हमने विश्व व्यापार संगठन में जो पीस क्लॉज लिया है वह खाद्य सुरक्षा के नाम पर लिया है। इसलिए इस स्टॉक से निर्यात पर मामला डब्लूटीओं मे जा सकता है। इसके पहले ही निर्यात प्रोत्साहन के चलते चीनी के निर्यात करने के सरकार के फैसले के खिलाफ कई देश डब्लूटीओ विवाद निस्तारण प्रक्रिया में मामला ले चुके हैं और 2021 में इस पर फैसला आ सकता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में इजाफे की एक बड़ी वजह चीन द्वारा कृषि उत्पादों की बड़े पैमाने पर खरीदारी भी है।

जहां तक देश से कृषि उत्पादों के निर्यात की बात है तो यह उतार-चढ़ाव देखता रहा है। यूपीए सरकार के कार्यकाल में इसमें रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई थी। 2003-04 से 2013-14 के दौरान देश से कृषि उत्पादों का निर्यात 7.53 अरब डॉलर से बढ़कर 43.25 अरब डॉलर पर पहुंच गया था। लेकिन इसके बाद इसमें गिरावट का दौर शुरू हुआ और 2015-16 में यह गिरकर 32.81 अरब डॉलर पर आ गया था। 2019-20 में देश से कुल कृषि उत्पदों का कुल निर्यात 35.60 अरब डॉलर रहा था।

निर्यात में बढ़ोतरी का मौजूदा रुख अगर बरकरार रहता है तो इसका फायदा किसानों को बेहतर कीमतों के रूप में मिल सकता है। बेहतर मौसम और फसलों की रिकॉर्ड बुआई के चलते चालू रबी सीजन में भी उत्पादन बेहतर होने की संभावना है। अगर कीमतें बेहतर रहती हैं तो यह किसानों और सरकार दोनों के लिए अच्छा रहेगा।