<?xml version="1.0" encoding="UTF-8" ?>
<rss version="2.0" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/" xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/">
<channel>
    <title>Farmer News: Government Schemes for Farmers, Successful Farmer Stories &#45; Latest Posts</title>
    <link>https://www.ruralvoice.in/</link>
	<atom:link href="https://www.ruralvoice.in/latest-news" rel="self" type="application/rss+xml" />
    <description>Farmer News: Government Schemes for Farmers, Successful Farmer Stories &amp;#45; Latest Posts</description>
    <dc:language>hi</dc:language>
	<sy:updatePeriod>hourly</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>1</sy:updateFrequency>
    

    <item>
        <title><![CDATA[वैश्विक चुनौतियों के बीच 2025&amp;#45;26 में भारत का कृषि निर्यात बढ़कर 52.55 अरब डॉलर पर पहुंचा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/india-agricultural-exports-rise-to-52.55-billion-dollars-in-fy-2025-26-amid-global-challenges.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 22 Apr 2026 19:39:20 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/india-agricultural-exports-rise-to-52.55-billion-dollars-in-fy-2025-26-amid-global-challenges.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>वित्त वर्ष 2025-26 में भारत के कृषि निर्यात में वृद्धि दर्ज की गई और यह बढ़कर 52.55 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया। यह पिछले वर्ष के 51.12 अरब डॉलर से 2.8 प्रतिशत अधिक है। वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, यह वृद्धि ऐसे समय में हुई है जब वैश्विक व्यापार अनिश्चितताओं से जूझ रहा है। निर्यात में यह वृद्धि पारंपरिक कृषि उत्पादों के साथ-साथ उच्च मूल्य और उभरते उत्पादों के योगदान से संभव हुआ।&nbsp;</p>
<p>कृषि और संबद्ध उत्पाद निर्यात का मुख्य आधार बने रहे, जबकि समुद्री और बागान (प्लांटेशन) उत्पादों ने अतिरिक्त गति प्रदान की। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बेहतर मूल्य प्राप्ति और भारतीय कृषि उत्पादों की निरंतर मांग का संकेत मिलता है।</p>
<p>कृषि एवं संबद्ध श्रेणी के भीतर कई वस्तुओं ने निर्यात वृद्धि में योगदान दिया, विशेष रूप से मूल्य संवर्धित और उभरते उत्पादों का प्रदर्शन उल्लेखनीय रहा। दलहन निर्यात में 21.83 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई और यह बढ़कर 94.81 करोड़ डॉलर हो गया।&nbsp;</p>
<p>ताजे फलों का निर्यात भी अच्छा रहा और इसमें 12.89 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इसका निर्यात वित्त वर्ष के दौरान 1.32 अरब डॉलर तक पहुंच गया। इस वृद्धि का मुख्य कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्थिर मांग और आपूर्ति श्रृंखला में सुधार को माना जा रहा है।</p>
<p>वनस्पति तेलों का निर्यात 15.88 प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ 73.21 करोड़ डॉलर तक पहुंच गया। वहीं, प्रसंस्कृत एवं मूल्य संवर्धित खाद्य उत्पादों में सीरियल प्रिपरेशन 7.8 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 1.01 अरब डॉलर के पार पहुंच गए। यह रुझान उच्च मूल्य वाले कृषि निर्यात की ओर बढ़ते झुकाव को दर्शाता है।</p>
<p>भारत के निर्यात पोर्टफोलियो को कई विशिष्ट और उच्च मूल्य वाले उत्पादों ने मजबूती दी है। काजू निर्यात में 12.21 प्रतिशत की वृद्धि हुई और यह 37.951 डॉलर तक पहुंच गया, जबकि कोको उत्पादों का निर्यात 7.59 प्रतिशत बढ़कर 31.79 डॉलर हो गया।&nbsp;</p>
<p>हालांकि चावल निर्यात में 7.5 प्रतिशत की गिरावट आई है। डीजीसीआईएस पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार अप्रैल 2025 से मार्च 2026 के दौरान कुल 11.53 अरब डॉलर का चावल निर्यात किया गया, जबकि पिछले साल इसका निर्यात 12.47 अरब डॉलर का था। तंबाकू, मसाले, ऑयल मील और तिलहन निर्यात भी कम हुआ है।&nbsp;</p>
<p>गेहूं का निर्यात भले ही सीमित मात्रा में हुआ, लेकिन यह बढ़कर 1.03 करोड़ डॉलर तक पहुंच गया, जो कुछ चुनिंदा अंतरराष्ट्रीय बाजारों में मांग के फिर से बढ़ने का संकेत है। प्रसंस्कृत खाद्य श्रेणी का प्रदर्शन भी उल्लेखनीय रहा। विविध प्रसंस्कृत उत्पादों का निर्यात 1.71 अरब डॉलर तक पहुंच गया। यह भारत के निर्यात में मूल्य संवर्धन और खाद्य प्रसंस्करण के बढ़ते महत्व को दर्शाता है। वित्त वर्ष के दौरान टेक्सटाइल निर्यात 2.1 प्रतिशत बढ़ा है। यह 3.09 लाख करोड़ से बढ़कर 3.16 लाख करोड़ रुपये हो गया।</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/11/image_750x500_691b38a60370c.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ वैश्विक चुनौतियों के बीच 2025-26 में भारत का कृषि निर्यात बढ़कर 52.55 अरब डॉलर पर पहुंचा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/11/image_750x500_691b38a60370c.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[ओडिशा में मूंग&amp;#45;सरसों समेत पांच फसलों की एमएसपी पर खरीद को केंद्र की मंजूरी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/states/centre-approves-msp-procurement-of-five-crops-including-moong-and-mustard-in-odisha.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 22 Apr 2026 18:45:45 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/states/centre-approves-msp-procurement-of-five-crops-including-moong-and-mustard-in-odisha.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ओडिशा में मूंग, उड़द, मूंगफली, सूरजमुखी और सरसों की खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर करने को मंजूरी दी। बुधवार को ओडिशा के उप मुख्यमंत्री एवं कृषि व किसान सशक्तीकरण मंत्री कनक वर्धन सिंह के साथ हुई वर्चुअल बैठक में उन्होंने यह मंजूरी दी। इन फसलों की कुल लगभग 1,428.31 करोड़ रुपये की खरीद की जाएगी।</p>
<p>राज्य में 34,492 मीट्रिक टन मूंग की खरीद को स्वीकृति दी गई, जिसका एमएसपी मूल्य 302.42 करोड़ रुपये है। उड़द के लिए 1,19,387 मीट्रिक टन की मांग को मंजूरी दी गई, जिसका एमएसपी मूल्य 931.21 करोड़ रुपये बैठता है। इसी तरह मूंगफली के लिए 20,219 मीट्रिक टन की स्वीकृति दी गई, जिसका समर्थन मूल्य 146.85 करोड़ रुपये है।</p>
<p>सूरजमुखी के लिए 2,210 मीट्रिक टन की मांग को सही मानते हुए केंद्रीय मंत्री ने मंजूरी प्रदान की, जिसका एमएसपी मूल्य 17.06 करोड़ रुपये है। सरसों के मामले में भी चौहान ने ओडिशा की 4,964 मीट्रिक टन की मांग को स्वीकृत किया, जिसका एमएसपी मूल्य 30.77 करोड़ रुपये बैठता है।</p>
<p>पूरी प्रक्रिया पीएम-आशा के तहत 90 दिनों की अवधि के लिए प्रस्तावित है और राज्य सरकार पहले से ही पीओएस आधारित खरीद व्यवस्था पर काम कर रही है। बैठक के दौरान शिवराज सिंह चौहान ने विशेष रूप से सूरजमुखी की खेती को लेकर प्रसन्नता व्यक्त की और कहा कि यह फसल कई क्षेत्रों से धीरे-धीरे समाप्त हो रही थी, ऐसे में ओडिशा में इसका बना रहना और बढ़ना उत्साहजनक है। उन्होंने राज्य सरकार को भरोसा दिलाया कि सूरजमुखी के रकबे और उत्पादन को बढ़ाने के लिए केंद्र हरसंभव सहयोग देगा तथा आवश्यकता पड़ने पर वैज्ञानिक एवं तकनीकी सहायता भी उपलब्ध कराई जाएगी।</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e8c9b3c5331.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ ओडिशा में मूंग-सरसों समेत पांच फसलों की एमएसपी पर खरीद को केंद्र की मंजूरी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e8c9b3c5331.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[मध्यप्रदेश में जमीन अधिग्रहण पर किसानों को मिल सकेगा चार गुना मुआवजा, कैबिनेट का फैसला]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/states/farmers-will-get-four-times-the-market-rate-compensation-for-land-acquisition-in-madhya-pradesh.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 22 Apr 2026 18:22:00 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/states/farmers-will-get-four-times-the-market-rate-compensation-for-land-acquisition-in-madhya-pradesh.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p data-start="130" data-end="540">मध्यप्रदेश सरकार ने कृषि भूमि अधिग्रहण से जुड़े नियमों में अहम बदलाव किया है, जिससे किसानों को दोगुने की बजाय चार गुना मुआवजा मिल सकेगा। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में बुधवार को हुई मंत्रिपरिषद की बैठक में कृषि भूमि के भू-अर्जन पर गुणन कारक (मल्टीप्लिकेशन फैक्टर) को बढ़ाकर 2.0 कर दिया गया है। इससे अधिग्रहित कृषि भूमि का मुआवजा किसानों को दोगुने के स्थान पर बाजार दर से चार गुना प्राप्त होगा।</p>
<p data-start="542" data-end="899">राज्य सरकार की ओर से जारी सूचना के अनुसार, मंत्रिपरिषद ने &lsquo;मध्यप्रदेश भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार नियम, 2015&rsquo; के तहत ग्रामीण क्षेत्रों के लिए गुणन कारक (Multiplication Factor) को बढ़ाकर 2.0 कर दिया है, जिससे किसानों को अब उनकी कृषि भूमि का बाजार दर से चार गुना मुआवजा मिलने का मार्ग प्रशस्त हो गया है।</p>
<p data-start="901" data-end="1152">यह निर्णय पूरे प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि भूमि के अधिग्रहण पर लागू होगा। वहीं, मंत्रिपरिषद ने नगरीय क्षेत्रों के लिए मुआवजा गुणन कारक को यथावत एक ही रखा है। मध्यप्रदेश में किसान लंबे समय से जमीन अधिग्रहण का मुआवजा बढ़ाने की मांग कर रहे थे।</p>
<p data-start="1154" data-end="1473">इस निर्णय से सिंचाई परियोजनाओं, सड़कों, पुलों, रेलवे और बांध निर्माण जैसे महत्वपूर्ण कार्यों के लिए केंद्र व राज्य सरकार द्वारा अधिग्रहित की जाने वाली कृषि भूमि पर किसानों को अधिक मुआवजा मिल सकेगा। इससे न केवल विकास कार्यों में तेजी आएगी, बल्कि भूमि देने वाले किसान परिवारों की आर्थिक स्थिति में भी सुधार होगा।</p>
<p data-start="1475" data-end="1593">उल्लेखनीय है कि इस संबंध में मंत्री तुलसीराम सिलावट, राकेश सिंह और चेतन्य कुमार काश्यप की उप-समिति ने अनुशंसा की थी, जिसके बाद विभिन्न पक्षों से विचार-विमर्श कर राज्य सरकार ने यह निर्णय लिया है।&nbsp;</p>
<p data-start="1561" data-end="1588"><strong data-start="1561" data-end="1588">कई परियोजनाओं को मंजूरी</strong></p>
<p data-start="1590" data-end="1935">मंत्रिपरिषद ने प्रदेश में सिंचाई, स्वास्थ्य, शिक्षा और सड़क जैसी बुनियादी संरचना के निर्माण एवं विकास कार्यों के लिए लगभग 33,985 करोड़ रुपये की स्वीकृति भी दी है। इन्दौख-रुदाहेड़ा सूक्ष्म सिंचाई परियोजना के लिए 157 करोड़ 14 लाख रुपये तथा छिंदवाड़ा सिंचाई कॉम्पलेक्स परियोजना में पुनर्वास के लिए 969 करोड़ रुपये के विशेष पैकेज को मंजूरी दी गई है।</p>
<p data-start="1937" data-end="2210">छिंदवाड़ा सिंचाई कॉम्पलेक्स परियोजना के अंतर्गत छिंदवाड़ा और पांढुर्णा जिलों में कुल 4 बांध प्रस्तावित हैं, जिससे 1,90,500 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधा उपलब्ध होगी। इस परियोजना से छिंदवाड़ा जिले के 369 और पांढुर्णा जिले के 259 गांव, यानी कुल 628 गांव लाभान्वित होंगे।&nbsp;</p>
<p data-start="1937" data-end="2210"></p>
<p data-start="1937" data-end="2210"></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e8c3e610e72.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ मध्यप्रदेश में जमीन अधिग्रहण पर किसानों को मिल सकेगा चार गुना मुआवजा, कैबिनेट का फैसला ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e8c3e610e72.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[भीषण गर्मी से कृषि पर गहरा असर, एफएओ&amp;#45;डब्ल्यूएमओ रिपोर्ट में खाद्य प्रणालियों पर बढ़ते खतरे की चेतावनी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/extreme-heat-hits-indian-farms-hard-as-global-report-warns-of-rising-risks-to-food-systems.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 22 Apr 2026 16:23:08 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/extreme-heat-hits-indian-farms-hard-as-global-report-warns-of-rising-risks-to-food-systems.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अत्यधिक गर्मी वैश्विक स्तर पर और भारत में कृषि के लिए सबसे गंभीर खतरों के रूप में तेजी से उभर रही है। इससे उत्पादन, आजीविका और खाद्य सुरक्षा प्रभावित हो रही है। खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) और विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की रिपोर्ट के अनुसार, बढ़ता तापमान अब केवल कभी-कभार आने वाली समस्या नहीं रहा, बल्कि यह एक संरचनात्मक जोखिम बन गया है जो विश्वभर की कृषि प्रणालियों को प्रभावित कर रहा है।</p>
<p>भारत में इस प्रवृत्ति का स्पष्ट उदाहरण देखने को मिला है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और केंद्रीय शुष्क कृषि अनुसंधान संस्थान (CRIDA) के विश्लेषण के अनुसार वर्ष 2022 में मार्च और अप्रैल सबसे गर्म महीने रहे, जब तापमान सामान्य से 8 से 10.8 डिग्री सेल्सियस अधिक था। कई क्षेत्रों में वर्षा में 99 प्रतिशत तक की कमी दर्ज की गई। गर्मी और सूखे के संयुक्त प्रभाव ने उत्तर और मध्य भारत में फसलों, पशुधन और किसानों की आय को गंभीर रूप से प्रभावित किया।</p>
<p><strong>गर्मी का फसलों पर प्रभाव</strong></p>
<p>एफएओ-डब्ल्यूएमओ की रिपोर्ट के अनुसार, जब तापमान 30&deg;C से ऊपर चला जाता है तो अधिकांश फसलें प्रभावित होने लगती हैं। अत्यधिक गर्मी प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया को कम करती है, फसलों के विकास चक्र को छोटा कर देती है और प्रजनन चरण को नुकसान पहुंचाती है। इससे उत्पादन घटता है और गुणवत्ता भी प्रभावित होती है।</p>
<p>भारत में ये प्रभाव 2022 की हीटवेव के दौरान स्पष्ट रूप से देखने को मिले। गेहूं की पैदावार में 9 से 34 प्रतिशत तक गिरावट आई, जिससे देश को निर्यात रोकना पड़ा। मक्का की फसल में वृद्धि रुक गई और कीटों के हमले बढ़े, जिससे उत्पादन में 18 प्रतिशत तक कमी आई। चना जैसी दलहनी फसलों में कमजोर वृद्धि और सिकुड़े हुए दाने देखने को मिले।</p>
<p>बागवानी फसलें इससे भी अधिक प्रभावित रहीं। पत्तागोभी, फूलगोभी और टमाटर जैसी सब्जियों में उत्पादन 50 प्रतिशत तक घट गया, जबकि सेब, आलूबुखारा और नींबू जैसी फलों की फसलों में फूल झड़ना, सनबर्न और कीट प्रकोप जैसी समस्याएं सामने आईं। ये नुकसान दर्शाते हैं कि अत्यधिक गर्मी केवल खाद्यान्न ही नहीं, बल्कि उच्च मूल्य वाली फसलों को भी गंभीर रूप से प्रभावित करती है।</p>
<p>भारत की लगभग 70 प्रतिशत कैलोरी आवश्यकता पूरी करने वाला चावल भी इस बढ़ते खतरे का सामना कर रहा है। वैश्विक स्तर पर भी चावल लगभग 20 प्रतिशत आहार ऊर्जा प्रदान करता है, जिससे यह खाद्य सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बन जाता है। भारत में बढ़ते तापमान और अनियमित मानसून के कारण चावल की खेती, विशेष रूप से इंडो-गंगा के घनी आबादी वाले मैदानों में, अधिक जोखिम में आने की आशंका है।</p>
<p><strong>पशुधन उत्पादकता में गिरावट</strong></p>
<p>विश्वभर में हीट स्ट्रेस (अत्यधिक गर्मी) का प्रभाव पशुधन प्रणालियों पर भी पड़ रहा है। एफएओ-डब्ल्यूएमओ की रिपोर्ट के अनुसार बढ़ते तापमान से पशुओं में चारे का सेवन कम होता है, दूध उत्पादन घटता है और प्रजनन क्षमता प्रभावित होती है।</p>
<p>भारत में वर्ष 2022 की हीटवेव के दौरान दूध उत्पादन में लगभग 15% तक की गिरावट दर्ज की गई। डेयरी पशुओं के शरीर का तापमान बढ़ा, भूख कम हुई और बीमारियों की घटनाएं बढ़ीं। पोल्ट्री क्षेत्र भी प्रभावित हुआ, जहां शुरुआती दिनों में अंडा उत्पादन में लगभग 10% तक कमी आई और मृत्यु दर में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।</p>
<p>रिपोर्ट के अनुसार, यदि उत्सर्जन उच्च स्तर पर बना रहता है तो सदी के अंत तक दुनिया के लगभग आधे मवेशी खतरनाक हीट स्ट्रेस की स्थिति का सामना कर सकते हैं। इससे डेयरी और मांस उत्पादन प्रणालियों के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है।</p>
<p><strong>मत्स्य पालन और एक्वाकल्चर पर खतरा</strong></p>
<p>अत्यधिक गर्मी का प्रभाव केवल भूमि आधारित कृषि तक सीमित नहीं है। समुद्री हीटवेव वैश्विक स्तर पर बढ़ रही है, जिससे मछलियों की संख्या और जलीय पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो रहे हैं। बढ़ते तापमान से पानी में ऑक्सीजन का स्तर घटता है, खाद्य श्रृंखला बाधित होती है और मछलियां ठंडे क्षेत्रों की ओर पलायन करने लगती हैं।</p>
<p>भारत का मत्स्य क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं है, विशेष रूप से अंतर्देशीय जलीय कृषि प्रणाली अधिक संवेदनशील है, जहां बढ़ता तापमान पानी की गुणवत्ता को प्रभावित करता है और रोगों के प्रकोप को बढ़ाता है। जहां लाखों लोग आजीविका और पोषण के लिए मत्स्य पालन पर निर्भर हैं, यह बदलाव दूरगामी प्रभाव डाल सकते हैं।</p>
<p><strong>वन और बागान फसलों पर प्रभाव</strong></p>
<p>वन और बागान फसलें लगातार बढ़ते तापमान के कारण हीट स्ट्रेस (गर्मी के दबाव) की चपेट में आ रही हैं। वैश्विक स्तर पर उच्च तापमान का संबंध जंगलों में आग की बढ़ती घटनाओं, कीट प्रकोप में वृद्धि और वनों में गिरावट से जोड़ा जा रहा है।</p>
<p>भारत में भी अत्यधिक गर्मी के दौरान बागान फसलें और बाग-बगीचे स्ट्रेस के संकेत दिखा चुके हैं। वर्ष 2022 में फलदार पेड़ों की उत्पादकता घटी और कीटों का प्रकोप बढ़ा। ऐसे प्रभाव न केवल किसानों की आय को कम करते हैं, बल्कि पारिस्थितिक संतुलन और जैव विविधता पर भी नकारात्मक असर डालते हैं।</p>
<p><strong>कृषि श्रमिकों पर बढ़ता खतरा</strong></p>
<p>अत्यधिक गर्मी का सबसे गंभीर लेकिन अक्सर नजरअंदाज किया जाने वाला प्रभाव कृषि श्रमिकों पर पड़ता है। रिपोर्ट के अनुसार, 20&deg;C से ऊपर हर 1 डिग्री तापमान बढ़ने पर श्रम उत्पादकता में 2-3% की गिरावट आती है।</p>
<p>भारत, जहां बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर है, इस खतरे के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील है। केवल धान की खेती में लाखों श्रमिक खुले खेतों में काम करते हैं। जलवायु अनुमानों के अनुसार, दक्षिण एशिया में इस सदी के अंत तक वेट-बल्ब तापमान मानव जीवन के लिए खतरनाक स्तर तक पहुंच सकता है।</p>
<p>हीटवेव के दौरान श्रमिकों को डिहाइड्रेशन, लू (हीटस्ट्रोक) और काम के घंटों में कमी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जिससे खेती-किसानी और ग्रामीण आय पर सीधा असर पड़ता है। चरम परिस्थितियों में कुछ क्षेत्रों में साल में 250 दिनों तक काम करना असुरक्षित हो सकता है।</p>
<p><strong>अनुकूलन रणनीतियों से उम्मीद&nbsp;</strong></p>
<p>बढ़ते जोखिमों के बावजूद, वैश्विक और भारतीय अध्ययनों में अत्यधिक गर्मी के प्रभाव को कम करने के लिए कई अनुकूलन रणनीतियों पर जोर दिया गया है। एफएओ-डब्ल्यूएमओ की रिपोर्ट में गर्मी के प्रति सहनशील फसल किस्मों के विकास, बेहतर सिंचाई व्यवस्था, उन्नत मृदा प्रबंधन और जलवायु-स्मार्ट खेती को अपनाने की आवश्यकता बताई गई है। बुवाई की तारीखों में बदलाव और जल्दी पकने वाली किस्मों का उपयोग कर किसान तेज गर्मी के दौर से बच सकते हैं।</p>
<p>भारत में भी इसी तरह की रणनीतियों पर काम किया जा रहा है। धान की खेती में जल्दी फूल आने वाली किस्मों का उपयोग, रोपाई के समय में बदलाव और सिंचाई के माध्यम से सतह के तापमान को कम करना प्रमुख उपायों में शामिल हैं। इसके साथ ही, गर्मी सहन करने वाली फसलों के विकास पर भी जोर बढ़ रहा है।</p>
<p>संस्थागत स्तर पर अर्ली वार्निंग सिस्टम, फसल बीमा योजनाएं और जलवायु परामर्श सेवाएं बेहद महत्वपूर्ण मानी गई हैं। हालांकि विशेषज्ञों के अनुसार जागरूकता की कमी, सीमित वित्तीय संसाधन और कमजोर विस्तार सेवाएं, विशेषकर छोटे और सीमांत किसानों के लिए, अब भी बड़ी बाधाएं बनी हुई हैं।</p>
<p>कृषि पर अत्यधिक गर्मी का बढ़ता प्रभाव यह दर्शाता है कि जलवायु जोखिम आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं। भारत जैसे देश में, जहां कृषि आजीविका और खाद्य सुरक्षा का मुख्य आधार है, यह चुनौती और भी गंभीर है। किसानों की सुरक्षा और स्थिर खाद्य आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए अनुकूलन उपायों, निवेश और मजबूत नीतिगत समर्थन के माध्यम से लचीलापन बढ़ाना बेहद जरूरी होगा। रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि केवल अनुकूलन ही पर्याप्त नहीं है। दीर्घकालिक नुकसान से बचने के लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी लाना और तापमान वृद्धि को सीमित करना अनिवार्य है।&nbsp;</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e8a8071c4d5.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ भीषण गर्मी से कृषि पर गहरा असर, एफएओ-डब्ल्यूएमओ रिपोर्ट में खाद्य प्रणालियों पर बढ़ते खतरे की चेतावनी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e8a8071c4d5.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[राजस्थान में महिलाओं के लिए प्रत्येक ग्राम पंचायत में होंगे कृषि प्रशिक्षण कार्यक्रम]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/states/agricultural-training-programs-to-be-launched-in-every-gram-panchayat-in-rajasthan-for-women.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 22 Apr 2026 13:13:30 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/states/agricultural-training-programs-to-be-launched-in-every-gram-panchayat-in-rajasthan-for-women.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>राजस्थान में महिलाओं की कृषि में भागीदारी बढ़ाने और नवीन कृषि तकनीकों की जानकारी देने के लिए ग्राम पंचायत स्तर पर महिला प्रशिक्षणों का आयोजन किया जायेगा। कृषि आयुक्त नरेश कुमार गोयल के अनुसार प्रशिक्षण में लघु‑सीमान्त, अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के साथ‑साथ स्वयं सहायता समूहों (SHG) की महिला कृषकों को प्राथमिकता दी जाएगी, ताकि ग्राम स्तर पर महिला कृषक नई तकनीक की जानकारी लेकर उत्पादन में वृद्धि कर सके। वर्ष 2025-26 में 11,019 महिला कृषक प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से 3 लाख 30 हजार 570 महिला कृषकों को प्रशिक्षण दिया गया था।</p>
<p>गोयल ने बताया कि प्रशिक्षण का आयोजन ग्राम पंचायत स्तर पर किया जाएगा। स्थान का चयन उस गांव से किया जाएगा, जहां पिछले दो वर्षों में इस प्रकार का कोई प्रशिक्षण आयोजित नहीं हुआ है। प्रशिक्षण कार्यक्रम में फसलों के बीज उत्पादन तकनीक, मृदा एवं जल परीक्षण का महत्व, नमूनों का संकलन एवं उपयोग, सन्तुलित उर्वरक प्रबंधन, समन्वित पोषक तत्व प्रबंधन, जैविक खेती व जैविक खाद बनाने की विधियों पर गहन चर्चा होगी।</p>
<p>इसके साथ ही फसल अवशेष प्रबंधन, वर्षा जल संरक्षण, शुष्क खेती एवं फसलों की क्रांतिक अवस्था पर समयानुसार सिंचाई, बून्द‑बून्द (ड्रिप), फव्वारा सिंचाई एवं पाईप‑लाइन, डिग्गी निर्माण से पानी का कुशल उपयोग; खरपतवार व कीटों का वैज्ञानिक नियंत्रण, उन्नत फसल किस्में, बीज प्रतिस्थापन दर बढ़ाने की विधियां, जैविक तथा रासायनिक खेती में संतुलन बनाने की तकनीकों का भी प्रशिक्षण दिया जाएगा। विभागीय योजनाओं के लाभ, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन आदि से जुड़ी जानकारी भी दी जाएगी।</p>
<p>प्रशिक्षण के दौरान प्रत्येक महिला कृषक की परख के लिए वस्तुनिष्ठ प्रशिक्षण परीक्षण आयोजित किया जाएगा। परीक्षण के आधार पर प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्थान प्राप्त करने वाली महिलाओं को उपयोगी कृषि सामग्री के पुरस्कार दिए जाएंगे।</p>
<p>प्रशिक्षण में स्थानीय जनप्रतिनिधियों, महिला बाल विकास विभाग, राजीव गांधी सेवा केन्द्र (राजीविका) के बीपीएम, ग्राम स्तरीय कृषि/पशु सखी एवं स्वयं सहायता समूह की महिलाओं को भी आमंत्रित किया जाएगा। साथ ही प्रगतिशील कृषकों को आमंत्रित कर उनके अनुभवों को मंच पर रखा जाएगा, जिससे अन्य कृषक महिलाएं व्यावहारिक ज्ञान ले सकें।&nbsp;</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e87bb5e18b9.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ राजस्थान में महिलाओं के लिए प्रत्येक ग्राम पंचायत में होंगे कृषि प्रशिक्षण कार्यक्रम ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e87bb5e18b9.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[भारत का समुद्री खाद्य निर्यात 72,000 करोड़ रुपये के उच्चतम स्तर पर पहुंचा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/indias-seafood-exports-hit-all-time-high-of-rs-72000-crore.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 22 Apr 2026 12:47:35 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/indias-seafood-exports-hit-all-time-high-of-rs-72000-crore.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का समुद्री खाद्य निर्यात रिकॉर्ड 72,325.82 करोड़ रुपये (8.28 अरब डॉलर) तक पहुंच गया। मात्रा के लिहाज से भी बीते वित्त वर्ष 19.32 लाख मीट्रिक टन समुद्री खाद्य का निर्यात किया गया। समुद्री उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (MPEDA) ने अपने प्रोविजनल आंकड़ों में यह जानकारी दी है।</p>
<p>फ्रोजन झींगा इस ग्रोथ का प्रमुख कारण रहा। इसका 47,973.13 करोड़ रुपये (5.51 अरब डॉलर) का निर्यात किया गया, जो कुल निर्यात के दो-तिहाई से अधिक है। झींगा निर्यात की मात्रा में 4.6% और मूल्य में 6.35% की बढ़ोतरी हुई।</p>
<p>अमेरिका सबसे बड़ा निर्यात ठिकाना बना रहा, जहां कुल 2.32 अरब डॉलर का निर्यात किया गया। हालांकि, अमेरिका को भेजे जाने वाले माल की मात्रा में 19.8% और मूल्य में 14.5% की गिरावट आई, जो प्रमुख तौर पर रेसिप्रोकल टैरिफ के प्रभाव को दर्शाती है।</p>
<p>चीन, यूरोपीय संघ और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों जैसे वैकल्पिक बाजारों में मजबूत बढ़ोतरी से इस गिरावट की भरपाई हुई। दूसरे सबसे बड़े निर्यात ठिकाने चीन को निर्यात मूल्य में 22.7% और मात्रा में 20.1% की बढ़ोतरी हुई। यूरोपीय संघ ने भी मजबूत बढ़ोतरी दर्ज की, जहां निर्यात मूल्य में 37.9% और मात्रा में 35.2% की बढ़ोतरी दर्ज हुई।&nbsp;</p>
<p>दक्षिण-पूर्व एशिया में भी विशेष विस्तार हुआ, जहां मूल्य और मात्रा में क्रमशः 36.1% और 28.2% से अधिक की बढ़ोतरी हुई। जापान को निर्यात मूल्य में 6.55% की बढ़ोतरी हुई, जबकि पश्चिम एशिया को निर्यात में वित्तीय वर्ष के अंत में क्षेत्र में व्याप्त अशांति के कारण 0.55% की मामूली गिरावट दर्ज की गई।</p>
<p>कई अलग-अलग बाजारों में दहाई अंकों की मजबूत बढ़ोतरी दर्ज की गई, जो पारंपरिक बाजारों में व्यापारिक चुनौतियों के बीच विविधीकरण की ओर स्पष्ट बदलाव को दर्शाती है।</p>
<p>उत्पादों की बात करें तो फ्रोजन मछली, स्क्विड, कटलफिश, सूखे खाद्य पदार्थ और जीवित उत्पादों के निर्यात में सकारात्मक तेजी देखी गई, जबकि ठंडे उत्पादों में गिरावट आई। सुरिमी, मछलियों का भोजन और मछली के तेल के निर्यात में सुधार हुआ। लॉजिस्टिक्स के संदर्भ में, शीर्ष पांच बंदरगाहों - विशाखापट्टनम, जेएनपीटी, कोच्चि, कोलकाता और चेन्नई - का कुल निर्यात मूल्य में लगभग 64% हिस्सा रहा, जो भारत की समुद्री खाद्य निर्यात आपूर्ति श्रृंखला में उनके लगातार महत्व को उजागर करता है।</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e875b0d5f9d.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ भारत का समुद्री खाद्य निर्यात 72,000 करोड़ रुपये के उच्चतम स्तर पर पहुंचा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e875b0d5f9d.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[नया शुगरकेन कंट्रोल ऑर्डर: 25 किमी होगी चीनी मिलों की दूरी, खांडसारी इकाइयों पर सख्ती, FRP भुगतान अनिवार्य]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/agribusiness/new-sugarcane-control-order-distance-between-sugar-mills-to-be-25-km-strict-regulation-on-khandsari-units-mandatory-frp-payment.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 22 Apr 2026 10:19:03 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/agribusiness/new-sugarcane-control-order-distance-between-sugar-mills-to-be-25-km-strict-regulation-on-khandsari-units-mandatory-frp-payment.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>केंद्र सरकार ने देश के चीनी क्षेत्र को नियंत्रित करने वाले प्रमुख कानून <em>शुगरकेन (कंट्रोल) ऑर्डर, 1966</em> में संशोधन के लिए नया ड्राफ्ट जारी किया है। प्रस्तावित <strong><a href="https://dfpd.gov.in/WriteReadData/Notices/0c0889b0-7aeb-41a1-8735-9b0b7c6256c6_OM%20reg.%20-%20Review%20of%20Sugarcane%20(Control)%20Order%201966.pdf"><em>शुगरकेन (कंट्रोल) ऑर्डर, 2026</em></a></strong> के तहत नई चीनी मिलों के बीच न्यूनतम दूरी 15 किलोमीटर से बढ़ाकर 25 किलोमीटर करने, खांडसारी इकाइयों को सख्त नियमन के दायरे में लाने और 14 दिनों के भीतर गन्ना भुगतान सुनिश्चित करने जैसे प्रावधान किए गए हैं।</p>
<p>उपभोक्ता मामलों, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने <em>शुगरकेन (कंट्रोल) ऑर्डर, 2026</em> का ड्राफ्ट 20 अप्रैल को जारी किया है और राज्यों, उद्योग संगठनों तथा अन्य हितधारकों से 20 मई तक सुझाव मांगे हैं। यह कदम पिछले करीब 60 वर्षों से लागू व्यवस्था में व्यापक बदलाव का संकेत माना जा रहा है।</p>
<h3>खांडसारी इकाइयों पर कड़ा नियंत्रण</h3>
<p>ड्राफ्ट में पारंपरिक &lsquo;खांडसारी&rsquo; इकाइयों के लिए लाइसेंस अनिवार्य करने और नियमित जांच-निरीक्षण का प्रावधान किया गया है। साथ ही, इन इकाइयों को भी गन्ना किसानों को तय <em>फेयर एंड रिम्यूनरेटिव प्राइस (FRP)</em> का भुगतान करना होगा।</p>
<p>चीनी मिलों को गन्ना जुटाने में हो रही दिक्कतों के पीछे गुड़ और खांडसारी इकाइयों द्वारा गन्ने की बढ़ती खरीद को भी एक बड़ी वजह माना जा रहा है। पिछले वर्ष सरकार ने शुगर कंट्रोल ऑर्डर में संशोधन कर 500 टीसीडी से अधिक क्षमता वाली खांडसारी इकाइयों को नियमन के दायरे में शामिल किया था।</p>
<h3>किसानों के भुगतान पर सख्ती</h3>
<p>ड्राफ्ट में यह प्रावधान भी बरकरार रखा गया है कि गन्ना खरीद के 14 दिनों के भीतर भुगतान न करने पर मिलों को बकाया राशि पर सालाना 14-15 प्रतिशत ब्याज देना होगा। हालांकि, व्यवहार में यह प्रावधान प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो पाया है और किसानों को इस ब्याज का लाभ नहीं मिल पाता।</p>
<p>इसके अलावा, यदि चीनी वर्ष के अंत तक किसानों का भुगतान नहीं किया जाता है, तो संबंधित मिल को तीन महीने के भीतर पूरी राशि जिला कलेक्टर के पास जमा करनी होगी। कलेक्टर इस राशि से किसानों के दावों का निपटान करेंगे और तीन वर्षों के भीतर यदि कोई राशि शेष रहती है, तो उसे राज्य की संचित निधि में जमा किया जाएगा। राज्यों को इस राशि का उपयोग गन्ना विकास कार्यों में करने की सलाह दी गई है।</p>
<h3>नई मिलों के लिए 25 किमी दूरी</h3>
<p>ड्राफ्ट में स्पष्ट किया गया है कि किसी भी नई चीनी मिल को मौजूदा मिल से 25 किलोमीटर के दायरे में स्थापित करने की अनुमति नहीं होगी। राज्य सरकारें केंद्र की पूर्व अनुमति से ही इस दूरी में बदलाव कर सकेंगी।&nbsp;नई परियोजनाओं के लिए 2 करोड़ रुपये की बैंक गारंटी और पांच वर्षों के भीतर उत्पादन शुरू करने की शर्त भी रखी गई है।</p>
<h3>एथेनॉल को प्रमुख उत्पाद का दर्जा</h3>
<p>यह ड्राफ्ट देश के चीनी क्षेत्र में दशकों का सबसे बड़ा नियामक बदलाव माना जा रहा है। इसमें इथेनॉल को चीनी मिलों का एक प्रमुख उत्पाद मानते हुए स्पष्ट परिभाषा दी गई है। गन्ने के जूस, सिरप या मोलासेस से सीधे 600 लीटर इथेनॉल उत्पादन को 1 टन चीनी के बराबर माना जाएगा। इससे मिलों के उत्पादन और मूल्य निर्धारण के तरीके में बड़ा बदलाव आ सकता है। बगास, मोलासेस और प्रेस मड जैसे उप-उत्पादों को भी मूल्यांकन में शामिल किया जाएगा।</p>
<h3>संशोधन का महत्व</h3>
<p><em>शुगरकेन कंट्रोल ऑर्डर, 1966</em> में संशोधन को चीनी क्षेत्र की तकनीकी प्रगति, इथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम और गन्ना क्षेत्र की चुनौतियों के मद्देनज़र एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इसका गन्ना किसानों और चीनी मिलों दोनों पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा।</p>
<p>उद्योग और विशेषज्ञों का कहना है कि ड्राफ्ट के कई प्रावधान पिछले 60 वर्षों से लागू 1966 के आदेश में पहले से मौजूद हैं, जबकि कुछ नए बदलावों का विस्तृत अध्ययन आवश्यक है।</p>
<h3>यूपी चुनाव और गन्ना राजनीति</h3>
<p>यह ड्राफ्ट उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले लाया गया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गन्ना और चीनी अर्थव्यवस्था एक अहम राजनीतिक मुद्दा है। इस वर्ष प्रदेश की चीनी मिलों को करीब 63 लाख टन कम गन्ना आपूर्ति हुई है। ऐसे में शुगरकेन कंट्रोल ऑर्डर में प्रस्तावित बदलाव गन्ना अर्थव्यवस्था के लिए काफी महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। साथ ही, नया ड्राफ्ट चीनी उद्योग को आधुनिक तकनीकी बदलावों और एथेनॉल आधारित अर्थव्यवस्था के अनुरूप ढालने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।&nbsp;</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e855a08af0f.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ नया शुगरकेन कंट्रोल ऑर्डर: 25 किमी होगी चीनी मिलों की दूरी, खांडसारी इकाइयों पर सख्ती, FRP भुगतान अनिवार्य ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e855a08af0f.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[खुरपका&amp;#45;मुंहपका रोग के SAT1 वायरस का बढ़ता प्रकोप, FAO ने जारी किया अलर्ट]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/fao-issues-alert-on-sat1-virus-causing-foot-and-mouth-disease.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 21 Apr 2026 20:53:43 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/fao-issues-alert-on-sat1-virus-causing-foot-and-mouth-disease.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p data-start="204" data-end="510">संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी <strong>फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गनाईजेशन&nbsp;(FAO)</strong> ने पशुओं में खुरपका-मुंहपका रोग (FMD) के SAT1 वायरस के बढ़ते प्रकोप को लेकर अलर्ट जारी किया है। संगठन ने एशिया और प्रशांत क्षेत्र के देशों को संभावित गंभीर पशुधन संकट से निपटने के लिए निगरानी और तैयारियों को मजबूत करने की सलाह दी है।</p>
<p data-start="512" data-end="766">यह अलर्ट SAT1 सीरोटाइप के तेजी से भौगोलिक विस्तार के बाद जारी किया गया है, जो पारंपरिक रूप से उप-सहारा अफ्रीका तक सीमित था, लेकिन अब पश्चिम एशिया, यूरोप और पूर्वी एशिया के कुछ हिस्सों तक फैल चुका है। हालिया मामलों ने इसके प्रसार को लेकर चिंता बढ़ा दी है। FAO ने 15 अप्रैल 2026 को जारी अपने अलर्ट में एशिया और प्रशांत क्षेत्र के देशों से अपील की है कि वे FMD वायरस के सीरोटाइप SAT1 के लगातार फैलाव को देखते हुए सतर्कता और तैयारियों को बढ़ाएं।&nbsp;</p>
<p data-start="768" data-end="954">अप्रैल 2025 में FAO ने इराक में FMD वायरस के सीरोटाइप SAT1 का पता चलने के बाद एक क्षेत्रीय अलर्ट जारी किया था। इराक में मवेशियों और भैंसों में संक्रमण के मामले सामने आए थे, जबकि बहरीन में आयात क्वारंटाइन के दौरान संक्रमित पशुधन की पहचान हुई थी। तब से यह वायरस अलग-अलग दिशाओं में तेजी से फैलता रहा है और साइप्रस, ग्रीस, इजराइल, लेबनान, फिलिस्तीन और हाल ही में चीन में इसके प्रकोप की पुष्टि हुई है।</p>
<p data-start="1359" data-end="1639">एफएमडी के इस नए सीरोटाइप का नए क्षेत्रों के पशुओं में संक्रमण भारी आर्थिक और उत्पादन नुकसान का कारण बन सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, पशुओं और पशु उत्पादों की आवाजाही, व्यापार तथा परिवहन के दौरान पशुओं का आपसी संपर्क इसके प्रसार के प्रमुख कारण हैं।</p>
<h3 data-section-id="ueuri4" data-start="1641" data-end="1678"><strong>भारत के पशुधन क्षेत्र के लिए खतरा</strong></h3>
<p data-start="1680" data-end="1922">एफएमडी के संभावित खतरे को देखते हुए केंद्र सरकार के पशुपालन एवं डेयरी विभाग ने तैयारियां पहले ही शुरू कर दी हैं। मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी राज्यों के पशुपालन विभागों और शोध संस्थानों के साथ मिलकर इस खतरे से निपटने की रणनीति तैयार कर रहे हैं।</p>
<p data-start="1924" data-end="2293">देश के कई राज्यों को <strong>एफएमडी मुक्त</strong> बनाने के प्रयास पहले से चल रहे थे, लेकिन यह नया खतरा इन योजनाओं को प्रभावित कर सकता है। एफएमडी नियंत्रण से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने रूरल वॉयस को बताया कि इस बीमारी की रोकथाम न केवल पशुपालन और दुग्ध उत्पादन के लिए, बल्कि इससे जुड़े वैल्यू चेन और निर्यात के लिए भी बेहद अहम है। यह पशुपालकों की आजीविका से भी जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा है।</p>
<p data-start="2295" data-end="2553">भारत और दक्षिण एशिया के लिए यह खतरा इसलिए अधिक गंभीर है क्योंकि यहां पशुधन का घनत्व अधिक है, पशुओं की अनौपचारिक आवाजाही व्यापक है और व्यापार नेटवर्क में पशुओं का मिश्रण बढ़ रहा है। वहीं, SAT1 के अनुरूप वैक्सीन की सीमित उपलब्धता इस चुनौती को और जटिल बनाती है।</p>
<p data-start="2555" data-end="2750">भारत में एफएमडी टीकाकरण कार्यक्रम मुख्य रूप से O, A और Asia1 सीरोटाइप पर केंद्रित हैं। SAT1 आमतौर पर इन टीकों में शामिल नहीं होता, जिससे बड़ी पशुधन आबादी इस नए खतरे के प्रति असुरक्षित बनी हुई है।</p>
<h3 data-section-id="3muyig" data-start="2752" data-end="2781"><strong>तत्काल कदम उठाने की जरूरत</strong></h3>
<p data-start="2783" data-end="3013">FAO ने एशिया और प्रशांत क्षेत्र के देशों से तुरंत कदम उठाने की अपील की है। इसमें रोग निगरानी प्रणाली को मजबूत करना, संदिग्ध मामलों की त्वरित लैब जांच सुनिश्चित करना और फार्म, मंडी व सीमा स्तर पर बायो-सिक्योरिटी को बढ़ाना शामिल है।</p>
<p data-start="3015" data-end="3194">संगठन ने जागरूकता बढ़ाने, आपातकालीन योजनाओं की समीक्षा करने, पशुपालकों और पशु चिकित्सकों को सतर्क करने तथा पशुओं की आवाजाही और व्यापार पर सख्त नियंत्रण लागू करने की भी सलाह दी है।</p>
<h3 data-section-id="7zbigq" data-start="3196" data-end="3224"><strong>खुरपका-मुंहपका रोग (FMD)</strong></h3>
<p data-start="3226" data-end="3472">एफएमडी एक अत्यंत संक्रामक वायरल बीमारी है, जो गाय, भैंस, भेड़, बकरी और सूअर जैसे खुर वाले पशुओं को प्रभावित करती है। यह मनुष्यों के लिए खतरनाक नहीं है, लेकिन खाद्य सुरक्षा, आजीविका और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर इसका गंभीर प्रभाव पड़ता है।</p>
<p data-start="3474" data-end="3741">एफएमडी वायरस के सात सीरोटाइप होते हैं&mdash;A, O, C, SAT1, SAT2, SAT3 और Asia1। इनमें से किसी एक सीरोटाइप के प्रति विकसित इम्युनिटी दूसरे से सुरक्षा नहीं देती। इसके अलावा, प्रत्येक सीरोटाइप के भीतर अलग-अलग टोपोटाइप होते हैं, जो वैक्सीन चयन और उसकी प्रभावशीलता को प्रभावित करते हैं।</p>
<p data-start="3474" data-end="3741"></p>
<p data-start="3474" data-end="3741"></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e7951d6df0a.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ खुरपका-मुंहपका रोग के SAT1 वायरस का बढ़ता प्रकोप, FAO ने जारी किया अलर्ट ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e7951d6df0a.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[पश्चिम बंगाल में पहले चरण और तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार थमा, 23 अप्रैल को वोटिंग]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/politics/campaigning-ends-for-first-phase-in-west-bengal-and-tamil-nadu-assembly-polls-voting-on-april-23.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 21 Apr 2026 19:14:28 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/politics/campaigning-ends-for-first-phase-in-west-bengal-and-tamil-nadu-assembly-polls-voting-on-april-23.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>23 अप्रैल 2026 को होने वाले पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण और तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार मंगलवार शाम को समाप्त हो गया। पश्चिम बंगाल में पहले चरण में 152 सीटों पर मतदान होना है। बाकी 142 सीटों के लिए चुनाव 29 अप्रैल को होगा। तमिलनाडु की सभी 234 सीटों के लिए 23 अप्रैल को मतदान होगा। असम, केरल और पुदुचेरी में पहले ही मतदान पूरा हो चुका है। सभी पांच राज्यों में मतगणना 4 मई को होगी। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कहा है कि राज्य में निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराने के लिए आयोग कोई कसर नहीं छोड़ेगा।</p>
<p><strong>पश्चिम बंगालः 294 में से 152 सीटों पर वोटिंग</strong></p>
<p>पश्चिम बंगाल विधानसभा में कुल 294 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए कम से कम 148 सीटों की जरूरत है। यहां मुख्य मुकाबला सत्तारूढ़ अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच है। कांग्रेस और लेफ्ट फ्रंट भी मैदान में हैं, लेकिन 2021 के चुनाव में इन दोनों को एक सीट पर भी जीत नहीं मिली थी। तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी सभी 294 सीटों पर चुनाव लड़ रही हैं। लेफ्ट फ्रंट और कांग्रेस ने 293 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं।&nbsp;</p>
<p>वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को 294 सीटों में से 215 सीटों पर जीत मिली थी। भाजपा के खाते में 77 सीटें आईं। बाकी बची दो सीटें अन्य के नाम गईं। कांग्रेस और सीपीएम को एक भी सीट पर जीत नहीं मिली। उससे पहले 2016 के चुनाव में तृणमूल को 211, भाजपा को 3, कांग्रेस को 44, वाम मोर्चा को 32 और अन्य को 4 सीटें मिली थीं।</p>
<p>राज्य में इस बार सबसे बड़ा मुद्दा वोटर लिस्ट का स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) रहा है। इस समीक्षा में करीब 90 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए। यह समीक्षा से पहले राज्य के कुल मतदाताओं का करीब 12% है। लगभग 60 लाख नामों को अनुपस्थित या मृतक बताया गया जबकि करीब 27 लाख मतदाताओं के मामले विभिन्न ट्रिब्यूनल में लंबित पड़े हैं। लंबित मामलों में मुस्लिम और मतुआ समुदाय के लोग ज्यादा हैं। फिलहाल रजिस्टर्ड मतदाताओं की संख्या 6 करोड़ 82 लाख है। राज्य के अन्य मुद्दों में नागरिकता संशोधन कानून, बॉर्डर सुरक्षा और घुसपैठ, भ्रष्टाचार, महिला सुरक्षा, रोजगार एवं विकास प्रमुख रहे।&nbsp;</p>
<p>मतदान से दो दिन पहले चुनाव आयोग ने मंगलवार को नंदीग्राम विधानसभा क्षेत्र के पुलिस पर्यवेक्षक हितेश चौधरी को हटा दिया। उनकी जगह अखिलेश सिंह को लाया गया है। एक दिन पहले ही तृणमूल कांग्रेस ने हितेश चौधरी के खिलाफ शिकायत की थी। पार्टी का आरोप है कि भाजपा कार्यकर्ताओं के खिलाफ उनकी शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। चुनाव आयोग ने पूरे प्रदेश में 84 पुलिस पर्यवेक्षक नियुक्त किए हैं।</p>
<p>एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने बताया है कि राज्य में चुनाव लड़ रहे 23 प्रतिशत प्रत्याशियों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामलों की जानकारी दी है। एडीआर ने कुल 2,920 प्रत्याशियों के हलफनामे का विश्लेषण किया, जिनमें से 683 ने अपने खिलाफ आपराधिक मामलों की जानकारी दी।</p>
<p>ममता बनर्जी ने इस चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की वापसी का दावा करते हुए कहा कि कोई भी नहीं चाहता कि प्रदेश में भाजपा की सरकार बने। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि यह चुनाव राज्य को घुसपैठियों से मुक्त करने का अवसर है। उन्होंने दावा किया कि अगर भाजपा चुनाव जीतती है तो हर लाख एक लाख युवाओं को नौकरियां दी जाएंगी।</p>
<p><strong>तमिलनाडुः सभी 234 सीटों के लिए मतदान</strong></p>
<p>तमिलनाडु विधानसभा में 234 सीटें हैं। यहां बहुमत सरकार बनाने के लिए 118 सीटों की जरूरत है। वर्ष 2021 के चुनाव में यहां डीएमके को 133, एआईडीएमके को 66, कांग्रेस को 18, पीएमके को 5, भाजपा को 4, वीसीके को 4, सीपीएम को 2 और सीपीआई को 2 सीटों पर जीत मिली थी। फिलहाल डीएमके और उसके सहयोगी दलों के पास 158 सीटें हैं। इस गठबंधन में डीएमके के अलावा कांग्रेस, सीपीएम, सीपीआई, एमडीएमके जैसी पार्टियां हैं।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x_69e77f0bbec53.jpg" alt="" /></p>
<p>तमिलनाडु में लगभग 18 प्रतिशत उम्मीदवारों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज होने की जानकारी दी है। यहां 25 प्रतिशत उम्मीदवारों के पास एक करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति है। एडीआर ने यहां के कुल 3,992 उम्मीदवारों के हलफनामों का विश्लेषण किया। इनमें से 722 यानी 18% उम्मीदवारों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें भी 404 (10%) उम्मीदवारों ने गंभीर आपराधिक मामलों की जानकारी दी है।</p>
<p>डीएमके के नेतृत्व वाले सेक्युलर प्रोग्रेसिव एलायंस (एसपीए) ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में महिलाओं को प्रतिमाह दी जाने वाली राशि बढ़ाकर 2000 रुपये करने, वृद्धावस्था पेंशन की राशि 1200 से बढ़ा कर 2000 रुपये करने और विकलांगों के लिए 2500 रुपये प्रतिमाहा देने का वादा किया है। इसने राज्य सरकार की बीमा स्कीम के तहत बीमित राशि 15 लाख रुपये करने और गरीबों के लिए 10 लाख घर बनाने जैसे वादे भी किए हैं। कृषि क्षेत्र की बात करें तो इस एलायंस ने 20 लाख किसानों को फ्री पंप सेट देने, धान और गन्ने का खरीद मूल्य बढ़ाने, दूध के खरीद मूल्य में 5 रुपये प्रति लीटर का इजाफा करने और मछुआरों को आर्थिक सहायता देने जैसे वादे किए हैं। स्वयं सहायता समूहों को 5 लाख रुपये तक ब्याज मुक्त लोन देने का वादा भी है।</p>
<p>एआईएडीएमके के नेतृत्व वाले एलायंस ने महिलाओं को प्रतिमाह 2000 रुपये देने, हर परिवार को महंगाई से राहत के लिए 10000 रुपये देने, बेरोजगार ग्रेजुएट को प्रतिमाह 2000 रुपये की सहायता, कामकाजी महिलाओं को दोपहिया वाहन खरीदने के लिए 25000 रुपये की मदद और वरिष्ठ नागरिकों के लिए पेंशन राशि बढ़ाकर 2000 रुपये करने जैसे वादे किए हैं। इसने सब्सिडी वाले सरकारी क्लिनिक की संख्या बढ़ाने और चरणबद्ध तरीके से शराब की दुकानें बंद करने का भी वादा किया है। इसके अलावा धान और गन्ने का खरीद मूल्य बढ़ाने तथा राशन की दुकानों पर मुफ्त में दाल और खाद्य तेल वितरित करने का वादा भी है।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e77e3a17621.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ पश्चिम बंगाल में पहले चरण और तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार थमा, 23 अप्रैल को वोटिंग ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e77e3a17621.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[वर्ष 2026 में भारत की अर्थव्यवस्था 6.4% की दर से बढ़ेगीः यूएन रिपोर्ट]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/un-report-sees-indian-economy-to-grow-6.4-percent-in-2026.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 21 Apr 2026 13:10:45 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/un-report-sees-indian-economy-to-grow-6.4-percent-in-2026.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><strong>-ग्रामीण खपत के कारण 2025 में 7.4% की मजबूत वृद्धि दर हासिल करने में सफलता</strong></p>
<p>संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत की अर्थव्यवस्था लगातार मजबूती के साथ आगे बढ़ती रहेगी। वर्ष 2026 में आर्थिक वृद्धि दर 6.4 प्रतिशत और 2027 में 6.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है। वहीं, महंगाई दर भी नियंत्रित दायरे में रहने की संभावना है। इसके 2026 में 4.4 प्रतिशत और 2027 में 4.3 प्रतिशत रहने का अनुमान है।</p>
<p>संयुक्त राष्ट्र के इकोनॉमिक एंड सोशल कमीशन फॉर एशिया एंड द पैसिफिकि (ESCAP) के मुताबिक, दक्षिण और दक्षिण-पश्चिम एशिया की अर्थव्यवस्थाओं ने 2025 में 5.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की, जो 2024 के 5.2 प्रतिशत से थोड़ी अधिक है। इस वृद्धि में भारत के मजबूत प्रदर्शन की प्रमुख भूमिका रही।</p>
<p>भारत ने 2025 में 7.4 प्रतिशत की प्रभावशाली आर्थिक वृद्धि हासिल की। यह वृद्धि मुख्य रूप से मजबूत घरेलू मांग, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ती खपत के कारण संभव हुई। इसके अलावा, जीएसटी दरों में कमी और अमेरिका द्वारा टैरिफ बढ़ाए जाने से पहले निर्यात में तेजी ने भी आर्थिक विस्तार को समर्थन दिया।</p>
<p>हालांकि, 2025 की दूसरी छमाही में आर्थिक वृद्धि की रफ्तार धीमी पड़ गई, क्योंकि ऊंचे टैरिफ लगाए जाने के बाद अमेरिका को होने वाले निर्यात में तेज गिरावट आई। इसके बावजूद, सेवा क्षेत्र अर्थव्यवस्था को सहारा देने वाला प्रमुख स्तंभ बना रहा।</p>
<p>रिपोर्ट में बताया गया है कि व्यापारिक तनाव और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के कारण एशिया-प्रशांत के विकासशील देशों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) का प्रवाह घटा है। इसके बावजूद, भारत अब भी बड़े पैमाने पर ग्रीनफील्ड निवेश आकर्षित कर रहा है। इसने पहली तीन तिमाहियों में लगभग 50 अरब डॉलर का निवेश हासिल किया है।</p>
<p>रेमिटेंस घरेलू खपत को समर्थन देने का एक महत्वपूर्ण स्रोत बने हुए हैं। हालांकि, जनवरी 2026 से अमेरिका द्वारा रेमिटेंस पर 1% कर लगाए जाने के कारण भारत को कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। इसके बावजूद, 2024 में 137 अरब डॉलर प्राप्त कर भारत दुनिया का सबसे बड़ा रेमिटेंस प्राप्त करने वाला देश बना हुआ है।</p>
<p>रिपोर्ट में स्वच्छ ऊर्जा के बढ़ते महत्व पर भी जोर दिया गया है। अंतरराष्ट्रीय रिन्यूएबल एनर्जी एजेंसी के अनुमानों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर हरित क्षेत्र में ग्रीन नौकरियों की संख्या 1.66 करोड़ तक पहुंच चुकी है, जिनमें से लगभग 13 लाख नौकरियां भारत में हैं।</p>
<p>रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि भारत की प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजना जैसी पहलें सौर ऊर्जा, बैटरी और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे प्रमुख क्षेत्रों में विनिर्माण को बढ़ावा दे रही हैं। एशिया-प्रशांत क्षेत्र में लक्षित औद्योगिक नीतियां टिकाऊ और स्वच्छ प्रौद्योगिकी आधारित विकास की दिशा में तेजी ला रही हैं।</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/05/image_750x500_62964a3a632ef.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ वर्ष 2026 में भारत की अर्थव्यवस्था 6.4% की दर से बढ़ेगीः यूएन रिपोर्ट ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/05/image_750x500_62964a3a632ef.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[दवाओं, एंटीबैक्टीरियल और कैंसर अनुसंधान में मददगार बना एक खरपतवार]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/agritech/a-weed-turned-into-tool-to-aid-drugs-antibacterial-and-cancer-research.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 21 Apr 2026 12:19:55 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/agritech/a-weed-turned-into-tool-to-aid-drugs-antibacterial-and-cancer-research.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>नगालैंड यूनिवर्सिटी और फजल अली कॉलेज के शोधकर्ताओं ने राज्य की सबसे समस्याग्रस्त आक्रामक खरपतवारों में से एक को स्वास्थ्य सेवाओं और सस्टेनेबल मैन्युफैक्चरिंग के लिए एक शक्तिशाली साधन में बदल दिया है। इस इनोवेशन से दवा उद्योग, चिकित्सा और हरित उद्योगों में बड़े पैमाने पर उपयोग की संभावनाएं खुली हैं।</p>
<p>शोध दल ने एक पर्यावरण-अनुकूल विधि विकसित की है, जिसके जरिए मिकानिया मिक्रांथा (Mikania micrantha) नामक खरपतवार को सिल्वर नैनोपार्टिकल्स में परिवर्तित किया जाता है। ये नैनोकण दवा उत्पादन को तेज करने, हानिकारक बैक्टीरिया से लड़ने और कैंसर-रोधी प्रभाव दिखाने में सक्षम हैं। खास बात यह है कि इस प्रक्रिया में पारंपरिक नैनोमैटेरियल निर्माण में इस्तेमाल होने वाले विषैले रसायनों का उपयोग नहीं किया जाता।</p>
<p>शोधकर्ताओं ने &ldquo;ग्रीन केमिस्ट्री&rdquo; दृष्टिकोण अपनाया, जो खतरनाक औद्योगिक प्रक्रियाओं की जगह पौधों पर आधारित विज्ञान का उपयोग करता है। पत्तियों के अर्क से तैयार किए गए ये अत्यधिक स्थिर सिल्वर नैनोपार्टिकल अल्ट्रा-फास्ट उत्प्रेरक (कैटेलिस्ट) की तरह काम करते हैं और 30 से 180 सेकंड में &lsquo;इमिडाजोल्स&rsquo; नामक आवश्यक दवा घटकों का निर्माण कर सकते हैं। ये यौगिक विभिन्न चिकित्सा क्षेत्रों में उपयोग होने वाली कई दवाओं का आधार हैं।</p>
<p>इस शोध को अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (ANRF) और नेशनल फेलोशिप फॉर शेड्यूल्ड ट्राइब स्टूडेंट्स का समर्थन प्राप्त हुआ। इसके निष्कर्ष बायोकेमिलकल एंड बायोफिजिकल रिसर्च कम्युनिकेशंस में प्रकाशित किए गए। इस शोध पत्र के सह-लेखकों में मंथाए सी. फोम, फितोविली सुमी, बेटोकली के. झिमोमी, खोंजानी यंथन, टोंगे डब्ल्यू.डब्ल्यू., शोकिप तुमटिन और तोविशे फुचो शामिल हैं।</p>
<p><strong>पर्यावरणीय चुनौती का समाधान</strong></p>
<p>मिकानिया मिक्रांथा लंबे समय से नगालैंड में समस्याओं का कारण रही है। यह शोध इस आक्रामक खरपतवार को उन्नत चिकित्सा और औद्योगिक उपयोगों के लिए उच्च मूल्य वाले कच्चे माल में बदलने का मार्ग दिखाता है। पूर्वी हिमालय का हिस्सा होने के कारण नगालैंड की अनूठी जैव-विविधता का उपयोग करते हुए यह अध्ययन दर्शाता है कि स्थानीय पौधों की प्रजातियां वैश्विक स्तर पर उपयोगी वैज्ञानिक नवाचार प्रदान कर सकती हैं। इस क्षेत्र के पौधों के विशेष रासायनिक गुणों ने नैनोपार्टिकल की दक्षता और स्थिरता बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया, जो इस तरह की पहली उपलब्धि है।</p>
<p>नगालैंड यूनिवर्सिटी के कुलपति जगदीश के. पटनायक ने कहा, &ldquo;यह अभिनव अध्ययन दवा संश्लेषण के लिए एक तेज और पर्यावरण-अनुकूल तरीका प्रस्तुत करता है, साथ ही इसमें मजबूत जीवाणुरोधी और कैंसर-रोधी क्षमता भी दिखाई देती है। इस तरह का शोध वैश्विक स्वास्थ्य चुनौतियों के समाधान में विश्वविद्यालय की वैज्ञानिक उत्कृष्टता और टिकाऊ दृष्टिकोण की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।&rdquo;</p>
<p>इस अध्ययन का सबसे त्वरित प्रभाव औषधि निर्माण के क्षेत्र में देखने को मिलता है। ये नैनोपार्टिकल पुन: उपयोग किए जा सकने वाले उत्प्रेरक (कैटेलिटिक) इंजन की तरह काम करते हैं, जिससे दवाओं के प्रमुख घटकों का उत्पादन अधिक तेज, स्वच्छ और कम लागत में संभव होता है। महंगे और विषैले रसायनों पर निर्भर पारंपरिक तरीकों के विपरीत यह विधि उद्योग के लिए एक स्केलेबल और टिकाऊ विकल्प प्रदान करती है।</p>
<p>महत्वपूर्ण बात यह है कि इन नैनोपार्टिकल का कम से कम छह बार उपयोग किया जा सकता है, और इस दौरान उनकी दक्षता में ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है। इससे उत्पादन लागत और रासायनिक अपशिष्ट दोनों में उल्लेखनीय कमी आती है, जो बड़े पैमाने पर दवा निर्माण के लिए बेहद लाभकारी है।</p>
<p>उत्पादन के अलावा, इन नैनोकणों ने खतरनाक रोगजनकों, जैसे स्टेफाइलोकॉकस ऑरियस (Staphylococcus aureus, अस्पताल संक्रमण का प्रमुख कारण) और यर्सिनिया पेस्टिस (Yersinia pestis) के खिलाफ मजबूत जीवाणुरोधी प्रभाव दिखाया। इससे एंटीमाइक्रोबियल कोटिंग, घाव के उपचार वाले उत्पादों और संक्रमण नियंत्रण प्रणालियों में इनके उपयोग की संभावनाएँ खुलती हैं। साथ ही, मानव कोलन कैंसर कोशिकाओं पर किए गए प्रयोगशाला परीक्षणों में पाया गया कि ये नैनोपार्टिकल कैंसर कोशिकाओं की जीवित रहने की क्षमता को काफी कम कर देते हैं।&nbsp;</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e71dbff3cee.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ दवाओं, एंटीबैक्टीरियल और कैंसर अनुसंधान में मददगार बना एक खरपतवार ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e71dbff3cee.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[केंद्र सरकार ने अतिरिक्त 25 लाख टन गेहूं निर्यात को दी मंजूरी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/latest-news/central-government-has-approved-the-export-of-an-additional-2.5-million-tonnes-of-wheat.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 20 Apr 2026 21:25:04 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/latest-news/central-government-has-approved-the-export-of-an-additional-2.5-million-tonnes-of-wheat.html</guid>
        <description><![CDATA[ <div dir="auto"><span>केंद्र सरकार ने कृषि निर्यात से जुड़ा अहम फैसला लेते हुए अतिरिक्त 25 लाख टन गेहूं निर्यात को मंजूरी दे दी है। इस फैसले से घरेलू बाजार में स्थिरता बनी रहेगी और किसानों को उपज का बेहतर मूल्य मिलने की उम्मीद है। </span><span>इस साल यह तीसरा मौका है जब सरकार ने गेहूं के निर्यात का रास्ता खोला है। </span></div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के अनुसार, सरकार ने अतिरिक्त 25 लाख टन गेहूं के निर्यात को मंजूरी दी है। यह निर्णय गेहूं के उत्पादन, स्टॉक उपलब्धता और बाजार कीमतों के रुझानों की विस्तृत समीक्षा के बाद लिया गया है।&nbsp;</div>
<div dir="auto"><span></span></div>
<div dir="auto"><span>रबी सीजन 2025-26 में गेहूं की बुवाई का क्षेत्रफल बढ़कर 334 लाख हेक्टेयर हो गया है, जो पिछले साल के 328 लाख हेक्टेयर से अधिक है। कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के दूसरे अग्रिम अनुमानों के मुताबिक, वर्ष 2025-26 में गेहूं का उत्पादन रिकॉर्ड 1202 लाख टन रहने का अनुमान है। </span></div>
<div dir="auto"><strong></strong></div>
<div dir="auto"><strong>तीसरी बार निर्यात खुला </strong></div>
<div dir="auto"><span><strong>जनवरी 2026:</strong> 5 लाख टन गेहूं उत्पादों (आटा आदि) के निर्यात को मंजूरी। </span></div>
<div dir="auto"><span><strong>फरवरी 2026:</strong> 25 लाख टन गेहूं और अतिरिक्त 5 लाख टन गेहूं उत्पादों की अनुमति। </span></div>
<div dir="auto"><span><strong>अप्रैल 2026:</strong> अब अतिरिक्त 25 लाख टन गेहूं के निर्यात को मंजूरी।</span></div>
<div dir="auto"><span>इस तरह कुल 50 लाख टन गेहूं और 10 लाख टन गेहूं उत्पादों के निर्यात की अनुमति दी गई है। हालांकि, </span><span>गेहूं का निर्यात अभी भी प्रतिबंधित श्रेणी में है। गेहूं निर्यात के संबंध में DGFT विस्तृत दिशा-निर्देश जारी करेगा। </span></div>
<div dir="auto"><strong></strong></div>
<div dir="auto"><strong>गेहूं का&nbsp;पर्याप्त स्टॉक </strong></div>
<div dir="auto"><span>1 अप्रैल 2026 तक भारतीय खाद्य निगम (FCI) के केंद्रीय पूल में गेहूं का कुल स्टॉक लगभग 182 लाख टन रहने का अनुमान है। निजी क्षेत्र के पास भी पिछले साल की तुलना में करीब 32 लाख टन अधिक स्टॉक है। सरकार का कहना है कि निर्यात अनुमति से घरेलू खाद्य सुरक्षा पर कोई असर नहीं पड़ेगा। </span></div>
<div dir="auto"><strong></strong></div>
<div dir="auto"><strong>कीमतों को स्थिर रखने का प्रयास </strong></div>
<div dir="auto"><span>यह फैसला किसानों को गेहूं का बेहतर दाम दिलाने, कीमतों को स्थिर रखने और आवक बढ़ने के दौरान दबाव में बिक्री रोकने में मददगार साबित हो सकता है। </span><span>मंडियों में गेहूं की आवक बढ़ने के साथ ही रिकॉर्ड उत्पादन के अनुमानों को देखते हुए कई इलाकों में व्यापारी एमएसपी से कम भाव पर गेहूं खरीद रहे थे।&nbsp;</span></div>
<div dir="auto"></div> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/04/image_750x500_6803a7a5af4f9.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ केंद्र सरकार ने अतिरिक्त 25 लाख टन गेहूं निर्यात को दी मंजूरी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/04/image_750x500_6803a7a5af4f9.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[IMD अलर्ट: उत्तर व मध्य भारत में अगले 4&amp;#45;5 दिनों भीषण लू चलने की संभावना]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/imd-alert-severe-heat-wave-likely-in-north-and-central-india-for-next-4-5-days.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 20 Apr 2026 18:16:15 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/imd-alert-severe-heat-wave-likely-in-north-and-central-india-for-next-4-5-days.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) <span>ने देश के कई हिस्सों में अगले </span>4-5 <span>दिनों के दौरान भयंकर लू (सीवियर हीटवेव) चलने और तापमान में तेजी से बढ़ोतरी की चेतावनी जारी की है। उत्तर-पश्चिम</span>, <span>मध्य और पूर्वी भारत के कुछ इलाकों में लू की स्थिति बनी रहने की संभावना है</span>, <span>जिससे जनजीवन प्रभावित होने की आशंका है। </span></p>
<p>आईएमडी के अनुसार, राजस्थान, <span>उत्तर प्रदेश</span>, <span>हरियाणा</span>, <span>पंजाब और मध्य प्रदेश के कई इलाकों में दिन का तापमान सामान्य से </span>3 <span>से </span>5 <span>डिग्री सेल्सियस तक अधिक रह सकता है। कुछ स्थानों पर तापमान </span>45 <span>डिग्री सेल्सियस या उससे ऊपर पहुंचने की संभावना जताई गई है।</span></p>
<p>दिल्ली-एनसीआर, <span>पंजाब</span>, <span>हरियाणा</span>, <span>बिहार और गुजरात के कुछ हिस्सों में भी गर्मी का प्रकोप बढ़ने वाला है। कई शहरों में दिन का तापमान </span>40 <span>डिग्री से ऊपर पहुंच चुका है। </span></p>
<p>मौसम विभाग ने विशेष रूप से दोपहर के समय लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी है। बच्चों, <span>बुजुर्गों और पहले से बीमार व्यक्तियों को लू से बचाव के लिए घर में रहने</span>, <span>पर्याप्त पानी पीने और धूप में बाहर निकलने से बचने की सलाह दी गई है।</span></p>
<p>विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार बढ़ती गर्मी और लू की स्थिति कृषि कार्यों पर भी असर डाल सकती है, <span>खासकर गेहूं की कटाई और भंडारण के दौरान किसानों को अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत होगी।</span></p>
<p>मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि इस साल अप्रैल-जून में सामान्य से अधिक लू के दिन रहने की संभावना है। कुछ क्षेत्रों में आने वाले दिनों में गर्म हवाओं की तीव्रता और बढ़ सकती है। ऐसे में स्थानीय प्रशासन को जरूरी तैयारियां करने और लोगों को जागरूक करने के निर्देश दिए गए हैं।</p>
<p>मौसम विभाग ने लोगों से अपील की है कि वे आधिकारिक मौसम अपडेट पर नजर बनाए रखें और स्वास्थ्य संबंधी सावधानियों का पालन करें, <span>ताकि लू के प्रभाव से बचा जा सके।</span></p>
<p>&nbsp;</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e61fd003e8c.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ IMD अलर्ट: उत्तर व मध्य भारत में अगले 4-5 दिनों भीषण लू चलने की संभावना ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e61fd003e8c.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[आलू की सरकारी खरीद का ऐलान होते ही गिरे दाम, 6.5 रुपये किलो में किसानों की लागत निकलनी भी मुश्किल]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/states/potato-prices-plummeted-after-government-procurement-announced-farmers-struggling-to-recover-costs.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 20 Apr 2026 17:31:52 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/states/potato-prices-plummeted-after-government-procurement-announced-farmers-struggling-to-recover-costs.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p data-start="106" data-end="485">इस साल उत्तर प्रदेश के आलू उत्पादक किसान उपज की गिरती कीमतों से परेशान हैं। फरवरी में आलू की खुदाई शुरू होने के समय से ही किसान राहत की मांग कर रहे हैं। अब केंद्र सरकार ने <strong>बाजार हस्तक्षेप योजना (MIS)</strong> के तहत उत्तर प्रदेश सरकार के आलू खरीद प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इसके तहत राज्य में <strong>20 लाख टन</strong> आलू की खरीद <strong>6,500 रुपये</strong> प्रति टन यानी 6.5 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव पर की जाएगी।</p>
<p data-start="487" data-end="807">हालांकि, केंद्र सरकार द्वारा 6,500 रुपये प्रति टन की दर से आलू खरीद की घोषणा किसानों के लिए फायदे के बजाय नुकसान का कारण बनती दिख रही है। सरकारी खरीद में 650 रुपये प्रति क्विंटल का रेट घोषित होते ही उत्तर प्रदेश की मंडियों में आलू के भाव 50-100 रुपये प्रति क्विंटल तक गिरकर 600-700 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास आ गए हैं।&nbsp;</p>
<p data-start="809" data-end="1193">आलू की खेती और भंडारण से जुड़े उत्तर प्रदेश के आगरा जिले के <strong>डूंगर सिंह खंडौली</strong> ने <em>रूरल वॉयस</em> को बताया कि इस साल देश में आलू के बंपर उत्पादन के चलते कई वर्षों बाद कीमतों में इतनी गिरावट आई है। फरवरी में खुदाई के समय मंडियों में आलू के खरीदार ही नहीं थे और भाव गिरकर 200-500 रुपये प्रति क्विंटल तक गिर गए थे। उनका कहना है कि यदि सरकार उस समय सरकारी खरीद का ऐलान करती तो स्थिति बेहतर हो सकती थी।</p>
<p data-start="1195" data-end="1464">डूंगर सिंह के अनुसार, मंडियों में पहले ही आलू के भाव 600-800 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास चल रहे थे। ऐसे में सरकार द्वारा 650 रुपये प्रति क्विंटल के भाव पर खरीद की घोषणा से दाम और नीचे आ गए। उनका कहना है कि सरकारी घोषणा ने किसानों को फायदे की बजाय नुकसान पहुंचा दिया। उनका कहना है कि पिछले चार साल में इस साल आलू किसान की हालत सबसे अधिक खराब है और वह बड़े नुकसान में है।</p>
<p data-start="1466" data-end="1818">अब तक अधिकांश आलू कोल्ड स्टोरेज में पहुंच चुका है। इसके लिए किसानों को लगभग 250 रुपये प्रति क्विंटल स्टोरेज, 65-70 रुपये प्रति क्विंटल बारदाना और 25-30 रुपये प्रति क्विंटल ढुलाई खर्च देना पड़ता है। ऐसे में 650 रुपये प्रति क्विंटल के रेट पर सरकारी खरीद में किसानों के लिए लागत निकालना भी मुश्किल है, जो कम से कम 1000-1200 रुपये प्रति क्विंटल बैठती है। अधिकांश आलू कोल्ड स्टोरेज में पहुंचने के बाद अब सरकारी खरीद कैसे होगी, इस पर भी सवाल उठ रहे हैं।&nbsp;</p>
<p data-start="1466" data-end="1818">जमीनी स्तर पर आलू खरीद की कोई खास तैयारियां दिखाई नहीं देती हैं। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि कहीं आलू खरीद महज घोषणा तक सीमित न रह जाए।</p>
<p data-start="1466" data-end="1818"><strong>किसान संगठनों ने उठाए सवाल&nbsp;</strong></p>
<p data-start="1820" data-end="2278">केंद्र सरकार द्वारा घोषित आलू खरीद दर का किसान संगठनों ने तीखा विरोध किया है। उनकी मांग है कि आलू की खरीद दर कम से कम 10-12 रुपये प्रति किलोग्राम होनी चाहिए। भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) के राष्ट्रीय प्रवक्ता <strong>राकेश टिकैत</strong> का कहना है कि सरकार आलू किसानों की मदद का दावा कर रही है, जबकि हकीकत यह है कि 6.5 रुपये प्रति किलो के भाव पर किसानों की लागत भी नहीं निकलेगी। बीज, खाद, सिंचाई, मजदूरी और अन्य बढ़ती लागत को देखते हुए इस रेट पर खरीद नाकाफी है। टिकैत ने आलू खरीद के मुद्दे पर मार्च के पहले सप्ताह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र भी लिखा था।&nbsp;</p>
<p data-start="2280" data-end="2305"><strong data-start="2280" data-end="2305">क्यों गिरे आलू के दाम</strong></p>
<p data-start="2307" data-end="2731">इस साल उत्तर प्रदेश के अलावा पश्चिम बंगाल, गुजरात और कर्नाटक में अधिक उत्पादन के कारण आलू की कीमतों में गिरावट देखी जा रही है। उत्तर प्रदेश के बाद आलू उत्पादन में पश्चिम बंगाल दूसरे स्थान पर है। वहां भी किसानों को 500 रुपये प्रति क्विंटल के ही दाम मिल पा रहे हैं। पिछले साल इन दिलों किसानों को आलू का भाव 1000-1500 रुपये प्रति क्विंटल के बीच मिला था, जबकि इस साल सीजन की शुरुआत में ही कीमतें 200-500 रुपये प्रति क्विंटल तक गिर गईं। फिलहाल देश में एक करोड़ टन से अधिक आलू कोल्ड स्टोरेज में रखा हुआ है, जबकि बाजार में भी पर्याप्त आपूर्ति होने से कीमतों पर दबाव बना हुआ है।</p>
<p data-start="2733" data-end="2970">आलू की कुफरी ख्याति, कुफरी मोहन और कुफरी गौरव जैसी अधिक उत्पादन देने वाली लेकिन कम शेल्फ लाइफ वाली किस्मों के दाम 500-700 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास हैं, जबकि कुफरी बहार, चिप्सोना और लालिमा जैसी किस्मों के दाम 700-800 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास चल रहे हैं। यूपी से इन दिनों आलू की आपूर्ति दक्षिण भारत के राज्यों में होती थी, लेकिन कर्नाटक में आलू उत्पादन बढ़ने से इसमें गिरावट आई है। फिलहाल यूपी का आलू मुख्यतः महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में जा रहा है।&nbsp;</p>
<p data-start="2733" data-end="2970"></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e612d20965c.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ आलू की सरकारी खरीद का ऐलान होते ही गिरे दाम, 6.5 रुपये किलो में किसानों की लागत निकलनी भी मुश्किल ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e612d20965c.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[यूपी: गेहूं खरीद में किसान को राहत, बिना फार्मर रजिस्ट्री बेच सकेंगे उपज]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/states/relief-for-farmers-in-wheat-procurement-in-up-can-sell-produce-without-farmer-registry.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 20 Apr 2026 14:18:28 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/states/relief-for-farmers-in-wheat-procurement-in-up-can-sell-produce-without-farmer-registry.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>उत्तर प्रदेश सरकार ने गेहूं खरीद को लेकर किसानों को राहत दी है। अब किसान बिना फार्मर रजिस्ट्री (किसान आईडी) के भी सरकारी खरीद केंद्रों पर अपनी उपज बेच सकेंगे। यह फैसला उन किसानों के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जो किसी वजह से पंजीकरण नहीं करा पाए हैं।</p>
<p>उत्तर प्रदेश में गेहूं खरीद की गति अपेक्षाकृत धीमी रही है। कई मंडियों और खरीद केंद्रों पर अपेक्षित मात्रा में आवक नहीं हो पा रही थी। इसके साथ ही, पंजीकरण प्रक्रिया में आ रही दिक्कतों के कारण भी बड़ी संख्या में किसान खरीद से बाहर रह जा रहे थे। इन परिस्थितियों को देखते हुए सरकार ने नियमों में ढील देने का फैसला किया है।</p>
<p>मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से जारी सूचना के अनुसार, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गेहूं खरीद के संबंध में बड़ा निर्णय लेते हुए किसानों को राहत प्रदान की है। अब किसान बिना फार्मर रजिस्ट्री के भी अपना गेहूं सरकारी क्रय केंद्रों पर बेच सकेंगे। मुख्यमंत्री ने सभी जिलाधिकारियों को तत्काल प्रभाव से इस निर्णय को लागू करने के निर्देश दिए हैं, जिससे किसान पूर्व की भांति सुगमता से अपनी उपज बेच सकें।</p>
<p>हालांकि, यह फैसला खरीद शुरू होने के करीब 20 दिन बीत जाने के बाद लिया गया है। प्रदेश में गेहूं खरीद की रफ्तार काफी धीमी चल रही है। कई जिलों में केंद्रों पर तकनीकी समस्याएं, बारदाना की कमी, सर्वर डाउन आदि जैसी दिक्कतें आ रही हैं।</p>
<p>पहले शासन ने गेहूं खरीद के लिए फार्मर रजिस्ट्री को अनिवार्य कर दिया था, जिससे कई खरीद केंद्रों पर किसानों को दिक्कतें आ रही थीं। अब गेहूं खरीद के लिए सरकार ने फार्मर रजिस्ट्री की अनिवार्यता खत्म कर दी है। इससे खरीद में तेजी आने की उम्मीद है। यूपी सरकार ने बार 50 लाख टन गेहूं खरीदने का लक्ष्य रखा है।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e5e807e00f1.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ यूपी: गेहूं खरीद में किसान को राहत, बिना फार्मर रजिस्ट्री बेच सकेंगे उपज ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e5e807e00f1.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[FSSAI का निर्देश: खाद्य उत्पादों में अश्वगंधा की पत्तियों का इस्तेमाल प्रतिबंधित, केवल जड़ों के उपयोग की अनुमति]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/fssai-directive-use-of-ashwagandha-leaves-in-food-products-banned-only-roots-allowed.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 20 Apr 2026 12:37:53 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/fssai-directive-use-of-ashwagandha-leaves-in-food-products-banned-only-roots-allowed.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) <span>ने खाद्य उत्पाद बनाने वाली कंपनियों के लिए एक महत्वपूर्ण एडवाइजरी जारी की है। </span>FSSAI <span>ने स्पष्ट किया है कि कंपनियां हेल्थ सप्लीमेंट जैसे उत्पादों में केवल अश्वगंधा की जड़ों और उनके अर्क का ही उपयोग करें</span>,<span> जबकि इसकी पत्तियों या अर्क के इस्तेमाल पर पूरी तरह प्रतिबंध है।</span></p>
<p>प्राधिकरण ने निर्देश दिया है कि फूड बिजनेस ऑपरेटर्स (FBOs) <span>यह सुनिश्चित करें कि विशेष खाद्य उत्पादों में केवल अश्वगंधा की जड़ों और उनके अर्क का ही उपयोग किया जाए। यह उपयोग भी निर्धारित सीमाओं और अधिसूचित मानकों के अनुरूप होना चाहिए। </span></p>
<p>FSSAI <span>के संज्ञान में आया है कि कुछ कंपनियां अपने उत्पादों में अश्वगंधा की पत्तियों का इस्तेमाल कर रही हैं</span>, <span>जो मौजूदा नियमों के तहत मान्य नहीं है। <strong>खाद्य सुरक्षा एवं मानक (हेल्थ सप्लीमेंट</strong></span><strong>, <span>न्यूट्रास्यूटिकल्स</span>, <span>फंक्शनल फूड और नॉवेल फूड) विनियम</span>, 2016</strong> <span>के तहत केवल अश्वगंधा की जड़ों और उनके अर्क को ही निर्धारित सीमा के भीतर स्वास्थ्य पूरक और न्यूट्रास्युटिकल्स जैसे उत्पादों में उपयोग की अनुमति दी गई है। आयुष मंत्रालय ने भी </span>15 <span>अप्रैल</span>, 2026 <span>को जारी अपने एक पत्र में दवा निर्माताओं को केवल अश्वगंधा की जड़ों के इस्तेमाल का निर्देश दिया है। </span></p>
<p>वैज्ञानिक अध्ययनों में अश्वगंधा की पत्तियों के उपयोग को लेकर स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं जताई गई हैं । इन पत्तियों में रिएक्टिव विथेनोलाइड्स (reactive withanolides), <span>विशेष रूप से विथेफेरिन-ए (</span>Withaferin-A) <span>की मात्रा बहुत अधिक होती है</span>, <span>जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकती है। </span></p>
<p>अश्वगंधा (Withania somnifera) <span>का उपयोग आयुर्वेदिक दवाओं के अलावा न्यूट्रास्यूटिकल्स</span>, <span>सप्लीमेंट्स और अब हर्बल चाय</span>, <span>प्रोटीन मिश्रण</span>, <span>पोषण पाउडर तथा वेलनेस ड्रिंक्स जैसे फंक्शनल फूड उत्पादों में भी तेजी से बढ़ा है।</span></p>
<p>FSSAI <span>ने सभी फूड बिजनेस ऑपरेटरों को नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने को कहा है और चेतावनी दी है कि उल्लंघन की स्थिति में खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम</span>, 2006 <span>के तहत कार्रवाई की जाएगी। साथ ही राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के खाद्य सुरक्षा आयुक्तों को निगरानी बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं।</span>&nbsp;</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e5d09d06e0b.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ FSSAI का निर्देश: खाद्य उत्पादों में अश्वगंधा की पत्तियों का इस्तेमाल प्रतिबंधित, केवल जड़ों के उपयोग की अनुमति ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e5d09d06e0b.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[पश्चिम एशिया संकट और भारत के कृषि व्यापार की मुश्किलें]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/west-asia-conflict-puts-india-farm-trade-at-risk.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 20 Apr 2026 11:51:58 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/west-asia-conflict-puts-india-farm-trade-at-risk.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बारे में आम तौर पर तेल और उर्वरकों के दृष्टिकोण से चर्चा होती है। हालांकि ये पहलू महत्वपूर्ण हैं, लेकिन भारतीय कृषि के लिए चिंता का विषय यह भी है कि इन व्यवधानों का कृषि व्यापार, बाजार पहुंच और घरेलू मूल्य व्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ता है। पश्चिम एशिया केवल एक सामान्य निर्यात गंतव्य नहीं; यह भारत के सबसे महत्वपूर्ण कृषि बाजारों में से एक है। भारत के कुल कृषि निर्यात का लगभग 22% पश्चिम एशिया को ही जाता है। इस क्षेत्र को भारत के कुल 66.86 अरब डॉलर के निर्यात (2023-24 और 2024-25 का औसत) में से लगभग 16% कृषि और संबद्ध वस्तुओं (एचएस चैप्टर 1-23) का हिस्सा है। इससे स्पष्ट है कि यह क्षेत्र किसानों की आय और व्यापार स्थिरता दोनों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।</p>
<p>साथ ही, पश्चिम एशिया यूरोप और अन्य क्षेत्रों तक माल भेजने के लिए एक प्रमुख ट्रांजिट कॉरिडोर के रूप में भी कार्य करता है। इसलिए यहां किसी भी प्रकार का व्यवधान न केवल सीधे निर्यात को प्रभावित करता है, बल्कि उस व्यापक व्यापार ढांचे पर भी असर डालता है, जिस पर भारत निर्भर करता है।</p>
<p><strong>वैल्यू चेन, ऊर्जा और लागत का दबाव</strong></p>
<p>पश्चिम एशिया भारत के ऊर्जा आयात के लिए बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र बना हुआ है। वहां से आने वाले लगभग 78% आयात में खनिज तेल, बहुमूल्य धातु और रत्न शामिल हैं। इसके अलावा, भारत लगभग 31% उर्वरक आयात इसी क्षेत्र से करता है। हालांकि चिंता तत्काल आपूर्ति बाधित होने की नहीं है, बल्कि बढ़ती ऊर्जा कीमतों और शिपिंग जोखिमों के कारण आयात की कुल लागत (लैंडेड कॉस्ट) में वृद्धि की है।</p>
<p>यह बढ़ती लागत कृषि वैल्यू चेन के विभिन्न स्तरों पर असर डालती हैं। केवल खेत स्तर पर नहीं, बल्कि कटाई के बाद की प्रक्रियाओं जैसे सुखाने, भंडारण और प्रसंस्करण में भी ऊर्जा की अहम भूमिका होती है। उदाहरण के लिए, मक्का जैसी फसलों में गुणवत्ता बनाए रखने और बाजार मानकों को पूरा करने के लिए सुखाना आवश्यक होता है, जो अक्सर ईंधन या गैस आधारित प्रणालियों पर निर्भर करता है।</p>
<p>ऐसे में ऊर्जा लागत में वृद्धि या अनिश्चितता से हैंडलिंग लागत बढ़ सकती है और संचालन में बाधाएं उत्पन्न हो सकती हैं। इसका असर घरेलू आपूर्ति श्रृंखलाओं के साथ-साथ निर्यात की तैयारियों पर भी पड़ता है। ये अचानक आने वाले झटके नहीं, बल्कि धीरे-धीरे बढ़ने वाले दबाव हैं। ये झटके कम मुनाफे वाली फसलों के लिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं, खासकर तब जब निर्यात बाजार भी अनिश्चित हो जाएं।</p>
<p><strong>कृषि निर्यात: उच्च निर्भरता, सीमित घरेलू खपत</strong></p>
<p>भारत से पश्चिम एशिया को कृषि निर्यात में अनाज, मांस (विशेष रूप से भैंस का मांस) तथा कॉफी, चाय और मसाले प्रमुख हैं। इस क्षेत्र को होने वाले कुल निर्यात का 66% हिस्सा इन उत्पादों का है। ये ऐसे क्षेत्र हैं जहां कीमतों के निर्धारण में बाहरी मांग की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।</p>
<p>अनाज के मामले में समस्या संरचनात्मक है। भारत में समय-समय पर सरप्लस उत्पादन होता रहता है और घरेलू मांग अपेक्षाकृत कम लचीली है। ऐसे में जब निर्यात प्रवाह बाधित होता है या कम लाभकारी रह जाता है, तो इसका असर घरेलू कीमतों पर दबाव के रूप में सामने आता है। घरेलू महंगाई को नियंत्रित करने के लिए अतीत में लगाए गए निर्यात प्रतिबंध भी इस बात को दर्शाते हैं कि कीमतों पर इनका कितना गहरा प्रभाव होता है।</p>
<p>भैंस के मांस के निर्यात को लेकर चिंता और अधिक गंभीर है, क्योंकि यह लगभग पूरी तरह निर्यात-आधारित है और इसकी घरेलू खपत बहुत कम है। इसलिए पश्चिम एशिया जैसे प्रमुख बाजारों में किसी भी प्रकार का व्यवधान सीधे तौर पर कीमतों और मूल्य श्रृंखला को प्रभावित करता है। चाय और मसाले जैसी फसलों में प्रभाव अपेक्षाकृत कम हो सकता है, लेकिन फिर भी महत्वपूर्ण है। खासकर तब जब गुणवत्ता के प्रति संवेदनशील निर्यात समय पर आपूर्ति और स्थिर मांग पर निर्भर करते हैं।</p>
<p><strong>खाद्य सुरक्षा की परस्पर निर्भरता और भारत की भूमिका</strong></p>
<p>इस व्यापार का महत्व एकतरफा नहीं है। पश्चिम एशिया संरचनात्मक रूप से खाद्य आयात पर निर्भर है, विशेष रूप से चावल जैसे मुख्य खाद्य पदार्थों और प्रोटीन स्रोतों के लिए। इसलिए आपूर्तिकर्ता के रूप में भारत की भूमिका व्यापक खाद्य सुरक्षा परिदृश्य में निहित है। भारत से होने वाली सतत आपूर्ति इस क्षेत्र में उपलब्धता और कीमतों की स्थिरता में योगदान देती है। उदाहरण के लिए, ईरान अपनी घरेलू चावल खपत का लगभग 30% आयात के माध्यम से पूरा करता है, जिसमें से करीब 43% आपूर्ति भारत से होती है। ऐसे में व्यापार प्रवाह में व्यवधान न केवल निर्यातकों के लिए, बल्कि आयात करने वाले देशों की खाद्य सुरक्षा के लिए भी गंभीर संकट पैदा कर सकते हैं।</p>
<p><strong>आर्थिक सहभागिता में किसान</strong></p>
<p>एक महत्वपूर्ण लेकिन अक्सर कम आंका जाने वाला पहलू यह है कि पश्चिम एशिया में भारत की स्थिति मूल रूप से उसके किसानों की सरप्लस उत्पादन क्षमता पर आधारित है। इसी अतिरिक्त उत्पादन ने भारत को इस क्षेत्र के लिए आवश्यक खाद्य वस्तुओं का एक विश्वसनीय आपूर्तिकर्ता बनाया है। वास्तव में, किसान केवल घरेलू बाजारों के सहभागी नहीं हैं, बल्कि वे भारत की बाहरी आर्थिक सहभागिता के भी प्रमुख साझीदार हैं।</p>
<p>आवश्यक वस्तुओं के मामले में व्यापारिक संबंध केवल नीतियों या समझौतों के माध्यम से नहीं, बल्कि निरंतर और समय पर आपूर्ति की विश्वसनीयता के आधार पर भी टिकते हैं। यही आधार भारत को इस क्षेत्र के विभिन्न देशों के साथ विश्वास बनाए रखने में सक्षम बनाता है। हालांकि यह स्थिति स्वतः नहीं बनती। इसके लिए प्रतिस्पर्धात्मकता बनाए रखना, लागत का प्रबंधन करना और विश्वसनीयता सुनिश्चित करना आवश्यक है। ये सभी पहलू तब और चुनौतीपूर्ण हो जाते हैं जब व्यापार की परिस्थितियां बाधित होती हैं।</p>
<p><strong>निष्कर्ष</strong></p>
<p>पश्चिम एशिया में जारी युद्ध यह दर्शाता है कि कृषि व्यापार में व्यवधान केवल तात्कालिक कमी का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह अनिश्चितता, बढ़ती लागत और कीमत पर पड़ने वाले दबाव से अधिक जुड़ा हुआ है। भारत के लिए मुख्य चिंता किसानों की आय पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर है। अनाज और भैंस के मांस जैसे उत्पादों में, जहां घरेलू खपत सीमित है, निर्यात बाजारों में व्यवधान सीधे तौर पर कीमतों पर गिरावट का दबाव बना सकता है। वहीं पश्चिम एशिया के लिए चिंता का स्वरूप अलग है, लेकिन वह भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उसकी चिंता खाद्य सुरक्षा को लेकर है क्योंकि यह क्षेत्र आवश्यक खाद्य वस्तुओं के लिए आयात पर निर्भर है।</p>
<p>यह परस्पर निर्भरता एक संतुलित और सावधानीपूर्वक नीतिगत प्रतिक्रिया की आवश्यकता को रेखांकित करती है। उत्पादन और मूल्य श्रृंखला के स्तर पर, सिंचाई, प्रसंस्करण और फसल कटाई के बाद के कार्यों में नवीकरणीय ऊर्जा के अधिक उपयोग से तथा जैव उर्वरकों और हरित खाद का इस्तेमाल बढ़ाकर ऊर्जा झटकों के प्रति संवेदनशीलता को कम किया जा सकता है। इससे लागत कम करने में मदद मिलेगी।</p>
<p>व्यापार के मोर्चे पर, निर्यात बास्केट और गंतव्य देशों में विविधता लाने की आवश्यकता है। कुछ चुनिंदा वस्तुओं का विशिष्ट बाजारों में अत्यधिक केंद्रित रहना जोखिम को बढ़ाता है। जब व्यवधान उत्पन्न होते हैं, तो वैकल्पिक बड़े बाजारों को तेजी से खोजना या सरप्लस को घरेलू स्तर पर खपाना आसान नहीं होता, जिससे किसानों की आय प्रभावित हो सकती है।</p>
<p>तेजी से अनिश्चित होते वैश्विक परिदृश्य में कृषि व्यापार को बनाए रखने के लिए केवल उत्पादन क्षमता ही पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि मूल्य श्रृंखला और बाजार पहुंच, दोनों में लचीलापन आवश्यक होगा। तभी देश के भीतर किसानों की आय और हमारे व्यापारिक साझीदार क्षेत्रों में खाद्य सुरक्षा दोनों सुनिश्चित की जा सकेगी।&nbsp;</p>
<p><em>(स्मिता सिरोही आईसीएआर नेशनल प्रोफेसर, एम.एस. स्वामीनाथन चेयर हैं। लव त्यागी आईसीएआर-एनआईएपी में यंग प्रोफेशनल हैं)</em></p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e332061d890.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ पश्चिम एशिया संकट और भारत के कृषि व्यापार की मुश्किलें ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e332061d890.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[गेहूं खरीद की सुस्त शुरुआत, पिछले साल से करीब 32 लाख टन कम अनाज की खरीद]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/wheat-procurement-gets-off-to-a-sluggish-start-with-about-3.2-million-tonnes-less-grain-procured-than-last-year.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 19 Apr 2026 08:57:54 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/wheat-procurement-gets-off-to-a-sluggish-start-with-about-3.2-million-tonnes-less-grain-procured-than-last-year.html</guid>
        <description><![CDATA[ <div class="flex flex-col text-sm pb-25">
<section class="text-token-text-primary w-full focus:outline-none [--shadow-height:45px] has-data-writing-block:pointer-events-none has-data-writing-block:-mt-(--shadow-height) has-data-writing-block:pt-(--shadow-height) [&amp;:has([data-writing-block])&gt;*]:pointer-events-auto scroll-mt-[calc(var(--header-height)+min(200px,max(70px,20svh)))]" dir="auto" data-turn-id="request-WEB:be5abc18-0a62-4f71-8447-dd3a7f854f2b-18" data-testid="conversation-turn-4" data-scroll-anchor="true" data-turn="assistant">
<div class="text-base my-auto mx-auto pb-10 [--thread-content-margin:var(--thread-content-margin-xs,calc(var(--spacing)*4))] @w-sm/main:[--thread-content-margin:var(--thread-content-margin-sm,calc(var(--spacing)*6))] @w-lg/main:[--thread-content-margin:var(--thread-content-margin-lg,calc(var(--spacing)*16))] px-(--thread-content-margin)">
<div class="[--thread-content-max-width:40rem] @w-lg/main:[--thread-content-max-width:48rem] mx-auto max-w-(--thread-content-max-width) flex-1 group/turn-messages focus-visible:outline-hidden relative flex w-full min-w-0 flex-col agent-turn">
<div class="flex max-w-full flex-col gap-4 grow">
<div data-message-author-role="assistant" data-message-id="a56bdb6c-3d7d-4f73-8313-1ffbe4c58082" dir="auto" data-message-model-slug="gpt-5-3" class="min-h-8 text-message relative flex w-full flex-col items-end gap-2 text-start break-words whitespace-normal outline-none keyboard-focused:focus-ring [.text-message+&amp;]:mt-1" data-turn-start-message="true" tabindex="0">
<div class="flex w-full flex-col gap-1 empty:hidden">
<div class="markdown prose dark:prose-invert w-full wrap-break-word light markdown-new-styling">
<p data-start="103" data-end="375">भारत में रबी विपणन सत्र (RMS) 2026-27 के लिए गेहूं की सरकारी खरीद की शुरुआत काफी सुस्त रही है। 1 अप्रैल से शुरू हुए खरीद सीजन में 16 अप्रैल तक देशभर में कुल 51.34 लाख टन गेहूं की खरीद हुई है, जो पिछले सीजन की समान अवधि के 83.57 लाख टन की तुलना में करीब 38 प्रतिशत कम है।</p>
<p data-start="377" data-end="658">इस साल गेहूं कटाई के दौरान कई राज्यों में बेमौसम बारिश से उपज भीग गई और कटाई में बाधा पहुंची। साथ ही, किसानों को खरीद प्रक्रिया में भी कई दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। हरियाणा और पंजाब में गेहूं खरीद मानकों में छूट मिलने के बाद अगले सप्ताह तक खरीद में तेजी आने की उम्मीद है।</p>
<p data-start="660" data-end="907">16 अप्रैल तक पंजाब में 5.94 लाख टन और हरियाणा में 37.74 लाख टन गेहूं की खरीद हुई। मध्य प्रदेश में खरीद की शुरुआत देरी से होने के कारण महज 3.43 लाख टन गेहूं खरीदा गया। उत्तर प्रदेश में 1.62 लाख टन और राजस्थान में 2.52 लाख टन गेहूं की खरीद हुई है।</p>
<p data-start="909" data-end="1336">मार्च-अप्रैल में हुई बारिश के कारण गेहूं की फसल में नमी, सिकुड़न और चमक की कमी देखी गई, जिससे बड़ी मात्रा में फसल मानक गुणवत्ता से बाहर हो गई। इस समस्या को देखते हुए केंद्र सरकार ने राजस्थान, पंजाब और हरियाणा में खरीद मानकों में छूट दे दी है। अब पंजाब में 70 प्रतिशत तक चमक की कमी (लस्टर लॉस) और 15 प्रतिशत तक सिकुड़े-टूटे दाने स्वीकार किए जाएंगे (पहले 6 प्रतिशत की सीमा थी)। क्षतिग्रस्त दानों की सीमा 6 प्रतिशत ही रखी गई है।</p>
<p data-start="1338" data-end="1730" data-is-last-node="" data-is-only-node="">केंद्र सरकार ने इस सीजन के लिए गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 2,585 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया है। रबी सीजन 2026-27 के लिए कुल 303 लाख टन गेहूं खरीद का लक्ष्य रखा गया है। लेकिन जिस तरह खरीद की धीमी शुरुआत हुई है और बारिश से फसल को नुकसान पहुंचा है, उससे कुल खरीद लक्ष्य से पीछे रहने की आशंका है। हालांकि, आने वाले हफ्तों में आवक बढ़ने के साथ खरीद में तेजी आने की उम्मीद जताई जा रही है।</p>
</div>
</div>
</div>
</div>
<div class="z-0 flex min-h-[46px] justify-start"></div>
<div class="mt-3 w-full empty:hidden">
<div class="text-center"></div>
</div>
</div>
</div>
</section>
</div> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/04/image_750x500_67fe2a3146b88.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ गेहूं खरीद की सुस्त शुरुआत, पिछले साल से करीब 32 लाख टन कम अनाज की खरीद ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/04/image_750x500_67fe2a3146b88.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[विधानसभा चुनावः किसान सभा की किसानों से पश्चिम बंगाल में वामफ्रंट और तमिलनाडु में एसपीए को वोट देने की अपील]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/politics/aiks-appeals-to-farmers-to-support-lf-in-west-bengal-and-spa-in-tamil-nadu-elections.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 19 Apr 2026 08:38:44 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/politics/aiks-appeals-to-farmers-to-support-lf-in-west-bengal-and-spa-in-tamil-nadu-elections.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अखिल भारतीय किसान सभा (AIKS) ने देशभर के किसानों से पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में वामफ्रंट और &nbsp;तमिलनाडु चुनाव में एसपीए का समर्थन करने की अपील की है। संगठन ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), कृषि संकट और संघीय अधिकारों के मुद्दों को ध्यान में रखते हुए किसानों से फैसला करने को कहा है।</p>
<p>किसान सभा ने भाजपा-नीत एनडीए सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि उसने 2014 के अपने वादे - C2+50% के आधार पर MSP और सुनिश्चित खरीद - को लागू नहीं किया। किसानों को उचित मूल्य न मिलने, उर्वरक और ईंधन पर सब्सिडी में कटौती तथा उत्पादन लागत बढ़ने से कृषि संकट और गहरा हुआ है और किसानों का कर्ज बढ़ा है।</p>
<p>संगठन ने पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस सरकार पर भी निशाना साधते हुए उसे किसान-विरोधी बताया। AIKS ने कहा कि राज्य में आलू उत्पादकों को मात्र 2&ndash;3 रुपये प्रति किलो का दाम मिल रहा है, जबकि उपभोक्ताओं को 20&ndash;30 रुपये या उससे अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है, जिससे बिचौलियों को फायदा हो रहा है।</p>
<p>किसान सभा ने तमिलनाडु में डीएमके (DMK) के नेतृत्व वाले सेक्युलर प्रोग्रेसिव एलायंस के घोषणा पत्र का स्वागत किया, जिसमें धान, गन्ना और दूध के लिए अधिक समर्थन मूल्य का वादा किया गया है। संगठन का कहना है कि इससे राज्य के लाखों किसानों को लाभ होगा।</p>
<p>इसी तरह, पश्चिम बंगाल में सीपीएम के नेतृत्व वाले लेफ्ट फ्रंट ने स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करने और प्रमुख फसलों के लिए MSP की कानूनी गारंटी देने का वादा किया है। साथ ही, किसान उत्पादक संगठनों को बढ़ावा देने, बंद चाय बागानों को खोलने और कृषि आधारित उद्योगों को समर्थन देने की भी योजना है।</p>
<p>किसान सभा ने केंद्र सरकार पर सत्ता के केंद्रीकरण का आरोप लगाते हुए राज्यों के लिए कर हिस्सेदारी बढ़ाने की मांग की। संगठन का कहना है कि किसानों के हितों की रक्षा और लोकतांत्रिक व संघीय मूल्यों को मजबूत करने के लिए इन गठबंधनों का समर्थन जरूरी है।</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e3822191eec.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ विधानसभा चुनावः किसान सभा की किसानों से पश्चिम बंगाल में वामफ्रंट और तमिलनाडु में एसपीए को वोट देने की अपील ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e3822191eec.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कैबिनेट ने पीएम ग्राम सड़क योजना&amp;#45;III को मार्च 2028 तक जारी रखने की मंजूरी दी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/cabinet-approves-continuation-of-pm-gram-sadak-yojana-iii-up-to-march-2028.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 18 Apr 2026 16:58:53 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/cabinet-approves-continuation-of-pm-gram-sadak-yojana-iii-up-to-march-2028.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने शनिवार को प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना-III (पीएमजीएसवाई-III) को मार्च 2025 की अवधि के बाद मार्च 2028 तक जारी रखने को अपनी मंजूरी दे दी है। इसके अंतर्गत ग्रामीण बस्तियों को ग्रामीण कृषि बाजारों, उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों और अस्पतालों से जोड़ने वाले 'थ्रू रूट्स' और 'प्रमुख ग्रामीण लिंक' का सुदृढ़ीकरण शामिल है। इस योजना का संशोधित व्यय 83,977 करोड़ रुपये होगा, जो पहले 80,250 करोड़ रुपये था।</p>
<p>ग्रामीण विकास मंत्रालय की तरफ से जारी विज्ञप्ति में बताया गया है कि मैदानी क्षेत्रों में सड़कों और पुलों के निर्माण तथा पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क निर्माण के शेष कार्यों को पूर्ण करने की समय-सीमा मार्च 2028 तक बढ़ा दी गई है। पहाड़ी क्षेत्रों में कठिन भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए पुलों के निर्माण कार्य को पूरा करने की अवधि को मार्च 2029 तक बढ़ाया गया है।</p>
<p>इसमें कहा गया है कि 31 मार्च, 2025 से पहले स्वीकृत वे सभी कार्य, जिनका आवंटन अभी तक नहीं हो सका था, उन्हें अब निविदा और आवंटन प्रक्रिया के लिए लिए जाने की अनुमति दी गई है। पहले से स्वीकृत सड़कों के मार्ग पर आने वाले 161 नए लंबे पुलों के निर्माण को भी मंजूरी दी गई है। लगभग 961 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाले इन पुलों की स्वीकृति, निविदा और आवंटन प्रक्रिया को अब आगे बढ़ाया जा सकेगा।</p>
<p>पीएमजीएसवाई-III की समय-सीमा बढ़ाए जाने से ग्रामीण सड़कों के सुधार का कार्य पूर्ण हो सकेगा। इससे कृषि और गैर-कृषि उत्पादों के लिए बाजार तक पहुंच आसान होगी, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था और व्यापार को काफी बढ़ावा मिलेगा। साथ ही, परिवहन के समय और लागत में कमी आने से ग्रामीण आय में भी सुधार होगा। बेहतर कनेक्टिविटी के माध्यम से शिक्षण संस्थानों और स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंच सुलभ होगी, जिससे विशेष रूप से दूर-दराज और वंचित क्षेत्रों में आवश्यक सेवाओं की समय पर उपलब्धता सुनिश्चित की जा सकेगी।</p>
<p>इस योजना से रोजगार के व्यापक अवसर भी पैदा होंगे। ये अवसर प्रत्यक्ष रूप से निर्माण गतिविधियों के माध्यम से और परोक्ष रूप से ग्रामीण उद्यमों व सेवाओं को बढ़ावा देकर उत्पन्न होंगे। यह विस्तार ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच के अंतर को कम करके समावेशी और सतत विकास में योगदान देगा।</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e36a8979ac4.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ कैबिनेट ने पीएम ग्राम सड़क योजना-III को मार्च 2028 तक जारी रखने की मंजूरी दी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e36a8979ac4.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[उत्तर प्रदेश में 20 लाख टन आलू खरीद को केंद्र की मंजूरी, आंध्र&amp;#45;कर्नाटक में चना और तूर खरीद पर भी अहम फैसला]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/center-approves-procurement-of-20-lakh-tonnes-of-potatoes-key-decision-on-chana-and-tur-procurement-in-andhra-pradesh-and-karnataka.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 18 Apr 2026 15:56:09 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/center-approves-procurement-of-20-lakh-tonnes-of-potatoes-key-decision-on-chana-and-tur-procurement-in-andhra-pradesh-and-karnataka.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश में 20 लाख टन आलू खरीद के उत्तर प्रदेश सरकार के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इसके अलावा आंध्र प्रदेश में चना खरीद की मात्रा तथा कर्नाटक में तूर (अरहर) खरीद की समय सीमा बढ़ाने को भी मंजूरी दी गई है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने शनिवार को इन राज्यों के कृषि मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ वर्चुअल बैठक कर ये स्वीकृतियां दीं। इस मौके पर आगामी खरीफ सीजन की तैयारियों की भी समीक्षा की गई।</p>
<p><strong>उत्तर प्रदेश: 20 लाख टन आलू खरीद को स्वीकृति</strong></p>
<p>केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने बाजार हस्तक्षेप योजना (MIS) के तहत वर्ष 2025-26 के लिए उत्तर प्रदेश सरकार के आलू खरीद प्रस्ताव को मंजूरी दी है। राज्य में 20 लाख टन आलू की खरीद 6,500.9 रु. प्रति टन के मूल्य पर की जाएगी। इस निर्णय में भारत सरकार का संभावित अंश 203.15 करोड़ रुपए रहेगा। कृषि मंत्रालय की तरफ से जारी बयान में कहा गया है कि इस फैसले से उत्तर प्रदेश के आलू उत्पादक किसानों को लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करने में सहायता मिलेगी तथा उन्हें मजबूरी में कम कीमत पर उपज नहीं बेचनी पड़ेगी।</p>
<p><strong>आंध्र प्रदेश: चना खरीद सीमा बढ़ाकर 1,13,250 मीट्रिक टन</strong></p>
<p>केंद्रीय कृषि मंत्री ने आंध्र प्रदेश सरकार के प्रस्ताव को मंजूरी देते हुए रबी 2025-26 सीजन के दौरान मूल्य समर्थन योजना (PSS) के अंतर्गत 1,13,250 मीट्रिक टन चना (बंगाल ग्राम) की खरीद को स्वीकृति दी है। पहले 94,500 टन चना खरीदने की स्वीकृति थी। इस फैसले से राज्य के चना उत्पादक किसानों को राहत मिलने की उम्मीद है।</p>
<p><strong>कर्नाटक: तूर खरीद अवधि 15 मई 2026 तक बढ़ी</strong></p>
<p>कर्नाटक में खरीफ 2025-26 सीजन के दौरान मूल्य समर्थन योजना (PSS) के तहत न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर तूर (अरहर) की खरीद का समय 30 दिनों के लिए बढ़ाया गया है। अब यह खरीद 15 मई 2026 तक जारी रहेगी। इससे कर्नाटक के तूर उत्पादक किसानों को MSP पर अपनी उपज बेचने के लिए अतिरिक्त समय मिलेगा।&nbsp;</p>
<p><strong>खरीफ की तैयारियों की समीक्षा</strong></p>
<p>चौहान ने आगामी खरीफ मौसम की तैयारियों की उच्चस्तरीय समीक्षा भी की और कृषि सचिव तथा संबंधित वरिष्ठ अधिकारियों को समय रहते आवश्यक प्रबंध करने के निर्देश दिए। बैठक में मौसम पूर्वानुमान, जल उपलब्धता, फसलों की स्थिति, बीज एवं अन्य कृषि इनपुट की व्यवस्था, राज्यों की तैयारियों तथा संभावित प्रतिकूल मौसम परिस्थितियों से निपटने की कार्ययोजना पर चर्चा हुई। बैठक में कृषि मंत्री ने कहा कि संभावित अल नीनो के प्रभाव को लेकर सरकार तैयार है।</p>
<p>मौसम विभाग ने इस वर्ष दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से कम रहने की आशंका व्यक्त की है। मौसमी वर्षा देशभर में दीर्घकालीन औसत के लगभग 92 प्रतिशत रहने का अनुमान है। यह संकेत दिया गया है कि मानसून सीजन के दौरान अल नीनो की स्थिति विकसित हो सकती है, हालांकि अंतिम और अद्यतन आकलन मई 2026 के अंतिम सप्ताह में जारी किया जाएगा। बैठक में बताया गया कि देश के जलाशयों का जलस्तर संतोषजनक है। यह सामान्य स्तर के 127.01 प्रतिशत पर है।</p>
<p>समीक्षा के दौरान यह भी उल्लेख किया गया कि वर्ष 2000 से 2016 के बीच अल नीनो का प्रभाव कृषि उत्पादन पर अपेक्षाकृत अधिक स्पष्ट दिखता था, क्योंकि तब वर्षा पर निर्भरता अधिक थी और जलवायु जोखिमों से निपटने की व्यवस्थाएं वर्तमान की तुलना में सीमित थीं। हाल के वर्षों में तकनीकी प्रगति, बेहतर कृषि प्रबंधन, जल संरक्षण, सिंचाई नेटवर्क के विस्तार और उन्नत बीजों के उपयोग से फसलों की उत्पादकता में अधिक स्थिरता आई है।</p>
<p>कृषि मंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि सभी राज्य किसी भी विपरीत मौसम की स्थिति से निपटने के लिए पूरी तैयारी रखें और जिला स्तर तक आकस्मिक योजनाओं को सक्रिय किया जाए। उन्होंने कहा कि बीज, उर्वरक और अन्य आवश्यक कृषि इनपुट की उपलब्धता सुनिश्चित करने के साथ वैकल्पिक फसल, देरी से बुवाई की रणनीति और सूखा-सहनशील किस्मों को बढ़ावा दिया जाए, ताकि किसानों को व्यवहारिक और त्वरित समाधान मिल सकें।</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e35b93666e4.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ उत्तर प्रदेश में 20 लाख टन आलू खरीद को केंद्र की मंजूरी, आंध्र-कर्नाटक में चना और तूर खरीद पर भी अहम फैसला ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e35b93666e4.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[ईरान युद्ध से परेशान निर्यातकों को राहत; सरकार ने रिलीफ योजना का विस्तार किया, DGFT से मंजूरी प्रक्रिया भी तेज]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/government-steps-up-support-for-exporters-with-relief-expansion-and-faster-dgft-approvals.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 18 Apr 2026 12:11:35 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/government-steps-up-support-for-exporters-with-relief-expansion-and-faster-dgft-approvals.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>सरकार ने भारतीय निर्यातकों की मदद के लिए दो बड़े फैसले लिए हैं। इनका मकसद बढ़ती लागत को कम करना, मंजूरी की प्रक्रिया को तेज करना और निर्यात को आसान बनाना है। पहला कदम RELIEF (Resilience &amp; Logistics Intervention for Export Facilitation) योजना का विस्तार है। यह योजना 19 मार्च 2026 को शुरू की गई थी, ताकि पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव के कारण बढ़े शिपिंग खर्च, महंगे बीमा और बढ़ते जोखिम से जूझ रहे निर्यातकों को राहत मिल सके। समुद्री रास्तों में बाधा के कारण निर्यातकों को सामान भेजने में काफी दिक्कतें आ रही थीं।</p>
<p>अब सरकार ने इस योजना में मिस्र और जॉर्डन को भी शामिल कर लिया है। इसका मतलब है कि इन देशों में या इनके रास्ते से माल भेजने वाले निर्यातकों को भी इस योजना का लाभ मिलेगा। योजना के तहत बढ़े हुए माल भाड़े और बीमा खर्च का कुछ हिस्सा वापस किया जाएगा, पुराने और नए दोनों तरह के शिपमेंट को सहायता मिलेगी, और बीमा सुविधा भी आसान बनाई जाएगी।</p>
<p>यह योजना ECGC (Export Credit Guarantee Corporation) के माध्यम से लागू की जा रही है। सरकार ने यह भी साफ किया है कि जो निर्यातक 16 मार्च 2026 के बाद नई ECGC पॉलिसी लेते हैं, वे भी इस योजना का फायदा उठा सकते हैं। इससे खासकर छोटे निर्यातकों को प्रोत्साहन मिलेगा।</p>
<p>दूसरा बड़ा कदम विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) में सुधार से जुड़ा है। निर्यातकों को एडवांस ऑथराइजेशन (AA) और ड्यूटी-फ्री इंपोर्ट ऑथराइजेशन (DFIA) जैसी योजनाओं के तहत कच्चा माल बिना शुल्क के आयात करने की अनुमति मिलती है, लेकिन मंजूरी में देरी होती थी। अब सरकार ने इन मंजूरियों को तेज करने के लिए Norms Committees को मजबूत किया है। पहले तकनीकी विशेषज्ञों की कमी के कारण काम धीमा था, लेकिन अब सदस्यों की संख्या 12 से बढ़ाकर 22 कर दी गई है।</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e3270208cd5.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ ईरान युद्ध से परेशान निर्यातकों को राहत; सरकार ने रिलीफ योजना का विस्तार किया, DGFT से मंजूरी प्रक्रिया भी तेज ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e3270208cd5.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[भारतीय कृषि के लिए अहम उर्वरक उत्पादन में आत्मनिर्भरता]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/importance-of-self-reliance-in-fertilisers-amid-global-uncertainties.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 18 Apr 2026 10:57:26 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/importance-of-self-reliance-in-fertilisers-amid-global-uncertainties.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी ने भारत की पेट्रोलियम अर्थव्यवस्था को काफी दबाव में डाल दिया है। लेकिन घरेलू उर्वरक क्षेत्र के लिए भी जोखिम कम नहीं है। उर्वरकों के उत्पादन और आयात पर पड़ने वाला असर देश के लिए एक बड़ी समस्या बनकर उभर सकता है और यह कृषि क्षेत्र को जोखिम में डाल सकता है। यह स्थिति कृषि क्षेत्र के लिए अनुकूल नहीं है। वर्ष 2024-25 में 4.2% की औसत से अधिक वृद्धि के बाद कृषि क्षेत्र के विकास की गति धीमी पड़ गई है। जीडीपी के दूसरे संशोधित अनुमानों के अनुसार, 2025-26 में कृषि वृद्धि दर केवल 2.4% रहने की उम्मीद है। इसके अलावा, हालिया आकलन बताते हैं कि पिछले दो महीनों के असामान्य मौसम पैटर्न के कारण रबी फसलों का उत्पादन पिछले वर्ष के स्तर तक नहीं पहुंच पाएगा। ऐसे समय में उर्वरकों की आपूर्ति में बाधा आना स्थिति को और गंभीर बना देता है, क्योंकि इससे किसानों के बीच अनिश्चितता और बढ़ गई है।</p>
<p>वैश्विक उर्वरक व्यापार का लगभग 33%, जिसमें यूरिया, अमोनिया और सल्फर शामिल हैं, होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। खाड़ी देश अपने निर्यात गंतव्यों तक पहुंचने के लिए इस मार्ग पर काफी हद तक निर्भर हैं। युद्ध के चलते यहां से उर्वरकों की आपूर्ति में देरी हो रही है, लागत में तेज बढ़ोतरी हुई है और यहां तक कि उर्वरकों कमी की समस्या भी आ रही है।</p>
<p>भारत लंबे समय से उर्वरकों के आयात पर निर्भर रहा है, और इस दशक के अधिकांश वर्षों में यह निर्भरता बढ़ी है। वर्ष 2023 में भारत यूरिया का तीसरा सबसे बड़ा आयातक था। इसके वैश्विक आयात में भारत की हिस्सेदारी 2024 को छोड़कर पूरे दशक में लगभग 15% के आसपास रही है। पिछले पांच वर्षों में देश की कुल खपत में आयात का हिस्सा 31% से 37% के बीच रहा है। आयात में तेजी को देखते हुए 2025-26 में इसके 50% से अधिक हो जाने की संभावना है।</p>
<p>अप्रैल से जनवरी 2025-26 के आंकड़े बताते हैं कि पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में आयात में 42% की वृद्धि हुई है, जबकि यूरिया आयात में 57% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यदि पोटाश उर्वरकों के आयात में 16% की कमी न आई होती, तो आयात में वृद्धि का आंकड़ा और अधिक हो सकता था। सरकार को यह निगरानी करने की आवश्यकता होगी कि पोटाश उर्वरकों के आयात में आई कमी से पोषक तत्वों के संतुलन पर कोई प्रतिकूल प्रभाव तो नहीं पड़ रहा है।</p>
<p>भारत पारंपरिक रूप से नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों की आपूर्ति के लिए खाड़ी क्षेत्र पर निर्भर रहा है। वर्ष 2024-25 में यूरिया आयात का 75 प्रतिशत इसी क्षेत्र से हुआ, जिसमें से अधिकांश आपूर्ति होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आई। इसमें कोई संदेह नहीं है कि कृषि जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र की जरूरतों को पूरा करने के लिए एक ही क्षेत्र पर इतनी अधिक निर्भरता अपने आप में बड़ा जोखिम है। पश्चिम एशिया के युद्ध ने इस वास्तविकता को गंभीर रूप से उजागर कर दिया है।</p>
<p>भारत ने यूरिया आयात के स्रोतों में विविधता लाकर इस समस्या को आंशिक रूप से कम करने का प्रयास किया है, जिसके परिणामस्वरूप अप्रैल से जनवरी 2025-26 के दौरान खाड़ी देशों की हिस्सेदारी घटकर 44 प्रतिशत रह गई। यह चीन और रूस से आयात बढ़ने के कारण संभव हुआ है। भारत के कुल यूरिया आयात का 35 प्रतिशत हिस्सा इन दोनों देशों से आया।</p>
<p>हालांकि, इससे यह सवाल उठता है कि क्या आयात स्रोतों में विविधता वास्तव में जोखिम कम करने की प्रभावी रणनीति हो सकती है। संसद में सरकार के हालिया बयानों से संकेत मिलता है कि उर्वरकों के आयात पर बढ़ती निर्भरता से उत्पन्न जोखिमों को कम करने के लिए यही उसकी प्राथमिक रणनीति है।</p>
<p>भू-आर्थिक जोखिम भारत के उर्वरक आयात की कमजोरियों का एकमात्र कारण नहीं हैं। उर्वरकों की कीमतों में तेज बढ़ोतरी पहले ही एक बड़े खतरे के रूप में उभर चुकी है। ईरान पर अमेरिका के हमले की शुरुआत के बाद से यूरिया की कीमतें लगभग 700 डॉलर प्रति मीट्रिक टन तक पहुंच गई हैं, जो युद्ध से पहले 400 से 490 डॉलर के बीच थीं। इससे चालू खाते का संतुलन बिगड़ने का खतरा बढ़ गया है।</p>
<p>चूंकि पश्चिम एशिया में संघर्ष समाप्त होने के बाद भी कीमतों के ऊंचे स्तर पर बने रहने की आशंका है, इसलिए इस वजह से भारत के बाह्य भुगतान संतुलन पर मध्यम अवधि में असर पड़ सकता है। इसका मतलब यह है कि जब तक भारत उर्वरक आयात पर अत्यधिक निर्भर बना रहेगा, तब तक केवल आयात स्रोतों में विविधीकरण करने से उसके जोखिम कम नहीं होंगे।</p>
<p>इन परिस्थितियों में यह काफी आश्चर्यजनक है कि सरकार ने आयात पर निर्भरता कम करने के लिए उर्वरकों के घरेलू उत्पादन को मजबूत करने पर विचार नहीं किया है। कोविड संकट और उससे उत्पन्न आपूर्ति शृंखला में व्यवधानों के बाद, आत्मनिर्भर भारत को बढ़ावा देने के लिए 14 प्रमुख क्षेत्रों के लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) योजना लागू की गई। इस योजना का उद्देश्य फार्मास्यूटिकल इंटरमीडिएट्स और प्रमुख कच्चे माल, मोबाइल फोन तथा विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक घटकों जैसे कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता हासिल करना और आयात पर निर्भरता कम करना है। साथ ही, इस योजना का लक्ष्य तकनीकी हस्तक्षेप के माध्यम से लक्षित क्षेत्रों को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना भी है।</p>
<p>इस योजना में लगभग सभी प्रमुख उद्योगों को शामिल किया गया है, लेकिन उर्वरक उद्योग इसका एकमात्र उल्लेखनीय अपवाद है। उर्वरक उद्योग की उत्पादन क्षमता को तत्काल बढ़ाने की आवश्यकता है, ताकि पौधों के लिए जरूरी पोषक तत्वों की आपूर्ति घरेलू उत्पादन इकाइयों से अधिक मात्रा में सुनिश्चित की जा सके।</p>
<p>भारत के उर्वरक उद्योग का विकास 1960 के दशक में हुए इसके विस्तार के समय से ही असंतुलित रहा है। घरेलू स्तर पर नाइट्रोजन युक्त उर्वरकों के उत्पादन को हमेशा अन्य दो प्रमुख पोषक तत्वों, फॉस्फोरस और पोटाश, की तुलना में प्राथमिकता दी गई। 1970 के दशक में बॉम्बे हाई गैस की खोज ने इस फीडस्टॉक का उपयोग करते हुए देश में यूरिया उत्पादन को उल्लेखनीय बढ़ावा दिया। हालांकि, गैस आधारित संयंत्र धीरे-धीरे आयातित प्राकृतिक गैस पर अधिक निर्भर होते गए, फिर भी यूरिया उत्पादन में वृद्धि हुई। लेकिन यह बढ़ती घरेलू मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं थी।</p>
<p>दूसरी ओर, फॉस्फेटिक और पोटाश उर्वरकों का उत्पादन उपेक्षित रहा, जिससे पोषक तत्वों का गंभीर असंतुलन पैदा हुआ। इसके परिणामस्वरूप फसलों की पैदावार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा और यूरिया के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता भी खराब हुई। इस पोषण असंतुलन को देश में सभी प्रमुख पोषक तत्वों का घरेलू उत्पादन बढ़ाकर दूर किया जा सकता है।</p>
<p>भारत के उर्वरक उद्योग को प्रोडक्शन-लिंक्ड इन्सेंटिव (पीएलआई) योजना में शामिल करके इस लक्ष्य को हासिल करना संभव है। इससे इसका व्यवस्थित विकास सुनिश्चित हो सकेगा, जैसा कि वर्तमान में इस योजना के तहत शामिल 14 क्षेत्रों में किया जा रहा है। अनिश्चितताओं से भरे इस दौर में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए यही सबसे ठोस गारंटी साबित हो सकती है।&nbsp;</p>
<p><em>(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर हैं)</em></p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/08/image_750x500_64eca086326e8.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ भारतीय कृषि के लिए अहम उर्वरक उत्पादन में आत्मनिर्भरता ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/08/image_750x500_64eca086326e8.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[हिमाचल प्रदेश में प्राकृतिक खेती वाली फसलों का समर्थन मूल्य बढ़ा, गेहूं का एमएसपी 80 रुपये प्रति किलो]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/states/himachal-pradesh-raises-msp-for-natural-farming-crops.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 17 Apr 2026 19:39:05 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/states/himachal-pradesh-raises-msp-for-natural-farming-crops.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>हिमाचल प्रदेश कैबिनेट ने मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की अध्यक्षता में प्राकृतिक खेती के तहत उगाई जाने वाली फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में उल्लेखनीय वृद्धि को मंजूरी दी है। इस फैसले का उद्देश्य किसानों की आय बढ़ाना और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना है।</p>
<p>नई दरों के अनुसार गेहूं का एमएसपी 60 रुपये से बढ़ाकर 80 रुपये प्रति किलोग्राम कर दिया गया है। मक्का का एमएसपी 40 से बढ़कर 50 रुपये प्रति किलोग्राम हो गया है। चंबा जिले की पांगी घाटी में उगाई जाने वाली जौ का समर्थन मूल्य भी 60 रुपये से बढ़ाकर 80 रुपये प्रति किलोग्राम किया गया है।&nbsp;</p>
<p>वहीं कच्ची हल्दी के न्यूनतम समर्थन मूल्य में बड़ी बढ़ोतरी करते हुए इसे 90 रुपये से बढ़ाकर 150 रुपये प्रति किलोग्राम कर दिया गया है। इसके अलावा अदरक की खरीद अब 30 रुपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से की जाएगी।</p>
<p>सरकार का मानना है कि इस कदम से किसानों को बेहतर दाम मिलेंगे और वे रासायनिक खेती से हटकर प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित होंगे। राज्य सरकार लंबे समय से पर्यावरण अनुकूल कृषि को बढ़ावा देने की दिशा में काम कर रही है।</p>
<p>कृषि के अलावा मंत्रिमंडल ने 1,500 सरकारी पदों के सृजन और भर्ती को भी मंजूरी दी है। इसमें 1,000 पुलिस कांस्टेबल पद शामिल हैं, जिससे कानून-व्यवस्था को मजबूत करने में मदद मिलेगी।</p>
<p>वन विभाग में 500 सहायक वन रक्षक पदों को भी स्वीकृति दी गई है, जिनमें से 50 प्रतिशत पद वन मित्रों के लिए आरक्षित होंगे। इससे जमीनी स्तर पर काम कर रहे लोगों को रोजगार के बेहतर अवसर मिलेंगे।</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e23e85729ef.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ हिमाचल प्रदेश में प्राकृतिक खेती वाली फसलों का समर्थन मूल्य बढ़ा, गेहूं का एमएसपी 80 रुपये प्रति किलो ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e23e85729ef.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[युद्धविराम के बीच ईरान ने की होर्मुज स्ट्रेट खोलने की घोषणा, तनाव कम होने की उम्मीद से कच्चे तेल कीमतों में बड़ी गिरावट]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/hormuz-strait-reopens-after-ceasefire-signals-oil-prices-tumble-amid-hopes-of-iran-war-de-escalation.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 17 Apr 2026 19:20:51 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/hormuz-strait-reopens-after-ceasefire-signals-oil-prices-tumble-amid-hopes-of-iran-war-de-escalation.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>मध्य पूर्व में डेढ़ महीने से भी ज्यादा समय से जारी तनाव के बीच ईरान ने रणनीतिक रूप से अहम होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने की घोषणा की है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराकची ने सोशल मीडिया एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि लेबनान में लागू युद्धविराम के दौरान सभी वाणिज्यिक जहाजों के लिए इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग को &ldquo;पूरी तरह खुला&rdquo; रखा जाएगा। यह कदम ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच लंबे संघर्ष के बाद क्षेत्र में स्थिरता लाने की कोशिशों के बीच उठाया गया है।</p>
<p>भारत के कच्चे तेल के आयात का लगभग 55-60% हिस्सा मध्य पूर्व से आता है, जिसमें से एक बड़ा भाग होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। वहीं, भारत की एलपीजी मांग का लगभग 60% आयात के जरिए पूरा होता है, जिसमें से करीब 90% आपूर्ति इसी जलडमरूमध्य से होकर आती है।</p>
<p>इस घोषणा का असर तुरंत वैश्विक तेल बाजार पर पड़ा। भारतीय समय के अनुसार शाम सात बजे ब्रेंट क्रूड की कीमत 11% से अधिक गिरकर 87.87 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई थी, जबकि डब्लूटीआई क्रूड 12% से ज्यादा गिरकर 83.13 डॉलर प्रति बैरल हो गया। यह गिरावट इस उम्मीद के चलते आई कि अब तेल आपूर्ति में बाधाएं कम होंगी।</p>
<p>होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के लगभग पांचवें हिस्से के तेल और एलएनजी आपूर्ति का प्रमुख मार्ग है। युद्ध के दौरान इसके बंद होने से वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा पर गंभीर खतरा पैदा हो गया था और इतिहास के सबसे बड़े तेल झटके की आशंका जताई जा रही थी।</p>
<p>इस बीच, लेबनान और इजरायल के बीच 10 दिनों का युद्धविराम फिलहाल कायम नजर आ रहा है, जिससे व्यापक शांति समझौते की संभावनाएं बढ़ी हैं। हालांकि, यह अभी स्पष्ट नहीं है कि सभी पक्ष इस समझौते का पूरी तरह पालन करेंगे या नहीं।</p>
<p>अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उम्मीद जताई कि ईरान युद्ध को समाप्त करने के लिए जल्द ही कोई समझौता हो सकता है, हालांकि इसकी समयसीमा अभी तय नहीं है। इसके बावजूद क्षेत्र में तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है और कुछ उल्लंघनों की खबरें भी सामने आई हैं।</p>
<p>अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, भले ही स्थिति सामान्य हो जाए, मध्य पूर्व को युद्ध से पहले के तेल उत्पादन स्तर तक लौटने में दो साल तक का समय लग सकता है। इस युद्ध के कारण मार्च में वैश्विक तेल आपूर्ति में एक करोड़ बैरल प्रतिदिन से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है।</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x500_69a6aac50075e.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ युद्धविराम के बीच ईरान ने की होर्मुज स्ट्रेट खोलने की घोषणा, तनाव कम होने की उम्मीद से कच्चे तेल कीमतों में बड़ी गिरावट ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x500_69a6aac50075e.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[चिराग पासवान ने पेश की भारत के मसाला उद्योग को दोगुना करने की रणनीति, गुणवत्ता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा पर जोर]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/chirag-paswan-unveils-strategy-to-double-indias-spice-industry-stresses-quality-and-global-competitiveness.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 17 Apr 2026 17:39:35 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/chirag-paswan-unveils-strategy-to-double-indias-spice-industry-stresses-quality-and-global-competitiveness.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री चिराग पासवान ने शुक्रवार को पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (PHDCCI) द्वारा आयोजित &ldquo;भारत स्पाइसेज कॉन्क्लेव 2026&rdquo; का उद्घाटन किया और देश के मसाला क्षेत्र को विस्तार देने के लिए एक महत्वाकांक्षी रोडमैप पेश किया। उद्योग से जुड़े प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए पासवान ने कहा कि यह कॉन्क्लेव नवाचार, नीतिगत समन्वय और रणनीतिक विकास को बढ़ावा देने का एक महत्वपूर्ण मंच है। उन्होंने जोर दिया कि भारत को उत्पादन आधारित मॉडल से आगे बढ़कर वैल्यू एडिशन, बेहतर प्रोसेसिंग और वैश्विक बाजार से मजबूत जुड़ाव पर ध्यान देना होगा, ताकि इस क्षेत्र की पूरी क्षमता का उपयोग किया जा सके।</p>
<p>भारत के व्यापार इतिहास में मसालों की अहम भूमिका को रेखांकित करते हुए उन्होंने बताया कि देश 225 से अधिक मसालों और वैल्यू एडेड उत्पादों का निर्यात लगभग 200 देशों को करता है। घरेलू मसाला बाजार 10 अरब डॉलर से अधिक का है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा मसाला उपभोक्ता है। इनका चार अरब डॉलर से अधिक का निर्यात होता है। प्रमुख निर्यात उत्पादों में मिर्च, जीरा, हल्दी, इलायची और मिश्रित मसाले शामिल हैं। चीन, अमेरिका और बांग्लादेश भारतीय मसालों के प्रमुख बाजार हैं।</p>
<p>हालांकि, पासवान ने गुणवत्ता को लेकर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में अंतरराष्ट्रीय बंदरगाहों पर भारतीय मसालों की खेपों की वापसी बढ़ी है, जिसका कारण हानिकारक अवशेषों की मौजूदगी है। उन्होंने कहा कि वैश्विक स्तर पर भरोसा कायम करने के लिए गुणवत्ता में एकरूपता बेहद जरूरी है। एक बार खेप लौटने से वर्षों में बनी साख को नुकसान पहुंच सकता है।</p>
<p>मंत्री ने यह भी बताया कि 100% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) और प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम औपचारिकीकरण योजना (PMFME) जैसी योजनाएं मूल्य श्रृंखला को मजबूत करने और उद्यमिता को बढ़ावा देने में सहायक हैं।</p>
<p>इस कॉन्क्लेव में सरकार और उद्योग के प्रमुख हितधारकों ने भाग लिया और मसाला क्षेत्र को मजबूत बनाने, निर्यात बढ़ाने और वैश्विक स्तर पर भारतीय मसालों की पहचान को सशक्त करने के लिए नीति, व्यापार और नवाचार से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की।</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e222a5ac6d3.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ चिराग पासवान ने पेश की भारत के मसाला उद्योग को दोगुना करने की रणनीति, गुणवत्ता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा पर जोर ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e222a5ac6d3.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[केंद्रीय खाद्य मंत्री से मिले तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी, राज्य से 30 लाख टन पारबॉयल्ड चावल खरीदने की मांग]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/states/telangana-pushes-for-30-lmt-boiled-rice-procurement-seeks-clearance-of-rs-1469-crore-pending-dues.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 17 Apr 2026 15:52:54 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/states/telangana-pushes-for-30-lmt-boiled-rice-procurement-seeks-clearance-of-rs-1469-crore-pending-dues.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>तेलंगाना की रेवंत रेड्डी की सरकार ने केंद्र से चावल की ज्यादा खरीद की मांग की है। उसने केंद्र सरकार से मौजूदा यासांगी (रबी) मार्केटिंग सीजन के दौरान 30 लाख मीट्रिक टन पारबॉयल्ड चावल खरीदने की अपील की है।</p>
<p>मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी शुक्रवार को इस सिलसिले में केंद्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री प्रल्हाद जोशी से मिले। उनके साथ राज्य के नागरिक आपूर्ति मंत्री एन उत्तम कुमार रेड्डी भी थे। मुख्यमंत्री ने केंद्रीय मंत्री को राज्य में धान की अच्छी पैदावार की जानकारी दी।</p>
<p>रेड्डी ने जोशी को बताया कि मौजूदा रबी सीजन के दौरान राज्य में करीब 90 लाख टन धान पैदा होने की उम्मीद है। इस फसल का एक बड़ा हिस्सा पारबॉयल्ड चावल बनाने के लिए सही है, जिसकी देश के अलग-अलग हिस्सों में मांग बढ़ रही है। केंद्रीय मंत्रालय के अधिकारियों ने पहले भी देश की जरूरतों को पूरा करने के लिए पारबॉयल्ड चावल की सप्लाई बढ़ाने का सुझाव दिया था।</p>
<p>इसके आधार पर राज्य ने 5% टूटे अनाज वाले 30 लाख टन पारबॉयल्ड चावल और 10% टूटे अनाज वाले 5 लाख टन कच्चे चावल की सप्लाई का ऑफर दिया है। इस प्रस्ताव को केंद्रीय मंत्री से सैद्धांतिक मंज़ूरी मिल गई है।</p>
<p>रेड्डी ने नागरिक आपूर्ति विभाग की गंभीर वित्तीय दिक्कतों के बारे में भी बताया। मुख्यमंत्री ने केंद्र से 2014-15 खरीफ सीजन से अतिरिक्त लेवी चावल की खरीद से जुड़े 1,468.94 करोड़ रुपये के बकाया को तुरंत जारी करने की मांग की। ​​उन्होंने जोर देकर कहा कि खरीद का काम आसानी से चलाने और किसानों को समय पर पेमेंट पक्का करने के लिए इस बकाया को चुकाना बहुत जरूरी है।</p>
<p>मीटिंग के दौरान उठाया गया एक और अहम मुद्दा फोर्टिफाइड राइस कर्नेल (FRK) के डिस्ट्रीब्यूशन पर रोक का था। मुख्यमंत्री ने केंद्र से बिना देर किए इस स्कीम को फिर से शुरू करने की अपील की, और बच्चों में एनीमिया और कुपोषण से निपटने में इसकी अहमियत पर जोर दिया। फोर्टिफाइड चावल पहले स्कूलों, हॉस्टल और ICDS सेंटरों के जरिए बांटा जाता था, जिससे समाज के कमजोर तबकों को फायदा होता था।</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e209ad75d88.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ केंद्रीय खाद्य मंत्री से मिले तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी, राज्य से 30 लाख टन पारबॉयल्ड चावल खरीदने की मांग ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e209ad75d88.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[पंजाब में भी गेहूं खरीद मानकों में केंद्र ने दी छूट, 70% तक कम चमक वाले गेहूं की होगी सरकारी खरीद]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/states/centre-relaxes-wheat-procurement-norms-in-punjab-chandigarh-after-rain-damage.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 17 Apr 2026 15:12:47 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/states/centre-relaxes-wheat-procurement-norms-in-punjab-chandigarh-after-rain-damage.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>केंद्र सरकार ने रबी विपणन सीजन 2026-27 के लिए पंजाब और चंडीगढ़ में गेहूं खरीद के गुणवत्ता मानकों में महत्वपूर्ण ढील देने का फैसला किया है। यह निर्णय पिछले दिनों हुई असमय बारिश और ओलों के कारण फसल की गुणवत्ता प्रभावित होने और किसानों को संभावित नुकसान से बचाने के उद्देश्य से लिया गया है। राजस्थान और हरियाणा के किसानों को यह छूट पहले ही दी जा चुकी है।</p>
<p>उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के तहत जारी अधिसूचना के अनुसार, राज्य सरकार और भारतीय खाद्य निगम (FCI) की सिफारिशों पर यह कदम उठाया गया है। हाल के दिनों में हुई बारिश के कारण गेहूं की गुणवत्ता में गिरावट आई है, जिससे किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर बिक्री में कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है।</p>
<p>नई व्यवस्था के तहत <strong>&lsquo;लस्टर लॉस&rsquo; (चमक में कमी)</strong> वाले गेहूं की सीमा को पूरे पंजाब और चंडीगढ़ में 70% तक बढ़ा दिया गया है। इसके अलावा, <strong>सिकुड़े और टूटे दानों</strong> (Shrivelled &amp; Broken grains) की सीमा को मौजूदा 6% से बढ़ाकर 15% कर दिया गया है। हालांकि, <strong>क्षतिग्रस्त और हल्के क्षतिग्रस्त</strong> (Damaged &amp; slightly damaged) दानों की कुल सीमा 6% से अधिक नहीं होगी।</p>
<p>सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस ढील के तहत खरीदे गए गेहूं को अलग से रखा जाएगा और उसका अलग हिसाब रखा जाएगी। साथ ही, ऐसे गेहूं के भंडारण के दौरान गुणवत्ता में किसी भी प्रकार की गिरावट की जिम्मेदारी संबंधित राज्य सरकारों की होगी।</p>
<p>इस फैसले से किसानों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है, क्योंकि वे अब खराब क्वालिटी के बावजूद अपनी उपज को सरकारी खरीद केंद्रों पर बेच सकेंगे। उन्हें औने-पौने दाम पर उपज की बिक्री नहीं करनी पड़ेगी। इस वर्ष गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) 2585 रुपये प्रति क्विंटल है।</p>
<p>मार्च और अप्रैल में हुई असमय बारिश के कारण गेहूं के दानों में नमी बढ़ने, सिकुड़न और चमक में कमी जैसी समस्याएं सामने आई हैं। इसके चलते बड़ी मात्रा में फसल निर्धारित गुणवत्ता मानकों से बाहर हो रही थी, जिससे खरीद प्रक्रिया प्रभावित हुई।&nbsp;</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/03/image_750x500_67e3d324b601a.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ पंजाब में भी गेहूं खरीद मानकों में केंद्र ने दी छूट, 70% तक कम चमक वाले गेहूं की होगी सरकारी खरीद ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/03/image_750x500_67e3d324b601a.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[यूपी की चीनी मिलों में 63 लाख टन कम गन्ना पेराई, किसानों को 2500 करोड़ का नुकसान, लेकिन आंकड़ों में बढ़ा गन्ना उत्पादन  ]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/up-sugar-mills-crush-6.3-million-tonnes-less-cane-farmers-lose-rs-2500-crore-despite-higher-production-estimates.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 17 Apr 2026 07:47:33 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/up-sugar-mills-crush-6.3-million-tonnes-less-cane-farmers-lose-rs-2500-crore-despite-higher-production-estimates.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>चालू चीनी सीजन 2025-26 <span>के दौरान गन्ने की पेराई लगभग पूरी हो चुकी है। इसी के साथ देश में गन्ना और चीनी उत्पादन की तस्वीर साफ हो गई है। महाराष्ट्र 99.30 लाख टन चीनी उत्पादन के साथ देश में अग्रणी है</span>, <span>वहीं गन्ने की कमी से जूझती रहीं उत्तर प्रदेश की चीनी मिलें 89</span>.26 <span>लाख टन चीनी उत्पादन ही कर पायी हैं। </span></p>
<p>चीनी उद्योग के संगठन इस्मा के अनुसार, 15 <span>अप्रैल तक देश की 539 चीनी मिलों में से 520 चीनी मिलों में पेराई बंद हो चुकी है। केवल 19 चीनी मिलों में फिलहाल पेराई जारी है।&nbsp;</span>देश का चीनी उत्पादन (इथेनॉल के अलावा) 274.80 लाख टन तक पहुंच गया है, जो पिछले साल इस अवधि तक 254.96 लाख टन चीनी उत्पादन से लगभग 8 फीसदी अधिक है। हालांकि, पिछले साल गन्ने की फसल पर रोग व मौसम की मार के चलते देश के चीनी उत्पादन में करीब 18 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई थी।&nbsp;</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x_69e1dc0a5f407.jpg" alt="" style="display: block; margin-left: auto; margin-right: auto;" /></p>
<p><strong>यूपी की मिलों को कम गन्ना आपूर्ति </strong></p>
<p>इस साल उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों में लगभग 63 लाख टन कम गन्ना पेराई हुई। गन्ना आपूर्ति में कमी के कारण प्रदेश की अधिकांश चीनी मिलों को समय से पहले ही सीजन समाप्ति का ऐलान करना पड़ा। यह प्रदेश की गन्ना अर्थव्यवस्था के लिए बड़े संकट की शुरुआत है।</p>
<p><strong>नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज लिमिटेड (NFCSF)</strong> <span>की ताजा रिपोर्ट के अनुसार</span>, 15 <span>अप्रैल तक </span><span>यूपी की चीनी मिलों में कुल </span>874.51 <span>लाख टन गन्ने की पेराई हुई है जबकि पिछले साल समान अवधि तक </span>937.63 <span>लाख टन गन्ना पेराई हुई थी। यानी यूपी में चीनी मिलों को करीब 6.7 फीसदी कम गन्ना मिला है। यह स्थिति तब है जबकि पिछले कई वर्षों से यूपी में गन्ने की बुवाई के क्षेत्र और गन्ना उत्पादन में बढ़ोतरी के दावे किए जा रहे हैं।&nbsp;</span></p>
<p><strong>पेराई कम लेकिन रिकवरी बढ़ी </strong></p>
<p>गन्ना आपूर्ति में कमी के बावजूद उत्तर प्रदेश में चीनी उत्पादन 89.26 लाख टन तक पहुंच गया है जो पिछले साल 15 अप्रैल तक 91.10 लाख टन था। सकारात्मक पहलू यह है कि यूपी में शुगर रिकवरी 9.70 फीसदी से बढ़कर 10.20 फीसदी हो गई है। यानी कम गन्ने से अधिक चीनी बनी।</p>
<p>इस तरह चीनी मिलों को गन्ना आपूर्ति में जो कमी आई, <span>उसकी कुछ हद तक भरपाई बढ़ी रिकवरी से हो गई। चीनी मिलों को उतना नुकसान नहीं हुआ</span>, <span>जितना घाटा गन्ना किसानों को उठाना पड़ा। यूपी में चीनी मिलों को लगभग 63 लाख टन कम गन्ना आपूर्ति के कारण किसानों को अनुमानित 2500 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। </span></p>
<p>चीनी मिलों का नुकसान यह है कि उन्हें पर्याप्त गन्ना नहीं मिला और समय से पहले ही सीजन समाप्त करना पड़ा है। अधिकांश मिलें कम क्षमता पर चलानी पड़ीं, <span>जिससे आर्थिक दिक्कतें बढ़ सकती हैं।</span></p>
<p><strong>गन्ना अर्थव्यवस्था का संकट </strong></p>
<p>पश्चिमी यूपी की एक प्रमुख चीनी मिल के अधिकारी ने <em>रूरल वॉयस</em> को बताया कि इस साल बेहतर भाव के बावजूद चीनी मिलें गन्ना जुटाने के लिए जूझती रहीं। गन्ने की कमी से चिंताजनक स्थिति पैदा हो गई। कई चीनी मिलों को पिछले साल के मुकाबले 2-3 <span>लाख टन तक कम गन्ना मिला</span>, <span>जिसका असर चीनी उत्पादन और मिलों के संचालन पर पड़ा है।</span></p>
<p><span>भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता <strong>राकेश टिकैत</strong> का कहना है कि उत्तर प्रदेश के गन्ना किसान इस समय गंभीर संकट में हैं। गन्ने की फसल रोग्रस्त होने के कारण पैदावार घटी है जबकि खेती की लागत लगातार बढ़ती जा रही है। सरकार और चीनी मिलें किसानों को गन्ने की रोग-प्रतिरोधक</span><span>&nbsp;किस्में उपलब्ध कराने में नाकाम रही हैं। टिकैत का कहना है कि अगर प्रदेश में गन्ने की खेती को बचाना है तो सरकार और चीनी मिलों को मिलकर किसानों को सहारा देना होगा।</span></p>
<p><strong>आंकड़ों से नदारद जमीनी हकीकत </strong></p>
<p>देश के प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश में इस साल चीनी मिलों को लगभग 63 लाख टन कम गन्ने की आपूर्ति हुई, <span>जबकि सरकारी आंकड़ों में हर साल प्रदेश में गन्ने का क्षेत्र और उत्पादन बढ़ता जा रहा है। केंद्रीय कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार</span>, <span>यूपी में गन्ने की बुवाई का क्षेत्र 2021</span>-22 <span>में 21.77 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 2025</span>-<span>26 में 28.02 लाख हेक्टेयर तक पहुंचने का अनुमान है। </span></p>
<p><span>इस पांच वर्षों में प्रदेश में गन्ना उत्पादन 1791.67 लाख टन से बढ़कर 2025</span>-26 <span>में 2329.59 लाख टन तक पहुंचने का अनुमान है। यानी प्रदेश में गन्ना क्षेत्र और उत्पादन बढ़ रहा है।&nbsp;</span></p>
<p>लेकिन सवाल यह है कि अगर यूपी में 2329 लाख टन गन्ना उत्पादन हुआ तो फिर प्रदेश की चीनी मिलों को केवल 874.51 <span>लाख टन गन्ना ही क्यों मिल पाया?</span> यह कुल उत्पादन का मात्र 38 फीसदी है। बाकी का 62 फीसदी गन्ना कहां गया? इससे बुवाई और उत्पादन के आंकड़ों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठता है।&nbsp;</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x_69e1dc7bf10ac.jpg" alt="" style="display: block; margin-left: auto; margin-right: auto;" /></p>
<p><strong>राष्ट्रीय स्तर पर भी आंकड़ों में विसंगति </strong></p>
<p>आंकड़ों में यह विसंगति राज्य ही नहीं राष्ट्रीय स्तर पर भी है। कृषि मंत्रालय के अनुमानों के अनुसार, देश में गन्ने की बुवाई का क्षेत्र पांच वर्षों में 51.75 लाख हेक्टयर से बढ़कर 2025-26 में 58.51 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया। इस दौरान देश का कुल गन्ना उत्पादन 4354 लाख टन से बढ़कर 5001 लाख टन तक पहुंचने का अनुमान है। जबकि देश भर की चीनी मिलों में इस साल कुल 2865 लाख टन गन्ने की पेराई हुई। फिर बाकी का लगभग 2136 लाख टन यानी करीब 42 फीसदी गन्ना कहां गया?</p>
<p>कुल गन्ना उत्पादन का कुछ हिस्सा बीज और कोल्हू व खांडसारी उद्योगों में जाता है। मगर इसकी हिस्सेदारी आमतौर पर 25-35 फीसदी के आसपास रहती है।&nbsp;&nbsp;</p>
<p>कुल गन्ना उत्पादन और चीनी मिलों में गन्ना पेराई के बढ़ते अंतर पर <strong>नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज लिमिटेड</strong> ने भी चिंता जताई है। फेडरेशन की ओर से 6 अप्रैल को जारी विज्ञप्ति के अनुसार, <span>भारत सरकार के दूसरे </span>अग्रिम अनुमानों के अनुसार इस साल गन्ना उत्पादन 5000 लाख टन को पार कर गया। गन्ने के रकबे में बढ़ोतरी और रिकॉर्ड उत्पादन के बावजूद चीनी उत्पादन के लिए लगभग 2975 लाख टन गन्ना पेराई का अनुमान है जो कुल उत्पादन का 59.50 फीसदी है। यह चीनी उत्पादन के लिए गन्ना पेराई का एक दशक का न्यूनतम स्तर है। आमतौर पर कुल गन्ना उत्पादन का 65-75 फीसदी चीनी उत्पादन में उपयोग होता है। &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;</p>
<p><strong>कम गन्ना आपूर्ति की वजह </strong><br /><span>यूपी में चीनी मिलों को कम गन्ना आपूर्ति के पीछे कई वजहें मानी जा रही हैं। गन्ने की प्रमुख प्रजाति सीओ-</span>0238 <span>में रेड रॉट जैसे रोगों के कारण पैदावार घटी है। गन्ने की फसल में रोगों व कीटों का प्रभावी नियंत्रण नहीं हो पाया</span>, <span>जबकि किसान कई साल से इस समस्या से जूझ रहे हैं। फसल में रोगों के प्रकोप के चलते पैदावार और उत्पादन प्रभावित हुआ है।&nbsp;</span></p>
<p>बिजनौर जिले के किसान नितिन देशवाल बताते हैं कि किसानों को गन्ना का बीज लेने के लिए भी दूर-दूर तक भटकना पड़ता है। अभी तक किसानों को सीओ-0238 <span>का विकल्प नहीं मिल पाया है। कई नई प्राजातियों को चीनी मिलें रिजेक्ट कर देती हैं। साथ ही गन्ने की खेती में श्रमिकों की समस्या और</span>&nbsp;<span>खाद व कीटनाशकों की बढ़ती लागत के कारण भी किसानों का गन्ने की खेती से मोहभंग होने लगा है। इन तमाम दिक्कतों के चलते बहुत से किसान गन्ने की बजाए बागवानी या एग्रो-फॉरेस्ट्री का रुख कर रहे हैं। कुछ किसान मक्का और आलू जैसी फसलें भी आजमा रहे हैं।</span></p>
<p><strong>महाराष्ट्र में भी मौसम की मार&nbsp;</strong></p>
<p><span>वहीं देश के सबसे बड़े चीनी उत्पादक और दूसरे सबसे बड़े गन्ना उत्पादक राज्य महाराष्ट्र में चालू सीजन में बंपर फसल की उम्मीद थी, लेकिन अक्तूबर में मौसम में आए बदलाव ने फसल को काफी नुकसान पहुंचाया। इसे जलवायु परिवर्तन के असर की तरह भी देख सकते हैं। अक्तूबर में अधिक बारिश होने के चलते जहां खेतों में पानी अधिक खड़ा रहा वहीं करीब एक माह तक बादलों के बने रहने के चलते फसल को धूप नहीं मिल सकी। फोटोसिंथिस की कमी होने का फसल पर सीधा असर पड़ा है।&nbsp;</span></p>
<p><strong>खांडसारी इकाइयों में बेहतर दाम </strong></p>
<p>यूपी में इस साल कई गुड व खांडसारी इकाइयों ने किसानों को गन्ने का दाम बेहतर चीनी मिलों से भी अधिक दिया। चीनी मिलों को कम गन्ना मिलने के पीछे यह भी एक वजह रही है।</p>
<p>कुल मिलाकर राज्य में गन्ने की पैदावार प्रभावित हुई है और गन्ने की खेती कई दिक्कतों से घिरी है,<span> जिसका असर उत्पादन पर दिख रहा है। यह किसानों के साथ-साथ चीनी उद्योग और सरकार के सामने भी बड़ी चुनौती है। ऐसे में अगर कारगर कदम नहीं उठाए गए तो यूपी के साथ-साथ देश का चीनी उद्योग बड़े संकट में आ सकता है।&nbsp;&nbsp;</span></p>
<p>&nbsp;</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e1d0550191f.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ यूपी की चीनी मिलों में 63 लाख टन कम गन्ना पेराई, किसानों को 2500 करोड़ का नुकसान, लेकिन आंकड़ों में बढ़ा गन्ना उत्पादन   ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e1d0550191f.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[अलनीनो नहीं, ‘सुपर अलनीनो’ आएगा इस साल! मौसम विज्ञानियों ने जताई आशंका]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/not-just-el-nino-super-el-nino-likely-this-year-warn-meteorologists.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 16 Apr 2026 16:13:34 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/not-just-el-nino-super-el-nino-likely-this-year-warn-meteorologists.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारतीय मौसम विभाग ने इस वर्ष सामान्य से कम (92 प्रतिशत) मानसून की आशंका जताई है। इसका प्रमुख कारण जून के बाद पैदा होने वाली अलनीनो की परिस्थितियां हैं। लेकिन अब दुनियाभर के मौसम विज्ञानी अलनीनो की जगह &lsquo;सुपर अलनीनो&rsquo; की आशंका जताने लगे हैं। फिलहाल अलनीनो की आशंका 62 प्रतिशत की और सुपर अलनीनो की आशंका 25 प्रतिशत है। अगर ऐसा हुआ तो आने वाले महीनों में न सिर्फ गर्मी नया रिकॉर्ड बनाएगी, बल्कि दुनिया में कहीं भीषण बारिश तो कहीं भयंकर सूखे का सामना करना पड़ सकता है।</p>
<p>प्रशांत महासागर में होने वाली घटनाओं पर नजर रखने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि सुपर अलनीनो का जोखिम अधिक है। अमेरिका की स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूयॉर्क में पर्यावरण विज्ञान के प्रोफेसर डॉ. पॉल राउंडी ने एक लेख में बताया है कि पिछले 140 वर्षों में सबसे शक्तिशाली अलनीनो की आशंका वास्तविक है। विश्व मौसम संगठन की सेक्रेटरी जनरल सेलेस्ते साउलो ने कहा है कि 2023-24 का अलनीनो अब तक दर्ज पांच सबसे शक्तिशाली अलनीनो घटनाओं में से एक था। इसने 2024 में रिकॉर्ड वैश्विक तापमान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।</p>
<p>अमेरिका के जलवायु पूर्वानुमान केंद्र की तरफ से 6 अप्रैल को जारी अनुमान के अनुसार, वर्तमान में मौसमीय परिस्थितियां ला नीना से तटस्थ स्थिति की ओर बढ़ रही हैं। हालांकि, मॉडलों के मुताबिक इस गर्मी में अलनीनो विकसित होने की 62 प्रतिशत संभावना है और इसके वर्ष के अंत तक बने रहने के आसार हैं।</p>
<p><strong>अलनीनो और इसके प्रभाव</strong></p>
<p>अलनीनो मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर की सतह के गर्म होने से होती है। वैज्ञानिक आम तौर पर तीन अवस्थाओं का अध्ययन करते हैं। अलनीनो के विपरीत ला नीना तब होता है जब समुद्र की सतह का तापमान औसत से कम होता है। जब न तो अलनीनो और न ही ला नीना हो और सतह का तापमान लगभग सामान्य स्तर पर हो तो तटस्थ स्थिति मानी जाती है।</p>
<p>उत्तरी गोलार्ध में वसंत ऋतु के दौरान विकसित होने वाली और हर तीन से सात वर्षों में बदलने वाली इन तीन अवस्थाओं को मिलाकर &ldquo;अलनीनो-दक्षिणी दोलन&rdquo; (ENSO) कहा जाता है। अलनीनो और ला नीना के दौरान समुद्र की सतह के तापमान में एक डिग्री से तीन डिग्री सेल्सियस तक की वृद्धि या गिरावट हो सकती है। इसका वर्षा, सूखा, गर्मी और विभिन्न क्षेत्रों में जलवायु आपदाओं पर गहरा प्रभाव पड़ता है।</p>
<p>अलनीनो के वर्षों में वे हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं या दिशा बदल लेती हैं, जो सामान्यतः गर्म पानी को पश्चिम की ओर धकेलती हैं। इसके परिणामस्वरूप प्रशांत महासागर के उस हिस्से की सतह पर जलधाराएं गर्म होने लगती हैं। सामान्य से कम से कम 0.5 डिग्री सेल्सियस अधिक तापमान होने पर दुनिया के मौसम पर व्यापक असर होता है। यह अक्सर वैश्विक तापमान को बढ़ा देता है।</p>
<p>मौसम को प्रभावित करने वाले कई कारक होते हैं, लेकिन अलनीनो व्यापक बदलाव ला सकता है। यह जेट स्ट्रीम के प्रवाह को बदल देता है और वर्षा के पैटर्न को उलट देता है, जिससे दुनिया के कुछ हिस्सों में तेज तूफान आते हैं, जबकि अन्य क्षेत्रों में सूखा जैसी स्थिति बन जाती है। इसके अलावा, यह पहले से बढ़ते तापमान को और अधिक बढ़ाने की क्षमता भी रखता है, भले ही यह प्रभाव कुछ समय के लिए ही क्यों न हो।</p>
<p><strong>2015 में भी आया था सुपर अलनीनो</strong></p>
<p>इससे पहले 2015 में सुपर अलनीनो आया था जिसने वैश्विक स्तर पर गंभीर असर डाला था। इस घटना के कारण इथियोपिया में भीषण सूखा पड़ा, जबकि प्यूर्टो रिको में पानी का संकट उत्पन्न हो गया। इसके अलावा, मध्य उत्तरी प्रशांत क्षेत्र में अत्यधिक सक्रिय तूफानी मौसम ने कई रिकॉर्ड तोड़ दिए।</p>
<p>विशेषज्ञों के अनुसार, अलनीनो आमतौर पर ऑस्ट्रेलिया, दक्षिणी और मध्य अफ्रीका, भारत तथा दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों में सूखा और अत्यधिक गर्मी की स्थिति पैदा करता है। वहीं दूसरी ओर, भारी वर्षा की संभावना अमेरिका के दक्षिणी हिस्सों, मध्य पूर्व के कुछ क्षेत्रों और दक्षिण-मध्य एशिया में देखी जाती है, जिससे इन इलाकों में बाढ़ जैसी स्थितियां भी उत्पन्न हो सकती हैं।</p>
<p><strong>सुपर अलनीनो की संभावना 25 प्रतिशत</strong></p>
<p>सुपर अलनीनो की घटना बहुत कम होती है। ऐसा तब होता है जब समुद्र की सतह का तापमान कम से कम 2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाता है। वर्ष 1950 के बाद ऐसा बहुत कम बार हुआ है और केवल एक बार तापमान 2.5 डिग्री सेल्सियस से भी अधिक बढ़ा है।</p>
<p>तापमान जितना अधिक बढ़ता है, अलनीनो के प्रभाव उतने ही तीव्र और व्यापक होने की संभावना रहती है। अमेरिका के नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) के वैज्ञानिकों ने अनुमान जताया है कि इस साल शरद ऋतु या सर्दियों तक ऐसे &ldquo;सुपर&rdquo; अलनीनो की स्थिति बनने की संभावना 25 प्रतिशत है।&nbsp;</p>
<p>हालांकि उन्होंने यह चेतावनी भी दी है कि वसंत ऋतु के दौरान किए गए पूर्वानुमान अक्सर स्पष्ट नहीं होते हैं। उनका कहना है कि वसंत के दौरान जलवायु परिस्थितियों में होने वाले बदलावों के कारण सटीक पूर्वानुमान लगाना मुश्किल होता है। इसके बावजूद कई महत्वपूर्ण संकेत दर्शाते हैं कि एक मजबूत या सुपर अलनीनो विकसित हो सकता है।</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e0bceb0100a.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ अलनीनो नहीं, ‘सुपर अलनीनो’ आएगा इस साल! मौसम विज्ञानियों ने जताई आशंका ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e0bceb0100a.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[हरियाणा में गेहूं खरीद मानकों में केंद्र ने दी छूट, 70% तक चमकहीन गेहूं की होगी खरीद; पंजाब में छूट का इंतजार]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/states/centre-relaxes-wheat-procurement-norms-in-haryana-allows-70-pc-lustre-loss-punjab-still-waiting.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 16 Apr 2026 12:37:38 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/states/centre-relaxes-wheat-procurement-norms-in-haryana-allows-70-pc-lustre-loss-punjab-still-waiting.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>बेमौसम बारिश और मौसम की मार से प्रभावित गेहूं की गुणवत्ता को देखते हुए केंद्र सरकार ने हरियाणा में खरीद मानकों में अहम छूट देने का निर्णय लिया है। इससे पहले राजस्थान में भी गेहूं खरीद मानकों में ढील दी जा चुकी है, जबकि पंजाब सहित अन्य राज्यों के किसान अभी भी राहत का इंतजार कर रहे हैं।</p>
<p>केंद्र सरकार ने हरियाणा के किसानों को राहत देते हुए गेहूं खरीद मानकों में अस्थायी छूट दी है। उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने रबी मार्केटिंग सीजन 2026-27 के लिए यह फैसला हरियाणा सरकार के अनुरोध पर लिया है, ताकि बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि से प्रभावित किसानों को अपनी फसल एमएसपी पर बेचने में परेशानी न हो।</p>
<p>केंद्र के निर्णय के अनुसार, पूरे हरियाणा में गेहूं की खरीद अब शिथिल मानकों के साथ की जाएगी। प्रमुख छूटें इस प्रकार हैं:</p>
<p><strong>चमक में कमी (Lustre Loss):</strong> चमक में कमी की सीमा को बढ़ाकर 70% तक स्वीकार किया गया है।<br /><strong>सिकुड़े और टूटे दाने (Shrivelled &amp; Broken Grains):</strong> सीमा 6% से बढ़ाकर 15% कर दी गई है।<br /><strong>क्षतिग्रस्त अनाज (Damaged Grain):</strong> खराब और मामूली क्षतिग्रस्त अनाज की कुल मात्रा 6% तक सीमित रहेगी।</p>
<p>सरकार ने स्पष्ट किया है कि इन छूटों के तहत खरीदे गए गेहूं को अलग से रखा जाएगा और उसका अलग हिसाब रखा जाएगा, ताकि गुणवत्ता प्रबंधन बना रहे।</p>
<p>इस फैसले से हरियाणा के लाखों किसानों को एमएसपी (2585 रुपये प्रति क्विंटल) पर अपनी उपज बेचने में आसानी होगी और वे मजबूरी में औने-पौने दाम पर फसल बेचने से बच सकेंगे।</p>
<p>मार्च और अप्रैल में हुई असमय बारिश के कारण गेहूं के दानों में नमी बढ़ने, सिकुड़न और चमक में कमी जैसी समस्याएं सामने आई हैं। इसके चलते बड़ी मात्रा में फसल निर्धारित गुणवत्ता मानकों से बाहर हो रही थी, जिससे खरीद प्रक्रिया प्रभावित हुई। हरियाणा में किसान संगठनों और विपक्षी दलों द्वारा भी गेहूं खरीद मानकों में ढील दिए जाने की मांग की जा रही थी।&nbsp;</p>
<h3><strong>खरीद की रफ्तार धीमी</strong></h3>
<p>गेहूं कटाई के समय बारिश और खरीद मानकों में छूट के इंतजार के चलते इस साल सरकारी खरीद अभी तक रफ्तार नहीं पकड़ पाई है। इसी वजह से देशभर में गेहूं की सरकारी खरीद में गिरावट दर्ज की गई है।</p>
<p>चालू खरीद सीजन 2026-27 में अब तक गेहूं की सरकारी खरीद 15.30 लाख टन रही है, जबकि पिछले साल इसी अवधि तक 50.08 लाख टन खरीद हो चुकी थी। 13 अप्रैल तक हरियाणा से 11.23 लाख टन, पंजाब से 29,925 टन, मध्य प्रदेश से 1.02 लाख टन और उत्तर प्रदेश से 96,670 टन गेहूं की खरीद हुई है।</p>
<p>राजस्थान और हरियाणा में खरीद मानकों में छूट से आने वाले दिनों में खरीद में तेजी आने की उम्मीद है।&nbsp;</p>
<h3><strong>आवक के मुकाबले एक चौथाई खरीद</strong></h3>
<p>हरियाणा में गेहूं खरीद 1 अप्रैल से शुरू हो चुकी है और राज्य का लक्ष्य 72 लाख टन गेहूं खरीदने का है। 12 अप्रैल तक राज्य की मंडियों में लगभग 39.65 लाख टन गेहूं की आवक हो चुकी है। जिसमें से बायोमैट्रिक सत्यापन 30.90 लाख टन गेहूं के लिए हुआ और 10.92 लाख टन गेहूं की खरीद की गई। आवक के मुकाबले एक चौथाई खरीद के पीछे जटिल प्रक्रिया और खरीद मानकों में छूट के इंतजार को वजह माना जा रहा है।&nbsp;</p>
<p style="font-weight: 400;"><span>राज्य में सरसों की&nbsp;खरीद&nbsp;हैफेड एवं&nbsp;गेहूं&nbsp;की&nbsp;खरीद&nbsp;खाद्य</span>,<span>&nbsp;</span><span>नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता मामले विभाग</span>,<span>&nbsp;</span><span>हैफेड</span>,<span>&nbsp;</span><span>हरियाणा&nbsp;वेयर हाउसिंग कारपोरेशन तथा भारतीय खाद्य निगम द्वारा की जा रही है।&nbsp;</span></p>
<h3><strong>किसानों को राहत, लेकिन दिक्कतें काफी</strong></h3>
<p>हरियाणा में खरीद मानकों में छूट ऐसे समय दी गई है जब मंडियों में बड़ी मात्रा में गेहूं पहुंच चुका है, लेकिन खरीद में देरी और गुणवत्ता संबंधी अड़चनों के कारण किसानों को इंतजार करना पड़ रहा था।&nbsp;</p>
<p>हालांकि, जमीनी स्तर पर अभी भी कई चुनौतियां बनी हुई हैं। कई मंडियों में खरीद प्रक्रिया धीमी है, ई-खरीद पोर्टल में तकनीकी दिक्कतें हैं, और भंडारण व परिवहन की कमी जैसी समस्याएं भी सामने आ रही हैं। खरीद की जटिल प्रक्रिया और धीमी खरीद को लेकर विपक्ष भी सरकार पर हमलावर है।&nbsp;</p>
<p></p>
<p></p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e08af0d98d1.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ हरियाणा में गेहूं खरीद मानकों में केंद्र ने दी छूट, 70% तक चमकहीन गेहूं की होगी खरीद; पंजाब में छूट का इंतजार ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69e08af0d98d1.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[उत्पादन लागत से भी कम हुए प्याज के दाम, किसानों का बढ़ा संकट, निर्यात सब्सिडी बढ़ाने की मांग]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/onion-prices-fall-below-production-cost-demand-for-higher-export-subsidy-intensifies.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 16 Apr 2026 06:36:54 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/onion-prices-fall-below-production-cost-demand-for-higher-export-subsidy-intensifies.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">ईरान युद्ध के कारण भारत से प्याज का निर्यात बाधित होने से घरेलू बाजार में प्याज के दाम किसानों की लागत से भी नीचे चले गए हैं। हालांकि मलेशिया और श्रीलंका जैसे देशों को निर्यात और सरकारी खरीद के कारण दो हफ्ते से कीमतों में थोड़ा सुधार का रुख देखने को मिल रहा है, लेकिन खाड़ी देशों को प्याज निर्यात में अब भी मुश्किल आ रही है। ऐसे में किसान नेताओं ने सरकार से तत्काल हस्तक्षेप करते हुए किसानों की मदद करने और निर्यात सब्सिडी बढ़ाने की मांग की है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के पोर्टल एग-मार्कनेट (agmarknet) पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार महाराष्ट्र की लासलगांव एपीएमसी में 9-15 अप्रैल 2026 को दाम 1098 रुपये प्रति क्विंटल रहे जबकि 1-8 अप्रैल 2026 को 1088 रुपये क्विंटल थे। महीने भर पहले, 9-15 मार्च 2026 को दुनिया की इस सबसे बड़ी प्याज मंडी में दाम करीब 927 रुपये क्विंटल और साल भर पहले 9-15 अप्रैल 2025 को 1100 रुपये क्विंटल थे। इस तरह, हफ्ते भर में कीमतों में एक प्रतिशत और महीने भर में 18.6 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। हालांकि सालाना आधार पर दाम 0.2 प्रतिशत नीचे हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">महाराष्ट्र की दूसरी मंडियों की बात करें तो 9-15 अप्रैल के दौरान जामखेड़ मंडी में सबसे कम 600 रुपये क्विंटल तो हिंगणा मंडी में 1471 रुपये और कामथी मंडी में सबसे अधिक 1770 रुपये क्विंटल का भाव रहा। जामखेड़ में महीने भर पहले 613 रुपये, हिंगणा में 1382 रुपये और कामथी में 2290 रुपये क्विंटल का भाव था। इस तरह, कामथी मंडी में एक महीने में दाम 22.7 प्रतिशत गिरे हैं।</span></p>
<p><strong>किसान संगठनों की सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">स्वाभिमानी शेतकरी संघटना के अध्यक्ष और पूर्व लोकसभा सांसद <strong>राजू शेट्टी</strong> ने <strong>रूरल वॉयस</strong> को बताया कि प्याज की लागत लगभग 1500 रुपये प्रति क्विंटल है, जबकि भाव 900 रुपये तक गिर गए थे। अब रबी की फसल आने लगी है तो आने वाले दिनों में दाम और गिर सकते हैं। उन्होंने बताया कि बांग्लादेश को प्याज का निर्यात लगभग बंद है। फिलहाल मलेशिया और श्रीलंका को निर्यात किया जा रहा है। निर्यात बाधित होने से भी घरेलू बाजार में दाम में गिरावट आई है। उन्होंने बताया कि किसान अपने पास प्याज को होल्ड कर सकें, इसमें मदद के लिए सरकार को चिट्ठी लिखी है। लेकिन सरकार की तरफ से अभी तक कोई कदम नहीं उठाया गया है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">शेतकरी संघटना के पूर्व प्रेसिडेंट <strong>अनिल घनवत</strong> ने रूरल वॉयस को बताया कि दो हफ्ते पहले तक प्याज के दाम काफी गिर गए थे। हालांकि उसके बाद इसमें सुधार देखने को मिल रहा है। उन्होंने बताया कि नाफेड के जरिए सरकार दो लाख टन प्याज की खरीद कर रही है और बीज कंपनियां भी खरीद रही हैं। इसके अलावा सितंबर-अक्टूबर में दाम बढ़ने की आशंका के चलते ट्रेडर और किसान प्याज का स्टॉक कर रहे हैं। इन वजहों से भी दाम बढ़े हैं। घनवत ने बताया कि खाड़ी देशों को प्याज निर्यात की लागत बढ़ गई है, क्योंकि अब उन्हें लंबे रूट से प्याज भेजना पड़ रहा है। इसलिए निर्यात पर सब्सिडी की बढ़ाने की मांग की जा रही है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">सोशल मीडिया एक्स पर जारी एक बयान में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार) के नेता <strong>जयंत पाटिल</strong> ने कहा कि प्याज की उत्पादन लागत करीब 2,200 रुपये प्रति क्विंटल है, जबकि बाजार में किसानों को केवल 900 से 1,300 रुपये प्रति क्विंटल का भाव मिल रहा है। उन्होंने इसे किसानों के लिए &ldquo;घाटे का सौदा&rdquo; बताते हुए कहा कि ऐसी स्थिति में प्याज की खेती जारी रखना मुश्किल हो गया है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">पाटिल ने कहा कि एक तरफ युद्ध जैसी परिस्थितियों के कारण प्याज का निर्यात रुका हुआ है, वहीं दूसरी ओर बेमौसम बारिश ने फसल को नुकसान पहुंचाया है। इस दोहरे संकट ने किसानों को आर्थिक रूप से बुरी तरह जकड़ लिया है और उनमें निराशा बढ़ रही है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">उन्होंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस से अपील की कि वे तुरंत हस्तक्षेप कर प्याज निर्यात को बढ़ावा देने के लिए प्रयास तेज करें और किसानों के लिए उचित न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) घोषित करें, ताकि उन्हें उनकी लागत के अनुरूप कीमत मिल सके।</span></p>
<p><strong>थोक महंगाई के आंकड़ों में भी गिरे हुए भाव की पुष्टि</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय की तरफ से बुधवार को ही जारी थोक महंगाई के आंकड़ों में बताया गया है कि मार्च 2026 में प्याज के दाम एक साल पहले की तुलना में 42.11 प्रतिशत कम रहे। अप्रैल 2025 से मार्च 2026 तक पूरे वित्त वर्ष के दौरान तो प्याज की औसत कीमत 47.53 प्रतिशत कम रही है।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">प्याज की थोक कीमतों में कम से कम छह महीने से गिरावट का माहौल है। सालाना आधार पर प्याज के दाम अक्टूबर 2025 में 66.06 प्रतिशत, नवंबर में 64.70 प्रतिशत, दिसबंर में 54.40 प्रतिशत, जनवरी 2026 में 33.42 प्रतिशत, फरवरी में 40.95 प्रतिशत और मार्च में 42.11 प्रतिशत कम रहे हैं। उपभोक्ता मंत्रालय के अनुसार करीब एक महीने से प्याज के खुदरा दाम 25 रुपये प्रति किलो से नीचे चल रहे हैं।</span></p>
<p><br /><br /></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/08/image_750x500_66b393d457273.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ उत्पादन लागत से भी कम हुए प्याज के दाम, किसानों का बढ़ा संकट, निर्यात सब्सिडी बढ़ाने की मांग ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/08/image_750x500_66b393d457273.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[चौतरफा चुनौतियों से घिरा खरीफ सीजन, ICRA ने जताई कृषि GVA घटने की आशंका]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/kharif-season-is-facing-all-round-challenges-icra-expects-agricultural-gva-to-decline.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 15 Apr 2026 18:14:47 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/kharif-season-is-facing-all-round-challenges-icra-expects-agricultural-gva-to-decline.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत में आगामी खरीफ सीजन (जून&ndash;सितंबर) पर इस बार कई गंभीर चुनौतियां मंडरा रही हैं। इस साल अल नीनो के प्रभाव के कारण मानसून की बारिश सामान्य से कम रहने का अनुमान है, जबकि पश्चिम एशिया में जारी तनाव के चलते उर्वरक और ईंधन आपूर्ति के मोर्चे पर दिक्कतें बढ़ सकती हैं। ईरान युद्ध के कारण देश के कृषि निर्यात को भी बड़ा झटका लगा है, जिसका असर किसानों की आमदनी पर पड़ रहा है। इस बीच बढ़ती महंगाई से किसानों की लागत भी बढ़ रही है। इन सभी चुनौतियों का असर खरीफ फसलों की बुवाई, खाद्यान्न उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।</p>
<p>भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने इस साल दक्षिण-पश्चिम मानसून सीजन के दौरान बारिश &lsquo;सामान्य से कम&rsquo; रहने का अनुमान जताया है, जो दीर्घावधि औसत (LPA) का 92 फीसदी रह सकती है। इसमें &plusmn;5% मॉडल त्रुटि संभव है। यह स्थिति मुख्य रूप से अल नीनो के विकसित होने की आशंका से जुड़ी है, जो आमतौर पर भारत में वर्षा को कमजोर करता है। तीन साल के अच्छे मानसून के बाद यह पहला मौका है जब कम वर्षा का अनुमान लगाया गया है। पूरे देश में मानसून सीजन के दौरान दीर्घावधि औसत वर्षा 87 सेंटीमीटर मानी जाती है।</p>
<p>आईएमडी के महानिदेशक मृत्युंजय महापात्रा के अनुसार, दक्षिण-पश्चिम मानसून सीजन के दौरान अल नीनो जैसी परिस्थितियां विकसित होने की संभावना है, जो अगस्त&ndash;सितंबर में बारिश को और कमजोर कर सकती हैं। आईएमडी के मुताबिक, आगामी मानसून के दौरान सामान्य से कम (एलपीए का 90&ndash;95%) बारिश की संभावना 31 फीसदी है, जबकि 90 फीसदी से कम वर्षा की संभावना 35 फीसदी है। वहीं, सामान्य मानसून (96&ndash;104%) की संभावना 27 फीसदी आंकी गई है।</p>
<p><strong>बुवाई और उत्पादन&nbsp;&nbsp;</strong><br />रेटिंग एजेंसी ICRA की रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल आईएमडी ने मानसून के सामान्य से कम (LPA का 92%) रहने का अनुमान जताया है, जो पिछले 25 वर्षों में प्रथम चरण का सबसे कम पूर्वानुमान है। सामान्य से कम मानसून का असर खरीफ की बुवाई, पैदावार, किसानों की आय और खाद्य कीमतों पर पड़ने की संभावना है।</p>
<p>रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच आगामी खरीफ सीजन में उर्वरकों की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती हो सकती है। ऐसे में खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में उचित बढ़ोतरी कृषि क्षेत्र के मनोबल को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण होगी।</p>
<p>ICRA ने वित्त वर्ष 2026&ndash;27 के लिए कृषि GVA में 3 फीसदी वृद्धि के अपने पूर्वानुमान में गिरावट की आशंका जताई है, जो सामान्य मानसून की उम्मीद पर आधारित था।&nbsp;</p>
<p><strong>जलाशयों का स्तर</strong><br />सामान्य से कम मानसून का पूर्वानुमान जलाशयों के जलस्तर के लिए अच्छा संकेत नहीं है। केंद्रीय जल आयोग के अनुसार, 9 अप्रैल तक देश के 166 बड़े जलाशयों में पानी का स्तर तेजी से गिर रहा है। इन जलाशयों में कुल स्टोरेज घटकर कुल क्षमता का केवल 44.71% बचा है। दो महीने में जलस्तर में 22 <span>प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है जिससे गर्मियों में जल संकट की आशंका बढ़ गई है। सबसे अधिक गिरावट पंजाब और राजस्थान के जलाशयों में दर्ज की गई है।</span></p>
<p>हालांकि, <span>प्रमुख जलाशयों का जलस्तर पिछले </span>10 <span>साल के औसत से बेहतर है</span>, <span>लेकिन गिरावट की रफ्तार चिंता का विषय है।</span></p>
<p><strong>उर्वरक और ईंधन आपूर्ति पर असर</strong><br />पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण उर्वरकों की उपलब्धता कृषि क्षेत्र के सामने एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। हालांकि केंद्र सरकार खेती के लिए पर्याप्त उर्वरक उपलब्ध होने का दावा कर रही है, लेकिन वैश्विक स्तर पर आपूर्ति बाधित होने और कीमतों में उछाल के बीच किसानों तक उर्वरकों की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती है।</p>
<p>कतर, कुवैत और सऊदी अरब में पेट्रोलियम रिफाइनरियों को नुकसान होने से सल्फर की आपूर्ति प्रभावित हुई है। इसके चलते वैश्विक स्तर पर डीएपी की उपलब्धता एक बड़ी समस्या बन गई है। उर्वरकों की कीमतों में भी तेजी से बढ़ोतरी हुई है। भारत के लिए यह स्थिति अधिक चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि देश अपनी उर्वरक जरूरतों को पूरा करने के लिए आयात पर निर्भर है।</p>
<p>हालांकि सरकार का कहना है कि फिलहाल देश में पिछले साल से बेहतर स्टॉक मौजूद है। एक अप्रैल को देश में यूरिया का स्टॉक लगभग 62 लाख टन और डीएपी का स्टॉक करीब 23 लाख टन था। ईरान युद्ध की शुरुआत के बाद से खाड़ी देशों से भारत में न तो यूरिया का आयात हुआ है और न ही एलएनजी का, जिसका असर देश में यूरिया उत्पादन पर पड़ा है, क्योंकि नाइट्रोजन उर्वरकों के उत्पादन में प्राकृतिक गैस एक प्रमुख कच्चा माल है।</p>
<p>खरीफ सीजन में लगभग 200 लाख टन यूरिया की खपत होती है। ऐसे में आयात में देरी से उपलब्धता की समस्या पैदा हो सकती है। इन परिस्थितियों को देखते हुए सरकार सब्सिडी वाले उर्वरकों के बेहतर प्रबंधन और लक्षित वितरण के लिए नेशनल फ्रेमवर्क लागू करने की दिशा में कदम बढ़ा रही है।</p>
<p><strong>खाद्य महंगाई और ग्रामीण अर्थव्यवस्था&nbsp;</strong><br />मौसम और भू-राजनीतिक दोनों कारकों के संयुक्त प्रभाव से खाद्य महंगाई बढ़ने का खतरा है। ICRA का अनुमान है कि चालू वित्त वर्ष में खुदरा महंगाई (CPI) 4.5% से अधिक रह सकती है। कम उत्पादन और महंगे इनपुट के कारण बाजार में कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे ग्रामीण मांग और समग्र अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी।&nbsp;</p>
<p>विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मानसून कमजोर रहता है और खाड़ी संकट लंबा खिंचता है, तो इसका असर कृषि निर्यात, खाद्य सुरक्षा और आर्थिक विकास दर पर भी पड़ सकता है।</p>
<p>&nbsp;</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69df8ca4b4939.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ चौतरफा चुनौतियों से घिरा खरीफ सीजन, ICRA ने जताई कृषि GVA घटने की आशंका ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69df8ca4b4939.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[भाखड़ा ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड पर केंद्र का नया नोटिफिकेशन हरियाणा के हितों के खिलाफ: भूपेंद्र सिंह हुड्डा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/states/centre-new-notification-on-bbmb-an-attack-on-haryana-interests-bhupinder-singh-hooda.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 15 Apr 2026 14:04:55 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/states/centre-new-notification-on-bbmb-an-attack-on-haryana-interests-bhupinder-singh-hooda.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने भाखड़ा ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड (बीबीएमबी) को लेकर केंद्र सरकार द्वारा जारी नए नोटिफिकेशन को पूरी तरह हरियाणा के हितों के खिलाफ बताया है। उन्होंने कहा कि यह फैसला राज्य के अधिकारों को कमजोर करने वाला है।</p>
<p>चंडीगढ़ में पत्रकारों से बातचीत में हुड्डा ने कहा कि हरियाणा जब पंजाब से अलग हुआ था, तभी बीबीएमबी के लिए स्पष्ट नियम बनाए गए थे। इन नियमों में राज्यों के हितों का संतुलन सुनिश्चित किया गया था। उदाहरण के तौर पर बोर्ड में सदस्य (सिंचाई) हरियाणा से और सदस्य (पावर) पंजाब से होगा जबकि अध्यक्ष हिमाचल का नहीं होगा।</p>
<p>उन्होंने आरोप लगाया कि नए नोटिफिकेशन में इन प्रावधानों की धज्जियां उड़ा दी हैं और अब किसी भी पद पर किसी भी राज्य का सदस्य नियुक्त किया जा सकता है। इससे हरियाणा के अधिकारों के साथ खिलवाड़ की आशंका बढ़ गई है। क्योंकि पहले भी ऐसा हो चुका है।</p>
<p>हुड्डा ने कहा कि एक तरफ केंद्र और राज्य में सत्तारूढ़ भाजपा की सरकार हरियाणा को सतलुज-यमुना लिंक नहर (एसवाईएल) का पानी दिलाने में विफल रही है, वहीं दूसरी तरफ भाखड़ा के पानी और बीबीएमबी में नौकरियों में भी हरियाणा के हितों की अनदेखी की जा रही है। प्रदेश की भाजपा सरकार इस मुद्दे पर मौन धारण किए बैठी है। बीबीएमबी में जब हरियाणा के कोटे की भर्तियों को खत्म किया गया था, तब भी प्रदेश सरकार ने कोई आपत्ति दर्ज नहीं करवाई थी।</p>
<p>उन्होंने याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट कई साल पहले हरियाणा के पक्ष में फैसला दे चुका है, फिर भी भाजपा शासित केंद्र और राज्य सरकारें हरियाणा को उसके हक का पानी दिलाने में नाकाम हैं। यह हरियाणा की जनता के साथ विश्वासघात है।</p>
<p><strong>खरीद को लेकर सरकार पर हमला </strong></p>
<p>मंडियों में गेहूं-सरसों की खरीद व्यवस्था को लेकर भी भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि सरकार ने किसानों को पोर्टल और जटिल शर्तों के जाल में उलझा रखा है। अपनी फसल बेचने के लिए किसानों को पहले पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन कराना पड़ता है, लेकिन सीजन के टाइम पोर्टल ठप हो जाता है। फिर गेट पास कटता, जो रजिस्ट्रेशन ना होने से कट ही नहीं पाता। कई दिन की माथापच्ची के बाद ये काम हो जाता है तो बायोमेट्रिक, ट्रेक्टर नंबर, वेरिफिकेशन और गारंटर जैसी शर्तें थोप दी जाती हैं। भाजपा सरकार किसानों को अपराधी की तरह ट्रीट कर रही है।&nbsp;</p>
<p>हुड्डा ने आरोप लगाया कि सरकार ने किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से वंचित करने का एक पूरा तंत्र तैयार कर रखा है। खरीद से ज्यादा मंशा घोटाले करने की नज़र आती है। पिछले सीजन में धान खरीद में घोटाला हुआ था और अब गेहूं व सरसों की खरीद में भी ऐसी ही आशंकाएं नजर आ रही हैं।</p>
<p>&nbsp;</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69df4da79eb52.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ भाखड़ा ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड पर केंद्र का नया नोटिफिकेशन हरियाणा के हितों के खिलाफ: भूपेंद्र सिंह हुड्डा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69df4da79eb52.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस के दाम बढ़ने से थोक महंगाई तीन साल के उच्चतम स्तर पर, खाद्य वस्तुओं की कीमतों में भी वृद्धि]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/petroleum-and-natural-gas-push-india-wpi-to-3-year-high-food-articles-also-show-a-positive-trend.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 15 Apr 2026 13:53:39 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/petroleum-and-natural-gas-push-india-wpi-to-3-year-high-food-articles-also-show-a-positive-trend.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अखिल भारतीय थोक मूल्य सूचकांक (WPI) पर आधारित वार्षिक महंगाई दर मार्च 2026 में 3.88% पर पहुंच गई। यह दर तीन वर्षों से अधिक समय में सबसे अधिक है। इससे पहले जनवरी 2023 में थोक महंगाई 4.8% थी। मार्च 2026 में महंगाई दर में यह वृद्धि मुख्य रूप से पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस, अन्य मैन्युफैक्चरिंग उत्पादों, गैर-खाद्य वस्तुओं तथा खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण हुई। इससे पहले फरवरी में थोक महंगाई 2.13% और जनवरी में 1.68% था। थोक महंगाई का यह आंकड़ा 2011-12 आधार वर्ष के अनुरूप है।</p>
<p>खाद्य वस्तुओं के लिए थोक मूल्य सूचकांक मार्च में 1.85% दर्ज किया गया। यह फरवरी में बराबर (1.85%) रहा, जबकि जनवरी 2026 में यह 1.51% था। सूचकांक में खाद्य वस्तुओं का भार 24.38% है, जो मैन्युफैक्चर्ड उत्पादों (64.23% भार) के बाद दूसरा सबसे अधिक है।</p>
<p>वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय की तरफ से जारी आंकड़ों के अनुसार मार्च में मैन्युफैक्चर्ड उत्पादों की महंगाई दर 3.39% रही, जबकि ईंधन और ऊर्जा क्षेत्र में यह 1.05% दर्ज की गई। वहीं प्राथमिक वस्तुओं की महंगाई 6.36% तक पहुंच गई, जो फरवरी में 3.27% और जनवरी में 2.27% थी।</p>
<p>खाद्य वस्तुओं में मार्च के दौरान अनाज की कीमतों में सालाना आधार पर 2.51% की गिरावट दर्ज की गई। गेहूं के दाम 4.6%, दालें 5.17%, आलू 27.94% और प्याज 42.11% सस्ते हुए। हालांकि, कुल सब्जियों की कीमतों में 1.45% की बढ़ोतरी हुई। वहीं फलों के दाम 2.11%, दूध 2.62% और अंडे व मांस 6.63% महंगे हो गए।</p>
<p>पिछले छह महीने से थोक मूल्य सूचकांक (WPI) में लगातार बढ़ोतरी का रुझान देखा जा रहा है। यह अक्टूबर 2025 में -1.02% था, जो नवंबर में -0.13%, दिसंबर में 0.96%, जनवरी 2026 में 1.68% और इस वर्ष फरवरी में 2.13% हो गया। खाद्य वस्तुओं में, अनाज की कीमतों में पिछले छह महीनों से लगातार रुझान बना हुआ है। अक्टूबर 2025 को छोड़कर, गेहूं की कीमतों में हर महीने गिरावट दर्ज की गई है। वहीं, दालों की कीमतों में भी पिछले छह महीनों से लगातार गिरावट का रुझान बना हुआ है।</p>
<p>आधार वर्ष 2024 पर आधारित उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) मार्च में 3.40% दर्ज किया गया था। भारतीय रिजर्व बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए खुदरा महंगाई 4.6% रहने का अनुमान जताया है। इसके पहली तिमाही में 4.0%, दूसरी तिमाही में 4.4%, तीसरी तिमाही में 5.2% और चौथी तिमाही में घटकर 4.7% रहने का अनुमान है।</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/10/image_750x500_670d25e4c7cf1.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस के दाम बढ़ने से थोक महंगाई तीन साल के उच्चतम स्तर पर, खाद्य वस्तुओं की कीमतों में भी वृद्धि ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/10/image_750x500_670d25e4c7cf1.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[भारत को उर्वरक आयात पर निर्भरता घटाने, एआई और आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाने की जरूरतः डॉ. एम.एल. जाट]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/naas-charts-roadmap-for-fertilizer-self-reliance-calls-for-policy-shift-and-tech-driven-solutions.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 15 Apr 2026 12:34:27 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/naas-charts-roadmap-for-fertilizer-self-reliance-calls-for-policy-shift-and-tech-driven-solutions.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>नेशनल एकेडमी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (NAAS) ने उर्वरक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए एक व्यापक रोडमैप तैयार किया है, जिसमें नीतिगत सुधार, आधुनिक तकनीकों के उपयोग और टिकाऊ कृषि पद्धतियों पर जोर दिया गया है। इस विषय पर एक विमर्श सत्र में विशेषज्ञों ने आयात निर्भरता कम करने, पोषक तत्वों &nbsp;के उपयोग की दक्षता बढ़ाने और संतुलित व आवश्यकता-आधारित उर्वरक उपयोग को बढ़ावा देने की जरूरत बताई।</p>
<p>विमर्श सत्र के बाद कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के सचिव, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के महानिदेशक और एनएएएस के प्रेसिडेंट डॉ. एम.एल. जाट ने संवाददाता सम्मेलन को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि भारत ने 2047 तक आत्मनिर्भर राष्ट्र बनने का लक्ष्य निर्धारित किया है, और इस यात्रा में कृषि क्षेत्र महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। जहां हरित क्रांति के दौरान उत्पादन बढ़ाने में उर्वरकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, वहीं वर्तमान चुनौती उर्वरकों के उपयोग की दक्षता में कमी और उनके अंधाधुंध इस्तेमाल में निहित है।</p>
<p>डॉ. जाट ने यह भी कहा कि देश में सालाना लगभग 330 लाख टन उर्वरकों की खपत होती है, जिसका बड़ा हिस्सा आयात किया जाता है; ऐसे में आयात पर निर्भरता कम करना अनिवार्य हो गया है। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे को हल करने के लिए ऐसे व्यापक दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसमें अल्पकालिक, मध्यकालिक और दीर्घकालिक रणनीति शामिल हों। उन्होंने कहा कि मृदा स्वास्थ्य जैसी योजनाओं को मजबूत करना, उर्वरकों के संतुलित और आवश्यकता-आधारित उपयोग को बढ़ावा देना, और किसानों के बीच जागरूकता बढ़ाना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x_69df558864b85.jpg" alt="" style="display: block; margin-left: auto; margin-right: auto;" /></p>
<p style="text-align: center;"><em>कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के सचिव, आईसीएआर महानिदेशक और एनएएएस प्रेसिडेंट डॉ. एम.एल. जाट प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए।</em></p>
<p>डॉ. जाट ने बताया कि उर्वरकों के उपयोग को उत्तम बनाने के लिए हमें सटीक पोषक तत्व प्रबंधन, एआई और सेंसर-आधारित प्रणालियों जैसी आधुनिक तकनीकों का लाभ उठाना चाहिए। उन्होंने कहा कि दालों और तिलहनों की ओर फसल विविधीकरण, 'वेस्ट-टू-वेल्थ' पहल के तहत जैविक कचरे की रीसाइक्लिंग का पुनर्चक्रण और जैविक स्रोतों के उपयोग को बढ़ाना, रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने में और भी अधिक योगदान देगा।</p>
<p>विचार विमर्श सत्र के बारे में उन्होंने बताया कि प्रतिभागियों ने बहु-आयामी रणनीति अपनाने की सलाह दी, जिसमें छोटे, मध्यम और लंबे समय के अनुसंधान एवं विकास लक्ष्य हों, और उन्हें हासिल करने के लिए सहायक नीतियां हों। रूपरेखा में उर्वरक अनुसंधान को मजबूत करने पर जोर दिया जाना चाहिए, ताकि स्मार्ट वैकल्पिक उर्वरक विकसित किए जा सकें; अप्रयुक्त स्वदेशी खनिजों (ग्लूकोनाइट, फॉस्फेट चट्टानें, अभ्रक, पॉलीहेलाइट...) और औद्योगिक उप-उत्पादों का उपयोग किया जा सके; जैविक पदार्थों का उपयोग बढ़ाया जा सके; मिट्टी के माइक्रोबायोम की क्षमता का लाभ उठाया जा सके; खाद बनाने की तकनीकों में सुधार किया जा सके और अच्छी कृषि पद्धतियां (जीएपी) अपनाई जा सकें जिनमें उर्वरकों और जैविक पदार्थों को मिलाकर सटीक पोषक तत्व प्रबंधन, मिट्टी के स्वास्थ्य की बहाली, फसल विविधीकरण और अवशेषों की रीसाइक्लिंग शामिल हो।</p>
<p>इस बात पर भी जोर दिया गया कि एकीकृत पोषक तत्व आपूर्ति और प्रबंधन (आईएनएसएएम) को बढ़ावा देने के लिए मिशन मोड कार्यक्रम शुरू करने की आवश्यकता है। प्रस्तावित मिशन का लक्ष्य अगले 3 वर्ष में मौजूदा खनिज उर्वरक के उपयोग का कम से कम 25% हिस्सा जैविक खाद से बदलना होगा। एआई प्लेटफॉर्म 'भारत VISTAAR' जैसे डिजिटल उपकरणों का उपयोग करके पूरे वर्ष बड़े पैमाने पर प्रौद्योगिकी हस्तांतरण करने से तकनीक को बड़े पैमाने पर अपनाने में मदद मिलेगी। कमजोर विस्तार सेवाओं में उर्वरक के उपयोग को बढ़ाने पर तो अधिक जोर दिया जाता है, लेकिन उसके कुशल उपयोग पर ध्यान नहीं दिया जाता।</p>
<p>हरित क्रांति के बाद भारत के कृषि बदलाव में उर्वरकों की भूमिका केंद्रीय रही है; इन्होंने अनाज उत्पादन में भारी वृद्धि की है और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की है। हालाँकि, यह क्षेत्र खासकर फास्फोरस और पोटेशियम के लिए अब भी आयात पर बहुत ज़्यादा निर्भर है। इसके कारण भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा बाहर जाती है और सब्सिडी का बोझ भी काफी बढ़ जाता है, जो 2024&ndash;25 में लगभग 1.71 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। उर्वरकों का गलत और असंतुलित इस्तेमाल उत्पादकता को और भी सीमित कर देता है, क्योंकि फसलें पोषक तत्वों का केवल छोटा सा हिस्सा यानी लगभग 30&ndash;50% नाइट्रोजन, 15&ndash;25% फास्फोरस, और 50&ndash;60% पोटेशियम ही इस्तेमाल कर पाती हैं। बाकी हिस्सा लीचिंग, बहाव, वाष्पीकरण या मिट्टी में जम जाने के कारण बर्बाद हो जाता है। पोषक तत्वों के इस्तेमाल की यह कम दक्षता (एनयूई) उत्पादन लागत बढ़ाती है, सब्सिडी का बोझ बढ़ाती है, और मिट्टी तथा पानी की गुणवत्ता में गिरावट का कारण बनती है।</p>
<p>वर्ष 2024&ndash;25 में कुल उर्वरक (N+P2O5+K2O) खपत 329.3 लाख टन तक पहुंच गई, जिसमें उर्वरक इस्तेमाल की इंटेंसिटी 151 किलोग्राम/हेक्टेयर थी। उर्वरक खपत का औसत अनुपात (9.3:3.5:1) नाइट्रोजन (N) की ओर बहुत ज़्यादा झुका हुआ है। यूरिया उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली लगभग 80% प्राकृतिक गैस आयात की जाती है। पश्चिम एशिया में हाल के घटनाक्रमों को उर्वरकों और कच्चे माल के संबंध में केवल अल्पकालिक आपूर्ति श्रृंखला संकट के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। बल्कि, यह हमारे लिए एक चेतावनी है कि हम अपनी नीतियों और अनुसंधान एवं विकास (R&amp;D) की प्राथमिकताओं पर फिर से विचार करें और उन्हें आत्मनिर्भरता की दिशा में पुनर्गठित करें।</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69df5542bc6dd.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ भारत को उर्वरक आयात पर निर्भरता घटाने, एआई और आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाने की जरूरतः डॉ. एम.एल. जाट ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69df5542bc6dd.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[भू राजनीतिक संकट और कच्चा तेल महंगा होने के बावजूद आईएमएफ का भारत की विकास दर 6.5% रहने का अनुमान, पिछले अनुमान से 0.1% ज्यादा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/despite-oil-shock-and-geopolitical-tensions-imf-raises-india-growth-projection.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 14 Apr 2026 20:34:13 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/despite-oil-shock-and-geopolitical-tensions-imf-raises-india-growth-projection.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>ऐसे समय जब वैश्विक अर्थव्यवस्था भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा बाजार में व्यवधान और बढ़ती महंगाई के कारण धीमी पड़ रही है, भारत एक अपेक्षाकृत मजबूत प्रमुख अर्थव्यवस्था के रूप में उभरता दिख रहा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की GDP वृद्धि दर लगभग 6.5% रहने का अनुमान है। यह इसके जनवरी के हनुमान से 0.1 प्रतिशत ज्यादा है। हालांकि पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण तेल कीमतों और व्यापार प्रवाह पर असर पड़ने से वैश्विक आर्थिक गति कमजोर पड़ रही है।</p>
<p>हाल के महीनों में वैश्विक आर्थिक परिदृश्य खराब हुआ है और IMF ने बढ़ती अनिश्चितताओं के चलते वृद्धि अनुमान घटाए हैं। ईरान से जुड़े संघर्ष ने ऊर्जा आपूर्ति को बाधित किया है, तेल कीमतों को बढ़ाया है और दुनिया भर में महंगाई का दबाव बढ़ाया है, जिससे 2026 में वैश्विक वृद्धि लगभग 3.1% तक सीमित रहने का अनुमान है। ऊर्जा आयात पर निर्भर उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर इसका असर अधिक पड़ने की आशंका है, क्योंकि उनके आयात बिल और वित्तीय अस्थिरता बढ़ सकती है।</p>
<p>इस चुनौतीपूर्ण वैश्विक परिदृश्य के बीच भारत की विकास दर अपेक्षाकृत मजबूत बनी हुई है। IMF द्वारा FY27 के लिए भारत की वृद्धि दर के अनुमान में हल्का संशोधन इस बात का संकेत है कि भारत की घरेलू मांग, व्यापक आर्थिक स्थिरता और नीतिगत ढांचा मजबूत है। अनुमान है कि FY28 में भी भारत इसी तरह की विकास गति बनाए रखेगा, जिससे वह दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में बना रहेगा।</p>
<p>हालांकि, इस सकारात्मक परिदृश्य के सामने जोखिम भी मौजूद हैं। S&amp;P ग्लोबल रेटिंग्स के अनुसार, यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, जो तनावपूर्ण स्थिति में 130 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं, तो भारत की वृद्धि दर में 80 बेसिस प्वाइंट तक की कमी आ सकती है। ऊंची ऊर्जा लागत का असर घरेलू खपत, कॉरपोरेट मुनाफे और बैंकिंग क्षेत्र की परिसंपत्ति गुणवत्ता पर पड़ सकता है, जिससे वैश्विक झटकों का असर घरेलू अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देगा।</p>
<p>इन जोखिमों के बावजूद, भारत की आर्थिक बुनियाद मजबूत मानी जा रही है, जो इन बाहरी झटकों को झेलने में सहायक हो सकती है। मजबूत कॉरपोरेट बैलेंस शीट, अच्छी पूंजी वाले बैंक और स्थिर बाहरी स्थिति को ऐसे प्रमुख कारकों के रूप में देखा जा रहा है, जो भारत को अन्य अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में बेहतर सुरक्षा प्रदान करते हैं।</p>
<p>कुल मिलाकर, वैश्विक आर्थिक स्थिति अभी अनिश्चित बनी हुई है और इसका भविष्य काफी हद तक भू-राजनीतिक घटनाक्रमों पर निर्भर करेगा। IMF ने विभिन्न संभावित परिदृश्यों का उल्लेख करते हुए चेतावनी दी है कि यदि ईरान युद्ध लंबा खिंचता है या और बढ़ता है, तो इससे वैश्विक वृद्धि और अधिक प्रभावित हो सकती है और महंगाई का दबाव बढ़ सकता है।</p>
<p></p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/03/image_750x500_63ff4ee67f7ab.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ भू राजनीतिक संकट और कच्चा तेल महंगा होने के बावजूद आईएमएफ का भारत की विकास दर 6.5% रहने का अनुमान, पिछले अनुमान से 0.1% ज्यादा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/03/image_750x500_63ff4ee67f7ab.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[मौसम विभाग का इस वर्ष सामान्य से कम मानसून का अनुमान, खरीफ उत्पादन और महंगाई को लेकर बढ़ी चिंता]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/below-normal-monsoon-forecast-raises-concerns-over-kharif-output-inflation.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 14 Apr 2026 14:27:24 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/below-normal-monsoon-forecast-raises-concerns-over-kharif-output-inflation.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत में इस वर्ष दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से कम रहने की संभावना है, जिससे कृषि उत्पादन, खाद्य महंगाई और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ गई है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार जून से सितंबर के दौरान होने वाली बारिश दीर्घकालिक औसत (LPA) के लगभग 92% रहने का अनुमान है, जो &lsquo;सामान्य से कम&rsquo; श्रेणी में आता है।</p>
<p>आईएमडी के मुताबिक, मानसून की बारिश दीर्घकालिक औसत 87 सेमी से करीब 8% कम रहने की संभावना है। इसमें &plusmn;5% की त्रुटि हो सकती है। यह पूर्वानुमान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मानसून भारत की कृषि के लिए बेहद अहम है, खासकर खरीफ फसलों के लिए। देश के कुल खाद्यान्न उत्पादन का आधे से अधिक हिस्सा इसी सीजन में होता है।</p>
<p>एक सप्ताह पहले निजी मौसम पूर्वानुमान एजेंसी स्काईमेट ने भी दक्षिण-पश्चिम मानसून के सामान्य से कम रहने का अनुमान जताया था। एजेंसी के अनुसार, मानसून दीर्घकालिक औसत (868.6 मिमी) के 94% रहने की संभावना है। जून में वर्षा 101% के साथ सामान्य के करीब रह सकती है, लेकिन जुलाई में 95%, अगस्त में 92% और सितंबर में 89% तक कमजोर पड़ने का अनुमान है।</p>
<p>भारतीय मौसम विभाग के पूर्वानुमान के अनुसार, सामान्य से कम वर्षा की 31% और सामान्य से काफी कम वर्षा की 35% संभावना है। इसका प्रभाव मानसून कोर जोन में अधिक देखने को मिल सकता है, जिसमें मध्य और पश्चिम भारत के वे बड़े हिस्से शामिल हैं जो कृषि के लिए वर्षा पर अत्यधिक निर्भर हैं।</p>
<p>औसत से कम बारिश का एक प्रमुख कारण जून के बाद अलनीनो परिस्थितियां विकसित होने की आशंका है। अलनीनो प्रशांत महासागर की सतह के तापमान में वृद्धि से जुड़ी जलवायु घटना है। यह ऐतिहासिक रूप से भारत में कमजोर मानसून से जुड़ी रही है। वर्ष 1980 के बाद के लगभग 70% अलनीनो वर्षों में देश में कम वर्षा दर्ज की गई है।</p>
<p>मौसम विभाग ने चेतावनी दी है कि अलनीनो का प्रभाव विशेष रूप से मानसून के दूसरे हिस्से, यानी अगस्त और सितंबर में पड़ सकता है। इससे पहले भी अलनीनो के कारण अनियमित वर्षा पैटर्न से 2023-24 फसल वर्ष में खाद्यान्न उत्पादन 6.1% तक घट गया था।</p>
<p>हालांकि, कुछ राहत देने वाले कारक भी हो सकते हैं। मौसम विज्ञान विभाग ने कहा है कि मानसून के उत्तरार्ध में विकसित होने वाली इंडियन ओशन डाइपोल (IOD) की सकारात्मक स्थिति, अलनीनो के प्रतिकूल प्रभाव को आंशिक रूप से कम कर सकती है। आमतौर पर सकारात्मक IOD से भारत में बेहतर वर्षा होती है, हालांकि इसके व्यवहार का सटीक अनुमान लगाना कठिन होता है।</p>
<p>औसत से कम मानसून के इस पूर्वानुमान ने अर्थशास्त्रियों और नीति-निर्माताओं के बीच चिंता बढ़ा दी है, खासकर पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के संदर्भ में। ईरान युद्ध ने वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को बाधित किया है, जिससे उर्वरक और ऊर्जा जैसे कृषि के लिए महत्वपूर्ण इनपुट की लागत में वृद्धि हुई है।</p>
<p>किसानों के लिए कम वर्षा और बढ़ती लागत का दोहरा संकट बुवाई के फैसले, फसल उत्पादन और कुल कृषि आय को प्रभावित कर सकता है। दलहन और तिलहन जैसी फसलें वर्षा की अनिश्चितता के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील होती हैं, और उत्पादन में किसी भी कमी से घरेलू बाजार में कीमतें बढ़ सकती हैं। हालांकि पर्याप्त बफर स्टॉक के कारण सरकार को धान उत्पादन को लेकर ज्यादा चिंता नहीं होगी, लेकिन अन्य फसलों के उत्पादन में गिरावट खाद्य महंगाई पर दबाव बढ़ा सकती है।&nbsp;</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69de010d45203.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ मौसम विभाग का इस वर्ष सामान्य से कम मानसून का अनुमान, खरीफ उत्पादन और महंगाई को लेकर बढ़ी चिंता ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69de010d45203.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[उर्वरक बिक्री को नियंत्रित करने की तैयारी, हरियाणा और तेलंगाना से होगी &amp;apos;नेशनल फ्रेमवर्क&amp;apos; की शुरुआत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/preparations-to-regulate-fertilizer-sales-new-system-to-be-launched-in-haryana-and-telangana.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 14 Apr 2026 14:06:41 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/preparations-to-regulate-fertilizer-sales-new-system-to-be-launched-in-haryana-and-telangana.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>ईरान और अमेरिका-इजरायल युद्ध के चलते देश में उर्वरकों की उपलब्धता को लेकर सरकार की चिंता बढ़ गई है। वैश्विक स्तर पर आपूर्ति बाधित होने और कीमतों में उछाल के बीच केंद्र सरकार के लिए किसानों को उर्वरकों की आपूर्ति सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती है। इन मुश्किल हालात को देखते हुए केंद्र सरकार ने किसानों को सब्सिडी वाले उर्वरकों की बिक्री के लिए एक नई व्यवस्था बनानी शुरू कर दी है।</p>
<p><strong>&lsquo;नेशनल फ्रेमवर्क फॉर सेल ऑफ सब्सिडाइज्ड फर्टिलाइजर&rsquo; </strong>के नाम से एक नई व्यवस्था लागू करने की तैयारी चल रही है। इसके तहत किसानों को उर्वरकों की बिक्री जमीन और फसल के आधार पर तय मात्रा के अनुसार की जाएगी। यूरिया के मामले में यह सीमा शुरुआती तौर पर पांच-छह बैग प्रति हेक्टेयर हो सकती है।</p>
<p>सरकार के उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक, सोमवार को <strong>एंपावर्ड ग्रुप ऑफ सेक्रेटरीज</strong> की बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा हुई और फ्रेमवर्क तैयार करने की जिम्मेदारी कृषि मंत्रालय को सौंपी गई है। उर्वरक आपूर्ति की नई जरूरत आधारित व्यवस्था संभवतः एक माह के भीतर लागू हो सकती है।</p>
<p><em>रूरल वॉयस</em> को मिली जानकारी के अनुसार, हरियाणा और तेलंगाना समेत कुछ राज्यों में एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया जा रहा है, जिसमें किसानों को जमीन और फसल के आधार पर उर्वरकों की आपूर्ति की जाएगी। सरकार का जोर है कि उर्वरकों की मात्रा फसल की न्यूट्रिएंट जरूरत के आधार पर तय की जाए। किसानों को खाद की बिक्री का ब्यौरा इंटीग्रेटेड फर्टिलाइजर मैनेजमेंट सिस्टम (IFMS) पर दर्ज होगा। इससे एक ही किसान द्वारा बार-बार उर्वरक खरीद की निगरानी रखी जा सकेगी। इस प्रकार सब्सिडी वाले उर्वरकों जैसे यूरिया और डीएपी की बिक्री पर अंकुश बढ़ाने की कोशिशें की जा रही हैं।&nbsp;</p>
<p>हरियाणा सरकार ने <strong>मेरी फसल, मेरा ब्यौरा (MFMB)</strong> पोर्टल को <strong>इंटीग्रेटेड फर्टिलाइजर मैनेजमेंट सिस्टम (IFMS)</strong> से जोड़कर जोड़कर उर्वरक बिक्री को भूमि रिकॉर्ड और फसल विवरण से लिंक कर दिया है। इससे यूरिया खपत में 1.26 लाख टन और डीएपी में 23,500 टन की कमी आई और 700 करोड़ रुपये की सब्सिडी में बचत हुई।&nbsp;</p>
<p>नई व्यवस्था में किसानों को उर्वरकों का आवंटन एनपीके के मानक अनुपात के आधार पर किया जा सकता है। यूरिया के मामले में यह प्रति हेक्टेयर आवंटन पांच से छह बैग तक हो सकता है। सूत्रों के अनुसार, फ्रेमवर्क तैयार होने के बाद स्थिति और स्पष्ट हो जाएगी। यह व्यवस्था खासतौर पर यूरिया और डीएपी जैसे सब्सिडी वाले उर्वरकों पर लागू हो सकती है।&nbsp;&nbsp;</p>
<p>दरअसल, वैश्विक स्तर पर उर्वरकों की आपूर्ति पर गंभीर दबाव बना हुआ है। ईरान युद्ध के चलते होर्मुज जलडमरूमध्य, जो वैश्विक उर्वरक व्यापार का एक प्रमुख मार्ग है, लगभग ठप हो गया है। इस मार्ग से सामान्य परिस्थितियों में दुनिया के करीब 30 प्रतिशत उर्वरकों का व्यापार होता है।</p>
<p>उर्वरकों की उपलब्धता के मामले में फिलहाल स्थिति सामान्य है, लेकिन यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधा बनी रहती है, तो खरीफ सीजन के लिए आपूर्ति परेशानी खड़ी हो सकती है। भारत में यूरिया लेकर आ रहे आठ जहाज होर्मुज जलडमरूमध्य में फंसे हुए हैं। कतर, कुवैत और सऊदी अरब में पेट्रोलियम रिफाइनरियों को नुकसान होने से सल्फर की आपूर्ति प्रभावित हुई है। मोरक्को की कंपनी ओसीपी ने डीएपी का निर्यात रोक दिया है, क्योंकि रॉक फॉस्फेट के साथ सल्फर मिलाने के बाद ही फॉस्फोरिक एसिड बनता है। इस कारण वैश्विक स्तर पर डीएपी की उपलब्धता एक बड़ी समस्या बन गई है।&nbsp;&nbsp;</p>
<p>पश्चिमी एशिया संकट के कारण वैश्विक स्तर पर उर्वरक कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई है। यूरिया की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में करीब <strong>800 डॉलर</strong> प्रति टन तक पहुंच गई है। भारत जैसे देश के लिए यह स्थिति अधिक चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि देश उर्वरक जरूरतों को पूरा करने के लिए आयात पर निर्भर है।</p>
<p>हालांकि सरकार का कहना है कि फिलहाल देश में पर्याप्त स्टॉक मौजूद है। एक अप्रैल को देश में यूरिया का स्टॉक लगभग <strong>62 लाख टन</strong> और डीएपी का स्टॉक <strong>23 लाख टन</strong> के आसपास था। ईरान युद्ध की शुरुआत &nbsp;बाद से खाड़ी देशों से भारत में न तो यूरिया का आयात हुआ है और न ही एलएनजी का। इसका असर देश में यूरिया उत्पादन पर पड़ा है। क्योंकि नाइट्रोजन उर्वरकों के उत्पादन में प्राकृतिक गैस एक प्रमुख कच्चा माल है।</p>
<p>उद्योग सूत्रों के अनुसार, मार्च महीने में देश में लगभग आठ लाख टन यूरिया उत्पादन घटा है और अप्रैल में भी कमी जारी रह सकती है। खरीफ सीजन में लगभग 200 लाख टन यूरिया की खपत होती है। ऐसे में आयात में देरी से उपलब्धता का संकट पैदा हो सकता है। इसी वजह से सरकार नेशनल फ्रेमवर्क लागू करने की दिशा में कदम उठा रही है। सरकार ने 25 लाख टन यूरिया के आयात के लिए टेंडर जारी किया है, जो बुधवार को खुल सकता है। इसके बाद कीमत और उपलब्धता की स्थिति और स्पष्ट होगी।</p>
<p>इन सभी स्थितियों को देखते हुए सरकार सब्सिडी वाले उर्वरकों के बेहतर प्रबंधन और लक्षित वितरण के लिए नेशनल फ्रेमवर्क लागू करने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रही है, ताकि सीमित संसाधनों का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित किया जा सके।&nbsp;&nbsp;</p>
<p>&nbsp;</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69de00c4e9dc2.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ उर्वरक बिक्री को नियंत्रित करने की तैयारी, हरियाणा और तेलंगाना से होगी 'नेशनल फ्रेमवर्क' की शुरुआत ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69de00c4e9dc2.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[एमएसपी बढ़ाने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर, कोर्ट ने केंद्र और राज्यों से जवाब मांगा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/supreme-court-seeks-centre-states-response-on-pil-demanding-higher-msp.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 14 Apr 2026 13:16:46 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/supreme-court-seeks-centre-states-response-on-pil-demanding-higher-msp.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अनाज की खरीद के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में पर्याप्त बढ़ोतरी की मांग करते हुए एक जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई है। इस पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों से जवाब मांगा है। याचिका में कहा गया है कि एमएसपी इतना बढ़ाया जाए कि कम से कम किसानों की लागत निकल सके और आर्थिक तंगी के कारण आत्महत्या जैसे कदम उठाने से रोका जा सके।</p>
<p>मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि इस मामले की जांच करना और कोई निर्देश जारी करना &ldquo;सरकार की आर्थिक नीति को दोबारा लिखने जैसा होगा&rdquo;, जिसमें देश की लगभग दो-तिहाई आबादी को मुफ्त राशन उपलब्ध कराने जैसी योजनाएं भी शामिल हैं।</p>
<p>तीन याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश होते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा, &ldquo;भारत के किसान अपनी उपज को उत्पादन लागत के बराबर कीमत पर भी नहीं बेच पा रहे हैं, जिससे वे गंभीर वित्तीय संकट का सामना कर रहे हैं। इसके चलते बड़े पैमाने पर किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। पिछले पांच वर्षों में अकेले महाराष्ट्र में 17,000 से अधिक किसानों ने आत्महत्या की है।&rdquo;</p>
<p>भूषण ने कहा कि एम. एस. स्वामीनाथन आयोग ने अपनी रिपोर्ट में खेती को लाभकारी बनाने के लिए लागत मूल्य के साथ 50 प्रतिशत मुनाफा जोड़कर भुगतान करने की सिफारिश की थी। लेकिन हर वर्ष तय किया जाने वाला न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) फसलों की औसत उत्पादन लागत से काफी कम रहता है।</p>
<p>याचिकाकर्ताओं का कहना है कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य पर चावल और गेहूं की सबसे बड़ी खरीदार है, लेकिन अन्य फसलों की खरीद MSP पर लगभग नहीं के बराबर होती है। भूषण ने कहा कि भले ही दो-तिहाई आबादी के लिए मुफ्त राशन जारी रहना चाहिए, लेकिन &ldquo;इससे इन फसलों के कृषि बाजार को नुकसान पहुंचा है।&rdquo;</p>
<p>याचिकाकर्ताओं के अनुसार, &ldquo;खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत लगभग दो-तिहाई आबादी को मुफ्त गेहूं और चावल देने की व्यवस्था से अन्य प्रतिस्पर्धी खाद्य फसलों, खासकर मोटे अनाज (मिलेट्स) की मांग कृत्रिम रूप से दब गई है। लोग गेहूं और चावल लगभग मुफ्त मिलने के कारण इन फसलों को खरीद नहीं रहे हैं।&rdquo;</p>
<p>उन्होंने कहा, &ldquo;इससे मोटे अनाज की खपत में गिरावट आई है और देश में स्वास्थ्य संकट भी और गहरा हुआ है। यदि सरकार राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत मुफ्त गेहूं, चावल और तेल देने के बजाय उतनी ही राशि का प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण करे, तो इससे किसानों के लिए खुला बाजार बनेगा और मिलेट जैसे पौष्टिक अनाजों की खपत भी बढ़ेगी।&rdquo;&nbsp;</p>
<p>उन्होंने यह भी कहा कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के तहत कृषि उत्पादों के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति किसानों की परेशानियों को और बढ़ा सकती है। इस स्थिति से निपटने के लिए आकर्षक न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) तय करने के साथ-साथ सरकार को गेहूं और चावल के अलावा अन्य फसलों की भी खरीद करनी चाहिए।</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2021/03/image_750x500_606430ca004e1.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ एमएसपी बढ़ाने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर, कोर्ट ने केंद्र और राज्यों से जवाब मांगा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2021/03/image_750x500_606430ca004e1.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[माइक्रोबायोम आधारित आलू की खेती के लिए हाइफार्म और श्री बायो एस्थेटिक्स में साझेदारी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/hyfarm-sri-bioaesthetics-partner-for-microbiome-based-potato-farming.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 14 Apr 2026 12:19:16 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/hyfarm-sri-bioaesthetics-partner-for-microbiome-based-potato-farming.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>हाइफन फूड्स की कृषि व्यवसाय इकाई और भारत में आलू बीज गुणन और प्रसंस्करण मूल्य श्रृंखला में अग्रणी कंपनी हाइफार्म ने श्री बायो एस्थेटिक्स प्राइवेट लिमिटेड के साथ एक रणनीतिक साझेदारी की है। दोनों कंपनियों के बीच समझौता ज्ञापन (MoU) के तहत, हाइफार्म और श्री बायो एस्थेटिक्स संयुक्त रूप से भारत के आलू उद्योग के लिए विशेष रूप से तैयार एक प्रिवेंटिव, माइक्रोबायोम-संचालित मृदा प्रतिरक्षा मॉडल विकसित करेंगे।&nbsp;</p>
<p>यह अपनी तरह का पहला सहयोग है जो आलू बीज उत्पादन और प्रसंस्करण-ग्रेड निरंतरता की कुछ सबसे महत्वपूर्ण चुनौतियों का समाधान करेगा। इसमें मृदा-जनित रोग, उपज में भिन्नता और प्रसंस्करण लाइनों में उच्च अस्वीकृति दर शामिल हैं। यह साझेदारी पारंपरिक फसल सुरक्षा प्रथाओं से हटकर एक सक्रिय, जीवविज्ञान-आधारित दृष्टिकोण की ओर एक महत्वपूर्ण बदलाव का प्रतीक है, जिसका प्राथमिक उद्देश्य बीज स्वास्थ्य, कंद में एकरूपता, प्रसंस्करण रिकवरी में सुधार और दीर्घकालिक मृदा उत्पादकता को बढ़ाना है।&nbsp;</p>
<p>हाइफार्म के सीईओ सुंदरराजन ने कहा, "हाइफार्म में हमारा ध्यान हमेशा एक अत्यधिक पूर्वानुमानित, प्रसंस्करण-ग्रेड आलू इकोसिस्टम बनाने पर रहा है। यह बीज से शुरू होता है और गुणवत्तापूर्ण अंतिम आउटपुट पर समाप्त होता है। श्री बायो एस्थेटिक्स के साथ यह सहयोग हमें मृदा स्वास्थ्य का कहीं अधिक वैज्ञानिक और प्रिवेंटिव तरीके से समाधान करने की अनुमति देता है।"&nbsp;</p>
<p>उन्होंने कहा कि हाइफार्म और श्री बायो एस्थेटिक्स दोनों के लिए यह गठबंधन केवल उपज में सुधार के बारे में नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर निरंतरता बनाने से जुड़ा है, जो आलू प्रसंस्करण उद्योग के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।&nbsp;</p>
<p>इस सहयोग के पहले चरण में दोनों कंपनियां श्री बायो एस्थेटिक्स के SoilFirst&trade; कार्यक्रम को लागू करेंगी। यह कार्यक्रम एक माइक्रोबायोम-आधारित ढांचा है जिसमें मृदा निदान, रोगजनकों की मैपिंग, रोपण से पहले मिट्टी की कंडीशनिंग (मृदा टीकाकरण), बीज कंद माइक्रोबियल उपचार और रूट-ज़ोन जैविक मजबूती शामिल हैं।&nbsp;</p>
<p>प्रारंभिक चरण में, गुजरात और पंजाब के प्रमुख आलू उत्पादक क्षेत्रों में 25 से 50 एकड़ भूमि में इन बीजों का प्रदर्शन देखा जाएगा। इस कार्यक्रम में पारंपरिक प्रथाओं और SoilFirst&trade; उपचारित भूखंडों के बीच एक तुलनात्मक मूल्यांकन शामिल होगा।&nbsp;</p>
<p>श्री बायो एस्थेटिक्स के प्रबंध निदेशक, केआरके रेड्डी ने कहा, "आलू के बीज और प्रसंस्करण इकोसिस्टम में निरंतरता और उच्च स्तर के गुणवत्ता पूर्वानुमान की आवश्यकता होती है। इस साझेदारी के माध्यम से, हम SoilFirst&trade; प्लेटफॉर्म को एक उच्च-प्रदर्शन वाली कृषि प्रणाली में ला रहे हैं।"&nbsp;</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69dde2c220f31.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ माइक्रोबायोम आधारित आलू की खेती के लिए हाइफार्म और श्री बायो एस्थेटिक्स में साझेदारी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69dde2c220f31.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[नोएडा में बवाल के बाद यूपी सरकार ने बढ़ाई न्यूनतम मजदूरी, तीन हजार तक बढ़ोतरी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/states/after-the-noida-uproar-up-government-increased-the-minimum-wage-by-three-thousand-rupees.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 14 Apr 2026 10:54:44 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/states/after-the-noida-uproar-up-government-increased-the-minimum-wage-by-three-thousand-rupees.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>उत्तर प्रदेश के औद्योगिक क्षेत्र नोएडा में श्रमिकों के हिंसक प्रदर्शन के बाद राज्य सरकार ने न्यूनतम मजदूरी में वृद्धि का ऐलान किया है। यूपी सरकार ने न्यूनतम मजदूरी में तीन हजार रुपये तक की बढ़ोतरी की है, जो 1 अप्रैल 2026 से लागू होगी।</p>
<p>सरकार द्वारा घोषित यह बढ़ोतरी अंतरिम (इंटरिम) रूप में लागू की गई है, जिसमें मजदूरी दरों में करीब 21 प्रतिशत तक वृद्धि की गई है।</p>
<h3>नई मजदूरी दरें क्या हैं</h3>
<p>नई दरों के अनुसार, नोएडा-गाजियाबाद क्षेत्र में:</p>
<ul>
<li>
<p>अकुशल मजदूर: 11,313 से बढ़कर 13,690 रुपये प्रति माह</p>
</li>
<li>
<p>अर्धकुशल मजदूर: 12,445 से बढ़कर 15,059 रुपये प्रति माह</p>
</li>
<li>
<p>कुशल मजदूर: 13,940 से बढ़कर 16,868 रुपये प्रति माह</p>
</li>
</ul>
<p>इसी तरह, अन्य नगर निगम क्षेत्रों और जिलों के लिए भी अलग-अलग नई दरें तय की गई हैं। सरकार ने स्पष्ट किया है कि कोई भी कंपनी इन निर्धारित दरों से कम भुगतान नहीं कर सकेगी। नई मजदूरी दरें सभी औद्योगिक और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर लागू होंगी।</p>
<p>सरकार का कहना है कि श्रमिकों की समस्याओं पर गंभीरता से विचार करते हुए यह निर्णय तात्कालिक राहत के तौर पर लिया गया है। साथ ही यह भी संकेत दिया गया है कि आगे व्यापक मजदूरी सुधारों पर भी विचार किया जा सकता है। अन्य मुद्दों के समाधान का भी भरोसा दिलाया जा रहा है।&nbsp;</p>
<h3>नोएडा में हिंसक हुआ प्रदर्शन</h3>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x_69ddcf5b25d13.jpg" alt="" style="display: block; margin-left: auto; margin-right: auto;" /></p>
<p>नोएडा में वेतन वृद्धि सहित कई मांगों को लेकर सोमवार को हजारों श्रमिक सड़कों पर उतर आए थे और कुछ जगहों पर प्रदर्शन हिंसक हो गया। इस दौरान तोड़फोड़, आगजनी और पथराव की घटनाएं भी हुईं। हालांकि, पुलिस ने जल्द ही हालात पर काबू पा लिया। विरोध-प्रदर्शन के उग्र होने से नोएडा में तनाव का माहौल बन गया।&nbsp;</p>
<p>जिस दिन नोएडा में ये घटनाएं हुईं, उस दिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पश्चिमी यूपी के मुजफ्फरनगर में रोजगार मेले और जनसभा में शामिल होने पहुंचे थे।</p>
<p>नोएडा के श्रमिकों का कहना था कि लंबे समय तक काम करने के बावजूद उनकी सैलरी कुछ खास नहीं बढ़ रही है। बढ़ती महंगाई, खासकर गैस और खाने-पीने की चीजों की कीमतों में उछाल के कारण उनके लिए जीवनयापन मुश्किल हो गया है।</p>
<p>पिछले दिनों हरियाणा के मानेसर में मजदूरों की हड़ताल के बाद वहां की सरकार ने भी न्यूनतम वेतन में बढ़ोतरी का ऐलान किया था। हरियाणा और यूपी के बीच मजदूरी के अंतर के चलते भी नोएडा के श्रमिकों में असंतोष बढ़ा। सोमवार की घटनाओं के बाद पूरे दिल्ली-एनसीआर में चौकसी बढ़ा दी गई है।</p>
<h3>हाई-पावर कमेटी गठित</h3>
<p>यूपी सरकार ने श्रमिकों और उद्योगों के बीच टकराव दूर करने के लिए एक हाई-पावर कमेटी गठित की है। यह कमेटी कर्मचारियों और उद्योग संगठनों से बातचीत कर समाधान निकालने का प्रयास कर रही है। इसी कमेटी की सिफारिश के बाद न्यूनतम मजदूरी में अंतरिम वृद्धि का ऐलान किया गया है।</p>
<h3>मुख्यमंत्री का निर्देश</h3>
<p>मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए हैं कि सभी नियोक्ताओं द्वारा बढ़ी हुई मजदूरी का भुगतान सुनिश्चित किया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि ओवरटाइम, साप्ताहिक अवकाश और महिला श्रमिकों की सुरक्षा से जुड़े नियमों का पालन न करने वाली कंपनियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।&nbsp;</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69ddd12cba9e0.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ नोएडा में बवाल के बाद यूपी सरकार ने बढ़ाई न्यूनतम मजदूरी, तीन हजार तक बढ़ोतरी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69ddd12cba9e0.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[जयंती विशेषः डॉ. बी. आर. आंबेडकर, संविधान, दलित और भारत में पंचायती राज]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/dr-b-r-ambedkar-constitution-dalits-and-panchayati-raj-in-india.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 14 Apr 2026 04:55:08 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/dr-b-r-ambedkar-constitution-dalits-and-panchayati-raj-in-india.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>डॉ. बी. आर. आंबेडकर भारत के महानतम सपूतों में से एक थे, जो न केवल एक नेता, प्रतिष्ठित विद्वान और संविधान विशेषज्ञ थे, बल्कि भारत में दलितों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले अग्रणी योद्धा भी थे। इस संदर्भ में, संविधान सभा की बहस के बाद पंचायती राज संस्थाओं को राज्य के नीति निदेशक तत्वों का हिस्सा कैसे बनाया गया और इस विषय पर डॉ. आंबेडकर के क्या विचार थे, यह महत्वपूर्ण है। उन्होंने संविधान में ग्राम पंचायतों को शामिल करने का विरोध किया था, जबकि 1932 में बॉम्बे पंचायत बिल पर बहस के दौरान वे पंचायतों के समर्थक वक्ता थे। इस लेख में उनके विचारों और दलितों की भागीदारी के साथ स्थानीय शासन के विकास पर चर्चा की गई है।</p>
<p>डॉ. बी. आर. आंबेडकर ने 4 नवंबर 1948 को संविधान सभा में संविधान के मसौदे पर विचार के लिए प्रस्ताव पेश करते हुए गांवों के बारे में कुछ टिप्पणियां कीं। उन्होंने मेटकाफ का हवाला दिया, जिन्होंने गांवों का वर्णन करते हुए कहा था, &ldquo;एक के बाद एक वंश समाप्त होते रहे, क्रांतियां होती रहीं। हिंदू, पठान, मुगल, मराठा, सिख, अंग्रेज सभी बारी-बारी से शासक बने, लेकिन ग्रामीण समुदाय वैसे ही बने रहे। संकट के समय वे स्वयं को सुरक्षित कर लेते थे। जब कोई शत्रु सेना देश से गुजरती थी, तो गांव के लोग अपने पशुओं को अपनी सीमाओं के भीतर इकट्ठा कर लेते थे और बिना किसी उकसावे के दुश्मन को गुजरने देते थे।&rdquo;</p>
<p>उन्होंने यह भी टिप्पणी की, &ldquo;अपने देश के इतिहास में गाँवों ने यही भूमिका निभाई है। इसे जानकर कोई उनमें किस बात का गर्व कर सकता है? यह सच हो सकता है कि वे सभी उतार-चढ़ावों के बीच जीवित रहे हैं, लेकिन मात्र जीवित रहने का कोई मूल्य नहीं है। प्रश्न यह है कि वे किस स्तर पर जीवित रहे हैं। निश्चय ही एक निम्न, स्वार्थी स्तर पर। मेरा मानना है कि ये ग्राम गणराज्य भारत के पतन का कारण रहे हैं। इसलिए मुझे आश्चर्य होता है कि जो लोग प्रांतीयता और सांप्रदायिकता की निंदा करते हैं, वही गाँवों के समर्थक बनकर सामने आते हैं। आखिर गाँव है क्या - स्थानीयता का गढ़, अज्ञानता का अड्डा, संकीर्णता और सांप्रदायिकता का केंद्र? मुझे खुशी है कि संविधान के ड्राफ्ट ने गाँव को त्यागकर व्यक्ति को अपनी इकाई के रूप में अपनाया है।&rdquo;</p>
<p>प्रासंगिक प्रश्न यह है कि 1948 में संविधान सभा की बहस के दौरान उन्होंने पंचायती राज में कमजोर वर्गों के लिए स्थान की वकालत क्यों नहीं की, जबकि इससे 16 वर्ष पहले, 6 अक्टूबर 1932 को जब बंबई विधानसभा में बंबई ग्राम पंचायत बिल पर चर्चा हो रही थी, तब वे विकेंद्रीकरण की नीति के पक्षधर थे। तब वे कानून में वंचित वर्गों के लिए विशेष प्रावधानों का समर्थन कर रहे थे।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x_69dcb5e20a21a.jpg" alt="" /></p>
<p>डॉ. आंबेडकर ने कहा था, &ldquo;मैं सबसे पहले यह कहना चाहता हूँ कि सिद्धांततः मुझे सत्ता के विकेंद्रीकरण (डिवोल्यूशन) की नीति पर कोई आपत्ति नहीं है। यदि यह पाया जाता है कि इस प्रेसीडेंसी के स्थानीय बोर्डों पर लोकल बोर्ड अधिनियम द्वारा सौंपे गए कार्यों का अत्यधिक बोझ है, और वे इस कारण अपने कार्यों का कुशलतापूर्वक निर्वहन नहीं कर पा रहे हैं, तो मैं कहता हूँ कि हर हाल में ग्राम पंचायतों की स्थापना की जानी चाहिए ताकि स्थानीय बोर्डों का बोझ कम किया जा सके।&rdquo;</p>
<p>दलित वर्गों के संदर्भ में उनकी टिप्पणी थी, &ldquo;यह विधेयक प्रावधान करता है कि ग्राम पंचायतों का चुनाव पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए वयस्क मताधिकार के आधार पर होगा। लेकिन मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि दलित वर्गों की ओर से बोलते हुए मुझे यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं है कि हमारे लिए मात्र वयस्क मताधिकार पर्याप्त नहीं है। माननीय मंत्री यह भूल गए हैं कि दलित वर्ग हर गाँव में अल्पसंख्यक हैं, अत्यंत नगण्य अल्पसंख्यक, और यदि वे वयस्क मताधिकार अपनाते भी हैं, तो वे स्वयं स्वीकार करेंगे कि वयस्क मताधिकार किसी अल्पसंख्यक को बहुसंख्यक में परिवर्तित नहीं कर सकता। इसलिए मैं यह आग्रह करने के लिए बाध्य हूँ कि यदि ये पंचायतें स्थापित की जाती हैं, तो उनमें अल्पसंख्यकों के लिए विशेष प्रतिनिधित्व होना चाहिए। कम से कम दलित वर्गों के लिए विशेष प्रतिनिधित्व अवश्य होना चाहिए। मैं भारत के लिए स्वशासन के सिद्धांत को तब तक स्वीकार नहीं कर सकता जब तक मुझे यह संतोष न हो जाए कि प्रत्येक स्वशासी संस्था में ऐसा प्रावधान हो, जो दलित वर्गों को उनके अधिकारों की रक्षा के लिए विशेष प्रतिनिधित्व प्रदान करता है।&rdquo;</p>
<p>प्रारंभ में डॉ. आंबेडकर ने संविधान में पंचायतों को शामिल करने का विरोध किया था। लेकिन जब संविधान सभा के अनेक सदस्यों ने पंचायतों के पक्ष में तर्क दिए और श्री संथानन ने पंचायतों को राज्य के नीति निदेशक तत्वों में शामिल करने का प्रस्ताव रखा, तब डॉ. आंबेडकर ने संविधान में पंचायतों को शामिल करने को स्वीकार कर लिया। डॉ. आंबेडकर द्वारा ग्राम पंचायतों को नीति निदेशक तत्वों में स्वीकार करने का कारण संभवतः यह था कि उन्होंने समझ लिया था कि चूंकि पंचायतें राज्य सरकारों की इच्छा पर निर्भर रहेंगी, इसलिए ये संस्थाएं न तो विकसित होंगी और न ही मजबूत बनेंगी। साथ ही, अनुच्छेद 40 के प्रावधान मुख्यतः संविधान तक ही सीमित रह जाएंगे। 1932 के बाद पंचायतों के कार्यान्वयन के अनुभवों ने भी डॉ. आंबेडकर को यह विश्वास दिलाया होगा कि यदि पंचायतों को नीति निदेशक तत्वों का हिस्सा बनाया गया, तो राजनीतिक नेताओं और नौकरशाही द्वारा इन्हें मजबूत और प्रभावी संस्थाओं के रूप में विकसित नहीं किया जाएगा, क्योंकि उनकी इसमें विशेष रुचि नहीं थी।</p>
<p>स्वतंत्रता के बाद पंचायतों के कार्यकलापों से यह स्पष्ट होता है कि 1947 के बाद वे ग्रामीण जीवन के विकास और नियोजन में कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं निभा सकीं। संविधान सभा की बहस के दौरान जिन नेताओं ने ग्राम पंचायतों के विकास के लिए जोरदार समर्थन और उत्साह दिखाया था, उन्होंने लगभग एक दशक तक पंचायतों के विकास में कोई सक्रिय भागीदारी नहीं दिखाई।</p>
<p>डॉ. आंबेडकर ने संभवतः पंचायतों में हाशिए पर रहने वाले वर्गों की स्थिति को देखा था, जहां गांवों के प्रभुत्वशाली वर्ग अपने अधिकार और सत्ता का उपयोग करते हैं। इसी कारण वे पंचायती राज के समर्थन में नहीं थे।</p>
<p>उत्तर प्रदेश का एक अध्ययन इस बात के पर्याप्त जमीनी प्रमाण प्रस्तुत करता है कि पंचायती राज को लेकर डॉ. आंबेडकर की सोच कितनी दूरदर्शी थी। सिद्धार्थ मुखर्जी के अध्ययन (2015, जो जून 2018 में इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली में प्रकाशित हुआ) में गोरखपुर जिले की तीन ग्राम पंचायतों का विश्लेषण किया गया, जिनका नेतृत्व दलितों के हाथ में था। इनमें से एक ग्राम पंचायत का नेतृत्व अनुसूचित जाति की महिला कर रही थी। अध्ययन में पाया गया कि पंचायत चुनाव तीन पक्षों - प्रभुत्वशाली जाति के नेता, प्रॉक्सी उम्मीदवार और मतदाता - के बीच एक तरह का व्यापारिक सौदा बन चुके हैं। चुनाव में भारी निवेश किया जाता है और उससे अधिक लाभ की अपेक्षा रहती है। &ldquo;कोई प्रधान राजनीति में तभी टिक सकता है, जब वह इस पूरी श्रृंखला के विभिन्न स्तरों पर कमीशन दे। इसमें ग्राम विकास सचिव, जूनियर इंजीनियर, ब्लॉक स्तर का स्टाफ और जिला पंचायत तक शामिल हैं।&rdquo;</p>
<p>उपरोक्त उदाहरण संविधान सभा में डॉ. आंबेडकर द्वारा व्यक्त विचारों की पुष्टि करता है। पंचायती राज को शक्तियों के हस्तांतरण पर 2024 में किए गए एक हालिया अध्ययन, जिसे भारत सरकार के पंचायती राज मंत्रालय की तरफ से आईआईपीए (इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन) को प्रायोजित किया गया था, से पता चला कि राष्ट्रीय स्तर पर समग्र विकेंद्रीकरण सूचकांक का स्कोर मात्र 43.89 प्रतिशत है। इसका अर्थ है कि पंचायतों को सौंपे जाने वाले 100 प्रतिशत अधिकारों में से केवल 43.89 प्रतिशत वास्तव में लागू हो सके हैं।</p>
<p><em>(लेखक भारतीय आर्थिक सेवा के पूर्व अधिकारी हैं। उनसे mpal1661@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है, लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी&nbsp; विचार हैं )</em></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69dcb5e25bed8.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ जयंती विशेषः डॉ. बी. आर. आंबेडकर, संविधान, दलित और भारत में पंचायती राज ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69dcb5e25bed8.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[विरोधाभास: मुजफ्फरनगर में रोजगार मेला और सीएम योगी की जनसभा, नोएडा में भड़का श्रमिकों का गुस्सा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/politics/cm-yogi-holds-public-meeting-and-employment-fair-in-muzaffarnagar-workers-protest-escalates-in-noida.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 13 Apr 2026 23:52:38 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/politics/cm-yogi-holds-public-meeting-and-employment-fair-in-muzaffarnagar-workers-protest-escalates-in-noida.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>सोमवार को पश्चिमी उत्तर प्रदेश से रोजगार से जुड़ी दो विपरीत तस्वीरें सामने आईं। एक ओर मुजफ्फरनगर में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी रोजगार मेले में शामिल हुए और जनसभा को संबोधित किया, वहीं प्रदेश के औद्योगिक केंद्र नोएडा में वेतन वृद्धि समेत कई मांगों को लेकर श्रमिकों का प्रदर्शन हिंसक हो गया।</p>
<p>मुजफ्फरनगर में आयोजित जनसभा में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ केंद्रीय कौशल विकास राज्य मंत्री जयंत चौधरी की मौजूदगी को 2027 के विधानसभा चुनाव के लिहाज से अहम माना जा रहा है। इसके जरिए भाजपा और रालोद ने अपने गठबंधन की मजबूती का संकेत दिया और रोजगार के मुद्दे पर युवाओं को साधने की कोशिश की।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x_69dd350ae765e.jpg" alt="" style="display: block; margin-left: auto; margin-right: auto;" /></p>
<p>मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहारनपुर में दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे का लोकार्पण करेंगे। इससे पहले जेवर एयरपोर्ट और मेरठ में रैपिड रेल के उद्घाटन के जरिए भी वे पश्चिमी यूपी में विकास की गति तेज करने का संदेश दे चुके हैं।</p>
<p>इन आयोजनों को भाजपा और रालोद की 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि, इसी दौरान वेतन, रोजगार और महंगाई के मुद्दों पर चुनौतियां भी सामने आती दिख रही हैं।</p>
<p>नोएडा में सोमवार को कई निजी कंपनियों के कर्मचारी वेतन वृद्धि समेत कई मांगों को लेकर सड़कों पर उतर आए। लेकिन यह प्रदर्शन हिंसक रूप ले गया। इस दौरान आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाएं भी हुईं, जिससे ऑफिस में अफरा-तफरी मच गई।&nbsp;</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x_69dd3952bc699.jpg" alt="" style="display: block; margin-left: auto; margin-right: auto;" /></p>
<p>हालांकि पुलिस और स्थानीय प्रशासन ने जल्द ही स्थिति को नियंत्रण में कर लिया, लेकिन रोजगार जैसे अहम मुद्दे पर मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री के कार्यक्रम के दिन ही इस तरह की घटना ने विपक्ष को सरकार पर निशाना साधने का मौका दे दिया।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x_69dd36b93f865.jpg" alt="" style="display: block; margin-left: auto; margin-right: auto;" /></p>
<p>मुख्यमंत्री के निर्देश पर राज्य सरकार ने मजदूरों और उद्योगों के बीच बढ़ते तनाव को कम करने के लिए एक उच्च स्तरीय समिति गठित की है। इसका जिम्मा औद्योगिक विकास आयुक्त को सौंपा गया है। समिति श्रमिकों और उद्योग प्रतिनिधियों से बातचीत कर समाधान निकालने का प्रयास करेगी।</p>
<p>मुजफ्फरनगर में जनसभा को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री <strong>योगी आदित्यनाथ</strong> ने कहा कि औद्योगिक अशांति फैलाने वालों से सावधान रहने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि 2017 से पहले उद्योग बंद हो रहे थे, जबकि अब निवेश में लगातार वृद्धि हो रही है।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x_69dda7c055f87.jpg" alt="" style="display: block; margin-left: auto; margin-right: auto;" /></p>
<p>उन्होंने कहा कि डबल इंजन की सरकार श्रमिकों, उद्यमियों, युवाओं और किसानों के साथ खड़ी है। सरकार ने बिना भेदभाव के 9 लाख युवाओं को सरकारी नौकरियां दी हैं और बेहतर कानून-व्यवस्था के कारण निवेश बढ़ा है, जिससे एमएसएमई क्षेत्र में 3 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार मिला है।</p>
<p>इस अवसर पर 951 करोड़ रुपये से अधिक लागत की 423 विकास परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास किया गया। साथ ही लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर की प्रतिमा का अनावरण और &lsquo;कौशल दर्शन&rsquo; पुस्तक का विमोचन भी किया गया। रोजगार मेले के तहत चयनित अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र वितरित किए गए।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x_69dd39841d027.jpg" alt="" style="display: block; margin-left: auto; margin-right: auto;" /></p>
<p>केंद्रीय मंत्री <strong>जयंत चौधरी</strong> ने कहा कि 100 से अधिक प्रतिष्ठित कंपनियों की भागीदारी से हजारों युवाओं को सीधे रोजगार के अवसर मिले हैं। यह आयोजन युवाओं को आत्मनिर्भर और सक्षम बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।</p>
<p><strong>अखिलेश ने सरकार को घेरा</strong></p>
<p>सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि नोएडा में वेतन बढ़ाने को लेकर उग्र हुए आंदोलन का कारण भाजपा सरकार की वो एकतरफ़ा नीति है जो पूंजीपतियों का पोषण करती है, लेकिन सामान्य काम करनेवाले कर्मचारियों और वेतनभोगी श्रमिकों-मजदूरों का शोषण। बेतहाशा महंगाई के इस दौर में कम वेतन में घर चलाना मुश्किल हो गया है। भाजपा का डबल इंजन, जनता के लिए ट्रबल इंजन बन गया है।</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69dda78f11bd3.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ विरोधाभास: मुजफ्फरनगर में रोजगार मेला और सीएम योगी की जनसभा, नोएडा में भड़का श्रमिकों का गुस्सा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69dda78f11bd3.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[मार्च में खुदरा महंगाई बढ़कर 3.4% पर, खाद्य महंगाई 3.87% पहुंची; दोनों फरवरी से अधिक]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/retail-inflation-rises-to-3.4-percent-in-march-food-inflation-climbs-to-3.87-percent-both-above-february-levels.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 13 Apr 2026 17:10:35 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/retail-inflation-rises-to-3.4-percent-in-march-food-inflation-climbs-to-3.87-percent-both-above-february-levels.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>मार्च 2026 के लिए अखिल भारतीय उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) (आधार वर्ष 2024) पर आधारित वर्ष-दर-वर्ष महंगाई दर मार्च 2025 के मुकाबले 3.40% (प्रोविजनल) रही। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में यह दर क्रमशः 3.63% और 3.11% रही। फरवरी 2026 में अखिल भारतीय खुदरा महंगाई दर 3.21% थी।</p>
<p>इसी तरह, अखिल भारतीय उपभोक्ता खाद्य मूल्य सूचकांक (CFPI) पर आधारित वर्ष-दर-वर्ष खाद्य महंगाई दर मार्च 2026 में 3.87% (प्रोविजनल) दर्ज की गई। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में यह दर क्रमशः 3.96% और 3.71% रही। फरवरी 2026 में यह दर 3.47% थी।</p>
<p>मार्च 2026 में प्याज की कीमतों में 27.76%, आलू में 19.98%, लहसुन में 10.18%, अरहर दाल में 9.56% और चना में 7.87% की गिरावट दर्ज की गई। इसके विपरीत, टमाटर की कीमतों में 35.99% और फूलगोभी में 34.11% की तेज वृद्धि हुई।</p>
<p>दक्षिणी राज्यों में महंगाई का असर सबसे अधिक रहा। तेलंगाना में कुल महंगाई दर 5.83% और खाद्य महंगाई 5.94% रही। आंध्र प्रदेश में यह क्रमशः 4.05% और 5.45%, कर्नाटक में 3.96% और 5.89%, तमिलनाडु में 3.77% और 3.94% तथा राजस्थान में 3.64% और 3% दर्ज की गई।</p>
<p>ये महंगाई आंकड़े नए आधार वर्ष 2024 पर आधारित हैं। रियल टाइम मूल्य डेटा 1407 चयनित शहरी बाजारों (ऑनलाइन बाजार सहित) और 1465 गांवों से एकत्र किया जाता है, जो सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कवर करते हैं। अप्रैल 2026 के CPI आंकड़े 12 मई 2026 (मंगलवार) को जारी किए जाएंगे।</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/06/image_750x500_666abf999ac5b.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ मार्च में खुदरा महंगाई बढ़कर 3.4% पर, खाद्य महंगाई 3.87% पहुंची; दोनों फरवरी से अधिक ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/06/image_750x500_666abf999ac5b.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कीमतों में तेजी से मार्च में पाम ऑयल आयात तीन महीने के निचले स्तर पर, लेकिन सनफ्लावर ऑयल में तेजी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/palm-oil-imports-dip-to-three-month-low-in-march-as-prices-deter-buyers.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 13 Apr 2026 14:20:34 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/palm-oil-imports-dip-to-three-month-low-in-march-as-prices-deter-buyers.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत का पाम ऑयल आयात मार्च में लगभग 19% घटकर तीन महीने के निचले स्तर पर पहुंच गया। इसका कारण वैश्विक कीमतों में तेजी है, जिसके चलते रिफाइनरों ने नई खरीद से परहेज किया। यह जानकारी सोमवार को जारी उद्योग के आंकड़ों में सामने आई। सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA) के आंकड़ों के अनुसार, मार्च में पाम ऑयल आयात घटकर 6,89,462 टन रह गया, जो फरवरी में 8,47,689 टन था। यह दिसंबर 2025 के बाद का सबसे निचला स्तर है।</p>
<p>पाम ऑयल की कीमतों में तेजी वैश्विक ऊर्जा बाजार की मजबूती के साथ बढ़ रही है। फिलहाल खरीदारों ने इंतजार की रणनीति अपनाई है। उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि रिफाइनरी कंपनियां कीमतों में संभावित नरमी की उम्मीद में खरीद टाल रही हैं।</p>
<p>पाम के अलावा अन्य खाद्य तेलों के आयात में मिश्रित रुझान देखने को मिला। सोयाबीन तेल का आयात लगभग 4% घटकर 2,87,220 टन रह गया, जबकि सूरजमुखी तेल का आयात करीब 35% बढ़कर 1,96,486 टन हो गया। कुल मिलाकर, भारत का खाद्य तेल आयात मार्च में फरवरी की तुलना में 9% से अधिक घटकर 11.7 लाख टन रह गया, जो अप्रैल 2025 के बाद का सबसे निचला स्तर है। इस गिरावट का मुख्य कारण पाम ऑयल और सोयोइल की कम खरीद रहा।</p>
<p>भारत दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य तेल आयातक है। यह पाम ऑयल का मुख्य रूप से इंडोनेशिया और मलेशिया से आयात करता है। वहीं, सोया ऑयल और सूरजमुखी तेल का आयात मुख्य रूप से अर्जेंटीना, ब्राजील, रूस और यूक्रेन से किया जाता है।</p>
<p>बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि नई फसल से सरसों तेल की बढ़ती घरेलू उपलब्धता के कारण भी आयात में कमी आई है। हालांकि, आयात में गिरावट से घरेलू भंडार कम हो सकते हैं, जिससे स्थानीय तिलहन कीमतों को समर्थन मिल सकता है। यदि अंतरराष्ट्रीय कीमतें ऊंची बनी रहती हैं और भंडार और घटते हैं, तो मांग को पूरा करने के लिए भारत को आने वाले महीनों में आयात बढ़ाना पड़ सकता है।</p>
<p>ट्रेडर्स का मानना है कि भविष्य में आयात की गति काफी हद तक वैश्विक कीमतों के रुख पर निर्भर करेगी, और कीमतों में स्थिरता या गिरावट आने पर रिफाइनर दोबारा बाजार में सक्रिय हो सकते हैं।</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69dca3c119b65.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ कीमतों में तेजी से मार्च में पाम ऑयल आयात तीन महीने के निचले स्तर पर, लेकिन सनफ्लावर ऑयल में तेजी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69dca3c119b65.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[होर्मुज पर अमेरिकी नाकेबंदी के फैसले से कच्चा तेल फिर 100 डॉलर के पार, वैश्विक ऊर्जा बाजार में उथल&amp;#45;पुथल]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/oil-surges-past-100-dollars-as-us-moves-to-blockade-hormuz-global-energy-markets-on-edge.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 13 Apr 2026 13:06:55 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/oil-surges-past-100-dollars-as-us-moves-to-blockade-hormuz-global-energy-markets-on-edge.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>सोमवार को वैश्विक ऊर्जा बाजारों में भारी उथल-पुथल देखने को मिली, जब अमेरिका और ईरान के बीच उच्चस्तरीय वार्ता के विफल होने के बाद वाशिंगटन ने होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिये ईरानी बंदरगाहों को निशाना बनाकर नाकेबंदी की घोषणा की। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की इस घोषणा के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें एक बार फिर 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गईं।</p>
<p>एशियाई कारोबार के शुरुआती सत्र में बेंचमार्क कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया। वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) 9% से अधिक बढ़कर 105.30 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया, जबकि ब्रेंट क्रूड 8% से अधिक चढ़कर 103.30 डॉलर प्रति बैरल हो गया।&nbsp;</p>
<p>तेल कीमतों में यह तेज तेजी मुख्य रूप से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस फैसले के कारण आई, जिसमें उन्होंने ईरान से जुड़े समुद्री यातायात पर नौसैनिक नाकेबंदी लागू करने की घोषणा की। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने कहा कि यह नाकेबंदी सोमवार को पूर्वी समयानुसार सुबह 10 बजे लागू होगी और अरब सागर तथा ओमान की खाड़ी में स्थित ईरानी बंदरगाहों में प्रवेश या वहां से निकलने वाले जहाजों को निशाना बनाएगी।</p>
<p>हालांकि अमेरिका ने स्पष्ट किया कि गैर-ईरानी बंदरगाहों के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों को नहीं रोका जाएगा, लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप ने चेतावनी दी कि जो भी जहाज ईरान को &ldquo;अवैध टोल&rdquo; का भुगतान करेगा, उसे रोका जाएगा। उन्होंने कड़ा सैन्य रुख अपनाने के संकेत भी दिए, जिसमें इस जलमार्ग में बिछाई गई समुद्री बारूदी सुरंगों को हटाना शामिल है, जहां से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का लगभग 20% गुजरता है।</p>
<p>यह घोषणा इस्लामाबाद में हुई महत्वपूर्ण वार्ता के विफल होने के बाद आई, जो एक दशक से अधिक समय में अमेरिका और ईरान के बीच पहली प्रत्यक्ष बातचीत थी। कई हफ्तों के संघर्ष के बाद दो सप्ताह के नाजुक युद्धविराम को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से हुई ये वार्ताएं मुख्य रूप से ईरान के परमाणु संवर्धन कार्यक्रम और क्षेत्रीय सुरक्षा मुद्दों पर असहमति के कारण टूट गईं।</p>
<p>ईरान ने यूरेनियम संवर्धन रोकने, प्रमुख परमाणु सुविधाओं को खत्म करने और क्षेत्रीय उग्रवादी समूहों को समर्थन वापस लेने की अमेरिकी मांगों को खारिज कर दिया। इसके जवाब में ईरानी अधिकारियों ने चेतावनी दी कि होर्मुज जलडमरूमध्य के पास किसी भी विदेशी सैन्य उपस्थिति को युद्धविराम का उल्लंघन माना जाएगा, जिससे ऊर्जा इन्फ्रास्ट्रक्चर पर फिर से हमलों की आशंका बढ़ गई है।</p>
<p>इन घटनाक्रमों पर बाजार ने तेजी से प्रतिक्रिया दी। नाकेबंदी से पहले ही तेल टैंकरों ने होर्मुज जलडमरूमध्य से दूरी बनानी शुरू कर दी। कई जहाजों ने अपने मार्ग बदल दिए या संचालन रोक दिया, जो सुरक्षा और आपूर्ति में बाधा को लेकर बढ़ती चिंताओं को दर्शाता है।</p>
<p>विश्लेषकों का अनुमान है कि इस नाकेबंदी से वैश्विक बाजार से प्रतिदिन 15 से 17 लाख बैरल ईरानी कच्चे तेल की आपूर्ति हट सकती है। यह संभावित कमी क्षेत्र में हालिया व्यवधानों के अतिरिक्त है, जिसमें हमलों के कारण सऊदी अरब की उत्पादन क्षमता और पाइपलाइन प्रवाह अस्थायी रूप से प्रभावित हुआ था।</p>
<p><strong>फरवरी से एलएनजी कीमतों में 80% उछाल</strong></p>
<p>इस संघर्ष ने वैश्विक तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) बाजार को भी झटका दिया है। उद्योग विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि हालिया संघर्ष के दौरान खाड़ी क्षेत्र की प्रमुख ऊर्जा अवसंरचना को नुकसान पहुंचने के बाद आपूर्ति श्रृंखला संकट और गहरा सकता है। रिपोर्ट्स के अनुसार, फरवरी के अंत से एलएनजी की कीमतों में करीब 80% की बढ़ोतरी हुई है।</p>
<p>दुनिया के सबसे बड़े एलएनजी निर्यातकों में से एक कतर ने अपनी ऊर्जा अवसंरचना पर हमलों के बाद कई अनुबंधों में फोर्स मेज्योर घोषित कर दिया, जिससे दीर्घकालिक आपूर्ति की विश्वसनीयता को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। इस व्यवधान ने कई एशियाई अर्थव्यवस्थाओं को अपनी ऊर्जा रणनीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है, जहां बढ़ती गैस कीमतों के बीच कुछ देश फिर से कोयले की ओर रुख कर रहे हैं।</p>
<p>विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय तक जारी रहने वाला भू-राजनीतिक तनाव ऊर्जा कीमतों को ऊंचा बनाए रख सकता है, जिससे वैश्विक महंगाई का दबाव बढ़ेगा और आर्थिक सुधार की प्रक्रिया जटिल हो जाएगी। हालांकि कूटनीतिक प्रयास जारी रह सकते हैं, लेकिन बाजार अब राजनीतिक घोषणाओं के बजाय वास्तविक आपूर्ति व्यवधानों पर अधिक संवेदनशील होता जा रहा है।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69dc9ca07c26c.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ होर्मुज पर अमेरिकी नाकेबंदी के फैसले से कच्चा तेल फिर 100 डॉलर के पार, वैश्विक ऊर्जा बाजार में उथल-पुथल ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69dc9ca07c26c.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कांग्रेस नेता नरेश कुमार का दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता पर निशाना, कहा किसानों के मुद्दों पर दोहरा रवैया अपना रही हैं सीएम]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/politics/congress-leader-targets-delhi-cm-over-double-standards-on-farmers-issues.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 13 Apr 2026 12:32:44 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/politics/congress-leader-targets-delhi-cm-over-double-standards-on-farmers-issues.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>कांग्रेस के वरिष्ठ प्रवक्ता डॉ. नरेश कुमार ने दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता पर तीखा हमला करते हुए आरोप लगाया है कि वह किसानों के नाम पर राजनीति कर रही हैं, जबकि राष्ट्रीय राजधानी में किसानों की समस्याओं की अनदेखी की जा रही है।</p>
<p>पश्चिम बंगाल में किसानों के मुद्दों पर गुप्ता के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कुमार ने कहा कि दिल्ली में किसानों के साथ &ldquo;विश्वासघात&rdquo; करने वाली सरकार को अन्य राज्यों में इस तरह के मुद्दे उठाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि जहां दिल्ली सरकार भूमि से जुड़े मुद्दों पर दूसरों की आलोचना करती है, वहीं स्थानीय किसानों से जुड़े अहम विषयों - जैसे भूमि अधिकार, मुआवजा और सर्किल रेट में संशोधन पर पूरी तरह चुप्पी साधे हुए है।</p>
<p>मुख्य मुद्दों को रेखांकित करते हुए कुमार ने कहा कि दिल्ली में कृषि भूमि के सर्किल रेट 2008 से संशोधित नहीं किए गए हैं, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। उन्होंने लंबे समय से लंबित भूमि पूलिंग नीति के लागू होने में देरी का भी मुद्दा उठाया और कहा कि इससे किसानों को उनकी जमीन का उचित लाभ नहीं मिल पा रहा है।</p>
<p>कांग्रेस नेता ने आगे आरोप लगाया कि दिल्ली के किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खरीद की कोई गारंटी नहीं है, जिससे उन्हें मजबूरी में अपनी उपज कम कीमत पर बेचनी पड़ रही है। हालिया बेमौसम बारिश का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि व्यापक फसल नुकसान के बावजूद सरकार ने प्रति एकड़ 50,000 रुपये मुआवजे की मांग को नजरअंदाज कर दिया है।</p>
<p>कुमार ने भाजपा पर भी निशाना साधते हुए कहा कि सत्ता में आने से पहले किसानों से किए गए वादों को भुला दिया गया है। उन्होंने सरकार से दिल्ली का &ldquo;किसान राज्य&rdquo; का दर्जा बहाल करने और सभी वादों को पूरा करने की मांग की।</p>
<p>मुख्यमंत्री की जवाबदेही पर सवाल उठाते हुए कुमार ने कहा कि उन्हें पहले दिल्ली के किसानों के लिए उठाए गए ठोस कदमों की जानकारी देनी चाहिए, न कि अन्य राज्यों को निशाना बनाना चाहिए। उन्होंने सरकार के भीतर समन्वय की कमी का भी आरोप लगाया, जिससे शासन प्रभावित हो रहा है और आम लोगों की मुश्किलें बढ़ रही हैं।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69dc94a3509d2.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ कांग्रेस नेता नरेश कुमार का दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता पर निशाना, कहा किसानों के मुद्दों पर दोहरा रवैया अपना रही हैं सीएम ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69dc94a3509d2.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[ईरान युद्ध से उर्वरक आयात पर भारत की निर्भरता उजागर, खाद्य सुरक्षा के लिए जोखिम बढ़ाः क्रिसिल रिपोर्ट]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/west-asia-conflict-exposes-india-fertiliser-vulnerability-raises-risks-to-food-security-and-farm-output.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 12 Apr 2026 09:16:08 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/west-asia-conflict-exposes-india-fertiliser-vulnerability-raises-risks-to-food-security-and-farm-output.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>उर्वरक संकट पर <strong>रूरल वॉयस</strong> की हालिया रिपोर्ट के बाद रेटिंग एजेंसी <strong>CRISIL</strong> ने भी एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की है। क्रिसिल की रिपोर्ट में बताया गया है कि पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष भारत के उर्वरक क्षेत्र की ढांचागत कमजोरियों को कैसे उजागर कर रहा है। इनमें आयात पर भारी निर्भरता, कमजोर सप्लाई चेन और ऊर्जा के साथ गहरे जुड़ाव शामिल हैं, जिनका कृषि और खाद्य सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ सकता है। रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि भारत खाद और जरूरी कच्चे माल के लिए पश्चिम एशिया पर बहुत ज़्यादा निर्भर है; कुल आयात का 40-42% हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है। यूरिया के मामले में यह निर्भरता और अधिक है, क्योंकि लगभग 64.8% यूरिया पश्चिम एशिया से ही आयात किया जाता है। इसके अलावा, डाइअमोनियम फॉस्फेट (DAP) के कुल आयात का एक-तिहाई से अधिक हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है। <em>(रूरल वॉयस की रिपोर्ट <a href="https://www.ruralvoice.in/national/fertiliser-crisis-urea-prices-surge-to-800-dollars-per-tonne-imports-may-take-two-months-to-stabilise.html"><strong>यहां पढ़ें</strong></a>)। <a href="https://www.youtube.com/watch?v=tAwTH7AIZQU"><strong>वीडियो देखें</strong></a>)</em></p>
<p>CRISIL की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान युद्ध के कारण पैदा हुई रुकावटों का असर न केवल तैयार उर्वरकों के आयात पर पड़ा है, बल्कि तरल प्राकृतिक गैस (LNG), अमोनिया, सल्फ्यूरिक एसिड और रॉक फॉस्फेट जैसे जरूरी कच्चे माल की उपलब्धता पर भी पड़ा है। ये कच्चे माल देश में उर्वरक उत्पादन के लिए बेहद जरूरी हैं।</p>
<p>भारत में उर्वरक बनाने का पूरा इकोसिस्टम ढांचागत रूप से काफी जोखिम भरा बना हुआ है। इसकी पूरी वैल्यू चेन का लगभग 69% हिस्सा विदेशी स्रोतों पर निर्भर है। उर्वरक उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले कुल मूल्य का लगभग 44.5% कच्चा माल आयात होता है। यूरिया के मामले में, कच्चे माल की कुल लागत का लगभग 80% हिस्सा प्राकृतिक गैस का होता है। यह आंकड़ा साफ दिखाता है कि ऊर्जा से जुड़े संकट के प्रति यह क्षेत्र कितना संवेदनशील है।</p>
<p>वैश्विक LNG की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं और आपूर्ति में रुकावटें बनी हुई हैं। भारत की कुल LNG खपत में उर्वरकों का हिस्सा 31% है, जिससे यह क्षेत्र गैस के सबसे बड़े उपभोक्ताओं में से एक बन गया है। LNG की उपलब्धता में किसी भी तरह की रुकावट का सीधा असर घरेलू उत्पादन क्षमता पर पड़ता है।</p>
<p>सरकार ने हस्तक्षेप करते हुए उर्वरक क्षेत्र को गैस के आवंटन में प्राथमिकता दी है (जिसे बढ़ाकर पिछली खपत स्तर का 95% कर दिया गया है)। फिर भी उत्पादन में संभावित कमी को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि इन उपायों के बावजूद यदि आपूर्ति में रुकावटें बनी रहती हैं तो आपूर्ति में बाधा उत्पन्न हो सकती है।</p>
<p>भारत के पास वर्तमान में लगभग ढाई महीने के लिए पर्याप्त उर्वरक का भंडार मौजूद है। हालांकि यदि यह युद्ध लंबे समय तक जारी रहता है, तो इससे आगे की खरीद में बाधा आ सकती है। इसका विशेष रूप से रबी के मौसम में उपलब्धता पर असर पड़ सकता है। मौजूदा खरीफ की फसल के लिए उर्वरक की आपूर्ति को प्राथमिकता दी जा रही है, लेकिन किसी भी तरह की कमी का असर आने वाले सीजन में फसल की पैदावार और कुल खाद्य उत्पादन पर पड़ सकता है।</p>
<p>इसके प्रभाव कृषि क्षेत्र तक ही सीमित नहीं हैं। उर्वरकों की बढ़ती कीमतों से भारत का आयात बिल बढ़ने और चालू खाता घाटा बढ़ने की आशंका है। इसके अलावा, बढ़ती लागत के कारण सब्सिडी की आवश्यकता बढ़ने से सरकारी खाते और महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है।</p>
<p>क्रिसिल का कहना है कि कृषि क्षेत्र दोहरी चुनौती का सामना कर रहा है - बढ़ती लागत और आपूर्ति में संभावित कमी। उर्वरकों की कम उपलब्धता से कृषि उत्पादकता प्रभावित हो सकती है, जबकि बढ़ी हुई कीमतें उपयोग को कम कर सकती हैं। इससे पैदावार पर बुरा असर पड़ेगा। इससे ग्रामीण आय और खाद्य कीमतों की स्थिरता को लेकर चिंताएं बढ़ जाती हैं।</p>
<p>भारत की उर्वरक खपत का पैटर्न इस चुनौती को और बढ़ाता है। कुल उर्वरक खपत का लगभग 45% हिस्सा यूरिया का है, जिससे पोषक तत्वों का असंतुलन और गैस आधारित उत्पादन पर अत्यधिक निर्भरता पैदा होती है। यह संरचनात्मक समस्या वैश्विक संकटों के दौरान संवेदनशीलता को और बढ़ा देती है।</p>
<p><strong>दीर्घकालिक ढांचागत सुधार की जरूरत</strong></p>
<p>इन जोखिमों से निपटने के लिए, रिपोर्ट में लंबे समय के ढांचागत सुधारों की जरूरत पर जोर दिया गया है। इनमें पश्चिम एशिया से बाहर आयात के स्रोतों में विविधता लाना, मुख्य कच्चे माल के लिए लंबे समय के आपूर्ति समझौतों को मजबूत करना और घरेलू उत्पादन क्षमता का विस्तार करना शामिल है।</p>
<p>ग्रीन अमोनिया जैसे वैकल्पिक समाधान और राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के साथ एकीकरण की दिशा में भी लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। कई उर्वरक कंपनियों ने ग्रीन अमोनिया की आपूर्ति के लिए पहले ही लंबे समय के समझौते कर लिए हैं, जिससे समय के साथ आयातित प्राकृतिक गैस पर निर्भरता कम हो सकती है।</p>
<p>इसके अलावा, फॉस्फेट और पोटाश के घरेलू भंडारों की खोज करना और यूरिया से हटकर संतुलित उर्वरक के उपयोग को बढ़ावा देना, उर्वरक आत्मनिर्भरता हासिल करने की दिशा में अहम कदम माने जाते हैं।</p>
<p>रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि भारत में उर्वरक सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा से गहराई से जुड़ी हुई है, क्योंकि देश की बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर है। उर्वरकों की उपलब्धता में किसी भी तरह की रुकावट का असर फसलों के उत्पादन, महंगाई और आर्थिक स्थिरता पर पड़ सकता है।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/08/image_750x500_64eca086326e8.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ ईरान युद्ध से उर्वरक आयात पर भारत की निर्भरता उजागर, खाद्य सुरक्षा के लिए जोखिम बढ़ाः क्रिसिल रिपोर्ट ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/08/image_750x500_64eca086326e8.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[गेहूं खरीद मानकों में राजस्थान को ढील, पंजाब में नुकसान का आकलन करेंगी केंद्र की टीमें]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/wheat-procurement-norms-relaxed-for-rajasthan-central-team-to-assess-losses-in-punjab.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 12 Apr 2026 09:10:43 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/wheat-procurement-norms-relaxed-for-rajasthan-central-team-to-assess-losses-in-punjab.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>हालिया बारिश, आंधी और ओलावृष्टि से देश के कई राज्यों में गेहूं की फसल को व्यापक नुकसान पहुंचा है। अब किसानों के सामने अनाज को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बेचना चुनौती बन गया है। इस बीच, केंद्र सरकार ने राजस्थान में गेहूं खरीद मानकों में छूट देने का आदेश जारी कर दिया है, जबकि पंजाब और हरियाणा के किसान भी रियायत की मांग कर रहे हैं।</p>
<div dir="auto">
<p>पंजाब में नुकसान का आकलन करने के लिए केंद्र सरकार ने अधिकारियों की टीमें गठित की हैं। ये टीमें राज्य सरकार और एफसीआई के अधिकारियों के साथ मिलकर प्रभावित जिलों का दौरा करेंगी, जिसके आधार पर केंद्र को विस्तृत रिपोर्ट सौंपी जाएगी।&nbsp;</p>
<p>पंजाब सरकार ने केंद्र सरकार से गेहूं खरीद मानकों में ढील देने की मांग की है ताकि किसानों को नुकसान से राहत मिल सके और उनकी उपज न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से नीचे न बिके।</p>
<p>इसी बीच, केंद्र सरकार ने राजस्थान को पहले ही गेहूं खरीद मानकों में ढील दे दी है। केंद्रीय खाद्य मंत्रालय के पत्र के अनुसार, रबी विपणन सत्र 2026-27 के लिए राजस्थान में चमकहीन (लस्टर लॉस) गेहूं की सीमा को 50% तक स्वीकार किया जाएगा, जबकि सिकुड़े और टूटे दानों की सीमा 6% से बढ़ाकर 15% कर दी गई है। कुल क्षतिग्रस्त और आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त अनाज की सीमा 6% से अधिक नहीं होगी।</p>
<p>पत्र में यह भी स्पष्ट किया गया है कि मानकों में ढील के तहत खरीदे गए गेहूं का अलग से भंडारण किया जाएगा और इस दौरान गुणवत्ता में गिरावट की जिम्मेदारी राज्य सरकार की होगी। ऐसे स्टॉक को प्राथमिकता के आधार पर निपटाने के निर्देश भी दिए गए हैं और यह अनाज राज्य के भीतर ही उपभोग किया जाएगा।</p>
<p>उधर, राजस्थान में खरीद मानकों में छूट को लेकर कई सवाल भी उठ रहे हैं। पंजाब के किसान नेता केंद्र सरकार पर भेदभाव का आरोप लगा रहे हैं। पंजाब सरकार का कहना है कि मौसम की समान मार के बावजूद राज्य को अब तक ऐसी राहत नहीं मिली है।</p>
<p>इस मुद्दे को लेकर मुख्यमंत्री भगवंत मान और केंद्रीय खाद्य मंत्री प्रह्लाद जोशी के बीच बैठक भी हो चुकी है, जिसमें राज्य की चिंताओं को उठाया गया। राज्य सरकार ने नुकसान के आकलन के लिए विशेष गिरदावरी के आदेश भी जारी किए हैं।</p>
<p>पिछले दिनों पश्चिमी विक्षोभ के चलते हुई बारिश और ओलावृष्टि से न केवल फसल गिरी है, बल्कि गेहूं की चमक, दानों के आकार और नमी स्तर पर भी असर पड़ा है, जिससे सरकारी खरीद में दिक्कतें आ रही हैं।</p>
<p>अब केंद्र की टीमों की रिपोर्ट पर ही यह निर्भर करेगा कि पंजाब में भी राजस्थान की तरह खरीद मानकों में ढील दी जाएगी या नहीं। अन्य राज्यों को भी मानकों में छूट का इंतजार है।&nbsp;</p>
<p></p>
</div> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69db23198743e.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ गेहूं खरीद मानकों में राजस्थान को ढील, पंजाब में नुकसान का आकलन करेंगी केंद्र की टीमें ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69db23198743e.jpg" width="220"/>
    </item>
    </channel>
</rss>