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    <title>Farmer News: Government Schemes for Farmers, Successful Farmer Stories &#45; Latest Posts</title>
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    <description>Farmer News: Government Schemes for Farmers, Successful Farmer Stories &amp;#45; Latest Posts</description>
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    <item>
        <title><![CDATA[कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर रहा तो 6% के पार जाएगी महंगाईः एचएसबीसी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/inflation-may-cross-6-percent-if-crude-oil-stays-above-100-dollars-per-barrel-hsbc.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 03 Apr 2026 19:04:09 GMT]]></pubDate>
				
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        <description><![CDATA[ <p>ईरान युद्ध के कारण महंगाई एक बार फिर बढ़ने का दबाव बनने लगा है। HSBC के आकलन के अनुसार, यदि कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती हैं, तो भारत में खुदरा महंगाई 6% के पार जा सकती है। ऐसी स्थिति में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को अपने मौजूदा रुख में बदलाव करते हुए ब्याज दरों में बढ़ोतरी पर विचार करना पड़ सकता है।</p>
<p>HSBC के अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इस समय भारत &ldquo;दोराहे&rdquo; पर खड़ा है। महंगाई की दिशा काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर से नीचे आती हैं या ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं। यदि कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहीं, तो महंगाई RBI की ऊपरी सीमा को पार कर सकती है। वहीं, यदि औसत कीमत 80 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहती है, तो महंगाई 4.5-5% के दायरे में नियंत्रित रह सकती है और सख्त मौद्रिक नीति की जरूरत नहीं पड़ेगी।</p>
<p><strong>कच्चा तेल क्यों है निर्णायक</strong></p>
<p>भारत की सबसे बड़ी कमजोरी आयातित तेल पर निर्भरता है। देश की लगभग 85% पेट्रोलियम जरूरतें आयात के जरिए पूरी होती हैं। कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। इससे ईंधन महंगा होता है, परिवहन लागत बढ़ती है और अंततः खाद्य पदार्थों व जरूरी वस्तुओं की कीमतों में भी इजाफा होता है। इस तरह यह प्रभाव किसी एक क्षेत्र तक सीमित न रहकर व्यापक महंगाई पैदा करता है।</p>
<p>अनुमान है कि कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी से भारत में महंगाई लगभग 55-60 बेसिस प्वाइंट तक बढ़ सकती है। पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के चलते कच्चे तेल की कीमतों में पहले ही उछाल आ चुका है और ब्रेंट हाल के हफ्तों में 100 डॉलर से ऊपर बना हुआ है।</p>
<p>अर्थशास्त्रियों का कहना है कि ऊर्जा आपूर्ति में लंबे समय तक व्यवधान रहने से इसके कई प्रभाव सामने आ सकते हैं। जैसे माल ढुलाई महंगी होना, आपूर्ति में कमी और आर्थिक गतिविधियों में सुस्ती। ये सब कारक महंगाई को और बढ़ा सकते हैं। तेल आयात बिल बढ़ने से रुपये पर दबाव पड़ेगा, जिससे आयातित महंगाई और तेज हो सकती है।</p>
<p><strong>रिजर्व बैंक क्या करेगा?</strong></p>
<p>यदि महंगाई 6% से ऊपर जाती है, तो RBI के पास सख्त मौद्रिक नीति अपनाने के अलावा ज्यादा विकल्प नहीं होंगे। HSBC के मुताबिक, कच्चे तेल के दाम ऊंचे बने रहने पर चालू वित्त वर्ष में कम से कम 25 बेसिस प्वाइंट तक ब्याज दरें बढ़ सकती हैं। गौरतलब है कि आरबीआई की अगली मौद्रिक नीति समीक्षा बैठक 7-9 अप्रैल को होनी है।</p>
<p>ब्याज दरों में बढ़ोतरी से आर्थिक वृद्धि की रफ्तार धीमी पड़ सकती है, खासकर ऐसे समय में जब वैश्विक अनिश्चितताएं पहले ही मांग पर दबाव डाल रही हैं। फिलहाल भारत में महंगाई RBI के निर्धारित दायरे में है, लेकिन स्थिति तेजी से बदल रही है। यदि कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर के आसपास बनी रहती हैं, तो महंगाई 6% के पार जाने का खतरा वास्तविक है।</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर रहा तो 6% के पार जाएगी महंगाईः एचएसबीसी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[पश्चिम एशिया संकट के बीच प्रमुख पेट्रोकेमिकल आयात पर सीमा शुल्क में 3 माह के लिए छूट]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/govt-grants-full-customs-duty-exemption-on-key-petrochemicals-amid-west-asia-crisis.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 03 Apr 2026 12:15:11 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/govt-grants-full-customs-duty-exemption-on-key-petrochemicals-amid-west-asia-crisis.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण आपूर्ति में आ रही बाधाओं को देखते हुए केंद्र सरकार ने चुनिंदा महत्वपूर्ण पेट्रोकेमिकल उत्पादों पर 30 जून 2026 तक सीमा शुल्क में पूरी छूट देने की घोषणा की है। इससे पैकेजिंग तथा अन्य उद्योगों को मदद मिलेगी जो इनपुट के तौर पर पेट्रोकेमिकल का इस्तेमाल करते हैं।</p>
<p>वित्त मंत्रालय ने एक बयान में कहा है कि इस फैसले का उद्देश्य घरेलू उद्योगों के लिए आवश्यक पेट्रोकेमिकल कच्चे माल की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करना और वैश्विक आपूर्ति शृंखला में आई बाधाओं के कारण बढ़ती लागत के दबाव को कम करना है।</p>
<p>सरकार ने स्पष्ट किया कि यह कदम आपूर्ति में स्थिरता बनाए रखने के लिए एक लक्षित हस्तक्षेप है, क्योंकि पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव के चलते प्रमुख कच्चे माल की उपलब्धता और कीमतों पर असर पड़ा है।</p>
<p>इस निर्णय से प्लास्टिक, पैकेजिंग, वस्त्र, फार्मास्यूटिकल्स, रसायन, ऑटोमोबाइल कंपोनेंट्स और अन्य क्षेत्रों को लाभ मिलने की उम्मीद है, जो बड़े पैमाने पर पेट्रोकेमिकल इनपुट पर निर्भर हैं।&nbsp;</p>
<p>यह अस्थायी छूट उद्योगों को बढ़ती इनपुट लागत से राहत देगी और उत्पादन में व्यवधान के जोखिम को कम करेगी। इससे आवश्यक कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित कर औद्योगिक उत्पादन को स्थिर रखने में मदद मिलेगी।</p>
<p>छूट के दायरे में एनहाइड्रस अमोनिया, मेथनॉल, टोल्यून, स्टाइरीन, विनाइल क्लोराइड मोनोमर और मोनोएथिलीन ग्लाइकोल जैसे प्रमुख पेट्रोकेमिकल इनपुट शामिल हैं। इसके अलावा पीवीसी, पीईटी चिप्स, एपॉक्सी रेजिन, पॉलीकार्बोनेट और पॉलीयूरेथेन जैसे व्यापक रूप से उपयोग होने वाले पॉलिमर और रेजिन पर भी छूट दी गई है।</p>
<p>ये सामग्री पैकेजिंग, निर्माण, वस्त्र और ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्रों की आपूर्ति शृंखला की रीढ़ हैं, और इनकी कमी से कई उद्योगों पर व्यापक असर पड़ सकता है।</p>
<p>सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह एक समयबद्ध कदम है, जिसका उद्देश्य बाहरी कारणों से उत्पन्न तात्कालिक चुनौतियों से निपटना है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ पश्चिम एशिया संकट के बीच प्रमुख पेट्रोकेमिकल आयात पर सीमा शुल्क में 3 माह के लिए छूट ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[भू&amp;#45;राजनीतिक तनाव के बीच भारत में सूरजमुखी तेल की खपत में 10% गिरावट की आशंका]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/sunflower-oil-consumption-set-to-wilt-10-percent-amid-geopolitical-heat.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 02 Apr 2026 13:10:22 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/sunflower-oil-consumption-set-to-wilt-10-percent-amid-geopolitical-heat.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><br />मौजूदा वित्त वर्ष में भारत में रिफाइंड सूरजमुखी तेल की खपत में करीब 10% की गिरावट आने की आशंका है। इसकी दो प्रमुख वजह हैं- पहला, पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण आपूर्ति श्रृंखला में बाधाएं, और दूसरा, बढ़ती लॉजिस्टिक लागत के चलते कीमतों में तेजी। इसके चलते उपभोक्ता सस्ते विकल्प जैसे राइस ब्रान और सोयाबीन तेल की ओर रुख कर सकते हैं। हालांकि, कीमतों में बढ़ोतरी से होने वाली बेहतर प्राप्तियों के कारण कुल राजस्व स्थिर रहने की उम्मीद है। यह संकेत रेटिंग एजेंसी CRISIL द्वारा रेट किए गए नौ सूरजमुखी तेल रिफाइनरों के विश्लेषण से मिलता है। ये रिफाइनरी कंपनियों की लगभग 36,000 करोड़ रुपये के उद्योग में 70% हिस्सेदारी है।</p>
<p>भारत में कुल 250-260 लाख टन वार्षिक खाद्य तेल खपत होती है। इसमें रिफाइंड सूरजमुखी तेल की हिस्सेदारी करीब 12-14% है। यह उद्योग कच्चे सूरजमुखी तेल के आयात पर काफी निर्भर है, जिससे यह वैश्विक व्यापार व्यवधानों और भू-राजनीतिक घटनाक्रमों के प्रति संवेदनशील बना रहता है।</p>
<p>सूरजमुखी तेल का बड़ा हिस्सा यूक्रेन और रूस से आयात किया जाता है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के चलते जहाज अब केप ऑफ गुड होप जैसे लंबे मार्गों से होकर आ रहे हैं, जिससे दूरी और ट्रांजिट समय बढ़ गया है। इसके अलावा, संवेदनशील क्षेत्रों से गुजरने वाले जहाजों के लिए युद्ध जोखिम बीमा प्रीमियम भी बढ़ गया है। परिणामस्वरूप, भारतीय रिफाइनरों के लिए कच्चे सूरजमुखी तेल की लैंडेड लागत बढ़ गई है।</p>
<p>क्रिसिल रेटिंग्स की निदेशक जयश्री नंदकुमार ने कहा, &ldquo;पश्चिम एशिया संघर्ष शुरू होने के बाद से कच्चे सूरजमुखी तेल का औसत आयात मूल्य बढ़कर वर्तमान में 1,420-1,440 डॉलर प्रति टन हो गया है, जबकि पिछले 12 महीनों में यह औसतन 1,275 डॉलर प्रति टन था। रुपये की कमजोरी और बढ़ी हुई शिपिंग लागत भारत में इसकी लैंडेड लागत को और बढ़ा रही है।&rdquo;</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x_69ce1cb384ccf.jpg" alt="" /></p>
<p>रिपोर्ट के मुताबिक, सूरजमुखी के कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर अंततः रिफाइंड सूरजमुखी तेल के खुदरा दामों पर पड़ेगा। वर्तमान में रिफाइंड सूरजमुखी तेल की कीमत 170-175 रुपये प्रति लीटर के आसपास है, जो जनवरी 2026 में करीब 150 रुपये प्रति लीटर थी। वहीं, राइस ब्रान और सोयाबीन तेल, सूरजमुखी तेल से 10-20 रुपये प्रति लीटर सस्ते मिल रहे हैं, जिससे उपभोक्ताओं का आंशिक रुझान इन विकल्पों की ओर बढ़ सकता है। इसके चलते वित्त वर्ष 2027 में सूरजमुखी तेल की मांग में करीब 10% की गिरावट का अनुमान है।</p>
<p>हालांकि, मांग में कमी के बावजूद रिफाइनरों की लाभप्रदता मजबूत बनी रहने की उम्मीद है, क्योंकि वे 10-15 दिनों की देरी के साथ कीमतों में बढ़ोतरी का बोझ उपभोक्ताओं पर डाल सकते हैं। साथ ही, कीमतों में गिरावट के जोखिम से बचने के लिए रिफाइनरों के पास मजबूत हेजिंग नीतियां हैं। कम कीमत पर खरीदे गए स्टॉक से होने वाला लाभ, मांग में गिरावट के कारण परिचालन पर पड़ने वाले नकारात्मक असर की भरपाई करेगा। इस कारण कंपनियों का ऑपरेटिंग मार्जिन 4.8-5% के आसपास स्थिर रहने का अनुमान है। हालांकि युद्ध शुरू होने के बाद से घरेलू सूरजमुखी तेल रिफाइनरों के पास इन्वेंटरी स्तर लगातार घट रहे हैं।</p>
<p>क्रिसिल रेटिंग्स के एसोसिएट डायरेक्टर ऋषि हरि ने कहा, &ldquo;रिफाइनर आमतौर पर आपूर्ति में व्यवधान और कीमतों में उतार-चढ़ाव से निपटने के लिए 30-45 दिनों का कच्चे माल का भंडार रखते हैं। हालांकि, पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण कीमतों में बढ़ोतरी के बीच यह भंडार घटकर 20-30 दिन रह गया है।&rdquo; यदि यह व्यवधान लंबा खिंचता है तो आपूर्ति और सख्त हो सकती है, जिससे कीमतों और खरीद रणनीति पर दबाव बढ़ेगा।&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारत में सूरजमुखी तेल की खपत में 10% गिरावट की आशंका ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[इफको ने वर्ष 2025–26 में दर्ज किया रिकॉर्ड लाभ और उत्कृष्ट समग्र प्रदर्शन]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/cooperatives/iffco-posts-record-profit-and-excellent-overall-performance-in-2025–26.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 01 Apr 2026 23:45:47 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/cooperatives/iffco-posts-record-profit-and-excellent-overall-performance-in-2025–26.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>विश्व की अग्रणी सहकारी उर्वरक संस्था इफको ने वित्त वर्ष 2025&ndash;26 में शानदार प्रदर्शन की घोषणा की है। इफको ने अब तक का सर्वाधिक, Rs 4,106 करोड़ से अधिक का अनुमानित कर-पूर्व लाभ (PBT) अर्जित करते हुए नया कीर्तिमान स्थापित किया है। साथ ही, पारंपरिक एवं नैनो उर्वरकों के उत्पादन और बिक्री में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।</p>
<p>यह अभूतपूर्व लाभ न केवल इफको की वित्तीय सुदृढ़ता और परिचालन उत्कृष्टता को दर्शाता है, बल्कि किसानों के कल्याण एवं ग्रामीण समृद्धि के प्रति उसकी प्रतिबद्धता का भी प्रतीक है।</p>
<h3>उत्पादन प्रदर्शन</h3>
<p>वित्त वर्ष 2025&ndash;26 के दौरान इफको ने कुल 90.62 लाख टन उर्वरकों का उत्पादन किया। इसमें 48.28 लाख टन यूरिया तथा 42.34 लाख टन एनपीके, डीएपी, डब्ल्यूएसएफ एवं विशेष उर्वरक शामिल हैं।</p>
<p>इफको के फूलपुर, आंवला और पारादीप संयंत्रों में रिकॉर्ड उत्पादन दर्ज किया गया। साथ ही, पारादीप में बेहतर बंदरगाह संचालन के कारण लॉजिस्टिक्स दक्षता में भी वृद्धि हुई। मजबूत उत्पादन के चलते, वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद किसानों को उर्वरकों की निर्बाध उपलब्धता सुनिश्चित करने में मदद मिली।</p>
<h3>बिक्री प्रदर्शन</h3>
<p>इफको ने वित्त वर्ष 2025&ndash;26 में 119.68 लाख टन उर्वरकों की कुल बिक्री की, जो देशभर में इसकी सुदृढ़ वितरण प्रणाली और बढ़ती मांग को दर्शाती है। पारंपरिक उर्वरकों की बिक्री 118.75 लाख टन पर मजबूत बनी रही।</p>
<p>वित्त वर्ष के दौरान नैनो उर्वरकों की कुल बिक्री 301 लाख बोतलों से अधिक रही। इसमें 221 लाख बोतल नैनो यूरिया प्लस लिक्विड और 64.89 लाख से अधिक बोतल नैनो डीएपी लिक्विड शामिल हैं। इस वर्ष नैनो जिंक और नैनो कॉपर की बिक्री की भी शुरुआत हुई।</p>
<p>पारंपरिक और नैनो उर्वरकों में यह संतुलित वृद्धि उत्पादकता और स्थिरता के प्रति इफको की दोहरी प्रतिबद्धता को दर्शाती है। साथ ही, कृषि में आधुनिक तकनीकों को अपनाने की दिशा में किसानों का रुझान भी बढ़ रहा है।</p>
<h3><strong>नैनो उर्वरकों पर जोर</strong></h3>
<p>इफको के अध्यक्ष <strong>दिलीप संघाणी</strong> ने कहा कि हम &lsquo;सहकार से समृद्धि&rsquo; के लक्ष्य को साकार कर रहे हैं। हमारी हर उपलब्धि केवल व्यावसायिक सफलता नहीं, बल्कि किसानों की बेहतर सेवा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने किसानों से नैनो उर्वरकों को अपनाने और सहकारिता की शक्ति का लाभ उठाने का आह्वान किया।</p>
<p>इफको के प्रबंध निदेशक <strong>के.जे. पटेल</strong> ने इस ऐतिहासिक उपलब्धि का श्रेय इफको परिवार और सहयोगी संस्थाओं को दिया। उन्होंने कहा कि संयुक्त उपक्रमों और सहयोगी संस्थाओं का उत्कृष्ट प्रदर्शन हमारी सामूहिक प्रतिबद्धता का परिणाम है।</p>
<h3>नवाचार और आत्मनिर्भरता</h3>
<p>इफको ने नैनो उर्वरकों, बायो-स्टिमुलेंट्स और उन्नत कृषि तकनीकों के माध्यम से आत्मनिर्भर कृषि को बढ़ावा देने पर जोर दिया है। संस्था का मानना है कि इससे आयात पर निर्भरता कम होगी और मृदा स्वास्थ्य में सुधार आएगा।</p>
<p>इसके तहत रासायनिक भार कम करने, पोषक तत्वों की उपयोग दक्षता बढ़ाने और टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।</p>
<h3>एग्री 2.0 की ओर अग्रसर</h3>
<p>आगामी वित्त वर्ष 2026&ndash;27 के लिए इफको ने &lsquo;एग्री 2.0&rsquo; का रोडमैप तैयार किया है। इसके तहत नवाचार के विस्तार, वैश्विक सहयोग को मजबूत करने और कृषि मूल्य श्रृंखला को सुदृढ़ बनाने का लक्ष्य तय किया गया है।</p>
<p>इफको ने स्पष्ट किया कि उसकी प्राथमिकता केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि किसानों की आय में वृद्धि और मृदा स्वास्थ्य का संरक्षण भी है। संस्था संतुलित पोषण, किफायती इनपुट्स और उर्वरकों के वैज्ञानिक उपयोग के प्रति किसानों में जागरूकता बढ़ाने पर कार्य कर रही है।</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ इफको ने वर्ष 2025–26 में दर्ज किया रिकॉर्ड लाभ और उत्कृष्ट समग्र प्रदर्शन ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[तकनीक और नवाचार पर केंद्रित कृषि जोनल कॉन्फ्रेंसों की श्रृंखला 7 अप्रैल: शिवराज सिंह]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/a-series-of-zonal-agricultural-conferences-focused-on-technology-and-innovation-will-commence-on-april-7-says-shivraj-singh.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 01 Apr 2026 19:14:05 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/a-series-of-zonal-agricultural-conferences-focused-on-technology-and-innovation-will-commence-on-april-7-says-shivraj-singh.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय देश भर में क्षेत्रवार जोनल कॉन्फ्रेंस की श्रृंखला शुरू कर रहा है। जिसके तहत अप्रैल&ndash;मई 2026 में पश्चिम, उत्तर, पूर्व सहित सभी प्रमुख जोन में उच्चस्तरीय विचार-विमर्श होगा। इन जोनल कॉन्फ्रेंसों से कृषि क्षेत्र में नवाचार, निवेश, तकनीकी अपनाने की गति तेज होगी और आने वाले वर्षों में किसानों की आय, उत्पादकता एवं ग्रामीण विकास को नई दिशा मिलेगी। सम्मेलनों में केंद्र और राज्यों के कृषि मंत्री, वरिष्ठ अधिकारी, वैज्ञानिक, प्रगतिशील किसान, किसान संगठन, एफपीओ, स्टार्टअप और निजी क्षेत्र एक साथ बैठकर योजनाओं की प्रगति की समीक्षा करेंगे और जमीन से जुड़े अनुभवों के आधार पर आगे की कार्ययोजना तय करेंगे।</p>
<p>केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आज यह जानकारी देते हुए बताया कि पश्चिमी क्षेत्र का पहला जोनल सम्मेलन 7 अप्रैल 2026 को जयपुर में आयोजित किया जा रहा है, जिसमें राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और गोवा के प्रतिनिधि भाग लेंगे। इसमें राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा सहित संबद्ध राज्यों के कृषि मंत्री और सभी वरिष्ठ कृषि अधिकारी शामिल होंगे।</p>
<p>इसके बाद 17 अप्रैल को लखनऊ में उत्तर भारत के राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों&ndash; दिल्ली, चंडीगढ़, जम्मू‑कश्मीर, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, लद्दाख, पंजाब और उत्तराखंड के लिए जोनल कॉन्फ्रेंस आयोजित होगी।</p>
<p>शिवराज सिंह के मुताबिक, 24 अप्रैल को भुवनेश्वर में पूर्वी जोन के लिए सम्मेलन प्रस्तावित है, जिसमें बिहार, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल आदि राज्यों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। श्रृंखला की निरंतरता में मई माह के अंत में हैदराबाद और गुवाहाटी में भी जोनल कॉन्फ्रेंस आयोजित की जाएगी, ताकि दक्षिण और उत्तर‑पूर्वी क्षेत्र की विशेष चुनौतियों और संभावनाओं पर केंद्रित चर्चा हो सके।</p>
<p>उन्होंने बताया कि इन जोनल कॉन्फ्रेंसों का मुख्य उद्देश्य केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय को और मजबूत करना तथा स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप केंद्रीय योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना है, जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी जी का संकल्प और दिशा-निर्देश भी रहा है। इन बैठकों में आत्मनिर्भर दलहन मिशन, राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन, प्राकृतिक खेती मिशन, डिजिटल एग्रीकल्चर मिशन जैसी प्राथमिकताओं पर विस्तृत चर्चा होगी और बाधाओं की पहचान कर समाधान तय किए जाएंगे। राज्यों के सफल मॉडल, जैसे सिंचाई, उर्वरक वितरण, एग्री‑स्टैक, बागवानी और मूल्य श्रृंखला प्रबंधन की सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा कर अन्य राज्यों में भी लागू करने की रूपरेखा बनेगी।</p>
<p>शिवराज सिंह के अनुसार, इन सम्मेलनों में संबंधित राज्यों के कृषि मंत्री, वरिष्ठ अधिकारी, ICAR वैज्ञानिक, KVK विशेषज्ञ, NABARD और बैंकों के प्रतिनिधियों के साथ‑साथ प्रगतिशील किसान, FPO, कृषि स्टार्टअप और निजी उद्यमी भी भाग लेंगे, ताकि नीति निर्माण में जमीनी अनुभव और बाज़ार की जरूरतें दोनों प्रतिबिंबित हों।&nbsp;</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69cd211d23878.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ तकनीक और नवाचार पर केंद्रित कृषि जोनल कॉन्फ्रेंसों की श्रृंखला 7 अप्रैल: शिवराज सिंह ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/04/image_750x500_69cd211d23878.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[भारत का सरसों उत्पादन 3.5 फीसदी बढ़ने की उम्मीद, रबी 2025&amp;#45;26 में 119.4 लाख टन उत्पादन का अनुमान]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/india-rapeseed-mustard-production-expected-to-increase-by-3.5-pc-estimated-to-reach-11.94-million-tonnes-in-rabi-2025-26.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 31 Mar 2026 14:00:59 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/india-rapeseed-mustard-production-expected-to-increase-by-3.5-pc-estimated-to-reach-11.94-million-tonnes-in-rabi-2025-26.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>तिलहन उत्पादन के मोर्चे पर अच्छी खबर है।&nbsp;<strong>साल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA)</strong> ने रबी सीजन 2025-26 के लिए रेपसीड-सरसों उत्पादन का पहला अनुमान जारी किया है। एसोसिएशन के अनुसार, इस साल देश में सरसों का कुल उत्पादन <strong>119.4 </strong><strong>लाख टन</strong> रहने की संभावना है, जो पिछले साल के 115.2 लाख टन के मुकाबले लगभग <strong>3.5 </strong><strong>प्रतिशत</strong> अधिक है।</p>
<p>एसईए के अध्यक्ष <strong>संजीव अस्थाना</strong> ने जयपुर में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि उत्पादन में यह वृद्धि बेहतर खेती के तरीकों, किसानों में बढ़ती जागरूकता और सरकारी नीतियों के सकारात्मक प्रभाव का परिणाम है। उन्होंने कहा कि सरसों की अच्छी फसल देश में खाद्य तेलों की उपलब्धता बढ़ाने और आयात पर निर्भरता कम करने में अहम भूमिका निभाएगी।</p>
<p>संजीव अस्थाना ने बताया कि 2019-20 में सरसों का उत्पादन महज 86 लाख टन था, जो अब 120 लाख टन के करीब पहुंच रहा है। यह वृद्धि खाद्य तेलों के आयात पर देश की निर्भरता कम करने में अहम भूमिका निभाएगी।&nbsp;</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x_69cb8638c29ca.jpg" alt="" style="display: block; margin-left: auto; margin-right: auto;" /></p>
<p><strong>प्रमुख आंकड़ों पर एक नजर</strong></p>
<p>एसोसिएशन द्वारा नियुक्त एजेंसी 'एग्रीवाच' के सर्वेक्षण और रिमोट सेंसिंग आंकड़ों के आधार पर निम्नलिखित महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए हैं:</p>
<ul>
<li><strong>बुवाई का रकबा:</strong> इस साल सरसों की बुवाई का क्षेत्रफल बढ़कर <strong>93.91 </strong><strong>लाख हेक्टेयर</strong> हो गया है, जो पिछले साल 92.15 लाख हेक्टेयर था।</li>
<li><strong>औसत पैदावार (Yield):</strong> बेहतर मौसम और खेती की उन्नत तकनीकों के कारण औसत पैदावार भी <strong>1,250 </strong><strong>किग्रा/हेक्टेयर से बढ़कर 1,271 </strong><strong>किग्रा/हेक्टेयर</strong> होने का अनुमान है।</li>
</ul>
<p><strong>सरसों में राजस्थान फिर अव्वल</strong></p>
<p>राज्यवार आंकड़ों में राजस्थान देश का सबसे बड़ा सरसों उत्पादक बना हुआ है, जहां उत्पादन 53.9 लाख टन रहने का अनुमान है। उत्तर प्रदेश में उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि के साथ यह 18.1 लाख टन तक पहुंच सकता है। हरियाणा में भी उत्पादन बढ़कर 12.7 लाख टन होने का अनुमान है।</p>
<p>हालांकि, मध्य प्रदेश में उत्पादन थोड़ा घटकर 13.9 लाख टन रहने का अनुमान है। वहीं पश्चिम बंगाल और गुजरात में क्रमशः 7.4 लाख टन और 5.9 लाख टन उत्पादन का अनुमान है। असम में उत्पादन घटकर 2.1 लाख टन रहने की संभावना है, जबकि बिहार में उत्पादन लगभग 0.9 लाख टन पर स्थिर रह सकता है।</p>
<table data-path-to-node="2">
<thead>
<tr>
<td style="text-align: center; width: 126.672px;"><strong>राज्य</strong></td>
<td style="text-align: center; width: 166.141px;"><strong>बुवाई क्षेत्र 2024-25 (हेक्टेयर)</strong></td>
<td style="text-align: center; width: 166.141px;"><strong>बुवाई क्षेत्र 2025-26 (हेक्टेयर)</strong></td>
<td style="text-align: center; width: 158.703px;"><strong>पैदावार 2024-25 (किग्रा/हे.)</strong></td>
<td style="text-align: center; width: 158.703px;"><strong>पैदावार 2025-26 (किग्रा/हे.)</strong></td>
<td style="text-align: center; width: 165.641px;"><strong>उत्पादन 2024-25 (लाख टन)</strong></td>
<td style="text-align: center; width: 165.641px;"><strong>उत्पादन 2025-26 (लाख टन)</strong></td>
</tr>
</thead>
<tbody>
<tr>
<td style="text-align: center; width: 126.672px;"><span data-path-to-node="2,1,0,0"><b data-path-to-node="2,1,0,0" data-index-in-node="0">राजस्थान</b></span></td>
<td style="text-align: center; width: 166.141px;"><span data-path-to-node="2,1,1,0">34,74,000</span></td>
<td style="text-align: center; width: 166.141px;"><span data-path-to-node="2,1,2,0">35,77,958</span></td>
<td style="text-align: center; width: 158.703px;"><span data-path-to-node="2,1,3,0">1,498</span></td>
<td style="text-align: center; width: 158.703px;"><span data-path-to-node="2,1,4,0">1,506</span></td>
<td style="text-align: center; width: 165.641px;"><span data-path-to-node="2,1,5,0">52.0</span></td>
<td style="text-align: center; width: 165.641px;"><span data-path-to-node="2,1,6,0">53.9</span></td>
</tr>
<tr>
<td style="text-align: center; width: 126.672px;"><span data-path-to-node="2,2,0,0"><b data-path-to-node="2,2,0,0" data-index-in-node="0">उत्तर प्रदेश</b></span></td>
<td style="text-align: center; width: 166.141px;"><span data-path-to-node="2,2,1,0">14,23,000</span></td>
<td style="text-align: center; width: 166.141px;"><span data-path-to-node="2,2,2,0">15,41,444</span></td>
<td style="text-align: center; width: 158.703px;"><span data-path-to-node="2,2,3,0">1,096</span></td>
<td style="text-align: center; width: 158.703px;"><span data-path-to-node="2,2,4,0">1,172</span></td>
<td style="text-align: center; width: 165.641px;"><span data-path-to-node="2,2,5,0">15.6</span></td>
<td style="text-align: center; width: 165.641px;"><span data-path-to-node="2,2,6,0">18.1</span></td>
</tr>
<tr>
<td style="text-align: center; width: 126.672px;"><span data-path-to-node="2,3,0,0"><b data-path-to-node="2,3,0,0" data-index-in-node="0">मध्य प्रदेश</b></span></td>
<td style="text-align: center; width: 166.141px;"><span data-path-to-node="2,3,1,0">14,86,000</span></td>
<td style="text-align: center; width: 166.141px;"><span data-path-to-node="2,3,2,0">14,04,368</span></td>
<td style="text-align: center; width: 158.703px;"><span data-path-to-node="2,3,3,0">987</span></td>
<td style="text-align: center; width: 158.703px;"><span data-path-to-node="2,3,4,0">993</span></td>
<td style="text-align: center; width: 165.641px;"><span data-path-to-node="2,3,5,0">14.7</span></td>
<td style="text-align: center; width: 165.641px;"><span data-path-to-node="2,3,6,0">13.9</span></td>
</tr>
<tr>
<td style="text-align: center; width: 126.672px;"><span data-path-to-node="2,4,0,0"><b data-path-to-node="2,4,0,0" data-index-in-node="0">हरियाणा</b></span></td>
<td style="text-align: center; width: 166.141px;"><span data-path-to-node="2,4,1,0">7,14,000</span></td>
<td style="text-align: center; width: 166.141px;"><span data-path-to-node="2,4,2,0">7,30,270</span></td>
<td style="text-align: center; width: 158.703px;"><span data-path-to-node="2,4,3,0">1,723</span></td>
<td style="text-align: center; width: 158.703px;"><span data-path-to-node="2,4,4,0">1,733</span></td>
<td style="text-align: center; width: 165.641px;"><span data-path-to-node="2,4,5,0">12.3</span></td>
<td style="text-align: center; width: 165.641px;"><span data-path-to-node="2,4,6,0">12.7</span></td>
</tr>
<tr>
<td style="text-align: center; width: 126.672px;"><span data-path-to-node="2,5,0,0"><b data-path-to-node="2,5,0,0" data-index-in-node="0">पश्चिम बंगाल</b></span></td>
<td style="text-align: center; width: 166.141px;"><span data-path-to-node="2,5,1,0">6,83,000</span></td>
<td style="text-align: center; width: 166.141px;"><span data-path-to-node="2,5,2,0">7,37,861</span></td>
<td style="text-align: center; width: 158.703px;"><span data-path-to-node="2,5,3,0">995</span></td>
<td style="text-align: center; width: 158.703px;"><span data-path-to-node="2,5,4,0">997</span></td>
<td style="text-align: center; width: 165.641px;"><span data-path-to-node="2,5,5,0">6.8</span></td>
<td style="text-align: center; width: 165.641px;"><span data-path-to-node="2,5,6,0">7.4</span></td>
</tr>
<tr>
<td style="text-align: center; width: 126.672px;"><span data-path-to-node="2,6,0,0"><b data-path-to-node="2,6,0,0" data-index-in-node="0">गुजरात</b></span></td>
<td style="text-align: center; width: 166.141px;"><span data-path-to-node="2,6,1,0">2,62,000</span></td>
<td style="text-align: center; width: 166.141px;"><span data-path-to-node="2,6,2,0">2,83,970</span></td>
<td style="text-align: center; width: 158.703px;"><span data-path-to-node="2,6,3,0">2,055</span></td>
<td style="text-align: center; width: 158.703px;"><span data-path-to-node="2,6,4,0">2,067</span></td>
<td style="text-align: center; width: 165.641px;"><span data-path-to-node="2,6,5,0">5.4</span></td>
<td style="text-align: center; width: 165.641px;"><span data-path-to-node="2,6,6,0">5.9</span></td>
</tr>
<tr>
<td style="text-align: center; width: 126.672px;"><span data-path-to-node="2,7,0,0"><b data-path-to-node="2,7,0,0" data-index-in-node="0">असम</b></span></td>
<td style="text-align: center; width: 166.141px;"><span data-path-to-node="2,7,1,0">3,15,000</span></td>
<td style="text-align: center; width: 166.141px;"><span data-path-to-node="2,7,2,0">3,20,332</span></td>
<td style="text-align: center; width: 158.703px;"><span data-path-to-node="2,7,3,0">798</span></td>
<td style="text-align: center; width: 158.703px;"><span data-path-to-node="2,7,4,0">667</span></td>
<td style="text-align: center; width: 165.641px;"><span data-path-to-node="2,7,5,0">2.5</span></td>
<td style="text-align: center; width: 165.641px;"><span data-path-to-node="2,7,6,0">2.1</span></td>
</tr>
<tr>
<td style="text-align: center; width: 126.672px;"><span data-path-to-node="2,8,0,0"><b data-path-to-node="2,8,0,0" data-index-in-node="0">बिहार</b></span></td>
<td style="text-align: center; width: 166.141px;"><span data-path-to-node="2,8,1,0">85,581</span></td>
<td style="text-align: center; width: 166.141px;"><span data-path-to-node="2,8,2,0">85,942</span></td>
<td style="text-align: center; width: 158.703px;"><span data-path-to-node="2,8,3,0">1,086</span></td>
<td style="text-align: center; width: 158.703px;"><span data-path-to-node="2,8,4,0">1,031</span></td>
<td style="text-align: center; width: 165.641px;"><span data-path-to-node="2,8,5,0">0.9</span></td>
<td style="text-align: center; width: 165.641px;"><span data-path-to-node="2,8,6,0">0.9</span></td>
</tr>
<tr>
<td style="text-align: center; width: 126.672px;"><span data-path-to-node="2,9,0,0"><b data-path-to-node="2,9,0,0" data-index-in-node="0">निगरानी वाले राज्य</b></span></td>
<td style="text-align: center; width: 166.141px;"><span data-path-to-node="2,9,1,0"><b data-path-to-node="2,9,1,0" data-index-in-node="0">84,42,581</b></span></td>
<td style="text-align: center; width: 166.141px;"><span data-path-to-node="2,9,2,0"><b data-path-to-node="2,9,2,0" data-index-in-node="0">86,82,145</b></span></td>
<td style="text-align: center; width: 158.703px;"><span data-path-to-node="2,9,3,0"><b data-path-to-node="2,9,3,0" data-index-in-node="0">1,306</b></span></td>
<td style="text-align: center; width: 158.703px;"><span data-path-to-node="2,9,4,0"><b data-path-to-node="2,9,4,0" data-index-in-node="0">1,322</b></span></td>
<td style="text-align: center; width: 165.641px;"><span data-path-to-node="2,9,5,0"><b data-path-to-node="2,9,5,0" data-index-in-node="0">110.2</b></span></td>
<td style="text-align: center; width: 165.641px;"><span data-path-to-node="2,9,6,0"><b data-path-to-node="2,9,6,0" data-index-in-node="0">114.9</b></span></td>
</tr>
<tr>
<td style="text-align: center; width: 126.672px;"><span data-path-to-node="2,10,0,0">अन्य राज्य</span></td>
<td style="text-align: center; width: 166.141px;"><span data-path-to-node="2,10,1,0">7,72,419</span></td>
<td style="text-align: center; width: 166.141px;"><span data-path-to-node="2,10,2,0">7,09,273</span></td>
<td style="text-align: center; width: 158.703px;"><span data-path-to-node="2,10,3,0">638</span></td>
<td style="text-align: center; width: 158.703px;"><span data-path-to-node="2,10,4,0">640</span></td>
<td style="text-align: center; width: 165.641px;"><span data-path-to-node="2,10,5,0">4.9</span></td>
<td style="text-align: center; width: 165.641px;"><span data-path-to-node="2,10,6,0">4.5</span></td>
</tr>
<tr>
<td style="text-align: center; width: 126.672px;"><span data-path-to-node="2,11,0,0"><b data-path-to-node="2,11,0,0" data-index-in-node="0">भारत (कुल)</b></span></td>
<td style="text-align: center; width: 166.141px;"><span data-path-to-node="2,11,1,0"><b data-path-to-node="2,11,1,0" data-index-in-node="0">92,15,000</b></span></td>
<td style="text-align: center; width: 166.141px;"><span data-path-to-node="2,11,2,0"><b data-path-to-node="2,11,2,0" data-index-in-node="0">93,91,418</b></span></td>
<td style="text-align: center; width: 158.703px;"><span data-path-to-node="2,11,3,0"><b data-path-to-node="2,11,3,0" data-index-in-node="0">1,250</b></span></td>
<td style="text-align: center; width: 158.703px;"><span data-path-to-node="2,11,4,0"><b data-path-to-node="2,11,4,0" data-index-in-node="0">1,271</b></span></td>
<td style="text-align: center; width: 165.641px;"><span data-path-to-node="2,11,5,0"><b data-path-to-node="2,11,5,0" data-index-in-node="0">115.2</b></span></td>
<td style="text-align: center; width: 165.641px;"><span data-path-to-node="2,11,6,0"><b data-path-to-node="2,11,6,0" data-index-in-node="0">119.4</b></span></td>
</tr>
</tbody>
</table>
<p><strong>बदलते मौसम पर रहेगी नजर</strong></p>
<p>SEA के कार्यकारी निदेशक <strong>डॉ. बी.वी. मेहता</strong> ने स्पष्ट किया कि यह अनुमान फिलहाल प्रारंभिक हैं और मौसम की स्थिति, फसल की प्रगति तथा रिमोट सेंसिंग व फील्ड सर्वे के आधार पर इनमें बदलाव संभव है। अंतिम अनुमान अप्रैल-मई के दौरान तीसरे और <strong>अंतिम सर्वे</strong> के बाद जारी किया जाएगा। एसोसिएशन के अनुसार, कुल मिलाकर इस वर्ष सरसों की फसल सकारात्मक संकेत दे रही है, जिससे देश में तिलहन क्षेत्र को मजबूती मिलने की उम्मीद है।&nbsp;</p>
<p>रेपसीड-मस्टर्ड प्रमोशन काउंसिल के चेयरमैन विजय डाटा ने इस फसल को भारतीय तिलहन क्षेत्र के लिए एक सकारात्मक संकेत बताया है, जिससे बाजार में खाद्य तेलों की उपलब्धता बेहतर होगी।</p>
<p>&nbsp;</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/12/image_750x500_67613bc84dca8.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ भारत का सरसों उत्पादन 3.5 फीसदी बढ़ने की उम्मीद, रबी 2025-26 में 119.4 लाख टन उत्पादन का अनुमान ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/12/image_750x500_67613bc84dca8.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[तीन राज्यों में एमएसपी पर 11,698 करोड़ रुपये की दलहन&amp;#45;तिलहन खरीद को मंजूरी, इसमें से 9,341 करोड़ सिर्फ यूपी के लिए]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/govt-clears-rs-11698-crore-msp-procurement-for-rabi-crops-across-3-states-up-to-get-9341-crore.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 31 Mar 2026 13:35:11 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/govt-clears-rs-11698-crore-msp-procurement-for-rabi-crops-across-3-states-up-to-get-9341-crore.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने रबी 2025-26 सीजन के लिए हरियाणा, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर 18 लाख मीट्रिक टन से अधिक दलहन और तिलहन की खरीद को मंजूरी दी है। इस पर कुल करीब 11,698 करोड़ रुपये खर्च आने का अनुमान है। यह खरीद मूल्य समर्थन योजना (PSS) के तहत की जाएगी।</p>
<p><strong>हरियाणा में चना और सरसों की खरीद</strong></p>
<p>केंद्रीय मंत्री ने हरियाणा सरकार के प्रस्ताव को स्वीकृति देते हुए रबी 2026 सीजन के लिए एमएसपी पर 13,082 मीट्रिक टन चना और 3,60,528 मीट्रिक टन सरसों की खरीद की अनुमति दे दी है। यह खरीद पीएसएस के अंतर्गत की जाएगी और इन स्वीकृतियों का कुल एमएसपी मूल्य 2,312.12 करोड़ रुपये से अधिक होगा।</p>
<p><strong>उत्तर प्रदेश में चना, मसूर और सरसों की खरीद</strong></p>
<p>उत्तर प्रदेश के पीएसएस प्रस्ताव के अंतर्गत रबी 2026 सीजन के लिए एमएसपी पर 2,24,000 मीट्रिक टन चना की खरीद को स्वीकृति दे दी गई है, जिसका एमएसपी मूल्य 1,316 करोड़ रुपये है। मसूर की 6,77,000 मीट्रिक टन की पूरी मांग (100 प्रतिशत) को स्वीकृति दी गई है, जिस पर एमएसपी मूल्य 70,000 रुपये प्रति मीट्रिक टन की दर से 4,739 करोड़ रुपये होगा। सरसों के लिए स्वीकृत मात्रा 5,30,000 मीट्रिक टन का एमएसपी मूल्य 62,000 रुपये प्रति मीट्रिक टन की दर से 3,286 करोड़ रुपये होगा।</p>
<p><strong>कर्नाटक में कुसुम (सैफ्लावर) की खरीद</strong></p>
<p>कर्नाटक में रबी 2025-26 सीजन के दौरान कुसुम (सैफ्लावर) की फसल के लिए पीएसएस प्रस्ताव को स्वीकृति दी गई है, जिसके तहत स्वीकृत मात्रा 6,923 मीट्रिक टन की उपज एमएसपी पर खरीदी जाएगी। राज्य की तरफ से भेजे गए प्रस्ताव में 25 प्रतिशत मात्रा (6,923 मीट्रिक टन) को मंजूरी दी गई है। वर्ष 2025-26 के लिए कुसुम का एमएसपी 65,400 रुपये प्रति मीट्रिक टन निर्धारित किया गया है, जिससे कुल एमएसपी मूल्य 45.27 करोड़ रुपये बनता है।</p>
<p>हरियाणा, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक के लिए स्वीकृत पीएसएस प्रस्तावों के माध्यम से, चना, मसूर, सरसों और कुसुम (सैफ्लावर) जैसी महत्वपूर्ण दलहन और तिलहन फसलों की एमएसपी पर वैज्ञानिक और सुव्यवस्थित खरीद सुनिश्चित की जाएगी। इससे न केवल किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिलेगा, बल्कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के देश में खाद्य और पोषण सुरक्षा बढ़ाने, तिलहन और दलहन उत्पादन बढ़ाने और कृषि क्षेत्र को सशक्त बनाने के संकल्प को भी बल मिलेगा। इसके साथ ही, राज्यों द्वारा पीओएस आधारित खरीद की व्यवस्था पहले से ही सुदृढ़ होने के कारण, किसानों के लिए पारदर्शी भुगतान सुनिश्चित किया जाएगा।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x500_69cb7f837d412.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ तीन राज्यों में एमएसपी पर 11,698 करोड़ रुपये की दलहन-तिलहन खरीद को मंजूरी, इसमें से 9,341 करोड़ सिर्फ यूपी के लिए ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[MC14: डब्ल्यूटीओ की मंत्रिस्तरीय बैठक गतिरोध के साथ समाप्त; भारत के प्रयासों के बीच फिशरीज पर वार्ता आगे बढ़ी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/world-trade-organization-mc14-ends-in-deadlock-e-commerce-pact-collapses-fisheries-talks-advance-amid-india’s-push.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 30 Mar 2026 14:04:53 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/world-trade-organization-mc14-ends-in-deadlock-e-commerce-pact-collapses-fisheries-talks-advance-amid-india’s-push.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>डब्ल्यूटीओ की 14वीं मंत्रिस्तरीय बैठक (MC14) बिना किसी ठोस सहमति के समाप्त हो गई। कैमरून के याउंडे में 26-29 मार्च को आयोजित इस सम्मेलन में ई-कॉमर्स, ढांचागत सुधार और कृषि से जुड़े अहम फैसले जिनेवा के लिए टाल दिए गए। यहां बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली में गहरे मतभेद भी उजागर हुए। ई-कॉमर्स मोरेटोरियम जैसे मौजूदा सेफगार्ड प्रावधान समाप्त हो गए। फिशरीज सब्सिडी पर चर्चा, विशेष रूप से अत्यधिक क्षमता और अधिक मछली पकड़ने के मुद्दों पर केंद्र में रही। भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के नेतृत्व में भारत ने इस मुद्दे पर सक्रिय भूमिका निभाई और नीतिगत स्वतंत्रता तथा न्यायसंगत परिणामों पर जोर दिया। गोयल के हस्तक्षेप ने फिशरीज वार्ताओं के दूसरे चरण की रूपरेखा तय करने में अहम भूमिका निभाई, हालांकि इस पर भी व्यापक सहमति नहीं बन सकी।</p>
<p>डब्ल्यूटीओ की महानिदेशक नगोजी ओकोंजो-इवीला ( Ngozi Okonjo-Iweala) ने स्वीकार किया कि सदस्य देश समझौते के काफी करीब पहुंच गए थे, लेकिन सहमति बनाने में विफल रहे। उन्होंने कहा, &ldquo;हम याउंडे पैकेज के बहुत करीब हैं, लेकिन अभी पूरी तरह वहां नहीं पहुंचे हैं।&rdquo; उन्होंने यह भी बताया कि सदस्य देश डब्ल्यूटीओ सुधार, ई-कॉमर्स, ट्रिप्स के तहत नॉन-वायलेशन शिकायतें और एलडीसी पैकेज से जुड़े फैसले के मसौदे को भविष्य की जिनेवा वार्ताओं के आधार के रूप में रखेंगे। यह सम्मेलन हाल के वर्षों की सबसे अनिर्णायक मंत्रिस्तरीय बैठकों में से एक है। इससे बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था के भविष्य को लेकर गहरा विभाजन भी दिखता है।</p>
<p><strong>ई-कॉमर्स मोरेटोरियम समाप्त, शुल्क लगाने का रास्ता खुला</strong></p>
<p>गतिरोध के केंद्र में WTO का इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन पर कस्टम ड्यूटी न लगाने का मोरेटोरियम था, जो 1998 से लागू था। अमेरिका, यूरोपीय संघ और जापान इसे दीर्घकालिक या स्थायी रूप से बढ़ाने के पक्ष में थे। लेकिन भारत और अन्य विकासशील देशों ने यह तर्क देते हुए इसका विरोध किया कि इससे राजस्व हानि स्थायी हो जाएगी और तेजी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था में नीतिगत लचीलापन सीमित हो जाएगा। कृषि वार्ताओं में प्रगति न होने का हवाला देते हुए ब्राजील ने चार साल के विस्तार सहित सभी प्रस्तावों पर असहमति जताई। सहमति न बनने के कारण 26 वर्षों में पहली बार यह मोरेटोरियम समाप्त हो गया, जिससे देशों के लिए डिजिटल ट्रांसमिशन पर शुल्क लगाने का रास्ता खुल गया है।</p>
<p><strong>TRIPS सुरक्षा प्रावधान भी समाप्त</strong></p>
<p>ई-कॉमर्स मोरेटोरियम का विस्तार नहीं होने के चलते TRIPS समझौते के तहत &lsquo;नॉन-वायलेशन&rsquo; शिकायतों के खिलाफ सेफगार्ड प्रावधान भी समाप्त हो गया। विकासशील देश नीतिगत स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए इस प्रावधान पर निर्भर थे, खासकर सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में। इसके बिना WTO के अनुरूप उठाए गए कदम, जैसे अनिवार्य लाइसेंसिंग, को भी विकसित देश चुनौती दे सकते हैं। भारत के लिए इससे बौद्धिक संपदा नियमों, विशेषकर पेटेंट कानून की धारा 3(डी) से जुड़े विवादों का जोखिम बढ़ गया है।</p>
<p><strong>डब्ल्यूटीओ में सुधार पर वार्ता ठप</strong></p>
<p>डब्ल्यूटीओ में सुधार के रोडमैप पर सहमति बनाने के प्रयास भी विफल रहे। वर्ष 2028 तक सुधारों की दिशा में काम करने का प्रस्ताव आम सहमति हासिल नहीं कर सका। मतभेद साफ हैं- विकसित देश तेज निर्णय प्रक्रिया और कड़े नियम चाहते हैं, जबकि विकासशील देश नीतिगत लचीलापन और सर्वसम्मति आधारित प्रणाली को सुरक्षित रखना चाहते हैं। नतीजतन, अन्य मुद्दों की तरह सुधार वार्ता भी बिना किसी ठोस प्रगति के जिनेवा बैठक के लिए टाल दी गई है।</p>
<p><strong>निवेश समझौता अटका, बहुपक्षीय समझौतों की राह आगे बढ़ी</strong></p>
<p>निवेश सुविधा समझौता (IFDA), जिसे अधिकांश देशों का समर्थन प्राप्त है, पर भारत का विरोध है। भारत का तर्क है कि ऐसे बहुपक्षीय (प्लुरिलैटरल) समझौतों को WTO के दायरे में लाने से इसकी बहुपक्षीय प्रकृति कमजोर होगी और छोटे समूह नियम तय करने लगेंगे। भारत के इस रुख ने डब्ल्यूटीओ की सर्वसम्मति आधारित निर्णय प्रणाली के मूल सिद्धांत को सुरक्षित रखने में मदद की है। वहीं 66 देशों ने WTO के बाहर एक अलग ई-कॉमर्स समझौते को आगे बढ़ाया, जो सर्वसम्मति प्रणाली से बाहर नियम बनाने की बढ़ती प्रवृत्ति को दर्शाता है।</p>
<p><strong>कृषि गतिरोध का असर और व्यापक विफलता</strong></p>
<p>कृषि वार्ताओं में लंबे समय से जारी ठहराव से उपजी निराशा ने इस गतिरोध को और गहरा किया, जो विकासशील देशों की प्रमुख प्राथमिकता रही है। ब्राजील ने ई-कॉमर्स पर प्रगति को कृषि मुद्दों से जोड़ दिया, जिससे समझौते की संभावना लगभग समाप्त हो गई। इससे स्पष्ट होता है कि पुराने और अनसुलझे मुद्दे अब डिजिटल व्यापार जैसे नए क्षेत्रों में भी प्रगति में बाधा बन रहे हैं।</p>
<p>MC14 सिर्फ नए समझौते न कर पाने के कारण नहीं, बल्कि मौजूदा ढांचे के कमजोर पड़ने के कारण भी अलग पहचान रखता है। इससे पहले MC11 (ब्यूनस आयर्स, 2017) में नए नियमों पर मतभेद के चलते कोई घोषणा नहीं हो सकी थी, जबकि MC5 (कैनकुन, 2003) में निवेश और प्रतिस्पर्धा जैसे नए मुद्दों पर विवाद के कारण वार्ता टूट गई थी।</p>
<p>लेकिन MC14 पहली ऐसी बैठक है, जहां ई-कॉमर्स और TRIPS से महत्वपूर्ण प्रावधानों को समाप्त होने दिया गया। MC11 के विपरीत, जहां विवाद भविष्य के नियमों को लेकर था, MC14 मौजूदा व्यवस्था को भी बनाए रखने में असफल रहा। कृषि ने ई-कॉमर्स जैसे असंबंधित क्षेत्रों में भी प्रगति रोक दी।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x_69ca350c445c2.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>छोटे मछुआरों से कोई खतरा नहीं: पीयूष गोयल</strong></p>
<p>सतत विकास लक्ष्यों (SDG 14.6) के अनुरूप स्थिरता को प्राथमिकता देते हुए भारत ने जोर दिया कि फेज-II की वार्ताओं में समानता के मूल सिद्धांतों को शामिल किया जाए। इसमें विकासशील और अल्प-विकसित देशों के लिए विशेष एवं विभेदित उपचार (S&amp;DT), साझा लेकिन विभेदित जिम्मेदारियां एवं संबंधित क्षमताएं (CBDR-RC) और &lsquo;प्रदूषक भुगतान सिद्धांत&rsquo; को मान्यता देना शामिल है। इन सिद्धांतों के अनुरूप, वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने विकासशील देशों के लिए 25 वर्ष की संक्रमण अवधि, दूर समुद्री क्षेत्र में मछली पकड़ने वाले बेड़ों पर कड़े नियम, छोटे एवं पारंपरिक मछुआरों के लिए स्थायी छूट, तथा प्रति व्यक्ति सब्सिडी के आधार पर अनुशासन जैसे प्रमुख मुद्दों को रेखांकित किया, जिससे फेज-II वार्ता का दायरा और व्यापक हुआ।</p>
<p>मंत्रिस्तरीय चर्चा के दौरान गोयल ने कहा कि मत्स्य क्षेत्र भारत की खाद्य सुरक्षा और आजीविका सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभाता है। यह 90 लाख से अधिक मछुआरा परिवारों का सहारा है। इनमें अधिकांश छोटे और पारंपरिक मछुआरे हैं, जो टिकाऊ तरीकों का पालन करते हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारत में फिशरीज सब्सिडी विश्व में सबसे कम स्तर पर है। यह प्रति मछुआरा परिवार सालाना लगभग 15 डॉलर है, जबकि अन्य देशों में यह हजारों डॉलर तक पहुंचती है।</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x500_69ca350cc6c7b.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ MC14: डब्ल्यूटीओ की मंत्रिस्तरीय बैठक गतिरोध के साथ समाप्त; भारत के प्रयासों के बीच फिशरीज पर वार्ता आगे बढ़ी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[मालनपुर प्लांट की क्षमता बढ़ाने के लिए 30 करोड़ निवेश करेगी नोवा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/nova-to-invest-rs-300-million-to-expand-malanpur-plant-capacity.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 30 Mar 2026 12:39:21 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/nova-to-invest-rs-300-million-to-expand-malanpur-plant-capacity.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>डेयरी उद्योग की कंपनी और नोवा ब्रांड के तहत डेयरी उत्पादन बेचने वाली कंपनी स्टर्लिंग एग्रो इंडस्ट्रीज लिमिटेड मध्य प्रदेश के मालनपुर स्थित अपने डेयरी संयंत्र की क्षमता में बढ़ोतरी के लिए करीब 25 करोड़ रुपये का निवेश करेगी। स्टर्लिंग एग्रो इंडस्ट्रीज लिमिटेड के डायरेक्टर रवीन सलूजा ने रूरल वॉयस के साथ एक बातचीत में यह जानकारी दी। कंपनी अपने प्रसंस्करण संयंत्र को पुनर्व्यवस्थित करने की योजना के तहत उत्तर प्रदेश के कासगंज स्थित संयंत्र को बंद करेगी क्योंकि इसकी क्षमता का पूरा उपयोग नहीं हो रहा है। वह हरियाणा के कुंडली और मध्य प्रदेश के मालनपुर स्थित संयंत्र के जरिये ही डेयरी उत्पादों का उत्पादन करने की योजना पर काम कर रही है।</p>
<p>नोवा डेयरी उद्योग का एक पुराना ब्रांड है और उसका फोकस दूध की बजाय दूध उत्पादों पर अधिक है। सलूजा के मुताबिक हम घरेलू बाजार में 40 फीसदी वृद्धि दर के लक्ष्य को लेकर चल रहे हैं। वहीं उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और राजस्थान में दूध की खरीद के लिए नयी टीम तैयार कर रहे हैं।&nbsp;</p>
<p>उन्होंने कहा, हम निर्यात बाजार में भी फोकस बढ़ा रहे हैं। कंपनी अपने उत्पाद का करीब 20 फीसदी निर्यात करती है। यह निर्यात थाईलैंड, इंडोनेशिया और दूसरे एशियाई देशों को होता है। इसमें घी, मिल्क पाउडर और बटर ऑयल का निर्यात प्रमुख है। बिजनेस टू बिजनेस मार्केट पर कंपनी का अधिक फोकस है। इस मार्केट में घी, पनीर, मिल्क पाउडर, टेबल बटर, फ्लेवर्ड मिल्क और दही शामिल हैं।&nbsp;</p>
<p>रवीन कहते हैं कि हम अपने बिजनेस के कंसोलिडेशन पर फोकस कर रहे हैं और उसी के तहत उत्पादन क्षमता में बढ़ोतरी के साथ इसमें नया निवेश कर रहे हैं। दूध की खरीद के बारे में वह कहते है कि हम वेंडर्स के जरिये ही अधिक दूध खरीदते हैं। लेकिन दूध के दाम इस साल काफी बढ़े हैं और हमारी खरीद लागत भैंस के 6.5 फीसदी फैट वाले दूध के लिए 59 रुपये लीटर तक पहुंच गई है।&nbsp;</p>
<p>रवीन का कहना है कि सरकार की नीतियों में सहकारी क्षेत्र को अधिक मदद की जाती है जबकि निजी क्षेत्र को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है। कई राज्यों में सरकारें सहकारी समितियों द्वारा खरीदे जाने वाले दूध पर सब्सिडी देती हैं जो एक समान प्रतिस्पर्धी बाजार के सिद्धांत के प्रतिकूल है।</p>
<p>डेयरी सेक्टर में आ रहे स्टार्टअप्स के बारे में उनका कहना है कि वह कुछ खास उत्पादों जैसे ए2 मिल्क, चीज और प्रोटीन वाले उत्पादों पर फोकस बढ़ा रहे हैं क्योंकि ये महंगे उत्पाद हैं और कंपनियां अपने संस्थागत निवेशकों को प्रभावित कर अधिक फंडिंग जुटाने के मकसद से इस रणनिति पर अमल करती हैं। इससे मार्केट डिसरप्शन तो आते हैं साथ ही यह बिजनेस टू कंज्यूमर (बीटूसी) प्रीमियम सेगमेंट में कंपटीशन खड़ा कर रहे हैं।</p>
<p>रवीन कहते हैं कि रेगूलेटरी अथारिटी की जिम्मेदारी है कि गलत और फेक उत्पाद बाजार में न बिक सकें। अगर रेगूलेटर सही तरीके से काम करेंगे तो यह किसानों और उपभोक्ताओं के साथ उद्योग के लिए भी बेहतर होगा। साथ ही बाजार भी स्थिर रहेगा और गैर-जरूरी उतार-चढ़ाव नहीं होंगे। हमारी कंपनी का फोकस ब्रांड लायल्टी को मजबूत करने के साथ ही अपने ब्रांड की साख को बेहरतर करना है। इसके लिए तय गुणवत्ता मानकों का पालन करते हुए बाजार की उम्मीदों पर खरा उतरने की हमारी कोशिश रहती है।&nbsp;</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x500_69ca2450d8985.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ मालनपुर प्लांट की क्षमता बढ़ाने के लिए 30 करोड़ निवेश करेगी नोवा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x500_69ca2450d8985.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[संकट के बीच केरोसिन की वापसी: PDS और पेट्रोल पंप से होगी बिक्री, नियमों में ढील]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/kerosene-returns-amid-lpg-crisis-sales-through-pds-and-petrol-pumps-rules-relaxed.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 30 Mar 2026 11:28:45 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/kerosene-returns-amid-lpg-crisis-sales-through-pds-and-petrol-pumps-rules-relaxed.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति पर असर पड़ा है, जिससे कई देशों में ईंधन संकट गहराया है। हालात को देखे हुए&nbsp;<span>केंद्र सरकार ने केरोसिन पर बड़ा फैसला लिया है। सरकार ने चुनिंदा पेट्रोल पंप और </span>पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम (PDS) के जरिए सुपीरियर केरोसिन ऑयल (SKO) आपूर्ति की अस्थायी अनुमति दी है। इससे ईंधन की किल्लत से जूझ रही आम जनता को कुछ राहत मिलेगी।</p>
<p>देश के 21 &ldquo;केरोसीन-फ्री&rdquo; राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में PDS के जरिए केरोसीन (SKO) की आपूर्ति फिर से शुरू करने के लिए यह अस्थायी कदम उठाया गया है। चुनिंदा&nbsp;पेट्रोल पंपों को भी सीमित मात्रा में SKO भंडारण और बिक्री की इजाजत होगी।&nbsp;</p>
<p>29 मार्च को जारी अधिसूचना के अनुसार, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 60 दिनों के लिए एड-हॉक आधार पर केरोसिन तेल (SKO) उपलब्ध कराने की अनुमति दी है। यह आपूर्ति विशेष रूप से घरेलू उपयोग जैसे खाना पकाने और रोशनी के लिए होगी, ताकि दुरुपयोग को रोका जा सके।</p>
<p>सरकार ने पेट्रोलियम नियम, 2002 के तहत अस्थायी छूट देते हुए सार्वजनिक क्षेत्र की ऑयल मार्केटिंग कंपनियों द्वारा संचालित चयनित चुनिंदा पेट्रोल पंपों को केरोसिन के भंडारण और वितरण की अनुमति दी है। प्रत्येक चयनित पेट्रोल पंप अधिकतम 5,000 लीटर तक केरोसिन स्टोर कर सकेगा।&nbsp;<span>हर जिले में अधिकतम दो पेट्रोल पंपों को इसके लिए नामित किया जाएगा, जहां केरोसिन बिक्री के लिए उपलब्ध होगा।</span></p>
<p>इसके साथ ही, केरोसिन वितरण प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए लाइसेंसिंग नियमों में भी ढील दी गई है। PDS डीलरों और अधिकृत एजेंटों को कुछ शर्तों के तहत लाइसेंस संबंधी प्रावधानों से अस्थायी छूट दी गई है। जिससे<span>&nbsp;घरों तक केरोसिन की आपूर्ति को आसान बनाया जा सके।&nbsp;</span></p>
<p>गौरतलब है कि भारत में पिछले एक दशक में केरोसिन पर निर्भरता को कम करने की नीति अपनाई गई है। इसके चलते PDS के माध्यम से सब्सिडी वाले केरोसिन की आपूर्ति धीरे-धीरे घटाई गई। कई राज्यों ने तो खुद को &ldquo;केरोसिन मुक्त&rdquo; घोषित कर दिया था। लेकिन ईरान में छोड़ी जंग ने केरोसिन की तरफ लौटने पर मजबूर कर दिया।&nbsp;</p>
<p>यह निर्णय खासकर गरीब और ग्रामीण परिवारों के लिए राहत देगा। सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह व्यवस्था पूरी तरह अस्थायी है और स्थिति सामान्य होने पर इसे वापस लिया जाएगा।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x_69ca12087c6bd.jpg" alt="" /></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x500_69ca11d48e951.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ संकट के बीच केरोसिन की वापसी: PDS और पेट्रोल पंप से होगी बिक्री, नियमों में ढील ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x500_69ca11d48e951.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[मेरठ: महाराजा सूरजमल की प्रतिमा का अनावरण, ‘जाट’ शब्द हटाने पर मचा विवाद]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/politics/meerut-maharaja-surajmals-statue-unveiled-controversy-over-removal-of-word-jat.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 29 Mar 2026 21:15:38 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/politics/meerut-maharaja-surajmals-statue-unveiled-controversy-over-removal-of-word-jat.html</guid>
        <description><![CDATA[ <div dir="auto">
<p>2027 के विधानसभा चुनाव से पहले जातीय समीकरण साधने की होड़ मची है। सियासी दलों के नेता सामाजिक संगठनों के जरिए सक्रियता बढ़ा रहे हैं। रविवार को अंतर्राष्ट्रीय जाट संसद' नामक संस्था ने मेरठ के सकौती टांडा स्थित हितकारी किसान इंटर कॉलेज में महाराजा सूरजमल की प्रतिमा अनावरण का कार्यक्रम आयोजित किया, जिसमें पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान, राजस्थान के सांसद हनुमान बेनीवाल और पूर्व केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान समेत कई राज्यों से जाट नेता शामिल हुए।</p>
<p>कार्यक्रम के दौरान उस समय विवाद खड़ा हो गया जब <span>प्रतिमा के फाउंडेशन पर लिखा &ldquo;जाट&rdquo; शब्द प्रशासन ने हटवा दिया। </span>सांसद <strong>हनुमान बेनीवाल</strong> ने महाराजा सूरजमल की प्रतिमा से 'जाट' शब्द हटाए जाने पर नाराजगी जताई। बेनीवाल ने कहा, उन्हें बताया गया कि पुलिस ने जाट शब्द हटवा दिया। इस पर बालियान बात करेंगे।&nbsp;<span></span></p>
<p>इस मामले को लेकर लोगों में काफी आक्रोश देखा गया और विवाद खड़ा हो गया। हंगामे के चलते पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान को प्रतिमा का अनावरण किए बिना ही लौटना पड़ा। यह यूपी में महाराजा सूरजमल की सबसे बड़ी प्रतिमा बताई जा रही है। समारोह में शामिल होने के लिए कई राज्यों से लोग पहुंचे थे।&nbsp;</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x_69c9785db16cb.jpg" alt="" style="display: block; margin-left: auto; margin-right: auto;" /></p>
<p>आयोजन स्थल पर मौजूद लोगों ने नारेबाजी कर विरोध जताया। आखिरकार पूर्व केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान और सांसद हनुमान बेनीवाल व अन्य लोगों ने महाराज सूरजमल की प्रतिमा का अनावरण किया।</p>
<p>प्रशासन पर निशाना साधते हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री <strong>संजीव बालियान</strong> ने कहा कि आयोजन को नाकाम करने की साजिशें चल रही थीं। जबकि यह एक सामाजिक कार्यक्रम था, सभी पार्टियों के लोग आए। एक राज्य के मुख्यमंत्री आए। लेकिन पता नहीं प्रशासन को क्या समस्या थी। ऐसे कार्यक्रम में तो सहयोग करना चाहिए था। बालियान ने दावा किया कि कार्यक्रम पूरी तरह अराजनीतिक था।&nbsp;</p>
<p>जाट संसद संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष मनु दांतल सहित कई लोगों ने अनावरण के बाद महाराजा सूरजमल की मूर्ति के नीचे धरना दिया और मेरठ पुलिस-प्रशासन पर जाट समाज के अपमान का आरोप लगाया। उन्होंने जाट शब्द हटाने वाले अफसरों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की।&nbsp;</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x_69c94a360221d.jpg" alt="" style="display: block; margin-left: auto; margin-right: auto;" /></p>
<p>स्थानीय अधिकारियों का कहना है कि जातिसूचक शब्द लिखने पर रोक के चलते यह कार्रवाई की गई।&nbsp;मेरठ पुलिस का बयान आया कि समस्त कार्यवाई इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा प्रवीण छेत्री बनाम उत्तर प्रदेश राज्य में दिए गए निर्णय के अनुसार आयोजक को अवगत कराने पर आयोजक द्वारा स्वयं की गई है जिसके वीडियो साक्ष्य मौजूद हैं।&nbsp;</p>
<p><strong>सीएम मान ने साधा पीएम मोदी पर निशाना&nbsp;</strong></p>
<p>जनसभा के दौरान भाजपा नेताओं के लिए उस समय स्थिति असहज स्थिति पैदा हो गई, जब पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर जमकर तंज कसे। इस दौरान उन्होंने संजीव बालियान से कान बंद करने का अनुरोध किया और केंद्र सरकार पर खूब हमले किये।&nbsp;</p>
<p>इस तरह महाराजा सूरजमल के नाम पर हुआ सामाजिक कार्यक्रम पूरी तरह राजनीतिक रंग में रंग गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में जाट समाज के गणमान्य लोग और युवा मौजूद रहे। कार्यक्रम के दौरान महाराजा सूरजमल के साहस, वीरता और समाज में उनके योगदान को याद किया गया।&nbsp;</p>
<br />
<p></p>
</div> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x500_69c97dc9be7ad.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ मेरठ: महाराजा सूरजमल की प्रतिमा का अनावरण, ‘जाट’ शब्द हटाने पर मचा विवाद ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कृषि श्रमिक संगठनों की आगामी विधानसभा चुनावों में सांप्रदायिक राजनीति को नकारने की अपील]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/politics/agricultural-workers-unions-urge-voters-to-reject-communal-politics-in-upcoming-assembly-polls.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 29 Mar 2026 11:08:47 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/politics/agricultural-workers-unions-urge-voters-to-reject-communal-politics-in-upcoming-assembly-polls.html</guid>
        <description><![CDATA[ <div><span>पांच राज्यों में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर अखिल भारतीय कृषि एवं ग्रामीण श्रमिक संगठन ने एक संयुक्त बयान जारी किया है। इसमें मतदाताओं से सांप्रदायिक राजनीति और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को हराने की अपील की गई है। संगठनों का आरोप है कि भाजपा की नीतियों ने ग्रामीण और कामकाजी वर्गों पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है।</span></div>
<div><span>&nbsp;</span></div>
<div><span>गौरतलब है कि केरल, पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु और पुडुचेरी में चुनाव तारीखों की घोषणा की गई है। संगठनों ने दावा किया कि भाजपा की जीत से सांप्रदायिक राजनीति को बढ़ावा मिलेगा और कल्याणकारी योजनाएं कमजोर होंगी। बयान में हाल के श्रम सुधारों और मनरेगा (MGNREGA) को नई योजना से बदलने की आलोचना करते हुए कहा गया कि इससे रोजगार की गारंटी और श्रमिकों के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं।</span></div>
<div><span>&nbsp;</span></div>
<div><span>संगठनों ने प्रस्तावित सीड्स बिल और बिजली विधेयक 2025 को लेकर भी चिंता जताई। उनका कहना है कि इन नीतियों से छोटे और सीमांत किसानों की लागत बढ़ेगी और पहले से ही कमजोर कृषि श्रमिक वर्ग पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा, जो ज्यादातर असंगठित क्षेत्र में कार्यरत है।</span></div>
<div><span>&nbsp;</span></div>
<div><span>केरल का उदाहरण देते हुए बयान में लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) सरकार की सराहना की गई और वहां के मतदाताओं से वामपंथी नीतियों का समर्थन जारी रखने की अपील की गई। साथ ही यह भी कहा गया कि केरल, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों ने पहले भी भाजपा की राजनीति को नकारा है, जबकि असम और पुडुचेरी के मतदाताओं से भाजपा को सत्ता से हटाने का आह्वान किया गया।</span></div>
<div><span>&nbsp;</span></div>
<div><span>संगठनों ने कृषि और ग्रामीण श्रमिकों से चुनाव प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी निभाने और भाजपा विरोधी गठबंधनों, विशेष रूप से वामपंथी उम्मीदवारों का समर्थन करने की अपील की। उन्होंने इन विकल्पों को &ldquo;कॉरपोरेट-सांप्रदायिक राजनीति&rdquo; के खिलाफ एक मजबूत विकल्प बताया।&nbsp;</span></div>
<div></div> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ कृषि श्रमिक संगठनों की आगामी विधानसभा चुनावों में सांप्रदायिक राजनीति को नकारने की अपील ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[एनसीईएल ने सहकारी निर्यात को बढ़ावा देने के लिए पंजाब और लद्दाख के साथ किए समझौते]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/cooperatives/ncel-to-promote-cooperative-exports-through-mou-with-punjab-and-ladakh.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 28 Mar 2026 16:42:40 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/cooperatives/ncel-to-promote-cooperative-exports-through-mou-with-punjab-and-ladakh.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>राष्ट्रीय सहकारी निर्यात लिमिटेड (NCEL) ने सहकारी क्षेत्र के कृषि निर्यात को बढ़ावा देने के लिए मार्कफेड पंजाब और लद्दाख के बागवानी विभाग के साथ समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं। इन साझेदारियों का उद्देश्य वैश्विक बाजारों तक पहुंच बढ़ाना, मूल्य श्रृंखलाओं को मजबूत करना और क्षेत्र-विशिष्ट उत्पादों को बढ़ावा देना है, जिससे किसानों की आय में वृद्धि हो और भारत एक विश्वसनीय कृषि निर्यात केंद्र के रूप में उभरे।</p>
<p>24 मार्च 2026 को चंडीगढ़ में एनसीईएल ने मार्कफेड पंजाब के साथ राज्य के कृषि और संबद्ध उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए समझौता किया। इस MoU पर एनसीईएल के प्रबंध निदेशक <strong>अनुपम कौशिक</strong> और मार्कफेड पंजाब के प्रबंध निदेशक <b>गिरीश दयालन</b> ने हस्ताक्षर किए।</p>
<p>इस साझेदारी का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप गुणवत्ता सुधारना, वैश्विक बाजार तक पहुंच बढ़ाना और कुशल व टिकाऊ मूल्य श्रृंखलाएं विकसित करना है, जिससे किसानों को बेहतर मूल्य मिल सके। अधिकारियों के अनुसार, यह साझेदारी सहकारी नेटवर्क के माध्यम से निर्यात क्षमता को मजबूत करेगी और ग्रामीण आय में वृद्धि करेगी।</p>
<p>इससे पहले 19 मार्च 2026 को एनसीईएल ने नई दिल्ली स्थित मुख्यालय में लद्दाख के बागवानी विभाग के साथ एक अन्य MoU पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते पर <strong>अनुपम कौशिक</strong> और लद्दाख के बागवानी निदेशक<strong> त्सेवांग पंचोक</strong>&nbsp;ने वरिष्ठ अधिकारियों की उपस्थिति में हस्ताक्षर किए।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x_69c7b771a39f6.jpg" alt="" style="display: block; margin-left: auto; margin-right: auto;" /></p>
<p>यह दीर्घकालिक सहयोग लद्दाख की सहकारी समितियों से निर्यात योग्य कृषि और संबद्ध उत्पादों की पहचान और प्रोत्साहन पर केंद्रित होगा। इसके तहत बाजार संपर्क, खरीद सहायता और क्षेत्र की विशेष परिस्थितियों के अनुरूप टिकाऊ एवं लाभकारी मूल्य श्रृंखलाएं विकसित की जाएंगी।</p>
<p>इस पहल के तहत लद्दाख के विशिष्ट उत्पादों जैसे खुबानी, ऊन, सीबकथॉर्न और उच्च ऊंचाई वाले जैविक उत्पादों को वैश्विक बाजार में प्रदर्शित किया जाएगा।</p>
<p><strong>एनसीईएल</strong> भारत में सहकारी निर्यात के लिए एक प्रमुख संस्था के रूप में कार्य करती है। ये पहलें &ldquo;सहकार से समृद्धि&rdquo; के उसके संकल्प को दर्शाती हैं, जिसका उद्देश्य सीमावर्ती क्षेत्रों सहित देशभर में किसानों और सहकारी संस्थाओं को सशक्त बनाना और भारत को वैश्विक कृषि बाजार में एक विश्वसनीय आपूर्तिकर्ता के रूप में स्थापित करना है।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x500_69c7b782ae2b7.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ एनसीईएल ने सहकारी निर्यात को बढ़ावा देने के लिए पंजाब और लद्दाख के साथ किए समझौते ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जेवर में नोएडा अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे के पहले चरण का उद्घाटन किया]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/prime-minister-inaugurates-phase-1-of-the-noida-international-airport-in-jewar.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 28 Mar 2026 14:24:41 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/prime-minister-inaugurates-phase-1-of-the-noida-international-airport-in-jewar.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को उत्तर प्रदेश के जेवर में नोएडा अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे के पहले चरण का उद्घाटन किया। इस एयरपोर्ट की शुरुआत को भारत के वैश्विक एविएशन हब बनने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) के लिए एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय गेटवे के रूप में परिकल्पित यह परियोजना देश के एयरपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने और क्षेत्रीय व अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिविटी बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम है।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x_69c791d8b6a70.jpg" alt="" /></p>
<p>इस अवसर पर अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट से आगरा, मथुरा, अलीगढ़, गाजियाबाद, मेरठ, इटावा, बुलंदशहर, फरीदाबाद और आसपास के क्षेत्रों को बहुत बड़ा लाभ होने वाला है।</p>
<p>उन्होंने कहा, &ldquo;यह एयरपोर्ट पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों, छोटे और लघु उद्योगों, यहां के नौजवानों के लिए अनेक नए अवसर लेकर आने वाला है। यहां से दुनिया के लिए विमान तो उड़ेंगे ही, साथ ही यह विकसित उत्तर प्रदेश की उड़ान का भी प्रतीक बनेगा। मैं विशेष कर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जनता को इस एयरपोर्ट के लिए बधाई देता हूं।&rdquo;</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x_69c791d872d88.jpg" alt="" /></p>
<p>प्रधानमंत्री ने कहा, पश्चिम एशिया में एक महीने से युद्ध चल रहा है। युद्ध की वजह से कई देशों में खाने-पीने के समान, पेट्रोल, डीजल, गैस, खाद जैसी कई जरूरी चीजों का संकट पैदा हो गया है। हर देश इस संकट का सामना करने के लिए कुछ न कुछ कोशिश कर रहा है। भारत भी इस संकट का पूरी शक्ति से मुकाबला कर रहा है। भारत बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और गैस युद्ध से प्रभावित क्षेत्र से मंगाता है। सरकार हर वह कदम उठा रही है जिससे सामान्य परिवारों पर, हमारे किसान भाई-बहनों पर इस संकट का बोझ ना पड़े।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x500_69c791d8eafa9.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जेवर में नोएडा अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे के पहले चरण का उद्घाटन किया ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x500_69c791d8eafa9.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[MC14: डब्ल्यूटीओ वार्ता में भारत पर बढ़ा दबाव; कृषि, फिशरीज सब्सिडी और ई&amp;#45;कॉमर्स समझौतों पर फोकस]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/mc14-pressure-mounts-on-india-as-wto-talks-focus-on-agriculture-fisheries-and-e-commerce.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 28 Mar 2026 13:29:10 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/mc14-pressure-mounts-on-india-as-wto-talks-focus-on-agriculture-fisheries-and-e-commerce.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>कैमरून के याउंडे में आयोजित WTO के 14वीं मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (MC14) का तीसरा दिन निर्णायक बनता दिख रहा है। मंत्रियों की बैठक चार प्रमुख क्षेत्रों- कृषि, फिशरीज सब्सिडी, निवेश सुविधा और ई-कॉमर्स- पर हो रही है। साथ ही खुली बैठकों में देश अपने-अपने रुख स्पष्ट कर रहे हैं। इस बीच, वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने सम्मेलन के दूसरे दिन कहा कि सहमति आधारित निर्णय प्रक्रिया डब्ल्यूटीओ की वैधता की आधारशिला है। उन्होंने जोर दिया कि डब्ल्यूटीओ सुधारों में उरुग्वे वार्ता से उत्पन्न असमानताओं को शामिल किया जाना चाहिए। साथ ही, सभी सदस्य देशों को उत्पादन क्षमता बढ़ाने, रोजगार सृजन करने और वैश्विक व्यापार में सार्थक भागीदारी का समान अवसर मिलना जरूरी है।</p>
<p>हालांकि किसी बड़े मुद्दे पर समाधान की संभावना कम है, लेकिन शनिवार की चर्चा अंतिम नतीजों की दिशा तय कर सकती है। दिल्ली स्थित थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनीशिएटिव (GTRI) के अनुसार सबसे बड़ा मतभेद ई-कॉमर्स पर कस्टम ड्यूटी मोरेटोरियम को लेकर है। अमेरिका इसे स्थायी रूप से बढ़ाने की वकालत कर रहा है, जबकि भारत और अन्य विकासशील देश राजस्व नुकसान और नीतिगत सीमाओं का हवाला देते हुए इसका विरोध कर रहे हैं। इस मुद्दे पर 2-4 साल के अस्थायी समझौते की संभावना सबसे अधिक मानी जा रही है।</p>
<p>निवेश सुविधा समझौते (IFD) पर अब भारत लगभग अकेला पड़ता दिख रहा है, क्योंकि अन्य देशों का विरोध कमजोर पड़ गया है। तुर्किये ने भी अपना विरोध वापस ले लिया है। छोटे समूहों की &ldquo;ग्रीन रूम&rdquo; बैठकों और WTO के महानिदेशक के सीधे हस्तक्षेप के जरिए नई दिल्ली पर दबाव बढ़ने की संभावना है। भारत की चिंता इस समझौते से अधिक उस बात को लेकर है, जो यह स्थापित कर सकता है कि ऐसे बहुपक्षीय समझौतों का रास्ता खोलना डब्ल्यूटीओ की बहुपक्षीय प्रकृति को बदल सकते हैं।</p>
<p>कृषि क्षेत्र में कुछ सदस्य, जिनमें केयर्न ग्रुप भी शामिल है, नए वार्ता एजेंडा की मांग कर सकते हैं, जिससे मौजूदा मुद्दे पीछे छूट सकते हैं। इनमें कुछ मुद्दे खासकर भारत के लिए महत्वपूर्ण विषय हैं। खाद्य सुरक्षा के लिए सार्वजनिक भंडारण (PSH) पर भारत की स्थायी समाधान की मांग पर किसी नतीजे की उम्मीद नहीं है। फिशरीज सब्सिडी के मुद्दे पर भी मतभेद बने रहने से सीमित प्रगति की संभावना है।&nbsp;</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x_69c789c466e88.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>भारत ने उठाए संरचनात्मक असमानताओं के मुद्दे</strong></p>
<p>सम्मेलन के दूसरे दिन पीयूष गोयल ने कहा कि सहमति आधारित निर्णय ही डब्ल्यूटीओ &nbsp;की विश्वसनीयता का आधार है और किसी भी सदस्य के संप्रभु अधिकार की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। इसके तहत वह उन नियमों से बंधने के लिए बाध्य नहीं है जिनसे वह सहमत नहीं है। भारत ने यह भी कहा कि सहमति से निर्णय लेने में आ रही चुनौतियों को दूर करने के लिए भरोसे का पुनर्निर्माण जरूरी है। इसके साथ ही, डब्ल्यूटीओ &nbsp;को मौजूदा गतिरोध और उसके कारणों की गंभीर समीक्षा करनी चाहिए।&nbsp;</p>
<p>&lsquo;समान अवसर (लेवल प्लेइंग फील्ड)&rsquo; के मुद्दे पर गोयल ने कहा कि चर्चाओं में उरुग्वे दौर से उत्पन्न असमानताओं को ध्यान में रखना होगा। उन्होंने खाद्य सुरक्षा, सार्वजनिक भंडारण (PSH) और कपास पर विशेष सुरक्षा तंत्र (SSM) जैसे लंबे समय से लंबित मुद्दों को प्राथमिकता देने की आवश्यकता पर जोर दिया। विवाद निपटान प्रणाली की लगातार निष्क्रियता को रेखांकित करते हुए भारत ने कहा कि प्रभावी न्यायिक व्यवस्था के बिना नियमों का पालन सुनिश्चित नहीं हो सकता।</p>
<p>भारत ने यह भी चेतावनी दी कि पारदर्शिता का इस्तेमाल व्यापारिक प्रतिशोध को उचित ठहराने या घरेलू नीतियों को चुनौती देने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। इसके बजाय, इसे ठोस और निरंतर क्षमता निर्माण के साथ जोड़ा जाना चाहिए, ताकि सभी सदस्य अपने दायित्वों को निष्पक्ष और प्रभावी ढंग से पूरा कर सकें। भारत ने दोहराया कि सभी देशों को उत्पादन क्षमता बढ़ाने, रोजगार सृजन करने और वैश्विक व्यापार में भागीदारी का समान अवसर मिलना चाहिए।</p>
<p>दूसरे दिन का समापन WTO सुधार और पारदर्शिता पर मंत्रीस्तरीय पूर्ण सत्र के साथ हुआ। इस सत्र में वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने समयबद्ध तरीके से सुधार प्रक्रिया को दोबारा शुरू करने के लिए भारत का समर्थन जताया। उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया ठोस साक्ष्यों और सदस्य देशों के प्रस्तावों व मंत्रीस्तरीय निर्णयों के आधार पर आगे बढ़नी चाहिए। भारत ने स्पष्ट रूप से कहा कि चुनिंदा मुद्दों को प्राथमिकता देने और पूर्व निर्धारित रुख अपनाने से बचना चाहिए।</p>
<p>भारत ने डब्ल्यूटीओ समितियों की भूमिका को अधिक महत्व देने की भी आवश्यकता बताई। बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली को कमजोर करने वाले बहुपक्षीय समझौतों के प्रति सावधान करते हुए अग्रवाल ने कहा कि सहमति आधारित प्रक्रिया खुलापन, पारदर्शिता, समावेशिता और सदस्य-प्रधान सिद्धांतों पर आधारित होनी चाहिए।</p>
<p>सम्मेलन के दूसरे दिन गोयल ने अमेरिका, चीन, कोरिया, स्विट्जरलैंड, न्यूजीलैंड, कनाडा, मोरक्को और ओमान के प्रतिनिधियों के साथ द्विपक्षीय बैठकें भी कीं। इन बैठकों में MC14 के एजेंडा के साथ-साथ द्विपक्षीय व्यापार संबंधों को मजबूत करने से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x500_69c789c50703a.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ MC14: डब्ल्यूटीओ वार्ता में भारत पर बढ़ा दबाव; कृषि, फिशरीज सब्सिडी और ई-कॉमर्स समझौतों पर फोकस ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x500_69c789c50703a.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[जैव उर्वरकों की बिक्री के लिए पैकेट के वजन की सीमा निर्धारित, कृषि मंत्रालय ने जारी की अधिसूचना]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/agriculture-ministry-notifies-weight-limits-for-bio-fertilizer-pack-sales.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 28 Mar 2026 12:18:44 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/agriculture-ministry-notifies-weight-limits-for-bio-fertilizer-pack-sales.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>देश में जैविक उर्वरक कितने बड़े पैकेट में बेचे जा सकते हैं, सरकार ने इसकी सीमा निर्धारित कर दी है। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने इस बारे में एक अधिसूचना जारी की है, जिसमें लिक्विड बायो फर्टिलाइजर, कैरियर आधारित बायोफर्टिलाइजर और वीएएम फर्टिलाइजर के पैकेट के वजन के बारे में बताया गया है।&nbsp;</p>
<p>कृषि एवं किसान कल्याण विभाग की तरफ से जारी अधिसूचना में बताया गया है कि वेसिकुलर अर्बुस्कुलर माइक्रोराइजा (वीएएम) जैव उर्वरक के पैकेट कम से कम 500 ग्राम के होंगे। इसके पैकेट अधिकतम 5 किलोग्राम तक के हो सकते हैं। बीजाणु आधारित माइक्रोरिजल फॉर्मूलेशन के लिए न्यूनतम वजन 100 ग्राम निर्धारित किया गया है।&nbsp;</p>
<p>वाहक यानी कैरियर आधारित जैव उर्वरकों के पैकेट कम से कम 200 ग्राम के होंगे। इन्हें अधिकतम एक किलोग्राम के पैकेट में बेचा जा सकता है। तरल जैव उर्वरक के लिए कम से कम 50 मिलीलीटर की सीमा निर्धारित की गई है। इस उर्वरक की अधिकतम एक लीटर के पैकेट में बिक्री की जा सकेगी।&nbsp;</p>
<p>अधिसूचना में निर्धारित वजन सीमा 1 अप्रैल 2026 से लागू होगी। विभाग ने स्पष्ट किया है कि यह आदेश इस अधिसूचना के प्रकाशन की तारीख से पहले पैक की गई सामग्री पर लागू नहीं होगा।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x500_69c77978961a6.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ जैव उर्वरकों की बिक्री के लिए पैकेट के वजन की सीमा निर्धारित, कृषि मंत्रालय ने जारी की अधिसूचना ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x500_69c77978961a6.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[2030 तक पॉपकॉर्न मक्का उत्पादन में आत्मनिर्भरता की ओर भारत, उत्पादन बढ़ाने में मिली कामयाबी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/agribusiness/india-on-track-to-achieve-self-sufficiency-in-popcorn-maize-production-by-2030-success-in-increasing-production.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 27 Mar 2026 18:56:05 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/agribusiness/india-on-track-to-achieve-self-sufficiency-in-popcorn-maize-production-by-2030-success-in-increasing-production.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत वर्ष 2030 तक पॉपकॉर्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बनने की राह पर है। एक दशक पहले तक भारत पॉपकॉर्न मक्का के लिए पूरी तरह से आयात पर निर्भर था, क्योंकि घरेलू उत्पादन बहुत कम था। लेकिन देश में मक्का की उन्नत किस्मों के विकास और निजी कंपनी व किसानों की भागीदारी से इस क्षेत्र में बड़ा बदलाव आया है।</p>
<p>कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) के सचिव और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक <strong>डॉ. एम. एल. जाट</strong> ने बताया कि भारत का पॉपकॉर्न मक्का बाजार 2014-15 के 50 हजार टन से बढ़कर 2025-26 में 1.30 लाख टन तक पहुंच गया है। वर्ष 2030 तक इसके करीब 1.80 लाख टन तक पहुंचने की संभावना है। वर्तमान में देश की लगभग 70 प्रतिशत मांग की पूर्ति घरेलू उत्पादन से हो रही है, जिससे आयात पर निर्भरता में उल्लेखनीय कमी आई है और किसानों के लिए आय के नए अवसर बने हैं।</p>
<p>डॉ. जाट के अनुसार, पॉपकॉर्न मक्का के घरेलू उत्पादन में वृद्धि के कारण आयात में आई गिरावट से 2025-26 में लगभग 810 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा की बचत हुई है। देश में करीब 90,000 टन पॉपकॉर्न मक्का का उत्पादन इस उपलब्धि का संकेत है। यह बढ़ोतरी भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल उच्च गुणवत्ता वाली किस्मों के विकास और अनुसंधान संस्थानों, निजी कंपनियों तथा किसानों के बीच मजबूत साझेदारी का परिणाम है।</p>
<p><strong>अनुसंधान और उद्योग की साझेदारी </strong></p>
<p>पॉपकॉर्न मक्का उत्पादन में आए बदलाव के पीछे आईसीएआर के लुधियाना स्थित <strong>भारतीय मक्का अनुसंधान संस्थान (IIMR)</strong> और देश की प्रमुख पॉपकॉर्न कंपनी <strong>गॉरमेट पॉपकॉर्निका एलएलपी</strong> के बीच साझेदारी की अहम भूमिका रही है। इसके जरिए पॉपकॉर्न मक्का की किस्मों में सुधार, बुवाई क्षेत्र में विस्तार और वैल्यू चेन विकसित करने पर जोर दिया गया।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x_69c6857e4fd12.jpg" alt="" width="557" height="443" style="display: block; margin-left: auto; margin-right: auto;" /></p>
<p>आईसीएआर-आईआईएमआर द्वारा विकसित स्वदेशी हाइब्रिड किस्म <strong>LPCH 3</strong> को लेकर फरवरी 2021 में हुए समझौतों के बाद इन प्रयासों में तेजी आई। यह हाइब्रिड किस्म उच्च उपज, अच्छी पॉपिंग गुणवत्ता और प्रमुख कीट एवं रोगों के प्रति सहनशीलता के लिए जानी जाती है। बाद में, गॉरमेट पॉपकॉर्निका ने भारतीय और अमेरिकी पॉपकॉर्न के गुणों को मिलाकर नए हाइब्रिड विकसित किए, जिसका उद्देश्य उपज और गुणवत्ता को और बेहतर बनाना था।</p>
<p><strong>वैल्यू चेन का विस्तार</strong></p>
<p>गॉरमेट पॉपकॉर्निका देश में नौ राज्यों के 17,500 से अधिक किसानों के साथ काम कर रही है और 36,000 एकड़ से अधिक क्षेत्र में पॉपकॉर्न मक्का की खेती कराई जा रही है। कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग, कृषि सहायता और प्रशिक्षण कार्यक्रमों के जरिए कंपनी ने एक संगठित और भरोसेमंद बाजार तैयार करने में मदद की है। इससे किसानों को बेहतर आय के अवसर मिल रहे हैं, वहीं प्रसंस्करण उद्योग और उपभोक्ताओं के लिए स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित हो रही है।</p>
<p>मजबूत अनुसंधान और जमीनी स्तर पर प्रभावी क्रियान्वयन के जरिए भारत न केवल अपनी घरेलू मांग पूरी करने के लिए तैयार है, बल्कि 2030 तक उच्च गुणवत्ता वाले पॉपकॉर्न मक्का का भरोसेमंद निर्यातक बनने की स्थिति में पहुंच सकता है।</p>
<p><strong>भावी संभावनाएं </strong></p>
<p>पॉपकॉर्न मक्का में कामयाबी की यह कहानी उदाहरण है कि कैसे फसल विविधीकरण, अनुसंधान और उद्योग की साझेदारी एक आयात-निर्भर उत्पाद को घरेलू मूल्य श्रृंखला में बदल सकती है। यह मॉडल किसानों की आय बढ़ाने, आयात पर निर्भरता घटाने और विशेष खाद्य आपूर्ति श्रृंखला विकसित करने का उदाहरण बन रहा है।</p>
<p>भारत की पॉपकॉर्न मक्का पर आयात निर्भरता एक दशक पहले शत-प्रतिशत से घटकर आज लगभग 30 फीसदी रह गई है। यदि वर्तमान रुझान जारी रहते हैं, तो भारत 2030 तक अपनी लगभग 1.80 लाख टन की पूरी घरेलू मांग को खुद पूरा कर सकता है।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x500_69c6854ee2005.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ 2030 तक पॉपकॉर्न मक्का उत्पादन में आत्मनिर्भरता की ओर भारत, उत्पादन बढ़ाने में मिली कामयाबी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[पेट्रोल&amp;#45;डीजल पर विशेष उत्पाद शुल्क में 10&amp;#45;10 रुपये की कटौती]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/india-cuts-excise-duty-on-petrol-diesel-by-rs-10-per-litre-amid-west-asia-crisis.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 27 Mar 2026 11:39:16 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/india-cuts-excise-duty-on-petrol-diesel-by-rs-10-per-litre-amid-west-asia-crisis.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>ईरान युद्ध के कारण जारी उतार-चढ़ाव के बीच केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क में कटौती की है। सरकारी आदेश के अनुसार पेट्रोल पर यह शुल्क घटाकर 13 रुपये से घटाकर 3 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है। डीजल पर 10 रुपये प्रति लीटर शुल्क को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है। इस तरह दोनों ईंधनों पर 10-10 रुपये प्रति लीटर की कटौती की गई है। वित्त मंत्रालय की अधिसूचना के अनुसार यह राहत तुरंत लागू हो गया है।</p>
<p>पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कहा, &ldquo;सरकार ने कर राजस्व में बड़ा नुकसान उठाते हुए यह कदम उठाया है, ताकि अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेज उछाल के कारण तेल कंपनियों को हो रहे भारी नुकसान (पेट्रोल पर लगभग 24 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 30 रुपये प्रति लीटर) को कम किया जा सके।&rdquo;&nbsp;</p>
<p>इससे पहले अप्रैल 2025 में केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में 2 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की थी। गुरुवार को ही देश की सबसे बड़ी निजी ईंधन खुदरा कंपनी नायरा एनर्जी ने पेट्रोल के दाम में 5 रुपये प्रति लीटर और डीजल में 3 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की थी।&nbsp;</p>
<p>इसके अलावा सरकार ने अलग-अलग अधिसूचनाओं के जरिए विमान ईंधन (ATF) पर भी शुल्क ढांचे में बदलाव किया है। एक अधिसूचना में ATF पर 50 रुपये प्रति लीटर का विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क लगाया गया है, जबकि अन्य प्रावधानों के तहत कुछ हिस्सों में छूट या संशोधित दरें लागू की गई हैं। इससे विमानन क्षेत्र को आंशिक राहत मिलने की उम्मीद है।</p>
<p>शुल्क में यह कटौती ऐसे समय की गई है जब भारत वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और आपूर्ति बाधाओं का सामना कर रहा है। अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच युद्ध के चलते वैश्विक तेल आपूर्ति के प्रमुख मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) काफी हद तक बाधित है, जिससे शिपिंग और गैस आपूर्ति प्रभावित हुई है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है और अपनी 90 प्रतिशत से अधिक कच्चे तेल की जरूरत आयात से पूरी करता है।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/04/image_750x500_67f3abe7842b0.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ पेट्रोल-डीजल पर विशेष उत्पाद शुल्क में 10-10 रुपये की कटौती ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[ईरान युद्ध से उर्वरक व ऊर्जा क्षेत्र को झटका, एशिया की कृषि व अर्थव्यवस्था के लिए बढ़ा जोखिम: एडीबी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/adb-report-middle-east-conflict-triggers-fertiliser-energy-shock-raises-risks-for-asia-agriculture.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 27 Mar 2026 10:49:08 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/adb-report-middle-east-conflict-triggers-fertiliser-energy-shock-raises-risks-for-asia-agriculture.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>इजरायल-अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध (Iran war) एशिया और प्रशांत क्षेत्र में कृषि और आर्थिक स्थिरता के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है। एशियाई विकास बैंक (ADB) की एक रिपोर्ट के अनुसार ऊर्जा, उर्वरक और अन्य कृषि इनपुट की कीमतों में तेज वृद्धि से खेती की लागत बढ़ रही है और खाद्य कीमतों पर दबाव बढ़ रहा है।</p>
<p>रिपोर्ट में कहा गया है कि ऊर्जा आपूर्ति शृंखला और प्रमुख कृषि इनपुट, खासकर उर्वरकों, में व्यवधान का असर अब वैश्विक बाजारों में साफ दिख रहा है। मध्य पूर्व वैश्विक यूरिया निर्यात में लगभग आधा और अमोनिया आपूर्ति में करीब 30% हिस्सा रखता है। ये दोनों फसल उत्पादन के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। आपूर्ति बाधित होने से उर्वरकों की उपलब्धता घटने और कीमतें तेजी से बढ़ने की आशंका है।</p>
<p>इस संकट का एक प्रमुख कारण कतर में उत्पादन में कमी है, जहां दुनिया की बड़ी उर्वरक कंपनियों में से एक QAFCO ने गैस संयंत्र पर हमले के बाद उत्पादन रोक दिया। इससे वैश्विक स्तर पर उर्वरक कीमतों में तेज उछाल आया है।</p>
<p>उर्वरकों के अलावा इस संकट का असर सल्फर और पेट्रोकेमिकल्स जैसे अन्य कृषि-संबंधित इनपुट पर भी पड़ा है। ये कृषि रसायनों के उत्पादन के लिए जरूरी हैं। वैश्विक सल्फर निर्यात का लगभग 45% खाड़ी देशों से आता है, जबकि कतर दुनिया की लगभग एक-तिहाई हीलियम आपूर्ति करता है, जो उर्वरक और औद्योगिक उत्पादन में उपयोगी है।</p>
<p>ऊर्जा कीमतों में उछाल ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। कच्चे तेल की कीमतें फरवरी के अंत में युद्ध शुरू होने से पहले लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास थीं, जो बढ़कर तनाव के चरम पर 120 डॉलर तक पहुंच गई थीं। अब भी ये 100 डॉलर से ऊपर बनी हुई हैं। प्राकृतिक गैस की कीमतों में भी तेज वृद्धि हुई है, जिससे कृषि उत्पादन और परिवहन लागत बढ़ गई है।</p>
<p>एडीबी ने चेतावनी दी है कि इन बढ़ती लागतों का असर खाद्य महंगाई के रूप में सामने आ सकता है। उर्वरक महंगे होने से किसान इनके उपयोग में कमी कर सकते हैं, जिससे पैदावार घट सकती है। साथ ही परिवहन और प्रसंस्करण लागत बढ़ने से खाद्य आपूर्ति शृंखला पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा। एशिया-प्रशांत क्षेत्र इस स्थिति से खास तौर पर प्रभावित है, क्योंकि यहां ऊर्जा और कृषि इनपुट का आयात अधिक होता है।&nbsp;</p>
<p>होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों के यातायात में आई बाधा ने अनिश्चितता को और बढ़ा दिया है। इस मार्ग से जहाजों की आवाजाही में भारी गिरावट आई है, जबकि माल भाड़ा और बीमा लागत बढ़ गई है। इससे भी कृषि इनपुट का आयात महंगा हो गया है। रिपोर्ट के अनुसार आपूर्ति शृंखला में व्यवधान से उर्वरक और कृषि रसायनों की समय पर आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, जिससे बुवाई चक्र और उत्पादन पर असर पड़ेगा।&nbsp;</p>
<p>व्यापक स्तर पर भी इसका असर गंभीर हो सकता है। एडीबी का अनुमान है कि यदि संघर्ष लंबा चलता है, तो विकासशील एशिया की आर्थिक वृद्धि में 1.3 प्रतिशत अंक तक कमी आ सकती है, जबकि मुद्रास्फीति 3.2 प्रतिशत अंक तक बढ़ सकती है। खाद्य महंगाई खास तौर से बढ़ेगी।&nbsp;</p>
<p>रिपोर्ट में कहा गया है कि आयातित इनपुट पर निर्भर अर्थव्यवस्थाएं सबसे अधिक प्रभावित होंगी। किसानों की आय घट सकती है और उन पर वित्तीय दबाव बढ़ सकता है, जबकि सरकारों को खाद्य सुरक्षा बनाए रखने के लिए सब्सिडी का बोझ बढ़ाना पड़ सकता है।</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x500_69c523f282f27.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ ईरान युद्ध से उर्वरक व ऊर्जा क्षेत्र को झटका, एशिया की कृषि व अर्थव्यवस्था के लिए बढ़ा जोखिम: एडीबी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x500_69c523f282f27.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[डब्ल्यूटीओ के कृषि व्यापार नियमों में बड़े बदलाव की मांग, विशेषज्ञ समूह ने दिए अपने सुझाव]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/global-initiative-calls-for-overhaul-of-wto-farm-trade-rule-ahead-of-mc14.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 26 Mar 2026 16:52:28 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/global-initiative-calls-for-overhaul-of-wto-farm-trade-rule-ahead-of-mc14.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>कैमरून में आज से विश्व व्यापार संगठन (WTO) का 14वां मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (MC14) शुरू हो रहा है। इससे पहले एक विशेषज्ञ समूह ने मौजूदा कृषि व्यापार नियमों पर पुनर्विचार करने की मांग उठाई है। इनका कहना है कि वर्तमान ढांचा आधुनिक चुनौतियों का सामना करने में लगातार विफल हो रहा है।</p>
<p>&ldquo;एग्रीमेंट ऑन एग्रीकल्चर री-इमैजिन्ड&rdquo; (AoA ReI) नामक इस पहल ने चेतावनी दी है कि बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, युद्ध और जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों ने वैश्विक व्यापार व्यवस्था की सीमाओं को उजागर कर दिया है। इसके अनुसार, मौजूदा प्रणाली खाद्य सुरक्षा, स्थिरता और लचीलापन सुनिश्चित करने में सक्षम नहीं है।</p>
<p>इस पहल का मुख्य प्रस्ताव &ldquo;सस्टेनेबल फूड सिस्टम्स के लिए कृषि व्यापार पर मॉडल संधि&rdquo; है। यह ढांचा डब्ल्यूटीओ के मौजूदा &ldquo;एग्रीमेंट ऑन एग्रीकल्चर&rdquo; को बदलने या व्यापक रूप से पुनर्गठित करने की बात करता है, जो पिछले लगभग 30 वर्षों से वैश्विक कृषि व्यापार का आधार रहा है।</p>
<p>AoA ReI की को-लीडर कैरोलिन डोमेन के अनुसार, छोटे-मोटे सुधार अब पर्याप्त नहीं हैं। उनका कहना है कि अंतरराष्ट्रीय कृषि व्यापार को संचालित करने के लिए साहसिक और संरचनात्मक बदलाव जरूरी हैं।</p>
<p>डब्ल्यूटीओ के भीतर सुधार वार्ताएं लगातार ठप रही हैं। वर्ष 2024 में आयोजित पिछली मंत्रिस्तरीय बैठक में भी सदस्य देशों के बीच सहमति नहीं बन सकी थी। प्रमुख कृषि निर्यातकों, उभरती अर्थव्यवस्थाओं और खाद्य आयातक देशों के बीच मतभेदों के कारण घरेलू सब्सिडी, सार्वजनिक भंडारण और निर्यात प्रतिबंध जैसे अहम मुद्दों पर प्रगति रुक गई है।</p>
<p>इंस्टीट्यूट फॉर एग्रीकल्चर एंड ट्रेड पॉलिसी की कार्यकारी निदेशक और पहल की को-लीडर सोफिया मर्फी ने कहा कि मौजूदा नियम बाजार विस्तार को प्राथमिकता देते हैं, जबकि आज की जरूरत स्थिरता और लचीलापन है। उन्होंने कहा कि वैश्विक खाद्य प्रणाली जलवायु अस्थिरता, जैव विविधता ह्रास, आपूर्ति श्रृंखला संकट और बढ़ती असमानताओं से जूझ रही है।</p>
<p>पहल की को-लीडर लिसा बुर्गी बोनानोमी ने कहा कि व्यापार महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे स्थानीय खाद्य उत्पादन का पूरक होना चाहिए। वहीं, अर्थशास्त्री बिस्वजीत धर ने चेतावनी दी कि यदि वर्तमान ढांचा विफल होता रहा, तो वैश्विक कृषि व्यापार में नीतिगत शून्य उत्पन्न हो सकता है।</p>
<p>प्रस्तावित मॉडल संधि का उद्देश्य वैश्विक स्तर पर चर्चा को बढ़ावा देना है, जिसमें टिकाऊ खाद्य प्रणालियों, समान आर्थिक परिणामों और मानवाधिकार व विकास लक्ष्यों के अनुरूप व्यापार सिद्धांतों को प्राथमिकता दी जाए।</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x500_69c5178b565c1.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ डब्ल्यूटीओ के कृषि व्यापार नियमों में बड़े बदलाव की मांग, विशेषज्ञ समूह ने दिए अपने सुझाव ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[ICAR&amp;#45;IARI ने क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग में बनाई जगह, कृषि और वानिकी श्रेणी में मिला स्थान]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/iari-makes-it-to-the-qs-world-rankings-2026-ranks-first-in-agriculture-and-forestry-rankings.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 26 Mar 2026 16:14:00 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/iari-makes-it-to-the-qs-world-rankings-2026-ranks-first-in-agriculture-and-forestry-rankings.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>देश में कृषि शिक्षा और अनुसंधान के प्रमुख केंद्र आईसीएआर के <strong>भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान </strong>(आईएआरआई) ने पहली बार QS <span>वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग </span>2026 में कृषि एवं वानिकी विषय श्रेणी में जगह बनाई है। संस्थान को 151&ndash;200 के बैंड में स्थान मिला है।</p>
<p>121 वर्ष पुराने इस प्रतिष्ठित संस्थान के साथ इस श्रेणी में <strong>बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी, आईआईटी खडगपुर </strong>और <strong>दिल्ली यूनिवर्सिटी</strong> भी शामिल हैं। QS <span>वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग में जगह बनाने से </span>आईएआरआई की देश-दुनिया के अग्रणी कृषि और वानिकी शिक्षा संस्थानों में स्थिति और मजबूत हुई है। &nbsp;</p>
<p>आईएआरआई की इस उपलब्धि पर <strong>भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद </strong><strong>(</strong><strong>आईसीएआर</strong><strong>) </strong>के महानिदेशक तथा सचिव (डेयर) <strong>डॉ. एम. एल. जाट</strong> ने कहा कि दिसंबर 2025 में मुख्य सचिवों के सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने &lsquo;विकसित भारत&rsquo; के लक्ष्य को पाने के लिए कुशल मानव संसाधन के विकास पर विशेष जोर दिया था। देश में एग्रीकल्चरल हायर एजुकेशन को मजबूत करना आईसीएआर और कृषि मंत्रालय की सबसे बड़ी प्राथमिकता है। नेशनल एग्रीकल्चरल रिसर्च एजुकेशन एंड एक्सटेंशन सिस्टम (NAREES) के तहत उच्च शिक्षण संस्थानों में वर्ल्ड क्लास मल्टीडिसिप्लिनरी रिसर्च-इंटेंसिव एजुकेशन इकोसिस्टम को मजबूत किया जा रहा है।</p>
<p>QS <span>वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग </span>2026 की कृषि एवं वानिकी विषय श्रेणी में <strong>तमिलनाडु एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी</strong> को 201-250 के बैंड में, <strong>अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी</strong> और <strong>शूलिनी यूनिवर्सिटी</strong> को 251-300 के बैंड में और<strong> चौधरी चरण सिंह हरियाणा एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी</strong> को 301-350 के बैंड में जगह मिली है।</p>
<p>क्यूएस रैंकिंग में संस्थानों का मूल्यांकन अकादमिक प्रतिष्ठा, नियोक्ता प्रतिष्ठा, शोध उद्धरण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग जैसे मानकों पर किया जाता है। आईएआरआई की यह उपलब्धि कृषि-खाद्य प्रणालियों, कुशल मानव संसाधन विकास और सतत विकास लक्ष्यों में उसके बहुआयामी योगदान को दर्शाती है। इसमें संस्थान की शिक्षण और शोध गुणवत्ता के साथ-साथ उसके सामाजिक योगदान का भी मूल्यांकन किया जाता है।&nbsp;</p>
<p>वैश्विक स्तर पर कृषि विज्ञान शिक्षा के क्षेत्र में कड़ी प्रतिस्पर्धा के बीच आईएआरआई का प्रदर्शन उल्लेखनीय माना जा रहा है। आईएआरआई के उत्कृष्ट प्रदर्शन के पीछे फंडामेंटल रिसर्च, ट्रांसलेशनल साइंस और फील्ड-लेवल आउटरीच के समन्वय की अहम भूमिका रही है, जिसके माध्यम से संस्थान ने फसल सुधार और जलवायु-सहिष्णु कृषि जैसे राष्ट्रीय कार्यक्रमों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसके साथ ही मजबूत पूर्व छात्र नेटवर्क और हितधारकों का भरोसा भी संस्थान की वैश्विक पहचान को बढ़ाने में सहायक रहा है।</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x500_69c50fccaf5a8.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ ICAR-IARI ने क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग में बनाई जगह, कृषि और वानिकी श्रेणी में मिला स्थान ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x500_69c50fccaf5a8.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[MC14: डब्ल्यूटीओ का 14वां मंत्रिस्तरीय सम्मेलन आज से, पीयूष गोयल करेंगे भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/14th-ministerial-conference-of-wto-mc14-to-begin-today-piyush-goyal-to-lead-indian-delegation.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 26 Mar 2026 10:53:03 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/14th-ministerial-conference-of-wto-mc14-to-begin-today-piyush-goyal-to-lead-indian-delegation.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>विश्व व्यापार संगठन (WTO) का 14वां मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (MC14) 26 से 29 मार्च 2026 तक कैमरून के याउंडे में आयोजित किया जा रहा है। इस सम्मेलन की अध्यक्षता कैमरून के व्यापार मंत्री लुक मैगलॉयर म्बार्गा करेंगे। इसमें डब्ल्यूटीओ के सदस्य देशों के व्यापार मंत्री वैश्विक व्यापार प्रणाली से जुड़े प्रमुख मुद्दों पर चर्चा करेंगे।</p>
<p>इस सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल कर रहे हैं। प्रतिनिधिमंडल में वाणिज्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारी, जिनेवा स्थित भारत के स्थायी मिशन के अधिकारी, विभिन्न मंत्रालयों एवं विभागों के प्रतिनिधि तथा तकनीकी और कानूनी विशेषज्ञ शामिल होंगे, जो अलग-अलग वार्ता क्षेत्रों में भाग लेंगे। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अनुसार, चर्चा के प्रमुख एजेंडा में WTO सुधार, ई-कॉमर्स वर्क प्रोग्राम एंड मोरेटोरियम, विकास के लिए निवेश सुविधा (IFD), फिशरीज सब्सिडी तथा कृषि और विकास से जुड़े मुद्दे शामिल हैं।</p>
<p><strong>खाद्य सुरक्षा को प्राथमिकता</strong></p>
<p>वाणिज्य मंत्रालय ने कहा है कि भारत बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली को मजबूत करने के उद्देश्य से सार्थक WTO सुधार का समर्थन जारी रखेगा, जिसमें विकास संबंधी चिंताओं को केंद्र में रखा जाएगा। भारत डब्ल्यूटीओ के बहुपक्षीय जनादेश का सम्मान करने, खाद्य सुरक्षा को प्राथमिकता देने, छोटे किसानों और मछुआरों की आजीविका की रक्षा करने तथा विशेष रूप से डिजिटल व्यापार जैसे उभरते क्षेत्रों में विकासशील देशों के लिए पर्याप्त स्थान सुनिश्चित करने पर जोर देगा।</p>
<p><a href="https://www.ruralvoice.in/international/wto-mc14-set-to-expose-deep-divides-as-key-trade-issues-head-for-stalemate.html"><strong>यह भी पढ़ें- गहराते मतभेदों के कारण प्रमुख मुद्दों पर गतिरोध के आसार</strong></a></p>
<p>भारत एक खुले, निष्पक्ष, समावेशी और गैर-भेदभावपूर्ण बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली की आवश्यकता पर जोर देता रहा है जिसमें डब्ल्यूटीओ की केंद्रीय भूमिका हो। भारत ने माराकेश समझोते (Marrakesh Agreement) में निहित गैर-भेदभाव के सिद्धांत को डब्ल्यूटीओ ढांचे का आधार बताया है।</p>
<p><strong>पब्लिक स्टॉकहोल्डिंग पर स्थायी समाधान चाहता है भारत</strong></p>
<p>इसके साथ ही भारत ने विकास-केंद्रित एजेंडा की आवश्यकता पर भी जोर दिया है, जिसमें खाद्य सुरक्षा के लिए पब्लिक स्टॉकहोल्डिंग (PSH) पर स्थायी समाधान, विकासशील और अल्पविकसित देशों (LDCs) के लिए विशेष एवं भिन्न व्यवहार (S&amp;DT) प्रावधानों का प्रभावी कार्यान्वयन तथा एक पूर्ण रूप से कार्यशील, विवाद निपटाने के लिए स्वतः संचालित और बाध्यकारी तंत्र की बहाली शामिल है। भारत के लिए PSH पर स्थायी समाधान अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश के अधिकांश किसान कम आय और सीमित संसाधन वाले हैं। वे न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) प्रणाली पर निर्भर हैं।</p>
<p>फिशरीज सब्सिडी के मुद्दे पर भारत ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की वकालत की है, जिसमें सस्टेनेबिलिटी के साथ-साथ मछुआरों की आजीविका की सुरक्षा सुनिश्चित हो। भारत ने यह भी कहा है कि तट से दूर पानी में मछली पकड़ने वाले देशों को अपनी क्षमता में क्रमिक कमी सहित अनुपातिक जिम्मेदारियां निभानी चाहिए।</p>
<p><strong>द्विपक्षीय व्यापार वार्ताओं में भी प्रगति</strong></p>
<p>भारत अपने द्विपक्षीय व्यापार संबंधों को भी सक्रिय रूप से आगे बढ़ा रहा है। हाल में भारत ने इंग्लैंड और ओमान के साथ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) किए हैं, जबकि न्यूजीलैंड और यूरोपियन यूनियन जैसे प्रमुख साझेदारों के साथ वार्ताओं में प्रगति हुई है। कई अन्य देशों के साथ FTA वार्ताएं जारी हैं। भारत के एफटीए WTO सिद्धांतों के अनुरूप हैं और नियम-आधारित बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं।&nbsp;</p>
<p>MC14 के दौरान वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री और वाणिज्य सचिव स्तर पर कई द्विपक्षीय बैठकें भी निर्धारित हैं। इन बैठकों के माध्यम से प्रमुख मुद्दों पर विचार-विमर्श और द्विपक्षीय व्यापार संबंधों को मजबूत करने पर चर्चा की जाएगी।</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ MC14: डब्ल्यूटीओ का 14वां मंत्रिस्तरीय सम्मेलन आज से, पीयूष गोयल करेंगे भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कैबिनेट ने 2031&amp;#45;35 के लिए भारत के नए उत्सर्जन लक्ष्यों को दी मंजूरी, रिन्यूएबल एनर्जी का टारगेट बढ़ा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/cabinet-approves-indias-new-climate-targets-for-2031-35-raises-ambition-on-emissions-and-clean-energy.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 25 Mar 2026 19:30:50 GMT]]></pubDate>
				
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        <description><![CDATA[ <p>जलवायु प्रतिबद्धताओं को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 2031-2035 की अवधि के लिए भारत के नए राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) को मंजूरी दे दी है। इन संशोधित लक्ष्यों को जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र के फ्रेमवर्क कन्वेंशन में भेजा जाएगा।</p>
<p>नई प्रतिबद्धताओं के तहत, भारत ने 2005 के स्तर की तुलना में 2035 तक अपनी जीडीपी की उत्सर्जन तीव्रता को 47 प्रतिशत तक कम करने का लक्ष्य रखा है। यह पहले के लक्ष्य की तुलना में महत्वपूर्ण वृद्धि है। स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में भी भारत ने बड़ा लक्ष्य निर्धारित किया है। 2035 तक अपनी कुल स्थापित विद्युत क्षमता का 60 प्रतिशत गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से प्राप्त करने का लक्ष्य है। उल्लेखनीय है कि फरवरी 2026 तक भारत पहले ही 52 प्रतिशत से अधिक गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता हासिल कर चुका है। वह लक्ष्य समय से काफी पहले पूरा हो गया था।</p>
<p>नए NDC का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू वन और वृक्ष आवरण के माध्यम से 2035 तक 3.5 से 4.0 अरब टन CO₂ समतुल्य का कार्बन सिंक बनाना है। भारत इस दिशा में पहले ही उल्लेखनीय प्रगति कर चुका है और 2021 तक 2.29 अरब टन का कार्बन सिंक तैयार कर चुका है।</p>
<p>भारत का जलवायु प्रदर्शन समय से पहले लक्ष्यों को हासिल करने के लिए जाना जाता है। 2015 में प्रस्तुत प्रारंभिक एनडीसी में 2030 तक उत्सर्जन तीव्रता में 33-35 प्रतिशत कमी और 40 प्रतिशत गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य रखा गया था, जिन्हें समय से पहले ही हासिल कर लिया गया। 2005 से 2020 के बीच उत्सर्जन तीव्रता में 36 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है।</p>
<p>नया NDC भारत की जलवायु महत्वाकांक्षा को और मजबूत करता है। इसमें सतत विकास, जलवायु अनुकूलन और समावेशी परिवर्तन पर विशेष जोर दिया गया है। सरकार ने कहा कि ये लक्ष्य शासन और दैनिक जीवन में स्थिरता को शामिल करने, समावेशी विकास को बढ़ावा देने और आजीविका की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से तैयार किए गए हैं। यह भारत की आर्थिक विकास और पर्यावरणीय संतुलन के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ कैबिनेट ने 2031-35 के लिए भारत के नए उत्सर्जन लक्ष्यों को दी मंजूरी, रिन्यूएबल एनर्जी का टारगेट बढ़ा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[गरीब देशों में जलवायु परिवर्तन से मौतें अमीर देशों की तुलना में 10 गुना अधिक होने का अनुमान: रिपोर्ट]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/climate-change-deaths-in-poor-countries-estimated-to-be-10-times-higher-than-in-rich-countries-report.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 25 Mar 2026 18:42:17 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/climate-change-deaths-in-poor-countries-estimated-to-be-10-times-higher-than-in-rich-countries-report.html</guid>
        <description><![CDATA[ <section class="text-token-text-primary w-full focus:outline-none [--shadow-height:45px] has-data-writing-block:pointer-events-none has-data-writing-block:-mt-(--shadow-height) has-data-writing-block:pt-(--shadow-height) [&amp;:has([data-writing-block])&gt;*]:pointer-events-auto scroll-mt-(--header-height)" dir="auto" data-turn-id="015fc79c-c1e2-4fef-adfd-f5528437a0f5" data-testid="conversation-turn-1" data-scroll-anchor="false" data-turn="user"></section>
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<p data-start="106" data-end="383">एक नई रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि बढ़ते तापमान के कारण होने वाली मौतों का बोझ दुनिया के गरीब देशों पर असमान रूप से पड़ेगा। <strong><em data-start="230" data-end="253">क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब</em> </strong>की इस <strong><a href="https://impactlab.org/news-insights/climate-change-is-projected-to-cause-ten-times-more-people-to-die-in-poor-countries-than-rich-countries/">रिपोर्ट</a></strong> के अनुसार, 2050 तक गर्मी से होने वाली मौतें अमीर देशों की तुलना में गरीब देशों में लगभग 10 गुना अधिक हो सकती हैं।</p>
<p data-start="385" data-end="605">रिपोर्ट बताती है कि हर साल रिकॉर्ड तोड़ गर्मी हजारों लोगों की जान लेती हैं और भविष्य में यह संकट और गहराने वाला है। अनुमान है कि तापमान से जुड़ी 90 प्रतिशत से अधिक मौतें निम्न और मध्यम आय वाले देशों में होंगी। इन देशों में कूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, स्वास्थ्य सेवाओं और जलवायु-संवेदनशील शहरी नियोजन की कमी उनकी अनुकूलन क्षमता को सीमित करती है।</p>
<p data-start="385" data-end="605">क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब के को-फाउंडर और&nbsp;रिपोर्ट के सह-लेखक <strong>माइकल ग्रीनस्टोन</strong> के अनुसार, "यह जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक है कि जिन देशों ने इस संकट में सबसे कम योगदान दिया, वही इसके सबसे बड़े शिकार बनेंगे। सीमित संसाधनों के कारण ये देश नई जलवायु चुनौतियों से निपटने में भी पीछे हैं।"&nbsp;</p>
<p>रिपोर्ट बताती है कि समस्या केवल यह नहीं है कि गर्म क्षेत्रों में ठंडे क्षेत्रों की तुलना में अधिक मौतें होंगी, बल्कि सबसे अधिक प्रभाव उन क्षेत्रों पर पड़ेगा जो एक साथ अधिक गर्म और गरीब हैं, क्योंकि उनके पास अनुकूलन के लिए संसाधन सीमित हैं।</p>
<p data-start="871" data-end="1131">अधिक तापमान से होने वाली मौतों को कम करना काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकारें और समाज किस तरह के अनुकूलन उपाय अपनाते हैं। एयर कंडीशनिंग, कूलिंग सेंटर, और स्वास्थ्य सुरक्षा ढांचे में निवेश जैसे कदम लाखों जानें बचा सकते हैं।</p>
<p data-start="1133" data-end="1374">रिपोर्ट वैश्विक स्तर पर असमानता को उजागर करती है। उदाहरण के लिए, पश्चिम अफ्रीका का बुर्किना फासो, जहां जलवायु परिस्थितियां कुवैत जैसी हैं, वहां गर्मी से होने वाली मौतें कुवैत से दोगुनी हो सकती हैं, क्योंकि वहां अनुकूलन के संसाधन सीमित हैं।</p>
<p><strong>भारत: क्षेत्रीय असमानताएं स्पष्ट</strong></p>
<p>भारत में तापमान से जुड़ी मृत्यु दर में औसतन 2.4 मौत प्रति 1 लाख लोगों की वृद्धि का अनुमान है, जिससे देश 241 क्षेत्रों में 76वें स्थान पर है। हालांकि, यह औसत आंकड़ा देश के भीतर गहरी क्षेत्रीय असमानताओं को छुपाता है।&nbsp;&nbsp;</p>
<ul>
<li>दक्षिण-पश्चिम, पूर्वी और अत्यधिक उत्तरी क्षेत्रों में मृत्यु दर में कमी का अनुमान है।</li>
<li>कश्मीर के पदम में लगभग 25 प्रति लाख की कमी देखी जा सकती है।</li>
<li>उत्तर-पश्चिम और उत्तर-मध्य भारत में मृत्यु दर में सबसे अधिक वृद्धि का अनुमान है।</li>
<li>राजस्थान के करणपुर में यह वृद्धि 26 प्रति लाख तक हो सकती है।</li>
</ul>
<p>सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में गर्मी से होने वाली अतिरिक्त मौतें (लगभग 23-25 प्रति लाख) वर्तमान में तपेदिक और मधुमेह जैसी बीमारियों से होने वाली मृत्यु दर के बराबर हो सकती हैं।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x_69c3df124fd37.jpg" alt="" style="display: block; margin-left: auto; margin-right: auto;" /></p>
<p><strong>जलवायु परिवर्तन और असमानता&nbsp;</strong></p>
<p>रिपोर्ट रेखांकित करती है कि जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं है, बल्कि यह गहरी सामाजिक और आर्थिक असमानताओं से जुड़ा संकट भी है। गरीब क्षेत्रों में पहले से ही अधिक तापमान का सामना करना पड़ता है जहां अनुकूलन के लिए कई बाधाएं मौजूद हैं।</p>
<p data-start="2104" data-end="2348">रिपोर्ट की शोध प्रमुख <strong>तम्मा कार्लेटन</strong> का कहना है कि जिन क्षेत्रों में मृत्यु दर में सबसे अधिक वृद्धि होगी, वहीं संसाधनों और सरकारी क्षमता की सबसे अधिक कमी है और वहां अंतरराष्ट्रीय निवेश भी सीमित रहा है।&nbsp;ऐसे में सीमित संसाधनों का सही दिशा में निवेश करना तय करेगा कि भविष्य में कौन जीवित रहेगा और कौन नहीं।</p>
<p data-start="2350" data-end="2650" data-is-last-node="" data-is-only-node="">यह रिपोर्ट &ldquo;एडाप्टेशन रोडमैप&rdquo; श्रृंखला की पहली कड़ी है, जिसका उद्देश्य यह बताना है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए किन क्षेत्रों में और किस प्रकार के निवेश सबसे प्रभावी होंगे। रिपोर्ट में दुनिया भर के उन इलाकों की पहचान की गई है जहां क्लाइमेट अडैप्टेशन इन्वेस्टमेंट से सबसे ज्यादा जानें बचाई जा सकती हैं।</p>
<p data-start="2350" data-end="2650" data-is-last-node="" data-is-only-node=""></p>
</div>
</div>
</div>
</div>
</div>
</div>
</section> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ गरीब देशों में जलवायु परिवर्तन से मौतें अमीर देशों की तुलना में 10 गुना अधिक होने का अनुमान: रिपोर्ट ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[खरीफ बुवाई के लिए उर्वरकों की आपूर्ति सुनिश्चित कराने पर जोर, शिवराज ने दिए कालाबाजारी रोकने के निर्देश]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/govt-steps-up-kharif-preparedness-amid-global-crisis-chouhan-orders-tight-supply-monitoring.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 25 Mar 2026 15:42:19 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/govt-steps-up-kharif-preparedness-amid-global-crisis-chouhan-orders-tight-supply-monitoring.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>इजरायल-अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध और बढ़ती वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बुधवार को उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक की। बैठक का उद्देश्य आगामी खरीफ सीजन के लिए कृषि क्षेत्र की तैयारियों को मजबूत करना था। बैठक में मंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि उर्वरकों की आपूर्ति निर्बाध और समान रूप से सुनिश्चित की जाए। साथ ही, उर्वरक और बीजों की कालाबाजारी तथा जमाखोरी पर सख्त कार्रवाई करने के निर्देश दिए।</p>
<p><strong>उर्वरक आपूर्ति और फार्मर आईडी</strong></p>
<p>केंद्रीय कृषि मंत्री ने उर्वरकों की समान और निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने पर जोर दिया। उन्होंने अधिकारियों को 'फार्मर आईडी' के काम में तेजी लाने के निर्देश दिए ताकि वितरण व्यवस्था पारदर्शी हो सके। उन्होंने कहा कि इसके लिए वे जल्द ही राज्यों के मुख्यमंत्रियों और कृषि मंत्रियों के साथ बैठक भी करेंगे।</p>
<p><strong>कालाबाजारी और जमाखोरी पर नकेल</strong></p>
<p>वैश्विक संकट का लाभ उठाकर खाद और बीजों की कालाबाजारी करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं। चौहान ने कहा कि राज्य सरकारों को भी इस दिशा में कड़े कदम उठाने के लिए प्रेरित किया जाएगा।</p>
<p><strong>बीज उत्पादन और पैकेजिंग सहायता</strong></p>
<p>बैठक में बीज सुखाने के लिए आवश्यक गैस और एग्रो-केमिकल्स की उपलब्धता की समीक्षा की गई। कृषि मंत्री ने कहा कि वैश्विक संकट में पैकेजिंग सामग्री (विशेषकर दूध और अन्य कृषि उत्पादों के लिए) की कमी न हो। इसके लिए उन्होंने पेट्रोलियम मंत्रालय और संबंधित विभागों के साथ समन्वय करने के निर्देश भी दिए।</p>
<p><strong>निगरानी के लिए स्पेशल सेल का गठन</strong></p>
<p>मौजूदा हालात में कृषि क्षेत्र की निगरानी के लिए एक विशेष सेल का गठन भी किया गया है। यह सेल खाद, बीज और कीटनाशकों की उपलब्धता की साप्ताहिक रिपोर्ट केंद्रीय कृषि मंत्री को प्रस्तुत करेगा।</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x500_69c3b4c733ba2.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ खरीफ बुवाई के लिए उर्वरकों की आपूर्ति सुनिश्चित कराने पर जोर, शिवराज ने दिए कालाबाजारी रोकने के निर्देश ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[पश्चिम एशिया संकट से निपटने के लिए प्रधानमंत्री ने बनाए 7 एम्पावर्ड ग्रुप, आपूर्ति बनाए रखने पर जोर]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/prime-minister-forms-7-empowered-groups-to-deal-with-the-impact-of-the-iran-war-focus-on-maintaining-supplies.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 25 Mar 2026 14:04:43 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/prime-minister-forms-7-empowered-groups-to-deal-with-the-impact-of-the-iran-war-focus-on-maintaining-supplies.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p data-start="203" data-end="529">पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के दुष्प्रभाव से देश को बचाने के लिए केंद्र सरकार ने कोशिशें तेज कर दी हैं। ईरान युद्ध से पैदा हुए संकट को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सात सशक्त समूहों (एम्पावर्ड ग्रुप्स) के गठन की घोषणा की है, जो ईंधन, उर्वरक और अन्य आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति पर नजर रखेंगे और बाधाओं का समाधान सुनिश्चित करेंगे।</p>
<p data-start="531" data-end="991">मंगलवार को राज्यसभा में अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि जैसे कोरोना काल में अलग-अलग सेक्टर्स की चुनौतियों से निपटने के लिए एक्सपर्ट्स और अधिकारियों के एम्पावर्ड ग्रुप बनाए गए थे, वैसे ही अब सात नए एम्पावर्ड ग्रुप गठित किए गए हैं। ये समूह सप्लाई चेन, पेट्रोल-डीजल, उर्वरक, गैस और महंगाई जैसे विषयों पर त्वरित और दीर्घकालिक रणनीति के तहत काम करेंगे। प्रधानमंत्री ने भरोसा जताया कि इन साझा प्रयासों से देश परिस्थितियों का बेहतर सामना कर पाएगा।</p>
<p data-start="993" data-end="1318">मौजूदा संकट से निपटने की रणनीति पर जानकारी देते हुए पीएम मोदी ने कहा कि सरकार शॉर्ट टर्म, मीडियम टर्म और लॉन्ग टर्म प्रभावों को ध्यान में रखते हुए काम कर रही है। भारत सरकार ने एक इंटर-मिनिस्ट्रियल ग्रुप भी बनाया है, जो नियमित रूप से बैठक कर आयात-निर्यात में आने वाली चुनौतियों का आकलन करता है और उनके समाधान पर काम करता है।</p>
<p data-start="1320" data-end="1659">पीएम मोदी ने कहा कि वर्तमान संकट ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को झकझोर दिया है। पश्चिम एशिया में हुए नुकसान से उबरने में दुनिया को समय लगेगा। उन्होंने कहा कि भारत में इसका न्यूनतम असर हो, इसके लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने भरोसा जताया कि भारतीय अर्थव्यवस्था के फंडामेंटल्स मजबूत हैं और सरकार बदलते हालात पर लगातार नजर रखे हुए है।</p>
<p data-start="1661" data-end="1910">सरकारी सूत्रों के अनुसार, इन सात सशक्त समूहों का नेतृत्व सचिव स्तर के अधिकारी करेंगे। इनमें रणनीतिक मामलों, ऊर्जा, आर्थिक मामलों और आपूर्ति शृंखला, कृषि इनपुट, उपभोक्ता मामलों, परिवहन एवं लॉजिस्टिक्स, तथा संचार एवं जनसंपर्क जैसे क्षेत्र शामिल हैं।</p>
<p data-start="1912" data-end="2207">आगामी खरीफ बुवाई सीजन को ध्यान में रखते हुए किसानों को पर्याप्त उर्वरक उपलब्ध कराने के लिए आवश्यक तैयारियां की जा रही हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि सरकार का प्रयास है कि किसी भी संकट का बोझ किसानों पर न पड़े। उन्होंने किसानों को आश्वस्त किया कि सरकार हर चुनौती के समाधान के लिए उनके साथ खड़ी है।</p>
<p data-start="2209" data-end="2594">राज्यसभा में बोलते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध ने वैश्विक ऊर्जा संकट को जन्म दिया है, जो भारत के लिए भी चिंता का विषय है। इस युद्ध के कारण व्यापार मार्ग प्रभावित हो रहे हैं, जिससे पेट्रोल, डीजल, गैस और उर्वरक जैसी आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति पर असर पड़ रहा है। होर्मुज स्ट्रेट में कई जहाज फंसे हुए हैं, जिनमें बड़ी संख्या में भारतीय क्रू मेंबर्स शामिल हैं।</p>
<p data-start="2596" data-end="2915">प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत ने पिछले 11 वर्षों में ऊर्जा आयात के स्रोतों का विविधीकरण किया है। पहले जहां क्रूड ऑयल, एलएनजी और एलपीजी जैसी जरूरतों के लिए 27 देशों से आयात होता था, वहीं अब यह संख्या बढ़कर 41 देशों तक पहुंच गई है। देश में 53 लाख मीट्रिक टन से अधिक का स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व भी विकसित किया गया है।</p>
<p data-start="2917" data-end="3338">प्रधानमंत्री ने देशवासियों से हर चुनौती के लिए तैयार रहने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि इस युद्ध के दुष्प्रभाव लंबे समय तक रह सकते हैं। कोरोना संकट के दौरान केंद्र और राज्यों ने मिलकर &lsquo;टीम इंडिया&rsquo; के रूप में जिस तरह कोविड प्रबंधन का सफल मॉडल पेश किया था, उसी भावना के साथ काम करने की जरूरत है। उन्होंने भरोसा जताया कि केंद्र और राज्य सरकारों के संयुक्त प्रयासों से देश इस वैश्विक संकट का प्रभावी तरीके से सामना करेगा।&nbsp;</p>
<p data-start="2917" data-end="3338"></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ पश्चिम एशिया संकट से निपटने के लिए प्रधानमंत्री ने बनाए 7 एम्पावर्ड ग्रुप, आपूर्ति बनाए रखने पर जोर ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[चीन में 2026&amp;#45;27 के दौरान अनाज उत्पादन बढ़ने का अनुमान, खाद्य सुरक्षा के लिए सोयाबीन आयात भी बढ़ाएगा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/china-boosts-grain-output-expands-soybean-import-to-secure-food-and-feed-demand.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 25 Mar 2026 13:16:07 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/china-boosts-grain-output-expands-soybean-import-to-secure-food-and-feed-demand.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) की फॉरेन एग्रीकल्चरल सर्विस (FAS) के अनुसार, 2026-27 में चीन का अनाज उत्पादन बढ़ने का अनुमान है। इसमें प्रमुख भूमिका बेहतर उत्पादकता और नीतिगत समर्थन की है, न कि खेती के क्षेत्र में बड़े विस्तार की।</p>
<p>इस सीजन के दौरान चीन में मक्का उत्पादन 30.5 करोड़ टन तक पहुंचने का अनुमान है, जो बेहतर पैदावार और आनुवंशिक रूप से संशोधित किस्मों के बढ़ते उपयोग से संभव होगा। हालांकि, खपत 32.3 करोड़ टन रहने का अनुमान है, जो उत्पादन से अधिक है। इस कारण चीन 80 लाख टन मक्के का आयात कर सकता है। मक्का चीन के पशु-चारा क्षेत्र का मुख्य आधार है, जहां इसका उपयोग 24.1 करोड़ टन तक पहुंच सकता है। प्रमुख अनाजों का कुल चारा उपयोग 29.07 करोड़ टन रहने का अनुमान है।</p>
<p>चीन आयात को टैरिफ रेट कोटा (TRQ) के माध्यम से सख्ती से नियंत्रित करता है। दूसरी तरफ, घरेलू उत्पादन बढ़ाने तथा भंडार प्रबंधन पर जोर देता है। ज्वार और जौ जैसे अनाज चारा मांग को पूरा करने में महत्वपूर्ण बने हुए हैं। इस वर्ष ज्वार आयात 78 लाख टन और जौ आयात 105 लाख टन रहने का अनुमान है।</p>
<p>गेहूं उत्पादन बढ़कर 14.01 करोड़ टन रहने की संभावना है, जबकि खपत 15 करोड़ टन तक पहुंच सकती है। गेहूं की खाद्य मांग स्थिर बनी हुई है, लेकिन बदलती खान-पान आदतों और बढ़ती उम्र की आबादी के कारण पारंपरिक आटा उपयोग में कमी आ रही है, वहीं ब्रेड और बेकरी उत्पादों की मांग बढ़ रही है। चावल उत्पादन 21 करोड़ टन तक पहुंच सकता है, जबकि इसकी खपत घटकर 14.5 करोड़ टन रह सकती है। इसका कारण जनसंख्या में कमी और खान-पान की बदलती प्रवृत्तियां हैं।</p>
<p><strong>सोयाबीन का अधिक आयात करेगा चीन</strong></p>
<p>अनाज के साथ चीन सोयाबीन आयात भी बढ़ाने जा रहा है ताकि प्रोटीन युक्त चारे की बढ़ती मांग को पूरा किया जा सके। 2026-27 में सोयाबीन आयात 10.8 करोड़ टन रहने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष से 20 लाख टन अधिक होगा। यह वृद्धि विशेष रूप से पोल्ट्री और एक्वाकल्चर में मांग बढ़ने से हो रही है।</p>
<p>अमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव कम होने के बाद चीन ने अमेरिकी सोयाबीन की खरीद फिर से शुरू कर दी है, और द्विपक्षीय समझौतों के तहत बड़ी मात्रा में खरीद पहले ही की जा चुकी है। घरेलू सोयाबीन उत्पादन थोड़ा बढ़कर 202 लाख टन रहने की संभावना है, हालांकि यह मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है।</p>
<p>सोयाबीन क्रशिंग (पेराई) में भी वृद्धि का अनुमान है, हालांकि कुल क्षमता का पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा है। सरकार तिलहन में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए अनुसंधान, प्रोत्साहन और रकबा विस्तार पर काम कर रही है। इसके अलावा, कनाडा से कैनोला आयात भी फिर शुरू होने की संभावना है, क्योंकि टैरिफ में कमी की गई है। इससे तिलहन बाजार में संतुलन बनेगा और विकल्पों पर निर्भरता कम होगी।</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ चीन में 2026-27 के दौरान अनाज उत्पादन बढ़ने का अनुमान, खाद्य सुरक्षा के लिए सोयाबीन आयात भी बढ़ाएगा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[देहात ने नासिक में एनएचबी के साथ शुरू किया अंगूर क्लस्टर विकास कार्यक्रम]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/dehaat-launches-nhb-supported-grapes-cluster-development-program-in-nashik.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 25 Mar 2026 11:46:52 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/dehaat-launches-nhb-supported-grapes-cluster-development-program-in-nashik.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत की अग्रणी एग्रीटेक कंपनी देहात ने अपने नासिक स्थित निर्यात संस्थान फ्रेशट्रॉप के साथ, राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड (एनएचबी) के सहयोग से नासिक में अंगूर क्लस्टर विकास कार्यक्रम की शुरुआत की है। इस पहल का उद्देश्य भारत की अंगूर उत्पादन एवं निर्यात क्षमता को वैश्विक बाजार में और अधिक मजबूत करना है।</p>
<p>वैश्विक अंगूर बाजार में तेजी से प्रीमियम और लाइसेंस प्राप्त किस्मों की मांग बढ़ रही है, जबकि भारत में अब भी पारंपरिक ओपन वैरायटी, जैसे थॉम्पसन सीडलेस का बोलबाला है। इस कार्यक्रम के जरिए किसान उच्च मूल्य वाले बाजारों तक आसानी से पहुंच बना सकेंगे, जहां किस्मों के चयन, उपज को उच्च गुणवत्तापूर्ण बनाए रखने और ट्रेसबिलिटी पर अधिक जोर दिया जा रहा है।</p>
<p>नासिक के अंगूर उत्पादक किसानों के लिए यह कार्यक्रम एक महत्वपूर्ण समय पर शुरू किया गया है। मौजूदा समय में वैश्विक बाजार में प्रीमियम और अलग-अलग किस्मों की मांग बढ़ रही है, ऐसे में निर्यात के लिए उपयुक्त न्यू जनरेशन की किस्मों को जल्दी अपनाने वाले किसानों को बाजार में बेहतर पहुंच, खरीदारों की प्राथमिकता और बेहतर दाम मिलने की संभावना अधिक होगी।</p>
<p><strong>राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड के उप निदेशक रविंद्र दांगी</strong> ने बताया, यह कार्यक्रम इस तरह से तैयार किया गया है कि अंगूर उत्पादक किसानों को वित्तीय सहायता और पूरी वैल्यू चेन का समर्थन मिल सके, जिससे वे उन्नत कृषि पद्धतियों को अपनाकर संगठित और निर्यात बाजारों से प्रभावी रूप से जुड़ सकें।</p>
<p>यह कार्यक्रम किसानों को कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सहायता करेगा, जैसे नई किस्मों के तहत अंगूर उत्पादक क्षेत्रों का विस्तार, ड्रिप सिंचाई, जीएपी (GAP) और आईपीएम (IPM) का पालन, कैनोपी और बागानों का नवीनीकरण तथा कटाई के बाद की प्रक्रियाएं और निर्यात में मदद। इसके अलावा कृषि सामान पर एनएचबी के निर्धारित मानकों और दिशानिर्देशों के अनुसार 30-50% तक वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाएगी।</p>
<p>ब्लूम फ्रेश के कमर्शियल मैनेजर कैरेन स्मिट-लोट्रिएट ने अपना मत साझा करते हुए बताया कि अंतरराष्ट्रीय बाजार अब नई जनरेशन की अंगूर किस्मों को प्राथमिकता दे रहे हैं, जो बेहतर गुणवत्ता, लंबी शेल्फ लाइफ और उपभोक्ताओं की पसंद के अनुरूप हों। ऐसे में नई किस्मों की खेती, वैश्विक बाजार में लंबे समय तक बने रहने के लिए जरूरी हो गयी है।</p>
<p>देहात इस कार्यक्रम को अपने &lsquo;सीड्स टू मार्केट&rsquo; प्लेटफॉर्म के माध्यम से लागू करेगा, जिसमें विशेषज्ञ सलाह, इनपुट डिलीवरी, उत्पाद एकत्रीकरण और बाजार से जुड़ाव जैसी सुविधाएं शामिल होंगी।&nbsp;</p>
<p>देहात के चीफ डिजिटल ऑफिसर निखिल तोषनीवाल का कहना है कि, &ldquo;नासिक लंबे समय से भारत के प्रमुख अंगूर उत्पादक क्षेत्रों में से एक रहा है। अब विकास का अगला चरण उन किसानों का होगा जो वैश्विक बाजार की जरूरतों के अनुसार बेहतर किस्में, मजबूत गुणवत्ता प्रणाली और पूर्ण ट्रेसबिलिटी अपनाएंगे।</p>
<p>आने वाले 3-5 वर्षों में इस कार्यक्रम के माध्यम से किसान तेजी से अंगूर की नई किस्में अपना सकेंगे और निर्यात प्रणाली भी बेहतर &nbsp;होगी, जिससे नासिक को वैश्विक स्तर पर अंगूर उत्पादन केंद्र बनाने में मदद मिलेगी।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ देहात ने नासिक में एनएचबी के साथ शुरू किया अंगूर क्लस्टर विकास कार्यक्रम ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[केंद्र ने यूपी, बिहार, झारखंड और महाराष्ट्र को 15वें वित्त आयोग के तहत 4,384 करोड़ रुपये का अनुदान जारी किया]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/centre-disburses-rs-4384-crores-as-xv-fc-grants-to-bihar-up-jharkhand-and-maharashtra.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 24 Mar 2026 18:01:11 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/centre-disburses-rs-4384-crores-as-xv-fc-grants-to-bihar-up-jharkhand-and-maharashtra.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए 15वें वित्त आयोग (XV-FC) के ग्रांट के तहत बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और महाराष्ट्र के पंचायती राज संस्थानों (PRIs) और ग्रामीण स्थानीय निकायों (RLBs) को 4,383.98 करोड़ रुपये की अनुदान राशि जारी की है। यह राशि ग्रामीण स्थानीय शासन को और मजबूत करने के उद्देश्य से दी गई है।</p>
<p><strong>बिहार</strong> को 1,203.60 करोड़ की राशि वित्त वर्ष 2025-26 के लिए दूसरी किस्त के रूप में सभी 38 जिला पंचायतों, 533 ब्लॉक पंचायतों और 8,053 ग्राम पंचायतों को जारी की गई है। इसके अलावा, पहली किस्त के रोके गए हिस्से से 2.09 करोड़ की अतिरिक्त राशि 3 ब्लॉक पंचायतों और 7 ग्राम पंचायतों को जारी की गई है, जो अब पात्र हो चुकी हैं।</p>
<p>इसी प्रकार, <strong>उत्तर प्रदेश</strong> के लिए 2,339.10 करोड़ रुपये की राशि दूसरी किस्त के रूप में सभी 75 जिला पंचायतों, 826 ब्लॉक पंचायतों और 57,694 ग्राम पंचायतों को जारी की गई है। साथ ही, पहली किस्त के रोके गए हिस्से से 16.52 करोड़ की अतिरिक्त राशि 2 जिला पंचायतों, 13 प्रखंड पंचायतों और 61 ग्राम पंचायतों को दी गई है, जो अब पात्र हो गई हैं।</p>
<p><strong>झारखंड</strong> के लिए अनुदान के तहत 412.69 करोड़ की राशि सभी 24 जिला पंचायतों, 253 पात्र ब्लॉक पंचायतों और 4,342 पात्र ग्राम पंचायतों के लिए निर्धारित की गई है।</p>
<p><strong>महाराष्ट्र</strong> को वित्त वर्ष 2022-23 के लिए अनुदान की पहली किस्त के रोके गए हिस्से से 104.04 करोड़ की राशि 12 अतिरिक्त पात्र जिला पंचायतों, 125 ब्लॉक पंचायतों और 50 ग्राम पंचायतों के लिए जारी की गई है। इसके अलावा, उसी वर्ष की दूसरी किस्त के रोके गए हिस्से से 120.61 करोड़ की राशि 12 जिला पंचायतों, 125 ब्लॉक पंचायतों और 324 ग्राम पंचायतों को जारी की गई है, जो अब पात्र हो गई हैं।</p>
<p>अबंधित (untied) अनुदान के तहत वित्त वर्ष 2023-24 की पहली किस्त के रोके गए हिस्से से 106.20 करोड़ की राशि 12 अतिरिक्त पात्र जिला पंचायतों, 125 ब्लॉक पंचायतों और 1,120 ग्राम पंचायतों को जारी की गई है। साथ ही, दूसरी किस्त के रोके गए हिस्से से 79.13 करोड़ की राशि 12 जिला पंचायतों, 125 ब्लॉक पंचायतों और 183 ग्राम पंचायतों को दी गई है, जो अब पात्र हो चुकी हैं।</p>
<p>केंद्रीय पंचायती राज मंत्रालय और जल शक्ति मंत्रालय (पेयजल एवं स्वच्छता विभाग) राज्यों के ग्रामीण स्थानीय निकायों के लिए अनुदानों की सिफारिश करते हैं, जिसके बाद वित्त मंत्रालय यह राशि जारी करता है। इन अनुदानों को एक वित्त वर्ष में दो किस्तों में जारी किया जाता है।</p>
<p>अबंधित (untied) अनुदान का उपयोग पंचायती राज संस्थाएं संविधान की ग्यारहवीं अनुसूची में शामिल 29 विषयों के अंतर्गत स्थानीय जरूरतों के अनुसार कर सकती हैं, हालांकि इसका उपयोग वेतन और अन्य प्रशासनिक खर्चों के लिए नहीं किया जा सकता।</p>
<p>वहीं, बंधित (tied) अनुदान का उपयोग बुनियादी सेवाओं के लिए किया जाता है, जिसमें स्वच्छता और खुले में शौच मुक्त (ODF) स्थिति को बनाए रखना शामिल है। इसके अंतर्गत घरेलू कचरे का प्रबंधन, मानव मल और फीकल स्लज का उपचार शामिल है। इसके अलावा पेयजल आपूर्ति, वर्षा जल संचयन और वाटर रीसाइक्लिंग जैसी गतिविधियां भी शामिल हैं।</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x500_69c28390ba9ac.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ केंद्र ने यूपी, बिहार, झारखंड और महाराष्ट्र को 15वें वित्त आयोग के तहत 4,384 करोड़ रुपये का अनुदान जारी किया ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x500_69c28390ba9ac.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[विश्व मौसम विज्ञान संगठन की चेतावनी: पृथ्वी का जलवायु असंतुलन वैश्विक खाद्य सुरक्षा और कृषि के लिए खतरा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/wmo-climate-imbalance-global-agriculture-risks.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 24 Mar 2026 17:27:17 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/wmo-climate-imbalance-global-agriculture-risks.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>पृथ्वी की जलवायु प्रणाली तेजी से &ldquo;असंतुलित&rdquo; होती जा रही है, जिसका वैश्विक कृषि, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। यह बात विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की एक नई रिपोर्ट में सामने आई है। सोमवार को जारी <strong>&lsquo;स्टेट ऑफ द ग्लोबल क्लाइमेट रिपोर्ट 2025&rsquo;</strong> में बताया गया है कि मानव-जनित जलवायु परिवर्तन से दुनिया की कृषि प्रणाली सीधे प्रभावित हो रही है।</p>
<p>इस समस्या के केंद्र में पृथ्वी का बढ़ता ऊर्जा असंतुलन है। पृथ्वी द्वारा सूर्य से अवशोषित ऊर्जा और वातावरण में वापस छोड़ी जाने वाली ऊष्मा के बीच के अंतर को ऊर्जा असंतुलन कहते हैं। ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के कारण यह असंतुलन तेजी से बढ़ रहा है, जिससे जलवायु प्रणाली में अतिरिक्त गर्मी जमा हो रही है। इस अतिरिक्त गर्मी का 90% से अधिक हिस्सा महासागर अवशोषित कर रहे हैं। इससे मौसम के पैटर्न में व्यापक बदलाव हो रहे हैं, जो कृषि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।</p>
<p>किसानों के लिए इसके प्रभाव पहले से ही दिखाई देने लगे हैं। बढ़ते तापमान के कारण फसलों के तैयार होने की अवधि कम हो रही है, जिससे गेहूं, चावल और मक्का जैसी प्रमुख खाद्य फसलों की पैदावार घट रही है। हीट स्ट्रेस का असर पशुधन की उत्पादकता, दुग्ध उत्पादन और पशुओं के स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है। उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में, जहां कृषि जलवायु पर अत्यधिक निर्भर है, इन बदलावों का प्रबंधन दिन-ब-दिन कठिन होता जा रहा है।</p>
<p>अनियमित वर्षा इस रिपोर्ट में उजागर की गई एक और बड़ी चिंता है। मानसून और मौसमी वर्षा के पैटर्न अब कम अनुमान योग्य हो गए हैं, जिससे किसानों के लिए बुवाई और कटाई की योजना बनाना मुश्किल हो गया है। लंबे सूखे के बाद अचानक भारी बारिश की घटनाएं खड़ी फसलों को नुकसान पहुंचा रही हैं, मिट्टी की सेहत को बिगाड़ रही हैं और बाढ़ के जोखिम को बढ़ा रही हैं।</p>
<p>रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि अल नीनो (El Ni&ntilde;o) और (La Ni&ntilde;a) जैसे प्राकृतिक जलवायु चक्र अब दीर्घकालिक तापमान वृद्धि के रुझानों के साथ मिलकर उनके प्रभाव को और बढ़ा रहे हैं। इसके चलते कुछ क्षेत्रों में सूखे की घटनाएं अधिक बार और अधिक तीव्र हो रही हैं, जबकि अन्य क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा और बाढ़ की स्थिति बन रही है। दोनों ही कृषि उत्पादन को बाधित करते हैं।</p>
<p>महासागरों के गर्म होने का कृषि पर परोक्ष प्रभाव भी पड़ रहा है। गर्म समुद्र अधिक शक्तिशाली चक्रवातों और चरम मौसम घटनाओं को जन्म देते हैं, जो फसलों को तबाह कर सकते हैं, सिंचाई इन्फ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचा सकते हैं और आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधित कर सकते हैं। तटीय कृषि प्रणालियां विशेष रूप से अधिक संवेदनशील हैं, क्योंकि समुद्र स्तर में वृद्धि से मिट्टी की लवणता बढ़ती है, जिससे फसल उत्पादकता घटती है।</p>
<p>रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि जलवायु परिवर्तन कीटों और बीमारियों के प्रसार को तेज कर रहा है। बढ़ते तापमान और बदलते आर्द्रता स्तर कीटों, रोगजनकों और आक्रामक प्रजातियों के लिए अनुकूल परिस्थितियां पैदा कर रहे हैं, जिससे फसल नुकसान बढ़ रहा है और कीटनाशकों पर निर्भरता भी बढ़ रही है। इससे न केवल किसानों की उत्पादन लागत बढ़ती है, बल्कि पर्यावरण और स्वास्थ्य पर भी खतरा उत्पन्न होता है।</p>
<p>इन परिवर्तनों के कारण खाद्य सुरक्षा संबंधी चिंताएं और अधिक गंभीर होती जा रही हैं। घटती पैदावार, बढ़ती उत्पादन लागत और बाजार की अस्थिरता मिलकर किसानों की आय पर दबाव डाल रही हैं। विशेष रूप से भारत जैसे विकासशील देशों के छोटे और सीमांत किसान सबसे अधिक प्रभावित हैं, क्योंकि उनके पास संसाधनों, तकनीक और जलवायु-लचीले इनपुट तक सीमित पहुंच होती है।</p>
<p>डब्ल्यूएमओ ने जोर देकर कहा है कि जलवायु अनुकूलन रणनीतियों के केंद्र में कृषि को रखा जाना चाहिए। जलवायु-लचीली फसल किस्मों को बढ़ावा देना, जल प्रबंधन में सुधार, प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करना और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाना, संवेदनशीलता कम करने के लिए महत्वपूर्ण कदम हैं। शोध और विस्तार सेवाओं में निवेश भी किसानों को बदलती परिस्थितियों के अनुरूप ढलने में अहम भूमिका निभाएगा।</p>
<p>रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि जलवायु प्रणाली में संतुलन बहाल करने के लिए सभी क्षेत्रों, विशेषकर कृषि से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना आवश्यक है। टिकाऊ भूमि उपयोग पद्धतियां, उर्वरकों का कुशल प्रबंधन और एग्रोफॉरेस्ट्री (कृषि वानिकी) जैसे उपाय शमन और अनुकूलन दोनों में योगदान दे सकते हैं।</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x500_69c27b9d3e0e1.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ विश्व मौसम विज्ञान संगठन की चेतावनी: पृथ्वी का जलवायु असंतुलन वैश्विक खाद्य सुरक्षा और कृषि के लिए खतरा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[संकट में याद आया इथेनॉल, पेट्रोल में मिश्रण 30 फीसदी तक बढ़ाने की मांग ने जोर पकड़ा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/ethanol-remembered-in-crisis-demand-for-increasing-blending-in-petrol-to-30-pc-gained-momentum.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 24 Mar 2026 16:10:25 GMT]]></pubDate>
				
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        <description><![CDATA[ <p data-start="173" data-end="522">कुछ महीनों पहले देश में इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम के खिलाफ काफी माहौल बनाया जा रहा था। खासकर गाड़ियों के माइलेज और मेंटेनेंस को लेकर केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी पर निशाना साधा गया। इथेनॉल को लेकर &lsquo;फूड बनाम फ्यूल&rsquo; की बहस भी छिड़ी। नतीजा यह हुआ कि पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण 20 फीसदी पर ही रुक गया और ब्लेंडिंग प्रोग्राम को लेकर भी संशय पैदा हो गया।</p>
<p data-start="524" data-end="982">लेकिन जैसे ही पश्चिम एशिया में युद्ध जैसे हालात बने और खाड़ी देशों से पेट्रोलियम व गैस की आपूर्ति बाधित हुई, इथेनॉल की अहमियत समझ आने लगी। ब्रेंट क्रूड तीन हफ्ते पहले 60-70 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर था, जिसकी कीमत अब लगभग 40 फीसदी बढ़ चुकी है। देश की ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भरता बहुत अधिक है और मौजूदा संकट ने इस चुनौती को उजागर कर दिया है। ताजा हालात को देखते हुए पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण 20 फीसदी से बढ़ाकर 30 फीसदी करने की मांग तेज हो गई है।</p>
<p data-start="984" data-end="1386">इस बीच, प्रधानमंत्री <strong>नरेंद्र मोदी</strong> ने पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष पर लोकसभा को संबोधित करते हुए कहा कि पिछले 10-11 वर्षों में इथेनॉल उत्पादन और उसकी ब्लेंडिंग पर अभूतपूर्व काम हुआ है। एक दशक पहले तक देश में सिर्फ 1-1.5 फीसदी इथेनॉल ब्लेंडिंग क्षमता थी, जबकि आज हम पेट्रोल में 20 फीसदी इथेनॉल ब्लेंडिंग के करीब पहुंच चुके हैं। इसके कारण प्रतिवर्ष करीब साढ़े चार करोड़ बैरल कम तेल आयात करना पड़ रहा है।</p>
<p data-start="1388" data-end="1742">पीएम मोदी ने भरोसा जताया कि जिस पैमाने पर वैकल्पिक ईंधनों पर काम हो रहा है, उससे भारत का भविष्य और अधिक सुरक्षित होगा। उन्होंने कहा कि सरकार सभी सेक्टर के स्टेकहोल्डर्स के साथ लगातार चर्चा कर रही है और जहां भी जरूरत है, वहां आवश्यक समर्थन दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री के इस बयान को इथेनॉल उत्पादक डिस्टिलरी उद्योग ने सकारात्मक संकेत के रूप में लिया है।</p>
<p data-start="1744" data-end="2164"><strong>ऑल इंडिया डिस्टिलर्स एसोसिएशन</strong> (AIDA) ने केंद्र सरकार से पेट्रोल में इथेनॉल की मात्रा 20 फीसदी से बढ़ाकर 30 फीसदी (E30) करने की मांग की है।&nbsp; एसोसिएशन की डीडीजी <strong>भारती बालाजी</strong> ने केंद्रीय मंत्री <strong>नितिन गडकरी</strong> को पत्र लिखकर कई सुझाव दिए हैं। इनमें ब्राजील की तर्ज पर 100 फीसदी इथेनॉल पर चलने वाले फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को बढ़ावा देना, घरेलू व औद्योगिक कुकिंग में इथेनॉल के इस्तेमाल को प्रोत्साहित करना और डीजल में इथेनॉल ब्लेंडिंग को बढ़ाना शामिल है।</p>
<p data-start="2415" data-end="2814">मंगलवार को AIDA के डिस्टिलर्स कॉन्क्लेव को संबोधित करते हुए केंद्रीय खाद्य सचिव <strong>संजीव चोपड़ा</strong> ने कहा कि हर संकट एक अवसर लेकर आता है और इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम में सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए यह उपयुक्त समय है। उन्होंने बताया कि 2014 से 2025 के बीच इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम के कारण कच्चे तेल का आयात लगभग 277 लाख टन कम हुआ है, जिससे 1.63 लाख करोड़ रुपये से अधिक की विदेशी मुद्रा की बचत हुई है।</p>
<p data-start="2816" data-end="3111"><strong>इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन</strong> (ISMA) ने भी प्रधानमंत्री कार्यालय को पत्र लिखकर E20 से आगे इथेनॉल ब्लेंडिंग के लिए एक चरणबद्ध और तेज रोडमैप तैयार करने की मांग की है। संगठनों का मानना है कि मौजूदा उत्पादन क्षमता का बेहतर उपयोग करने के लिए ब्लेंडिंग लक्ष्य बढ़ाना जरूरी है।</p>
<p data-start="3113" data-end="3591">इस्मा के डायरेक्टर जनरल <strong>दीपक बल्लानी</strong> ने कहा, &ldquo;प्रधानमंत्री का यह कहना कि इथेनॉल ब्लेंडिंग से 4.5 करोड़ बैरल कच्चे तेल के आयात में बचत हुई है, बायोफ्यूल को भारत की ऊर्जा सुरक्षा के एक अहम स्तंभ के रूप में स्थापित करता है।&rdquo; उन्होंने कहा कि इथेनॉल उद्योग 20 फीसदी से अधिक ब्लेंडिंग के लिए आपूर्ति बढ़ाने को तैयार है। इस्मा के अनुसार, देश में सालाना करीब 2,000 करोड़ लीटर से अधिक घरेलू इथेनॉल उत्पादन क्षमता है, जो 20 फीसदी मिश्रण के लिए आवश्यक 1,100 करोड़ लीटर से काफी ज्यादा है। इस तरह भारत इथेनॉल मिश्रण बढ़ाने की स्थिति में है।&nbsp;</p>
<p><strong>ग्रेन इथेनॉल मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन</strong> (GEMA) के अध्यक्ष <strong>सी.के. जैन</strong> का कहना है कि देश में इथेनॉल को लेकर नीति समर्थन जारी रहा तो यह क्षेत्र कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकता है। अनाज आधारित इथेनॉल उत्पादन से किसानों को अतिरिक्त बाजार और बेहतर आय के अवसर मिल रहे हैं।</p>
<p data-start="3113" data-end="3591"></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ संकट में याद आया इथेनॉल, पेट्रोल में मिश्रण 30 फीसदी तक बढ़ाने की मांग ने जोर पकड़ा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[उत्तर प्रदेश में 6500 केंद्रों पर गेहूं की सरकारी खरीद 25 मार्च से, राज्य सरकार का 50 लाख टन गेहूं खरीद का फैसला]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/states/uttar-pradesh-to-begin-wheat-procurement-from-wednesday-state-targets-50-lakh-tonnes-purchase.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 24 Mar 2026 12:28:27 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/states/uttar-pradesh-to-begin-wheat-procurement-from-wednesday-state-targets-50-lakh-tonnes-purchase.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">उत्तर प्रदेश सरकार ने रबी विपणन वर्ष 2026-27 के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के अन्तर्गत गेहूं क्रय नीति को स्वीकृति प्रदान की है। पूरे प्रदेश में गेहूं क्रय की अवधि 25 मार्च, 2026 से 15 जून, 2026 तक निर्धारित की गई है। गेहूं खरीद के लिए आठ एजेंसियां कुल करीब 6,500 क्रय केंद्र स्थापित करेंगी। सोमवार को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में मंत्रिपरिषद की बैठक में यह निर्णय लिया गया।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">यह जानकारी देते हुए प्रदेश के कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही ने बताया कि विभाग की तरफ से 30 लाख मीट्रिक टन खरीद के प्रस्ताव को बढ़ाकर 50 लाख मीट्रिक टन करने का फैसला किया गया है। केंद्र सरकार ने 2026-27 मार्केटिंग सीजन के लिए गेहूं का एमएसपी 2,585 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया है।</span></p>
<p><strong>किस खरीद एजेंसी के कितने केंद्र</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">गेहूं खरीद के लिए उत्तर प्रदेश सहकारी संघ (पीसीएफ) के सबसे ज्यादा 3,300 केंद्र खोलने का निर्णय लिया गया है। इसके अलावा खाद्य विभाग की विपणन शाखा के 1,250, उत्तर प्रदेश राज्य कृषि उत्पादन मंडी परिषद के 100, उत्तर प्रदेश को-ऑपरेटिव यूनियन (यूपीपीसीयू) के 700, उत्तर प्रदेश उपभोक्ता सहकारी संघ (यूपीएसएस) के 350, भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ (नैफेड) के 300, भारतीय राष्ट्रीय उपभोक्ता सहकारी संघ (एनसीसीएफ) के 100 तथा भारतीय खाद्य निगम के 400 क्रय केन्द्र प्रस्तावित किए गए हैं।</span></p>
<p><strong>गेहूं खरीद केंद्र खुलने का समय</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कैबिनेट के फैसले के मुताबिक गेहूं क्रय केन्द्र सुबह 9 बजे से शाम 6 बजे तक खुले रखे जाएंगे, लेकिन जिलाधिकारी स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार क्रय केन्द्र के खुलने व बन्द होने के समय में आवश्यक परिवर्तन करने के लिए अधिकृत होंगे। रविवार एवं राजपत्रित अवकाश को छोड़कर, शेष कार्य दिवसों एवं स्थानीय अवकाश व द्वितीय शनिवार को क्रय केन्द्र खुले रहेंगे।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">रबी विपणन वर्ष 2026-27 में इलेक्ट्रॉनिक प्वाइंट ऑफ परचेज मशीन के माध्यम से किसानों के बायोमैट्रिक प्रमाणीकरण द्वारा क्रय केन्द्रों/मोबाइल क्रय केन्द्रो पर गेहूं की खरीद की जाएगी। गोबाइल क्रय केन्द्रों पर होने वाली प्रत्येक खरीद का ई-पॉप डिवाइस के जरिए अक्षांश-देशान्तर भी कैप्चर किया जाएगा।</span></p>
<p><strong>भुगतान पीएफएमएस पोर्टल के माध्यम से 48 घंटे में&nbsp;</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">बटाईदार किसान भी पंजीकरण कराकर गेहूं की बिक्री कर सकेंगे। समस्त क्रय एजेंसियों द्वारा किसानों से खरीदे गए गेहूं के मूल्य का भुगतान भारत सरकार के पीएफएमएस पोर्टल के माध्यम से यथासम्भव 48 घण्टे के अन्तर्गत उनके बैंक खाते में सुनिश्चित किया जायेगा।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">गेहूं खरीद वर्ष 2026-27 के अन्तर्गत पंजीकृत ट्रस्ट का भी गेहूं क्रय किया जायेगा। क्रय केन्द्र पर ट्रस्ट के संचालक अधिकृत प्रतिनिधि का बायोमैट्रिक सत्यापन कराते हुए गेहूं की खरीद की जाएगी तथा भुगतान ट्रस्ट के बैंक खाते में पीपीए मोड के माध्यम से कराया जायेगा।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">राज्य सरकार की तरफ से जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि गेहूं क्रय केन्द्रों पर किसानों के लिए पीने के पानी, बैठने की व्यवस्था एवं वाहन पार्किंग इत्यादि की पर्याप्त व्यवस्था की जाएगी। क्रय केन्द्रों पर गेहूं को वर्षा व अन्य प्राकृतिक आपदाओं से बचाने के लिए क्रेट्स व तिरपाल की व्यवस्था की जाएगी, ताकि किसी भी स्थिति में गेहूं खराब न होने पाए।</span></p>
<p><strong>बागपत सहकारी चीनी मिल की क्षमता बढ़ेगी</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कैबिनेट ने बागपत स्थित दि किसान सहकारी चीनी मिल लि. की पेराई क्षमता 2,500 टीसीडी से बढ़ाकर 5,000 टीसीडी० करते हुए नई चीनी मिल की स्थापना के लिए पब्लिक इन्वेस्टमेण्ट बोर्ड की तरफ से 37249.89 लाख रुपये के प्रस्ताव को स्वीकृति दी है। इसमें 50 प्रतिशत राशि राज्य सरकार की अंशपूंजी/अनुदान के रूप में तथा बाकी 50 प्रतिशत राशि राज्य सरकार से ऋण के रूप में होगी।</span></p>
<p><strong>उप्र निजी बिजनेस पार्क विकास योजना-2025 स्वीकृत</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">मंत्रिपरिषद ने उत्तर प्रदेश निजी बिजनेस पार्क विकास योजना-2025 के प्रस्ताव को स्वीकृति प्रदान की है। बिजनेस पार्को में वैश्विक निगमों के लिए कार्यालय, अनुसंधान एव विकास केन्द्र, वैश्विक क्षमता केन्द्रों तथा संचालन केन्द्रों की स्थापना के लिए रेडी-टू-ऑपरेट एवं प्लग एण्ड प्ले सुविधाएं उपलब्ध करायी जाएंगी। ऐसे बिजनेस पार्क नवाचार आधारित पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में कार्य करेंगे, जो नॉलेज बेस्ड उद्योगों को आकर्षित करेंगे, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को बढ़ावा देंगे, अनुसंधान क्षमताओं में वृद्धि करेंगे तथा उद्यमिता को प्रोत्साहित करेंगे।</span></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ उत्तर प्रदेश में 6500 केंद्रों पर गेहूं की सरकारी खरीद 25 मार्च से, राज्य सरकार का 50 लाख टन गेहूं खरीद का फैसला ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[पश्चिम एशिया संघर्ष पर लोकसभा में पीएम मोदी का संबोधन, भारतीयों की सुरक्षा और एनर्जी सिक्योरिटी पर जोर]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/pm-modi-address-in-parliament-on-west-asia-conflict-emphasis-on-safety-and-energy-security-of-indians.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 23 Mar 2026 18:50:17 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/pm-modi-address-in-parliament-on-west-asia-conflict-emphasis-on-safety-and-energy-security-of-indians.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को लोकसभा को संबोधित करते हुए पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष को चिंताजनक बताया। उन्होंने कहा कि इस युद्ध ने भारत के सामने भी अप्रत्याशित चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। इस संकट को तीन सप्ताह से अधिक समय हो चुका है और इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था तथा लोगों के जीवन पर पड़ रहा है। इसलिए पूरी दुनिया इसके शीघ्र समाधान के लिए सभी पक्षों से अपील कर रही है।</p>
<p>पीएम मोदी ने कहा कि<span> हम कोरोना के समय भी एकजुटता से ऐसी चुनौतियों का सामना कर चुके हैं। अब हमें फिर से उसी तरह तैयार रहने की आवश्यकता है। उन्होंने राज्य सरकारों से आग्रह किया कि ऐसे समय में कालाबाजारी और जमाखोरी करने वाले एक्टिव हो जाते हैं, इसके लिए कड़ी मॉनिटरिंग जरूरी है। जहां से भी ऐसी शिकायतें आती हैं, वहां त्वरित कार्रवाई होनी चाहिए।&nbsp;</span></p>
<p><strong>भारत की चिंताएं</strong></p>
<p>प्रधानमंत्री ने कहा कि युद्धरत और प्रभावित देशों के साथ भारत के व्यापक व्यापारिक संबंध हैं। जिस क्षेत्र में संघर्ष हो रहा है, वह वैश्विक व्यापार का एक महत्वपूर्ण मार्ग है। लगभग एक करोड़ भारतीय खाड़ी देशों में रहते हैं और समुद्री व्यापार में भी बड़ी संख्या में भारतीय क्रू सदस्य कार्यरत हैं। इन सभी कारणों से भारत की चिंताएं स्वाभाविक हैं। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर संसद से एकजुट और स्पष्ट संदेश दुनिया तक जाना चाहिए।</p>
<p>पीएम मोदी ने कहा कि <span>भारत की भूमिका स्पष्ट है। शुरुआत से ही हमने इस संघर्ष को लेकर अपनी गहरी चिंता व्यक्त की है। भारत हमेशा से मानवता के हित में और शांति के पक्ष में अपनी आवाज उठाता रहा है। बातचीत और कूटनीति ही इस समस्या का समाधान है।&nbsp;</span></p>
<p><strong>भारतीयों की सुरक्षा प्राथमिकता</strong></p>
<p>पीएम मोदी ने कहा कि युद्ध शुरू होने के बाद से प्रभावित देशों में हर भारतीय को आवश्यक सहायता दी जा रही है। उन्होंने स्वयं पश्चिम एशिया के कई देशों के राष्ट्राध्यक्षों से दो दौर की बातचीत की है और सभी ने भारतीयों की सुरक्षा का आश्वासन दिया है। विदेशों में मौजूद भारतीय मिशन लगातार सहायता में जुटे हैं।&nbsp;</p>
<p><strong>3.75 </strong><strong>लाख भारतीय सुरक्षित लौटे</strong></p>
<p>प्रधानमंत्री के अनुसार, युद्ध शुरू होने के बाद अब तक 3 लाख 75 हजार से अधिक भारतीय सुरक्षित स्वदेश लौट चुके हैं। ईरान से लगभग 1000 भारतीयों को वापस लाया गया है, जिनमें 700 से अधिक मेडिकल छात्र शामिल हैं।&nbsp;</p>
<p><strong>एनर्जी सिक्योरिटी पर फोकस</strong></p>
<p>प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत में कच्चा तेल, गैस और उर्वरक जैसी कई जरूरी वस्तुएं होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आती हैं। युद्ध के बाद यहां जहाजों की आवाजाही चुनौतीपूर्ण हो गई है। सरकार का प्रयास है कि पेट्रोल, डीजल और गैस की आपूर्ति प्रभावित न हो और आम नागरिकों को कम से कम परेशानी हो।</p>
<p>उन्होंने बताया कि भारत के पास 53 लाख टन से अधिक का रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार है और बीते 11 वर्षों में रिफाइनिंग क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। सरकार विभिन्न देशों के सप्लायर्स के साथ संपर्क में है ताकि आपूर्ति बनी रहे। <span>भारत डिप्लोमेसी के जरिए युद्ध के माहौल में भी, भारतीय जहाजों के सुरक्षित आवागमन के लिए निरंतर प्रयास कर रहा है। </span>हाल के दिनों में होर्मुज क्षेत्र में फंसे कई भारतीय जहाज सुरक्षित आए हैं।&nbsp;</p>
<p><strong>खेती को संकटों से बचाएंगे </strong></p>
<p>प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि किसानों ने देश के अन्न भंडार भर रखे हैं और भारत के पास पर्याप्त खाद्यान्न उपलब्ध है। कोरोना काल में भी वैश्विक सप्लाई चेन बाधित हुई थी, तब अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमत 3000 रुपये प्रति बोरी तक पहुंच गई थी, जबकि भारतीय किसानों को यह 300 रुपये से भी कम कीमत पर उपलब्ध कराया गया।</p>
<p>उन्होंने बताया कि किसानों को ऐसे संकटों से बचाने के लिए पिछले एक दशक में 6 नए यूरिया संयंत्र शुरू किए गए, जिससे सालाना 76 लाख टन अतिरिक्त उत्पादन क्षमता जुड़ी है। DAP और NPK उर्वरकों का घरेलू उत्पादन भी करीब 50 लाख टन बढ़ाया गया है और आयात स्रोतों को भी विविधीकृत किया गया है।</p>
<p>प्रधानमंत्री ने कहा कि किसानों को &lsquo;मेड इन इंडिया&rsquo; नैनो यूरिया का विकल्प दिया गया है और प्राकृतिक खेती को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। पीएम कुसुम योजना के तहत 22 लाख से अधिक सोलर पंप लगाए गए हैं, जिससे डीजल पर निर्भरता कम हुई है। पीएम मोदी ने कहा,&nbsp;&ldquo;मैं इस सदन के माध्यम से देश के किसानों को विश्वास दिलाता हूं कि सरकार किसानों को हर संभव मदद करती रहेगी।&rdquo;&nbsp;</p>
<p><strong>एथेनॉल ब्लेंडिंग से राहत</strong></p>
<p>प्रधानमंत्री ने कहा कि पिछले दशक में एथेनॉल उत्पादन और ब्लेंडिंग में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। पहले जहां एथेनॉल ब्लेंडिंग लगभग 1-2 प्रतिशत थी, अब यह 20 प्रतिशत के करीब पहुंच गई है। इससे हर साल करीब साढ़े चार करोड़ बैरल तेल आयात कम हुआ है।</p>
<p>रेलवे के विद्युतीकरण से भी बड़े पैमाने पर डीजल की बचत हुई है। यदि यह न हुआ होता, तो हर साल लगभग 180 करोड़ लीटर अतिरिक्त डीजल की आवश्यकता पड़ती। साथ ही, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को बढ़ावा देने के तहत राज्यों को 15,000 इलेक्ट्रिक बसें दी गई हैं।</p>
<p></p>
<p></p>
<p><strong>&nbsp;</strong></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ पश्चिम एशिया संघर्ष पर लोकसभा में पीएम मोदी का संबोधन, भारतीयों की सुरक्षा और एनर्जी सिक्योरिटी पर जोर ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[ट्रंप ने ईरान पर 5 दिनों के लिए हमले रोकने का दिया आदेश, सकारात्मक बातचीत का दिया हवाला, लेकिन ईरान का वार्ता से इनकार]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/trump-postpones-iran-strikes-oil-prices-slide-march-2026.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 23 Mar 2026 18:16:29 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/trump-postpones-iran-strikes-oil-prices-slide-march-2026.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने ईरान के ऊर्जा ठिकानों पर अगले 5 दिनों तक हमले नहीं करने का आदेश दिया है। उन्होंने अमेरिका और ईरान के बीच हुई &ldquo;सकारात्मक बातचीत&rdquo; का हवाला देते हुए यह फैसला लिया। इससे पहले उन्होंने 48 घंटे का अल्टीमेटम देते हुए चेतावनी दी थी कि यदि वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह नहीं खोला गया, तो ईरान के ऊर्जा ठिकानों पर हमला किया जाएगा। हालांकि ईरान ने अमेरिका के साथ किसी भी तरह की बातचीत की पुष्टि नहीं की है।&nbsp;</p>
<p>अपने नए फैसले की जानकारी देते हुए उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, &lsquo;मुझे यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है कि अमेरिका और ईरान के बीच पिछले दो दिनों में मध्य पूर्व में हमारी शत्रुता के पूर्ण और समग्र समाधान को लेकर अत्यंत सकारात्मक बातचीत हुई है। इन गहन, विस्तृत और रचनात्मक चर्चाओं के स्वर और दिशा को देखते हुए, जो पूरे सप्ताह जारी रहेंगी, मैंने युद्ध मंत्रालय को निर्देश दिया है कि वह ईरान के बिजली संयंत्रों और ऊर्जा इन्फ्रास्ट्रक्चर पर प्रस्तावित सभी सैन्य हमलों को पांच दिनों के लिए स्थगित कर दे। यह निर्णय जारी बैठकों और वार्ताओं की सफलता पर निर्भर करेगा। इस विषय पर आपके ध्यान के लिए धन्यवाद!&rsquo; ट्रंप की इस घोषणा से उम्मीद बढ़ी है कि इस संघर्ष का कूटनीतिक समाधान संभव हो सकता है।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x_69c135f4635e7.jpg" alt="" /></p>
<p>इस घोषणा का वैश्विक बाजारों पर तत्काल असर पड़ा। तनाव कम होने की उम्मीदों के बीच कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट दर्ज की गई। ब्रेंट क्रूड की कीमत 6.5% गिरकर 105 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई, जबकि अमेरिकी डब्ल्यूटीआई की कीमत 5.8% घटकर 92.4 डॉलर प्रति बैरल हो गई। कच्चे तेल के दाम में गिरावट एक समय 8% तक चली गई थी।</p>
<p>दो दिन पहले अमेरिका ने ईरान को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खोलने के लिए 48 घंटे की समय सीमा तय की थी और चेतावनी दी थी कि ऐसा न होने पर सैन्य कार्रवाई की जाएगी। होर्मुज जलमार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की एक अहम धुरी है और इसमें व्यवधान अंतरराष्ट्रीय व्यापार और तेल बाजारों पर गहरा प्रभाव डाल रहा है।</p>
<p>अमेरिका की इस चेतावनी पर ईरान ने भी कड़े जवाब की चेतावनी दी थी। तेहरान ने कहा था कि वह मध्य पूर्व में ऊर्जा इन्फ्रास्ट्रक्चर को निशाना बना सकता है। यदि उसके तटों या रणनीतिक ठिकानों पर हमला हुआ, तो वह फारस की खाड़ी को अवरुद्ध करने के लिए समुद्री बारूदी सुरंगों का इस्तेमाल भी कर सकता है।</p>
<p>सैन्य टकराव में यह ताजा विराम कूटनीति के लिए एक संभावित अवसर का संकेत देता है, हालांकि क्षेत्र में अनिश्चितता अब भी बनी हुई है। विश्लेषकों का कहना है कि भले ही फिलहाल तनाव कम हुआ हो, लेकिन स्थिति अब भी नाजुक है और जारी वार्ताओं के परिणाम के आधार पर तेजी से बदल सकती है। यह सैन्य टकराव 28 फरवरी को तब शुरू हुआ जब इजरायल और अमेरिका ने ईरान पर हमले किए।</p>
<p><strong>ईरान का इनकार</strong></p>
<p>इस बीच, ईरान की तसनीम न्यूज एजेंसी ने एक वरिष्ठ ईरानी अधिकारी के हवाले से बताया कि होर्मुज जलडमरूमध्य के युद्ध-पूर्व स्थिति में लौटने की संभावना नहीं है, और वैश्विक ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता बनी रहेगी। अधिकारी ने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका के साथ फिलहाल कोई बातचीत नहीं चल रही है। रिपोर्ट के अनुसार, अधिकारी ने दावा किया कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने वित्तीय बाजारों के दबाव में ईरान के महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर हमले की योजना से पीछे हटने का फैसला किया है। उन्होंने यह भी कहा कि तेहरान तब तक अपनी रक्षात्मक रणनीति जारी रखेगा जब तक वह अपनी प्रतिरोध क्षमता को दोबारा स्थापित नहीं कर लेता।</p>
<p>ईरान की फार्स समाचार एजेंसी ने भी एक स्रोत के हवाले से बताया कि डोनाल्ड ट्रंप के साथ कोई सीधा संपर्क नहीं हुआ है, यहां तक कि किसी मध्यस्थ के जरिए भी नहीं। स्रोत ने आरोप लगाया कि ईरान द्वारा किसी भी संभावित हमले के जवाब में बिजली संयंत्रों को निशाना बनाने की चेतावनी के बाद ट्रंप पीछे हट गए।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ ट्रंप ने ईरान पर 5 दिनों के लिए हमले रोकने का दिया आदेश, सकारात्मक बातचीत का दिया हवाला, लेकिन ईरान का वार्ता से इनकार ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[हरियाणा में कपास उत्पादकता 30% घटी, किसानों को प्रति एकड़ 15 हजार रुपये का नुकसानः एचएयू की रिपोर्ट]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/states/haryana-agri-university-report-cotton-farmers-suffer-losses-exceeding-rs-15000-per-acre.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 23 Mar 2026 17:09:29 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/states/haryana-agri-university-report-cotton-farmers-suffer-losses-exceeding-rs-15000-per-acre.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>हरियाणा के किसानों के लिए कपास की खेती घाटे का सौदा बन चुकी है। राज्य के किसानों को कपास की खेती में प्रति एकड़ औसतन 15 हजार रुपये से अधिक का नुकसान हो रहा है। इसकी मुख्य वजह है उत्पादकता में गिरावट और किसानों को उपज की कम कीमत मिलना। चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय की हाल की एक रिपोर्ट में इसका खुलासा किया गया है। खरीफ सीजन 2025 की यह रिपोर्ट 13-14 फरवरी 2026 को एग्रीकल्चर ऑफिसर्स वर्कशॉप में प्रस्तुत की गई।</p>
<p>रिपोर्ट के अनुसार, कपास की प्रति एकड़ औसत पैदावार 2025 में सिर्फ चार क्विंटल रह गई, जो पिछले साल 5.70 क्विंटल थी। यानी प्रति एकड़ उत्पादकता 30 प्रतिशत कम हो गई। किसानों को मिलने वाली कीमत में भी कमी आई है। औसत कीमत पिछले साल 7,071 रुपये प्रति क्विंटल थी, जो इस साल 15 प्रतिशत घटकर 6,020 रुपये प्रति क्विंटल रह गई।&nbsp;</p>
<p>मई 2025 में केंद्र सरकार ने मध्यम रेशे वाली कपास का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) 7,710 रुपये और लंबे रेशे वाली कपास का एमएसपी 8,110 रुपये प्रति क्विंटल तय किया था।&nbsp;</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x_69c107bc785f2.jpg" alt="" /></p>
<p>रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश के किसानों के लिए प्रति एकड़ औसत लागत 40,024 रुपये थी। इसके बदले उन्हें कपास की बिक्री से 24,081 रुपये और बाई-प्रोडक्ट से 801 रुपये प्राप्त हुए। इस तरह किसानों को कपास की खेती में प्रति एकड़ 15,142 रुपये का नुकसान हो रहा है। लागत के आकलन में खेत तैयार करने, सिंचाई, बीज, उर्वरक, तुड़ाई आदि को जोड़ा गया है।</p>
<p>इस अध्ययन का हिस्सा रहे हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के कृषि अर्थशास्त्र विभाग में सहा. वैज्ञानिक <strong>डॉ. विनय महला</strong> ने रूरल वॉयस को बताया कि विश्वविद्यालय हर साल खरीफ व रबी की रिपोर्ट तैयार करता है। कपास के मामले में देखा जाए तो साल 2017 के बाद से किसानों को नुकसान हो रहा है। कपास की फसल पर कीटों और रोगों की मार के चलते यह समस्या खड़ी हुई है। अगर नई किस्में नहीं आईं तो आने वाले 3 से 5 वर्षों में हरियाणा में कपास किसानों की संख्या बहुत कम हो जाएगी।&nbsp;</p>
<p>राज्य में कपास की खेती मुख्य रूप से हिसार, भिवानी, फतेहाबाद, महेंद्रगढ़, रेवाड़ी, चरखी दादरी और सिरसा जिलों में होती है। कपास की खेती में किसानों का सबसे अधिक खर्च फतेहाबाद जिले में आया। उनका प्रति एकड़ खर्च 48,721 रुपये था। उनका नुकसान भी 17,315 रुपये प्रति एकड़ था। हालांकि सबसे अधिक 17,515 रुपये प्रति एकड़ का औसत नुकसान हिसार के किसानों का था। बाकी जिलों में महेंद्रगढ़ के किसानों का औसत नुकसान 14,144 रुपये, &nbsp;चरखी दादरी का 15,276 रुपये, रेवाड़ी का 9,548 रुपये, भिवानी का 14,852 रुपये और सिरसा के किसानों का 11,250 रुपये प्रति एकड़ था।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x_69c107bdf39fe.jpg" alt="" /></p>
<p>रूरल वॉयस ने राज्य के कई कपास किसानों से बात की। सिसवाला, हिसार के पवन कुमार ने बताया कि बीते वर्ष 8.7 हैक्टेयर में कपास की खेती की थी, जिसमें 3 किवंटल प्रति एकड़ के लगभग कपास उत्पादन हुआ व मंडी में 5600 रुपये का भाव प्राप्त हुआ। पवन के अनुसार उन्हें काफी नुकसान का सामना करना पड़ा और वे यह नुकसान 2018 से लगातार झेल रहे हैं।</p>
<p>एक अन्य किसान हरपाल सिंह ने बताया कि बीते वर्ष 4 हेक्टेयर में कपास की खेती की थी। उन्हें खेतों में गुलाबी सूंडी का सामना करना पड़ा व बारिश की वजह से फसल भी खराब हुई। जब मंडी में फसल बेचने गए तब उन्हें लागत भी नहीं मिली।&nbsp;</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ हरियाणा में कपास उत्पादकता 30% घटी, किसानों को प्रति एकड़ 15 हजार रुपये का नुकसानः एचएयू की रिपोर्ट ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[अग्रसरी नीति समीक्षा में पंचायतों की भूमिका पर चर्चा, विशेषज्ञों ने कहा जनभागीदारी से ही मजबूत होंगे पंचायत सुधार]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/people-participation-key-to-strengthening-panchayat-raj-says-agrasri-policy-review.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 23 Mar 2026 14:28:30 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/people-participation-key-to-strengthening-panchayat-raj-says-agrasri-policy-review.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>जमीनी स्तर पर प्रभावी शासन सुनिश्चित करने के लिए पंचायत राज सुधार केवल सक्रिय जनभागीदारी और संस्थाओं के सुदृढ़ीकरण के माध्यम से ही संभव हैं। हालांकि पंचायती राज संस्थाओं को अधिकार देने वाला 73वां संविधान संशोधन अधिनियम लागू हुए 30 वर्ष से अधिक का समय बीत चुका है, फिर भी कई राज्यों में पंचायतों को निधियों, कार्यों और शक्तियों का पूर्ण हस्तांतरण अभी तक नहीं हो पाया है। तिरुपति स्थित अकादमी ऑफ ग्रासरूट्स स्टडीज एंड रिसर्च ऑफ इंडिया (AGRASRI) की तरफ से आयोजित एक नीति समीक्षा में ये बातें कही गईं।</p>
<p>ऑनलाइन आयोजित इस नीति समीक्षा बैठक को संबोधित करते हुए चित्तूर जिला प्रजा परिषद के उप मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. जी. वेंकट नारायण ने कहा कि ग्रामीण भारत में पंचायतों की भूमिका बहुआयामी है और वे कल्याणकारी तथा विकास योजनाओं को लोगों तक पहुंचाने का प्रमुख माध्यम हैं। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद से पंचायत राज व्यवस्था को मजबूत करने के लिए कई सुधार किए गए हैं, जिनमें 73वां संवैधानिक संशोधन अधिनियम देश की छह लाख से अधिक पंचायतों के लिए एक मील का पत्थर साबित हुआ है।</p>
<p>आंध्र प्रदेश में हालिया प्रशासनिक सुधारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि सचिवालय (Sachivalayam) प्रणाली ने ग्रामीण क्षेत्रों में कल्याणकारी योजनाओं की समयबद्ध डिलीवरी को बेहतर बनाया है। पंचायत राज ढांचे में कर्तव्यों का स्पष्ट बंटवारा और लंबे समय से लंबित पदोन्नतियों जैसे कदमों ने भी जमीनी स्तर पर बेहतर प्रशासन का मार्ग प्रशस्त किया है।</p>
<p><strong>पंचायत को अभी तक पूर्ण अधिकार हस्तांतरित नहीं</strong></p>
<p>अग्रसरी (AGRASRI) के संस्थापक और निदेशक डॉ. डी. सुंदर राम ने कहा कि 73वें संवैधानिक संशोधन को लागू हुए तीन दशक से अधिक समय बीत जाने के बावजूद कई राज्यों में पंचायतों को निधियों, कार्यों और शक्तियों का पूर्ण हस्तांतरण अभी तक नहीं हो पाया है। उन्होंने कहा कि यह स्थिति समग्र ग्रामीण विकास में बाधा बनी हुई है। उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा भारतीय ग्रामीण विकास सेवा (IRDS) शुरू करने के फैसले का स्वागत किया और इसे ग्रामीण शासन को सशक्त बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।</p>
<p>उन्होंने आगे तत्काल सुधारों की आवश्यकता पर जोर देते हुए निर्वाचित प्रतिनिधियों के लिए क्षमता निर्माण कार्यक्रम, ग्राम स्तर पर प्लानिंग, भ्रष्टाचार और जन-शिकायतों के समाधान के लिए लोकपाल जैसी व्यवस्था और पंचायतों को निधि, कार्य एवं शक्तियों का शीघ्र हस्तांतरण सुनिश्चित करने की वकालत की। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि पंचायत स्तर पर अनुभव रखने वाले प्रतिनिधियों के लिए संसद और राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण दिया जाना चाहिए, ताकि जमीनी लोकतंत्र को और मजबूती मिल सके।</p>
<p>बैठक में विशेषज्ञों ने कहा कि बेहतर सेवा वितरण, बुनियादी ढांचे के विकास और प्रशासनिक समन्वय के लिए विकेंद्रीकरण और वित्तीय स्वायत्तता अत्यंत आवश्यक हैं। उन्होंने वित्त आयोगों की सिफारिशों के प्रभावी क्रियान्वयन और पंचायतों को सीधे धन हस्तांतरण पर भी जोर दिया।</p>
<p><strong>विकेंद्रीकरण और वित्तीय स्वायत्तता अहम</strong></p>
<p>बैठक में शिक्षाविदों और विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि 73वें संशोधन के प्रावधानों के क्रियान्वयन में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्य दक्षिण भारत के अन्य राज्यों से पीछे हैं। उन्होंने ग्राम स्तर पर संस्थागत ढांचे को मजबूत करने और जन प्रतिनिधियों के लिए नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने की आवश्यकता बताई।</p>
<p>चर्चा के दौरान ग्राम सभाओं की बढ़ती भूमिका पर भी विशेष जोर दिया गया। वक्ताओं ने कहा कि ग्राम सभाएं पारदर्शिता, जवाबदेही और नागरिकों की भागीदारी सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इन संस्थाओं को मजबूत करना &ldquo;ग्राम स्वराज&rdquo; के लक्ष्य और 2047 तक विकसित भारत के विजन को साकार करने के लिए अत्यंत आवश्यक है।</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ अग्रसरी नीति समीक्षा में पंचायतों की भूमिका पर चर्चा, विशेषज्ञों ने कहा जनभागीदारी से ही मजबूत होंगे पंचायत सुधार ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[फसलों पर मौसम की मार के बाद 72 घंटे अहम: जानिए कैसे दें फसल नुकसान की सूचना]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/72-hours-are-crucial-after-the-weather-hits-crops-know-how-to-get-compensation-for-crop-loss.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 23 Mar 2026 13:58:18 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/72-hours-are-crucial-after-the-weather-hits-crops-know-how-to-get-compensation-for-crop-loss.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p data-start="120" data-end="585">पिछले एक सप्ताह के दौरान हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश सहित देश के कई राज्यों में बेमौसम बारिश, आंधी और ओलावृष्टि से रबी की तैयार फसलों को नुकसान पहुंचा है। किसानों की मेहनत पर आपदा की मार के बाद राहत और मुआवजे का इंतजार शुरू हो गया है। जिन किसानों की फसलों का प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत बीमा हुआ है, उन्हें फसल नुकसान पर बीमा क्लेम मिलता है, बशर्ते समय पर फसल नुकसान की सूचना बीमा कंपनी, कृषि विभाग या संबंधित बैंक शाखा को दी जाए।</p>
<p data-start="587" data-end="821">केंद्रीय कृषि मंत्री<strong> शिवराज सिंह चौहान</strong> का कहना है कि <span>हमने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) के सभी नियमों में संशोधन किया और यह तय किया कि अगर एक भी किसान का नुकसान होता है, तो बीमा कंपनी को उस नुकसान का मुआवजा देना होगा। राज्यों से तुरंत संपर्क कर नुकसान का आकलन कराया जा रहा है। SDRF के तहत राज्य सरकारें राहत दे रही हैं, वहीं फसल बीमा योजना के अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वैज्ञानिक तरीके से सर्वे कर किसानों को राहत उपलब्ध कराई जाए।</span></p>
<p data-start="823" data-end="961">प्राकृतिक आपदाओं जैसे बेमौसम बारिश, ओलावृष्टि या सूखे से होने वाले फसल नुकसान के लिए मुख्य रूप से दो तरीकों से सहायता प्रदान की जाती है:</p>
<p data-start="963" data-end="1307"><strong data-start="963" data-end="1005">1. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY)</strong><br data-start="1005" data-end="1008" />यह योजना उन किसानों के लिए है जिन्होंने अपनी फसल का बीमा कराया है। फसल कटाई के बाद अधिकतम 14 दिनों तक खेत में रखी फसल यदि असामयिक वर्षा या प्राकृतिक आपदाओं के कारण खराब होती है, तो उसे बीमा कवरेज में शामिल किया जाता है। इससे प्रभावित किसानों को व्यक्तिगत आधार पर भी नुकसान की भरपाई का प्रावधान है।</p>
<p data-start="1309" data-end="1598">इसके लिए किसानों को फसल नुकसान की सूचना 72 घंटे के भीतर देना अनिवार्य है। यह सूचना कृषि रक्षक पोर्टल <strong><a data-start="1410" data-end="1435" rel="noopener" target="_new" class="decorated-link" href="https://pmfby.gov.in/krph">https://pmfby.gov.in/krph,</a>&nbsp;&lsquo;क्रॉप इंश्योरेंस ऐप&rsquo;</strong> (Crop Insurance App) या हेल्पलाइन नंबर<strong> 14447</strong> के माध्यम से दी जा सकती है। किसान व्हाट्सऐप चैटबॉट नंबर <strong>7065514447</strong> पर भी संदेश भेज सकते हैं।</p>
<p data-start="1600" data-end="1727">इसके अलावा, किसान संबंधित बीमा कंपनी, नजदीकी कृषि कार्यालय या बैंक शाखा के माध्यम से जानकारी दे सकते हैं।</p>
<p data-start="2108" data-end="2245"><strong data-start="2108" data-end="2141">2. राज्य आपदा राहत कोष (SDRF)</strong><br data-start="2141" data-end="2144" />जिन किसानों ने बीमा नहीं कराया है, उन्हें राज्य सरकारें अपने नियमों के अनुसार राहत प्रदान करती हैं।</p>
<ul data-start="2247" data-end="2469">
<li data-section-id="k75vk9" data-start="2247" data-end="2341"><strong data-start="2249" data-end="2268">न्यूनतम नुकसान:</strong> आमतौर पर 33% से अधिक नुकसान होने पर ही किसान सहायता के पात्र होते हैं।</li>
<li data-section-id="1w5hlp1" data-start="2342" data-end="2469"><strong data-start="2344" data-end="2358">सर्वेक्षण:</strong> नुकसान का आकलन करने के लिए संबंधित जिले के अधिकारी (राजस्व विभाग/कृषि विभाग) गिरदावरी या सर्वेक्षण करते हैं।</li>
</ul>
<p>उपरोक्त दोनों ही स्थितियों में किसानों को फसल नुकसान होते ही इसकी जानकारी बीमा कंपनी और कृषि विभाग के माध्यम में जरूर दर्ज करानी चाहिए। साथ ही खराब फसलों की तस्वीरें व वीडियों और उस दिन मौसम में आए बदलाव की जानकारी भी रखनी चाहिए।&nbsp;</p>
<p>हाल की बारिश और ओलावृष्टि के बाद&nbsp;विभिन्न राज्य सरकारों के कृषि विभागों ने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वे मौके पर पहुंचकर फसल खराबे का निरीक्षण करें और प्रभावित किसानों को त्वरित राहत दिलाने में सहयोग करें। सरकार ने&nbsp;फसल बीमा कंपनियों को भी निर्देश दिया गया है कि प्राप्त सूचनाओं पर तत्काल कार्रवाई करते हुए फील्ड सर्वे शुरू किया जाए, ताकि नुकसान का सही आकलन कर शीघ्र बीमा क्लेम का भुगतान सुनिश्चित किया जा सके।</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x500_69c108cac1a5b.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ फसलों पर मौसम की मार के बाद 72 घंटे अहम: जानिए कैसे दें फसल नुकसान की सूचना ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x500_69c108cac1a5b.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[किसानों पर ईरान युद्ध का असर, कीटनाशक होंगे महंगे, अप्रैल से 25 से 30 फीसदी तक दाम बढ़ने के आसार]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/iran-war-hits-farmers-pesticides-could-become-25–30-percent-more-expensive-from-april.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 22 Mar 2026 19:31:25 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/iran-war-hits-farmers-pesticides-could-become-25–30-percent-more-expensive-from-april.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p dir="ltr">अमेरिका और इजरायल के साथ ईरान के युद्ध का असर अब व्यापक होता जा रहा है। इस तनाव के कारण कीटनाशकों (पेस्टीसाइड्स) की कीमतों में 25 से 30 फीसदी की बढ़ोतरी होना लगभग तय है। चूंकि खरीफ सीजन में कीटनाशकों की खपत अधिक होती है, इसलिए इस मोर्चे पर किसानों की लागत बढ़ना निश्चित है। एग्रोकेमिकल कंपनियों का कहना है कि लागत में वृद्धि के कारण उन्हें दाम बढ़ाने पड़ेंगे और अब नया उत्पादन बढ़ी हुई कीमतों के साथ ही बाजार में आएगा। कीमतों में यह उछाल अप्रैल से दिखना शुरू हो जाएगा। <span style="font-weight: 400;">कीटनाशकों की घरेलू उपलब्धता की समस्या के साथ इनका निर्यात भी प्रभावित होने की आशंका है।</span></p>
<p dir="ltr">​एक बड़ी एग्रोकेमिकल कंपनी के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर (COO) ने <b>'रूरल वॉयस'</b> को बताया कि कच्चे तेल की कीमतों में इजाफे के कारण रिफाइनरियों ने पेट्रोकेमिकल उत्पादों के दाम 25 से 30 फीसदी तक बढ़ा दिए हैं। साथ ही, पैकेजिंग उत्पादों की कीमतों में भी 15 से 30 फीसदी की वृद्धि हुई है। अधिकारी के अनुसार, सप्लायरों ने पहले से तय अनुबंधों (कॉन्ट्रैक्ट्स) की कीमतें भी बढ़ा दी हैं। इसके अलावा, रिफाइनरियों ने सल्फर के दामों में भारी बढ़ोतरी की है। कंपनियां कीटनाशकों के अलावा 'प्लांट ग्रोथ स्टिमुलस' भी बनाती हैं, जिसके कच्चे माल के रूप में सल्फर का बड़ा योगदान होता है।</p>
<p dir="ltr">​कीटनाशकों के उत्पादन में उपयोग होने वाले अधिकांश रसायन चीन से आते हैं और चीन ने न केवल कीमतों में भारी बढ़ोतरी की है, बल्कि निर्यात में भी कटौती कर दी है। इसी सप्ताह चीन में केमिकल और फर्टिलाइजर पर एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन हो रहा है, जिसमें दुनिया की बड़ी उर्वरक और एग्रोकेमिकल कंपनियों के प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं। इस बैठक के बाद स्थिति और स्पष्ट होने की उम्मीद है।</p>
<p dir="ltr">​एक अन्य वरिष्ठ पदाधिकारी ने बताया कि कच्चे तेल की कीमतों में उछाल से कीटनाशकों में इस्तेमाल होने वाले <b>सॉल्वेंट और इमल्सीफायर</b> महंगे हो गए हैं, जो एग्रोकेमिकल्स का मुख्य हिस्सा होते हैं। वहीं, डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होकर 93 रुपये के स्तर को पार कर गया है। युद्ध के मौजूदा हालात देखते हुए इसके और टूटने की आशंका है, जिससे कच्चे माल की आयात लागत बढ़ गई है। साथ ही, शिपिंग चार्जेस और इंश्योरेंस प्रीमियम बढ़ने से भी आयात महंगा हुआ है। ऐसे में कंपनियों के पास दाम बढ़ाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। यदि युद्ध लंबा खिंचता है, तो भविष्य में आपूर्ति (सप्लाई चेन) भी एक बड़ी चुनौती बन जाएगी।</p>
<p dir="ltr">​हाल ही में कीटनाशक निर्माताओं की संस्था <b>'क्रॉपलाइफ इंडिया'</b> ने भी एक बयान जारी कर कीमतों में 25 फीसदी तक की बढ़ोतरी की आशंका जताई है।</p>
<p dir="ltr"><span style="font-weight: 400;">मध्य पूर्व की समस्या भारत से एग्रोकेमिकल निर्यात को भी प्रभावित कर रही है। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एग्रोकेमिकल निर्यातक है। देश से हर साल इनका 5.5 अरब डॉलर से अधिक का निर्यात होता है।</span></p>
<p dir="ltr">​पश्चिम एशिया के इस युद्ध की आंच अब भारतीय किसानों के करीब पहुंच गई है। उर्वरकों (फर्टिलाइजर) के मोर्चे पर भी मुश्किलें बढ़ सकती हैं, हालांकि वहां सरकार सब्सिडी बढ़ाकर किसानों को राहत दे सकती है। लेकिन कीटनाशकों की कीमतों पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है।</p>
<p dir="ltr">हाल के वर्षों में फसल उत्पादन की कुल लागत में कीटनाशकों के खर्च का हिस्सा बढ़ा है। पिछले एक साल में किसानों को उनकी उपज का उचित दाम नहीं मिला है, ऐसे में बढ़ती लागत का यह नया बोझ उनकी मुश्किलें और बढ़ा देगा।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ किसानों पर ईरान युद्ध का असर, कीटनाशक होंगे महंगे, अप्रैल से 25 से 30 फीसदी तक दाम बढ़ने के आसार ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[WTO MC14: गहराते मतभेदों के कारण प्रमुख व्यापारिक मुद्दों पर गतिरोध बने रहने के आसार]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/wto-mc14-set-to-expose-deep-divides-as-key-trade-issues-head-for-stalemate.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 21 Mar 2026 17:06:44 GMT]]></pubDate>
				
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        <description><![CDATA[ <p>विश्व व्यापार संगठन (WTO) के 166 सदस्य देशों के व्यापार मंत्री 26 से 29 मार्च तक कैमरून के याउंदे (Yaound&eacute;) में 14वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (MC14) में भाग लेंगे। यह बैठक ऐसे समय हो रही है जब वैश्विक व्यापार 35 ट्रिलियन डॉलर के पार पहुंच चुका है, लेकिन बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली गंभीर दबाव का सामना कर रही है। कृषि सब्सिडी, खाद्य सुरक्षा के लिए सार्वजनिक भंडारण, फिशरीज सब्सिडी, डिजिटल व्यापार नियम और विवाद निपटान सुधार जैसे अहम मुद्दों पर विकसित और विकासशील देशों के बीच गहरे मतभेद बने हुए हैं।</p>
<p>थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनीशिएटिव (GTRI) और रिसर्च एंड इन्फॉर्मेशन सिस्टम फॉर डेवलपिंग कंट्रीज (RIS) ने अपनी रिपोर्टों में कहा है कि प्रमुख वार्ता मसौदों पर सहमति के अभाव और दोनों पक्षों के अड़े रहने के कारण बड़े नतीजों की उम्मीद कम है। इसके बजाय, MC14 को एक &ldquo;होल्डिंग&rdquo; मंत्रिस्तरीय सम्मेलन के रूप में देखा जा रहा है, जहां ई-कॉमर्स मोरेटोरियम और खाद्य भंडारण पर पीस क्लॉज जैसे मौजूदा प्रावधानों को आगे बढ़ाने पर ध्यान रहेगा, जबकि विवादित मुद्दों को भविष्य के लिए टाल दिया जाएगा।&nbsp;</p>
<p><strong>कृषि वार्ता: प्रमुख मुद्दों पर लगातार गतिरोध</strong></p>
<p>डब्ल्यूटीओ वार्ताओं में कृषि अब भी सबसे विवादास्पद क्षेत्र बना हुआ है, जो खाद्य सुरक्षा की जरूरतों और व्यापार उदारीकरण के लक्ष्यों के बीच गहरे टकराव को दर्शाता है। चर्चाएं मुख्य रूप से सार्वजनिक भंडारण (PSH), घरेलू समर्थन, बाजार पहुंच, निर्यात प्रतिबंध, कपास और विशेष सुरक्षा तंत्र (SSM) जैसे प्रमुख मुद्दों पर केंद्रित हैं।</p>
<p>विकसित देश सभी मुद्दों को एक साथ शामिल करते हुए व्यापक वार्ता के दृष्टिकोण का समर्थन करते हैं। इसके विपरीत, भारत सहित विकासशील देश सार्वजनिक भंडारण और विशेष सुरक्षा तंत्र जैसे अनिवार्य मुद्दों को प्राथमिकता देने की मांग कर रहे हैं, क्योंकि ये सीधे खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका से जुड़े हैं।</p>
<p>सब्सिडी नियमों में संरचनात्मक असंतुलन एक बड़ा विवाद का कारण है। पहले मिले अधिकारों के कारण विकसित देशों के पास अधिक नीतिगत लचीलापन है, जबकि विकासशील देशों पर कड़े प्रतिबंध लागू हैं। इस असमानता को लंबे समय से अन्यायपूर्ण माना जाता रहा है। विभिन्न पक्षों के बीच मतभेदों के कारण, एमसी14 में कृषि वार्ताओं से ठोस समझौतों के बजाय केवल प्रक्रियात्मक परिणाम (जैसे प्रतिबद्धताओं की पुनः पुष्टि करना) ही निकलने की संभावना है।</p>
<p><strong>सार्वजनिक भंडारण: भारत के लिए प्रमुख मुद्दा</strong></p>
<p>भारत का सार्वजनिक भंडारण कार्यक्रम WTO की चर्चाओं के केंद्र में रहने की संभावना है। इस प्रणाली के तहत सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खाद्यान्न की खरीद करती है, बफर स्टॉक बनाती है और करोड़ों लोगों को सब्सिडी वाले खाद्यान्न का वितरण करती है।</p>
<p>हालांकि, WTO के नियम इस तरह के समर्थन को व्यापार को विकृत करने वाला मानते हैं और इसकी गणना 1986-88 की पुरानी संदर्भ कीमतों के आधार पर करते हैं। इससे सब्सिडी का आकलन बढ़ा-चढ़ाकर होता है और भारत जैसे देशों को, वास्तविक समर्थन कम होने के बावजूद, सीमा उल्लंघन के जोखिम का सामना करना पड़ता है।</p>
<p>भारत लगातार एक स्थायी समाधान की मांग कर रहा है, जिसमें संदर्भ मूल्य प्रणाली को अपडेट करना और खाद्य सुरक्षा कार्यक्रमों के लिए नीति में लचीलापन सुनिश्चित करना शामिल है। भारत का यह भी कहना है कि विकसित देशों के पास लगभग 95 प्रतिशत सब्सिडी का अधिकार है।</p>
<p>दूसरी ओर अमेरिका, यूरोपीय संघ और केर्न्स जैसे उद्योग समूह व्यापक छूट का विरोध करते हैं और तर्क देते हैं कि इससे व्यापार में विकृति आ सकती है। सहमति के अभाव में 2013 का अंतरिम &ldquo;शांति प्रावधान&rdquo; (पीस क्लॉज) अस्थायी सुरक्षा के रूप में जारी रहने की संभावना है।</p>
<p>मूल विवाद WTO के कृषि समझौते (Agreement on Agriculture) के तहत सब्सिडी नियमों में निहित है, जहां प्रशासनिक कीमतों पर खरीद को एंबर बॉक्स के अंतर्गत रखा जाता है। पुराने बाह्य संदर्भ मूल्य (ERP) इस समस्या को और जटिल बना देते हैं।</p>
<p>जी-33 और अफ्रीकी समूह के नेतृत्व में विकासशील देश मूल्य बेंचमार्क को अपडेट करने, कवरेज बढ़ाने और कानूनी स्पष्टता सुनिश्चित करने जैसे सुधारों की मांग कर रहे हैं। वहीं, विकसित देश पारदर्शिता और व्यापार विकृति के मुद्दों का हवाला देते हुए सतर्क रुख अपनाए हुए हैं। कोविड-19 महामारी और जलवायु संकट जैसी वैश्विक परिस्थितियों ने पीएसएच की महत्ता को और मजबूत किया है, लेकिन गहरे मतभेदों के कारण बातचीत अभी ठप पड़ी हुई है।</p>
<p><strong>फिशरीज सब्सिडी: सस्टेनेबिलिटी और आजीविका के बीच संतुलन</strong></p>
<p>फिशरीज क्षेत्र से जुड़ी वार्ताएं वर्ष 2022 में अवैध, अनियमित और गैर-रिपोर्टेड (IUU) मछली पकड़ने पर हुए समझौते के बाद एक महत्वपूर्ण चरण में प्रवेश कर चुकी हैं। वर्तमान में ध्यान उन सब्सिडी पर है जो अत्यधिक क्षमता और अधिक मछली पकड़ने (ओवरफिशिंग) को बढ़ावा देती हैं।</p>
<p>वैश्विक स्तर पर मत्स्य क्षेत्र 10 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार प्रदान करता है, जिनमें अधिकांश विकासशील देशों के छोटे पैमाने के मछुआरे शामिल हैं। हालांकि, सब्सिडी का वितरण अत्यंत असमान है और इसका बहुत कम हिस्सा इन मछुआरों तक पहुंच पाता है।</p>
<p>भारत का तर्क है कि उसकी सब्सिडी छोटे और पारंपरिक मछुआरों के समर्थन के लिए हैं और इन्हें औद्योगिक स्तर की सब्सिडी के बराबर नहीं माना जाना चाहिए। विकसित देश पर्यावरणीय क्षति को रोकने के लिए कड़े नियमों की वकालत कर रहे हैं। दोनों पक्षों के बीच गहरे मतभेदों को देखते हुए, MC14 में व्यापक फिशरीज सब्सिडी पर अंतिम समझौता होने की संभावना कम है।</p>
<p><strong>ई-कॉमर्स मोरेटोरियम: डिजिटल विभाजन को लेकर चिंता बढ़ी</strong></p>
<p>डब्ल्यूटीओ का लंबे समय से लागू इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन पर सीमा शुल्क न लगाने का मोरेटोरियम अब एक बड़ा विवादास्पद मुद्दा बन गया है। विकसित देश डिजिटल व्यापार को बढ़ावा देने के लिए इसे स्थायी बनाना चाहते हैं, जबकि विकासशील देश इसका विरोध कर रहे हैं।</p>
<p>भारत ने राजस्व में नुकसान, नीतिगत सीमाओं और घरेलू डिजिटल उद्योगों पर इसके प्रभाव को लेकर चिंता जताई है। जैसे-जैसे वैश्विक व्यापार तेजी से डिजिटल प्लेटफॉर्म की ओर बढ़ रहा है, शुल्क लगाने में असमर्थता डिजिटल विभाजन को और बढ़ा सकती है। एमसी14 में इस मुद्दे पर स्थायी समाधान की संभावना कम है और सबसे संभावित परिणाम मोरेटोरियम का अस्थायी विस्तार ही माना जा रहा है।</p>
<p><strong>विवाद निपटान प्रणाली में व्यवधान जारी</strong></p>
<p>डब्ल्यूटीओ की विवाद निपटान प्रणाली, जो कभी इसकी सबसे मजबूत आधारशिला मानी जाती थी, अब गहरे संकट में है। 2019 से अपीलीय निकाय (Appellate Body) नियुक्तियां न होने के कारण निष्क्रिय बना हुआ है। इसमें अवरोध मुख्य रूप से अमेरिका की आपत्तियों के कारण है। इससे व्यापार नियमों के प्रवर्तन पर असर पड़ा है औरअंतिम तथा बाध्यकारी फैसले नहीं हो पाते। हालांकि MPIA जैसे अंतरिम उपाय मौजूद हैं, लेकिन उन्हें सभी देशों की स्वीकृति प्राप्त नहीं है।</p>
<p>भारत एक पूर्णतः कार्यशील दो-स्तरीय विवाद निपटान प्रणाली की बहाली का समर्थन करता है। वहीं अमेरिका न्यायिक हस्तक्षेप को सीमित करने के लिए सुधारों पर जोर दे रहा है। सहमति के अभाव में MC14 से किसी बड़े समाधान की उम्मीद नहीं है, जिससे यह प्रणाली फिलहाल कमजोर बनी हुई है।</p>
<p><strong>डब्ल्यूटीओ सुधार: लचीलापन बनाए रखने पर टकराव</strong></p>
<p>संस्थागत सुधार भी डब्ल्यूटीओ में असहमति का एक प्रमुख क्षेत्र बना हुआ है। विकसित देश निर्णय लेने की अधिक लचीली व्यवस्था की वकालत करते हैं, जिसमें बहुपक्षीय (plurilateral) समझौतों को शामिल किया जा सकता है, ताकि वार्ताओं में गतिरोध को दूर किया जा सके।</p>
<p>भारत और कई विकासशील देश सहमति-आधारित प्रणाली का मजबूती से समर्थन करते हैं। उनका तर्क है कि यह व्यवस्था निष्पक्षता और सभी सदस्यों की समान भागीदारी सुनिश्चित करती है। वे यह भी चेतावनी देते हैं कि सहमति से हटने पर छोटे देशों के हित प्रभावित हो सकते हैं और विकास संबंधी प्राथमिकताएं कमजोर पड़ सकती हैं।</p>
<p>सुधार संबंधी चर्चाओं में पारदर्शिता बढ़ाने, भागीदारी को मजबूत करने और डिजिटल व्यापार व सतत विकास जैसे उभरते मुद्दों को शामिल करने पर भी जोर दिया जा रहा है। हालांकि, गहरे मतभेदों के कारण इस दिशा में ठोस प्रगति की संभावना कम दिख रही है।</p>
<p><strong>निष्कर्ष: ठोस फैसले नहीं, मतभेद सामने आने के आसार</strong></p>
<p>कृषि, मत्स्य, डिजिटल व्यापार, विवाद निपटान और संस्थागत सुधार जैसे सभी प्रमुख मुद्दों पर एमसी14 से ठोस निर्णयों की बजाय गहरे मतभेद ही सामने आने की संभावना है। भारत के लिए प्राथमिकता नीति-निर्माण की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने, खाद्य सुरक्षा कार्यक्रमों का बचाव करने और विकासशील देशों के साथ गठजोड़ मजबूत करने पर रहेगी। व्यापक स्तर पर यह सम्मेलन एक बड़ी चुनौती को रेखांकित करता है- तेजी से बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था के अनुरूप बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली को ढालना।</p>
<p>वैश्विक व्यापार 35 ट्रिलियन डॉलर के पार पहुंचने के बावजूद WTO की प्रासंगिकता और विश्वसनीयता की यह एक महत्वपूर्ण परीक्षा है, जहां एमसी14 में वर्षों से लंबित विवादों के समाधान के बजाय मौजूदा व्यवस्था को आगे बढ़ाने की संभावना ही अधिक है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ WTO MC14: गहराते मतभेदों के कारण प्रमुख व्यापारिक मुद्दों पर गतिरोध बने रहने के आसार ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[आईसीएआर&amp;#45;आईवीआरआई ने उन्नत प्रजनन तकनीक से साहीवाल बछिया उत्पादन में हासिल की बड़ी सफलता]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/icar-ivri-achieves-breakthrough-in-producing-sahiwal-calves-using-advanced-reproductive-technology.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 21 Mar 2026 13:41:29 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/icar-ivri-achieves-breakthrough-in-producing-sahiwal-calves-using-advanced-reproductive-technology.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>देश के पशुधन क्षेत्र में एक बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि हासिल करते हुए भारतीय पशु अनुसंधान संस्थान (आईसीएआर-आईवीआरआई) ने उन्नत सहायक प्रजनन तकनीक (ART) का उपयोग कर स्वदेशी साहीवाल नस्ल की बछियों का उत्पादन किया है। संस्थान को अल्ट्रासाउंड-निर्देशित ओवम पिक-अप, इन विट्रो फर्टिलाइजेशन और एम्ब्रियो ट्रांसफर (OPU-IVF-ET) तकनीक के माध्यम से यह पहली सफलता है। इससे स्वदेशी नस्लों के तेज आनुवंशिक सुधार का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।</p>
<p>यह उपलब्धि वर्ष 2022-23 में शुरू किए गए उस विशेष कार्यक्रम का परिणाम है, जिसका उद्देश्य देश की प्रमुख दुग्ध नस्लों- साहीवाल, थारपारकर और मुर्रा भैंस की आनुवंशिक क्षमता को मजबूत करना था। वैज्ञानिकों ने खेत और फार्म दोनों परिस्थितियों में OPU-IVF-ET तकनीक को मानकीकृत करने पर काम किया।</p>
<p>वैज्ञानिकों के सतत प्रयासों का परिणाम 28 फरवरी 2026 से शुरू हुए मात्र पांच दिनों में देखने को मिला, जब OPU-IVF-ET तकनीक से पांच स्वस्थ साहीवाल बछियों का जन्म हुआ। ये बछड़े उच्च गुणवत्ता वाले जर्मप्लाज्म से तैयार किए गए। इसके लिए 12 लीटर प्रतिदिन से अधिक दूध देने वाली उच्च उत्पादक साहीवाल गाय से ओसाइट लिए गए, जबकि निषेचन के लिए ऐसे सांड के वीर्य का उपयोग किया गया जिसकी मातृ वंशावली का दुग्ध उत्पादन लगभग 3,320 किलोग्राम रहा है।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x_69be525649698.jpg" alt="" /></p>
<p>अनुसंधान के दौरान वैज्ञानिकों ने बिना हार्मोनल स्टिमुलेशन के भी सफलतापूर्वक ओसाइट प्राप्त किए। औसतन थारपारकर में 14.5, साहीवाल में 13.14 और मुर्रा भैंस में 4.5-5.5 ओसाइट प्राप्त हुए। वहीं भ्रूण विकास की सफलता दर भी उल्लेखनीय रही, जिसमें मवेशियों में 47 प्रतिशत से अधिक और भैंसों में 42 प्रतिशत से अधिक ब्लास्टोसिस्ट उत्पादन दर दर्ज की गई, जो वैश्विक स्तर की प्रयोगशालाओं के बराबर है।</p>
<p>इस उपलब्धि की सराहना करते हुए डॉ. राघवेंद्र भट्ट, उप महानिदेशक (पशु विज्ञान), आईसीएआर एवं निदेशक, आईसीएआर-आईवीआरआई ने कहा कि यह सफलता सहायक प्रजनन तकनीक के क्षेत्र में नए आयाम स्थापित करेगी और भविष्य में और भी महत्वपूर्ण उपलब्धियों का मार्ग प्रशस्त करेगी। यह शोध कार्य डॉ. बृजेश कुमार के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की टीम द्वारा किया गया, जिसे डॉ. एस.के. सिंह का मार्गदर्शन प्राप्त था।&nbsp;</p>
<p>संस्थान के अनुसार, यह उपलब्धि भविष्य में बड़े पैमाने पर लागू की जा सकने वाली तकनीक का मॉडल है। आईसीएआर-आईवीआरआई अब इस तकनीक के विस्तार के माध्यम से उत्कृष्ट स्वदेशी पशुधन के उत्पादन को तेज़ करने की दिशा में कार्य करेगा, जिससे आनुवंशिक सुधार कार्यक्रमों को मजबूती मिलेगी और देशी जर्मप्लाज्म का संरक्षण होगा।</p>
<p>संस्थान क्षमता निर्माण पर भी विशेष ध्यान दे रहा है। OPU-IVF-ET तकनीक पर प्रशिक्षण कार्यक्रमों के जरिए कुशल मानव संसाधन तैयार किए जा रहे हैं, जिससे पशुधन क्षेत्र में उद्यमिता और स्टार्टअप को बढ़ावा मिल सके।&nbsp;</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ आईसीएआर-आईवीआरआई ने उन्नत प्रजनन तकनीक से साहीवाल बछिया उत्पादन में हासिल की बड़ी सफलता ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[ईरान युद्ध से वैश्विक कृषि आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव, उर्वरक, कीटनाशक और ईंधन महंगे होने से खाद्य महंगाई बढ़ने का खतरा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/middle-east-conflict-fertiliser-prices-food-inflation-2026.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 21 Mar 2026 11:19:47 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/middle-east-conflict-fertiliser-prices-food-inflation-2026.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>ईरान और इजरायल-अमेरिका युद्ध (Iran War) ने वैश्विक कृषि आपूर्ति श्रृंखला के लिए गंभीर चिंता उत्पन्न कर दी है। कच्चा तेल और गैस के साथ उर्वरकों के दाम भी तेजी से बढ़ रहे हैं। यदि यह संकट लंबा खिंचता है तो इसका असर खाद्य उत्पादन, कीमतों और वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर व्यापक रूप से पड़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि कीटनाशक उत्पादन की लागत 20 से 25 प्रतिशत तक बढ़ सकती है।</p>
<p>क्रॉप लाइफ इंडिया के चेयरमैन और क्रिस्टल क्रॉप प्रोटेक्शन लि. के एक्जीक्यूटिव चेयरमैन और एमडी अंकुर अग्रवाल ने बताया कि युद्ध के कारण जो शिपिंग रूट बाधित हुआ है, उससे कीटनाशकों के उत्पादन की लागत 20 से 25 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। फलस्वरूप किसानों की लागत भी बढ़ेगी। उन्होंने कहा कि इस व्यवधान के कारण महत्वपूर्ण कृषि सीजन में कीटनाशकों की कमी भी हो सकती है। इसका असर उत्पादकता और गुणवत्ता पर होगा।</p>
<p>रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है। आईजीसी की गुरुवार को जारी रिपोर्ट के मुताबिक, यह दुनिया के लगभग 25% तेल और 20% एलएनजी निर्यात का प्रमुख मार्ग है। इसके अलावा, यह क्षेत्र उर्वरक उत्पादन और व्यापार का भी बड़ा केंद्र है। यहां से वैश्विक यूरिया का करीब 35% और अमोनिया का लगभग 30% निर्यात होता है। मौजूदा हालात में शिपिंग बाधाएं और कुछ उत्पादन इकाइयों के बंद होने से उर्वरक कीमतों में तेज वृद्धि देखी जा रही है।</p>
<p>संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) और अन्य एजेंसियों के अनुसार, यह जलडमरूमध्य वैश्विक स्तर पर व्यापार होने वाले लगभग 30% उर्वरकों के परिवहन के लिए भी अहम है। कुछ आकलनों में युद्ध के कारण 65% से 70% तक यूरिया आपूर्ति पर खतरे की आशंका जताई गई है। उर्वरकों की कीमतें पहले ही 30% से 40% तक बढ़ चुकी हैं, जिससे खेती की लागत में बड़ा इजाफा हो रहा है।</p>
<p>हालांकि उत्तरी गोलार्ध के अधिकांश अनाज और तिलहन उत्पादक देशों ने अगली बुवाई के लिए पर्याप्त उर्वरक भंडारण रखा है, लेकिन एशिया और अफ्रीका के अनेक देश खाड़ी क्षेत्र पर निर्भर हैं। यदि संकट लंबा चला, तो इन क्षेत्रों में बुवाई के फैसलों पर असर पड़ सकता है। उर्वरकों की कमी या ऊंची कीमतों के कारण किसानों को उर्वरक उपयोग घटाना पड़ सकता है, जिससे फसल उत्पादन और गुणवत्ता दोनों प्रभावित हो सकते हैं।</p>
<p>ऊर्जा कीमतों में भी तेज उछाल आया है। वैश्विक तेल और गैस की कीमतें युद्ध से पहले की तुलना में लगभग 50% बढ़ चुकी हैं। इसका सीधा असर कृषि उत्पादन, परिवहन और आपूर्ति लागत पर पड़ रहा है। नाइट्रोजन-आधारित उर्वरकों पर निर्भर गेहूं और मक्का जैसी प्रमुख फसलें सबसे पहले प्रभावित हो सकती हैं, जिससे खाद्य श्रृंखला पर व्यापक असर पड़ेगा। पशु चारा महंगा होने से डेयरी और मांस उत्पादों की कीमतों में भी वृद्धि की संभावना है।</p>
<p>यह संकट खाद्य सुरक्षा की क्षेत्रीय कमजोरियों को भी उजागर कर रहा है। फारस की खाड़ी क्षेत्र में हर महीने औसतन 20 लाख टन अनाज, तिलहन और संबंधित उत्पादों की आपूर्ति होती है। हालांकि यह वैश्विक व्यापार का केवल 3% है, लेकिन खाड़ी देशों की आयात पर निर्भरता बहुत अधिक है। होर्मुज मार्ग के बाधित होने से वैकल्पिक आपूर्ति मार्ग सीमित हो गए हैं, हालांकि कुछ हद तक रेड सी या कैस्पियन सागर के रास्ते पुनः मार्ग निर्धारण संभव है। स्थानीय भंडार अल्पकालिक राहत दे सकते हैं, लेकिन लंबे समय तक व्यवधान रहने पर खाद्य आपूर्ति संकट गहरा सकता है।</p>
<p>विकासशील देशों पर इसका असर अधिक गंभीर हो सकता है, जहां खुदरा महंगाई में खाद्य और ईंधन की हिस्सेदारी 30% से 50% तक होती है, जबकि विकसित देशों में यह 25% से कम रहती है। इससे इन अर्थव्यवस्थाओं में बाहरी झटकों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ जाती है। केन्या में उर्वरक कीमतें पहले ही करीब 40% तक बढ़ चुकी हैं। इसके विपरीत, लैटिन अमेरिका के कुछ देश अपेक्षाकृत कम प्रभावित हैं, हालांकि वहां भी आपूर्ति बाधाओं की आशंका बनी हुई है।&nbsp;</p>
<p>विशेषज्ञों का मानना है कि 2022 के यूक्रेन संकट के विपरीत, इस बार सीधा असर अनाज निर्यात पर नहीं बल्कि उर्वरकों और ऊर्जा लागत के माध्यम से उत्पादन पर पड़ेगा। इससे खाद्य महंगाई की दूसरी लहर देखने को मिल सकती है। हाल के वर्षों में वैश्विक खाद्य महंगाई में कमी आई थी और जनवरी में यह 2017 के बाद के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई थी, लेकिन मौजूदा संकट इस परिस्थिति को उलट सकता है।&nbsp;</p>
<p>यदि यह संकट कुछ सप्ताह से अधिक समय तक जारी रहता है, तो वैश्विक स्तर पर बुवाई, उत्पादन और खाद्य आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ सकता है, जिससे खाद्य सुरक्षा और महंगाई दोनों पर दीर्घकालिक दबाव बनने की आशंका है।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/01/image_750x500_695fccaf95ed1.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ ईरान युद्ध से वैश्विक कृषि आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव, उर्वरक, कीटनाशक और ईंधन महंगे होने से खाद्य महंगाई बढ़ने का खतरा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[जलगांव में 200 करोड़ रुपये के निवेश से केले का क्लस्टर विकसित करने को सरकार की मंजूरी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/states/jalgaon-banana-cluster-project-shivraj-singh-chouhan-farmers-price-compensation.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 20 Mar 2026 15:42:41 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/states/jalgaon-banana-cluster-project-shivraj-singh-chouhan-farmers-price-compensation.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बताया है कि जलगांव में लंबे समय से प्रस्तावित केले का क्लस्टर विकसित करने की परियोजना को स्वीकृति मिल चुकी है। इसे 200 करोड़ रुपये की लागत से विकसित किया जा रहा है। इस क्लस्टर के अंतर्गत गुड एग्रीकल्चर प्रैक्टिस, मैकेनाइजेशन, बायो-कंट्रोल, फ्रूट कवर तथा प्री-कूलिंग जैसी सुविधाएं विकसित की जाएंगी। साथ ही कोल्ड स्टोरेज, राइपनिंग चेंबर, रेफ्रिजरेटेड वैन, प्रोसेसिंग एवं निर्यात से जुड़ी अधोसंरचना भी तैयार की जाएगी। MIDH और एग्रीकल्चर इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड के तहत इन सुविधाओं के लिए सब्सिडी उपलब्ध कराई जाएगी जिससे किसानों को प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा।</p>
<p>केंद्रीय मंत्री ने किसानों को मिलने वाले कम दाम और शहरों में ऊंची कीमतों के बीच बड़े अंतर पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि कई बार किसानों को टमाटर जैसे उत्पाद बहुत कम कीमत पर बेचने पड़ते हैं जबकि शहरों में वही उत्पाद कई गुना अधिक मूल्य पर बिकता है। उन्होंने आश्वासन दिया कि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर इस मूल्य अंतर को कम करने के लिए प्रभावी तंत्र विकसित करेंगी ताकि किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिल सके।</p>
<p>उन्होंने यह भी कहा कि केला जैसी फसलें MSP पर खरीदकर लंबे समय तक रखी नहीं की जा सकती, इसलिए सरकार ऐसे वैकल्पिक मॉडल पर विचार कर रही है, जिसमें बाजार मूल्य अत्यधिक कम होने पर किसानों को लागत या निर्धारित मॉडल मूल्य और बाजार भाव के बीच का अंतर प्रदान किया जा सके। उन्होंने बताया कि इस प्रकार के प्रयोग मिर्च और आम जैसी फसलों में किए गए हैं और &lsquo;पीएम-आशा&rsquo; योजना के तहत भी नए मॉडल विकसित किए जा रहे हैं।</p>
<p>उन्होंने कहा कि किसानों से प्राप्त सुझावों और समस्याओं के समाधान के लिए एक व्यापक रोडमैप तैयार किया जाएगा और जलगांव के केले को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिलाने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए जाएंगे।&nbsp;</p>
<p>चौहान ने अत्यधिक रासायनिक खाद और कीटनाशकों के उपयोग से मिट्टी की बिगड़ती सेहत पर चिंता जताते हुए कहा कि इससे ऑर्गेनिक कार्बन की कमी हो रही है, मित्र कीट नष्ट हो रहे हैं और भूमि की उर्वरता घट रही है। उन्होंने किसानों से अपील की कि वे प्राकृतिक खेती को अपनाएं और शुरुआत छोटे स्तर पर प्रयोग के रूप में करें। उन्होंने विश्वास जताया कि सही तरीके से की गई प्राकृतिक खेती से उत्पादन में कमी नहीं आती, बल्कि भूमि की क्षमता और उत्पादकता बढ़ती है।</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x500_69bd1d456de90.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ जलगांव में 200 करोड़ रुपये के निवेश से केले का क्लस्टर विकसित करने को सरकार की मंजूरी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कई राज्यों में रबी की तैयार फसलों पर बारिश&amp;#45;आंधी व ओलावृष्टि का कहर, शिवराज ने की समीक्षा बैठक]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/rain-storm-and-hailstorm-wreak-havoc-on-ready-rabi-crops-in-many-states-how-will-losses-of-farmers-be-compensated.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 20 Mar 2026 15:08:45 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/rain-storm-and-hailstorm-wreak-havoc-on-ready-rabi-crops-in-many-states-how-will-losses-of-farmers-be-compensated.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>रबी सीजन की जिन फसलों को किसानों ने कई महीनों की मेहनत, लागत और लगन से तैयार किया है, वे अब असमय बारिश, तेज आंधी और ओलावृष्टि की मार झेल रही हैं। देश के कई राज्यों में अचानक बदले मौसम ने खेतों में खड़ी फसलों को भारी नुकसान पहुंचाया है। फसलों को हुए नुकसान की समीक्षा के लिए केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने शुक्रवार को उच्चस्तरीय बैठक की। बैठक में उन्होंने नुकसान का तुरंत सर्वेक्षण कराने और आवश्यक कार्यवाही के निर्देश दिए।</p>
<p>पश्चिमी विक्षोभ के सक्रिय होने से जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के ऊंचाई वाले इलाकों में बर्फबारी दर्ज की गई, जबकि हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश के कई हिस्सों में बारिश, तेज हवाओं और ओलावृष्टि से रबी फसलों को व्यापक क्षति हुई है।</p>
<p>इस समय सरसों की कटाई कई क्षेत्रों में शुरू हो चुकी है, वहीं गेहूं की फसल दाना भरने और पकने की अवस्था में है। ऐसे में तेज बारिश और ओलावृष्टि से बालियां झुकने, फसल गिरने, दानों के काले पड़ने और गुणवत्ता में गिरावट का खतरा बढ़ गया है। चना और मसूर जैसी दलहनी फसलें भी प्रभावित हुई हैं, जिससे उत्पादन में कमी की आशंका जताई जा रही है।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x_69bd167fa8ac8.jpg" alt="" style="display: block; margin-left: auto; margin-right: auto;" /></p>
<p>आईसीएआर के पूर्व डीडीजी (एनआरएम) <strong>डॉ. जे.एस. सामरा </strong>ने<strong> रूरल वायस</strong> को बताया कि कटाई के लिए तैयार सरसों और गेहूं की अगैती फसल को भारी बारिश और ओले पड़ने से भारी नुकसान पहुंचा है। खेतों में जलभराव होने से फसलें गिर गई हैं। इससे पैदावार की गुणवत्ता पर प्रतिकूल असर पड़ेगा और कटाई में देरी होगी।</p>
<p>हरियाणा के करनाल जिले के बुटाणा गांव के प्रगतिशील किसान <strong>नीरज चौधरी</strong> का कहना है कि सरसों और गेहूं की खड़ी फसल पर इतनी अधिक बारिश पड़ने से पैदावार में कम से कम 20 फीसदी का नुकसान होगा। किसानों के लिए यह बारिश आफत बनकर आई है।</p>
<p>किसानों का कहना है कि फरवरी के अंत और मार्च की शुरुआत में असामान्य गर्मी ने पहले ही फसलों को प्रभावित किया था, और अब बेमौसम बारिश ने उनकी मुसीबत बढ़ा दी है। विभिन्न राज्यों में किसानों ने सरकार से नुकसान का त्वरित सर्वे कर उचित मुआवजा देने की मांग की है।</p>
<p>अखिल भारतीय किसान सभा ने केंद्र और राज्य सरकारों पर निशाना साधते हुए किसानों के नुकसान की जानबूझकर कम रिपोर्टिंग और राहत उपायों को जारी करने में संवेदनहीनता का आरोप लगाया। किसान सभा ने केंद्र सरकार से सभी प्रभावित किसानों के लिए एक व्यापक राहत पैकेज घोषित करने और तत्काल मुआवजा जारी करने की मांग की है।</p>
<p><strong>शिवराज सिंह चौहान ने की समीक्षा बैठक</strong></p>
<p>असमय बारिश और ओलावृष्टि से कई राज्यों में फसलों को हुए नुकसान की समीक्षा के लिए केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने शुक्रवार को उच्चस्तरीय बैठक की। बैठक में उन्होंने फसल नुकसान का तुरंत सर्वेक्षण कराने और आवश्यक कार्यवाही के निर्देश दिए। राज्यों से तुरंत संपर्क कर नुकसान का आकलन कराया जा रहा है। कृषि मंत्री ने बताया कि SDRF के तहत राज्य सरकारें राहत दे रही हैं, वहीं फसल बीमा योजना के अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वैज्ञानिक तरीके से सर्वे कर किसानों को राहत उपलब्ध कराई जाए।&nbsp;</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x_69bd227d9a944.jpg" alt="" /></p>
<p>कृषि मंत्री ने कहा, हमने आगामी खरीफ सीजन की तैयारी के लिए देश के विभिन्न क्षेत्रों में रीजनल कॉन्फ्रेंस आयोजित करने का निर्णय लिया है, ताकि स्थानीय जरूरतों के अनुसार खरीफ फसल के लिए बेहतर रणनीति बनाई जा सके। इसके लिए देश को पांच ज़ोन (उत्तर, दक्षिण, पश्चिम, पूर्व और नॉर्थ-ईस्ट/हिली स्टेट्स) में बांटकर रीजनल कॉन्फ्रेंस की जाएगी, ताकि खरीफ फसल के लिए बेहतर रणनीति बनाई जा सके।</p>
<p>केंद्रीय मंत्री ने बैठक में न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर सुचारु खरीद सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक निर्देश दिए। उन्होंने बताया कि रबी फसल का उत्पादन इस वर्ष बंपर हुआ है। गेहूं और धान की खरीदी शीघ्र प्रारंभ होगी, साथ ही तुअर, मसूर और उड़द की भी पूरी खरीदी की जाएगी। किसान जितनी उपज बेचना चाहेंगे, हम खरीदेंगे।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x500_69bd2223e8234.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ कई राज्यों में रबी की तैयार फसलों पर बारिश-आंधी व ओलावृष्टि का कहर, शिवराज ने की समीक्षा बैठक ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x500_69bd2223e8234.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[वैश्विक अनाज उत्पादन 2025&amp;#45;26 में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचेगा, खपत बढ़ने के बावजूद भंडार में सुधार की उम्मीदः आईजीसी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/global-grains-production-record-forecast-2025-2026.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 20 Mar 2026 14:37:40 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/global-grains-production-record-forecast-2025-2026.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>इंटरनेशनल ग्रेन्स काउंसिल (IGC) ने 2025-26 विपणन वर्ष में वैश्विक अनाज उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने की संभावना जताई है। इसने मक्का और गेहूं के उत्पादन में वृद्धि को प्रमुख कारण बताया है, जबकि खपत में भी बढ़ोतरी जारी रहने का अनुमान है।</p>
<p>कुल अनाज उत्पादन (गेहूं और मोटे अनाज सहित) का अनुमान महीने-दर-महीने एक करोड़ टन बढ़ाकर 247 करोड़ टन कर दिया गया है। यह वृद्धि मुख्य रूप से मक्का उत्पादन (भारत सहित) और रूस व ऑस्ट्रेलिया जैसे प्रमुख निर्यातक देशों में गेहूं उत्पादन बढ़ने के कारण है।</p>
<p>आईजीसी का कहना है कि बढ़ी हुई आपूर्ति का अधिकांश हिस्सा खपत में वृद्धि से समाहित हो जाएगा। खपत का अनुमान 80 लाख टन बढ़ाकर 242.3 करोड़ टन कर दिया है। इसके साथ ही वैश्विक भंडार भी बढ़ने का अनुमान है, और सीजन के अंत में स्टॉक 63.2 करोड़ टन रहने का अनुमान है।</p>
<p>काउंसिल के अनुसार, 2025-26 में वैश्विक अनाज उत्पादन वर्ष-दर-वर्ष आधार पर 14.3 करोड़ टन अधिक होगा, जिसमें मक्का (7.9 करोड़ टन), गेहूं (44 करोड़ टन) और जौ (1.1 करोड़ टन) में वृद्धि शामिल है। खपत भी 7.3 करोड़ टन बढ़कर रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने का अनुमान है। वैश्विक अनाज व्यापार 2.5 करोड़ टन बढ़कर 63.2 करोड़ टन तक पहुंच सकता है, जिसमें गेहूं और मक्का का बड़ा हिस्सा होगा।</p>
<p>हालांकि आईजीसी ने 2026-27 विपणन वर्ष के लिए परिस्थितियां कुछ नरम रहने का संकेत दिया है। बुवाई क्षेत्र और उत्पादकता में कमी के कारण वैश्विक अनाज उत्पादन में 2% गिरावट का अनुमान है। कुल उत्पादन 241.7 करोड़ टन रह सकता है, जो पिछले सीजन के रिकॉर्ड से 5.3 करोड़ टन कम होगा।&nbsp;</p>
<p>खपत लगातार चौथे वर्ष बढ़ने का अनुमान है और यह 244 करोड़ टन के नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच सकता है। जिसका मुख्य कारण खाद्य के अलावा और औद्योगिक उपयोग में मांग में वृद्धि है। इसके परिणामस्वरूप, वैश्विक भंडार घटकर 60.9 करोड़ टन रह सकता है, जो वर्ष-दर-वर्ष 2.3 करोड़ टन कम होगा। यह गिरावट मुख्य रूप से प्रमुख निर्यातक देशों में देखी जाएगी। व्यापार कुल मिलाकर लगभग स्थिर रहने का अनुमान है।</p>
<p>तिलहनों में 2025-26 के लिए वैश्विक सोयाबीन उत्पादन का अनुमान 20 लाख टन घटाकर 42.6 करोड़ टन कर दिया गया है, जिसका कारण ब्राजील और भारत में उत्पादन में कमी है। इसके चलते खपत और भंडार के अनुमानों में भी मामूली कमी की गई है।</p>
<p>2026-27 के लिए वैश्विक सोयाबीन उत्पादन 44.2 करोड़ टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने का अनुमान है। पर्याप्त उपलब्धता के चलते प्रसंस्करण भी नए उच्च स्तर पर पहुंच सकता है, जबकि वैश्विक भंडार लगभग स्थिर रहने की संभावना है। व्यापार 2% बढ़कर 19 करोड़ टन तक पहुंच सकता है, जिसका मुख्य कारण दक्षिण अमेरिका से एशिया को होने वाले निर्यात हैं।</p>
<p>चावल के वैश्विक बाजार में 2025-26 के दौरान आपूर्ति और मांग के अनुमान में बहुत कम बदलाव हुआ है। व्यापार 2% बढ़कर 595 लाख टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने की उम्मीद है। 2026-27 में रकबा बढ़ने और सामान्य उत्पादकता के आधार पर वैश्विक उत्पादन नए उच्च स्तर पर पहुंच सकता है।</p>
<p>खपत और व्यापार दोनों में नई ऊंचाई देखने को मिल सकती है, जिसका कारण उप-सहारा अफ्रीका और दक्षिण एशिया में जनसंख्या वृद्धि है। वैश्विक चावल भंडार में भी वृद्धि का अनुमान है, जिसमें भारत में भंडारण बढ़ने की प्रमुख भूमिका होगी। 2026-27 में चावल व्यापार 609 लाख टन तक पहुंच सकता है।</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/12/image_750x500_693d475a64202.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ वैश्विक अनाज उत्पादन 2025-26 में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचेगा, खपत बढ़ने के बावजूद भंडार में सुधार की उम्मीदः आईजीसी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/12/image_750x500_693d475a64202.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[भारत ने स्वदेशी पशु प्रजनन में हासिल की बड़ी उपलब्धि, बड़े पैमाने पर भ्रूण ट्रांसफर कार्यक्रम सफल]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/india-indigenous-cattle-embryo-transfer-breakthrough-bl-agro.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 20 Mar 2026 12:44:54 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/india-indigenous-cattle-embryo-transfer-breakthrough-bl-agro.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत के डेयरी और पशुपालन क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, बीएल एग्रो समूह की सहायक कंपनी लीड्स जेनेटिक्स ने बरेली में देश का पहला, बड़े पैमाने का स्वदेशी गाय भ्रूण ट्रांसफर कार्यक्रम सफलतापूर्वक पूरा करने का दावा किया है। &lsquo;सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर कैटल ब्रीडिंग एंड डेयरी टेक्नोलॉजी&rsquo; में की गई यह पहल, भारत की पशु आनुवंशिकी और दुग्ध उत्पादकता को बेहतर बनाने के लिए प्रजनन तकनीकों के उपयोग में एक महत्वपूर्ण प्रगति है।</p>
<p>दिसंबर 2025 में संचालित पहले चरण में, कंपनी ने 116 गायों पर इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) किया, जिसमें लगभग 70% सफलता दर हासिल हुई। विशेषज्ञों के अनुसार, इस स्तर पर यह सफलता दर काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसके आधार पर दूसरे चरण में भ्रूण (एम्ब्रियो) ट्रांसफर प्रक्रियाओं का विस्तार 160 गायों तक किया गया, जिसमें गिर और साहीवाल जैसी स्वदेशी नस्लों के साथ-साथ होल्सटीन फ्रीजियन (HF) क्रॉसब्रीड गायें भी शामिल थीं।</p>
<p>यह कार्यक्रम उन्नत IVF, जीनोमिक्स और पैथोलॉजी प्रयोगशालाओं से सुसज्जित एक आधुनिक सुविधा में संचालित किया जा रहा है, जो वैज्ञानिक पशुपालन प्रबंधन की दिशा में बढ़ते प्रयासों को दर्शाता है। यह पहल ब्राजील की एम्ब्रापा और फजेंडा फ्लोरेस्टा के साथ त्रिपक्षीय सहयोग के तहत भी संचालित हो रही है। यह एम्ब्रापा की किसी निजी भारतीय संस्था के साथ पहली साझेदारी है।</p>
<p>विशेषज्ञों का कहना है कि एम्ब्रियो ट्रांसफर तकनीक उच्च आनुवंशिक गुणवत्ता वाले पशुओं की तेजी से संख्या बढ़ाने में सक्षम है, जिससे प्रति पशु दुग्ध उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। कंपनी के अधिकारियों के अनुसार यह तकनीक पारंपरिक प्रजनन विधियों की तुलना में दूध उत्पादन क्षमता को तीन गुना तक बढ़ा सकती है, हालांकि इसके परिणाम खेत स्तर पर अपनाने और समग्र पारिस्थितिकी तंत्र के समर्थन पर निर्भर करेंगे।</p>
<p>बीएल एग्रो के प्रबंध निदेशक आशीष खंडेलवाल ने कहा, इस सफलता का पैमाना भारतीय डेयरी क्षेत्र के लिए एक निर्णायक क्षण है। उन्नत प्रजनन तकनीक प्रति गाय उत्पादकता बढ़ाने और पशुधन की आनुवंशिक गुणवत्ता को मजबूत करने के भारत के लक्ष्य को तेज कर सकती हैं।</p>
<p>भारत पहले ही दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है, लेकिन प्रति पशु उत्पादन के मामले में अब भी पीछे है। ऐसे में इस तरह की पहल किसानों की आय बढ़ाने और ग्रामीण आजीविका को मजबूत बनाए रखने के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं। यदि इन्हें प्रभावी ढंग से बड़े स्तर पर लागू किया जाता है, तो यह देश की डेयरी वैल्यू चेन को आधुनिक बनाने के साथ-साथ स्वदेशी नस्लों के संरक्षण और संवर्धन में भी अहम भूमिका निभा सकती हैं।</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x500_69bcefb78699c.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ भारत ने स्वदेशी पशु प्रजनन में हासिल की बड़ी उपलब्धि, बड़े पैमाने पर भ्रूण ट्रांसफर कार्यक्रम सफल ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/03/image_750x500_69bcefb78699c.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[लॉजिस्टिक्स लागत जीडीपी के 14% से घटकर 7.9% पर आई: फिक्की&amp;#45;ग्रांट थॉर्नटन रिपोर्ट]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/india-indigenous-cold-chain-technology-logistics-report-ficci.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 20 Mar 2026 11:43:12 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/india-indigenous-cold-chain-technology-logistics-report-ficci.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत को अपने लॉजिस्टिक्स के भविष्य को सुरक्षित और प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए स्वदेशी कोल्ड चेन तकनीक विकसित करनी होगी। गुरुवार को जारी इंडस्ट्री चैंबर फिक्की (FICCI) और ग्रांट थॉर्नटन भारत (Grant Thornton Bharat) की संयुक्त रिपोर्ट में यह बात कही गई है। रिपोर्ट के निष्कर्ष फिक्की गतिशक्ति सम्मेलन के तीसरे संस्करण में प्रस्तुत किए गए। इसमें बताया गया है कि भारत में लॉजिस्टिक्स की लागत घटकर जीडीपी का 7.9 प्रतिशत रह गई है।</p>
<p>यह रिपोर्ट &lsquo;भारत के लॉजिस्टिक्स इकोसिस्टम में बदलाव: वेयरहाउसिंग, कोल्ड चेन और टेक्नोलॉजी की भूमिका&rsquo; शीर्षक से जारी की गई है। इसमें बताया गया है कि भारत में लॉजिस्टिक्स लागत घटकर जीडीपी के 7.9 प्रतिशत तक आ गई है, जो पहले 13-14 प्रतिशत के बीच थी। हालांकि, रिपोर्ट के अनुसार अब प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए स्वदेशी तकनीक विकास अगला बड़ा कदम होगा।</p>
<p>रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि कोल्ड चेन ऑटोमेशन के लिए एक राष्ट्रीय अनुसंधान एवं विकास (R&amp;D) केंद्र स्थापित किया जाना चाहिए, जिससे केवल क्षमता बढ़ाने के बजाय सिस्टम की दक्षता पर ध्यान दिया जा सके। इसमें रोबोटिक्स, सेंसर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे उपकरणों को भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।</p>
<p>भारत में वर्तमान में 8,815 कोल्ड स्टोरेज इकाइयां हैं, जिनकी कुल क्षमता 402.18 लाख मीट्रिक टन है। इसके बावजूद फल और सब्जियों में फसल कटाई-तुड़ाई के बाद नुकसान 6 से 15 प्रतिशत तक बना हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार इसका कारण केवल बुनियादी ढांचे की कमी नहीं, बल्कि ऑटोमेशन की कमी, आपूर्ति श्रृंखला की कमजोर योजना और स्मार्ट सिस्टम का सीमित उपयोग है।</p>
<p><strong>नीतिगत समर्थन और उद्योग की भूमिका</strong></p>
<p>सम्मेलन में नीति निर्माताओं और उद्योग जगत के प्रतिनिधियों ने भी स्वदेशी नवाचार की आवश्यकता पर जोर दिया। वेयरहाउसिंग डेवलपमेंट एंड रेगुलेटरी अथॉरिटी की चेयरपर्सन अनीता प्रवीण ने इलेक्ट्रॉनिक नेगोशिएबल वेयरहाउस रसीद प्रणाली को आसान और प्रभावी समाधान बताते हुए कहा कि इससे किसानों को अपनी उपज गिरवी रखकर वित्तीय सहायता मिल सकती है और उन्हें मजबूरी में फसल बेचने से बचाया जा सकता है।</p>
<p><strong>तेजी से बढ़ता लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर</strong></p>
<p>फिक्की लॉजिस्टिक्स समिति के को-चेयर अंशुमन सिंह ने बताया कि भारत में इस समय 50 करोड़ वर्ग फीट लॉजिस्टिक्स पार्क हैं, जो अगले पांच वर्षों में बढ़कर 100 करोड़ वर्ग फीट से अधिक हो सकते हैं। यह वृद्धि पीएम गति शक्ति (PM Gati Shakti), राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति और मल्टीमोडल लॉजिस्टिक्स पार्क योजनाओं के कारण संभव होगी। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार की 33,660 करोड़ रुपये की भव्य योजना (100 प्लग-एंड-प्ले लॉजिस्टिक्स पार्क बनाने के लिए) पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के जरिए लॉजिस्टिक्स पार्क के विकास में तेजी लाएगी।&nbsp;</p>
<p>उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) के संयुक्त सचिव पंकज कुमार ने कहा कि लागत में कमी महत्वपूर्ण है, लेकिन स्थिरता, लचीलापन और बेहतर परिणाम भी उतने ही जरूरी हैं। उन्होंने पीएम गति शक्ति पोर्टल के बेहतर उपयोग पर जोर दिया, ताकि विभिन्न परियोजनाओं का समन्वित विकास हो सके।</p>
<p>फिक्की लॉजिस्टिक्स कमेटी के को-चेयर और ताबी मोबिलिटी के सीईओ पाली त्रिपाठी ने कहा कि लॉजिस्टिक्स क्षेत्र में सबसे बड़ी चुनौती लास्ट-माइल डिलीवरी है। उन्होंने डेटा के बेहतर उपयोग और एकीकृत निर्णय प्रणाली को भविष्य की दिशा बताया। नेशनल इंडस्ट्रियल कॉरिडोर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के एमडी एवं सीईओ रजत कुमार सैनी ने कहा कि इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश के साथ-साथ कौशल विकास, नियामकीय सुधार और वर्कफोर्स के फॉर्मलाइजेशन पर भी ध्यान देना जरूरी है।</p>
<p>रिपोर्ट के अनुसार, स्वदेशी कोल्ड चेन ऑटोमेशन भारत के लिए न केवल लॉजिस्टिक्स दक्षता बढ़ाने का माध्यम है, बल्कि 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने और जलवायु-संवेदनशील, वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी लॉजिस्टिक्स प्रणाली बनाने के लिए भी अनिवार्य है।</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ लॉजिस्टिक्स लागत जीडीपी के 14% से घटकर 7.9% पर आई: फिक्की-ग्रांट थॉर्नटन रिपोर्ट ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[पश्चिम एशिया संकट के बीच निर्यातकों के लिए सरकार ने लांच की 497 करोड़ रुपये की ‘रिलीफ’ योजना]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/national/govt-launches-rs-497-crores-relief-scheme-to-support-exporters-amid-west-asia-logistics-crisis.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 19 Mar 2026 16:04:13 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/national/govt-launches-rs-497-crores-relief-scheme-to-support-exporters-amid-west-asia-logistics-crisis.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>पश्चिम एशिया में बिगड़ते हालात और खाड़ी क्षेत्र में लॉजिस्टिक्स पर उसके प्रभाव को देखते हुए केंद्र सरकार ने निर्यातकों की मदद के लिए एक विशेष &lsquo;रिलीफ&rsquo; (Resilience &amp; Logistics Intervention for Export Facilitation) योजना शुरू की है। यह समयबद्ध और लक्षित योजना एक्सपोर्ट प्रमोशन मिशन (EPM) के तहत लागू की जाएगी। इसका उद्देश्य खाड़ी और व्यापक पश्चिम एशिया समुद्री मार्ग में बाधाओं के कारण बढ़े मालभाड़े, महंगे बीमा प्रीमियम और युद्ध से जुड़े जोखिमों से प्रभावित भारतीय निर्यातकों को राहत देना है।</p>
<p>वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अनुसार, हाल के घटनाक्रम, खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बढ़ी सुरक्षा चिंताओं के कारण जहाजों के मार्ग बदलने, लंबी दूरी तय करने, ट्रांसशिपमेंट हब पर भीड़ और आपातकालीन सरचार्ज जैसी स्थितियां उत्पन्न हुई हैं। इससे लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ी है और निर्यात गतिविधियों में अनिश्चितता पैदा हुई है।</p>
<p><strong>ECGC होगी नोडल एजेंसी</strong></p>
<p>इस योजना के तहत ईसीजीसी को नोडल और कार्यान्वयन एजेंसी बनाया गया है। यह एजेंसी दावों की जांच, भुगतान, वितरण और निगरानी का जिम्मा संभालेगी। निर्यात ऋण जोखिम कवर देने में ईसीजीसी के अनुभव से समय पर और विश्वसनीय सहायता सुनिश्चित होने की उम्मीद है।</p>
<p><strong>RELIEF योजना के तीन प्रमुख घटक</strong></p>
<p>रिलीफ योजना में तीन प्रमुख घटक शामिल हैं, जो संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कुवैत, इजराइल, कतर, ओमान, बहरीन, इराक, ईरान और यमन जैसे देशों के लिए भेजे जाने वाले निर्यात पर लागू होंगे।</p>
<p>पहला, जिन निर्यातकों ने पहले से ECGC बीमा लिया हुआ है, उन्हें 14 फरवरी से 15 मार्च 2026 के बीच भेजे गए माल पर अतिरिक्त 100% जोखिम कवर मिलेगा, जिससे उन्हें बिना अतिरिक्त खर्च के सुरक्षा मिलेगी।</p>
<p>दूसरा, 16 मार्च से 15 जून 2026 तक प्रस्तावित निर्यात के लिए सरकार के समर्थन से 95% तक अतिरिक्त जोखिम कवर दिया जाएगा, जिससे अनिश्चितता के बीच निर्यात जारी रखने में मदद मिलेगी।</p>
<p>तीसरा, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) निर्यातकों के लिए, जिन्होंने बीमा नहीं लिया था, लेकिन बढ़े हुए फ्रेट और बीमा लागत का सामना कर रहे हैं, उनके लिए 50% तक आंशिक प्रतिपूर्ति का प्रावधान किया गया है। यह सहायता अधिकतम 50 लाख रुपये प्रति निर्यातक तक सीमित होगी और निर्धारित शर्तों के तहत दी जाएगी।</p>
<p><strong>497 करोड़ रुपये का प्रावधान</strong></p>
<p>इस योजना के लिए कुल 497 करोड़ रुपये का वित्तीय प्रावधान किया गया है। ईसीजीसी एक डैशबोर्ड आधारित निगरानी प्रणाली के जरिए दावों और फंड उपयोग की रियल-टाइम मॉनिटरिंग करेगी। एक्सपोर्ट प्रमोशन मिशन संचालन समिति समय-समय पर योजना की समीक्षा करेगी और जरूरत के अनुसार इसमें बदलाव कर सकती है।</p>
<p>सरकार का उद्देश्य इस योजना के माध्यम से लॉजिस्टिक्स बाधाओं के तात्कालिक प्रभाव को कम करना, निर्यातकों का विश्वास बनाए रखना, ऑर्डर रद्द होने से रोकना और निर्यात आधारित क्षेत्रों में रोजगार की रक्षा करना है।</p>
<p><strong>अंतर-मंत्रालयी समूह की निगरानी</strong></p>
<p>ईरान और इजरायल-अमेरिका युद्ध की स्थिति से निपटने के लिए 2 मार्च 2026 को सप्लाई चेन रेजिलिएंस पर एक अंतर-मंत्रालयी समूह (IMG) का गठन किया गया था, जिसने 3 मार्च से दैनिक समीक्षा शुरू की। इस समूह में विभिन्न मंत्रालयों, वित्तीय संस्थानों, लॉजिस्टिक्स कंपनियों और निर्यातक संगठनों को शामिल किया गया है।</p>
<p>समूह की सिफारिशों के आधार पर फंसे हुए माल की आवाजाही में ढील, बंदरगाहों पर बेहतर समन्वय, स्टोरेज शुल्क में छूट, शिपिंग कीमतों में पारदर्शिता और बीमा जोखिम की निगरानी जैसे कई कदम उठाए गए। इन प्रयासों ने जमीनी चुनौतियों का आकलन करने और लक्षित वित्तीय सहायता योजना तैयार करने में मदद की।</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ पश्चिम एशिया संकट के बीच निर्यातकों के लिए सरकार ने लांच की 497 करोड़ रुपये की ‘रिलीफ’ योजना ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[साउथ पार्स पर इजराइली हमले के बाद ईरान का पलटवार, खाड़ी के ऊर्जा ठिकानों पर मिसाइल हमले; ट्रंप की ‘भीषण’ जवाब की चेतावनी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/iran-strikes-gulf-energy-hubs-israel-south-pars-trump.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 19 Mar 2026 15:26:04 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/iran-strikes-gulf-energy-hubs-israel-south-pars-trump.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>ईरान और इजराइल-अमेरिका (Israel-Iran War) युद्ध एक खतरनाक चरण में प्रवेश कर गया है। इजराइल की तरफ से रणनीतिक साउथ पार्स गैसफील्ड पर हमले के बाद ईरान ने खाड़ी क्षेत्र के प्रमुख ऊर्जा ठिकानों पर मिसाइल हमले शुरू कर दिए हैं। इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है। युद्ध के 20वें दिन इजराइल ने ईरान के बुशेहर प्रांत स्थित दुनिया के सबसे बड़े प्राकृतिक गैस भंडार साउथ पार्स को निशाना बनाया। इसके कुछ ही घंटों बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के तेल और गैस ठिकानों पर मिसाइलें दागीं। कतर के रास लफ्फान इंडस्ट्रियल सिटी, जो दुनिया का सबसे बड़ा एलएनजी हब है, पर हुए हमले में कई जगह आग लग गई और भारी नुकसान हुआ, हालांकि किसी के हताहत होने की खबर नहीं है।</p>
<p><strong>क्षेत्रीय असर और खाड़ी में बढ़ता तनाव</strong></p>
<p>यूएई में मिसाइल हमलों के बाद प्रमुख ऊर्जा संयंत्रों को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा। वहां इंटरसेप्ट किए गए प्रोजेक्टाइल के मलबे गिरे। सऊदी अरब ने रियाद और महत्वपूर्ण ढांचों को निशाना बनाकर दागी गई कई बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन को नष्ट किया। बहरीन और कुवैत ने भी संभावित हमलों और साजिशों के मद्देनजर सुरक्षा कड़ी कर दी है। कतर ने ईरानी दूतावास के सैन्य और सुरक्षा अधिकारियों को देश छोड़ने का आदेश देते हुए उन्हें &lsquo;पर्सोना नॉन ग्राटा&rsquo; घोषित कर दिया, जबकि सऊदी अरब ने कहा कि ईरान पर बचा-खुचा भरोसा भी पूरी तरह खत्म हो चुका है और जरूरत पड़ने पर सैन्य कार्रवाई का संकेत दिया।</p>
<p><strong>ट्रंप ने अमेरिका की भूमिका से इनकार, ईरान को चेतावनी</strong></p>
<p>बढ़ते संकट के बीच डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने इजराइल की कार्रवाई से अमेरिका को अलग करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि साउथ पार्स पर हमले में अमेरिका की कोई भूमिका नहीं थी और कतर को भी इसकी कोई जानकारी नहीं थी। हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी कि यदि ईरान कतर सहित खाड़ी के ऊर्जा ठिकानों को निशाना बनाना जारी रखता है, तो अमेरिका &ldquo;भीषण&rdquo; जवाब देते हुए पूरे साउथ पार्स गैसफील्ड को नष्ट कर सकता है। ट्रंप का यह दोहरा रुख वॉशिंगटन की स्थिति को लेकर अनिश्चितता बढ़ा रहा है।</p>
<p>हालांकि अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से आई रिपोर्ट्स में कहा गया है कि ट्रंप को इजराइल की योजना की पहले से जानकारी हो सकती थी, जिससे परोक्ष समर्थन की अटकलें तेज हो गई हैं। विश्लेषकों का मानना है कि इससे वॉशिंगटन में असहजता बढ़ रही है और यह सवाल उठ रहा है कि क्या अमेरिकी नीति पर इजराइल का प्रभाव बढ़ गया है।&nbsp;</p>
<p><strong>ऊर्जा क्षेत्र बना नया युद्धक्षेत्र</strong></p>
<p>ताजा घटनाक्रम ने युद्ध को एक नए मोड़ पर ला दिया है, जहां ऊर्जा ठिकाने सीधे निशाने पर हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि साउथ पार्स और रास लफ्फान जैसे ठिकानों पर हमले से वैश्विक एलएनजी आपूर्ति बाधित हो सकती है और ऊर्जा कीमतों में तेज उछाल आ सकता है। खाड़ी देश प्रमुख ऊर्जा निर्यातक हैं, ऐसे में लंबे समय तक हमले जारी रहने से वैश्विक बाजारों पर गहरा असर पड़ सकता है।</p>
<p>इज़राइल की तरफ से उत्तरी ईरान में हमले बढ़ाने और वरिष्ठ ईरानी अधिकारियों की लक्षित हत्याओं के बीच तनाव चरम पर है। विशेषज्ञों का मानना है कि इजराइल, ईरान की सत्ता को अस्थिर करने की कोशिश कर रहा है, जबकि ईरान के खाड़ी देशों पर हमले संघर्ष के विस्तार का संकेत देते हैं। खाड़ी देश अपने जवाब पर विचार कर रहे हैं और अमेरिका की सतर्क लेकिन आक्रामक चेतावनी के बीच पूरा क्षेत्र एक बड़े और विनाशकारी युद्ध के खतरे का सामना कर रहा है।</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ साउथ पार्स पर इजराइली हमले के बाद ईरान का पलटवार, खाड़ी के ऊर्जा ठिकानों पर मिसाइल हमले; ट्रंप की ‘भीषण’ जवाब की चेतावनी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[देश में सस्टेनेबल अरंडी बीज उत्पादन 1.70 लाख टन पहुंचा, इस बीज के लिए अब तक 13,500 से अधिक किसान प्रमाणित]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/states/india-sustainable-castor-output-hits-1.70-lakh-tonnes-more-than-13500-farmers-certified-so-far.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 19 Mar 2026 15:06:28 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/states/india-sustainable-castor-output-hits-1.70-lakh-tonnes-more-than-13500-farmers-certified-so-far.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत में सतत (सस्टेनेबल) अरंडी बीज उत्पादन ने 1.70 लाख टन के स्तर को छू लिया है। यह गुजरात में किसानों की भागीदारी से संचालित पहल का नतीजा है, जिसका नेतृत्व जयंत एग्रो-ऑर्गेेनिक्स (Jayant Agro-Organics Limited) द्वारा उसके प्रमुख प्रोजेक्ट &lsquo;प्रगति&rsquo; के माध्यम से किया जा रहा है। इस प्रोजेक्ट के नौ वर्ष पूरे हो गए हैं और अब यह वैश्विक स्तर पर टिकाऊ और ट्रेसेबल आपूर्ति श्रृंखला का मॉडल बन चुका है।</p>
<p>साल 2016 में शुरू किए गए इस कार्यक्रम को आरकेमा (Arkema) और बीएएसएफ (BASF) के साथ मिलकर, तथा विकास संगठन सॉलिडेरिडैड (Solidaridad) के सहयोग से लागू किया गया। इसके साथ ही इहसेदु एग्रोकेम (Ihsedu Agrochem) प्राइवेट लिमिटेड द्वारा संचालित &lsquo;आई-प्रगति&rsquo; परियोजना ने किसानों तक इसकी पहुंच को और विस्तार दिया है।</p>
<p>वर्ष 2025 तक दोनों परियोजनाओं के तहत 13,500 से अधिक किसानों को प्रमाणित किया जा चुका है और 16,000 हेक्टेयर से अधिक भूमि को सक्सेस (SuCCESS&reg;) सस्टेनेबिलिटी कोड के अंतर्गत लाया गया है। इन पहलों के माध्यम से कुल मिलाकर लगभग 1.70 लाख टन प्रमाणित कैस्टर बीज का उत्पादन हुआ है, जिससे वैश्विक स्पेशलिटी रसायन बाजार में भारत की स्थिति और मजबूत हुई है।</p>
<p>खेत स्तर पर इसका प्रभाव भी उल्लेखनीय रहा है। प्रगति से जुड़े किसानों ने सरकारी मानकों की तुलना में 32% अधिक उत्पादन दर्ज किया, जबकि डेमो प्लॉट में पारंपरिक खेती के मुकाबले लगभग 30% कम पानी का उपयोग हुआ। सस्टेनेबल खेती के तहत बढ़ता रकबा इस बात का संकेत है कि किसान अरंडी को एक लाभकारी और जलवायु-अनुकूल फसल के रूप में अपना रहे हैं, खासकर अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में।</p>
<p>जयंत एग्रो समूह के चेयरमैन अभय वी. उदेशी के अनुसार, यह पहल दर्शाती है कि टिकाऊ कृषि पद्धतियां किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ वैश्विक उद्योगों के लिए विश्वसनीय आपूर्ति भी सुनिश्चित कर सकती हैं। प्रमाणित किसानों की बढ़ती संख्या इस मॉडल पर किसानों के विश्वास को भी दर्शाती है।</p>
<p>गुजरात भारत का प्रमुख अरंडी उत्पादन का केंद्र है। यहां से शुरू हुई पहल अब एक वैश्विक ढांचे में विकसित हो चुकी है। किसानों ने बेहतर कृषि प्रथाओं और प्रमाणित बीजों के उपयोग से लागत में 20-25% तक कमी और उत्पादन में वृद्धि का अनुभव किया है।</p>
<p>उत्पादन बढ़ाने के अलावा यह कार्यक्रम किसानों के क्षमता निर्माण पर भी ध्यान दे रहा है। वर्ष के दौरान 450 से अधिक प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए गए और 500 से अधिक लीड किसानों को अन्य किसानों का मार्गदर्शन करने के लिए प्रशिक्षित किया गया। साथ ही 10,000 से अधिक सुरक्षा किट वितरित किए गए और 150 से अधिक स्वास्थ्य शिविर आयोजित किए गए, जिनसे हजारों ग्रामीण परिवारों को लाभ मिला।</p>
<p>कार्यक्रम महिलाओं की भागीदारी को भी बढ़ावा दे रहा है। इसके तीसरे चरण में 1,150 से अधिक महिलाओं को सस्टेनेबल खेती, डिजिटल और वित्तीय साक्षरता का प्रशिक्षण दिया गया है, जिससे निर्णय लेने की उनकी क्षमता और ग्रामीण समुदायों की मजबूती में सुधार हुआ है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ देश में सस्टेनेबल अरंडी बीज उत्पादन 1.70 लाख टन पहुंचा, इस बीज के लिए अब तक 13,500 से अधिक किसान प्रमाणित ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[ईरानी मूल के यूएन वैज्ञानिक कावेह मदानी को ‘वॉटर बैंकरप्सी’ शोध के लिए 2026 का स्टॉकहोम वाटर पुरस्कार]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/international/iran-origin-un-scientist-kaveh-madani-wins-2026-stockholm-water-prize-for-water-bankruptcy-research.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 19 Mar 2026 14:17:03 GMT]]></pubDate>
				
        <guid>https://www.ruralvoice.in/international/iran-origin-un-scientist-kaveh-madani-wins-2026-stockholm-water-prize-for-water-bankruptcy-research.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>वैज्ञानिक उत्कृष्टता और असाधारण संघर्ष की प्रेरणा, ईरानी मूल के कावेह मदानी को संयुक्त राष्ट्र का वर्ष 2026 का प्रतिष्ठित स्टॉकहो वाटर प्राइज (Stockholm Water Prize) देने की घोषणा की गई है। इस पुरस्कार को &ldquo;पानी का नोबेल पुरस्कार&rdquo; भी कहा जाता है। मदानी इस समय संयुक्त राष्ट्र की यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट फॉर वाटर, एनवायरमेंट एंड हेल्थ के निदेशक हैं।</p>
<p>यह घोषणा पेरिस स्थित यूनेस्को मुख्यालय में विश्व जल दिवस के अवसर पर आयोजित एक विशेष समारोह में की गई। यह पुरस्कार औपचारिक रूप से अगस्त 2026 में विश्व जल सप्ताह के दौरान किंग कार्ल XVI गुस्ताफ द्वारा प्रदान किया जाएगा।</p>
<p>महज 44 वर्ष की आयु में मदानी इस पुरस्कार के 35 साल के इतिहास में सबसे कम उम्र के विजेता बन गए हैं। साथ ही, वे पहले संयुक्त राष्ट्र अधिकारी और पूर्व राजनेता हैं जिन्हें यह सम्मान मिला है। उनका जीवन सफर विज्ञान, राजनीति और पर्यावरणीय संघर्ष के अनोखे संगम को दर्शाता है।</p>
<p>1981 में तेहरान में जन्मे मदानी के जीवन पर जल संकट की समस्याओं का गहरा प्रभाव रहा। उन्होंने ईरान, स्वीडन और अमेरिका में शिक्षा प्राप्त की और जल संसाधन प्रबंधन के क्षेत्र में एक अग्रणी विशेषज्ञ के रूप में पहचान बनाई। उनका प्रमुख योगदान गेम थ्योरी और हाइड्रोलॉजी को जोड़कर मानव व्यवहार को समझने का एक नया दृष्टिकोण विकसित करना है, जिसने वैश्विक नीति निर्माण को प्रभावित किया है।</p>
<p>वर्ष 2017 में मदानी ईरान लौटे और पर्यावरणीय पद पर कार्यभार संभाला। लेकिन जल प्रबंधन में पारदर्शिता और सुधारों की उनकी पहल से सत्ता के कुछ वर्गों में असंतोष पैदा हुआ। उन्हें &ldquo;वॉटर टेररिस्ट&rdquo; और जासूस तक कहा गया, गिरफ्तार किया गया और पूछताछ का सामना करना पड़ा। अंततः 2018 में उन्हें देश छोड़कर निर्वासन में जाना पड़ा।</p>
<p>इन कठिन परिस्थितियों के बावजूद मदानी ने अपने शोध और वैश्विक कार्य को जारी रखा और बाद में संयुक्त राष्ट्र के जल थिंक टैंक माने जाने वाले UNU-INWEH के प्रमुख बने। आज वे दुनिया भर की सरकारों को जल प्रबंधन और नीतिगत सुधारों पर सलाह दे रहे हैं।</p>
<p>उनकी सबसे चर्चित अवधारणाओं में से एक &ldquo;वॉटर बैंकरप्सी&rdquo; है। उन्होंने &ldquo;जल संकट&rdquo; शब्द को चुनौती देते हुए कहा कि कई क्षेत्रों में पानी की कमी अब अस्थायी नहीं बल्कि स्थायी और अपरिवर्तनीय बन चुकी है। उनकी हालिया संयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट के अनुसार जनवरी 2026 से दुनिया &ldquo;ग्लोबल वॉटर बैंकरप्सी&rdquo; के दौर में प्रवेश कर चुकी है, जिससे वैश्विक स्तर पर बहस तेज हो गई है।</p>
<p>मदानी ने जटिल वैज्ञानिक अवधारणाओं को सरल भाषा में प्रस्तुत कर उन्हें आम लोगों तक पहुंचाया है। सोशल मीडिया और डिजिटल अभियानों के माध्यम से उन्होंने जल संकट को जन-आंदोलन का विषय बनाया और नई पीढ़ी को जागरूक किया। उनकी कूटनीतिक भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। ईरान के पर्यावरणीय राजनयिक के रूप में उन्होंने वैश्विक जल मुद्दों को जलवायु वार्ताओं के केंद्र में लाने की वकालत की।</p>
<p>इस सम्मान पर प्रतिक्रिया देते हुए मदानी ने इसे &ldquo;सत्य की जीत&rdquo; बताया और इसे अपने समर्थकों व उन पर्यावरण कार्यकर्ताओं को समर्पित किया जिन्होंने कठिन समय में उनका साथ दिया। संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों ने उनके कार्य को विश्व की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण बताया। 1991 में शुरू किया गया स्टॉकहोम वाटर प्राइज जल संसाधनों के सतत उपयोग और संरक्षण में उत्कृष्ट योगदान के लिए दिया जाता है।&nbsp;</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ ईरानी मूल के यूएन वैज्ञानिक कावेह मदानी को ‘वॉटर बैंकरप्सी’ शोध के लिए 2026 का स्टॉकहोम वाटर पुरस्कार ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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