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    <title>Farmer News: Government Schemes for Farmers, Successful Farmer Stories &#45; : Opinion</title>
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    <description>Farmer News: Government Schemes for Farmers, Successful Farmer Stories &amp;#45; : Opinion</description>
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        <title><![CDATA[बजट में सहकारी संस्थाओं के लाभांश पर दोहरे कराधान से राहत, हालांकि धारा 80पी में पूर्ण संशोधन नहीं]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/addressing-double-taxation-on-cooperative-dividends-in-budget-2026-27.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 12 Mar 2026 12:15:07 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/addressing-double-taxation-on-cooperative-dividends-in-budget-2026-27.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत की सहकारी संस्थाएं एक संरचनात्मक कर विसंगति से जूझ रही हैं। इसके सदस्यों को मिलने वाले लाभांश पर दो बार कर लगता है, जिससे उनकी वास्तविक आय घटती है। यह सहकारिता के मूल सिद्धांत के भी खिलाफ है। बजट 2026-27 ने इस समस्या का पूर्ण समाधान तो नहीं किया, लेकिन लक्षित सुधारों के जरिए बोझ को कम किया है।</p>
<p><strong>मुद्दाः</strong> सहकारी संस्थाएं अपनी शुद्ध आय से चुकता शेयर पूंजी पर अधिकतम 20% तक लाभांश दे सकती हैं। वर्ष 2020 में डिविडेंड डिस्ट्रीब्यूशन टैक्स समाप्त होने के बाद लाभांश पर दोहरा कर लग रहा है। पहले सहकारी संस्था के स्तर पर और फिर सदस्य के स्तर पर। इसके कारण एक ही आय पर प्रभावी कर दर लगभग 48.51% तक पहुंच जाती है। यह सहकारी सिद्धांतों के विपरीत है, क्योंकि सहकारी संस्थाओं में लाभांश को निवेश पर रिटर्न नहीं, बल्कि पैट्रनेज रिफंड (सदस्यों को लाभ का वितरण) माना जाता है।</p>
<p><strong>आदर्श स्थितिः</strong> आयकर अधिनियम की धारा 80पी में संशोधन कर सदस्यों को दिए जाने वाले लाभांश को कर योग्य आय की गणना से पहले, सकल आय से घटाने योग्य व्यय के रूप में मान्यता दी जाए। लाभांश को पैट्रनेज रिफंड माना जाए; सहकारी संस्थाएं इसे कर-पूर्व कटौती के रूप में घटाएं, जबकि सदस्य इसे अपनी कर योग्य आय में शामिल करें और धारा 194 के तहत टीडीएस व्यवस्था यथावत रहे। इससे दोहरा कराधान समाप्त होगा और राजस्व पर भी कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।</p>
<p><strong>बजट 2026-27: सहकारी संस्थाओं के लिए प्रमुख कर सुधार</strong><br />बजट में लक्षित सुधार पेश किए गए हैं, जो मांग की मूल भावना के अनुरूप हैं। हालांकि सभी सदस्यों के लाभांश के लिए धारा 80पी में पूर्ण संशोधन नहीं किया गया। इसके बजाय, बजट का फोकस सहकारी-से-सहकारी लाभांश (इंटर-कोऑपरेटिव डिविडेंड) और प्राथमिक समितियों को मिलने वाली कर कटौती पर रहा है। इससे सदस्यों तक बेहतर वैल्यू फ्लो सुनिश्चित होता है और बार-बार लगने वाले करों में कमी आती है।</p>
<p><strong>प्राथमिक सहकारी समितियों के लिए आयकर कटौती का विस्तार</strong><br />मौजूदा प्रावधानों (जैसे धारा 80पी) के तहत कर कटौती लाभ को उन प्राथमिक सहकारी संस्थाओं तक बढ़ाया गया है जो सदस्यों द्वारा उत्पादित पशु आहार और कपास बीज की आपूर्ति करती हैं। पहले यह लाभ केवल दूध, तिलहन तथा फल-सब्जियों तक सीमित था।</p>
<p><strong>प्रभावः</strong> कर बोझ में कमी। अधिक कार्यशील पूंजी, सदस्यों को बेहतर मूल्य, भुगतान में तेजी और भंडारण/गुणवत्ता/लॉजिस्टिक्स में निवेश। इससे बहुउद्देश्यीय पैक्स को ग्रामीण उद्यम केंद्रों के रूप में मजबूती मिलती है और डेयरी व कपास क्षेत्रों में इनपुट की लागत पर अंकुश लगता है।</p>
<p><strong>अंतर-सहकारी लाभांश आय पर कटौती</strong><br />सदस्यों को वितरित की गई सीमा तक अंतर-सहकारी लाभांश आय को (नई कर व्यवस्था के तहत) कटौती के रूप में अनुमति दी गई है।</p>
<p><strong>निहितार्थः</strong> सहकारी मूल्य श्रृंखला में दोहरे कराधान को समाप्त करता है; वर्टिकल इंटीग्रेशन को प्रोत्साहित करता है (पैक्स-फेडरेशन-राष्ट्रीय संस्थाएं); पूंजी के बेहतर प्रवाह में मदद करता है; ऊपरी स्तरों पर अधिशेष जमा करने की प्रवृत्ति को हतोत्साहित करता है। कर कानून में सदस्य की जवाबदेही को समाहित करता है।</p>
<p><strong>अधिसूचित राष्ट्रीय सहकारी फेडरेशनों के लिए 3 वर्षीय छूट</strong><br />कंपनियों में किए गए निवेश (31.01.2026 तक) से प्राप्त लाभांश आय पर छूट, बशर्ते कि यह लाभांश सदस्य सहकारी संस्थाओं को वितरित किया जाए।</p>
<p><strong>विचारः</strong> &nbsp;यह दृष्टिकोण राष्ट्रीय स्तर के ऐसे चैंपियन तैयार करता है जिनके पास पर्याप्त स्केल, निवेश और बाजार साझेदारियां हों। साथ ही जमीनी स्तर पर स्वामित्व सुनिश्चित करता है और अभिजात वर्ग द्वारा कब्जे को रोकता है। इसके तहत पारदर्शी, परफॉरमेंस आधारित मानदंड सुझाए गए हैं - जैसे सुशासन, ऑडिट, डिजिटल अनुपालन और भुगतान/लाभ वितरण अनुपात।</p>
<p><strong>समग्र आकलन</strong><br />बजट 2026-27 सहकारी संस्थाओं को प्रतिस्पर्धी, सदस्य-केंद्रित विकास इंजनों के रूप में सशक्त बनाने की दिशा में एक निर्णायक संरचनात्मक बदलाव करता है। यह राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2026 के अनुरूप है। यह प्रतीकात्मक समर्थन से आगे बढ़कर ऐसे प्रणालीगत प्रोत्साहन देता है जो सदस्यों तक मूल्य वितरण को पुरस्कृत करते हैं, आपूर्ति श्रृंखलाओं में कर विवाद कम करते हैं और ग्रामीण उद्यमिता व उत्पादकता को बढ़ावा देते हैं। हालांकि आयकर अधिनियम की धारा 80पी के तहत सभी सदस्यों के लाभांश की व्यापक कटौती का मूल उद्देश्य पूरी तरह हासिल नहीं हुआ है, फिर भी अंतर-सहकारी और प्राथमिक स्तर के उपाय दोहरे कराधान से उल्लेखनीय राहत देते हैं और सीधे तौर पर किसान आय, एग्रीगेशन तथा सहकारिता की गहराई को समर्थन प्रदान करते हैं। ये सुधार किसानों की आय बढ़ाने, एकीकृत जलाशय/मत्स्य/पशुपालन विकास, बैंकों के आधुनिकीकरण तथा विरासत वाले उद्योगों (जैसे महात्मा गांधी स्वराज पहल के तहत हथकरघा) जैसे एजेंडा के केंद्र में कोऑपरेटिव को स्थापित करते हैं।</p>
<p><em>(लेखक नेशनल कोऑपरेटिव एक्सपोर्ट्स लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर हैं)</em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ बजट में सहकारी संस्थाओं के लाभांश पर दोहरे कराधान से राहत, हालांकि धारा 80पी में पूर्ण संशोधन नहीं ]]></media:description>
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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[टैरिफ वार के दौर में एफटीए बना व्यापार का नया कायदा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/india-fta-moment-trading-rules-in-a-world-without-rules.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 09 Mar 2026 11:55:22 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/india-fta-moment-trading-rules-in-a-world-without-rules.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>वर्ष 2025 के अंतिम पखवाड़े में ओमान और न्यूजीलैंड के साथ भारत के मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) संपन्न हुए और जनवरी 2026 के अंत में यूरोपीय यूनियन (ईयू) के साथ एफटीए पर भी सहमति बनी। इसके साथ ही भारत ने ऐसा दौर देखा जो देश के ट्रेड वार्ताकारों के लिए अब तक का सबसे सक्रिय और व्यस्त समय रहा। हाल में संपन्न इन तीन एफटीए के अलावा, मौजूदा वित्त वर्ष में ब्रिटेन के साथ भी समझौते पर हस्ताक्षर किए गए और यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (ईएफटीए) के साथ व्यापार एवं आर्थिक साझेदारी समझौते के कार्यान्वयन की शुरुआत हुई। इस अवधि में भारत के सबसे बड़े व्यापार साझेदार अमेरिका के साथ भी गहन द्विपक्षीय व्यापार वार्ताएं हुईं। इसके अलावा, दिसंबर 2025 की शुरुआत में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की नई दिल्ली यात्रा के अंत में लिया गया एक और अहम फैसला यह था कि भारत और यूरेशियन इकोनॉमिक यूनियन आपसी हित के क्षेत्रों को शामिल करते हुए एफटीए वार्ताएं शुरू करेंगे।</p>
<p>राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के बाद द्विपक्षीय एफटीए का महत्व काफी बढ़ गया है, जिसके पीछे दो प्रमुख कारण हैं। पहला, ट्रंप द्वारा अपने व्यापार नियम गढ़े जाने के बाद विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) और उसके साथ बहुपक्षीय व्यापार नियम गंभीर संकट में पड़ गए हैं। 1940 के दशक के उत्तरार्ध में विश्व समुदाय ने यह स्वीकार किया था कि वैश्विक व्यापार के लिए पूर्वानुमान योग्य नियम अनिवार्य हैं। इसी सोच के तहत नियम-आधारित व्यापार व्यवस्था की स्थापना की गई थी। बहुपक्षीय प्रणाली के अस्त-व्यस्त होने के साथ ही अब व्यापार नियम तय करने के लिए द्विपक्षीय व्यापार समझौते एकमात्र विकल्प के रूप में उभर कर सामने आए हैं। भारत भी उन अनेक देशों में शामिल है, जिन्होंने द्विपक्षीय व्यापार समझौतों पर बातचीत की है या कर रहे हैं।</p>
<p>भारत के लिए एफटीए में सक्रिय रूप से शामिल होने का दूसरा और संभवतः अधिक महत्वपूर्ण कारण, अपने निर्यात गंतव्यों में विविधता लाना है। पिछले एक दशक में भारतीय निर्यातक अमेरिका पर अधिक निर्भर होते गए हैं। वर्ष 2014-15 में भारत के कुल निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी 14 प्रतिशत से भी कम थी, लेकिन 2025 की पहली छमाही तक यह बढ़कर लगभग 23 प्रतिशत हो गई। भारत के खिलाफ ट्रंप की टैरिफ युद्ध नीति के जल्द समाप्त होने की संभावना न होने के कारण, भारत के लिए अपने निर्यात गंतव्यों में विविधता लाना अब अनिवार्य हो गया है। चीन के विपरीत, जिसने वैश्विक एकीकरण के तहत व्यवस्थित रूप से हर क्षेत्र में बाजारों की तलाश की, भारत अब तक मुख्य रूप से बड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर निर्भर रहा है। विशेषकर उन देशों पर जहां प्रवासी भारतीय आबादी अधिक है। ट्रंप का यह रवैया भारत के लिए एक चेतावनी होना चाहिए। इसलिए द्विपक्षीय एफटीए के माध्यम से वैश्विक बाजारों में भारत की मौजूदगी बढ़ाने की पहल को सही दिशा में उठाया गया कदम माना जाना चाहिए।</p>
<p>भारत-ओमान व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौता (सीईपीए) भारतीय बिजनेस को साझेदार देश में अपनी मौजूदगी बढ़ाने के महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है। ओमान अपनी 87 प्रतिशत टैरिफ लाइन पर वर्तमान में लगाए जा रहे शुल्क समाप्त करेगा। चूंकि ओमान की 11 प्रतिशत टैरिफ लाइन पहले से ही शुल्क-मुक्त हैं, इसलिए भारतीय कारोबारियों को कुल 98 प्रतिशत टैरिफ लाइन पर शुल्क-मुक्त पहुंच प्राप्त होगी। सेवा क्षेत्र में ओमान ने कंप्यूटर संबंधी सेवाओं, व्यावसायिक और पेशेवर सेवाओं, ऑडियो विजुअल सेवाओं, अनुसंधान एवं विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं सहित कई क्षेत्रों को खोलने की प्रतिबद्धता जताई है, जिससे भारतीय सेवा प्रदाताओं को लाभ होगा। इस समझौते की एक प्रमुख विशेषता &lsquo;मोड-4&rsquo; के तहत ओमान में भारतीयों के लिए अस्थायी रोजगार के अवसरों में उल्लेखनीय वृद्धि है।</p>
<p>ओमान के साथ समझौता खाड़ी क्षेत्र में यूएई के बाद भारत का दूसरा द्विपक्षीय व्यापार समझौता है। लेकिन वैश्विक वस्तु आयात और सेवा आयात में ओमान की सीमित हिस्सेदारी को देखते हुए यह भारत के निर्यात विविधीकरण के लक्ष्य में बड़ा योगदान नहीं दे पाएगा। हालांकि यह समझौता रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र में भारत की मौजूदगी को मजबूत करता है। इस लिहाज से इसका महत्व कम नहीं है। खास बात यह है कि भारत का मध्यम अवधि का उद्देश्य खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के साथ एक व्यापक समझौता करना है और ओमान के साथ सीईपीए को इस लक्ष्य की दिशा में एक अहम कदम के रूप में देखा जाना चाहिए।</p>
<p><strong>न्यूजीलैंड के साथ द्विपक्षीय समझौता</strong><br />भारत-न्यूजीलैंड एफटीए की लंबी चली वार्ताओं में भारत के डेयरी बाजार को खोलना सबसे विवादास्पद मुद्दा रहा। हालांकि भारत ने डेयरी उत्पादों पर शुल्क कम करने से इनकार किया, फिर भी ऐसा लगता है कि भारत ने इस क्षेत्र से जुड़ी दो प्रतिबद्धताओं को स्वीकार करते हुए एफटीए को अंतिम रूप दिया है। पहली प्रतिबद्धता के तहत भारत ने न्यूजीलैंड के डेयरी उत्पादों के शुल्क-मुक्त आयात को आगे की मैन्युफैक्चरिंग और निर्यात के लिए एक समर्पित फास्ट-ट्रैक तंत्र लागू करने पर सहमति जताई है। न्यूजीलैंड को उम्मीद है कि इससे भारत की सप्लाई चेन में, और भारत के बढ़ते एफटीए साझेदार देशों तक, उसके निर्यातकों के लिए नए अवसर पैदा होंगे। दूसरी प्रतिबद्धता यह है कि यदि भारत भविष्य में किसी अन्य देश के लिए अपना डेयरी बाजार खोलता है, तो वह न्यूजीलैंड के डेयरी उद्योग को भी समान रियायतें देगा। खास तौर पर यह दूसरी प्रतिबद्धता नया विवाद शुरू कर सकती है, क्योंकि अमेरिका और यूरोपीय यूनियन दोनों ही भारत के साथ अपने एफटीए के तहत डेयरी उत्पादों पर शुल्क कम करने की मांग करते रहे हैं।</p>
<p>दूसरी तरफ, भारत के सभी निर्यात को शुल्क-मुक्त पहुंच देने की न्यूजीलैंड की प्रतिबद्धता से महत्वपूर्ण अवसर खुलते हैं। हालांकि भारत का यह एफटीए साझेदार देश औसतन बहुत कम शुल्क (2024 में 1.9 प्रतिशत) लागू करता है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में (खासकर भारतीय निर्यात वाले क्षेत्रों में) इसके शुल्क काफी अधिक हैं। इनमें गारमेंट्स पर 45 प्रतिशत का अधिकतम शुल्क तथा इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों, रसायनों और चमड़ा उत्पादों पर 10 प्रतिशत का शुल्क शामिल हैं।</p>
<p>भारत और न्यूजीलैंड के बीच सेवा व्यापार में भी विस्तार होने की संभावना है, क्योंकि दोनों देशों ने अपने-अपने सेवा क्षेत्रों को खोलने को लेकर व्यापक प्रतिबद्धताएं जताई हैं। न्यूजीलैंड ने कौशल वाले पेशे में कार्यरत भारतीयों को हर वर्ष 1,667 तीन-वर्षीय अस्थायी रोजगार प्रवेश वीजा देने पर सहमति जताई है। हालांकि किसी भी समय इसकी अधिकतम सीमा 5,000 होगी। यह संख्या न्यूजीलैंड द्वारा प्रतिवर्ष जारी किए जाने वाले कुल स्किल्ड वीजा के औसत से कम है।</p>
<p><strong>भारत-ईयू एफटीए</strong><br />भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौते को अब तक भारत का सबसे व्यापक द्विपक्षीय समझौता माना जा रहा है। चाहे वह शामिल क्षेत्रों की व्यापकता हो या बाजार खोलने की सीमा। यूरोपीय आयोग की प्रेसिडेंट उर्सुला वॉन डर लेयेन ने इसे &lsquo;सभी सौदों की जननी&rsquo; कहा है। इस समझौते के तहत यूरोपीय यूनियन अपनी 97 प्रतिशत टैरिफ लाइन में भारतीय निर्यात को तरजीही पहुंच देगा, जो आयात मूल्य के लिहाज से 99.5 प्रतिशत को कवर करता है। इससे भारत को वस्त्र, चमड़ा और फुटवियर, खेल सामान तथा आभूषण जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों के निर्यात में वृद्धि का लाभ मिलने की संभावना है। इसके अलावा चाय, कॉफी, मसाले, ताजी सब्जियां और फल तथा प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद जैसे कई कृषि उत्पादों को भी तरजीही बाजार पहुंच मिलेगी।</p>
<p>दूसरी ओर, भारत ने भी शुल्क समाप्त करने की महत्वपूर्ण प्रतिबद्धता जताई है। कुल मिलाकर भारत अपनी 92 प्रतिशत टैरिफ लाइन को खोलने की पेशकश कर रहा है, जो ईयू के 97.5 प्रतिशत निर्यात को कवर करती हैं। भारत के बाजार खुलने से ईयू के ऑटोमोबाइल, फार्मास्यूटिकल्स, रसायन, लोहा-इस्पात और मशीनरी उद्योगों को सबसे अधिक लाभ मिलने की संभावना है। भारत ने इस एफटीए से अनाज और डेयरी उत्पादों को बाहर रखा है, लेकिन उसने जैतून तेल, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ और भेड़ के मांस जैसे कई कृषि उत्पादों पर शुल्क समाप्त करने पर सहमति दी है। इसके अलावा वाइन और स्पिरिट्स पर भी शुल्क में उल्लेखनीय कटौती की जाएगी। इसके परिणामस्वरूप भारत के खाद्य प्रसंस्करण उद्योग पर यूरोपीय यूनियन के समकक्ष उद्योगों से प्रतिस्पर्धा का दबाव होगा।</p>
<p>हालांकि यूरोपीय यूनियन को निर्यात बढ़ने से कई भारतीय उद्योगों को लाभ मिलने का अनुमान है, लेकिन वे इन लाभों को तभी साकार कर पाएंगे जब वे व्यापक नियामक बाधाओं को पार कर सकें। खाद्य सुरक्षा, पर्यावरण और श्रम सहित कई क्षेत्रों में ईयू के मानक बहुत कड़े हैं। इसलिए इस एफटीए से अनुमानित लाभों को पूरी तरह हासिल करने के लिए सरकार और उद्योग जगत को आपसी तालमेल के साथ काम करना होगा।&nbsp;</p>
<p><em>(लेखक जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर हैं)</em></p> ]]></description>

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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[एथेनॉल की आपूर्ति बढ़ने के बावजूद किसान और इंडस्ट्री के स्तर पर चुनौतियां बरकरार]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/despite-enhanced-supply-of-ethanol-challenges-remain-for-industry-and-farmers.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 07 Mar 2026 11:20:34 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/despite-enhanced-supply-of-ethanol-challenges-remain-for-industry-and-farmers.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत के ऊर्जा क्षेत्र में बदलाव एक कृषि-कथा बनता जा रहा है। इसलिए नहीं कि किसान अधिक ऊर्जा की खपत कर रहे हैं, बल्कि इसलिए कि कृषि से अब ऊर्जा उत्पादन में योगदान की अपेक्षा की जा रही है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) का अनुमान है कि अगले एक दशक में वैश्विक ऊर्जा मांग में होने वाली वृद्धि में सबसे बड़ा योगदान भारत का होगा। बढ़ती ऊर्जा जरूरतों पर इन दिनों हो रही चर्चा का बड़ा हिस्सा एआई और डेटा सेंटर पर केंद्रित है। लेकिन ऊर्जा की मांग में वृद्धि इससे कहीं व्यापक और संरचनात्मक है। बढ़ती आय, शहरीकरण, विद्युतीकरण और गर्म होती जलवायु, ये सभी घरेलू उपभोक्ताओं, परिवहन और उद्योगों में ऊर्जा की जरूरत बढ़ा रहे हैं। कूलिंग की मांग इसका एक उदाहरण है। वैश्विक स्तर पर एयर कंडीशनर की संख्या ही आज की लगभग 1.6 अरब यूनिट से बढ़कर 2050 तक करीब 5.6 अरब यूनिट (आईईए) होने की उम्मीद है। यानी अगले तीन दशकों तक हर सेकंड लगभग दस नए यूनिट जोड़े जाएंगे। हाल के इंडिया एनर्जी वीक 2026 में भी इसका उल्लेख किया गया।</p>
<p>ऊर्जा की मांग में वृद्धि संरचनात्मक तथा जीवनशैली से प्रेरित है और इससे बचा नहीं जा सकता। यही कारण है कि भारत के लिए बायोएनर्जी कोई विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता है। इसी वजह से कृषि की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।</p>
<p><strong>अनिवार्यताओं पर आधारित बायोफ्यूल परिकल्पना</strong><br />पिछले एक दशक में भारत की ऊर्जा नीति ने ब्लेंडिंग की अनिवार्यताओं और विभिन्न क्षेत्रों के लिए तय लक्ष्यों के माध्यम से बायोफ्यूल की मांग को लगातार मजबूत किया है। पेट्रोल में एथेनॉल ब्लेंडिंग लगभग 20 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। डीजल के लिए बायोडीजल ब्लेंडिंग के लक्ष्य भी जारी हैं। सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क में कंप्रेस्ड बायोगैस (सीबीजी) के मिश्रण को अनिवार्य किया गया है। कोयला आधारित बिजली संयंत्रों में बायोमास को-फायरिंग की भी अनिवार्यता है। हाल ही अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल के लक्ष्य भी घोषित किए गए हैं। ये केवल पायलट योजनाएं नहीं हैं। ये परिवहन, बिजली और विमानन तीनों क्षेत्रों में बायोमास आधारित ईंधनों के लिए सुनिश्चित और नीति-प्रेरित मांग पैदा करती हैं।</p>
<p><strong>जैव-ईंधन नीति में &lsquo;बायोमास&rsquo;</strong><br />नीतिगत भाषा में जैव-ईंधन बायोमास पर निर्भर करता है। व्यवहार में इसमें फसल अवशेष, गोबर, पोल्ट्री कचरा, प्रेस-मड, बगास, नगरपालिका का जैविक कचरा, स्लॉटर हाउस का कचरा, उपयोग किए हुए खाद्य तेल, कृषि उद्योग के बायप्रोडक्ट तथा ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में उपलब्ध अन्य जैविक स्रोत शामिल हैं। हालांकि बायोमास में नगरपालिका और उद्योगों का जैविक कचरा भी आता है, लेकिन भारत की जैव ईंधन अनिवार्यताओं के लिए पैमाना, भौगोलिक फैलाव और निरंतर उपलब्धता की आवश्यकता के कारण कृषि आधारित बायोमास ही प्रमुख आधार है। कागज पर तो यह बायोमास प्रचुर मात्रा में उपलब्ध दिखाई देता है, लेकिन जमीनी स्तर पर यह बिखरा हुआ, मौसमी और नमी वाला होता है। इसके अलावा, यह पहले से ही ग्रामीण आजीविकाओं का अभिन्न हिस्सा बना हुआ है।</p>
<p><strong>एथेनॉल से सबक</strong><br />एथेनॉल मिश्रण का स्तर तेजी से बढ़ा है (चित्र 1) और देश के कई हिस्सों में अब यह 20 प्रतिशत से भी अधिक हो गया है। एथेनॉल सप्लाई वर्ष 2018-19 में ईंधन मिश्रण के लिए तेल विपणन कंपनियों को 1.9 अरब लीटर बायो-एथेनॉल की आपूर्ति हुई थी, वहीं 2024-25 में यह बढ़कर 10 अरब लीटर हो गई। वर्ष 2024-25 में तेल कंपनियों को प्राप्त कुल एथेनॉल का 68 प्रतिशत हिस्सा अनाज-आधारित एथेनॉल से आया, जिसमें मक्का और चावल से क्रमशः 4.8 अरब लीटर और 2.1 अरब लीटर की आपूर्ति हुई। चीनी क्षेत्र की हिस्सेदारी 32 प्रतिशत रही। वर्ष 2024-25 में ईंधन में एथेनॉल के लिए लगभग 126 लाख मीट्रिक टन मक्का और 48 लाख टन चावल का इस्तेमाल हुआ।</p>
<p>हालांकि एथेनॉल की आपूर्ति की जा रही है, लेकिन ब्लेंडिंग मिश्रण से जुड़ी प्रणालियों पर स्पष्ट रूप से दबाव है। डिस्टिलरी इकाइयों को फसल चक्र से जुड़ी मौसमी कच्चे माल की कमी का सामना करना पड़ रहा है। तेल कंपनियां अधिक ब्लेंडिंग के लिए भंडारण और वितरण से जुड़ी चुनौतियों से अब भी जूझ रही हैं। वाहनों के &lsquo;ई-20&rsquo; की ओर बढ़ने के कारण इंजन के घिसाव, रखरखाव और ईंधन दक्षता को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं।</p>
<p><strong>चार संरचनात्मक चुनौतियां</strong><br />1. &nbsp;एग्रीगेशन और लॉजिस्टिक्स: बायोमास लाखों खेतों, पशुशालाओं, मिलों और नगरपालिका यार्डों में बिखरा पड़ा होता है। इसे इकट्ठा करने, सुखाने, भंडारण करने और परिवहन करने के लिए ऐसे स्थानीय ढांचे की जरूरत है जो फिलहाल लगभग मौजूद ही नहीं है। प्रसंस्करण से पहले की व्यवस्था और एग्रीगेशन सिस्टम के बिना जैव-ईंधन संयंत्रों को साल भर भरोसेमंद आपूर्ति सुनिश्चित करना मुश्किल और महंगा होता है।</p>
<p>2. खाद्य-ईंधन-चारा पर बहस: सरप्लस बायोमास का बड़ा हिस्सा पहले ही कई तरह के उपयोग में है- फसल अवशेष का चारे और पशुओं की बेडिंग के रूप में, गोबर का खाद और रसोई में ईंधन के तौर पर, तथा फसल सामग्री का मिट्टी के पोषण और छप्पर बनाने में। जब मक्का, धान और गन्ना जैसी फसलों का इस्तेमाल सीधे एथेनॉल बनाने में होता है, तो मुद्दा केवल अवशेषों तक सीमित न रहकर भूमि, जल, चारा और खाद्य प्रणालियों तक फैल जाता है। हालिया आर्थिक सर्वेक्षण में ओईसीडी-एफएओ के विश्लेषण का हवाला देते हुए बताया गया है कि विभिन्न देशों में जैव-ईंधन की अनिवार्यता ने फसल क्षेत्रफल में ऐतिहासिक रूप से स्थायी बदलाव किए हैं, क्योंकि किसान मांग के अनुरूप प्रतिक्रिया देते हैं। भूमि के सावधानीपूर्वक उपयोग की योजना और बायोमास बाजार के उचित आकार निर्धारण के बिना, ऊर्जा नीति से मिलने वाले संकेत अनजाने में फसल पैटर्न को बदल सकते हैं।</p>
<p>3. जैव-ईंधनों के बीच फीडस्टॉक टकराव: जैव-ईंधन अब एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करने लगे हैं। एक ही प्रकार के अवशेषों को 2जी एथेनॉल, सीबीजी, पेलेट्स, को-फायरिंग और यहां तक कि सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल के लिए गिना जा रहा है। नगर निगम का कचरा और उपयोग किए गए तेलों को भी कई तरह के ईंधन के योग्य माना जा रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर फीडस्टॉक आवंटन की स्पष्ट नीति के अभाव में भारत कागजों पर ही बायोमास क्षमता का आकलन कर रहा है। इससे जमीनी स्तर पर अनुपयोगी जैव ईंधन एसेट खड़ा होने का जोखिम है।</p>
<p>4. एकीकृत बायोमास बाजार और गवर्नेंस ढांचे का अभाव: भारत में अभी तक बायोमास की गुणवत्ता के मानक, पारदर्शी मूल्य निर्धारण व्यवस्था, दीर्घकालिक अनुबंध या बायोमास की उपलब्धता का राष्ट्रीय स्तर का मैपिंग तंत्र मौजूद नहीं है। बायोमास बाजार स्थानीय और बिखरे हुए हैं। निवेशकों के लिए फीडस्टॉक से जुड़ा जोखिम ऊंचा है, जबकि किसानों के लिए बाजार तक पहुंच भी अनिश्चित है।</p>
<p><strong>केंद्रीय बजट में क्या है प्रावधान</strong><br />बजट इस असंतुलन को और मजबूत करता है। जैव ईंधन उत्पादन क्षमता के लिए समर्थन जारी है, जिसमें 2जी एथेनॉल के लिए अधिक आवंटन और बायोगैस मिश्रित ईंधनों के लिए प्रोत्साहन शामिल हैं। बायोगैस मिश्रित सीएनजी पर उत्पाद शुल्क में कटौती जैसे उपाय बायोगैस संयंत्रों की व्यवहार्यता सुधारने की दिशा में एक स्वागत योग्य कदम हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत सरकार ने बायोमास के संग्रह के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करने की एक योजना के तहत पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय को लगभग 150 करोड़ रुपये आवंटित किए थे, लेकिन 2026-27 में यह आवंटन घटाकर 100 करोड़ रुपये कर दिया गया है। संयंत्रों को जिस गति से वित्त पोषण मिल रहा है, उस तुलना में बायोमास सिस्टम का निर्माण धीमी गति से हो रहा है। यह असंतुलन मामूली नहीं, बल्कि मूलभूत और केंद्रीय समस्या है।</p>
<p><strong>भारत के जैव-ईंधन का भविष्य खेत तय करेंगे</strong><br />जैव-ईंधन भारत को किसानों की आय को स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन से जोड़ने का, जीवाश्म ईंधन आयात पर निर्भरता घटाने का और जलवायु प्रतिबद्धताओं को एक साथ पूरा करने का दुर्लभ अवसर देते हैं। लेकिन केवल अधिक रिफाइनरियां बनाने से यह संभावना साकार नहीं होगी। इसके लिए ग्रामीण स्तर पर एग्रीगेशन के लिए विशेष उद्यमों का गठन, भंडारण प्रणाली, बायोमास के लिए मूल्य निर्धारण तंत्र और विभिन्न ईंधन स्रोतों के बीच स्पष्ट प्राथमिकताओं की आवश्यकता है। भारत के जैव-ईंधन का भविष्य सिर्फ संयंत्रों में नहीं, बल्कि खेतों में भी तय होगा।&nbsp;</p>
<p><em>(श्वेता सैनी कृषि अर्थशास्त्री और आर्कस पॉलिसी रिसर्च की संस्थापक एवं सीईओ हैं। पुलकित खत्री कृषि अर्थशास्त्री और आर्कस पॉलिसी रिसर्च में लीड कैपेसिटीज हैं)</em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ एथेनॉल की आपूर्ति बढ़ने के बावजूद किसान और इंडस्ट्री के स्तर पर चुनौतियां बरकरार ]]></media:description>
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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[बजट 2026&amp;#45;27 में किसानों के लिए कुछ नहीं बदला]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/budget-2026-27-keeps-‘business-as-usual’-for-farmers.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 05 Mar 2026 11:38:22 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/budget-2026-27-keeps-‘business-as-usual’-for-farmers.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>इस वर्ष के बजट से किसानों की क्या अपेक्षाएं थीं? इसका उत्तर इस बात पर निर्भर करता है कि आप किससे पूछ रहे हैं। उद्योग संगठनों के विपरीत, किसानों के पास कोई एकीकृत &lsquo;व्यावसायिक&rsquo; संगठन नहीं है जो बजट से पहले या बाद में सरकार और मीडिया के साथ प्रभावी संवाद कर सके। कुछ आवाजें जरूर हैं, लेकिन इतनी प्रभावशाली नहीं कि किसानों के पक्ष में नीतिगत दिशा बदल सकें। इसलिए यह निश्चित रूप से कहना कठिन है कि किसानों की अपेक्षाएं क्या थीं और निराशा कहां हुई। संभव है कि किसानों ने उम्मीद की हो, या कहना अधिक उपयुक्त होगा कि उन्होंने &lsquo;दुआ की&rsquo; हो, कि बजट में ऐसा कुछ होगा जो उनकी आय बढ़ाए और उनके जोखिम को कम करे। अधिक सब्सिडी? बेहतर दाम? आसान और सुलभ व्यवस्था? इन सवालों पर खुद किसानों की राय भी एक जैसी नहीं है। लेकिन बजट में उन्हें इनमें से कुछ भी नहीं मिला- और यही उनकी निराशा का कारण हो सकता है। वास्तव में, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के बजट में &lsquo;किसान कल्याण&rsquo; को लेकर कोई ठोस बात नजर नहीं आती।</p>
<p>यहां हम यथार्थ को परख सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय और घरेलू दोनों बाजार बदल रहे हैं, और सरकार जितना कर सकती है या जितना उसे करना चाहिए, उसकी भी एक सीमा है। यह अलग सवाल है कि सरकार ने वास्तव में उतना किया या नहीं जितना वह कर सकती थी! क्या अब समय आ गया है कि किसान घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों बाजारों में तकनीक, वित्त और बाजारों तक बिना रोक-टोक पहुंच की मांग करे और उससे जुड़े जोखिम भी स्वयं उठाए? क्या नई तकनीक, कुशल संस्थाओं और अधिक स्वतंत्रता की ओर बढ़ने का वक्त आ गया है? अगर ऐसा है, तो रणनीति और उसका नैरेटिव दोनों स्पष्ट होने चाहिए।</p>
<p>फिलहाल बजट और उसके आंकड़ों की बात करें। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय को बजटीय आवंटन में लगभग कोई बढ़ोतरी नहीं मिली है। इसके उलट, मत्स्य पालन, डेयरी और पशुपालन क्षेत्रों को उल्लेखनीय बढ़त मिली है। पशुपालन एवं डेयरी विभाग का बजट आवंटन 5,302.83 करोड़ से बढ़कर 6,153.46 करोड़ रुपये हो गया है, यानी लगभग 16 प्रतिशत की वृद्धि है। वहीं मत्स्य विभाग का आवंटन 1,732.95 करोड़ से बढ़कर 2,761.80 करोड़ हो गया है, जो 59 प्रतिशत की बढ़ी बढ़ोतरी है। दोनों ही पूरी तरह जायज हैं। सहकारिता क्षेत्र को भी बड़ा प्रोत्साहन मिला है, जिसका अधिकांश हिस्सा एनसीईएल (राष्ट्रीय स्तर की शीर्ष निर्यात सहकारी संस्था) को गया है। एनसीईएल क्या करेगा (उम्मीद है निर्यात अवसंरचना के लिए) यह अभी स्पष्ट नहीं है। यह किसानों तक &lsquo;समृद्धि&rsquo; कैसे पहुंचाएगा, यह भी फिलहाल अज्ञात है। इसलिए अभी इंतजार करें और देखें।</p>
<p>वास्तविक निराशा अनुसंधान एवं विकास के लिए आवंटन में कटौती को लेकर है। कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (डेयर/आईसीएआर) का आवंटन 2025-26 के संशोधित अनुमान 10,280.83 करोड़ रुपये से घटकर 2026-27 के बजट अनुमान में 9,967.40 करोड़ रह गया है। यानी 313.43 करोड़ या लगभग 3 प्रतिशत की कमी। मुझे आरएंडडी बजट में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की उम्मीद थी, इसके कई कारण थे: 1) कृषि क्षेत्र में आरएंडडी में किया गया कोई भी निवेश सबसे अधिक प्रतिफल देता है। 2) आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए कृषि एवं सहयोगी क्षेत्रों में गहन शोध प्रयास आवश्यक हैं। 3) जलवायु अनुकूलन और टिकाऊ कृषि के लिए कहीं अधिक विकेंद्रीकृत और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप अनुसंधान की जरूरत है। इन सभी चुनौतियों की अनदेखी का खामियाजा लंबे समय में भारी कीमत चुकाकर भुगतना पड़ सकता है।</p>
<p>उर्वरक सब्सिडी (1,70,781 करोड़) और खाद्य सब्सिडी (2,27,629 करोड़), ये दोनों प्रमुख सब्सिडी यथावत रखी गई हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि संशोधित अनुमान में इन दोनों में बढ़ोतरी की जाएगी। लेकिन इतने ऊंचे उर्वरक सब्सिडी बोझ के कारण प्राकृतिक खेती के लिए मात्र 750 करोड़ का प्रावधान किया गया है।</p>
<p>मनरेगा के विवादास्पद विकल्प वीबी जी राम जी के लिए 95,692 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। लेकिन इसमें एक बड़ी शर्त जुड़ी है। यह राशि कुल प्रावधान का केवल 60% है; शेष 40%, यानी लगभग 60,000 करोड़ रुपये, राज्यों को स्वयं जुटाने होंगे। ऐसे में संभावना है कि यह योजना चालू वित्त वर्ष में अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाएगी। वर्ष के अंत में जब वास्तविक खर्च के आंकड़े सामने आएंगे, तब इसमें गिरावट साफ दिखाई देगी।<br />अब कृषि और सहयोगी क्षेत्रों के लिए की गई प्रमुख घोषणाओं पर एक त्वरित नजर डालते हैं।</p>
<p><strong>मत्स्य पालन:</strong> (i) 500 जलाशयों और अमृत सरोवरों का एकीकृत विकास, (ii) तटीय क्षेत्रों में फिशरीज वैल्यू चेन को सशक्त करना तथा स्टार्टअप और महिला नेतृत्व वाले समूहों को मत्स्य किसान उत्पादक संगठनों के साथ जोड़ते हुए बाजार से जुड़ाव सक्षम करना।</p>
<p><strong>पशुपालन:</strong> उद्यमिता विकास के लिए (क) क्रेडिट-लिंक्ड सब्सिडी कार्यक्रम, (ख) पशुधन उद्यमों का विस्तार और आधुनिकीकरण, (ग) पशुधन, डेयरी और पोल्ट्री पर केंद्रित एकीकृत मूल्य शृंखला के सृजन को बढ़ावा, तथा (घ) पशुधन किसान उत्पादक संगठनों के गठन को प्रोत्साहन।</p>
<p><strong>उच्च मूल्य कृषि:</strong> तटीय क्षेत्रों में नारियल, चंदन, कोको और काजू जैसी उच्च मूल्य वाली फसलों को समर्थन, जिसमें प्रमुख नारियल उत्पादक राज्यों में पुराने और गैर-उत्पादक पेड़ों की जगह नई उन्नत किस्म के पौधे लगाना शामिल है।</p>
<p>कच्चे काजू और कोको के उत्पादन व प्रसंस्करण में भारत को आत्मनिर्भर बनाने, निर्यात प्रतिस्पर्धा बढ़ाने तथा भारतीय काजू और भारतीय कोको को वर्ष 2030 तक प्रीमियम वैश्विक ब्रांड के रूप में स्थापित करने के लिए एक समर्पित कार्यक्रम प्रस्तावित किया गया है। भारतीय चंदन पारिस्थितिकी तंत्र की खोई हुई प्रतिष्ठा बहाल करने के लिए लक्षित खेती और कटाई-पश्चात प्रसंस्करण को बढ़ावा दिया जाएगा।</p>
<p>भारत-विस्तार की शुरुआतः यह एक बहुभाषी एआई टूल होगा, जो एग्रीस्टैक पोर्टल और आईसीएआर कृषि पद्धतियों से जुड़े पैकेज को एआई प्रणालियों के साथ एकीकृत करेगा। इससे कृषि उत्पादकता बढ़ेगी, किसानों को बेहतर निर्णय लेने में मदद मिलेगी और अनुकूलित सलाह सेवाओं के माध्यम से जोखिम में कमी आएगी।</p>
<p>इनमें से भारत विस्तार एक गेम-चेंजर के रूप में उभर सकता है। यदि कृषि से जुड़ी प्रमुख सलाह सेवाओं, जैसे मौसम, मृदा में नमी, मृदा में पोषक तत्वों की स्थिति, कीट प्रकोप और बाजार परिस्थितियों के साथ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का एकीकरण किया जाए, तो यह किसानों को अमूल्य सहयोग प्रदान कर सकता है। हालांकि, इसकी रूपरेखा स्थानीय फसलों, मौसम और मृदा स्थितियों के अनुरूप होना अनिवार्य है। &lsquo;वन-साइज-फिट्स-ऑल&rsquo; मॉडल अपनाने में खतरा निहित है। इसके लिए निरंतर डेटा अपग्रेड और बदलती जरूरतों व उभरती चुनौतियों के अनुरूप एक बेहतर, आईसीएआर-प्रेरित टेक्नोलॉजी एवं एडवाइजरी प्रणाली की आवश्यकता होगी।</p>
<p>तटीय क्षेत्रों में नारियल, काजू, कोको और चंदन के लिए की गई घोषणाएं मुख्यतः केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे दक्षिणी राज्यों को लक्षित प्रतीत होती हैं। नारियल के लिए एक केंद्रीय नारियल बोर्ड पहले से मौजूद है, जिसने अतीत में इसी तरह की योजनाएं चलाई हैं, लेकिन उन्हें बहुत अधिक सफलता नहीं मिली। नई योजना किस तरह से तैयार की जाती है, यही निर्णायक होगा। चूंकि इसका विस्तृत विवरण उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए इस पर टिप्पणी करना कठिन है। हालांकि, यह कहना आवश्यक है कि पुनरुद्धार और पुनःरोपण की योजनाएं नई नहीं हैं। विभिन्न फसलों में इन्हें अलग-अलग स्तर की सफलता के साथ आजमाया जा चुका है।</p>
<p>कच्चे काजू में आत्मनिर्भरता एक दीर्घकालिक लक्ष्य है। काजू के बागानों का पुनरुद्धार, नई किस्मों के साथ पुनःरोपण, पौधशालाओं और रोपण सामग्री की व्यवस्था के लिए एक समेकित परियोजना की आवश्यकता है। चूंकि किसान उपजाऊ भूमि पर काजू लगाना आकर्षक नहीं मानते, इसलिए आंशिक रूप से खराब भूमि पर बड़े पैमाने के बागानों की ओर ध्यान देना होगा। काजू को प्लांटेशन फसल घोषित करना और भूमि सीमा कानूनों के तहत छूट देना काजू उत्पादन में आवश्यक निवेश ला सकता है। प्रसंस्करण की गुणवत्ता और दक्षता में सुधार कर निर्यात प्रतिस्पर्धा बढ़ाने का विचार सही है। हालांकि, इसके लिए प्रौद्योगिकी, बाहरी बाजारों में गुणवत्ता मानकों की स्पष्ट समझ जरूरी है और नीति का फोकस चुनिंदा &lsquo;एक्सपोर्ट लीडर्स&rsquo; पर होना चाहिए, न कि इसे &lsquo;सभी के लिए सब्सिडी&rsquo; वाली व्यवस्था बना दिया जाए।</p>
<p>कोको का मामला अधिक जटिल है। कोको बीन्स की अंतर्निहित गुणवत्ता से लेकर उसके प्री-प्रोसेसिंग और अंततः घटक के रूप में उपयोग होने वाले अंतिम उत्पाद तक, प्रभावी परिणामों के लिए कई उपाय करने की आवश्यकता होगी। पिछले तीन दशकों में किए गए प्रयोगों की गलतियां इस दिशा में महत्वपूर्ण संकेत दे सकती हैं। आदर्श रूप से, अनुसंधान एवं विकास, उत्पादन, प्रसंस्करण और बाजार, इन सभी को मिशन मोड में एक साथ जोड़ा जाना चाहिए था।</p>
<p>पशुपालन और मत्स्य क्षेत्र पर दिया गया जोर काफी समय से अपेक्षित था। ये दोनों क्षेत्र तेजी से बढ़ रहे हैं और इन्हें अधिक स्तर के समर्थन की आवश्यकता है। पशु प्रोटीन की मांग लगातार बढ़ रही है और ये क्षेत्र कृषि एवं सहयोगी क्षेत्रों की वृद्धि को तेज कर सकते हैं। अंतर्देशीय मत्स्य पालन के लिए जल निकायों में निवेश, यदि पर्याप्त अनुसंधान एवं विकास तथा बुनियादी ढांचा समर्थन के साथ किया जाए, तो इस क्षेत्र को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकता है।</p>
<p>फसल क्षेत्र की तुलना में डेयरी और पोल्ट्री क्षेत्रों की वृद्धि दर अधिक रही है। पूरे देश में पोल्ट्री के लिए एकीकृत वैल्यू चेन की जरूरत है, जिन्हें निजी क्षेत्र द्वारा अपेक्षाकृत आसानी से स्थापित किया जा सकता है। भारत के बड़े हिस्से में डेयरी वैल्यू चेन सहकारी क्षेत्र में पहले से मौजूद हैं। सवाल यह है कि क्या उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में, जहां सहकारी संस्थाएं कमजोर हैं, उन्हें मजबूत किया जाएगा, या फिर यह कार्यक्रम डेयरी वैल्यू चेन में अधिक निजी निवेश लाने का माध्यम बनेगा? हालांकि डेयरी क्षेत्र निजी निवेश के लिए काफी आकर्षक बन चुका है, लेकिन सहकारी संस्थाएं विकास के लिहाज से कहीं अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसलिए इस कार्यक्रम को लागू करते समय सामाजिक उद्देश्यों और शुद्ध मुनाफे के लक्ष्यों के बीच स्पष्ट अंतर करना जरूरी है।</p>
<p><strong>क्या कमी रह गई?</strong><br />किसानों की आय बढ़ाने के लिए कोई स्पष्ट रणनीति नहीं, टिकाऊ खेती के लिए कोई ठोस रोडमैप नहीं, जलवायु और बाजार-जनित जोखिमों से कृषि को सुरक्षित करने की कोई स्पष्ट योजना नहीं, और प्राकृतिक व जैविक खेती पर वास्तविक अर्थों में जोर, ये इस बजट की बड़ी चूक हैं। सबसे निराशाजनक पहलू कृषि अनुसंधान एवं विकास के लिए आवंटन में कमी, टिकाऊ खेती के लिए बेहद कम प्रावधान और गवर्नेंस में सुधार के लिए किसी नए विचार का अभाव है।<br />मेरा मानना है कि वित्त मंत्री इससे कहीं अधिक कर सकती थीं। हमेशा की तरह किसान बेहतर दिनों की उम्मीद करेंगे और उत्पादन जारी रखेंगे ताकि उपभोक्ताओं को भोजन मिलता रहे। लेकिन क्या हमें इसी से संतुष्ट हो जाना चाहिए? सवाल अब भी कायम है।&nbsp;</p>
<p><em>(लेखक भारत सरकार में कृषि मंत्रालय और खाद्य मंत्रालय के पूर्व सचिव हैं)</em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ बजट 2026-27 में किसानों के लिए कुछ नहीं बदला ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[अमेरिका के साथ व्यापार समझौते की अब क्या होगी रणनीति?]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/what-will-happen-to-the-india-us-trade-agreement-now.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 22 Feb 2026 12:46:47 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/what-will-happen-to-the-india-us-trade-agreement-now.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के रेसिप्रोकल टैरिफ के फैसले को रद्द करने से भारत और अमेरिका के बीच होने वाले व्यापार समझौते (ट्रेड डील) को लेकर अनिश्चितता की स्थिति बन गई है। दोनों देशों ने फरवरी की शुरुआत में जिस अंतरिम ट्रेड डील का फ्रेमवर्क जारी किया था, उस पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कई सवाल खड़े हो गए हैं।</p>
<p>पहला सवाल यह है कि क्या भारत और अमेरिका के बीच जिस फ्रेमवर्क पर सहमति बनी थी, वह ट्रंप टैरिफ पर केंद्रित था, जिसमें अमेरिका द्वारा भारतीय निर्यात पर 18 फीसदी का रियायती टैरिफ लगाने की बात तय हुई थी। अब स्थिति बदल गई है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद रेसिप्रोकल टैरिफ की व्यवस्था ही नहीं रह गई है। इसके बाद ट्रंप ने 10 फीसदी टैरिफ की घोषणा की है, जिसे बाद में बढ़ाकर 15 फीसदी कर दिया। ऐसे में क्या भारत को अमेरिका की शर्तों पर समझौता करने की आवश्यकता है, यह एक बड़ा सवाल है।</p>
<p>ट्रेड मामलों के प्रतिष्ठित विशेषज्ञ और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के पूर्व प्रोफेसर डॉ. बिस्वजीत धर का कहना है कि भारत के सामने नए सिरे से मोलभाव करने का अवसर है। हमें अमेरिका की शर्तें मानने की आवश्यकता नहीं है। जिन परिस्थितियों में बातचीत चल रही थी, वे अब बदल चुकी हैं। कृषि और रूस से तेल खरीद जैसे मुद्दों पर समझौता करने की कोई अनिवार्यता नहीं है।</p>
<p>डब्ल्यूटीओ वार्ताओं में भारत, व्यापार मामलों में विकासशील देशों को साथ लेकर एक समूह के रूप में दबाव बनाता रहा है। इसी कारण विकसित देश भारत को &lsquo;डील ब्रेकर&rsquo; कहते रहे हैं। उस समय भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भी नहीं था, लेकिन अब हम एक बड़ी अर्थव्यवस्था हैं। ऐसे में अमेरिका के साथ व्यापार समझौते में बिना किसी दबाव के, अपने हितों को केंद्र में रखकर बातचीत करनी चाहिए।</p>
<p>एक और सवाल यह है कि क्या प्रस्तावित व्यापार समझौते में हम शर्तें पहले ही स्वीकार कर चुके हैं। यदि स्वीकार भी कर ली हैं, तो क्या उन पर बने रहना आवश्यक है? फिलहाल कहा जा रहा है कि बातचीत जारी है और अंतिम समझौता नहीं हुआ है, केवल फ्रेमवर्क पर सहमति बनी है। यदि स्थिति यही है, तो नई परिस्थितियों के अनुसार आगे बढ़ने की जरूरत है।</p>
<p>कुछ विशेषज्ञ यह भी सवाल उठा रहे हैं कि जब निचली अदालत राष्ट्रपति ट्रंप के आईईईपीए के तहत टैरिफ लगाने के फैसले को रद्द कर चुकी थी और मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित था, तो हमारी सरकार ने अंतिम फैसले तक इंतजार क्यों नहीं किया। कई संगठनों और बड़ी संख्या में अमेरिकी कंपनियों ने ट्रंप के इस फैसले के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया था, जिससे संकेत मिल रहे थे। अमेरिकी संविधान के अनुसार, व्यापार मामलों में निर्णय लेने का अधिकार कांग्रेस के पास है। कांग्रेस पहले ही कनाडा के खिलाफ टैरिफ के फैसले में बदलाव कर चुकी है, जहां डेमोक्रेट्स के साथ कुछ रिपब्लिकन सांसदों ने भी समर्थन दिया था। ऐसे में अमेरिका में मौजूद हमारे लॉबिस्ट बेहतर सलाह दे सकते थे।</p>
<p>ट्रंप ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद धारा 122 के तहत जो 15 फीसदी टैरिफ लगाया है, जो केवल 150 दिनों के लिए वैध है और जुलाई में समाप्त हो जाएगा। इस प्रावधान के तहत भुगतान संतुलन (बैलेंस ऑफ पेमेंट) संकट की स्थिति में राष्ट्रपति यह कदम उठा सकता है। लेकिन अमेरिका के सामने ऐसा कोई संकट नहीं है। अमेरिकी डॉलर दुनिया की रिजर्व करेंसी है। इसलिए इस फैसले के खिलाफ भी अदालत जाने का रास्ता खुला है। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि फैसले में असहमति जताने वाले जज कैवेनाग के नोट को ध्यान से देखना होगा, क्योंकि वे संकेत दे रहे हैं कि आने वाले दिनों में ट्रंप को कुछ सकारात्मक सुझाव मिल सकते हैं।</p>
<p>कुल मिलाकर, नई परिस्थितियों में सभी देशों पर 15 फीसदी टैरिफ लागू होगा और भारत भी इससे अछूता नहीं है। रेसिप्रोकल टैरिफ के तहत भारत पर 50 फीसदी टैरिफ की घोषणा की गई थी, जिसे ट्रेड डील के तहत घटाकर 18 फीसदी किया गया था। हालांकि, ट्रंप टैरिफ से पहले भारतीय निर्यात पर औसत टैरिफ लगभग तीन फीसदी था। अब यह बढ़कर 15 फीसदी होगा और इस स्तर पर हमें अन्य निर्यातक देशों के साथ प्रतिस्पर्धा करनी होगी।</p>
<p>ऐसे में सभी की नजरें सरकार पर हैं कि क्या भारत&ndash;अमेरिका व्यापार समझौता पहले से तय संभावित शर्तों पर ही आगे बढ़ेगा या नई परिस्थितियों के अनुसार शर्तें तय की जाएंगी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ने एक सवाल के जवाब में कहा है कि भारत टैरिफ देगा और अमेरिका कोई टैरिफ नहीं देगा। इन सभी परिस्थितियों में आगे की रणनीति बेहद अहम होगी।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/02/image_750x500_699aade121be9.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ अमेरिका के साथ व्यापार समझौते की अब क्या होगी रणनीति? ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[केंद्रीय बजट 2026–27: भारत के कृषि निर्यात के लिए संकेत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/union-budget-2026–27-what-it-signals-for-indian-agricultural-trade.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 21 Feb 2026 06:45:57 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/union-budget-2026–27-what-it-signals-for-indian-agricultural-trade.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>केंद्रीय बजट 2026&ndash;27 में कृषि क्षेत्र के लिए किए गए आवंटनों और नई घोषणाओं पर व्यापक चर्चा हुई है। किंतु बजट केवल व्यय का दस्तावेज़ नहीं होते; वे नीति की दिशा भी दर्शाते हैं। यह बजट भी ऐसे संकेत देता है जो भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धा, मूल्य-श्रृंखला एकीकरण, लॉजिस्टिक दक्षता, विनियामक सुगमता और वैश्विक व्यापार के प्रति तैयारी को प्रभावित कर सकते हैं।</p>
<p>अंतरराष्ट्रीय व्यापार का वातावरण तेजी से बदल रहा है। भू-राजनीतिक तनाव, आपूर्ति व्यवधान और कड़े स्वच्छता एवं पादप स्वच्छता (SPS) मानक कृषि निर्यात के लिए नई चुनौतियाँ उत्पन्न कर रहे हैं। ऐसे समय में केवल उत्पादन पर्याप्त नहीं; गुणवत्ता, मानकों का पालन और कुशल परिवहन भी उतने ही आवश्यक हैं।</p>
<p><strong>उच्च</strong><strong>-</strong><strong>मूल्य</strong> <strong>कृषि</strong> <strong>और</strong> <strong>निर्यात</strong> <strong>अभिमुखता</strong></p>
<p>राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) और कृषिओन्नति योजना के बजट में संशोधित अनुमान 2025&ndash;26 की तुलना में क्रमशः 22.14 प्रतिशत और 64.71 प्रतिशत की वृद्धि की गई है। यह उत्पादकता, विविधीकरण और संरचनात्मक परिवर्तन पर बढ़ते जोर को दर्शाता है।</p>
<p>नारियल, काजू, कोको और चंदन जैसी उच्च-मूल्य फसलों के लिए रु.350 करोड़ का प्रावधान किया गया है। पूर्वोत्तर में अगरवुड तथा पहाड़ी क्षेत्रों में बादाम, अखरोट और पाइन नट जैसी मेवा फसलों को भी प्रोत्साहन दिया जा रहा है। इससे स्पष्ट है कि ध्यान अब थोक उत्पादन के बजाय मूल्य-श्रृंखला आधारित, बाज़ार-उन्मुख कृषि पर है।</p>
<p>नारियल मुख्यतः केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में उगाया जाता है और लाखों किसानों की आजीविका से जुड़ा है। वर्ष 2023&ndash;24 में नारियल उत्पादों का निर्यात रु.3,469.44 करोड़ रहा, जिसमें रु.187.48 करोड़ सूखे नारियल तथा रु.334.23 करोड़ ताज़ा नारियल से प्राप्त हुए। किंतु पारंपरिक उत्पादक क्षेत्रों में घटती उत्पादकता चिंता का विषय है। ऐसे में बागानों का पुनर्जीवन केवल कृषि सुधार का प्रश्न नहीं, बल्कि निर्यात की स्थिरता बनाए रखने के लिए भी आवश्यक है।</p>
<p>काजू के मामले में एक स्पष्ट संरचनात्मक विरोधाभास दिखाई देता है। वर्ष 2024 में भारत वैश्विक काजू उत्पादन में चौथे स्थान पर था, लेकिन प्रमुख आयातकों में बारहवें स्थान पर भी रहा। यह स्थिति घरेलू स्तर पर कच्चे काजू की उपलब्धता की सीमाओं और प्रसंस्करण क्षमता से जुड़ी प्रतिस्पर्धात्मक चुनौतियों को दर्शाती है। लगभग 8 प्रतिशत वार्षिक मांग वृद्धि के अनुमान से स्पष्ट है कि आपूर्ति श्रृंखला में सुधार के बिना आयात निर्भरता बनी रह सकती है।</p>
<p>कोको की खेती भी धीरे-धीरे विस्तार पा रही है, विशेषकर नारियल और सुपारी के साथ अंतरफसल के रूप में। इसके बावजूद कोको का आयात अभी भी बना हुआ है। इससे स्पष्ट है कि घरेलू उत्पादन और प्रसंस्करण की क्षमता मांग के अनुरूप अभी पर्याप्त नहीं है। ऐसे में कोको के लिए बढ़ा बजटीय समर्थन केवल उत्पादन विस्तार का प्रश्न नहीं, बल्कि मूल्य-श्रृंखला को सुदृढ़ करने की आवश्यकता की ओर भी संकेत करता है।</p>
<p><strong>अवसंरचना</strong> <strong>और</strong> <strong>लॉजिस्टिक्स</strong><strong>: </strong><strong>निर्यात</strong> <strong>की</strong> <strong>रीढ़</strong></p>
<p>नाशवंत कृषि उत्पादों के लिए समय पर और कम लागत वाला परिवहन आवश्यक है। केंद्रीय बजट 2026&ndash;27 में समर्पित माल गलियारों (Dedicated Freight Corridors), अंतर्देशीय जलमार्गों और तटीय कार्गो परिवहन पर निरंतर बल इस दिशा में एक स्पष्ट नीति प्राथमिकता को दर्शाता है। वर्तमान में कृषि उपज का बड़ा हिस्सा सड़क मार्ग से लंबी दूरी तक पहुँचाया जाता है। जाम, देरी और ईंधन लागत इसे महंगा बनाते हैं और इससे फल, सब्ज़ी, पुष्पोत्पादन और समुद्री उत्पादों की गुणवत्ता प्रभावित होती है।</p>
<p>भारत का अंतर्देशीय जलमार्ग नेटवर्क 20,000 किलोमीटर से अधिक विस्तृत है, किंतु कृषि परिवहन में इसका पूरा उपयोग नहीं हो रहा। यदि सड़क निर्भरता कम कर जलमार्ग और तटीय परिवहन को बढ़ावा दिया जाए तो लागत घट सकती है और आपूर्ति श्रृंखला अधिक स्थिर बन सकती है। उत्पादन क्षेत्रों, प्रसंस्करण इकाइयों और निर्यात बंदरगाहों के बीच बेहतर संपर्क से निर्यात प्रतिस्पर्धा सुदृढ़ होती है।</p>
<p><strong>मूल्य</strong> <strong>संवर्धन</strong> <strong>और</strong> <strong>प्रसंस्करण</strong><strong>: </strong><strong>कच्चे</strong> <strong>निर्यात</strong> <strong>से</strong> <strong>आगे</strong></p>
<p>मत्स्य क्षेत्र कृषि और संबद्ध गतिविधियों में सबसे तेज़ी से बढ़ने वाले क्षेत्रों में रहा है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025&ndash;26 के अनुसार FY16 से FY25 के बीच कृषि और संबद्ध क्षेत्रों की औसत वार्षिक वृद्धि दर 4.45 प्रतिशत रही, जिसमें मत्स्य पालन (एक्वाकल्चर सहित) की वृद्धि दर 8.8 प्रतिशत दर्ज की गई। समुद्री उत्पादों के प्रसंस्करण हेतु आवश्यक विशिष्ट आयातित सामग्री पर शुल्क-मुक्त आयात सीमा 1 प्रतिशत से बढ़ाकर 3 प्रतिशत की गई है। इससे उच्च स्तर के प्रसंस्करण को प्रोत्साहन मिल सकता है। आज वैश्विक बाज़ार में प्रतिस्पर्धा कच्चे निर्यात की तुलना में तैयार और प्रसंस्कृत उत्पादों पर अधिक निर्भर करती है।</p>
<p>आयुष और पारंपरिक औषधीय उत्पादों का निर्यात वर्ष 2024&ndash;25 में लगभग 129 हजार टन रहा, जिसका मूल्य 689 मिलियन अमेरिकी डॉलर था। इस क्षेत्र में स्थायी वृद्धि के लिए गुणवत्ता परीक्षण और प्रमाणन व्यवस्था सुदृढ़ होना आवश्यक है। फार्मेसियों और परीक्षण प्रयोगशालाओं के उन्नयन के प्रस्ताव इसी दिशा में हैं।</p>
<p>क्लस्टर स्तर पर स्व-सहायता उद्यमी (SHE) मार्ट स्थापित करने की योजना स्थानीय ब्रांडिंग, उत्पाद एकत्रीकरण और विपणन को बढ़ावा दे सकती है। ऐसे मंच छोटे उत्पादकों और स्वयं सहायता समूहों को संगठित ढंग से अपने प्रसंस्कृत उत्पाद प्रस्तुत करने का अवसर देंगे। यदि इन मार्टों को गुणवत्ता मानकों और पैकेजिंग सुधार से जोड़ा जाए, तो वे घरेलू ही नहीं, निर्यात बाज़ारों तक पहुँच बनाने में भी सहायक हो सकते हैं।</p>
<p><strong>डिजिटल</strong> <strong>और</strong> <strong>नियामक</strong> <strong>सुधार</strong></p>
<p>सीमा शुल्क विभाग द्वारा प्रस्तावित कस्टम्स इंटीग्रेटेड सिस्टम (CIS) &mdash; एक एकीकृत डिजिटल कार्गो क्लीयरेंस प्लेटफॉर्म &mdash; खाद्य, पादप और पशु उत्पादों की निकासी प्रक्रिया को अधिक सुव्यवस्थित बनाएगा। रोकी गई खेपों का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं श्रेणियों से संबंधित होता है। उन्नत स्कैनिंग तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित लक्षित निरीक्षण प्रणाली से जांच प्रक्रिया अधिक तीव्र, पारदर्शी और पूर्वानुमेय होगी। कृषि निर्यात के संदर्भ में, जहाँ देरी सीधे गुणवत्ता और शेल्फ लाइफ को प्रभावित करती है, तेज़ और पूर्वानुमेय क्लीयरेंस प्रणाली वैश्विक बाज़ारों में विश्वसनीयता बढ़ाती है।</p>
<p>डिजिटल सुधार केवल सीमा तक सीमित नहीं हैं। भारत-विस्तार (Bharat-VISTAAR) जैसे मंच किसानों तक वैज्ञानिक और मानकीकृत जानकारी पहुँचाने में सहायक हो सकते हैं। बेहतर जानकारी से उत्पादन गुणवत्ता में सुधार संभव है, जिससे निर्यात मानकों का पालन स्रोत स्तर पर ही अधिक प्रभावी हो सकता है।</p>
<p>इसी क्रम में, विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र (EEZ) और उच्च समुद्र में संचालित भारतीय मछली पकड़ने वाले जहाजों की पकड़ पर सीमा शुल्क छूट परिचालन लागत कम करती है। यह कदम गहरे समुद्री मत्स्यन को प्रोत्साहित करने के साथ निर्यात प्रतिस्पर्धा को आधार स्तर से मजबूत बनाता है।</p>
<p><strong>निर्यात</strong> <strong>क्षमता</strong> <strong>को</strong> <strong>स्थायी</strong> <strong>बनाने</strong> <strong>के</strong> <strong>लिए</strong> <strong>आवश्यक</strong> <strong>कदम</strong></p>
<p>इन पहलों को टिकाऊ निर्यात लाभ में बदलने के लिए कुछ अतिरिक्त प्रयास आवश्यक होंगे। पहला, कृषि बाज़ार से जुड़ी जानकारी समय पर और स्पष्ट रूप से उपलब्ध होनी चाहिए, ताकि निर्यातक बदलते शुल्क, मानकों और बाज़ार प्रवृत्तियों का अनुमान पहले से लगा सकें।</p>
<p>दूसरा, गुणवत्ता और मानक अवसंरचना को मजबूत करना अनिवार्य है। प्रयोगशालाओं, परीक्षण प्रणालियों और प्रमाणन व्यवस्था की क्षमता बढ़ाए बिना उत्पादन वृद्धि व्यापार लाभ में परिवर्तित नहीं हो सकती।</p>
<p>तीसरा, कृषि निर्यात राज्यों से संचालित होते हैं। इसलिए राज्य-स्तरीय रणनीतियों का केंद्रीय व्यापार पहलों और वस्तु-विशेष मूल्य-श्रृंखलाओं के साथ बेहतर तालमेल आवश्यक है।</p>
<p>चौथा, डिजिटल प्रणालियों का उपयोग दस्तावेज़ीकरण और ट्रैकिंग को सरल बनाने में किया जाना चाहिए, ताकि निर्यात प्रक्रिया अधिक सुगम और पूर्वानुमेय बन सके।</p>
<p><strong>निष्कर्ष</strong></p>
<p>केंद्रीय बजट 2026&ndash;27 यह संकेत देता है कि कृषि नीति अब केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं है। अब ध्यान मूल्य संवर्धन, प्रसंस्करण, परिवहन दक्षता और निर्यात तैयारी पर भी है।</p>
<p>आने वाले समय में सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत केवल कितना उत्पादन करता है, यह नहीं; बल्कि यह भी कि वह अपने उत्पादों को वैश्विक बाज़ार तक कितनी दक्षता, गुणवत्ता और विश्वसनीयता के साथ पहुँचा पाता है।</p>
<p><em><strong>(पवित्रा श्रीनिवासमूर्ति आईसीएआर-नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चरल इकोनॉमिक्स एंड पॉलिसी रिसर्च (एनआईएपी) नई दिल्ली में सीनियर साइंटिस्ट हैं और स्मिता सिरोही, आईसीएआर- नेशनल प्रोफेसर, एम एस स्वामीनाथन चेयर हैं )&nbsp;&nbsp;</strong></em></p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ केंद्रीय बजट 2026–27: भारत के कृषि निर्यात के लिए संकेत ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[इंडो&amp;#45;यूएस ट्रेड डील: अमेरिका के किन कृषि उत्पादों के लिए खुलेगा भारतीय बाजार?]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/what-did-india-concede-in-agriculture-under-the-india–us-trade-agreement.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 07 Feb 2026 17:46:07 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/what-did-india-concede-in-agriculture-under-the-india–us-trade-agreement.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>पिछले करीब एक सप्ताह के तेज घटनाक्रम के बीच आखिरकार 7 फरवरी की सुबह भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते का अंतरिम मसौदा जारी हो गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुई करीब साल भर पहले की बैठक के बाद इस समझौते की घोषणा हुई। सरकार लगातार इस बात पर जोर देती रही है कि भारत का कृषि क्षेत्र इस समझौते से अछूता रहेगा, लेकिन आखिरकार यह अधूरा सत्य निकला। समझौते में साफ तौर से कहा गया है कि भारत, अमेरिका के कृषि उत्पादों के लिए अपना बाजार खोलेगा और उसमें सीमा शुल्क रियायत के साथ ही गैर-सीमा शुल्क प्रतिबंधों में भी छूट देगा। बदले में अमेरिका, भारत पर लगाये गये रेसिप्रोकल टैरिफ को घटाकर 18 फीसदी करेगा।</p>
<p><a href="https://www.youtube.com/watch?v=XvHYZ1jCYb4"><span style="text-decoration: underline;"><strong>इस खबर का वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक करें</strong></span></a></p>
<p>अंतरिम समझौते में कृषि उत्पादों की एक सूची भी अमेरिका के व्हाइट हाउस ने आधी रात के बाद जारी मसौदे में शामिल की है। उसके बाद, सुबह भारत ने भी आधिकारिक रूप से उसे जारी कर दिया। इन कृषि उत्पादों में ड्राइड डिस्टीलरी ग्रेन सॉल्यूबल्स (डीडीजीएस), सोयाबीन तेल, ट्री नट (बादाम, अखरोट, पिस्ता), ताजा फल (सेब और बैरीज), प्रसंस्कृत फल, कॉटन, ज्वार ( रेड सोरगम) पशु चारे के लिए और अन्य उत्पाद शामिल हैं। इन उत्पादों पर सीमा शुल्क में कटौती की जाएगी, जिसमें शून्य आयात शुल्क और टैरिफ रेट कोटा (टीआरक्यू) जैसे प्रावधान शामिल होंगे ताकि भारत में इन उत्पादों के आयात को सुगम बनाया जा सके। इसके साथ वाइन और स्प्रिट और गैर-अल्कोहॉलिक बेवरेजेज शामिल होंगी।&nbsp;</p>
<p>भारत सरकार ने कहा है और समझौते के मसौदे में भी यह साफ है कि गेहूं, चावल और मक्का जैसे अनाज, चीनी, डेयरी और पॉल्ट्री उत्पाद इस समझौते का हिस्सा नहीं हैं। वैसे भी भारत में जिस तरह से गेहूं, चावल और चीनी का उत्पादन बढ़ा है वह जरूरत से काफी अधिक है और भारत गैर-बासमती चावल का दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक होने के साथ ही कम कीमत पर निर्यात करने वाला देश है। गेहूं के बेहतर स्टॉक और उत्पादन को देखते हुए सरकार धीरे-धीरे उस पर लगी पाबंदियां हटा रही है। पिछले दिनों पांच लाख टन आटा और उसी तरह के उत्पाद निर्यात करने की अनुमति दी गई। दो दिन पहले गेहूं पर लागू स्टॉक सीमा को भी समाप्त कर दिया है। डेयरी और पॉल्ट्री को संरक्षण काफी महत्वपूर्ण है।</p>
<p>लेकिन अब बात दूसरे उत्पादों की करें। सरकार ने नये बजट में हाई वैल्यू कृषि उत्पादों और प्लांटेशन क्रॉप्स को बढ़ावा देने के कदम उठाये थे। उनमें कुछ उत्पाद ऐसे भी हैं जो भारत-अमेरिका व्यापार समझौते का हिस्सा हैं। भारत, अमेरिका को करीब छह अरब डॉलर के कृषि उत्पादों का निर्यात करता &nbsp;है। वहीं अमेरिका से करीब तीन अरब डॉलर के कृषि उत्पादों का हम आयात करते हैं। इस तरह हमारा अमेरिका के साथ कृषि व्यापार में करीब तीन अरब डॉलर का सरप्लस है।&nbsp;</p>
<p>अब दूसरी तसवीर देखते हैं। साल 2025 में अमेरिका से कृषि उत्पादों के आयात में 30 फीसदी से अधिक की बढ़ोतरी हुई है। इसमें ट्री नट्स बादाम और पिस्ता जैसे उत्पादों के आयात में 34 फीसदी की बढ़ोतरी हुई और नवंबर, 2025 तक यह 1.3 अरब डॉलर पर पहुंच गया था। अब इन पर शुल्क समाप्त होने का मतलब है कि यह आयात बढ़ेगा। इसी तरह सेब और दूसरे ताजा फलों के आयात पर शुल्क कटौती और आयात को सुगम बनाने का प्रावधान इस मसौदे में है। जाहिर है, इनका आयात बढ़ने से हमारे सेब किसान सीधे प्रभावित होंगे।</p>
<p>एक बड़ा आयात डीडीजीएस का है। मक्का और दूसरे खाद्यान्नों से एथेनॉल उत्पादन के बाद सह-उत्पाद के रूप में डीडीजीएस निकलता है। इस प्रोटीन युक्त उत्पाद का उपयोग पशु चारे और पॉल्ट्री फीड में होता है। अमेरिका हर साल करीब 120 लाख टन डीडीजीएस का निर्यात करता है। इससे आप समझ सकते हैं कि यह आयात कितना बड़ा हो सकता है। हालांकि डेयरी और पॉल्ट्री उद्योग को इससे फायदा होगा लेकिन सोयाबीन किसान और सोया उद्योग इससे सीधे प्रभावित होगा। यह सोयामील का प्रतिद्वंद्वी उत्पाद है।&nbsp;</p>
<p>पिछले दो साल में सोयाबीन किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) मिलने में हुई दिक्कत के पीछे डीडीजीएस एक वजह है, क्योंकि इससे सोयामील के दाम गिर गये। सोयाबीन में केवल 18 फीसदी तेल होता है बाकी सोयामील होता है। भारत में मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान में करीब 130 लाख हैक्टेयर में सोयाबीन की खेती होती है। इस समझौते का सबसे बड़ा झटका इन किसानों को लगेगा।&nbsp;</p>
<p>सोयाबीन तेल को भी अमेरिका से आयात होने वाले कृषि उत्पादों में शामिल किया गया है। भारत अपनी जरूरत का 60 फीसदी से अधिक खाद्य तेल आयात करता है। इसमें सोयाबीन तेल की हिस्सेदारी पिछले तेल वर्ष (नवंबर, 2024 से अक्तूबर, 2025) में 48 लाख टन थी। सोयाबीन तेल पर 16.5 फीसदी सीमा शुल्क लागू है। फिलहाल इसका अधिकांश आयात अर्जेंटीना, ब्राजील और रूस से होता है। लेकिन अब अमेरिका को रियायती दरों में सोयाबीन तेल की सुविधा मिलेगी तो यह आयात बढ़ेगा।&nbsp;</p>
<p>गौरतलब है कि भारत ने खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता के लिए मिशन एडिबल ऑयल एंड ऑयल पाम शुरू कर रखा है। ऐसे में आयात को बढ़ावा देने से आत्मनिर्भरता की कोशिश को झटका लगेगा। इसी तरह हमारा कपास उत्पादन अपने उच्चतम स्तर 398 लाख गांठ से घटकर 300 लाख गांठ पर आ गया है। ऐसे में अमेरिका से रियायती शुल्क पर कॉटन का आयात भारतीय कपास किसानों के हितों के प्रतिकूल होगा।</p>
<p>इन उत्पादों के अलावा सूची में कुछ और उत्पाद शामिल हो सकते हैं। समझौते का पूरा ब्यौरा, शुल्क दरों में छूट और टीआरक्यू जैसी विस्तृत जानकारी आने पर स्थिति पूरी तरह साफ होगी। लेकिन घरेलू उद्योग और मैन्यूफैक्चरिंग के लिए हितकर बताये जा रहे इस समझौते की एक अहम बात यह भी है कि अमेरिका भारत को हर साल 100 अरब डॉलर का निर्यात करने का लक्ष्य लेकर चल रहा है। दोनों देशों के बीच अभी 130 अरब डॉलर के करीब कारोबार होता है और अमेरिका के साथ हमारा करीब 40 अरब डॉलर का ट्रेड सरप्लस है। अमेरिका इसी ट्रेड सरप्लस को खत्म करना चाहता है। ऐसे में भारत और अमेरिका के बीच सालाना व्यापार 200 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है।&nbsp;</p>
<p>जियो पॉलिटिकल अनिश्चितता की स्थिति में किसी एक ट्रेड पार्टनर पर अधिक निर्भरता उचित रणनीति नहीं होती है। भारत अपना 20 फीसदी से अधिक निर्यात अमेरिका को करता है। दूसरी तरफ, चीन ने चरणबद्ध तरीके से अमेरिकी बाजार पर अपनी निर्भरता को काफी कम किया है। यही वजह है कि जब ट्रंप ने दुनिया भर के देशों पर रेसिप्रोकल टैरिफ लगाने का फैसला किया तो कुछ समय बाद उसे चीन के साथ समझौता करना पड़ा था।</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ इंडो-यूएस ट्रेड डील: अमेरिका के किन कृषि उत्पादों के लिए खुलेगा भारतीय बाजार? ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[भारत&amp;#45;ईयू एफटीए: यूरोप के प्रीमियमों उत्पादों को बाजार मिलने से बढ़ेंगी भारतीय कृषि की चुनौतियां]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/india-eu-fta-market-access-to-premium-european-products-will-increase-challenges-for-indian-agriculture.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 31 Jan 2026 14:45:22 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/india-eu-fta-market-access-to-premium-european-products-will-increase-challenges-for-indian-agriculture.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p data-start="124" data-end="441">भारत और यूरोपीय यूनियन (ईयू) ने फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफटीए) को दोनों पक्षों के लिए बड़े फायदे वाला बताया है। यह समझौता दुनिया की करीब 25 फीसदी अर्थव्यवस्था को कवर करता है। दोनों ओर से शुल्क दरों में भारी कटौती की गई है। साथ ही, दोनों पक्षों का कहना है कि संवेदनशील क्षेत्रों को अपने-अपने स्तर पर संरक्षित रखा गया है।</p>
<p data-start="443" data-end="835">भारत सरकार ने साफ किया है कि उसने अपने कृषि क्षेत्र को पूरी तरह संरक्षण दिया है और किसानों को इससे केवल फायदा होगा, नुकसान नहीं। लेकिन हकीकत पूरी तरह वैसी नहीं है जैसी सरकार दावा कर रही है। इस एफटीए से भारत के प्रीमियम कृषि उत्पाद बाजार में ईयू देशों के उत्पादों की एंट्री हो जाएगी। यह बात अलग है कि अभी इस फैसले को यूरोपीय संसद की मंजूरी मिलनी है और उसके बाद वहां अदालत का रास्ता भी खुला है।</p>
<p data-start="837" data-end="1149">जहां तक भारत की बात है, यहां ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं है और सरकार का लिया गया फैसला सीधे लागू हो जाएगा। इस बात की भी कोई संभावना नहीं दिखती कि प्रक्रिया पूरी होने से पहले संसद में इस पर चर्चा होगी। उद्योग और सेवा क्षेत्र को छोड़ दें तो कृषि से जुड़े हितधारकों की राय लेने के लिए अब तक कोई ठोस पहल सामने नहीं आई है।</p>
<p data-start="1151" data-end="1427">अंतरराष्ट्रीय व्यापार के जानकारों का कहना है कि फ्रूट जूस, वाइन, खाद्य तेल और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों की एक लंबी सूची है, जिन्हें ईयू से आयात के लिए खोल दिया गया है। इनमें से कई उत्पादों पर सीमा शुल्क में भारी कटौती की गई है, जबकि कुछ को पूरी तरह शुल्क मुक्त कर दिया गया है।</p>
<p data-start="1429" data-end="1981">भारत में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग उस स्तर पर विकसित नहीं है, जिस स्तर पर यूरोपीय देशों में है। उदाहरण के तौर पर जूस बाजार को देखें तो भारतीय बाजार में पहले से ही आयातित जूस की बड़ी हिस्सेदारी है। ईयू के साथ एफटीए के बाद यह आयात और बढ़ना तय है। कृषि उत्पादों के प्रसंस्करण का हमारा स्तर, जो पहले ही कुल उत्पादन के करीब 10 फीसदी पर अटका है, उसके विकास में इससे मुश्किलें आ सकती हैं। वाइन और फ्रूट बीयर जैसे उत्पादों के सस्ते आयात का मतलब है कि देश में खड़ी हो रही इस इंडस्ट्री को झटका लगेगा, जबकि यही उद्योग देश के फल उत्पादकों को बाजार उपलब्ध करा रहा था।</p>
<p data-start="1983" data-end="2344">खाद्य तेलों की हमारी 60 फीसदी से अधिक जरूरत आयात से पूरी होती है। अब जैतून तेल के सस्ते आयात के चलते खाद्य तेलों का एक प्रीमियम बाजार इस आयात के हिस्से जा सकता है। हिमाचल प्रदेश के सेब किसानों के संगठनों का कहना है कि न्यूजीलैंड के साथ एफटीए में सेब पर ड्यूटी घटाने से वे पहले ही प्रभावित हो रहे हैं। ईयू के साथ एफटीए को लेकर भी वे इसी तरह की आशंका जता रहे हैं।</p>
<p data-start="2346" data-end="2588">सरकार का कहना है कि इस समझौते में खाद्यान्न, सोयाबीन और चावल जैसे उत्पादों को शामिल नहीं किया गया है। हालांकि इन फसलों की कीमतें भारत में पहले से ही काफी कम हैं और ये उत्पाद प्रतिस्पर्धी हैं। ऐसे में यूरोप से इनके आयात की संभावना सीमित ही है।</p>
<p data-start="2590" data-end="3291">हमारी निर्यात संभावनाओं को जिस तरह पेश किया जा रहा है, उनकी सफलता पर भी सवाल हैं। ईयू ने हमारे प्रमुख निर्यात उत्पादों जैसे चावल, चीनी और डेयरी उत्पादों पर किसी भी तरह की रियायत देने से साफ इनकार कर दिया है। इसके अलावा ईयू ने खाद्य मानकों को लेकर किसी भी प्रकार का समझौता करने से भी मना कर दिया है। ऐसे में ताजा सब्जियों और अंगूर के निर्यात को लेकर जो उम्मीदें जताई जा रही हैं, उनके लिए सख्त खाद्य मानकों और ट्रेसेबिलिटी की शर्तों का पालन करना अनिवार्य होगा। वैसे भी गर्किन और अंगूर का निर्यात हम पहले से यूरोप को कर रहे हैं, क्योंकि निर्यात करने वाली कंपनियां इन मानकों को पूरा करती हैं। इस समझौते में भेड़ के मांस को शामिल करने से पशुपालन के उस सेगमेंट को झटका लग सकता है, जिसमें तेज ग्रोथ की संभावना थी।</p>
<p data-start="3293" data-end="3691">फिलहाल एफटीए की पूरी जानकारी सामने आनी बाकी है और उसके बाद ही स्थिति स्पष्ट होगी। कृषि क्षेत्र में किसानों की आय बढ़ाने की सबसे ज्यादा संभावना हॉर्टिकल्चर उत्पादों में है। लेकिन समझौते में जिन उत्पादों के आयात को छूट दी गई है, वे भी इसी क्षेत्र से आते हैं। देश में हॉर्टिकल्चर उत्पादन अब खाद्यान्न उत्पादन से आगे निकल चुका है। ऐसे में केवल फसल उत्पादों को संरक्षण देने की बात करना पर्याप्त नहीं है।</p>
<p data-start="3693" data-end="4258">सरकार ने बड़े पैमाने पर एफटीए किए हैं और चालू साल में ही चार समझौते हुए हैं। न्यूजीलैंड के साथ एफटीए में बेबी फूड और इंटरमीडियरी उत्पादों के आयात की छूट दी गई है, जो परोक्ष रूप से डेयरी उत्पादों के आयात का रास्ता खोलती है। देश के बेबी फूड बाजार पर पहले से ही बहुराष्ट्रीय कंपनियों का दबदबा है, और इस तरह की छूट से वह और बढ़ेगा। इससे साफ है कि ये एफटीए मुख्य रूप से उद्योग और सेवा क्षेत्र को ध्यान में रखकर किए गए हैं। संरक्षण के नाम पर कृषि क्षेत्र को इनमें आधा-अधूरा ही शामिल किया गया है। बदलते कृषि परिदृश्य के संदर्भ में इस नीति पर दोबारा विचार करने की जरूरत है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ भारत-ईयू एफटीए: यूरोप के प्रीमियमों उत्पादों को बाजार मिलने से बढ़ेंगी भारतीय कृषि की चुनौतियां ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[बजट, राजनीति और किसान: सवाल नीति और नीयत का]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/budget-2026-a-question-of-agricultural-policy-and-intention.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 30 Jan 2026 07:07:36 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/budget-2026-a-question-of-agricultural-policy-and-intention.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span class="im">प्राचीन रोम में दार्शनिक सेनेका ने चेतावनी लिखी थी कि &ldquo;प्रतिद्वंद्वी के बिना उत्कृष्टता फीकी पड़ जाती है।&rdquo; लगभग दो हजार साल बाद आज भी यह बात असहज रूप से सटीक लगती है।&nbsp;<br /><br />आज भारत सत्ता के एक विरोधाभास का गवाह बन रहा है। गांधी भाई-बहनों के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का निरंतर पतन राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को कमजोर कर रहा है। एक भरोसेमंद विपक्ष के गैर-मौजूदगी में, सबसे अधिक बेपरवाही कृषि-अर्थशास्त्र के क्षेत्र में दिख रही है।<br /><br />आश्चर्य की बात है कि केंद्रीय बजट से लेकर आर्थिक सर्वेक्षण तक, अरावली इकोलॉजी से लेकर लेबर और बिजली से लेकर कीटनाशक व बीज कानूनों के मुद्दों पर भाजपा के भीतर और उससे जुड़े संगठनों ने साफ तौर पर एक चुप्पी साध रखी है। नीतियों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया है। इसलिए नहीं कि नीतियां कमजोर हैं, बल्कि इसलिए कि संबंधित मंत्रियों के अलावा उनके पक्ष में तर्क देने वाला कोई नहीं है।<br /><br />जब कृषि नीति का बचाव नहीं किया जाता, तो वह परिणाम देने से पहले ही अपनी वैधता खो देती है। इससे राजनीतिक ताकत भी कमजोर होती है और बजट पर लोकलुभावन उपायों की ओर लौटने का दबाव बढ़ता है, जबकि कृषि सुधार ठप हो जाते हैं।<br /><br />कृषि और बजट के सामने अब एक नई चुनौती खड़ी है: अमेरिकी टैरिफ का प्रभाव। कड़वी सच्चाई यह है कि 'ईश्वर' से डील करना 'शैतान' से डील करने से अलग नहीं है। अपने से कहीं गुना अधिक ताकतवर के साथ मोलभाव नहीं किया जा सकता, भले ही भारतीय अर्थव्यवस्था पर अब तक किस्मत मेहरबान रही हो।<br /><br />भारत को एक दशक से अधिक समय तक अच्छे मानसून का लाभ मिला और कच्चे तेल की कम कीमतों से अर्थव्यवस्था को राहत की सांस मिली। इससे संसाधनों का अधिक दोहन करने वाली नीतियां बनाने की गुंजाइश रही।<br /><br />बजट आवंटन का आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है। मेरा मानना है कि कृषि अनुसंधान एवं विकास (R&amp;D) के आवंटन में काफी बढ़ोतरी होगी। इस बीच, G-Ram G (रोजगार एवं आजीविका मिशन के लिए गारंटी - ग्रामीण) को पिछले साल के मनरेगा व्यय पर ही रखने की संभावना है, भले ही यह योजना राज्यों पर चुपचाप 30 फीसदी अतिरिक्त राजकोषीय बोझ डाल रही हो। ऐसे दिखावे संघवाद में वित्तीय जिम्मेदारी के व्यापक बदलाव को छिपाते हैं। राजनीति भले ही टालमटोल कर रही हो, लेकिन हिसाब-किताब साफ है।<br /><br /></span><span>अगर किसानों की आय पर नीति आयोग के पेपर को सही भी मान लिया जाए, तब भी किसानों की आय &lsquo;नॉमिनल-टर्म्स&rsquo; (चालू कीमतें) में दोगुनी हुई है, &lsquo;रियल-टर्म्स&rsquo; (स्थिर कीमतों) में नहीं। ऐसा पहली बार है कि कृषक परिवारों की आय का एक बड़ा हिस्सा 'गैर-कृषि' आय से आ रहा है, न कि उनके मुख्य पेशे से। लंबे समय तक 'फार्मगेट प्राइस' (किसानों को मिलने वाले दाम) को दबाकर रखने की नीति ने पूरी अर्थव्यवस्था में एक संरचनात्मक और क्षेत्रीय समस्या पैदा कर दी है।</span><span class="im"><br /><br />फार्मगेट कीमतों को गिरने से बचाने के लिए, न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) वाली फसलों के आयात पर टैरिफ लगाए जाने चाहिए, जिन्हें इस तरह संतुलित किया जाए कि आयात मूल्य कभी भी एमएसपी से कम न हो। फिलहाल मुद्रास्फीति कम है और विदेशी मुद्रा भंडार दबाव में है। ये परिस्थितियां वास्तव में इस तरह के संरक्षण के पक्ष में हैं। यदि सही तरीके से अंजाम दिया जाए तो राजकोष पर बोझ बढ़ाए बिना किसानों की आजीविका सहारा और ग्रामीण खपत को रिवाइव किया जा सकता है।<br /><br /></span><span>इन नीतियों का मुद्रास्फीति से कम और राजनीतिक नियंत्रण से अधिक संबंध है। ये नीतियां विरोधाभासों में उलझी हुई हैं। घोषित रूप से प्राकृतिक खेती पर जोर दिया जा रहा है लेकिन सरकारी फंडिंग का बड़ा हिस्सा रासायनिक उर्वरकों की सब्सिडी (लगभग 1.70 लाख करोड़ रुपये) में जा रहा है। राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के लिए आवंटन (459 करोड़ रुपये) और वास्तविक खर्च (30 करोड़ रुपये) के बीच का भारी अंतर इस बात को पुख्ता करता है।</span><br /><br /><span>इन आंकड़ों से भी कहीं अधिक महत्वपूर्ण वह बोझ है, जिसे बजट में गिना ही नहीं जाएगा: आठवां वेतन आयोग, जिसका वार्षिक राजकोषीय भार लगभग दो लाख करोड़ रुपये होगा। आप चाहें तो इसे निराशावाद कह सकते हैं। लेकिन मैं खुद को अनुभव से सधा हुआ एक आशावादी कहना पसंद करूंगा।</span><span class="im"><br /><br />जब नीति-निर्माता हाशिए की आवाजों को अनसुना कर देते हैं और जवाबदेही से बचते हैं, तो पर्यावरण को होने वाला नुकसान बढ़ जाता है जिस पर कोई ध्यान नहीं देता। दुनिया के मात्र 2.4 प्रतिशत क्षेत्रफल पर भारत विश्व की 18 प्रतिशत आबादी और 16 प्रतिशत पशुधन का भार उठाता है। मरुस्थलीकरण और क्षरण से 30 प्रतिशत भूमि प्रभावित है। इसके अलावा, लाखों हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि शहरीकरण और विकास की भेंट चढ़ गई है, और बिना सोचे-समझे विकास के लिए छोड़ी जा रही है।<br /><br />भयानक स्थिति के बावजूद, नीति निर्माता यह नहीं समझ पा रहे हैं कि इस नुकसान को कैसे ठीक किया जाए। ऐसा नहीं है कि इसे ठीक नहीं जा सकता। जैसे लाखों हेक्टेयर भूमि, जो देश की सिंचित कृषि भूमि का 15 प्रतिशत से अधिक है, में सिंचाई से हुए नुकसान (लवणीकरण और जलभराव) को नई बाढ़-सिंचाई परियोजनाओं के बजाय मौजूदा सिंचित क्षेत्रों के लिए जल निकासी आवंटन को प्राथमिकता देकर हल किया जा सकता है।<br /><br /></span><span>जीडीपी विकास दर का धीमा पड़ना किसी बड़ी चुनौती का शुरुआती संकेत हो सकता है, जो राजनीतिक सौदेबाजी को और जटिल बना देगा। बजट आवंटन या नीतियों में मामूली बदलाव करना दिखावे के लिए तो ठीक है लेकिन भारत को विकसित बनाने के लिए काफी नहीं है। सुधारों पर सरकार का फिर से जोर देना सराहनीय है, लेकिन इन्हें अब भूमि और कृषि तक बढ़ाने की जरूरत है&mdash;जैसे कि भूमि बटाईदारी के लिए कानून, लैंड सीलिंग कानूनों पर पुनर्विचार, उर्वरक और खाद्य सब्सिडी को तर्कसंगत बनाना, या क्षेत्र उत्पादन योजनाओं के आधार पर सब्सिडी का वितरण और कृषि उपजों में वायदा व्यापार की अनुमति देना।</span><span class="im"><br /><br />भारत कृषक समाज के अर्काइव (1955-1980) के डिजिटाइजेशन से नीतिगत चर्चा में एक अनोखी निरंतरता का पता चलता है। भारतीय कृषि से जुड़ी कई बुनियादी सिफारिशें पिछले सात दशकों में काफी हद तक ज्यों की त्यों रही हैं। इसी तरह का पैटर्न लगातार केंद्रीय बजटों में भी दिखाई देता है। जब पिछले सुझाव लागू नहीं होते तो नई सिफारिशें देना निराशाजनक लगता है।<br /><br />फिर भी, मैं एक सुझाव देने की कोशिश करता हूं: बुनियादी स्तर पर कृषि अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए एक 'कृषि नवाचार कोष' की स्थापना की जाए। बस एक चीज पर ध्यान दें: 'सॉइल माइक्रोबायोम' (मिट्टी का सूक्ष्मजीव तंत्र)। यह अगला वैज्ञानिक मोर्चा है जहां हम समझेंगे कि मिट्टी में लाइफ सिस्टम कैसे काम करता है। आधुनिक विज्ञान जब प्राकृतिक खेती से जुड़ेगा और उत्तर-आधुनिक कृषि के नए सिद्धांत उभरेंगे।<br /><br /></span><span>नीतिगत क्षेत्र में काम करने वालों ने सफलता से ज्यादा असफलता से सीखा है, क्योंकि भारत को असफलता का अनुभव अधिक है। एक नया सबक यह है कि सरकार के भीतर आंतरिक क्षमता का निर्माण कर बाहरी लोगों के निहित प्रभाव को रोकने की आवश्यकता है। इसकी शुरुआत पारदर्शिता से होती है। भारत को एक 'हितों के टकराव' (conflict of interest) कानून की जरूरत है, जो चुने हुए प्रतिनिधियों, आईएएस अधिकारियों और सरकारी या स्वायत्त संस्थानों के सीनियर मैनेजमेंट पर लागू हो। जो राज्य सलाह और प्रभावित करने के बीच, विशेषज्ञता और संलिप्तता के बीच अंतर नहीं कर सकता, वह धीरे-धीरे अपनी संप्रभुता खो देता है।</span><span class="im"><br /><br />एक बात का ध्यान रखना जरूरी है। भविष्य जितना दिख रहा है, उससे कहीं अधिक निकट है। खेती का कर्ज चुपचाप बढ़ रहा है। सरकार के लिए यह उचित होगा कि वह कृषि ऋणों के लिए 'डेट रिकवरी ट्रिब्यूनल' जैसी अथॉरिटी बनाए। अगर ऐसा न हुआ तो जैसे-जैसे 2029 का चुनावी नजदीक आएगा, पूर्ण ऋण माफी की मांग फिर पुरजोर तरीके से उठने लगेगी।<br /><br /></span><span>अंत में, ईमानदारी से कहें तो भारत की कृषि नीति विफल नहीं हो सकती है क्योंकि भारत में अभी तक ऐसी कोई कृषि नीति है ही नहीं। कृषि क्षेत्र में बदलाव के लिए केवल 'नीयत' काफी नहीं है, जो इस सरकार में काफी है, बल्कि एक 'नीति' की आवश्यकता है। एक ऐसा ढांचा जिसके केंद्र में किसानों का नजरिया हो।</span><span class="im"><br />______________________________<wbr />__<br /><br /><strong><em>अजय वीर जाखड़, भारत कृषक समाज के चेयरपर्सन हैं।</em></strong><br /></span></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ बजट, राजनीति और किसान: सवाल नीति और नीयत का ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[बजट 2026: कृषि के बेहतर भविष्य के लिए तात्कालिक राहत और दीर्घकालिक सुधारों का संतुलित समावेश जरूरी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/a-balanced-mix-of-immediate-relief-and-long-term-reforms-is-essential-in-budget-for-a-better-future-of-indian-agriculture.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 28 Jan 2026 12:41:31 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/a-balanced-mix-of-immediate-relief-and-long-term-reforms-is-essential-in-budget-for-a-better-future-of-indian-agriculture.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>वित्त वर्ष 2026-27 के केंद्रीय बजट से भारत के कृषि और संबद्ध क्षेत्रों की अपेक्षाएं बहुत अधिक हैं। कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग 16 प्रतिशत हिस्सा है और लगभग 46 प्रतिशत कार्यशील आबादी को रोजगार देता है। जलवायु परिवर्तन, किसानों की स्थिर आय, वस्तुओं की कीमतों में उतार-चढ़ाव, खाद्य तेलों, दालों और उर्वरकों के लिए आयात पर निर्भरता, बढ़ती इनपुट लागत और किसानों पर कर्ज जैसी चुनौतियों के समाधान के लिए केंद्रित और इनोवेटिव बजट उपायों की आवश्यकता है। एक दूरदर्शी और समावेशी बजट भारतीय कृषि को अधिक टिकाऊ, प्रतिस्पर्धी और निर्यात-उन्मुख बनाने में मदद कर सकता है।</p>
<p><strong>महत्वपूर्ण उपाय</strong></p>
<p><strong>पहला,</strong> कृषि अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) में निवेश को लंबे समय से नजरअंदाज किया गया है। भारत वर्तमान में कृषि जीडीपी का केवल 0.4 प्रतिशत आरएंडडी पर खर्च करता है, जो वैश्विक औसत एक प्रतिशत से काफी कम है और चीन तथा ब्राजील जैसे देशों से भी पीछे है। बजट में कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) के लिए फंडिंग को दोगुना करने का लक्ष्य होना चाहिए। जलवायु-सहनशील और बायो-फोर्टिफाइड फसल किस्मों का विकास, दालों और तिलहनों का उत्पादन बढ़ाना, कृषि निर्यात को प्रोत्साहित करना, कीट एवं रोग प्रतिरोधी बीज विकसित करना, पोषक तत्व प्रबंधन तथा कम इनपुट वाली टिकाऊ खेती को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। लक्षित कर प्रोत्साहन और सह-वित्तपोषण (को-फंडिंग) निजी क्षेत्र के आरएंडडी निवेश को बढ़ावा दे सकते हैं, जिससे नवाचार और व्यावसायीकरण में तेजी आएगी। भारतीय कृषि की आत्मनिर्भरता विज्ञान से शुरू होती है, इसलिए &ldquo;विज्ञान-नेतृत्व वाली आत्मनिर्भरता&rdquo; को लक्ष्य बनाया जाना चाहिए।</p>
<p><strong>दूसरा,</strong> कृषि उत्पादकता बढ़ाने और फसल कटाई के बाद नुकसान को कम करने के लिए कृषि अवसंरचना अत्यंत महत्वपूर्ण है। फसल कटाई के बाद का नुकसान, खासकर जल्द खराब होने वाली उपजों में, सालाना कुल कृषि उत्पादन का लगभग 18&ndash;20 प्रतिशत है। वित्त वर्ष 2025-26 में सरकार ने कृषि और संबद्ध क्षेत्रों के लिए लगभग 1.52 लाख करोड़ रुपये का आवंटन किया। यह एक बड़ी राशि है, लेकिन ग्रामीण भंडारण, कोल्ड चेन, पैकिंग हाउस, ग्रेडिंग इकाइयों और निचले स्तर पर लॉजिस्टिक्स की कमियों के कारण यह पर्याप्त नहीं है। शोध से पता चलता है कि आधुनिक वेयरहाउसिंग, एकीकृत कोल्ड चेन और डिजिटल मार्केट प्लेटफॉर्म में निवेश से बर्बादी कम की जा सकती है, कीमतों में स्थिरता लाई जा सकती है, निर्यात बढ़ाया जा सकता है और किसानों की आय में वृद्धि हो सकती है। विशेषकर फल, सब्जी, मसाले और मत्स्य क्षेत्र में।</p>
<p><strong>तीसरा,</strong> जलवायु परिवर्तन भारतीय कृषि के लिए एक बड़ा खतरा बन चुका है। शुद्ध बोए गए क्षेत्र के 60 प्रतिशत से अधिक हिस्से में चरम मौसम की घटनाओं का जोखिम बढ़ रहा है, जिससे जलवायु जोखिम सहने की क्षमता पैदा करना जरूरी हो गया है। पंजाब और हरियाणा में पानी की अधिक खपत वाली धान और गेहूं की फसलों पर लंबे समय तक निर्भरता के कारण 75 प्रतिशत से अधिक भूजल ब्लॉक अति-शोषित या गंभीर स्थिति में पहुंच गए हैं। मिट्टी का क्षरण हुआ है और फसल अवशेष जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ गया है। 2026-27 के बजट में फसल विविधीकरण, प्राकृतिक और जैविक खेती, प्रिसीजन कृषि और जलवायु-स्मार्ट प्रथाओं को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। वर्षा सिंचित क्षेत्रों में पीएमकेएसवाई (PMKSY) का विस्तार और सौर सिंचाई के लिए पीएम-कुसुम (PM-KUSUM) के तहत मजबूत प्रोत्साहन से जल उपयोग दक्षता बढ़ेगी, ऊर्जा लागत घटेगी और जलवायु के जोखिम से निपटने में मदद मिल सकती है। &nbsp;</p>
<p><strong>चौथा,</strong> पशुधन, मत्स्य पालन और बागवानी जैसे संबद्ध क्षेत्र आय विविधीकरण में अहम भूमिका निभाते हैं, विशेषकर छोटे और सीमांत किसानों के लिए, जो कुल किसान परिवारों का लगभग 85 प्रतिशत हैं। पशुधन कृषि सकल मूल्य वर्धन (GVA) का लगभग 28 प्रतिशत योगदान करता है और 7 करोड़ से अधिक ग्रामीण रोजगार उपलब्ध कराता है। इसके बावजूद यह पशु चिकित्सा सेवाओं, गुणवत्तापूर्ण चारे, ऋण और प्रसंस्करण सुविधाओं की कमी से जूझ रहा है। वित्त वर्ष 2025-26 में एएचआईडीएफ (AHIDF) के तहत 14,413.88 करोड़ रुपये की फंडिंग को डेयरी, मांस और मूल्य-वर्धित व्यवसायों के लिए बढ़ाया जाना चाहिए। मत्स्य पालन लगभग 2.8 करोड़ लोगों को रोजगार देता है, लेकिन इसमें कटाई के बाद 20&ndash;25 प्रतिशत नुकसान होता है, जिससे पीएमएमएसवाई (PMMSY) के तहत अधिक आवंटन की आवश्यकता है। बागवानी कृषि उत्पादन में एक तिहाई से अधिक योगदान देती है, लेकिन कोल्ड स्टोरेज कवरेज 10 प्रतिशत से भी कम है, जिससे इसकी निर्यात क्षमता सीमित रहती है। इसलिए नुकसान कम करने, निर्यात बढ़ाने और आय में स्थिरता लाने के लिए लक्षित निवेश की आवश्यकता है।</p>
<p><strong>पांचवां,</strong> छोटी जोत (औसतन 1.08 हेक्टेयर) वाले क्षेत्रों में उत्पादकता, बाजार दक्षता और आय वृद्धि के लिए डिजिटल कृषि महत्वपूर्ण है। वर्ष 2027 तक 10,000 एफपीओ (FPOs) के गठन की सरकारी योजना को मजबूत डिजिटल अवसंरचना, कार्यशील पूंजी तक पहुंच और बाजार एकीकरण के माध्यम से समर्थन देने की जरूरत है। ई-नाम (e-NAM) 23 राज्यों में 1,522 से अधिक मंडियों को जोड़ता है और इसके माध्यम से 3 लाख करोड़ रुपये से अधिक का व्यापार होता है। इसे अंतर-राज्यीय व्यापार और पारदर्शी मूल्य निर्धारण के लिए और सुदृढ़ किया जाना चाहिए। एआई आधारित सलाह, ब्लॉकचेन ट्रेसेबिलिटी और डिजिटल फसल बीमा लेनदेन लागत कम कर सकते हैं, निर्यात अनुपालन बढ़ा सकते हैं और किसानों का विश्वास मजबूत कर सकते हैं।</p>
<p><strong>छठा,</strong> सस्ते औपचारिक ऋण तक सीमित पहुंच एक गंभीर समस्या बनी हुई है। लगभग 85 प्रतिशत किसान अनौपचारिक साहूकारों पर निर्भर हैं, जो 24&ndash;60 प्रतिशत तक ब्याज लेते हैं। किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) योजना लगभग 10 करोड़ किसानों को कवर करती है, लेकिन यह केवल 71 प्रतिशत परिचालन जोत तक ही पहुंच पाई है। कई किरायेदार किसान और संबद्ध गतिविधियां अभी भी इससे बाहर हैं। वित्त वर्ष 2025-26 के लिए 32.50 लाख करोड़ रुपये का कृषि ऋण लक्ष्य, जिसमें पशुपालन, डेयरी और मत्स्य पालन के लिए 5 लाख करोड़ रुपये शामिल हैं, एक सकारात्मक कदम है। हालांकि ऋण विस्तार के साथ जोखिम प्रबंधन को भी मजबूत करना होगा। पीएमएफबीवाई (PMFBY) वर्तमान में केवल 30&ndash;35 प्रतिशत फसली क्षेत्र को कवर करती है। दावा निपटान में तेजी, गैर-ऋणी किसानों को शामिल करना और तकनीक आधारित नुकसान आकलन से इसमें सुधार किया जा सकता है।</p>
<p><strong>सातवां,</strong> महिलाएं कृषि कार्यबल में 50 प्रतिशत से अधिक योगदान देती हैं, लेकिन भूमि, ऋण और तकनीक तक उनकी पहुंच सीमित है। कृषि भूमि का लगभग 33 प्रतिशत उनके नाम होने के बावजूद निर्णय लेने की शक्ति कम है। बजट प्राथमिकताओं में महिला-केंद्रित कौशल विकास, ऋण उत्पाद और भूमि अधिकार सुधार शामिल किए जाने चाहिए, जिससे खाद्य सुरक्षा और पोषण में उनकी भूमिका को मजबूती मिलेगी।</p>
<p><strong>आठवां,</strong> वैश्विक कृषि व्यापार का आकार सालाना 1.91 लाख करोड़ (ट्रिलियन) डॉलर से अधिक है। इस व्यापार में भारत की हिस्सेदारी लगभग 2.2&ndash;2.4 प्रतिशत है और वह आठवें स्थान पर है। वर्ष 2024-25 में भारत का कृषि निर्यात 51.2 अरब डॉलर रहा, जिसमें वृद्धि की काफी गुंजाइश है। परीक्षण प्रयोगशालाओं को उन्नत करने, ट्रेसेबिलिटी प्रणालियों में सुधार और वैश्विक एसपीएस मानकों को पूरा करने के लिए 10,000 करोड़ रुपये का समर्पित निर्यात सुविधा कोष (EFF) बनाया जाना चाहिए। जैविक, जीआई-टैग वाले और मूल्य-वर्धित उत्पादों के लक्षित प्रचार तथा स्थिर व्यापार नीतियों से भारत की वैश्विक हिस्सेदारी बढ़ाई जा सकती है।</p>
<p>प्याज, गैर-बासमती चावल और गेहूं के निर्यात पर हालिया प्रतिबंधों से किसानों की आय को नुकसान हुआ और बाजार में अस्थिरता बढ़ी। गैर-बासमती चावल का निर्यात 2023-24 में 6.36 अरब डॉलर से घटकर 2024-25 में 4.57 अरब डॉलर रह गया। इसी तरह प्याज पर निर्यात शुल्क और न्यूनतम निर्यात मूल्य (MEP) अप्रैल 2025 तक किसानों के लिए नुकसानदेह साबित हुए। इससे निपटने के लिए कृषि व्यापार, मूल्य निर्धारण और बाजार सुधारों पर एक सुसंगत और साक्ष्य-आधारित नीति की जरूरत है। जीएसटी परिषद की तर्ज पर एक वैधानिक कृषि विकास परिषद की तत्काल आवश्यकता है।</p>
<p><strong>महत्वपूर्ण उपज और निर्यात प्रतिस्पर्धा</strong></p>
<p>भारत कई आवश्यक वस्तुओं के आयात पर बहुत अधिक निर्भर है और खाद्य तेल की लगभग 60 प्रतिशत जरूरत (सालाना 20 अरब डॉलर से अधिक) आयात से पूरा करता है। साथ ही 20&ndash;30 लाख टन दालों का आयात करता है। राष्ट्रीय मिशन फॉर एडिबल ऑयल एवं ऑयल पाम (NMEO-OP) और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (दालें) को घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए अधिक फंडिंग की आवश्यकता है। वित्त वर्ष 2024-25 में उर्वरक सब्सिडी 1.75&ndash;1.95 लाख करोड़ रुपये से अधिक रही, जो आयात निर्भरता कम करने, संतुलित पोषक तत्व उपयोग, नैनो उर्वरकों और फॉस्फेटिक व पोटाश उर्वरकों के घरेलू उत्पादन की आवश्यकता को रेखांकित करती है। महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए दालों, तिलहनों और उर्वरकों पर केंद्रित एक विशेष मिशन आवश्यक है।</p>
<p>केंद्रीय बजट 2026-27 कृषि क्षेत्र की तात्कालिक चुनौतियों को हल करने के लिए आत्मनिर्भरता, जलवायु अनुकूलता और निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ावा देने एक महत्वपूर्ण अवसर है। भारतीय कृषि के बेहतर भविष्य के लिए बजट को तात्कालिक राहत और दीर्घकालिक सुधारों के संतुलित मिश्रण के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए।</p>
<p><strong><em>(</em><em>डॉ. नवीन पी सिंह कृषि लागत एवं मूल्य आयोग के पूर्व सदस्य हैं और वर्तमान में नई दिल्ली स्थित आईसीएआर-एनआईएपी में प्रधान वैज्ञानिक हैं। यहां व्यक्त विचार उनके व्यक्तिगत हैं।)</em></strong></p>
<p><em>&nbsp;</em></p>
<p><em>&nbsp;</em></p>
<p>&nbsp;</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/01/image_750x500_6979b86657f7e.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ बजट 2026: कृषि के बेहतर भविष्य के लिए तात्कालिक राहत और दीर्घकालिक सुधारों का संतुलित समावेश जरूरी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[Budget 2026: किसानों को बजट की औपचारिकता नहीं, ठोस सुधारों की जरूरत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/budget-2026-farmers-need-real-reforms-not-budget-rituals.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 21 Jan 2026 11:58:00 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/budget-2026-farmers-need-real-reforms-not-budget-rituals.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>वर्ष 2026 भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित होने वाला है। निश्चित रूप से केंद्रीय बजट इसका महत्वपूर्ण हिस्सा होगा, लेकिन 8वां वेतन आयोग और 16वां वित्त आयोग ऐसे निर्णायक पड़ाव हैं, जिन पर खास ध्यान देने की जरूरत है। इसके बाद दो सरकारी विशेषज्ञ समितियां भी हैं, जिनका नेतृत्व राजीव गाबा कर रहे हैं - एक विकसित भारत के लक्ष्यों को साकार करने के लिए और दूसरी गैर-वित्तीय क्षेत्र के रेगुलेटरी सुधारों के लिए। इसके अलावा, अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ किए जाने वाले व्यापार समझौतों में लिए जाने वाले रणनीतिक फैसले भी महत्वपूर्ण हैं। ऐसे फैसले जो हमें खाद्य सुरक्षा, डेटा रेगुलेशन और अनुपालन प्रणाली के बाहरी मानकों में सीमित कर सकते हैं, जो हमारे हित में नहीं हो सकते।</p>
<p>भारतीय किसानों के लिए बजट अब समाधान की बजाय एक औपचारिकता बन गया है। या तो वित्त मंत्रालय कृषि मंत्रालय की बात नहीं सुनता, या कृषि मंत्रालय प्रभावशाली तर्क पेश करने में विफल रहता है। बजट घोषणाएं केवल इरादों के बयान तक सीमित रहती हैं। उदाहरण के लिए, पिछले वर्ष घोषित किसान क्रेडिट कार्ड की सीमा 3 लाख रुपये से बढ़ाकर 5 लाख रुपये करने का वादा अब तक अधिसूचित नहीं हुआ है।</p>
<p>यह कहना गलत होगा कि शीर्ष नेतृत्व में साहस की कमी है। नए विचार आजमाए गए हैं। स्वाभाविक रूप से, कभी-कभी नीतियां अपेक्षित परिणाम नहीं देतीं या समय के साथ परिस्थितियां बदल जाती हैं। लेकिन विफल कार्यक्रमों को जारी रखने की राजनीतिक मजबूरी सुधार की गुंजाइश को सीमित कर देती है और सिस्टम एक दुष्चक्र में फंस जाता है। कमजोर परिणाम चुनावी चिंता को बढ़ाते हैं, जो अंततः लोक-लुभावन नीतियों को बढ़ावा देता है। लोक-लुभावन नीतियां और वित्तीय समस्याएं एक-दूसरे को पोषित करती हैं और गवर्नेंस को कठिन बना देती हैं।</p>
<p>लोक-लुभावन राजनीति उन स्थानों पर अधिक मजबूत होती है जहां असमानता अधिक है। बिहार के चुनावों ने इसे प्रमाणित किया और यह भी दिखाया कि राजनीतिक दलों की विचारधारा में अंतर होते हुए भी उनकी लोक-लुभावन प्रवृत्तियां समान हैं। सरकारें कर्ज समस्या को और अधिक कर्ज देकर कम करने की कोशिश करती हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि कई निजी व्यवसायों की उधारी की लागत (ब्याज) कई राज्यों की तुलना में कम है, जबकि उन राज्यों का ऋण संप्रभु गारंटी के तहत है।</p>
<p>उदाहरण के लिए उर्वरक सब्सिडी। खाद्य सुरक्षा अब पहले जैसी वजह नहीं रही। कृषि की विकास दर लगभग 3% है, जबकि जनसंख्या वृद्धि करीब 0.5% है। गणित बदल गया है। राजनीतिक रूप से यूरिया की कीमतों में 25% वृद्धि करना संभव है और इस बचत को सीधे किसानों के लाभ के लिए पुनः इस्तेमाल किया जा सकता है।</p>
<p>उपभोग के दृष्टिकोण से, भारत ने अत्यधिक गरीबी को घटाकर 7.5 करोड़ तक लाने में बड़ी प्रगति की है। नीति आयोग के अनुसार 15 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी का सामना कर रहे हैं। लेकिन अब भी 80 करोड़ भारतीय मुफ्त अनाज प्राप्त कर रहे हैं। तार्किक रूप से यह व्यवस्था इसी तरह जारी नहीं रह सकती।</p>
<p>फसल बीमा की बात करें तो, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) में केंद्र और राज्य मिलकर कुल प्रीमियम का 90 प्रतिशत दे रहे हैं। इसके बावजूद किसानों और राज्यों में शिकायतें व्यापक हैं, खासकर दावे निपटान और पारदर्शिता को लेकर। विशेषज्ञों का सुझाव है कि अब PMFBY को सरल फसल मुआवजा कोष में बदल दिया जाए, जिससे किसानों का भरोसा फिर से स्थापित किया जा सके।</p>
<p>शहरी नीति में भी एक बड़ी चूक नजर आती है। &lsquo;स्मार्ट सिटी&rsquo; का विचार 10 साल पहले ही सफल नहीं था। यह ग्रामीण इलाकों से लोगों को पहले से ही दबावग्रस्त शहरों की ओर खींचता है और भारत के गांवों के वास्तविक स्वरूप को नजरअंदाज करता है। सुधार स्पष्ट है- इसके बजाय 5,000 से अधिक जनगणना शहरों का विकास किया जाए, ताकि समावेशी विकास सुनिश्चित हो सके।</p>
<p>यह किसी भी तरह से आसान नहीं है। किसानों की शिकायतें लंबे समय से बरकरार हैं और समस्याएं दशकों से बढ़ती रही हैं। किसी भी नए कार्यक्रम का विस्तार करने से पहले उसका मूल्यांकन अनिवार्य है। लेकिन सरकारें अपनी ही कार्यप्रणाली का सही मूल्यांकन करने में कमजोर साबित होती हैं। इसके लिए एक विधिक (स्टैच्यूटरी) किसान आयोग का गठन किया जाना चाहिए, जिसका दायित्व मौजूदा व्यवस्था का ऑडिट करना, सुधार की सिफारिशें देना, नए उपाय प्रस्तावित करना और एक समग्र किसान नीति तैयार करना होना चाहिए।</p>
<p>यह कहना आवश्यक है कि कुछ नीतियां बेहद प्रभावी साबित हुई हैं। हालांकि इसके कारण खुले तौर पर स्वीकार नहीं किए जाते। किसानों को उनके खेत के पास मिलने वाली कीमतों (फार्म-गेट प्राइस) को कृत्रिम रूप से कम रखना भारत का सबसे प्रभावी महंगाई नियंत्रण उपकरण बना हुआ है। चाहे भारतीय रिजर्व बैंक कुछ भी तर्क दे, रेपो रेट दूसरे नंबर पर आता है। कीमतों पर यह दबाव आंकड़ों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है: अरहर, कपास, चना, मूंगफली, मक्का, मसूर, मूंग, रागी, सोयाबीन और उड़द आदि की कीमतें न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से नीचे बनी हुई हैं।</p>
<p>यहां तक कि आम सब्जियों - प्याज, आलू, टमाटर, गाजर - की कीमतें भी लगभग एक तिहाई गिर गई हैं, जबकि फल और सब्जियों का उत्पादन 4% बढ़ा है। यह कोई विरोधाभास नहीं है। यह उत्पादन और उत्पादकता के बीच के अंतर को दर्शाता है। स्पष्ट संदेश यह है कि सरकार की कल्याणकारी और लोकलुभावन नीतियां डिप्रेशन को खुले विरोध में बदलने से रोक रही हैं।</p>
<p>व्यापार नीति ने दबाव को और बढ़ा दिया है। पिछले वर्ष पाम, सोयाबीन और सूरजमुखी तेल पर आयात शुल्क में 40% कटौती की गई। भारत अब अपनी खाद्य तेल की जरूरत का 57% आयात करता है। आयात अधिक हैं क्योंकि फसल उत्पादन (यील्ड) में अंतर बना हुआ है और कृषि अनुसंधान व विकास (R&amp;D) दशकों से उपेक्षित रहा है। R&amp;D का आवंटन दोगुना न करना &lsquo;विकसित भारत&rsquo; के लक्ष्य के प्रति विश्वासघात होगा।</p>
<p>विडंबना यह है कि किसानों को जो राहत मिली है, वह अनजाने में हुई है: मुद्रा अवमूल्यन। कमजोर रुपया - जो 2014 के 60 रुपये प्रति डॉलर से बढ़कर अब लगभग 90 रुपये हो गया है - सस्ते कृषि उत्पादों के आयात के खिलाफ एक प्राकृतिक अवरोध का काम करता है और निर्यात प्रतिस्पर्धा को बढ़ाता है। शुल्क संरक्षण न होने की स्थिति में, अवमूल्यन ने वही काम कर दिया जो नीति नहीं कर पाई।</p>
<p>भारत जीडीपी के हिसाब से दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। फिर भी यह प्रति व्यक्ति जीडीपी के मामले में लगभग 200 देशों में 142वें स्थान पर है। किसानों को उच्चतम मूल्य तभी मिल पाएगा जब उनकी क्रय शक्ति बढ़ेगी, उपभोग में वृद्धि होगी और अर्थव्यवस्था अधिक संतुलित रूप से बढ़ेगी। इसके लिए बेहतर गवर्नेंस अहम है।</p>
<p>शासन की गुणवत्ता और सार्वजनिक संसाधनों (जैसे हवा, पानी, मिट्टी आदि) को सुधारने के लिए अगर इस वर्ष केवल एक सुधार किया जाना है, तो वह यह होना चाहिए: संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के माध्यम से सिविल सेवा भर्ती में ऊपरी आयु सीमा को 26 वर्ष तक सीमित किया जाए और प्रयासों (अटेम्प्ट) की संख्या केवल दो निर्धारित की जाए, चाहे उम्मीदवार किसी भी जाति का हो। सुधार ऊपर से शुरू हो ताकि नीचे के लोगों को उठाया जा सके।</p>
<p>मुझे प्रधानमंत्री की नीयत और क्षमता पर भरोसा है; काश मुझे यह विश्वास भी होता कि सरकार हमारी, यानी किसानों की बात सुनेगी।</p>
<p><strong><em>(अजय वीर जाखड़ भारत कृषक समाज के चेयरमैन हैं)</em></strong></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ Budget 2026: किसानों को बजट की औपचारिकता नहीं, ठोस सुधारों की जरूरत ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[भारतीय कृषि में समावेशी विकास का मार्ग बन सकता है वेज कोड 2019]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/code-on-wages-2019-a-pathway-to-inclusive-growth-in-indian-agriculture.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 20 Jan 2026 13:41:19 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/code-on-wages-2019-a-pathway-to-inclusive-growth-in-indian-agriculture.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>21 नवंबर 2025 से लागू हुई चारों श्रम संहिताएं (लेबर कोड) भारत के श्रम कानूनों की संरचना को नए सिरे से गढ़ेंगी। वेज कोड 2019 का उद्देश्य सबके लिए यूनिवर्सल न्यूनतम मजदूरी सुनिश्चित करना है, ताकि श्रमिकों को सम्मानजनक जीवन स्तर मिल सके। यह संहिता पूरी अर्थव्यवस्था पर लागू होती है, लेकिन इसका सबसे बड़ा प्रभाव कृषि क्षेत्र पर पड़ेगा, जो अनौपचारिक, मौसमी और अधिकांशतः कम पारिश्रमिक पाने वाले श्रमिकों के साथ सबसे बड़ा नियोक्ता है। यह लेख मजदूरी के आंकड़ों, आर्थिक सिद्धांत और नीतिगत विश्लेषण के आधार पर खेती में इस संहिता के अमल से होने वाले संभावित लाभ और लागत का आकलन करता है। वर्तमान परिस्थितियों से जुड़ी मजदूरी तय करने से अनुपालन की लागत बढ़ सकती है, संरचनात्मक बदलाव तेज हो सकते हैं और छोटे किसानों की आर्थिक व्यवहार्यता के लिए खतरा पैदा हो सकता है।</p>
<p><strong>अनुशंसित मजदूरी बनाम कृषि की वास्तविकताएं</strong><br />मजदूरी (वेज) संबंधी सिफारिशें राज्य और पेशे के अनुसार अलग-अलग हैं। बहुत कम राज्यों ने कृषि के लिए अलग से दरें तय की हैं। पंजाब में यह 457 रुपये प्रतिदिन (भोजन के बिना) या 411 रुपये प्रतिदिन (कार्यस्थल पर भोजन के साथ) है। पश्चिम बंगाल में यह 330 रुपये (अकुशल), 363 रुपये (अर्ध-कुशल) और 400 रुपये (कुशल) प्रतिदिन है (कार्यस्थल पर भोजन के बिना)। यहां तक कि अकुशल श्रमिकों के लिए कम न्यूनतम मजदूरी वाले राज्यों में भी बड़ा अंतर दिखता है - राजस्थान में यह 285 रुपये प्रतिदिन, जबकि कर्नाटक में 543 रुपये प्रतिदिन है, जो 90 प्रतिशत से भी अधिक है।</p>
<p>क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करने के लिए नई वेतन संहिता (कोड) में जीवन स्तर से जुड़ा एक राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन (फ्लोर वेज) तय किया गया है। राज्य या उद्योग विशिष्ट दरें इस फ्लोर से ऊपर होनी चाहिए और यदि पहले से अधिक हैं तो वे इससे नीचे नहीं लाई जा सकतीं। जिन राज्यों में कृषि के लिए अलग से वेतन सिफारिशें नहीं हैं, वहां हमने कृषि के लिए केंद्र द्वारा तय न्यूनतम वेतन की तुलना वास्तविक मजदूरी से की है।&nbsp;</p>
<p>वर्तमान में अकुशल श्रमिकों के लिए न्यूनतम मजदूरी 465 रुपये प्रति दिन है। वर्ष 2023-24 में खेती से जुड़े कार्यों के लिए औसत कृषि मजदूरी पुरुषों के लिए 420 रुपये प्रति दिन और महिलाओं के लिए 360 रुपये प्रति दिन थी। इस प्रकार मौजूदा औसत मजदूरी अनुशंसित न्यूनतम से 10 से 23 प्रतिशत कम है। यहां तक कि 2023-24 के बेंचमार्क भी अंतर दर्शाते हैं - 1 अप्रैल 2024 को क्षेत्र &lsquo;सी&rsquo; में अकुशल श्रमिकों के लिए न्यूनतम मजदूरी 449 रुपये थी, जबकि पुरुषों की वास्तविक मजदूरी 420 रुपये रही, यानी 6.5 प्रतिशत कम। चूंकि अधिकांश कृषि श्रम अकुशल है, इसलिए इस कोड का प्रभाव निकट अवधि में करोड़ों मजदूरों की मजदूरी में बढ़ोतरी के रूप में सामने आएगा।</p>
<p><strong>कम मजदूरी वाले राज्यों की चुनौती</strong><br />वास्तविक कृषि मजदूरी राज्यों के बीच काफी भिन्न है। केरल में 912 रुपये प्रति दिन और तमिलनाडु में 699 रुपये प्रति दिन की मजदूरी राष्ट्रीय न्यूनतम से अधिक है। यह आमतौर पर कृषि में उच्च उत्पादकता (लगभग 1.5 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष) से जुड़ी है। इसलिए इन राज्यों में मजदूरी पर प्रभाव सीमित रहेगा, हालांकि अनुपालन जरूरी होगा। दूसरी ओर कई राज्य काफी पीछे हैं - छत्तीसगढ़ 303 रुपये, गुजरात 307 रुपये, झारखंड 308 रुपये, मध्य प्रदेश 341 रुपये, उत्तर प्रदेश 351 रुपये, बिहार 377 रुपये और ओडिशा 389 रुपये प्रति दिन। इन राज्यों में कम उत्पादकता के कारण मजदूरी कम है और महिलाओं की मजदूरी अक्सर 200 रुपये प्रति दिन से भी कम रहती है। कानूनन न्यूनतम वेतन उन नियोक्ताओं के लिए श्रम की लागत सबसे अधिक बढ़ाएगा, जहां पहले से मजदूरी कम है।</p>
<p><strong>लागत से जुड़े प्रभाव</strong><br />मजदूरी में बढ़ोतरी को कृषि की समग्र आर्थिक वास्तविकताओं के अनुरूप करना होगा। बिहार में धान उत्पादन की परिचालन लागत में मजदूरी की हिस्सेदारी लगभग 37%, झारखंड में 28% और ओडिशा में 27% है। गेहूं के मामले में यह हिस्सेदारी बिहार और गुजरात में 18% तथा उत्तर प्रदेश में 14% है। छत्तीसगढ़ में, जहां पुरुष मजदूरों की मजदूरी 303 रुपये प्रतिदिन है, यदि इसे 465 रुपये किया जाता है तो मजदूरी लागत में 53% से अधिक की वृद्धि होगी। चूंकि धान में श्रम की हिस्सेदारी 19% है, इससे वहां के किसानों पर गंभीर दबाव पड़ेगा। इससे सीमांत और छोटे किसानों की स्थिति विशेष रूप से प्रभावित होगी, जो पारिवारिक और किराये के मजदूरों पर निर्भर हैं। उनके मुनाफे सीमित हैं और अतिरिक्त लागत वहन करने के लिए पर्याप्त पूंजी भी नहीं है। उत्पादन मूल्य में आनुपातिक बढ़ोतरी के बिना लागत बढ़ने से उत्पादक (किसान) का सरप्लस घटेगा और उत्पादन में कमी का जोखिम बढ़ेगा।</p>
<p><strong>मशीनीकरण की दिशा में तेजी</strong><br />तत्काल लागत बढ़ने के बावजूद, यह कोड संरचनात्मक बदलाव की प्रक्रिया को तेज कर सकता है। श्रम लागत बढ़ने से पूंजी को श्रम पर तरजीह मिलती है। इससे उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में मशीनीकरण को बढ़ावा मिल सकता है। कृषि मशीनीकरण पर उप-मिशन और कस्टम हायरिंग सेंटर जैसी योजनाएं इस प्रक्रिया को सुगम बनाती हैं। सीड ड्रिल, भूमि समतल करने वाले उपकरण और हार्वेस्टर के अधिक उपयोग से दक्षता बढ़ सकती है, प्रति इकाई श्रम की आवश्यकता घट सकती है और पूंजी-श्रम प्रतिस्थापन की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। हालांकि, यदि सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था पर्याप्त मजबूत नहीं हुई तो अकुशल श्रमिकों के रोजगार पर प्रतिकूल असर पड़ने का जोखिम भी बना रहेगा।</p>
<p><strong>नीति में समन्वय की जरूरत</strong><br />वेतन सुधारों को अन्य श्रम संहिताओं और कृषि नीति के साथ इंटीग्रेट किया जाना चाहिए। वेज कोड को सामाजिक सुरक्षा संहिता से जोड़ने से पेंशन, बीमा और ग्रेच्युटी के माध्यम से श्रमिक कल्याण में सुधार हो सकता है, जिससे औपचारिकीकरण की प्रक्रिया तेज होगी। ग्रामीण रोजगार योजनाएं पहले से ही ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक मजदूरी को समर्थन दे रही हैं। नकारात्मक प्रभावों से बचने के लिए मजदूरी को न्यूनतम वेतन मानकों के अनुरूप रखा जाना चाहिए। सुधारों से किसानों पर बढ़ने वाली लागत को उत्पादकता वृद्धि और बेहतर मूल्य प्राप्ति के जरिए संतुलित करना आवश्यक है। किसान संगठनों और आपूर्ति शृंखलाओं को मजबूत करना इसमें सहायक होगा।</p>
<p>वेज कोड समानता और दक्षता के बीच के संतुलन को दर्शाता है। एक ओर श्रम का औपचारिकीकरण, ग्रामीण गरीबी में कमी और महिलाओं सहित सबसे कमजोर श्रमिकों की आजीविका में सुधार है, तो दूसरी ओर किसानों के लिए बढ़ती लागत, उत्पादन में संभावित गिरावट और सामाजिक सुरक्षा जाल के अभाव में विस्थापन का जोखिम। इसका परिणाम नीति-निर्माण पर निर्भर करेगा- अधिक संवेदनशील राज्यों के लिए क्रमिक बदलाव, सामाजिक सुरक्षा को सुदृढ़ करना, सस्ते मशीनीकरण को बढ़ावा देना और कम श्रम-आधारित, मूल्यवर्धित फसलों की ओर विविधीकरण, साथ ही अधिक मजदूरी को संभव बनाने के लिए फार्म-गेट मूल्य समर्थन। यदि सावधानीपूर्वक और संतुलित ढंग से लागू किया जाए, तो यह संहिता भारतीय कृषि को अधिक आधुनिक और न्यायसंगत दिशा में ले जा सकती है। इसलिए इस परिवर्तन को लागू करने के लिए एक संवेदनशील और समग्र नीतिगत ढांचे की आवश्यकता है।</p>
<p><strong><em>(डॉ. नवीन पी. सिंह आईसीएआर-नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चरल इकोनॉमिक्स एंड पॉलिसी रिसर्च (एनआईएपी), नई दिल्ली में प्रधान वैज्ञानिक और डॉ. बालाजी एसजे इसी संस्थान में वैज्ञानिक हैं)</em></strong></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ भारतीय कृषि में समावेशी विकास का मार्ग बन सकता है वेज कोड 2019 ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[Genome Editing: फसल सुधार में भारतीय वैज्ञानिकों ने की नए अध्याय की शुरूआत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/gene-editing-how-indias-scientists-are-opening-a-new-chapter-in-crop-improvement.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 17 Jan 2026 16:25:50 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/gene-editing-how-indias-scientists-are-opening-a-new-chapter-in-crop-improvement.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>दशकों से किसान ऐसे बीज चाहते हैं जो कम उर्वरक, कम कीटनाशक और कम पानी में ज्यादा पैदावार दें। दुनियाभर के वैज्ञानिक अलग-अलग ब्रीडिंग और बायोटेक्नोलॉजी टूल्स का इस्तेमाल करके फसलों की ऐसी किस्में बनाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसा ही एक टूल है जीनोम एडिटिंग, जो फसलों को बेहतर बनाने के सबसे सशक्त तरीकों में से एक बन गया है।</p>
<p>सदियों से पौधों के डीएनए में प्राकृतिक रूप से होने वाले छोटे-छोटे बदलाव (म्यूटेशन) बेहतर स्वाद या कीड़ों के प्रति रेजिस्टेंस जैसे गुण पैदा करते हैं। शुरुआती किसानों ने डीएनए में इन बदलावों से पौधों के बीज बचाए और धीरे-धीरे उन फसलों को आकार दिया जिन पर हम आज भरोसा करते हैं।</p>
<p>समझ बढ़ने के साथ किसानों और ब्रीडर्स ने फायदेमंद गुणों वाले दो अलग तरह के पौधों की क्रॉस-ब्रीडिंग शुरू कर दी ताकि फसल की किस्म को तेजी से बेहतर बनाया जा सके। उदाहरण के लिए, एक तरह का चावल सूखा सहने की क्षमता रखता है जबकि दूसरा अधिक पैदावार देता है। उन्हें क्रॉस करके ब्रीडर ऐसा पौधा बना सकते हैं जिसमें सूखा सहने की क्षमता और ज्यादा पैदावार दोनों गुण हों।</p>
<p>20वीं सदी के मध्य में वैज्ञानिकों ने म्यूटेशन ब्रीडिंग शुरू की। इसमें बीजों को रेडिएशन या केमिकल के संपर्क में लाकर डीएनए में रैंडम बदलाव किया जाता है और फिर फायदेमंद म्यूटेंट को चुना जाता है। इस तकनीक से दुनिया भर में 3,000 से ज्यादा बेहतर फसल किस्में तैयार हुई हैं।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/01/image_750x_696b6a6c8de26.jpg" alt="" /></p>
<p>उसके बाद जेनेटिक मॉडिफिकेशन (जीएम) आया, जिसमें वैज्ञानिक एक बाहरी जीन को पौधे में डालकर उसमें कीटरोधी, खर-पतवाररोधी या बेहतर पोषण जैसे उपयोगी गुण जोड़ सकते हैं। भारत की एकमात्र कमर्शियल जीएम फसल बीटी कॉटन में ऐसा गुण विकसित किया गया जो इसे कीड़ों से बचाता है।</p>
<p>जीनोम एडिटिंग ब्रीडिंग का सबसे एडवांस तरीका है। इसकी क्रिस्पर-कैस (CRISPR-Cas) टेक्नोलॉजी को नोबेल पुरस्कार मिल चुका है। यह पौधों के डीएनए को काटने और बदलने के लिए मॉलिक्यूलर कैंची की तरह काम करती है। एक बार डीएनए में जरूरी बदलाव हो जाने के बाद, क्रिस्पर कैंची की जरूरत नहीं रहती और उन्हें हटाया जा सकता है। इससे पौधे में कोई बाहरी जीन नहीं बचता।</p>
<p><strong>स्वदेशी ब्रीडिंग टूल</strong><br />Cas9 और Cas12a जैसे क्रिस्पर टूल को विदेशों में पेटेंट हासिल है। इनके कमर्शियल प्रयोग में भारतीय वैज्ञानिकों को दिक्कत आती है। भारत में हुई एक खोज इस कमी को दूर करने और फसल सुधार के नए दरवाजे खोलने में मदद कर सकती है। कटक में ICAR-सेंट्रल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट (CRRI) के शोधकर्ताओं ने जीनोम एडिटिंग के लिए TnpB नाम के एक छोटे प्रोटीन को अपनाया है। TnpB को Cas9 का छोटा विकल्प कह सकते हैं।&nbsp;</p>
<p>इसे समझने के लिए एक कैंची की कल्पना करें। Cas9 जैसे पारंपरिक टूल शक्तिशाली होते हैं। लेकिन यह एक धागे को काटने के लिए बड़ी गार्डन कैंची का इस्तेमाल करने जैसा है। इसके उलट, TnpB छोटी, हल्की कैंची की तरह है। Cas9 के 1300 की तुलना में TnpB में लगभग 400 अमीनो एसिड होते हैं - यानी लगभग एक-तिहाई साइज। TnpB एक समय में एक से ज्यादा जीन एडिट कर सकता है। इसके शोध नतीजे अंतरराष्ट्रीय प्लांट बायोटेक्नोलॉजी जर्नल में प्रकाशित हुए। ICAR को TnpB का पेटेंट मिला है। पेटेंट अधिकार भारत में होने से भारतीय शोधकर्ता जीनोम एडिटिंग और फसल सुधार के लिए इसका आसानी से इस्तेमाल कर सकेंगे।</p>
<p>सालों से ज्यादातर जीनोम एडिटिंग इनोवेशन यूरोप, अमेरिका और चीन में होते रहे हैं। लेकिन CRRI के TnpB टूल ने भारत को नेक्स्ट-जेन जीनोम एडिटिंग में सबसे आगे ला दिया है। CRRI टीम इसे बेहतर बनाने पर काम कर रही है। यह टूल फसलों की अच्छी किस्में तेजी से डेवलप करने में मदद कर सकता है।</p>
<p><em>(कुतुबुद्दीन मोल्ला कटक स्थित आईसीएआर-नेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट के क्रॉप इंप्रूवमेंट डिवीजन में वरिष्ठ वैज्ञानिक हैं)</em></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/01/image_750x500_696b6a6cd062e.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ Genome Editing: फसल सुधार में भारतीय वैज्ञानिकों ने की नए अध्याय की शुरूआत ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/01/image_750x500_696b6a6cd062e.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[नया बीज कानून: भारतीय बीज क्षेत्र के लिए ऐतिहासिक कदम]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/decision-to-enact-a-new-seed-law-aligns-with-indias-ambition-to-become-an-agricultural-powerhouse.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 12 Jan 2026 10:14:37 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/decision-to-enact-a-new-seed-law-aligns-with-indias-ambition-to-become-an-agricultural-powerhouse.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>नए ड्राफ्ट सीड बिल 2025 का जारी होना भारत के कृषि क्षेत्र के लिए एक अहम पल है। लगभग छह दशकों में पहली बार, सरकार ने देश के बीज सेक्टर को कंट्रोल करने वाले कानूनी ढांचे की विस्तृत समीक्षा की है। यह सिर्फ इसलिए ज़रूरी नहीं है क्योंकि बीज अधिनियम 1966 पुराना हो चुका है, बल्कि इसलिए भी कि भारतीय कृषि क्षेत्र इतना &nbsp;बदल गया है कि उसे पहचाना नहीं जा सकता। 1966 का कानून हरित क्रांति के शुरुआती दौर के लिए बनाया गया था, उस समय बीज उत्पादन में सार्वजनिक क्षेत्र का बोलबाला था, खाद्य सुरक्षा गेहूं और चावल पर निर्भर थी, और प्राइवेट बीज इंडस्ट्री अभी आकार लेना शुरू ही कर रही थी। आज, भारत का बीज इकोसिस्टम मुख्य रूप से प्राइवेट सेक्टर के हाथों में है, यह रिसर्च-इंटेंसिव है, दुनिया भर में जुड़ा हुआ है, और तेज़ी बदल रही टेक्नोलॉजी से चलता है। किसान बेहतर नतीजे देने वाले हाइब्रिड, जलवायु परिवर्तन अनुकूल किस्मों और सटीक टेक्नोलॉजी तक तेज़ी से पहुंच की मांग कर रहे हैं। इस मामले में, देश के बीज कानून को फिर से बनाने की सरकार की इच्छा समय के हिसाब से, आगे बढ़ने वाली और भारत के दुनिया भर में कृषि क्षेत्र की बड़ी ताकत बनने के सपने से पूरी तरह जुड़ी हुई है।</p>
<p><strong>बीज अधिनियम 1966 की समीक्षा क्यों ज़रूरी थी</strong><br />दशकों तक, बीज अधिनियम 1966 इस सेक्टर के विकास के साथ तालमेल बिठाने में मुश्किल महसूस कर रहा था। इसे एक अलग समय और स्ट्रक्चर के लिए लिखा गया था; जैसे-जैसे प्राइवेट बीज इंडस्ट्री बढ़ी, रेगुलेटरी कमियां भी बढ़ती गईं। अलग-अलग राज्यों में लाइसेंसिंग की ज़रूरतों ने कंपनियों को कई, अक्सर अलग-अलग सिस्टम से गुज़रने पर मजबूर किया, जिससे मार्केट में एंट्री में देरी हुई और स्केल पर रोक लगी। 1960 के दशक में डिजिटल ट्रेसेबिलिटी, QR-बेस्ड ऑथेंटिकेशन और जीनोम-लिंक्ड बीज पहचान जैसे मॉडर्न टूल्स के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था, जिससे आज की इंडस्ट्री के पास नकली बीजों से निपटने या ट्रांसपेरेंसी पक्का करने के लिए सही तरीके नहीं हैं। एक्ट में रिसर्च पर आधारित ग्रोथ को बढ़ावा देने के लिए आर्किटेक्चर की भी कमी थी&mdash;इसमें R&amp;D को बढ़ावा देने के लिए कोई नियम नहीं थे, कोई उत्पादकता आधारित इंसेंटिव (पीएलआई) जैसी सोच नहीं थी, और पब्लिक रिसर्च को प्राइवेट इनोवेशन के साथ जोड़ने पर कोई स्पष्टता नहीं थी। वैरायटी टेस्टिंग और रजिस्ट्रेशन धीमा और एक जैसा नहीं रहा, जिससे अक्सर हाई-परफॉर्मिंग हाइब्रिड लाने में देरी हुई, जिनकी किसानों को तुरंत ज़रूरत थी। संक्षेप में, 1966 का फ्रेमवर्क एक ऐसे सेक्टर के लिए बहुत पुराना था जो डायनामिक, कॉम्पिटिटिव और साइंस-ड्रिवन बन गया था।</p>
<p><strong>नया ड्राफ्ट सीड बिल किसानों, सीड इंडस्ट्री और घरेलू अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद&nbsp;</strong><br />विकसित भारत के विज़न को पूरा करने के लिए, भारतीय कृषि क्षेत्र को भी देश की बढ़ती GDP के साथ तालमेल बिठाने की ज़रूरत है। अभी कृषि क्षेत्र देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) &nbsp;में लगभग 450 अरब डॉलर का योगदान देता है, यह आंकड़ा अगले 10-15 सालों में 4-5 गुना बढ़कर दो ट्रिलियन डॉलर हो जाना चाहिए। बीज में टेक्नोलॉजी का उपयोग कर उत्पादकता और जलवायु परिवर्तन के अनुकूलता लाना संभव है। नया ड्राफ्ट सीड बिल आज के सीड इकोसिस्टम की असलियत और इनोवेशन के लिए बढ़े हुए R&amp;D इन्वेस्टमेंट को पहचानता है। यह मानता है कि भारत अब वाइब्रेंट सीड इंडस्ट्री का घर है और रेगुलेटरी फ्रेमवर्क को इनोवेशन को सीमित करने के बजाय बढ़ावा देना चाहिए। सबसे आगे की सोच वाली खासियतों में से एक &ldquo;वन नेशन-वन लाइसेंस&rdquo; की ओर बढ़ना है, जो लंबे समय से इंडस्ट्री की बड़ी मांग रही है। एक यूनिफाइड लाइसेंसिंग स्ट्रक्चर से ट्रांज़ैक्शन कॉस्ट कम होगी, डुप्लीकेशन खत्म होगा, और मल्टी-स्टेट ऑपरेशन आसान होंगे,आखिरकार किसानों तक अच्छी क्वालिटी के बीज तेज़ी से पहुँच सकेंगे। यह बिल डिजिटल-फर्स्ट गवर्नेंस की ओर बदलाव का भी संकेत देता है, जिसमें QR-बेस्ड ट्रेसेबिलिटी और डिजिटल रजिस्ट्रेशन सिस्टम के प्रावधान हैं जो ट्रांसपेरेंसी बढ़ाते हैं नकली बीज मार्केट से निपटने में मदद करते हैं, और किसानों का भरोसा मज़बूत करते हैं।</p>
<p>साइंटिफिक और परफॉर्मेंस-ड्रिवन पैरामीटर्स के आधार पर वैल्यू फॉर कल्टीवेशन एंड यूज़ (VCU) टेस्टिंग को शामिल करना भी उतना ही ज़रूरी है। इससे उन वैरायटी को तेज़ी से बाजार में लाया जा सकता है जो अच्छे फ़ायदे दिखाती हैं और कंपनियों को नई तकनीक में अधिक निवेश करने के लिए बढ़ावा देती हैं। छोटे अपराधों को डीक्रिमिनलाइज़ करना एक और कदम है जो मॉडर्न रेगुलेटरी सोच को दिखाता है: बीज इनोवेशन को सज़ा वाले नियमों से नहीं दबाया जाना चाहिए, बल्कि ऐसे स्ट्रक्चर्ड सुधारों के ज़रिए सपोर्ट किया जाना चाहिए जो अकाउंटेबिलिटी बनाए रखते हुए बिज़नेस करने में आसानी लाएँ।</p>
<p><strong>सीड बिल और PPVFRA के बीच तालमेल की ज़रूरत</strong><br />नया ड्राफ़्ट प्रोग्रेसिव है, लेकिन कुछ ऐसे एरिया हैं जिन पर स्पष्टता और गहरे सोच-विचार की ज़रूरत है। इनमें सबसे ज़रूरी है प्रोटेक्शन ऑफ़ प्लांट वैरायटीज़ एंड फार्मर्स राइट्स एक्ट (PPVFRA) के साथ तालमेल बैठाना। PPVFRA इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी की सुरक्षा पर फोकस करता है, जबकि सीड बिल बीज की क्वालिटी, रजिस्ट्रेशन और मार्केट रेगुलेशन को कंट्रोल करता है। ये दोनों फ्रेमवर्क कभी-कभी ओवरलैप करते हैं, जिससे दोहरा कम्प्लायंस बोझ और अनिश्चितता पैदा होती है, खासकर मौजूदा वैरायटी, किसानों के अधिकारों और ब्रीडर के अधिकारों को लेकर।&nbsp;</p>
<p>इंडस्ट्री लंबे समय से एक ऐसे तालमेल वाले, सिंगल-विंडो डिजिटल प्लेटफॉर्म की वकालत कर रही है जो दोनों सिस्टम को जोड़ता हो, प्रक्रिया को कम करने के साथ ब्रीडर को ट्रांसपेरेंट गाइडेंस देता हो।<br />साथ ही, इस व्यवस्था में किसानों के बीज बचाने, इस्तेमाल करने, एक्सचेंज करने और बोने के लंबे समय से चले आ रहे अधिकारों को बनाए रखना चाहिए। यह ऐसे मुख्य सिद्धांत हैं जिनकी शुरुआत भारत ने दुनिया भर में की थी। सीड बिल और PPVFRA के बीच एक अच्छी तरह से तय इंटरफेस सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है बल्कि यह एक ऐसा रेगुलेटरी इकोसिस्टम बनाने के लिए ज़रूरी है जो किसानों के हितों की रक्षा करते हुए इनोवेशन को सपोर्ट करे।</p>
<p><strong>बीज की गुणवत्ता का भरोसा और सर्टिफिकेशन को मजबूत करना</strong><br />बीज की गुणवत्ता किसानों के भरोसे का आधार है, और नया ड्राफ्ट बीज टेस्टिंग और सर्टिफिकेशन के तरीके को मॉडर्न बनाने की कोशिश करता है। प्राइवेट बीज टेस्टिंग लैब को मान्यता देना एक ज़रूरी कदम है, जिससे टर्नअराउंड टाइम कम करने, कैपेसिटी बढ़ाने और यह पक्का करने में मदद मिलेगी कि किसानों को अच्छी क्वालिटी के बीज का लंबा इंतज़ार न करना पड़े। हालांकि, लैब एक्रेडिटेशन, मॉनिटरिंग और अकाउंटेबिलिटी के लिए साफ फ्रेमवर्क की ज़रूरत है ताकि प्राइवेट हिस्सेदारी साइंटिफिक सख्ती को कम न करे। बिल इंस्पेक्शन सिस्टम और बीज स्टैंडर्ड को भी मजबूत करता है, लेकिन इन्हें ट्रांसपेरेंसी और बैलेंस के साथ काम करना चाहिए। बिना गाइडलाइंस के बहुत ज़्यादा अपनी मर्ज़ी से काम करने में रुकावटें आ सकती हैं; इसलिए, नियमों को लागू करने की उचित और कुशल व्यवस्था के लिए समयसीमा और सही से परिभाषित प्रोटोकॉल बहुत ज़रूरी होंगे। इसका मकसद एक मज़बूत क्वालिटी वाला इकोसिस्टम बनाना होना चाहिए जो किसानों के हितों की रक्षा करे और साथ ही बीज इंडस्ट्री को पहले से तय और प्रोफेशनलिज़्म के साथ काम करने में मदद करे।</p>
<p><strong>नियम बनाने के स्तर पर सकारात्मक एजेंडा</strong><br />जैसे-जैसे बिल विस्तृत नियम बनाने की ओर बढ़ेगा, इंडस्ट्री अपनी मांगों को रखते हुए एक सकारात्मक भूमिका निभाना चाहेगी। सबसे बड़ी उम्मीद यह है कि &ldquo;वन नेशन-वन लाइसेंस&rdquo; बिना किसी परोक्ष राज्य-स्तरीय दोहराव के काम करे ताकि बिज़नेस करने में सच में आसानी हो सके। लाइसेंसिंग, रजिस्ट्रेशन और लैब एक्रेडिटेशन के लिए समयबद्ध मंजूरी और डीम्ड अप्रूवल ऑपरेशनल निश्चितता सुनिश्चित करेंगे। लाइसेंसिंग, रजिस्ट्रेशन और यहां तक कि किसानों की शिकायत दूर करने के लिए एक यूनिफाइड डिजिटल पोर्टल भारत के बीज रेगुलेटरी सिस्टम को दुनिया भर में सबसे एडवांस्ड में से एक बना सकता है। बीज बिल, PPVFRA और बायोडायवर्सिटी कानून में साफ़ अलाइनमेंट प्रोटोकॉल इनोवेशन के लिए एक सही कानूनी माहौल बनाने में मदद करेंगे। सरकार R&amp;D इंसेंटिव को सीड बिल के रोलआउट से जोड़ने पर भी विचार कर सकती है, जिससे जलवायु परिवर्तन अनुकूल, पोषणयुक्त और निर्यात की जा सकने वाली किस्मों के लिए रिसर्च को बढ़ावा मिलेगा। आखिर में, अधिनियम की समय-समय पर समीक्षा लिए एक प्रक्रिया यह सुनिश्चित करेगी कि रेगुलेशन साइंटिफिक एडवांसमेंट और भविष्य की इंडस्ट्री की ज़रूरतों के साथ तालमेल बिठाए।</p>
<p><strong>बिल भारत के किसानों और बड़े इकोसिस्टम पर कैसे असर डालता है</strong><br />किसी भी बीज कानून के केंद्र में किसान के हित होने चाहिए और यह प्रस्तावित कानून किसानों की उत्पादकता को बेहतर करने में सक्षम है। मंजूरी की तेज प्रक्रिया, मज़बूत ट्रेसेबिलिटी और बेहतर क्वालिटी एश्योरेंस का मतलब है कि किसानों को भरोसेमंद, बेहतर नतीजे देने वाले वाले बीज मिलते हैं जो पैदावार बढ़ाते हैं, उत्पादन लागत कम करते हैं, और क्लाइमेट स्ट्रेस से निपटने की क्षमता में सुधार करते हैं। क्यूआर ऑथेंटिकेशन किसानों को बीज पैकेट की असलियत वेरिफाई करने में मदद करेगा, जिससे नकली मार्केट से होने वाले नुकसान कम होंगे। एक मॉडर्न रेगुलेटरी फ्रेमवर्क भारत के बीज एक्सपोर्ट की संभावना को भी बढ़ाएगा, जिससे भारतीय कंपनियां उभरते मार्केट में ग्लोबली कॉम्पिटिटिव हाइब्रिड बीज की सप्लाई कर पाएंगी। छोटे और मीडियम एंटरप्राइज को आसान लाइसेंसिंग और नेशनल-लेवल ऑपरेशन से फायदा होगा, हालांकि उन्हें नए डिजिटल सिस्टम में एडजस्ट करने के लिए ट्रांज़िशनल सपोर्ट की ज़रूरत हो सकती है। एफपीओ और ग्रामीण कारोबारियों को बीज उत्पादन और डिस्ट्रीब्यूशन में ज़्यादा मौके मिलेंगे, जिससे आय के नये स्रोत पैदा होंगे। बायोटेक्नोलॉजी, जेनेटिक्स और बीज ई-कॉमर्स में काम करने वाले स्टार्ट-अप ज़्यादा नतीजे देने वाले और इनोवेशन-फ्रेंडली माहौल में काम करेंगे।</p>
<p>नये कानून के असली लाभार्थी देश का किसान और फूड सिस्टम होगा। एक प्रोग्रेसिव बीज कानून भारत को न केवल खाद्य और पोषण सुरक्षा देने में मदद करेगा, बल्कि बीज निर्यात, एग्रीकल्चरल टेक्नोलॉजी और क्लाइमेट-स्मार्ट इनोवेशन का एक ग्लोबल हब भी बनाएगा। लगभग साठ साल बाद रेगुलेशन को मॉडर्न बनाकर, सरकार ने एक ऐसा एग्रीकल्चरल इकोसिस्टम बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है जो कॉम्पिटिटिव, शोध को बढ़ावा देने वाले विकसित भारत के नजरिया के साथ सीधे जुड़ा है। सीड बिल 2025 इस सफर का अंत नहीं है&mdash;बल्कि यह एक मजबूत भविष्य की शुरुआत है।&nbsp;</p>
<p><strong><em>(लेखक फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया के चेयरमैन और सवाना सीड्स के सीईओ एवं मैनेजिंग डायरेक्टर हैं)</em></strong></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ नया बीज कानून: भारतीय बीज क्षेत्र के लिए ऐतिहासिक कदम ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[उत्पादन में बढ़ोतरी के बावजूद कृषि क्षेत्र में धीमी ग्रोथ, किसानों की आय न बढ़ने का संकेत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/rising-production-fails-to-lift-farm-incomes-as-agriculture-growth-slows.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 08 Jan 2026 17:20:39 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/rising-production-fails-to-lift-farm-incomes-as-agriculture-growth-slows.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>बेहतर मानसून और उत्पादन में बढ़ोतरी के बावजूद देश में किसानों की आर्थिक स्थिति कमजोर होती जा रही है। इस पर सरकार द्वारा चालू वित्त वर्ष (2025&ndash;26) के लिए जारी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आंकड़ों ने मुहर लगा दी है। केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) द्वारा 7 जनवरी को जारी जीडीपी के पहले अग्रिम अनुमानों के मुताबिक, चालू वर्ष में जीडीपी 7.4 फीसदी की दर से बढ़ेगी और ग्रॉस वैल्यू एडेड (जीवीए) की दर 7.3 फीसदी रहेगी। जीवीए का आकलन जीडीपी में से टैक्स और सब्सिडी घटाने के बाद किया जाता है। इस प्रकार जीवीए कुल उत्पादन का द्योतक है।&nbsp;</p>
<p>चालू वित्त वर्ष में कृषि एवं सहयोगी क्षेत्र के लिए जीवीए की वृद्धि दर (2011-12 <span>की स्थिर कीमतों पर</span>)<span> केवल </span>3.1 फीसदी रहने का अनुमान लगाया गया है, जो पिछले वर्ष (2024&ndash;25) के दौरान 4.6 फीसदी थी। इससे भी अधिक चिंता की बात है कि मौजूदा कीमतों (करंट प्राइसेस) पर कृषि एवं सहयोगी क्षेत्र के जीवीए में मात्र 0.8 फीसदी की बढ़ोतरी का अनुमान है। गत वर्ष मौजूदा कीमतों पर कृषि व संबंधित क्षेत्र के जीवीए में 10.4 फीसदी की ग्रोथ थी।</p>
<p>स्थिर कीमतों तथा मौजूदा कीमतों पर जीवीए में अंतर महंगाई का परिणाम है। कृषि एवं सहयोगी क्षेत्रों के लिए यह अंतर -2.3 फीसदी हो गया है। मतलब, <span>कृषि उत्पादों की महंगाई बढ़ने की बजाय घट रही है। जब उपजों की कीमतें ही नहीं बढ़ रही है तो फिर किसानों की आय कैसे बढ़ेगी</span>?</p>
<p>इस तरह भारतीय कृषि एक ऐसी स्थिति में आ गई जब कृषि उत्पादन बढ़ रहा है, लेकिन उपज की कीमतों में बढ़ोतरी न होने के कारण मौजूदा कीमतों पर कृषि एवं सहयोगी क्षेत्र के ग्रॉस वैल्यू एडेड (जीवीए) में वृद्धि दर एक फीसदी से भी कम रह गई है। यह कृषि क्षेत्र में सुस्ती और ठहराव का संकेत है जो अर्थव्यवस्था के लिए चिंताजनक संकेत है।</p>
<p>सरकारी आंकड़े लगातार इस स्थिति की पुष्टि भी करते हैं। खाद्य महंगाई दर काफी कम है और देश की कृषि मंडियों में उत्पादों के दाम पिछले साल की तुलना में नीचे रहे हैं। खरीफ सीजन के दौरान किसानों को अधिकांश फसलें न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से भी कम दामों पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसी का असर कृषि और सहयोगी क्षेत्र की जीडीपी के आंकड़ों पर दिख रहा है।</p>
<p>महंगाई को काबू में रखने के लिए सरकार ने खाद्य उत्पादों की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए कई कदम उठाए। इनमें घरेलू खपत से कम उत्पादन वाली वस्तुओं जैसे खाद्य तेल और दालों का बड़े पैमाने पर सस्ता आयात भी शामिल है। इसका नतीजा यह हुआ कि खरीफ सीजन की अधिकांश फसलों के लिए किसानों को एमएसपी मिलना भी मुश्किल हो गया।</p>
<p>किसानों की आय में वृद्धि के लिए उत्पादन के अलावा उपजों की कीमतों में बढ़ोतरी भी आवश्यक है। देश में कृषि उत्पादन तो बढ़ा है लेकिन कृषि उपजों के दाम गिरने से किसानों को इसका फायदा नहीं मिल पा रहा है। केंद्र सरकार और आरबीआई ने खाद्य कीमतों को नियंत्रित करने की जो नीति अपनाई गई, उसके चलते कृषि क्षेत्र दबाव में आ गया है। अर्थव्यवस्था के ताजा आंकड़े इसे उजागर करते हैं।</p>
<p>जब पूरी अर्थव्यवस्था 7.3 फीसदी की दर से बढ़ रही है, तब कृषि और सहयोगी क्षेत्र का केवल 3.1 फीसदी की दर से बढ़ना किसी भी सरकार के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। खासकर जबकि देश की लगभग 46 फीसदी कामकाजी आबादी आज भी कृषि और सहयोगी क्षेत्र पर निर्भर है।</p>
<p>चालू वर्ष में जीडीपी में कृषि की हिस्सेदारी लगभग 17 फीसदी रहने का अनुमान है, जबकि मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की हिस्सेदारी 14 फीसदी रहेगी। इसके बावजूद मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में 12 फीसदी से भी कम लोगों को रोजगार मिलता है। इसके अलावा फाइनेंशियल सर्विसेज, अन्य तृतीयक क्षेत्र, कंस्ट्रक्शन और सरकारी सेवाएं अर्थव्यवस्था के बाकी अहम हिस्से हैं।</p>
<p>इस वर्ष मैन्युफैक्चरिंग की जीवीए ग्रोथ 7 फीसदी रहने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष 4.5 फीसदी थी। वहीं तृतीयक क्षेत्र (व्यापर व सेवाएं)<span> का जीवीए पिछले वर्ष के </span>7.2 फीसदी से बढ़कर इस वर्ष 9 फीसदी तक पहुंचने का अनुमान है। इससे स्पष्ट होता है कि अर्थव्यवस्था की कुल वृद्धि का बड़ा हिस्सा गैर-कृषि क्षेत्रों से आ रहा है।</p>
<p>हालांकि,<span> कृषि के मुकाबले अन्य क्षेत्रों का तेज गति से बढ़ना स्वाभाविक और आवश्यक है</span>, लेकिन यह देखना भी उतना ही जरूरी है कि क्या कृषि पर निर्भर लोग इन तेजी से बढ़ते क्षेत्रों में रोजगार पा रहे हैं। फिलहाल ऐसा होता नजर नहीं आ रहा है। आज भी लगभग 46 फीसदी कामकाजी लोग कृषि और सहयोगी क्षेत्र में ही कार्यरत हैं।</p>
<p>असल में ये आंकड़े ग्रामीण और गैर-ग्रामीण अर्थव्यवस्था के बीच बढ़ती खाई को भी उजागर करते हैं और यह साबित करते हैं कि कृषि पर निर्भर लोगों की आमदनी नहीं बढ़ पा रही है। ये आंकड़े केवल किसानों की परेशानियों तक सीमित नहीं हैं। इसी स्थिति के चलते ग्रामीण अर्थव्यवस्था में उपभोक्ता मांग कमजोर बनी हुई है, जो इस संकट का एक और संकेत है।</p>
<p>ऐसे में जब सरकार आगामी 1 फरवरी को वित्त वर्ष 2026&ndash;27 का बजट पेश करेगी, तब यह देखना बेहद अहम होगा कि क्या कृषि क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए कोई ठोस कदम उठाए जाते हैं या नहीं। हालांकि हर बजट में वित्त मंत्री कृषि और ग्रामीण क्षेत्र को प्राथमिकता देने का दावा करते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग नजर आती है।</p>
<p>&nbsp;</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/01/image_750x500_695f97b72b193.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ उत्पादन में बढ़ोतरी के बावजूद कृषि क्षेत्र में धीमी ग्रोथ, किसानों की आय न बढ़ने का संकेत ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[उच्च शिक्षा में लड़कियां: स्कॉलरशिप मिलते ही पढ़ाई छोड़ने का ट्रेंड कैसे थमेगा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/girls-in-higher-education-the-trend-of-dropping-out-after-receiving-scholarships.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 07 Jan 2026 11:53:16 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/girls-in-higher-education-the-trend-of-dropping-out-after-receiving-scholarships.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>उत्तराखंड सरकार द्वारा उच्च शिक्षा में लड़कियों का पंजीकरण बढ़ाने के उद्देश्य से आरंभ की गई नंदा गौरा योजना छात्रवृत्ति के परिणाम पहले वर्ष में तेज पंजीकरण और इसके बाद लगभग उतनी ही तेजी से ड्रॉपआउट के रूप में सामने आ रहे हैं। छात्रवृत्ति की राशि मिलने के बाद गरीब परिवारों में लड़कियों की पढ़ाई के प्रति उदासीनता का माहौल बन जाता है। इस योजना में कुछ आंशिक परिवर्तन करके न केवल लड़कियों की उपस्थिति बनाए रखी जा सकती है, बल्कि उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में भी व्यापक सुधार किया जा सकता है।</p>
<p>भारत सरकार का लक्ष्य यह है कि 17 से 23 वर्ष के युवाओं में से लगभग 50 प्रतिशत युवा उच्च शिक्षा में पंजीकृत हों। इसके लिए सरकार ने वर्ष 2035 तक का लक्ष्य निर्धारित किया है। उत्तराखंड इस लक्ष्य के काफी निकट है। ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन (AISHE) की 2021-22 की रिपोर्ट से स्पष्ट होता है कि उत्तराखंड में 17 से 23 वर्ष आयु वर्ग के 40 प्रतिशत से अधिक युवा किसी न किसी कॉलेज अथवा विश्वविद्यालय में स्नातक उपाधि के लिए पंजीकृत हैं। इनमें लड़कियों की संख्या भी लगभग बराबरी की है। (2025-26 के पंजीकरण को देखें तो यह आंकड़ा 45 फीसद पार कर चुका होगा, हालांकि इसकी पुष्टि AISHE की नई रिपोर्ट आने के बाद ही होगी।) विगत वर्षों में उत्तराखंड सरकार की नंदा गौरा योजना ने लड़कियों की संख्या बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन यह संख्या स्नातक उपाधि के प्रथम वर्ष के बाद बहुत तेजी से घटती चली जाती है। पंजीकरण बढ़ने की प्रमुख वजह नंदा गौरा छात्रवृत्ति है और गिरावट की प्रमुख वजह उसी छात्रवृत्ति का गलत क्रियान्वयन है। (हालांकि इस पर व्यवस्थित अकादमिक अध्ययन की जरूरत है ताकि इसके वास्तविक परिणामों को तथ्यात्मक रूप से जाना जा सके।)</p>
<p>इस योजना के अंतर्गत सरकार द्वारा उन सभी छात्राओं को 51 हजार रुपये की एकमुश्त राशि प्रदान की जाती है, जिन्होंने 12वीं उत्तीर्ण करने के बाद राज्य के किसी उच्च शिक्षा संस्थान, चाहे वह कॉलेज हो अथवा विश्वविद्यालय, में प्रवेश लिया हो। इस योजना का लाभ देने के लिए परिवार की आय, एक ही परिवार में लड़कियों की संख्या जैसे कुछ मानक निर्धारित किए गए हैं। इन मानकों का पालन करते हुए भी प्रत्येक वर्ष 25 से 30 हजार छात्राओं को इस योजना का लाभ मिलता रहा है। मौजूदा शैक्षणिक वर्ष 2025-26 में भी इस योजना के अंतर्गत 30 हजार से अधिक आवेदन महिला सशक्तिकरण एवं बाल विकास विभाग को प्राप्त हुए हैं। यही विभाग इस योजना का क्रियान्वयन करता है।</p>
<p>51 हजार रुपये की स्कॉलरशिप इंजीनियरिंग, मेडिकल या अन्य किसी प्रोफेशनल डिग्री के लिए आज के समय में बहुत आकर्षक नहीं मानी जा सकती, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में बीए, बीएससी, बीकॉम जैसे सामान्य डिग्री कार्यक्रमों में प्रवेश लेने वाली छात्राओं के लिए यह राशि काफी महत्वपूर्ण हो जाती है। प्रथम वर्ष में प्रवेश के कुछ महीने के भीतर ही सरकार यह राशि सीधे संबंधित छात्रा के खाते में जारी कर देती है। इस योजना के चलते उत्तराखंड के मैदानी ग्रामीण क्षेत्रों में विगत वर्षों में लड़कियों का पंजीकरण काफी तेजी से बढ़ा है, लेकिन यह सुखद स्थिति उस समय चिंता में बदल जाती है जब यह राशि छात्रा के खाते में पहुंचने के बाद अगले सत्र में एक चौथाई से अधिक छात्राएं पढ़ाई छोड़ देती हैं। (कई स्थानों पर और कुछ अल्पसंख्यक समूहों के मामले में यह संख्या और भी ज्यादा है)</p>
<p>गरीब परिवारों के लिए यह राशि लड़कियों की पढ़ाई की बजाय परिवार की व्यक्तिगत आवश्यकताओं में अधिक खर्च हो रही है। इन परिवारों की अधिकतर छात्राएं ऐसी स्थिति में नहीं होतीं कि वे प्रतिवाद कर सकें कि यह राशि केवल उनकी पढ़ाई के लिए है और इसे किसी अन्य कार्य में खर्च नहीं किया जाना चाहिए। डिग्री कॉलेजों में अनेक अभिभावक प्रवेश दिलाने के तुरंत बाद यह पूछने लगते हैं कि उनकी बेटी के खाते में नंदा गौरा योजना की राशि कब तक आएगी। ऐसे मामलों में अभिभावकों की रुचि छात्रा की पढ़ाई जारी रखने की बजाय इस पैसे को प्राप्त करने में अधिक दिखाई देती है। जबकि सरकार का उद्देश्य यह रहा है कि इस राशि से तीन या चार वर्ष की डिग्री अवधि के दौरान पुस्तकों, अध्ययन सामग्री, दैनिक यात्रा व्यय, यूनिफॉर्म आदि की जरूरतें पूरी की जा सकें, लेकिन कई अभिभावकों के लिए यह एक अतरिक्त इनकम की तरह बन गई है।</p>
<p>अब प्रश्न यह है कि इस योजना के क्रियान्वयन में ऐसे कौन से परिवर्तन किए जाएं, जिससे छात्राओं के ड्रॉपआउट को रोका जा सके। इसका सबसे सरल उपाय यह हो सकता है कि 51 हजार रुपये की राशि एक साथ जारी करने के बजाय तीन किस्तों में प्रदान की जाए। प्रवेश के समय 17 हजार रुपये, प्रथम वर्ष उत्तीर्ण करने पर 17 हजार रुपये और दूसरा वर्ष उत्तीर्ण करके तीसरे वर्ष में प्रवेश लेने पर शेष 17 हजार रुपये दिए जाएं। जो छात्राएं राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अंतर्गत चार वर्षीय स्नातक उपाधि पूरी करने की इच्छुक हों, उन्हें चौथे वर्ष में भी कुछ अतिरिक्त राशि प्रदान करने पर विचार किया जा सकता है।</p>
<p>एक अन्य तरीका यह हो सकता है कि नंदा गौरा योजना के अंतर्गत चयनित सभी छात्राओं की कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में बायोमेट्रिक उपस्थिति अनिवार्य की जाए। सरकार न्यूनतम 180 दिन की उपस्थिति को आवश्यक मानती है (इस बारे में शासनादेश भी निर्गत किया गया है) इसलिए ऐसी छात्राओं को प्रति बायोमेट्रिक उपस्थिति 100 रुपये की दर से प्रोत्साहन राशि निर्धारित की जा सकती है। शैक्षणिक वर्ष के अंत में जिन छात्राओं की उपस्थिति 180 दिन या उससे अधिक हो, उन्हें उनकी वास्तविक उपस्थिति के अनुरूप नंदा गौरा योजना के अंतर्गत राशि जारी की जाए। यह व्यवस्था तब तक जारी रखी जा सकती है, जब तक छात्रा द्वारा स्नातक उपाधि पूर्ण न कर ली जाए। इसके दो बड़े लाभ होंगे। पहला, कक्षाओं में उपस्थिति की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि होगी और दूसरा, ड्रॉपआउट की संभावना काफी हद तक कम हो जाएगी। हालांकि इससे संस्थानों के स्तर पर थोड़ा काम बढ़ जाएगा क्योंकि उन्हें प्रत्येक वर्ष छात्राओं का बायोमेट्रिक उपस्थिति रिकॉर्ड विभाग को उपलब्ध कराना होगा।</p>
<p>इस योजना को उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के एक साधन के रूप में भी देखा जा सकता है। जो छात्राएं 75 प्रतिशत या उससे अधिक अंकों के साथ उत्तीर्ण हों, उन्हें अतिरिक्त प्रोत्साहन राशि देने पर भी विचार किया जाना चाहिए। स्थानीय परिस्थितियों और शैक्षणिक माहौल को ध्यान में रखते हुए अंक प्रतिशत की इस सीमा में थोड़ा-बहुत परिवर्तन किया जा सकता है। इससे छात्राओं के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का वातावरण विकसित होगा।</p>
<p>वस्तुतः इस योजना का वास्तविक लक्ष्य केवल 12वीं उत्तीर्ण करने के बाद छात्राओं का डिग्री स्तर पर पंजीकरण कराना नहीं होना चाहिए, बल्कि यह होना चाहिए कि सभी पंजीकृत छात्राएं अपनी स्नातक उपाधि सफलतापूर्वक पूरी करें। इस योजना का विस्तार स्नातक के बाद स्नातकोत्तर स्तर तक भी किया जाना चाहिए, क्योंकि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में अब 12वीं के बाद प्रथम वर्ष में प्रवेश से लेकर पांचवें वर्ष तक निरंतर अध्ययन का स्पष्ट प्रावधान किया गया है। ड्रॉप आउट के बाद पुनः प्रवेश भी ले सकते हैं।</p>
<p>पैसे के वितरण की व्यवस्था में बदलाव करने से संभव है कि इस योजना में सरकार का कुछ प्रतिशत अतिरिक्त व्यय बढ़ जाए, लेकिन इसके अंतिम परिणामों में व्यापक और सकारात्मक परिवर्तन दिखाई देंगे। वर्तमान में इस योजना के कुछ मानकों के चलते इसके दायरे में प्रत्येक वर्ष प्रवेश लेने वाली छात्राओं में से लगभग आधी छात्राएं ही पात्र हो पाती हैं। जबकि, बेहतर यह होगा कि इस योजना के अंतर्गत सभी वर्गों (आरक्षित एवं अनारक्षित) और सभी आय समूहों की छात्राओं को सम्मिलित किया जाए, ताकि इसका लाभ व्यापक स्तर पर शिक्षा की निरंतरता और गुणवत्ता को सुनिश्चित कर सके। वैसे भी, अब राज्य में संख्यात्मक (GER) उपलब्धि की बजाय गुणात्मक (QER) की कहीं अधिक जरूरत है क्योंकि उत्तराखंड 50 फीसद GER के राष्ट्रीय लक्ष्य को डेडलाइन (वर्ष 2035) से बहुत पहले हासिल कर चुका होगा।</p>
<p><strong><em>(डॉ. सुशील उपाध्याय मीडिया संस्थानों में वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रह चुके हैं और वर्तमान में सीएल डिग्री कॉलेज, हरिद्वार के प्रिंसिपल हैं)</em></strong></p>
<p></p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ उच्च शिक्षा में लड़कियां: स्कॉलरशिप मिलते ही पढ़ाई छोड़ने का ट्रेंड कैसे थमेगा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[उम्मीदें 2026: कृषि नीतियों को उपभोक्ता नहीं, किसान केंद्रित बनाने का साल]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/expectations-2026-the-year-to-make-agricultural-policies-farmer-centric-not-consumer-centric.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 01 Jan 2026 12:58:54 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/expectations-2026-the-year-to-make-agricultural-policies-farmer-centric-not-consumer-centric.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>केंद्र की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार अपनी नीतियों के केंद्र में किसान, महिला, युवा और गरीब को रखने का दावा करती है। प्रधानमंत्री लगातार इस प्राथमिकता को दोहराते रहते हैं और इसी के सहारे 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने की बात भी करते हैं। लेकिन यह भी सच है कि कृषि क्षेत्र की तेज वृद्धि और किसानों की आय में गुणात्मक बढ़ोतरी के बिना यह सपना पूरा करना संभव नहीं है। ऐसे में सरकार को वर्ष 2026 की अपनी नीतियों में बदलाव लाने की जरूरत है और उपभोक्ता-केंद्रित रुख की बजाय किसानों के हितों को प्राथमिकता देनी होगी।</p>
<p>इसके पीछे सबसे बड़ी वजह मौद्रिक नीति और महंगाई लक्ष्यों को लेकर अधिक लचीला रुख अपनाने की आवश्यकता है। खाद्य महंगाई दर ऋणात्मक बनी हुई है और खुदरा महंगाई दर (सीपीआई) को चार फीसदी के दायरे में (दो फीसदी कम या ज्यादा) रखने को लेकर भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा सरकार से किए गए वादे किसानों को आर्थिक रूप से कमजोर कर रहे हैं। इस सच्चाई को सरकार को स्वीकार करना होगा, क्योंकि इसके बिना नीतिगत रुख में बदलाव संभव नहीं है। सरकार लगातार यह कहती रही है कि अब नीति का केंद्र उत्पादन नहीं बल्कि किसानों की आय है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों के फैसलों में यह स्पष्ट नहीं दिखता। अधिकांश कृषि उत्पादों के दामों में आई गिरावट से साफ है कि किसानों की आमदनी प्रभावित हुई है।</p>
<p>किसानों की आय बढ़ने के दो ही प्रमुख रास्ते हैं: उत्पादन में बढ़ोतरी और लागत में कमी, या फिर उनके उत्पादों के दाम में वृद्धि। सरकार 23 फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में लगातार बढ़ोतरी कर रही है, लेकिन इन कीमतों पर खरीद चुनिंदा फसलों और कुछ राज्यों तक ही सीमित है। इसके चलते किसानों का झुकाव मुख्य रूप से खाद्यान्न फसलों की ओर बना हुआ है। नतीजतन, केंद्रीय पूल में गेहूं और चावल का रिकॉर्ड भंडार जमा हो गया है और सरकार अब इसमें कमी के रास्ते तलाश रही है। हालांकि, यहां से निर्यात भी पूरी तरह संभव नहीं है, क्योंकि डब्ल्यूटीओ की शर्तों के अनुसार सब्सिडी पर खरीदे गए सार्वजनिक भंडार से निर्यात की अनुमति नहीं है। इस जटिल चक्र के कारण सरकार किसानों को कृषि के विविधीकरण की ओर भी प्रभावी ढंग से प्रेरित नहीं कर पा रही है, जबकि यह लक्ष्य सब्सिडी के बजाय इंसेंटिव आधारित नीति से ही हासिल किया जा सकता है।</p>
<p>दूसरी ओर, केंद्र सरकार का कृषि बजट भी बड़े पैमाने पर लाभार्थी खातों में ही जा रहा है। इसका सबसे बड़ा हिस्सा प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि में खर्च होता है। इसके बाद ब्याज छूट, फसल बीमा सब्सिडी और कृषि अवसंरचना कोष जैसी योजनाएं आती हैं। इन सबके बाद जो राशि बचती है, वह वेतन और अन्य राजस्व खर्चों में चली जाती है, जिससे कृषि अवसंरचना विकास, पूंजी निवेश और शोध के लिए बहुत कम संसाधन उपलब्ध हो पाते हैं।</p>
<p>हालांकि, सरकार उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर लाभार्थी योजनाओं में एक्सक्लूजन की दिशा में भी आगे बढ़ रही है। इसके तहत प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि, ब्याज छूट और अन्य योजनाओं से अपात्र लाभार्थियों को बाहर किया जा रहा है। इसकी अगली कड़ी उर्वरक सब्सिडी में कटौती के रूप में भी सामने आ सकती है।</p>
<p>ऐसे में जहां सभी की निगाहें सरकार द्वारा एक फरवरी को पेश किए जाने वाले बजट पर टिकी होंगी, वहीं यह देखना भी जरूरी है कि पिछले दो-तीन वर्षों में किए गए वादों को पूरा करने के मामले में सरकार आज कहां खड़ी है।</p>
<p>इसके साथ ही वर्ष 2026 में कृषि और किसानों से जुड़े कई कानूनों में बदलाव की भी संभावना है। इसकी पहली कड़ी बीज विधेयक 2025 है, जो पारित होने के बाद बीज अधिनियम 1966 का स्थान लेगा। यह कानून भारतीय कृषि के लिए एक बड़े कानूनी और नीतिगत बदलाव का संकेत देगा। इसी तरह के कानून कीटनाशकों और उर्वरकों से जुड़े क्षेत्रों में भी आ सकते हैं। हालांकि संभव है कि सरकार पहले बीज अधिनियम को लेकर हितधारकों की प्रतिक्रिया को परखने के बाद आगे का कदम बढ़ाए।</p>
<p>लेकिन इन तमाम प्रयासों के बावजूद, यदि सरकार कीमतों के मोर्चे पर उपभोक्ता के बजाय किसानों को प्राथमिकता नहीं देती, तो किसानों की मुश्किलें कम होना संभव नहीं है। जिस तरह कुछ फसलों का उत्पादन बढ़ रहा है और वैश्विक बाजार में खाद्य जिंसों की कीमतों में गिरावट के संकेत मिल रहे हैं, वे सरकार को नीतिगत स्तर पर ठोस बदलाव करने के लिए मजबूर कर सकते हैं। साथ ही, पिछले बजट में घोषित किए गए विभिन्न मिशनों की मौजूदा स्थिति की समीक्षा करना भी सरकार के लिए जरूरी हो गया है।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2026/01/image_750x500_695628d661743.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ उम्मीदें 2026: कृषि नीतियों को उपभोक्ता नहीं, किसान केंद्रित बनाने का साल ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[2025 में कृषि: महंगाई पर काबू, रिकॉर्ड उत्पादन लेकिन किसानों की आय पर संकट]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/agriculture-in-2025-inflation-under-control-record-production-but-farmer-incomes-in-jeopardy.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 30 Dec 2025 14:16:37 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/agriculture-in-2025-inflation-under-control-record-production-but-farmer-incomes-in-jeopardy.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p data-start="187" data-end="639">कृषि क्षेत्र के लिए साल 2025 का आकलन करने पर हमारे सामने दो अलग-अलग तस्वीरें उभरती हैं&mdash;एक किसानों के लिए और दूसरी अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों के लिए। सरकार और रिजर्व बैंक की नीतिगत सफलता महंगाई दर को नीचे लाने में साफ तौर पर दिखाई पड़ती है, लेकिन इस सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि किसानों की आय महंगाई नियंत्रण नीति की भेंट चढ़ गई। अधिकांश फसलों के दाम <strong>न्यूनतम समर्थन मूल्य</strong> (एमएसपी) से नीचे रहे हैं। यह एक व्यापक परिदृश्य है, जो 2025 के आंकड़ों पर नजर डालने के बाद साफ होता है।</p>
<p data-start="641" data-end="1187">बेहतर मानसून और <strong>बंपर उत्पादन</strong> के चलते, 15 करोड़ टन चावल उत्पादन के साथ भारत ने चीन के 14.5 करोड़ टन चावल उत्पादन को पीछे छोड़ दिया है और दुनिया का सबसे बड़ा चावल उत्पादक देश बन गया। साथ ही भारत दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक भी बन गया। यह उपलब्धि सरकारी आंकड़ों में तो अच्छी दिखती है, लेकिन किसान के स्तर पर नहीं। यही वजह है कि कई भारतीय कंपनियां करीब 33 रुपये प्रति किलो के आसपास चावल निर्यात के सौदे कर चुकी हैं, जो किसानों को चालू सीजन के लिए तय धान के एमएसपी 2389 रुपये प्रति क्विंटल का भुगतान करने के बाद असंभव सा लगता है।</p>
<p data-start="1189" data-end="1454">वहीं, अधिकांश<strong> दालों</strong> के दाम भी एमएसपी से नीचे चल रहे हैं। 60 फीसदी से अधिक आयात-निर्भरता वाले खाद्य तेलों के मोर्चे पर भी कमोबेश यही स्थिति है। किसानों को सोयाबीन का एमएसपी नहीं मिला, जबकि उसका उत्पादन गिर रहा है। दलहन, तिलहन की बात करें या कपास की, लगभग सभी फसलों के दाम एमएसपी से नीचे रहे हैं।</p>
<p data-start="1456" data-end="1940">इन आंकड़ों की तस्दीक <strong>जीडीपी</strong> और <strong>जीवीए</strong> के आंकड़ों में भी होती है। चालू साल की पहली दो तिमाहियों के कृषि और सहयोगी क्षेत्र के लिए&nbsp; जो जीडीपी और जीवीए के आंकड़े सरकार ने जारी किए हैं, उनमें जीवीए की वृद्धि दर जीडीपी से कम रही है। यह साफ संकेत देता है कि कृषि अर्थव्यवस्था <strong>डिफ्लेशन</strong> के दौर में है, जबकि मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर के आंकड़े अपेक्षाकृत सकारात्मक हैं। किसानों ने इस साल रिकॉर्ड उत्पादन तो किया, लेकिन किसानों की आय उतनी नहीं बढ़ी है। इसका असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कमजोर मांग के रूप में देखने को मिलेगा।&nbsp;</p>
<p data-start="1942" data-end="2525">कृषि से जुड़ा दूसरा बड़ा मुद्दा <strong>भारत और अमेरिका</strong> के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते पर सरकार का रुख रहा है। इस समझौते के अटकने की सबसे बड़ी वजह कृषि क्षेत्र है। सरकार को बार-बार कहना पड़ा कि वह भारतीय किसानों के हितों की कीमत पर अमेरिका के साथ व्यापार समझौता नहीं करेगी। अमेरिका चाहता है कि उसके सोयाबीन, मक्का, एथेनॉल और कपास के साथ-साथ सेब, बादाम और पिस्ता जैसे ड्राई फ्रूट्स के लिए भारत अपना बाजार खोले। लेकिन सरकार के लिए ऐसा करना मुश्किल है, क्योंकि इसके बड़े राजनीतिक मायने हैं, जो सरकार के खिलाफ जा सकते हैं। यही वजह है कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की रेड-लाइन कृषि बनी हुई है।</p>
<p data-start="2527" data-end="2989">इस साल देश के किसानों को<strong> उर्वरक</strong> उपलब्धता को लेकर ऐसे संकट का सामना करना पड़ा, जैसा उन्होंने पहले कभी नहीं किया था। देश के अधिकांश हिस्सों में किसानों को पहली बार यूरिया की भारी कमी से जूझना पड़ा। हालांकि सरकार लगातार दावा करती रही कि पर्याप्त मात्रा में यूरिया उपलब्ध है, लेकिन बिक्री केंद्रों पर बारिश, धूप और ठंड में दिन-रात लगी किसानों की लंबी कतारें कुछ और ही हकीकत बयां करती रहीं। कई राज्यों ने केंद्र सरकार को यूरिया का अधिक आवंटन करने के लिए पत्र भी लिखे।</p>
<p data-start="2991" data-end="3532">असल में देश में<strong> यूरिया</strong> की खपत तेजी से बढ़ रही है। सबसे सस्ता उर्वरक होने के साथ-साथ इस खरीफ में बेहतर मानसून के चलते फसल क्षेत्रफल में बढ़ोतरी और दालों जैसी कम यूरिया-खपत वाली फसलों की बजाय धान और मक्का जैसी अधिक यूरिया-खपत वाली फसलों के रकबे में वृद्धि इसकी बड़ी वजह रही। सरकार द्वारा नए संयंत्र लगाने के बावजूद यूरिया पर आयात-निर्भरता बनी हुई है। हालांकि डाई-अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) को लेकर भी किसानों को रबी और खरीफ दोनों सीजन में दिक्कतें हुईं, लेकिन ऐसा पहले भी होता रहा है। यूरिया के मामले में इतनी गंभीर स्थिति पहली बार देखने को मिली।</p>
<p data-start="3534" data-end="4064">एक सकारात्मक घटनाक्रम के रूप में सरकार द्वारा <strong>जीन-एडिटिंग</strong> के जरिए विकसित धान की दो किस्मों को मंजूरी देना अहम रहा। यह पहली बार है जब देश में जीन-एडिटिंग तकनीक से विकसित किस्मों को स्वीकृति दी गई है। सरकार ने जीन-एडिटिंग को जेनेटिकली मॉडिफाइड (जीएम) फसलों से अलग कर दिया है और इनके लिए जीएम फसलों जैसी लंबी मंजूरी प्रक्रिया नहीं रखी गई है। यही वजह है कि आने वाले समय में बड़े पैमाने पर जीन-एडिटिंग से तैयार किस्मों को मंजूरी मिलने की संभावना है, क्योंकि इस तकनीक के जरिए खाद्यान्न और प्लांटेशन क्रॉप दोनों पर तेजी से काम चल रहा है।</p>
<p data-start="4066" data-end="4508">हालांकि जीन-एडिटिंग तकनीक पेटेंटेड है और इसके बौद्धिक संपदा अधिकार मुख्य रूप से बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पास हैं। इन फसलों को व्यावसायिक रूप से जारी करने से पहले इन कंपनियों से समझौता करना होगा। लेकिन राहत की बात यह है कि जीन-एडिटिंग की एक तकनीक भारतीय वैज्ञानिकों ने भी विकसित कर ली है और उसे पेटेंट मिल चुका है। ऐसे में आने वाले दिनों में जीन-एडिटिंग के जरिए फसलों की किस्में विकसित करने में स्वदेशी तकनीक के इस्तेमाल की संभावना भी बनती है।</p>
<p data-start="4510" data-end="5008"><strong>कृषि और ग्रामीण</strong> अर्थव्यवस्था से जुड़ा सरकार का एक और बड़ा फैसला <strong>मनरेगा</strong> की जगह लेने वाले <span><strong>विकसित भारत रोजगार व आजीविका गारंटी मिशन (वीबी-</strong></span><b>जी राम जी</b><span>)</span> विधेयक के रूप में सामने आया। संसद से इसे पारित कराने के बाद इसे कानून के रूप में लागू करने की औपचारिकताएं पूरी हो चुकी हैं। इस कानून को लेकर जहां विपक्ष और अर्थशास्त्रियों का एक बड़ा वर्ग विरोध में है और उनका दावा है कि मनरेगा के जरिए पिछले 20 वर्षों से दी जा रही ग्रामीण रोजगार गारंटी के अस्तित्व पर सवाल खड़ा हो गया है, वहीं सरकार का कहना है कि यह एक बेहतर और अधिक व्यवहारिक कानून है।</p>
<p data-start="5010" data-end="5184">यह तय है कि यह नया कानून ग्रामीण भारत के सामाजिक और आर्थिक ढांचे पर गहरा असर डालने वाला साबित होगा। हालांकि इसके कई प्रावधानों की व्यवहारिकता को लेकर सवाल अभी भी बने हुए हैं।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/12/image_750x500_69538efdcf1cb.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ 2025 में कृषि: महंगाई पर काबू, रिकॉर्ड उत्पादन लेकिन किसानों की आय पर संकट ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[क्या भारतीय कृषि में इनपुट गुणवत्ता की समस्या का समाधान कर सकता है ई&amp;#45;कॉमर्स?]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/can-e-commerce-solve-the-problem-of-input-quality-in-indian-agriculture.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 29 Dec 2025 10:58:04 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/can-e-commerce-solve-the-problem-of-input-quality-in-indian-agriculture.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">भारतीय किसानों को दशकों से एक गंभीर और लगातार बनी रहने वाली समस्या का सामना करना पड़ रहा है। वह है घटिया गुणवत्ता वाले कृषि इनपुट। नकली कीटनाशक, मिलावटी उर्वरक और घटिया बीज लगातार फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं, किसानों का पैसा बर्बाद कर रहे हैं और कृषि इनपुट व्यवस्था पर उनका भरोसा कमजोर कर रहे हैं। हाल के वर्षों में ई-कॉमर्स कृषि (agri commerce) इनपुट की पारंपरिक आपूर्ति श्रृंखला का एक मजबूत विकल्प बनकर उभरा है। हालांकि यह कोई पूर्ण समाधान नहीं है, लेकिन यह किसानों को भरोसेमंद उत्पादों तक पहुंच दिलाने के तरीके को निश्चित रूप से बदल रहा है।</span></p>
<p><strong>भारतीय कृषि में ई-कॉमर्स</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कृषि क्षेत्र में ई-कॉमर्स (agri commerce) से आशय ऐसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से है, जो किसानों को वेबसाइट या मोबाइल एप्लिकेशन के माध्यम से सीधे मशीनरी, बीज, उर्वरक, कीटनाशक और अन्य कृषि इनपुट खरीदने की सुविधा देते हैं। ये प्लेटफॉर्म स्थानीय विक्रेताओं और बिचौलियों पर निर्भरता कम करते हैं, जो कई बार बिना उचित लेबलिंग या प्रामाणिकता की जांच के उत्पाद बेचते हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">आज अनेक किसान अपने मोबाइल फोन के जरिये इनपुट उत्पादों की जानकारी जांचते हैं, कीमतों की तुलना करते हैं और सामान को सीधे अपने गांव या समुदाय तक मंगवा रहे हैं। डिजिटल कृषि को अपनाने पर किए गए शोध बताते हैं कि स्मार्टफोन की बढ़ती पहुंच से किसानों को इनपुट की खरीद, सलाह सेवाओं तक पहुंच और कीमतों की तुलना करने में मदद मिल रही है, जिससे स्थानीय बिचौलियों पर निर्भरता घट रही है। कृषि नवाचार और उत्पादकता पर <strong><a href="https://www.oecd.org/en/topics/agriculture-and-fisheries.html">OECD के अध्ययनों</a></strong> में भी यह रेखांकित किया गया है कि इनपुट की डिलीवरी और सलाह सेवाओं के साथ एकीकृत डिजिटल उपकरण कृषि में सस्टेनेबिलिटी और खेत स्तर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया को बेहतर बनाते हैं। यह बदलाव धीरे-धीरे भारत में कृषि इनपुट की आपूर्ति को अधिक डेटा-आधारित और संगठित बना रहा है।</span></p>
<p><b>खराब गुणवत्ता वाले इनपुट किसानों को कैसे प्रभावित करते हैं</b></p>
<p><span style="font-weight: 400;">खराब गुणवत्ता वाले कृषि इनपुट सीधे तौर पर फसलों को मिलने वाले <strong><a href="https://eng.ruralvoice.in/opinion/crop-nutrients-bio-fertilizers-as-a-potential-source-for-sustainable-nutrient-supply.html">पोषक तत्वों</a></strong> को प्रभावित करते हैं। अंकुरण न करने वाले बीज, कम पोषक तत्व वाले उर्वरक और निष्क्रिय रसायनों से मिलावटी कीटनाशक उपज में नुकसान और बार-बार छिड़काव पर अतिरिक्त खर्च का कारण बनते हैं। कई मामलों में शुरुआत में फसल सामान्य दिखाई देती है, जिससे किसानों को गलत भरोसा मिल जाता है। असली नुकसान तब सामने आता है जब फसल के महत्वपूर्ण विकास चरण निकल जाते हैं, सुधार की गुंजाइश कम रह जाती है और किसानों को दोबारा नए इनपुट खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">उपज में कमी के अलावा, खराब इनपुट किसानों पर गंभीर आर्थिक दबाव भी डालते हैं। किसान आमतौर पर बेहतर उत्पादन की उम्मीद में मौसमी ऋण लेते हैं, लेकिन फसल खराब होने पर उन्हें बार-बार कर्ज लेना पड़ता है। दोबारा छिड़काव, पुनः बुवाई और अतिरिक्त मजदूरी पर होने वाला खर्च लागत और बढ़ा देता है, जबकि फसल संभलने की कोई गारंटी नहीं होती। समय के साथ घटिया रसायनों और उर्वरकों के बार-बार इस्तेमाल से मिट्टी की संरचना कमजोर होती है, पोषक तत्वों की उपलब्धता घटती है और फसलें कीटों व तनावपूर्ण परिस्थितियों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती हैं, जिससे दीर्घकालीन उत्पादकता भी कम होती है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इस दुष्चक्र का सबसे अधिक असर छोटे और सीमांत किसानों पर पड़ता है। सीमित भूमि, पूंजी और विशेषज्ञ सलाह तक कम पहुंच के कारण उनके पास प्रयोग करने या नुकसान सहने की गुंजाइश बहुत कम होती है। महज एक खराब मौसम पूरे परिवार की आय को प्रभावित कर सकता है, कर्ज चुकाने में देरी हो सकती है और खेती से जुड़े फैसलों पर भरोसा कमजोर पड़ जाता है। इसलिए बड़े किसानों की तुलना में छोटे किसानों के लिए खराब गुणवत्ता वाले इनपुट का प्रभाव कहीं अधिक गंभीर होता है।</span></p>
<p><b>इनपुट गुणवत्ता से जुड़ी समस्याएं क्यों बनी रहती हैं</b></p>
<p><span style="font-weight: 400;">पारंपरिक कृषि इनपुट की आपूर्ति श्रृंखला अत्यधिक बिखरी हुई है। कई ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों तक उत्पाद पहुंचने से पहले वे कई स्तरों से होकर गुजरते हैं, जिससे गुणवत्ता की निगरानी चुनौतीपूर्ण हो जाती है। ढीली निगरानी व्यवस्था और अपर्याप्त परीक्षण के कारण नकली और घटिया उत्पादों की उपलब्धता आसान हो जाती है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">एक अन्य बड़ा कारण जागरूकता की कमी है। लेबल, बैच नंबर या प्रमाणपत्रों की जांच करने के बजाय अनेक किसान डीलरों की सलाह या केवल कीमत के आधार पर निर्णय लेते हैं। चूंकि खराब गुणवत्ता के बीज और अन्य इनपुट तनावपूर्ण परिस्थितियों में असफल हो जाते हैं, इसलिए जलवायु की अनिश्चितता इस समस्या को और गंभीर बना देती है।</span></p>
<p><b>ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म की भूमिका</b></p>
<p><span style="font-weight: 400;">एग्री-ईकॉमर्स प्लेटफॉर्म इन कमियों को दूर करने का प्रयास कर रहे हैं, क्योंकि वे इनपुट की सोर्सिंग सीधे निर्माताओं या अधिकृत वितरकों से करते हैं। ये प्लेटफॉर्म सत्यापित सप्लायर, केंद्रीकृत वेयरहाउसिंग और बैच-स्तर की उत्पाद पहचान के माध्यम से उत्पादों की प्रामाणिकता और ट्रेसबिलिटी पर जोर देते हैं। यह मॉडल नकली इनपुट के प्रसार को कम करने के लिए भरोसेमंद ऑनलाइन कृषि इनपुट प्लेटफॉर्म द्वारा तेजी से अपनाया जा रहा है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अधिकांश प्लेटफॉर्म स्पष्ट उत्पाद जानकारी उपलब्ध कराते हैं, सटीक इनवॉयस और जीएसटी बिलिंग करते हैं, तथा उत्पाद सूचीबद्ध करने से पहले आपूर्तिकर्ताओं की जांच करते हैं। यदि किसानों को खराब या गलत उत्पाद मिलते हैं, तो कई प्लेटफॉर्म आसान रिटर्न या रिप्लेसमेंट की सुविधा भी देते हैं। कुछ प्लेटफॉर्म ने सलाह सेवाओं को भी जोड़ा है। वे किसानों को उनकी फसल, क्षेत्र और मौसम के अनुसार उपयुक्त इनपुट चुनने में मदद करते हैं।</span></p>
<p><b>ई-कॉमर्स कैसे इनपुट की गुणवत्ता सुधारने में मदद करता है</b></p>
<p><span style="font-weight: 400;">ऑनलाइन प्लेटफॉर्म जवाबदेही तय करते हैं। जब उत्पादों को पूरी जानकारी, बैच नंबर और उपयोगकर्ता फीडबैक के साथ प्रस्तुत किया जाता है, तो नकली इनपुट के लिए बाजार में टिके रहना कठिन हो जाता है। किसान ब्रांड की जांच करके और ग्राहकों की समीक्षाएं पढ़कर बिना सोचे-समझे खरीदारी करने से बच सकते हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">बीच के हैंडलिंग चरणों को कम करने और डायरेक्ट सोर्सिंग से मिलावट का जोखिम कम होता है। इसके अलावा, डिजिटल रिकॉर्ड के कारण शिकायतों को ट्रैक करना और अविश्वसनीय आपूर्तिकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई करना आसान हो जाता है। इससे भरोसा बढ़ता है और गुणवत्ता को प्राथमिकता देने वाले विक्रेताओं को बढ़ावा मिलता है।</span></p>
<p><b>ई-कॉमर्स इनपुट की गुणवत्ता सुधारने के प्रमुख तरीके इस प्रकार हैं:</b></p>
<ul>
<li style="font-weight: 400;" aria-level="1"><span style="font-weight: 400;">बैच नंबर और उत्पाद विवरण प्रदर्शित करना, जिससे खरीद से पहले सत्यापन संभव होता है।</span></li>
<li style="font-weight: 400;" aria-level="1"><span style="font-weight: 400;">किसानों को ब्रांड और कीमतों की तुलना करने की सुविधा देना, जिससे स्थानीय एकाधिकार कम होता है।</span></li>
<li style="font-weight: 400;" aria-level="1"><span style="font-weight: 400;">उपयोगकर्ता की समीक्षा और फीडबैक दर्ज करना, जिससे खराब गुणवत्ता वाले उत्पाद जल्दी सामने आ जाते हैं।</span></li>
<li style="font-weight: 400;" aria-level="1"><span style="font-weight: 400;">भौतिक हैंडलिंग कम करना और मिलावट के जोखिम को घटाना।</span></li>
<li style="font-weight: 400;" aria-level="1"><span style="font-weight: 400;">डिजिटल लेनदेन का रिकॉर्ड बनाए रखना, जिससे शिकायतों की ट्रैकिंग और कार्रवाई आसान होती है।</span></li>
<li style="font-weight: 400;" aria-level="1"><span style="font-weight: 400;">गैर-भरोसेमंद विक्रेताओं की पहचान करना और उच्च-गुणवत्ता इनपुट देने वाले व्यापारियों को आगे बढ़ाना।</span></li>
</ul>
<p><span style="font-weight: 400;">ये प्रणालियां गुणवत्ता को प्राथमिकता देने वाले आपूर्तिकर्ताओं को पुरस्कृत करती हैं और डिजिटल इनपुट बाजारों में भरोसे को मजबूत करती हैं।</span></p>
<p><b>किसानों के लिए लाभ</b><b><br /></b><span style="font-weight: 400;">किसानों के लिए सबसे तात्कालिक लाभ पारदर्शी कीमतों पर असली और प्रमाणित कृषि इनपुट तक पहुंच है। बिचौलियों की संख्या कम होने से लागत अक्सर कम होती है। समय पर आपूर्ति से किसानों बुवाई और छिड़काव की योजना आसानी से बना सकते हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;"></span><span style="font-weight: 400;">उतना ही महत्वपूर्ण भरोसा है। जब किसानों को इनपुट की गुणवत्ता पर विश्वास होता है, तो वे अपनी फसलों में उचित निवेश करने के लिए तैयार होते हैं। ऐप या कॉल सेंटर के माध्यम से मिलने वाली सलाह सेवाएं निर्णय प्रक्रिया को बेहतर बनाती हैं और उत्पादों के गलत उपयोग को कम करती हैं।</span></p>
<p><b>कृषि ई-कॉमर्स को मजबूत करने में सरकार की भूमिका</b></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कृषि ई-कॉमर्स के विस्तार में सरकार का समर्थन अहम भूमिका निभाता है। डिजिटल कृषि को अपनाने पर किए गए शोध बताते हैं कि ग्रामीण इंटरनेट कनेक्टिविटी, डिजिटल भुगतान प्रणालियां और किसानों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम इसे व्यापक रूप से अपनाने और संस्थागत भरोसे के लिए आवश्यक हैं <strong><a href="https://www.worldbank.org/en/topic/digital">(विश्व बैंक, डिजिटल विकास और कृषि अनुसंधान)</a></strong>। सब्सिडी और सरकारी योजनाओं को सत्यापित प्लेटफॉर्म से जोड़ने से नकली इनपुट के प्रसार को भी रोका जा सकता है। सरकार, किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के बीच सहयोग से दूर-दराज के क्षेत्रों तक भी गुणवत्तापूर्ण कृषि इनपुट की आपूर्ति संभव हो सकती है।</span></p>
<p><b>कृषि ई-कॉमर्स की चुनौतियां</b></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इन्फ्रास्ट्रक्चर और भरोसे के अलावा, संचालन और नीतिगत सीमाएं भी इसे व्यापक रूप से अपनाने में बाधक हैं। नकारात्मक अनुभव के बाद किसान दोबारा ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का उपयोग करने से हिचकते हैं, क्योंकि रिटर्न और शिकायत निवारण की व्यवस्थाएं कई बार धीमी या अस्पष्ट होती हैं। लास्ट-माइल डिलीवरी अक्सर बाहरी लॉजिस्टिक्स पर निर्भर करता है, जो कृषि की तात्कालिक जरूरतों के अनुरूप नहीं होता, जिससे छिड़काव या बुवाई जैसे महत्वपूर्ण समय में देरी हो जाती है। जब तक प्लेटफॉर्म, स्थानीय संस्थानों और कृषि विस्तार तंत्र के बीच बेहतर समन्वय के जरिए इन संरचनात्मक कठिनाइयों का समाधान नहीं किया जाता, तब तक कृषि में ई-कॉमर्स का उपयोग समान रूप से नहीं, बल्कि असमान तरीके से ही बढ़ता रहेगा।</span></p>
<p><b>आगे की राह</b></p>
<p><span style="font-weight: 400;">ई-कॉमर्स अकेले इनपुट की गुणवत्ता से जुड़ी सभी समस्याओं को समाप्त नहीं कर सकता, लेकिन यह उन्हें काफी हद तक कम जरूर कर सकता है। पारदर्शिता, ट्रेसेबिलिटी और सत्यापित उत्पादों तक पहुंच में सुधार करके यह किसानों को पारंपरिक बाजारों का एक सुरक्षित विकल्प प्रदान करता है। बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर, प्रशिक्षण और नीतिगत समर्थन के साथ, कृषि ई-कॉमर्स खराब गुणवत्ता वाले इनपुट से किसानों को बचाने और भारतीय कृषि को अधिक भरोसेमंद व टिकाऊ बनाने में दीर्घकालिक भूमिका निभा सकता है।</span></p>
<p><strong><em>(लेखक AgriBegri में चीफ एग्रोनॉमी ऑफिसर हैं)</em></strong></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/12/image_750x500_694fa20b615a8.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ क्या भारतीय कृषि में इनपुट गुणवत्ता की समस्या का समाधान कर सकता है ई-कॉमर्स? ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[चौधरी चरण सिंह की विरासत और किसान दिवस का व्यापक फलक]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/it-is-important-to-understand-the-significance-of-bharat-ratna-chaudhary-charan-singh-and-kisan-diwas.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 23 Dec 2025 14:30:24 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/it-is-important-to-understand-the-significance-of-bharat-ratna-chaudhary-charan-singh-and-kisan-diwas.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत रत्न चौधरी चरण सिंह के जन्मदिन, 23 दिसंबर, को किसान दिवस के रूप में मनाया जाता है। उनका लंबा राजनीतिक जीवन गांव की तरक्की और किसान-मजदूर की खुशहाली की सोच को देश की राजनीति और सरकारी नीतियों में स्थापित करने की मिसाल है। कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को प्राथमिकता देने का उनका विचार केंद्र और राज्यों के स्तर पर कई परिवर्तनकारी प्रयासों में दिखाई देता है। आजादी से पहले ही उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पार्टी के माध्यम से राजनीतिक जीवन की शुरुआत करने वाले चौधरी चरण सिंह ने आगे चलकर अपना स्वतंत्र राजनीतिक अस्तित्व और दल स्थापित किया और प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे। उनकी राजनीतिक ताकत उसी किसान-कमेर वर्ग से आई, जिसके लिए उन्होंने जीवनपर्यंत काम किया।</p>
<p>जमींदारी उन्मूलन और चकबंदी जैसे भूमि सुधारों से लेकर कृषक समुदायों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने वाली नीतियों व संस्थानों के माध्यम से उन्होंने किसानों को जो आत्मविश्वास दिया, वही उनकी सबसे बड़ी ताकत बना। ऐसी ताकत, जो आज भी किसान और मेहनतकश वर्ग के साथ खड़ी दिखाई देती है। यही वजह है कि देश में वह एकमात्र ऐसे नेता हैं जिनके जन्मदिन को किसान दिवस के रूप में घोषित किया गया। आज पूरे देश में किसान दिवस चौधरी साहब के प्रति अपार जुड़ाव और सम्मान व्यक्त करने का अवसर बन गया है। साथ ही यह दिन देश के किसानों के परिश्रम और योगदान की भी याद दिलाता है।</p>
<p>इसमें कोई दो राय नहीं है कि देश का किसान आज भी कई मुश्किलों से जूझ रहा है और उसका जीवन संघर्षों से भरा है। कृषि और ग्रामीण क्षेत्र अक्सर नीतिगत उपेक्षा का शिकार भी होते रहे हैं। लेकिन यह भी सच है कि सरकार चाहे किसी भी दल की हो, उसे स्वयं को किसान-केंद्रित एजेंडे पर काम करते हुए दिखाना ही पड़ता है। जब भी अर्थव्यवस्था मुश्किल में होती है, तब देश को तरक्की के रास्ते पर आगे बढ़ाने के लिए चौधरी साहब द्वारा दिखाया गया गांवों और खेत-खलिहानों का रास्ता याद आता है। इसलिए आज उन्हें याद करने के साथ-साथ उनकी नीतियों और विचारों को समझना भी उतना ही जरूरी है।</p>
<p>चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न भले ही 2024 में मिला हो, लेकिन जनमानस में वह बहुत पहले ही किसानों के सबसे बड़े हिमायती और ग्रामीण भारत की प्रगति के पैरोकार के रूप में स्थापित हो चुके थे। हाल ही में देश के एक वरिष्ठ अर्थशास्त्री ने कहा कि चौधरी चरण सिंह देश के सबसे बड़े किसान नेता थे। उन्होंने स्वयं को कभी जातिगत दायरों तक सीमित नहीं रखा। आज देश में ऐसा कोई नेता नहीं है, जिसे उसी स्तर पर एक बड़े किसान नेता के रूप में देखा जा सके, क्योंकि न तो वैसी दृष्टि दिखाई देती है और न ही राष्ट्रीय स्तर पर किसानों के हित में खड़े होने वाला वैसा कद नजर आता है।</p>
<p>हालांकि राजनीतिक विश्लेषक यह भी मानते हैं कि भारतीय मीडिया, खासकर अंग्रेजी मीडिया, ने उन्हें एक विशेष जाति के नेता के रूप में देखने की प्रवृत्ति अपनाई और उन्हें कुलक, यानी बड़े किसानों का समर्थक बताया। जबकि वास्तविकता यह है कि जमींदारी उन्मूलन और भू-सुधार कानून (जेडएलआरए) के माध्यम से उत्तर प्रदेश में लागू किए गए सुधारों का सबसे अधिक लाभ सभी खेतिहर जातियों और ग्रामीण समुदायों को मिला। इनमें पिछड़े वर्ग की अनेक जातियां शामिल थीं, जिन्हें भूमि का मालिकाना हक मिला और जो आगे चलकर एक मजबूत राजनीतिक ताकत के रूप में उभरीं।</p>
<p>मंडल आयोग, जिसने देश के सामाजिक न्याय आंदोलन और राजनीतिक संरचना को नई दिशा दी, उसकी स्थापना भी चौधरी चरण सिंह ने ही की थी। इसके बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर, राजस्थान को छोड़कर, जाटों को केंद्रीय आरक्षण नहीं मिला। पिछड़े वर्ग के नेतृत्व को आगे बढ़ाने का सवाल हो, या फिर देश की नीति और राजनीति की दिशा गांव-किसान की ओर मोड़ने का, अथवा समावेशी आर्थिक चिंतन का, उनका आकलन जिस व्यापक दृष्टिकोण से किया जाना चाहिए था, वह नहीं हो पाया।</p>
<p>इन सबके बावजूद उनकी किसान-हितैषी सोच, नीतियां और फैसले उन्हें किसानों का निर्विवाद नेता स्थापित करते हैं। वह सामान्य राजनीतिज्ञों से अलग एक विचारशील व्यक्तित्व थे। उनका भरोसा अपनी सोच, विचार और नीतियों को पुस्तकों के माध्यम से जनमानस और नीति-निर्माताओं तक पहुंचाने में था। यही कारण है कि बहुत कम राजनीतिज्ञ ऐसे हुए हैं, जिन्होंने आर्थिक, कृषि और ग्रामीण मुद्दों पर इतनी बड़ी संख्या में पुस्तकें लिखी हों। अमेरिकी लेखक और शिक्षाविद पॉल ब्रास ने जिस तरह से उनके राजनीतिक जीवन को अपनी पुस्तकों में बयां किया है, वह न केवल चौधरी चरण सिंह के जीवन और कार्यों का विवरण है, बल्कि उस दौर की राजनीति का भी महत्वपूर्ण दस्तावेज है।</p>
<p>इसलिए आज जब हम चौधरी चरण सिंह के जन्मदिवस को किसान दिवस के रूप में मना रहे हैं, तो यह भारतीय अर्थव्यवस्था, राजनीति और किसानों के जीवन में उनके योगदान को रेखांकित करता है। यह भी सुखद है कि अब केवल किसान और राजनीतिक दल ही नहीं, बल्कि कृषि और उससे जुड़े उद्योग भी स्वयं को किसान दिवस से जोड़कर दिखाने का प्रयास कर रहे हैं। बेहतर होगा कि देश का शहरी वर्ग और उद्योग जगत किसान के संघर्ष को समझे और उसकी मेहनत का सही मोल दिलाने का भी प्रयास करे, क्योंकि किसान की खुशहाली ही अंततः देश की खुशहाली है।</p>
<p>आज किसान दिवस को लेकर देश भर में आयोजन, चर्चाएं और विश्लेषण हो रहे हैं। किसान दिवस अब राष्ट्रीय स्तर का एक महत्वपूर्ण अवसर बन चुका है। लेकिन इसके केंद्र में यह सवाल जरूर होना चाहिए कि देश के किसानों के जीवन को कैसे बेहतर बनाया जाए, किसान के लिए खेती कैसे फायदे का सौदा बने, और चौधरी चरण सिंह के विचार और नीतियां जमीनी स्तर पर बदलाव के रूप में कैसे दिखाई दें।&nbsp;</p>
<p></p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/12/image_750x500_694a5b39eab63.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ चौधरी चरण सिंह की विरासत और किसान दिवस का व्यापक फलक ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/12/image_750x500_694a5b39eab63.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[किसानों में उत्साह जगाने में क्यों नाकाम रही एथेनॉल नीति?]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/why-did-the-ethanol-policy-fail-to-attract-farmers.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 22 Dec 2025 13:50:46 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/why-did-the-ethanol-policy-fail-to-attract-farmers.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले के टिब्बी में जिस तरह से किसान एथेनॉल प्लांट का विरोध कर रहे हैं,<span>&nbsp;</span>उसने एथेनॉल नीति की सफलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस एथेनॉल को किसानों की आय बढ़ाने के बड़े स्रोत के रूप में प्रचारित किया गया था,<span>&nbsp;</span>उसी एथेनॉल संयंत्र का किसानों द्वारा पुरजोर विरोध यह संकेत देता है कि जमीनी स्तर पर एथेनॉल नीति के लाभ किसानों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं।</p>
<p>असल में केंद्र सरकार ने पेट्रोल में 20 फीसदी एथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य बहुत तेजी से हासिल किया। लेकिन&nbsp;साथ ही कई सारे सवाल भी खड़े हो गये है और सबसे अहम सवाल किसानों द्वारा संयंत्र के विरोध में खड़े होने से सामने आया है।</p>
<p>केंद्र सरकार ने पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम (ईबीपी) की शुरुआत मूल रूप से चीनी उद्योग और&nbsp; गन्ना किसानों की मुश्किलों के समाधान के तौर पर की थी। ब्राजील मॉडल के आधार पर अधिक गन्ना उत्पादन वाले वर्षों में चीनी के बजाय एथेनॉल उत्पादन का रास्ता चुना गया। इसके लिए सरकार ने डिस्टिलरी स्थापना से जुड़े नियम सरल किए और वित्तीय प्रोत्साहन दिया।</p>
<p>वहीं, अनाज आधारित एथेनॉल उत्पादन के लिए भी बड़े पैमाने पर संयंत्र लगे। इसका नतीजा यह हुआ कि देश में एथेनॉल उत्पादन क्षमता तेजी से बढ़कर तेल विपणन कंपनियों की आवश्यकता से लगभग दो गुना हो गई।</p>
<p>चालू एथेनॉल आपूर्ति वर्ष (ईएसवाई 2025-26) में लगभग 1050 करोड़ लीटर की एथेनॉल मांग के मुकाबले आपूर्तिकर्ताओं ने लगभग 1776.49 करोड़ लीटर की पेशकश की। इसमें 1304.86 करोड़ लीटर&nbsp; की पेशकश खाद्यान्न (मक्का और चावल) आधारित एथेनॉल उत्पादक इकाइयों से की गई है और 471.63 करोड़ लीटर की आपूर्ति पेशकश गन्ना आधारित एथेनॉल उत्पादकों ने की।</p>
<p>इस तरह जिस चीनी उद्योग के लिए एथेनॉल कार्यक्रम शुरू हुआ था उसे केवल 27.5 फीसदी आपूर्ति करने का मौका मिला, जबकि बाकी हिस्सेदारी अनाज आधारित संयंत्रों से आएगी। हालांकि, अनाज आधारित एथेनॉल की आपूर्ति भी उत्पादन क्षमता के मुकाबले काफी कम है और कई कंपनियां वित्तीय कठिनाई में फंसने लगी हैं। यह उद्योग के लिए गंभीर आर्थिक चुनौती खड़ी कर सकता है।</p>
<p>बेहतर होता कि सरकार एकल (स्टैंडअलोन) डिस्टीलरीज की बजाय चीनी उद्योग द्वारा स्थापित की जाने वाली डिस्टलरीज को एथेनॉल उत्पादन के लिए प्रोत्साहन देती। साथ ही इन डिस्टलरीज को डबल फीड स्टॉक की ओर ले जाती ताकि गन्ने की पेराई सीजन में यह डिस्टीलरीज गन्ने के जूस या शीरे से चलती और ऑफ सीजन में ग्रेन को फीड स्टॉक के रूप में उपयोग किया जाता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और ग्रेन आधारित डिस्टीलरीज की स्थापना बहुत तेजी हुई जो अब एक मुश्किल बनती दिख रही हैं।</p>
<p>ऐसे में हनुमानगढ़ के टिब्बी क्षेत्र में एथेनॉल संयंत्र का सवाल गंभीर हो गया है। यहां खेती के लिए पानी बाहर से लाया जाता है और भूजल स्तर बेहद नीचे है। उद्योग के जानकार मानते हैं कि एक लीटर एथेनॉल उत्पादन के लिए लगभग छह लीटर पानी की जरूरत होती है। ऐसे में राजस्थान जैसे सूखे प्रदेश में बड़े संयंत्र की स्थापना पर सवाल उठना स्वाभाविक है। किसानों के विरोध के चलते सरकार के लिए अब इस परियोजना पर आगे बढ़ना मुश्किल हो गया है।</p>
<p><strong>मक्का की कीमतें गिरीं,<span>&nbsp;</span></strong><strong>किसानों की उम्मीदें टूटीं</strong></p>
<p>एथेनॉल में इस्तेमाल होने के कारण मक्का की मांग को बढ़ावा मिला और किसानों का रुझान भी मक्का की तरफ बढ़ा।&nbsp;दो वर्ष पहले तक पंजाब,<span>&nbsp;</span>बिहार,<span>&nbsp;</span>मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में मक्का किसानों को एमएसपी से बेहतर भाव मिल रहे थे। मक्का की कीमतें<span>&nbsp;</span>2600<span>&nbsp;</span>रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गई थीं,<span>&nbsp;</span>लेकिन इस वर्ष मक्का के अधिक उत्पादन और कीमतों को सहारा देने की पुख्ता व्यवस्था न होने के कारण दम एमएसपी से काफी नीचे गिर गए हैं।&nbsp;</p>
<p>चालू विपणन वर्ष के लिए मक्का का एमएसपी<span>&nbsp;</span>2400<span>&nbsp;</span>रुपये प्रति क्विंटल है,<span>&nbsp;</span>जबकि किसान<span>&nbsp;</span>1200<span>&nbsp;</span>से<span>&nbsp;</span>1800<span>&nbsp;</span>रुपये प्रति क्विंटल के भाव पर मक्का बेचने को मजबूर हैं।&nbsp;यह किसानों में गहरी निराशा पैदा कर रहा है।</p>
<p>एथेनॉल के लिए मक्का की बढ़ती मांग से किसानों की आमदनी बढ़ने की धारणा अब गलत साबित हो रही है। इसके पीछे भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) द्वारा खाने के लिए अनुपयोगी चावल की एथेनॉल उत्पादकों को बिक्री भी एक बड़ी वजह है। 4100 रुपये से अधिक की आर्थिक लगत वाले चावल को एफससीआई पहले 3200 रुपये के रेट पर बेचना चाहता था लेकिन उस दाम पर खरीदार नहीं मिले और उसके बाद इसके दाम घटकर 2250 रुपये प्रति क्विटंल तक आ गये।&nbsp;&nbsp;</p>
<p>कुल मिलाकर मक्का के किसान भी एथेनॉल से मिलने वाले लाभ से वंचित रह जा रहे हैं। ऐसे में यदि डिस्टिलरी को एमएसपी भुगतान का प्रमाण प्रस्तुत करने पर ही एथेनॉल मूल्य मिले, तभी किसानों को बेहतर भाव मिल सकता है। लेकिन फिलहाल ऐसी कोई नीति नहीं है।&nbsp;</p>
<p><strong>उपभोक्ता स्तर पर चुनौतियां</strong></p>
<p>एथेनॉल उद्योग चाहता है कि एथेनॉल ब्लेंडिंग<span>&nbsp;</span>24<span>&nbsp;</span>प्रतिशत तक बढ़े लेकिन आम जनता की धारणा इसके अनुकूल नहीं है। एथेनॉल ब्लेंडिंग से माइलेज और इंजन की क्षमता प्रभावित होने को लेकर भी कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। इन आशंकाओं ने एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम के भविष्य पर सवालिया निशान लगा दिया है।&nbsp;</p>
<p>तेल कंपनियों को सस्ता एथेनॉल मिल रहा है लेकिन ब्लैंडेड पेट्रोल की कीमत में कोई कमी नहीं आई, जिससे उपभोक्ताओं तक एथेनॉल मिश्रण का कोई सीधा लाभ नहीं पहुंचा।&nbsp;इस स्थिति के चलते सरकार ब्लैंडिंग का स्तर बढ़ाने को लेकर कोई बड़ा फैसला नहीं ले पा रही है। साथ ही ऑटो उद्योग भी फ्लेक्सी फ्यूल जैसी टेक्नोलॉजी लेकर बहुत तेजी से कदम नहीं बढ़ा रहा है।</p>
<p><strong>गन्ना किसान भी लाभ से वंचित</strong></p>
<p>सरकार का दावा है कि एथेनॉल से गन्ना किसानों को लाभ पहुंचा है। लेकिन किसानों का मानना है कि चीनी मिलें पहले भी राज्य परामर्श मूल्य (SAP) पर भुगतान करती थीं,<span>&nbsp;</span>आज भी वही कर रही हैं। यही स्थिति एफआरपी वाले राज्यों में है। हालांकि, सरकार कहती है कि एथेनॉल के चलते किसानों को समय पर गन्ना मूल्य भुगतान में सुधार हुआ है। लेकिन प्रत्यक्ष रूप से एथेनॉल के रेवेन्यू में हिस्सेदारी नहीं होने से किसान एथेनॉल प्रोग्राम को लेकर बहुत उत्साहित नहीं है। देश के प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश में तो दो साल तक गन्ने का भाव ही नहीं बढ़ा। जबकि गन्ना किसान फसल में रोग और पैदावार में गिरावट के कारण दोहरी मार झेल रहे थे।&nbsp;</p>
<p>एक तरफ किसान सस्ता मक्का बेचने को मजबूर है। गन्ना किसानों को एथेनॉल का अलग से कोई प्रत्यक्ष लाभ नहीं मिला है। जबकि दूसरी तरफ उपभोक्ता को पेट्रोल के दाम में कोई रियायत नहीं मिली। यही वजह है कि न तो किसानों में और न ही आम जनता में एथेनॉल कार्यक्रम को लेकर कोई उत्साह है। ये परिस्थितियां नीतिगत अस्पष्टता के चलते पैदा हुई है।</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ किसानों में उत्साह जगाने में क्यों नाकाम रही एथेनॉल नीति? ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[GDP Data: कृषि उत्पादन तो बढ़ा, लेकिन उस अनुपात में किसानों की आय नहीं बढ़ी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/farmer-income-trails-growth-in-agricultural-output.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 29 Nov 2025 18:36:55 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/farmer-income-trails-growth-in-agricultural-output.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>बेहतर मानसून और किसान की मेहनत से कृषि और सहयोगी क्षेत्र ने चालू वित्त वर्ष (2025-26) की दूसरी तिमाही में 3.5 फीसदी की वृद्धि दर को तो हासिल किया, लेकिन उस अनुपात में आय वृद्धि में वह पिछड़ गया। यह लगातार दो तिमाही में हुआ है जब कृषि और सहयोगी क्षेत्र का उत्पादन जितना बढ़ा, उसकी वैल्यू उस अनुपात में नहीं बढ़ी। यह सीधे कृषि उत्पादों की कीमतों में गिरावट का नतीजा है। अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्रों मैन्यूफैक्चरिंग, रियल स्टेट और फाइनेंशियल सर्विसेज में जीडीपी के मुकाबले पहली दोनों तिमाही में जीवीए की दर अधिक रही है।&nbsp;</p>
<p>28 नवंबर को केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) द्वारा जारी जीडीपी और जीवीए के आंकड़ों ने यह तस्वीर साफ की है। इससे यह भी साफ है कि टर्म्स ऑफ ट्रेड कृषि और सहयोगी क्षेत्रों के लिए प्रतिकूल है। सीएसओ के मुताबिक दूसरी तिमाही में कुल जीडीपी के 8.2 फीसदी की दर से और जीवीए के 8.1 फीसदी की दर से बढ़ने का अनुमान है।</p>
<p>असल में इस साल बेहतर मानसून रहा। कई क्षेत्रों में अधिक बारिश और बाढ़ से फसलों को नुकसान हुआ, लेकिन बेहतर बारिश से खरीफ सीजन में फसलों के क्षेत्रफल और उत्पादन में बढ़ोतरी दर्ज की गई। इसका नतीजा है कि कृषि और सहयोगी क्षेत्रों की जीडीपी में 3.5 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। हालांकि यह पहली तिमाही की 3.7 फीसदी की बढ़ोतरी से कुछ कम है।&nbsp;</p>
<p>लेकिन कहानी कुछ और है। चालू साल की पहली और दूसरी तिमाही, दोनों ऐसी रही हैं जब स्थिर कीमतों (2011-12) के मुकाबले मौजूदा कीमतों (करंट प्राइसेज) के आधार पर कृषि और सहयोगी क्षेत्र में ग्रॉस वैल्यू एडेड (जीवीए) की वृद्धि दर कम रही है। स्थिर कीमतों पर कृषि और सहयोगी क्षेत्र के जीवीए में पहली दो तिमाही में क्रमशः &nbsp;3.7 फीसदी और 3.5 फीसदी की वृद्धि हुई है। लेकिन करंट प्राइसेज में पहली तिमाही में जीवीए 3.2 फीसदी रही जो स्थिर कीमतों पर जीवीए से कम है। दूसरी तिमाही में यह केवल 1.8 फीसदी रह गई है। यानी उत्पादन के अनुपात में वैल्यू नहीं बढ़ी है। इसका अर्थ है, किसानों ने जो उत्पादन किया उसके अनुपात में उनकी आय नहीं बढ़ी है। यानी गिरती कीमतों के कारण दो तिमाही से कृषि क्षेत्र डिफ्लेशन की स्थिति में है।&nbsp;</p>
<p>वहीं अगर अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्रों को देखें तो स्थिति उलट है। वहां उत्पादन के मुकाबले वैल्यू अधिक बढ़ी है। स्थिर कीमतों पर मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र पहली तिमाही में 7.7 फीसदी वृद्धि दर पर था जबकि पहली तिमाही में करंट प्राइस पर इसकी वृद्धि दर 10.10 फीसदी थी। यानी उसकी आय अधिक रही। उसी तरह दूसरी तिमाही में स्थिर कीमतों पर जीवीए 9.1 फीसदी रहा जबकि करंट प्राइसेज पर 11.7 फीसदी था। टर्सरी सेक्टर में दोनों तिमाही में स्थिर कीमतों के मुकाबले ताजा कीमतों पर जीवीए वृद्धि दर अधिक है। रियल एस्टेट और फाइनेंशियल सर्विसेज के लिए पहली तिमाही में यह आंकड़े 9.5 फीसदी और 11 फीसदी रहे जबकि दूसरी तिमाही में यह आंकड़े 10.2 फीसदी और 11.5 फीसदी हैं।</p>
<p>तकनीकी रूप से जटिल दिखने वाले यह आंकड़े कृषि क्षेत्र की कमजोर तसवीर को काफी हद तक साफ करते हैं। जीडीपी में कृषि और सहयोगी क्षेत्र की हिस्सेदारी 14 फीसदी के बराबर है जो मैन्यूफैक्चरिंग का भी स्तर है। अर्थव्यवस्था की बढ़ोतरी में सर्विस सेक्टर का योगदान सबसे अधिक है। पीरियोडिकल लेबर फोर्स सर्वे के मुताबिक देश की कामकाजी आबादी का 46 फीसदी हिस्सा कृषि क्षेत्र पर निर्भर करता है। ऐसे में वहां आय का कम बढ़ना एक मजबूत अर्थव्यवस्था का संकेत नहीं है। हालांकि देश के कुछ बड़े इकोनॉमिस्ट मानते हैं कि अगले कुछ बरसों में कृषि पर आधारित परिवारों की आय का आधे से ज्यादा हिस्सा गैर-कृषि कार्यों से आएगा। नाबार्ड के एक सर्वे के मुताबिक इसकी हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है और यह 40 फीसदी से अधिक हो गया है।</p>
<p>दूसरी तिमाही में कृषि और सहयोगी क्षेत्र की 3.5 फीसदी वृद्धि दर के बावजूद फसल उत्पादन के मोर्चे पर स्थिति बहुत बेहतर नहीं है। जीडीपी के आंकड़ों से एक दिन पहले जारी खरीफ सीजन के उत्पादन के पहले अग्रिम अनुमान में इसकी झलक दिखती है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी इन आंकड़ों जारी करते हुए एक बयान में कहा कि कई क्षेत्रों में फसल अधिक बारिश व प्राकृतिक आपदा के चलते प्रभावित हुई है। उनका यह बयान इस बात का संकेत भी हो सकता है कि दूसरे आरंभिक अनुमानों में इन आंकड़ों को नीचे की ओर रिवाइज किया जा सकता है।&nbsp;</p>
<p>पहले अग्रिम अनुमानों के मुताबिक खरीफ सीजन (2025-26) में चावल का उत्पादन पिछले साल के 1227.72 लाख टन से बढ़कर 1245.04 लाख टन रहने का अनुमान लगाया गया है। मक्का में भी बेहतर उत्पादन वृद्धि हुई है और खरीफ में इस साल इसका उत्पादन पिछले साल के 248 लाख टन से बढ़कर 283.03 लाख टन रहने का अनुमान जारी किया गया है। लेकिन इन दोनों को छोड़कर अन्य फसलों का उत्पादन या तो गिरा है या फिर उसमें बहुत मामूली बढ़ोतरी दर्ज की गई है। मसलन, दालों का उत्पादन पिछले साल के 77.33 लाख टन से घटकर 74.13 लाख टन रह गया है। तूर, उड़द और मूंग का उत्पादन घटा है। इसी तरह तिलहन उत्पादन 280.23 लाख टन से गिरकर इस साल 275.63 लाख टन रह गया। मूंगफली का उत्पादन 104.12 लाख टन से बढ़कर इस साल खरीफ में 110.93 लाख टन रहने का अनुमान है। लेकिन खरीफ की दूसरी बड़ी तिलहन फसल सोयाबीन का उत्पादन करीब 10 लाख टन गिर गया है और यह पिछले साल के 152.68 लाख टन से घटकर 142.66 लाख टन रहने का अनुमान है। खास बात यह है कि खाद्य तेल और दालों में हमारी आयात पर निर्भरता है जबकि घरेलू उत्पादन गिर रहा है और किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) भी नहीं मिल पा रहा है।</p>
<p>खरीफ की मुख्य व्यावसायिक फसल कपास का उत्पादन पिछले साल के 297.24 लाख गांठ से घटकर 292.15 लाख गांठ रहने का अनुमान है। कपास किसानों को भी एमएसपी से करीब 1000 रुपये प्रति क्विंटल कम पर फसल बेचने की खबरें देश के अधिकांश कपास उत्पादक हिस्सों से आई हैं। सरकार ने दिसंबर 2025 तक कपास के शुल्क मुक्त आयात का अनुमति दे रखी है। जूट का उत्पादन गिरा है और गन्ना उत्पादन मामूली रूप से बढ़कर पिछले साल के 4546.11 लाख टन से बढ़कर 4756.14 लाख टन रहने का अनुमान जारी किया गया है।</p>
<p>यह आंकड़े कृषि क्षेत्र की जीडीपी में सामान्य बढ़ोतरी की पुष्टि तो करते हैं लेकिन कुल स्थिति बहुत उत्साहजनक नहीं है। वहीं जिस तरह से फसलों के दाम गिरे हैं उसका सीधा असर जीवीए में दिख रहा है। सरकार और रिजर्व बैंक को महंगाई कम करने में कामयाबी मिल रही है क्योंकि खाद्य उत्पादों की कीमतों में लगातार गिरावट आ रही है, लेकिन इसका सीधा असर किसानों की आमदनी पर किस तरह पड़ रहा है वह जीवीए के आंकड़े साफ कर रहे हैं।</p>
<p>यह आंकड़े कृषि क्षेत्र के मुश्किल दौर में जाने का भी संकेत हैं क्योंकि चालू खरीफ मार्केटिंग सीजन में कुछ राज्यों में धान खरीद की पुख्ता व्यवस्था को छोड़ दें तो अधिकांश फसलों के लिए किसानों को एमएसपी भी नहीं मिल पा रहा है। यानी कृषि क्षेत्र एक स्ट्रक्चरल संकट में है जिसका सीधा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ GDP Data: कृषि उत्पादन तो बढ़ा, लेकिन उस अनुपात में किसानों की आय नहीं बढ़ी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[बदलते दौर में भारतीय कृषि क्षेत्र को चाहिए नया नजरिया]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/reimaging-of-agriculture-research-system.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 17 Nov 2025 08:29:04 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/reimaging-of-agriculture-research-system.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत सरकार द्वारा "विकसित भारत@2047" का लक्ष्य निर्धारण करना एक साहसिक व प्रेरणादायक &nbsp; कदम है। वर्तमान की आकर्षक व प्रभावी विकास दर (6.8%) के दृष्टिगत विशेषज्ञों का ऐसा अनुमान है कि भारत 2030 तक दुनिया की तीसरी अर्थव्यवस्था (पांच ट्रिलियन यूएस डॉलर) &nbsp;बन जाएगा। प्रतिष्ठित वित्तीय सेवा कम्पनी मोर्गन स्टेनले (Morgan Stanley) ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि भारत 2028 तक जर्मनी को पीछे छोड़कर दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था (4.7 ट्रिलियन यूएस डॉलर) हो जाएगा।&nbsp;</p>
<p>लेकिन इस आर्थिक प्रगति को तभी टिकाऊ बनाए रखा जा सकता है जब कृषि व उससे संबद्ध क्षेत्रों सहित हमारी अर्थव्यवस्था के सभी स्तम्भ आर्थिक प्रगति की निरंतरता बनाए रखने में बढ़-चढ़ कर &nbsp;योगदान करें। इसीलिए कृषि के सशक्तीकरण के लिए इस क्षेत्र का पुनर्मूल्यांकन करने का निर्णय कोई विकल्प के रूप में नहीं बल्कि अनिवार्यता के रूप में होना चाहिए।</p>
<p><strong>पुनर्मूल्यांकन क्यों आवश्यक है?&nbsp;</strong><br />इतिहास गवाह है कि कृषि प्रणाली को समयानुकूल तकनीकों व नीतियों से अगर पोषित न किया जाए तो इसके परिणाम बहुत ही गंभीर, &nbsp;निराशाजनक व भयावह होते हैं। इस संबंध में हमारे पास बहुचर्चित "रायल कमीशन रिपोर्ट 1928" एक प्रमाण के रूप में है जिसमें कहा गया है, "भारतीय किसान कर्ज में पैदा होता है, कर्ज में ही जीवन जीता है और कर्ज को ही अपनी संतान को उपहार में देकर जाता है।"&nbsp;</p>
<p>यदि परिस्थितियों का गहनता से अध्ययन करें तो पता चलता है कि 18वीं सदी में अप्रत्यक्ष रूप से ईस्ट इंडिया कम्पनी के माध्यम से और फिर 1858 से1947 तक प्रत्यक्ष रूप में चले ब्रिटिश शासनकाल में भारतीय कृषि क्षेत्र के विकास के प्रति तत्कालीन शासकों की अत्यधिक उदासीनता रही। इसके कारण किसानों व कृषि से जुड़े हितधारकोंं की आर्थिक बदहाली हुई।&nbsp;</p>
<p>इसी रिपोर्ट की अनुशंसा के आधार पर 1929 में इम्पीरियल काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च की स्थापना की गई। स्वतंत्रता के बाद उसका नाम बदल कर इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद) कर दिया गया। इसी परिषद के कुशल नेतृत्व में देश में हरित क्रांति/ कृषि क्रांति व खाद्य सुरक्षा का आगाज हुआ।</p>
<p>वर्तमान समय में कृषि क्षेत्र के लिए पर्यावरण परिवर्तन की समस्या, विश्व बाजार की स्पर्धा तथा प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा जैसी बड़ी चुनौतियां उभर रही हैं उनके दृष्टिगत हमें पुनः इस क्षेत्र के सशक्तीकरण के लिए अब कदम उठाना आवश्यक हो गया है।</p>
<p><strong>कृषि क्षेत्र- विकसित भारत का इंजन</strong><br />यह क्षेत्र देश के कुल सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 16-18% तक का योगदान देता है और देश के लगभग 45% कार्यबल को रोजगार देने में सक्षम है। सन् 2023-24 में लगभग 52 अरब डॉलर का कृषि निर्यात किया गया और 2035 तक निर्यात लक्ष्य 100 अरब डॉलर निर्धारित किया गया है। भारत का पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था 2030 तक बन जाना अनुमानित है जिसमें कृषि क्षेत्र द्वारा एक ट्रिलियन डॉलर का योगदान देने की संभावना को साकार करना है।&nbsp;</p>
<p>इसके लिए कृषि क्षेत्र से संबंधित नीतियों में ऐसे बदलाव हों जिसके केन्द्र में किसान, विशेषकर छोटे व मझोले किसान हों, जिनकी संख्या कुल किसानों की 86% है। प्रौद्योगिकी संचालित खेती करने के लिए इन किसानों की तकनीकी क्षमताओं को बढ़ाना तथा उनको बाजारोन्मुखी व उद्यमशील बनने के लिए प्रेरित करना अत्यंत आवश्यक है।&nbsp;</p>
<p><strong>विज्ञान, नवाचार व नीति- बदलाव के तीन स्तंभ</strong><br />उभरती चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना करने के लिए विशेष नीतिगत बदलाव लाकर खेती को विज्ञान व नवाचार आधारित बनाने के लिए निर्णायक कदम उठाने होंगे। इसी के दृष्टिगत कृषि में सुधार लाने के लिए कई राष्ट्रीय समितियों, जिनमें डॉ. आरए माशेलकर कमेटी 2005, डॉ. एमएस स्वमीनाथन कमेटी 2006 तथा डॉ आरएस परोदा कमेटी 2019 शामिल हैं, ने अनेक महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं। इन कमेटियों के सुझाव से यह इंगित होता है कि कृषि क्षेत्र में परिवर्तनकारी सुधारों को गति देने के लिए कृषि शिक्षा पाठ्यक्रम में बदलाव, अनुसंधान को नई दिशा देने, &nbsp;किसानों व हितधारकों की क्षमता (capacity building) बढ़ाने , &nbsp;सामूहिक बुद्धिमत्ता (Collective Intelligence) के उपयोग का वातावरण तैयार करने तथा कृषि विज्ञान की उपलब्धियों व नवाचारों को प्रयोगशालाओं से किसानों, उद्यमियों व अन्य हितधारकों तक ले जाने पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।&nbsp;</p>
<p>कृषि अनुसंधान प्रणाली के पुनर्मूल्यांकन के लिए सरकार व संस्थानों के बीच जो महत्वपूर्ण विमर्श हो रहा है वह एक दूरदर्शी व समयानुकूल कदम है। यह कृषि शिक्षा, अनुसंधान व विकास को पुनर्व्यवस्थित करके वर्तमान चुनौतियों से निपटने में मददगार होगा, तथा भविष्य के लिए एक टिकाऊ और कृषि क्षेत्र में सकारात्मक आर्थिक बदलाव लाने का मार्ग प्रशस्त करेगा।</p>
<p><strong>कृषि शिक्षा का आधुनिकीकरण</strong><br />ऐसा प्रत्यक्ष प्रतीत हो रहा है कि 21वीं सदी में कृषि क्षेत्र में वैश्विक प्रतिस्पर्धा बहुत अधिक बढ़ेगी। इस स्पर्धा का सामना करने के लिए वैज्ञानिक ज्ञान से संपन्न व तकनीकी कौशल से युक्त मानव संसाधन का कृषि क्षेत्र में होना आवश्यक होगा। अतः परंपरागत &nbsp;प्रणाली से हट कर अब कृषि शिक्षा प्रणाली को पूर्णरूप से विज्ञान व तकनीक आधारित बनाए जाने की आवश्यकता है। इसके लिए कृषि विश्वविद्यालयों व संस्थानों का ऐसा एकीकृत पाठ्यक्रम होना चाहिए जो वर्तमान व भविष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए निम्नलिखित क्षेत्रों में मानव संसाधन विकसित कर सके:<br />-आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस, मशीन लर्निंग, व रोबोटिक्स<br />-ब्लॉकचेन एवं मार्केट इंटेलिजेंस<br />-सतत एवं जलवायु प्रतिरोधी कृषि प्रणाली&nbsp;<br />-उद्यमिता विकास, कृषि व्यवसाय प्रबंधन, स्टार्टअप विकास<br />-गुणवत्ता व सेनीटरी-फाइटोसेनीटरी के वैश्विक मानकों की जानकारी</p>
<p>शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ डिग्री देने तक सीमित न हो बल्कि ऐसे स्नातक बनें जो उद्यमशील हों तथा जिनमें नवाचार करने की प्रवृत्ति हो। अर्थात हमारे स्नातक नौकरी खोजी होने के बजाय नौकरी देने वाले परिवर्तनकारी बनें।</p>
<p><strong>कृषि विज्ञान केन्द्र ज्ञान-नवाचार केन्द्र बनें&nbsp;</strong><br />&lsquo;डॉ. आरएस परोदा कमेटी रिपोर्ट 2019&rsquo; में &nbsp;किसानों व कृषि से जुड़े हितधारकों को साक्षर बनाने के महत्व &nbsp;को विशेष रूप से रेखांकित किया गया है। देश के सभी कृषि विज्ञान केन्द्रों (731) व कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन केन्द्रों (691) को "ज्ञान-कौशल-नवाचार केन्द्रों" के रूप में परिवर्तित करने की अनुशंसा की गई है ताकि ये केन्द्र ऐसा मानव संसाधन पैदा कर सकें जो ज्ञान अद्यतन हो, सतत क्षमता निर्माण में सहायक हों और &nbsp;भारतीय कृषि क्षेत्र को आवश्यक तकनीकी हस्तांतरण द्वारा अधिक प्रगतिशील, समृद्ध व विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने में बड़ी भूमिका निभाए।</p>
<p><strong>सोच वैश्विक हो लेकिन कार्यान्वयन स्थानीय हो&nbsp;</strong><br />हमारे अनुसंधान की प्राथमिकताओं में नवाचार को प्रमुखता दी जानी चाहिए। इसी दृष्टिकोण से भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने 2006 में बौद्धिक संपदा प्रबंधन व व्यवसायीकरण के लिए नीति लागू की लेकिन इस दिशा में बहुत धीमी प्रगति हुई है। इसके लिए आवश्यक है कि-<br />-अनुसंधान व विकास के सशक्तीकरण के लिए सार्वजनिक व निजी क्षेत्रों में भागीदारी को प्रोत्साहित किया जाए।<br />-नवाचार आधारित उद्यमिता को बढ़ावा मिले<br />-अनुसंधान के केन्द्र में किसान की आवश्यकताएं भी हों<br />-भारतीय कृषि की कुल कारक उत्पादकता&nbsp;</p>
<p>इनपुट के लिहाज से देखें तो उत्पादकता कम है। पानी उपयोग की दक्षता सिर्फ 36-40% है, जबकि मृदा की उर्वरा-शक्ति व कार्बन स्तर कम होता जा रहा है। स्थिर व लचीली खेती के लिए जीनोमिक्स, जीन एडीटिंग तथा टिकाऊ खेती जैसी तकनीकों का प्रयोग आवश्यक हो गया है।</p>
<p><strong>कृषि सशक्तीकरण के लिए नीतिगत बदलाव हों</strong><br />स्वतंत्रता के बाद कृषि क्षेत्र के सशक्तीकरण के लिए भूमि प्रबंधन व सिंचाई सुविधाओं में सुधार से लेकर कृषि उत्पादन विपणन कमेटी अधिनियम (APMC Act) व अनुबंधित खेती करने सहित अनेक नीतिगत बदलाव किए गए, लेकिन विभिन्न कारणों से अनेक क्षेत्रों में आशातीत प्रगति नहीं हो पाई। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सबल बनाने के लिए ऐसे साहसिक नीतिगत बदलाव की आवश्यकता है जो यह सुनिश्चित करे कि-<br />-निजी क्षेत्र के साथ साझेदारी लाभदायक है<br />-अनुसंधान, विकास व नवाचार के लिए अधिक निवेश किया जा सके<br />-सब्सिडी देने की रूपरेखा ऐसी हो जिससे छोटे व मझोले किसानों को सीधा लाभ मिले<br />-ज्ञान व कौशल विकास के लिए जमीनी स्तर पर समग्र एवं सतत प्रयास हों<br />-किसान आपूर्ति श्रृंखला का हिस्सा बन सकें</p>
<p><strong>उपसंहार</strong><br />भारतीय कृषि को भविष्य की आवश्यकताओं के अनुसार परिवर्तन लाने के लिए ऐसा एक बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाना होगा जिसमें सभी किसानों व हितधारकों के सशक्तीकरण के लिए नीतिगत बदलाव, तकनीकी उन्नयन, नवाचार और सतत विकास योजनाओं के कार्यान्वयन पर विशेष ध्यान दिया जाए। जब हमारी कृषि विज्ञान व प्रौद्योगिकी आधारित होगी तो वैश्विक प्रतिस्पर्धा का सामना करने में सक्षम होगी और खाद्य व पोषण सुरक्षा देने के साथ-साथ विकसित भारत@2047 मिशन में महत्वपूर्ण योगदान दे सकेगी।</p>
<p>कृषि को मात्र एक जीविका का साधन न समझा जाए बल्कि इसे आर्थिक परिवर्तन लाने के इंजन के रूप में पहचाना जाना चाहिए।</p>
<p><strong><em>(डॉ. आर. एस. परोदा ,पूर्व महानिदेशक, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, पूर्व सेक्रेटरी, कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग भारत सरकार एवं चेयरमैन, ट्रस्ट फार एडवांसमेंट ऑफ एग्रीकल्चरल सांइसेज हैं)</em></strong></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/03/image_750x500_67cbf7925156d.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ बदलते दौर में भारतीय कृषि क्षेत्र को चाहिए नया नजरिया ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/03/image_750x500_67cbf7925156d.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[प्लांट वैरायटी एक्ट के संशोधन में कृषक अधिकारों की सुरक्षा जरूरी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/amending-indias-plant-varieties-and-farmers-rights-act.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 15 Nov 2025 15:23:30 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/amending-indias-plant-varieties-and-farmers-rights-act.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत ने कृषि और बागवानी फसलों की किस्मों, पादप प्रजनन (plant breeding) और किसानों के अधिकारों से संबंधित बौद्धिक संपदा (आईपी) कानून - पौध किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण अधिनियम (पीपीवी एंड एफआर अधिनियम) - में संशोधन की प्रक्रिया शुरू कर दी है। यह अधिनियम मूल रूप से 30 अक्टूबर 2001 को विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के प्रावधानों के अनुपालन में भारतीय संसद द्वारा पारित किया गया था। यह कानून दो चरणों में लागू हुआ। पहले चरण की धाराएं 11 नवंबर 2005 से और दूसरे चरण की शेष धाराएं 19 अक्टूबर 2006 से प्रभावी हुईं।</p>
<p>प्रस्तावित संशोधनों के लिए मुख्य तर्क यह दिया गया कि कानून के लागू होने के बीस वर्ष बाद इसके क्रियान्वयन में आ रही कठिनाइयों को दूर करने की आवश्यकता है। अधिकारी कुछ कानूनी प्रावधानों में स्पष्टता की आवश्यकता भी बताते हैं। इस कानून में अब तक केवल एक बार, वर्ष 2021 में संशोधन किया गया था।</p>
<p>पीपीवी एंड एफआर प्राधिकरण का मुख्यालय 2005 में नई दिल्ली में स्थापित किया गया। तब से इसने गुवाहाटी, पालमपुर, पुणे, रांची और शिवमोगा में पांच क्षेत्रीय कार्यालय स्थापित किए हैं। यह प्राधिकरण नई और मौजूदा पौध किस्मों की 206 श्रेणियों पर बौद्धिक संपदा अधिकार प्रदान करता है। पंजीकरण के लिए आवेदन स्वीकृत होने पर पौध किस्म प्रमाणपत्र (पीवीसी) जारी किया जाता है। पीपीवी एंड एफआर अधिनियम के तहत &lsquo;पंजीकरण&rsquo; में प्लांट ब्रीडर को 15 वर्षों (फसलों के लिए) और 18 वर्षों (पेड़/लता के लिए) की अवधि के लिए उस किस्म का उत्पादन, बिक्री, विपणन, वितरण, आयात या निर्यात करने के विशिष्ट अधिकार प्रदान करता है।</p>
<p>प्राधिकरण ने &lsquo;अधिनियम और नियमों की समीक्षा कर संशोधन के सुझाव देने&rsquo; के लिए एक समिति गठित की है। यह समिति 3 दिसंबर 2024 को आयोजित प्राधिकरण की 39वीं बैठक में अनुमोदित की गई। बारह सदस्यीय समिति की अध्यक्षता कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत कृषि अनुसंधान और शिक्षा विभाग (डीएआरई) के सेवानिवृत्त सचिव एवं आईसीएआर के पूर्व महानिदेशक डॉ. आर.एस. परोदा कर रहे हैं। इसमें बीज उद्योग सहित विविध हितधारक समूहों के प्रतिनिधि शामिल हैं।</p>
<p>हितधारकों के साथ परामर्श अक्टूबर 2025 के अंत तक हाइब्रिड मोड में आयोजित किए गए। इनमें बीज उद्योग, सार्वजनिक क्षेत्र एवं किसान संगठनों के प्रतिनिधियों ने नई दिल्ली स्थित प्लांट अथॉरिटी भवन में भाग लिया। इन परामर्शों से प्राप्त फीडबैक के आधार पर समिति कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय को सुझाव देगी।</p>
<p>जब यह कानून पहली बार पारित किया गया था, तब इसे कृषि में आईपी के डब्ल्यूटीओ मानदंडों के अनुरूप ढलती दुनिया के बीच भारत का अनूठा उत्तर बताया गया था। यहां किसानों के नवाचार को न तो मान्यता मिलती थी और न ही कोई प्रतिफल। भारत के इस आईपी कानून की विशिष्टता यह है कि यह किसानों को भी ब्रीडर के रूप में मान्यता देता है और उन्हें अपनी किस्मों पर आईपी प्राप्त करने का विकल्प प्रदान करता है। प्राधिकरण के प्रयास अधिक किसानों को पंजीकरण के लिए प्रेरित करने और उनकी किस्मों को आईपी व्यवस्था में शामिल करने की ओर रहे हैं। हालांकि अनेक किसान पौधों पर विशिष्ट संपत्ति अधिकार की अवधारणा के विरोध के चलते ऐसे आईपी पंजीकरण से दूर भी रहे हैं। कुछ इसके बजाय गैर-आईपी आधारित संस्थागत समर्थन चाहते हैं, जिसमें पीवीसी के लिए पंजीकरण कराना आवश्यक नहीं होता। कुछ का तर्क है कि कॉमन जैव-सांस्कृतिक विरासत के रूप में उपयोग और संरक्षित किस्मों को किसी एक किसान के इनोवेशन के रूप में आईपी का अधिकार देना उचित नहीं है।</p>
<p>पीपीवी एंड एफआर प्राधिकरण की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 31 अक्टूबर 2025 तक कुल 10,018 पीवीसी जारी किए गए हैं। इनमें से 5,038 किसान किस्मों (एफवी) को दिए गए। प्राधिकरण इस तथ्य को रेखांकित करता है कि अब तक जारी कुल आईपी पंजीकरणों में किसानों की किस्मों पर आईपी की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से थोड़ा अधिक है।</p>
<p>फिर भी दो गुणात्मक तथ्यों को ध्यान में रखना आवश्यक है। पहला, किसान द्वारा तैयार किस्में &lsquo;विद्यमान&rsquo; (या मौजूदा) श्रेणी में पंजीकृत हैं, &lsquo;नई&rsquo; श्रेणी में नहीं। यदि किसान ब्रीडर द्वारा खेत में आरएंडडी और वैरायटी डेवलपमेंट को व्यवस्थित रूप से समर्थन नहीं मिला, तो देश की सभी विद्यमान किसान किस्मों के पंजीकरण के बाद नए पंजीकरण में गिरावट की आशंका है।</p>
<p>दूसरा, सर्टिफिकेट रखने वाले किसानों को राष्ट्रीय कृषि प्रणाली और सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों से उनकी स्थानीय फसल किस्मों को मुख्यधारा में लाने के लिए बहुत कम संस्थागत समर्थन मिलता है। केवल आईपी संरक्षण से उनकी किस्में बीज बाजार में उपलब्ध नहीं हो जातीं। इसके लिए उन्हें राज्य की वैरायटी रिलीज कमेटियों में शामिल करना, पैकेजिंग, लेबलिंग और विपणन की व्यवस्था करना आवश्यक है। जैसे-जैसे भारत अपने कृषि-खाद्य तंत्र में पोषण सुरक्षा और जलवायु अनुकूलता हासिल करना चाहता है, किसान किस्मों के लिए समर्थन और अधिक महत्वपूर्ण होता जाएगा।</p>
<p>उधर, औपचारिक बीज उद्योग आईपी-संरक्षित किस्मों का प्रमुख आपूर्तिकर्ता बना हुआ है। आईपी समर्थक बीज उद्योग, जिसमें फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया और उनके लाइसेंसी नेशनल सीड एसोसिएशन ऑफ इंडिया शामिल हैं, कानून में उद्योगों की मदद वाले संशोधनों की लगातार मांग कर रहे हैं, जिनमें &lsquo;वन नेशन वन लाइसेंस&rsquo; जैसी नियामक व्यवस्था शामिल है। उनका तर्क है कि इससे कृषि व्यवसाय में सुगमता बढ़ेगी और पीपीवी एंड एफआर अधिनियम, बीज अधिनियम तथा जैव विविधता अधिनियम &mdash; इन तीन अलग-अलग कानूनों के कानूनी प्रावधानों का एकीकरण संभव होगा।</p>
<p>आईपी अधिकतावादी (मैक्सिमलिस्ट) शक्तियों के प्रभुत्व के दौर में विशिष्ट रूप से किसान पक्षधर बने रहना ही इस संशोधन प्रक्रिया की वास्तविक परीक्षा होगी।</p>
<p><em>(शलिनी स्वतंत्र विधि और नीतिगत विश्लेषक हैं। वह 1995 में डब्ल्यूटीओ के अमल में आने के बाद से कृषि में आईपी नियमों पर नजर रख रही हैं)</em></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/11/image_750x500_69184d0992f0e.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ प्लांट वैरायटी एक्ट के संशोधन में कृषक अधिकारों की सुरक्षा जरूरी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[धरती का भविष्य हमारी थाली पर निर्भर]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/planets-fate-rests-on-our-plates.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 10 Nov 2025 10:28:10 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/planets-fate-rests-on-our-plates.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>इस मानव युग में, <span>केवल जीवाश्म ईंधन ही हमारे सबसे बड़े वैश्विक संकटों का कारण नहीं हैं</span>, <span>बल्कि भोजन भी इन संकटों&mdash;चाहे वह ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन हो</span>, <span>भूमि उपयोग में बदलाव</span>, <span>जैव विविधता का नुकसान या मीठे पानी की कमी&mdash;को बढ़ा रहा है। नाइट्रोजन</span>, <span>फास्फोरस और अन्य पोषक तत्वों के अत्यधिक बहाव का सबसे बड़ा स्रोत भी भोजन ही है</span>, <span>जो दुनिया भर में यूट्रोफिकेशन (जलाशयों में पोषक तत्वों की अत्यधिक वृद्धि) को बढ़ावा देता है।</span></p>
<p>अक्टूबर 2025 <span>की <strong>&lsquo;</strong></span><strong>EAT-<span>लैंसेट कमीशन ऑन हेल्दी</span>, <span>सस्टेनेबल एंड जस्ट फूड सिस्टम्स&rsquo;</span></strong><span> रिपोर्ट नए प्रमाण प्रस्तुत करती है कि बढ़ती वैश्विक आबादी का पोषण कैसे किया जाए</span>,<span> जो सभी के लिए न्यायसंगत हो और साथ ही धरती की सीमाओं के भीतर भी रहे। आहार संबंधी निर्णय महत्वपूर्ण हैं क्योंकि बाजार के संकेत (खपत पैटर्न) और सरकारी नीतियों</span>,<span> जैसे पीडीएस के तहत खरीद</span>,<span> के आधार पर किसान तय करते हैं कि क्या उगाएं।</span></p>
<p>दुर्भाग्य से, <span>आज की दोषपूर्ण खाद्य प्रणाली धरती को नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ मानव स्वास्थ्य को भी बिगाड़ रही है। एक-चौथाई से अधिक वैश्विक आबादी या तो कुपोषण का शिकार है या मोटापे से ग्रसित। मौजूदा प्रणाली हर साल लगभग </span>1.1 <span>करोड़ अकाल मौतों में योगदान देती है और हृदय</span>, <span>श्वास संबंधी और अन्य पुरानी बीमारियों को बढ़ावा दे रही है।</span></p>
<p>पिछले दशक में,<span> दुनिया ने जीवाश्म ईंधन को चरणबद्ध तरीके से हटाने और अक्षय ऊर्जा में निवेश बढ़ाने पर जोर दिया। जबकि जलवायु परिवर्तन में भोजन की भूमिका को नजरअंदाज किया गया। भले ही जीवाश्म ईंधन पर नेट न्यूट्रैलिटी हासिल हो जाए</span>, <span>लेकिन जलवायु चुनौती बनी रहेगी। क्योंकि भोजन एक &ldquo;लुप्त कड़ी&rdquo; है और भारत की कृषि उत्पादन एवं उपभोग नीतियां अक्सर इस लक्ष्य के विपरीत काम करती हैं।</span></p>
<p><strong>पॉट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च</strong> द्वारा विकसित EAT-<span>लैंसेट रिपोर्ट पृथ्वी की सहन सीमाओं के भीतर एक स्वस्थ संदर्भ आहार को परिभाषित करती है। <strong>प्लैनेटरी हेल्थ डाइट (</strong></span><strong>PHD)</strong> <span>की कुछ प्रमुख सिफारिशें इस प्रकार हैं:</span></p>
<ul>
<li><span>सप्ताह में केवल चार बार एनिमल प्रोटीन का सेवन&mdash;एक बार चिकन</span>, <span>दो बार मछली</span>, <span>और रोज़ एक बार डेयरी</span>; <span>साथ ही सप्ताह में डेढ़ अंडा </span></li>
<li><span>रेड मीट के उपभोग को लगभग </span>14 <span>ग्राम प्रतिदिन या सप्ताह में एक बार तक सीमित करना। (यह अमेरिका और यूरोप के औसत से कई गुना कम है। भारत जैसे देशों में आहार धरती की सहन-सीमाओं के भीतर इसलिए रहता है क्योंकि बड़ी आबादी मीट</span>, <span>पॉल्ट्री या अधिक प्रोटीन का खर्च उठाने में सक्षम नहीं है।)</span></li>
</ul>
<p><strong>प्लैनेटरी हेल्थ डाइट (</strong><strong>PHD)</strong> <span>प्राप्त करने के लिए आयोग के सुझाव:</span></p>
<ul>
<li><span>कृषि सब्सिडी को मांस और डेयरी की बजाय पर्यावरण-अनुकूल फल-सब्जियों</span>, <span>फलियों और अनाज पर केंद्रित किया जाए। ताकि ये स्वस्थ और टिकाऊ विकल्प और अधिक किफायती बन सकें।</span></li>
<li><span>प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रों में कृषि के विस्तार और जैव विविधता के नुकसान को रोका जाए </span></li>
<li><span>भूमि और जल उत्पादकता में सुधार </span></li>
<li><span>कृषि प्राथमिकताओं का पुनर्निर्देशन </span></li>
<li><span>पांच दशकों तक एकल फसल (मोनोकल्चर) उपज में शोध और निवेश को बढ़ावा देने के बाद अब मिश्रित</span>, <span>एकीकृत कृषि प्रणालियों को भी इतना ही महत्व दिया जाए</span></li>
</ul>
<p>विश्वविद्यालयों व शोध संस्थानों के सामने चुनौती केवल सतत गहनता के जरिए पर्यावरण अनुकूल और पारंपरिक कृषि का समन्वय करना ही नहीं है, <span>बल्कि इस ज्ञान को विकासशील देशों के साथ मुक्त रूप से साझा करना भी है। जहां उपज उच्चतम स्तर पर है लेकिन कृषि असंतुलित तरीकों से हो रही है</span>, <span>वहां सस्टेनेबिलिटी की ज्यादा जरूरत है जबकि कम पैदावार वाले क्षेत्रों को सतत गहनता पर ध्यान देना चाहिए।</span></p>
<p><strong>भारत </strong>का फोकस शोध के माध्यम से उत्पादकता बढ़ाने के बजाय खरीद-प्रोत्साहन के जरिए उत्पादन बढ़ाने पर रहा है। पेरिस समझौते के लक्ष्य हासिल करने का एकमात्र तरीका है वैश्विक खाद्य प्रणाली में परिवर्तन यानी आहार में बदलाव, <span>कार्बन उत्सर्जन और खाद्य अपशिष्ट को आधा करना</span>, <span>तथा सस्टेनेबल एग्रीकल्चर को अपनाना। इसमें नाइट्रोजन व फास्फोरस के बहाव को कम करना</span>, <span>उर्वरकों और गोबर से नाइट्रस ऑक्साइड उत्सर्जन घटाना और पशुधन से मीथेन उत्सर्जन कम करना शामिल है। लेकिन भारत इन मोर्चों पर पिछड़ रहा है। रसायनों पर बढ़ती निर्भरता संकट को और गहरा कर रही है।</span></p>
<p><strong>प्लैनेटरी हेल्थ डाइट</strong> के मूल में न्याय का सिद्धांत है। इसके अनुसार किसान सिर्फ खाद्य उत्पादक नहीं हैं, <span>वे सम्मानजनक आजीविका के हकदार भी हैं। फिर बड़ा सवाल यह है कि किसान पर्यावरण-अनुकूल कृषि पद्धतियां कैसे अपनाएं</span>, <span>जबकि भोजन को सस्ता रखने पर आधारित लोकलुभावन राजनीति कृषि उपज के दाम बढ़ने से रोकती है</span>?</p>
<p>यदि डोनाल्ड ट्रम्प सब्सिडी वाला अमेरिकी अनाज खरीदने के लिए दबाव बनाते हैं, <span>तो भारत जैसे खाद्य-आयातक देशों में कृषि उपजों के मूल्य और गिरेंगे। इससे किसान और गरीबी में धकेले जाएंगे</span>, <span>और असंतुलित एकल-कृषि का चक्र चलता रहेगा।</span></p>
<p>जलवायु परिवर्तन को राजनीतिक सीमाओं के भीतर सीमित रखकर हल नहीं किया जा सकता। दुनिया को यह पुनर्विचार करना होगा कि कृषि उपज का व्यापार किस तरह किया जाए &mdash; खासकर विश्व व्यापार संगठन (WTO) <span>के ढांचे के भीतर &mdash; और उसकी असल लागत उपभोक्ता की थाली में किस रूप में दिखाई दे। </span></p>
<p><em><strong>(अजय वीर जाखड़ भारत कृषक समाज के चेयरमैन हैं)</strong></em></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/11/image_750x500_69117dddb17da.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ धरती का भविष्य हमारी थाली पर निर्भर ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[‘किसान प्रथम’ नीति ही होगी कृषि क्षेत्र में ट्रेड डील का आधार]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/farmer-first-centric-policy-to-lead-trade-deals-in-agriculture-sector.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 02 Nov 2025 10:14:17 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/farmer-first-centric-policy-to-lead-trade-deals-in-agriculture-sector.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">ऐसे समय जब भारत और अमेरिका 2030 तक आपसी व्यापार हर साल 500 अरब डॉलर (2022-23 में 128.78 अरब डॉलर) तक बढ़ाने के लिए बातचीत कर रहे हैं, खेती एक विवाद वाला क्षेत्र बन गया है। अमेरिका, भारत के बड़े कृषि बाजार तक गहरी पहुंच के लिए जोर दे रहा है। यह एक ऐसी मांग है जिसने भारतीय किसानों को परेशान कर दिया है। 15 अगस्त 2025 को अपने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पॉलिसी के तौर पर किसानों के हितों की रक्षा के लिए &ldquo;दीवार की तरह खड़े रहने&rdquo; का वादा किया था। उनके पक्के इरादे ने भारत की &ldquo;किसान प्रथम&rdquo; नीति को फिर से पक्का किया, जिसकी देश और दुनिया भर में बहुत तारीफ हुई।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अमेरिका के अंदर भी, जेफरी सैक्स जैसे कई अर्थशास्त्रियों और नीति निर्माताओं ने भारतीय सामान पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ धमकियों की आलोचना की, उन्हें &ldquo;अजीब और खुद को नुकसान पहुंचाने वाला&rdquo; कहा। फिर भी 26 अगस्त 2025 को ट्रंप ने भारतीय एक्सपोर्ट पर 25+25% टैरिफ लगाने का ऐलान किया। इस चुनौती ने भारत को रोकने के बजाय देश के इरादे को और मजबूत किया है। किसानों, वैज्ञानिकों और पॉलिसी बनाने वालों ने इसे खेती में बदलाव और आत्मनिर्भरता के मौके के तौर पर देखा है।</span></p>
<p><strong>&nbsp;अमेरिका की डिमांड को समझना</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">पिछले दस सालों में अमेरिका ने बार-बार भारत के 452 अरब डॉलर के कृषि बाजार (जिसके 2030 तक 563 अरब डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है) में एंट्री की कोशिश की है। सोयाबीन, मक्का, गेहूं, फल, डेयरी, पोल्ट्री और मीट में घरेलू सरप्लस का सामना कर रहे अमेरिकी किसान भारत के 146 करोड़ उपभोक्ताओं को अपने संघर्षरत एग्रीबिजनेस सेक्टर के लिए लाइफलाइन के तौर पर देखते हैं। भारत के मार्केट का एक छोटा सा हिस्सा भी हासिल करने से अमेरिका लीडरशिप को बड़ा आर्थिक और राजनीतिक फायदा होगा।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">हालांकि, अमेरिका का फायदा गलत प्रतिस्पर्धा पर आधारित है। अमेरिकी कृषि को सालाना घरेलू सब्सिडी से फायदा होता है जो अक्सर 20 अरब डॉलर से ज्यादा होती है। इससे उनके उत्पादों के दाम कृत्रिम रूप से कम हो जाते हैं। भारत इस अत्यधिक सब्सिडी वाले, मैकेनाइज्ड कॉम्पिटिशन को अपने घरेलू सेक्टर को बर्बाद करने की इजाजत नहीं दे सकता।</span></p>
<p><strong>भारत अपना कृषि क्षेत्र क्यों नहीं खोल सकता</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">भारत के लिए खेती सिर्फ एक कॉमर्शियल काम नहीं, यह खाद्य और पोषण की सुरक्षा का आधार है। देश की 45 प्रतिशत वर्कफ़ोर्स के लिए यह रोजी-रोटी का मुख्य जरिया है। यह सेक्टर गांवों में स्थिरता, रोजगार और विकसित भारत @2047 विजन का आधार है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">भारतीय बाजारों को अधिक सब्सिडी वाली, मशीन वाली अमेरिकी खेती के लिए खोलने से घरेलू किसान परेशान होंगे और दशकों की तरक्की उलट जाएगी। भारत यह सबक पहले ही सीख चुका है। 1990 के दशक में खाद्य तेल और दालों का आयात आसान बनाने से स्थानीय उत्पादन कम हुआ। इससे आयात पर निर्भरता खाने के तेल की खपत (कीमत 1.38 लाख करोड़ रुपये) और दालों (42,629 करोड़ रुपये) का 57 प्रतिशत हो गई। हाल ही सरकार ने सितंबर से दिसंबर 2025 तक कॉटन के ड्यूटी फ़्री इम्पोर्ट की इजाजत दी, जिससे किसानों को अपनी उपज न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से बहुत नीचे बेचने पर मजबूर होना पड़ा। इस साल कपास उगाने वालों को भारी नुकसान हो रहा है। अमेरिकी मक्का, सोयाबीन, इथेनॉल, डेयरी या पोल्ट्री सेक्टर के आने से ऊर्जा में आत्मनिर्भरता, घरेलू वैल्यू चेन और खेती से होने वाली इनकम को प्रभावित करेगी।</span></p>
<p><strong>एमएसपी का सुरक्षा कवच</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">जरूरी बात यह है कि MSP सिस्टम और पब्लिक स्टॉकहोल्डिंग प्रोग्राम ऐसे सुरक्षा उपाय हैं जिन पर कोई मोल-भाव नहीं किया जा सकता। ये कोशिशें छोटे और सीमांत किसानों के लिए गारंटीशुदा आय पक्का करती हैं। ये सब्सिडी वाली अंतरराष्ट्रीय वस्तुओं से कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव के खिलाफ एक जरूरी सुरक्षा कवच का काम करती हैं। व्यापारिक साझीदार को खुश करने के लिए इस फ्रेमवर्क को खत्म करना या कमजोर करना देश के लाखों छोटे और सीमांत किसानों की आर्थिक सुरक्षा और रोजी-रोटी को कमजोर कर देगा।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अभी भारत की GDP में खेती का हिस्सा 15 - 18 प्रतिशत है, और सही पॉलिसी, इंफ्रास्ट्रक्चर और इनोवेशन की मदद से यह जल्द ही 20 प्रतिशत से ज्यादा हो सकता है। सरकार का बढ़ता बजट एलोकेशन (2013&ndash;14 में 21,933 करोड़ से बढ़कर 2024&ndash;25 में 1.22 लाख करोड़ रुपये) खेती की ग्रोथ के लिए एक मजबूत प्रतिबद्धता दिखाती है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कई नई पहल हुई हैं जिनका मकसद घरेलू उत्पादन को मजबूत करना और आयात कम करना है, वे इस प्रकार हैं:</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">&Oslash; प्रोडक्टिविटी और क्वालिटी बढ़ाने के लिए कॉटन मिशन।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">&Oslash; तिलहन में आत्मनिर्भरता पाने के लिए तेल-तिलहन पर नेशनल मिशन (2024&ndash;31)।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">&Oslash; दालों के लिए दलहन आत्मनिर्भरता मिशन (11,440 करोड़ रुपये)।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">&Oslash; फसल बीमा के जरिए खाद्य और इनकम सुरक्षा के लिए प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY)।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">&Oslash; खाद्य और पोषण सुरक्षा के लिए पीएम धन-धान्य कृषि योजना (24,000 करोड़)।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">&Oslash; पशुपालन, मछली पालन और खाद्य प्रसंस्करण स्कीम (5,450 करोड़)।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">&Oslash; आधुनिक खाद्य प्रसंस्करण इंफ्रास्ट्रक्चर और वैल्यू चेन डेवलपमेंट के लिए PM किसान संपदा योजना।</span></p>
<p><strong>कृषि व्यापार और निर्यात में सुधार</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अमेरिका के टैरिफ बढ़ाने से पहले भारत ने 2035 तक कृषि निर्यात 51.9 अरब डॉलर (2024&ndash;25) से बढ़ाकर 100 अरब डॉलर करने की योजना बनाई थी। अमेरिका को होने वाला निर्यात 5.7 अरब डॉलर (कुल का 11%) था, जिसमें से आधे से ज्यादा पर टैरिफ का असर पड़ा है। लंबे समय में, भारत को अपना बाजार खोलने की जरूरत है, कम से कम उस अनुपात में जितना वह विदेशी बाजारों से चाहता है। इसके लिए व्यापार और निर्यात नीति में सुधार की जरूरत है। निर्यात में ग्रोथ बनाए रखने के लिए भारत को एक सुरक्षित अर्थव्यवस्था से दुनिया भर में मुकाबला करने वाली अर्थव्यवस्था में बदलना होगा। इसके लिए ये उपाय किए जा सकते हैंः</span></p>
<ul>
<li><span style="font-weight: 400;"> हाई-वैल्यू प्रोसेस्ड प्रोडक्ट्स के साथ अपने निर्यात पोर्टफोलियो को डायवर्सिफाई और अपग्रेड करना।</span></li>
<li><span style="font-weight: 400;"> प्रोसेसिंग, ब्रांडिंग, कोल्ड चेन और लॉजिस्टिक्स में MSMEs, FPOs और SHGs की मदद करना।</span></li>
<li><span style="font-weight: 400;"> आसियान (ASEAN), अफ्रीका, यूरोपियन यूनियन (EU) और मिडिल ईस्ट में मार्केट प्रमोशन बढ़ाना।</span></li>
<li><span style="font-weight: 400;"> स्थिर निर्यात नीति सुनिश्चित करना और बार-बार लगाए जाने वाले प्रतिबंधों से बचना।</span></li>
<li><span style="font-weight: 400;"> मॉडर्न टेस्टिंग, ट्रेसेबिलिटी और सर्टिफिकेशन के जरिए SPS और TBT स्टैंडर्ड्स को पूरा करना।</span></li>
<li><span style="font-weight: 400;"> ईज-ऑफ-डूइंग बिजनेस, इनोवेशन इंसेंटिव और स्टार्ट-अप इकोसिस्टम को मजबूत करना।</span></li>
<li><span style="font-weight: 400;"> छोटे किसानों को मजबूत बनाने और टेक्नोलॉजिकल साक्षरता के लिए परोदा कमेटी (2019) की सिफारिशों को मानना।</span></li>
</ul>
<p><strong>नए जमाने के किसानों को मजबूत बनाना</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">खेती में लगातार बदलाव सब्सिडी पर नहीं, बल्कि ज्ञान, स्किल और इनोवेशन पर निर्भर करता है। किसानों को जलवायु-सहिष्णु टेक्नोलॉजी अपनाने, उत्पादन में अलग-अलग तरह के बदलाव लाने और आधुनिक वैल्यू चेन से जुड़ने के लिए तैयार रहना चाहिए। मशीनीकरण, लॉजिस्टिक्स, फूड प्रोसेसिंग और मार्केटिंग में एग्री-स्टार्टअप पहले से ही पढ़े-लिखे युवाओं को इज्जत, मुनाफा और मकसद देकर अपनी ओर खींच रहे हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कृषि विज्ञान केंद्रों (KVKs) पर बनी उच्चस्तरीय समिति (2014), जिसकी अध्यक्षता डॉ. आरएस परोदा ने की थी, ने सभी 731 केवीके और 691 एटीएमए केंद्रों को &ldquo;नॉलेज-</span><span style="font-weight: 400;">स्किल-इनोवेशन हब&rdquo; में बदलने का सुझाव दिया था।</span><span style="font-weight: 400;"> कृषि </span><span style="font-weight: 400;">में युवाओं को उत्साहित करने और आकर्षित करने पर वर्कशॉप (MAYA) में इन सुधारों का भी प्रस्ताव रखा गया:</span></p>
<ul>
<li><span style="font-weight: 400;"> कृषि पाठ्यक्रम में बदलाव।</span></li>
<li><span style="font-weight: 400;"> आंत्रप्रेन्योरशिप के लिए संस्थागत मदद।</span></li>
<li><span style="font-weight: 400;"> ICT, हाई-वैल्यू क्रॉप और सप्लाई चेन मैनेजमेंट में वोकेशनल ट्रेनिंग।</span></li>
</ul>
<p><span style="font-weight: 400;">विकसित भारत का विजन कृषि में डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) पर बहुत अधिक निर्भर है। डिजिटल सेवाओं से जुड़ी पहल पर्सनलाइज्ड सलाह सेवा, कर्ज तक पहुंच और मार्केट लिंकेज देंगी। इससे यह पक्का होगा कि टेक्नोलॉजी में तरक्की भारत के लाखों छोटे किसानों के लिए समावेशी और अमल के योग्य हो।</span></p>
<p><strong>खेती की पढ़ाई के बारे में नए सिरे से सोचना</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">भविष्य की खेती ज्ञान पर आधारित होगी, जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), बायोटेक्नोलॉजी, रोबोटिक्स, ड्रोन, ब्लॉक चेन और प्रिसिजन फार्मिंग से चलेगी। खेती को साइंस, इंजीनियरिंग, टेक्नोलॉजी और मैथ (STEM) विषयों के साथ जोड़ने से ऐसे इनोवेटर्स तैयार होंगे जो देश-दुनिया में मुकाबला करने वाले सॉल्यूशन बना सकें। हालांकि ऐसे बदलाव के लिए उच्च शिक्षा और रिसर्च के लिए अच्छी फंडिंग की जरूरत है, ताकि यह पक्का हो सके कि टेक्नोलॉजी आधारित खेती सबको साथ लेकर चलने वाली और टिकाऊ बनी रहे।</span></p>
<p><strong>कोऑपरेटिव को मजबूत बनाना</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">छोटे किसान अक्सर जागरूकता की कमी और सीमित वित्तीय संसाधनों के कारण टेक्नोलॉजी अपनाने में मुश्किल महसूस करते हैं। प्राइमरी एग्रीकल्चरल क्रेडिट सोसाइटी (PACS) को मजबूत करके और उन्हें फार्मर्स प्रोड्यूसर ऑर्गनाइजेशन (FPO) तथा सेल्फ-हेल्प ग्रुप (SHG) से जोड़कर कस्टम-हायरिंग के आधार पर कर्ज तक पहुंच, स्टोरेज और उपकरणों की सुविधा मिल सकती है। एक इंटीग्रेटेड प्रोडक्शन-टू-मार्केटिंग कोऑपरेटिव नेटवर्क किसानों के मुनाफे में काफी सुधार कर सकता है।</span></p>
<p><strong>भारतीय कृषि की पहचान की रक्षा</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">भारत को अपनी घरेलू खेती और फूड इंडस्ट्री की कुशलता और प्रतिस्पर्धी क्षमता को बेहतर बनाकर उनकी सुरक्षा करनी चाहिए। &ldquo;मेक इन इंडिया&rdquo; एग्री-ब्रांड को बढ़ावा देना और स्थानीय उत्पादों में कंज्यूमर का भरोसा जगाना सही दिशा में कदम है। आखिरकार, भारत की सफलता टैरिफ और नॉन-टैरिफ रुकावटों को तेजी से दूर करने, नीतिगत फ्रेमवर्क और इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाने तथा कृषि क्षेत्र को दुनिया भर में भरोसेमंद, प्रतिस्पर्धी और आत्मनिर्भर सिस्टम के तौर पर स्थापित करने की उसकी क्षमता पर निर्भर करेगी।</span></p>
<p><strong>आखिर में,</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">&ldquo;किसान प्रथम&rdquo; नीति सिर्फ एक नारा नहीं, यह भारत की खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण स्थिरता और देश की आजादी की नींव है। अमेरिका के व्यापारिक दबाव के आगे झुककर कपास, मक्का, सोयाबीन, डेयरी प्रोडक्ट्स, मीट वगैरह के लिए गेट खोलने से भारतीय किसानों पर बुरा असर पड़ सकता है, खासकर तब जब आत्मनिर्भरता की कोशिशें हो रही हों। इसके बजाय, मक्का और सोयाबीन जैसी जीएम फसलें उगाने के लिए पॉलिसी सपोर्ट से उत्पादन को बेहतर तरीके से और सस्ते में बढ़ाने में मदद मिलेगी। इससे हमारी खेती दुनिया भर में प्रतिस्पर्धी बनेगी। बीटी कॉटन की सफलता की कहानी इसका शानदार उदाहरण है। अच्छी तरह से प्लान की गई, समन्वित और दीर्घकालिक आयात-निर्यात नीति से भारत को बहुत फायदा होगा। लेकिन इसके लिए एक साहसिक नीतिगत माहौल और 'मेक इन इंडिया' इनोवेशन को तेजी से बढ़ाने के लिए एक मजबूत कोशिश की जरूरत होगी।</span></p>
<ul>
<li><em><span style="font-weight: 400;">डॉ. आर.एस. परोदा ट्रस्ट फॉर एडवांसमेंट ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (TAAS) के चेयरमैन, ICAR के पूर्व महानिदेशक और कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के पूर्व सचिव हैं।&nbsp;</span></em></li>
<li><em><span style="font-weight: 400;">डॉ. राम श्रीवास्तव, प्रोफेसर (रिटायर्ड), हरियाणा एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी; वे ट्रस्ट फॉर एडवांसमेंट ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (TAAS) में कंसल्टेंट भी हैं।</span></em></li>
</ul> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ ‘किसान प्रथम’ नीति ही होगी कृषि क्षेत्र में ट्रेड डील का आधार ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[उपभोक्ता केंद्रित नीतियों का खामियाजा भुगत रहे किसान, अधिकांश फसलों के दाम एमएसपी से नीचे]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/farmers-are-bearing-the-brunt-of-consumer-centric-policies-with-prices-of-most-crops-below-msp.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 20 Oct 2025 01:02:02 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/farmers-are-bearing-the-brunt-of-consumer-centric-policies-with-prices-of-most-crops-below-msp.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>सरकार द्वारा जीएसटी दरों में कटौती के चलते देश भऱ से जिस तरह की बंपर दिवाली की खबरें आ रही हैं वह किसानों के मामले में सही नहीं है। देश के कई हिस्सों में किसानों के लिए दिवाली फीकी साबित हो रही है क्योंकि कपास, मक्का, सोयाबीन, बाजरा, दालों और कई जगह धान के लिए किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के कम दाम पर अपनी फसल बेचनी पड़ रही है। सरकार की उपभोक्ता हितों पर केंद्रित नीतियों के चलते जहां देश में खाद्य तेलों, दालों और कपास का आयात बढ़ा है वहीं लगातार बेहतर मानसून के चलते बेहतर उत्पादन ने केंद्रीय पूल में खाद्यान्न भंडार में भारी बढ़ोतरी की है। खाद्य महंगाई दर गिरावट के रिकार्ड बना रही है जो अधिकांश कृषि उत्पादों के दाम में गिरावट के चलते ही संभव हुआ है। लेकिन यह स्थिति किसानों के साथ ही सरकार के लिए भी बहुत बेहतर नहीं है क्योंकि जिस तरह की कम कीमत का संकट किसान झेल रहे हैं उसे सरकार बहुत लंबे समय तक अनदेखा नहीं कर सकती है और यह स्थिति केंद्र की मोदी सरकार के लिए नई चुनौती बन सकती है।</p>
<p>बेहतर उत्पादन और कीमतों पर नियंत्रण के लिए उठाये गये कदमों का नतीजा है कि &nbsp;एक अक्तूबर, 2025 को केंद्रीय पूल में गेहूं का स्टॉक 320.30 लाख टन रहा जो बफर मानकों का डेढ़ गुना होने के साथ ही चार साल के उच्चतम स्तर पर है। खास बात यह है कि सरकार ने गेहूं के रिकॉर्ड उत्पादन के दावे के साथ ही गेहूं पर स्टॉक लिमिट लागू कर रखी है और उसका निर्यात 2022 से बंद है। वहीं चावल के मामले में स्थिति और बेहतर है एक अक्तूबर, 2025 को केंद्रीय पूल में चावल का स्टॉक 449.30 लाख टन था जो बफर मानक से 4.4 गुना था वहीं खरीफ सीजन में धान की बंपर फसल के चलते इसमें भारी बढ़ोतरी होने जा रही है क्योंकि नया सरकारी खरीद सीजन चल रहा है। धान की सरकारी खरीद पंजाब, हरियाणा, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में बेहतर होती है। वहीं छत्तीसगढ़ सरकार और उड़ीसा सरकार धान पर बोनस भी दे रही है। इसलिए जहां सरकारी खरीद की बेहतर व्यवस्था नहीं है वहां किसानों को धान का एमएसपी मिलने में दिक्कत आ रही है और उत्तर प्रदेश में इसके अधिक मामले आ रहे हैं।&nbsp;</p>
<p>लेकिन कपास के मामले में स्थिति धान जैसी नहीं है। देश के अधिकांश हिस्सों में कपास किसानों को एमएसपी से 1000 रुपये से 1500 रुपये प्रति क्विंटल तक कम कीमत पर ही अपनी फसल बेचनी पड़ रही है। चालू मार्केटिंग सीजन के लिए सरकार ने कपास की मीडियम स्टेपल किस्म ले लिए 7710 रुपये और लॉन्ग स्टेपल किस्म के लिए 8110 रुपये प्रति क्विंटल का एमएसपी तय किया है जबकि बाजार में किसानों को 6500 रुपये से 7100 रुपये प्रति क्विंटल की ही कीमत मिल रही है। इसकी बड़ी वजह सरकार द्वारा फसल के बाजार में आने के सीजन में भी शुल्क मुक्त कॉटन आयात की अनुमति को जारी रखना है और दिसंबर के अंत तक देश में करीब 50 लाख गांठ कॉटन का आयात होने का अनुमान है। घरेलू उत्पादन और आयात को मिलाकर कॉटन की देश में उपलब्धता खपत से करीब 30 लाख गांठ अधिक रहने का अनुमान है। जाहिर सी बात है कि किसानों के लिए कपास का एमएसपी मिलना एक चुनौती रहेगा।&nbsp;</p>
<p>वहीं सोयाबीन की किस्सा बड़ा दिलचस्प है। देश में पिछले साल करीब 17 अरब डॉलर का खाद्य तेल आयात हुआ और हम अपनी जरूरत का 60 फीसदी से ज्यादा खाद्य तेल आयात करते हैं। इसके बावजूद खरीफ सीजन में तिलहन की मुख्य फसल सोयाबीन के किसानों को चालू सीजन का एमएसपी तो मिलना दूर उन्हें पिछले साल के एमएसपी से भी कम दाम में अपनी फसल बेचनी पड़ रही है। मौसम की मार और फसल में बीमारी लगने से पिछले साल के मुकाबले उत्पादन में 16 फीसदी से अधिक गिरावट के बावजूद सोयबीन किसानों को 4100 रुपये से 4200 रुपये प्रति क्विंटल की कीमत पर ही अपनी फसल बेचनी पड़ रही है। चालू खरीफ मार्केटिंग सीजन लिए सोयाबीन का एमएसपी 5328 रुपयें प्रति क्विंटल है।&nbsp;</p>
<p>वहीं पिछले दो तीन साल में मक्का के लिए किसानों को बेहतर दाम मिला और यह एमएसपी से उपर भी बिकी क्योंकि एथेनॉल उत्पादन के लिए मक्का का उपयोग काफी बढ़ा और ग्रेन आधारित डिस्टीलरीज से इसकी मांग में काफी इजाफा हुआ। देश में पिछले सप्लाई साल में पेट्रोल में एथेनॉल की ब्लैंडिंग के लिए आपूर्ति किये गये एथेनॉल में सबसे अधिक हिस्सा मक्का से उत्पादित एथेनॉल का रहा। लेकिन अब स्थिति उलटती दिख रही क्योंकि सरकारी तेल विपणन कंपनियों ने जो एथेनॉल आपूर्ति निविदाएं नए साल के लिए मंगाई हैं उसमें जरूरत से कहीं अधिक आपूर्ति ऑफर आए हैं और उसके चलते ग्रेन आधारित एथेनॉल की आपूर्ति को कम किया जाएगा। वहीं मक्का का उत्पादन बढ़ाने के लिए किसानों ने इस रकबा करीब दस लाख हैक्टेयर बढ़ाकर 95 लाख हैक्टेयर पर पहुंचा दिया। लेकिन इसा किसानों को मक्का का 2400 रुपये प्रति क्विंटल का एमएसपी मिलने की बात तो दूर उन्हें हरियाणा और कर्नाटक जैसे राज्यों में 2000 रुपये से 2100 रुपये प्रति क्विंटल के दाम ही मिल रहे है जबकि मध्य प्रदेश में कीमतें 1500 रुपये प्रति क्विंटल से कम चल रही हैं।<br />बात केवल इन फसलों पर ही आकर नहीं रुक रही है। दालों पर हमारी आयात पर निर्भरता होने के बावजूद अधिकांश दालें अरहर, मूंग और उड़द जैसी दालों के दाम एमएसपी से नीचे चल रहे हैं। हालांकि सरकार ने हाल में दालों में आत्मनिर्भता मिशन लांच किया है और अगले पांच साल में दाल उत्पादन और उत्पादकता में बढ़ोतरी के महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखे हैं। लेकिन जब तक किसानों को उनकी फसल का वाजिब दाम नहीं मिेलेगा तब तक इस तरह के मिशन की कामयाबी को लेकर संदेह कायम रहेगा क्योंकि देश में दाल और तिलहन मिशन नब्बे के दशक में भी शुरू हुए थे लेकिन इन दोनों फसलों में हमारी आयात निर्भरता में भारी बढ़ोतरी हुई है।&nbsp;<br />खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता के लिए सरकार एक मिशन चला रहा है लेकिन जिस तरह से शुल्क दरों में कटौती कर सस्ते खाद्य तेलों के आयात का सहारा कीमतों पर नियंत्रण के लिए लिया गया है वह किसानों के लिए नुकसानदेह साबित हो रहा है।&nbsp;</p>
<p>सरकार ने उपभोक्ता हितों के संरक्षण के लिए जिस तरह के कदम उठाएं हैं उनके चलते उसने महंगाई दर पर अंकुश लगाने में कामयाबी जरूर हासिल कर ली है लेकिन इन नियंत्रण और आयात प्रोत्साहन के फैसलों ने किसानों के लिए मुश्किलें पैदा कर रही है उनको अपने अधिकांश उत्पादन एमएसपी से नीचे दाम पर बेचने पड़ रहे हैं। किसी एक उपज के मामले में सरकार स्थिति को अनदेखा कर सकती थी लेकिन मौजूदा स्थिति उसके लिए नई चुनौती लेकर आ रहा है ऐसे में अगर आने वाले दिनों में दालों, खाद्य तेलों और कपास जैसे उत्पादों के आयात को लेकर सरकार को अपनी नीति में बदलाव करना पड़ सकता है क्योंकि किसानों के लिए बेहतर दाम का माहौल उसे बनाना पड़ेगा क्योंकि किसानों की नाराजगी का राजनीतिक जोखिम सरकार उठाना नहीं चाहेगी।&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ उपभोक्ता केंद्रित नीतियों का खामियाजा भुगत रहे किसान, अधिकांश फसलों के दाम एमएसपी से नीचे ]]></media:description>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कोयले से उर्वरक बनाना इस क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने की कुंजी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/india’s-coal-advantage-turning-black-gold-into-food-security.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 06 Oct 2025 11:09:12 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/india’s-coal-advantage-turning-black-gold-into-food-security.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>दुनिया के कुछ सबसे बड़े कोयला भंडार (लगभग 378.2 अरब टन) के साथ भारत के पास एक ऐसा संसाधन है जिसे लंबे समय से जलवायु परिवर्तन का एक प्रमुख कारण माना जाता रहा है। लेकिन सही तकनीक के साथ, यह काला पत्थर देश की सबसे जरूरी चुनौतियों में से एक, उर्वरक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने की कुंजी साबित हो सकता है।<br />भारत का कोयला क्षेत्र तलचर के 38.65 अरब टन से लेकर झरिया के 19.4 अरब टन कोकिंग कोल तक फैला है। यह संसाधन अस्थिर वैश्विक बाजारों में घरेलू सुरक्षा कवच प्रदान करता है। वर्ष 2024-25 में कोयला उत्पादन 104.77 करोड़ टन तक पहुंच गया। एक समय इस संसाधन को इसके प्रदूषणकारी प्रभाव के लिए उपहास का पात्र बनाया जाता था, वहीं आज इसे रेजिलिएंस के एक आधार के रूप में फिर से परिकल्पित किया जा रहा है।</p>
<p><strong>उर्वरक: खाद्य सुरक्षा की कमजोर कड़ी</strong><br />दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा उर्वरक उपभोक्ता होने के बावजूद भारत दूसरों पर निर्भर है। किसानों का प्रिय यूरिया अब भी लगभग 20% आयात पर निर्भर है, डीएपी के मामले में निर्भरता 50-60% तक है। हमारी मिट्टी के लिए जरूरी पोषक तत्व, एमओपी का तो हम 100% आयात करते हैं। इस तरह उर्वरक के मामले में देश हर मोड़ पर असुरक्षित है।<br />लगभग 150 लाख टन उर्वरक की मांग घरेलू उत्पादन से पूरी नहीं हो पा रही है। इससे भी बदतर स्थिति यह है कि पोषक तत्व उपयोग की दक्षता मात्र 35-40% के आसपास है। बाकी पर्यावरण में नष्ट हो जाता है जिससे उत्सर्जन और मृदा क्षरण बढ़ता है। सरकार का सब्सिडी बिल 2023-24 में 1.88 लाख करोड़ रुपये था जो केंद्रीय बजट का लगभग 4% था। यह इस सच्चाई को उजागर करता है कि उर्वरक असुरक्षा अब केवल एक कृषि चुनौती नहीं, एक राष्ट्रीय संकट है।</p>
<p><strong>कोयले से उर्वरक: एक क्रांतिकारी बदलाव</strong><br />एक समाधान कोयले को उर्वरक के फीडस्टॉक में बदलना हो सकता है। कोयले को संश्लेषण गैस (सिनगैस) में गैसीकृत करके और फिर अमोनिया और यूरिया का उत्पादन करके, भारत आयात कम कर सकता है, सब्सिडी कम कर सकता है और किसानों को वैश्विक मूल्य के झटकों से बचाया जा सकता है।<br />तो इसमें बाधा क्या है? भारत के कोयले में राख की मात्रा अधिक होने के कारण पारंपरिक रूप से इसका गैसीकरण भरोसेमंद नहीं है। इसके लिए ट्रांसपोर्ट इंटीग्रेटेड गैसिफिकेशन (TRIG) का प्रयोग किया जा सकता है। यह अमेरिकी तकनीक है जिसे विशेष रूप से निम्न-श्रेणी और अधिक राख वाले कोयले के लिए डिजाइन किया गया है। भारत के लिए यह टेक्नोलॉजी न केवल उर्वरकों के लिए, बल्कि मेथनॉल, रसायन और स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन के लिए भी कोयले का उपयोग बढ़ा सकती है।<br />सरकार अगले एक दशक में सालाना 10 करोड़ टन कोयले को गैसीफाई करने के लिए चार लाख करोड़ रुपये निवेश की योजना पहले ही घोषित कर चुकी है। यह दुनिया के सबसे बड़े औद्योगिक बदलावों में से एक होगा।<br />&bull; भारत के लिए: इसका अर्थ है आत्मनिर्भर भारत को आगे बढ़ाना, मेक इन इंडिया मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देना, खाद्य सुरक्षा की दिशा में आगे बढ़ना और उच्च गुणवत्ता वाली नौकरियां पैदा करना।<br />&bull; अमेरिका के लिए: इसका अर्थ है प्रौद्योगिकी लाइसेंसिंग और संयुक्त उद्यम, जो गैसीफिकेशन में नवाचार के क्षेत्र में अग्रणी के रूप में उसकी भूमिका को और मजबूत करेगा।</p>
<p>कोयला लंबे समय से अंतर्राष्ट्रीय वार्ताओं में मतभेद का कारण रहा है। इसे अक्सर एक उज्जवल और स्वच्छ भविष्य की राह में एक बाधा के रूप में देखा जाता है। लेकिन अब एक नई सुबह आ रही है जो हमारे दृष्टिकोण को बदल सकती है। &lsquo;कोयले से उर्वरक तक&rsquo; का अर्थ केवल रसायनों और ऊर्जा तक सीमित नहीं; यह आशा और संभावना की क्रांति है।<br />कल्पना कीजिए जब कोयले का उपयोग बोझ के रूप में नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा के उत्प्रेरक के रूप में किया जाएगा, तो इसका कितना गहरा प्रभाव पड़ेगा। भारत में इसके विशाल भंडार को अमेरिकी नवाचार की असीम क्षमता से जोड़ा जा सकेगा। यह इंजीनियरिंग से कहीं बढ़कर है। यह ऐसा गठबंधन होगा जो राष्ट्रों को जोड़ेगा, किसानों का उत्थान करेगा, उद्योगों को सशक्त बनाएगा और सीमा पार श्रमिकों के सम्मान की रक्षा करेगा।<br />भारत का कोयला टिकाऊ कृषि का अप्रत्याशित आधार और सुदृढ़ मित्रता का प्रतीक बनने की असाधारण क्षमता रखता है। यह परिवर्तन की एक कहानी हो सकती है, जहां विज्ञान विश्वास का मार्ग प्रशस्त करता है, और बाधाएं साझा प्रगति तथा आशा के बंधन में परिणत होती हैं। यह टिकाऊ कृषि और एक मजबूत अमेरिका-भारत गठबंधन की आधारशिला है।</p>
<p><em>(डॉ. राणा उर्वरक एवं पौध पोषण विशेषज्ञ, &nbsp;CIMMYT, IRRI, ICRISAT के सलाहकार हैं। डॉ. पद्मा शांति जगदभि बायोएनर्जी विशेषज्ञ, फिनलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ युवास्किला से बायोएनर्जी में पीएचडी हैं। यहां व्यक्त विचार लेखकों के हैं)&nbsp;</em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ कोयले से उर्वरक बनाना इस क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने की कुंजी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कृषि आय और पोषण बढ़ाने में मददगार हो सकते हैं कोल्ड रूम]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/cold-rooms-in-local-markets-securing-farmers-delivering-nutrition.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 29 Sep 2025 08:36:47 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/cold-rooms-in-local-markets-securing-farmers-delivering-nutrition.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा फल और सब्जी उत्पादक है। यहां बागवानी उत्पादन 2024-25 में रिकॉर्ड 36.77 करोड़ टन तक पहुंच गया। हालांकि फसल तैयार होने के बाद का नुकसान इस रिकॉर्ड को कमतर कर देता है। जिस क्षण किसी फल या सब्जी की कटाई-तुड़ाई होती है, उसी क्षण समय के साथ उसकी दौड़ शुरू हो जाती है। अपर्याप्त भंडारण, परिवहन और रखरखाव के कारण हर फसल का 16 प्रतिशत से अधिक हिस्सा बाजार पहुंचने से पहले ही नष्ट हो जाता है। नतीजतन किसानों को अक्सर उसे औने-पौने दामों पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ता है। कोल्ड स्टोरेज की कमी का सबसे ज्यादा असर छोटे और सीमांत किसानों पर पड़ता है। भारत के 86 प्रतिशत किसान पहले से ही गरीबी और कर्ज से जूझ रहे हैं।</p>
<p>वर्ष 2020 और 2022 के बीच उचित कोल्ड स्टोरेज सुविधाओं के अभाव के कारण भारत को हर साल अनुमानित 1.53 लाख करोड़ रुपये (18.5 अरब अमेरिकी डॉलर) का नुकसान हुआ। मौजूदा कोल्ड चेन इन्फ्रास्ट्रक्चर का 90-95% हिस्सा निजी कंपनियों के स्वामित्व में है, लेकिन ज्यादातर भारतीय किसान इन सुविधाओं का खर्च वहन नहीं कर सकते। विडंबना यह है कि भारत में बड़े कोल्ड चेन की परिचालन लागत लगभग 60 डॉलर प्रति घन मीटर प्रति वर्ष है। यह पश्चिमी देशों की तुलना में लगभग दोगुनी है। सार्वजनिक वित्त पोषित अधिकतर कोल्ड चेन सुविधाएं पुरानी हैं और अपर्याप्त कनेक्टिविटी से जूझ रही हैं। इसलिए उनका पूरा इस्तेमाल नहीं हो पाता है। जब-तब कटने वाली बिजली और बैकअप जनरेटर की आवश्यकता लागत को और बढ़ा देती है।</p>
<p>आर्थिक विकास महानगरीय केंद्रों से जुड़ा है, जहां सेवा क्षेत्र की नौकरियों के साथ श्रम बाजार सघन होते हैं। इनके अलावा छोटे-मझोले शहरों, खेतों और कृषि लॉजिस्टिक्स व प्रसंस्करण केंद्रों का संयोजन भी है। यहां स्थानीय आबादी खेती के साथ मैन्युफैक्चरिंग, व्यापार, परिवहन और लॉजिस्टिक्स गतिविधियों में भी शामिल होती है। महानगरों में खाद्य आपूर्ति श्रृंखलाएं आम तौर पर बड़ी कंपनियां चला रही हैं। लेकिन जिन जिलों में नई मांग निकल रही है, वहां इस तरह की सेवा का अभाव है।</p>
<p><strong>कोल्ड रूम नेटवर्क में निवेश&nbsp;</strong><br />एकीकृत क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था का लाभ उठाने के लिए भारत हाइपर-लोकल कोल्ड रूम नेटवर्क में निवेश कर सकता है, जिनका संचालन बिजनेस के रूप में हो। यह मौजूदा नेटवर्क का व्यवस्थित रूप से विस्तार करेगा। उदाहरण के तौर पर ऑपरेशन फ्लड के माध्यम से बना कोल्ड चेन इन्फ्रास्ट्रक्चर, 1974 से दिल्ली में मदर डेयरी और सफल बूथ और अन्य राज्य-विशिष्ट फ्रेंचाइजी को लिया जा सकता है।&nbsp;</p>
<p>कोल्ड रूम नेटवर्क किसानों और किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) को क्षेत्रीय बाजारों तक पूर्ण और सीधी पहुंच प्रदान करेगा, साथ ही स्थानीय उपभोक्ताओं को ताजा और पौष्टिक भोजन की आपूर्ति करेगा। उचित तापमान बनाए रखने पर कोल्ड रूम फसल के पोषक तत्वों और ताजगी को संरक्षित रखते हैं। यह सुनिश्चित होता है कि उपभोक्ताओं, विशेष रूप से कम आय वाले परिवारों को पौष्टिक उत्पाद मिलें। यह सीधे तौर पर भारत के कुपोषण के साथ-साथ खाद्य अधिशेष के विरोधाभास की समस्या का समाधान करता है (हम ग्लोबल हंगर इंडेक्स पर 127 में से 105वें स्थान पर हैं)।</p>
<p>सौर ऊर्जा से चलने वाले 5 से 30 मीट्रिक टन क्षमता के कोल्ड रूम, जिन्हें ग्रामीण-शहरी या रूर्बन बुनियादी ढांचा माना जाता है, किसान और विक्रेता को बाजार के जोखिम से बचा सकते हैं। इससे किसान अपनी उपज का सर्वोत्तम मूल्य प्राप्त करने के लिए समय का इंतजार कर सकते हैं, बजाय इसके कि वे फसल कटाई के बाद औने-पौने दाम में अपनी उपज बेच दें। कोल्ड रूम किसानों और एफपीओ के लिए घर-घर आपूर्ति और खाद्य प्रसंस्करण व्यवसायों में विविधता लाने के लिए एक मंच के रूप में काम कर सकते हैं। ये खुदरा मूल्य में उतार-चढ़ाव के प्रभाव और खाद्य महंगाई को कम करके ग्रामीण आय को भी बढ़ावा दे सकते हैं। इसके अतिरिक्त, ये कार्बन उत्सर्जन को कम करने और जलवायु परिवर्तन के प्रति लचीलापन बढ़ाने में मददगार साबित होंगे।</p>
<p><strong>कोल्ड रूम के सफल परीक्षण</strong><br />भारत के कई राज्यों में कोल्ड रूम का प्रायोगिक परीक्षण किया जा चुका है। वर्ष 2023 में बिहार सरकार को राज्य में 15 सौर ऊर्जा चालित कोल्ड स्टोरेज इकाइयां स्थापित करने के लिए यूएनडीपी और जापान सरकार का सहयोग प्राप्त हुआ था। इन इकाइयों के शुरू होने के बाद से करीब 5,000 महिलाएं इस तरह के समूहों में शामिल हो चुकी हैं। उन्होंने 300 टन उपज का भंडारण किया और लगभग 25,000 डॉलर मूल्य की उपज को खराब होने से बचाया है। मेघालय सरकार ने भी अपने बेसिन मैनेजमेंट और रिन्यूएबल ऊर्जा कार्यक्रमों के तहत कई स्थानों पर सौर ऊर्जा चालित कोल्ड रूम स्थापित किए हैं।</p>
<p>वर्ष 2021-22 में राउरकेला नगर निगम को ब्लूमबर्ग फिलैंथ्रोपीज के ग्लोबल मेयर चैलेंज से स्थानीय महिला विक्रेताओं और स्वयं सहायता समूहों के लिए मदद मिली। यह मदद स्थानीय बाजारों में 5 मीट्रिक टन क्षमता वाला सौर ऊर्जा चालित कोल्ड रूम स्थापित करने के लिए थी, ताकि किसानों की आजीविका में सुधार हो सके। पहले वर्ष खाद्य अपव्यय में 31 प्रतिशत की कमी आई, जबकि भाग लेने वाले किसानों की औसत आय में 26 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई। ये कोल्ड रूम 3 रुपये प्रति 15 किलोग्राम के न्यूनतम शुल्क पर संचालित होते हैं। इन्होंने आय के स्रोतों के विविधीकरण के जरिए स्वयं सहायता समूहों का राजस्व 62 प्रतिशत बढ़ाने में मदद की। इनसे विभिन्न संस्थानों और घरों में फलों और सब्जियों की थोक आपूर्ति सुनिश्चित की जा सकी। इसके परिणामों से उत्साहित होकर शहर में इस तरह के पांच और केंद्र स्थापित करने का निर्णय लिया गया है।</p>
<p>कोल्ड रूम आर्थिक विकास, किसानों की बेहतर आय और लचीली खाद्य प्रणाली जैसी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं में भारत की खाद्य आपूर्ति श्रृंखला को नए सिरे से परिभाषित करने का अवसर प्रदान करते हैं। कोल्ड रूम का व्यावहारिक अर्थशास्त्र छोटे और सीमांत किसानों को गुणवत्तापूर्ण छोटे कोल्ड स्टोरेज तक बेहतर पहुंच प्रदान करने के उपयुक्त है। यह उन्हें बाजारों से जोड़ता है। उन्नत एआई-संचालित कृषि-तकनीक और कृषि-वित्त समाधान भारत में व्यापक रूप से प्रचलित हुए हैं, लेकिन लघु-स्तरीय कृषि इन्फ्रास्ट्रक्चर उतना व्यापक नहीं हो पाया है। भारत बड़े पैमाने पर कोल्ड रूम के वित्तपोषण के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड, जलवायु और हरित निधि, इम्पैक्ट बांड, सार्वजनिक-निजी भागीदारी, कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) और नए खाद्य-प्रसंस्करण उद्यमों जैसे विभिन्न स्रोतों से धन जुटा सकता है।</p>
<p>कोल्ड रूम केवल रेफ्रिजरेटेड बॉक्स नहीं हैं, बल्कि लचीली खाद्य प्रणाली के सूक्ष्म केंद्र कहे जा सकते हैं, जो निरंतर गुणवत्तापूर्ण आपूर्ति, मूल्य में स्थिरता और स्थानीय व्यापार बढ़ाने में मदद करते हैं। ये सतत ग्रामीण-शहरी विकास के तत्व हैं, जो महिलाओं द्वारा संचालित स्वयं सहायता समूहों की आय में सुधार ला सकते हैं और कम आय वाले परिवारों को पोषण प्रदान कर सकते हैं। कोल्ड रूम दिखाते हैं कि कैसे छोटा सा बुनियादी ढांचा भारतीय किसानों की किस्मत बदल सकता है।&nbsp;</p>
<p><em>(दोनों लेखिका इंफ्राविजन फाउंडेशन में रिसर्च एसोसिएट हैं। यहां व्यक्त विचार उनके निजी हैं।)</em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ कृषि आय और पोषण बढ़ाने में मददगार हो सकते हैं कोल्ड रूम ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[फसलों में पोषणः पोषक तत्व आपूर्ति के स्थायी स्रोत बन सकते हैं जैव उर्वरक]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/crop-nutrients-bio-fertilizers-as-a-potential-source-for-sustainable-nutrient-supply.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 28 Sep 2025 15:06:13 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/crop-nutrients-bio-fertilizers-as-a-potential-source-for-sustainable-nutrient-supply.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) नई दिल्ली के माइक्रोबायोलॉजी डिवीजन, अन्य आईसीएआर संस्थानों तथा राज्य कृषि विश्वविद्यालयों में जैव उर्वरकों (बायो फर्टिलाइजर) पर दशकों के शोध ने यह सिद्ध कर दिया है कि जैव उर्वरक फसलों के लिए नाइट्रोजन (N), फॉस्फोरस (P) और पोटाश (K) जैसे प्रमुख पोषक तत्वों की अनुशंसित मात्रा का 25% आसानी से स्थिर (फिक्स) या गतिशील कर सकते हैं। विभिन्न संस्थानों की तरफ से विकसित ऐसे प्रोडक्ट उत्पादन बढ़ाने के लिए सहज उपलब्ध हैं।</p>
<p>पोषक तत्वों की आपूर्ति में जैव उर्वरकों की क्षमता: सभी जैव उर्वरक प्रति हेक्टेयर 20-30 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रदान कर सकते हैं, उपज में 12-20% की वृद्धि कर सकते हैं और मिट्टी की उर्वरता में उल्लेखनीय सुधार कर सकते हैं। विशेष रूप से पूसा माइकोराइजा, 30-35% फास्फोरस की पूर्ति करके एक स्थायी समाधान प्रदान करता है। इससे रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता कम होती है और नर्सरी में उगाई जाने वाली फसलों से लेकर विविध फसलों तक, पर्यावरण-अनुकूल कृषि पद्धतियों को बढ़ावा मिलता है। इन जैव उर्वरकों के उपयोग से रासायनिक उर्वरकों की खपत में अनुमानित 10-25% की कमी संभव है, जिससे किसानों की लागत में उल्लेखनीय बचत होगी।</p>
<p><strong>क्या किया जाना चाहिए?</strong><br />1. &nbsp;जैव उर्वरकों को प्राकृतिक/जैविक खेती का अभिन्न अंग बनाया जाना चाहिए: प्राकृतिक/जैविक खेती में पोषक तत्वों की आपूर्ति बीजामृत, जीवामृत, घनजीवामृत आदि के रूप में सूक्ष्मजीवों की शक्ति का दोहन करने की धारणा पर आधारित है। हालांकि इनमें से कोई भी उत्पाद वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं है। इसके विपरीत, विभिन्न संस्थानों द्वारा विकसित जैव उर्वरक दशकों के शोध पर आधारित हैं और प्रकृति में उपलब्ध मिट्टी, गोबर और मूत्र आदि स्रोतों से प्राप्त सर्वाधिक प्रभावी सूक्ष्मजीवों का उपयोग करते हैं। इसलिए जैविक/प्राकृतिक खेती में इन जैव उर्वरकों का उपयोग कहीं अधिक प्रभावी होगा।<br />2. &nbsp;जैव उर्वरकों को अकार्बनिक कृषि प्रणाली का अभिन्न अंग बनाया जाना चाहिए: जैव उर्वरक पोषक तत्वों की 25% पूर्ति करने में सक्षम हैं, इसलिए उन्हें अकार्बनिक कृषि प्रणाली का भी अभिन्न अंग बनाया जाना चाहिए। अनुशंसाओं के बावजूद जैव उर्वरकों का व्यवहार में बड़े पैमाने पर उपयोग नहीं हुआ है।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/09/image_750x_68d7bc8731309.jpg" alt="" /></p>
<p>विभिन्न आईसीएआर संस्थानों और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों में शोध से तैयार कई जैव उर्वरक उपलब्ध हैं, जिनमें से कुछ का विवरण नीचे दिया गया है।</p>
<p><strong>पूसा जैव उर्वरक</strong><br />आईसीएआर-आईएआरआई, नई दिल्ली के माइक्रोबायोलॉजी डिवीजन का 1980 के दशक के आरंभ से जैव उर्वरक अनुसंधान एवं विकास में लंबा और विशिष्ट इतिहास रहा है। इस विभाग ने ठोस वाहक आधारित, सिंगल बैक्टीरियल इनोकुलेंट सहित जैव उर्वरकों की एक विस्तृत श्रृंखला के विकास में अग्रणी भूमिका निभाई है। इनमें दालों के लिए राइजोबियम, सब्जियों और अनाज के लिए एजोटोबैक्टर, अनाज और बाजरा के लिए एजोस्पिरिलम जैसे शुरुआती इनोवेशन शामिल हैं। इस विभाग ने धान की खेती के लिए विशेष रूप से डिजाइन किए गए साइनोबैक्टीरिया-आधारित जैव उर्वरक भी विकसित किए हैं।<br />पिछले कुछ वर्षों में इस विभाग ने विविध फसलों के लिए उपयुक्त बहु-सूक्ष्मजीव/बहु-पोषक, मल्टी-फंक्शनल, करियर-आधारित और तरल फॉर्मूलेशन तैयार करके उल्लेखनीय प्रगति की है। ये न केवल पौधों/उपज को मजबूत बनाते हैं, बल्कि स्थूल एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता भी बढ़ाते हैं। साथ ही, पौधों की वृद्धि और उपज को उल्लेखनीय रूप से प्रोत्साहित करते हैं। इसके प्रमुख उदाहरणों में बहु-पोषक तत्व प्रदान करने वाले उत्पाद शामिल हैं, जैसे:<br />1. &nbsp;पूसा सम्पूर्ण: एनपीके (नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटेशियम) प्रदान करने वाले लाभकारी सूक्ष्मजीवों का एक कंसोर्टियम।<br />2. &nbsp;पूसा बायोफर्ट: देसी बैक्टीरिया का एक कंसोर्टियम, साथ ही एजोस्पिरिलम, एजोटोबैक्टर के नए फॉर्मूलेशन और फास्फोरस, पोटेशियम तथा जिंक जैसे आवश्यक पोषक तत्वों को घुलनशील बनाने वाले फॉर्मूलेशन।<br />3. &nbsp;पूसा माइकोराइजा: पोषक तत्वों और पानी का अवशोषण बढ़ाने, मिट्टी की संरचना में सुधार करने और रोगों तथा पर्यावरणीय दिक्कतों के प्रति पौधों का लचीलापन बढ़ाने के लिए एक माइकोराइजल जैव उर्वरक।<br />4. &nbsp;पूसा साइनोन्यूट्रिकॉन, पूसा साइनोफोर्ट, पूसा साइनोबायोकॉन: फलियां, सब्जियां, कपास, गेहूं, मक्का जैसी विभिन्न फसलों में उपयोग के लिए नए मल्टी-फंक्शनल, साइनोबैक्टीरियल फॉर्मूलेशन भी विकसित किए गए हैं और विविध कृषि-पारिस्थितिकी में परीक्षण किया गया है। ये ऑर्गेनिक कार्बन में सुधार करते हैं, मिट्टी में नाइट्रोजन और सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता तथा पौधों में उनका स्थानांतरण बेहतर बनाते हैं, साथ ही प्रति हेक्टेयर 25-30 किलोग्राम नाइट्रोजन की बचत भी करते हैं।<br />तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय ने भी ऐसे कई उत्पाद तैयार किए हैं, जिनका विवरण नीचे दिया गया है।<br />इसी प्रकार अन्य आईसीएआर संस्थानों और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों के पास दशकों के अनुसंधान से विकसित जैव उर्वरकों की एक श्रृंखला है, जिनका उत्पादन संबंधित संस्थानों द्वारा छोटे पैमाने पर किया जा रहा है। इनमें से कुछ के उत्पादन के लिए छोटी कंपनियों को लाइसेंस भी दिया गया है।</p>
<p>बाधाएं: उचित मूल्य पर और आवश्यक मात्रा में गुणवत्तापूर्ण जैव उर्वरकों की अनुपलब्धता उनके उपयोग की प्रमुख बाधाएं हैं। इसका कारण यह है कि जैव उर्वरकों का उत्पादन और इनकी आपूर्ति मोटे तौर पर अवांछित लोगों के हाथों में रही है। उनके पास शोध आधारित जैव उर्वरकों की उत्पादन सुविधा नहीं है, उत्पादन, भंडारण और परिवहन की स्थिति और आपूर्ति श्रृंखला अच्छी तरह से विकसित नहीं है। अक्सर जैव उर्वरकों को बिना किसी गुणवत्ता नियंत्रण के सब्सिडी के तहत खरीदा जाता है और फिर इनकी आपूर्ति की जाती है। कई बार तो पैकेट में केवल राख (करियर) होती है जिसमें जीवित सूक्ष्मजीव नहीं होते। यह जैव उर्वरकों के प्रभावी न होने के सबसे महत्वपूर्ण कारणों में से एक रहा है।<br />क्या किया जाना चाहिए: सख्त गुणवत्ता नियंत्रण वाली छोटी कंपनियों के अलावा, एक समग्र आपूर्ति श्रृंखला के साथ जैव उर्वरकों के उत्पादन की प्रमुख जिम्मेदारी इफको, कृभको, एनएफएल, नागार्जुन फर्टिलाइजर्स जैसी प्रमुख उर्वरक कंपनियों को दी जानी चाहिए। यह अनिवार्य किया जाना चाहिए कि ये कंपनियां अपने कुल पोषक उत्पादन का 25% जैव उर्वरकों के रूप में उत्पादित करें। उन्हें इसके लिए अपने सीएसआर फंड का उपयोग करने की अनुमति दी जा सकती है।</p>
<p>प्रभाव: जैव उर्वरकों के उपयोग को बढ़ावा देने से रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में 25% की कमी आएगी और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन भी इसी अनुपात में कम होगा। भारत में कृषि से कुल नाइट्रोजन ऑक्साइड उत्सर्जन 3 लाख टन है, जिसमें से 20% सिंथेटिक उर्वरकों से होता है। जैव उर्वरकों के उपयोग से उत्सर्जन में 20% के 25% यानी 15,000 टन नाइट्रोजन ऑक्साइड की कमी आएगी, साथ ही किसानों की खेती की लागत भी कम होगी। जैव उर्वरकों के प्रति किसानों का विश्वास बढ़ाने के लिए उनके खेतों पर इन उत्पादों का बड़े पैमाने पर प्रदर्शन भी आवश्यक है।&nbsp;<br /><em>(लेखक भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के पूर्व निदेशक हैं। लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं)</em></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/09/image_750x500_68d7bc843e462.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ फसलों में पोषणः पोषक तत्व आपूर्ति के स्थायी स्रोत बन सकते हैं जैव उर्वरक ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[पर्यावरण अनुकूल खेती और अधिक उत्पादकता सुनिश्चित करने में मददगार बायोस्टिमुलेंट]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/beyond-myths-building-sustainable-farming-in-india.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 25 Sep 2025 16:56:57 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/beyond-myths-building-sustainable-farming-in-india.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><!--StartFragment --></p>
<p class="pf0"><span class="cf0">बायोस्टिमुलेंट</span><span class="cf0"> इन दिनों गलत कारणों से चर्चा में हैं। नियामक के बढ़ते दबाव और </span><span class="cf0">फंडिंग</span><span class="cf0"> में कमी ने किसानों, कंपनियों और नीति निर्माताओं के सामने जवाबों से ज्यादा सवाल खड़े कर दिए हैं। कुछ के लिए ये चमत्कारी इलाज हैं, तो कुछ के लिए </span><span class="cf0">मार्केटिंग</span><span class="cf0"> का दिखावा। फिर भी इस शोर के पीछे एक साधारण सी सच्चाई छिपी है- </span><span class="cf0">बायोस्टिमुलेंट</span><span class="cf0"> कोई रामबाण इलाज नहीं हैं। ये व्यावहारिक, विज्ञान-आधारित </span><span class="cf0">टूल</span><span class="cf0"> हैं जो किसानों की क्षमता बढ़ाने, पोषक तत्वों के उपयोग की दक्षता में सुधार लाने और उत्पादों के कार्बन </span><span class="cf0">फुटप्रिंट</span><span class="cf0"> को कम करने में मदद कर सकते हैं।</span></p>
<p class="pf0"><span class="cf0">इस लेख में यह समझाने का प्रयास किया गया है कि </span><span class="cf0">बायोस्टिमुलेंट</span><span class="cf0"> क्या हैं, उनकी श्रेणियां, सक्रिय तत्व, </span><span class="cf0">नवाचार</span><span class="cf0">, भारत में उनका उपयोग, बाजार की संभावनाएं क्या हैं। यह सभी को स्वयं उत्तर खोजने के लिए कुछ दिशा प्रदान करता है।</span></p>
<p class="pf0"><strong><span class="cf0">बायोस्टिमुलेंट</span><span class="cf0"> क्या हैं?</span></strong></p>
<p class="pf0"><span class="cf0">बायोस्टिमुलेंट</span><span class="cf0"> कोई नई बात नहीं है। इनके उपयोग का एक लंबा और समृद्ध इतिहास है। </span><span class="cf0">मध्यकालीन</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">आयरलैंड</span><span class="cf0">, </span><span class="cf0">नॉरमैंडी</span><span class="cf0"> और चैनल द्वीप समूह में 12वीं शताब्दी से ही सूखे समुद्री शैवाल, जिसे </span><span class="cf0">अक्सर</span><span class="cf0"> "</span><span class="cf0">रैक</span><span class="cf0">" कहा जाता है, के उपयोग का वर्णन मिलता है। इसका उपयोग खेतों में मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के लिए किया जाता था, खासकर पोषक तत्वों की कमी वाली मिट्टी पर। आधुनिक समय में 1947 में </span><span class="cf0">मैक्सीक्रॉप</span><span class="cf0"> कंपनी ने पहला औद्योगिक तरल समुद्री शैवाल उर्वरक पेश किया, जिससे कृषि में समुद्री शैवाल-आधारित </span><span class="cf0">बायोस्टिमुलेंट</span><span class="cf0"> की औपचारिक शुरुआत हुई।</span></p>
<p class="pf0"><span class="cf0">पौधों और </span><span class="cf0">मृदा</span><span class="cf0"> स्वास्थ्य में सुधार के लिए पंचगव्य, </span><span class="cf0">जीवामृत</span><span class="cf0">, </span><span class="cf0">बीजामृत</span><span class="cf0"> जैसे </span><span class="cf0">पादप</span><span class="cf0"> और </span><span class="cf0">सूक्ष्मजीवी</span><span class="cf0"> मिश्रणों का उपयोग भारत में कोई नई बात नहीं है। </span><span class="cf0">सुरपाल</span><span class="cf0"> (लगभग 10वीं शताब्दी ई.) द्वारा रचित </span><span class="cf0">वृक्षायुर्वेद</span><span class="cf0"> बीज के चयन, </span><span class="cf0">मृदा</span><span class="cf0"> की तैयारी, सिंचाई और पोषण सहित </span><span class="cf0">पादप</span><span class="cf0"> जीवन का एक समग्र दृष्टिकोण प्रदान करता है। इसमें फसल स्वास्थ्य, "</span><span class="cf0">मृदा</span><span class="cf0"> को </span><span class="cf0">जागृत</span><span class="cf0"> करने" और "बीज शक्ति" में सुधार के लिए </span><span class="cf0">कुणापजला</span><span class="cf0"> का वर्णन किया गया है।</span></p>
<p class="pf0"><span class="cf0">उर्वरक नियंत्रण आदेश (</span><span class="cf0">एफसीओ</span><span class="cf0">) </span><span class="cf0">गाइडलाइंस</span><span class="cf0"> (2021) </span><span class="cf0">बायोस्टिमुलेंट</span><span class="cf0"> को ऐसे पदार्थ या </span><span class="cf0">सूक्ष्मजीवों</span><span class="cf0"> के रूप में परिभाषित करते हैं, जिनमें पोषक तत्व और </span><span class="cf0">कीटनाशक</span><span class="cf0"> शामिल नहीं हैं, जो पोषक तत्वों के अवशोषण, पोषक तत्वों के उपयोग की दक्षता, </span><span class="cf0">अजैविक</span><span class="cf0"> (</span><span class="cf0">एबायोटिक</span><span class="cf0">) </span><span class="cf0">स्ट्रेस</span><span class="cf0"> के प्रति सहनशीलता और फसल की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए प्राकृतिक </span><span class="cf0">पादप</span><span class="cf0"> प्रक्रियाओं को </span><span class="cf0">स्टिमुलेट</span><span class="cf0"> करते हैं। यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि ये सीधे कीटों को नियंत्रित नहीं करते या उर्वरक के रूप में कार्य नहीं करते हैं। इसके बजाय ये बेहतर प्रदर्शन के लिए </span><span class="cf0">पादप</span><span class="cf0"> और </span><span class="cf0">मृदा</span><span class="cf0"> विज्ञान के साथ मिलकर काम करते हैं।</span></p>
<p class="pf0"><strong><span class="cf0">एआई</span><span class="cf0"> (सक्रिय तत्व) आज और कल</span></strong></p>
<p class="pf0"><span class="cf0">जैविक उत्पाद तेजी से बढ़ रहे हैं और </span><span class="cf0">बायोस्टिमुलेंट</span><span class="cf0"> सबसे तेजी से बढ़ते क्षेत्रों में से एक हैं। जैसे-जैसे पौधों और </span><span class="cf0">मृदा</span><span class="cf0"> स्वास्थ्य का महत्व बढ़ रहा है, वैश्विक स्तर पर </span><span class="cf0">इनोवेशन</span><span class="cf0"> में तेजी आ रही है। हालांकि विशिष्ट </span><span class="cf0">बायोस्टिमुलेंट</span><span class="cf0"> पेटेंट के आंकड़े सीमित हैं, फिर भी </span><span class="cf0">एग्रीटेक</span><span class="cf0"> पेटेंट एक मजबूत </span><span class="cf0">परिदृश्य</span><span class="cf0"> प्रस्तुत करता है। अमेरिका अब भी इसमें अग्रणी बना हुआ है, लेकिन वहां वृद्धि दर धीमी होने लगी है, जबकि भारत और चीन में इनका तेजी से विकास हो रहा है। (</span><span class="cf0">डब्ल्यूआईपीओ</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">एग्रीफूड</span><span class="cf0"> टेक पेटेंट </span><span class="cf0">लैंडस्केप</span><span class="cf0"> रिपोर्ट)।</span></p>
<p class="pf0"><strong><span class="cf0">वर्तमान प्रमुख सक्रिय तत्व</span></strong></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">-</span><span class="cf0">समुद्री शैवाल के अर्क से </span><span class="cf0">पॉलीसैकेराइड</span><span class="cf0"> और </span><span class="cf0">हार्मोन</span></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">-</span><span class="cf0">प्रोटीन </span><span class="cf0">हाइड्रोलाइजेट</span><span class="cf0"> से </span><span class="cf0">अमीनो</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">एसिड</span><span class="cf0"> और </span><span class="cf0">पेप्टाइड</span></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">-</span><span class="cf0">मृदा</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">कार्बनिक</span><span class="cf0"> पदार्थों से </span><span class="cf0">ह्यूमिक</span><span class="cf0"> और </span><span class="cf0">फुल्विक</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">एसिड</span></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">-</span><span class="cf0">सूक्ष्मजीव</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">इनोक्युलेंट</span><span class="cf0"> (जैसे </span><span class="cf0">बैसिलस</span><span class="cf0">, </span><span class="cf0">ट्राइकोडर्मा</span><span class="cf0">, </span><span class="cf0">स्यूडोमोनास</span><span class="cf0">)</span></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">-</span><span class="cf0">पौधों</span><span class="cf0"> की प्रतिरक्षा के लिए </span><span class="cf0">चिटोसन</span></p>
<p class="pf0"><strong><span class="cf0">उभरती अगली पीढ़ी के सक्रिय तत्व</span></strong></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">-</span><span class="cf0">टारगेटेड</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">सिग्नलिंग</span><span class="cf0"> के साथ </span><span class="cf0">सेकंडरी</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">मेटाबोलाइट्स</span><span class="cf0"> (</span><span class="cf0">फेनोलिक्स</span><span class="cf0">, </span><span class="cf0">एल्कलॉइड</span><span class="cf0">, </span><span class="cf0">टेरपेनॉइड</span><span class="cf0">)</span></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">-</span><span class="cf0">विशिष्ट</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">पादप</span><span class="cf0"> रक्षा तरीकों को सक्रिय करने वाले </span><span class="cf0">पेप्टाइड</span></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">-</span><span class="cf0">मल्टी</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">स्ट्रेस</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">रेजिलिएंस</span><span class="cf0"> के लिए डिजाइन किए गए </span><span class="cf0">इंजीनियर्ड</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">माइक्रोबियल</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">कंसोर्टिया</span></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">-</span><span class="cf0">उपज में वृद्धि के लिए फसल-विशिष्ट </span><span class="cf0">सिग्नलिंग</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">मॉलीक्यूल</span><span class="cf0"> </span></p>
<p class="pf0"><span class="cf0">यह क्यों महत्वपूर्ण है: परिभाषित सक्रिय तत्वों की ओर बढ़ने से यांत्रिक स्पष्टता, अधिक सुसंगत परिणाम और नियामक स्वीकृति में आसानी होती है।</span></p>
<p class="pf0"><span class="cf0">भारत में </span><span class="cf0">बायोस्टिमुलेंट्स</span><span class="cf0"> की वृद्धि दर बेहद अच्छी है। जलवायु संबंधी मुद्दों, कार्बन </span><span class="cf0">फुटप्रिंट</span><span class="cf0"> और स्वच्छ एवं पौष्टिक भोजन की उपभोक्ता मांग के प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण इस वृद्धि को और बल मिलने की उम्मीद है। उच्च-मूल्य वाली </span><span class="cf0">बागवानी</span><span class="cf0"> फसलों के उत्पादक, जो अच्छी-गुणवत्ता वाली फसलें चाहते हैं, इन्हें सबसे तेजी से अपना रहे हैं। अन्य लोग पोषक तत्व-उपयोग दक्षता (</span><span class="cf0">एनयूई</span><span class="cf0">) में सुधार की आवश्यकता को देखते हुए इसे अपना रहे हैं।</span></p>
<p class="pf0"><strong><span class="cf0">इनोवेशन</span><span class="cf0"> के अवसर क्या हैं?</span></strong></p>
<p class="pf0"><span class="cf0">इनोवेशन</span><span class="cf0">-केंद्रित कंपनियां सक्रिय अवयवों के साथ-साथ </span><span class="cf0">फॉर्मूलेशन</span><span class="cf0"> की </span><span class="cf0">रीइमेजिंग</span><span class="cf0"> पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं। हम फिलहाल कम "बड़े दावों" और अधिक </span><span class="cf0">सटीकता</span><span class="cf0"> की उम्मीद कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, "अम्लीय मिट्टी में </span><span class="cf0">फॉस्फोरस</span><span class="cf0"> अवशोषण में 20% की वृद्धि" बनाम "पौधों की वृद्धि में सुधार"।</span></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">1. </span><span class="cf0">परिभाषित सक्रिय तत्व: कार्य के स्पष्ट तरीकों के साथ मानकीकृत </span><span class="cf0">मेटाबोलाइट</span><span class="cf0">-आधारित </span><span class="cf0">बायोस्टिमुलेंट</span><span class="cf0">।</span></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">2. </span><span class="cf0">हाइब्रिड</span><span class="cf0"> उत्पाद: </span><span class="cf0">सूक्ष्मजीवी</span><span class="cf0"> और </span><span class="cf0">बायोकेमिकल</span><span class="cf0"> सक्रिय तत्वों का संयोजन।</span></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">3. </span><span class="cf0">फसल और </span><span class="cf0">मृदा</span><span class="cf0">-विशिष्ट </span><span class="cf0">फॉर्मूलेशन</span><span class="cf0">: </span><span class="cf0">मृदा</span><span class="cf0"> स्वास्थ्य पर आधारित </span><span class="cf0">डेटा</span><span class="cf0">-संचालित </span><span class="cf0">पर्सनलाइजेशन</span><span class="cf0">।</span></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">4. </span><span class="cf0">डिजिटल</span><span class="cf0"> कृषि के साथ एकीकरण: सटीक खुराक के लिए </span><span class="cf0">बायोस्टिमुलेंट</span><span class="cf0"> के उपयोग को उपग्रह/</span><span class="cf0">आईओटी</span><span class="cf0"> आधारित निगरानी से जोड़ना।</span></p>
<p class="pf0"><strong><span class="cf0">किसानों और उपभोक्ताओं को क्या जानने की जरूरत है?</span></strong></p>
<p class="pf0"><span class="cf0">किसानों के लिए: </span><span class="cf0">बायोस्टिमुलेंट</span><span class="cf0"> अच्छे कृषि-विज्ञान का विकल्प नहीं हैं, वे केवल </span><span class="cf0">संवर्द्धक</span><span class="cf0"> हैं। न ही वे उर्वरकों या </span><span class="cf0">कीटनाशकों</span><span class="cf0"> की जगह लेने के लिए हैं। किसानों को प्रमाणित आंकड़ों के आधार पर उत्पादों का चयन करना चाहिए। </span><span class="cf0">बायोस्टिमुलेंट</span><span class="cf0"> के प्रकार को फसल और समस्या (</span><span class="cf0">स्ट्रेस</span><span class="cf0">, पोषक तत्वों का अवरोध, गुणवत्ता) के अनुसार चुनने की जरूरत है।</span></p>
<p class="pf0"><span class="cf0">उपभोक्ताओं के लिए: </span><span class="cf0">बायोस्टिमुलेंट</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">सिंथेटिक</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">इनपुट</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">लोड</span><span class="cf0"> को कम कर सकते हैं, जिससे संभावित रूप से खाद्य पदार्थों के </span><span class="cf0">पर्यावरणीय</span><span class="cf0"> प्रभाव को कम किया जा सकता है। वे </span><span class="cf0">डिफॉल्ट</span><span class="cf0"> रूप से "</span><span class="cf0">ऑर्गेनिक</span><span class="cf0">" नहीं होते, वे "</span><span class="cf0">बायोलॉजिकल</span><span class="cf0">" या "</span><span class="cf0">बायो</span><span class="cf0">-आधारित" होते हैं। ये दो अलग </span><span class="cf0">अवधारणाएं</span><span class="cf0"> हैं।</span></p>
<p class="pf0"><strong><span class="cf0">उद्योग के लिए क्या?</span></strong></p>
<p class="pf0"><span class="cf0">परिभाषित सक्रिय तत्वों के लिए यांत्रिक अनुसंधान एवं विकास में निवेश करें। अतिरेक दावों से बचें और मापने योग्य परिणामों पर ध्यान केंद्रित करें। बाजार और जलवायु परिवर्तनों से </span><span class="cf0">हेजिंग</span><span class="cf0"> के लिए </span><span class="cf0">पोर्टफोलियो</span><span class="cf0"> में विविधता लाएं। कृषि वैज्ञानिकों और डीलरों को मिट्टी और फसल की स्थिति के आधार पर </span><span class="cf0">बायोस्टिमुलेंट</span><span class="cf0"> की सिफारिश करने के लिए प्रशिक्षित करें। किसानों में विश्वास बनाने के लिए प्रमुख कृषि-</span><span class="cf0">क्लस्टर</span><span class="cf0"> में प्रदर्शनी लगाएं।</span></p>
<p class="pf0"><span class="cf0">निष्कर्षः</span><span class="cf0"> </span><span class="cf0">बायोस्टिमुलेंट</span><span class="cf0"> कोई </span><span class="cf0">हाइप</span><span class="cf0"> नहीं, ये किसानों के लिए एक जरूरी औजार हैं। आने वाले समय में वैश्विक स्तर पर </span><span class="cf0">नियामकीय</span><span class="cf0"> जरूरतें कड़ी होंगी, लेकिन यह कोई मौत की घंटी नहीं है। यह क्षेत्र धीरे-धीरे </span><span class="cf0">जेनरिक</span><span class="cf0">, "</span><span class="cf0">मी-टू</span><span class="cf0">" उत्पादों से आगे बढ़कर लक्षित, परिभाषित और उच्च-प्रभाव वाले समाधानों की ओर बढ़ेगा। किसानों के लिए ये कम लागत में उच्च उत्पादकता का मार्ग प्रस्तुत करते हैं। कृषि-</span><span class="cf0">इनपुट</span><span class="cf0"> उद्योग के लिए ये ऊंचे </span><span class="cf0">ग्रोथ</span><span class="cf0"> वाला विविधीकरण हैं। नीति निर्माताओं के लिए ये जलवायु, खाद्य सुरक्षा और </span><span class="cf0">सस्टेनेबिलिटी</span><span class="cf0"> के लक्ष्यों को प्राप्त करने का आवश्यक साधन हैं। </span></p>
<p class="pf0"><em><span class="cf0">(डॉ. रेणुका दीवान </span><span class="cf0">बायोप्राइम</span><span class="cf0"> की सह-संस्थापक और </span><span class="cf0">सीईओ</span><span class="cf0"> हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं)</span></em></p>
<p><!--EndFragment --></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/07/image_750x500_62da3bea00473.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ पर्यावरण अनुकूल खेती और अधिक उत्पादकता सुनिश्चित करने में मददगार बायोस्टिमुलेंट ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[सहकारिता में सुधार: सुशासन, पारदर्शिता और समृद्धि की नई दिशा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/strengthening-cooperatives-in-india-key-reforms-governance-changes-and-the-road-ahead.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 23 Sep 2025 11:10:03 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/strengthening-cooperatives-in-india-key-reforms-governance-changes-and-the-road-ahead.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>संविधान के 97वें संशोधन अधिनियम, 2011 ने सहकारी समितियों को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया, जो 15 फरवरी 2012 से लागू हुआ। इसमें तीन प्रमुख प्रावधान किए गए। ये हैं: (क) संविधान के भाग III के अनुच्छेद 19(1)(ग) में &lsquo;सहकारी समितियां&rsquo; शब्द जोड़कर सहकारी समितियां बनाने के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाया गया, (ख) सहकारी समितियों को बढ़ावा देने के लिए राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत के रूप में संविधान के भाग IV में अनुच्छेद 43बी जोड़ा गया और (ग) सहकारी समितियों के गठन, नियमन और उन्हें बंद करने के प्रावधानों के साथ भाग IXबी मे &lsquo;सहकारी समितियां&rsquo; जोड़ा गया।&nbsp;</p>
<p>इसे कानूनी चुनौती का भी सामना करना पड़ा। गुजरात उच्च न्यायालय ने 22 अप्रैल 2013 के अपने फैसले में कहा कि संविधान (97वां) संशोधन अधिनियम, 2011 द्वारा अनुच्छेद 243जेडएच से 243जेडटी वाले भाग IXबी को सम्मिलित करना संविधान के अनुच्छेद 368(2) के कारण अधिकारों से परे है। इस अनुच्छेद के तहत संशोधन को ज्यादातर राज्य विधानसभाओं की मंजूरी आवश्यक है। फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया कि यह निर्णय संविधान (97वां) संशोधन अधिनियम, 2011 के अन्य भागों को प्रभावित नहीं करेगा। हालांकि, एक विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 20 जुलाई 2021 को अपने बहुमत निर्णय में माना कि भारत के संविधान का भाग IXबी केवल मल्टी-स्टेट सहकारी समितियों से संबंधित है। यह निर्णय मोदी सरकार द्वारा &lsquo;सहकार से समृद्धि&rsquo; के विजन को साकार करने के लिए 6 जुलाई 2021 को एक नए सहकारिता मंत्रालय के गठन के ठीक बाद आया।</p>
<p>नए मंत्रालय के गठन से सहकारी क्षेत्र में सुधारों पर ध्यान केंद्रित हुआ। सरकार की पहल समावेशी रही है और सहकारी समितियों के समूचे पारिस्थितिकी तंत्र को इसमें शामिल किया गया है। इसमें पैक्स (PACS) के लिए आदर्श उपनियम (मॉडल बायलॉज) बनाना भी शामिल है ताकि पारिस्थितिकी तंत्र का आधार मजबूत किया जा सके। यह एक उल्लेखनीय उपलब्धि है कि इन आदर्श उपनियमों को सभी राज्य सरकारों ने अपनाया है। राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 में भी फाउंडेशन को मजबूत बनाना पहला रणनीतिक मिशन स्तंभ है। इन सुधारों ने पैक्स को बहुद्देश्यीय व्यावसायिक संस्थाओं में बदलने की एक व्यवस्था प्रदान की। मंत्रालय पैक्स के दरवाजे तक उत्पादों (जैसे अनाज भंडारण, मेडिकल स्टोर, एलपीजी वितरण आदि) और सेवाओं (सीएससी, अतिरिक्त शाखाएं खोलना) का एक विविध पोर्टफोलियो लेकर आया। इस तरह उन्हें अपने गांवों की भौगोलिक सीमाओं से परे सोचने के लिए प्रेरित किया गया और उन्हें जीईएम (GEM) प्लेटफॉर्म पर लाकर तथा कई ई-बाजारों से जोड़कर संभावनाओं की एक नई दुनिया के साथ जोड़ा गया। नेशनल कोऑपरेटिव एक्सपोर्ट्स लिमिटेड (NCEL) और नेशनल कोऑपरेटिव ऑर्गेनिक्स लिमिटेड (NCOL) जैसे राष्ट्रीय फेडरेशन प्राथमिक समितियों के उत्पादों को वैश्विक बाजारों में भी ला सकते हैं।</p>
<p>इसके बाद मल्टी-स्टेट कोऑपरेटिव सोसायटीज एक्ट, 2002 में संशोधन के माध्यम से व्यापक सुधार किए गए, जिसे केंद्र सरकार ने 3 अगस्त 2023 को औपचारिक रूप से अधिसूचित किया। मल्टी-स्टेट कोऑपरेटिव सोसायटीज (संशोधन) एक्ट 2023 ने बहु-राज्य सहकारी समितियों में गवर्नेंस को मजबूत करने, पारदर्शिता बढ़ाने, जवाबदेही बढ़ाने और चुनावी प्रक्रिया में सुधार आदि के प्रावधान किए। बहु-राज्य सहकारी समिति नियम 2002 में भी संशोधन किया गया और संशोधित नियमों को 4 अगस्त 2023 को अधिसूचित किया गया। ये बदलाव सुधारों के प्रति सरकार की गहरी प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं। समय के साथ सहकारी समितियों में गवर्नेंस काफी कमजोर हो गया था। इसलिए इन सुधारों का मुख्य फोकस गवर्नेंस में सुधार और जवाबदेही लाना है ताकि सहकारी सदस्यों को अधिकतम लाभ मिल सके।</p>
<p><strong>सहकारी चुनाव प्राधिकरण का गठन सबसे बड़ा गवर्नेंस सुधार&nbsp;</strong><br />भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243के में विधि प्रदत्त किसी प्राधिकरण या निकाय द्वारा सहकारी चुनाव के संचालन में मतदाता सूची तैयार करने के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण के लिए प्राधिकरण की स्थापना की परिकल्पना की गई है। बहु-राज्य सहकारी समितियों के लिए एमएससीएस अधिनियम की धारा 45 के अंतर्गत एक सहकारी चुनाव प्राधिकरण (सीईए) की स्थापना गवर्नेंस में सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन रहा है। इस प्राधिकरण का गठन एक बड़ा परिवर्तनकारी कदम है। यह प्राधिकरण एक बहु-सदस्यीय निकाय है, जिसे बहु-राज्य सहकारी समिति अधिनियम के तहत पंजीकृत समितियों के चुनाव कराने का कार्य सौंपा गया है। इसकी भूमिका में सदस्यों की सटीक मतदाता सूची बनाए रखना और समय पर चुनाव सुनिश्चित करना शामिल हैं। पहले समितियां स्वयं चुनाव कराती थीं, जिनमें अक्सर पारदर्शिता का अभाव होता था। इस प्राधिकरण की शुरुआत के साथ यह प्रक्रिया कहीं अधिक पारदर्शी हो गई है। संशोधित अधिनियम ने बोर्ड में दो महिलाओं और एक अनुसूचित जाति/जनजाति के सदस्य के लिए आरक्षण का भी प्रावधान किया है। इससे निर्णय लेने की प्रक्रिया में सामाजिक समावेशन और कमजोर वर्ग की भागीदारी सुनिश्चित होती है।</p>
<p><strong>सहकारी समितियों में चुनाव में पारदर्शिता</strong><br />नई व्यवस्था के तहत प्रत्येक चुनाव कार्यक्रम को प्राधिकरण की वेबसाइट पर प्रकाशित किया जाता है। जिला कलेक्टर रिटर्निंग ऑफिसर नियुक्त किए जाते हैं, और उनके साथ एक या एक से अधिक सहायक रिटर्निंग ऑफिसर (एआरओ) होते हैं, जो राज्य सहकारी विभाग के अधिकारी होते हैं। कलेक्टर चुनाव संबंधी एक सूचना जारी करते हैं, जिसे समिति के कार्यक्षेत्र के समाचार पत्रों में भी प्रकाशित किया जाता है, ताकि सदस्यों को जानकारी मिल सके। इसके अतिरिक्त, चुनाव संबंधी सभी जानकारी समिति को अपनी वेबसाइट पर उपलब्ध करानी होती है। बहु-राज्यीय समितियों के सदस्य दो या तीन अलग-अलग राज्यों से संबंधित होते हैं, इसलिए पहले उन्हें अक्सर यह भी पता नहीं होता था कि चुनाव कब हो रहे हैं। यह पारदर्शी प्रक्रिया चुनाव में लोकतंत्र और भागीदारी को बढ़ावा दे रही है। प्राधिकरण की प्रमुख गतिविधियों पर प्रकाश डालने वाला एक मासिक नोट केंद्रीय रजिस्ट्रार की वेबसाइट (https://crcs.gov.in) पर भी उपलब्ध है।</p>
<p>कोऑपरेटिव सोसाइटी के बोर्ड का कार्यकाल पहले तीन से पांच वर्षों के बीच होता था, जिसे अब अधिनियम के तहत समान रूप से पांच वर्ष निर्धारित कर दिया गया है। यह एकरूपता बोर्ड के कामकाज में स्थिरता लाने और सुचारू बनाने में मदद करती है। एक और महत्वपूर्ण संशोधन यह है कि बोर्ड का कार्यकाल समाप्त होने के बाद वह अगला चुनाव होने तक बना नहीं रह सकता। इस तरह अब नए चुनाव अनिवार्य हो गए हैं। पहले कई समितियां कई वर्षों तक बिना चुनाव के काम कर रही थीं। कुछ सोसाइटी में तो आखिरी चुनाव नौ साल पहले हुए थे। अब चुनाव अनिवार्य हो जाने से जवाबदेही बढ़ी है। सदस्य अपने प्रबंधन से सवाल पूछने लगे हैं, जिससे शासन व्यवस्था में भी मजबूत आ रही है।</p>
<p><strong>अधिनियम के प्रावधानों को लागू करने में चुनौतियां</strong><br />इसमें तीन प्रमुख चुनौतियों का सामना करना पड़ा है:<br />(क) सोसाइटी के उपनियमों में संशोधन में देरी - जब 2023 में संशोधन अधिनियम लागू हुआ, तो सभी सोसाइटियों को छह महीने के भीतर उसके मुताबिक अपने उपनियमों में संशोधन करना आवश्यक था। लेकिन दो साल बाद भी कई सोसाइटियां ऐसा करने में विफल रही हैं। अनुपालन सुनिश्चित करना पहली बड़ी चुनौती है।<br />(ख) अधिकृत शेयर पूंजी - किसी सहकारी संस्था में सदस्यता के लिए शेयर धारण करना आवश्यक है। शेयरधारक ही मतदान कर सकते हैं या चुनाव लड़ सकते हैं। नॉमिनल सदस्य, जिनके पास शेयर नहीं भी हो सकते हैं, वे समिति की सेवाओं का लाभ तो उठा सकते हैं, ऐसे सदस्यों को चुनाव लड़ने और मतदान का अधिकार नहीं होता। दूसरे, सहकारिता के सिद्धांतों के अनुसार सदस्यों को समान रूप से योगदान देना और पूंजी को लोकतांत्रिक तरीके से नियंत्रित करना आवश्यक है। निर्धारित नियमों या स्थापित सिद्धांतों से अलग चलना कठिनाइयां पैदा करता है।<br />(ग) उपनियमों में अस्पष्टताएं - कई समितियों के उपनियमों में निम्नलिखित महत्वपूर्ण पहलुओं पर स्पष्टता का अभाव है:<br />(i) निर्वाचित होने वाले निदेशकों की संख्या: कुछ उपनियमों में न्यूनतम सात और अधिकतम 21 निदेशकों की अनुमति है। उपनियमों में निदेशकों की संख्या की एक रेंज बताने वाले ऐसे प्रावधान चुनावों के दौरान जटिलताएं पैदा करते हैं, क्योंकि चुनाव अधिसूचना में एक निश्चित संख्या की आवश्यकता होती है। ऐसी अस्पष्टताओं को दूर करने के लिए ऐसे उपनियमों में संशोधन आवश्यक है।<br />(ii) निदेशक पद के लिए पात्रता: निर्वाचन अधिकारियों द्वारा नामांकन को अनावश्यक रूप से अस्वीकार किए जाने से बचने के लिए चुनाव लड़ने के स्पष्ट मानदंड या योग्यताएं निर्दिष्ट की जानी चाहिए।<br />(iii) निर्वाचन क्षेत्र का गठन और मतदान प्रक्रियाएं: यदि इन्हें स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया या निर्वाचन क्षेत्र का गठन न्यायसंगत नहीं है, तो चुनाव के दौरान विवाद उत्पन्न हो सकते हैं। ये प्रावधान स्पष्ट होने चाहिए, क्योंकि निर्वाचन अधिकारी अक्सर ऐसे प्रश्न उठाते हैं जिनका उत्तर समितियां संतोषजनक ढंग से नहीं दे पाती हैं।<br />(iv) न्यूनतम स्तर के उत्पादों या सेवाओं का उपयोगः सदस्यों के लिए न्यूनतम स्तर की सेवाओं का लाभ उठाना आवश्यक है। इसे स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट किया जाना चाहिए क्योंकि इसकी अवहेलना करने पर समिति की सदस्यता समाप्त हो सकती है। कई उपनियमों में अक्सर इसका अभाव देखा गया है।<br />(घ) &nbsp;चुनाव अनुरोध प्रस्तुत करने में देरी - बोर्ड के कार्यकाल की समाप्ति से छह महीने पहले चुनाव अनुरोध प्रस्तुत करना सोसाइटी के सीईओ और चेयरमैन की संयुक्त जिम्मेदारी है। लेकिन अक्सर इसमें देरी हो जाती है, जिससे चुनाव प्रक्रिया पूरी न होने के कारण बोर्ड के न होने की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। कई मामलों में केंद्रीय रजिस्ट्रार को आम सभा की वार्षिक आम बैठक (एजीएम) बुलाने के लिए हस्तक्षेप करना पड़ता है। किसी सदस्य की मृत्यु, इस्तीफा, अयोग्यता या बोर्ड से हटाए जाने या अन्य किसी कारण से होने वाली आकस्मिक रिक्ति की स्थिति में सीईओ से अपेक्षा की जाती है कि वह एक सप्ताह के भीतर प्राधिकरण को सूचित करें। जवाबदेही तय करने के लिए ऐसी समय-सीमा निर्धारित की गई है।</p>
<p><strong>चुनाव संचालन में प्रगति</strong><br />11 मार्च 2024 को सहकारी चुनाव प्राधिकरण (सीईए) की अधिसूचना जारी होने के बाद से लगभग 160 चुनाव सफलतापूर्वक संपन्न हो चुके हैं, जबकि लगभग 60 समितियों में चुनाव अभी जारी हैं। अनुमान है कि आने वाले समय में प्राधिकरण को एक वर्ष में 250-300 समितियों के चुनाव कराने पड़ सकते हैं। हालांकि प्राधिकरण के बारे में सदस्यों में जागरूकता लगातार बढ़ रही है। चुनाव संचालन के लिए आवश्यक विवरण और फैक्टशीट प्रदान करने के लिए समितियों से पत्रों और ईमेल के माध्यम से संपर्क किया जा रहा है। इन सुधारों से गवर्नेंस में उल्लेखनीय सुधार होने की उम्मीद है।</p>
<p><strong>सहकारिता में पेशेवरों की आवश्यकता</strong><br />सहकारिता क्षेत्र को सही कौशल और दृष्टिकोण वाले पेशेवरों की आवश्यकता है। कॉरपोरेट व्यवस्थाओं के विपरीत, सहकारिता में सहयोग और सामूहिक विकास की भावना की आवश्यकता होती है। इस मानसिकता को पोषित करने के उद्देश्य से समर्पित पेशेवर तैयार करने के लिए सरकार ने त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय की स्थापना की है। कोऑपरेटिव मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट के फैकल्टी सदस्यों को भी प्रशिक्षण की आवश्यकता है। सोसाइटी के सचिवों, कोषाध्यक्षों, निदेशकों और पदाधिकारियों के लिए गहन प्रशिक्षण का प्रस्ताव रखा गया है। उदाहरण के लिए, प्रत्येक निदेशक को अपनी जिम्मेदारियों को बेहतर ढंग से समझने के लिए अनिवार्य रूप से 15-दिवसीय इंडक्शन कार्यक्रम से गुजरना होगा।</p>
<p>सहकारी संरचना के सभी स्तरों के लिए प्रशिक्षण अब आवश्यक है ताकि लोगों में अवसरों की उचित व्यावसायिक समझ हो, सफलता के लिए उचित मार्गदर्शन मिले और सहकारी व्यवसायों का सफल प्रबंधन सुनिश्चित हो सके। पैक्स का डिजिटलीकरण और डेटा को एक ही प्लेटफॉर्म पर स्थानांतरित करने से दक्षता आती है, लेकिन साइबर सुरक्षा के पहलुओं से निपटने और उचित सुरक्षा उपाय बनाने आदि के लिए मैनपावर की आवश्यकता हो सकती है।</p>
<p>निर्यात में बढ़ती रुचि के साथ सहकारी समितियां भी इस दिशा में आगे बढ़ रही हैं। हालांकि, निर्यात के लिए कड़े अंतरराष्ट्रीय मानकों और निर्यात प्रोटोकॉल का ज्ञान आवश्यक है। उदाहरण के लिए, यदि केले या आम का निर्यात करना है तो सहकारी समिति को आयातक देश की फाइटो-सैनिटरी आवश्यकताओं को समझना होगा और उसके अनुसार कृषि पद्धतियां अपनानी होंगी। त्रिभुवन विश्वविद्यालय के विशेष पाठ्यक्रम इस प्रकार का प्रशिक्षण प्रदान कर सकते हैं। सहकारी बैंकिंग और ऋण समितियों को जोखिम प्रबंधन, नकदी प्रवाह प्रबंधन और अधिशेष निधि के निवेश में भी विशेषज्ञता की आवश्यकता है। इसके लिए राज्यों के सभी सहकारी संस्थानों को एक छत्र के नीचे आना होगा, विश्वविद्यालय से संबद्ध होना पड़ेगा, मानक पाठ्यक्रमों का पालन करना होगा और देश भर में एक समान कौशल विकास प्रणाली स्थापित करनी होगी।</p>
<p><strong>सहकारिता को एक नई दिशा</strong><br />एक समय ऐसा भी था जब सहकारिता के विकास की गति काफी धीमी पड़ गई थी। हालांकि नए मंत्रालय के गठन के साथ, प्रधानमंत्री और सहकारिता मंत्री के नेतृत्व में, कम समय में ही बहुत प्रगति हुई है। सहकारिता क्षेत्र को अब नई दिशा और गति मिली है। साथ ही, सदस्यों की अपेक्षाएं भी बढ़ी हैं। सहकारी समितियों में सकारात्मकता की भावना बढ़ रही है और सदस्यों को विश्वास है कि वे और भी बड़े लक्ष्य हासिल कर सकते हैं। मुख्य ध्यान आर्थिक विकास पर है। यदि सहकारी सदस्यों की आय में मामूली वृद्धि भी हो सके तो यह राष्ट्र की प्रगति में एक बड़ा योगदान होगा।&nbsp;<br /><em>(लेखक कोऑपरेटिव इलेक्शन अथॉरिटी के चेयरपर्सन हैं। यहां व्यक्त विचार निजी हैं)</em></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/06/image_750x500_62bc42e923bbe.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ सहकारिता में सुधार: सुशासन, पारदर्शिता और समृद्धि की नई दिशा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[अमेरिकी टैरिफ पर बातचीत की प्रक्रिया फिर शुरू, क्या टैरिफ भारतीय कृषि में बदलाव लाएंगे?]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/talks-begin-on-us-tariffs-will-tariffs-upend-indian-agriculture.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 21 Sep 2025 16:27:03 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/talks-begin-on-us-tariffs-will-tariffs-upend-indian-agriculture.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने फरवरी में अपनी तथाकथित &lsquo;निष्पक्ष (फेयर) और पारस्परिक (रेसिप्रोकल)&rsquo; टैरिफ योजना शुरू करने के लिए मेमोरेंडम पर हस्ताक्षर किए, तो भारतीय नीति निर्माताओं को डर था कि इसका सबसे बड़ा खमियाजा कृषि क्षेत्र को भुगतना पड़ेगा। छह महीने बाद ये आशंकाएं सच साबित हो रही हैं। भारतीय कृषि उत्पादों पर टैरिफ अब 50 प्रतिशत तक हो गया है, जिससे झींगा, चावल, फल और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का निर्यात अचानक खतरे में पड़ गया है। ये उत्पाद अमेरिका के साथ भारत के 3.4 अरब डॉलर के कृषि सरप्लस का मुख्य हिस्सा रहे हैं।</p>
<p>भारत के किसान देश के कार्यबल का 40 प्रतिशत से भी ज्यादा हिस्सा हैं। उनके लिए इस टैरिफ के परिणाम तटीय समुद्री खाद्य के हब से लेकर देश के विभिन्न हिस्सों के चावल उत्पादक क्षेत्र तक को प्रभावित कर सकते हैं। इससे कीमतों में गिरावट, आय में कमी और ग्रामीण क्षेत्रों में नौकरियां कम हो सकती हैं। भारतीय अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंध अनुसंधान परिषद (इक्रियर) की एक नई रिपोर्ट में इसे लेकर चेतावनी दी गई है, "अमेरिका को भारत का कृषि निर्यात तेजी से कम हो सकता है और ट्रेड सरप्लस समाप्त हो सकता है।"</p>
<p><strong>सिकुड़ता अमेरिकी बाजार</strong></p>
<p>अनेक वर्षों से भारतीय कृषि उत्पाद अपेक्षाकृत कम टैरिफ पर अमेरिकी बाजार को निर्यात किए जाते रहे हैं। अमेरिका को भारत का सबसे बड़ा कृषि निर्यात झींगे (श्रिंप) का रहा है, और इस पर कोई शुल्क नहीं लगता था। चावल, शहद और पौधों के अर्क पर भी टैरिफ की दर न्यूनतम रही है।</p>
<p>लेकिन पारस्परिक शुल्क (रेसिप्रोकल टैरिफ) की नीति ने इस समीकरण को बदल दिया है। वियतनाम और थाईलैंड ने अमेरिका के साथ कम व्यापार बाधाओं वाले और सक्रिय मुक्त व्यापार समझौते किए हैं। ये देश समुद्री खाद्य और चावल के बाजार में भारत की हिस्सेदारी हथियाने की अच्छी स्थिति में हैं। यहां तक कि झींगा के क्षेत्र में उभरता हुआ प्रतिस्पर्धी बांग्लादेश भी भारत की स्थिति में अचानक आई कमी से लाभान्वित हो सकता है।</p>
<p><strong>राजनीतिक गतिरोध</strong></p>
<p>टैरिफ का टकराव आर्थिक ही नहीं, बल्कि राजनीतिक भी है। अमेरिकी अधिकारी लंबे समय से भारत से डेयरी, पोल्ट्री और आनुवंशिक रूप से संशोधित (जीएम) फसलों पर बाधाएं कम करने की मांग कर रहे हैं। ये ऐसे क्षेत्र हैं जिनका भारत सांस्कृतिक और छोटे किसानों के आधार पर कड़ा संरक्षण करता है। उदाहरण के लिए, भारत के डेयरी नियम पशु-जनित चारा खाने वाले मवेशियों के उत्पादों के आयात पर प्रतिबंध लगाते हैं। यह अमेरिकी निर्यातकों के लिए एक बड़ी बाधा है।</p>
<p>ऐसे मामलों में झुकना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए राजनीतिक रूप से मुश्किल होगा, जिनकी एनडीए सरकार ने कृषि संरक्षण के वादों के इर्द-गिर्द अपना ग्रामीण आधार तैयार किया है। इसलिए भारतीय अधिकारी झींगा निर्यातकों और चावल किसानों के लिए राहत पैकेज का संकेत दे रहे हैं, तो साथ ही आत्मनिर्भरता के नारे पर और जोर दे रहे हैं।</p>
<p><strong>व्यापक आर्थिक दांव</strong></p>
<p>कई अध्ययनों में यह अनुमान लगाया गया है कि ट्रम्प के टैरिफ बढ़ाने से विभिन्न क्षेत्रों में लगभग 48 अरब डॉलर मूल्य के भारतीय निर्यात प्रभावित हो सकते हैं। अर्थशास्त्रियों का आकलन है कि भारत की जीडीपी वृद्धि दर में इससे 0.2 से 0.5 प्रतिशत की गिरावट आएगी। कमजोर रुपया और बढ़ती उधारी लागत इस दबाव को और बढ़ा सकती है।</p>
<p>कृषि के लिए जोखिम तत्काल हैं। घरेलू स्तर पर अधिक आपूर्ति चावल, कपास और मेवे की कीमतों को कम कर सकती है। इससे उस क्षेत्र की आय कम हो जाएगी जो पहले से ही बढ़ते कर्ज बोझ और जलवायु परिवर्तन के झटकों का सामना कर रहा है।</p>
<p><strong>एक निर्णायक क्षण</strong></p>
<p>भारत अपने किसानों को उच्च शुल्कों के माध्यम से संरक्षित करता रहा है। कृषि क्षेत्र में आयात शुल्क औसतन 39 प्रतिशत है, जबकि अमेरिका में यह 5 प्रतिशत है। भारत का यह मॉडल इसे इसी प्रकार के प्रतिशोधी शुल्क के प्रति संवेदनशील बना रहा है। इक्रियर की रिपोर्ट में कहा गया है, "भारत टैरिफ से अनिश्चित काल तक खुद को बचा नहीं सकता।" इसमें उत्पादकता-संचालित प्रतिस्पर्धात्मकता की ओर बढ़ने का आग्रह किया गया है।</p>
<p>इसके लिए कठिन बदलावों की आवश्यकता होगी- प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों और डेयरी जैसे उत्पादों पर शुल्क को धीरे-धीरे कम करना, कृषि अनुसंधान एवं विकास (जिस पर आज कृषि-जीडीपी का 0.5 प्रतिशत से भी कम खर्च होता है) में निवेश करना, अपशिष्ट को कम करने तथा विदेशों के कड़े स्वच्छता मानकों को पूरा करने के लिए आधुनिक आपूर्ति श्रृंखलाओं का निर्माण करना।</p>
<p>भारत पर बाजारों में विविधता लाने का भी दबाव है। व्यापार मामलों के अधिकारी यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और अफ्रीकी देशों के साथ बातचीत को प्राथमिकता दे रहे हैं ताकि अमेरिका पर अत्यधिक निर्भरता कम की जा सके।</p>
<p><strong>व्यापक तस्वीर</strong></p>
<p>टैरिफ की लड़ाई भारत की आर्थिक रणनीति में एक बड़े तनाव को रेखांकित करती है: क्या वह छोटे किसानों की रक्षा करने के साथ खुद को एक निर्यात महाशक्ति के रूप में पेश कर सकता है? फिलहाल नई दिल्ली में राजनीतिक हवाएं अवज्ञा के पक्ष में हैं। लेकिन सुधारों के बिना भारत के सामने वैश्विक कृषि में अपने से बेहतर प्रतिस्पर्धियों से पीछे छूट जाने का खतरा है।</p>
<p>ट्रंप के लिए ये टैरिफ व्यापार घाटा कम करने के लिए &lsquo;अमेरिका फर्स्ट&rsquo; अभियान का हिस्सा हैं। अमेरिका का व्यापार घाटा पिछले साल 918 अरब डॉलर था, जिसमें भारत का योगदान 45.7 अरब डॉलर का था। मोदी के लिए ये टैरिफ इस बात की परीक्षा बन गए हैं कि क्या &lsquo;आत्मनिर्भर भारत&rsquo; वैश्विक बाजार के दबावों का सामना कर सकता है।</p>
<p>आने वाले महीनों में पता चलेगा कि क्या भारत की कृषि अर्थव्यवस्था हालात के अनुकूल हो पाएगी, या क्या अमेरिकी टैरिफ उसे और अधिक गहन मूल्यांकन के लिए बाध्य करेंगे।<br /><em>(लेखक प्रेट्र ऑफ इंडिया के पूर्व एडिटर-ईस्ट हैं। यहां व्यक्त विचार निजी हैं)</em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ अमेरिकी टैरिफ पर बातचीत की प्रक्रिया फिर शुरू, क्या टैरिफ भारतीय कृषि में बदलाव लाएंगे? ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[बायो एनर्जी से नेट&amp;#45;जीरो लक्ष्य की प्राप्ति &amp;#45; जैव ऊर्जा में भारत की अब तक की नीतिगत पहल और भविष्य के मार्ग]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/bioenergy-and-net-zero-policy-momentum-and-future-pathways.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 20 Sep 2025 16:11:05 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/bioenergy-and-net-zero-policy-momentum-and-future-pathways.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत का जैव ऊर्जा (बायो एनर्जी) से जुड़ाव 1980 के दशक में शुरू हुआ। तब कृषि अपशिष्ट, विशेषकर मवेशियों के गोबर, को ग्रामीण घरों के लिए स्वच्छ रसोई गैस में बदलने का एक महत्वाकांक्षी कार्यक्रम शुरू किया गया था। हालांकि उस समय पर्यावरण संबंधी चिंताएं मुख्य प्रेरक नहीं थीं, फिर भी यह पहल समय के लिहाज से दूरदर्शी थी। इसका उद्देश्य किसानों को खाना पकाने और रौशनी के लिए आधुनिक, धुआं-मुक्त ऊर्जा विकल्प प्रदान करना था। भारत सरकार ने स्वच्छ और स्वस्थ जीवनशैली प्रदान करने के उद्देश्य से ऐसी इकाइयों की स्थापना के लिए वित्तीय सहायता भी प्रदान की।</p>
<p>इस दिशा में अगली बड़ी छलांग 2003 में लगी जब इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम की शुरुआत की गई। चुनिंदा राज्यों में पेट्रोल में 5% तक इथेनॉल मिश्रण अनिवार्य कर दिया गया। इसका उद्देश्य नवीकरणीय ऊर्जा पैदा करने के साथ जीवाश्म ईंधन का आयात कम करना था। इसी के साथ जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता से नवीकरणीय ऊर्जा में आत्मनिर्भरता की दिशा में बदलाव की भी शुरुआत हुई। प्रारंभ में गन्ने के सह-उत्पाद, जैसे मोलेसेज का उपयोग इथेनॉल उत्पादन के लिए किया जाता था। वर्ष 2005 में भारत ने बायोडीजल खरीद नीति के साथ अपनी जैव ऊर्जा दृष्टि का विस्तार किया, और 2012 तक डीजल के साथ बायोडीजल के मिश्रण को 20% तक बढ़ाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया। योजना आयोग ने इसके लिए जिस मुख्य फीडस्टॉक पर भरोसा किया था, वह था अखाद्य तिलहन और जट्रोफा।</p>
<p>लगभग उसी समय चीनी मिलों, चावल मिलों और खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों में को-जनरेशन प्लांट फलने-फूलने लगे, जिससे लागत में बचत हुई, उत्सर्जन में कमी आई और जीवाश्म ईंधन के उपयोग में कमी आई। सरकार ने इन संयंत्रों की स्थापना में वित्तीय सहायता दी।</p>
<p><strong>शुरुआती प्रगति धीमी</strong><br />इन प्रयासों के बावजूद इथेनॉल और बायोडीजल मिश्रण में शुरुआती प्रगति धीमी रही। वर्ष 2014 तक इथेनॉल मिश्रण 1.5% से कम रहा और डीजल के मामले में तो यह और भी कम था। इसका मुख्य कारण खंडित नीतियां और वैश्विक परिवेश था जहां जीवाश्म ईंधन का आयात आसान लगता था। लेकिन तेल की बढ़ती कीमतों और ऊर्जा सुरक्षा की रणनीतिक जरूरत ने बदलाव की मांग की। यह बदलाव 2014 में आया जब पेट्रोल की कीमत 31 रुपये से बढ़कर 81 रुपये हो गई, जो एक दशक में ऐतिहासिक रूप से सबसे ज्यादा वृद्धि थी।</p>
<p>एक मजबूत ऊर्जा रणनीति की तात्कालिकता को समझते हुए एनडीए सरकार ने जैव ईंधन क्षेत्र को पुनर्जीवित किया, जिसके परिणामस्वरूप 2018 में क्रांतिकारी राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति लागू हुई। इस ऐतिहासिक नीति ने इथेनॉल के लिए फीडस्टॉक आधार का विस्तार किया और इसमें चीनी सिरप, मक्का, खराब खाद्यान्न और यहां तक कि बायोडीजल के लिए प्रयुक्त खाद्य तेल को भी शामिल किया। इसने 2जी इथेनॉल जैसे उन्नत जैव ईंधनों में निवेश को भी प्रोत्साहित किया और एक आकर्षक मूल्य निर्धारण प्रणाली की शुरुआत की। इससे इथेनॉल उत्पादन व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य हो गया। पेट्रोल में 20% इथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य मूल रूप से 2030 के लिए निर्धारित था, लेकिन महत्वाकांक्षी रूप से पीछे करते हुए 2025-26 तक कर दिया गया।</p>
<p>उसी वर्ष भारत ने सस्ते परिवहन के लिए सतत विकल्प (SATAT) योजना शुरू की। यह कृषि अवशेषों, नगरपालिका अपशिष्ट और बायोमास से कंप्रेस्ड बायो गैस (सीबीजी) बनाने वाले 5,000 संयंत्र स्थापित करने की एक दूरदर्शी योजना थी। इस कार्यक्रम का उद्देश्य न केवल कच्चे तेल के आयात में कटौती करना था, बल्कि एक ऐसा पारिस्थितिकी तंत्र बनाना भी जहां अपशिष्ट को धन में परिवर्तित किया जा सके, ताकि किसानों को आय का एक अतिरिक्त स्रोत मिले और परिवहन के लिए स्वच्छ ईंधन भी सुनिश्चित हो।</p>
<p><strong>इथेनॉल मिश्रण में प्रगति</strong><br />इथेनॉल मिश्रण में प्रगति उत्साहजनक रही और पिछले एक दशक में इसमें उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। हालांकि बायोडीजल अब भी कच्चे माल की कमी के कारण चुनौतियों का सामना कर रहा है। जिस जट्रोफा फसल पर सरकार ने शुरुआत में भरोसा किया था, वह सफल नहीं हुई। शायद प्रयोगशाला में उगाई गई और खेतों में उगाई गई फसलों में बहुत अंतर था, जिसके कारण यील्ड और एफिशिएंसी बुरी तरह प्रभावित हुई। एग्रीगेशन संबंधी समस्याओं और मिलावट के बाजार में भेजे जाने के कारण प्रयुक्त खाद्य तेल का संग्रह भी ठीक से काम नहीं कर पाया। उद्योग ने एक और कच्चा माल, पाम तेल आजमाया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव, आयात पर निर्भरता और कम उठाव मूल्य के कारण यह भी अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सका।</p>
<p>2018 से 2023 तक सीबीजी की ग्रोथ भी बहुत धीमी रही। उस दौरान 40 से 50 संयंत्र ही स्थापित किए जा सके। इस पर ध्यान देते हुए केंद्र सरकार ने कुछ नीतिगत उपाय किए, जिनमें फर्मेंटेड जैविक खाद (एफओएम) के लिए बाजार विकास सहायता (एमडीए), बायोमास एग्रीगेशन मशीनरी (बीएएम) योजना, प्रत्यक्ष पाइपलाइन इंजेक्शन (डीपीआई) योजना, केंद्रीय वित्तीय सहायता (सीएफए) आदि शामिल हैं। इनसे उद्योग को थोड़ा बढ़ावा मिला। अब देश में लगभग 120 संयंत्र चालू हो चुके तथा 200 से 300 अन्य निर्माण के विभिन्न चरणों में हैं।</p>
<p>एक और आशाजनक प्रगति बॉयलरों में सघन बायोमास का उपयोग है, विशेष रूप से बिजली के क्षेत्र में। ऊर्जा मंत्रालय ने ताप विद्युत संयंत्रों में कोयले के साथ 5% बायोमास मिश्रण का लक्ष्य रखा है। थर्मल प्लांट में कृषि-अवशेषों के उपयोग पर सतत कृषि मिशन को सुगम बनाने के लिए समर्थ मिशन की स्थापना की गई ताकि एक ऐसा पारिस्थितिकी तंत्र बनाया जा सके जो उठाव में सहायक हो। मूल्य बेंचमार्किंग भी शुरू की गई और इससे इस क्षेत्र में आवश्यक सकारात्मक गति लाने में मदद मिली।</p>
<p><strong>भविष्य की तैयारियां</strong><br />आगे की बात करें तो भारत 2जी इथेनॉल, सतत विमान ईंधन (एसएएफ) और जैव-सामग्री जैसे भविष्योन्मुखी क्षेत्रों में भी निवेश कर रहा है। ये भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। भारत ने 2030 तक कार्बन तीव्रता में 45% की कमी, 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन ऊर्जा क्षमता और 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है।</p>
<p>सरकार का इरादा स्पष्ट है, लेकिन इस सेक्टर की पूरी क्षमता को हासिल करने के लिए मदद बढ़ाना और एक स्थिर पारिस्थितिकी तंत्र बनाना आवश्यक है। खंडित प्रयासों के बजाय एक व्यापक, सतत दृष्टिकोण ही आगे बढ़ने का रास्ता होगा। इसके प्रमुख कारक होंगे:<br />- एक प्राइस गैप सपोर्ट तंत्र, जो ईंधन को किफायती रखते हुए उत्पादकों के लिए उचित लाभ सुनिश्चित करे।<br />- बायो एनर्जी के वित्तपोषण के लिए जीवाश्म ईंधन उपकर पर आधारित एक केंद्रीय जलवायु और कार्बन रिडक्शन फंड।<br />- दीर्घकालिक निजी निवेश को आकर्षित करने के लिए मैंडेट और नीतिगत निश्चितता।</p>
<p>भारत की जैव ऊर्जा यात्रा अब केवल तेल आयात कम करने तक सीमित नहीं है। यह किसानों को सशक्त बनाने, अपशिष्ट प्रबंधन को स्थायी बनाने, हरित रोजगार सृजन और भारत को रिन्यूएबल एनर्जी इनोवेशन में दुनिया में अग्रणी के रूप में स्थापित करने के बारे में है। निर्णायक नीतियों, उद्योगों के सहयोग और मजबूत जन समर्थन के साथ जैव ऊर्जा भारत के स्वच्छ ऊर्जा भविष्य की आधारशिला बन सकती है।<br /><em>(लेखक इंडियन फेडरेशन ऑफ ग्रीन एनर्जी के डायरेक्टर जनरल हैं। यहां व्यक्त विचार निजी हैं)</em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ बायो एनर्जी से नेट-जीरो लक्ष्य की प्राप्ति - जैव ऊर्जा में भारत की अब तक की नीतिगत पहल और भविष्य के मार्ग ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[भारत&amp;#45;अमेरिका व्यापार समझौते का भविष्य अनिश्चितता की ओर]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/no-agreement-ay-farmers-cost-says-modi.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 07 Aug 2025 14:25:39 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/no-agreement-ay-farmers-cost-says-modi.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p data-start="209" data-end="660">भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार समझौते का भविष्य अब अनिश्चितता की ओर बढ़ता दिख रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा 6 अगस्त को भारतीय उत्पादों के आयात पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त सीमा शुल्क (टैरिफ) लगाने का आदेश जारी करने के अगले दिन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट कर दिया कि भारत अपने किसानों के हितों की कीमत पर कोई समझौता नहीं करेगा। पीएम मोदी के इस बयान के बाद दोनों देशों के बीच व्यापारिक मोर्चे पर स्थिति और अधिक जटिल हो गई है।</p>
<p data-start="662" data-end="904">हालांकि ट्रम्प का यह आदेश 21 दिन बाद, यानी 27 अगस्त से लागू होगा, लेकिन इससे पहले लगाए गए 25 प्रतिशत टैरिफ के साथ मिलाकर कुल टैरिफ दर 50 प्रतिशत हो जाएगी। यह टैरिफ रूस से कच्चे तेल के आयात के खिलाफ एक तरह की 'पेनल्टी' के रूप में लगाया गया है।</p>
<p data-start="906" data-end="1368">ट्रम्प के इस कदम का असर भारतीय उत्पादों के निर्यात पर दिखना शुरू हो गया है, जिससे निर्यातकों के सामने अनिश्चितता की स्थिति उत्पन्न हो गई है। मौजूदा हालात में अमेरिका को होने वाले भारत के लगभग 7 अरब डॉलर के कृषि निर्यात में गिरावट तय मानी जा रही है। इसमें सबसे अधिक प्रभावित होने वाला उत्पाद श्रिम्प (झींगा) है, जो अमेरिका को भारत के कृषि और उससे संबंधित उत्पादों में सबसे बड़ा निर्यात है। इसके अलावा, बासमती चावल, ऑयल एसेंस, मसाले और फल-सब्जियों का निर्यात भी प्रभावित होगा।</p>
<p data-start="1370" data-end="1886">अमेरिका भारत में अपने कृषि उत्पादों के लिए बाजार चाहता है, लेकिन भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह डेयरी क्षेत्र और जेनेटिकली मॉडिफाइड (जीएम)&nbsp; सोयाबीन और मक्का के लिए अपना बाजार नहीं खोलेगा। फिलहाल अमेरिका से भारत को बड़े पैमाने पर ट्री नट्स (सूखे मेवे जिनमें बादाम, पिस्ता और अखरोट शामिल हैं)&nbsp; का निर्यात होता है, जिसकी वार्षिक कीमत 1 अरब डॉलर से अधिक है। भारत अमेरिका से एथेनॉल का भी आयात करता है, लेकिन यह केमिकल और फार्मा उद्योग के लिए होता है। अमेरिका चाहता है कि भारत पेट्रोल में एथेनॉल ब्लेंडिंग के लिए भी इसका उपयोग करे, जिसका भारतीय उद्योग द्वारा कड़ा विरोध किया गया है।</p>
<p data-start="1888" data-end="2099">गौरतलब है कि करीब दो माह पहले नीति आयोग द्वारा भारत-अमेरिका व्यापार पर जारी एक पेपर में कुछ अमेरिकी उत्पादों के लिए भारतीय बाजार खोलने के सुझाव दिए गए थे, लेकिन भारी विरोध के चलते उस पेपर को वापस ले लिया गया था।</p>
<p data-start="2101" data-end="2465">दिलचस्प यह है कि चालू कैलेंडर वर्ष में भारत और अमेरिका के बीच कृषि व्यापार में तेज़ी देखी गई है। जनवरी से जून 2025 के बीच भारत में अमेरिकी कृषि उत्पादों का आयात 49.1 प्रतिशत बढ़कर 1.69 अरब डॉलर हो गया, जो पिछले वर्ष इसी अवधि में 1.13 अरब डॉलर था। वहीं, इसी अवधि में भारत से अमेरिका को कृषि निर्यात 24.1 प्रतिशत बढ़कर 3.47 अरब डॉलर हो गया, जो पहले 2.79 अरब डॉलर था।</p>
<p data-start="2467" data-end="2783">ऐसे में, अगर भारत से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर 50 प्रतिशत शुल्क लागू होता है, तो कृषि निर्यात का प्रभावित होना लगभग तय है। हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि भारत अपने हितों को सर्वोपरि रखते हुए ही कोई निर्णय लेगा। अब देखना यह है कि क्या भारत अमेरिकी उत्पादों पर जवाबी शुल्क (रिटेलियेटरी टैरिफ) लगाएगा या नहीं।</p>
<p data-start="2785" data-end="3155">भारत अमेरिका से खाद्य तेलों के रूप में सोयाबीन तेल और कपास का भी आयात करता है। हाल ही में सरकार ने क्रूड सोयाबीन ऑयल पर सीमा शुल्क में कटौती की थी, जबकि टेक्सटाइल उद्योग कपास पर भी शुल्क समाप्त करने की मांग कर रहा है। ये दोनों ऐसे उत्पाद हैं जो अमेरिकी हितों को प्रभावित कर सकते हैं। इसी तरह सूखे मेवे और वाशिंगटन एप्पल पर भारत सरकार का कदम आने वाले रुख को स्पष्ट करेगा।</p>
<p data-start="3157" data-end="3517">अब 27 अगस्त तक यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारत और अमेरिका के बीच व्यापार नीति किस दिशा में जाती है। हालांकि सरकार ने दोहराया है कि किसानों के हित उसके लिए सर्वोपरि हैं और उनके साथ किसी प्रकार का समझौता नहीं किया जाएगा। वहीं, क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों ने अमेरिकी टैरिफ में बढ़ोतरी से भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले संभावित असर का आकलन करना शुरू कर दिया है।</p>
<p data-start="3157" data-end="3517"></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ भारत-अमेरिका व्यापार समझौते का भविष्य अनिश्चितता की ओर ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[उत्तराखंड की आपदाओं के भयावह सबक!]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/a-horrifying-lesson-from-uttarakhands-disaster.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 06 Aug 2025 15:36:15 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/a-horrifying-lesson-from-uttarakhands-disaster.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>उत्तरकाशी आपदा की गंभीरता को समझना हो तो 12 साल पहले की केदारनाथ त्रासदी को याद करना होगा। उत्तरकाशी जिले में कम से कम तीन जगहों पर बहुत कम अवधि में बादल फटे हैं और उनका परिणाम धराली गांव के एक बड़े हिस्से के गायब होने के रूप में सामने आया है। कितने लोगों ने अपनी जान गंवाई है, इसका अभी अनुमान लगाना भी संभव नहीं है। लेकिन, यह संख्या बहुत बड़ी होगी, यह तय है।</p>
<p>उत्तराखंड में (और पड़ोसी हिमाचल में भी) बादल फटना, भूस्खलन, पहाड़ दरकना-धंसना, नदियों का विकराल रूप धर लेना और अचानक ग्लेशियर फटना बेहद आम घटनाएं हो गई हैं। जो एक डरावना संकेत है। ऐसी हर एक घटना के बाद आमतौर पर प्रकृति को दोष दिया जाता है और भगवान से बचाने की गुहार लगाई जाती है, लेकिन इन दोनों से बात नहीं बनती। उत्तराखंड गठन के 25 साल में पहाड़ों में जितने व्यापक पैमाने पर निर्माण कार्य हुए हैं, हो रहे हैं और लोगों की आवाजाही बढ़ी है, वह चौंकाने वाली है।</p>
<p>ये त्रासदियां संकेत दे रही हैं कि विकास के नाम पर प्रकृति के साथ जो खिलवाड़ हुआ है, उसकी कीमत अब लगातार चुकानी होगी। पहाड़ के आम जीवन में यह मान्यता है कि नदी अपने खोए हुए (बल्कि बिल्डरों द्वारा कब्जाए गए) रास्ते पर वापस जरूर आती है, भले ही 100 साल के अंतराल पर आए। धराली में नदी के प्रचंड वेग और उसके साथ बड़ी-बड़ी इमारतों, होटलों, घरों के बहने का दृश्य भयावह था, लेकिन इसके लिए नदी बिल्कुल दोषी नहीं है।</p>
<p>पहाड़ में प्राकृतिक आपदाएं नई नहीं हैं, ना ही इन्हें पूरी तरह रोका जा सकता है, लेकिन उनकी आवृत्ति और तीव्रता में बढ़ोतरी स्वाभाविक नहीं, बल्कि स्पष्ट रूप से मानवीय हस्तक्षेप का परिणाम है। अगर मोटे तौर पर देखें तो वैश्विक तापमान वृद्धि के कारण भी हिमालयी क्षेत्र के मौसम में असामान्य परिवर्तन दिख रहे हैं। वर्षा का पैटर्न असंतुलित हो गया है। कभी महीनों तक सब कुछ सामान्य रहता है और फिर कुछ ही घंटों में मौसम तांडव करने लगता है। बादल फटना, जो पहले कभी कभार की घटना थी, अब हर बारिश में बार-बार सामने आ रही है।</p>
<p>प्रदेश में विगत दशकों में अनियंत्रित और अनियोजित विकास ने भी परेशानी बढ़ाई है। केदारनाथ आपदा, नाचनी गांव आपदा, रैनी गांव आपदा, जोशीमठ का नीचे धंसना, और धराली की आपदा एक भयावह संकेत कर रही है कि कुछ दशकों बाद उत्तराखंड में कई रूपकुंड (जहां आज भी हजारों नरकंकाल बिखरे हुए हैं) होंगे। उत्तराखंड में चारधाम यात्रा के नाम पर जो ऑल वेदर रोड बनाई जा रही है, वह यहां के पहाड़ों के मिजाज के अनुरूप नहीं है। कच्चे पर्वतीय ढलानों को काटकर बनाई गई चौड़ी सड़कों ने पहाड़ों की आंतरिक संरचना को कमजोर किया है। इससे भूस्खलन की घटनाएं बढ़ी हैं। सरकार यहां आने वाले लोगों के लिए सुविधाएं विकसित करने पर जोर दे रही है, लेकिन यह समझने की जरूरत महसूस नहीं की जा रही है कि उत्तराखंड और यहां का पहाड़ी इलाका बाहरी लोगों की अनियंत्रित आवाजाही के लायक नहीं है। लोग इतने बेपरवाह हैं कि वे इन दिनों भी बड़ी संख्या में चारधाम यात्रा पर आ रहे हैं। पिछले सप्ताह ही सरकार ने करीब 5 हजार लोगों को केदारनाथ के रास्ते बमुश्किल सुरक्षित निकाला है। पर्यटकों की हर साल बढ़ती संख्या यहां के बुनियादी ढांचे पर दबाव पैदा कर रही है।</p>
<p>नदी किनारे बसाहट और अवैज्ञानिक निर्माण ने भागीरथी, मंदाकिनी, अलकनंदा जैसी बड़ी नदियों से लेकर छोटी बरसाती नदियों तक के किनारों को होटलों, होमस्टे और बाजारों से ढक दिया है। यह निर्माण आर्थिक दृष्टि से भले ही लाभदायक लगे, लेकिन ये आपदा प्रबंधन के मानदंडों पर खरे नहीं उतरते। बाढ़, भूस्खलन या मलबे की घटना इन्हें पूरी तरह नष्ट कर देती है, जैसा धराली में देखने को मिला।</p>
<p>इस परिप्रेक्ष्य में बड़ा सवाल यह कि क्या सरकार, प्रशासन और लोगों ने इन संकेतों से कुछ सीखा है? हर त्रासदी के बाद राहत और पुनर्निर्माण की प्रक्रिया तो आरंभ होती है, लेकिन दीर्घकालिक समाधान और नीतिगत परिवर्तन नदारद रहते हैं। कई बार तो ऐसा लगता है कि आपदाएं कुछ ठेकेदारों और परियोजना संचालकों के लिए लाभ का माध्यम बन जाती हैं। इन सभी घटनाओं ने यह भी स्पष्ट किया है कि उत्तराखंड की आपदा प्रबंधन प्रणाली में खामियां हैं। अग्रिम चेतावनी, स्थानीय प्रशिक्षण, सुरक्षित स्थानों की पहचान जैसे बुनियादी प्रावधान अब भी अधूरे और अपर्याप्त दिख रहे हैं। धराली में लोगों को इतना अवसर भी नहीं मिला कि खुद को बचाने के लिए ऊंचे स्थानों की ओर जा पाते।</p>
<p>यदि ग्रहण किया जा सके तो आज का सबक यही है कि हिमालयी राज्यों में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की स्पष्ट नीति बने। नदी किनारे निर्माण पर सख्त प्रतिबंध हो, सड़क निर्माण से पहले भू-वैज्ञानिक सर्वे के निष्कर्षों को स्वीकार किया जाए और बड़े प्रोजेक्ट्स के पर्यावरणीय प्रभावों को गंभीरता से लिया जाए। अन्यथा हम लाशें गिनते रह जाएंगे। उत्तराखंड की त्रासदियां साफ चेतावनी दे रही हैं कि यदि अब भी सबक नहीं लिया गया, तो यह क्षेत्र केवल धार्मिक पर्यटन का केंद्र नहीं, बल्कि पर्यावरणीय आपदाओं का स्थायी ठिकाना बन जाएगा। नीतिगत और व्यवस्थागत सुधार तथा इनका सही क्रियान्वयन न हुआ तो यकीन मानिए, भविष्य की त्रासदियां और भी भयावह होंगी। और भी कई रूपकुंड होंगे!</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ उत्तराखंड की आपदाओं के भयावह सबक! ]]></media:description>
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	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[महंगाई का छह साल का निचला स्तर किसानों पर कितना भारी?]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/how-much-is-the-six-year-low-inflation-a-burden-on-farmers.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 21 Jul 2025 10:36:28 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/how-much-is-the-six-year-low-inflation-a-burden-on-farmers.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>जून माह में खुदरा महंगाई दर (सीपीआई) छह साल के निचले स्तर 2.1 फीसदी पर आ गई। भारतीय रिजर्व बैंक और इकोनॉमी के गैर-कृषि क्षेत्र के लिए बेहतर खबर है क्योंकि इससे ब्याज दरों में कटौती का माहौल बन गया, जिसे इकोनॉमी की ग्रोथ के लिए बेहतर स्थिति माना जाता रहा है। लेकिन इसके दूसरे पहलू पर गौर नहीं किया गया है। असल में, महंगाई दर में यह कमी खाद्य महंगाई दर के घटकर 1.1 फीसदी निगेटिव हो जाने के चलते आई है। इसका कारण खाद्य वस्तुओं की कीमतों में आई भारी गिरावट है। उन खाद्य उत्पादों की कीमतें भी गिरी हैं जिनके लिए हम आयात पर निर्भर हैं। क्योंकि सरकार ने सस्ते आयात को बढ़ावा दिया। लेकिन दाल और तिलहन जैसे उत्पादों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से नीचे जाना चिंता का कारण है। इससे इन उत्पादों में किसानों की दिलचस्पी कम हो रही है। चालू खरीफ सीजन की बुवाई के आंकडे इस तरफ संकेत करते हैं।&nbsp; चालू खरीफ सीजन में 11 जुलाई तक अरहर का बुलाई रकबा 25.42 लाख हैक्टेयर पर पहुंचा है जो पिछले साल इसी समय 27.18 लाख हैक्टेयर पर था। इसी तरह सोयाबीन का रकबा 11 जुलाई, 2025 को 99.03 लाख हैक्टेयर रहा जो पिछले साल इसी समय 107.78 लाख हैक्टेयर पर पहुंच गया था।&nbsp;</p>
<p>सरकार लगातार दावा करती रही है कि वह किसानों की आय बढ़ाने की पूरी कोशिश कर रही है, लेकिन सामान्य से बेहतर मानसून और बढ़ते आयात के बावजूद अरहर, सोयाबीन, कपास और गन्ने का क्षेत्रफल घटना सामान्य स्थिति नहीं हैं। वहीं खाद्यान्न फसलों का बढ़ता रकबा, केंद्रीय पूल में गेहूं के स्टॉक का चार साल के उच्चतम स्तर पर होना और चावल का स्टॉक पिछले साल से भी अधिक होना, सुनिश्चित करता है कि इन उत्पादों की महंगाई नियंत्रण में रहेगी। हालांकि, जनरल महंगाई दर अभी भी चार फीसदी से आसपास बनी हुई है। यानी लोगों को स्वास्थ्य, परिवहन और शिक्षा जैसे सेवाओं के लिए अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है। सस्ते में उपज बेचे रहे किसानों पर यह दोहरी मार है।&nbsp;</p>
<p>इस साल अच्छे मानसून की उम्मीद है। मानसून सीजन में 1 जून से 20 जुलाई तक दीर्घकालिक औसत (एलपीए) से 7.1 फीसदी अधिक बारिश हुई है।&nbsp;बेहतर रबी उत्पादन के चलते सरकार ने 300.35 लाख टन गेहूं की सरकारी खरीद की जो चाल साल का उच्चतम स्तर है। वहीं 1 जुलाई, 2025 को केंद्रीय पूल में गेहूं का स्टॉक 358.78 लाख टन रहा जो पिछले साल इसी समय 16 साल के निम्नतम स्तर पर आ गया था। गेहूं के पर्याप्त भंडार के कारण सरकार ने एमएसपी से थोड़ी अधिक कीमत पर ही ओपन मार्केट सेल स्कीम (ओएमएसएस) के तहत खुले बाजार में गेहूं बिक्री की घोषणा की है।&nbsp;</p>
<p>उधर, सोयाबीन और अरहर की कीमत मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की मंडियों में 4300 रुपये और 6500 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास चल रही है। जबकि चालू खरीफ सीजन (2025-26) के लिए सोयाबीन का एमएसपी 5328 रुपये प्रति क्विंटल और अरहर का एमएसपी 8000 रुपये प्रति क्विंटल है। सोयाबीन और अरहर का यह हाल तब है जबकि देश में दलहन व तिलहन की कमी है और हम इनके आयात पर निर्भर हैं।&nbsp;</p>
<p>पिछले वित्त वर्ष (2024-25) के दौरान देश में 72.56 लाख टन दालों और 164.13 लाख टन खाद्य तेलों का आयात किया गया था। यह आयात शून्य सीमा शुल्क या आयात शुल्क घटाकर सस्ती कीमतों पर किया गया। सरकार ने 31 मार्च, 2026 तक अरहर, उड़द और पीली मटर का&nbsp; शुल्क मुक्त आयात करने की अनुमति दे रखी है। वहीं, मसूर और चना पर केवल 10 फीसदी का सीमा शुल्क है। इसके चलते अफ्रीकी देशों से अरहर का आयात 4600 से 5100 रुपये प्रति क्विंटल हो रहा है जबकि कनाडा और रूस से आयातित पीली मटर की कीमत केवल 3100 रुपये प्रति क्विंटल चल रही है। 31 मई, 2025 से सरकार ने क्रूड सोयाबीन, क्रूड पॉम और सूरजमुखी तेल पर सीमा शुल्क को 27.5 फीसदी से घटाकर 16.5 फीसदी कर दिया है। इससे खाद्य तेलों के सस्ते आयात का रास्ता खुल गया है।&nbsp;</p>
<p>ये सब उपाय खाद्य महंगाई कम करने की सरकार की रणनीति का हिस्सा हैं जो किसानों पर भारी पड़ रहे हैं। जून के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले साल के मुकाबले इस माह में सब्जियों की कीमतों में 19 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। जबकि टमाटर की कीमतें 31.5 फीसदी, प्याज की कीमतें 26.6 फीसदी और दालों की कीमतें 25.1 फीसदी कम हुई। इस तरह महंगाई को छह साल के निचले स्तर पर लाना संभव हुआ है। लेकिन इसके लिए जरूरी नहीं है कि उत्पादन अधिक हुआ हो। जहां उत्पादन कम है और आयात पर निर्भरता है, वहां सस्ते आयात को माध्यम बनाया गया है।</p>
<p>महंगाई तो काबू में हुई है लेकिन इसका असर किसानों की आय भी कम हो गई है। तमाम आर्थिक सिद्धांतों में कहा गया है कि उत्पादक को बढ़ती कीमतों का इंसेंटिव उसे प्राेत्साहित करता है। इसलिए जब कई फसलों की कीमतें एमएसपी से नीचे चल रही हैं तो किसान मायूस है।&nbsp;बेहतर मानसून के बावजूद कई फसलों का रकबा होने का सीधा अर्थ है कि उनमें किसानों की&nbsp;दिलचस्पी घट रही है। यही स्थिति तिलहन के मामले में भी है।&nbsp;</p>
<p>सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक की रणनीति कृषि उपज की कीमतों में कमी लाकर महंगाई रोकने में है। इसके लिए सस्ते आयात से लेकर निर्यात प्रतिबंधों का सहारा लिया जाता है। ऐसे में गैर-कृषि क्षेत्रों और उपभोक्ताओं का पलड़ा किसानों के मुकाबले भारी है और नीतिगत फैसलों में उनको किसानों के मुकाबले अधिक प्राथमिकता दी जाती है। इसलिए महंगाई दर का छह साल के निचले स्तर पर होना इन वर्गों के लिए तो बेहतर संकेत है, लेकिन किसानों के लिए यह मुश्किल स्थिति है। वैसे दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं अमेरिका और ब्रिटेन में जून की महंगाई दर 2.7 फीसदी और 3.6 फीसदी रही। वहीं इन देशों में खाद्य महंगाई दर तीन फीसदी और 4.5 फीसदी रही जबकि भारत में यह 1.1 फीसदी के निगेटिव स्तर पर रही है।&nbsp;</p>
<p></p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ महंगाई का छह साल का निचला स्तर किसानों पर कितना भारी? ]]></media:description>
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        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[डेयरी निर्यात में अग्रणी बनने के लिए भारत को क्या करने की जरूरत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/unlocking-indias-dairy-potential-what-it-takes-to-lead-the-global-market.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 18 Jul 2025 12:49:02 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/unlocking-indias-dairy-potential-what-it-takes-to-lead-the-global-market.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत एक अग्रणी दूध उत्पादक देश है। यहां उत्पादन प्रति वर्ष 240 अरब लीटर (24 करोड़ टन) तक पहुंच गया है। विश्व के कुल दूध उत्पादन का 24% से अधिक हिस्सा भारत में होता है। 50 वर्ष पहले हम दूध की कमी वाले देश थे। उस स्थिति से हम आत्मनिर्भर बने और अब दुनिया को दूध निर्यात करने की ओर बढ़ रहे हैं। यह कितना अद्भुत परिवर्तन है!</p>
<p>हम कह सकते हैं कि पिछले वर्ष हमारे यहां दूध उत्पादन में केवल 3.8% वृद्धि हुई, जो पिछले वर्षों की 6% की वृद्धि दर से कम है। लेकिन हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि विश्व स्तर पर यह वृद्धि दर 1% के आसपास है। इसके साथ विकसित देशों की समस्याओं को देखिए। उदाहरण के लिए मिट्टी में नाइट्रोजन का स्तर, मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैसें आदि। &nbsp;आप सोचिए, आने वाले समय में विश्व में अतिरिक्त दूध कहां से आएगा? भारत के पास 30 करोड़ से अधिक विशाल पशुधन है। इसके साथ डेयरी को अर्थव्यवस्था का प्रमुख अंग बनाए रखने और सरकार की अनेक सुधार एवं विकास पहलों के साथ भारत संभवतः इस चुनौती का एक श्रेष्ठ विकल्प प्रस्तुत करता है। लगभग आठ करोड़ लोग दूध उत्पादन क्षेत्र से जुड़े हैं, जिनमें 75% से अधिक महिलाएं हैं।</p>
<p>अब देखते हैं कि दूध उत्पादन के क्षेत्र में हम कहां ठहरते हैं-</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/07/image_750x_68725272297c0.jpg" alt="" /></p>
<p>उपरोक्त प्रमुख दूध निर्यातक देशों की तालिका से आप समझ सकते हैं कि जो भारत आज 240 अरब लीटर या 24 करोड़ टन दूध उत्पादन करता है, वह अगले तीन से पांच वर्षों में इन पांच मुख्य निर्यातक देशों/महाद्वीपों के बराबर दूध उत्पादन कर रहा होगा। क्या आप इसकी कल्पना कर सकते हैं!</p>
<p>अनुमान है कि हम 2030 तक विश्व दूध उत्पादन में 30% (30 करोड़ टन) और संभवतः 2047 तक 45% का योगदान करेंगे। वर्तमान में घरेलू प्रति व्यक्ति खपत 470 ग्राम/दिन है (विश्व औसत 322 ग्राम/दिन)। तो यह पूछा जा सकता है कि हम और कितना खा सकते हैं? यदि आप इसकी तुलना विकसित देशों के औसत, मान लीजिए 750 ग्राम/दिन से करें, तो हां, उत्पादन बढ़ने के साथ हम अधिक खा भी सकते हैं। लेकिन संभवतः अगले तीन से पांच वर्षों में हम सरप्लस की स्थिति में पहुंच जाएंगे।</p>
<p>अगले 25 वर्षों में भारत में दूध उत्पादन 62.8 करोड़ टन पहुंच जाएगा, जबकि दूध और डेयरी प्रोडक्ट की मांग 51.7 करोड़ टन की होगी। 2047 तक भारत के पास 11.1 करोड़ टन का निर्यात योग्य सरप्लस होगा। ऐसी अपेक्षित अधिशेष की स्थिति में भविष्य के परिदृश्य के देखते हुए अभी से उचित कदम उठाना क्या बुद्धिमानी नहीं होगी? वर्ष 2023 में वैश्विक डेयरी उत्पादों का व्यापार 107 बिलियन डॉलर का हो गया था। ऐसे में भारत से डेयरी निर्यात स्वाभाविक रूप से सर्वोत्तम विकल्प बन जाता है।&nbsp;</p>
<p><strong>वर्तमान परिदृश्य और बाधाएं</strong></p>
<p>एक सामान्य वर्ष में भारतीय डेयरी उद्योग लगभग 6 लाख टन स्किम्ड मिल्क पाउडर का उत्पादन करता है। इसमें से लगभग 3.5 लाख टन का उपयोग उद्योग दूध की कम उपलब्धता वाले मौसम में करता है। इसके अतिरिक्त 1.5 लाख टन अन्य खाद्य पदार्थों में प्रयोग हो जाता है। बाकी एक लाख टन स्टॉक के रूप में बचता है। लेकिन पिछले दो-तीन वर्षों में कच्चे दूध की आकर्षक कीमतों, पशु संख्या में वृद्धि, बेहतर चारे की उपलब्धता और लीन सीजन छोटा होने के कारण हमारा स्टॉक 3 लाख टन से अधिक हो गया। स्टॉक अधिक होने का ही नतीजा है कि एसएमपी की कीमतें कई महीने तक निचले स्तर पर बनी रहीं।</p>
<p>चूंकि घरेलू खपत में रातों-रात कोई बड़ा बदलाव नहीं होने वाला था, इसलिए समाधान के रूप में निर्यात की ओर रुख करना जरूरी था। लेकिन यह तभी संभव है जब हमारी कीमतें अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में टिक सकें। दुर्भाग्यवश चीन और अन्य देशों से कम मांग के कारण एसएमपी की वैश्विक कीमतें लंबे समय से दबाव में हैं। तो अब आगे क्या किया जाए?</p>
<p>समाधान साधारण मीडियम-हीट एसएमपी के बजाय उन एसएमपी वेरिएंट्स की खोज में है, जिनकी वाकई में बहुत आवश्यकता है। उदाहरण के तौर पर, चीज बनाने के लिए लो-हीट एसएमपी चाहिए और इवैपोरेटेड मिल्क बनाने के लिए हाई-हीट एसएमपी। क्या कोई फैक्टरी ये वेरिएंट्स लगातार बना सकती है? तब तक नहीं जब तक आपके पास उच्च गुणवत्ता वाला कच्चा दूध न हो। इन्हें तैयार करने के लिए आवश्यक उपकरण/प्रौद्योगिकी भी चाहिए। इसका मतलब है एक अलग सोच, तकनीकी निवेश और आरएंडडी में प्रगति।</p>
<p>जब हम वैश्विक परिदृश्य में वास्तव में टिकाऊ और दीर्घकालिक समाधान के लिए कदम रखना चाहते हैं, तो हमें कहीं अधिक भरोसेमंद तंत्र और रणनीतिक दृष्टिकोण की आवश्यकता होगी। मेरा मानना है कि इसके लिए तीन &ldquo;सी (C)&rdquo; सबसे महत्वपूर्ण हैं:</p>
<p>&bull; गुणवत्ता में निरंतरता (Consistency in Quality)<br />&bull; आपूर्ति में निरंतरता (Consistency in Supplies)<br />&bull; मूल्य प्रतिस्पर्धा में निरंतरता (Consistency in Price competitiveness)</p>
<p>हमारे लिए अच्छी बात यह रही कि हमने पिछले वर्ष मक्खन/मिल्क फैट का काफी निर्यात किया (कैलेंडर वर्ष 2024 में 55,000 टन) और अंतरराष्ट्रीय स्तर की तुलना में प्रतिस्पर्धी कीमतों पर बेचा। इससे डेयरी प्रसंस्करण संयंत्रों पर स्टॉक का बोझ कम हुआ, कार्यशील पूंजी मुक्त हुई और साथ ही देश के लिए विदेशी मुद्रा अर्जित हुई। मैं कल्पना भी नहीं कर सकता कि यदि यह अवसर उपलब्ध नहीं होता तो हमारे डेयरी उद्योग की स्थिति क्या होती।</p>
<p><strong>निर्यात में हम वर्तमान में कहां खड़े हैं?</strong></p>
<p>मेरा मानना है कि वर्तमान में भारत से एसएमपी और मक्खन का निर्यात &ldquo;अवसर का फायदा उठाना&rdquo; ही कहा जा सकता है। जबकि हम मध्य पूर्व, दक्षिण पूर्व एशिया और पड़ोसी देशों में डेयरी उत्पादों का निर्यात कर रहे थे और कर रहे हैं, अमूल ने वास्तव में हमारी डेयरी की सीमाओं को विश्व मानचित्र पर फैला दिया है। अमेरिका में उनकी उपस्थिति है और यूरोपियन यूनियन में भी प्रवेश की चर्चा चल रही है। कर्नाटक मिल्क फेडरेशंस लिमिटेड (केएमएफ) ने भी हाल ही यूएई के दुबई में नंदिनी डेयरी पार्लर लॉन्च किए हैं। क्या इन लीडर्स से सीखने और उद्योग को और अधिक बढ़ाने का समय नहीं आ गया है?</p>
<p>शायद हमें अन्य डेयरी उत्पादक देशों की ओर भी देखने की जरूरत है जो उदाहरण पेश कर रहे हैं। जैसे न्यूज़ीलैंड, अमेरिका या यूरोपियन यूनियन। हमें उन देशों पर भी नजर रखनी चाहिए जो पारंपरिक रूप से डेयरी उत्पादक नहीं माने जाते, लेकिन उत्पाद विशेषज्ञता हासिल करके वर्षों से निर्यात कर रहे हैं। जैसे मलेशिया का इवैपोरेटेड/कंडेंस्ड दूध। हालांकि हमें किसी की नकल नहीं करनी है, लेकिन हम हमेशा दूसरों के अनुभवों से सीख सकते हैं। अपना एक अनूठा मॉडल/यूएसपी तैयार करना ही समय की जरूरत है।</p>
<p>हमें अवसरों को बढ़ाने के लिए नए क्षितिज तलाशने की आवश्यकता है। रूस, चीन, अफ्रीका, मेक्सिको जैसे प्रमुख आयातक देशों को निर्यात करना स्वाभाविक दिशा होगी। इनमें कुछ बाजार तो व्यापार के लिए खुले हैं, लेकिन बाकी देशों के लिए औपचारिक स्वीकृति की आवश्यकता होगी। इसके लिए सरकार से कहा जा सकता है।</p>
<p>जब हम लगातार भरोसेमंद, मानकीकृत और प्रतिस्पर्धी मूल्यों पर आपूर्ति करने की स्थिति में पहुंच जाएं, तब वैश्विक डेयरी निर्यात के लिए क्यों न एक समर्पित &ldquo;भारतीय डेयरी उत्पाद नीलामी प्लेटफॉर्म&rdquo; लांच किया जाए?</p>
<p><strong>अवसर कहां और किसे लक्षित करें?</strong></p>
<p>अब एसएमपी के अलावा अन्य डेयरी उत्पादों के लिए भी वैल्यू-एडेड प्रोडक्ट एवं वेरिएंट्स पर काम करने का समय है। यहां कुछ विचार हैं&hellip;</p>
<p><strong>बी2सी उपभोक्ता उत्पाद</strong><br />तरल दूध, फ्लेवर्ड मिल्क, ताज़ा क्रीम, आइसक्रीम मिक्स जैसे यूएचटी उत्पादों के लिए कुछ लक्षित बाज़ारों के करीब जाना एक आकर्षक विकल्प हो सकता है।</p>
<p><strong>यूएसपी</strong><br />भैंस के दूध के हम दुनिया में सबसे बड़े उत्पादक हैं। आने वाले दो दशकों में भैंसों की संख्या बढ़ने की संभावना है। इसे देखते हुए हम पास किसी भी श्वेत डेयरी उत्पाद - जैसे मोज़ारेला चीज़ या व्हाइट स्प्रेड चीज़ - के लिए एडवांटेज में हैं।</p>
<p><strong>एनहाइड्रस मिल्क फैट (एएमएफ)&nbsp;</strong><br />मध्य-पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया के लक्षित बाज़ारों के लिए एएमएफ हमेशा एक खुला अवसर है।</p>
<p><strong>इनोवेशन/उत्पाद विकास</strong><br />अधिक शेल्फ-लाइफ वाली हमारी देसी मिठाइयां भारतीय प्रवासी समुदाय में काफी पसंद की जाती हैं। इन्हें विदेशी स्वादों के अनुरूप ढालकर वैश्विक उपभोक्ताओं तक पहुंचाना एक अच्छा विकल्प होगा।</p>
<p><strong>उत्पाद अनुकूलन/विस्तार</strong><br />वनस्पति वसा युक्त मिल्क पाउडर की घरेलू स्तर पर मांग उतनी नहीं है, लेकिन अफ्रीका, इराक, मध्य-पूर्व, दक्षिण-पूर्व एशिया और आसपास के देशों में इसे स्वीकार किया जा रहा है और इसकी मांग बढ़ रही है। यह हमारे लिए एक अनूठा निर्यात अवसर प्रदान करता है।</p>
<p>संक्षेप में कहें तो हमारे डेयरी उद्योग के लिए निर्यात एक मात्र दीर्घकालिक टिकाऊ समाधान होगा। हम आत्मनिर्भर बनने के लक्ष्य की दिशा में काफी आगे बढ़ चुके हैं, लेकिन वैश्विक बाज़ार में भागीदार बनने के लिए अभी लंबा रास्ता तय करना है। तो आइए, इसका लाभ उठाते हुए अभी से तैयारियां शुरू कर दें।</p>
<p><em>(लेखक स्वतंत्र खाद्य सलाहकार और डेयरी इंडस्ट्री के एक्सपर्ट हैं)</em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ डेयरी निर्यात में अग्रणी बनने के लिए भारत को क्या करने की जरूरत ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कृषि निर्यात में कई बाधाओं के बावजूद व्यापक संभावनाएं]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/despite-hurdles-indias-agricultural-exports-hold-vast-potential.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 10 Jul 2025 15:51:54 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/despite-hurdles-indias-agricultural-exports-hold-vast-potential.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत वैश्विक कृषि महाशक्ति बन चुका है और विश्व कृषि उत्पादन में दूसरे स्थान पर है। लेकिन इसका वैश्विक कृषि निर्यात में हिस्सा मात्र 2.4% है। वर्ष 2023-24 में भारत का कृषि निर्यात 48.9 अरब डॉलर रहा, जो 2022-23 के 53.2 अरब डॉलर से कम है। भारत के सामने अवसर और चुनौतियां दोनों हैं। इस लेख में भारत के कृषि निर्यात की वर्तमान स्थिति का मूल्यांकन किया गया है, और प्रमुख परफॉर्मेंस इंडिकेटर के विश्लेषण के साथ सतत विकास के लिए रणनीतिक संभावनाओं पर विचार किया गया है।</p>
<p>भारत के कृषि निर्यात में हाल के वर्षों में उतार-चढ़ाव रहा है। यह वैश्विक बाजार के डायनामिक्स और घरेलू नीतिगत निर्णय, दोनों को प्रतिबिंबित करता है। वर्ष 2023-24 में 2022-23 की तुलना में 8.2% की गिरावट घरेलू खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से मुख्य रूप से चावल, गेहूं और चीनी जैसी प्रमुख वस्तुओं पर लगाए गए निर्यात प्रतिबंधों के कारण हुई।</p>
<p><strong>साल-दर-साल प्रदर्शन का विश्लेषणः</strong><br />&bull; 2023-24: 48.9 अरब डॉलर (पिछले साल से 8.2% गिरावट)<br />&bull; 2022-23: 53.2 अरब डॉलर&nbsp;<br />&bull; 2021-22: 50.24 अरब डॉलर (21.8% वृद्धि)<br />&bull; 2020-21: 41.25 अरब डॉलर&nbsp;</p>
<p>वित्त वर्ष 2024-25 (अप्रैल-दिसंबर) में कुल कृषि निर्यात 3,18,509 करोड़ रुपये (36.95 अरब डॉलर) का रहा। विशेष वस्तुओं का मजबूत प्रदर्शन बाजार में सुधार के संकेत देता है।&nbsp;</p>
<p>क्षेत्रवार विवरण: भारत मुख्य रूप से इन उत्पादों का निर्यात करता है: कृषि एवं संबंधित उत्पाद, समुद्री उत्पाद (शीर्ष श्रेणी), बागान उत्पाद (चाय, कॉफी, मसाले), वस्त्र एवं संबंधित उत्पाद।</p>
<p>वृद्धि के रुझान: कृषि निर्यात में पिछले पांच वर्षों में औसतन सकारात्मक वृद्धि हुई है। हाल की गिरावट मुख्य रूप से घरेलू खाद्य सुरक्षा के लिए नीतिगत हस्तक्षेपों के कारण हुई है। लेकिन चावल जैसे प्रमुख कृषि उत्पादों पर निर्यात प्रतिबंध हटाने से चालू वित्त वर्ष में सकारात्मक परिणाम दिखने लगे हैं।</p>
<p>वैश्विक बाजार में स्थिति: वैश्विक कृषि व्यापार में भारत का 2.5% हिस्सा है और यह दुनिया का आठवां सबसे बड़ा कृषि निर्यातक बना हुआ है। भारत वैश्विक कृषि उत्पादन में दूसरे स्थान पर है, फिर भी वैश्विक कृषि निर्यात में हिस्सा कम है (स्रोत: डब्लूटीओ का ट्रेड स्टैटिस्टिकल रिव्यू, 2022)। उत्पादन क्षमता और निर्यात प्रदर्शन के बीच यह अंतर इस क्षेत्र में छिपी संभावनाओं को दर्शाता है।</p>
<p>प्रमुख परफॉर्मेंस इंडिकेटरः &nbsp;चावल कुल कृषि निर्यात में 20% से अधिक योगदान देता है। शीर्ष 5 जिंस (बासमती चावल, गैर-बासमती चावल, चीनी, मसाले, तिलहन) कुल कृषि निर्यात में 51.5% योगदान करते हैं। कृषि और संबंधित क्षेत्र के कुल निर्यात में समुद्री उत्पाद का हिस्सा सबसे अधिक रहता है। कॉफी निर्यात में 12.3% की मजबूत वृद्धि देखी गई। चाय निर्यात में 10 वर्षों में अधिकतम 10% वृद्धि हुई। फल और सब्जियों का निर्यात 14% बढ़ा। मांस, डेयरी और पोल्ट्री का निर्यात 12.4% बढ़ा।</p>
<p>निर्यात प्रतिबंधों का प्रभावः 2023-24 में चावल, गेहूं और चीनी के निर्यात पर प्रतिबंध लगे। इन प्रतिबंधों के कारण कृषि निर्यात में 8.2% की गिरावट आई। घरेलू खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए लागू नीतिगत उपायों ने निर्यात प्रदर्शन को प्रभावित किया।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/07/image_750x_6868fb88b7bce.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>प्रमुख निर्यात कमोडिटी</strong></p>
<p><strong>समुद्री उत्पाद: श्रेष्ठ प्रदर्शन</strong><br />मरीन प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट्स डेवलपमेंट अथॉरिटी के अनुसार 2023-24 में भारत से समुद्री उत्पादों का निर्यात रिकॉर्ड 17,81,602 टन तक पहुंच गया। इसका मूल्य 60,524 करोड़ रुपये (7.38 अरब डॉलर) से अधिक था। हालांकि रेड सी में भू-राजनैतिक चुनौतियों और अमेरिका, यूरोपीय संघ और इंग्लैंड जैसे बड़े बाजारों में महंगाई से उपभोक्ता मांग में कमी के चलते निर्यात मूल्य में 5.39% गिरावट आई (2022-23 के 63,969 करोड़ रुपये के मुकाबले 2023-24 में 60,524 करोड़ रुपये), लेकिन निर्यात मात्रा में 2.67% की बढ़ोतरी हुई। यह भारत सरकार की विभिन्न पहलों, जैसे प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना और मत्स्य विभाग की ब्रांडिंग, इनोवेशन और इन्फ्रास्ट्रक्चर के विकास का परिणाम है।</p>
<p>भारत ने 2023-24 में 132 देशों को समुद्री उत्पाद निर्यात किए, जिनमें 6 नए बाजार भी शामिल हैं- सूरीनाम, चाड, सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक, मायोत्ते, सिएरा लियोन और ग्वाडेलूप। वर्ष 2024-25 में समुद्री उत्पाद निर्यात में वृद्धि जारी रही। फरवरी 2024 में 0.49 अरब डॉलर की तुलना में फरवरी 2025 में इनका निर्यात 0.51 अरब डॉलर हो गया। कुल निर्यात 7.2 अरब डॉलर का रहा, जो अंतरराष्ट्रीय व्यापार में जारी भू-राजनैतिक चुनौतियों के बावजूद मजबूत प्रदर्शन को दर्शाता है।</p>
<p><strong>चावल: कृषि निर्यात का दिग्गज</strong><br />चावल भारत का सबसे बड़ा कृषि निर्यात उत्पाद है और कुल कृषि निर्यात में इसका 20% से अधिक हिस्सा है। 2022-23 में भारत से 11.14 अरब डॉलर का चावल निर्यात हुआ जो 2021-22 में 9.67 अरब डॉलर से 15.22% अधिक था। 2023-24 में भारत ने दुनिया में सबसे अधिक, 165 लाख टन चावल निर्यात किया। सरकार द्वारा 16 मई 2025 को जारी नए आंकड़ों के अनुसार, 2024-25 में भारत ने चावल निर्यात में रिकॉर्ड 12.5 अरब डॉलर की उपलब्धि हासिल की, जो 2023-24 के 10.4 अरब डॉलर से काफी ज्यादा है।</p>
<p><strong>अन्य प्रमुख वस्तुएं</strong></p>
<p>मसाले: मसालों का निर्यात थोड़ा बढ़कर 2024-25 में 4.45 अरब डॉलर का रहा, जबकि पिछले वित्त वर्ष में यह 4.25 अरब डॉलर था।</p>
<p>कॉफी: 2024-25 में कॉफी का निर्यात 1.81 अरब डॉलर रहा, जो 2023-24 में 1.29 अरब अमेरिकी डॉलर था। भारत से कॉफी का निर्यात 2023 में 12.3% बढ़कर 114.62 करोड़ किलो हो गया।</p>
<p>चाय: भारत के चाय निर्यात ने भी 10 वर्षों के उच्चतम स्तर को छू लिया। वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों के बावजूद यह 2024 में 25.5 करोड़ किलोग्राम तक पहुंच गया। टी बोर्ड ऑफ इंडिया के अनुसार यह पिछले वर्ष के 23.16 करोड़ किलोग्राम से 10 प्रतिशत ज्यादा है। वैल्यू के लिहाज से देखें तो निर्यात 2023-24 के 0.83 अरब डॉलर से बढ़कर 2024-25 में 0.92 अरब डॉलर हो गया।</p>
<p>भेड़ और बकरी का मांस: भारत विश्व में भेड़ और बकरी के मांस के सबसे बड़े निर्यातकों में है। 2022-23 में इसका 6.9 करोड़ डॉलर से अधिक का निर्यात हुआ था। एक साल पहले की तुलना में इसमें अच्छी वृद्धि हुई। वर्ष 2022-23 के दौरान भारत ने वैश्विक बाजारों में 9,592.31 टन भेड़-बकरी का मांस निर्यात किया, जिसकी भारतीय मुद्रा में कीमत 537.18 करोड़ रुपये थी। प्रमुख निर्यात गंतव्य संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत, मालदीव और ओमान थे। 2022 और 2023 के बीच सबसे तेजी से बढ़ते निर्यात बाजार संयुक्त अरब अमीरात (82.9 लाख डॉलर), बहरीन (6.63 लाख डॉलर) और कुवैत (4.53 लाख डॉलर) थे।</p>
<p><strong>कृषि निर्यात की चुनौतियां</strong></p>
<p><strong>नीति संबंधी चुनौतियां</strong></p>
<p>बार-बार निर्यात प्रतिबंध: चावल और चीनी के निर्यात पर बार-बार प्रतिबंध ने वैश्विक बाजारों में भारत की विश्वसनीयता प्रभावित की, जिससे खरीदारों का विश्वास घटा है। प्रतिबंध लगाना न केवल ग्लोबल साउथ के कम समृद्ध देशों की खाद्य सुरक्षा को प्रभावित करता है, बल्कि एक भरोसेमंद खाद्य आपूर्तिकर्ता के रूप में भारत की छवि को भी कमजोर करता है।</p>
<p>सीमित निर्यात उत्पादः भारत के कृषि निर्यात का आधार मुख्य रूप से पांच वस्तुओं पर निर्भर है, जिससे यह क्षेत्र वैश्विक कीमतों और मांग में उतार-चढ़ाव के प्रति संवेदनशील हो जाता है।</p>
<p>प्रसंस्कृत उत्पादों का कम हिस्सा: प्रसंस्कृत कृषि निर्यात का हिस्सा अपेक्षाकृत कम है। यह कुल कृषि निर्यात का लगभग 17% है। यह अमेरिका (लगभग 25%) और चीन (लगभग 50%) की तुलना में काफी कम है।</p>
<p><strong>इन्फ्रास्ट्रक्चर और गुणवत्ता की समस्याएं</strong></p>
<p>इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी: कोल्डचेन इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी और अपर्याप्त लॉजिस्टिक्स बड़ी बाधाएं हैं। फार्मगेट पैकहाउस (कोल्ड रूम वाले प्री-कूलिंग यूनिट्स) या अन्य कोल्डचेन घटकों की जरूरत के प्रति जागरूकता बहुत कम है। एपीडा के अनुसार देश के लगभग 40% खाद्य पदार्थ खराब हो जाते हैं, जिससे किसानों की आय पर गहरा प्रभाव पड़ता है।</p>
<p>गुणवत्ता और मानक: कीटों-बीमारियों के प्रभाव और जागरूकता की कमी के कारण भारतीय कृषि निर्यात के लिए निरंतर गुणवत्ता सुनिश्चित करना और अंतरराष्ट्रीय सैनिटरी तथा फाइटो-सैनिटरी मानकों का पालन करना एक बड़ी चुनौती है।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/07/image_750x_6868fb8854dce.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>संरचनात्मक चुनौतियां</strong><br />छोटी जोतः छोटी और सीमांत जोत के साथ कर्ज मिलने में कठिनाई कमर्शियल उत्पादन की ओर जाने में लगातार चुनौतियां उत्पन्न करती है। भारत में दो हेक्टेयर से कम जमीन वाले छोटे और सीमांत किसान 86.2% हैं। छोटी जोत और कम मैकेनाइजेशन इकोनॉमी ऑफ स्केल हासिल करने में बाधक हैं।</p>
<p><strong>सरकार की पहल और नीतिगत रूपरेखा</strong><br />कृषि निर्यात नीति 2018ः सरकार ने दिसंबर 2018 में व्यापक कृषि निर्यात नीति पेश की। इसका उद्देश्य उचित नीतिगत उपायों से निर्यात संभावनाओं का दोहन करना, भारत को कृषि क्षेत्र में वैश्विक शक्ति बनाना और किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य में मदद करना था। प्रमुख उद्देश्यों में एक दशक में कृषि निर्यात को 100 अरब डॉलर तक पहुंचाना और वैश्विक मूल्य श्रृंखला के साथ एकीकरण को प्राथमिकता देकर विश्व कृषि निर्यात में भारत का हिस्सा दोगुना करना शामिल हैं।&nbsp;</p>
<p><strong>राष्ट्रीय सहकारी निर्यात लिमिटेड: एक परिवर्तनकारी पहल</strong><br />भारत के कृषि निर्यात में हाल की सबसे महत्वपूर्ण पहल राष्ट्रीय सहकारी निर्यात लिमिटेड के गठन के रूप में हुई है। एनसीईएल को 25 जनवरी 2023 को बहु-राज्य सहकारी समिति अधिनियम, 2002 के तहत पंजीकृत किया गया।</p>
<p>संरचना और प्रमोटरः एनसीईएल एक बहुराज्यीय सहकारी समिति है, जिसे देश की कुछ प्रमुख सहकारी समितियों ने संयुक्त रूप से प्रमोट किया है। इनमें अमूल, इफको, कृभको, नाफेड और राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (एनसीडीसी) शामिल हैं। एनसीईएल की अधिकृत शेयर पूंजी 2,000 करोड़ रुपये है। प्राथमिक से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक की सभी सहकारी समितियां इसका सदस्य बनने के लिए पात्र हैं।</p>
<p><strong>कैसे एनसीईएल कृषि निर्यात को बढ़ावा दे रहा हैः</strong><br />1. शीर्ष संगठन: एनसीईएल सहकारी क्षेत्र से निर्यात के लिए एक अंब्रेला संगठन के रूप में कार्य करता है तथा हर स्तर और क्षेत्र में निर्यात को बढ़ावा देता है। इससे सहकारी समितियों की विदेशी बाजारों में निर्यात क्षमता बढ़ती है।<br />2. समग्र निर्यात पारिस्थितिकी तंत्र: एनसीईएल कृषि वस्तुओं के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए एक पूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र प्रदान करता है। इसमें खरीद, भंडारण, प्रसंस्करण, मार्केटिंग, ब्रांडिंग, लेबलिंग, पैकेजिंग, सर्टिफकेशन, अनुसंधान एवं विकास और व्यापार शामिल हैं।<br />3. मूल्य संवर्धन और गुणवत्ता सुधार: एनसीईएल सहकारी समितियों को वैल्यू एडिशन और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार उत्पाद की गुणवत्ता सुधारने में सहायता करता है ताकि सहकारी निर्यात अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धी बन सके।<br />4. निर्यात समर्थन सेवाएं: इसकी सेवाएं हैं- निर्यात सर्टिफिकेशन और लॉजिस्टिक्स में सहायता, वित्तीय सहायता और तकनीकी मार्गदर्शन देना, प्रशिक्षण और क्षमता विकास, अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय बाजार के लिए रिसर्च करना, बाजार इंटेलिजेंस सिस्टम बनाना, निर्यात से संबंधित परामर्श सेवाएं, सहकारी निर्यात के लिए नॉलेज रिपॉजिटरी बनाना और उसका रखरखाव, ब्रांडिंग, लेबलिंग और पैकेजिंग में समर्थन।<br />5. किसान-केंद्रित दृष्टिकोण<br />6. बाजार पहुंच और मूल्य प्राप्ति: एनसीईएल किसानों को विदेशी बाजारों में उनके उत्पादों के लिए अधिक मूल्य प्राप्त करने में सहायता करता है।</p>
<p><strong>रणनीतिक महत्व</strong><br />एनसीईएल कृषि निर्यात में कई महत्वपूर्ण चुनौतियों का समाधान करता है:<br />&bull; निर्यात बाजार की समस्याओं का समाधान: सघन प्रतिस्पर्धा, एकाधिकार, कुप्रथाएं, इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी और मानकीकरण जैसी समस्याओं से निपटना।<br />&bull; सहकारिता की ताकत का उपयोग: कृषि पर निर्भर भारत की 60% आबादी के लिए व्यापक सहकारी नेटवर्क का लाभ उठाना।<br />&bull; समग्र सरकारी दृष्टिकोण: निर्यात से जुड़ी विभिन्न मंत्रालयों की योजनाओं और नीतियों के लाभ सहकारी समितियों तक प्रभावी तरीके से पहुंचाना।<br />&bull; समावेशी विकास मॉडल: सरकार के "सहकार से समृद्धि" के उद्देश्य को पूरा करने की दिशा में काम करना।</p>
<p><strong>भविष्य की संभावनाएं और सुझाव</strong><br />निर्यात वृद्धि के लिए एनसीईएल का उपयोगः एनसीईएल भारत के कृषि निर्यात के दृष्टिकोण में एक क्रांतिकारी बदलाव का प्रतिनिधित्व करता है। सहकारी समितियों की सामूहिक शक्ति का उपयोग करके एनसीईएल 100 अरब डॉलर के कृषि निर्यात लक्ष्य को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।</p>
<p>सहकारी भागीदारी का विस्तार: 10,000 से अधिक सहकारी समितियों को सदस्य के रूप में जोड़ने और इसके व्यापक विस्तार की संभावना के साथ, एनसीईएल देश भर के लाखों छोटे किसानों के उत्पादन को एग्रीगेट कर सकता है।</p>
<p>गुणवत्ता और मानकीकरण: तकनीकी मार्गदर्शन और गुणवत्ता सुधार में सहायता प्रदान करके, एनसीईएल सुनिश्चित कर सकता है कि सहकारी उत्पाद अंतरराष्ट्रीय मानकों को निरंतर पूरा करें।</p>
<p>ब्रांड निर्माण: सामूहिक ब्रांडिंग और मार्केटिंग प्रयासों के माध्यम से एनसीईएल भारतीय कृषि उत्पादों के लिए वैश्विक बाजारों में मजबूत ब्रांड की पहचान बना सकता है।<br />जोखिम कम करनाः इसका अंब्रेला स्ट्रक्चर छोटी सहकारी समितियों को कम जोखिम के साथ अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचने में मदद करता है।</p>
<p><strong>प्रौद्योगिकी और नवाचार</strong><br />कृषि निर्यात को बड़ा बूस्ट नई तकनीक और बिजनेस मॉडल में नए विचारों और इनोवेशन से आएगा। इस संदर्भ में स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र का समर्थन और उनकी समृद्धि के लिए नीतियां अत्यंत लाभकारी सिद्ध हो सकती हैं। प्रौद्योगिकी और इनोवेशन भारतीय कृषि को पूरी तरह बदल रहे हैं, और दक्षता व सस्टेनेबिलिटी के नए युग की शुरुआत कर रहे हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म और एग्रीटेक समाधान किसानों को वास्तविक समय के डेटा, प्रिसीजन खेती की तकनीक और स्वचालित सिंचाई प्रणालियों से सशक्त बनाते हैं। एआई-संचालित उपकरण फसल प्रबंधन, रोगों का शीघ्र पता लगाने और उर्वरक प्रयोग के ऑप्टिमाइजेन में मदद करते हैं, जिससे अपव्यय कम होता है और उपज बढ़ती है।&nbsp;</p>
<p>मोबाइल एप्लिकेशन, सेंसर नेटवर्क और ड्रोन निगरानी जैसे इनोवेशन सूचना की खामियों को दूर कर किसानों को बाजारों और वित्तीय सेवाओं से जोड़ते हैं। यह तकनीकी क्रांति उत्पादकता बढ़ाने के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाती है। एनसीईएल उन्नत कृषि तकनीक, प्रिसीजन खेती और सक्षम सिंचाई को बढ़ावा देने के साथ कृषि स्टार्टअप और इनोवेटिव समाधानों को सशक्त बनाने का प्रयास कर रहा है ताकि उत्पादकता और निर्यात दक्षता को बढ़ाया जा सके।</p>
<p><strong>मूल्य संवर्धन और प्रसंस्करण</strong><br />कृषि उपज का मूल्य संवर्धन और प्रसंस्करण भारत की निर्यात संभावनाओं को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्नत प्रसंस्करण तकनीक उत्पाद की शेल्फ लाइफ और पोषकता बढ़ाती हैं। इससे वैश्विक उपभोक्ताओं को आकर्षित किया जा सकता है। जल्दी नष्ट होने वाली वस्तुओं को प्रसंस्कृत उत्पादों में परिवर्तित करने से कटाई के बाद होने वाले नुकसान कम होते हैं और खाद्य सुरक्षा मजबूत होती है। इसके अतिरिक्त मूल्य संवर्धन से उत्पाद की ब्रांडिंग होती है और प्रीमियम बाजारों तक पहुंच संभव होती है। आधुनिक प्रोसेसिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर में निवेश और नई तकनीक अपनाकर भारत कृषि निर्यात काफी बढ़ा सकता है, जिससे किसानों को अधिक लाभ मिलेगा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में प्रतिष्ठा भी बढ़ेगी।</p>
<p><strong>बाजार विविधीकरण</strong><br />निर्यात बढ़ाने के लिए सरकार ने विकसित देशों में उच्च निर्यात संभावना वाले 20 कृषि उत्पादों की पहचान की है। इनमें केले, आम, काजू, भैंस का मांस और शराब भी शामिल हैं। 2022 में ऐसे उत्पादों के 400 अरब डॉलर के वैश्विक बाजार में भारत का हिस्सा केवल 2.23 प्रतिशत था, जो 9 अरब डॉलर के बराबर है। लक्ष्य अगले कुछ वर्षों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में 4 से 5 प्रतिशत हिस्सेदारी हासिल करना है।</p>
<p><strong>नीतिगत सुझाव</strong><br />सुसंगत व्यापार नीतियां: अर्थशास्त्रियों का सुझाव है कि अस्थायी शुल्क जैसे नियम-आधारित और पूर्वानुमान योग्य नीतियां अपनाई जाएं ताकि निर्यात में अचानक बाधा न आए।</p>
<p>इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास: सरकार को आवश्यक कमोडिटी का बफर स्टॉक रखना चाहिए ताकि मूल्यों में अस्थिरता को कम किया जा सके और बाजार में स्थिरता सुनिश्चित हो।</p>
<p>गुणवत्ता में वृद्धि: अंतरराष्ट्रीय मानकों को पूरा करने और गुणवत्ता सुनिश्चित करने का तंत्र विकसित करने पर ध्यान देना चाहिए ताकि वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़े।</p>
<p>एनसीईएल का संचालन: एनसीईएल की पहुंच को अधिक सहकारी समितियों तक बढ़ाना, इसकी तकनीकी क्षमताओं को विस्तार देना ताकि संचालन का स्तर ऊंचा हो सके।<br />भारत का कृषि निर्यात एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। यहां इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी, छोटी जोत और नीतियों में अस्थिरता जैसी चुनौतियां मौजूद हैं। लेकिन इस क्षेत्र की संभावनाएं विशाल हैं। प्रौद्योगिकी अपनाने, मूल्य संवर्धन, इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास और नीतिगत स्थिरता पर केंद्रित कदमों के साथ भारत कृषि निर्यात में 100 अरब डॉलर के लक्ष्य को साकार कर सकता है। इस प्रयास की सफलता से न केवल विदेशी मुद्रा और किसानों की आय बढ़ेगी, बल्कि भारत को वैश्विक कृषि बाजार में एक विश्वसनीय और प्रतिस्पर्धी खिलाड़ी के रूप में स्थापित करेगी। आगे का सफर सरकार, निजी क्षेत्र और कृषि समुदायों के समन्वित प्रयासों की मांग करता है।&nbsp;<br /><em>(लेखक राष्ट्रीय सहकारी निर्यात लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर हैं)</em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ कृषि निर्यात में कई बाधाओं के बावजूद व्यापक संभावनाएं ]]></media:description>
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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कृषि निर्यात का हब बनने में भारत की चुनौतियां]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/the-challenges-before-indias-emergence-as-an-agricultural-export-hub.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 05 Jul 2025 14:26:39 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/the-challenges-before-indias-emergence-as-an-agricultural-export-hub.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>दिसंबर 2018 में सरकार ने पहली बार एक महत्वाकांक्षी कृषि निर्यात नीति की घोषणा की थी। उससे पहले भारत की कृषि नीति का मुख्य उद्देश्य घरेलू खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना था। निर्यात नीति इस उद्देश्य में एक महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाती थी। कृषि नीति में यह बदलाव लंबे समय से अपेक्षित था, क्योंकि हरित क्रांति की रणनीति ने भारत को खाद्य के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बना दिया था और आयात पर निर्भरता की स्थिति दोबारा लौटने की कोई आशंका नहीं रह गई थी।</p>
<p>कृषि निर्यात नीति कई मायने में महत्वपूर्ण कही जा सकती है। पहला, इसे निर्यातोन्मुखी उत्पादन पर केंद्रित करके तैयार किया गया था, जिसे भारत सरकार द्वारा अपनाई गई नीतियों और कार्यक्रमों के साथ समन्वित किया जाना था। दूसरा, इस नीति ने किसान केंद्रित दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल दिया, जिसका उद्देश्य अधिक मूल्य संवर्धन के माध्यम से किसानों की आय में सुधार करना था, ताकि वैल्यू चेन में होने वाले नुकसान को कम किया जा सके। तीसरा, इस नीति ने एक किसान उन्मुख रणनीति की आवश्यकता को रेखांकित किया, जो खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ भारत को विश्व का एक प्रमुख कृषि निर्यातक बनाने के दोहरे लक्ष्य को प्राप्त कर सके। इस नीति का एक और उद्देश्य खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को प्रोत्साहन देना था, जिससे भारत के कृषि निर्यात बास्केट में मूल्य संवर्धित और प्रसंस्कृत उत्पादों की हिस्सेदारी बढ़ सके तथा भारत वैश्विक स्तर पर एक प्रमुख निर्यातक के रूप में उभर सके।</p>
<p>अपने व्यापक उद्देश्यों के अलावा कृषि निर्यात नीति में कई विशिष्ट लक्ष्य भी शामिल थे। पहला, विश्व कृषि निर्यात में भारत की हिस्सेदारी को दोगुना करते हुए इसे वैश्विक मूल्य श्रृंखला से शीघ्र जोड़ना और भारत के कृषि निर्यात को 2022 तक दोगुना कर 60 अरब डॉलर तक पहुंचाना। इससे किसानों को विदेशी बाजारों में निर्यात के अवसरों का लाभ मिलता। सरकार ने 2016 में किसानों की आय को 2022 तक दोगुना करने का लक्ष्य निर्धारित किया था और कृषि निर्यात को बढ़ावा देना इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए आवश्यक माना गया था। दूसरा लक्ष्य निर्यात बास्केट तथा गंतव्यों में विविधता लाना और अधिक मूल्य वाले एवं मूल्य वर्धित कृषि निर्यात को बढ़ावा देना था। इसमें जल्दी नष्ट होने वाले उत्पादों पर विशेष ध्यान दिया जाना था। तीसरा लक्ष्य था एक संस्थागत तंत्र उपलब्ध कराना, जो बाजार तक पहुंच सुनिश्चित करे, निर्यात बाधाओं को दूर करे और सैनिटरी तथा फाइटो-सैनिटरी मुद्दों से निपटे। ये सैनिटरी तथा फाइटो-सैनिटरी मुद्दे मानव, पशु, पर्यावरण तथा स्वास्थ्य मानकों से संबंधित हैं तथा वैश्विक बाजारों में भारत की उपस्थिति बढ़ाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/07/image_750x_6868e884aa21a.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>विवादास्पद कृषि सुधार</strong>&nbsp;<br />2020 में पेश विवादास्पद कृषि सुधार भारत को कृषि निर्यात केंद्र में बदलने की दिशा में एक और कदम था। आवश्यक वस्तु अधिनियम 2020 ने कृषि उपज बाजार को विनियमन मुक्त कर दिया और इससे निर्यात को बढ़ावा मिलने की अपेक्षा की गई थी। इस अधिनियम में संशोधन कर बाजार को रेगुलेशन से मुक्त किया गया ताकि उत्पादन, भंडारण, परिवहन, वितरण और आपूर्ति की स्वतंत्रता दी जा सके, बड़े पैमाने पर उत्पादन का लाभ उठाया जा सके और कृषि में निजी क्षेत्र तथा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को आकर्षित किया जा सके। सरकार का तर्क था कि भारत अब अधिकांश कृषि उपज में अधिशेष की स्थिति में है, लेकिन कोल्ड स्टोरेज, गोदाम, प्रसंस्करण और निर्यात में निवेश की कमी के कारण किसानों को बेहतर मूल्य नहीं मिल रहा है। सरकार के मुताबिक आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत लगाए गए भंडारण प्रतिबंधों ने उद्यमशीलता की भावना को कमजोर कर दिया था।</p>
<p>2022 में विदेश व्यापार महानिदेशालय ने जिलों को निर्यात हब के रूप में स्थापित करने की पहल की। इसका उद्देश्य देश के 733 जिलों में कृषि और अन्य ऐसे उत्पादों की पहचान करना था जिनमें निर्यात की संभावनाएं हैं।&nbsp;</p>
<p>इस पहल के तीन प्रमुख उद्देश्य हैं जो निर्यात को बढ़ावा देने से संबंधित हैं:<br />(i) भारत के निर्यात गंतव्य वाले देशों में विविधता लाना और अधिक मूल्य व मूल्य वर्धित कृषि निर्यात को बढ़ावा देना। इसमें जल्दी नष्ट होने वाली वस्तुओं पर विशेष ध्यान देना शामिल है।<br />(ii) नए, देसी, जैविक, पारंपरिक और गैर-पारंपरिक कृषि उत्पादों के निर्यात को प्रोत्साहित करना।<br />(iii) किसानों को निर्यात के अवसरों का लाभ उठाने योग्य बनाना।</p>
<p>2023 की विदेश व्यापार नीति ने इस जिला निर्यात हब पहल को औपचारिक वैधता प्रदान की। इसके लिए संस्थागत तंत्र की स्थापना की गई ताकि देश के चिन्हित जिलों को निर्यात हब के रूप में विकसित किया जा सके। 2025 में 765 जिलों में जिला निर्यात संवर्धन समितियों को यह जिम्मेदारी सौंपी गई कि वे निर्यात की संभावना वाले उत्पादों और सेवाओं की पहचान करें, उनके निर्यात में आने वाली बाधाओं को दूर करें, स्थानीय निर्यातकों/निर्माताओं को स्केल हासिल करने में मदद करें और संभावित विदेशी खरीदारों तक पहुंचने में उनकी सहायता करें।</p>
<p>2018 से कृषि निर्यात को बढ़ावा देने के लिए उल्लेखनीय प्रयास किए गए हैं, ऐसे में यह उपयोगी होगा कि कृषि निर्यात नीति को अपनाए जाने के बाद से अब तक के प्रदर्शन का मूल्यांकन किया जाए। यहां यह उल्लेख किया सकता है कि जब यह नीति लागू की गई थी, तब इसका एक प्रमुख उद्देश्य 2022 तक कृषि उत्पादों के निर्यात को दोगुना करना था।</p>
<p>भारत को एक प्रमुख कृषि निर्यात केंद्र के रूप में स्थापित करने में जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, उन्हें 2018 में कृषि निर्यात नीति अपनाए जाने के बाद की घटनाओं से स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। वाणिज्य विभाग के डायरेक्टरेट जनरल ऑफ कॉमर्शियल इंटेलिजेंस एंड स्टैटिस्टिक्स (DGCI&amp;S) के आंकड़े दिखाते हैं कि कृषि और संबद्ध उत्पादों का निर्यात 2018-19 के लगभग 37 अरब डॉलर से बढ़कर 2024-25 (अप्रैल से फरवरी) में लगभग 46 अरब डॉलर हो गया। यानी इसमें करीब 24% की वृद्धि हुई। हालांकि 2018 के बाद कृषि उत्पादों के निर्यात में यह वृद्धि न केवल कृषि निर्यात नीति में निर्धारित &lsquo;2022 तक निर्यात दोगुना करने&rsquo; के लक्ष्य से काफी कम रही, बल्कि यह भारत की कुल निर्यात वृद्धि से भी कम थी। इस दौरान भारत का कुल निर्यात 30% बढ़ा। भारत के कुल निर्यात में कृषि उत्पादों का हिस्सा 11-12% के बीच बना रहा। सिर्फ 2020-21 में खाद्य उत्पादों को छोड़कर अन्य सभी उत्पादों के निर्यात में तेज गिरावट आई थी।</p>
<p>गैर-बासमती चावल के निर्यात में वृद्धि पिछले दशक की शुरुआत से ही उल्लेखनीय रही है। उस समय सिर्फ 5 करोड़ डॉलर का गैर-बासमती चावल निर्यात हुआ था, लेकिन डेढ़ दशक बाद यह 10 गुना से अधिक बढ़कर 6 अरब डॉलर तक पहुंच गया। वर्ष 2020-21 में गैर-बासमती चावल का निर्यात पहली बार भारत के सबसे लोकप्रिय कृषि निर्यात उत्पाद, बासमती से अधिक हो गया। गैर-बासमती चावल के निर्यात में वृद्धि ने न केवल वैश्विक चावल निर्यात बाजार पर भारत की पकड़ को मजबूत किया, बल्कि कई उप-सहारा अफ्रीकी देशों के साथ व्यापारिक संबंधों को भी बेहतर किया। चावल की इस किस्म के निर्यात का एक बड़ा हिस्सा इन्हीं देशों को जाता है। वर्ष 2024-25 में कुल निर्यात का 51% से अधिक हिस्सा इन देशों को गया। इनमें बेनिन, कोट डी आइवोर और सेनेगल सबसे प्रमुख बाजार रहे। विशेष रूप से कोविड महामारी के दौरान गैर-बासमती चावल के निर्यात में तेज वृद्धि ने अधिकांश आयातक देशों को कोविड के बाद उत्पन्न संकट से उबरने में मदद की।</p>
<p>वर्ष 2024-25 में निर्यात के लिहाज से छह सबसे बड़े कमोडिटी ग्रुप - चावल, समुद्री उत्पाद, मसाले, भैंसे का मांस, चीनी और ऑयल मील - का कृषि और संबद्ध उत्पादों के कुल निर्यात में लगभग 63% हिस्सा रहा। 2018 में इन उत्पादों की हिस्सेदारी कुल कृषि और संबद्ध उत्पादों के निर्यात में लगभग दो-तिहाई थी। 2020-21 में चरम पर पहुंचने के बाद इस आंकड़े में गिरावट आई।&nbsp;</p>
<p>इस अवधि में चावल का निर्यात सबसे तेजी (48%) से बढ़ा। गैर-बासमती चावल के निर्यात में लगभग दोगुनी वृद्धि हुई, जबकि जुलाई 2023 से सितंबर 2024 के बीच सरकार ने घरेलू बाजार को स्थिर करने के उद्देश्य से चावल निर्यात पर प्रतिबंध लगाया था। हालांकि सरकार ने खाद्य सुरक्षा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कुछ देशों को उनके अनुरोध पर चावल निर्यात की अनुमति दी थी। दूसरी ओर, समुद्री उत्पादों का निर्यात 2017-18 से 2024-25 के बीच घटा, जबकि भैंसे के मांस का निर्यात मामूली 3% की दर से बढ़ा। उत्पादन चक्र से प्रभावित होने के बावजूद चीनी निर्यात में 37% की वृद्धि दर्ज की गई। ऑयल मील का निर्यात 2017-18 से लगभग 19% गिर गया।</p>
<p>कृषि निर्यात को लेकर सकारात्मक उम्मीदें पिछले दशक के अंत से ही बननी शुरू हो गई थीं, लेकिन ये उम्मीदें बहुत जल्दी गायब भी हो गईं। इन उम्मीदों को 2022-23 में तब झटका लगा जब गेहूं के भंडार में कमी के संकेत मिले। गेहूं उत्पादन में भारी गिरावट के कारण इसका निर्यात 2023-24 में घटकर 5.4 करोड़ डॉलर का रह गया, जो 2011-12 के बाद का सबसे निचला स्तर था। गर्मी की लहर ने 2023 से गेहूं उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव डाला, जिसके परिणामस्वरूप 2024-25 में इसके निर्यात में तेज गिरावट आई और यह केवल 16 लाख डॉलर रह गया।&nbsp;</p>
<p>इस प्रकार तीन साल के भीतर गेहूं निर्यात 2.2 अरब डॉलर से घटकर केवल 16 लाख डॉलर रह गया। इसने यह अहसास दिलाया कि प्रमुख कृषि उपज के उत्पादन में उतार-चढ़ाव से बड़ी अनिश्चितताएं उत्पन्न हो सकती हैं। चावल के अलावा अधिकांश फसलें पिछले कुछ वर्षों में उत्पादन चक्र से नहीं निपट पाईं, जिससे गंभीर आपूर्ति संकट उत्पन्न हुआ। इसका नतीजा यह हुआ कि बासमती चावल के निर्यात को छोड़कर भारत अन्य कृषि उपज का प्रमुख निर्यातक नहीं बन सका। इस सेक्टर में संरचनात्मक संकट तो था ही, किसान भी इस बात पर आंदोलित होने लगे कि कृषि अब लाभकारी व्यवसाय नहीं रह गया है। ऐसे में अधिकांश फसलों के उत्पादन के स्तर को बनाए रखना एक कठिन कार्य था।</p>
<p>एक सकारात्मक बात यह है कि फल और सब्जियां समेत प्रसंस्कृत कृषि उत्पादों के निर्यात में निरंतर वृद्धि हुई है। 2017-18 और 2024-25 के बीच प्रसंस्कृत उत्पादों का निर्यात लगभग दोगुना हो गया है। भारत को इन उत्पादों पर अधिक ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है ताकि मूल्य संवर्धन और रोजगार के अवसर बढ़ सकें। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र कृषि निर्यात नीति के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए बेहतर स्थिति में है।</p>
<p><strong>खाद्य संरक्षा मानक</strong><br />भारत के कृषि उत्पादों के निर्यात को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करने में उत्पादन स्तर में अनिश्चितता एकमात्र कारक नहीं थी। एक और महत्वपूर्ण कारक है कि निर्यातकों में लगातार सख्त होते सैनिटरी और फाइटो-सैनिटरी मानकों के अनुसार खुद को ढालने की क्षमता होनी चाहिए। ये मानक न केवल विकसित देशों में, बल्कि विकासशील देशों में भी लागू हो रहे हैं।</p>
<p>यूरोपीय संघ (ईयू) के सदस्य देशों और अमेरिका में खाद्य उत्पादों के आयात से उत्पन्न वास्तविक या संभावित जोखिम के बारे में चेतावनी जारी करने का व्यापक तंत्र हैं। ईयू के सदस्य देशों में फूड और फीड के लिए रैपिड अलर्ट सिस्टम (RASFF) मौजूद है, जो खाद्य या चारे में पाए गए जोखिम की जानकारी का त्वरित आदान-प्रदान करता है। यह अलर्ट सिस्टम विशेष रूप से आयात से उत्पन्न खाद्य सुरक्षा के मुद्दों पर त्वरित प्रतिक्रिया के जरिए लोगों के स्वास्थ्य की रक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अमेरिका में फेडरल ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) के पास यह सुनिश्चित करने का अधिकार है कि आयातित उत्पाद फेडरल फूड, ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट (FD&amp;C Act) और अन्य संबंधित कानूनों के साथ मेल खाते हों। यदि कोई आयात एक्ट के नियमों का पालन नहीं करता है, तो उसे &lsquo;इंपोर्ट रिफ्यूजल&rsquo; (आयात अस्वीकृति) के रूप में शामिल किया जाता है। एफडीए का यह निर्णय अंतिम होता है।</p>
<p>ईयू के आरएएसएफएफ से 2020 से प्राप्त डेटा और एफडीए के 2001 से जारी आयात अलर्ट्स का विश्लेषण बताता है कि भारतीय खाद्य निर्यातक किस हद तक इन दोनों भौगोलिक क्षेत्रों में सैनिटरी और फाइटो-सैनिटरी मानकों का पालन कर रहे हैं। एफडीए के आयात अलर्ट्स 2001 से उपलब्ध हैं। ये बताते हैं कि भारतीय खाद्य उत्पादों का निर्यात अमेरिकी मानकों की कसौटी पर कितना खरा उतरा है (ग्राफ 1)।&nbsp;</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/07/image_750x_6868e8841afa2.jpg" alt="" /></p>
<p>कोविड महामारी के बाद से भारतीय खाद्य निर्यात के लिए अमेरिकी बाजार में आयात अस्वीकृति तेजी से बढ़ी है, जो निश्चित रूप से चिंता का विषय है। 2025 में भी यह रुझान जस का तस बना हुआ है। अप्रैल के अंत तक आयात अस्वीकृति के 766 मामले दर्ज किए गए हैं। हालांकि अमेरिकी बाजार में भारतीय चावल की आयात अस्वीकृति का रुझान सकारात्मक कहा जा सकता है। 2021 के बाद इसमें हल्की वृद्धि हुई है, लेकिन किसी भी परिस्थिति में इसे और अधिक नहीं बढ़ने दिया जाना चाहिए।&nbsp;</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/07/image_750x_6868e8834c885.jpg" alt="" /></p>
<p>ईयू के आरएएसएफएफ ने 2020 से 2024 के दौरान भारत से आयातित खाद्य या चारे की 1661 खेप को विभिन्न जोखिम स्तरों के साथ चिन्हित किया। हालांकि इनमें से 12% को &lsquo;कोई जोखिम नहीं&rsquo; के रूप में चिन्हित किया गया था। ग्राफ 2 में उन खेपों के रुझान के बारे में बताया गया है जो संभावित/गंभीर जोखिम का कारण बन सकती हैं। ग्राफ 2 वर्ष 2020 से खाद्य और चारे की आयात खेपों में उच्च जोखिम के ट्रेंड को दर्शाता है। यह कुल मिलाकर एक उत्साहजनक ट्रेंड है। हालांकि 2024 में मामूली वृद्धि पर ध्यान दिया जाना चाहिए। वर्तमान वर्ष के पहले चार महीने का ट्रेंड भी उत्साहजनक दिखता है, क्योंकि इस दौरान सिर्फ 72 मामलों की पहचान की गई जिनमें से 12 मामले गंभीर नहीं थे।&nbsp;</p>
<p>हालांकि अमेरिका और ईयू में सैनिटरी और फाइटो-सैनिटरी मानकों के पालन करने का ट्रेंड यह दिखाता है कि सरकार को नए संस्थानों को खड़ा करने और मौजूदा संस्थानों को मजबूत करने पर पर्याप्त ध्यान देने की आवश्यकता है। इनके माध्यम से कृषि उत्पादक और निर्यातक वैश्विक बाजारों में प्रचलित कठिन मानकों को पूरा करने के लिए खुद को तैयार कर सकेंगे। इस तैयारी के बिना भारत का कृषि निर्यात हब बनने का सपना अधूरा रहेगा। साथ ही, सरकार को कृषि क्षेत्र में अपना निवेश बढ़ाना चाहिए ताकि प्रमुख कमोडिटी के उत्पादन को निरंतर बढ़ावा दिया जा सके। यह देश को एक विश्वसनीय कृषि निर्यात हब के रूप में उभरने के लिए महत्वपूर्ण है।&nbsp;</p>
<p><em>(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के रिटायर्ड प्रोफेसर और काउंसिल फॉर सोशल डेवलपमेंट में प्रतिष्ठित प्रोफेसर हैं)</em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ कृषि निर्यात का हब बनने में भारत की चुनौतियां ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[100 अरब डॉलर का कृषि निर्यात का महत्वाकांक्षी लक्ष्य]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/fast-tracking-indias-agri-exports.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 04 Jul 2025 16:00:40 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/fast-tracking-indias-agri-exports.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>सेवा क्षेत्र की ग्रोथ चरम पर पहुंच चुकी है और यह 1990 से 2010 तक के दशकों की तरह रोजगार उत्पन्न नहीं कर रही है। मैन्युफैक्चरिंग पूंजी-प्रधान होती जा रही है और ऑटोमेशन बढ़ने से श्रमिक बाहर हो रहे हैं। ऐसे में इस बात पर व्यापक सहमति बन रही है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र की भूमिका लगातार बढ़ती जाएगी। कृषि क्षेत्र को न केवल उत्पादन बढ़ाना होगा, बल्कि वैल्यू एडिशन के जरिए रोजगार भी उत्पन्न करने होंगे। लेकिन यह तभी संभव है जब भारतीय किसानों को अपनी उपज के लिए ऐसे बाजार मिलें जहां उन्हें बेहतर मूल्य प्राप्त हो सके। इसके लिए किसानों को घरेलू के साथ अंतरराष्ट्रीय बाजारों की भी आवश्यकता है। रूरल वर्ल्ड का यह अंक कृषि निर्यात पर केंद्रित है। वर्ष 2024-25 में भारत का कृषि निर्यात लगभग 51 अरब डॉलर रहा। क्या हम 2030 तक इसे बढ़ाकर 100 अरब डॉलर तक ले जा सकते हैं?</p>
<p>कृषि निर्यात के मोर्चे पर सकारात्मक नतीजे आ भी रहे हैं, मसलन 2024-25 में बासमती और गैर-बासमती चावल का निर्यात एक लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गया, मरीन उत्पादों का निर्यात 60 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, फल-सब्जी, डेयरी और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों का निर्यात बढ़ रहा है और ऑर्गेनिक उत्पादों का निर्यात 35 फीसदी बढ़ा है। अगर हम यह गति जारी रखें और निर्यात पर केंद्रित नीतिगत फैसले, नियम और जरूरी प्रोत्साहन के साथ ढांचागत सुविधाओं पर निवेश बढ़ाएं तो 100 अरब डॉलर के कृषि निर्यात का लक्ष्य हासिल कर सकते हैं।&nbsp;</p>
<p>यह बहुत ही महत्वाकांक्षी लक्ष्य है, इसलिए सरकार को जरूरी नीति और निवेश पर फोकस करना होगा। हालांकि यह राह बहुत आसान नहीं है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रेसिप्रोकल टैरिफ से वैश्विक व्यापार के मोर्चे पर उथल-पुथल मचा रखी। इसके साथ ही मल्टीलेटरल और नियम आधारित इंटरनेशनल ट्रेड की डब्लूटीओ व्यवस्था के अस्तित्व पर भी सवाल खड़े कर दिये हैं। नतीजा, क्षेत्रीय और द्विपक्षीय ट्रेड एग्रीमेंट (एफटीए) तेजी से अस्तित्व में आ रहे हैं। इनके अपने फायदे और नुकसान हैं, लेकिन हकीकत यह है कि हमें नई वास्तविकता को स्वीकार कर रणनीति बनानी होगी।</p>
<p>हमारे ज्यादातर कृषि उत्पाद निर्यात कमोडिटी श्रेणी में हैं और वैश्विक बाजार में कीमतें इनको सीधे प्रभावित करती हैं। घरेलू स्तर पर भी इनकी कीमतें सरकार को निर्यात से संबंधित फैसले लेने को बाध्य करती हैं, जो कई बार निर्यात के खिलाफ जाते हैं। इन उत्पादों की गुणवत्ता बड़ी चुनौती हैं। अमेरिका और यूरोपीय यूनियन के अलावा कई एशियाई देशों में भी गुणवत्ता के मानक काफी सख्त हैं। सेनेटरी और फाइटोसेनेटरी मानक भी हमारे निर्यात में बाधक बनते हैं और कई देश नॉन-टैरिफ बैरियर के रूप में इनका इस्तेमाल करते हैं। हमें किसानों के स्तर पर ही गुड एग्रीकल्चरल प्रैक्टिसेज (जीएपी) पर काम करने की जरूरत है। इसके लिए सरकार और निर्यातक दोनों को मिलकर एक्सटेंशन का ढांचा दुरुस्त करना पड़ेगा।&nbsp;</p>
<p>फिलहाल हमारे कृषि निर्यात में ज्यादातर हिस्सा करीब आधा दर्जन उत्पादों का है। इस बास्केट को बड़ा करने के साथ नए निर्यात बाजार भी तलाशने की जरूरत है। निर्यात सुविधाओं पर बड़े निवेश की जरूरत है क्योंकि निर्यात का बड़ा हिस्सा पेरिशेबल (जल्दी खराब होने वाले) उत्पादों का है। इनके लिए पैक हाउस से लेकर ग्रेडिंग और सॉर्टिंग के साथ खास पैकेजिंग और स्टोरेज व ट्रांसपोर्टेशन की जरूरत है। पोर्ट और एयरपोर्ट पर भी विशेष स्टोरेज चाहिए। इन सुविधाओं पर तो सरकार को ही निवेश करना होगा। तमाम उत्पाद ऐसे हैं जिनकी हैंडलिंग के लिए विशिष्ट कौशल वाले श्रमिकों की जरूरत है।</p>
<p>रूरल वर्ल्ड के इस अंक में हमने यह बताने की कोशिश की है कि 100 अरब डॉलर के कृषि निर्यात लक्ष्य के लिए किस तरह के नीतिगत फैसलों, उत्पादन और निवेश की जरूरत है। इस विषय पर आईआईएफटी के कुलपति प्रो. राकेश मोहन जोशी, काउंसिल फॉर सोशल डेवलपमेंट के विशिष्ट प्रोफेसर बिश्वजीत धर, एनसीईएल के एमडी अनुपम कौशिक, अगवाया एलएलपी के पार्टनर सिराज ए. चौधरी के लेख हैं। एपीडा चेयरमैन अभिषेक देव का साक्षात्कार भी इस विषय पर केंद्रित है। आईसीएआर महानिदेशक और कृषि शिक्षा विभाग (डेयर) के सेक्रेटरी डॉ. मांगी लाल जाट का साक्षात्कार भी इस अंक का हिस्सा है। उम्मीद है कि रूरल वर्ल्ड का यह अंक कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों के विकास के लिए हमारे ईमानदार प्रयास के रूप में देखा जाएगा।</p>
<p><em>(यह लेख सर्वप्रथम रूरल वर्ल्ड मैगजीन के मई-जुलाई 2025 अंक में संपादकीय टिप्पणी के रूप में प्रकाशित हुआ है)</em></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/06/image_750x500_68568fbed30ef.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ 100 अरब डॉलर का कृषि निर्यात का महत्वाकांक्षी लक्ष्य ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[100 अरब डॉलर का निर्यात लक्ष्यः विश्व बाजार में कैसे जगह बनाएंगे भारतीय कृषि उत्पाद]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/making-indian-agriculture-globally-competitive.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 25 Jun 2025 07:35:52 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/making-indian-agriculture-globally-competitive.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>कृषि निर्यात भारत की आजीविका और रोजगार की चुनौतियों के समाधान की कुंजी हैं। यहां कृषि लोगों की आजीविका के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह देश की 45% से अधिक आबादी को रोजगार प्रदान करती है। यह सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में लगभग 18% का योगदान करती है। भारत 142 करोड़ आबादी के साथ विश्व की सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश है। इसके लिए खाद्य सुरक्षा और आत्मनिर्भरता अत्यावश्यक है। भारत के अधिकांश कृषि उत्पादन की देश के भीतर ही खपत हो जाती है, जबकि विकसित देशों में कृषि उत्पादन का बड़ा हिस्सा अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बेचा जाता है। भारतीय कृषि की विशेषताएं बिखरी हुई जोत, जलवायु परिवर्तन के प्रति अत्यधिक संवेदनशीलता, कम उत्पादकता और विपणन अक्षमताएं हैं। इन तमाम चुनौतियों के बावजूद, भारत कई कृषि कमोडिटी का सबसे बड़ा उत्पादक देश बनकर उभरा है। दूध, दालें, जूट, चावल, गन्ना, गेहूं, कपास जैसे अनेक कृषि उपज के मामले में यह विश्व में अग्रणी है।</p>
<p>भारत ने कृषि क्षेत्र में लंबा सफर तय किया है। एक समय खाद्यान्न का आयातक रहा भारत आज विश्व का सबसे बड़ा चावल निर्यातक बन चुका है। यह वैश्विक चावल व्यापार में लगभग 40% हिस्सेदारी रखता है। भारत का कृषि निर्यात 2000-01 में 7.5 अरब डॉलर से बढ़कर 2022-23 में 53.1 अरब डॉलर हो गया, जो 8% सालाना वार्षिक वृद्धि को दर्शाता है। यह वृद्धि इस तथ्य के बावजूद हुई कि समय-समय पर चावल, चीनी, गेहूं आदि जैसे उत्पादों पर निर्यात की मात्रा या न्यूनतम निर्यात मूल्य के अंकुश लगाए गए।</p>
<p>हालांकि सालों से भारत खाद्य तेलों और दालों के आयात पर निर्भर रहा है, और इनके मूल्य में वृद्धि भारत के कृषि व्यापार संतुलन पर काफी नकारात्मक प्रभाव डालती है। वर्ष 2024 में भारत के कृषि निर्यात में 6.5% वृद्धि हुई, जबकि आयात में 18.7% बढ़ोतरी दर्ज की गई। इससे भारत का कृषि व्यापार घाटा बढ़ गया। वर्ष 2024 में भारत के प्रमुख कृषि निर्यात जैसे समुद्री उत्पाद, गैर-बासमती चावल, चीनी, बासमती चावल और मसाले कुल कृषि निर्यात का 50% से अधिक थे।</p>
<p><strong>कृषि निर्यात की प्रमुख चुनौतियां</strong><br />संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के कृषि जिंस की कीमतों के सूचकांक और वर्ल्ड बैंक के कमोडिटी प्राइस इंडेक्स से संकेत मिलता है कि कृषि जिंसों की कीमतों में गिरावट का रुझान है। वर्ल्ड बैंक ने 2025 में वैश्विक खाद्य कीमतों में लगभग 7% गिरावट और 2026 में अतिरिक्त 1% गिरावट का अनुमान लगाया है। इस परिदृश्य में यह आवश्यक हो गया है कि हमारी कृषि उत्पादन प्रणाली को मूल्य श्रृंखला के हर चरण में प्रतिस्पर्धी बनाया जाए, ताकि भारतीय कृषि उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजारों में मुकाबला कर सकें।</p>
<p>कृषि और खाद्य उत्पादों की नष्ट होने की प्रकृति के कारण आपूर्ति श्रृंखला में अनेक चुनौतियां उत्पन्न होती हैं, विशेषकर कोल्डचेन, भंडारण, परिवहन और प्रसंस्करण से संबंधित। भारतीय कृषि प्रणाली में संरचनात्मक समस्याएं हैं जिन्हें समग्र दृष्टिकोण से हल करने की आवश्यकता है। भंडारण और परिवहन की अक्षमता के कारण आपूर्ति श्रृंखला बाधित होती है, जिससे कटाई के बाद 15-20% फसल का नुकसान होता है। विकसित देश अब कृषि व्यापार में अधिक से अधिक संरक्षणवादी रुख अपना रहे हैं, जहां गुणवत्ता मानकों, उर्वरकों एवं कीटनाशकों के उपयोग तथा टिकाऊ कृषि पद्धतियों के बहाने गैर-शुल्क बाधाएं खड़ी की जा रही हैं।</p>
<p><strong>व्यापक रणनीति और सटीक कार्यान्वयन की आवश्यकता</strong><br />भारत को अपने कृषि निर्यात की पूरी क्षमता का दोहन करने के लिए खेतों और आपूर्ति शृंखला में व्याप्त अक्षमताओं को दूर करना होगा। इसके साथ ही केवल प्राथमिक वस्तुओं के बजाय वैल्यू एडिशन और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों के निर्यात पर विशेष ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है। तेजी से बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए नए बाजारों की पहचान करना और वैकल्पिक बाजारों तक पहुंचना भारत की कृषि निर्यात रणनीति का अभिन्न हिस्सा होना चाहिए।</p>
<p>भारत को उत्पादकता में महत्वपूर्ण सुधार की दिशा में आगे बढ़ते हुए कृषि रसायनों के उपयोग में चरणबद्ध रूप से कमी लाने, जैविक उत्पादन को बढ़ावा देने और जल का कुशल उपयोग सुनिश्चित करते हुए उत्पादन और उत्पादकता में बढ़ोतरी करने की जरूरत है। इसके लिए चौथी पीढ़ी की कृषि तकनीकों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) जैसी उन्नत वैज्ञानिक तकनीकों का एकीकृत और कुशल उपयोग आवश्यक है, विशेषकर उत्पादन और जल संचय की दिशा में।</p>
<p>भारत को खाद्यान्न और प्राथमिक वस्तुओं के उत्पादन व निर्यात से हटकर बागवानी और अधिक शेल्फ लाइफ वाले मूल्य वर्धित उत्पादों की ओर जाने की जरूरत है, जहां मुनाफे की संभावनाएं कहीं अधिक होती हैं। एक जिला एक उत्पाद (ओडीओपी) रणनीति को प्रभावी रूप से लागू करने की आवश्यकता है, ताकि इसमें निहित संभावनाओं का पूरा लाभ उठाया जा सके।</p>
<p>राज्य और केंद्र सरकार, दोनों को खेतों के स्तर पर और संपूर्ण आपूर्ति श्रृंखला में विभिन्न एजेंसियों को जोड़ते हुए ऐसी योजनाएं विकसित करनी चाहिए जो उपरोक्त उद्देश्यों को पूरा करने में सहायक हों। केंद्र और राज्यों के विभागों को समन्वित और समग्र निर्यात प्रोत्साहन रणनीति के तहत एकजुट होकर कार्य करना चाहिए, न कि अलग-अलग जिनमें आपसी समन्वय की कमी हो।</p>
<p>भारत को नए व्यापार समझौतों में प्रवेश करते समय सावधानी बरतनी चाहिए ताकि देश को शुल्क-मुक्त या रियायती शुल्क के रूप में बाजार पहुंच का लाभ मिल सके। साथ ही गैर-शुल्क बाधाओं की स्पष्टता भी हो। गुणवत्ता में सुधार के लिए काफी प्रयासों की आवश्यकता है ताकि गुणवत्ता संबंधी उभरती व्यापार बाधाओं का समाधान किया जा सके और निर्यात गंतव्य पर कनसाइनमेंट अस्वीकार किए जाने को न्यूनतम किया जा सके।</p>
<p>हमें अत्यधिक सतर्क रहने की भी आवश्यकता है क्योंकि अमेरिका, यूरोपीय संघ, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड जैसे कई विकसित देश भारत के 142 करोड़ के विशाल उपभोक्ता बाजार पर नजर गड़ाए हुए हैं।<br />हाल ही अमेरिका ने अप्रत्याशित टैरिफ नीति के तहत भारत पर 26% शुल्क और अन्य कई देशों पर भिन्न-भिन्न रेसिप्रोकल टैरिफ लगाए। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में व्यापार का विश्लेषण कहीं अधिक जटिल हो गया। इस नीति के तहत वियतनाम और थाईलैंड पर अधिक शुल्क लगाए गए, जिससे भारतीय चावल थोड़ा अधिक प्रतिस्पर्धी हो गया था, लेकिन बाद में सभी देशों पर लगाए गए टैरिफ को अस्थायी रूप से स्थगित कर दिया गया।</p>
<p>अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति तेजी से जटिल और अस्पष्ट होती जा रही है, विशेष रूप से चीन पर लगाए गए उच्च शुल्कों के कारण (हाल में समझौते के बाद अमेरिका और चीन ने एक-दूसरे के खिलाफ शुल्क में कमी की है)। संभावना है कि चीन, अमेरिका से कृषि आयात पर अपनी निर्भरता कम करेगा। तब अमेरिका के किसान वैकल्पिक बाजारों की तलाश करेंगे। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि विशेष रूप से प्रतिस्पर्धी देशों और प्रमुख बाजारों पर लागू आयात शुल्क की निरंतर निगरानी की जाए। सरकारों, निर्यात संवर्धन एजेंसियों और निर्यातकों को अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर सतर्क दृष्टि बनाए रखनी चाहिए और लचीली एवं समयानुकूल व्यापार रणनीति अपनानी चाहिए।&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ 100 अरब डॉलर का निर्यात लक्ष्यः विश्व बाजार में कैसे जगह बनाएंगे भारतीय कृषि उत्पाद ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[आयात भरोसे महंगाई नियंत्रण, लेकिन खामियाजा भुगत रहे किसान]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/inflation-under-control-at-the-cost-of-farmers.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 13 Jun 2025 17:12:27 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/inflation-under-control-at-the-cost-of-farmers.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p data-start="202" data-end="545">केंद्र सरकार द्वारा जारी मई 2025 के आंकड़ों के मुताबिक, खुदरा महंगाई दर (CPI) 2.82 प्रतिशत रही है। महंगाई दर में इस गिरावट के पीछे एक अहम वजह खाद्य महंगाई दर का घटकर 0.99 प्रतिशत पर आ जाना है। यानी मई 2024 की तुलना में मई 2025 में खाद्य उत्पादों की कीमतें केवल 0.99 प्रतिशत ही बढ़ीं। इसमें भी दालों, फल और सब्जियों की कीमतों में आई गिरावट प्रमुख कारण रही।</p>
<p data-start="547" data-end="799">देखने में यह जितना सामान्य लगता है, वास्तव में उतना है नहीं। कीमतों पर नियंत्रण का खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ रहा है, क्योंकि कई फसलों के दाम न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से भी नीचे रहे हैं&mdash;यहां तक कि उन फसलों के भी, जिनका हम आयात कर रहे हैं।</p>
<p data-start="801" data-end="1432">अगर बात खाद्य तेलों और दालों की करें, तो उद्योग जगत के अनुसार पिछले एक माह में खाद्य तेलों के दाम लगभग 7% तक गिर गए हैं। यह गिरावट घरेलू उत्पादन बढ़ने से नहीं, बल्कि आयात में वृद्धि से आई है। इसके लिए सरकार ने मई के अंत में कच्चे खाद्य तेलों पर सीमा शुल्क में 10 प्रतिशत की कटौती भी की थी। इसी दौरान पाम ऑयल का रिकॉर्ड आयात हुआ। दूसरी ओर, सोयाबीन के किसान MSP के लिए तरसते रहे। सरकार ने राष्ट्रीय खाद्य&nbsp;तेल मिशन<span>&nbsp;(एनएमईओ-ओपी)</span> के तहत आत्मनिर्भरता की बात तो की है, लेकिन हकीकत यह है कि देश अपनी 61% खाद्य तेल आवश्यकता का आयात कर रहा है। वहीं, प्रमुख तिलहन फसल सरसों के किसानों को भी समर्थन मूल्य पर बिक्री में दिक्कतें आईं।</p>
<p data-start="1434" data-end="1755">दालों की बात करें तो पिछले साल देश ने लगभग 77 लाख टन दालों का आयात किया। जबकि घरेलू उत्पादन 260 लाख टन रहा, जिसमें लगभग 40% हिस्सा केवल चना का था। मूंग का उत्पादन भले बढ़ा हो, पर मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में किसानों को MSP पर खरीद के लिए आंदोलन करने पड़े। नरसिंहपुर जिले के एक किसान ने <em data-start="1732" data-end="1743">रूरल वॉयस</em> को बताया, "मैं तिलहन और दालों का उत्पादन करता हूं ताकि देश आत्मनिर्भर हो, लेकिन मुझे तो अपनी उपज का MSP भी नहीं मिल रहा है। मूंग की खरीद MSP पर नहीं हो रही।&rdquo;</p>
<p data-start="1907" data-end="2130">इसी बीच चना का 15 लाख टन आयात ऑस्ट्रेलिया और तंजानिया से हुआ, पीली मटर का 21 लाख टन कनाडा और ऑस्ट्रेलिया से आया। मसूर और अरहर का आयात 12-12 लाख टन और उड़द का 8 लाख टन रहा, जो अफ्रीकी देशों व म्यांमार से हुआ।</p>
<p data-start="2132" data-end="2385">सरकार के महंगाई आंकड़ों से साफ है कि फल, सब्जियां, दालें और खाद्यान्न की कीमतों में गिरावट की वजह से खाद्य महंगाई दर नीचे आई है। यानी महंगाई नियंत्रण में आयात ने बड़ी भूमिका निभाई है, और सरकार इसे शुल्क में छूट के जरिए प्रोत्साहित कर रही है।</p>
<p data-start="2387" data-end="2847">वहीं, रिकॉर्ड 11.75 करोड़ टन गेहूं उत्पादन के बावजूद सरकार ने 31 मार्च 2026 तक स्टॉक लिमिट लागू कर दी ताकि बाजार में दाम न बढ़ें। यह फैसला खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने लिया है। हैरानी की बात यह है कि कम कीमत पर गेहूं और चावल उपलब्ध कराने वाली &lsquo;भारत आटा योजना&rsquo; को बंद कर दिया गया है। इससे लगता है कि सरकार को निजी क्षेत्र पर भरोसा हो गया है कि वह उचित कीमत पर आपूर्ति करेगा&mdash;या शायद बाजार को पूरी तरह निजी हाथों में देना ही लक्ष्य है।</p>
<p data-start="2849" data-end="3134">इस तरह महंगाई नियंत्रण की नीतियां किसानों के लिए घाटे का सौदा बनती जा रही हैं। कई फसलों के भाव पिछले साल से भी कम मिल रहे हैं। प्याज और टमाटर जैसी सब्जियों के दाम गिरने से किसानों को भारी नुकसान हुआ है, लेकिन महंगाई घटाने की सफलता के आंकड़ों में इन समस्याओं की कोई जगह नहीं है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ आयात भरोसे महंगाई नियंत्रण, लेकिन खामियाजा भुगत रहे किसान ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[नई चुनौतियों के बीच कृषि क्षेत्र में बदलाव की धुरी बनता मशीनीकरण]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/farm-mechanization-holds-the-key-for-agricultural-transformation-under-emerging-challenges.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 04 Jun 2025 08:00:58 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/farm-mechanization-holds-the-key-for-agricultural-transformation-under-emerging-challenges.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p data-sourcepos="3:1-3:1137">कृषि क्षेत्र आज पर्यावरण के क्षरण, जलवायु परिवर्तन, तेजी से बढ़ती युवा आबादी और बदलते उपभोग पैटर्न जैसी नई चुनौतियों का सामना कर रहा है। विशेष रूप से ग्लोबल साउथ यानी विकासशील देशों के छोटे किसानों के लिए, जहां दुनिया के लगभग 55 करोड़ फैमिली फार्म का बड़ा हिस्सा है, शारीरिक श्रम की प्रधानता है। इससे थकावट, जलवायु परिवर्तन के जोखिम, कम फसल तीव्रता और उपज में बड़े अंतर जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। भारत ने कृषि मशीनीकरण में महत्वपूर्ण प्रगति की है, जहां औसत मशीनीकरण स्तर 47 प्रतिशत है, जो अनेक विकासशील देशों की तुलना में अधिक है।</p>
<p data-sourcepos="3:1-3:1137">हालांकि, विभिन्न फसलों (जैसे गेहूं में 69% और बाजरा में 33%) और राज्यों (हरियाणा और पंजाब में उच्चतम) में मशीनीकरण में बड़ा अंतर है। यह ब्राजील और चीन जैसे अन्य BRIC (ब्राजील, रूस, भारत, चीन) देशों की तुलना में पीछे है। फार्म मशीनीकरण से कृषि कार्यों की समयबद्धता सुनिश्चित की जा सकती है, श्रम उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है और छोटे किसानों के लिए कृषि कार्यों में कठिनाई को कम किया जा सकता है। इससे खाद्य सुरक्षा और रोजगार के अवसरों में वृद्धि होगी, सामाजिक-आर्थिक विकास में योगदान मिलेगा, साथ ही पर्यावरणीय क्षरण को रोका जा सकेगा। इसलिए, मशीनीकरण विकासशील देशों के विकास एजेंडे में प्राथमिकता पर है।</p>
<p data-sourcepos="5:1-5:674"><strong>गरीबी उन्मूलन, जलवायु शमन, भूमि क्षरण और कृषि में बदलाव</strong> के लिए उत्पादन को सतत रूप से बढ़ाना और कृषि-खाद्य प्रणाली मूल्य श्रृंखला को मजबूत करना आवश्यक है, ताकि तेजी से विकास हो सके। फार्म मशीनीकरण कृषि तीव्रता (इंटेंसिफिकेशन) का एक अनिवार्य हिस्सा है और कई सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कृषि मशीनीकरण में कृषि-खाद्य प्रणाली मूल्य श्रृंखला में यांत्रिक शक्ति का उपयोग शामिल है, जिसमें फार्म उत्पादन, फसल कटाई के बाद की हैंडलिंग, भंडारण और प्रसंस्करण शामिल हैं। फार्म मशीनीकरण छोटे किसानों को अनूठी क्षमता प्रदान करता है। यह एक आवश्यक कृषि इनपुट है जो लाखों ग्रामीण परिवारों के जीवन और अर्थव्यवस्थाओं को बदलने की क्षमता रखता है।</p>
<p data-sourcepos="7:1-7:385">मशहूर कहावत है कि "कृषि के अलावा सब कुछ इंतजार कर सकता है।" यह कृषि कार्यों की समयबद्धता के महत्व को दर्शाता है, जिसे मशीनीकरण के बिना प्राप्त नहीं किया जा सकता। हालांकि, किसान, शोधकर्ता, एक्सटेंशन एजेंट, योजनाकार या नीति निर्माता - सभी हितधारकों के लिए यह आवश्यक है कि वे पूरी कृषि प्रणाली में मूल्य श्रृंखला परिप्रेक्ष्य के साथ कृषि मशीनीकरण के प्रयासों को समझें और उसमें योगदान दें।</p>
<p data-sourcepos="9:1-9:710">खेत स्तर पर और कृषि-खाद्य मूल्य श्रृंखला में आर्थिक, पर्यावरणीय और सामाजिक रूप से सतत कृषि मशीनीकरण में वृद्धि करना महत्वपूर्ण है। सस्टेनेबिलिटी के ढांचे के भीतर कृषि मशीनीकरण का उपयोग समय की दक्षता, कृषि-खाद्य प्रणाली मूल्य श्रृंखला में संचालन की गति, बढ़ी हुई उपज, उत्पादन लागत में कमी, फसल तीव्रता में वृद्धि, इनपुट की दक्षता में वृद्धि, जलवायु जोखिमों में कमी, फसल कटाई के बाद के नुकसान में कमी जैसे कई लाभ ला सकता है। हालांकि, खाद्य उत्पादन को सतत रूप से बढ़ाने के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए जरूरत के मुताबिक मशीनीकरण की आवश्यकता है। इसलिए, व्यापक प्रभाव के लिए विविध फसल/कृषि प्रणालियों और मिट्टी के प्रकारों के लिए उपयुक्त मशीनीकरण का विकास, उनकी रिफाइनिंग, अनुकूलन और टारगेटिंग महत्वपूर्ण हैं।</p>
<h3 data-sourcepos="13:1-13:44">कृषि मशीनीकरण: परिवर्तन के लिए उत्प्रेरक</h3>
<p data-sourcepos="15:1-15:842">भारत में कृषि क्षेत्र ने विशेष रूप से हरित क्रांति के आगमन के बाद महत्वपूर्ण परिवर्तन देखा है। तब भारत खाद्यान्न आयातक था और अब यह लगभग 55 बिलियन डॉलर का निर्यात करता है। 2030 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लक्ष्य में बड़ा योगदान देने की संभावना है, क्योंकि कृषि राष्ट्रीय जीडीपी का लगभग 17-18 प्रतिशत योगदान देती है। हालांकि, प्रारंभ में ध्यान राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा प्राप्त करने के लिए फसल उत्पादन बढ़ाने पर था, लेकिन भारतीय कृषि की समकालीन चुनौतियों के लिए कहीं अधिक व्यापक दृष्टिकोण की आवश्यकता है। इन चुनौतियों में छोटी जोत और कृषि प्रणालियों की विविधता, मशीनीकरण में असंतुलन, उपकरण की ऊंची लागत और बिक्री के बाद खराब सेवा, फार्म उपकरणों का वित्तपोषण, खाद्य नुकसान कम करने के लिए फसल कटाई के बाद कुशल प्रबंधन, किसानों की आय बढ़ाने के लिए कृषि उत्पादों में वैल्यू एडिशन और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करना शामिल हैं।</p>
<p data-sourcepos="17:1-17:410">वाणिज्यिक वित्तीय संस्थान मुख्य रूप से बड़ी मशीनरी पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं और छोटी मशीनरी पर नहीं, जो भारत में मशीनीकरण स्तर में वृद्धि के लिए सबसे बड़ी बाधाओं में से एक है। फार्म उपकरणों के वित्तपोषण की जटिल प्रक्रिया और उच्च ब्याज दरें छोटे किसानों को मशीनीकरण में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित नहीं करती हैं। कृषि मशीनीकरण इन बहुआयामी आवश्यकताओं को संबोधित करने में एक उत्प्रेरक के रूप में उभरी है।</p>
<h3 data-sourcepos="21:1-21:65">मशीनीकरण से किसानों का सशक्तीकरण&nbsp;</h3>
<p data-sourcepos="23:1-23:1324"><strong>कृषि अभियांत्रिकी</strong> का एक महत्वपूर्ण योगदान कृषि कार्यों का व्यापक मशीनीकरण रहा है। भारत ट्रैक्टर निर्माण में वैश्विक शक्ति के रूप में उभरा है, जो प्रति वर्ष लगभग 10 लाख यूनिट का उत्पादन करता है। यह वैश्विक ट्रैक्टर उत्पादन का आधा है। यह उल्लेखनीय उपलब्धि न केवल किसानों के शारीरिक श्रम और पशु शक्ति पर निर्भरता को कम करती है, बल्कि विभिन्न कृषि कार्यों में दक्षता भी बढ़ाती है। हल, हैरो और बीज ड्रिल जैसे उपकरणों के साथ ट्रैक्टरों ने जमीन को तैयार करने, बुवाई और कटाई कार्यों को सुव्यवस्थित किया है। इससे किसान कम समय में बड़े क्षेत्र में खेती कर सकते हैं।</p>
<p data-sourcepos="23:1-23:1324"><strong>एआई, रोबोटिक्स और नई प्रौद्योगिकी</strong> कृषि मशीनीकरण अनुसंधान और शिक्षा में क्रांति ला रही है, जिससे उत्पादकता में अभूतपूर्व वृद्धि हो रही है। एआई-संचालित सिस्टम सेंसर और उपग्रह इमेजरी से विशाल डेटा सेट का विश्लेषण कर सकते हैं ताकि सिंचाई, उर्वरक और कीट नियंत्रण को अनुकूलित किया जा सके, संसाधन अपव्यय को न्यूनतम किया जा सके और उपज को अधिकतम किया जा सके। रोबोटिक्स श्रम-सघन कार्यों जैसे रोपाई, कटाई और निराई को स्वचालित कर रहे हैं, जिससे श्रमिकों की कमी को दूर किया जा रहा है और दक्षता में सुधार हो रहा है। इसके अलावा, प्रिसिजन रोपाई उपकरण और ऑटोनोमस ट्रैक्टर जैसी उन्नत यांत्रिक प्रौद्योगिकी खेत स्तर पर कार्यों को अधिक कुशल बनाते हैं। कृषि मशीनीकरण अनुसंधान के माध्यम से इन नवाचारों को विशिष्ट फसल और पर्यावरणीय परिस्थितियों के लिए लगातार अनुकूलित किया जा रहा है।</p>
<h3 data-sourcepos="27:1-27:48">सस्टेनेबिलिटी और जलवायु सहनशीलता&nbsp;</h3>
<p data-sourcepos="29:1-29:1071"><strong>संरक्षण कृषि</strong>, खेती की पद्धतियों में एक मौलिक बदलाव है। जीरो टिलेज और डायरेक्ट सीडिंग जैसी तकनीकों ने भूमि प्रबंधन में क्रांति ला दी है। इन विधियों के अनेक लाभ हैं - मिट्टी में नमी का संरक्षण, न्यूनतम जुताई के माध्यम से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी और लाभदायक सूक्ष्मजीव गतिविधि को बढ़ावा देकर मृदा स्वास्थ्य में सुधार। सूखा प्रभावित क्षेत्र (लगभग 50%) के किसानों की आय बढ़ाना और लागत कम करना अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि हरित क्रांति ने इन क्षेत्रों को नजरअंदाज कर दिया था। इन्हें हरा-भरा बनाने के लिए उपयुक्त मशीनों के विकास की आवश्यकता है जो संरक्षण कृषि को अपनाने में सहायक हों। यह तकनीक पिछले दो दशकों में अर्जेंटीना, ब्राजील, अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में काफी तेजी से विकसित हुई है। वैश्विक स्तर पर संरक्षण खेती को 20 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में अपनाया जाना इसकी प्रभावशीलता का प्रमाण है। भारत में भी इसका प्रयोग बढ़ रहा है, लेकिन इसके विस्तार की अभी काफी संभावना है। इंजीनियर भारत की विविध कृषि-जलवायु स्थितियों के अनुकूल तकनीक के विकास और अनुकूलन में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं, जिससे एक अधिक सतत और जलवायु-सहिष्णु कृषि प्रणाली का निर्माण संभव हो सकेगा।</p>
<h3 data-sourcepos="33:1-33:67">माइक्रो-सिंचाई से पानी की बचत और उत्पादकता में वृद्धि</h3>
<p data-sourcepos="35:1-35:726">भारत के कई क्षेत्रों में जल संकट की समस्या बढ़ रही है। ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई जैसी माइक्रो-सिंचाई प्रणाली जल प्रबंधन के लिए एक क्रांतिकारी तरीका प्रदान करती हैं। पौधों की जड़ों तक सीधे जल पहुंचाकर वाष्पीकरण और बहाव के कारण होने वाले जल के नुकसान में कमी आती है। इन प्रणालियों के स्पष्ट लाभ के बावजूद, भारत में केवल 10% सिंचित भूमि ही इनके अंतर्गत है। कुल 14 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में से केवल 10 प्रतिशत क्षेत्र में माइक्रो-सिंचाई अपनाई गई है, जबकि यह 30 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। कृषि इंजीनियरिंग इस क्षेत्र में इन प्रणालियों की डिजाइनिंग, स्थापना और रख-रखाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसके अतिरिक्त, अनुसंधान और विकास का फोकस कम लागत वाली माइक्रो-सिंचाई तकनीक के विकास पर है जो छोटे किसानों के लिए उपयुक्त हों।</p>
<p data-sourcepos="37:1-37:591">किसानों ने पारंपरिक कृषि पद्धतियों से परे ज्ञान की आवश्यकता जताई है, विशेष रूप से सेकेंडरी और स्पेशल्टी एग्रीकल्चर के संदर्भ में, और यह स्पष्ट किया है कि युवा अब खेती के सामान्य तरीकों में रुचि नहीं लेते। अतः हमें वर्टिकल फार्मिंग और संरक्षित खेती (protected cultivation) जैसी नई विधियों को बढ़ावा देना चाहिए। वर्तमान में संरक्षित खेती का क्षेत्र भारत में लगभग 70,000 हेक्टेयर है, जबकि चीन में यह 20 लाख हेक्टेयर तक पहुंच चुका है। यदि हमें 10 लाख हेक्टेयर तक पहुंचना है, तो इसके लिए एक आक्रामक और मिशन मोड में प्रयास करने की आवश्यकता है। इसमें कृषि इंजीनियरिंग की महत्वपूर्ण भूमिका होगी।</p>
<h3 data-sourcepos="41:1-41:41">युवाओं के लिए कौशल विकास</h3>
<p data-sourcepos="43:1-43:578"><strong>कृषि इंजीनियरिंग </strong>की पूर्ण क्षमता का लाभ उठाने के लिए यह आवश्यक है कि युवाओं को आधुनिक कृषि तकनीकों के संचालन और प्रबंधन के लिए आवश्यक ज्ञान और विशेषज्ञता प्रदान की जाए। ऐसे कौशल विकास कार्यक्रमों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, ड्रोन तकनीक और प्रिसिजन खेती के उपकरणों में प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। इससे तकनीक में कुशल नई पीढ़ी के किसान और कृषि पेशेवर तैयार होंगे जो नवाचार को आगे बढ़ाएंगे और उत्पादकता में सुधार लाएंगे। ये कार्यक्रम स्थानीय समुदायों की विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुसार तैयार किए जाने चाहिए और इनमें व्यावहारिक अनुभव और प्रशिक्षण पर विशेष जोर होना चाहिए।</p>
<h3 data-sourcepos="47:1-47:44">तकनीक की पहुंच सुनिश्चित करना जरूरी</h3>
<p data-sourcepos="49:1-49:578"><strong>आधुनिक कृषि उपकरणों </strong>की ऊंची लागत छोटे और सीमांत किसानों के लिए बड़ी बाधा है। कस्टम हायरिंग सेंटर की स्थापना से इस चुनौती का समाधान किया जा सकता है। ये सेंटर मशीनों की किराये पर उपलब्धता, मरम्मत, रखरखाव और उपकरणों के सही उपयोग का प्रशिक्षण जैसी सेवाएं प्रदान करते हैं। इससे आधुनिक तकनीक तक किसानों की पहुंच बढ़ेगी और वे अपनी उत्पादकता व लाभ में सुधार कर सकेंगे। एआई और रोबोटिक्स, विशेष रूप से ड्रोन के उपयोग से उर्वरक दक्षता में सुधार और नैनो टेक्नोलॉजी का प्रयोग प्रभावी रूप से किया जाना चाहिए। परंतु इन तकनीकों का पूर्ण लाभ उठाने के लिए युवाओं को प्रशिक्षित करना आवश्यक है।</p>
<p data-sourcepos="51:1-51:626"><strong>हैप्पी सीडर </strong>जैसे उपकरण संरक्षण, मृदा स्वास्थ्य सुधार और बिना पराली जलाए गेहूं की बुवाई में सहायक हैं। लेकिन इनकी सीमित उपलब्धता एक बड़ी बाधा है। इसलिए, किसानों के सहकारी संगठनों, उत्पादक संगठनों, सरकारी एजेंसियों या उद्योगों द्वारा कस्टम हायरिंग केंद्र स्थापित करने की आवश्यकता है। ऐसे उपकरणों का उपयोग का सीमित समय (लगभग 20 दिन) के लिए होता है, इसलिए व्यक्तिगत निवेश व्यावहारिक नहीं है। कस्टम हायरिंग केंद्रों द्वारा सामुदायिक मॉडल को बढ़ावा देना आवश्यक है, जिनकी स्थापना कृषि विज्ञान केंद्र (KVKs) द्वारा भी की जा सकती है। साथ ही, युवाओं को निजी स्तर पर एक्सटेंशन सेवा प्रदाता के रूप में प्रशिक्षित करना भी लाभकारी होगा।</p>
<p data-sourcepos="53:1-53:400">इसी प्रकार, संरक्षित खेती (जैसे ग्रीनहाउस) में निवेश की रुचि के बावजूद सफल संचालन के लिए फर्टिगेशन, वर्नलाइजेशन और सोलराइजेशन जैसी तकनीकों की आवश्यकता होती है। इन तकनीकों को अपनाने में इनोवेटिव एक्सटेंशन सेवाओं की अनुपलब्धता बाधक है। अतः, बड़ी कंपनियों को अपनी कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) पहल के अंतर्गत संस्थाओं का सहयोग करना चाहिए जिससे युवा सशक्त हों और सतत कृषि पद्धतियों को बढ़ावा मिले।</p>
<h3 data-sourcepos="57:1-57:46">सस्टेनेबिलिटी से जुड़ी चुनौतियों का समाधान</h3>
<p data-sourcepos="59:1-59:219">भारतीय कृषि संसाधनों की कमी, जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय क्षरण जैसी कई सस्टेनेबिलिटी संबंधी चुनौतियों का सामना कर रही है। कृषि इंजीनियरिंग इन चुनौतियों से निपटने और एक सतत कृषि प्रणाली को बढ़ावा देने में सहायक है।</p>
<p data-sourcepos="61:1-61:422">(i) <strong>कार्बन फार्मिंग:</strong> संरक्षण कृषि की विधि, जिसमें मृदा स्वास्थ्य को बढ़ावा देने पर फोकस होता है, कार्बन का अवशोषण बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भारत यदि संरक्षण कृषि को अपनाए तो वह पेरिस समझौते के अंतर्गत 3 अरब टन कार्बन सिंक लक्ष्य प्राप्त करने में योगदान कर सकता है। कृषि इंजीनियरों को ऐसे इनोवेटिव उपकरणों के विकास पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन को बढ़ाएं और मृदा स्वास्थ्य सुधारें।</p>
<p data-sourcepos="63:1-63:408">(ii) <strong>कटाई के बाद नुकसान में कमी:</strong> भारत में कृषि उत्पादों का 6-7% हिस्सा कटाई के बाद खराब हो जाता है, जिसका कारण खराब भंडारण, प्रसंस्करण सुविधाओं की कमी और पैकेजिंग की अक्षमता है। यह न केवल आर्थिक नुकसान है, बल्कि खाद्य अपव्यय के रूप में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को भी बढ़ाता है। कृषि इंजीनियरिंग के जरिए बेहतर भंडारण, प्रसंस्करण और पैकेजिंग तकनीकों का विकास और कार्यान्वयन इस तरह के नुकसान को कम कर सकता है।</p>
<p data-sourcepos="65:1-65:416">(iii) <strong>अक्षय ऊर्जा का इंटीग्रेशन:</strong> कृषि क्षेत्र में सिंचाई, कृषि कार्यों और प्रसंस्करण के लिए बड़ी मात्रा में ऊर्जा की खपत होती है। सौर ऊर्जा और बायोगैस जैसी अक्षय ऊर्जा का उपयोग जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता को कम कर सकता है। सौर ऊर्जा चालित सिंचाई पंप और कृषि अपशिष्ट से ऊर्जा उत्पन्न करने वाले बायोगैस संयंत्र इसके उदाहरण हैं। कृषि इंजीनियर ऐसे तकनीकी समाधान विकसित कर रहे हैं जो कम लागत में किसानों के अनुकूल हों।</p>
<h3 data-sourcepos="69:1-69:14">आगे की राह</h3>
<p data-sourcepos="71:1-71:116">भारतीय कृषि में कृषि इंजीनियरिंग शिक्षा और अनुसंधान का प्रभाव बढ़ाने के लिए निम्नलिखित कदम उठाने की आवश्यकता है:</p>
<p data-sourcepos="73:1-73:271">(i) <strong>पाठ्यक्रम में बदलाव:</strong> कृषि इंजीनियरिंग शिक्षा में पारंपरिक डिग्री कार्यक्रमों के साथ-साथ व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम भी जोड़े जाने चाहिए ताकि छात्र व्यावहारिक कौशल और उद्यमशीलता की भावना से युक्त हों। इससे महिलाओं समेत युवाओं के लिए हम नए अवसर पैदा कर सकते हैं।</p>
<p data-sourcepos="75:1-75:277">(ii) <strong>सेकंडरी कृषि पर फोकस:</strong> प्रसंस्कृत खाद्य जैसे मूल्य संवर्धित उत्पादों में विविधता से किसान की आय बढ़ाई जा सकती है और ग्रामीण क्षेत्रों में नए आर्थिक अवसर पैदा किए जा सकते हैं। कृषि इंजीनियरिंग प्रसंस्करण, पैकेजिंग और संरक्षण तकनीकों के विकास में अहम भूमिका निभा सकती है।</p>
<p data-sourcepos="77:1-77:563">(iii) <strong>नवाचार का विस्तार:</strong> ऐसी सक्षम नीतियों के विकास की आवश्यकता है जो डिसरप्टिव तकनीक को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करें, जिससे कृषि उत्पादकता और सस्टेनेबिलिटी में महत्वपूर्ण सुधार हो सके और ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं को रूपांतरित किया जा सके। इन तकनीकों में प्रिसिजन खेती (Precision Farming) के उपकरण, ड्रोन तकनीक और एआई आधारित कृषि समाधान शामिल हो सकते हैं। भारत में खेती के तरीके, मिट्टी, कृषि पारिस्थितिकी तंत्र और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियां विविध हैं, इसलिए जरूरत आधारित मशीनीकरण आवश्यक है, ताकि भौगोलिक रूप से भिन्न उत्पादन प्रणालियों को लक्षित किया जा सके।</p>
<p data-sourcepos="79:1-79:517">(iv) <strong>किसानों को ज्ञान से सशक्त बनाना:</strong> किसानों को नई तकनीक और आधुनिक कृषि पद्धतियों को अपनाने के लिए आवश्यक जानकारी और तकनीकी सहायता सुनिश्चित करने के मकसद से कृषि एक्सटेंशन सेवाओं (Extension Services) को मजबूत बनाने में निवेश करना अत्यंत आवश्यक है। युवाओं को AI, रोबोटिक्स, ड्रोन तकनीक, संरक्षित खेती (Protected Cultivation) और फर्टिगेशन जैसी उन्नत तकनीक के लिए निजी एक्सटेंशन सेवाएं प्रदान करने हेतु प्रशिक्षित करना, न केवल नए रोजगार के अवसर पैदा करेगा बल्कि कृषि एक्सटेंशन सेवाओं की गुणवत्ता को भी बेहतर बनाएगा।</p>
<p data-sourcepos="81:1-81:744">(v) <strong>नवाचार के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी:</strong> सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) अनुसंधान के परिणामों के व्यावसायीकरण को गति देने और उन्हें जमीनी स्तर तक अपनाए जाने का एक प्रभावशाली माध्यम है। सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों की विशेषज्ञता और संसाधनों का लाभ उठाकर, ऐसी भागीदारी भारतीय कृषि के सामने मौजूद महत्वपूर्ण चुनौतियों से निपटने के लिए नवीन कृषि तकनीक के विकास और उनके कार्यान्वयन को सुगम कर सकते हैं। पीपीपी किसानों को नई तकनीक की जानकारी और तकनीकी सहायता प्रदान करने वाली एक्सटेंशन सेवाओं की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। शैक्षणिक संस्थानों, उद्योग और सरकार के बीच सहयोग को बढ़ावा देकर पीपीपी इनोवेशन को प्रोत्साहित कर सकते हैं और एक अधिक जीवंत, आधुनिक तथा टिकाऊ कृषि क्षेत्र का निर्माण कर सकते हैं।</p>
<h3 data-sourcepos="85:1-85:12">निष्कर्ष</h3>
<p data-sourcepos="87:1-87:472">कृषि इंजीनियरिंग भारत की कृषि प्रगति का आधार बन चुकी है। यह उत्पादकता, सस्टेनेबिलिटी और ग्रामीण जीवनयापन की चुनौतियों से निपटने में अहम भूमिका निभा रही है। कृषि अब केवल उत्पादन तक सीमित नहीं है, यह मूल्य निर्माण का माध्यम बन चुकी है। नवाचार-आधारित विकास, शिक्षा और अनुसंधान के माध्यम से भारत न केवल सतत कृषि में वैश्विक नेतृत्व हासिल कर सकता है, बल्कि किसानों की समृद्धि भी सुनिश्चित कर सकता है। इसके लिए उद्योग, शिक्षा जगत और किसानों के संयुक्त प्रयास की आवश्यकता है।</p>
<p data-sourcepos="89:1-89:124"><em><strong>(लेखक ट्रस्ट फॉर एडवांसमेंट ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (TAAS) के प्रेसिडेंट, DARE के पूर्व सचिव एवं ICAR के पूर्व महानिदेशक हैं)</strong></em></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/06/image_750x500_683c4e26f1c7b.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ नई चुनौतियों के बीच कृषि क्षेत्र में बदलाव की धुरी बनता मशीनीकरण ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[73वें संविधान संशोधन के 30 वर्षों के कार्यान्वयन के बाद क्या है पंचायतों की स्थिति]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/where-panchayats-stand-after-30-years-of-implementation-of-73rd-amendment-act.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 01 Jun 2025 17:01:44 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/where-panchayats-stand-after-30-years-of-implementation-of-73rd-amendment-act.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा दिए हुए, अर्थात <strong>73वें संविधान संशोधन अधिनियम 1993</strong> के बाद 30 वर्ष से अधिक का समय बीत चुका है। इस संशोधन के तहत पंचायती संस्थाओं (panchayat) को स्वशासी निकायों के रूप में स्थापित किया गया था। इसका अर्थ है कि उन्हें स्वायत्त संस्थाओं की तरह कार्य करना चाहिए, जिनके कार्य स्पष्ट रूप से परिभाषित हों, उन्हें कार्यों को पूरा करने के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन और योग्य मानव संसाधन उपलब्ध हों, ताकि वे निर्धारित समय-सीमा में अपने दायित्वों का निर्वहन कर सकें।</p>
<p>इन संस्थाओं को देशभर में सक्रिय और जीवंत संस्थाओं के रूप में कार्य करना चाहिए था। लेकिन जब इनका आकलन और मूल्यांकन वास्तविक अधिकारों (devolution) के रूप में किया गया, तो सामने आया कि ये संस्थाएं इतनी कमजोर और कुपोषित हैं कि ये गांवों में अपने अपेक्षित कार्यों को पूरा करने में सक्षम नहीं हैं। इसका मुख्य कारण अधिकारों और स्वायत्तता का अभाव।</p>
<p>हालांकि इस निराशाजनक तस्वीर में कुछ उम्मीद की किरणें भी दिखाई देती हैं। जैसे कर्नाटक (72.23%), केरल (70.59%) और तमिलनाडु (68.38%) जैसे राज्यों में पंचायती संस्थाओं को सौंपे गए अधिकार अपेक्षित 100% के बहुत करीब हैं। यह लेख विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में अधिकारों के हस्तांतरण की तस्वीर प्रस्तुत करता है और यह भी बताता है कि यह स्थिति क्यों है।</p>
<p>इस संदर्भ में यह अध्ययन करना प्रासंगिक हो जाता है कि इन संस्थाओं को कार्यों, वित्त, कार्मिक और अन्य संबंधित विषयों के रूप में किस हद तक सशक्त बनाया गया है। इस दिशा में वर्ष 2024 में भारत सरकार के पंचायती राज मंत्रालय ने भारतीय लोक प्रशासन संस्थान, नई दिल्ली द्वारा किए गए "राज्यों में पंचायतों को अधिकारों के हस्तांतरण की स्थिति" विषय पर अध्ययन की सहायता से पंचायतों की स्थिति का मूल्यांकन किया गया।</p>
<p>पंचायतों को अधिकार हस्तांतरण को छह आयामों को शामिल करते हुए एक डिवोल्यूशन इंडेक्स के माध्यम से मापा गया, जिनमें शामिल हैं:<br />(i) रूपरेखा (Framework - D1)<br />(ii) कार्य (Functions - D2)<br />(iii) वित्त (Finances - D3)<br />(iv) कार्मिक (Functionaries - D4)<br />(v) क्षमता निर्माण (Capacity Building - D5)<br />(vi) उत्तरदायित्व (Accountability - D6)</p>
<p>प्रत्येक आयाम को भिन्न-भिन्न भार (वेटेज) दिया गया है। रूपरेखा को 10 प्रतिशत और वित्त को 30 प्रतिशत, जबकि अन्य प्रत्येक को 15 प्रतिशत भार दिया गया है। आइए देखें कि पंचायतें स्थानीय शासन की स्वायत्त संस्थाएं बनने की दिशा में कितनी आगे बढ़ी हैं।</p>
<p>आगे बढ़ने से पहले पाठकों को यह अवगत कराना जरूरी है कि विभिन्न आयामों में उप-सूचकांक (sub-indices) क्या हैं। अधिकारों के हस्तांतरण से संबंधित आंकड़ों को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है - सामान्य वर्ग के राज्य, उत्तर-पूर्वी/पर्वतीय राज्य और केंद्र शासित प्रदेश।</p>
<p>&lsquo;फ्रेमवर्क&rsquo; आयाम (D1) का संबंध 73वें संविधान संशोधन अधिनियम में दिए गए संवैधानिक प्रावधानों से है, जिनका कार्यान्वयन अनिवार्य प्रकृति का है। राज्यों को इन प्रावधानों को अनिवार्य रूप से लागू करना होता है। ये प्रावधान निम्नलिखित हैं:<br />(i) नियमित रूप से पंचायत चुनाव कराना,<br />(ii) पंचायतों में महिलाओं, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों और पदों का आरक्षण,<br />(iii) राज्य वित्त आयोग का गठन,<br />(iv) नियमित अंतराल पर राज्य चुनाव आयोग का गठन,<br />(v) जिला योजना समिति की स्थापना।</p>
<p>अध्ययन से पता चलता है कि इस विधायी ढांचे का राष्ट्रीय स्तर पर औसत स्कोर 54.29 प्रतिशत है, जबकि इसे 100 प्रतिशत होना चाहिए क्योंकि संविधान में इस आयाम को लागू न करने का कोई विकल्प नहीं दिया गया है। राज्यों में केरल इस आयाम में 83.56 प्रतिशत के साथ पहले स्थान पर है, जबकि पुदुचेरी मात्र 9.31 प्रतिशत के साथ सबसे नीचे है। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि कोई भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश 73वें संविधान संशोधन अधिनियम के अनिवार्य प्रावधानों को पूरी तरह लागू नहीं कर पाया है।</p>
<p>&lsquo;कार्य&rsquo; आयाम (D2) में पंचायतों को हस्तांतरित गतिविधियां, गतिविधियों की मैपिंग, व्यय आवंटन, पंचायतों की विभिन्न कार्यों में भागीदारी और प्रमुख योजनाओं के कार्यान्वयन में पंचायतों की भूमिका शामिल है। यह चिंताजनक है कि पंचायतों को कार्यों के हस्तांतरण का राष्ट्रीय औसत स्कोर मात्र 29.9 प्रतिशत है। राज्यों की स्थिति देखें तो तमिलनाडु इस मामले में 60.24 प्रतिशत के साथ सबसे ऊपर है, जबकि गोवा मात्र 6.63 प्रतिशत के साथ सबसे नीचे है।</p>
<p>&lsquo;वित्तीय&rsquo; आयाम (D3) के तहत 15वें वित्त आयोग द्वारा पंचायतों को दिया गया अनुदान, राज्य वित्त आयोग द्वारा पंचायतों को दिया गया अनुदान, पंचायतों को राजस्व वसूलने और लगाने का अधिकार, पंचायतों की अपनी निधियां तथा पंचायतों द्वारा वित्त, लेखा और बजट के लिए किए गए प्रयास शामिल हैं। इस आयाम पर राष्ट्रीय स्तर पर कुल मिलाकर मात्र 37.04 प्रतिशत ही विकेंद्रीकरण हुआ है। राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में कर्नाटक सबसे ऊपर (70.65) है, जबकि लक्षद्वीप सबसे नीचे (3.99) पर है।</p>
<p>&lsquo;कार्मिक&rsquo; आयाम (D4) में पंचायतों की भौतिक संरचना, पंचायतों की ई-कनेक्टिविटी और पंचायतों के स्वीकृत एवं कार्यरत अधिकारी शामिल हैं। इस आयाम पर राष्ट्रीय स्तर पर स्थिति केवल 50.96 प्रतिशत है। राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में तमिलनाडु सबसे आगे (84.29) है, जबकि पंजाब सबसे पीछे (8.20) है।</p>
<p>&lsquo;क्षमता निर्माण&rsquo; (D5) आयाम में पंचायतों के निर्वाचित प्रतिनिधियों और अधिकारियों को दी जाने वाली प्रशिक्षण गतिविधियां और प्रशिक्षण संस्थानों की व्यवस्था शामिल है। इस संबंध में अध्ययन से पता चलता है कि राष्ट्रीय औसत केवल 54.63 प्रतिशत है। राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में यह आंकड़ा तेलंगाना राज्य में सबसे अधिक 86.19 प्रतिशत और दादरा एवं नगर हवेली और दमन और दीव में सबसे कम 8.57 प्रतिशत है।</p>
<p>&lsquo;जवाबदेही&rsquo; (D6) आयाम में पंचायतों का लेखा-जोखा और लेखा परीक्षण, सामाजिक ऑडिट, ग्राम सभा की कार्यप्रणाली, पारदर्शिता और एंटीकरप्शन, तथा पंचायतों का मूल्यांकन एवं प्रोत्साहन शामिल हैं। इस आयाम के अध्ययन से पता चलता है कि राष्ट्रीय औसत मात्र 47.51 प्रतिशत है, जो 50 अंक तक भी नहीं पहुंच पाया। राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों को देखें तो कर्नाटक में यह आंकड़ा सबसे अधिक 81.33 प्रतिशत, इसके बाद केरल में 81.18 प्रतिशत है, जबकि लद्दाख में यह सबसे कम 27.43 प्रतिशत दर्ज किया गया है।</p>
<p>सभी आयामों (पंचायतों को कुल सशक्तीकरण या समग्र सशक्तीकरण सूचकांक) के योग से पता चलता है कि राष्ट्रीय स्तर पर मात्र 43.89 प्रतिशत सशक्तीकरण ही देश में हासिल हुआ है। यह आंकड़ा पंचायतों को अधिकार सौंपने की खराब स्थिति को दर्शाता है। संविधान में शामिल किए जाने के 30 वर्षों बाद भी पंचायतें सरकारों की दया पर ही निर्भर हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो पंचायतें अपने स्तर पर स्थानीय सरकारों के रूप में उभर नहीं पाई हैं। हालांकि, कर्नाटक ने सबसे अच्छा प्रदर्शन करते हुए 72.23 प्रतिशत सशक्तीकरण प्राप्त किया है, जबकि केरल और तमिलनाडु ने भी उसके निकट परिणाम दर्ज किए हैं। इसके विपरीत, सबसे कम सशक्तीकरण (13.62 प्रतिशत) दादरा एवं नगर हवेली और दमन एवं दीव में दर्ज किया गया है।</p>
<p>अध्ययन से पता चलता है कि सामान्य श्रेणी के 18 राज्यों में से केवल 13 (72.22%) राज्यों ने पंचायतों को 50 प्रतिशत या उससे अधिक अधिकार हस्तांतरित किए हैं। उत्तरी/पर्वतीय राज्यों की बात करें तो 10 राज्यों में से केवल दो राज्य हिमाचल प्रदेश और त्रिपुरा ने 50 प्रतिशत से अधिक अधिकार हासिल किए हैं। केंद्र शासित प्रदेशों में सबसे अधिक अधिकार हस्तांतरण केवल 27.85 प्रतिशत है। दूसरे शब्दों में, सभी केंद्र शासित प्रदेशों में पंचायतों को अधिकार देने का स्तर राष्ट्रीय औसत से बहुत कम है।<br />&nbsp;<br />संविधान के अनुच्छेद 243जी में कहा गया है, "संविधान के प्रावधानों के अधीन, किसी राज्य की विधायिका कानून द्वारा पंचायतों को ऐसे अधिकार और शक्तियां दे सकती है जो उन्हें स्वशासन संस्थान के रूप में कार्य करने के लिए आवश्यक हों, और ऐसा कानून पंचायतों को उचित स्तर पर शक्तियां और जिम्मेदारियां सौंपने के प्रावधान कर सकता है, जिन पर निर्धारित शर्तें लागू हों, जो निम्नलिखित विषयों से संबंधित हों -<br />(क) आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए योजनाओं का निर्माण;<br />(ख) आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए योजनाओं का क्रियान्वयन, जिनका दायित्व उन्हें सौंपा गया हो, जिसमें ग्यारहवीं अनुसूची में सूचीबद्ध मामलों से संबंधित योजनाएं भी शामिल हों।"</p>
<p>संविधान के अनुच्छेद 243जी की रौशनी में इस अध्ययन के परिणामों की समीक्षा करें तो पता चलता है कि पंचायती राज संस्थाओं को सशक्त बनाने की दिशा में बहुत कम उपलब्धि हासिल हुई है। इस स्थिति के लिए केंद्र और राज्य दोनों जिम्मेदार हैं। तत्कालीन ग्रामीण विकास मंत्री जी. वेंकटस्वामी ने 1 दिसंबर 1992 को संसद में संविधान (73वां संशोधन) विधेयक प्रस्तुत करते समय स्वीकार किया था- "यह केंद्र और राज्यों दोनों पर दायित्व डालता है कि वे ग्राम पंचायतों की स्थापना और पोषण करें ताकि उन्हें प्रभावी, स्वशासी संस्था बनाया जा सके।"</p>
<p>यहां उल्लेखनीय है कि अशोक मेहता समिति ने तीन दशक पहले पंचायती राज संस्थाओं के बारे में क्या कहा था। ब्यूरोक्रेसी और राजनेताओं ने पंचायतों के अ-सशक्तीकरण में सक्रिय भूमिका निभाई है। ब्यूरोक्रेसी को लगा कि उन्हें पंचायतों के प्रति जवाबदेह होने की बजाय राज्य सरकार के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। वे चुने हुए प्रतिनिधियों की निगरानी में काम करने के लिए खुद को ढालना नहीं चाहते थे। राजनीतिक नेता भी पंचायतों के प्रति असहज थे क्योंकि वे पंचायतों के सशक्त होने को अपने निर्वाचन क्षेत्रों के लिए खतरा मानते थे।</p>
<p>इस समस्या का समाधान ग्रामीणों में उनके अधिकारों और जिम्मेदारियों के प्रति जागरूकता लाने में निहित है, ताकि वे ग्रामीण स्थानीय सरकारों को सशक्त बना सकें। लेखक ने फील्ड स्तर पर देखा कि ग्रामीण अपनी ऊर्जा उन मुद्दों पर लगाते हैं जो उनके लिए अप्रासंगिक होते हैं। स्थानीय शासन के पुनरुद्धार के लिए एक सामाजिक आंदोलन शुरू करना आवश्यक है।<br /><em>(लेखक इंडियन इकोनॉमिक सर्विस, भारत सरकार के पूर्व अधिकारी हैं)</em></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/05/image_750x500_683ae8b31abde.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ 73वें संविधान संशोधन के 30 वर्षों के कार्यान्वयन के बाद क्या है पंचायतों की स्थिति ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[अमेरिकी रेसिप्रोकल टैरिफ व्यवस्था के बीच भारतीय कृषि क्षेत्र की भूमिका]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/role-of-indian-agriculture-sector-amid-us-reciprocal-tariff-regime.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 24 Apr 2025 15:11:39 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/role-of-indian-agriculture-sector-amid-us-reciprocal-tariff-regime.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा&nbsp; दिए गए नारे "मेक अमेरिका ग्रेट अगेन" में&nbsp; इस विचार की स्पष्टता शुरू से ही थी कि व्यापारिक विसंगतियों को दूर करने के लिए अमेरिका अपनी टैरिफ प्रणाली में बदलाव करेगा। भारत इसके लिए पहले से ही सतर्क था और अमेरिका के साथ द्विपक्षीय अनुकूल व्यापार व्यवस्था के रास्ते खोजने में लगा था&nbsp; ताकि&nbsp; "विकसित भारत@2047" के लक्ष्य को निर्धारित समय सीमा में प्राप्त करने में बाधा उत्पन्न न हो।&nbsp; लेकिन अमरीकी प्रशासन द्वारा अप्रैल 2025 में घोषित नई रेसिप्रोकल&nbsp;टैरिफ प्रणाली&nbsp; फिलहाल एक गतिरोधक के रूप में आकर खड़ी हो गई है।</p>
<p>यद्यपि कई विशेषज्ञों /अर्थशास्त्रियों का ऐसा अनुमान है कि नई टैरिफ प्रणाली का भारत की विकास दर पर थोड़ा प्रभाव पड़ेगा परन्तु भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। भारत से भी अधिक अन्य एशियाई देश रेसिप्रोकल&nbsp;टैरिफ से प्रभावित होंगे क्योंकि उन देशों पर अधिक टैरिफ लगाया गया है। जापान (24%) के बाद भारत (27%) पर ही सबसे कम टैरिफ लगाने की घोषणा की गई है। अब भारत सहित विभिन्न देश इस विमर्श में व्यस्त हैं कि&nbsp; भविष्य में विश्व बाजार का प्रारूप क्या होगा? अमेरिका को&nbsp; चीन द्वारा निर्यात की जाने वाली वस्तुओं पर ट्रंप प्रशासन द्वारा 145% टैरिफ घोषित करने के बाद चीन ने भी अमरीकी वस्तुओं पर 125% टैरिफ लगाकर एक तरह से "ट्रेड वार" की आधारशिला रख दी है। निश्चित ही इस ट्रेड वार से विश्व में "न्यू ट्रेड आर्डर" स्थपित होने की संभावना है। इन सभी आशंकाओं के बीच नोबल पुरस्कार विजेता अमेरिकी अर्थशास्त्री "माइकल स्पैंस" का मानना&nbsp; है कि भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने की ओर तेजी से आगे बढ़ सकेगी क्योंकि भारत में विभिन्न क्षेत्रों में विकास की अपार क्षमताएं हैं।&nbsp;</p>
<p>देश में जनमानस ने&nbsp; कृषि-क्रांति को आते देखा है, स्पेस रिसर्च में देश ने नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं, अब कनेक्टिविटी में भी आई क्रांति हमारे सामने हैं तथा साइंस व तकनीकी विकास में अनेकानेक उपलब्धियों को होते हुए हम देख रहे हैं। इन उपलब्धियों ने&nbsp; यह विश्वास जगा दिया है कि भारत में वो सभी क्षमताएं हैं जो विकसित देशों के पास हैं। इसलिए बदलती हुई विश्व व्यापार की परिस्थितियों का भी भारत सफलतापूर्वक सामना करने में समर्थ है ऐसा हमें विश्वास करना चाहिए।</p>
<p>अब भारत को अमेरिकी बाजार के साथ साथ संपूर्ण विश्व बाजार में अवसरों और विकल्पों को खोजने व उनका व्यावसायिक दोहन करने के लिए गतिशीलता दिखानी होगी&nbsp; ताकि नए व्यापारिक परिवेश में उत्पन्न होने वाली प्रतिस्पर्धा का सफलतापूर्वक सामना करते हुए हम विकसित भारत@2047 के लक्ष्य को हासिल करने के लिए तेजी से अग्रसर होते रहें।</p>
<p>भारतीय कृषि क्षेत्र हमारी अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख स्तंभ है। कुल सकल घरेलू उत्पाद&nbsp; में इसका लगभग 15 -18% का योगदान है और अकुशल, अर्द्धकुशल तथा कुशल तीनों तरह के मानव संसाधनों को रोजगार देने का सबसे बड़ा माध्यम है। अतः कृषि क्षेत्र के सशक्तिकरण के बिना विकसित भारत का&nbsp; लक्ष्य प्राप्त होना असंभव है। इसके लिए भारतीय कृषि क्षेत्र को कुशल व&nbsp; बाजारोन्मुखी बनाना भी अत्यंत आवश्यक है। भारत सरकार के वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के डाटा के अनुसार वित्त वर्ष 2023 में भारत से 52.5 बिलियन डॉलर के कृषि उत्पादों का निर्यात अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात, चीन, बंगलादेश, सऊदीअरब, वीयतनाम, ईराक, मलेरिया आदि अनेको देशों को हुआ। देखा जाय तो यह निर्यात हमारी कृषि की क्षमताओं से काफी कम है। हमें अपने कृषि उत्पादों के निर्यात मूल्य को 100 बिलयन डालर तक पहुंचाने के प्रयासों में तेजी लानी होगी। इसके लिए निर्यात किए जाने वाले&nbsp; परंपरागत उत्पादों के अलावा हमें अन्य कृषि उत्पादों जैसे कि बायोफ्यूल, सोयामील, ग्रेप वाइन, फल, फूल, मोजेरेला चीज़, बकरी व ऊंट का दूध, कृषि मशीनरी, पशु उत्पाद आदि के बाजारों में अपनी पकड़ बनाने के लिए सघन प्रयास करने होंगे।</p>
<p>जैसे जैसे हमारे कृषि सैक्टर का बाजारोन्मुखी दायरा बढ़ेगा तो संभावित "न्यू ट्रेड आर्डर" की चुनौतियों का सामना करने की शक्ति का भी विस्तार करना होगा।&nbsp; हमारे कृषि क्षेत्र को अकेले "टैरिफ" बदलाव से ही नहीं जूझना है बल्कि खाद्य पदार्थों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार में एक महत्वपूर्ण मुद्दा "सेनेटरी-फाइटोसेनेटरी" मानकों की अनुपालना का भी है। इन मानकों के पूरा न होने पर हमारे उत्पादों की विश्व बाजार में&nbsp; पकड़ कमजोर हो जाती है। अतः अब सक्षम किसानों व कृषि सैक्टर से जुड़े सभी हितधारकों को विश्व बाजार के गुणवत्ता मानकों पर आधारित कृषि उत्पाद पैदा करने, प्रतिस्पर्धात्मक कीमतें रखने और विश्वसनीय निर्यातक बनने की ओर ठोस कदम उठाने के लिए शिक्षित व जागरूक करना होगा।</p>
<p>इन कदमों को एकाकी रूप में या व्यक्तिगत रूप से उठा पाना लगभग असंभव है। इसके लिए&nbsp; किसान, वैज्ञानिक, सार्वजनिक क्षेत्र व निजी क्षेत्र के बीच पारस्परिक लाभप्रद संबंधों पर आधारित कार्ययोजना बनाने की आवश्यकता है। हमें यह समझना चाहिए कि उपरोक्त क्षेत्रों के अन्दर अलग अलग विशेषताएं व योग्यताएं होती हैं जो एक दूसरे की पूरक हैं। सामूहिक प्रयास घरेलू व विश्व बाजार&nbsp; के अवसरों का दोहन करने के लिए उत्पादन दक्षता बढ़ाने, अच्छी उत्पादन सामग्री उपलब्ध कराने, बाजार की मांग के अनुसार विविध प्रकार के उत्पाद पैदा करने, आपूर्ति श्रृंखला व मूल्य श्रृंखला बनाने तथा लाजिस्टिक व ऊर्जा खर्च को कम करने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। अतः विश्व बाजार पर बड़ी पकड़ बनाने के लिए&nbsp; सामूहिक प्रयासों को बढ़ावा देना होगा ।</p>
<p>नई बाजार व्यवस्था में हमारे देश में छोटे व मझोले किसान, जिनकी&nbsp; संख्या कुल किसानों की संख्या का 85-86% है, पीछे न छूट जाएं इसका हमें विशेष ध्यान रखना होगा क्योंकि उनकी देश व विदेश की मंडियों तक पहुंच बहुत ही कम है। ऐसे किसानों को अब "गुजर-बसर वाली खेती की सोच" से बाहर आकर सेकेंडरी एवं स्पेशलिटी कृषि कौशल को अपनाना होगा जिनसे राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर के सस्ते एवं अच्छी गुणवत्ता वाले उत्पाद पैदा कर सकें।&nbsp; इन किसानों की आर्थिक शक्ति को " किसान उत्पादक संगठन", सहकारिता समूह आदि बनाकर&nbsp; उभारने की अत्यंत आवश्यकता है ताकि&nbsp; उनको निजी व सरकारी क्षेत्रों से आसानी से जोड़ा जा सके और उनके उत्पाद भी घरेलू व अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक&nbsp; पहुंच सकें। किसानों व उनके समूहों को उन भ्रांतियों से बाहर निकालना होगा&nbsp; जिनमें निजी क्षेत्र को सिर्फ किसानों के शोषण करने वाले उद्यम के रूप में ही देखा जाता है। किसानों की यह भ्रांति तभी खत्म होगी जब ऐसी सरकारी नीतियां लागू हों जो किसानों व उद्योगों दोनों के हितों का संरक्षण करते हुए प्रगतिशील हों।</p>
<p>हमें यह मान कर चलना होगा कि भविष्य में भी "ट्रेड वार" किसी न किसी रूप में चलती रहेगी। इसलिए उसका सामना करने के लिए कृषि क्षेत्र को अपनी क्षमताओं को विकसित करते रहना होगा। कृषि के क्षेत्र को अधिक उत्पादक व लाभप्रद बनाने के लिए सटीक खेती, नैनो तकनीक, वर्टिकल फार्मिंग, प्रोटैक्टिड कल्टीवेशन, ड्रोन तकनीक, आर्टीफिशियल इंटैलीजेंस, आधुनिक भंडारण, स्मार्ट पैकेजिंग, इलेक्ट्रॉनिक राष्ट्रीय बाजार (ई-नाम) जैसी अनेकानेक तकनीकों का समावेश होने लगा है। अतः खेती से जुड़े युवाओं को इन तकनीकों के बारे में साक्षर व कौशलयुक्त होना होगा।</p>
<p>भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा शक्ति है। इस युवा शक्ति का सृजनात्मक उपयोग करने के लिए हमें कौशल विकास को प्राथमिकता देनी होगी ताकि कृषि क्षेत्र में आधुनिक तकनीकों का समावेश हो, कम कीमत पर अधिक उत्पादन हो, अधिक रोजगार पैदा हों, नवाचारों के लिए युवा आगे आएं और विश्व बाजारों से जुड़ें। ऐसे युवा कृषि की प्रगति में बड़ी सहभागिता करके इस क्षेत्र से&nbsp; देश की अर्थव्यवस्था में एक ट्रिलियन अमरीकी डालर का योगदान सुनिश्चित कर सकते हैं और भारत की अर्थव्यवस्था को पांच ट्रिलियन अमरीकी डालर की बनाने के लक्ष्य को जल्दी प्राप्त कराने में सहायक हो सकते हैं।</p>
<p>इसी के दृष्टिगत "डा० आरएस परोदा कमेटी रिपोर्ट 2019" में एक महत्वपूर्ण अनुशंसा की गई है कि&nbsp; "देश भर के सभी कृषि विज्ञान केन्द्रों व कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन केन्द्रों को "ज्ञान-कौशल-नवाचार" केन्द्रों के रूप में परिवर्तित किया जाए&nbsp; ताकि ये केन्द्र ऐसा मानव संसाधन पैदा कर सकें जो आत्मविश्वासी हो और भारतीय कृषि क्षेत्र को अधिक प्रगतिशील व विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने में तथा&nbsp; "राष्ट्रीय कृषि नीति 2000" में निहित 4% कृषि विकास दर के लक्ष्य को प्राप्त करने में अपनी बड़ी भूमिका निभा सकें।</p>
<p>कृषि के क्षेत्र में स्टार्टअप्स दस्तक दे चुके हैं लेकिन इस क्षेत्र में अपेक्षाकृत बहुत कम "स्टार्टअप" हैं। इनमें से ज्यादातर इंजीनियरिंग या प्रबंधन से संबंधित स्नातकों के द्वारा स्थापित किए गए हैं। उनकी सफलताएं कृषि को नई दिशा दिखा रही हैं तथा यह विश्वास भी पैदा कर रही हैं कि&nbsp; संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित "सतत विकास लक्ष्य"&nbsp; प्राप्त करने में स्टार्टअप्स बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। यह एक अच्छी शुरुआत है लेकिन अब कृषि स्नातकों को भी इस संदर्भ में कौशल विकास करके अपनी उद्यमशीलता से कृषि क्षेत्र को सशक्त बनाने में भूमिका निभाने के लिए आगे आना होगा। इसके लिए हमारे शिक्षा व अनुसंधान के संस्थानों को उद्यमशील स्नातकों की पहचान करके उनकी उद्यमशीलता को निखारने के लिए प्रारंभिक सहायता, तकनीकी समर्थन, प्रशिक्षण व निगरानी तब तक करनी व करानी होगी जब तक वो सक्षम नहीं हो जाते।</p>
<p>भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के संस्थानों, राज्यों के कृषि विश्वविद्यालयों, नाबार्ड आदि&nbsp; के&nbsp; द्वारा&nbsp; कृषि को बाजारोन्मुखी बनाने के प्रयासों को और अधिक प्रभावी बनाना होगा ताकि हमारा कृषि क्षेत्र अपनी दक्षता व क्षमताएं बढ़ाकर उच्च गुणवत्ता मानकों के उत्पाद पैदा करके&nbsp; विश्व बाजार में अपनी बड़ी साझेदारी अर्जित सके। इन प्रयासों को बल देने के लिए लम्बी अवधि की ऐसी "आयात-निर्यात नीति" बनाने की ओर त्वरित कदम उठाने की भी आवश्यकता है जो भारतीय कृषि उत्पादों की परंपरागत व नए बाजारों में&nbsp; हिस्सेदारी बढ़ाने में सहायक हो।</p>
<p><em>(<strong>डॉ. आरएस परोदा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के&nbsp; पूर्व महानिदेशक, पूर्व सैक्रेटरी, कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (डेअर), भारत सरकार और</strong></em><em><strong> ट्रस्ट फॉर एडवांसमेंट इन एग्रीकल्चरल सांइसेज (तास) के चैयरमैन हैं।)</strong></em></p>
<p><em><strong>(डॉ. राम श्रीवास्तव , रिटायर्ड प्रोफेसर और ट्रस्ट फॉर एडवांसमेंट इन एग्रीकल्चरल सांइसेज (तास) के सलाहकार हैं)&nbsp;</strong></em></p>
<p><em><strong><br /><br /></strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ अमेरिकी रेसिप्रोकल टैरिफ व्यवस्था के बीच भारतीय कृषि क्षेत्र की भूमिका ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[सहकारी आंदोलन को नई दिशा देगा त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/tribhuvan-cooperative-university-will-give-a-new-direction-to-cooperative-movement.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 19 Apr 2025 13:32:23 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/tribhuvan-cooperative-university-will-give-a-new-direction-to-cooperative-movement.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत में सहकारी आंदोलन को नई दिशा देने और युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर सृजित करने के उद्देश्य से सरकार ने 'त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय' (Tribhuvan Cooperative University) की स्थापना का प्रस्ताव रखा था। अब यह सपना साकार हो चुका है, क्योंकि त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय विधेयक (Tribhuvan Cooperative University Bill) को लोकसभा और राज्यसभा दोनों ने पारित कर दिया है। इस विधेयक के पारित होने के साथ ही, यह विश्वविद्यालय न केवल सहकारी शिक्षा, अनुसंधान और प्रशिक्षण को बढ़ावा देगा, बल्कि सहकारी क्षेत्र को अधिक पेशेवर और प्रभावी बनाने में भी मदद करेगा।</p>
<p>भारत में सहकारी आंदोलन का इतिहास काफी पुराना है, लेकिन इसके विकास की गति अपेक्षाकृत धीमी रही है। सहकारी संस्थाएं अक्सर पेशेवर प्रबंधन की कमी, नवीनतम तकनीकों की अनुपस्थिति और प्रभावी नेतृत्व के अभाव में संघर्ष करती रही हैं। त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय इन सभी समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करेगा और सहकारी क्षेत्र को एक स्वर्णिम युग में प्रवेश करने में सहायता करेगा।</p>
<p><strong>भारत में सहकारी आंदोलन: एक संक्षिप्त परिचय</strong><br />भारत में सहकारी आंदोलन की शुरुआत औपनिवेशिक काल में हुई थी। 1904 में सहकारी समितियों से संबंधित पहला कानून लाया गया, जिसके बाद इस आंदोलन को एक संरचित रूप मिला। आज भारत में सहकारी समितियां कृषि, बैंकिंग, डेयरी, आवास, उपभोक्ता वस्तुएं और अन्य कई क्षेत्रों में कार्यरत हैं। अमूल, इफको (IFFCO), कृभको (KRIBHCO) जैसी संस्थाएं सहकारी आंदोलन के सफल उदाहरण हैं।</p>
<p>हालांकि, सहकारी क्षेत्र की बढ़ती चुनौतियां, जैसे डिजिटल तकनीक का अभाव, प्रतिस्पर्धा में पिछड़ना और व्यावसायिक कौशल की कमी, इसके सतत विकास में बाधा बन रही हैं। इन समस्याओं के समाधान के लिए त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय की स्थापना की जा रही है।</p>
<p><strong>त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय की स्थापना का उद्देश्य</strong><br />त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय की स्थापना निम्नलिखित उद्देश्यों को पूरा करने के लिए की जा रही है:<br /><strong>1. युवाओं के लिए रोजगारपरक शिक्षा:</strong> सहकारी क्षेत्र में व्यावसायिक शिक्षा की कमी के कारण युवा इस क्षेत्र की ओर आकर्षित नहीं होते। यह विश्वविद्यालय युवाओं को सहकारी प्रबंधन, वित्तीय समावेशन, सहकारी विपणन, डिजिटल सहकारिता और अन्य विषयों में विशेष शिक्षा प्रदान करेगा।<br /><strong>2. सहकारी संगठनों का सशक्तीकरण:</strong> पेशेवर प्रशिक्षण और नवीनतम शोध के माध्यम से सहकारी समितियों को अधिक प्रभावी और प्रतिस्पर्धात्मक बनाया जाएगा।<br /><strong>3. डिजिटल युग में सहकारी आंदोलन का विकास:</strong> डिजिटल तकनीकों, डेटा एनालिटिक्स और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के उपयोग से सहकारी संस्थानों को आधुनिक तकनीकों से जोड़ा जाएगा।<br /><strong>4. ग्लोबल कोऑपरेटिव नेटवर्किंग:</strong> विश्वविद्यालय अंतरराष्ट्रीय सहकारी संगठनों के साथ साझेदारी कर भारतीय सहकारी क्षेत्र को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धात्मक बनाएगा।</p>
<p><strong>रोजगारोन्मुख पाठ्यक्रम: युवाओं के लिए नया करियर विकल्प</strong><br />त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय सहकारी क्षेत्र में उच्च शिक्षा प्रदान करने वाला पहला संस्थान होगा। इसके पाठ्यक्रम विशेष रूप से व्यावहारिक और रोजगारोन्मुख होंगे, जिनमें शामिल होंगे:<br />1. सहकारी प्रबंधन (Cooperative Management): सहकारी संस्थानों के सुचारू संचालन और नेतृत्व कौशल के लिए।<br />2. सहकारी वित्त (Cooperative Finance &amp; Banking): सहकारी बैंकों और वित्तीय संस्थानों के लिए पेशेवर ट्रेनिंग।<br />3. डिजिटल सहकारिता (Digital Cooperatives): सहकारी क्षेत्र में डिजिटल तकनीकों के समावेश के लिए।<br />4. सामुदायिक विकास और सहकारिता (Community Development &amp; Cooperatives): ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में सहकारी आंदोलन को बढ़ावा देने के लिए।<br />5. कृषि और ग्रामीण सहकारिता (Agricultural &amp; Rural Cooperatives): कृषि आधारित सहकारी समितियों को आधुनिक बनाने के लिए।</p>
<p>विश्वविद्यालय से डिग्री या डिप्लोमा प्राप्त करने वाले छात्रों को सहकारी संस्थाओं में प्राथमिकता दी जाएगी, जिससे यह एक आकर्षक करियर विकल्प बन सके।</p>
<p><strong>सहकारी शिक्षा, अनुसंधान और प्रशिक्षण का सुदृढ़ीकरण</strong><br />सहकारी आंदोलन को मजबूत बनाने के लिए शोध और प्रशिक्षण का विशेष महत्व है। त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय निम्नलिखित पहलुओं पर ध्यान देगा:</p>
<p>1. सहकारी नीतियों पर अनुसंधान: विभिन्न राज्यों और देशों में सहकारी नीतियों का अध्ययन कर भारत के लिए उपयुक्त नीतियों का विकास।<br />2. प्रशिक्षण कार्यशालाएं: सहकारी क्षेत्र के कार्यकर्ताओं और प्रबंधकों के लिए समय-समय पर विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम।<br />3. नवाचार एवं तकनीकी समावेशन: सहकारी संस्थानों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ब्लॉकचेन और डेटा एनालिटिक्स का उपयोग।</p>
<p><strong>सहकारी आंदोलन और 'विकसित भारत' का लक्ष्य</strong><br />भारत सरकार 'विकसित भारत 2047' के लक्ष्य की ओर बढ़ रही है। सहकारी क्षेत्र इसमें एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय इस लक्ष्य को प्राप्त करने में निम्नलिखित तरीकों से योगदान देगा:<br />1. आत्मनिर्भर भारत: सहकारी समितियां स्थानीय स्तर पर उत्पादन और विपणन को बढ़ावा देकर भारत को आत्मनिर्भर बनाएंगी।<br />2. रोजगार सृजन: सहकारी क्षेत्र के विस्तार से लाखों युवाओं को रोजगार मिलेगा।<br />3. कृषि क्षेत्र में क्रांति: कृषि सहकारी समितियों को डिजिटल तकनीक से जोड़कर किसानों की आय बढ़ाई जाएगी।<br />4. वित्तीय समावेशन: सहकारी बैंक और क्रेडिट सोसाइटी ग्रामीण भारत को वित्तीय सेवाएं प्रदान करेंगी।<br />5. स्थानीय से वैश्विक: त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय भारतीय सहकारी संगठनों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करेगा, जिससे वे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपनी पहचान बना सकें।<br />6. हरित और सतत विकास: सहकारी संगठनों को पर्यावरण अनुकूल नीतियों के साथ जोड़ा जाएगा, जिससे सतत विकास को बल मिलेगा।</p>
<p><strong>निष्कर्ष</strong><br />त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय सहकारी आंदोलन के लिए एक ऐतिहासिक कदम साबित होगा। यह विश्वविद्यालय सहकारी शिक्षा को एक नए स्तर पर ले जाएगा, जिससे सहकारी संस्थानों का कार्य अधिक पेशेवर, आधुनिक और प्रभावी होगा।<br />-यह युवाओं को एक वैकल्पिक और आकर्षक करियर विकल्प प्रदान करेगा।<br />-सहकारी संस्थानों को डिजिटल और तकनीकी रूप से सशक्त बनाएगा।<br />-वैश्विक सहकारी संगठनों के साथ भारत की भागीदारी को मजबूत करेगा।<br />-'विकसित भारत' के लक्ष्य को प्राप्त करने में सहकारी क्षेत्र की भूमिका को प्रभावी बनाएगा।</p>
<p>इस प्रकार, त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय भारत में सहकारी आंदोलन को स्वर्णिम युग में प्रवेश कराने वाला एक ऐतिहासिक संस्थान साबित होगा।</p>
<p><em>(लेखक NCUI, IFFCO &amp; GUJCOMASOL के अध्यक्ष और गुजरात के पूर्व मंत्री हैं)</em></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/04/image_750x500_680357e3c85c1.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ सहकारी आंदोलन को नई दिशा देगा त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[एक्वाकल्चर: पांच प्रमुख पहल जो भारतीय सीफूड सेक्टर में ला सकती हैं बदलाव]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/reimagining-indian-seafood-growth-of-aquaculture-in-india.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 31 Mar 2025 10:48:38 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/reimagining-indian-seafood-growth-of-aquaculture-in-india.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत के लिए यह गर्व का विषय है कि हम जलीय कृषि (एक्वाकल्चर) - यानी मछली, झींगा और अन्य जलीय जीवों के भूमि-आधारित पालन में दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल हैं। आज भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा जलीय कृषि उत्पादक, तीसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक और चौथा सबसे बड़ा सीफूड निर्यातक है। यह वैश्विक सीफूड उत्पादन में लगभग 10% का योगदान करता है। लेकिन यह सिर्फ आंकड़ों की बात नहीं है; यह उन लाखों किसानों और परिवारों की आजीविका का प्रश्न भी है जो देश के ग्रामीण और तटीय क्षेत्रों में इस उद्योग पर निर्भर हैं।</p>
<p>समुद्र में ज्यादा मछली पकड़ने और जलवायु परिवर्तन के दबाव के कारण, जलीय कृषि एक सतत विकल्प के रूप में उभर रही है। वैश्विक स्तर पर देखें तो हर दो में से एक मछली का पालन भूमि पर किया जाता है, और भारत में यह संख्या हर तीन में से दो मछली तक पहुंच चुकी है। यह ट्रेंड बताता है कि हम केवल प्रतिस्पर्धा में बने नहीं हैं, बल्कि अग्रणी भी हैं। इसके अलावा, भारत का सीफूड निर्यात लगभग आठ अरब डॉलर का है, जिससे जलीय कृषि हमारी अर्थव्यवस्था के सबसे तेजी से उभरते क्षेत्रों में से एक बन गई है।</p>
<p>इन उपलब्धियों के बावजूद, भारतीय जलीय कृषि क्षेत्र अब भी कुछ बुनियादी चुनौतियों से जूझ रहा है। किसानों को कम उत्पादकता, अधिक उत्पादन लागत, तालाब प्रबंधन में अक्षमता और व्यापक बीमारियों के प्रकोप जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, जिसका असर उनके मुनाफे पर पड़ता है। भारतीय जलीय कृषि की एक दिलचस्प विशेषता यह है कि इसका ध्यान दो अलग-अलग बाजारों पर केंद्रित है: एक तरफ झींगा पालन मुख्य रूप से निर्यातोन्मुख है। भारत में उत्पादित अधिकांश झींगे अमेरिका, यूरोप, चीन, जापान, वियतनाम आदि बाजारों में भेजे जाते हैं। दूसरी तरफ, मछली पालन मुख्य रूप से घरेलू बाजार के लिए है। इसमें कतला, रोहू, मिरगल, तिलापिया और रूपचंद जैसी प्रजातियां शामिल हैं। हर सेगमेंट के सप्लाई चेन की अलग चुनौतियां हैं। उदाहरण के लिए, झींगा क्षेत्र में, पिछले पांच वर्षों से फार्म गेट कीमतें स्थिर बनी हुई हैं, जबकि उत्पादन लागत 30-40% तक बढ़ चुकी है। इसका मतलब है कि झींगा किसान मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा खो रहे हैं।</p>
<p>इतना ही नहीं, विभिन्न स्तरों पर अक्षम मार्केट लिंकेज उद्योग को आगे बढ़ने से रोक रहे हैं। जैसे-जैसे हम उत्पादन दोगुना करने और दूसरी नीली क्रांति की ओर बढ़ रहे हैं, यह स्पष्ट है कि इन बुनियादी चुनौतियों पर तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता है। अच्छी बात यह है कि प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना जैसी स्कीमों के माध्यम से सरकार नए इन्फ्रास्ट्रक्चर और अनुसंधान में निवेश कर रही है।</p>
<p><strong>1. यह बदलाव का समय है: परंपरा से तकनीक की ओर</strong><br />वैश्विक मत्स्य उद्योग में अपनी स्थिति बनाए रखने और अगले विकास चरण का समर्थन करने के लिए हमें कुछ महत्वपूर्ण दूरियों को पाटने की आवश्यकता है, जिसमें डिजिटलीकरण सबसे अहम है। अन्य उद्योगों ने समय रहते टेक्नोलॉजी को अपनाया, लेकिन मत्स्य पालन उद्योग इस बदलाव में पीछे रह गया। जिससे उत्पादन, उपभोग और निर्यात में हमारी वास्तविक क्षमता का पूरा उपयोग नहीं हो पाया। लेकिन अब हमारे पास जनरेटिव एआई और भू-स्थानिक (जियोस्पेशियल) टूल्स जैसी उभरती तकनीकों को अपनाने का सुनहरा अवसर है, जो किसानों की उत्पादन क्षमता बढ़ाने, समय रहते बीमारियों का पता लगाने और लागत नियंत्रण जैसी रोजमर्रा की चुनौतियों को हल करने में मदद कर सकती हैं। ऐसी तकनीकों को अपनाने से उत्पादन और उसके बाद की प्रक्रियाओं में पारदर्शिता, दक्षता और पूर्वानुमान क्षमता आएगी। इससे कई पुरानी समस्याओं का समाधान हो सकता है।</p>
<p>निश्चित रूप से नई तकनीक को अपनाने की भी अपनी चुनौतियां हैं, खासकर ऐसे क्षेत्र में जहां पारंपरिक तरीके हावी हैं। तकनीक प्रदाताओं को तीन प्रमुख चुनौतियों का समाधान निकालना होगा। पहली चुनौती सीखने की कठिनाई है। छोटे पैमाने पर काम करने वाले लाखों मत्स्य किसानों को ऐसे तकनीकी समाधान चाहिए जो आसान हों और समझने व उपयोग में सरल हों। दूसरी चुनौती लागत और व्यावहारिकता की है। सिर्फ शानदार तकनीक बनाना पर्याप्त नहीं है; असली सफलता इसमें है कि इसे किफायती और हर किसान की पहुंच में कैसे बनाया जाए। यही किफायत तकनीक को खेल बदलने वाला बना सकती है। तीसरी चुनौती वितरण और अंतिम छोर तक पहुंच की है। इसमें यह सुनिश्चित करना है कि ये समाधान वास्तव में जलीय कृषि केंद्रों तक पहुंचें और किसानों को इसका लाभ मिले।&nbsp;</p>
<p><strong>2. स्थानीयता पर जोर: जो उगाएं, उसे सराहें</strong><br />जब तकनीक को अपनाने से जलीय कृषि क्षेत्र में नए अवसर खुल रहे हैं, हमें एक और महत्वपूर्ण मुद्दे पर ध्यान देने की जरूरत है। वह है घरेलू सीफूड खपत। यह सच है कि भारत का सीफूड निर्यात लगातार बढ़ रहा है और हर साल नए रिकॉर्ड बना रहा है। लेकिन क्या हमने खुद से यह सवाल किया है कि हम घरेलू बाजार पर पर्याप्त ध्यान दे रहे हैं या नहीं। भारत का झींगा निर्यात सराहनीय है, लेकिन यह पूरी तस्वीर नहीं है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव आने पर निर्यात पर निर्भरता हमें कमजोर बना देती है। वैश्विक कीमतों में गिरावट का असर किसानों से लेकर निर्यातकों तक सभी पर पड़ता है, और हमारे त्वरित समाधान अक्सर अस्थायी पैबंद मात्र होते हैं। हमें न केवल निर्यात बल्कि घरेलू खपत को भी बढ़ावा देने के लिए रणनीति बनानी होगी, ताकि हमारा जलीय कृषि क्षेत्र और मजबूत हो सके।</p>
<p>असल बात यह है कि हम अपने झींगा (श्रिम्प) का निर्यात करने पर इतने केंद्रित हैं कि हम अपने ही देश में एक बड़े अवसर को नजरअंदाज कर रहे हैं। यह असंतुलन बाजार में अस्थिरता पैदा करता है और जब वैश्विक कीमतें गिरती हैं, तो हमें नुकसान उठाना पड़ता है। भारत में बड़ी संख्या में मांसाहारी लोग हैं, हमारा घरेलू बाजार बहुत विशाल है, लेकिन इसका पूरा उपयोग नहीं किया जा रहा है। दूसरी ओर, घरेलू खपत को बढ़ावा देने से बाजार में स्थिरता आएगी, कीमतों को नियंत्रित रखने में मदद मिलेगी और हमारे किसानों के लिए एक अतिरिक्त सुरक्षा कवच तैयार होगा।</p>
<p>हमें इनोवेटिव मार्केटिंग प्रयासों और मूल्यवर्धन (वैल्यू एडिशन) पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है- कुछ वैसा ही जैसा हमने पोल्ट्री उद्योग के विकास में देखा है। अब समय आ गया है कि हम मूल्यवर्धन को बढ़ावा दें, उत्पादों में नवाचार करें और यह सुनिश्चित करें कि हमारा सीफूड शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में उपभोक्ताओं के लिए सुलभ और आकर्षक बने।</p>
<p>यदि हम निर्यात के साथ-साथ अपने घरेलू बाजार को भी मजबूत करते हैं, तो हम अपने उद्योग को अंतरराष्ट्रीय झटकों से बचा सकते हैं और दीर्घकालिक स्थिरता की नींव रख सकते हैं। इस विषय पर उद्योग के अग्रणी लोग चर्चा कर रहे हैं, और जल्द ही हमें ऐसे ठोस प्रयास देखने को मिलेंगे जिससे झींगा हमारे घरों और भोजन की थालियों तक पहुंचेगा।</p>
<p><strong>3. बायोटेक्नोलॉजी के जरिए एक्वाकल्चर को अपग्रेड करना</strong><br />घरेलू खपत बढ़ाने के साथ अब समय आ गया है कि हम जलीय कृषि के भविष्य के लिए एक और महत्वपूर्ण कारक, बायोटेक्नोलॉजी को अपनाएं। जैसे-जैसे हमारा उद्योग विकसित हो रहा है, हमें नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। केवल पारंपरिक तरीकों पर निर्भर रहना अब पर्याप्त नहीं है। हम ऐसे दौर में हैं जहां विज्ञान आधारित समाधान न केवल उत्पादन क्षमता को बढ़ा सकते हैं, बल्कि घातक बीमारियों से निपटने, जैव सुरक्षा में सुधार और तालाब प्रबंधन को बेहतर बनाने में भी मदद कर सकते हैं। यह भारत में जलीय कृषि की दीर्घकालिक सस्टेनेबिलिटी और मजबूती के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।</p>
<p>बायोटेक्नोलॉजी को अपनाना विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता है। सही इनोवेशन के साथ हम किसानों की सबसे बड़ी समस्याओं का समाधान निकाल सकते हैं। हालांकि इस क्षेत्र में अब भी एक बड़ा अंतर बना हुआ है- एक्वाकल्चर में बायोटेक्नोलॉजी पर किया गया शोध काफी हद तक अपर्याप्त है। कई बायोटेक फॉर्मूलेशन में वर्तमान चुनौतियों के प्रभावी समाधान के लिए अपडेट की जरूरत है। साथ ही, बायोटेक्नोलॉजिस्ट में एक्वाकल्चर की विशिष्ट आवश्यकताओं को लेकर जागरूकता की कमी है। यह दर्शाता है कि इस क्षेत्र में अधिक रुचि और शोध को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है।</p>
<p>यदि हम आधुनिक शोध और जलीय कृषि के रोजमर्रा के वास्तविक अनुभवों के बीच की खाई को पाट सकें, तो हमारे पास सीफूड उत्पादन के तरीकों को पूरी तरह नया रूप देने का अवसर होगा। नए दृष्टिकोण और बेहतर फॉर्मूलेशंस के साथ बायोटेक्नोलॉजी हमारे एक्वाकल्चर क्षेत्र को अधिक विश्वसनीय और भविष्य के लिए तैयार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।</p>
<p><strong>4. तालाब से थाली तक: पारदर्शिता की यात्रा</strong><br />अब बात करते हैं एक और महत्वपूर्ण पहलू ट्रेसेबिलिटी की। क्या आपने कभी सोचा है कि आपका सीफूड कहां से आता है? वह किस तालाब या समुद्र से लिया गया है, आपकी थाली तक पहुंचने में उसने कौन-सा सफर तय किया, और क्या उसे टिकाऊ तरीके से पाला या पकड़ा गया? ज्यादातर लोगों का जवाब &lsquo;नहीं&rsquo; होगा। ऐसा इसलिए नहीं कि हमें इसकी परवाह नहीं है, बल्कि इसलिए कि सीफूड उद्योग में वर्षों से इस स्तर की पारदर्शिता की कमी रही है।</p>
<p>ट्रेसबिलिटी आज अमेरिका, यूरोप और जापान जैसे बड़े आयातक देशों में चर्चा का प्रमुख विषय है। वहां उपभोक्ता यह प्रमाण चाहते हैं कि जो खाद्य सामग्री वे खरीद रहे हैं, वह सतत और सुरक्षित है। लेकिन सीफूड सप्लाई चेन आज भी अत्यधिक विखंडित है। कई इंटरमीडियरी, अस्थिर मानकों और महत्वपूर्ण डेटा को डिजिटल रूप में संकलित करने में आवश्यक उपकरणों की कमी के कारण ट्रेसेबिलिटी का स्तर अब भी कमजोर बना हुआ है। इस कमी के चलते खाद्य सुरक्षा जोखिम, गलत लेबलिंग और सस्टेनेबिलिटी संबंधी चिंताएं बनी रहती हैं।</p>
<p>हाल के वर्षों में सीफूड आयात करने वाले देशों ने ट्रेसेबिलिटी को बढ़ावा देने के लिए नीतिगत बदलाव किए हैं। हमारे अपने उद्योग में भी यह सुनिश्चित करने के प्रयास तेज हो गए हैं कि हमारा सीफूड अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करे और पारदर्शिता की बढ़ती मांग को पूरा करे। वैश्विक सीफूड बाजार में जैसे-जैसे ट्रेसेबिलिटी को प्राथमिकता मिल रही है, उपभोक्ताओं को मूल्यों के अनुरूप उत्पाद चुनने का अधिक अधिकार मिलेगा। जल्द ही, हम ट्रेसेबिलिटी पर आधारित नए व्यावसायिक मॉडल उभरते हुए देखेंगे, जो टिकाऊ और पारदर्शी सीफूड उद्योग की दिशा में एक बड़ा कदम होगा।</p>
<p><strong>5. सीफूड वैल्यू चेन का डीकार्बोनाइजेशन: स्थिरता और दक्षता का संगम</strong><br />जैसे-जैसे हम उत्पादन को दोगुना करने, उत्पादकता बढ़ाने, बीमारियों को कम करने और लाभ मार्जिन बढ़ाने की दिशा में काम कर रहे हैं, हमारे सामने एक और उतना ही महत्वपूर्ण लक्ष्य है- सीफूड मूल्य श्रृंखला का डीकार्बोनाइजेशन। यह सिर्फ उत्पादन बढ़ाने की बात नहीं है, बल्कि इसे हमारे पर्यावरण के अनुकूल और टिकाऊ तरीके से करने की जरूरत है।</p>
<p>सीफूड प्रोटीन का एक बेहतरीन स्रोत है, जिसका फीड कन्वर्जन रेशियो (एफसीआर) लगभग 1.2:1 है। अर्थात 1.2 किलोग्राम चारा खिलाने पर एक किलोग्राम बायोमास प्राप्त होता है। अगर इसकी तुलना चिकन, बीफ या पोर्क से की जाए, तो अंतर स्पष्ट हो जाता है। जैसे-जैसे वैश्विक जनसंख्या आठ अरब के करीब पहुंच रही है, हमारी खाद्य प्रणालियों पर दबाव तेजी से बढ़ रहा है। चुनौती केवल अधिक उत्पादन करने की नहीं है, बल्कि इसे स्वच्छ और हरित तरीके से करने की भी है।</p>
<p>वैश्विक खाद्य क्षेत्र में सतत विकास की लहर को अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सीफूड इंडस्ट्री में कार्बन उत्सर्जन पर अध्ययन अभी प्रारंभिक चरण में हैं, क्योंकि जलीय कृषि में डेटा संग्रह की प्रभावी प्रणालियों की कमी है। आखिरकार, आप उसी चीज को नियंत्रित कर सकते हैं, जिसे आप माप सकते हैं।</p>
<p>सीफूड मूल्य श्रृंखला को डीकार्बोनाइज करने के लिए हमें व्यापक शोध की आवश्यकता है, जिससे यह पता लगाया जा सके कि उत्सर्जन कहां हो रहा है और उन्हें कम करने के सटीक समाधान विकसित किए जा सकें। अब समय आ गया है कि सभी हितधारक मिलकर इस दिशा में प्रयास करें, जिससे सीफूड उत्पादन जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में योगदान दे और नेट जीरो लक्ष्यों को तेजी से हासिल करने में मदद करे। इस मिशन के साथ, हम सीफूड को न केवल एक प्रभावी प्रोटीन स्रोत बना सकते हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सतत विकल्प भी सुनिश्चित कर सकते हैं।</p>
<p><strong>एक्वाकनेक्टः हर तरह से जलीय कृषि को सशक्त बनाने का लक्ष्य</strong><br />जलीय कृषि के भविष्य पर चर्चा के साथ यह समझना महत्वपूर्ण है कि निजी क्षेत्र भी इसकी वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। एक इंटीग्रेटेड सीफूड प्लेटफॉर्म के रूप में एक्वाकनेक्ट सभी हितधारकों के लिए टेक्नोलॉजी आधारित समाधान प्रदान करता है, जिससे कुशलतापूर्वक जुड़ाव संभव हो पाता है। हम किसानों को गुणवत्तापूर्ण फार्म इनपुट तक पहुंचने और उत्पादन को व्यापक एक्वा-पार्टनर नेटवर्क के माध्यम से बेचने में मदद करते हैं, जिससे वे सीधे सीफूड खरीदारों से जुड़कर अपनी उपज का बेहतर मूल्य प्राप्त कर सकें।</p>
<p>यह प्रयास सिर्फ घरेलू मूल्य श्रृंखला तक सीमित नहीं है। वैश्विक व्यापार के महत्व को समझते हुए हमने एक्वाकनेक्ट ग्लोबल भी लॉन्च किया है। यह एंड-टू-एंड सीफूड प्लेटफॉर्म है, जिसे भारतीय उत्पादकों और अमेरिका, चीन, यूरोप जैसे प्रमुख बाजारों के अंतरराष्ट्रीय खरीदारों के बीच की खाई को पाटने के लिए डिजाइन किया गया है। जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में डॉ. ग्रो के माध्यम से हमारा प्रयास है, जिसे हमने हर किसान के लिए जैव प्रौद्योगिकी को उपयोगी बनाने के विजन के साथ विकसित किया है। एक मजबूत आरएंडडी आधार के साथ, हम किफायती और उन्नत जैव प्रौद्योगिकी समाधान विकसित कर रहे हैं।</p>
<p>हमारी सबसे बड़ी ताकतों में से एक हमारा सक्षम फीडबैक लूप है। हम किसानों के साथ निरंतर, प्रतिदिन संपर्क में रहते हैं, उनके अनुभव को प्राप्त करते हैं और उन्हें तेजी से हमारे प्रोडक्ट डेवलपमेंट में शामिल करते हैं। इस तरह प्रयोगशाला में विकसित इनोवेशन पहले से कहीं अधिक तेजी से खेतों तक पहुंच रहे हैं।&nbsp;</p>
<p>डिजिटाइजेशन के मोर्चे पर हम एआई और भू-स्थानिक प्रौद्योगिकी का उपयोग करके एक अवरोध-रहित और स्केलेबल दृष्टिकोण अपना रहे हैं। हमारे एक्वासैट मॉडल यह बताते हैं कि कोई वाटर बॉडी मछली पालन या झींगा पालन के लिए है तो उनके कल्चर नमें कितना समय लगेगा। यह जानकारी मूल्य श्रृंखला में पारदर्शिता, पूर्वानुमान क्षमता और दक्षता लाती है, जिससे फार्म इनपुट की मांग और उत्पादन आपूर्ति का पूर्वानुमान संभव होता है।</p>
<p>हम ब्लूटिक (BluTik) प्लेटफॉर्म के माध्यम से सीफूड क्वालिटी इंस्पेक्शन में पारदर्शिता लाते हैं। यह उद्योग में पहली बार शुरू की गई पहल है, जो बिना छेड़छाड़ के गुणवत्ता निरीक्षण रिपोर्ट प्रदान करती है। इसमें रीयल-टाइम जियो-टैगिंग और टाइमस्टैम्प शामिल होते हैं। इससे खरीदारों को सीफूड की गुणवत्ता पर पूर्ण विश्वास मिलता है। ब्लूटिक के साथ सीफूड स्वयं अपनी गुणवत्ता का प्रमाण देता है, जिससे किसी भी तरह की अस्पष्टता की कोई संभावना नहीं रहती।</p>
<p>और भी बहुत कुछ हैं। एक्वासैट की क्षमता के माध्यम से हम एक क्लाइमेट-टेक सीफूड प्लेटफॉर्म विकसित कर रहे हैं, जो कार्बन उत्सर्जन को मापता है और नेट-जीरो लक्ष्यों को हासिल करने की रणनीति बनाने में मदद करता है। यह प्रयास सीफूड उद्योग को जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में शामिल करने में मदद करेगा। संक्षेप में, एक्वाकनेक्ट का मिशन लगातार प्रयोग करना और निरंतर विकसित होकर सीफूड क्षेत्र को पुनः परिभाषित करना है। इसे फार्म से लेकर वैश्विक बाजार तक अधिक कुशल, पारदर्शी और पूर्वानुमान योग्य बनाना है।&nbsp;</p>
<p><em>(मुरुगन चिदंबरम एक्वाकनेक्ट में डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन प्रमुख हैं)</em></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/03/image_750x500_67d3bc2650bbe.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ एक्वाकल्चर: पांच प्रमुख पहल जो भारतीय सीफूड सेक्टर में ला सकती हैं बदलाव ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[अमेरिका के साथ ट्रेड समझौते में लचीला रुख ठीक नहीं, कृषि को वार्ता से बाहर रखने की जरूरत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/flexible-approach-in-trade-deal-with-us-inappropriate-need-to-exclude-agriculture-from-talks.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 29 Mar 2025 14:27:55 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/flexible-approach-in-trade-deal-with-us-inappropriate-need-to-exclude-agriculture-from-talks.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड एग्रीमेंट को लेकर बातचीत के ताजा दौर का आज आखिरी दिन है। सरकार ने इस बात के संकेत दिये हैं कि अगले कुछ माह में यह समझौता हो सकता है। जिस तरह से अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार रेसिप्रोकल टैरिफ की बात कर दबाव बना रहे हैं उससे लगता है कि भारत के नेगोशिएटर काफी हद तक दबाव में हैं और उसका संकेत बोरबॉन व्हिस्की पर सीमा शुल्क को 150 फीसदी से घटाकर 100 फीसदी करने का फैसला कर जो संकेत दिया गया उसमें मिलता है। यही नहीं अमेरिकी टेक कंपनियों गूगल और मेटा के लिए विज्ञापनों पर शुल्क दर को भी कम कर दिया गया है। लेकिन यहां बड़ा सवाल कृषि बाजार पर फंसा हुआ है। हालांकि पिछले अधिकांश फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स में भारत ने कृषि को बाहर रखा और उस पर कोई बात नहीं की। क्या इस बार अमेरिका के साथ ट्रेड एग्रीमेंट में यह संभव नहीं है?</p>
<p>अमेरिकी राष्ट्रपति और वहां के कामर्स सेक्रेटरी ने काफी हद तक अग्रेसिव रुख दिखाया और कई बार अपने बयानों में ट्रंप कह चुके हैं कि भारत सबसे अधिक सीमा शुल्क लगाने वाले देशों में शामिल है। दूसरी तरफ भारत का रुख लगातार नरम बना हुआ है और यह हम विदेश मंत्री एस. जयशंकर और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के बयानों में देख रहे हैं। जयशंकर अमेरिकी एलएनजी और क्रूड ऑयल के आयात को भारत के लिए एक विश्वसनीय आपूर्तिकर्ता के रूप में देख रहे हैं और वाणिज्य मंत्री उद्योग को सलाह दे रहे हैं कि वह चीन के अलावा दूसरे आपूर्तिकर्ता देशों के बारे में भी विचार करें। यानी अमेरिकी उत्पादों का आयात करें। साथ ही भारत का ऑटो उद्योग और इलेक्ट्रानिक्स उद्योग सकते में है क्योंकि अमेरिका के टैरिफ बढ़ाने की स्थिति में उसे मुश्किल होगी और अमेरिकी उत्पादों पर शुल्क कम होने पर भी भारतीय बाजार में घरेलू उद्योग को मुश्किल होगी।</p>
<p>असल में इंटरनेशनल ट्रेड एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत का लचीला रुख ठीक नहीं है। जिस तरह से अमेरिकी राष्ट्रपति ने सत्ता संभालते ही मेक्सिको और कनाडा के खिलाफ टैरिफ लगाने की घोषणा की तो दोनों देशों से उसी तरह का जवाब मिलने पर उन्होंने जहां बढ़े हुए टैरिफ को लागू करने का समय आगे बढ़ा दिया वहीं बीच का रास्ता अपनाने का भी रुख अपनाया। इसी तरह चीन ने भी साफ कर दिया है कि अगर अमेरिका उसके उत्पादों पर टैरिफ बढ़ाता है तो वह भी उसी तरह का कदम उठायेगा और उसने कई कृषि उत्पादों के आयात पर 10 फीसदी व 15 फीसदी का शुल्क भी कर दिया है।</p>
<p>अब सवाल उठता है कि भारत क्यों नहीं चीन जैसा रुख अपना सकता है। चीन विदेशी निवेश और घरेलू बाजार दोनों मामलों में अपनी शर्तों पर समझौता करता है। लेकिन जहां हम विदेशी निवेश के लिए रेड कार्पेट बिछाने के लिए लालायित रहते हैं वहीं भारत के विशाल बाजार को अपने पक्ष में मजबूती से नहीं रख पाते हैं।</p>
<p>जहां मैन्यूफैक्चरिंग में चुनौती है वहीं भारत का कृषि बाजार अमेरिका चाहता है। वहां के कॉमर्स सेक्रेटरी कह चुके हैं कि भारत को अपना एग्रीकल्चर मार्केट खोलना चाहिए। यहां वह सोयाबीन, मक्का, कपास और यहां तक कि गेहूं खपाने के लिए भी मार्केट ढूंढ रहा है। इसके साथ ही अमेरिका क्रूड आयल को मार्केट कीमत पर भारत को निर्यात करने की शर्त मानने के लिए कह रहा है, वहीं वह एथेनॉल के लिए भी भारत को एक बड़े मार्केट के रूप में देख रहा है। भारत में पेट्रोल में एथेनॉल ब्लैंडिंग प्रोग्राम (ईबीपी) चल रहा है। सरकार ने 2025 में इसे 20 फीसदी (ई20) पर ले जाने का लक्ष्य रखा है।&nbsp;</p>
<p>परिवहन मंत्री नितिन गड़करी चाहते हैं कि भारत में ई100 वाहन भी चलें यानी पूरी तरह से एथेनॉल से चलने वाले वाहन भी देश में लांच किये जाएं। लेकिन जिस उद्देश्य से ईबीपी शुरू किया गया था उसे कुछ धक्का लगा है क्योंकि इसके मूल में देश में खपत से अधिक चीनी उत्पादन की स्थिति में उसका उपयोग एथेनॉल उत्पादन के लिए करना ही मुख्य मकसद था। अधिक उत्पादन की स्थिति में चीनी के दाम गिरने से चीनी उद्योग और किसान दोनों को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता रहा है। लेकिन दो साल से चीनी उत्पादन में कमी आई है और चालू साल में चीनी उत्पादन पिछले साल के मुकाबले करीब 60 लाख टन कम रहेगा। ऐसे में सीजन के मध्य में ही अधिकांश चीनी मिलों ने गन्ने के रस से सीधे एथेनॉल बनाने और बी हैवी मोलेसेज का उपयोग एथेनाल बनाने में बंद कर दिया था। यही वजह है कि ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के नये टेंडर में गन्ने के सीरप और बी-हैवी मोलेसेज से बनने वाले एथेनॉल को शामिल ही नहीं किया गया है। इस टेंडर में ग्रेन आधारित एथेनॉल और सी-हैवी मोलेसेज से बनने वाले एथेनॉल को ही शामिल किया गया है। इस तरह की परिस्थिति में उद्योग के लोग अमेरिका से एथेनॉल आयात के लिए भी रास्ता बनता देख रहे हैं।</p>
<p>मुख्य फसल उत्पादों के अलावा अमेरिका डेयरी, पोल्ट्री और ड्राई फ्रूट्स, वाशिंगटन एप्पल और चेरी व पीयर्स के लिए भी भारत को एक बेहतर निर्यात बाजार के रूप में देख रहा है। अगर सरकार भारतीय कृषि बाजार को अमेरिका के साथ ट्रेड एग्रीमेंट में शामिल करती है, तो उसका भारतीय किसानों को खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। हालांकि अभी ट्रेड एग्रीमेंट में हो रही वार्ता का खुलासा नहीं हुआ है लेकिन यह भी जरूरी है कि इस समझौते में कृषि उत्पादों पर टैरिफ से जुड़ा कोई भी कदम उठाने के पहले सरकार सभी स्टेकहोल्डर्स से बात करे क्योंकि भारतीय कृषि को सस्ते आयात से संरक्षण जरूरी है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ अमेरिका के साथ ट्रेड समझौते में लचीला रुख ठीक नहीं, कृषि को वार्ता से बाहर रखने की जरूरत ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[डेयरी उत्पादकता में अग्रणी बनने की ओर भारत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/breaking-through-the-ceiling-in-indias-dairy-sector.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 17 Mar 2025 10:33:39 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/breaking-through-the-ceiling-in-indias-dairy-sector.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत को लंबे समय से संभावनाओं की भूमि के रूप में जाना जाता है। पंजाब के डेयरी किसानों की उपलब्धियों ने इस बात को और मजबूत किया है। प्रोग्रेसिव डेयरी फार्मर्स एसोसिएशन (पीडीएफए) ने 8-10 फरवरी 2025 को लुधियाना जिले के जगरांव में अपना 18वां अंतरराष्ट्रीय डेयरी और कृषि एक्सपो आयोजित किया। यह आयोजन डेयरी और कृषि क्षेत्र में इनोवेशन तथा सहयोग के लिए एक प्रमुख मंच बन गया है, जिसमें देश-विदेश से लोगों की भागीदारी होती है।</p>
<p>इस वर्ष के एक्सपो में डेयरी मशीनरी, उपकरण और जेनेटिक्स क्षेत्र की वैश्विक दिग्गज कंपनियों की व्यापक भागीदारी देखी गई। इन कंपनियों ने अत्याधुनिक उत्पादों और टेक्नोलॉजी का प्रदर्शन किया, जिससे किसानों को नवीनतम प्रगति की प्रत्यक्ष जानकारी मिली। इस आयोजन में भारत और विदेश के 3.5 लाख से अधिक किसानों ने भाग लिया, जिससे एक प्रमुख कृषि कार्यक्रम के रूप में इसकी प्रतिष्ठा और मजबूत हुई।&nbsp;</p>
<p>भारत का डेयरी उद्योग कम उत्पादकता की चुनौती का सामना कर रहा है। इसमें फीड कन्वर्जन अनुपात में सुधार की आवश्यकता है। इन चिंताओं को दूर करने के लिए एक्सपो में विशेषज्ञों ने एडवांस ब्रीडिंग, पोषण और प्रबंधन तरीके अपनाने के महत्व पर जोर दिया, जिससे डेयरी उत्पादन बढ़ाया जा सके।</p>
<p>पीडीएफए की स्थापना 1972 में कुछ सौ सदस्यों के साथ डेयरी फार्मिंग का प्रदर्शन सुधारने के उद्देश्य से की गई थी। हालांकि, इसमें बदलाव 2003 में दूरदर्शी डेयरी किसान सरदार दलजीत सिंह के नेतृत्व में शुरू हुआ। उन्होंने डेयरी खेती में क्रांति लाने का संकल्प लिया और उन्नत डेयरी वाले देशों का दौरा किया। उन्होंने वहां सीखी गई तकनीकों को पीडीएफए के किसानों के साथ साझा किया। उन्होंने एसोसिएशन के सदस्यों के अंतरराष्ट्रीय डेयरी एक्सपो दौरे का भी नेतृत्व किया, जिससे किसानों को बेहतर प्रथाओं को अपनाने की प्रेरणा मिली।</p>
<p>इन अनुभवों को हासिल करने के बाद एसोसिएशन ने 2007 में अपना पहला एक्सपो आयोजित किया। एक साधारण कार्यक्रम के रूप में शुरू हुआ एक्सपो अब एक विशाल आयोजन बन चुका है। इसके 2025 संस्करण में डेयरी उत्पादन, मशीनरी, फीड और जेनेटिक्स में विशेषज्ञता रखने वाली राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों ने 550 से अधिक स्टॉल लगाए। कंपनियों ने ऑटोमेटेड मिल्किंग सिस्टम और उन्नत पशु पोषण समाधान जैसी तकनीकों का प्रदर्शन किया, जिससे किसानों को उत्पादकता बढ़ाने में मदद मिलेगी।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/03/image_750x_67d7ae802941e.jpg" alt="" /></p>
<p>एक्सपो का एक प्रमुख आकर्षण शानदार पशु प्रतियोगिता थी। इसमें 1,200 से अधिक उच्च गुणवत्ता के दूध देने वाले पशु शामिल थे। इनमें होल्स्टीन और जर्सी गायें तथा मुर्रा और नीली रवि भैंसें थीं। इन पशुओं का मूल्यांकन चार अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के एक प्रतिष्ठित पैनल द्वारा किया गया। पैनल के जजों में से एक, नीदरलैंड्स के अल्बर्ट रेयुरिंक ने पीडीएफए किसानों की प्रगति की सराहना करते हुए कहा कि वे अब वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं।</p>
<p>डेयरी क्षेत्र में उन्नत देश बेल्जियम के 28 किसानों का एक प्रतिनिधिमंडल इस एक्सपो में भाग लेने आया। उन्हें इसकी जानकारी ऑनलाइन मिली थी। वे यहां के पशुओं की गुणवत्ता देखकर हैरान रह गए और कहा कि यूरोप में भी ऐसे उच्च मानक शायद ही देखने को मिलते हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि पंजाब के डेयरी किसानों के पास दुनिया को सिखाने के लिए बहुत कुछ है। देखें तो ज्ञान का प्रवाह उल्टा हो रहा है- जो भारत कभी डेयरी में एक शिक्षार्थी था, वह अब अग्रणी के रूप में उभर रहा है।</p>
<p>मुझे पहली बार इस एक्सपो का दौरा करने का अवसर मिला, और भारत में इतनी उच्च गुणवत्ता वाले डेयरी पशुओं को देखकर मैं चकित रह गया। मैं दलजीत सिंह और उनकी टीम के अद्भुत कार्य के लिए उन्हें धन्यवाद और बधाई देता हूं।</p>
<p>पीडीएफए की सफलता का रहस्य सर्वोत्तम गुणवत्ता वाले प्रोजेनी-टेस्टेड सीमेन के उपयोग में निहित है। इसे वर्ष 2007 में डेयरी के क्षेत्र में उन्नत देशों से आयात किया गया था। इसके साथ उत्कृष्ट पोषण और प्रबंधन तरीकों को भी अपनाया गया। पीडीएफए अपने सदस्यों का मार्गदर्शन करने के लिए नियमित रूप से दुनिया भर के विशेषज्ञों को आमंत्रित करता है। इन प्रयासों का परिणाम तब दिखा जब हरप्रीत सिंह की गाय को चैंपियन घोषित किया गया। उनकी गाय प्रतिदिन 81.96 किलोग्राम दूध देती है। उन्होंने पुरस्कार के रूप में एक नया ट्रैक्टर जीता।</p>
<p>यह भी उल्लेखनीय है कि एसोसिएशन के सदस्य किसानों की गायों का औसत दूध उत्पादन 305 दिनों की एक लैक्टेशन अवधि में 9,000 से 12,000 किलोग्राम के बीच होता है। शीर्ष पांच होल्स्टीन और जर्सी गायों की उनकी असाधारण उत्पादकता के लिए पहचान की गई।</p>
<p>इस एक्सपो को भारत सरकार और अकादमिक जगत का भी जबरदस्त समर्थन प्राप्त हुआ। पशुपालन मंत्री, वरिष्ठ नौकरशाहों, कुलपतियों, डेयरी सहकारी नेताओं और शिक्षाविदों की उपस्थिति ने इस आयोजन की शोभा बढ़ाई। भारत सरकार के पशुपालन विभाग के संयुक्त आयुक्त डॉ. भूषण त्यागी इस वर्ष के एक्सपो में उपस्थित हुए और आधुनिक डेयरी प्रथाओं को अपनाने और सस्टेनेबिलिटी सुनिश्चित करने के लिए पीडीएफए के प्रयासों की सराहना की।</p>
<p>अंत में यही कहा जा सकता है कि 18वां अंतरराष्ट्रीय डेयरी और कृषि एक्सपो एक शानदार सफलता रही, जिसने वैश्विक डेयरी उद्योग में भारत की बढ़ती प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित किया। पीडीएफए के प्रयास हर साल भारत को डेयरी क्षेत्र में दुनिया में अग्रणी बनने के करीब ला रहे हैं। इसके अलावा, इसके प्रयास किसानों, इंडस्ट्री लीडर्स और नीति-निर्माताओं को उत्कृष्टता की इस तलाश में एकजुट कर रहे हैं।</p>
<p><em>(डॉ. आर.एस. सोढ़ी, प्रेसिडेंट, इंडियन डेयरी एसोसिएशन और चेयरपर्सन, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फूड टेक्नोलॉजी, आंत्रप्रेन्योरशिप एंड मैनेजमेंट (निफ्टम) तंजावुर हैं। उदय तिवारी राष्ट्रीय संयोजक, प्रोग्रेसिव डेयरी फार्मर्स एसोसिएशन हैं)</em></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/03/image_750x500_67d7ae5e2dfea.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ डेयरी उत्पादकता में अग्रणी बनने की ओर भारत ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कितनी कारगर होंगी कृषि और ग्रामीण विकास की योजनाएं?]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/what-does-dhan-dhanya-krishi-yojana-imply.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 15 Mar 2025 10:20:01 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/what-does-dhan-dhanya-krishi-yojana-imply.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने बजट भाषण की शुरुआत चार &lsquo;शक्तिशाली&rsquo; विकास इंजनों की पहचान से की, जिनमें पहला कृषि है। यह लंबे समय से ध्यान दिया जाने वाला अपेक्षित विषय है। कृषि क्षेत्र के लिए प्रमुख घोषणाओं में &lsquo;धन-धान्य कृषि योजना&rsquo; नामक एक नई प्रमुख योजना शामिल है, जिसे देश के 100 जिलों में लागू किया जाएगा। ये जिले &lsquo;कम उत्पादकता, मध्यम फसल इंटेंसिटी और औसत से नीचे के ऋण मानकों&rsquo; वाले होंगे। इस योजना का उद्देश्य है: 1) कृषि उत्पादकता बढ़ाना, 2) फसल विविधीकरण और सतत कृषि पद्धतियों को अपनाना, 3) पंचायत और ब्लॉक स्तर पर फसल कटाई के बाद भंडारण को बढ़ावा देना, 4) सिंचाई सुविधाओं में सुधार करना और 5) दीर्घकालिक एवं अल्पकालिक ऋण की उपलब्धता आसान बनाना। इस योजना में चुने गए 100 जिलों में 1.7 करोड़ किसानों को कवर किए जाने की &lsquo;संभावना&rsquo; है। तो क्या इसका मतलब यह है कि ये 100 जिले पहले ही चुने जा चुके हैं?</p>
<p>मैं बुरी खबर से शुरुआत करता हूं। इस नई योजना के लिए बजट में कोई विशिष्ट धन आवंटित नहीं किया गया है! बजट में कोई &lsquo;धन&rsquo; नहीं, लेकिन यह योजना 1.7 करोड़ किसानों का &lsquo;धन&rsquo; बढ़ाएगी और अधिक &lsquo;धान्य&rsquo; भी पैदा करेगी। यह थोड़ा रहस्यमय लगता है! सबसे उदार व्याख्या यही हो सकती है कि धन कृषि मंत्रालय की राष्ट्रीय कृषि विकास योजना और राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन (एनएमएसए) जैसी मौजूदा योजनाओं से आएगा। तो क्या यह योजना कई स्रोतों से वित्तपोषित होगी, जो संभवतः मिशन मोड में समन्वित होकर इन 100 जिलों में कार्यान्वित की जाएगी? देखते हैं कि यह कैसे आगे बढ़ती है। ऐसा प्रयास नौकरशाही की उलझनों में फंस सकता है! यह मानते हुए कि यह योजना 100 जिलों में विकास का एक शक्तिशाली इंजन बनेगी और इसके लिए धन की कमी नहीं होगी, आइए आगे के एक संभावित रास्ते पर विचार करें।</p>
<p>यह योजना मुख्य रूप से 2007 में शुरू किए गए सफल &lsquo;राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन&rsquo; के सिद्धांतों पर आधारित प्रतीत होती है। इस मिशन का लक्ष्य उन पिछड़े जिलों पर केंद्रित था, जहां खाद्यान्न (मुख्य रूप से चावल और गेहूं) की अधिक उत्पादकता की संभावना थी। इस योजना को 5 वर्षों में 5000 करोड़ रुपये की निधि मिली थी। संक्षेप में कहें तो मिशन के तहत लागू लक्षित कदमों के कारण खाद्यान्न उत्पादन में 3.4 करोड़ टन की वृद्धि हुई, जबकि लक्ष्य दो करोड़ टन का था। यह 4500 करोड़ रुपये की लागत से हासिल किया गया, जो निर्धारित बजट से 500 करोड़ रुपये कम था (स्रोत: कृषि मंत्रालय)।</p>
<p>धन-धान्य कृषि योजना &lsquo;कम संसाधन&rsquo; वाले जिलों पर केंद्रित है। जो कम उत्पादकता, मध्यम फसल इंटेंसिटी और औसत से नीचे के ऋण मानकों के आधार पर चुने गए हैं। इनमें से अधिकांश जिले वर्षा आधारित क्षेत्रों में होंगे। दृष्टिकोण सही है, लेकिन मिशन के घटक क्या होंगे? क्या यह योजना किसी विशेष फसल पर केंद्रित होगी, या फिर इसमें कई फसलों पर फोकस किया जाएगा? प्रत्येक जिले की अपनी भौगोलिक और आर्थिक चुनौतियां होती हैं। योजना के डिजाइन में इस भिन्नता को समायोजित करना होगा और इसे संचालन स्तर पर इनोवेशन की गुंजाइश देनी होगी। राष्ट्रीय कृषि विकास योजना और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन और राष्ट्रीय बागवानी मिशन से मिले सबक उपयोगी साबित हो सकते हैं। पहले बताए गए पांच घटक योजना की सफलता के लिए महत्वपूर्ण हैं। इन्हें सार्थक तरीके से संयोजित करना भी एक चुनौती होगी।</p>
<p>सिंचाई सुविधाओं में सुधार और ऋण उपलब्धता बढ़ाने की पहल प्रत्यक्ष सरकारी हस्तक्षेप वाली हैं और इन्हें तुरंत शुरू किया जा सकता है। लेकिन अन्य तीन घटकों को साथ लाने के लिए एक मजबूत जुड़ाव की आवश्यकता होगी। आमतौर पर उत्पादकता बढ़ाने में अधिक उपज देने वाले बीज, बेहतर जल प्रबंधन और उर्वरक जैसे इनपुट का अधिक प्रयोग शामिल होते हैं। यही हरित क्रांति की पारंपरिक रणनीति रही। लेकिन इस दृष्टिकोण को सतत कृषि पद्धतियों और विविधीकरण के साथ जोड़ना कठिन होगा। यदि हरित क्रांति के सिद्धांतों को दोहराया जाता है, तो यह भविष्य में सस्टेनेबिलिटी की नई समस्याएं पैदा कर सकता है।</p>
<p>इसके अलावा, फसल विविधीकरण और भंडारण आपस में जुड़े हुए हैं। कोई भी अनाज भंडारगृह तेजी से बना सकता है, भले ही उस क्षेत्र को इसकी आवश्यकता हो या न हो। वे भर भी सकते हैं क्योंकि अच्छे भंडारण स्थलों की कमी है। लेकिन अगर बात जल्दी खराब होने वाली उपज की है, तो मामला बिगड़ सकता है। जल्दी खराब होने वाली फसलों के लिए भंडारण और प्री-प्रोसेसिंग सुविधाओं की कमी अधिक गंभीर समस्या है। तो क्या हम वापस जिला कृषि योजनाओं की ओर लौट रहे हैं? धन-धान्य कृषि योजना का डिजाइन एक संवेदनशील और कुशल टीम की मांग करता है और इसे लागू करने से पहले विभिन्न पक्षों के साथ व्यापक परामर्श की आवश्यकता होगी। सरकार को इस योजना को जल्दबाजी में शुरू करने से बचना चाहिए, ताकि यह &lsquo;सबके लिए एक&rsquo; प्रकार की अव्यावहारिक योजना न बन जाए।</p>
<p>मैं धन-धान्य कृषि योजना में निम्नलिखित प्रमुख पहलुओं को देखना पसंद करता:<br />1)इन जिलों में किसानों की आय बढ़ाने की आवश्यकता का स्पष्ट उल्लेख,<br />2) किसानों को अधिक मूल्य प्राप्ति सुनिश्चित करने के लिए मार्केटिंग/बाजार से जुड़ाव पर जोर और 3) कृषि आय बढ़ाने के लिए पशुपालन और मत्स्य पालन को शामिल करना। इन्हें अब भी योजना में जोड़ा जा सकता है। ये सभी घटक मौजूदा कार्यक्रमों से लिए जा सकते हैं, लेकिन इन्हें जिला स्तर पर समन्वित करने की आवश्यकता होगी।<br />बजट भाषण में ग्रामीण विकास के लिए 100 &lsquo;कृषि जिलों&rsquo; के एक कार्यक्रम का भी उल्लेख किया गया है। इसमें कहा गया है, &ldquo;राज्यों के साथ साझेदारी में एक व्यापक बहु-क्षेत्रीय ग्रामीण समृद्धि और अनुकूलन कार्यक्रम शुरू किया जाएगा। यह कौशल विकास, निवेश, टेक्नोलॉजी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाकर रोजगार की समस्या को दूर करेगा। लक्ष्य यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में पर्याप्त अवसर उत्पन्न किए जाएं ताकि पलायन एक विकल्प हो, यह आवश्यकता न बने। यह कार्यक्रम ग्रामीण महिलाओं, युवा किसानों, ग्रामीण युवाओं, सीमांत और छोटे किसानों तथा भूमिहीन परिवारों पर केंद्रित होगा।&rdquo;</p>
<p>&ldquo;वैश्विक और घरेलू सर्वोत्तम प्रथाओं को शामिल किया जाएगा और बहुपक्षीय विकास बैंकों से उपयुक्त तकनीकी और वित्तीय सहायता प्राप्त की जाएगी। पहले चरण में 100 विकासशील कृषि-जिलों को शामिल किया जाएगा। यह कार्यक्रम निम्नलिखित पर केंद्रित होगा:<br />1) &nbsp;ग्रामीण महिलाओं के लिए उद्यम विकास, रोजगार और वित्तीय स्वतंत्रता को उत्प्रेरित करना;<br />2) &nbsp;युवा किसानों और ग्रामीण युवाओं के लिए नए रोजगार और व्यवसाय के सृजन में तेजी लाना;<br />3) &nbsp;उत्पादकता सुधार और भंडारण के लिए कृषि क्षेत्र की देखभाल और इसे आधुनिक बनाना, विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों के लिए; तथा<br />4) &nbsp;भूमिहीन परिवारों के लिए विविध अवसर उत्पन्न करना।&rdquo;</p>
<p>यह योजना भी सही दिशा में है। लेकिन दुर्भाग्य से इसके लिए भी कोई अलग बजटीय प्रावधान नहीं किया गया है। धन-धान्य कृषि योजना की तरह इसके लिए भी धन संभवतः ग्रामीण विकास मंत्रालय की मौजूदा योजनाओं से आएगा।</p>
<p>वास्तविक प्रश्न जो अब भी अनुत्तरित है, वह यह है:<br />क्या धन-धान्य कृषि योजना में उल्लिखित 100 जिले वही हैं जो &lsquo;ग्रामीण समृद्धि और अनुकूलन कार्यक्रम&rsquo; के 100 जिले हैं? ये 112 आकांक्षी जिलों से कैसे अलग हैं? क्या इनमें कोई ओवरलैप होगा? ओवरलैप होना बुरा नहीं है। प्रश्न यह है कि हमें ये दोनों सूचियां कब देखने को मिलेंगी? क्या यह 100 + 100 + 112 जिले हैं या फिर चयनित 200 से अधिक जिले होंगे जहां एक से अधिक कार्यक्रम चलेंगे? इनका समन्वय कौन करेगा? नीति आयोग? यदि दिशानिर्देश स्पष्ट हुए तो जिला स्तर पर समन्वय जिला मजिस्ट्रेट कर सकता है। लेकिन केंद्रीय स्तर पर कौन करेगा?</p>
<p>अच्छे इरादे से तीन कार्यक्रम कम संसाधन वाले जिलों के लिए बनाए गए हैं, लेकिन इनके डिजाइन, कार्यान्वयन और निगरानी में गंभीर चुनौतियां हैं। फिलहाल हम केवल यही आशा कर सकते हैं कि ये सफल हों!</p>
<p><strong><em>(लेखक भारत सरकार के कृषि एवं खाद्य मंत्रालय के पूर्व सचिव हैं)</em></strong></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ कितनी कारगर होंगी कृषि और ग्रामीण विकास की योजनाएं? ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[सरकार आठवां वेतन आयोग दे सकती है तो एमएसपी की गारंटी क्यों नहीं?]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/if-government-can-give-8th-pay-commission-then-why-not-a-legal-guarantee-on-msp.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 18 Jan 2025 07:20:18 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/if-government-can-give-8th-pay-commission-then-why-not-a-legal-guarantee-on-msp.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>देश के किसान केंद्र सरकार से कृषि उपज के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (<span>एमएसपी</span>) <span>की कानूनी गारंटी मांग रहे हैं। इस पर विचार करने के लिए </span>2021 <span>में ऐतिहासिक किसान आंदोलन के बाद सरकार ने एक समिति गठित की। समिति की रिपोर्ट आज तक नहीं आई है। इस बीच</span>, <span>पिछले 11 महीनों से पंजाब-हरियाणा की सीमाओं पर किसान एमएसपी की कानूनी गारंटी के लिए आंदोलन कर रहे हैं।</span></p>
<p>बुजुर्ग किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल का आमरण अनशन 53<span> दिनों से चल रहा है। लेकिन अभी तक केंद्र सरकार ने एमएसपी की कानूनी गारंटी की मांग पूरी करना तो दूर, आंदोलनकारी किसानों के साथ बातचीत का रास्ता भी नहीं खोला है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक</span>,<span> देश में किसान जोतों की संख्या </span>14 <span>करोड़ से अधिक है और </span>88 <span>फीसदी किसान एक हैक्टेयर से कम जमीन के मालिक हैं।</span></p>
<p>दूसरी ओर केंद्र सरकार ने अपने कर्मचारियों के लिए आठवें वेतन आयोग के गठन की घोषणा कर दी है। आयोग की सिफारिशें जनवरी&nbsp; 2026 से<span> लागू की जा सकती हैं। कर्मचारियों का वेतन कितना बढ़ेगा अभी यह तय नहीं है, फिर भी इससे सरकार पर करीब दो लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ने का अनुमान है। सरकार के ताजा फैसले का फायदा करीब एक करोड़ केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनर्स को मिलेगा। </span></p>
<p><span>यह दोनों बातें सरकार की प्राथमिकताओं और विरोधाभास को दर्शाती हैं।&nbsp;</span>एमएसपी की कानूनी गारंटी को लेकर कहा जा रहा है कि इसकी वजह से पड़ने वाले वित्तीय बोझ को वहन करना सरकार के लिए मुश्किल होगा। उदारवादी अर्थशास्त्री यही तर्क देते हैं। लेकिन कृषि उत्पादों के बाजार की मौजूदा व्यवस्था को देखें तो ऐसा कहीं नहीं दिखता है कि सरकार को देश में पैदा होने वाले सारे कृषि उत्पादों की पूरी मात्रा खरीदने की जरूरत है। सरकारी हस्तक्षेप की जरूरत तभी पड़ेगी, <span>जब भाव एमएसपी से नीचे होगा। ऐसे मामलों में भी भंडारण और निर्यात के जरिए सरकार के पास नुकसान की भरपाई का अवसर रहेगा। </span></p>
<p>यह सब कितनी आसानी से किया जा सकता है इसे उन राज्यों से समझा जा सकता है जहां चुनाव के दौरान धान और गेहूं पर एमएसपी के ऊपर बोनस देने का चुनावी वादा किया गया था और उसे निभाया भी है। चूंकि मामला राजनीतिक लिहाज से महत्वपूर्ण था इसलिए छत्तीसगढ़ और ओडिशा में धान की खरीद 2300 रुपये प्रति क्विंटल के एमएसपी के बजाय 3100 <span>रुपये प्रति क्विंटल के भाव पर की गई। यानी किसानों को उपज का बेहतर दाम देना संभव है। इसका फायदा किसानों के साथ-साथ पूरी इकोनॉमी को मिलता है इसलिए यह आर्थिक दृष्टि से भी घाटे का सौदा नहीं है। </span></p>
<p>केंद्र सरकार के आठवें वेतन आयोग के फैसले को भी चुनावी नजरिये से देखा जा सकता है क्योंकि दिल्ली में विधान सभा चुनाव होने हैं और यहां पर बड़ी संख्या में केंद्रीय कर्मचारी मतदाता हैं। लेकिन ताज्जुब की बात है कि केंद्रीय कर्मचारियों को इसके लिए न तो कोई आंदोलन करना पड़ा और न ही इससे सरकार पर पड़ने वाले वित्तीय बोझ का तर्क दिया गया। जबकि किसानों की एमएसपी गारंटी की मांग को लेकर वित्तीय बोझ पड़ने का तर्क दिया जा रहा है।&nbsp;</p>
<p>दूसरा तर्क यह भी है कि एमएसपी की कानूनी गारंटी से बाजार में हस्तक्षेप होगा और खुले बाजार और मार्केट में प्रतिस्पर्धा के उसूलों के खिलाफ है। गौरतलब है कि कृषि बाजार को कथित तौर पर मुक्त करने के लिए केंद्र सरकार तीन नये कृषि कानून लेकर आई थी जिन्हें 2020 <span>के किसान आंदोलन के कारण वापस लेना पड़ा था।&nbsp;</span></p>
<p>देखा जाए तो खुले बाजार और मार्केट में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का तर्क कृषि उत्पादों के मामले में नाकाम हो जाता है। मसलन,<span> भारत खाद्य तेलों के मामले में </span>60 <span>फीसदी से अधिक आयात पर निर्भर है। देश में खाद्य तेलों की खपत के मुकाबले करीब 40 फीसदी ही उत्पादन होता है। मांग-आपूर्ति के इस अंतर के चलते तो तिलहन किसानों को उनकी उपज का बहुत बेहतर दाम मिलना चाहिए।&nbsp;</span></p>
<p>लेकिन पिछले साल दो प्रमुख तिलहन फसलों सरसों और सोयाबीन का भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य से भी नीचे चला गया था क्योंकि सरकार ने खाद्य तेलों के सस्ते आयात को प्रोत्साहन दिया। यह बाजार में सरकारी हस्तक्षेप का सटीक उदाहरण है। सच तो यह है कि किसानों को खुले बाजार का लाभ मिलने ही नहीं दिया जाता है। पिछले साल गैर बासमती चावल के निर्यात पर प्रतिबंध, <span>गेहूं निर्यात पर प्रतिबंध और प्याज निर्यात पर प्रतिबंध व कई पाबंदियां लागू की गईं। ऐसी स्थिति में मुक्त बाजार की धारणा नाकाम हो जाती है।</span></p>
<p>किसान उत्पादन और कीमत दोनों मोर्चों पर जोखिम उठा रहा है। जलवायु संकट, प्रतिकूल<span> मौसम की घटनाओं और फसलों के रोगग्रस्त होने से उत्पादन प्रभावित होने का जोखिम है। जबकि बाजार में कीमतों का उतार-चढ़ाव सही दाम से किसानों को वंचित रखता है। किसान का जोखिम दोगुना हो जाता है। ऐसे में अगर किसान सरकार से न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी मांग रहे हैं तो उसे अनुचित नहीं कहा सकता है। कड़ी मेहनत और तमाम जोखिम के बावजूद किसान उपज के सही दाम से वंचित रह जाते हैं। </span></p>
<p>देश में करीब 14.6 <span>करोड़ किसान हैं। सरकार प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के तहत लगभग </span>9 <span>करोड़ किसानों को सालाना छह हजार रुपये की सहायता देती है। मतलब</span>, <span>सरकार खुद मान रही है कि किसानों को मदद की दरकार है। इसलिए तो किसानों को फसल के उचित दाम की गारंटी देना और भी जरूरी है। सही दाम न मिलने की वजह से किसानों को बड़ा नुकसान उठाना पड़ता है और यह हानि सालाना 6 हजार रुपये से कहीं अधिक है। </span></p>
<p>एमएसपी गारंटी लागू करना व्यावहारिक है या नहीं उसे लेकर काफी विवाद है। यह गारंटी कैसे दी जा सकती है, <span>इसे गन्ने के उदाहरण से समझा जा सकते है। देश में शुगरकेन कंट्रोल आर्डर </span>1966 <span>से लागू है। इसके तहत सरकार द्वारा तय दाम से कम कीमत पर कोई चीनी मिल किसानों से गन्ना नहीं खरीद सकती है। यह व्यवस्था पिछले 68 साल से लागू है। फिर सवाल है कि इस तरह की व्यवस्था बाकी फसलों के मामले क्यों लागू नहीं हो सकती है</span>?</p>
<p>सरकार को यह भी देखना होगा कि किसानों के लिए खेती अब बहुत आकर्षक काम नहीं रह गया है। जोत छोटी होने से यह चुनौती बढ़ती जा रही है। दूसरी ओर कृषि पर निर्भर लोगों की संख्या कम होने की बजाय बढ़ रही है, क्योंकि मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर में पर्याप्त रोजगार पैदा नहीं हो पा रहे हैं।</p>
<p>लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन सर्वे के ताजा आंकड़ों के मुताबिक,<span> अभी भी </span>44 <span>फीसदी से अधिक कार्यबल को कृषि में ही काम मिल रहा है। चालू वित्त वर्ष में कृषि और सहयोगी क्षेत्र की विकास दर </span>3.8 <span>फीसदी रहने की उम्मीद है जो पिछले साल केवल </span>1.2 <span>फीसदी थी। कृषि की अच्छी ग्रोथ के बूते जीडीपी की विकास दर </span>5.6 <span>फीसदी तक पहुंचने का अनुमान है। ऐसे में सरकार का जिम्मा बनता है कि वह कृषि को आर्थिक रूप से बेहतर व्यवसाय के रूप में स्थापित करने वाली नीति को लागू करे।</span></p>
<p>कृषि के लिए टर्म्स ऑफ ट्रेड इंडेक्स साल 2004-05 में 87.82 पर था जो <span>बढ़कर </span>2010-11 <span>में </span>102.95 <span>हो गया था। इसके लिए </span>2011-12 <span>आधार वर्ष है। यानी किसान अपने उत्पाद बेचकर जो कमाई करता था वह उसके द्वारा खरीदे जाने वाले उत्पादों से बेहतर थी</span>, <span>लेकिन </span>2022-23 <span>में टर्म्स ऑफ ट्रेड इंडेक्स </span>97.21 <span>पर आ गया। यानी किसान द्वारा बेचे जाने वाले उत्पादों से होने वाली कमाई उसके द्वारा खरीदे जाने वाले उत्पादों से कम हो गई है। इस असंतुलन को दूर करने लिए किसानों को एमएसपी की गारंटी को एक विकल्प के रूप में देखने की जरूरत है। साथ ही सरकार को किसानों के साथ वार्ता का रास्ता भी खोलना चाहिए और मौजूदा आंदोलन को केवल एक या दो राज्यों के किसानों की मांग के रूप में देखने की बजाय देश भर के किसानों की एक वाजिब जरूरत के रूप में देखना चाहिए। यह बात हकीकत है कि देश भर में किसान एमएसपी को लेकर अब बहुत जागरूक हो चुके हैं और अब इस मुद्दे को लंबे समय तक ठंडे बस्ते में नहीं डाला जा सकता है।</span></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ सरकार आठवां वेतन आयोग दे सकती है तो एमएसपी की गारंटी क्यों नहीं? ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[एफपीओः भारतीय किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण संस्थान]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/fpos-a-vital-instituion-for-indian-farmers.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 13 Jan 2025 10:42:31 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/fpos-a-vital-instituion-for-indian-farmers.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत के कृषि परिदृश्य में छोटे और सीमांत किसान अधिक (86%) हैं। इनमें से अनेक किसान सीमित संसाधन और छोटी जोत के कारण मोलभाव करने की स्थिति में नहीं होते। इन समस्याओं के हल के लिए सरकार ने किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) के गठन को प्रोत्साहित किया है। ये संगठन बतौर कानूनी संस्था किसानों की बाजार तक पहुंच, संसाधनों की पूलिंग और मोलभाव की ताकत बढ़ाने के लिए काम करते हैं। हालांकि एफपीओ को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है जिससे उनकी क्षमता प्रभावित होती है। इस संक्षिप्त लेख में हम ऐसे ही कुछ पहलुओं को रेखांकित करने के साथ उनका प्रदर्शन सुधारने के लिए कुछ सुझाव दे रहे हैं।</p>
<p>पहले कुछ संदर्भ:<br />1. &nbsp;किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) एक आर्थिक संस्था है जो सामाजिक परिवेश में कार्य करती है। इसका ढांचा ग्रामीण परिवेश की समुदाय-संचालित और सहकारी प्रकृति के भीतर काम करते हुए किसानों की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने का है।</p>
<p>क. &nbsp;एक आर्थिक इकाई के रूप में: एफपीओ कृषि उपज की सामूहिक खरीद, उत्पादन, प्रसंस्करण और मार्केटिंग पर फोकस करते हैं। संसाधनों को एकत्रित करके वे अपने सदस्य किसानों के लिए लाभप्रदता और सस्टेनेबिलिटी बढ़ाते हैं। व्यवसाय के रूप में कार्य करते हुए एफपीओ राजस्व अर्जित करते हैं और कुछ मामलों में सदस्य किसानों में लाभ का वितरण भी करते हैं। इससे ग्रामीण आर्थिक विकास में योगदान होता है तथा किसानों की आय और उत्पादकता बढ़ती है।</p>
<p>ख. सामाजिक परिवेश: एफपीओ ग्रामीण क्षेत्रों के सामाजिक ताने-बाने से जुड़े होते हैं और छोटे तथा सीमांत किसानों के सामूहिक कल्याण के लिए काम करते हैं। उनका उद्देश्य गरीबी कम करना, सस्टेनेबल कृषि को बढ़ावा देना और स्थानीय क्षमता को बढ़ाना है। एफपीओ सहयोग, साझा निर्णय लेने और सदस्यों के बीच आपसी मदद को बढ़ावा देते हैं और सस्टेनेबल कार्यों के लिए प्रशिक्षण देते हैं। इसके अतिरिक्त, एफपीओ स्थानीय स्तर पर अवसरों का सृजन करके ग्रामीण बेरोजगारी, लैंगिक असमानता और गांव से शहर की ओर पलायन जैसी सामाजिक चुनौतियों से निपटने में मदद करते हैं।</p>
<p>2. &nbsp;एफपीओ और कोऑपरेटिव: एफपीओ और कोऑपरेटिव दोनों का साझा आधार सामूहिक खेती है, लेकिन उनके फोकस और उनकी संरचना में अंतर होता है। सहकारी संस्थान फसल ऋण, उधारी और कृषि इनपुट जैसे क्षेत्रों में मजबूत होते हैं, वहीं एफपीओ मूल्य संवर्धन, उत्पादों के विविधीकरण और एग्रीगेशन में विशेषज्ञता रखते हैं- अर्थात ऐसे क्षेत्रों में जहां सहकारी संस्थानों की उपस्थिति कम होती है। यह अंतर एफपीओ को प्रसंस्करण और विपणन जैसी आधुनिक कृषि आवश्यकताओं के लिए अधिक प्रासंगिक बनाता है। दूसरी तरफ, सहकारी संस्थान पारंपरिक कार्यों में बेहतर होते हैं।</p>
<p>3. &nbsp;स्वयं सहायता समूह अनौपचारिक समूह होते हैं जबकि एफपीओ कानूनी संस्था: स्वयं सहायता समूह सामान्य तौर पर कानूनी संस्था नहीं होते। ये अनौपचारिक समूह होते हैं, जिन्हें उनके सदस्य बचत, उधारी या छोटे पैमाने पर उद्यमिता जैसे सामान्य वित्तीय या सामाजिक लक्ष्यों के लिए आपसी सहमति से बनाते हैं। हालांकि यदि स्वयं सहायता समूह अपनी संरचना को औपचारिक बनाना चाहें तो कानूनी मान्यता प्राप्त करने के तरीके हैं। दूसरी ओर, एफपीओ एक कानूनी संस्था के रूप में कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत पंजीकृत होते हैं। कई राज्यों में स्वयं सहायता समूह के सदस्य मिलकर एफपीओ बना रहे हैं।<br />4. &nbsp;एफपीओ के लिए वित्तीय मदद: केंद्र सरकार की 10,000 एफपीओ योजना के तहत प्रत्येक किसान उत्पादक संगठन को शुरुआती सेटअप लगाने, परिचालन व्यय और क्षमता निर्माण में मदद के लिए अच्छी खासी वित्तीय मदद मिलती है। इसमें शामिल हैंः<br />क. &nbsp;प्रत्येक एफपीओ को शुरुआती सेटअप और परिचालन के लिए 18 लाख रुपये तक की राशि;<br />ख. &nbsp;आसान ऋण के लिए 2 करोड़ रुपये तक की क्रेडिट गारंटी;<br />ग. &nbsp;प्रत्येक स्वयं सहायता समूह सदस्य को 15,000 रुपये तक सीड कैपिटल (यदि लागू हो);<br />घ. उत्पादक संगठन प्रोत्साहन संस्थान (पीओपीआई) या क्लस्टर-आधारित व्यापार संगठन (सीबीबीओ) के माध्यम से प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण में मदद।</p>
<p>एफपीओ के पहले तीन साल तक कार्यालय का किराया और सीईओ का वेतन देने में भी मदद की जाती है। योजना के तहत सीईओ का वेतन सामान्यतः 25,000 रुपये प्रति माह के आसपास निर्धारित किया जाता है। यह क्षेत्र, एफपीओ का आकार और अन्य कारकों पर निर्भर करता है।</p>
<p>अवसर या चुनौतियां?<br />सितंबर 2024 तक लगभग 44,460 एफपीओ बनाए गए थे जिनका गठन 2003 से सितंबर 2024 के बीच (टीसीआई 2024) हुआ था। कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय के डेटा के अनुसार लगभग 40 प्रतिशत एफपीओ आज सक्रिय नहीं हैं। शेष 26,938 सक्रिय एफपीओ में से 42 प्रतिशत ने 2023 में अपने वित्तीय दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए। दूसरे शब्दों में कहें तो वर्तमान में केवल एक-तिहाई पंजीकृत एफपीओ सक्रिय हैं जो कंप्लायंस को पूरा कर रहे हैं। इसके पीछे कौन सी समस्याएं हो सकती हैं? क्या ये समस्याएं संरचनात्मक हैं या परिचालन से जुड़ी? बिहार, महाराष्ट्र, ओडिशा और मध्य प्रदेश में किए गए अध्ययन में हमने कुछ समस्याओं की पहचान की है:</p>
<p>1. &nbsp;अनुदान-आधारित स्टार्टअप पर अत्यधिक जोर: अनेक एफपीओ, विशेष रूप से जो 10,000 एफपीओ योजना के तहत बनाए गए थे, एक सस्टेनेबल बिजनेस मॉडल बनाने के बजाय सरकार से अनुदान प्राप्त करने की दिशा में अधिक प्रेरित थे। शुरुआती वित्तीय सहायता के बाद आगे उन्हें बिना अतिरिक्त वित्तीय मदद के संचालन में संघर्ष करना पड़ता है। इसका असर उनके प्रदर्शन पर होता है और यहां तक कि बंद होने की नौबत आ जाती है। विडंबना यह है कि पुराने एफपीओ, जिन्होंने योजना लांच होने से पहले बिना अनुदान के संचालन शुरू किया था, उन्हें अच्छे कामकाज के बावजूद ऐसी कोई मदद नहीं मिलती है।</p>
<p>2. दीर्घकालिक दृष्टिकोण की कमी और कुप्रबंधन: अनेक नए एफपीओ उचित योजना, मार्केट रिसर्च या नेतृत्व प्रशिक्षण के बिना स्थापित किए गए थे, जिसके परिणामस्वरूप उनका प्रबंधन भी खराब हुआ। स्पष्ट रणनीति और तकनीकी विशेषज्ञता की कमी के कारण अक्सर उनका कामकाज विफल हो गया। कुछ एफपीओ आय सृजन वाला मॉडल विकसित करने में नाकाम रहे और अनुदानों पर ज्यादा निर्भर हो गए।</p>
<p>3. &nbsp;गुणवत्ता के मुकाबले मात्रा पर ध्यान: सरकार के 10,000 एफपीओ स्थापित करने के लक्ष्य से गुणवत्ता के बजाय संख्या पर अधिक ध्यान केंद्रित किया गया। अनेक एफपीओ सिर्फ इस लक्ष्य को पूरा करने के उद्देश्य से बनाए गए। उनके पास न तो पर्याप्त सपोर्ट सिस्टम था, न ही सदस्यों की सहभागिता के लिए कोई योजना थी। इसके परिणामस्वरूप कामकाज की बुनियाद कमजोर रही।</p>
<p>4. &nbsp;सस्टेनेबिलिटी की चुनौतियां: प्रारंभिक वित्तीय सहायता के बाद अनेक एफपीओ को बाजार तक पहुंच, मूल्य संवर्धन और एग्रीगेशन में कठिनाई होती है। बाजार के साथ मजबूत लिंकेज अथवा प्रसंस्करण और भंडारण के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे के बिना अनेक एफपीओ प्रोडक्ट में विविधता नहीं ला पाते या लाभप्रदता में सुधार करने में नाकाम रहते हैं। इससे दीर्घकालिक सस्टेनेबिलिटी प्राप्त करना कठिन हो जाता है।<br />5. &nbsp;पर्याप्त क्षमता निर्माण और प्रशिक्षण की कमी: अनेक एफपीओ के पास बिजनेस मैनेजमेंट, मार्केटिंग और संगठनात्मक कौशल में आवश्यक प्रशिक्षण की कमी होती है। एफपीओ के लिए उत्पादक संगठन प्रोत्साहन संस्थान (पीओपीआई) या क्लस्टर-आधारित व्यापार संगठन (सीबीबीओ) प्रशिक्षण में सहायता प्रदान तो करते हैं, लेकिन व्यावहारिक प्रयोग एक चुनौती बनी रहती है।</p>
<p>6. &nbsp;सीमित बाजार पहुंच: अनेक एफपीओ के लिए एक महत्वपूर्ण बाधा विश्वसनीय बाजार तक पहुंच प्राप्त करना है। अक्सर वे कम कीमतों पर या बिचौलियों के माध्यम से उपज बेचते हैं। इससे वे अपने सदस्यों को बेहतर कीमत नहीं दिला पाते। इससे उनके विकास की संभावनाएं भी प्रभावित होती हैं।</p>
<p>7. &nbsp;सदस्यों की अपर्याप्त सहभागिता: अनेक एफपीओ को सदस्यों की कम सहभागिता से जूझना पड़ता है। इससे निर्णय लेने में कठिनाई होती है और संगठनात्मक गतिविधियों के लिए भी पर्याप्त सहयोग नहीं मिलता है। सक्रिय भागीदारी के बिना योजनाओं को लागू करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।</p>
<p>8. &nbsp;रेगुलेटरी और प्रशासनिक चुनौतियां: जटिल प्रशासनिक आवश्यकताओं और कानूनी ढांचे का पालन करना विशेष रूप से सीमित प्रबंधन अनुभव वाले छोटे एफपीओ के लिए बोझ बन जाता है। इन बाधाओं के कारण अनेक एफपीओ सक्रिय नहीं रह पाते हैं।</p>
<p>9. इन्फ्रास्ट्रक्चर और लॉजिस्टिक की कमी: दूर-दराज के क्षेत्रों में भंडारण, परिवहन और प्रसंस्करण सुविधा जैसे बुनियादी ढांचे की कमी है। इससे एफपीओ की मूल्य संवर्धन, प्रोडक्ट को खराब होने से बचाने या लागत कम करने की क्षमता प्रभावित होती है।</p>
<p>10. नेतृत्व की चुनौतियां: किसी भी एफपीओ के सीईओ का कार्य कठिन होता है और अक्सर यह थकाऊ होता है। सीईओ के लिए 25,000 रुपये प्रतिमाह का मौजूदा वेतन ढांचा बहुत कम है। इससे किसी सक्षम व्यक्ति को आकर्षित करना या बनाए रखना मुश्किल होता है। इसका सीधा असर एफपीओ की क्षमता पर पड़ता है।</p>
<p><br />एफपीओ की क्षमता सुधारने के लिए कुछ नीतिगत सुझावः<br />1. &nbsp;डिजिटल डिसीजन डैशबोर्ड बनाना: सभी एफपीओ के लिए एक राष्ट्रीय स्तर का रिपॉजिटरी स्थापित किया जा सकता है, जो संचालन क्षेत्र (फसल प्रकार, मछली पालन आदि), वित्तीय प्रदर्शन और सदस्यों की डेमोग्राफी जैसे प्रमुख डेटा को ट्रैक करे। इस डैशबोर्ड से सरकार और एफपीओ के बीच दो-तरफा संचार हो सकेगा। इससे प्रदर्शन की निगरानी, फीडबैक देने और सरकारी योजनाओं को अधिक प्रभावी रूप देने में मदद मिलेगी।</p>
<p>2. &nbsp;एनालिटिक्स के माध्यम से एफपीओ को कस्टमाइज्ड मदद: एफपीओ का मूल्यांकन उनकी आयु, कुल कारोबार और प्रति सदस्य कारोबार के आधार पर किया जा सकता है। एनालिटिक्स यह निर्धारित कर सकेगा कि किस प्रकार की मदद (क्षमता निर्माण, क्रेडिट, बाजार लिंकेज) की जरूरत है। इससे लक्षित हस्तक्षेप किया जा सकेगा। जैसे, पुराने और कम कारोबार वाले एफपीओ के लिए बिजनेस डेवलपमेंट, नए और अधिक कारोबार वाले एफपीओ के लिए वित्तीय मदद।</p>
<p>3. &nbsp;एफपीओ के लिए फोकस क्षेत्र: डैशबोर्ड से प्राप्त मेट्रिक्स की मदद से एफपीओ को भौगोलिक, कमोडिटी और नीतिगत फोकस (जैसे सस्टेनेबिलिटी, आय सृजन, क्लाइमेट रेजिलिएंस) के आधार पर श्रेणीबद्ध किया जा सकता है। इससे राज्य और राष्ट्रीय स्तर निर्णय लेने में मदद मिलेगी।</p>
<p>4. &nbsp;एफपीओ सदस्य बनने के मानदंड की समीक्षा: स्थानीय कृषि जरूरतों के साथ तालमेल बिठाने के लिए प्रत्येक एफपीओ में सदस्य किसानों की न्यूनतम संख्या और हर ब्लॉक में एफपीओ की संख्या के मानकों पर पुनर्विचार करना जरूरी है। इसमें सदस्यों की संख्या से फोकस हटाकर भूमि आधारित मानदंडों पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए। प्रतिस्पर्धा और संचालन संबंधी समस्याओं से बचने के लिए ब्लॉक-स्तरीय डिस्ट्रीब्यूशन पर चर्चा को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।</p>
<p>5. &nbsp;पुरस्कार और इनाम की व्यवस्था: एफपीओ के लिए उत्पादकता, इनोवेशन और सामाजिक प्रभाव जैसे कारकों पर आधारित एक श्रेणीबद्ध पुरस्कार व्यवस्था उत्कृष्टता और श्रेष्ठ तौर-तरीके अपनाने को प्रोत्साहित कर सकती है। इससे छोटे और बड़े एफपीओ दोनों को प्रोत्साहन मिलेगा और निरंतर सुधार की संस्कृति पनपेगी।</p>
<p>6. &nbsp;नेतृत्व की स्थिरता के लिए प्रोत्साहन: सीईओ और बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के लिए प्रतिस्पर्धी वेतन और प्रदर्शन आधारित प्रोत्साहन से एफपीओ प्रबंधन में नेतृत्व की स्थिरता और सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित होगी। वेतन संरचना की नियमित समीक्षा से एफपीओ की आवश्यकताओं और लक्ष्यों के साथ तालमेल बिठाया जा सकेगा।</p>
<p>इन संरचनात्मक और परिचालन संबंधी मुद्दों का समाधान निकालना एफपीओ को सस्टेनेबल और समृद्ध संगठन में बदलने के लिए महत्वपूर्ण है।</p>
<p><em><span style="font-weight: 400;">(श्वेता सैनी कृषि अर्थशास्त्री और आर्कस पॉलिसी रिसर्च की संस्थापक एवं सीईओ हैं। पुलकित खत्री </span><span style="font-weight: 400;">कृषि अर्थशास्त्री और आर्कस पॉलिसी रिसर्च के लीड (लोकल वॉयसेज) हैं)</span></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ एफपीओः भारतीय किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण संस्थान ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[ट्रंप 2.0 में एग्री ट्रेडः भारत को अमेरिका के साथ सख्त मोलभाव के लिए तैयार रहने की जरूरत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/agri-trade-in-trump-2-india-needs-to-get-ready-for-a-tough-bargain-with-the-us.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 13 Jan 2025 07:26:23 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/agri-trade-in-trump-2-india-needs-to-get-ready-for-a-tough-bargain-with-the-us.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अमेरिका कृषि उत्पादों का सबसे बड़ा निर्यातक है, जो 175 बिलियन डॉलर से अधिक का निर्यात करता है और विश्व कृषि निर्यात में 8.5 फीसदी की हिस्सेदारी रखता है। हालांकि, सीधे तौर पर कृषि से संबंधित गतिविधियों में अमेरिका की केवल 1.2 फीसदी आबादी ही कार्यरत है और अमेरिका की जीडीपी में कृषि का योगदान केवल 5.6 फीसदी है।</p>
<p>भारत का कृषि व्यापार में अमेरिका के साथ सकारात्मक व्यापार संतुलन है। भारत ने 2023 में अमेरिका को 5.1 बिलियन डॉलर के कृषि उत्पादों का निर्यात किया था जबकि इसी अवधि में अमेरिका से 1.4 बिलियन डॉलर का आयात किया था। अमेरिका को भारत के प्रमुख निर्यातों में झींगा, मरीन प्रोडक्ट्स, चावल, कॉफी, चाय, मसाले, गोंद, रेजिन और अन्य सब्जियां व जड़ी-बूटियां शामिल हैं, जबकि भारत में अमेरिका से होने वाले प्रमुख कृषि आयातों में बादाम, इथाइल अल्कोहल, अखरोट, काजू, सेब और पिस्ता आदि शामिल हैं।</p>
<p>डोनाल्ड ट्रंप 'अमेरिका फर्स्ट' के नारे को भारी समर्थन के साथ सत्ता में आए हैं। इस नारे ने करोड़ों मतदाताओं की भावनाओं को प्रभावित किया जिन्होंने अमेरिका को फिर से महान बनाने की उनकी विचारधारा का समर्थन किया। अर्थव्यवस्था के कायाकल्प और लोगों की आर्थिक खुशहाली को बढ़ावा देने के वादे ने अमेरिकी मतदाताओं, खासकर भीतरी इलाकों में, मतदाताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। तेजी से आर्थिक लाभ प्राप्त करने की ट्रंप की व्यापार विचारधारा इस बुनियादी व्यापारिक नियम पर आधारित है कि अमेरिका को अधिक निर्यात और कम आयात करना चाहिए, व्यापार घाटे को घटना चाहिए और जल्द से जल्द व्यापार संतुलन कायम करना चाहिए। आधुनिक व्यापार के सिद्धांतकारों और शोधकर्ताओं द्वारा दुनिया भर में मुक्त व्यापार के प्रचार के बावजूद, अमेरिका में अधिकांश लोगों का मानना है कि मुक्त व्यापार वास्तव में आम अमेरिकी नागरिकों के हितों के लिए नुकसानदेह है। डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी लोगों की नब्ज को समझने में कोई गलती नहीं की और आधुनिक दौर के अर्थशास्त्रियों और उनके वैश्विक प्रभाव के कड़े प्रतिरोध के बावजूद उसी का लाभ उठाया।</p>
<p>आने वाले महीनों में, अमेरिका डब्ल्यूटीओ जैसी बहुपक्षीय प्रणालियों की अवहेलना करते हुए कार्य कर सकता है, जिसकी बुनियाद टैरिफ में कमी, गैर-टैरिफ बाधाओं को दूर करने और सबसे पसंदीदा राष्ट्र (एमएफएन) दर्जे के तहत यूनिफार्म टैरिफ लागू करने पर आधारित है। ट्रंप पहले ही घोषणा कर चुके हैं कि वे आयात के लिए टैरिफ को 10-20 फीसदी तक बढ़ाएंगे और चीन से आयात पर टैरिफ 60 फीसदी या उससे अधिक बढ़ा देंगे। इसके अलावा, उन देशों से आयात पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाया जा सकता है जो अमेरिकी डॉलर में व्यापार नहीं करते हैं। मुक्त व्यापार का बड़ा प्रचारक होने के बावजूद अमेरिका कृषि उत्पादों पर पर बढ़ा-चढ़ाकर आयात शुल्क लगाता है। डब्ल्यूटीओ के वर्ल्ड टैरिफ प्रोफाइल 2023 के अनुसार, अमेरिका में अनाज व खाद्य वस्तुओं पर 193%, तिलहन, वसा और तेल पर 164%, डेयरी उत्पाद पर 188%, पेय पदार्थ पर 150% और फल और सब्जियाें पर 132% आयात शुल्क है।</p>
<p>ट्रंप खुले आम खुद को 'टैरिफ प्रेमी' बताते हैं, जबकि पहले वह भारत पर 'टैरिफ किंग' होने का आरोप लगाते थे। ऐसा लगता है कि ट्रंप की योजना में, लेन-देन के आधार पर कड़ी सौदेबाजी और मोलभाव खूब रहेगा।</p>
<p>भारत अपनी 1.42 अरब की आबादी और दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था के साथ दुनिया के सबसे बड़े कृषि निर्यातक अमेरिका के लिए बेहद आकर्षक बाजार है। भारत अमेरिकी ट्री-नट्स जैसे बादाम, अखरोट और पिस्ता के अलावा सेब, खाद्य तेल और दालों का आयात करने वाले प्रमुख देशों में से एक है।</p>
<p>हालांकि, चीन के साथ लंबे समय से चल रहे व्यापार संघर्ष के बीच अमेरिका भारत को एक प्रमुख वैकल्पिक आर्थिक और रणनीतिक साझेदार के रूप में देखता है। अमेरिकी निवेश और व्यापार के मामले में भारत को लाभ हो सकता है। हालांकि, टैरिफ कम करने और डेयरी व मीट उत्पादों के लिए बाजार पहुंच प्रदान करने के लिए अमेरिका कठोर दबाव की रणनीति अपना सकता है, जिसके लिए भारत के लिए झुकना मुश्किल होगा। इस प्रकार, ट्रंप युग में सरवाइवल स्ट्रैटेजी भारत की तैयारी और सटीक रिसर्च पर निर्भर करेगी। ताकि भारत के हितों की रक्षा की जा सके और उन्हें बहुपक्षीय व द्विपक्षीय मंचों पर प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया जा सके।</p>
<p><strong><em>(लेखक भारतीय विदेश व्यापार संस्थान, नई दिल्ली के कुलपति हैं)</em></strong></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ ट्रंप 2.0 में एग्री ट्रेडः भारत को अमेरिका के साथ सख्त मोलभाव के लिए तैयार रहने की जरूरत ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[जलवायु परिवर्तन और शोध संस्थानों की बदलती भूमिका]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/climate-change-and-evolving-role-of-research-institutions.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 12 Jan 2025 10:42:46 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/climate-change-and-evolving-role-of-research-institutions.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>पिछले दशकों में भारत को खाद्य की कमी वाली अर्थव्यवस्था से 140 करोड़ से अधिक लोगों को भोजन प्रदान करने में सक्षम अर्थव्यवस्था बनाने में कृषि अनुसंधान की उपलब्धियों ने अहम भूमिका निभाई है। हालांकि जलवायु परिवर्तन, घटते प्राकृतिक संसाधन और मिट्टी की सेहत जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं, फिर भी पिछली उपलब्धियों द्वारा रखी गई नींव जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूलन और पर्यावरण की सस्टेनेबिलिटी के लिए अनुसंधान में एक मजबूत मंच प्रदान करती है।</p>
<p>भारत ने कृषि अनुसंधान और शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए कई संस्थानों की स्थापना की। वर्ष 1929 में स्थापित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों ने राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली के तहत वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इन्होंने उत्पाद और प्रौद्योगिकी विकास में योगदान किया जिससे खाद्य, पोषण और आजीविका की सुरक्षा प्राप्त करने में मदद मिली है। इनके प्रमुख योगदान में अधिक उपज देने वाली, रोग प्रतिरोधक और पोषण के लिए बायो फोर्टिफाइड किस्मों का विकास शामिल हैं। साथ ही इन्होंने मिट्टी की सेहत, जल और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन और कीट एवं रोग प्रबंधन के लिए इंटीग्रेटेड टेक्नोलॉजी भी विकसित की। इसके परिणामस्वरूप देश में खाद्य उत्पादन बढ़कर लगभग 33.2 करोड़ टन तक पहुंच गया है।</p>
<p>हालांकि समृद्ध इतिहास और महत्वपूर्ण उपलब्धियों वाली भारतीय कृषि वर्तमान में कई चुनौतियों का सामना कर रही है। प्रमुख चुनौती है जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चरम मौसमी घटनाएं, जिनके कारण फसल उत्पादन में कमी और कीटों तथा रोगों की घटनाओं में वृद्धि हो रही है। हरित क्रांति में अधिक उपज वाली किस्मों की उत्पादकता बनाए रखने के लिए रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ है। इसके परिणामस्वरूप किसानों के खेतों में मिट्टी की उर्वरता और फसलों की जैव विविधता को नुकसान हुआ है।</p>
<p>इन चुनौतियों से निपटने में रिसर्च और इनोवेशन पर पुनः ध्यान केंद्रित करना स्थायी और प्रभावी समाधान प्रदान कर सकता है। कुछ अनुसंधान क्षेत्र जिन्हें प्राथमिकता दी जानी चाहिए, उनमें फसलों की ऐसी किस्मों का विकास शामिल है जो कम एग्रोकेमिकल के साथ अधिक उत्पादन देने में सक्षम हों। साथ ही सूखा, लवणता, बाढ़, उच्च तापमान जैसी विषम परिस्थितियों का सामना करने में सक्षम हों, और उनमें कीटों तथा रोगों की प्रतिरोधी क्षमता हो। क्रिस्पर (CRISPR) आधारित जीन एडिटिंग जैसी उन्नत प्रजनन तकनीक के साथ पारंपरिक प्रजनन को बढ़ावा देने के मौजूदा प्रयासों को मजबूत करना चाहिए। इसमें जेनेटिक इंजीनियरिंग, मार्कर-असिस्टेड चयन और जीनोमिक्स की मदद से प्रजनन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।</p>
<p>इसी तरह जल प्रबंधन, मिट्टी की सेहत में सुधार, डिजिटल और प्रिसीजन खेती, फसल विविधीकरण, कृषि जैव विविधता को मुख्यधारा में लाना, बायोफर्टिलाइजर तथा मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में मददगार और नाइट्रोजन-फिक्सिंग करने वाले सूक्ष्मजीवों के अनुसंधान पर ध्यान केंद्रित करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। हमें ऐसी प्रणालियां विकसित करने और बढ़ावा देने की आवश्यकता है जो एकल फसलों पर निर्भरता को कम करे, जैव विविधता को बढ़ावा दे और किसानों की आय बढ़ाए। यह भी महत्वपूर्ण है कि संसाधनों के उपयोग को श्रेष्ठतम बनाने और फसल स्वास्थ्य की मॉनिटरिंग के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, इंटरनेट ऑफ थिंग्स और रिमोट सेंसिंग का लाभ उठाया जाए।&nbsp;</p>
<p>इसके अतिरिक्त किफायती कृषि सेंसर, ड्रोन और उपग्रह आधारित निर्णय लेने के उपकरणों का विकास आवश्यक है। जलवायु परिवर्तन के तेजी से बढ़ते प्रभाव के चलते कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन अनिवार्य हो गया है। इसके लिए कृषि वानिकी, कंजर्वेशन टिलेज और कवर क्रॉप के उपयोग जैसे तरीकों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। पौधों की जड़ से जुड़े जीव विज्ञान, प्रकाश संश्लेषण द्वारा कार्बन कैप्चर करने की क्षमता बढ़ाने, अप्रयुक्त पौधों के आनुवंशिक गुणों और मिट्टी-पौधा-सूक्ष्मजीव के बीच परस्पर क्रियाओं पर अनुसंधान बढ़ाना चाहिए। इससे फसल उत्पादन बढ़ाने और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम करने में क्लाइमेट स्मार्ट खेती का अधिकतम लाभ मिल सकेगा। जलवायु के प्रति अनुकूलन, तकनीकी इनोवेशन और सस्टेनेबल परंपराओं पर ध्यान केंद्रित करके भारतीय कृषि खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित कर सकती है, किसानों की आजीविका को बेहतर बना सकती है और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा कर सकती है।</p>
<p>भारतीय कृषि की आज की चुनौतियों का समाधान करने के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जो पारंपरिक ज्ञान को अत्याधुनिक विज्ञान के साथ जोड़ता हो। नीति निर्माताओं, शोधकर्ताओं और किसानों के बीच सहयोगात्मक प्रयास कृषि व्यवस्था को सुदृढ़ और समृद्ध बनाने में महत्वपूर्ण होंगे। सहभागी रिसर्च को मजबूत करने से किसान अपनी तरफ से स्थानीय जानकारी दे सकेंगे और उन्हें भी उपयुक्त समाधान प्राप्त करने में मदद मिलेगी। इससे व्यावहारिक और प्रभावी इनोवेशन को बढ़ावा मिलेगा। इस संदर्भ में राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थानों को बड़ी भूमिका निभानी चाहिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे वैश्विक स्तर पर अग्रणी बने रहें।</p>
<p>वर्तमान चुनौतियों का समाधान करने के लिए अनुसंधान के दृष्टिकोण में भी बदलाव की आवश्यकता है। इसमें बुनियादी पौध विज्ञान पर ध्यान केंद्रित किया जाए ताकि किसी समस्या का प्रासंगिक समाधान खोजा जा सके। दूसरे शब्दों में, पौध विज्ञान के मौलिक ज्ञान को बढ़ाने से लेकर जलवायु के प्रति लचीलापन, सस्टेनेबिलिटी और किसानों की बेहतर आजीविका को बढ़ावा देने वाली इनोवेटिव टेक्नोलॉजी और नीतियों को विकसित करना ही आगे का मार्ग है। बुनियादी पौध विज्ञान के साथ प्रिसीजन खेती, रीजेनरेटिव और कंजरवेटिव खेती, रिमोट-सेंसर तकनीक, उन्नत जैव प्रौद्योगिकी उपकरण और एआई संचालित मॉडल जैसी अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी के बीच तालमेल से ही सतत और जलवायु के प्रति लचीले कृषि का आधार बनेगा।</p>
<p>महत्वपूर्ण योगदान के बावजूद राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थान वित्तीय संकट, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में अंतर, अंतरविभागीय अनुसंधान और अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों तथा निजी क्षेत्र के साथ सहयोग जैसी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। इन समस्याओं का समाधान करने के लिए अधिक निवेश और इनोवेटिव सोच की आवश्यकता होगी ताकि भविष्य की दृष्टि से साझेदारियां की जा सकें। सरकारी संस्थानों और निजी क्षेत्र को मिलकर कृषि अनुसंधान और इनोवेशन के लिए वित्तीय संसाधन जुटाने की आवश्यकता है। देशों के बीच सहयोग से जानकारियां साझा करने और संसाधन जुटाने में तेजी आ सकती है। जन जागरूकता पर पर्याप्त जोर दिया जाना चाहिए ताकि बुनियादी विज्ञान और उन्नत जैव प्रौद्योगिकी टूल्स के महत्व को समझाया जा सके और नीतिगत समर्थन जुटाया जा सके।</p>
<p>शोध संस्थानों को इनोवेटिव दृष्टिकोण अपनाकर, सहयोग को मजबूत करके और वर्तमान तथा भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ना चाहिए। कृषि अनुसंधान संस्थानों की क्षमता और प्रासंगिकता बढ़ाने के लिए मल्टी-डिसीप्लिनरी अप्रोच अपनाना और शोधकर्ताओं के बीच सहयोग को प्रोत्साहित करना महत्वपूर्ण है। इससे व्यापक समाधान विकसित किए जा सकेंगे, तकनीकी कंपनियों के साथ साझेदारी स्थापित कर प्रिसीजन खेती के उपकरण विकसित किए जा सकेंगे। इसमें एआई, आईओटी और सैटेलाइट डेटा का उपयोग किया जाना चाहिए। हमें सार्वजनिक शोध संस्थानों के निजी क्षेत्र की कंपनियों के साथ सहयोग को बढ़ावा देना चाहिए। इससे बेहतर बीज किस्मों, हार्वेस्टिंग के बाद की तकनीक और स्मार्ट खेती के क्षेत्र में रिसर्च आउटपुट बढ़ेगा। कृषि अनुसंधान में निजी निवेश बढ़ाने के साथ शोध संस्थानों और उद्योगों के बीच संबंधों को मजबूत करना भी आवश्यक है, ताकि विशिष्ट चुनौतियों का समाधान किया जा सके।</p>
<p>भारत में अत्याधुनिक ज्ञान और प्रौद्योगिकी लाने के लिए अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के साथ एक्सचेंज प्रोग्राम जरूरी हो गया है। युवा प्रतिभाओं को आकर्षित करने के लिए छात्रवृत्ति, फेलोशिप और करियर प्रोत्साहन देना आज के समय की आवश्यकता है। इससे युवाओं को कृषि अनुसंधान में प्रवेश करने के लिए प्रेरित किया जा सकेगा। अनुसंधान सुविधाओं को आधुनिक बनाना और जैव प्रौद्योगिकी तथा आनुवंशिक अध्ययन के लिए प्रयोगशालाओं को अत्याधुनिक उपकरणों से अपग्रेड करना भी जरूरी है। इससे वैज्ञानिक लक्ष्यों को अधिक प्रभावी तरीके से हासिल करने में मदद मिलेगी।</p>
<p>हमें ऐसी रणनीति विकसित करने पर जोर देना चाहिए जो जलवायु के प्रति लचीलापन, मिट्टी की सेहत में सुधार, कार्बन अवशोषण और पर्यावरण सस्टेनेबिलिटी जैसी दीर्घकालिक चुनौतियों से निपटने में रिसर्च प्रोजेक्ट के लिए निरंतर वित्त पोषण प्रदान करें। उभरती प्रौद्योगिकियों और सतत कृषि परंपराओं पर जानकारी का आदान-प्रदान करने के मकसद से लिए शोधकर्ताओं को वैश्विक फोरम में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इससे वे अपनी शोध प्राथमिकताओं का अंतर्राष्ट्रीय मानकों के साथ मेल कर सकेंगे।</p>
<p><em>(लेखक नेशनल ब्यूरो ऑफ प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेज-आईसीएआर के पूर्व निदेशक, राष्ट्रीय कृषि विज्ञान अकादमी के पूर्व सचिव और ऑस्ट्रेलिया की मर्डोक यूनिवर्सिटी में एडजंक्ट प्रोफेसर हैं)</em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ जलवायु परिवर्तन और शोध संस्थानों की बदलती भूमिका ]]></media:description>
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	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[वैश्विक चुनौतियां और स्थानीय संस्थाओं की अहमियत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/local-institutions-for-global-challenges.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 06 Jan 2025 09:44:48 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/local-institutions-for-global-challenges.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>कृषि कई वैश्विक चुनौतियों का सामना कर रही है। बल्कि यह कहना बेहतर होगा कि किसानों को जमीन पर जिन स्थानीय चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, वे चुनौतियां वैश्विक रूप ले चुकी हैं। जलवायु संकट ऐसी ही एक समस्या है। दूसरी समान रूप से महत्वपूर्ण समस्या कृषि जैव विविधता का नुकसान है। जैव विविधता सतत कृषि का एक महत्वपूर्ण घटक है। जैव विविधता खाद्य और पोषण सुरक्षा, बेहतर पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के प्रति लचीलापन सुनिश्चित करती है।</p>
<p>जैविक विविधता (बायोडायवर्सिटी) के संरक्षण और इसके सतत उपयोग को जैव विविधता पर कन्वेंशन (सीबीडी) में &lsquo;मानवता की सामान्य चिंता&rsquo; के रूप में अंतरराष्ट्रीय कानून की मान्यता मिली थी। वर्ष 1992 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण और विकास सम्मेलन (यूएनसीईडी) में सीबीडी की शुरुआत हुई थी। उसे &lsquo;पृथ्वी सम्मेलन&rsquo; भी कहा जाता है। उसका आयोजन ब्राजील के रियो डी जनेरियो में हुआ था। भारत उन 150 देशों में शामिल था जिन्होंने उस समय सीबीडी पर हस्ताक्षर किए थे।</p>
<p>उसी वर्ष भारत में संविधान का 73वां संशोधन पारित हुआ जिसके तहत पंचायती राज संस्थाओं की स्थापना हुई। अन्य प्रावधानों के अलावा यह प्रावधान लागू किया गया कि पंचायती राज संस्थाएं, स्थानीय स्वशासन वाली संस्थाएं होंगी। वे राज्य विधानसभा द्वारा प्रदत्त शक्तियों का ग्राम स्तर पर प्रयोग कर सकती हैं। पंचायती राज संस्थाओं की शक्तियां, अधिकार और जिम्मेदारियां (जो संविधान के अनुच्छेद 243जी में दी गई हैं) ग्यारहवीं अनुसूची में उल्लिखित विषयों तक होती हैं। उक्त अनुसूची के 29 विषयों में से पहला विषय &lsquo;कृषि&rsquo; है। बायोडायवर्सिटी के बिना कृषि न तो जीवंत और समृद्ध हो सकती है, न ही लचीली।</p>
<p>संसद ने 2002 में सीबीडी के अनुरूप जैव विविधता अधिनियम पारित किया। इस अधिनियम की धारा 41 में एक नए स्थानीय संस्थान &ndash; जैव विविधता प्रबंधन समिति (बीएमसी) की स्थापना का प्रावधान किया गया है। कानून के अनुसार, हर स्थानीय निकाय को बीएमसी स्थापित करना अनिवार्य था।</p>
<p>वर्ष 2004 में केंद्र सरकार ने जैव विविधता नियम जारी किए, जिसमें बीएमसी की संरचना और कार्य को नियम 22 में परिभाषित किया गया था। इसके अनुसार, एक बीएमसी में स्थानीय निकाय द्वारा नामित छह व्यक्ति होने चाहिए। उनमें कम से कम एक-तिहाई महिलाएं होनी चाहिए और कम से कम 18 प्रतिशत अनुसूचित जाति/जनजाति श्रेणी से होने चाहिए। बीएमसी का अध्यक्ष इस समिति के सदस्यों को ही चुनना था। दो दशक बाद, 22 अक्टूबर 2024 को पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने नए जैव विविधता नियम जारी किए। इसमें बीएमसी की संरचना से संबंधित नियम (नियम 22) हटा दिया गया है।</p>
<p>जैव विविधता (संशोधन) अधिनियम, 2023 में यह प्रावधान किया गया है- (1बी) जैव विविधता प्रबंधन समिति की संरचना राज्य सरकार द्वारा निर्धारित की जाएगी। उक्त समिति के सदस्यों की संख्या सात से कम और ग्यारह से अधिक नहीं होगी।</p>
<p>नए जैव विविधता नियमों (नियम 2(1)(d)) के परिभाषा खंड में बीएमसी को अधिनियम की धारा 41 की उपधारा (1) के तहत स्थापित एक संस्था के रूप में परिभाषित किया गया है। जैव विविधता अधिनियम कहता है कि बीएमसी के कार्यों में जैव विविधता का संरक्षण, सतत उपयोग और दस्तावेजीकरण को बढ़ावा देना शामिल हैं। इसमें आवास का संरक्षण, भूमि, स्थानीय किस्मों, पालतू पशुओं की नस्लों और सूक्ष्म जीवों का संरक्षण और जैव विविधता से संबंधित जानकारी का संग्रह भी शामिल हैं।</p>
<p>नेशनल बायोडायवर्सिटी अथॉरिटी की वेबसाइट के अनुसार, भारत में कुल 2,77,688 बीएमसी हैं (28 राज्यों में 2,72,963 और 8 केंद्र शासित प्रदेशों में 4,980 बीएमसी)। इसके मुकाबले देश में 731 कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) हैं। ये केवीके आईसीएआर के 11 एग्रीकल्चरल टेक्नोलॉजी एप्लिकेशन रिसर्च इंस्टीट्यूट्स (एटीएआरआई) के तहत कार्य करते हैं, जो कृषि विस्तार विभाग के अधीन आते हैं। केवीके किसानों तक टेक्नोलॉजी ले जाने का माध्यम बन गए हैं। बीएमसी किसानों से एनएआरईएस तक जैव विविधता और उससे संबंधित संदेश और सामग्री पहुंचाने का माध्यम हो सकते हैं। बीएमसी ने जमीनी स्तर पर जैव विविधता-रक्षकों से औपचारिक आरएंडडी प्रणाली तक आनुवांशिक संसाधनों और उनकी जानकारी पहुंचाने का कार्य किया है और अब भी कर रहा है। उनके द्वारा जैव विविधता वाली कृषि परंपराओं को अपनाने की क्षमता पूरी तरह लागू की जानी चाहिए, चाहे वह बीजों से जुड़ी हो या नस्लों से। राज्य सरकारें इन जैव विविधता संस्थाओं में नया जीवन डाल सकती हैं। &nbsp;</p>
<p>कुनमिंग-मॉन्ट्रियल ग्लोबल बायोडायवर्सिटी फ्रेमवर्क (जीबीएफ) को 2022 में सीबीडी के एक सम्मेलन में अपनाया गया था। जीबीएफ जैव विविधता को बहाल करने की एक योजना है। इसके मुख्य तत्व 2050 के लिए 4 लक्ष्य और 2030 के लिए 23 लक्ष्य हैं। यह मूल रूप से 2030 के बाद सतत विकास लक्ष्य का एक मार्ग है, जिसका उद्देश्य 2050 तक पृथ्वी पर प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन जीना है। यह मार्ग जैव विविधता को केंद्र में रखता है। जैव विविधता अधिनियम के 20 साल बाद, भारत ने जीबीएफ को मंजूरी दी। उसने जीबीएफ अभियान &lsquo;जैव विविधता योजना: पृथ्वी पर जीवन के लिए&rsquo; के पहले चरण के लिए अपनी प्रतिबद्धता भी व्यक्त की है।<br />यदि खेतों और किसानों के करीबी जैव विविधता से जुड़े स्थानीय संस्थान जीवित रखें जाएं, तो वे न केवल सतत जीवन और आजीविका के लक्ष्यों को पूरा करने में मदद करेंगे, बल्कि वैश्विक चुनौतियों से निपटने में भी सहायक होंगे।</p>
<p><strong>कृषि जैव विविधता की परिभाषा</strong><br />फसलों, मवेशी, वानिकी और मछली पालन जैसे क्षेत्रों में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पशुओं, पौधों और सूक्ष्मजीवों की विविधता और भिन्नता। इसमें आनुवंशिक संसाधनों (प्रजातियां, नस्लें) और खाद्य, चारा, रेशा, ईंधन और औषधियों में उपयोग की जाने वाली प्रजातियों की विविधता शामिल है। इसमें उत्पादन बढ़ाने में मददगार और बिना हार्वेस्टिंग वाली प्रजातियों की विविधता भी शामिल है (मिट्टी में पाए जाने वाले सूक्ष्मजीव, प्रिडेटर, पॉलिनेटर)। इसमें वे प्रजातियां भी शामिल हैं जो कृषि पारिस्थितिकी तंत्र (कृषि, चरागाह, वन और जल) को बेहतर बनाती हैं।&nbsp;<br />(स्रोतः एफएओ, 1999a)</p>
<p><strong>ग्लोबल बायोडायवर्सिटी फ्रेमवर्क के लक्ष्य</strong><br />यह सुनिश्चित करना कि कृषि, एक्वाकल्चर, मत्स्य पालन और वानिकी का प्रबंधन सतत रूप से किया जाए, विशेष रूप से जैव विविधता के सस्टेनेबल उपयोग के जरिए। इसमें जैव विविधता अनुकूल परंपराओं, जैसे सस्टेनेबल इंटेंसिफिकेशन, कृषि पारिस्थितिकी और अन्य इनोवेटिव दृष्टिकोणों का प्रयोग बढ़ाना शामिल हैं। ये परंपराएं इन उत्पादन प्रणालियों की सहनशीलता, दीर्घकालिक क्षमता और उत्पादकता में योगदान करें। ये खाद्य सुरक्षा, जैव विविधता का संरक्षण तथा इसकी पुनर्स्थापना और आमजन के लिए प्रकृति के योगदान को बनाए रखें।</p>
<p><em>(लेखिका लीगल रिसर्चर और पॉलिसी एनालिस्ट हैं, सस्टेनेबल एग्रीकल्चर और बायोडाइवर्सिटी कंजर्वेशन पर काम करती हैं। संपर्कः emailsbhutani@gmail.com)</em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ वैश्विक चुनौतियां और स्थानीय संस्थाओं की अहमियत ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कृषि की तरक्की के लिए नए संस्‍थानों पर दारोमदार]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/india-needs-new-institutions-to-boost-agriculture.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 02 Jan 2025 10:52:32 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/india-needs-new-institutions-to-boost-agriculture.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>कृषि क्षेत्र भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। यह देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में लगभग 18% का योगदान करने के साथ राष्ट्रीय कार्यबल के 45% को रोजगार भी प्रदान करता है। कृषि निर्यात के मामले में भारत दुनिया के शीर्ष देशों में 8वें स्थान पर है, और इसका वैश्विक कृषि निर्यात में 2.33% हिस्सा है। इसके बावजूद भारत का 24 अरब डॉलर का एग्री-टेक बाजार अब भी काफी हद तक अप्रयुक्त है। भारतीय कृषि की कुछ विशेषताएं हैं- विविध कृषि-जलवायु परिदृश्य, जीडीपी और रोजगार में महत्वपूर्ण योगदान, पारंपरिक से आधुनिक कृषि पद्धतियों की ओर बदलाव और एग्री-टेक व डिजिटल समाधान पर बढ़ता ध्यान।</p>
<p><strong>भारत में कषि और बागवानी उत्पादन</strong></p>
<p>भारत ने बीते वर्षों में कृषि उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि देखी है। देश की कृषि जीडीपी 1970 के दशक की शुरुआत में लगभग 25 अरब डॉलर थी, जो बढ़कर 2024 में 630 अरब डॉलर से अधिक हो गई। इस वृद्धि को बागवानी, डेयरी, पोल्ट्री और इनलैंड एक्वाकल्चर जैसे अधिक मूल्य वाले क्षेत्रों ने गति प्रदान की है।</p>
<p><strong>भारतीय कषि में सफलता की कहानियां और संबंधित संस्थान</strong></p>
<p>भारतीय कृषि में सफलता की अनेक कहानियां हैं। जैसे हरित क्रांति, जिसने राष्ट्रीय स्तर पर खाद्य आत्मनिर्भरता दी। श्वेत क्रांति, जिसने दूध उत्पादन में महत्वपूर्ण वृद्धि की, और हाल में बागवानी क्षेत्र में आया उछाल, जिसने भारत को फलों और सब्जियों का प्रमुख उत्पादक बना दिया। एक उल्लेखनीय विशेषता है एग्रीटेक स्टार्टअप का उदय। वर्ष 2013 से 2020 के बीच 1,000 से अधिक एग्रीटेक स्टार्टअप उभरे। सफलता की इन सभी कहानियों का आधार आईसीएआर, भारतीय खाद्य निगम, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, अमूल/जीसीएमएमएफ, एनडीडीबी, कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया, नाबार्ड जैसे कुछ प्रतिष्ठित संस्थान रहे हैं।</p>
<p><strong>भारतीय कषि में सफलता और चुनौतियां</strong></p>
<p>इन युगांतरकारी विकास को अंजाम देने वाले प्रतिष्ठित संस्थानों से हमें कई सफलताएं मिलीं। जैसे खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि, कृषि निर्यात में विविधीकरण और लगातार बढ़ती जनसंख्या तथा कृषि योग्य भूमि कम होने के बावजूद कई कृषि उपज में आत्मनिर्भरता। इन महत्वपूर्ण उपलब्धियों के बावजूद कुछ चुनौतियां बनी रहीं। जैसे वैश्विक मानकों की तुलना में कम कृषि उत्पादकता, कमजोर बुनियादी ढांचा और आपूर्ति श्रृंखला की अक्षमताएं, वैश्विक मूल्यों में अस्थिरता और बाजार पहुंच की समस्याएं और कृषि पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव। हालांकि अनुसंधान और विकास में निवेश से फसलों की बेहतर किस्मों, खेती की उन्नत तकनीकों और अधिक उत्पादकता में सफलता मिली है। फिर भी भारत की औसत उपज और दुनिया की सर्वाधिक उपज के बीच बड़ा अंतर है। उदाहरण के लिए, भारत का औसत धान उत्पादन 3,878 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है, जबकि विश्व का अधिकतम उत्पादन 10,386 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है।</p>
<p><strong>सरप्लस उत्पादन और निर्यात की संभावना</strong></p>
<p>भारत में कृषि उत्पादन को काफी हद तक बढ़ाने की क्षमता है। हालांकि इससे कुछ कमोडिटी का उत्पादन सरप्लस में पहुंच सकता है और संभव है कि उनका उत्पादन वैश्विक व्यापार की जरूरत से अधिक हो जाए। उदाहरण के लिए, विश्व स्तर पर सर्वाधिक उपज हासिल करने पर भारत संभवतः 20 करोड़ मीट्रिक टन से अधिक चावल का सरप्लस उत्पादन कर सकता है। यह पूरे विश्व व्यापार के लिए काफी होगा और वैश्विक भूख के मुद्दे का भी हल कर देगा।</p>
<p>भारतीय कृषि को आगे और ऊंचे स्तर तक पहुंचाया जा सकता है। इसके लिए नए और समय के अनुकूल संस्थानों का निर्माण करना होगा, जिनके उद्देश्य कई लेकिन समानांतर होंगे। जैसे सहकारी पारिस्थितिकी तंत्र और किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) के माध्यम से उपज का एग्रीगेशन, फसल-विशिष्ट की उत्पादकता बढ़ाने के लिए अनुसंधान और विकास को प्रदर्शित करने वाले उत्कृष्टता केंद्र, टिकाऊ कृषि की खातिर प्रौद्योगिकी (एआई, आईओटी, रिमोट सेंसिंग) का लाभ उठाने के लिए सार्वजनिक-निजी साझेदारी, किसानों और वैश्विक बाजारों को जोड़ने के लिए वैश्विक उपभोक्ता-केंद्रित निर्यात संस्थान, और सबसे महत्वपूर्ण, जीएसटी काउंसिल की तर्ज पर भारतीय कृषि परिषद का गठन जिससे कृषि सुधार और नीतिगत हस्तक्षेप जारी रहें।</p>
<p>ऐसे उद्देश्यों के लिए डिजाइन की गई संस्थाएं पूरे कृषि क्षेत्र में निवेश के लिए आवश्यक प्रोत्साहन प्रदान करेंगी। ये संस्थाएं ग्रामीण क्षेत्रों में सतत रोजगार अवसरों के सृजन के लिए जरूरी भौतिक, डिजिटल और मानव संसाधन इन्फ्रास्ट्रक्चर के निर्माण में मदद करेंगी। साथ ही, ये ग्रामीण और शहरी जीवनशैली के बीच अंतर को पाटेंगी और वैश्विक बाजार में एक प्रमुख खाद्य आपूर्तिकर्ता बनने की क्षमता पैदा करेंगी।</p>
<p><strong>भारत में कषि सुधारों की जरूरत</strong></p>
<p>कृषि क्षेत्र की चुनौतियों का समाधान करने और इसके पूर्ण सामर्थ्य को उजागर करने के लिए सुधार आवश्यक हैं। सुधार के मुख्य क्षेत्रों में शामिल हैं- कृषि विपणन प्रणालियों का आधुनिकीकरण, आपूर्ति श्रृंखला की दक्षता में सुधार, कृषि में निजी क्षेत्र के निवेश को बढ़ावा देना, सस्टेनेबल कृषि के तौर-तरीकों को प्रोत्साहित करना, किसानों के लिए ऋण और बीमा की सुविधा में सुधार करना। सौभाग्यवश, माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में वर्तमान सरकार का इस अनिवार्यता पर पूरा फोकस है। सरकार एकाधिक कार्यक्रमों, संस्थाओं और संसाधनों के साथ विधायिका और कार्यपालिका में सुधारों को लागू कर रही है।</p>
<p>भारत के कृषि निर्यात में वृद्धि की प्रचुर संभावनाएं हैं। देश पहले ही वैश्विक स्तर पर कृषि उत्पादों के शीर्ष 15 निर्यातकों में शामिल है। यह क्षेत्र भारत की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देता है।</p>
<p><strong>निर्यात संभावना के प्रमुख कारक</strong></p>
<p> विविध कृषि-पारिस्थितिकी क्षेत्र: भारत की विविध जलवायु और भौगोलिक स्थितियां कृषि उत्पादों की एक विस्तृत श्रृंखला के उत्पादन का माहौल देती हैं।</p>
<p> बढ़ती वैश्विक मांग: बढ़ती वैश्विक जनसंख्या और बदलती आहार प्राथमिकताएं भारतीय कृषि निर्यात के लिए अवसर उत्पन्न करती हैं।</p>
<p> सरकारी पहल: कृषि निर्यात नीति का उद्देश्य आने वाले वर्षों में कृषि निर्यात को 100 अरब डॉलर तक पहुंचाना है।</p>
<p> प्रौद्योगिकी में प्रगति: एग्री-टेक स्टार्टअप और डिजिटल पहल से कृषि क्षेत्र में उत्पादकता और गुणवत्ता में वृद्धि हो रही है।</p>
<p><strong>निर्यात के लिए प्रमुख उत्पाद और अवसर</strong></p>
<p> चावल: सबसे बड़ा कृषि निर्यात उत्पाद, जिसका 2022-23 में कुल कृषि निर्यात में 20% से अधिक योगदान था।&nbsp;</p>
<p> समुद्री उत्पाद: वर्ष 2022-23 में 8.07 अरब डॉलर का निर्यात, जिससे तटीय राज्यों को लाभ।</p>
<p> कॉफी: निर्यात में वृद्धि, विशेष रूप से इंस्टेंट कॉफी और री-एक्सपोर्ट में।&nbsp;</p>
<p> फल और सब्जियां: अंगूर, केले, अनार और प्रसंस्कृत उत्पादों के निर्यात में वृद्धि की संभावना।&nbsp;</p>
<p> मूल्य संवर्धित और जैविक उत्पाद: अधिक मूल्य वाले और प्रसंस्कृत कृषि निर्यात का हिस्सा बढ़ाने के अवसर।</p>
<p><strong>इन चुनौतियों से निपटना जरूरी</strong></p>
<p> इन्फ्रास्ट्रक्चर और लॉजिस्टिक्स: बेहतर कोल्ड चेन सुविधाओं, परिवहन और निर्यातोन्मुख इन्फ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता।</p>
<p> गुणवत्ता मानक: अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित करना।&nbsp;</p>
<p> मूल्य संवर्धन: निर्यात बास्केट में प्रसंस्कृत और मूल्य संवर्धित उत्पादों का हिस्सा बढ़ाना।&nbsp;</p>
<p> बाजार पहुंच: संभावित निर्यात बाजारों में शुल्क और गैर-शुल्क बाधाओं का समाधान निकालना।</p>
<p><strong>समर्पित संस्थान का गठन</strong></p>
<p>नेशनल कोऑपरेटिव एक्सपोर्ट लिमिटेड (एनसीईएल) को कृषि निर्यात को बढ़ावा देने में एक विशिष्ट भूमिका निभाने के लिए स्थापित किया गया है। यह सहकारी प्रयासों के माध्यम से भारत के कृषि क्षेत्र की निर्यात क्षमता को हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।</p>
<p><strong>प्रमुख क्षेत्र जहां एनसीईएल योगदान कर सकता है</strong></p>
<p>&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; उपज का एग्रीगेशन: एनसीईएल छोटे और सीमांत किसानों को उनके संसाधनों और उनकी उपज को एकत्र करने में मदद कर सकता है, ताकि निर्यात के लिए इकोनॉमी ऑफ स्केल प्राप्त की जा सके।&nbsp;</p>
<p> &nbsp;&nbsp;&nbsp; गुणवत्ता नियंत्रण और मानकीकरण: कृषि उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाने के लिए कठोर गुणवत्ता नियंत्रण उपायों को लागू करे।</p>
<p> &nbsp;&nbsp;&nbsp; मार्केट इंटेलिजेंस: सदस्य सहकारी समितियों को वैश्विक बाजार के ट्रेंड, मांग के पैटर्न और निर्यात अवसरों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करे।</p>
<p> क्षमता निर्माण: सहकारी समितियों को निर्यात प्रक्रियाओं, डॉक्यूमेंटेशन और अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुपालन जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षण और मदद करे।</p>
<p> ब्रांड का विकास: कृषि निर्यात के लिए एक मजबूत 'कोऑपरेटिव इंडिया' ब्रांड बनाए जो गुणवत्ता और सस्टेनेबिलिटी पर जोर दे।&nbsp;</p>
<p> इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास: एग्रीकल्चर इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड जैसी सरकारी पहल के साथ सहयोग करे, ताकि निर्यातोन्मुख इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास किया जा सके।&nbsp;</p>
<p> प्रौद्योगिकी अपनाना: सदस्य सहकारी समितियों में उत्पादकता और गुणवत्ता बेहतर करने के लिए एग्री-टेक समाधानों को अपनाने में सहायता करे।&nbsp;</p>
<p><strong>सरकारी पहल के साथ एलाइनमेंट</strong></p>
<p>एनसीईएल कृषि निर्यात को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों के साथ मिलकर काम कर सकता है।</p>
<p> डिजिटल कृषि मिशन (डीएएम): निर्यातोन्मुख कृषि तौर-तरीकों में सुधार के लिए डिजिटल तकनीक के उपयोग को बढ़ावा दे।&nbsp;</p>
<p> कृषि निर्यात नीति: कृषि निर्यात दोगुना करने और निर्यात बकेट में विविधता लाने के लक्ष्यों को प्राप्त करने में योगदान करे।</p>
<p> एग्रीकल्चर इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड: फंड का उपयोग निर्यात-केन्द्रित बुनियादी ढांचा जैसे गोदाम, प्रसंस्करण इकाइयां और कोल्ड स्टोरेज सुविधाओं के विकास के लिए करे।&nbsp;</p>
<p><strong>एनसीईएल के संभावित प्रभाव</strong></p>
<p> किसानों की आय में वृद्धि: निर्यात को सुगम बनाकर बेहतर मूल्य प्राप्ति और बाजार पहुंच के माध्यम से एनसीईएल किसानों की आय 25-35% तक बढ़ा सकता है।</p>
<p> निर्यात में वृद्धि: कृषि निर्यात 60 अरब डॉलर और उससे अधिक ले जाने में योगदान कर सकता है।&nbsp;</p>
<p> ग्रामीण विकास: निर्यातोन्मुख मूल्य श्रृंखला और रोजगार के अवसर सृजित करके ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दे सकता है।</p>
<p> सतत कृषि: वैश्विक मांग को पूरा करने के लिए पर्यावरण की दृष्टि से अनुकूल उत्पादों के सस्टेनेबल तरीके और जैविक कृषि को बढ़ावा दे सकता है।</p>
<p>एनसीईएल के पास भारत के कृषि निर्यात परिदृश्य में सहकारी संस्थाओं की शक्ति का उपयोग करके एक गेमचेंजर बनने की क्षमता है। प्रमुख चुनौतियों का समाधान और सरकारी पहल के साथ समन्वय करते हुए एनसीईएल भारत को एक वैश्विक कृषि निर्यात महाशक्ति में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। साथ ही, किसानों और ग्रामीण समुदाय के लिए भी समान लाभ सुनिश्चित कर सकता है।</p>
<p><em><strong> (अनुपम कौशिक, नेशनल कोऑपरेटिव एक्सपोर्ट लिमिटेड (एनसीईएल) के मैनेजिंग डायरेक्टर हैं)</strong></em></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/01/image_750x500_6775122ebb146.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ कृषि की तरक्की के लिए नए संस्‍थानों पर दारोमदार ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/01/image_750x500_6775122ebb146.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[किसानों के लिए संस्थाओं के नव निर्माण की जरूरत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/building-institutions-for-farmers.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 31 Dec 2024 17:28:26 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/building-institutions-for-farmers.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारतीय कृषि और किसानों का बेहतर भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि उनके लिए किस तरह के संस्थान और संस्थाएं बन रही हैं, या मौजूदा संस्थानों को कैसे समय के साथ प्रासंगिक बनाया जा रहा है। देश में हरित क्रांति और खाद्यान्न आत्मनिर्भरता हासिल करने में किसानों और संस्थानों- संस्थाओं की भूमिका अहम रही है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर), कृषि विश्वविद्यालयों और कृषि शोध तंत्र ने बड़ी भूमिका निभाई है। कामयाबी केवल फसलों की किस्मों विकसित करने से नहीं मिली, बल्कि इस उपज के लिए जरूरी उर्वरकों के उत्पादन संयंत्र स्थापित किए गए। उपज का न्यूनतम दाम तय करने के लिए एग्रीकल्चर प्राइस कमीशन बना जो बाद में कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) के रूप में जाना गया और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की व्यवस्था लागू हुई। किसानों को इस कीमत का भुगतान करने के लिए उपज की खरीद व्यवस्था के तहत भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) अस्तित्व में आया। केंद्रीय भंडारण निगम और राज्य भंडारण निगम बने और लोगों तक सही कीमत पर खाद्यान्न पहुंचाने के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) अस्तित्व में आई। कामयाबी की इस कहानी में सरकारी संस्थानों के साथ सहकारिता की भी बड़ी भूमिका रही।&nbsp;</p>
<p>निजी क्षेत्र ने 1980 के दशक के अंत और 1990 के दशक की शुरुआत में इसमें प्रवेश किया। वे सब्जियों, मक्का और कपास (बीटी समेत) की हाइब्रिड, केला में टिशू कल्चर, अधिक यील्ड वाला ब्रॉयलर चिकन और लेयर पोल्ट्री ब्रीड, तथा ड्रिप सिंचाई और लेजर लेवलिंग जैसी नई टेक्नोलॉजी लेकर आए।&nbsp;</p>
<p>अब जब हम खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर होने के साथ दुनिया के बड़े कृषि निर्यातक हैं, तो केंद्रीय मुद्दा किसानों की आय बन गया है। साथ ही 1991 के आर्थिक उदारीकरण के साथ कृषि पर निर्भर लोगों को मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर में शिफ्ट कर किसानों की स्थिति सुधारने की जो उम्मीद थी, उस पर भी ताजा आंकड़े पानी फेरते नजर आते हैं। ऐसे में नीति का केंद्र कृषि और किसान की आर्थिक आत्मनिर्भरता पर आकर टिक गया है। इसके साथ ही यह भी तय है कि इस दिशा की ओर बढ़ने के लिए किसानों को व्यक्तिगत स्तर पर आर्थिक लाभ देने की नीति बहुत कारगर नहीं है। इसके लिए संस्थागत स्वरूप ही कारगर होगा। ऐसी संस्थाएं चाहिए जिनमें किसानों की मालिकाना भागीदारी हो या फिर निजी क्षेत्र के संस्थानों के साथ उनका कारोबारी हितों में भागीदारी का रिश्ता हो। जो संस्थाएं पहले से मौजूद हैं उनमें आईसीएआर और नेशनल एग्रीकल्चरल रिसर्च सिस्टम (नार्स) के तहत आने वाले तमाम संस्थानों के उद्देश्यों और जिम्मेदारी को पुनर्परिभाषित करने और उनके पुनर्गठन की जरूरत है। वहीं एफसीआई जैसे संस्थानों के कामकाज और जिम्मेदारियों की भी समीक्षा की जरूरत है। यही काम राज्य सरकारों के कृषि और किसानों के लिए बने संस्थानों के लिए भी किया जाना जरूरी है।&nbsp;</p>
<p>यहां एक अहम रास्ता किसानों की संस्थाओं से होकर जाता है। इसके लिए कई स्वरूप हैं लेकिन सबसे संगठित, प्रभावशाली व पहुंच वाला स्वरूप सहकारिता है। सरकार ने नया सहकारिता मंत्रालय गठित किया है। सहकारिता के पूरे ढांचे को अधिक कार्यकुशल और जवाबदेह व पारदर्शी बनाने के लिए नियम-कानूनों में बदलाव किए गए हैं। लेकिन यहां चुनौतियां भी कम नहीं हैं। सरकारी और राजनीतिक हस्तक्षेप से लेकर पारदर्शिता और लोकतांत्रिक तरीके से प्रबंधन का चैलेंज तथा पेशेवरों द्वारा इनका संचालन जैसे तमाम मुद्दे हैं जिनको हल करने की जरूरत है।&nbsp;</p>
<p>दूसरा स्वरूप करीब एक दशक पहले आया और उसे कृषि उत्पादक संगठन (एफपीओ) या कृषक उत्पादक कंपनी (एफपीसी) का दर्जा दिया गया। सहकारिता के विकल्प के रूप में सरकार द्वारा प्रोत्साहित इन संस्थाओं की भी अब समीक्षा का समय आ गया है। सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर तीन नई सहकारी संस्थाएं- नेशनल कोआपरेटिव फॉर एक्सपोर्ट लिमिटेड, राष्ट्रीय ऑर्गैनिक कोआपरेटिव लिमिटेड और राष्ट्रीय बीज सहकारी समिति लिमिटेड स्थापित की हैं। उनका उद्देश्य किसानों के उत्पादों के लिए उनको बेहतर कीमत दिलाना और बाजार तैयार करना है। कई निजी संस्थाएं भी बड़े पैमाने पर किसानों के साथ काम कर रही हैं। इसके सबसे कामयाब क्षेत्र डेयरी और चीनी उद्योग इस मॉडल को दूसरे कृषि उत्पादन में भी लागू करने की जरूरत है।&nbsp;</p>
<p>किसानों के लिए संस्था निर्माण की अहमियत को समझते हुए हमने <strong>रूरल वर्ल्ड </strong>पत्रिका&nbsp;का यह अंक इस विषय को समर्पित किया है। इसके लिए इस विषय को समझने वाले और इन संस्थाओं को खड़ा करने व उनका नेतृत्व करने वाले एक्सपर्ट्स और अधिकारियों की राय उनके लेखों के जरिये विस्तार से पाठकों के सामने रख रहे हैं। साथ ही, रूरल वॉयस के 23 दिसंबर को पांचवें साल में प्रवेश करने के गौरवशाली मौके पर हमने सालाना आयोजित होने वाले रूरल वॉयस एग्रीकल्चर कॉन्क्लेव एंड अवार्ड्स 2024 का विषय भी यही तय किया है। "बिल्डिंग इंस्टिट्यूशन्स फॉर फार्मर्स" के मुख्य विषय पर कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था व सहकारिता से जुड़े देश के जाने-माने एक्सपर्ट्स और अधिकारी मंथन करेंगे। रूरल वर्ल्ड का यह अंक हमेशा की तरह किसानों की समृद्धि की दिशा में हमारा प्रयास है।</p>
<p><a href="https://ruralworld.co.in/"><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/12/image_750x_6773dc3755ad9.jpg" alt="" style="display: block; margin-left: auto; margin-right: auto;" /></a></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/12/image_750x500_6773db3ed6258.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ किसानों के लिए संस्थाओं के नव निर्माण की जरूरत ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/12/image_750x500_6773db3ed6258.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[खाद्य सुरक्षा के लिए कृषि नीति पर आम सहमति जरूरी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/india-food-security-needs-policy-consensus-on-punjab.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 31 Dec 2024 10:57:15 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/india-food-security-needs-policy-consensus-on-punjab.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>पंजाब के किसान एक बार फिर आंदोलन पर उतर आए हैं। इस बार वे इसलिए परेशान हैं क्योंकि वे अपनी धान की उपज एपीएमसी मंडियों में सरकारी खरीद केंद्रों पर बेच नहीं पा रहे हैं। राज्य में चावल के लिए भंडारण क्षमता की कमी को इसका कारण बताया जा रहा है।</p>
<p>दशकों से पंजाब चावल और गेहूं की खरीद में अग्रणी रहा है। राज्य की एजेंसियों की खरीद के बाद गेहूं और चावल भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के नियंत्रण में आ जाते हैं। वहां से उन्हें उनका उपभोग वाले राज्यों को भेजा जाता है। आम तौर पर इन्हें रेलवे के जरिए भेजा जाता है, हालांकि हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर तक इसकी ढुलाई ट्रकों से होती है। इस तरह दूसरे राज्यों में अनाज भेजे जाने से अगले साल की खरीद के लिए भंडारण की जगह बनती है। चावल केवल ढंके हुए गोदामों में रखा जाता है, जबकि गेहूं को ढंके हुए गोदामों और प्लिंथ (सीएपी) स्टोरेज में भी रखा जाता है।</p>
<p><strong>पंजाब में भंडारण समस्या क्यों</strong></p>
<p>वर्ष 2023-24 के खरीफ मार्केटिंग सीजन (अक्टूबर-सितंबर) के अंत तक पंजाब में एफसीआई को 124 लाख टन चावल डिलीवर किया गया था। लेकिन इसमें से केवल सात लाख टन बाहर भेजा जा सका। इसका प्रमुख कारण ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु जैसे राज्यों में चावल की अधिक खरीद है। पारंपरिक रूप से इन राज्यों में चावल की खरीद कम होती है। बिहार और पश्चिम बंगाल ने भी चावल की खरीद बढ़ाई है। नतीजतन, इन राज्यों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के लिए खाद्यान्न की आवश्यकता स्थानीय खरीद से पूरी हो रही है। यह अलग बात है कि 2014 में केंद्र सरकार ने खुद राज्यों को गेहूं और चावल पर बोनस नहीं देने को कहा था। केंद्र की तरफ से कहा गया था कि यदि विकेंद्रीकृत खरीद (डीसीपी) वाले राज्य चावल और गेहूं के लिए एमएसपी से अधिक बोनस घोषित करेंगे, तो केंद्र उस राज्य के पीडीएस के लिए जरूरी मात्रा पर ही सब्सिडी देगा।</p>
<p>बाद के वर्षों में इस नीति में बदलाव आया है। अब छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और हाल में ओडिशा ने धान 3100 रुपये प्रति क्विंटल की दर से खरीदा है, जो एमएसपी से 700 रुपये प्रति क्विंटल अधिक है।</p>
<p>इस बोनस के अलावा कई राज्य कृषि के लिए बिजली पर बहुत अधिक सब्सिडी भी दे रहे हैं। प्रतिष्ठित थिंक टैंक काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरमेंट एंड वाटर (सीईईडब्लू) का अनुमान है कि 2022-23 में कृषि क्षेत्र के लिए बिजली पर लगभग 1,01,745 करोड़ रुपये की सब्सिडी दी गई। इन प्रोत्साहनों के कारण पीडीएस की जरूरत पूरी करने के लिए पंजाब से चावल की मांग कम हुई है।</p>
<p>दूसरे राज्यों में अधिक चावल उत्पादन के कारण पंजाब से उन राज्यों को चावल भेजना बहुत कम हो गया है। पंजाब में एफसीआई के पास चावल का स्टॉक 1 अक्टूबर 2023 के 60.65 लाख टन से बढ़कर 1 अक्टूबर 2024 को 119 लाख टन हो गया। पंजाब के स्टोरेज लगभग पूरी तरह भर गए, जिससे राज्य में खरीफ मार्केटिंग सीजन 2024-25 का चावल रखने के लिए बहुत कम स्थान बचा। पंजाब में भंडारण की जगह की कमी का एक अन्य कारण लगभग 45 लाख टन गेहूं को सीएपी स्टोरेज के बजाय ढंके हुए गोदामों में रखना है।</p>
<p><strong>प्राइवेट आंत्रप्रेन्योर गारंटी स्कीम और स्टील साइलो से भंडारण क्षमता में वृद्धि</strong></p>
<p>वर्षों से केंद्र सरकार ने खाद्यान्न भंडारण क्षमता निर्माण में निजी निवेश का समर्थन किया है। वर्ष 2008 में सरकार निजी उद्यमी गारंटी स्कीम (पीईजी) लेकर आई जिसके तहत भारत के हर जिले में स्टोरेज क्षमता में कमी का आकलन किया गया। पीडीएस के तहत उपभोग करने वाले जिलों में चार महीने की खाद्यान्न आवश्यकता और खरीद करने वाले जिलों में पिछले तीन वर्षों में स्टॉक के उच्चतम स्तर को इसका आधार बनाया गया। निजी उद्यमियों को दस वर्षों के लिए भंडारण किराये के भुगतान की गारंटी दी गई। सीडब्लूसी/एसडब्लूसी के लिए गारंटी अवधि नौ वर्ष निर्धारित की गई थी।</p>
<p>एफसीआई ने भंडारण क्षमता में कमी के आधार पर गोदाम बनाने के लिए निविदाएं आमंत्रित कीं। इस प्रकार केंद्रीय बजट से खर्च किए बिना भंडारण क्षमता बनाई गई। पीईजी के तहत 31 अगस्त 2024 तक 163.4 लाख टन भंडारण क्षमता को मंजूरी दी गई और इसमें से 146 लाख टन का निर्माण हो चुका है। इसमें से 132.4 लाख टन की क्षमता एफसीआई/राज्य एजेंसियों ने अपने कब्जे में ले ली है। पंजाब में ही एफसीआई ने 44.6 लाख टन की क्षमता अपने नियंत्रण में ली है।</p>
<p>वर्तमान संकट का कारण 2022-23, 2023-24 और 2024-25 के रबी मार्केटिंग सीजन (अप्रैल-मार्च) में गेहूं की कम खरीद है। वर्ष 2021-22 में 433 लाख टन गेहूं की खरीद हुई जो 2022-23 में घटकर 188 लाख टन रह गई। अगले दो वर्षों में औसतन लगभग 260 लाख टन की खरीद हुई। इसे देखते हुए एफसीआई और राज्य की एजेंसियों ने गोदामों को छोड़ दिया होगा, जिससे भंडारण क्षमता 31 मार्च 2022 के 788.3 लाख टन से घटकर 31 मार्च 2023 को 711.5 लाख टन रह गई। इस तरह क्षमता में 76.8 लाख टन की कमी आई है।</p>
<p>एफसीआई के अपने ढंके हुए गोदामों की क्षमता 31 मार्च 2022 के 426.6 लाख टन से घटकर 31 मार्च 2023 को 337.4 लाख टन रह गई। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने पहले किराये पर लिए गए गोदामों की अधिक क्षमता पर आपत्ति जताई थी। शायद ऑडिट के डर से गोदामों को छोड़ने का निर्णय लिया गया।</p>
<p>पारंपरिक गोदामों के अतिरिक्त सरकार ने सार्वजनिक-निजी साझेदारी (पीपीपी) मॉडल के तहत स्टील साइलो को भी मंजूरी दी है। वर्ष 2007 में सर्किट-आधारित मॉडल के तहत पंजाब, हरियाणा और कुछ उपभोग करने वाले राज्यों में 5.5 लाख टन की साइलो क्षमता बनाई गई थी। इसके अलावा एफसीआई ने 29.25 लाख टन की साइलो क्षमता का ठेका दिया है। इसमें से 10.75 लाख टन का निर्माण पूरा हो चुका है और एफसीआई ने इसे अपने कब्जे में लिया है। उदाहरण के लिए, बिहार के दरभंगा और समस्तीपुर, यूपी के बस्ती, धमोरा और कन्नौज, गुजरात के वडोदरा और पंजाब के साहनेवाल, छेहरटा और बटाला में साइलो परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं।</p>
<p>साइलो क्षमता के निर्माण से एफसीआई पंजाब और हरियाणा में खरीदे गए गेहूं को उपभोग करने वाले राज्यों तक भेज सकेगा। आदर्श रूप से गेहूं की ढुलाई जूट के बोरों के बजाय थोक में होनी चाहिए।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/12/image_750x_677375f3b824a.jpg" alt="" style="display: block; margin-left: auto; margin-right: auto;" width="586" height="328" /></p>
<p><strong>कम स्टॉक के कारण भंडारण क्षमता कम की गई</strong></p>
<p>पिछले तीन वर्षों में गेहूं की कम खरीद के कारण गोदामों को छोड़ने से भंडारण क्षमता में कमी आई। अगस्त 2024 तक एफसीआई ने फिर से गोदामों को किराये पर लिया जिससे इसकी क्षमता 408 लाख टन हो गई। लेकिन यह अब भी 31 मार्च 2022 की तुलना में कम है और खरीफ मार्केटिंग सीजन 2024-25 में चावल की खरीद की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अपर्याप्त है।</p>
<p><strong>शॉर्ट टर्म में आगे क्या</strong></p>
<p>पंजाब में चावल की भंडारण और खरीद की वर्तमान समस्याओं का समाधान होगा क्योंकि सरकार राज्य में किसानों के एक और बड़े आंदोलन का सामना नहीं कर सकती। इसलिए भंडारण क्षमता बढ़ाने और केंद्रीय पूल के चावल का स्टॉक घटाने के लिए कदम उठाए जाएंगे। पंजाब और अन्य राज्यों में भंडारण क्षमता को किराये पर लिया जाएगा तथा रेलवे चावल को पंजाब से बाहर ले जाने के लिए अधिक रेल गाड़ियों की उपलब्धता सुनिश्चित करेगी। हो सकता है कुछ नए गोदाम भंडारण के क्वालिटी मानक पूरा नहीं करें, लेकिन आपात स्थिति में इसे नजरअंदाज किया जाएगा।</p>
<p>सरकार ने एथेनॉल बनाने के मकसद से एफसीआई द्वारा 23 लाख टन चावल की बिक्री के लिए 2,800 रुपये प्रति क्विंटल की दर निर्धारित की है, जबकि 2024-25 में चावल की आर्थिक लागत 3,975 रुपये प्रति क्विंटल होने का अनुमान है। सरकार को लग सकता है कि इससे चावल का स्टॉक घटाने में मदद मिलेगी, लेकिन ऐसा लगता है कि एथेनॉल बनाने वाली अनाज डिस्टिलरी टूटे हुए चावल कम कीमत पर खरीद रही हैं। इसलिए इस कीमत पर चावल की मांग नहीं है।</p>
<p>गैर-बासमती चावल के निर्यात पर प्रतिबंध हटा लिए गए हैं, तो उम्मीद है कि निर्यात पिछले वर्ष की तुलना में अधिक होगा। इससे चावल की खरीद की जरूरत कम हो सकती है। इससे सरकार को स्टॉक प्रबंधन में भी मदद मिलेगी।</p>
<p><strong>2034 के लिए कुछ सवाल</strong></p>
<p>सरकार को एक महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय लेना है कि क्या एमएसपी और पीडीएस की व्यवस्था अपने वर्तमान रूप में जारी रहेगी? क्या खाद्यान्न वितरण उन खाद्य सरप्लस वाले राज्यों में भी जारी रहेगा जो एमएसपी पर गेहूं और चावल खरीद रहे हैं? क्या सरप्लस वाले कुछ राज्यों में पीडीएस के लिए डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) की आवश्यकता है?</p>
<p>इस बात पर तो सहमति है कि पंजाब और हरियाणा में गैर-बासमती धान का रकबा कम करने की आवश्यकता है। लेकिन इसे हासिल करने का कोई रोड मैप नहीं है। पंजाब के कृषि मंत्री ने जुलाई 2024 में धान की जगह कम पानी की जरूरत वाली फसल अपनाने वालों को प्रति हेक्टेयर 17,500 रुपये के प्रोत्साहन की घोषणा की, लेकिन तब तक धान की रोपाई लगभग पूरी हो चुकी थी। यह स्पष्ट नहीं है कि क्या केंद्र सरकार भी इस प्रोत्साहन में योगदान देने पर सहमत है। भारतीय कृषि के हित में यह आवश्यक है कि पंजाब और केंद्र के बीच अगली खरीफ बुआई से पहले समय पर एक समझौता हो ताकि किसानों को इस बारे में स्पष्टता रहे।</p>
<p>पंजाब की कृषि में विविधता की कमी है। यह पड़ोसी राज्य हरियाणा की तुलना में भी कम विविध है। भारत की दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा के हित में आगे का रास्ता स्पष्ट करना समय की मांग है।</p>
<p>------------------------</p>
<p><strong>&nbsp;संदर्भ</strong></p>
<ol>
<li><a href="https://www.tribuneindia.com/news/comment/paddy-procurement-crisis-due-to-lack-of-planning">https://www.tribuneindia.com/news/comment/paddy-procurement-crisis-due-to-lack-of-planning</a></li>
<li><a href="https://indianexpress.com/article/explained/how-paddy-variety-pr-126-became-a-victim-of-its-own-popularity-9625697">https://indianexpress.com/article/explained/how-paddy-variety-pr-126-became-a-victim-of-its-own-popularity-9625697</a></li>
<li><a href="https://www.financialexpress.com/policy/economy-food-subsidy-for-fy25-may-be-revised-upward-by-over-rs-35000-cr-3442219/">https://www.financialexpress.com/policy/economy-food-subsidy-for-fy25-may-be-revised-upward-by-over-rs-35000-cr-3442219/</a></li>
<li><a href="https://www.financialexpress.com/policy/economy-food-subsidy-for-fy25-may-be-revised-upward-by-over-rs-35000-cr-3442219/">https://www.financialexpress.com/policy/economy-food-subsidy-for-fy25-may-be-revised-upward-by-over-rs-35000-cr-3442219/</a></li>
</ol>
<p></p>
<p><strong><em>(सिराज हुसैन पूर्व केंद्रीय कृषि सचिव और जुगल महापात्रा पूर्व केंद्रीय ग्रामीण विकास एवं उर्वरक सचिव हैं।)</em></strong></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/12/image_750x500_677374122457a.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ खाद्य सुरक्षा के लिए कृषि नीति पर आम सहमति जरूरी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/12/image_750x500_677374122457a.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[संस्‍थाओं के कायाकल्प से किसान कल्याण]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/redesigning-institutions-for-betterment-of-farmers.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 29 Dec 2024 09:34:59 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/redesigning-institutions-for-betterment-of-farmers.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>हरित क्रांति की सफलता का श्रेय नीतियों, इन्फ्रास्ट्रक्चर, संसाधनों और संस्थानों को दिया जाता है। इनमें से वर्तमान में नीतियों और संसाधनों (इनपुट) की सस्टेनेबिलिटी के दृष्टिकोण से समीक्षा की जा रही है। इन्फ्रास्ट्रक्चर निवेश के लिए प्राथमिकता बना हुआ है। मुख्यतः पिछली सफलताओं के कारण संस्थान गहन जांच से बच गए हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर), सहकारी ऋण संस्थान, सिंचाई विभाग, उर्वरक कंपनियां (सार्वजनिक, सहकारी और निजी) तथा भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) ने किसानों के लिए अधिक उत्पादकता हासिल करने में मदद की। इन संस्थानों ने खाद्यान्न की कमी की गंभीर समस्या को हल करने के लिए एकजुट होकर काम किया। उनका उद्देश्य स्पष्ट था- अधिक खाद्य उत्पादन करना ताकि भारत को खाद्यान्न के लिए आयात पर निर्भर न रहना पड़े। उन्होंने यह लक्ष्य हासिल किया और आज भारत खाद्यान्न का निर्यात करता है।</p>
<p>समय बदल गया है और साथ ही जलवायु, पारिस्थितिकी और बाजार भी। खेती को पारिस्थितिकी के लिहाज से स्थायी और आर्थिक रूप से व्यवहार्य गतिविधि के रूप में बनाए रखने की चिंता ने तात्कालिक और दीर्घकालिक समाधान की आवश्यकता को उजागर किया है। नीतिगत विकल्पों पर तो राष्ट्रीय और वैश्विक मंचों पर चर्चा की जा रही है, लेकिन ऐसा लगता है कि संस्थानों के पुनर्निर्माण को पीछे छोड़ दिया गया है। इस लेख में कुछ प्रमुख मुद्दों को रेखांकित करने का प्रयास किया गया है। संस्थानों के पुनर्निर्माण के मुद्दे को व्यापक दृष्टिकोण की आवश्यकता है। यह लेख केवल सोच को प्रेरित करने के लिए लिखा गया है, सभी सवालों के जवाब देने के लिए नहीं।</p>
<p>यहां यह बात महत्वपूर्ण है कि &lsquo;संस्थान&rsquo; शब्द का अर्थ केवल सरकारी संस्थानों तक सीमित नहीं है। इसमें सभी प्रकार के संस्थान शामिल हैं, जैसे सहकारी समितियां, किसान संगठन, गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ), निजी संस्थान आदि। इस स्पष्टीकरण के साथ मैं कुछ मुद्दे रखता हूं।</p>
<p><strong>पहला,</strong> <strong>सबसे महत्वपूर्ण भारतीय कृषि अनुसंधान परिषदः</strong> यह संस्थान खाद्य आत्मनिर्भरता हासिल करने में अपनी बड़ी भूमिका के लिए जाना जाता है। इसने बागवानी, पशुपालन और मत्स्य पालन के विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। हालांकि, इसके प्रयास मुख्य रूप से उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने पर केंद्रित रहे हैं, न कि किसानों की आय या दीर्घकालिक सस्टेनेबिलिटी पर। यह तर्क कई बार सुनने को मिलता है कि उत्पादकता में वृद्धि अपने आप किसानों की आय बढ़ाएगी। यह सही है कि उत्पादकता में वृद्धि आय बढ़ाने में सहायक है, लेकिन यह मान लेना ठीक नहीं कि यही एकमात्र रास्ता है। इसके अलावा, अनुसंधान और विकास मुख्य रूप से चावल और गेहूं की उत्पादकता बढ़ाने तक सीमित रहा है।&nbsp;</p>
<p>जहां आईसीएआर का ध्यान अनुसंधान और विकास पर केंद्रित था (जो ठीक भी था), वहीं निजी क्षेत्र में नई टेक्नोलॉजी विकसित हुईं जो कंपनियों और किसानों को कीमत पर उपलब्ध थीं। बागवानी और तिलहन में उत्पादन में वृद्धि या कीट रोधी बीज ज्यादातर निजी क्षेत्र से ही आए। किसानों ने इन प्रौद्योगिकी के लाभ देखकर इन्हें तेजी से अपनाया। आईसीएआर ने अपने पारंपरिक क्षेत्र में काम जारी रखा, जबकि निजी क्षेत्र ने बड़े पैमाने पर प्रवेश किया। इसमें कोई बुराई नहीं है। लेकिन आईसीएआर, जो भारत में कृषि के लिए सबसे बड़ी सार्वजनिक वित्त पोषित अनुसंधान संस्था है, को नई चुनौतियों को स्वीकार करना चाहिए और निम्नलिखित बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए:&nbsp;</p>
<p>1. केवल उत्पादकता बढ़ाकर नहीं, बल्कि लागत घटाने और अधिक मूल्य दिलाने के तरीके खोज कर किसानों की आय बढ़ाना।&nbsp;<br />2. प्राकृतिक खेती के तरीकों पर शोध और शिक्षा प्रदान करना और इन्हें वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित करना ताकि किसान उन्हें अपना सकें।&nbsp;<br />3. सस्टेनेबल कृषि और जलवायु प्रतिरोधक क्षमता पर शोध करना।&nbsp;<br />4. कृषि विज्ञान केंद्रों को स्थानीय स्तर पर समस्याओं के समाधानकर्ता के रूप में पुनर्गठित करना।&nbsp;<br />इस सूची को और विस्तार दिया जा सकता है, लेकिन यह न्यूनतम आवश्यकताएं हैं।</p>
<p><strong>दूसरा,</strong> <strong>कृषि विस्तार प्रणाली:</strong> कृषि विस्तार (एक्सटेंशन) प्रणाली अब भी हरित क्रांति के तरीकों पर आधारित चावल और गेहूं पर केंद्रित है। हालांकि जलवायु परिवर्तन और फलों-सब्जियों, अंडे-पोल्ट्री तथा डेयरी उत्पादों की बढ़ती मांग ने एक विविध और अधिक ज्ञानपूर्ण विस्तार प्रणाली की आवश्यकता को जन्म दिया है। इन नई मांगों को पूरा करने के लिए न तो विस्तार प्रणाली की पहुंच बढ़ाई गई, न ही तकनीकी दक्षता में सुधार हुआ है। इस खाली स्थान को निजी कंपनियां और उनके एजेंटों भर रहे हैं। हाल ही स्टार्टअप ने भी इस बाजार में प्रवेश किया है। किसानों ने दिखाया है कि वे उच्च गुणवत्ता वाली सेवाओं के बदले भुगतान करने के लिए तैयार हैं, बशर्ते ये सेवाएं उनकी आय बढ़ाने में सहायक हों। स्टार्टअप ने इस आवश्यकता को पहचाना और उन्होंने माइक्रो स्तर पर मौसम का पूर्वानुमान, पौधों के पोषक तत्वों का मूल्यांकन, बाजार और वित्तीय जानकारी जैसे क्षेत्रों में काम करना शुरू किया है, ताकि किसानों को इन चुनौतियों से बेहतर तरीके से निपटने में मदद मिल सके।</p>
<p><strong>तीसरा,</strong> <strong>ऋण संस्थान:</strong> स्थापित सहकारी ऋण प्रणाली मुख्यतः कुप्रबंधन और डिफॉल्ट के कारण ध्वस्त हो गई। कृषि ऋण प्रदान करने का भार वाणिज्यिक बैंकों पर आ गया, जिन्होंने तब तक ग्रामीण शाखाओं का एक बड़ा नेटवर्क स्थापित कर लिया था। इसके परिणामस्वरूप सहकारी ऋण प्रणाली की बची-खुची व्यवस्था भी पूरी तरह समाप्त हो गई। इसे पुनर्जीवित करने के लिए अब देर से प्रयास किए जा रहे हैं। सहकारी ऋण कम होने के बावजूद कुल अल्पकालिक ऋण की उपलब्धता में वृद्धि हुई है। हालांकि इसके मानदंड और वित्तीय इंस्ट्रूमेंट अब भी चावल-गेहूं प्रारूप तक ही सीमित हैं, जिससे बागवानी, पोल्ट्री जैसे तेजी से बढ़ते क्षेत्रों की मांगों की अनदेखी हो रही है। कुछ इनोवेटिव निजी वित्तीय संस्थानों ने बेहतर वित्तीय इंस्ट्रूमेंट तैयार किए हैं, जिनमें वितरण का लचीला शेड्यूल और वैज्ञानिक तरीके से मॉनिटरिंग शामिल हैं। मुख्य रूप से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों पर आधारित ऋण प्रणाली में बड़े पैमाने पर इनोवेशन की आवश्यकता है।</p>
<p><strong>चौथा,</strong> <strong>किसान संगठन:</strong> ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पारंपरिक सहकारी ढांचे की विफलता के मुख्य कारण अभिजात वर्ग और राजनीतिक हस्तक्षेप, कुप्रबंधन, किसानों की भागीदारी की कमी और सरकारी दखल हैं। इससे किसान संगठनों को नए सिरे से डिजाइन करने की आवश्यकता महसूस हुई। इसी विचार के तहत किसान उत्पादक कंपनी (एफपीसी) की अवधारणा को कंपनी अधिनियम के तहत पंजीकृत इकाई के रूप में लागू किया गया। इस ढांचे ने सदस्यों को राज्य सरकारों के प्रभाव से बाहर निकलने और निजी कंपनियां स्थापित करने की अनुमति दी। ऐसी 10,000 एफपीसी खोलने की बड़ी योजना शुरू की गई, और रिपोर्टों के अनुसार अब 40,000 से अधिक ऐसी कंपनियां मौजूद हैं। हालांकि यह देखना बाकी है कि इनमें से कितनी सब्सिडी अवधि समाप्त होने के बाद टिकी रहेंगी। &nbsp;</p>
<p>एफपीसी को बढ़ावा देने के साथ 97वें संविधान संशोधन के तहत सहकारी समितियों को अधिक परिचालन स्वतंत्रता प्रदान की गई। हाल ही सरकार ने जैविक कृषि, निर्यात और बीज के लिए राष्ट्रीय स्तर की तीन सहकारी समितियां बनाई हैं। इनकी परफॉर्मेंस का आकलन अभी बाकी है। चूंकि तीनों संस्थानों का ढांचा अमूल की तरह &lsquo;नीचे से ऊपर&rsquo; का नहीं है, किसानों के लिए वास्तविक वैल्यू लाने की इनकी क्षमता को अभी देखा जाना है।&nbsp;</p>
<p>सबक <strong>अमूल मॉडल और स्वयं सहायता समूह मॉडल</strong> से लिया जाना चाहिए था, जो निचले स्तर से ऊपर की ओर जाते हैं। उन्हें फेडरेशन या ग्रामीण आजीविका मिशनों की मदद मिलती है। किसानों की आय बढ़ाने के प्रयास में प्रभावी किसान संगठनों को एक व्यावसायिक संगठन के रूप में विकसित करना महत्वपूर्ण है। किसानों के संस्थान बनाने का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उन्हें निजी चैनलों या अपनी फेडरेशन के माध्यम से बाजार से जुड़ने दिया जाए और किसी निर्धारित प्रारूप तक सीमित न रखा जाए। यह बाजार सुधारों की दिशा में कदम होगा जो दीर्घकाल में किसानों के लिए फायदेमंद होंगे।</p>
<p><strong>पांचवां, कृषि स्टार्टअप के लिए इकोसिस्टम:</strong> कृषि टेक्नोलॉजी, फाइनेंशियल टेक्नोलॉजी और फूड टेक्नोलॉजी में कुछ स्टार्टअप ने अच्छे परिणाम दिखाए हैं। हालांकि रेगुलेटरी और नीतिगत वातावरण में कुछ बाधाएं हैं जिन्हें दूर करने की आवश्यकता है। सरकार को किसानों को बेहतर सेवाएं प्रदान करने में स्टार्टअप को अपने साझेदार के रूप में देखना चाहिए।</p>
<p><strong>छठा, बाजार और संस्थान:</strong> पहला संस्थान जो दिमाग में आता है, वह है कृषि उपज मंडी समिति (एपीएमसी)। मेरा मानना है कि नियमित बाजार महत्वपूर्ण हैं, लेकिन मंडी समितियां अपने मूल उद्देश्य और डिजाइन से काफी हद तक भटक चुकी हैं। इन्हें बाजार संस्थाओं को जकड़ने वाली इकाइयों के बजाय किसानों को सशक्त बनाने वाली संस्थाओं के रूप में सुधारने की आवश्यकता है। इन्हें व्यापारियों और बिचौलियों के प्रभाव से मुक्त कर किसानों के स्वामित्व और नियंत्रण वाले संगठनों में बदलना चाहिए। &nbsp;</p>
<p><strong>भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई)</strong> एक अन्य बड़ा संस्थान है, जो खाद्यान्न की खरीद के लिए जिम्मेदार है। देश भर में इसकी खरीद, वितरण कार्यों की जटिलता और आकार को देखते हुए कहा जा सकता है कि इसने अच्छा काम किया है, लेकिन इसके साथ कुछ लॉजिस्टिक्स की समस्याएं भी हैं। भारत जैसे देश के लिए स्थानीय रूप से जड़ें जमाए हुए छोटे और चुस्त संस्थान अधिक उपयुक्त हैं। हालांकि एफसीआई का 'क्षेत्रीयकरण' और विकेंद्रीकरण कोई साधारण कार्य नहीं है। इस तरह के बदलाव के लिए विस्तृत योजना बनानी होगी जो सभी उद्देश्यों के साथ जुड़ी हो। &nbsp;</p>
<p>कई राज्यों की अपनी मार्केटिंग फेडरेशन हैं जो अधिकांश अप्रभावी हैं। उन्हें हटाकर नए, बाजार-केंद्रित संस्थानों की स्थापना की आवश्यकता है। इस संदर्भ में नेशनल एग्रीकल्चरल कोऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन (नाफेड) को भी खुद को बदलना होगा और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद तक सीमित रहने के बजाय अधिक बाजार-केंद्रित बनना होगा।</p>
<p><strong>सातवां, निजी संस्थान:</strong> कृषि और किसानों को प्रभावित करने वाले कई निजी संस्थान हैं। पारंपरिक बीज और उर्वरक एसोसिएशन जैसे संस्थान अपने सदस्यों के व्यावसायिक हितों की रक्षा के लिए सुसंगठित हैं। हालांकि यदि वे इस बात को समझें कि किसान उनके मुख्य ग्राहक हैं और उनका बने रहना किसानों के निर्णयों पर निर्भर करता है, तो इससे उन्हीं का भला होगा। इनका किसानों के साथ संबंध &lsquo;विश्वास&rsquo; पर आधारित होना चाहिए। शायद गलती किसान संगठनों की भी है, क्योंकि उन्होंने इन संस्थानों के साथ निरंतर और सार्थक संवाद नहीं किया। इसके अलावा कई चैरिटेबल संस्थान, गैर-सरकारी संगठन और शिक्षण संस्थान हैं जो किसानों के मुद्दों पर काम करते हैं। हालांकि ये संस्थान अपने हितों और फंडिंग के आधार पर छोटे दायरे में काम करते हैं। इन संस्थानों के कार्यों को संकलित करके किसानों के लिए सुलभ बनाना जरूरी है।&nbsp;</p>
<p>यह सूची और लंबी हो सकती है। मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि नई चुनौतियों के समाधान के लिए एक नए इकोसिस्टम की आवश्यकता है। सरकार को ऐसा इकोसिस्टम बनाना चाहिए जिसमें सभी संबंधित पक्ष आपस में विश्वास के साथ मिलकर काम कर सकें और किसानों को बेहतर सेवाएं प्रदान कर सकें। हमें संस्थागत संरचना को दुरुस्त करना होगा!</p>
<p><em>(लेखक भारत सरकार के पूर्व कृषि एवं खाद्य सचिव हैं)</em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ संस्‍थाओं के कायाकल्प से किसान कल्याण ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[उदार अर्थव्यवस्था के शिल्पकार डॉ. मनमोहन सिंह ने किसानों के लिए भी किये कई बड़े काम]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/architect-of-liberalised-econmoy-dr-manmohan-singh-also-contributed-big-for-agriculture.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 27 Dec 2024 19:40:49 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/architect-of-liberalised-econmoy-dr-manmohan-singh-also-contributed-big-for-agriculture.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का 92 साल की उम्र में निधन हो गया। इसके साथ ही उनके 1991 से 1996 तक वित्त मंत्री के कार्यकाल और 2004 से 2014 तक प्रधानमंत्री के कार्यकाल का आकलन भी हो रहा है। वह देश के पहले नेता तो नहीं हैं जो इन दोनों पदों पर रहे हैं। लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था और देश के विकास को लेकर उनकी जो भूमिका है वह दूसरे किसी राजनेता को लेकर इस तरह के आकलन का मौका नहीं देती है। प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंहराव की कांग्रेस की अल्पमत सरकार के वित्त मंत्री रहते हुए मनमोहन सिंह ने न्यू इंडस्ट्रियल पॉलिसी 1991 के जरिये आर्थिक उदारीकरण का जो दौर शुरू किया, उसकी दिशा को अभी तक की कोई भी सरकार या वित्त मंत्री बदलने की सोच पैदा नहीं कर सका।</p>
<p>उस समय विश्व बैंक और आईएमएफ के दबाव में उदारीकरण के फैसले लेने का आरोप लगाने वाले तमाम विरोधी दलों की सरकारें केंद्र की सत्ता में रह चुकी हैं। लेकिन आर्थिक नीति के मोर्चे पर 1991 में जो दिशा तय हुई थी, वह जारी है। जहां 1991 में इकोनॉमी की हालत खस्ता थी और बैलेंस ऑफ पेमेंट का संकट खड़ा हो गया था, उसे वित्त मंत्री रहते हुए पटरी पर लाने और प्रधानमंत्री कार्यकाल में जीडीपी की सबसे तेज दर हासिल करने का श्रेय डॉ. मनमोहन सिंह को जाता है।</p>
<p>इसके साथ ही उनके प्रधानमंत्री के कार्यकाल में कृषि को लेकर कई फैसले भी हुए और भारतीय कृषि ने कई बड़े बदलाव भी देखे। मसलन, उनके कार्यकाल में करीब 70 हजार करोड़ रुपये की देश की सबसे बड़ी किसान कर्ज माफी हुई। यह केवल कर्ज माफी नहीं थी बल्कि इस कदम ने करोड़ों किसानों को कर्ज लेने के लिए पात्र बनाया जिनके ऊपर बैंकों का कर्ज होने से उनकी कर्ज लेने की पात्रता नहीं बची थी। 2004-14 के दौरान कृषि क्षेत्र और किसानों के लिए टर्म्स ऑफ ट्रेड बेहतर रही और इसके पीछे वैश्विक बाजार में कृषि जिन्सों की ऊंची कीमत थी। इकोनॉमी की ग्रोथ के चलते 2004-05 से 2011-12 के बीच कृषि पर निर्भर वर्क फोर्स की संख्या में गिरावट आई और यह 58 फीसदी से घटकर 48.9 फीसदी पर आ गई थी। यह भारत के इतिहास में पहली बार हुआ जब कृषि पर निर्भर लोगों की संख्या 26.86 करोड़ से घटकर 23.19 करोड़ रह गई थी। लेकिन 2023-24 में यह बढ़कर 46.1 फीसदी पर पहुंच गई है।&nbsp;</p>
<p>देश में मैन्युफैक्चरिंग के लिए विदेशी निवेश के दरवाजे खोलने और फाइनेंस व स्टॉक मार्केट की ग्रोथ के रास्ते उनके वित्त मंत्री रहते हुए ही खुले। सरकारी नियंत्रण और लाइसेंस परमिट राज को जब वह समाप्त करने का प्रयास कर रहे थे तो देश में उद्योगपतियों का एक बॉम्बे क्लब भी था जो विदेशी निवेश और विदेशी कंपनियों से संरक्षण के लिए लॉबिंग कर रहा था। लेकिन यह सब बहुत तेजी से पीछे छूटता गया। देश में आईटी सेक्टर के उभार और निजी क्षेत्र को नौकरी के पहले विकल्प के रूप में स्थापित करने का काम मनमोहन सिंह के वित्त मंत्री के कार्यकाल में ही शुरू हुआ। जिस ऑटो सेक्टर में दो-तीन कंपनियों की मोनोपली थी, वहां दुनिया के लगभग सभी बड़े ऑटो ब्रांड उसी नीति के तहत आए और अब भारत का ऑटो सेक्टर एक बड़ा निर्यातक है। लोकलाइजेशन की शर्तों ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारत में उत्पादन के लिए मजबूर किया तो देश में मैन्युफैक्चरिंग को ग्रोथ मिली। कंज्यूमर ड्यूरेबल के तमाम बड़े ब्रांड उसी उदारीकरण की नीति के चलते यहां आये। देश में एक नया मध्य वर्ग तैयार हुआ जिसकी बदौलत भारतीय बाजार का महत्व पूरी दुनिया को समझ आने लगा।&nbsp;&nbsp;</p>
<p>जिस स्टॉक एक्सचेंज की बदौलत देश में मार्केट से कमाई करने वाला वर्ग पैदा हुआ उसके रेगुलेशन के लिए सेबी और बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज व क्षेत्रीय स्टॉक एक्सचेंज की मोनोपली को खत्म करने के लिए ऑनलाइन नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) भी उनकी देन है। यही नहीं बैंकिंग सेक्टर को निजी क्षेत्र और विदेशी निवेश के लिए खोलने का परिणाम देश के दूसरे सबसे बड़े बैंक एचडीएफसी और आईसीआईसीआई बैंक के रूप&nbsp; में हमारे सामने हैं। यही वह दौर था जब कई बड़े विदेशी बैंकों ने भारतीय बाजार में रिटेल बैंकिंग शुरू की। वहीं इंश्योरेंस सेक्टर को खोलने का दौर भी तभी शुरू हुआ। उसी दौर में टेलीकॉम सेक्टर भी निजी क्षेत्र के लिए खोला गया। यह वह दौर था जब अर्थव्यवस्था के नये क्षेत्र खड़े हो रहे थे और बड़े पैमाने पर लोगों को नौकरियां मिल रही थी। एक पूरी पीढ़ी आज जो मध्य वर्ग के रूप में जानी जाती है उसे आर्थिक उदारीकरण की वजह से ही आगे बढ़ने के अवसर मिले।</p>
<p>मुश्किल दौर में वित्त मंत्री का उनका कार्यकाल बहुत ऊंची विकास दर तो हासिल नहीं कर सका लेकिन प्रत्यक्ष विदशी निवेश के लिए उदार शर्तें, आयात-निर्यात पर नियंत्रण में कमी और भारत में पैसा भेजने (रेमिटेंस) के नियमों का सरलीकरण तमाम ऐसे कदम थे जो भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ जोड़ रहे थे। उनके वित्त मंत्री के कार्यकाल में भारत की विकास दर 5.1 फीसदी रही और उसके बाद 1996-97 से 2003-04 तक यह 5.9 फीसदी रही। इसके साथ ही विकास दर के मोर्चे पर हिंदु रेट ऑफ ग्रोथ की धारणा भी टूटने लगी। जिसे माना जाता था कि भारत एक कमजोर आर्थिक विकास दर वाला देश है। उनके इस कार्यकाल में ही टैक्स रिफॉर्म की शुरूआत हुई और सर्विस टैक्स भी उस दौर में ही लागू किया गया।</p>
<p>जहां तक मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री के कार्यकाल की बात है तो वह दौर भारतीय अर्थव्यवस्था का सबसे तेज विकास दर का दौर था। 2004-05 से 2013-14 के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर का औसत 6.8 फीसदी रहा। वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने बाजार और आर्थिक उदारीकरण के रास्ते खुलवाए तो प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में सूचना का अधिकार, शिक्षा का अधिकार,खाद्य सुरक्षा अधिनियम और मनरेगा जैसी पहल के जरिए समाज के कमजोर वर्गों को मजबूती देने के प्रयास हुए। सामाजिक क्षेत्र में निवेश और जन कल्याणकारी योजनाएं यूपीए के शासन काल की पहचान बनीं। अमेरिका के साथ परमाणु समझौते और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके प्रभाव ने विश्व फलक पर भारत को मजबूत किया।</p>
<p>इस दौरान 2008 का वैश्विक आर्थिक संकट भी आया। लेकिन सरकार के प्रोएक्टिव फैसलों के चलते भारतीय अर्थव्यवस्था को इस संकट से बचाने में मदद मिली। यह बात अलग है कि निवेश को बढ़ावा देने के लिए अपनाया गया उदार रुख और निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन एक नये संकट को जन्म दे गया। इस संकट को पूर्व चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर व रिजर्व बैंक के पूर्व गर्वनर रघुराम राजन ने ट्विन बैलेंसशीट संकट का नाम दिया। जिसमें जहां उधार लेने वाली कंपनियां भारी नुकसान में गईं, वहीं उदारता से कर्ज देने वाले तमाम बैंकों को भी भारी नुकसान उठाना पड़ा।</p>
<p>वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री रहते हुए मनमोहन सिंह ने कृषि क्षेत्र के लिए कोई बहुत बड़े फैसले तो नहीं किये। लेकिन वैश्विक बाजार में कमोडिटी कीमतों में बढ़ोतरी के चलते भारतीय किसानों के लिए 2004 से 2014 का दौर बेहतर कमाई वाला दौर रहा। इस बीच 2009 में करीब 70 हजार करोड़ रुपये की किसान कर्जमाफी का अभी तक का सबसे बड़ा फैसला उनके प्रधानमंत्री कार्यकाल में ही हुआ। 2009 के लोक सभा चुनाव में कांग्रेस की सत्ता में वापसी का यह एक बड़ा कारण रहा। इसके साथ ही जिस डॉ. एम एस स्वामीनाथन समिति की सिफारिशों के आधार पर एमएसपी तय करने के लिए किसान कई साल से आंदोलनरत है वह रिपोर्ट मनमोहन सिंह के कार्यकाल में आई थी। उन्होंने ही डॉ. एमएस स्वामीनाथन को किसान आयोग का अध्यक्ष बनाया था। हालांकि, सवाल उठता है कि मनमोहन सिंह सरकार ने स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू नहीं किया।</p>
<p>लेकिन किसानों को भूमि अधिग्रहण में बेहतर मोलभाव का कानून मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार में बनाया गया था। विदर्भ में किसानों की आत्महत्या का संकट सामने आने पर नेशनल डेवलपमेंट काउंसिल की सब कमेटी बनाई गई। उसी सरकार के समय फसलों का एमएसपी 80 फीसदी तक बढ़ाने की सिफारिशों को स्वीकार भी किया गया। इसके साथ ही यह भी एक तथ्य है कि उनके कार्यकाल में किसानों के लिए टर्म्स ऑफ ट्रेड पॉजिटिव था। लेकिन पिछले दस साल से यह निगेटिव बना हुआ यानी किसान को अपने उत्पाद को बेचने से जो आय होती है उसका इंडेक्स उसके द्वारा इनपुट और अपने जीवनयापन पर होने वाले खर्च के इंडेक्स से कम है। सीधे कहा जा सकता है कि किसान वित्तीय हालत कमजोर हुई है।</p>
<p>देश में डिजिटल क्रांति की नींव भी उदारीकरण से आगे बढ़े बैंकिंग, टेलीकॉम और आईटी सेक्टर पर खड़ी हुई। डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में ही आधार कार्ड और डीबीटी जैसी पहल शुरू हो गई थीं जो आगे चलकर देश में डिजिटल और फिनटैक क्रांति का आधार बनी। यह बात अलग है कि राजनीतिक मोर्चों पर घिरी यूपीए सरकार इन कोशिशों का न तो श्रेय ले पाई और न ही इन्हें बहुत आगे बढ़ा पाई थी।</p>
<p>प्रधानमंत्री के उनके दूसरे कार्यकाल में जिस तरह से घोटालों के उजागर होने का दौर शुरू हुआ, उसने उनकी छवि को बहुत नुकसान पहुंचाया। उस दौरान अर्थव्यवस्था के कई मोर्चों पर मुश्किलें पैदा हुई और खासतौर से ढांचागत परियोजनाओं में निवेश अटकने का बैंकिंग सेक्टर पर काफी प्रतिकूल असर पड़ा। उनके दूसरे कार्यकाल के बाद के दो साल काफी मुश्किल रहे और भाजपा को केंद्र की सत्ता तक पहुंचाने के लिए माहौल बन चुका था। विडंबना है कि उनकी आर्थिक उदारीकरण की नीतिओं और निर्णयों का सबसे बड़ा लाभार्थी वर्ग ही उनका सबसे कटु आलोचन बन गया। दुर्भाग्यपूर्ण है कि डॉ. मनमोहन सिंह की शालीनता को उनकी कमजोरी समझा गया। लेकिन वे आखिरी तक आशावादी बने रहे। &nbsp;</p>
<p>अब डॉ. मनमोहन सिंह हमारे बीच नहीं रहे हैं तो उनके प्रति भावुक श्रद्धांजलियों का सैलाब उमड़ रहा है। इसमें एक पश्चाताप भी झलक रहा है। जिससे उम्मीद बढ़ती है कि इतिहास उनके प्रति अधिक उदार होगा। क्योंकि उन्होंने देश-दुनिया पर जो छाप छोड़ी है वह अमिट तो है ही, साथ ही उसका सकारात्मक पक्ष ज्यादा मजबूत है।&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ उदार अर्थव्यवस्था के शिल्पकार डॉ. मनमोहन सिंह ने किसानों के लिए भी किये कई बड़े काम ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[असामान्य तापमान, डीएपी संकट और रिजर्व बैंक की मुश्किलें]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/abnormal-temperature-dap-crisis-and-rbi-troubles.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 05 Dec 2024 13:52:11 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/abnormal-temperature-dap-crisis-and-rbi-troubles.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>पिछले सप्ताह जीडीपी के सात तिमाही के निचले स्तर पर पहुंचने के आंकड़ों ने पहले से ही परेशान भारतीय रिजर्व बैंक और सरकार की मुश्किलें बढ़ी दी हैं। महंगाई दर पहले ही रिजर्व बैंक की तय सीमा से ऊपर है वहीं अक्तूबर और नवंबर में तापमान का स्तर सामान्य से अधिक रहने के चलते गेहूं समेत रबी की फसलों के उत्पादन को लेकर भी अनिश्चितता बन रही है। बुवाई सीजन लंबा चल रहा है और अनुकूल तापमान नहीं होने से बोई गई कई फसलों में समस्या पैदा हो रही है। दूसरे भले ही सरकार तमाम दावे करे लेकिन यह बात सच है कि चालू रबी सीजन में किसानों को डाई अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) की उपलब्धता के संकट का सामना करना पड़ रहा है।</p>
<p>ऐसे में जब रिजर्व बैंक अपनी द्विमासिक मौद्रिक नीति की समीक्षा बैठक में नीतिगत ब्याज दरों और कैश रिजर्व रेश्यो जैसे मुद्दों पर फैसला लेगा तो समिति के जेहन में खाद्य महंगाई दर और कृषि उत्पादन सबसे ऊपर&nbsp;रहेंगे। ताजा आंकड़ों में खाद्य महंगाई दर दहाई में चली गई है। इसमें गेहूं, दालों, खाद्य तेलों के साथ आलू, प्याज और दूसरी सब्जियों व फसलों की कीमतें काफी अधिक बढ़ी हैं। किसानों का मानना है कि अक्तूबर के शुरू से ही आलू की बुवाई के समय डीएपी की उपलब्धता का संकट और उसके बाद बुवाई के बाद तापमान का अधिक बना रहना आलू उत्पादन पर असर डालेगा। हालांकि सरकार ने आठ नवंबर के बाद दो दिन पहले रबी सीजन के बुवाई के आंकड़े जारी कर दिये हैं और उनमें गेहूं का रकबा पिछले साल से ज्यादा है, लेकिन करीब 60 फीसदी आयात निर्भरता वाले खाद्य तेलों में सबसे अहम तिलहन फसल सरसें के क्षेत्रफल में गिरावट दर्ज की गई है। दालों के मोर्चे पर भी स्थिति बहुत बेहतर नहीं है।</p>
<p>वहीं पिछले सीजन के बाद चालू चीनी सीजन (2024-25) में भी चीनी उत्पादन में गिरावट आना तय&nbsp; माना जा रहा है। दिसंबर के पहले सप्ताह तक तापमान का सामान्य से अधिक रहना गन्ने में चीनी की रिकवरी को प्रभावित कर रहा है। चीनी उद्योग सूत्रों के मुताबिक, पिछले साल नवंबर के शुरू में उत्तर भारत में गन्ने में चीनी की रिकवरा जो स्तर था वह अभी तक भी नहीं आ पाया है। अभी भी चीनी की रिकवरी करीब आधा फीसदी कम चल रही है। वहीं महाराष्ट्र में भी चीनी उत्पादन पिछले साल करीब 10 लाख टन कम रहने का अनुमान उद्योग ने लगाया है।</p>
<p>एक तरह से देखा जाए तो जिस कृषि क्षेत्र की 3.5 फीसदी वृद्धि दर के चलते ही जीडीपी की वृद्धि दर 5.4 फीसदी तक पहुंची है उसके मामले में भी रबी सीजन में खऱीफ जैसे नतीजे आएं यह जरूरी नहीं है। यह बात सही है कि बेहतर मानसून के चलते रिजवायर्स में पानी की स्थिति बेहतर है, लेकिन सामान्य से अधिक तापमान को जलवायु परिवर्तन के असर के रूप में देखा जा रहा है। दो साल पहले मार्च माह में तापमान बढ़ने से गेहूं की उत्पादकता में 15 से 20 फीसदी तक की गिरावट आई थी।</p>
<p>इस सबके बीच रिजर्व बैंक पर ब्याज दरों में कटौती का दबाव है क्योंकि सरकार के वरिष्ठ मंत्री भी ब्याज दरों में कमी के पक्ष में बयान दे चुके हैं। वहीं जीडीपी के कमजोर आंकड़ों के पीछे उद्योग ऊंची ब्याज दरों को बड़ा कारण मानता है। हालांकि पहली छमाही में सरकारी खर्च का रहना भी इकोनॉमी में सुस्ती का एक कारण रहा है। लेकिन रबी सीजन की फसलों की स्थिति, डीएपी की किल्लत और महंगाई की ऊंची दर का रिजर्व बैंक के फैसले पर असर रहेगा। &nbsp;</p>
<p>&nbsp; &nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ असामान्य तापमान, डीएपी संकट और रिजर्व बैंक की मुश्किलें ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[खाद्य और पोषण सुरक्षा के लिए कारगर है कृषि वानिकी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/agroforestry-emerges-as-sustainable-solution-for-food-and-nutritional-security.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 06 Nov 2024 14:37:20 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/agroforestry-emerges-as-sustainable-solution-for-food-and-nutritional-security.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>जैसे-जैसे विश्व की आबादी बढ़ती जा रही है, लोगों की खाद्य और पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने की चुनौती भी बढ़ रही है। ऐसे में कृषि वानिकी से जुड़ी टिकाऊ कृषि पद्धतियां कारगर समाधान के रूप में उभर रही हैं। सेंटर फॉर इंटरनेशनल फॉरेस्ट्री रिसर्च (CIFOR) और वर्ल्ड एग्रोफॉरेस्ट्री (ICRAF) के अनुसार, कृषि वानिकी यानी "पेड़ों की खेती" - पेड़ों, झाड़ियों और पशुधन को खेती के साथ जोड़ती हैं, जिससे कृषि भूमि की उत्पादकता और इकोलॉजिकल हेल्थ को बढ़ावा मिलता है। कृषि वानिकी भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक है, जहां जटिल भौगोलिक स्थितियों और विविध पारिस्थितिकी संतुलन तंत्रों के लिए टिकाऊ कृषि की आवश्यकता है।</p>
<p>कृषि वानिकी पारिस्थितिकी संतुलन को बनाए रखते हुए कृषि उत्पादकता को बढ़ाकर खाद्य और पोषण सुरक्षा में अहम योगदान कर सकती है। पारंपरिक कृषि पद्धतियों की तुलना में कृषि वानिकी 30 प्रतिशत तक अधिक कार्बन संग्रहित करती है। इस प्रकार यह जलवायु परिवर्तन से निपटने के प्रयासों में महत्वपूर्ण योगदान कर सकती है।&nbsp;कृषि वानिकी कूड़े के अपघटन, जड़ उत्सर्जन और जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण के माध्यम से पोषक चक्रण को बढ़ाकर खाद्य और पोषण सुरक्षा को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।</p>
<p>खासकर सूखे के दौरान कृषि वानिकी फसल उत्पादन को स्थिर रख जलवायु की बदलती दशाओं का मुकाबला करने की क्षमताओं को बढ़ाती है। मिट्टी में ऑर्गेनिक तत्वों की वृद्धि से मृदा संरचना और उर्वरता में सुधार आता है जो फसल उत्पादकता के लिए महत्वपूर्ण है। इसके अलावा, फसलों के साथ-साथ पेड़ों को लगाने से निरंतर खाद्य आपूर्ति बनाए रखने, आहार विविधता और एकल फसल उत्पादन की तुलना में अधिक पोषण प्राप्त करने में मदद मिलती है।&nbsp;</p>
<p>मिट्टी में नमी बरकरार रखकर कृषि वानिकी मिट्टी कटाव के जोखिम को कम करने में मदद कर सकती है। यह पूर्वोत्तर भारत के पहाड़ी इलाकों के लिए खासतौर पर फायदेमंद हो सकता है। यह क्षेत्र अनियमित वर्षा, असामयिक बाढ़, तापमान में उतार-चढ़ाव से ग्रस्त हैं। कृषि वानिकी का लाभ उठाकर पूर्वोत्तर भारत में हरित क्षेत्र बढ़ाकर और बेहतर जल प्रबंधन के द्वारा टिकाऊ कृषि को बढ़ाया दिया जा सकता है।</p>
<p>कृषि वानिकी किसानों को उनकी आय में विविधता लाने का अवसर भी प्रदान करती है। फलों, सब्जियों, फसलों, लकड़ी और चारे के समन्वय से किसान आय के लिए एक ही फसल पर निर्भरता को कम कर सकते हैं। पूर्वोत्तर भारत के संदर्भ में यह एक कारगर उपाय है क्योंकि वहां लगभग 80 प्रतिशत किसान छोटी जोत वाले हैं। चूंकि पूर्वोत्तर भारत के कई हिस्सों में खाना पकाने के लिए अब भी ईंधन के तौर पर लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है इसलिए कृषि वानिकी ईंधन का एक स्थायी स्रोत प्रदान करती है जिससे प्राकृतिक वनों पर निर्भरता कम होती है।</p>
<p>इन सभी फायदों के बावजूद, पूर्वोत्तर भारत में कृषि वानिकी का भरपूर लाभ नहीं उठाया गया है। इसके लिए किसानों में कृषि वानिकी के लाभ के बारे में जागरूकता की कमी, कृषि वानिकी की शुरुआत में अधिक लागत और भूमि स्वामित्व से मुद्दे वजह हो सकते हैं। इस क्षेत्र को जलवायु परिवर्तन के कारण सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है, जिससे कमजोर समुदायों के लिए खाद्य सुरक्षा की समस्या और भी गंभीर हो गई है।</p>
<p>हालांकि, सरकार राष्ट्रीय कृषि वानिकी नीति और राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन जैसी पहलों के माध्यम से टिकाऊ कृषि प्रणालियों को बढ़ावा दे रही हैं, लेकिन कृषि वानिकी प्रथाओं को प्रोत्साहन देने के लिए लक्षित कार्यक्रमों और कार्यान्वयन की आवश्यकता है। नीतिगत समर्थन और निवेश किसानों के आत्मविश्वास को बढ़ाने और उन्हें खाद्य व पोषण सुरक्षा प्राप्त करने में मदद कर सकता है, साथ ही उनकी आजीविका में भी सुधार ला सकता है। जलवायु परिवर्तन की चुनौती के मद्देनजर यह आवश्यक है कि हमारे पास कृषि वानिकी को बढ़ावा देने और भविष्य की खाद्य और पोषण संबंधी जरूरतों को सुरक्षित करने के लिए आम सहमति और आवश्यक उपाय हों।</p>
<p><em>(</em><em>लेखक एक सामाजिक उद्यमी और बालीपारा फाउंडेशन के संस्थापक एवं अध्यक्ष हैं। बालीपारा फाउंडेशन पर्यावरण संरक्षण, </em><em>कृषि और आजीविका के क्षेत्रों में पूर्वी हिमालयी समुदायों के साथ मिलकर काम करता है।)</em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ खाद्य और पोषण सुरक्षा के लिए कारगर है कृषि वानिकी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[घट नहीं रही है भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि की &amp;apos;प्रधानता&amp;apos;]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/indian-economy-is-still-more-farm-dependent.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 21 Oct 2024 07:21:44 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/indian-economy-is-still-more-farm-dependent.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारतीय अर्थव्यवस्था में एक विरोधाभास पैदा हो गया है। तेज आर्थिक विकास दर के फायदे कुछ लोगों तक सीमित हो गए हैं जबकि देश की आबादी का बड़ा हिस्सा कृषि पर निर्भर है। यह बात नाबार्ड द्वारा ग्रामीण आबादी पर 2021-22 में किये गये सर्वे में बहुत साफ नजर आती है। देश में कृषि और उससे जुड़ी गतिविधियों के जरिए जीवनयापन कर रहे ग्रामीण परिवारों की संख्या बढ़ रही है और यह 57 फीसदी तक पहुंच गई है जो 2016-17 में 48 फीसदी थी।&nbsp;</p>
<p>नाबार्ड ने यह सर्वे जुलाई 2021 से जून 2022 के बीच किया था जिसमें ग्रामीण क्षेत्रों के साथ 50 हजार तक की आबादी वाले अर्द्ध शहरी क्षेत्रों को भी शामिल किया गया था। सर्वे में कृषक परिवारों की परिभाषा में 6500 रुपये से अधिक की कृषि आय वाले परिवारों को शामिल किया गया है। इसके पहले 2016-17 के सर्वे में यह सीमा 5000 रुपये थी।</p>
<p>रिपोर्ट के मुताबिक, कृषक परिवारों की औसत मासिक आय, गैर-कृषक परिवारों की औसत मासिक आय और सभी परिवारों की औसत मासिक आय से अधिक है। देश में सभी ग्रामीण परिवारों की औसत मासिक आय 12,698 रुपये है, जबकि कृषक परिवारों की औसत मासिक आय 13,661 रुपये और गैर-कृषक परिवारों की औसत आय 11,438 रुपये है। वहीं, 2016-17 के सर्वे में कृषक परिवारों की औसत मासिक आय 8,931 रुपये जबकि गैर-कृषक परिवारों की 7,269 रुपये थी।</p>
<p>कृषक परिवारों के लिए खेती सबसे बड़ा आय का स्रोत है, जो कुल मासिक आय का लगभग एक-तिहाई (33 फीसदी) है। इसके बाद सरकारी या निजी सेवाओं का 23 फीसदी, मजदूरी का 16 फीसदी और अन्य उद्यमों का 15 फीसदी योगदान है। दूसरी ओर, गैर-कृषक परिवारों की आय में सरकारी या निजी नौकरियों का सबसे बड़ा हिस्सा 57 फीसदी है, जबकि मजदूरी से गैर-कृषक परिवारों को 26 फीसदी आय होती है।</p>
<p>रिपोर्ट में बताया गया कि जिन परिवारों के पास 2 हेक्टेयर से अधिक भूमि है, उनकी औसत आय छोटी जोत वाले किसानों की तुलना में लगभग दोगुनी होती है। इसके विपरीत, जिनके पास 0.01 हेक्टेयर से कम भूमि है, उनकी आय का अधिकांश हिस्सा नौकरी, मजदूरी या पशुपालन से आता है। इसमें सरकारी या निजी नौकरियों का 31 फीसदी, मजदूरी का 29 फीसदी और पशुपालन का 25 फीसदी योगदान है। ऐसे छोटे किसानों की कुल आय में खेती का योगदान केवल 2 फीसदी है।&nbsp;</p>
<p>सर्वे के आंकड़ों के आधार पर कहा जा सकता है कि 2016-17 से 2021-22 के बीच कृषि से आय अर्जित करने वाले परिवारों की संख्या तेजी से बढ़ी है। साथ ही इन परिवारों की कृषि से होने वाली आय अन्य स्रोतों से होने वाली आय के मुकाबले बढ़ी है। हालांकि यह तर्क दिया जा सकता है कि यह सर्वे कोविड के दौर के एकदम बाद हुआ और उस समय लॉकडाउन की वजह के अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्र उबर रहे थे। लेकिन नेशनल सैंपल सर्वे कार्यालय के पीरियोडिक लेबर फोर्स (पीएलएफ) सर्वे के आंकड़े भी इस बात की ओर इशारा करते हैं कि भारत में कृषि के जरिए आजीविका कमाने वालों की तादाद बढ़ रही है।</p>
<p>पीएलएफ सर्वे के मुताबिक, 1993-94 में देश की कामकाजी आबादी का 64.6 फीसदी हिस्सा कृषि में लगा था। इसका स्तर 2004-05 में घट कर 58.5 फीसदी और 2011-12 में 48.9 फीसदी रह गया। इसके बाद कोविड से पहले 2018-19 में कृषि पर निर्भरता गिरकर 42.5 फीसदी रह गई। लेकिन उसके बाद इसकी राह उल्टी हो गई और 2020-21 में इसका स्तर बढ़कर 46.5 फीसदी हो गया। यह अनुपात 2021-22 में 45.5 फीसदी पर आया लेकिन 2022-23 में फिर बढ़ कर 45.8 फीसदी हो गया। वहीं 2023-24 के ताजा आंकड़ों के मुताबिक 46.1 फीसदी लोगों को कृषि से रोजगार मिल रहा है। भारतीय अर्थव्यवस्था पिछले तीन साल में 8.3 फीसदी की औसत दर से बढ़ी है।</p>
<p>अगर ग्रामीण भारत के आंकड़ों को देखें तो वह इसी ओर इशारा करते हैं। ग्रामीण कामकाजी लोगों में से 2018-19 में 57.8 फीसदी लोगों को कृषि में रोजगार मिल रहा था जो 2019-20 में 61.5 फीसदी और 2020-21 में 60.8 फीसदी रहा। साल 2022-23 में यह कुछ कम होकर 58.4 फीसदी पर आ गया, जबकि 2023-24 में यह फिर से बढ़कर 59.8 फीसदी पर पहुंच गया।</p>
<p>नाबार्ड और पीएलएफ दोनों सर्वे में, रोजगार के मामले में कृषि पर निर्भर लोगों की तादाद बढ़ी है। जबकि मैन्यूफैक्चरिंग में रोजगार पाने वाले लोगों की संख्या 2023-24 में गिरकर 11.4 फीसदी पर पहुंच गई, जो 2011-12 में 12.6 फीसदी और 2018-19 में 12.1 फीसदी थी। साल 2022-23 में मैन्यूफैक्चरिंग से अधिक लोग ट्रेड, होटल और रेस्तरां क्षेत्र में रोजगार पा रहे थे। वहां यह स्तर 12.2 फीसदी और कंस्ट्रक्शन में 12 फीसदी था।</p>
<p>पीएलएफ सर्वे के मुताबिक, सबसे अधिक 63.8 फीसदी लोग छत्तीसगढ़ में कृषि पर निर्भर हैं, मध्य प्रदेश में यह अनुपात 61.6 फीसदी, उत्तर प्रदेश &nbsp;55.9 फीसदी, बिहार में 54.2 फीसदी, हिमाचल प्रदेश में 54 फीसदी, राजस्थान में 51.1 फीसदी, पंजाब में 27.2 फीसदी और हरियाणा में 27.5 फीसदी है। सबसे कम 8.1 फीसदी गोवा में कृषि पर निर्भर हैं।</p>
<p>वित्त वर्ष 2022-23 में कृषि और संबद्ध क्षेत्रों की विकास दर 4.7 फीसदी थी, जो 2023-24 में घट कर सिर्फ 1.4 फीसदी रह गई। बीते वर्ष की आखिरी दो तिमाही में तो कृषि विकास दर सिर्फ 0.4 फीसदी और 0.6 फीसदी थी। अर्थात कृषि विकास दर घटने के बावजूद इस पर लोगों की निर्भरता बढ़ी है।</p>
<p>यह स्थिति तब है जब भारतीय अर्थव्यवस्था 2011 के 1.82 ट्रिलियन डॉलर से बढ़कर 2023 में 3.55 ट्रिलियन डॉलर पर पहुंच गई है। जो आर्थिक नीतियां बन रही हैं और लागू की जा रही हैं उनका आधार लोगों को कृषि से हटाकर दूसरे क्षेत्रों में ले जाना है। लेकिन ताजा सर्वे इस विरोधाभास को सामने ला रहे हैं कि भारत में रोजगार के लिए कृषि पर निर्भरता बढ़ी है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था के कृषि प्रधान होने को और अधिक पुख्ता करता है। यह देश में विभिन्न वर्गों के बीच आर्थिक असमानता बढ़ने का भी प्रमाण है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ घट नहीं रही है भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि की 'प्रधानता' ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[किसानों को सब्जियों की खुदरा कीमत का सिर्फ एक&amp;#45;तिहाई मिलता है, कीमत वृद्धि का फायदा बिचौलियों और रिटेलर्स को]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/farmers-get-third-of-veggies-retail-price-middlemen-and-retailers-gain-from-price-spikes.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 20 Oct 2024 16:56:18 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/farmers-get-third-of-veggies-retail-price-middlemen-and-retailers-gain-from-price-spikes.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अगर कृषि आधारित प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों/यूटिलिटी के लिए अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) लागू किया जा सकता है, तो प्राथमिक कृषि उत्पादों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) क्यों नहीं होना चाहिए? भारतीय किसानों के फल और सब्जियों की रिटेल कीमत का केवल एक तिहाई हिस्सा मिलता है, अधिकांश लाभ थोक विक्रेताओं और खुदरा विक्रेताओं के हिस्से जाता है। यह जानकारी भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा खाद्य महंगाई पर प्रकाशित शोध पत्रों में सामने आई है।</p>
<p>यह स्थिति डेयरी जैसे अन्य क्षेत्रों से बिल्कुल भिन्न है, जहां किसान अंतिम कीमत का लगभग 70% प्राप्त करते हैं। अंडा उत्पादक सबसे बेहतर स्थिति में रहते हैं, जो अंतिम कीमत का 75% प्राप्त करते हैं। पोल्ट्री मीट के किसानों और एग्रीगेटर, दोनों को मिलाकर खुदरा कीमत का 56% मिलता है।</p>
<p>उपभोक्ता साल में कम से कम दो बार मौसमी कारणों से टमाटर, प्याज और आलू (TOP) की कीमतों में वृद्धि का सामना करते हैं, लेकिन इसका लाभ किसानों को नहीं मिलता। शोध पत्रों के अनुसार, किसान टमाटर की उपभोक्ता कीमत का लगभग 33%, प्याज का 36% और आलू का 37% प्राप्त करते हैं। फलों के लिए अनुमान लगाया गया है कि किसान घरेलू बाजार में केले की खुदरा कीमत का 31%, अंगूर का 35% और आम का 43% प्राप्त करते हैं।</p>
<p>कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी तथा अन्य के अध्ययन में यह निष्कर्ष भी निकाला गया है कि कीमतों में वृद्धि का पूर्वानुमान संभव है। अध्ययन ने ई-नाम (e-NAM) का उपयोग बढ़ाने, किसान संगठनों को बढ़ावा देने, फ्यूचर्स ट्रेडिंग को फिर शुरू करने, अधिक कोल्ड स्टोरेज और प्रसंस्करण सुविधाओं के निर्माण जैसे कदम उठाने की सिफारिश की है।</p>
<p>सवाल है कि जिस प्रकार औद्योगिक क्षेत्रों और कॉर्पोरेट्स के लिए एनपीए और कर्ज को वैध रूप से समाप्त करने के लिए इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) लागू किया जाता है, वैसा किसानों और उनके कर्जों पर क्यों लागू नहीं किया जाता? सिर्फ इसलिए कि यह एक असंगठित क्षेत्र है या इसमें अन्य उद्योगों की तरह सुनिश्चित लाभ नहीं होता?</p>
<p>इसलिए, किसानों को तत्काल एमएसपी प्रदान करने की आवश्यकता है। यह एक मिथक रहा है कि एमएसपी अनिवार्य रूप से सरकारें देंगी, क्योंकि सरकारें एमएसपी पर कृषि उत्पादों की खरीद करती हैं। यह भी कहा जाता है कि इसके परिणामस्वरूप सप्लाई चेन प्रबंधन की कमियों और खराब लॉजिस्टिक क्षमताओं के कारण 40% से अधिक उपज की बर्बादी होती है।</p>
<p><strong>किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य</strong><br />अन्य किसी उद्यम की तरह कृषि तभी टिकाऊ हो सकती है जब यह किसान या उत्पादक को मुनाफा दे सके। बाजार वह स्थान होता है, जहां उत्पादन का लेन-देन होता है और प्रति इकाई मूल्य निर्धारित किया जाता है। इससे किसान-उत्पादक को प्राप्त मूल्य का निर्धारण होता है। मूल्य सीधे किसान की आय को प्रभावित करते हैं, इसलिए कृषि बाजार और मार्केटिंग क्षमता अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। किसानों के हितों की रक्षा करने और उनकी आय बढ़ाने के लिए मौजूदा बाजार संरचना की नए सिरे से समीक्षा करने और एक अधिक प्रतिस्पर्धी मार्केटिंग वातावरण लाने की आवश्यकता है। इसके साथ अधिक उत्पादकता और खेती/उत्पादन की लागत को कम करना भी जरूरी है।&nbsp;</p>
<p>राज्य में संगठित थोक मार्केटिंग को राज्यों के कृषि उपज विपणन (विनियमन) अधिनियमों के प्रावधानों के तहत स्थापित बाजारों के नेटवर्क के माध्यम से बढ़ावा दिया जाता है। इन बाजार संरचनाओं का उद्देश्य लेन-देन में पारदर्शिता प्राप्त करना और किसान-उत्पादक को लाभकारी मूल्य दिलाना है। हालांकि ये बाजार बदलते भारत की कृषि उपज की प्रोफाइल के अनुरूप अपर्याप्त हो गए हैं। हाल में कृषि, बागवानी, डेयरी, पोल्ट्री और मत्स्य पालन के क्षेत्र में उत्पादन के उच्च स्तर देखने को मिले हैं। साथ ही अनाज, दालों और तिलहन की मात्रा में भी वृद्धि हुई है।</p>
<p>एमएसपी प्रणाली को सुधारने के लिए आवश्यक है कि कृषि बाजार संरचना में बदलाव किया जाए, जिससे किसानों की आय में वृद्धि हो सके। उत्पादकता के बढ़े हुए स्तर और खेती/उत्पादन की लागत में कमी से कृषि विकास, किसान कल्याण, उत्पादक रोजगार और ग्रामीण क्षेत्रों की आर्थिक समृद्धि में वृद्धि होगी। कृषि क्षेत्र में बदलाव को देखते हुए, यह आवश्यक है कि राज्य में एक बाधा-मुक्त एकीकृत कृषि बाजार हो। इसके लिए निम्नलिखित विधायी हस्तक्षेप आवश्यक हैं:<br />1) निजी थोक बाजार की स्थापना के लिए अनुकूल वातावरण का निर्माण और प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए रायतु भरोसा केंद्रों (RBKs) को मजबूत करना।<br />2) किसानों और प्रसंस्करणकर्ताओं/निर्यातकों/थोक खरीदारों/यूजर के बीच सीधा संपर्क बढ़ाना, जिससे उत्पादक और उपभोक्ता दोनों को लाभ हो।<br />3) गोदामों/साइलो/कोल्ड स्टोरेज आदि को बाजार उप-यार्ड के रूप में घोषित करने की अनुमति देना।<br />4) किसानों को अपने उत्पाद अपनी पसंद के स्थान और समय पर बेहतर कीमत पर बेचने की स्वतंत्रता प्रदान करना।</p>
<p>किसानों के हितों की रक्षा के लिए एक अधिनियम लाया जाना चाहिए, जो न्यूनतम समर्थन मूल्य सुनिश्चित करे। एमएसपी की समय-समय पर समीक्षा की जानी चाहिए। इस अधिनियम के तहत किसानों के उत्पाद पर अधिसूचित न्यूनतम समर्थन मूल्य का उल्लंघन करने वाले किसी भी लेनदेन को अवैध माना जाना चाहिए। यह न केवल सरकारी एजेंसियों पर लागू हो, बल्कि निजी संस्थाओं, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, आपूर्तिकर्ता, बिचौलिओं और आम जनता पर भी लागू हो।&nbsp;</p>
<p>किसानों की उपज के समर्थन मूल्य निर्धारण और उसे लागू करने से संबंधित सभी नियम और विनियम इस अधिनियम के अनुसार निर्धारित किए जाने चाहिए। इस अधिनियम के तहत सरकार द्वारा अधिकृत अधिकारियों को शक्ति प्रदान की जानी चाहिए, ताकि उल्लंघन के मामलों में उपकरण/वाहनों को जब्त करने और दंडित करने के प्रावधान लागू किए जा सकें। सरकार को इस अधिनियम के तहत कंट्रोलिंग अथॉरिटी नियुक्त करना चाहिए। इस अथॉरिटी को अधिनियम के प्रावधानों को लागू करने के लिए हर तरह के कदम उठाने चाहिए, जिनमें ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, वेबसाइट, मोबाइल ऐप आदि का निर्माण भी शामिल है।&nbsp;</p>
<p><em>(लेखक कैपिटल फॉर्चून्स प्रा. लि. में प्रोजेक्ट और इंफ्रास्ट्रक्चर मैनेजर हैं। इससे पहले वे आंध्र प्रदेश अर्बन इंफ्रास्ट्रक्चर एसेट मैनेजमेंट लि. में लीगल और लायजनिंग प्रमुख थे।)</em></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2021/11/image_750x500_6193598436146.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ किसानों को सब्जियों की खुदरा कीमत का सिर्फ एक-तिहाई मिलता है, कीमत वृद्धि का फायदा बिचौलियों और रिटेलर्स को ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कृषि आय बढ़ाने और महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण में डेयरी सेक्टर की भूमिका]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/the-potential-of-the-dairy-sector-for-better-farming-income-and-economic-empowerment-of-women.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 30 Sep 2024 11:21:54 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/the-potential-of-the-dairy-sector-for-better-farming-income-and-economic-empowerment-of-women.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>आठ करोड़ डेयरी किसानों के साथ भारत का डेयरी सेक्टर सामूहिक प्रयास और रणनीतिक विकास की ताकत का बेहतरीन सबूत है। 50 साल पहले दूध की कमी वाले देश से दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक बनने तक भारत ने असाधारण यात्रा तय की है। आज दूध न सिर्फ देश का सबसे बड़ा कृषि उत्पाद है बल्कि यह कृषि अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण अंश भी बन गया है। भारत की डेयरी इंडस्ट्री लगभग 14 लाख करोड़ रुपए की है और यह देश की जीडीपी में पांच प्रतिशत का योगदान करती है। कृषि क्षेत्र में इसका हिस्सा लगभग एक-तिहाई है।</p>
<p><strong>ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण स्तंभः</strong> तेजी से विकसित हो रहे कृषि क्षेत्र में डेयरी सेक्टर ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बनकर उभरा है। मौसमी फसलों के विपरीत डेरी फार्मिंग पूरे साल आय का एक विश्वसनीय स्रोत बन गया है। इससे किसानों को अपनी आमदनी निरंतर बरकरार रखने और कर्ज तथा बाहरी वित्तीय मदद पर निर्भरता कम करने में मदद मिली है। यह स्थिरता खासतौर से ग्रामीण इलाकों में देखी जा सकती है जहां जलवायु परिवर्तन, बाजार में उतार-चढ़ाव और फसलों को होने वाले नुकसान के कारण कृषि आय को लेकर जोखिम बहुत बढ़ गया है।</p>
<p>पिछले 5 दशकों में भारत की आबादी ढाई गुना बढ़ी लेकिन दूध उत्पादन 10 गुना बढ़ा है। अनाज जैसे दूसरे खाद्य पदार्थों का उत्पादन सिर्फ 2.8 गुना हुआ है। दूध उत्पादन में इस उल्लेखनीय वृद्धि ने करोड़ों भूमिहीन और छोटे किसानों का जीवन बदला है, उन्हें आजीविका का सतत साधन उपलब्ध कराकर उन्हें गरीबी से बाहर निकाला है।</p>
<p>श्रम सघन प्रकृति होने के कारण डेयरी फार्मिंग ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के भी अनेक अवसर पैदा करता है। पशुपालन से लेकर दूध की प्रोसेसिंग और वितरण तक डेयरी सेक्टर ने करोड़ों लोगों को रोजगार दे रखा है। इस तरह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने तथा गरीबी दूर करने में इसका योगदान महत्वपूर्ण है।</p>
<p><strong>महिलाओं का आर्थिक सशक्तीकरणः</strong> भारत की आबादी में 48.5% महिलाएं हैं और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में उनका योगदान भी निरंतर बढ़ रहा है। महिलाएं कृषि क्षेत्र की रीढ़ हैं क्योंकि डेयरी फार्मिंग में 70% से अधिक काम महिलाएं ही करती हैं। इस सेक्टर में उनका जुड़ाव खाद्य और पोषण सुरक्षा के लिए ही नहीं, बल्कि ग्रामीण परिवारों की आर्थिक स्थिरता के लिए भी महत्वपूर्ण है।</p>
<p>अनेक ग्रामीण समुदायों में मवेशियों की देखभाल मुख्य रूप से महिलाएं ही करती हैं। फिर भी उनके योगदान की अक्सर अनदेखी कर दी जाती है या उसे कमतर आंका जाता है। लेकिन उनकी भूमिका को औपचारिक रूप देकर तथा डेयरी संबंधी परिसंपत्तियों पर उनके मालिकाना हक तथा नियंत्रण उपलब्ध करवा कर यह सेक्टर महिलाओं का सशक्तीकरण करता है और इस बिजनेस में उन्हें प्रत्यक्ष हिस्सेदार बनाता है। इस सशक्तीकरण से उन महिलाओं की परिवार में आर्थिक स्वतंत्रता और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है। इससे न सिर्फ उनकी सामाजिक आर्थिक स्थिति बेहतर होती है बल्कि उनका आत्मविश्वास भी बढ़ता है।</p>
<p>डेयरी सेक्टर ग्रामीण इलाकों में लैंगिक समानता को बढ़ावा देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। डेयरी फार्मिंग में ज्यादा संख्या में महिलाओं की भागीदारी होने के कारण उनमें आत्मविश्वास पनपता है और वे अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाती हैं। साथ ही अपने समुदाय में लीडरशिप की भूमिका भी निभाती हैं। यह बदलाव न सिर्फ ज्यादा समावेशी और समान अधिकारों वाले समाज को बढ़ावा देता है बल्कि इससे सामुदायिक विकास के प्रयासों को भी मजबूती मिलती है। इन सबका नतीजा ग्रामीण संपन्नता के रूप में देखने को मिलता है।</p>
<p><strong>भारतीय डेयरी उद्योग की चुनौतियांः</strong> भारत का डेयरी उद्योग इस समय कई महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना कर रहा है। इसकी प्रमुख चिंताओं में एक किसानों, उपभोक्ताओं तथा नीति निर्माताओं के बीच सस्टेनेबिलिटी की अलग-अलग व्याख्या है। यहां मुख्य मुद्दा यह है कि किसानों तथा उपभोक्ताओं, दोनों के लिए कैसे बेहतर स्थिति सुनिश्चित की जा सके। यह ऐसी स्थिति हो जहां दूध उत्पादन में वृद्धि का सभी पक्षों को लाभ मिले।</p>
<p>दूसरी महत्वपूर्ण चुनौती अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धी बने रहने की है। हम सिर्फ दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए इसके दाम नहीं बढ़ा सकते। हमें पशुओं की उत्पादकता पर भी ध्यान देना होगा। साथ ही दूध उत्पादन की लागत भी कम करनी पड़ेगी। निर्यात बढ़ाने के लिए जरूरी है कि हमारे डेयरी उत्पादों की कीमत प्रतिस्पर्धी हो और वह अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों को पूरा करें। इसलिए महत्वपूर्ण सवाल यह है कि प्रति लीटर दूध उत्पादन की लागत कैसे कम की जाए। यह बेहतर फीड कन्वर्जन रेट और नस्लों में सुधार के जरिए ही संभव है।</p>
<p>इसके अलावा खाद्य महंगाई और खाद्य संपन्नता के बीच संतुलन बनाने की भी चुनौती है। अक्सर जब किसानों को उनकी उपज की बेहतर कीमत मिलती है तो उसे खाद्य महंगाई का नाम दे दिया जाता है। लेकिन इसे संपन्नता और किसानों के लिए इंसेंटिव के तौर पर देखा जाना चाहिए ताकि वह दूध का उत्पादन जारी रख सके। हमें खाद्य सुरक्षा और किसानों की आजीविका के बीच संतुलन बनाने की जरूरत है।</p>
<p>डेयरी सेक्टर कृषि क्षेत्र में जितना योगदान करता है उस अनुपात में इसके लिए बजट आवंटन नहीं होता है। भावी पीढ़ियां इस उद्योग में बनी रहें, यह सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है कि दूध उत्पादन को लाभदायक तथा आधुनिक बिजनेस के रूप में तैयार किया जाए।</p>
<p>एक और महत्वपूर्ण मुद्दा बिना दूध वाले पेय पदार्थ बनाने वालों की तरफ से फैलाई जाने वाली गलत सूचनाएं हैं। उपभोक्ताओं के बीच दूध के फायदे को लेकर जागरूकता बढ़ाकर हमें इसका मुकाबला करना चाहिए। डेयरी उत्पादन में सस्टेनेबिलिटी और पर्यावरण को लेकर चिंता भी बढ़ रही है। भारत के छोटे और सीमांत किसानों के लिए प्राथमिकता आजीविका से जुड़ा उत्सर्जन होनी चाहिए ना कि लग्जरी। डेयरी फार्मिंग पर उनकी आर्थिक निर्भरता की हकीकत तथा सस्टेनेबिलिटी की जरूरत के बीच संतुलन की आवश्यकता है।</p>
<p>निष्कर्षः किसानों की आमदनी बढ़ाने का जरिया और महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण के एक माध्यम के तौर पर भारत के डेयरी सेक्टर में अनेक संभावनाएं हैं। इस सेक्टर में लगातार निवेश करके और इस सेक्टर को समर्थन देकर भारत टिकाऊ आर्थिक विकास, बेहतर ग्रामीण आजीविका और समान अधिकारों वाले समाज का निर्माण कर सकता है। डेयरी इंडस्ट्री का सफलता का इतिहास रहा है। इसलिए इसमें पूरे देश के करोड़ों किसानों तथा महिलाओं का बेहतर भविष्य छिपा हुआ है।</p>
<p><strong><em>(लेखक इंडियन डेयरी एसोसिएशन के प्रेसिडेंट और अमूल (जीसीएमएमएफ) के पूर्व मैनेजिंग डायरेक्टर है)</em></strong></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ कृषि आय बढ़ाने और महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण में डेयरी सेक्टर की भूमिका ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[जीएम बीज की नई पीढ़ी से उत्पादकता बढ़ने के साथ भारतीय कपास विश्व बाजार में प्रतिस्पर्धी होगी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/next-generation-gm-seed-case-for-transformation-of-indian-cotton-sector-and-textile-economy.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 15 Sep 2024 10:20:29 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/next-generation-gm-seed-case-for-transformation-of-indian-cotton-sector-and-textile-economy.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><strong>कपास</strong> भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सबसे महत्वपूर्ण नकदी फसलों में एक है। यह फाइबर और तेल के साथ पशु चारा भी उपलब्ध कराता है। लेकिन किसानों के लिए कपास की फसल उपजाना चुनौतीपूर्ण बनता जा रहा है, क्योंकि इस पर बॉलवर्म, थ्रिप्स, व्हाइटफ्लाई और जैसिड जैसे कीटों के हमले अधिक होने लगे हैं। दुनिया में खेती की जमीन के सिर्फ 2.5 प्रतिशत हिस्से पर कपास की फसल उपजाई जाती है, लेकिन 16% कीटनाशकों की खपत इसी में होती है।</p>
<p>भारत में कपास की उत्पादकता 1950 से 1970 के दौरान धीरे-धीरे बढ़ी। यह प्रति हेक्टेयर 130 किलो के आसपास थी और कुल औसत उत्पादन करीब 60 लाख गांठ था। उत्पादन 2002-03 में बढ़कर 136 लाख गांठ पहुंच गया और प्रति हेक्टेयर उत्पादकता 302 किलो हो गई। उत्पादकता में इस बढ़ोतरी का श्रेय उर्वरकों और कीटनाशकों की उपलब्धता बढ़ने और सिंचाई की तकनीक के साथ पानी की उपलब्धता में सुधार को जाता है।</p>
<p>वर्ष 2002 में भारत में पहले जेनेटिकली मॉडिफाइड (जीएम) बीज बीटी कॉटन को मंजूरी दी गई, जो मोनसेंटो की पहली पीढ़ी की जीएम टेक्नोलॉजी थी। जल्दी ही भारत में 90% कपास की खेती इसी किस्म की होने लगी। बीटी कॉटन से पारंपरिक किस्म की तुलना में न सिर्फ उत्पादकता 25% से 60% तक बढ़ी, बल्कि इससे कीटनाशकों पर होने वाला खर्च भी कम हो गया। गैर-बीटी वैरायटी की तुलना में बीटी वैरायटी में तेल की मात्रा भी अधिक थी। इससे जिनिंग और तेल मिलों को फायदा हुआ।</p>
<p>अगले कुछ वर्षों के दौरान और अधिक संख्या में किसानों ने बीटी बीज को अपनाया, जिससे इसका रकबा 2002-03 के 76.3 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 2014-15 में 128.5 लाख हेक्टेयर हो गया। इस दौरान उत्पादकता भी प्रति हेक्टेयर 302 किलो से बढ़कर 511 किलोग्राम हो गई। 2013-14 में सबसे अधिक 566 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की उत्पादकता थी। उत्पादन भी इस दौरान 179 लाख गांठ से 386 लाख गांठ पहुंच गया। उत्पादन 2013-14 में 398 लाख गांठ के अधिकतम स्तर पर पहुंच गया था। इसका नतीजा यह हुआ कि चीन को पीछे छोड़ते हुए भारत दुनिया का सबसे बड़ा कपास उत्पादक बन गया। बीटी बीज के आने से भारत में कपास का उत्पादन सिर्फ 11 वर्षों में तीन गुना हो गया।</p>
<p>वर्ष 2015-16 तक बॉलगार्ड-2 टेक्नोलॉजी पिंक बॉलवर्म कीटों के हमले को झेलने में सक्षम थी, लेकिन 2014 के बाद पिंक बॉलवर्म में इस किस्म के बीज के विरुद्ध प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने लगी थी। मार्केटिंग वर्ष 2015-16 में पिंक बॉलवर्म कीटों ने गुजरात में काफी नुकसान पहुंचाया। वर्ष 2017-18 में तो इन कीटों ने मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में महामारी के स्तर पर नुकसान पहुंचाया। इसका प्रभाव 8% से लेकर 92% तक रहा, जिससे उत्पादकता 10% से 30% तक कम हो गई। किसानों की समझ में नहीं आ रहा था कि वे क्या करें। बॉलवर्म को रोकने के लिए उन्होंने फसल पर पर्याप्त कीटनाशकों का छिड़काव भी नहीं किया था। उसके बाद से बॉलवर्म का असर कम करने के लिए कई कदम उठाए गए, लेकिन नतीजे उत्साहजनक नहीं रहे। प्रति हेक्टेयर उत्पादकता भी 2013-14 के 566 किलोग्राम से घटकर 2023-24 में 422 किलोग्राम रह गई है।</p>
<p><strong>नई किस्म के बीज की जरूरतः</strong> 2006 में जीएम वैरायटी की दूसरी पीढ़ी के आने के बाद से बीज टेक्नोलॉजी में कोई सुधार नहीं हुआ है। अभी जो बीटी बीज उपलब्ध हैं वह पुरानी पीढ़ी की ही वैरायटी हैं, जिनके खिलाफ बॉलवर्म प्रतिरोध क्षमता विकसित कर चुके हैं। यह किस्में अपने आसपास उगने वाली खरपतवार से लड़ने में भी सक्षम नहीं हैं। इन खरपतवारों से कपास की उत्पादकता 30% से अधिक घट सकती है।</p>
<p>दुनिया में बेहतर बीज टेक्नोलॉजी उपलब्ध है। पुरानी किस्म की तुलना में इनमें बाल काउंट भी ज्यादा है। इनमें प्रोटीन की तीन स्ट्रेन होती है जो कपास के पौधे को बॉलवर्म तथा अन्य कीटों से लड़ने में मदद करती है। बीज की यह पीढ़ी खरपतवार प्रबंधन में भी बेहतर है। बीज की नई किस्म कीटनाशक और खरपतवार नाशक छिड़काव में किसानों की लागत कम कर सकती है।</p>
<p><strong>कपास उत्पादन में सुधारः</strong> नई बीज टेक्नोलॉजी को अपनाने से उत्पादकता बेहतर होगी और उत्पादन भी बढ़ेगा। अगर हम मान लें कि नई बीज टेक्नोलॉजी से हम प्रति हेक्टेयर उत्पादन को 2013-14 के 566 किलोग्राम के स्तर पर ले जाने में सफल रहते हैं, तो कुल उत्पादन 402 लाख गांठ का होगा। यह मौजूदा वर्ष के उत्पादन की तुलना में 62 लाख गांठ अधिक होगा। इस तरह 3.72 अरब डॉलर का संभावित फायदा होगा जिसे भारत अभी हर साल खो रहा है। इसके अलावा किसानों की आय भी 31% बढ़ेगी क्योंकि उनकी उत्पादकता 15% बढ़ जाएगी और खेती की लागत में 7% की बचत होगी।</p>
<p><strong>कपास की बढ़ती घरेलू खपतः</strong> 11 वर्षों में उत्पादन लगभग तीन गुना बढ़ने के बाद कपास की घरेलू खपत में भी काफी वृद्धि हुई है। वर्ष 2002-03 में खपत 154 लाख गांठ की थी जो 2023-24 में 315 लाख गांठ हो गई। भारत का घरेलू टेक्सटाइल और अपैरल बाजार 2010-11 के 50 अरब डॉलर से बढ़कर 2021-22 में 99 अरब डॉलर का हो गया, और उद्योग विशेषज्ञों के अनुसार 2025-26 में इसके 190 अरब डॉलर का हो जाने का अनुमान है।</p>
<p>इस मांग के साथ स्पिनिंग क्षमता और फैब्रिक तथा गारमेंट उत्पादन में भी वृद्धि हुई। कॉटन यार्न का निर्यात 2007 के 1.76 अरब डॉलर से बढ़कर 2020-21 में 4.92 अरब डॉलर हो गया। अर्थात इसमें 176% की वृद्धि हुई। इस तरह हम देख सकते हैं कि उत्पादन के आंकड़े बढ़ने के साथ यार्न निर्यात और फैब्रिक तथा गारमेंट के उत्पादन में भी वृद्धि हुई है।</p>
<p><strong>भारतीय अर्थव्यवस्था में कॉटन तथा कॉटन टेक्सटाइल उत्पादों का योगदानः</strong> वर्ष 2020-21 में भारत का घरेलू टेक्सटाइल और अपैरल बाजार लगभग 99 अरब डॉलर का था। भारत से लगभग 31 अरब डॉलर के टेक्सटाइल और अपैरल का निर्यात भी हुआ। इस तरह इस सेक्टर का इकोनॉमी में योगदान 130 अरब डॉलर का रहा जो उस साल की जीडीपी का लगभग 5% है।</p>
<p>कॉटन और कॉटन टेक्सटाइल उत्पादों का हिस्सा सबसे बड़ा है। वर्ष 2020-21 में भारत से 2.4 अरब डॉलर के कॉटन फाइबर का निर्यात किया गया जबकि कॉटन यार्न का निर्यात 4.9 अरब डॉलर और कॉटन फैब्रिक का 3.3 अरब डॉलर का रहाय़ दूसरी तरफ अपैरल और अन्य तैयार उत्पादों का निर्यात 15.7 अरब डॉलर तक पहुंच गया। इस तरह देखें तो कॉटन और कॉटन टेक्सटाइल उत्पादों का कुल टेक्सटाइल निर्यात में 60% हिस्सा था। अगर हम उत्पादकता में सुधार के साथ उत्पादन 402 लाख गांठ तक पहुंचाने में सफल रहते हैं तो इससे इकोनॉमी में हर साल 9.8 अरब डॉलर का अतिरिक्त योगदान होगा।</p>
<p><strong>2005 से 2024 तक के लाभः</strong> बीटी कॉटन की वजह से भारत के कपास उत्पादन और पूरी वैल्यू चेन में वृद्धि का आकलन किया जाए तो 2005-2024 के दौरान भारत की अर्थव्यवस्था में टेक्सटाइल सेक्टर का योगदान 240 अरब डॉलर का हो जाता है। अगर कॉटन की उत्पादकता 566 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के सर्वोच्च स्तर से 422 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के मौजूदा स्तर पर नहीं गिरती तो यह वैल्यू 133 अरब डॉलर अधिक होती।</p>
<p><strong>इस सेक्टर के संभावित लाभः</strong> अगली पीढ़ी की जीएम वैरायटी की नई किस्म अपनाने की प्रक्रिया को मंजूरी मिल चुकी है। एक बार इसकी नीति आ जाए तो यह भारतीय टेक्सटाइल इकोनॉमी में अगले 15 वर्षों के दौरान 800 अरब से लेकर 1.6 लाख करोड़ डॉलर (सबसे अच्छी परिस्थितियों में) योगदान कर सकती है। भारत में कपास की खेती और टेक्सटाइल सेक्टर पर जीएम टेक्नोलॉजी के प्रभाव को देखते हुए कहा जा सकता है कि इस तरह की नीतिगत पहल को ट्रेट फीस और आईपीआर की बहस में नहीं उलझाया जाना चाहिए।</p>
<p><strong>बीज का मसला तत्काल हल न करने के जोखिमः</strong> अगर कपास की उत्पादकता लगातार कम रहती है तो न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) बढ़ाने की जरूरत पड़ती रहेगी और वैश्विक कपास बाजार में भारत की कपास प्रतिस्पर्धा करने लायक नहीं रहेगी। इसके कई नकारात्मक प्रभाव होंगे। जैसे, भारत से कपास का निर्यात कम होगा, एमएसपी एजेंसियों पर अधिक मात्रा में फसल खरीदने का दबाव होगा जिसका असर वित्तीय संसाधनों पर पड़ेगा। विश्व टेक्सटाइल बाजार में भारतीय कॉटन टेक्सटाइल की प्रतिस्पर्धी क्षमता और स्वीकार्यता प्रभावित होगी। टेक्सटाइल निर्यात बढ़ाने का हमारा लक्ष्य तो अधूरा रहेगा ही, भारतीय टेक्सटाइल सेक्टर में गैर निष्पादित परिसंपत्तियां (एनपीए) बढ़ने लगेंगी। मौजूदा एमएसपी देखें तो भारतीय कपास समान किस्म की ब्राजील की कपास से 15 से 20% महंगी है। पिछले 6-7 वर्षों में ब्राजील की कपास दुनिया में सबसे अधिक प्रतिस्पर्धी बनकर उभरी है।</p>
<p><strong>रोजगार सृजनः</strong> टेक्सटाइल सेक्टर स्किल्ड और अनस्किल्ड दोनों तरह के श्रमिकों को बड़े पैमाने पर रोजगार उपलब्ध कराता है। इंडिया ब्रांड इक्विटी फाउंडेशन के मुताबिक टेक्सटाइल सेक्टर कृषि के बाद दूसरा सबसे बड़ा रोजगार उपलब्ध कराने वाला सेक्टर है। इसमें 4.5 करोड़ लोग प्रत्यक्ष रूप से और 6 करोड़ परोक्ष रूप से जुड़े हुए हैं। अगर कपास का उत्पादन 10 अरब डॉलर मूल्य के बराबर सालाना बढ़ता है तो इस सेक्टर में 35 लाख नए रोजगार पैदा होने की संभावना है।</p>
<p>जैसी कि पहले चर्चा की गई है, पुरानी किस्म की तुलना में जीएम कॉटन की नई पीढ़ी के अनेक फायदे हैं। इससे कपास उत्पादन बढ़ाने में मदद मिलेगी और हम अपना निर्यात और अपनी विदेशी मुद्रा आय बढ़ा सकेंगे, विश्व बाजार में अपनी हिस्सेदारी में भी इजाफा कर सकेंगे, नए रोजगार का सृजन होगा और जीवों और वनस्पतियों पर दीर्घकालिक असर डालने वाले कीटनाशकों तथा खरपतवार नाशकों का इस्तेमाल कम होगा। इस तरह हम पर्यावरण को होने वाले नुकसान को भी बचा सकेंगे।</p>
<p><strong><em>(लेखक राष्ट्रीय सहकारी निर्यात लिमिटेड (एनसीईएल )के मैनेजिंग डायरेक्टर और गुरूग्राम स्थित ओलम एग्री इंडिया प्रा. लि. के&nbsp; पूर्व&nbsp; सीनियर वाइस प्रेसिडेंट (कपास एवं खाद्य तेल) हैं। यह लेख उन्होंने एनसीईएल में&nbsp; एमडी का पदभार ग्रहण करने के पहले लिखा था )&nbsp;</em></strong></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/09/image_750x500_66e6675f4431d.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ जीएम बीज की नई पीढ़ी से उत्पादकता बढ़ने के साथ भारतीय कपास विश्व बाजार में प्रतिस्पर्धी होगी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[फसलों की जलवायु रोधी क्षमता और सस्टेनेबिलिटी के लिए जीएम टेक्नोलॉजी अहम]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/gm-technology-is-crucial-for-climate-resilient-varieties-of-crops-and-sustainability.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 07 Sep 2024 17:38:41 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/gm-technology-is-crucial-for-climate-resilient-varieties-of-crops-and-sustainability.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><strong>आईसीएआर</strong> के संस्थानों और कृषि विश्वविद्यालयों समेत राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली के कृषि वैज्ञानिकों का एक प्रमुख लक्ष्य राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा को बचाना है। पर्याप्त खाद्य उत्पादन सुनिश्चित करने के मकसद से उपयुक्त टेक्नोलॉजी, खेती के तरीकों और फसलों की उन्नत किस्में विकसित करने के लिए विज्ञान आधारित हर संभव दृष्टिकोण का उपयोग किया जाता है। इसका उद्देश्य बढ़ती आबादी की खाद्य जरूरतों को पूरा करना है। खाद्य और कृषि के लिए विभिन्न फसलों की नई किस्में विकसित करने में लगे वैज्ञानिक पारंपरिक ब्रीडिंग, मॉलेक्यूलर ब्रीडिंग और जेनेटिक इंजीनियरिंग सहित विभिन्न तरीकों का उपयोग करते हैं। नई फसल किस्मों को अधिक उपज, बीमारियों और कीटों के प्रतिरोध और सूखा, अधिक तापमान, लवणता, बाढ़ जैसे पर्यावरणीय प्रभावों के प्रति सहनशीलता जैसे गुणों के साथ विकसित किया जाता है। वैज्ञानिकों के ठोस प्रयासों के परिणामस्वरूप हम फसल उत्पादकता 1970 में 0.7 टन प्रति हेक्टेयर से 2022 में 2.4 टन प्रति हेक्टेयर तक सुधारने में सक्षम हुए हैं। इससे देश में खाद्य उत्पादन में वृद्धि हुई है। यह 1970 के केवल 10 करोड़ टन से 2022-23 में लगभग 33 करोड़ टन हो गया है, वह भी खेती का शुद्ध क्षेत्रफल बिना बढ़ाए। इस अवधि के दौरान वांछित विशेषताओं के साथ अनाज, दलहन और तिलहन फसलों की 5000 से अधिक किस्में विकसित की गईं।</p>
<p>हालांकि इसके बावजूद भारत में गेहूं, चावल, मक्का, चना, मूंगफली और सरसों जैसी प्रमुख फसलों की उत्पादकता दुनिया के उच्चतम स्तरों की तुलना में बहुत कम है। इसके अलावा, आज कृषि कई चुनौतियों का सामना कर रही है, जिनमें मुख्य रूप से तेजी से बदलती जलवायु, कृषि योग्य भूमि और पानी जैसे घटते प्राकृतिक संसाधन, मिट्टी का क्षरण और उभरते कीट और रोगाणु शामिल हैं।</p>
<p>बढ़ती आबादी की खाद्य जरूरतों को पूरा करने के लिए फसलों की बेहतर किस्में विकसित करने में पारंपरिक फसल ब्रीडिंग महत्वपूर्ण है। इसे जैव प्रौद्योगिकी (बायो टेक्नोलॉजी) और जेनेटिक (आनुवंशिक) इंजीनियरिंग में होने वाली प्रगति के साथ जोड़कर हम ब्रीडिंग की गति तेज कर सकते हैं। इस तरह चुनौतीपूर्ण जलवायु परिस्थितियों के अनुकूल अधिक उपज वाली किस्में विकसित कर सकते हैं। इसलिए यह जरूरी है कि हम जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चुनौतियों के बावजूद खाद्य उत्पादन में वृद्धि के लिए नई और संकर किस्में विकसित करने में आनुवंशिक इंजीनियरिंग और जीनोम एडिटिंग जैसी आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी के साथ पारंपरिक ब्रीडिंग तरीकों का पूरक के तौर पर इस्तेमाल करें।</p>
<p>1990 के दशक की शुरुआत में प्लांट जेनेटिक इंजीनियरिंग के आगमन के साथ भारत ने कई विशेषताओं के साथ जीएम फसलों को विकसित करना शुरू किया। वे मुख्य रूप से कीटों और बीमारियों के प्रतिरोध, पोषण गुणवत्ता और सूखे, लवणता आदि के प्रति सहनशीलता पर केंद्रित थे। 2002 में बीटी जीन वाले और अमेरिकन बॉलवर्म के खिलाफ प्रतिरोधी क्षमता वाले जीएम कपास को जेनेटिक इंजीनियरिंग अनुमोदन समिति की मंजूरी मिली और उसे वाणिज्यिक खेती के लिए जारी किया गया। बीटी कपास संकर किस्म को किसानों ने तेजी से अपनाया, जिससे कपास उत्पादन 2002-03 के लगभग 130 लाख गांठ से बढ़कर 2014-15 में 350 लाख गांठ के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। इस तरह भारत आयातक से वैश्विक स्तर पर कपास का प्रमुख निर्यातक बन गया।</p>
<p>अक्टूबर 2022 में दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर जेनेटिक मैनिपुलेशन इन क्रॉप प्लांट्स द्वारा विकसित जीएम सरसों हाइब्रिड डीएमएच 11 को पर्यावरणीय रिलीज के लिए जेनेटिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति (जीसीएसी) से सशर्त मंजूरी मिली। इस किस्म की उत्पादकता लगभग 25% अधिक है। साथ ही इसके जीएम पेरेंटल लाइन को भी मंजूरी मिली। इसका उद्देश्य देश में खाद्य तेल उत्पादन को बढ़ावा देने और समय के साथ आयात पर निर्भरता कम करने के लिए अधिक उपज वाली संकर किस्में विकसित करना था। (भारत ने वर्ष 2020-21 के दौरान 1.17 लाख करोड़ रुपये, 2021-22 में 1.57 लाख करोड़ रुपये और 2022-23 में 1.38 लाख करोड़ रुपये का खाद्य तेल आयात किया)।</p>
<p>हालांकि, नवंबर 2022 में अदालत में एक रिट याचिका दायर की गई और जीईएसी की तरफ से जरूरी आगे के प्रयोग नहीं किए जा सके। जीएम सरसों पेरेंटल लाइन के साथ-साथ जीएम संकर डीएमएच 11 का वांछित फील्ड परीक्षण भी पूरा नहीं किया जा सका।</p>
<p>इस बीच, 23 जुलाई 2024 को माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में एक खंडित निर्णय दिया है। इसमें एक ओर जीएम सरसों संकर किस्म डीएमएच 11 के फील्ड परीक्षण को पर्याप्त सुरक्षा उपायों और सावधानियों के साथ जारी रखने की अनुमति दी गई है, वहीं दूसरी ओर जीईएसी द्वारा ट्रांसजेनिक सरसों हाइब्रिड डीएमएच-11 के पर्यावरणीय रिलीज को मंजूरी देने के निर्णय को रद्द कर दिया गया है। न्यायालय ने भारत सरकार को अगले चार महीने के भीतर राज्य सरकारों सहित सभी हितधारकों के साथ राष्ट्रीय स्तर पर परामर्श करने के बाद जीएम फसलों पर एक राष्ट्रीय नीति तैयार करने का निर्देश दिया है।</p>
<p>यह राष्ट्रीय हित में है कि हम सभी आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग करें ताकि खेती की भूमि का विस्तार किए बिना बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए अधिक कुशलता से खाद्य उत्पादन किया जा सके। जीएम फसलें इसका आवश्यक और अभिन्न अंग हैं। जीएम प्रौद्योगिकी का उपयोग न केवल फसल उत्पादकता बढ़ाने में, बल्कि भारतीय कृषि को जलवायु परिवर्तन से निपटने में सक्षम बनाने और पर्यावरणीय स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए भी महत्वपूर्ण है।</p>
<p>वैश्विक स्तर पर देखें तो जीएम फसलों में किसानों को कई तरह के फायदे पहुंचाने की क्षमता है। इसमें कीटों, बीमारियों और खरपतवारों के साथ सूखे, लवणता और उच्च तापमान जैसी चरम मौसमी परिस्थितियों से बेहतर सुरक्षा शामिल हैं। इसके परिणामस्वरूप पैदावार में वृद्धि, कीटनाशकों के उपयोग में कमी और किसानों की आय में वृद्धि होती है। यहां यह बताना महत्वपूर्ण है कि शोधकर्ताओं ने ऐसा जीएम चावल विकसित किया है जो ग्रीनहाउस गैस का कम उत्सर्जन करता है। वैसे भी इस समय 29 देशों में 20 करोड़ हेक्टेयर से अधिक जमीन में जीएम फसलों की खेती हो रही है। इसके अतिरिक्त, 43 देशों ने जीएम फसलों का उपभोग करना स्वीकार किया है।</p>
<p>जहां तक जीएम फसलों से सुरक्षा की बात है, तो इन 72 देशों में विशेषज्ञों ने पिछले 25 वर्षों में लगभग 4400 तरह के जोखिम का आकलन किया है। सभी ने निष्कर्ष निकाला है कि जीएम फसलों और उनकी गैर-जीएम किस्मों के जोखिम में कोई अंतर नहीं है। महत्वपूर्ण बात यह है कि दुनिया के कई प्रमुख वैज्ञानिक संस्थान जैसे अमेरिका के खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए), राष्ट्रीय विज्ञान, इंजीनियरिंग और चिकित्सा अकादमी, अमेरिकन एसोसिएशन फॉर द एडवांसमेंट ऑफ साइंस, विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और भारत की राष्ट्रीय कृषि विज्ञान अकादमी (एनएएएस) ने जीएम खाद्य सुरक्षा के मुद्दे का गंभीरता से विश्लेषण किया है। उन्होंने पाया है कि जीएम फसलें जैव सुरक्षा के दृष्टिकोण से सुरक्षित हैं।</p>
<p>जीएम फसलों को अपनाने में देरी के कई परिणाम हो सकते हैं। जैसे कृषि उत्पादकता में कमी, कम उन्नत किस्म की फसलों और पारंपरिक कृषि पद्धतियों पर निर्भरता में वृद्धि। पारंपरिक ब्रीडिंग विधियों से विकसित किस्में जनसंख्या में निरंतर वृद्धि और तेजी से बदलती जलवायु परिस्थितियों के कारण भोजन की बढ़ती मांगों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं होंगी। साथ ही, किसान रासायनिक कीटनाशकों और उर्वरकों पर अधिक निर्भर रह सकते हैं। इससे न केवल इनपुट लागत बढ़ेगी, बल्कि कीटनाशकों के उपयोग से पर्यावरण और किसानों के स्वास्थ्य को भी नुकसान होगा। जीएम फसलें एक विकल्प प्रदान करती हैं। ये अधिक उपज देने वाली, कीट और रोग प्रतिरोधी, पोषण से भरपूर किस्में और हाइब्रिड विकसित करने के लिए चल रहे ब्रीडिंग प्रयासों में पूरक बन सकती हैं। ये कृषि उत्पादन में लचीलापन लाने के साथ स्थिरता भी बढ़ा सकती हैं।</p>
<p>इसके अलावा, जीएम फसलों (और जीनोम एडिटिंग भी) सहित कृषि जैव प्रौद्योगिकी को अपनाने वाले देश अधिक उत्पादन करके वैश्विक बाजारों में अपनी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ा सकते हैं। हाल ही चीन ने अपनी कृषि क्षमता में सुधार के लिए अधिक उपज वाले जीएम सोयाबीन, मक्का, कपास और पपीते को मंजूरी दी है। जीएम प्रौद्योगिकी को अपनाने में देरी से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता कम हो सकती है। ऐसी जीएम फसलें जो रेगुलेटरी पाइपलाइन में एडवांस चरण में हैं, उन्हें समय पर जारी करने से भारतीय किसानों को तत्काल लाभ मिलेगा। अंत में, हमें किसानों और उपभोक्ताओं के फायदे के लिए और कृषि से पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कम करने के लिए अधिक उत्पादन करने में सक्षम, आनुवंशिक रूप से बेहतर जीएम फसलों की खेती की अनुमति देनी चाहिए।</p>
<p><em>(लेखक नेशनल ब्यूरो ऑफ प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेज (आईसीएआर) के पूर्व निदेशक और नेशनल अकादमी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज, नई दिल्ली के पूर्व सचिव हैं। वर्तमान में वे मर्डोक विश्वविद्यालय, पर्थ, ऑस्ट्रेलिया में सहायक प्रोफेसर हैं। ईमेल: kcbansal27@gmail.com, &nbsp;kc.bansal@murdoch.edu.au)</em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ फसलों की जलवायु रोधी क्षमता और सस्टेनेबिलिटी के लिए जीएम टेक्नोलॉजी अहम ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[बजट 2024&amp;#45;25: अब ये देश हुआ बेगाना]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/budget-2024-25-no-country-for-farmers.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 02 Sep 2024 09:19:07 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/budget-2024-25-no-country-for-farmers.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>एक और बजट आया और चला गया, लेकिन बदलावकारी नीति के लिए भारत के किसानों का इंतजार खत्म नहीं हुआ। यह इंतजार वैसे ही है जैसे हर साल वे गर्मियों के बाद मानसून के पहले संकेत का इंतजार करते हैं। मानसून तो अक्सर उनके इंतजार का फल देता है, भले ही वह समय पर ना आए या किसान की उम्मीद के मुताबिक नहीं बरसे। लेकिन बजट तो दूर दिखने वाले उन बादलों की तरह प्रतीत होता है जो नीति की सूखी जमीन पर कभी नहीं बरसते। दशकों की सूझबूझ वाली नीति के साथ हमारे वैज्ञानिकों, प्रशासकों तथा किसानों की कड़ी मेहनत के बल पर हम खाद्य सुरक्षा की छतरी की ठंडी छाया में आराम फरमा रहे हैं, लेकिन कृषि का भविष्य इसकी अतीत की कुछ उपलब्धियों जैसा उज्जवल नहीं जान पड़ता है।&nbsp;</p>
<p>यह लेख इस बजट में विभिन्न मदों में आवंटित राशि और नई योजनाओं की घोषणा के बारे में नहीं है, इसमें यह बताने की कोशिश की गई है कि वास्तव में बजट में क्या चूक हुई और एक आदर्श स्थिति में उसमें क्या किया जा सकता था। मेरे विचार से इस बजट में चार बड़ी चूक हैं।</p>
<p>पहली बात तो यह कि बजट समग्र तौर पर देश को और खास तौर से कृषक समुदाय को यह संकेत देने में विफल रहा कि यह आने वाले दशकों में कृषि को रोजगार सृजन तथा विकास के इंजन के केंद्र के रूप में देखता है। यह एक ऐसा बड़ा विचार (बिग आइडिया) है जो कृषि क्षेत्र को ऊर्जा से भर देता और नीतिगत सुधार की प्रक्रिया को गति देता, जिसका इंतजार लगभग तीन दशकों से है। आप को याद होगा कि वर्ष 1991 में वित्त मंत्री के तौर पर डॉ मनमोहन सिंह ने मशहूर बजट भाषण में आर्थिक नीति के कंपास को रीसेट कर दिया था। वह बजट भी जुलाई में ही आया था। उनके भाषण का समग्र फोकस उद्योग, व्यापार और फाइनेंशियल सेक्टर की नीतियों के उदारीकरण पर था। वह वास्तव में अगले तीन दशकों के लिए नीतिगत सुधारों का एजेंडा था। लेकिन 1991 में भी कृषि के लिए कुछ नहीं कहा गया और यह आज भी उसी स्टेशन पर खड़ा है, क्योंकि नीति की कोई भी ट्रेन उस स्टेशन पर नहीं रुक रही है।</p>
<p>मेरा तर्क है कि कृषि हमेशा बिग आइडिया का हिस्सा रही है। आजादी के बाद पहला बिग आइडिया जमींदारी प्रथा खत्म करने का था। उसके बाद 1950 के दशक में सामुदायिक विकास की पहल हुई, 1960 और 70 के दशक में हरित क्रांति की टेक्नोलॉजी आई। फिर 1980 के दशक में डेयरी कोऑपरेटिव प्रयोग से दुग्ध क्रांति आई। इस तरह देखें तो 1947 से लगभग हर दशक में एक बदलावकारी नीति लागू की गई। लेकिन यह प्रक्रिया अचानक 1991 में बंद हो गई जिसे दोबारा कभी शुरू नहीं किया गया। इस बजट ने भी इस अवसर को खो दिया।</p>
<p>इस बजट की दूसरी बड़ी चूक है कि मौजूदा कृषि संकट के कारण को यह ठीक से पहचानने में नाकाम रही है। इस संकट का प्रमुख कारण निवेश और सब्सिडी के बीच असंतुलन है। कुछ अनुमानों के अनुसार यह अनुपात एक-चार का है। अर्थात कृषि में रिसर्च और डेवलपमेंट, इंफ्रास्ट्रक्चर आदि पर एक रुपया निवेश होता है तो सब्सिडी पर खर्च चार रुपए का होता है। यह असंतुलन खेती के स्तर पर होने वाले खर्च को विकृत करता है। इसकी वजह से दीर्घकालिक निवेश के बजाय अल्पकालिक हस्तक्षेप को वरीयता मिलती है। सब्सिडी और निवेश के इस असंतुलन को ठीक करना राजनीतिक अथवा प्रशासनिक रूप से आसान नहीं है, लेकिन कम से कम भूल सुधार की प्रक्रिया यह संकेत देती कि सरकार इस चुनौती से निपटने की मंशा रखती है।</p>
<p>तीसरी बड़ी चूक मार्केटिंग सुधारों पर चुप्पी है। जून 2020 में अचानक लागू किए गए तीन केंद्रीय कानूनों में एक बिग आइडिया का बीज हो सकता था। लेकिन ना तो उन्हें लागू करने से पहले सार्वजनिक रूप से चर्चा हुई, ना ही अचानक उन्हें वापस लिए जाने से पहले ऐसा किया गया। इसलिए हम सिर्फ अनुमान ही लगा सकते हैं कि क्या हम उन कानूनों में कोई बड़ी चीज खो बैठे। जबरदस्त किसान आंदोलन के चलते उन कानूनों को वापस लिए जाने के बाद लगता है कृषि उपज की मार्केटिंग पर कुछ करने के मामले में सरकार गहरे खोल में समा गई है। कृषि बाजार पुरानी गड़बड़ियों और अक्षमता के साथ काम कर रहे हैं, जिससे किसान अपनी उपज के उचित मूल्य से वंचित रह जाते हैं। दाम भी पारदर्शी तरीके से तय नहीं होते हैं। मार्केटिंग सुधारों का एक लंबा एजेंडा दो दशक से भी अधिक समय से सुस्त पड़ा हुआ है।</p>
<p>जलवायु परिवर्तन को अस्तित्व के लिए खतरे के तौर पर स्वीकार ना करना बजट की चौथी बड़ी चूक है। जलवायु परिवर्तन का संकट जितनी तेजी से बढ़ रहा है उसे देखकर कहा जा सकता है कि अनुमान से भी कम समय में हमें अपनी खेती का तौर-तरीका बदलने पर मजबूर होना पड़ेगा। हीट वेव, भीषण तेज बारिश, बादल फटने जैसी घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। जलवायु विज्ञानियों के अनुसार मानसून के आने और जाने के समय में भी परिवर्तन हुआ है। तेजी से बढ़ते इस खतरे से निपटने के लिए हमें मौसम तथा कीटों से संबंधित चुनौतियों से जूझने वाली फसल किस्मों की जरूरत है। अनुसंधान एवं विकास का बजट इस अहम जरूरत को प्रदर्शित नहीं करता है। इस संकट से निपटने के लिए हमें संसाधनों को एकत्र करने और उन उपायों को गति देने की जरूरत है जिनसे किसानों को कोई समाधान मिल सके।</p>
<p>यह सही है कि किसानों को डायरेक्ट ट्रांसफर की फ्लैगशिप स्कीम जारी है, लेकिन इसमें मिलने वाली रकम इतनी नहीं होती कि किसान जलवायु परिवर्तन से जूझने वाले उपायों को अपना सकें अथवा उत्पादकता बढ़ाने के लिए निवेश कर सकें। देश के स्तर पर एक डेटाबेस बनाने की बात कही गई है, लेकिन केंद्र तथा विपक्ष शासित राज्यों के बीच तनाव भरे वातावरण के मद्देनजर यह देखना होगा कि इस पहल पर कैसे काम होता है। इस तरह के डेटाबेस के बिना नीति निर्माण इनपुट और उपभोक्ता सब्सिडी जैसे बिना धार वाले औजारों पर निर्भर रहेगा।</p>
<p>ऐसा लगता है कि देश के किसानों को एक अच्छे मानसून की तुलना में एक अच्छी नीति के लिए अधिक इंतजार करना पड़ेगा।</p>
<p><em>(लेखक पूर्व आईएएस अधिकारी हैं। लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं)</em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ बजट 2024-25: अब ये देश हुआ बेगाना ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[क्या कृषि को लेकर बजट से हमारी उम्मीदें बहुत ज्यादा थीं?]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/did-we-expect-too-much-for-agriculture-in-the-budget.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 01 Sep 2024 09:28:40 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/did-we-expect-too-much-for-agriculture-in-the-budget.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>सबसे पहले एक कैवियटः कृषि इतना विशाल और जटिल सेक्टर है कि इसे सिर्फ बजट घोषणाओं और वित्तीय प्रावधानों के नजरिए से नहीं देखा जा सकता। फिलहाल मैं एक प्राकृतिक घटना के तौर पर कृषि पर मानसून के प्रभाव को दरकिनार करता हूं। आइए, हम सरकार की नीतियों और विभिन्न योजनाओं के अमल पर फोकस करें।</p>
<p>सरकार की कई नीतियां कृषि को प्रभावित करती हैं। इनमें प्रमुख इन बातों से जुड़ी हैं- (i) पानीः नहर सिंचाई व्यवस्था से पानी की समय पर सप्लाई और मेंटनेंस, भूजल का दोहन, कृषि में इस्तेमाल होने वाले पानी के पंप की बिजली की उपलब्धता और उसका शुल्क (मुफ्त, सब्सिडी और डिफरेंशियल), डीजल की लागत (ट्रैक्टर, बिना बिजली वाले इलाकों में पंप) (ii) उर्वरकः उपलब्धता, कीमत (सब्सिडी की व्यवस्था), ऑर्गेनिक खाद की उपलब्धता और इसकी कीमत तथा वितरण से संबंधित नीति (iii) कीमतः न्यूनतम समर्थन मूल्य और उत्पादन के विभिन्न क्षेत्रों में खरीद की क्षमता, बिना एमएसपी वाली फसलों में कीमत को लेकर हस्तक्षेप की नीति (iv) मूल्य नियंत्रण के उपायः स्टॉक लिमिट, निर्यात पर अंकुश, शुल्क मुक्त या कम शुल्क पर आयात (v) कर्जः पर्याप्तता, उपलब्धता और उसकी लागत (vi) जोखिम कम करनाः बीमा उत्पादों की प्रभावशीलता और कवरेज। यह सूची और लंबी हो सकती है। ऐसे अनेक नीतिगत फैसले हैं जो किसान की आमदनी और कृषि को बजट से अधिक प्रभावित करते हैं। इस कैवियट के साथ कृषि और किसान के नजरिए से मैं बजट पर टिप्पणी करता हूं।</p>
<p>वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने बजट भाषण की शुरुआत में ही कृषि के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने जो नौ प्राथमिकताएं गिनाईं उनमें कृषि (उत्पादकता और रेजिलियंस) सर्वोपरि थी। मुझे खुशी होती अगर उनके भाषण में सस्टेनेबिलिटी और किसान की संपन्नता, ये दो शब्द भी होते। लेकिन अफसोस कि यह दोनों शब्द नहीं थे।</p>
<p>अब मैं प्रमुख घोषणाओं का विश्लेषण करता हूंः<br />1.कृषि अनुसंधान की व्यापक समीक्षा और चुनौती पूर्ण मोड में एक फंड के गठन की घोषणा की गई है। निजी संस्थान भी इस फंड का इस्तेमाल कर सकेंगे। यह मांग लंबे समय से की जा रही थी। अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) का आधार बढ़ाना निहायत ही अर्थपूर्ण है। अनेक नीति विशेषज्ञ कृषि में आरएंडडी पर खर्च बढ़ाने और आईसीएआर के अलावा अन्य संसाधनों को अनुमति देने का तर्क देते आए हैं। तत्काल इसकी आलोचना यह कह कर की जा सकती है कि कॉर्पोरेट रिसर्च का एजेंडा तय करेंगे। इस तर्क को एक मिनट के लिए किनारे रखिए। डिजिटल हस्तक्षेप, बेहतर मृदा प्रबंधन (उर्वरता और नमी) के लिए टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल, खाद्य के साथ पोषण का लिंकेज, मौसम का माइक्रो स्तर पर अनुमान, बायोटेक्नोलॉजी हस्तक्षेप, वाटरशेड मैनेजमेंट जैसे अन्य कदमों के बारे में आपका क्या ख्याल है? एकमात्र सावधानी रिसर्च का एजेंडा तय करने में की जानी चाहिए। मेरी प्राथमिकता किसान की आमदनी में निरंतर बढ़ोतरी होनी चाहिए। इस विचार को मजबूती से रखने के साथ मैं यह भी कहना चाहूंगा कि कृषि में अनुसंधान एवं विकास के लिए बजट में जो आवंटन हुआ है, वह बहुत ही निराशाजनक है। आगे टेबल में इसके आंकड़े देखे जा सकते हैं।</p>
<p>2. तिलहन और दलहन के लिए मिशन एक और महत्वपूर्ण पहल है। भारत तिलहन और दलहन की उत्पादकता बढ़ाने के लिए संघर्ष करता रहा है। इन दोनों के लिए पहले भी मिशन (ISOPOM- आइसोपोम) शुरू किए गए हैं। आइसोपोम में मामूली बदलाव के साथ 2010 में शुरू की गई दाल ग्राम योजना का अच्छा असर हुआ। वर्ष 2009 में दालों का उत्पादन 145 लाख टन पर स्थिर था, जो 2022 में 275 लाख टन पर पहुंच गया। इस दौरान दालों की बुवाई का क्षेत्रफल भी 230 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 310 लाख हेक्टेयर हो गया, और प्रति हेक्टेयर उत्पादकता 630 किलोग्राम से बढ़कर 892 किलोग्राम हो गई। हालांकि दालों की बुवाई वाला सिर्फ 23 प्रतिशत क्षेत्र ऐसा है जहां सिंचाई की सुविधा है। हमारी प्रोटीन की जरूरत को देखते हुए भारत को दालों का उत्पादन बढ़ाने की आवश्यकता है। तिलहन भी खाद्य नीति विशेषज्ञों की चिंता बढ़ाएगा। इसका रकबा समान अवधि में 260 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 290 लाख हेक्टेयर हो गया, लेकिन इस दौरान उत्पादकता 1100 किलोग्राम से बढ़कर सिर्फ 1292 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हुई। उत्पादन में कुछ वृद्धि हुई लेकिन भारत अब भी अपनी जरूरत का लगभग 60% तेल आयात करता है। वर्ष 2022-23 में भारत में तेलों की मांग 290 लाख टन हो गई जिसमें से 160 लाख टन का आयात किया गया। यहां चुनौती अन्य फसलों के क्षेत्र को बदले बिना (तंबाकू को छोड़कर) उत्पादन बढ़ाने की है। यहां गौर करने वाली बात है कि दलहन और तिलहन में कोई बड़ा आरएंडडी नहीं हुआ है। क्या आरएंडडी पर फोकस इस अंतर को कम करेगा?</p>
<p>3. श्रिंप उत्पादन और निर्यातः यह एमपीडा (MPEDA) और तटीय राज्यों, खासकर आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के मत्स्य पालन विभागों के सफल प्रयोग का परिणाम है। यह निर्यातोन्मुख उत्पादन का बेहतरीन उदाहरण है जिसमें श्रिंप किसानों को अच्छी आमदनी हुई और देश की निर्यात आय बढ़ी। यह अच्छी तरह से सोची-समझी और बारीक मॉनिटरिंग वाली उत्पादन तथा प्रोसेसिंग चेन है। इसमें उत्पादन जल्दी बढ़ाने के चक्कर में ऐसा कुछ नहीं किया जाना चाहिए जिससे प्रोटोकॉल कमजोर पड़ जाए। तटीय आंध्र प्रदेश में 1990 के दशक के आखिरी वर्षों में एक्वाकल्चर के क्षेत्र में जो अनुभव हुआ, उसे याद रखने की जरूरत है।</p>
<p>4. शहर के इर्द-गिर्द सब्जी उत्पादन के क्लस्टरः खाद्य महंगाई, खासकर सब्जियों की महंगाई के कारण संभवतः यह स्कीम लाई गई है। इससे पहले भी इसी तरह के क्लस्टर विकसित करने की योजना के परिणाम उत्साहजनक नहीं रहे। शहरी खपत केंद्रों के आसपास उत्पादन के क्लस्टर रखने से किसानों को अच्छी कीमत मिल सकती है और वैल्यू चेन भी छोटी होगी। एफपीओ के किसान बाजार के जरिए शहरी बाजारों तक पहुंच और शहरी केंद्रों को निर्धारित दिनों में किसान बाजार के लिए खोलना इस पहल का एक हिस्सा हो सकता है।</p>
<p>5. डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चरः डिजिटल कृषि और एग्री-स्टैक के अनेक वर्जन ऐसे हैं जिनके फायदे से किसान अभी तक दूर हैं। इसमें किसानों के इस्तेमाल का नजरिया अपनाया जाना चाहिए। वह कौन सी सर्विस का इस्तेमाल करता है और उसे कितनी आसानी से उस तक पहुंचाया जा सकता है? आसान कर्ज, बेहतर जोखिम कवर, बाजार में बेहतर कीमत, मौसम की समय पर और उपयोगी जानकारी, यह सब डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर की बुनियादी चीजें हैं। किसी घटना के बाद विश्लेषण के लिए एग्री-स्टैक बनाना अनुसंधानकर्ताओं के लिए अच्छा है, लेकिन किसानों को सर्विसेज की जरूरत सही समय पर पड़ती है। इस तरीके से प्राथमिकता निर्धारित करना आवश्यक है।</p>
<p>6. प्राकृतिक खेतीः बजट में एक करोड़ और किसानों को प्राकृतिक खेती से जोड़ने का प्रस्ताव है। इसके लिए सर्टिफिकेशन और ब्रांडिंग की भी बात कही गई है। यह कहां होगा? आसान जवाब वर्षा सिंचित इलाकों का हो सकता है। अगर ऐसा है तो इसके लिए किस तरह के इंसेंटिव की योजना है, अभी यह स्पष्ट नहीं है। हो सकता है कि कृषि मंत्रालय बाद में इसकी विस्तृत जानकारी दे। सर्टिफिकेशन और ब्रांडिंग दोनों में समस्याएं हैं। सर्टिफिकेशन नौकरशाही की वजह से एक दुश्चक्र बन सकता है। ब्रांडिंग में भी अनेक चुनौतियां आएंगी। क्या प्राकृतिक खेती ऑर्गेनिक खेती से अलग होगी? दोनों के बीच अंतर क्या होगा? इन विषयों पर गंभीर चिंतन की जरूरत है। प्राकृतिक खेती में मुख्य फोकस लागत कम करने और जैव विविधता बढ़ाने पर होनी चाहिए, ताकि किसानों को अधिक मूल्य मिल सके। इससे पोषण का स्तर भी बेहतर होगा। मैं उम्मीद करुंगा कि इसकी अनदेखी नहीं की जाएगी। जिन किसानों ने रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल नहीं करने का फैसला किया, वे इंसेंटिव से वंचित हैं जबकि इनका इस्तेमाल करने वाले किसान मुफ्त बिजली और रासायनिक उर्वरकों पर सब्सिडी जैसी सुविधाएं ले रहे हैं। अगर प्राकृतिक खेती को सफल बनाना है तो इस नीति को उनके पक्ष में बदलने की जरूरत है जो प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करते हैं।</p>
<p>7. राष्ट्रीय सहकारिता नीतिः मेरे विचार से प्रस्तावित राष्ट्रीय सहकारिता नीति पर एक रिपोर्ट पहले से सरकार के पास है। सरकार को अति-केंद्रीकरण के किसी भी प्रयास को विफल करना चाहिए। लंबे विचार-विमर्श के बाद कंपनी कानून के तहत किसान उत्पादक कंपनियों को प्रोत्साहित किया गया। कोऑपरेटिव सेक्टर के लिए संविधान संशोधन का उद्देश्य स्वैच्छिक गठन को बढ़ावा देना, लोकतांत्रिक नियंत्रण, स्वायत्त कार्यकलाप और पेशेवर प्रबंधन को बढ़ावा देना था। नीति में लोगों को कोऑपरेटिव तथा किसी अन्य संगठन (एफपीओ) में से एक को चुनने की अनुमति होनी चाहिए और इसमें सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। ज्यादातर राज्य सरकारों में कोऑपरेटिव को नियंत्रित (यहां तक कि हस्तक्षेप करने) करने की प्रवृत्ति होती है। इससे उस कोऑपरेटिव के बिजनेस करने की क्षमता और उनका स्वतंत्र चरित्र प्रभावित होता है। एफपीओ को इसका एक जवाब माना गया। राज्य अथवा केंद्र के स्तर पर पुराने मॉडल में लौटना प्रतिकूल हो सकता है।</p>
<p>कृषि और संबंधित क्षेत्र के लिए बजट में 1.52 लाख करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है (बजट भाषण के मुताबिक)। इसमें संभवतः कृषि एवं किसान कल्याण, कृषि अनुसंधान, फिशरीज, डेयरी और पशुपालन, फूड प्रोसेसिंग तथा सहकारिता शामिल हैं।</p>
<div dir="ltr" align="left" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; margin-left: 0pt;">
<table style="border: medium; border-collapse: collapse; width: 524px;"><colgroup><col width="219" /><col width="143" /><col width="156" /></colgroup>
<tbody>
<tr style="height: 42.75pt;">
<td style="margin: 0px; border-width: 0.800002pt 0.800002pt 1.2pt; border-style: solid; border-color: #b4c6e7 #b4c6e7 #8eaadb; vertical-align: top; padding: 0pt 5pt; overflow: hidden; width: 196.1px;">
<h3 dir="ltr" style="line-height: 1.8; margin: 0pt 7pt;"><strong><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">बजट</span></strong></h3>
</td>
<td style="margin: 0px; border-width: 0.800002pt 0.800002pt 1.2pt; border-style: solid; border-color: #b4c6e7 #b4c6e7 #8eaadb; vertical-align: top; padding: 0pt 5pt; overflow: hidden; width: 124.283px;">
<h3 dir="ltr" style="line-height: 1.8; margin: 0pt 7pt;"><strong><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">संशोधित अनुमान</span></strong></h3>
<h3 dir="ltr" style="line-height: 1.8; margin: 0pt 7pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; font-weight: 400; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">&nbsp;23-24 (करोड़ रुपये)&nbsp;</span></h3>
</td>
<td style="margin: 0px; border-width: 0.800002pt 0.800002pt 1.2pt; border-style: solid; border-color: #b4c6e7 #b4c6e7 #8eaadb; vertical-align: top; padding: 0pt 5pt; overflow: hidden; width: 159.817px;">
<h3 dir="ltr" style="line-height: 1.8; margin: 0pt 7pt;"><strong><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">बजट अनुमान&nbsp;&nbsp;&nbsp;</span></strong></h3>
<h3 dir="ltr" style="line-height: 1.8; margin: 0pt 7pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; font-weight: 400; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;24-25 (करोड़ रुपये)&nbsp;</span></h3>
</td>
</tr>
<tr style="height: 15.75pt;">
<td style="margin: 0px; border-width: 1.2pt 0.800002pt 0.800002pt; border-style: solid; border-color: #8eaadb #b4c6e7 #b4c6e7; vertical-align: top; padding: 0pt 5pt; overflow: hidden; width: 196.1px;">
<p dir="ltr" style="line-height: 1.2; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; color: #000000; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय</span></p>
</td>
<td style="margin: 0px; border-width: 1.2pt 0.800002pt 0.800002pt; border-style: solid; border-color: #8eaadb #b4c6e7 #b4c6e7; vertical-align: top; padding: 0pt 5pt; overflow: hidden; width: 124.283px;">
<h3 dir="ltr" style="line-height: 1.8; margin: 0pt 7pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; font-weight: 400; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; 1,15,531</span></h3>
</td>
<td style="margin: 0px; border-width: 1.2pt 0.800002pt 0.800002pt; border-style: solid; border-color: #8eaadb #b4c6e7 #b4c6e7; vertical-align: top; padding: 0pt 5pt; overflow: hidden; width: 159.817px;">
<h3 dir="ltr" style="line-height: 1.8; margin: 0pt 7pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; font-weight: 400; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; 1,22,528</span></h3>
</td>
</tr>
<tr style="height: 15.75pt;">
<td style="margin: 0px; vertical-align: top; padding: 0pt 5pt; overflow: hidden; border: 0.800002pt solid #b4c6e7; width: 196.1px;">
<h3 dir="ltr" style="line-height: 1.8; margin: 0pt 7pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; font-weight: 400; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग</span></h3>
</td>
<td style="margin: 0px; vertical-align: top; padding: 0pt 5pt; overflow: hidden; border: 0.800002pt solid #b4c6e7; width: 124.283px;">
<h3 dir="ltr" style="line-height: 1.8; margin: 0pt 7pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; font-weight: 400; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; 9,876</span></h3>
</td>
<td style="margin: 0px; vertical-align: top; padding: 0pt 5pt; overflow: hidden; border: 0.800002pt solid #b4c6e7; width: 159.817px;">
<h3 dir="ltr" style="line-height: 1.8; margin: 0pt 7pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; font-weight: 400; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; 9,941</span></h3>
</td>
</tr>
<tr style="height: 15.75pt;">
<td style="margin: 0px; vertical-align: top; padding: 0pt 5pt; overflow: hidden; border: 0.800002pt solid #b4c6e7; width: 196.1px;">
<p dir="ltr" style="line-height: 1.2; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; color: #000000; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">पशुपालन और डेयरी विभाग</span></p>
</td>
<td style="margin: 0px; vertical-align: top; padding: 0pt 5pt; overflow: hidden; border: 0.800002pt solid #b4c6e7; width: 124.283px;">
<h3 dir="ltr" style="line-height: 1.8; margin: 0pt 7pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; font-weight: 400; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; 3,913</span></h3>
</td>
<td style="margin: 0px; vertical-align: top; padding: 0pt 5pt; overflow: hidden; border: 0.800002pt solid #b4c6e7; width: 159.817px;">
<h3 dir="ltr" style="line-height: 1.8; margin: 0pt 7pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; font-weight: 400; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; 4,521</span></h3>
</td>
</tr>
<tr style="height: 15.75pt;">
<td style="margin: 0px; vertical-align: top; padding: 0pt 5pt; overflow: hidden; border: 0.800002pt solid #b4c6e7; width: 196.1px;">
<h3 dir="ltr" style="line-height: 1.8; margin: 0pt 7pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; font-weight: 400; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">फिशरीज</span></h3>
</td>
<td style="margin: 0px; vertical-align: top; padding: 0pt 5pt; overflow: hidden; border: 0.800002pt solid #b4c6e7; width: 124.283px;">
<h3 dir="ltr" style="line-height: 1.8; margin: 0pt 7pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; font-weight: 400; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; 1,701</span></h3>
</td>
<td style="margin: 0px; vertical-align: top; padding: 0pt 5pt; overflow: hidden; border: 0.800002pt solid #b4c6e7; width: 159.817px;">
<h3 dir="ltr" style="line-height: 1.8; margin: 0pt 7pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; font-weight: 400; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; 2,616</span></h3>
</td>
</tr>
<tr style="height: 15.75pt;">
<td style="margin: 0px; vertical-align: top; padding: 0pt 5pt; overflow: hidden; border: 0.800002pt solid #b4c6e7; width: 196.1px;">
<h3 dir="ltr" style="line-height: 1.8; margin: 0pt 7pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; font-weight: 400; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">सहकारिता</span></h3>
</td>
<td style="margin: 0px; vertical-align: top; padding: 0pt 5pt; overflow: hidden; border: 0.800002pt solid #b4c6e7; width: 124.283px;">
<h3 dir="ltr" style="line-height: 1.8; margin: 0pt 7pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; font-weight: 400; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; 747</span></h3>
</td>
<td style="margin: 0px; vertical-align: top; padding: 0pt 5pt; overflow: hidden; border: 0.800002pt solid #b4c6e7; width: 159.817px;">
<h3 dir="ltr" style="line-height: 1.8; margin: 0pt 7pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; font-weight: 400; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; 1,183</span></h3>
</td>
</tr>
<tr style="height: 15.75pt;">
<td style="margin: 0px; vertical-align: top; padding: 0pt 5pt; overflow: hidden; border: 0.800002pt solid #b4c6e7; width: 196.1px;">
<h3 dir="ltr" style="line-height: 1.8; margin: 0pt 7pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; font-weight: 400; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">फूड प्रोसेसिंग</span></h3>
</td>
<td style="margin: 0px; vertical-align: top; padding: 0pt 5pt; overflow: hidden; border: 0.800002pt solid #b4c6e7; width: 124.283px;">
<h3 dir="ltr" style="line-height: 1.8; margin: 0pt 7pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; font-weight: 400; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; 2,911</span></h3>
</td>
<td style="margin: 0px; vertical-align: top; padding: 0pt 5pt; overflow: hidden; border: 0.800002pt solid #b4c6e7; width: 159.817px;">
<h3 dir="ltr" style="line-height: 1.8; margin: 0pt 7pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; font-weight: 400; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; 3,290</span></h3>
</td>
</tr>
<tr style="height: 15.75pt;">
<td style="margin: 0px; vertical-align: top; padding: 0pt 5pt; overflow: hidden; border: 0.800002pt solid #b4c6e7; width: 196.1px;">
<h3 dir="ltr" style="line-height: 1.8; margin: 0pt 7pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; font-weight: 400; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">पीएमकेएसवाई (जल शक्ति)</span></h3>
</td>
<td style="margin: 0px; vertical-align: top; padding: 0pt 5pt; overflow: hidden; border: 0.800002pt solid #b4c6e7; width: 124.283px;">
<h3 dir="ltr" style="line-height: 1.8; margin: 0pt 7pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; font-weight: 400; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; 7,031</span></h3>
</td>
<td style="margin: 0px; vertical-align: top; padding: 0pt 5pt; overflow: hidden; border: 0.800002pt solid #b4c6e7; width: 159.817px;">
<h3 dir="ltr" style="line-height: 1.8; margin: 0pt 7pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; font-weight: 400; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; 9,339</span></h3>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
</div>
<p>कृषि मंत्रालय के बजट में पीएम आशा के आवंटन में काफी वृद्धि की गई है। इस स्कीम के लिए 6,437 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। यह दालों, तिलहन, आलू और प्याज के लिए एक मजबूत मूल्य समर्थन व्यवस्था का संकेत देता है। दरअसल कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के बजट में वृद्धि का यह एक प्रमुख कारण है। इसके अलावा उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के तहत मूल्य स्थिरीकरण फंड (प्राइस स्टेबलाइजेशन फंड- पीएसएफ) के लिए 10,000 करोड़ रुपए का प्रावधान है। दोनों को मिलाकर देखा जाए तो किसानों को दाल तथा अन्य फसलों के लिए एमएसपी सुनिश्चित हो सकता है, तो दूसरी तरफ पीएसएफ की मदद से उपभोक्ताओं को महंगाई से बचाया जा सकता है। मुश्किल तब होगी जब दोनों योजनाएं बिना सामंजस्य के लागू की जाएं।</p>
<p>कुल मिलाकर यह बजट उत्पादकता और रेजिलियंस के बारे में है। इसमें किसान कल्याण और सस्टेनेबिलिटी को स्थान नहीं मिला है। कुछ विचार नए और स्वागतयोग्य हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि उनके लिए उचित आवंटन किया गया हो। मौजूदा और नई योजनाओं का डिजाइन तथा उन्हें लागू किया जाना ही उनकी सफलता या विफलता तय करेगा। राज्यों के स्तर पर गवर्नेंस इसमें गेमचेंजर का काम कर सकता है।</p>
<p>समय आ गया है कि इस सेक्टर के लिए बजट से बाहर एक व्यापक रणनीति बनाई जाए। क्या बजट भाषण की दिशा यह संकेत देती है कि कृषि की रणनीति दोबारा बनाने के लिए राज्यों तथा अन्य संस्थाओं के साथ विचार-विमर्श की खुशनुमा शुरुआत होगी? उम्मीद करता हूं कि ऐसा हो!</p>
<p><em>(लेखक खाद्य मंत्रालय और कृषि मंत्रालय के पूर्व सचिव तथा एनडीडीबी के पूर्व चेयरमैन हैं)</em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ क्या कृषि को लेकर बजट से हमारी उम्मीदें बहुत ज्यादा थीं? ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[राजनीतिक संकट से खतरे में बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/political-turmoil-in-bangladesh-threatens-its-economic-gains.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 26 Aug 2024 12:17:13 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/political-turmoil-in-bangladesh-threatens-its-economic-gains.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>बांग्लादेश में महीनों तक चली हिंसा के बाद शेख हसीना की 15 साल पुरानी सरकार जाने के साथ 53 वर्ष पुराना यह देश अपने अब तक के सबसे बुरे राजनीतिक संकट का सामना कर रहा है। कानून-व्यवस्था भंग होने के चलते देश की इकोनॉमी पर असर पड़ा है। वर्ष 2009 में शेख हसीना के प्रधानमंत्री बनने के बाद बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था अच्छा प्रदर्शन कर रही थी। इन वर्षों में बांग्लादेश का सकल घरेलू उत्पाद हर साल औसतन 6.5% की दर से बढ़ रहा था। उससे पहले के एक दशक में सालाना औसत विकास दर 5% थी। इस घटनाक्रम के चलते देश 2026 में अल्प विकसित देश का दर्जा खोने के करीब पहुंच गया है।</p>
<p>आईएमएफ का आकलन बताता है कि इस दशक के अंत तक बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति आय 4000 डॉलर से अधिक हो जाती। यह इस मामले में बांग्लादेश भारत से भी आगे निकल जाता। लेकिन राजनीतिक संकट से अर्थव्यवस्था को जो नुकसान हो रहा है, उससे शेख हसीना के कार्यकाल में हासिल की गई बढ़त बहुत जल्दी समाप्त हो जाएगी। हालांकि इन सब के बीच आशा की कुछ किरणें भी हैं। सरकार के नवनियुक्त सलाहकारों ने ढाका तथा देश के अन्य हिस्से में हालात जल्दी सामान्य करने की तत्परता दिखाई है।</p>
<p>हाल के वर्षों में बांग्लादेश की आर्थिक मजबूती से भारत को भी अनेक फायदे हुए हैं। इस पड़ोसी देश के साथ भारत का व्यापार बढ़ा है। भारत के निवेशक भी बांग्लादेश में पैसा लगाने में पीछे नहीं हैं। भारतीय निवेशकों ने वहां कई सेक्टर में निवेश किया है और अन्य कई क्षेत्रों में वे साझा उपक्रम स्थापित करने का मौका तलाश रहे हैं। दरअसल बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था में भारत का हमेशा बड़ा हिस्सा रहा है और हाल के वर्षों में इसमें काफी वृद्धि भी हुई है।</p>
<p>पिछले दशक के आखिरी वर्षों से भारत और बांग्लादेश के बीच व्यापार तेजी से बढ़ा है। वर्ष 2015-16 से 2021-22 के दौरान द्विपक्षीय व्यापार में लगभग 2.7 गुना की वृद्धि हुई है। वर्ष 2021-22 में भारत का निर्यात 16 अरब डॉलर से अधिक पहुंच गया जो 2015-16 में सिर्फ 6 अरब डॉलर था। इस दौरान बांग्लादेश को निर्यात और वहां से आयात, दोनों में लगभग एक समान वृद्धि हुई। हालांकि यहां यह ध्यान रखना जरूरी है कि आयात में इतनी वृद्धि कम आधार के कारण हुई।</p>
<p>बांग्लादेश से कम आयात दोनों देशों के बीच विवाद का विषय रहा है। बांग्लादेश की हमेशा यह शिकायत रही है कि भारत उससे अधिक सामान नहीं खरीदता है। बांग्लादेशी उत्पादों को ड्यूटी फ्री और कोटा फ्री एक्सेस देने के बावजूद यह स्थिति है। डब्लूटीओ समझौते में अल्प विकसित देशों को बाजार पहुंच बढ़ाने की शर्त के तहत भारत ने यह सुविधा दी है। वर्ष 2019-20 से पहले बांग्लादेश के शीर्ष निर्यात ठिकानों में भारत का स्थान नहीं था। तब बांग्लादेश भारत को एक अरब डॉलर से भी कम का निर्यात करता था। वर्ष 2018-19 में इस सीमा को पार करने के बाद 2022-23 में बांग्लादेश से भारत को निर्यात दो अरब डॉलर पहुंच गया।</p>
<p>भारत के निर्यात ठिकानों में बांग्लादेश की स्थिति बेहतर हुई है। वर्ष 2018-19 में भारत के लिए बांग्लादेश सातवां सबसे बड़ा निर्यात बाजार था जो 2021-22 में चौथा सबसे बड़ा बाजार बन गया। बांग्लादेश को होने वाला निर्यात चीन को भारत से होने वाले निर्यात की तुलना में थोड़ा ही कम है। भारत के लिए यह महत्वपूर्ण उपलब्धि थी क्योंकि यहां के निर्यातक रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण पड़ोसी देश के बाजार में पहुंचने में सफल रहे।</p>
<p>बांग्लादेश में भारत की मौजूदगी बढ़ाने में दो कमोडिटी ग्रुप का विशेष योगदान रहा है। पहला कृषि उत्पाद और दूसरा कॉटन तथा कॉटन यार्न। बांग्लादेश में रेडीमेड गारमेंट इंडस्ट्री हाल के वर्षों में काफी तेजी से फली-फूली है। उसके लिए इंटरमीडिएट गुड्स भारत उपलब्ध कराता रहा है। वर्ष 2021-22 में बांग्लादेश के कुल निर्यात में रेडीमेड गारमेंट का हिस्सा 80% से अधिक था। इस तरह वह दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा रेडीमेड गारमेंट निर्यातक बन गया। भारत के कॉटन यार्न के लिए बांग्लादेश हमेशा महत्वपूर्ण बाजार रहा है। वर्ष 2021-22 में भारत का लगभग 42% कॉटन यार्न और 58% कच्ची कपास का निर्यात बांग्लादेश को हुआ।</p>
<p>दक्षिण एशियाई देशों में आर्थिक जुड़ाव के पक्षधर हमेशा यह तर्क देते आए हैं कि इस क्षेत्र में वैल्यू चेन की के विकास से पूरे क्षेत्र में आर्थिक इंटीग्रेशन मजबूत होगा। इससे इस क्षेत्र को अपने दम पर आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी। भारत और बांग्लादेश में टेक्सटाइल तथा गारमेंट इंडस्ट्री की वैल्यू चेन स्थापित होने से भविष्य में दूसरी इंडस्ट्री में भी इस तरह की संभावना बनने लगी। इसके साथ दक्षिण एशियाई क्षेत्र के दूसरे देशों में भी इस तरह की वैल्यू चेन बनने के आसार नजर आने लगे।</p>
<p>बांग्लादेश को भारत के निर्यात में कृषि कमोडिटी का बड़ा योगदान है। वर्ष 2021-22 में गेहूं का निर्यात लगभग तीन गुना बढ़ गया जबकि चीनी निर्यात में करीब 10 गुना की वृद्धि हुई। भारत से चावल का निर्यात भी लगभग दो गुना हो गया। कच्ची कपास को मिला लें तो कुल कृषि निर्यात भारत से बांग्लादेश को होने वाले निर्यात का 35% था। भारत भी इस दौरान कृषि निर्यात हब के रूप में अपने आप को स्थापित करने का प्रयास कर रहा था।</p>
<p>वर्ष 2021-22 में भारत और बांग्लादेश के बीच द्विपक्षीय व्यापार रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। इससे दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग के महत्व का भी पता चला। लेकिन उसके बाद के दो वर्षों में आपूर्ति की दिक्कतों के चलते द्विपक्षीय व्यापार में 30% की कमी आ गई। भारत में अनाज उत्पादन कम होने की आशंका तथा खाद्य महंगाई बढ़ने के कारण अनाज निर्यात पर पाबंदी लगा दी गई। दूसरी तरफ बांग्लादेश में विदेशी मुद्रा संकट के चलते आयात कम होने लगा। गारमेंट इंडस्ट्री के लिए महत्वपूर्ण इंटरमीडिएट वस्तुओं के आयात में भी कमी आई। हालांकि दोनों देशों के बीच व्यापार में अस्थायी तौर पर ही गिरावट आई है। आने वाले वर्षों में इसमें अनेक वृद्धि की संभावना है।</p>
<p>इस बात में संदेह नहीं कि दोनों पड़ोसी देशों के बीच आर्थिक संबंध ऐसे बिंदु पर पहुंच गए हैं जहां से लंबी छलांग लगाई जा सकती है। यह इस बात से भी पता चलता है कि भारत का निजी क्षेत्र अपने इस पड़ोसी देश की अर्थव्यवस्था के अनेक सेक्टर में निवेश की रुचि रखता है। इसलिए यह उम्मीद की जाती है कि बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बावजूद दोनों देशों की सरकारें आपसी सहयोग की भावना को आगे बढ़ाएंगी। यही नागरिकों के बेहतर भविष्य के लिए जरूरी है।</p>
<p><strong>(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के रिटायर्ड प्रोफेसर और काउंसिल फॉर सोशल डेवलपमेंट में विशिष्ट प्रोफेसर हैं)</strong></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ राजनीतिक संकट से खतरे में बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कृषि को भारतीय अर्थव्यवस्था का ग्रोथ इंजिन मानने का तर्क देता इकोनॉमिक सर्वे]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/economic-survey-argues-for-considering-agriculture-as-the-growth-engine-of-the-indian-economy.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 22 Jul 2024 21:07:32 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/economic-survey-argues-for-considering-agriculture-as-the-growth-engine-of-the-indian-economy.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>आर्थिक उदारीकरण की स्थापित थ्योरी को <strong>आर्थिक सर्वेक्षण 2023-24</strong> में उलटने की कोशिश के साथ एक ईमानदार स्वीकारोक्ति भी कहा जा सकता है। सर्वे में माना गया है कि कृषि भारत का ग्रोथ इंजिन बनने की क्षमता रखता है बशर्ते कि कुछ जरूरी नीतिगत बदलाव किये जाएं। इसके साथ ही इसमें यह बात भी स्वीकार की गई है कि मार्केट इकोनॉमी की जिस थ्योरी में इंडस्ट्रियल ग्रोथ के जरिये लोगों को कृषि से निकालकर उद्योगों और सर्विस सेक्टर में ले जाने का तर्क दिया जाता है वह मौजूदा परिदृष्य में संभव नहीं है। इसके उलट भारत के पास दुनिया को ग्रोथ का एक नया मॉडल देने का मौका है जिसमें कृषि की ग्रोथ से देश को विकसित देशों की श्रेणी में खड़ा किया जा सके। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा 22 जुलाई को संसद के दोनों सदनों रखे गये 2023-24 के इकोनॉमिक सर्वे में यह बातें कही गई हैं।</p>
<p><strong>अब देश में 89.4 फीसदी किसान&nbsp;</strong></p>
<p>सर्वे में दिये गये आंकड़े के मुताबिक अब देश में 89.4 फीसदी किसान दो हेक्टेयर से कम जोत वाले हैं। यानी लघु और सीमांत किसानों की संख्या अब करीब 90 फीसदी हो गयी है। एक महत्वपूर्ण बात कही गयी है कि जिस तरह चीन में कृषि की तरक्की से उत्पादों और सेवाओं की मांग बढ़ने से पूरी इकोनॉमी को फायदा हुआ था, वह मौका हम भी हासिल कर सकते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 2016 में छह साल में किसानों की आय को दोगुना करने की जो घोषणा की गई थी, लगता है उसे चीन के मॉडल से लिया गया था। वहां 1978 से 1984 के दौरान छह साल में किसानों की वास्तविक आय दो गुना हुई थी। छोटे किसानों से आने वाली उत्पादों की मांग के चलते ही वहां औद्योगिक क्रांति संभव हुई थी।</p>
<p>आर्थिक सर्वे में रोजगार के बारे में बहुत लंबी चर्चा की गई है और साथ ही बदलते मैन्युफैक्चरिंग, टेक्नोलॉजी और जियो पॉलिटिकल परिदृष्य के चलते मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर में चुनौतियों बढ़ने की बात कही गयी है। कहा गया है कि अधिकांश नौकरियां निजी बिजनेस सेक्टर से आएंगी। लेकिन निजी क्षेत्र का निवेश उस तेजी से नहीं बढ़ रहा है जिस तेजी से बढ़ना चाहिए। निजी क्षेत्र को रोजगार सृजन के बारे में अधिक सक्रियता दिखानी होगी।</p>
<p><strong>कृषि पर दारोमदार</strong></p>
<p>आर्थिक सर्वेक्षण कृषि क्षेत्र पर बहुत भरोसा करता दिखता है। इसमें कहा गया है कि यह परिस्थिति हमें पारंपरिक ज्ञान की ओर जाने के लिए कहती है। कृषि क्षेत्र इसका रास्ता दिखा सकता है। अपनी जड़ों की ओर लौटकर हम कृषि उत्पादन प्रक्रिया और नीति निर्धारण में सुधार के जरिये किसानों की आय बढ़ा सकते हैं। अधिक मूल्य वाले उत्पादन, खाद्य प्रसंस्करण और निर्यात को बढ़ावा देकर कृषि क्षेत्र को आकर्षक और अधिक उत्पादक बना सकते हैं।&nbsp;</p>
<p><strong>एमएसपी के फायदों का स्वीकारा</strong></p>
<p>सर्वे में स्वीकार किया गया है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के फायदे हैं और इसके जरिये किसानों को फसल विविधिकरण के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। जिन 23 फसलों के लिए एमएसपी की व्यवस्था है यह उसमें देखा जा सकता है। साथ ही राज्यों को भी इसके लिए अतिरिक्त इंसेंटिव दिये जा सकते हैं। सर्वे में स्वीकार किया गया है कि केवल फसलों के उत्पादन से किसानों की आय में बढ़ोतरी संभव नहीं है। बागवानी, डेयरी और पॉल्ट्री और मीट जैसे उत्पादन को बढ़ावा देना होगा।</p>
<p><strong>उर्वरक सब्सिडी पर सवाल&nbsp;</strong></p>
<p>आर्थिक सर्वेक्षण में कैमिकल फर्टिलाइजर के अधिक उपयोग की समस्या को उजागर करते हुए उर्वरक सब्सिडी के प्रावधानों पर सवाल भी उठाये हैं। मसलन पीओएस मशीन के साथ किसान की जोत का रिकॉर्ड का न जुड़ा होना। आधार कार्ड पर उर्वरकों की मात्रा का सीमित न होना जैसे मुद्दो का हल ढूंढने की बात कही गई है। इसके लिए एग्री स्टैक को एक विकल्प के रूप में देखने की बात कही गई है। साथ ही आर्गेनिक खेती की वकालत की गई है। रिसर्च पर निवेश बढ़ाने और निजी निवेश बढ़ाने की बात कही गई है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ कृषि को भारतीय अर्थव्यवस्था का ग्रोथ इंजिन मानने का तर्क देता इकोनॉमिक सर्वे ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[बिहार को विशेष राज्य का दर्जा क्यों मिलना चाहिए?]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/why-should-bihar-get-special-category-status.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 15 Jul 2024 17:16:09 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/why-should-bihar-get-special-category-status.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत में वर्तमान में 29 राज्य और सात केंद्र शासित प्रदेश हैं। वित्त आयोग के अध्यक्ष की सिफारिशों के आधार पर इन सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को हर पांच साल में संघीय सरकार के राजस्व का एक निश्चित प्रतिशत प्राप्त होता है। किन्तु इनमें से ग्यारह राज्यों, जो अंतर्राष्ट्रीय सीमाएँ साझा करते हैं, को 'विशेष श्रेणी राज्य' का दर्जा केंद्र सरकार द्वारा प्राप्त है। ये हैं: मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा, सिक्किम, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, असम, जम्मू और कश्मीर तथा नगालैंड; अर्थात मुख्य रूप से आर्थिक रूप से कमज़ोर पहाड़ी राज्यों का एक समूह।<br />स्वतंत्रता प्राप्ति के आरंभिक वर्षों में समग्र रूप से देश अल्प विकसित था। आय सभी क्षेत्रों में असमान रूप से वितरित थी। अतः सभी क्षेत्रों के संतुलित विकास को एक स्पष्ट सरकारी लक्ष्य बनाया गया। यह तर्क दिया गया कि यदि बाजार तंत्र को प्राथमिक भूमिका दी गई और राज्य की भूमिका प्रतिबंधित कर दी गई, तो देश का आर्थिक विकास उन चुनिंदा इलाकों तक ही सीमित रहेगा जो अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में हैं, जिसके परिणामस्वरूप असमानता और बढ़ जाएगी। इसलिए, असमानता कम करने के लिए सक्रिय राजकीय हस्तक्षेप की परिकल्पना की गई थी। इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए नियोजित तंत्र केंद्र से राज्यों को संसाधनों का हस्तांतरण करता था। यह कार्य वित्त आयोग और योजना आयोग के माध्यम से संपन्न किये जाते थे।<br />किन्तु किसी राज्य के विकास का स्तर ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और समाजशास्त्रीय कारकों का एक जटिल समुच्चय होता है। राज्यों के लिए 'विशेष श्रेणी न केवल राज्यों को विशेष केंद्रीय धन के आवंटन को आसान बनाने के लिए था, बल्कि वंचित क्षेत्रों और कम विकसित राज्यों में विकास को बढ़ावा देने के लिए कुछ अतिरिक्त सुविधाएं (विशेष रूप से कर रियायतें) देना भी था।<br />ऐतिहासिक रूप से वंचित बिहार राज्य के लिए, 'विशेष श्रेणी का दर्जा' आवश्यक है। बिहार राज्य स्वतंत्रता पूर्व तीन शताब्दियों से प्रशासन की उदासीनता का शिकार रहा है। इस उदासीनता के मुख्य बिंदु हैं &ndash; ब्रिटिश शासन द्वारा अपनाई गई शोषणकारी आर्थिक नीतियां; स्वतंत्रता प्राप्ति के प्रथम दशक में बिहार में जमींदारी प्रथा के उन्मूलन का पूरी तरह क्रियान्वित नहीं &nbsp;हो पाना; 1952 से भारत सरकार द्वारा लागू माल ढुलाई समानीकरण नीति (freight equalization policy) का बिहार पर दुष्प्रभाव; 1961 से 1990 तक प्रदेश में राजनीतिक अस्थिरता; नवंबर 2000 में प्रदेश के विभाजन (बिहार और झारखंड) के उपरांत बिहार राज्य से अधिकांश खनिज एवं राजस्व पैदा करने वाले स्रोतों से वंचित हो जाना इत्यादि। इन वजहों से बिहार विकास के पैमाने पर पिछड़ेपन से जूझ रहा है। 'विशेष श्रेणी का दर्जा' ही इसके विकास को गति प्रदान कर सकता है। इससे ही राज्य में बड़े पैमाने पर निजी और सार्वजनिक निवेश का मार्ग प्रशस्त होगा।&nbsp;<br />वर्तमान में 'विशेष श्रेणी का दर्जा' देने वाले मापदंडों में प्रमुख हैं - पहाड़ी और कठिन इलाके, कम जनसंख्या घनत्व और/या जनजातीय आबादी का पड़ोसी देश की सीमाओं से मिलना, आर्थिक और ढांचागत पिछड़ापन इत्यादि। इस तरह के मानदंडों के आधार पर बिहार को अति-आवश्यक 'विशेष श्रेणी का दर्जा' से महरूम रखा गया है। हालांकि बिहार राज्य भूमि से घिरा है किन्तु मात्र इस वजह से इसे 'विशेष श्रेणी का दर्जा' से वंचित रखना अन्याय है। अतः इस मापदंड पर दोबारा गौर करने की जरूरत है।<br />जब से नीतीश कुमार सत्ता में आए हैं तब से वह बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग कर रहे हैं। उनकी इस मांग का आधार यह है कि विशेष राज्य का दर्जा औद्योगिक घरानों को आकर्षित करके, औद्योगीकरण की गति को तीव्र करके धनोपार्जन एवं रोजगार के अवसर प्रदान कर बिहार को सशक्त बनाएगा। यदि बिहार को विशेष राज्य का दर्जा के तहत समुचित वित्तीय सहायता मिलती है तो औद्योगीकरण में तीव्रता आएगी। इस मांग को एसोसिएटेड चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री इन इंडिया (एसोचैम) ने भी समर्थन दिया है ताकि बिहार को बुनियादी ढांचे और सामाजिक क्षेत्रों को विकसित करने के लिए अगले पांच वर्षों में 2.5 लाख करोड़ रुपये का निवेश मिल सके। इससे राज्य को विकास की प्रतिस्पर्धा में बनाए रखने में मदद मिलेगी। बड़े पैमाने पर निवेश तभी संभव है जब बिहार को विशेष श्रेणी का दर्जा देकर एक आकर्षक और अत्यधिक अनुकूल वातावरण दिया जाए जैसा कि उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और अन्य राज्यों के मामलों में किया गया था। बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने से केंद्र सरकार को जितना राजस्व का घाटा होगा उससे कहीं अधिक राजस्व बिहार के द्वारा अर्जित हो जायेगा।&nbsp;<br />बुनियादी ढांचे के विकास के लिए काफी हद तक बिहार सार्वजनिक क्षेत्र के निवेश पर निर्भर रहा है, लेकिन इस क्षेत्र में समुचित विकास के लिए निजी निवेश को प्रोत्साहित करना आवश्यक है। निजी निवेश से बुनियादी ढांचे और औद्योगिक विकास में तेजी आएगी, जिसका असर शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्रों पर स्वत: पड़ेगा। इसके अलावा प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि होगी और जनसामान्य की क्रय शक्ति में सुधार होगा। विशेष राज्य का दर्जा बिहार में निवेशकों का विश्वास बढ़ाने में सहायक होगा।&nbsp;<br />यद्यपि बिहार में शराब की बिक्री-खरीद पर प्रतिबंध के कारण राज्य के खजाने को नुकसान हुआ है, किन्तु &nbsp;यह माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सामान्य रूप से समाज की बेहतरी का प्रतीक है। इसके अलावा समानांतर रूप से अन्य क्षेत्रों जैसे - पर्यटन को बढ़ावा देकर वित्तीय नुकसान की भरपाई करने का प्रयास किया गया, और इसमें काफी हद तक सफलता भी मिली है।&nbsp;<br />हालाँकि, वित्तीय संकट में फंसे राज्य को बाहर निकालने के प्रयासों के बावजूद, यह पूरी तरह से स्पष्ट हो गया है कि राज्य के विकास की यह गति यथेष्ट नहीं है क्योंकि इतने प्रयासों के बावजूद देश के बाकी हिस्सों की तुलना इस प्रदेश में विकास की गति धीमी है। यह तथ्य &lsquo;विशेष श्रेणी दर्जे&rsquo; की मांग को और अधिक बल प्रदान करता है और यही बिहार को विभिन्न विकास मानकों पर राष्ट्रीय औसत के करीब लाने के लिए प्रेरित करने वाला नीतिगत उपाय भी माना जा सकता है।&nbsp;<br />बिहार सरकार की मांग को बिहार विधान परिषद और बिहार विधान सभा में सर्वसम्मत प्रस्तावों द्वारा समर्थन प्राप्त है। संभवतः उपर्युक्त बातों को मद्देनज़र रखकर पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान, केंद्रीय वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने पटना में कहा था कि केंद्र सरकार बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने पर गंभीरतापूर्वक विचार करेगी। दूसरी ओर, केंद्र को यह नहीं भूलना चाहिए कि पिछली तीन शताब्दियों में बिहार जिस तरह की आर्थिक उपेक्षा का शिकार हुआ है, वैसा किसी अन्य राज्य ने नहीं झेला है। अब समय आ गया है कि केंद्र सरकार बिहार को समुचित विकास के लिए बेहद आवश्यक &lsquo;विशेष श्रेणी का दर्जा&rsquo; प्रदान करे। बिहार समेत देश का समग्र विकसित भारत के सपने को साकार करने में मील का पत्थर साबित हो सकता है।&nbsp;<br /><strong><em>(लेखिका प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्षा- रिटायर्ड, स्नातकोत्तर दर्शनशास्त्र विभाग, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, पटना; पूर्व प्रतिकुलपति, बी.एन. मंडल विश्वविद्यालय, मधेपुरा, बिहार और पूर्व विजिटिंग प्रोफेसर, महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट, मोका, मारीशस हैं)</em></strong></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ बिहार को विशेष राज्य का दर्जा क्यों मिलना चाहिए? ]]></media:description>
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	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कृषि उत्पादन के आंकड़ों और जमीनी हकीकत के बीच विरोधाभास क्यों?]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/why-is-there-an-imbalance-between-agricultural-production-data-and-the-ground-reality.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 14 Jul 2024 11:46:52 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/why-is-there-an-imbalance-between-agricultural-production-data-and-the-ground-reality.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>केंद्र की नई सरकार में शिवराज सिंह चौहान कृषि मंत्री बने हैं, जिनके मुख्यमंत्री काल में मध्य प्रदेश में कृषि की ग्रोथ काफी अच्छी रही है। मेरा मानना है कि कृषि मंत्री को सबसे पहले देश के कृषि उत्पादन के अनुमानों की समीक्षा करनी चाहिए, क्योंकि लगातार रिकॉर्ड उत्पादन के अनुमानों के बीच खाद्यान्न और खाद्य उत्पादों की कीमतें बढ़ रही हैं।<br />सरकार ने पिछले साल रिकार्ड गेहूं उत्पादन का दावा किया, लेकिन 13 जून, 2023 को गेहूं पर स्टॉक लिमिट लगा दी। उसके बाद सरकारी अनुमानों में इस साल 11.29 करोड़ टन के साथ गेहूं उत्पादन का एक और रिकार्ड बना, लेकिन सरकार ने 24 जून को फिर गेहूं पर स्टॉक लिमिट लागू कर दी। सवाल यह है कि रिकार्ड उत्पादन और घरेलू बाजार के नियंत्रण के कदम जैसी दोनों बातें एक साथ कैसे हो सकती हैं। बात केवल गेहूं की नहीं, ज्यादातर उत्पादों के मामले में ऐसा हो रहा है।&nbsp;<br />जीडीपी के पिछले साल (2023-24) के अनुमानों में कृषि क्षेत्र का जीवीए 1.4 फीसदी बढ़ा जबकि कुल अर्थव्यवस्था का जीवीए 7.2 फीसदी बढ़ा है। हालांकि पहले अग्रिम अनुमानों में कृषि का जीवीए 0.7 फीसदी रहा था। एक वर्ग ताजा अनुमानों को इनफ्लेटेड मान रहा है। सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद जून में खाद्य महंगाई बढ़ कर 9.36 फीसदी हो गई जो मई में 8.83 फीसदी थी।<br />हम कृषि उपज के मामले में वाकई सरप्लस हैं या डेफिसिट में, इसे समझने के लिए कुछ बातों पर नजर डालने की जरूरत है। चालू साल के लिए सरकार ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफएसए) और दूसरी अन्य योजनाओं के लिए 590 लाख टन खाद्यान्न का आवंटन किया है। इसमें 184.1 लाख टन गेहूं और 419 लाख टन चावल है। गेहूं की मात्रा कम रखने का साफ मतलब इसकी उपलब्धता कम होना है।&nbsp;<br />सरकार ने तीसरे अग्रिम अनुमानों में 11.29 करोड़ टन गेहूं उत्पादन का अनुमान जताया है, जो रिकार्ड है। लेकिन चालू रबी मार्केटिंग सीजन (2024-25) में सरकारी खरीद में 266 लाख टन गेहूं ही मिला। पिछले साल भी 262 लाख टन की ही सरकारी खरीद हो पाई थी। बाजार में गेहूं की कीमतें 2275 रुपये प्रति क्विटंल के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के ऊपर चल रही हैं। देश से गेहूं का निर्यात भी प्रतिबंधित है। केंद्रीय पूल में 1 जून, 2024 को 299.5 लाख टन गेहूं था जो पिछले साल के 313.8 लाख टन से कम है।&nbsp;<br />यही नहीं 1 अप्रैल, 2024 को केंद्रीय पूल में गेहूं का स्टॉक 75.02 लाख टन था। यह 74.6 लाख टन के बफर मानक से मामूली अधिक तो था लेकिन यह 2008 के बाद, 16 साल का सबसे कम स्तर था। पिछले साल सरकार ने रिकार्ड गेहूं उत्पादन के अनुमानों के बीच 13 जून, 2023 को गेहूं पर स्टॉक लिमिट लागू कर दी थी। इस साल भी रिकॉर्ड उत्पादन के दावे के बावजूद कीमतों में बढ़ोतरी पर अंकुश लगाने के लिए 24 जून को स्टॉक लिमिट लागू कर दी है। कीमतें नियंत्रित करने के लिए अब ओपन सेल स्कीम में 2325 रुपये क्विंटल के भाव पर गेहूं बेचने का फैसला किया है। लगता है सरकार इस हकीकत को समझना नहीं चाहती कि इस साल मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान में फसल को नुकसान हुआ है।<br />दूसरा उदाहरण चना का है। सरकार का अनुमान है कि देश में चना उत्पादन 121 लाख टन है जबकि बाजार का अनुमान 105 लाख टन के आसपास का है। सरकार ने बफर के लिए चना खरीदने की कोशिश की लेकिन कीमतों में बढ़ोतरी के चलते उसे करीब 45 हजार टन चना ही मिला। पिछले साल सरकार के पास बफर में 37 लाख टन चना था लेकिन दाम नियंत्रित करने के लिए सरकार ने अधिकांश चना बेच दिया। अब उसके पास करीब चार लाख टन चना ही मौजूद है। ऐसे में आस्ट्रेलिया से चना आयात बढ़ गया है। यह स्थिति तब है जब सरकार दालों में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए उठाये जा रहे कदमों को गिनाती नहीं थकती है।<br />चीनी उत्पादन पिछले साल के मुकाबले 9.65 लाख टन कम रहा है क्योंकि गन्ना उत्पादन गिर गया था। चीनी निर्यात पर भी रोक है। सरकारी अनुमान के मुताबिक इस साल 13.67 करोड़ टन के साथ चावल उत्पादन 9.5 लाख टन अधिक रहा है। लेकिन दाम बढ़ने पर सरकार ने पहले 20 जुलाई, 2023 को व्हाइट राइस के निर्यात पर रोक लगाई, उसके बाद 25 अगस्त 2023 को सेला चावल पर 20 फीसदी निर्यात शुल्क लगा दिया गया था। यही नहीं बासमती निर्यात पर भी 1200 डॉलर प्रति टन का न्यूनतम निर्यात मूल्य (एमईपी) लगा दिया गया था जिसे बाद में घटाकर 850 डॉलर प्रति टन किया गया। इससे पहले 2022-23 में 200 लाख टन से अधिक निर्यात के साथ भारत ने दुनिया के चावल निर्यात बाजार में 40 फीसदी हिस्सेदारी हासिल कर ली थी।<br />अब सरकार के सामने मुश्किलें कई हैं। दाम कम रखने के लिए घरेलू बाजार नियंत्रित करने के दोहरे राजनीतिक नुकसान भी हैं। जैसा प्याज निर्यात प्रतिबंधित करने से महाराष्ट्र में हुआ। अब प्याज के दाम फिर बढ़ रहे हैं और आने वाले विधानसभा चुनावों तक दाम ऊंचे रहने की संभावना है, क्योंकि प्याज की अगली फसल अब अक्तूबर में ही आएगी।&nbsp;<br />अधिकांश दालों का उत्पादन घटा है और उनके दाम 30 फीसदी तक बढ़े हैं। खाद्य तेलों की कम कीमतों का दौर भी समाप्त हो गया है। मई में आयात में 45 फीसदी बढ़ोतरी के बावजूद कीमतें छह फीसदी से अधिक बढ़ी हैं जबकि यह बात भी सच है कि देश में सबसे बड़े तिलहन सरसों के किसानों को रबी सीजन में 5650 रुपये प्रति क्विंटल के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से कम दाम पर अपनी फसल बेचनी पड़ी।&nbsp;<br />इस साल मानसून सामान्य है या नहीं उसके लिए पूरा सीजन देखना होगा। लेकिन यह कृषि क्षेत्र को लेकर सरकार की नीतियों और फैसलों की कमजोरी को बार-बार सामने ला रहा है। जब एनएसएसओ का ताजा सर्वे बता रहा है कि देश में प्रति व्यक्ति खाद्यान्न खपत घट रही है तो रिकार्ड उत्पादन के बावजूद कीमत नियंत्रण के कड़े उपाय करने की नौबत इसलिए आ रही है क्योंकि वास्तविक उत्पादन अनुमानों से मेल नहीं खाता है। कृषि क्षेत्र के लिए नई तकनीक और बड़े नीतिगत फैसलों का इंतजार लंबा होता जा रहा है। उचित नीति के अभाव में सरकार की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं जो पहले ही खाद्य महंगाई को काबू करने के लिए जूझ रही है।</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ कृषि उत्पादन के आंकड़ों और जमीनी हकीकत के बीच विरोधाभास क्यों? ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[खाद्य महंगाई की पहेली बढ़ा रही है सरकार और रिजर्व बैंक की चिंता]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/the-puzzle-of-food-inflation-is-increasing-the-problems-of-the-government-and-the-reserve-bank.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 17 Jun 2024 07:52:41 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/the-puzzle-of-food-inflation-is-increasing-the-problems-of-the-government-and-the-reserve-bank.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">तेज विकास दर के बीच सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक ऊंची खाद्य महंगाई दर की पहेली को हल करने में कामयाब नहीं हो पा रहे हैं। अब इनकी उम्मीदें सामान्य मानसून के आधार पर खरीफ सीजन पर टिकी हैं। ताजा आंकड़ों के मुताबिक खाद्य महंगाई दर मई में 8.7 फीसदी रही है और पिछले चार माह से लगातार 8.5 फीसदी के उपर बनी हुई है, जबकि खुदरा महंगारी दर (सीपीआई) पांच फीसदी से नीचे है। थोक मूल्य सूचकांक (डब्लूपीआई) के ताजा आंकड़ों में खाद्य महंगाई दर 9.2 फीसदी पर पहुंच गई है। अब सवाल है कि सरकार रिकार्ड खाद्यान्न उत्पादन के अनुमान जारी कर रही है तो इनकी कीमतें क्यों बढ़ रही हैं। इस तरह के सवालों के जवाब मिलने की मुश्किल के बीच रिजर्व बैंक ने ताजा मौद्रिक नीति की समीक्षा बैठक के बाद कहा कि महंगाई दर आने वाले दिनों बढ़ सकती है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">असल में सरकार के खुद के आंकड़े उसकी मुश्किल बढ़ा रहे हैं। मई के महंगाई के आंकड़ों के मुताबिक खाद्यान्न महंगाई दर 10.4 फीसदी रही है। लेकिन सरकारी अनुमान में उत्पादन बढ़ता ही रहता है। दो साल पहले देश में गेहूं का उत्पादन गिरा तो सरकार ने वास्तविक गिरावट को मानने से इनकार कर दिया और उनमें मामूली संशोधन किया। उसके बाद पिछले साल भी बेहतर उत्पादन के अनुमान जारी किये गये, लेकिन सरकारी खरीद 262 लाख टन पर अटक गई और सरकारी खरीद के सीजन के बीच में ही स्टॉक लिमिट लागू करनी पड़ी। अब इस साल भी रिकॉर्ड उत्पादन का दावा किया जा रहा है। इसके बावजूद गेहूं की सरकारी खरीद 266 लाख टन तक ही पहुंची है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">गेहूं के 2275 रुपये प्रति क्विंटल के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के मुकाबले बाजार में कीमतें 2600 रुपये प्रति क्विटंल को पार कर गई हैं। वहीं 1 अप्रैल, 2024 को केंद्रीय पूल में गेहूं का स्टॉक 16 साल के निचले स्तर पर रह गया था। कमजोर खरीद के चलते 1 जून, 2024 को केंद्रीय पूल में गेहूं स्टॉक 299.05 लाख टन पर रहा जबकि पिछले साल इसी तिथि को केंद्रीय पूल में गेहूं का स्टॉक 313 लाख टन था।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">पिछले साल कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने खुले बाजार की योजना के तहत 100 लाख टन से अधिक गेहूं की बिक्री की थी। इस साल आयात शुल्क में कमी की अटकलों के बीच सरकार को बयान देना पड़ रहा है कि उसके पास कीमतों को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त स्टॉक है। अब सवाल उठता है कि जब देश में 11.2 करोड़ टन गेहूं उत्पादन का अनुमान जारी किया गया तो सरकारी खरीद सीजन के दौरान ही कीमत एमएसपी से इतना उपर कैसे चली गई। इसकी एक बड़ी वजह सरकारी स्टॉक कम होना माना जा रहा है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इसके अलावा दालों और खाद्य तेलों की कीमतों में भी तेजी आई है। खाद्य तेलों का मई में आयात पिछले साल के मुकाबले 45 फीसदी बढ़ा है। इसके बावजूद मई में खाद्य तेल 6.7 फीसदी महंगे हुए हैं, जबकि एक साल पहले इनकी कीमतें गिर रही थीं। इसके साथ ही जब देश के सबसे बड़े तिलहन सरसों की फसल बाजार में आई तो अधिकांश किसानों को 5650 रुपये प्रति क्विटंल के एमएसपी से कम दाम पर इसे बेचना पड़ा। लेकिन अब कीमतें 6200 रुपये प्रति क्विटंल पर पहुंच गई हैं।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">मई के थोक मूल्य सूचकांक के आंकड़ों के अनुसार, खाने-पीने की चीजों की थोक महंगाई दर इस साल मई में 9.82 फीसदी रही, जबकि अप्रैल में यह 7.74 फीसदी थी। इसी तरह मई में सब्जियों की थोक महंगाई दर 32.42 फीसदी रही, जो अप्रैल में 23.60 फीसदी थी। वहीं, प्याज की महंगाई दर 58.05 फीसदी, आलू की 64.05 फीसदी और दालों की महंगाई दर 21.95 प्रतिशत रही।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">दालों की खुदरा महंगाई दर 17.1 फीसदी पर पहुंच गई है। इनमें अरहर की कीमत 32.1 फीसदी बढ़ी हैं। दालों के मामले में चना का उदाहरण हमारे सामने है। जब सरकार के पास दो साल की खरीद के चलते स्टॉक अधिक था तो उसे कम कीमतों पर बेचकर पांच लाख टन से कम पर ला दिया गया। वहीं इस साल कीमतें बढ़ने के चलते उसकी खरीद केवल 45 हजार टन पर सिमट गई। अब कीमतों पर अंकुश के लिए आस्ट्रेलिया और दूसरे देशों से आयात का सहारा है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">चीनी उत्पादन को लेकर जब पिछले साल अगस्त में उद्योग ने उत्पादन में गिरावट का अनुमान जारी किया तो सरकार ने सफाई मांग ली। लेकिन जब उत्पादन गिरने लगा तो एथेनॉल के लिए गन्ने के रस और बी हैवी मोलेसेज पर रोक जैसे कदम उठाये। कमजोर उत्पादन के चलते चीनी के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। हाल ही में डेयरी कंपनियों ने दूध के दाम भी बढ़ाए, जिसका असर आने वाले समय में महंगाई के आंकड़ों में दिखेगा।<br /></span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">जीडीपी के एडवांस एस्टीमेट में कृषि जीडीपी की वृद्धि दर को 0.6 फीसदी से बढ़ाकर 1.4 फीसदी कर दिया गया जबकि अधिकांश फसलों का उत्पादन गिरा। उत्पादन के आंकड़ों के साथ ही बाजार में कीमतों में बढ़ोतरी भी इस बात का संकेत है कि कहीं न कहीं अधिक उत्पादन के आंकड़ों पर बाजार पूरी तरह भरोसा नहीं कर पा रहा है। सामने आए आंकड़ों के आधार पर महंगाई का हल ढूंढ़ना कैसे संभव होगा जब वास्तविकता कहीं और है। मानसून सामान्य रहने की स्थिति में खरीफ का बेहतर उत्पादन कुछ राहत जरूर ला सकता है, लेकिन रिजर्व बैंक और सरकार को महंगाई के मोर्चे पर फतह पाने के लिए सही आंकड़ों की उपलब्धता पर फोकस करना होगा।&nbsp;</span></p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ खाद्य महंगाई की पहेली बढ़ा रही है सरकार और रिजर्व बैंक की चिंता ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[खाद्य प्रणाली में बदलाव पर गंभीर चर्चा से हो किसानों के लिए अमृत काल की शुरुआत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/process-to-amrit-kaal-for-farmers-should-start-with-a-dialogue-on-food-systems-transformation.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 16 Jun 2024 16:20:41 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/process-to-amrit-kaal-for-farmers-should-start-with-a-dialogue-on-food-systems-transformation.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2022 में 2047 तक विकसित भारत की परिकल्पना रखते हुए लाल किले से अपने भाषण में कहा था, &ldquo;आने वाले 25 वर्षों के दौरान तेज, प्रॉफिटेबल विकास, सबके लिए बेहतर जीवन स्तर, इन्फ्रास्ट्रक्चर और टेक्नोलॉजी में प्रगति तथा भारत के प्रति विश्व का भरोसा दोबारा कायम करके भारतीय अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र का पुनर्गठन किया जाएगा। अमृत काल के पांच प्रण में भारत को विकसित देश बनाना, हमारी आदतों से गुलामी का अंश खत्म करना, अपनी विरासत पर गर्व करना, एकता और एकजुटता तथा नागरिकों का कर्तव्य शामिल हैं।&rdquo;<br />उसके बाद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वित्त वर्ष 2023-24 के केंद्रीय बजट को अमृत काल का पहला बजट बताते हुए कहा कि यह एक सशक्त और समावेशी अर्थव्यवस्था को दिशा देने वाला बजट है। उन्होंने कहा, &ldquo;इस बजट का लक्ष्य आर्थिक स्थिरता की मजबूत नींव रखना है। इसमें नए भारत के लिए टेक्नोलॉजी और जानकारी आधारित अर्थव्यवस्था के साथ महिला सशक्तीकरण पर जोर दिया गया है। इसमें हरित तथा भविष्य की टेक्नोलॉजी आधारित तरीकों से टिकाऊ विकास को बढ़ावा देने का रोड मैप दिया गया है। इसका एक और लक्ष्य अर्थव्यवस्था के सभी छोटे-बड़े क्षेत्रों को फंड का आवंटन करते हुए संपन्नता लाना है।&rdquo;<br />इन बयानों के बाद अनेक विद्वान और नीति विश्लेषक यह विचार करने लगे कि अमृत काल में कैसे आगे बढ़ा जाए। इस बारे में जो लेख छपे उनमें एक प्रमुख सेक्टर कृषि भी था। नीति आयोग (सदस्य रमेश चंद) ने एक विस्तृत शोध पत्र जारी किया जिसका शीर्षक था &lsquo;हरित क्रांति से अमृत काल&rsquo;। इन शोध पत्रों में आगे बढ़ने के लिए अनेक विचार तथा सुझाव दिए गए हैं। इस लेख में अमृत काल के लिए कृषि की प्राथमिकताएं बताने की कोशिश की गई हैं।<br />मेरे विचार से &lsquo;अमृत काल&rsquo; का मतलब एक सशक्त, संपन्न और समावेशी भारत बनाना है। प्रधानमंत्री के विजन में सबसे अहम सबके लिए बेहतर जीवन है। हम जानते हैं कि लगभग 50% आबादी कृषि पर निर्भर है। हमने देखा है कि कोविड महामारी जैसे रोजगार संकट के समय बड़ी संख्या में लोग आजीविका के लिए अपनी छोटी-छोटी जमीनों पर खेती करने के लिए लौट गए थे।<br />हमारी कृषि व्यवस्था में विकास की संभावनाएं सीमित होने के बावजूद बड़ी संख्या में लोग इस पर निर्भर हैं। अतः कृषि एजेंडा किसानों तथा कृषि मजदूरों की आवश्यकताओं को प्राथमिकता में बदलना होना चाहिए। अमृत काल के समावेशी एजेंडा की प्राथमिकताएं स्पष्ट रूप से किसानों तथा कृषि मजदूरों की संपन्नता एवं उनका कल्याण होना चाहिए। इसमें किसानों की आय बढ़ाना, ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार के बेहतर साधन उपलब्ध कराना, सूचना एवं प्रौद्योगिकी की पहुंच बेहतर करना तथा फाइनेंस और बीमा की पहुंच बढ़ाना शामिल हैं। कोई व्यक्ति इस सूची में और विषयों को जोड़ सकता है, लेकिन फोकस स्पष्ट होना चाहिए।<br />मैं यहां कुछ प्राथमिकताएं बताता हूंः</p>
<p><strong>पहली</strong> प्राथमिकता तो निर्विवाद रूप से किसानों की आय बढ़ाना है। इसे सिर्फ उत्पादकता बढ़ाकर हासिल नहीं किया जा सकता, जैसा अक्सर कहा जाता है। ऊंची वैल्यू वाले उत्पाद बनाना और वैल्यू चेन में किसानों को शामिल करना कृषि क्षेत्र में बदलाव का महत्वपूर्ण अंग होना चाहिए। किसानों की आय निरंतर बढ़ाने वाली नीति बनाने तथा उन्हें लागू करने के लिए हमें खाद्य सुरक्षा के केंद्र में उपभोक्ता के बजाय किसानों को रखना पड़ेगा। इसके लिए नीतिगत रूप से रणनीतिक बदलाव जरूरी है। उत्पादकता बढ़ाने और टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से लेकर बाजार और निजी कंपनियां सब महत्वपूर्ण हैं, लेकिन रणनीति का मुख्य केंद्र किसानों का भला होना चाहिए। यह भला सिर्फ आमदनी के क्षेत्र में नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और सेवाओं के क्षेत्र में भी हो।<br /><strong>दूसरा,</strong> किसानों को ज्यादा आजादी मिलनी चाहिए। किसान क्या करे, क्या ना करे इसके लिए उसे अनेक नियमों से जकड़ दिया गया है। यह लेखक लंबे समय से विभिन्न क्षेत्रों में किसानों पर लगाए जाने वाले प्रतिबंध हटाने की बात कहता रहा है। इनमें कुछ खास तरह की प्रैक्टिस अपनाना, बीज, उर्वरक, मशीन, फाइनेंस, बीमा उत्पाद इत्यादि के लिए कानूनी अंकुश और वित्तीय इंसेंटिव शामिल हैं। किसानों पर रेगुलेटरी बोझ फसल की बुवाई के समय शुरू होता है और वह स्टॉक लिमिट तथा निर्यात पर प्रतिबंध तक रहता है। यह रेगुलेटरी प्रतिबंध उपभोक्ता महंगाई के नजरिये से आवश्यक कमोडिटी पर लागू होता है। किसानों को ज्यादा स्वतंत्र बनाने के लिए इन सभी कानूनों और नियमों की समीक्षा की जरूरत है।<br /><strong>तीसरा</strong> है किसानों को जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने में सक्षम बनाना। जलवायु परिवर्तन के असर को अभी पूरी तरह समझा जाना बाकी है, खासकर स्थानीय स्तर पर। स्थानीय जरूरत के मुताबिक जलवायु परिवर्तन को समझना, भूख और पोषण की चिंताओं की अनदेखी किए बिना जलवायु प्रतिरोधी फसल उपजाने में किसानों की समस्याएं दूर करना तथा पारंपरिक जानकारी, विज्ञान और टेक्नोलॉजी के बीच समन्वय इस पहल के महत्वपूर्ण तत्व हैं।<br /><strong>चौथा</strong> है बाजार से जुड़ी नीति। इसमें उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी महंगाई पर जरूरत से ज्यादा जोर नहीं दिया जाना चाहिए। भंडारण से लेकर निर्यात तक, विभिन्न स्तरों पर मार्केटिंग पर प्रतिबंधों से किसानों को नुकसान हुआ है। किसी नीति के बजाय इस तरह जब-तब लगाए जाने वाले प्रतिबंध अधिक नुकसानदायक साबित हुए हैं। अभी तक ऐसा कोई अध्ययन नहीं हुआ है जिसमें महंगाई नियंत्रित करने के सरकार के फैसले से किसानों के नुकसान का आकलन किया गया हो। अध्ययन की तो छोड़िए, उपभोक्ताओं के लिए महंगाई कम करने की वजह से अंततः किसानों को नुकसान होता है, इस विचार को भी मुख्यधारा में जगह नहीं मिलती है। इस तरह के तदर्थ फैसलों से किसान कोई उम्मीद नहीं रख सकते हैं।<br /><strong>पांचवां,</strong> आय बढ़ाने के लिए अनुसंधान एवं विकास। उत्पादकता बढ़ाने में अभी तक राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली (नेशनल एग्रीकल्चरल रिसर्च सिस्टम) ने बहुत अच्छा काम किया है। इसके साथ निजी क्षेत्र के प्रयासों से उत्पादन में काफी बढ़ोतरी हुई है। यह बड़ी उपलब्धि तो है, सवाल उठता है कि किसानों की आमदनी उतनी बढ़ी या नहीं जितनी बढ़नी चाहिए थी। यह सही है कि उत्पादन बढ़ने से किसानों के हाथ में अधिक पैसे आए और उनकी सकल आय बढ़ी है, लेकिन क्या वे अपने बच्चों पर अधिक खर्च करने की स्थिति में हैं? ज्यादातर किसान आपको बताएंगे कि दूसरे पेशे के लोगों की तुलना में उनकी स्थिति खराब हुई है। अनुसंधान एवं विकास में सार्वजनिक क्षेत्र की अग्रणी भूमिका तो बनी रहेगी, लेकिन इसमें उत्पादकता की बजाय किसान की संपन्नता बढ़ाने पर फोकस किया जाना चाहिए। निजी क्षेत्र की भूमिका की अनदेखी अब नहीं की जा सकती है। नए तरीके तलाशने होंगे जिसमें सार्वजनिक और निजी क्षेत्र मिलकर काम करें। कृषि क्षेत्र में स्टार्टअप की उत्तरोत्तर वृद्धि इस सेक्टर में टेक्नोलॉजी उपलब्ध कराने वाली निजी कंपनियों के बढ़ते प्रभाव को दिखाती है। अगले दो दशकों के दौरान इसमें कई गुना वृद्धि होने की संभावना है।<br /><strong>छठा</strong> है प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण। मिट्टी और पानी जैसे प्राकृतिक संसाधनों का अवैज्ञानिक दोहन कृषि के भविष्य को लेकर बड़ी चिंता पैदा करती है। प्राकृतिक संसाधनों के दोहन में चलताऊ अप्रोच की लंबे समय में सस्टेनेबिलिटी पर अनेक वैज्ञानिक सवाल उठे हैं, जो जायज है। अनेक लोग पूरी तरह प्राकृतिक खेती अपनाने की बात करते हैं। हालांकि वैज्ञानिक सिर्फ परंपरागत खेती अपनाने के विकल्प को सही नहीं मानते, लेकिन उनके संदेहों में उचित तर्क नहीं होता है। लेकिन यह कहना भी अतिशयोक्ति होगी कि सिर्फ हरित क्रांति का अप्रोच काम करेगा। हरित क्रांति वाले माइंडसेट ने जाने-अनजाने हमारी नीतियों को इस तरह प्रभावित किया कि उर्वरकों तथा पानी का इस्तेमाल काफी बढ़ गया। जाहिर है कि इससे हमें सस्टेनेबिलिटी के उद्देश्य को हासिल करने में मदद नहीं मिलेगी। इसलिए इनके अधिक इस्तेमाल को हतोत्साहित करने और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए नीति बननी चाहिए।<br /><strong>सातवां</strong> है कंज्यूमर यानी उपभोक्ता। कंज्यूमर इज किंग यानि उपभोक्ता राजा है और राजा से कोई सवाल न पूछना स्वाभाविक है। लेकिन अब वह समय आ गया है। क्या उपभोक्ताओं को किसानों को उचित मूल्य का भुगतान नहीं करना चाहिए? क्या उन्हें किसानों की कीमत पर सस्ता भोजन पाने का हक है? उपभोक्ताओं को फायदा पहुंचाने के लिए निर्यात पर प्रतिबंध जैसे उपाय बेरोकटोक लागू किए जाने चाहिए जिससे किसानों को नुकसान होता है? क्या उपभोक्ता के स्तर पर खाद्य सामग्री की बर्बादी रोकने के गंभीर उपाय नहीं होने चाहिए? क्या यह संसाधनों की राष्ट्रीय बर्बादी नहीं जिसके लिए दंडित किया जाना चाहिए? फसल कटाई, उसके ट्रांसपोर्ट और भंडारण में होने वाला नुकसान भी कम नहीं है। टेक्नोलॉजी, लॉजिस्टिक्स और मैनेजमेंट के जरिए इनका समाधान भी निकाला जाना चाहिए।<br />डिजिटाइजेशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रोबोटिक्सः डिजिटाइजेशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रोबोटिक्स जैसी नई टेक्नोलॉजी अनेक क्षेत्रों में अपनी उपयोगिता साबित कर चुकी हैं। कृषि के अनेक क्षेत्रों में भी इनका प्रभाव बढ़ने की संभावना है। कृषि कार्यों में ड्रोन का इस्तेमाल अब वास्तविकता बन चुकी है। इस क्षेत्र में पारंपरिक रूप से जो खामियां थीं, टेक्नोलॉजी आंत्रप्रेन्योर उन्हें दूर कर रहे हैं और किसान उनके नए प्रोडक्ट का बिना झिझक इस्तेमाल भी कर रहे हैं। हमारे युवा तकनीकी उद्यमियों की क्षमता और सार्वजनिक रिसर्च तथा एक्सटेंशन सपोर्ट सिस्टम के बीच समन्वय को नीतिगत प्राथमिकता दी जानी चाहिए।<br /><strong>अंत में,</strong> खाद्य प्रणाली में बदलाव के लिए गंभीर प्रयास की जरूरत। जब भी इस मुद्दे को उठाया जाता है तो आमतौर पर यही जवाब मिलता है कि यह तरीका काम नहीं करेगा। इसका एक कारण तो इस बात पर मतभेद है कि बदलाव क्या होना चाहिए। इस विषय पर विकसित जगत में काफी चर्चा हो रही है और यह आशंका व्यक्त की जा रही है कि पश्चिमी देश हमें एक बार फिर खाद्य की कमी वाला देश बना सकते हैं। यह डर कई बार अंतरराष्ट्रीय सेमिनार और वर्कशॉप में अधकचरे विचारों की वजह से उपजता है। समय आ गया है कि भारत में हम अपने सिस्टम की कमियों को पहचानें और खाद्य प्रणाली में बदलाव के लिए अपना ब्लूप्रिंट तैयार करें। हम ऐसा कर सकते हैं और इससे हमें बचना नहीं चाहिए। यह जटिल और मुश्किल जरूर है लेकिन साध्य है। हमें अपने विचारों को एक जगह लाने और साथ काम करने का रास्ता तलाशने की जरूरत है। इस विशद चर्चा के केंद्र में किसानों, खाद्य एवं पोषण तथा जलवायु को रखा जाना चाहिए।<br />मेरे विचार से किसानों के लिए अमृत काल की शुरुआत खाद्य प्रणाली में बदलाव पर गंभीर पर चर्चा के साथ होनी चाहिए।<br /><em><strong>(लेखक पूर्व केंद्रीय कृषि एवं खाद्य सचिव हैं)</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ खाद्य प्रणाली में बदलाव पर गंभीर चर्चा से हो किसानों के लिए अमृत काल की शुरुआत ]]></media:description>
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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[शिवराज सिंह चौहान के साथ क्या लौटेगा कृषि मंत्रालय का रुतबा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/will-the-status-of-agriculture-ministry-return-with-shivraj-singh-chauhan-as-agriculture-minister.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 11 Jun 2024 23:00:35 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/will-the-status-of-agriculture-ministry-return-with-shivraj-singh-chauhan-as-agriculture-minister.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>लोकसभा चुनावों के नतीजों ने भारतीय जनता पार्टी को अगर सबसे बड़ा सबक दिया है तो वह है कि ग्रामीण आबादी और किसान अपने हालात से बहुत खुश नहीं हैं। ग्रामीण भारत में भाजपा की लोकप्रियता घटी है। इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लगातार तीसरी बार बनी एनडीए गठबंधन सरकार के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती है इस धारणा को बदलना है। इसके लिए एक मजबूत कृषि मंत्री की दरकार थी जिसे मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय का जिम्मा देकर पूरा करने की कोशिश की गई है। कृषि के साथ ही उन्हें ग्रामीण विकास मंत्रालय का जिम्मा भी दिया गया है।</p>
<p>पिछले दस साल में कृषि मंत्रालय के साथ किसान कल्याण का नाम तो जुड़ा लेकिन खेती-किसानी से जुड़े कई महत्वपूर्ण विभागों को अलग कर उसका आकार काफी छोटा कर दिया। खाद्य, उर्वरक और खाद्य प्रसंस्करण जैसे मंत्रालय कृषि से पहले ही अलग थे जबकि कृषि निर्यात से जुड़े फैसले वाणिज्य मंत्रालय लेता है। इससे केंद्रीय कैबिनेट में कृषि मंत्रालय की अहमियत कम होती गई और सरकार के नीतिगत निर्णयों में कृषि मंत्री का रुतबा घटा है।&nbsp;</p>
<p>देश की सबसे बड़ी आबादी को रोजगार मुहैया कराने के साथ ही कृषि क्षेत्र राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के रूप में एक रणनीतिक अहमियत रखता है। वहीं महंगाई पर काबू पाने के लिए भी कृषि मंत्रालय की अहम भूमिका है। लेकिन कई बार किसानों के हितों, उपभोक्ताओं के हितों और राजकोषीय स्थिति के बीच विरोधाभास की स्थिति बन जाती है। ऐसे में अगर कृषि मंत्रालय राजनीतिक रूप से कद्दावर नेता के पास नहीं रहेगा तो किसानों और कृषि से जुड़े फैसले उस तरह नहीं हो सकेंगे जो वित्त, वाणिज्य और सड़क परिवहन जैसे मंत्रालयों में होते रहे हैं।&nbsp;</p>
<p>कृषि मंत्रालय की राजनीतिक अहमियत के चलते डॉ. राजेंद्र प्रसाद, सी. सुब्रमण्यम, जगजीवनराम, चौधरी देवीलाल, प्रकाश सिंह बादल, बलराम जाखड़, अजित सिंह और शरद पवार जैसे कद्दावर राजनीतिज्ञों के पास यह मंत्रालय रहा है। हम जिस हरित क्रांति और श्वेत क्रांति के फायदे देख रहे हैं, वह इन बड़े नेताओं के बिना संभव नहीं था जिन्होंने बड़े फैसलों के लिए दूसरे मंत्रालय का मुंह नहीं ताका। यही नहीं पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पहली 13 माह की सरकार में उन्होंने खुद अपने पास कृषि मंत्रालय रखा था और उनके साथ कृषि राज्य मंत्री सोमपाल शास्त्री थे। उसी कार्यकाल में पहली कृषि नीति लाई गई थी और फसल बीमा योजना पर काम शुरू हुआ था।</p>
<p>जहां तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पिछले दो कार्यकाल की बात है तो उसमें कृषि मंत्रालय में कोई कद्दावर नेता मंत्री के रूप में नहीं रहा है। यही नहीं इस दौरान कृषि मंत्रालय से मत्स्य पालन, डेयरी और पशुपालन विभाग और सहकारिता विभाग को अलग कर नए मंत्रालय बनाए गये। जबकि सही मायने में कृषि मंत्रालय एक सुपर मंत्रालय होना चाहिए जिसमें कृषि के साथ खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय, उर्वरक मंत्रालय, डेयरी और पशुपालन मंत्रालय इसका हिस्सा होने चाहिए। गौरतलब है की यूपीए सरकार में कृषि और खाद्य मंत्रालय शरद पवार के पास थे। ऐसे में कृषि और किसानों से जुड़े फैसलों में बेहतर समन्वय संभव है।</p>
<p>अब शिवराज सिंह चौहान को कृषि मंत्रालय का जिम्मा दिया गया है तो उससे लगता है कि कृषि मंत्रालय का रुतबा लौट सकेगा। वह 17 साल मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री रहे हैं और भाजपा की मौजूदा टीम के सबसे वरिष्ठ नेताओं की श्रेणी में आते हैं। मध्य प्रदेश में उनके कार्यकाल में कृषि क्षेत्र ने ऊंची विकास दर हासिल की। वहां पिछले दस साल 2014-15 से 2023-24 के दौरान कृषि क्षेत्र की औसत विकास दर 6.5 फीसदी रही जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह 3.7 फीसदी रही। इसी दौरान मध्यप्रदेश उत्तर प्रदेश के बाद देश का सबसे बड़ा गेहूं उत्पादक राज्य भी बना। साल 2019-20 में मध्य प्रदेश ने गेहूं की सरकारी खऱीद में पंजाब को भी पीछे छोड़ दिया था।</p>
<p>यह सब शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में हुआ। राज्य में सिंचाई सुविधाओं में बढ़ोतरी के लिए हुए निवेश और मार्केटिंग इनफ्रास्ट्रक्चर में सुधार के चलते यह संभव हुआ। ऐसे में कृषि विकास में शिवराज सिंह चौहान की अपनी साख और अनुभव है जो उनके केंद्र में कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री के रूप में काम आएगा। साथ ही सरकार में वह नीतिगत फैसलों को किसानों और कृषि मंत्रालय के पक्ष में प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। वहीं, उनके लिए केंद्र में अपनी भूमिका साबित करने का भी यह एक बड़ा मौका है क्योंकि कृषि मंत्रालय मोदी सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों वाला मंत्रालय है।</p>
<p>जहां तक नीतिगत मामलों की बात है तो उनके लिए पहला काम किसानों की आय बढ़ोतरी को केंद्र में रखकर काम करना होगा। फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी गारंटी की मांग कायम है और एमएसपी एक राष्ट्रव्यापी मुद्दा बन चुका है। यह देश भर में किसानों की सबसे बड़ी आकांक्षा बन चुका है।</p>
<p>बड़ी चुनौती कृषि नीतियों के आयात-निर्यात और घरेलू बाजार में प्रतिबंधों से जुड़े फैसले भी हैं जहां पर उनको किसानों के हित में खड़ा होना होगा। पिछले कुछ वर्षों में उपभोक्ता हित अधिक प्रभावी रहे हैं जिसके चलते किसानों को तो नुकसान हुआ ही है, साथ ही दालों ओर खाद्य तेलों के मामले में आयात निर्भरता बढ़ी और आत्मनिर्भरता को झटका लगा है।&nbsp;</p>
<p>कृषि में निवेश की स्थिति बहुत बेहतर नहीं है। इसके लिए केवल मंत्रालय के बजट के आकार से आकलन नहीं लगाया जा सकता है क्योंकि उसका अधिकांश हिस्सा सब्सिडी और डायरेक्ट ट्रांसफर में जा रहा है। वहीं सरकार के पास ऐसी कारगर नीति भी नहीं है जो सार्वजनिक निवेश के अलावा निजी निवेश को कृषि में आकर्षित करती हो। यही वजह है कि फसलों की उत्पादकता के मामले में बेहतर वैश्विक रिकार्ड से हम अधिकांश फसलों में पिछड़े हुए हैं। नई टेक्नोलॉजी को लेकर स्थिति अस्पष्ट है। नई टेक्नोलॉजी नए बीजों के विकास और फसलों की सुरक्षा से जुड़ी हैं। ऐसे में शिवराज चौहान के सामने चुनौती होगी इस संबंध में अटके फैसलों पर आगे कैसे बढ़ें।</p>
<p>किसानों की आय के अलावा एक बड़ा चैलेंज क्लाइमेट चेंज है। गरम होते मौसम और एक्ट्रीम वैदर की घटनाओं के चलते भारतीय कृषि पर इसका सीधा प्रभाव दिखने लगा है। यही नहीं किसान भी क्लाइमेंट चेंज की आंच महसूस करने लगे हैं। इसलिए अभी भी बड़ी पहल नहीं हो रही है और न ही इससे निपटने के लिए कोई पुख्ता रणनीति है। आने वाले बरसों में जलवायु के मोर्चे पर मुश्किलें बढ़ेंगी और उससे निपटने के लिए बड़े नीतिगत फैसलों की दरकार है।</p>
<p>इन परिस्थितियों में कृषि मंत्रालय राजनीतिक जोखिम वाला मंत्रालय भी है। अगले कुछ माह में किसानों और कृषि के महत्व वाले तीन राज्यों महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में विधान सभा चुनाव भी होने हैं। ऐसे में शिवराज सिंह के सामने पहला राजनीतिक इम्तिहान भी करीब है। उम्मीद है कि वह अपने राजनीतिक कद और अनुभव का उपयोग करते हुए कृषि मंत्रालय को एक बार फिर दूसरे अहम मंत्रालयों के समकक्ष खड़ा करने में कामयाब होंगे।&nbsp;</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ शिवराज सिंह चौहान के साथ क्या लौटेगा कृषि मंत्रालय का रुतबा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    <item>
        <title><![CDATA[विश्वसनीय कृषि निर्यातक बनने के लिए देश की कृषि की बुनियाद को मजबूत करना जरूरी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/fundamentals-of-the-countrys-agriculture-must-be-significantly-strengthened-to-emerge-as-a-reliable-agricultural-export-hub.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 10 Jun 2024 07:00:00 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/fundamentals-of-the-countrys-agriculture-must-be-significantly-strengthened-to-emerge-as-a-reliable-agricultural-export-hub.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>सरकार ने दिसंबर 2018 में कृषि निर्यात नीति की घोषणा की। इसके दो प्राथमिक उद्देश्य थे। पहला, वैश्विक मूल्य श्रृंखला के साथ एकीकरण करके विश्व कृषि निर्यात में भारत की हिस्सेदारी दोगुना करना और दूसरा, किसानों को विदेशी बाजारों में निर्यात के अवसरों का लाभ उठाने में सक्षम बनाना। यह तर्क दिया गया कि वैश्विक मूल्य श्रृंखला में भारतीय कृषि का एकीकरण "उत्पादकता बढ़ाने और लागत में प्रतिस्पर्धी क्षमता हासिल करने के साथ सर्वोत्तम कृषि पद्धति अपनाने के श्रेष्ठ तरीकों में से एक है"। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार ने 2016 में 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का जो लक्ष्य निर्धारित किया था, उसे पूरा करने के लिए कृषि निर्यात को बढ़ावा देना अनिवार्य माना गया।</p>
<p>2020 में लाया गया विवादास्पद कृषि सुधार कानून भारत को कृषि निर्यात केंद्र में बदलने के लिए उठाया गया एक और कदम था। यह आधी सदी से भी अधिक समय से चली आ रही और मुख्य रूप से घरेलू खाद्य सुरक्षा पर केंद्रित भारत की कृषि नीति से एक अलग रुख को दर्शाता है। पिछली किसी भी सरकार ने निर्यात को कृषि नीति का प्रमुख लक्ष्य नहीं बनाया था। खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता की नीति, जो 1960 के दशक के मध्य में हरित क्रांति को अपनाने की मूल वजह थी, कमोबेश अपरिवर्तित रही। इस तथ्य के पक्ष में सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य यह है कि विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में भारत की सभी सरकारों ने तर्क दिया कि देश की खाद्य सुरक्षा की जरूरतों को देखते हुए टैरिफ के जरिए संरक्षण और सब्सिडी महत्वपूर्ण कदम हैं। इसी परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखते हुए कृषि निर्यात को बढ़ावा देना इस क्षेत्र के लिए नीतिगत घोषणाओं के केंद्र में कभी नहीं रहा।</p>
<p>कृषि निर्यात को बढ़ावा देने में यह झिझक संभवतः उचित थी क्योंकि प्रमुख फसलों के उत्पादन में एक हद से अधिक अनिश्चितता थी। दूसरे शब्दों में कहें तो भारतीय कृषि स्वयं को खास उत्पादन चक्रों से मुक्त नहीं कर सकी, जिससे उत्पादन के स्तर में स्थिरता भी कायम नहीं रखी जा सकी। इसका नतीजा यह हुआ कि बासमती चावल के निर्यात को छोड़कर, जो वैसे ही देश के आम नागरिकों की थाली तक नहीं पहुंचता, भारत खुद को कृषि वस्तुओं के प्रमुख निर्यातक के रूप में स्थापित नहीं कर सका। एक तरफ तो यह क्षेत्र संरचनात्मक संकटों में फंस गया और दूसरी तरफ, किसान इस बात को लेकर आंदोलन करते रहे कि खेती उनके लिए मुनाफे का काम नहीं रह गया है। ऐसे में अधिकांश फसलों का उत्पादन स्तर बनाए रखना स्पष्ट रूप से एक कठिन काम था।</p>
<p>देश को एक प्रमुख कृषि निर्यातक के रूप में स्थापित करने में जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, उन्हें कृषि निर्यात नीति अपनाने के बाद के घटनाक्रमों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। वर्ष 2020-21 में कृषि वस्तुओं के निर्यात में 25% से अधिक की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। जब भारत की कुल निर्यात वृद्धि सात प्रतिशत से कम थी, कृषि निर्यात में ऐसी वृद्धि एक स्वागत योग्य घटना थी। दोनों प्रमुख अनाजों का निर्यात तो और भी प्रभावशाली था। गेहूं के रिकॉर्ड उत्पादन और बढ़ते बफर स्टॉक के चलते इसका निर्यात बढ़कर 55 करोड़ डॉलर तक पहुंच गया, जो एक साल पहले केवल 6.2 करोड़ डॉलर था। इस प्रकार, जिस कमोडिटी में भारत हमेशा वैश्विक बाजार में एक छोटा खिलाड़ी रहा, उसमें 2014-15 के बाद से निर्यात का उच्चतम स्तर दर्ज किया गया। भारत अपने पड़ोसियों के लिए गेहूं के एक प्रमुख निर्यातक के रूप में उभरा और बांग्लादेश इसका सबसे बड़ा लाभार्थी था।</p>
<p>अगले वर्ष घरेलू उत्पादन और स्टॉक का स्तर बेहद अनुकूल रहने के कारण गेहूं का निर्यात 2.1 अरब डॉलर के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया। भारत ने सिर्फ बांग्लादेश को 1.1 अरब डॉलर का निर्यात किया, जो एक वर्ष पहले की तुलना में तीन गुना था। पश्चिम और दक्षिण पूर्व एशिया के कई देश भारत के बाजार के रूप में उभरे और भारत गेहूं के शीर्ष 10 निर्यातकों में शुमार हो गया।</p>
<p>इसी अवधि के दौरान अच्छे घरेलू उत्पादन और बेहतर स्टॉक के कारण गैर-बासमती, या चावल की सामान्य किस्मों के निर्यात में भी लगातार वृद्धि हुई। वर्ष 2020-21 में चावल की इस किस्म का निर्यात तो बासमती से भी अधिक हो गया, जो अब तक का सबसे अधिक कृषि निर्यात है। चावल निर्यात बाजार पर अपना नियंत्रण मजबूत करने के अलावा भारत को बेनिन और टोगो सहित अफ्रीका में नए बाजार मिले थे। भारत के चावल निर्यात से बांग्लादेश और चीन को भी कोविड महामारी के बाद की समस्याओं से उबरने में मदद मिली।</p>
<p>लेकिन, पिछले दशक के अंत से कृषि निर्यात में तेजी की जो उम्मीदें बनी थीं, वह बीते वित्त वर्ष के शुरुआती महीनों में लगभग गायब हो गईं। स्थिति में उलटफेर 2022-23 में हुआ था, क्योंकि गेहूं के भंडार में कमी के संकेत दिख रहे थे। आपूर्ति कम होने के साथ सरकार ने गेहूं के निर्यात पर अंकुश लगा दिया, जो घटकर 1.5 अरब डॉलर रह गया। चावल निर्यात पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया और पारबॉयल्ड चावल पर 20% एक्सपोर्ट ड्यूटी लगा दी गई।</p>
<p>गेहूं उत्पादन में बड़ी गिरावट के परिणामस्वरूप 2023-24 में इसका निर्यात गिरकर 5.4 करोड़ डॉलर रह गया, जो 2011-12 के बाद सबसे निचला स्तर है। पारबॉयल्ड चावल के निर्यात पर सरकार के प्रतिबंध का बांग्लादेश पर बड़ा प्रभाव पड़ा, जो भारत से इस किस्म के चावल का मुख्य आयातक है।</p>
<p>पिछले दो वर्षों के अनुभव भारत के कृषि नीति निर्माताओं के लिए बड़ी सीख हैं कि एक विश्वसनीय कृषि निर्यातक के रूप में उभरने के लिए देश की कृषि की बुनियाद को काफी मजबूत किया जाना चाहिए। हालांकि यह तर्क दिया जा सकता है कि सरकार का निर्यात पर प्रतिबंध लगाना उचित था, क्योंकि खाद्य महंगाई घरेलू अर्थव्यवस्था में अस्थिरता का खतरा पैदा कर रही थी। लेकिन इस तरह के अचानक प्रतिबंध से वैश्विक आपूर्ति में गंभीर व्यवधान पैदा होता है, जिससे खाद्य आयातक देशों में खाद्य असुरक्षा बढ़ जाती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत के पास अपने पड़ोसी देशों के साथ अफ्रीका के भी कई देशों में खाद्यान्न की कमी को पूरा करने की क्षमता है, लेकिन इसके पास आपूर्ति के विश्वसनीय स्रोत के रूप में वैश्विक बाजार में बने रहने की क्षमता की कमी है। यह समस्या दशकों से इस क्षेत्र की उपेक्षा से उत्पन्न हुई है। सवाल है कि क्या यथास्थिति को बदलने की राजनीतिक इच्छाशक्ति है?</p>
<p><strong>(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के रिटायर्ड प्रोफेसर और काउंसिल फॉर सोशल डेवलपमेंट में विशिष्ट प्रोफेसर हैं)</strong></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ विश्वसनीय कृषि निर्यातक बनने के लिए देश की कृषि की बुनियाद को मजबूत करना जरूरी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[गठबंधन सरकार में बिना शर्त कोई समर्थन नहीं होता, हर कोई हिस्सा मांगेगा!]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/there-is-no-unconditional-support-in-a-coalition-government-everyone-will-ask-for-a-share.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 05 Jun 2024 19:43:53 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/there-is-no-unconditional-support-in-a-coalition-government-everyone-will-ask-for-a-share.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>लोक सभा चुनाव 2024 के नतीजे आ चुके हैं। पिछले दो चुनावों में अपने बूते बहुमत हासिल करने वाली भाजपा बहुमत के आंकड़े से 32 सीट पीछे है। लेकिन कुछ माह पहले फिर से चर्चा में आये राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के पास 293 सीटों के साथ बहुमत का आंकड़ा है। इस आंकड़े को बहुमत तक पहुंचाने वाले दो बड़े सहयोगी जनता दल (यू) और तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) के प्रमुख नीतीश कुमार और चंद्र बाबू नायडू का रिश्ता भाजपा के साथ बदलता रहा है। दोनों बीच में कांग्रेस के सहयोगी रहे और अब भाजपा के साथ हैं।</p>
<p>इसके साथ ही यह भी सच है कि पिछले दस साल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चली सरकार "मोदी सरकार" थी जिसे कभी एनडीए सरकार के तौर पर प्रचारित नहीं किया गया। बल्कि भाजपा सरकार की बजाय वह मोदी सरकार के रूप में ही अधिक जानी गई। यही वजह है कि पूरे चुनाव में मोदी की गारंटी और मोदी का चेहरा ही आगे रहा। लेकिन चुनाव नतीजों के बाद जो संभावनाएं हैं उसमें एनडीए की सरकार बनना तय है। इस तरह देश में एक दशक बाद गठबंधन सरकार होगी।</p>
<p>सवाल उठता है कि भाजपा के पिछली बार 303 सीटों के आंकड़े से इस बार 63 सीट घटकर 240 सीटों पर आने की क्या वजह रही है। यही वह सवाल है जो इस गठबंधन की दिशा तय करेगा। असल में इन चुनावों से साफ हो गया है कि भारत में प्रेसिडेंशियल रेफरेंडम जैसा चुनाव नहीं हो सकता है। किसी एक नेता के नाम और काम पर देश की जनता केंद्र सरकार के लिए बहुमत देने को तैयार नहीं है। दूसरे, सरकार के विकास के बड़े दावों पर लोगों को पूरा भरोसा नहीं है क्योंकि जमीनी हकीकत सरकार की दावों से अलग है।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/06/image_750x_666070ed1bec7.jpg" alt="" /></p>
<p>भले ही 8.2 फीसदी की जीडीपी वृद्धि दर हासिल की गई हो लेकिन ग्रामीण आबादी और निम्न मध्य वर्ग की आर्थिक स्थिति कमजोर है। रोजगार लेने की बजाय रोजगार देने वाले जैसे उदाहरण अब लोगों के गले नहीं उतर रहे हैं। बेरोजगारी एक बड़ा मुद्दा है जिसे विपक्ष ने भाजपा के खिलाफ भुनाने की कोशिश की और कई जगह कामयाब भी हुआ। देश में अमीरी-गरीब की बढ़ती खाई और आर्थिक असमानता का मुद्दा भी इन चुनावों में छाया रहा। सरकारी विभागों में भर्तियां न होना किस तरह से बेरोजगारों को नाराज कर रहा है वह इन नतीजों में दिखा है।</p>
<p>सरकार कोई भी दावा करती रहे लेकिन मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में रोजगार कम हो रहा है और कृषि पर निर्भरता बढ़ रही है। ऊपर से ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओ के लिए सेना में रोजगार के विकल्प को अग्निवीर योजना ने सीमित कर दिया है। जिसे विपक्षी दलों ने उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब जैसे सेना में सबसे अधिक जवान भेजने वाले राज्यों में सरकार के खिलाफ माहौल बनाने में इस्तेमाल किया है।</p>
<p>ग्रामीण सीटों पर भाजपा को 2019 के मुकाबले इन चुनावों में भारी नुकसान हुआ है। कृषि से जुड़े मसलों पर किसानों की सरकार से नाराजगी है। महाराष्ट्र, हरियाणा, राजस्थान, पंजाब और उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों की ग्रामीण सीटों पर भाजपा को हुआ नुकसान है। किसान आंदोलन, फसलों की वाजिब कीमतों का मुद्दा, निर्यात पर प्रतिबंध, आयात की खुली छूट जैसे मसलों ने किसानों के मत को प्रभावित किया। वहींं, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी व उनके सहयोगियों ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी गारंटी और किसान कर्जा माफी जैसे मुद्दों को भुनाने का प्रयास किया। जबकि भाजपा के चुनाव घोषणा-पत्र में किसानों, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, रोजगार के अवसर और छोटे कारोबारियों के लिए बहुत कुछ कहने को नहीं था। क्योंकि वह जो अभी कर रही है उसी को सही मान रही थी।</p>
<p>इसके साथ ही इस चुनाव की एक बड़ी सीख यह है कि जहां अल्पसंख्यकों और खासतौर से मुसलमानों ने अपने मत का भाजपा के खिलाफ बेहतर उपयोग किया। वहीं हिंदुत्व का मुद्दा हिंदुओं को भाजपा के पक्ष में उस तरह एकजुट नहीं कर सका, जिस तरह 2014 और 2019 में किया था। भाजपा को सबसे बड़ा झटका फैजाबाद सीट का लगा जहां अयोध्या में राम मंदिर को भाजपा की जीत की गारंटी माना जा रहा था।&nbsp;</p>
<p>सब बहुत अच्छा चल रहा है। इस धारणा से भाजपा को बचना होगा। क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था के तेज गति से बढ़ते जाने के बावजूद आम आदमी के लिए स्थिति बहुत बेहतर नहीं है। महंगाई और बेरोजगारी बड़े मुद्दे हैं। सरकार की मुफ्त अनाज से लेकर घर, शौचालय और उज्जवला जैसी योजनाओं से लाभार्थी बना वर्ग भी अब भाजपा के लिए बड़ा जिताऊ फैक्टर नहीं है, यह भी इस चुनाव में साबित होता दिख रहा है।&nbsp;</p>
<p>ऐस में केंद्र में बनने वाली गठबंधन सरकार की राह आसान नहीं होगी। भाजपा के साथ फिर से आये नीतीश कुमार और चंद्र बाबू नायडू गठबंधन की राजनीति के दिग्गज राजनेता हैं। वहीं सही मायने में नरेंद्र मोदी के लिए यह पहली गठबंधन पर निर्भर सरकार होगी। जिसमें सहयोगी दल प्रभावी हिस्सेदारी चाहेंगे। साथ ही सरकार के फैसलों में अब सहयोगी दलों की राय के मायने होंगे। ऐसे में तथाकथित बड़े फैसलों के लिए गठबंधन धर्म निभाने की शर्त जुड़ जाएगी। इसकी पहली परीक्षा तो भावी सरकार के मंत्रिमंडल गठन में होगी। उसके बाद सहयोगी दलों की मांगों का दबाव रहेगा। बिहार और आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग उठ सकती है। विपक्षी दल इस मांग पर पहले ही जोर देते रहे हैं। सरकार में हिस्सेदारी लेने वाले जदयू और टीडीपी पर इस मांग का दबाव रहेगा।</p>
<p>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव के दौरान सरकारी अधिकारियों से नई सरकार के लिए जो 100 दिन का एजेंडा बनवाया था, उसमें शामिल कई फैसलें गठबंधन की विवशता से बाधित हो सकते हैं या ठंडे बस्ते में जा सकते हैं। हालांकि कुछ लोगों का यह भी मानना है कि जब प्रधानमंत्री दस साल से सरकार चला रहे हैं अब 100 दिन के एजेंडा की बात करना उचित नहीं है। बहरहाल दस साल बाद देश में गठबंधन सरकार बनेगी। हालांकि गठबंधन सरकारों में देशहित के कई महत्वपूर्ण काम हुए हैं। ऐसी ही उम्मीद नई सरकार से भी रहेगी।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ गठबंधन सरकार में बिना शर्त कोई समर्थन नहीं होता, हर कोई हिस्सा मांगेगा! ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[यूपी में कैसे उभरा नया नायक, नए सियासी समीकरण का संकेत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/how-a-new-hero-emerged-in-up-a-sign-of-a-new-political-equation.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 05 Jun 2024 17:02:49 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/how-a-new-hero-emerged-in-up-a-sign-of-a-new-political-equation.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>इन लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में कई बड़े उलटफेर हुए। राज्य की नगीना लोकसभा सीट पर आजाद समाज पार्टी (<span>कांशी राम</span>) <span>के उम्मीदवार चंद्रशेखर आजाद ने 1.51 लाख से अधिक वोटों से जीत हासिल कर सबको चौंका दिया। चंद्रशेखर की जीत बसपा के लिए खतरे की घंटी बताई जा रही है। नगीना में पिछली बार बसपा जीती थी। लेकिन इस बार बसपा उम्मीदवार को मात्र 13 हजार वोट मिले और वह चौथे स्थान पर रहा। नगीना में चंद्रशेखर को 51.19 फीसदी</span>, <span>भाजपा को 36.06 फीसदी</span>, <span>सपा को 10.22 फीसदी और बसपा को मात्र 1.33 फीसदी वोट मिले।</span></p>
<p>मायावती पहली बार 1989 में बिजनौर लोक सभा सीट से संसद पहुंची थीं। अब उसी बिजनौर जिले की नगीना सीट से दलित राजनीति ने करवट ली है और एक नया दलित नेता उभरा है। लेकिन चंद्रशेखर की जीत सिर्फ बसपा के लिए ही खतरे की घंटी नहीं है। नगीना में उन्होंने जिस तरह मुस्लिम, <span>दलित और जाट समुदाय का समर्थन प्राप्त किया</span>,<span> वह यूपी के तमाम राजनीतिक दलों की बेचैनी बढ़ाएगा।&nbsp;</span>यह उसी पीडीए (<span>पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक</span>)<span> से मिलता-जुलता समीकरण है जिसे अखिलेश यादव यूपी में अपनी कामयाबी का श्रेय दे रहे हैं। जिसके चलते समाजवादी पार्टी 37 लोक सभा सीटें लेकर संसद में यूपी की सबसे बड़ी पार्टी बन गई है।&nbsp;</span></p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/06/image_750x_66604d6e520af.jpg" alt="" width="824" height="312" style="display: block; margin-left: auto; margin-right: auto;" /></p>
<p>नगीना में चंद्रशेखर भी इसी सियासी समीकरण को साधने में कामयाब रहे, <span>जिसके चलते भाजपा उम्मीदवार और तीन बार के विधायक ओम कुमार को उन्होंने भारी अंतर से शिकस्त दी। साथ ही सपा के उम्मीदवार मनोज कुमार को तीसरे स्थान पर पहुंचा दिया, जो लगभग चार लाख वोटों के अंतर से हारे। यूपी में शानदार प्रदर्शन करने वाली सपा की किसी भी मुस्लिम बहुल सीट पर इतनी बड़ी हार नहीं हुई है</span>, <span>जितनी नगीना में हुई। इन नतीजों को देखकर समझना मुश्किल नहीं है</span>, <span>आखिर क्यों विपक्षी दलों ने चंद्रशेखर से किनारा कर लिया था। </span></p>
<p>यूपी विधानसभा चुनाव के बाद से ही चंद्रशेखर नगीना से चुनाव लड़ने की तैयारी में जुट गये थे। उन्हें पूरी उम्मीद थी विपक्षी गठबंधन में सपा, <span>रालोद और कांग्रेस का समर्थन उन्हें मिलेगा। लेकिन लोक सभा चुनाव से ठीक पहले सपा-रालोद का गठबंधन टूट गया। फिर सपा ने नगीना में अपना उम्मीदवार उतार दिया। यह चंद्रशेखर के लिए बड़ा झटका था। लेकिन नगीना में चंद्रशेखर को जिस तरह का जन समर्थन मिल रहा था</span>, <span>उससे उन्हें अकेले अपने दम पर चुनाव में उतरने का फैसला किया। पश्चिमी यूपी की इस सीट पर किसान आंदोलन का असर भी था। </span></p>
<p><span>दिल्ली में किसान आंदोलन और पहलवानों के प्रदर्शन के दौरान चंद्रशेखर ने जिस तरह वहां पहुंचकर समर्थन दिया था</span>, <span>उससे किसानों के बीच भी उनकी लोकप्रियता बढ़ी है। दलित-पिछड़ों और अल्संख्यकों के मुद्दों पर लगातार जमीनी संघर्ष के कारण चंद्रशेखर एक यूथ आइकन बनकर उभरे। मायावती जहां सरकार से सीधा टकराव मोल लेने से बचती दिखीं, वहीं चंद्रशेखर कमजोर के साथ खड़े होने वाले सबसे पहले लोगों में शुमार हो गये। इस छवि का नगीना में उन्हें फायदा मिला।&nbsp;</span></p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/06/image_750x_66604d8b78f5e.jpg" alt="" style="display: block; margin-left: auto; margin-right: auto;" /></p>
<p>चंद्रशेखर को समर्थन न देने का इंडिया गठबंधन को अब मलाल जरूर होगा। लेकिन इसके पीछे सियासी दलों की आपसी प्रतिस्पर्धा और नेताओं का असुरक्षा बोध है। ऐसी खबरें आई कि सपा चाहती थी कि चंद्रशेखर समाजवादी पार्टी से साइकिल के सिंबल पर चुनाव लड़े। जिसके लिए वह तैयार नहीं हुए और अकेले अपनी पार्टी से चुनावी रण में हुंकार भर दी। नगीना में लंबे समय से डटे रहने का फायदा उन्हें मिला। साथ ही वे गांव-गांव जाकर लोगों के बीच में रहे। उनसे कनेक्ट बनाने में कामयाब रहे। &nbsp;</p>
<p>विपक्षी दलों के चंद्रशेखर से किनारा करने और बसपा के आकाश आनंद की उन पर हल्की टिप्पणियों का उन्हें फायदा ही हुआ। लोगों की सहानुभूति उनकी तरफ बढ़ने लगी। अखिलेश यादव ने भी नगीना लोकसभा क्षेत्र में जनसभा की और चंद्रशेखर पर निशाना साधा था। लेकिन नगीना की जनता चंद्रशेखर को जीत दिलाने का मन बना चुकी थी। दरअसल, दलितों के साथ-साथ मुस्लिम मतदाताओं का भरोसा जीतने की उनकी क्षमता बसपा के साथ-साथ सपा के लिए भी चुनौती बन सकती है। नगीना में उन्होंने जाट मतदाताओं में भी खासी लोकप्रियता हासिल की है। वहीं, उनकी जीत का अंतर बढ़ने का प्रमुख कारण है।&nbsp;</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/06/image_750x_66604df120aeb.jpg" alt="" style="display: block; margin-left: auto; margin-right: auto;" width="639" height="334" /></p>
<p>लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद साफ हो गया है कि बसपा का जनाधार खिसक रहा है। 2019 के लोकसभा में बसपा को यूपी में 10 सीटें और 19.43 <span>फीसदी मत प्राप्त हुए थे। इससे पहले 2014 में बसपा को कोई सीट तो नहीं मिली थी लेकिन वोट प्रतिशत तब भी 19.77 फीसदी था। 2024 में बसपा का खाता भी नहीं खुला है और वोट प्रतिशत घटकर </span>9.39 <span>फीसदी रह गया। यानी बसपा का लगभग आधा वोट बैंक खिसक चुका है। कई साल से लग रहा था कि बसपा के कमजोर होने का फायदा चंद्रशेखर उठा सकते हैं। आखिरकार नगीना में उन्होंने यह कर दिखाया। बसपा के खिसकते जनाधार का फायदा सपा और कांग्रेस को भी मिला है। ऐसे में अगर विपक्षी गठबंधन चंद्रशेखर को साथ लेता तो उसकी बढ़त में इजाफा ही होता। &nbsp;</span></p>
<p>अब सवाल यह है कि क्या नगीना में कामयाबी दिलाने वाले दलित, <span>मुस्लिम और जाट गठजोड़ के फार्मूले को चंद्रशेखर पश्चिमी यूपी में विस्तार दे पाएंगे</span>? <span>राष्ट्रीय लोकदल के विपक्षी खेमे को छोड़कर भाजपा से हाथ मिलाने के बाद पश्चिमी यूपी की विपक्षी राजनीति में एक खालीपन पैदा हुआ है। चंद्रशेखर इस खालीपन को भरने का प्रयास करेंगे। अगर वे अपनी जुझारू छवि और बसपा के घटते जनाधार के साथ नगीना की कामयाबी के फार्मूले को विस्तार दे पाए तो यूपी में मायावती की तरह बड़ी राजनीतिक ताकत बन सकते हैं।</span></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/06/image_750x500_66604c282078f.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ यूपी में कैसे उभरा नया नायक, नए सियासी समीकरण का संकेत ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[अमृत काल में कृषि&amp;#45;खाद्य प्रणाली में बदलाव के लिए इनोवेशन]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/innovations-for-transformation-in-agri-food-systems-in-the-amrit-kaal.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 03 Jun 2024 13:36:36 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/innovations-for-transformation-in-agri-food-systems-in-the-amrit-kaal.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>वैश्विक कृषि-खाद्य प्रणाली इस समय कई चुनौतियों का सामना कर रही है। दुनिया की आबादी वर्ष 2050 तक 980 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। इसे खिलाने के लिए खाद्य उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि की आवश्यकता है। इसे प्राकृतिक संसाधनों में कमी, जलवायु परिवर्तन और उत्पादन की बढ़ती लागत की समस्या पर विचार करते हुए हासिल करने की जरूरत है। मौजूदा कृषि-खाद्य प्रणाली कई खामियों और खेती की गैर-टिकाऊ प्रथाओं से भी जूझ रही है। छोटे किसानों के पास नई प्रौद्योगिकी और संसाधनों तक पहुंच का अभाव है। प्रचलित कृषि पद्धतियां हमारे प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन कर रही हैं। इनसे बड़ी मात्रा में खाद्य अपशिष्ट पैदा होता है तथा ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन भी होता है। कोविड-19 महामारी के बाद गरीबी में और वृद्धि हुई है। जैसा कि संयुक्त राष्ट्र खाद्य प्रणाली सम्मेलन में बताया गया, 93 देशों में भोजन की गंभीर कमी के कारण स्थानीय खाद्य प्रणाली और पुनर्योजी (रिजेनरेटिव) कृषि पर अधिक निर्भरता की जरूरत महसूस हुई है। इसलिए, अब प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करते हुए कृषि में लचीलापन लाने का दबाव है, ताकि स्थानीय खाद्य प्रणालियों के माध्यम से निरंतर खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।</p>
<p>2030 तक सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) को प्राप्त करना एक और चुनौती है जिससे अधिकांश देशों को प्राथमिकता के आधार पर निपटना है। यह भी स्पष्ट है कि भारत के इन लक्ष्यों को प्राप्त किए बिना वैश्विक स्तर पर एसडीजी को हासिल नहीं किया जा सकता है। पेरिस समझौते में ग्रीनहाउस गैस (जीएचजी) उत्सर्जन को कम करने और 300 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड समकक्ष के स्तर तक कार्बन पृथक्करण (सीक्वेस्ट्रेशन) में कृषि की भूमिका बताई गई है। इसके लिए पशुधन, विशेषकर गोवंश के बेहतर प्रबंधन, उर्वरकों के कुशल उपयोग और चावल तथा गन्ना जैसी फसलों में पानी का इस्तेमाल कम करने की जरूरत है। इसके साथ रिजेनरेटिव कृषि के माध्यम से मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार की भी आवश्यकता है। इसमें कृषि वानिकी पर जोर देने (हर मेड़ पर पेड़) के साथ संरक्षण कृषि भी शामिल है। इसलिए 5 साल से कम उम्र के अल्पपोषित बच्चों (46%) पर ध्यान देने के साथ मौजूदा उच्च जनसंख्या वृद्धि और गरीबी (16.4%) के दुष्चक्र को तोड़ना अमृत काल की मुख्य प्राथमिकता होनी चाहिए।</p>
<p>साठ के दशक के उत्तरार्ध में हरित क्रांति की बदौलत हम जनसंख्या में साढ़े चार गुना वृद्धि के मुकाबले खाद्यान्न उत्पादन साढ़े छह गुना (32.35 करोड़ टन) बढ़ाने में सफल रहे हैं। भारत खाद्यान्न का आयात करने वाले देश से एक महत्वपूर्ण कृषि निर्यातक के रूप में उभरा है। भारत का सालाना कृषि निर्यात लगभग 55 अरब डॉलर पहुंच गया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि इन उपलब्धियों की कीमत जलवायु परिवर्तन के अलावा प्राकृतिक संसाधनों पर प्रतिकूल प्रभाव के रूप में चुकानी पड़ी है। भारत ने बागवानी (34.15 करोड़ टन), दूध उत्पादन (21 करोड़ टन) और मछली उत्पादन (142 लाख टन) में भी उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। देश में खाद्यान्न का बफर स्टॉक 2020 तक लगभग 950 लाख टन तक पहुंच गया। कृषि उत्पादन, उत्पादकता और गरीबी में कमी में ये उपलब्धियां खाद्य सुरक्षा और लाखों छोटे किसानों के लिए बेहतर आजीविका की दिशा में भारत की उल्लेखनीय प्रगति को उजागर करती हैं। विभिन्न क्रांतियों (हरित, श्वेत, नीली, इंद्रधनुष) की सफलता के आधार में राजनीतिक इच्छाशक्ति, संस्थानों की भूमिका, मानव संसाधन और भागीदारी के अलावा निवेश करने और नई प्रौद्योगिकी अपनाने के इच्छुक प्रगतिशील किसान शामिल हैं।</p>
<p>अमृत काल में प्रवेश करते समय हमें आनुवांशिक बेहतरी से प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन की ओर जाने की जरूरत है, विकास के लिए कृषि अनुसंधान (एआर4डी) से विकास के लिए कृषि अनुसंधान और इनोवेशन (एआरआई4डी) की ओर जाने की आवश्यकता है। नए विज्ञान का लाभ उठाने के मकसद से कृषि अनुसंधान पर निवेश दोगुना करने के लिए नीतिगत समर्थन की आवश्यकता है। इसके साथ ही आनुवंशिक रूप से संशोधित (जीएम) फसलों, जीनोम/जीन एडिटिंग, जैव सूचना विज्ञान, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, ड्रोन, मशीनीकरण और संरक्षण कृषि जैसे इनोवेशन को भी बढ़ाने की जरूरत है। वैल्यू चेन के माध्यम से उत्पादन के बाद के प्रबंधन और किसानों को बाजार से जोड़ने (आंतरिक और वैश्विक दोनों) पर अधिक जोर देना होगा। बौद्धिक संपदा (आईपी) अधिकारों की रक्षा करते हुए तेज डिलीवरी और नई प्रौद्योगिकी को अपनाने के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) को मजबूत करने से इसमें तेजी आएगी। हर्बिसाइड सहिष्णु किस्मों के साथ डायरेक्ट सीडिंग वाले चावल (चित्र 1) जैसे कम पानी इस्तेमाल के तरीके नए अवसर प्रदान करेंगे।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/06/image_750x_665d78da682d9.jpg" alt="" /></p>
<p><em><strong>हर्बिसाइड टॉलरेंट (एचटी) डायरेक्ट सीडेड राइस (डीएसआर), फोटोः ए के सिंह, आईएआरआई</strong></em></p>
<p>इनोवेशन बढ़ाने पर अधिक ध्यान केंद्रित करने वाले देशों ने ज्यादा प्रगति की है। इस संबंध में हमें नए इनोवेशन की गति तेज करनी होगी और कृषि में नए पेटेंट दाखिल करने के लिए बौद्धिक संपदा व्यवस्था प्रदान करनी होगी। उदाहरण के लिए वर्ष 2022 में चीन ने 15.8 लाख पेटेंट दाखिल किए थे, जबकि अमेरिका में 5,05,539 और भारत में 55,718 पेटेंट दाखिल किए गए। अमेरिका और चीन में क्रमशः मक्का और चावल की संकर किस्मों और भारत में बीटी कपास की सफलता की कहानियां कृषि में तेज विकास के लिए इनोवेशन की क्षमता को प्रदर्शित करती हैं। इसलिए हमें अब विश्व स्तर पर सोचने और स्थानीय स्तर पर कार्य करने की आवश्यकता है ताकि सफलताओं को दोहराया जा सके और जहां अवसर हो वहां उत्कृष्टता हासिल करने के लिए तेजी से आगे बढ़ सकें। उदाहरण के लिए बीटी कपास प्रौद्योगिकी को अपनाना भारत में एक उल्लेखनीय सफलता की कहानी है (चित्र 2)।&nbsp;</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/06/image_750x_665d78ea3a288.jpg" alt="" /></p>
<p>बीटी कपास के तहत खेती का क्षेत्र काफी बढ़ गया है। यह 70 लाख हेक्टेयर से 120 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया है। इसके परिणामस्वरूप कपास का उत्पादन लगभग दोगुना हुआ है। यह 2014 के 23 लाख टन से बढ़कर 40 लाख टन हो गया है। उल्लेखनीय रूप से कीटनाशकों का प्रयोग भी 40 प्रतिशत कम हुआ है, जिसका लाभ पर्यावरण और स्वास्थ्य में मिला। इस प्रक्रिया में लगभग 50 लाख कपास किसानों की आय तीन गुना बढ़ गई है। इसके अलावा, भारत से सालाना चार अरब डॉलर से अधिक का कपास निर्यात हो रहा है, जबकि बीटी कपास को अपनाने से पहले भारत आयातक देश था। एक अन्य उदाहरण सिंगल क्रॉस हाइब्रिड मक्का का है। पहला सिंगल क्रॉस मक्का हाइब्रिड 1995 में जारी किया गया था। सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों द्वारा विकसित इस नए हाइब्रिड ने रकबा को 60 लाख हेक्टेयर एक करोड़ हेक्टेयर तक बढ़ाने में मदद की है। सिर्फ दो दशक में उत्पादकता भी एक टन से बढ़कर 3.5 टन प्रति हेक्टेयर और कुल उत्पादन एक करोड़ टन से बढ़ कर 3.8 करोड़ टन (2022-23) हो गया है (चित्र 3)।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/06/image_750x_665d78f765d2c.jpg" alt="" /></p>
<p>शुष्क भूमि क्षेत्रों (अब भी 45%) में संरक्षण (बिना जुताई) कृषि जैसे प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन में इनोवेशन, सूक्ष्म सिंचाई, फर्टिगेशन, जैव उर्वरक और अपशिष्ट से कमाई जैसे क्षेत्र भी अनेक अवसर प्रदान करते हैं। अंतर्राष्ट्रीय मिलेट वर्ष (2023) ने भविष्य की खाद्य सुरक्षा के लिए स्थानीय खाद्य प्रणालियों के महत्व को रेखांकित किया है। अमृत काल में इनोवेशन और प्रौद्योगिकीय हस्तक्षेप की एक लहर कृषि-खाद्य प्रणाली को बदलने, उन्हें अधिक उत्पादक, टिकाऊ और न्यायसंगत बनाने के लिए तैयार है (चित्र 4)। जो इनोवेशन और प्रौद्योगिकी प्रचलन में हैं, तथा जिन्हें उत्पादन प्रणाली में सुधार के लिए लागू करने की आवश्यकता है, उन्हें चित्र 4 में दिखाया गया है।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/06/image_750x_665d7907249ad.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>कृषि में लचीलेपन के लिए इनोवेशन</strong><br /><strong>i) प्रिसीजन खेती:</strong> इसमें बेहतर निर्णय लेने के लिए डेटा और प्रौद्योगिकी का उपयोग किया जाता है। मिट्टी की नमी, पोषक तत्वों के स्तर और फसल के स्वास्थ्य पर रियल टाइम डेटा एकत्र करने के लिए खेतों में सेंसर नेटवर्क लगाने से सिंचाई, उर्वरकों प्रयोग और कीट नियंत्रण बेहतर होगा। इससे उपज अधिकतम और बर्बादी न्यूनतम होगी (चित्र 5)। इस संदर्भ में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग करके ड्रोन इमेजरी और उपग्रह डेटा का विश्लेषण जैसी तकनीक काफी मददगार होगी। इनसे किसान ज्यादा पैदावार के लिए उपलब्ध संसाधनों का श्रेष्ठतम उपयोग कर सकेंगे। छोटी जोत वाले किसानों के लिए सस्ती और सुलभ कृषि मशीनरी गेम-चेंजर साबित होगी, खासकर जब श्रम बहुत महंगा हो गया है।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/06/image_750x_665d791835f9b.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>(ii) कृषि जैव प्रौद्योगिकी:</strong> जीनोम/जीन संपादन जैसी उभरती जैव प्रौद्योगिकी (बायोटेक्नोलॉजी) कृषि उत्पादकता के साथ सस्टेनेबिलिटी बढ़ाने की भी संभावनाएं प्रदान करती हैं। ये तकनीक उन किस्मों/संकरों की ब्रीडिंग के लिए बेहतर होंगी जो कीटों, बीमारियों और जैविक-अजैविक कारकों के प्रति अधिक प्रतिरोधी हैं। इसके अलावा बायोफोर्टिफिकेशन से पोषण बढ़ाने और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी दूर करने में मदद मिलेगी।</p>
<p><strong>(iii) वर्टिकल फार्मिंग और नियंत्रित वातावरण में कृषि (सीईए):</strong> वर्टिकल फार्मिंग और नियंत्रित वातावरण में खेती, कृषि के लिए एक क्रांतिकारी दृष्टिकोण उपस्थित करते हैं। वे खाद्य पदार्थों को अधिक कुशलतापूर्वक, सस्टेनेबल तरीके से और उन स्थानों पर उगाने का अवसर प्रदान करते हैं जिन्हें पहले खेती के लिए अनुपयुक्त माना जाता था। जैसे शहरों के सीमित स्थानों में, यहां तक कि रेगिस्तान या अत्यधिक विषम जलवायु परिस्थिति वाले क्षेत्रों में भी। वर्टिकल खेती से जमीन और पानी, दोनों की आवश्यकता कम होगी। नियंत्रित वातावरण में खेती में तापमान, प्रकाश और आर्द्रता पर सटीक नियंत्रण होता है। इससे ज्यादा उत्पादन के लिए बेहतर परिस्थितियां बनती हैं।</p>
<p><strong>एक सतत उत्पादन प्रणाली के लिए इनोवेशन</strong><br /><strong>(i) रिजेनरेटिव कृषि:</strong> लंबे समय में मिट्टी के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले पारंपरिक तरीकों के विपरीत पुनर्योजी (रिजेनरेटिव) कृषि जलवायु परिवर्तन की चुनौती को कम करती है तथा भविष्य में सस्टेनेबल खाद्य उत्पादन के लिए बड़ी संभावना पैदा करती है (चित्र 6)। पुनर्योजी कृषि के तहत कवर क्रॉपिंग, कम या बिना जुताई वाली संरक्षण कृषि और कंपोस्ट बनाने जैसे तरीकों को अपनाने की आवश्यकता है।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/06/image_750x_665d7924bcdfc.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>(ii) चक्रीय अर्थव्यवस्था:</strong> एक सस्टेनेबल प्रणाली के लिए अपशिष्ट कम करना महत्वपूर्ण है। सर्कुलर अर्थव्यवस्था का दृष्टिकोण कृषि में व्यापक बदलाव ला सकता है। खाद्य उत्पादन चक्र में अपशिष्ट कम किया जाए और संसाधनों का अधिकतम उपयोग हो तो यह पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा के लिए एक तरह से जीत की स्थिति होगी। खाद्य अपशिष्ट कम करने की नीति के लिए तत्काल बेहतर भंडारण और परिवहन सुविधाओं, सह-उत्पादों को वैल्युएबल उत्पादों में बदलने और कंपोस्ट बनाने जैसे कुशल खाद्य अपशिष्ट प्रबंधन समाधान विकसित करने की आवश्यकता है।</p>
<p><strong>उचित उत्पादन प्रणाली के लिए इनोवेशन</strong><br /><strong>(i) डिजिटल प्लेटफॉर्म और ई-कॉमर्स:</strong> कृषि में डिजिटल क्रांति में छोटे किसानों को सशक्त बनाने और अधिक सस्टेनेबल खाद्य प्रणाली विकसित करने की क्षमता है। जैसे-जैसे ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल साक्षरता और प्रौद्योगिकी तक पहुंच बढ़ेगी, छोटे किसानों के जीवन पर अधिक सकारात्मक प्रभाव देख सकते हैं। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म किसानों को सीधे उपभोक्ताओं से जोड़ेंगे, बिचौलिये को खत्म करेंगे और किसानों का मुनाफा बढ़ाएंगे। ये प्लेटफॉर्म बाजार से संबंधित जानकारी, मौसम के पूर्वानुमान तथा अन्य आवश्यक कृषि सलाह दे सकते हैं, जिनसे किसान सशक्त होंगे।</p>
<p><strong>(ii) छोटे किसानों पर फोकस के साथ वित्तीय समावेशन:</strong> ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे और डिजिटल साक्षरता के क्षेत्र में चुनौतियां होने के बावजूद छोटे किसानों के लिए वित्तीय समावेशन में क्रांति लाने में ब्लॉकचेन की क्षमता निर्विवाद है। जैसे-जैसे प्रौद्योगिकी और पहुंच में सुधार होगा, हम एक ऐसा भविष्य देखने की उम्मीद कर सकते हैं जहां छोटे किसान न केवल फसलें उगाएंगे, बल्कि सफल व्यवसायी भी बनेंगे। छोटे किसानों के लिए ऋण की पहुंच आसान बनाने में ब्लॉकचेन तकनीक क्रांतिकारी बदलाव लाएगी। सुरक्षित और पारदर्शी फाइनेंशियल रिकॉर्ड बनाकर ब्लॉकचेन छोटे ऋण और वित्तीय सेवाओं की सुविधाएं बेहतर कर सकता है।</p>
<p><strong>(iii) जानकारी साझा करना और क्षमता निर्माण:</strong> जैसे-जैसे कृषि से संबंधित जानकारी और प्रौद्योगिकी विकसित होगी, कृषि एक्सटेंशन में इनोवेशन और उनका व्यापक इस्तेमाल अहम होता जाएगा। इसमें निजी एक्सटेंशन को बढ़ावा देने, जानकारी और सेवा दोनों के प्रसार के लिए प्रशिक्षित और कुशल युवाओं को शामिल करने की जरूरत है। किसानों को भी लगातार बदलती कृषि उत्पादन प्रणाली से निपटने की आवश्यकता है।</p>
<p><strong>निष्कर्ष</strong><br />इनोवेशन में हमारी कृषि-खाद्य प्रणाली को बदलने की अपार संभावनाएं हैं, फिर भी अनेक चुनौतियां हैं। छोटी जोत वाले किसानों के कल्याण और उनकी आय बढ़ाने के लिए प्रौद्योगिकी तक समान पहुंच सुनिश्चित करना और ग्रामीण क्षेत्रों में जानकारी के अंतर को पाटना चुनौती बनी हुई है। इसलिए कृषि-खाद्य प्रणाली को बदलने के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण चाहिए। एसडीजी हासिल करने और पेरिस समझौते के तहत की गई प्रतिबद्धताओं को पूरा करने की भी तत्काल आवश्यकता है, क्योंकि अब समय कम बचा है। इसके लिए विज्ञान में अधिक भरोसा और निवेश, नए इनोवेशन को बढ़ावा और सेकंडरी तथा विशिष्ट कृषि को अपनाने की जरूरत है। खाद्य प्रणाली के लिए एक समग्र दृष्टिकोण पर भी जोर दिया जाना चाहिए जिसमें उत्पादन और उत्पादन के बाद, दोनों पहलू शामिल हों। राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली (एनएआरएस) और अंतरराष्ट्रीय अनुसंधान केंद्रों (सीजीआईएआर के तहत एवं अन्य) के बीच सार्वजनिक-निजी जैसी मजबूत साझेदारियां बनाना अहम होगा। उद्यमशीलता, गुणवत्तापूर्ण इनपुट का उत्पादन और आपूर्ति तथा नई जानकारी और सलाह को साझा करने में प्राइवेट एक्सटेंशन की सफलता के लिए कृषि में युवाओं को प्रेरित और आकर्षित करना (माया) महत्वपूर्ण है। इसके अलावा, बेहतर निर्णय लेने के लिए ट्रस्ट फॉर एडवांसमेंट ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (तास) और नेशनल एकेडमी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (नास) जैसे तटस्थ थिंक टैंक के लगातार प्रयासों के माध्यम से पॉलिसी एडवोकेसी और जन-जागरूकता की आवश्यकता होगी ताकि अमृत काल में विज्ञान-आधारित नीतिगत निर्णय सुनिश्चित किए जा सकें।&nbsp;</p>
<p>अंत में, भविष्य में खाद्य, पोषण और पर्यावरण सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए वर्तमान राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली को मजबूत बनाने और अधिक फंडिंग के लिए कृषि जीडीपी के कम से कम एक फीसदी राशि की जरूरत है। देश की लक्षित पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र की भागीदारी कम से कम एक ट्रिलियन डॉलर करने के लिए यह आवश्यक है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि अमृत काल में कृषि-खाद्य प्रणाली में बदलाव राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा और कृषि क्षेत्र में हमारे वैश्विक नेतृत्व की कुंजी हैं।</p>
<p><em><strong>(लेखक पद्म भूषण से सम्मानित हैं। वे पूर्व सचिव डेयर तथा डीजी आईसीएआर और&nbsp; ट्रस्ट फॉर एडवांसमेंट ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज&nbsp; (तास) के चेयरमैन हैं)</strong></em></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/06/image_750x500_665d7983e82e8.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ अमृत काल में कृषि-खाद्य प्रणाली में बदलाव के लिए इनोवेशन ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[लोक सभा चुनाव में महंगाई, मंदिर और आरक्षण के बीच खो गया कृषि संकट]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/in-the-lok-sabha-elections-the-agriculture-crisis-got-lost-amidst-inflation-unemployment-temple-and-reservations.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 01 Jun 2024 14:29:30 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/in-the-lok-sabha-elections-the-agriculture-crisis-got-lost-amidst-inflation-unemployment-temple-and-reservations.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>लोक सभा चुनाव 2024 के आखिरी चरण के मतदान से एक दिन पहले केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) ने 2023-24 के लिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के प्रोविजनल आंकड़े जारी किये, जिसमें कृषि और सहयोगी क्षेत्र का ग्रास वैल्यू एडेड (जीवीए) केवल 1.4 फीसदी की दर से बढ़ा है। इसके विपरीत पूरी अर्थव्यवस्था के जीवीए की वृद्धि दर 7.2 फीसदी रही। जीवीए में कृषि की हिस्सेदारी 18 फीसदी हो गई है। यानी देश की 45 फीसदी रोजगार हिस्सेदारी वाला क्षेत्र ग्रोथ के मामले में बाकी क्षेत्रों से पिछड़ रहा है। दिलचस्प बात यह है कि इसके बावजूद लोक सभा चुनावों में कृषि संकट एक बड़े मुद्दे के रूप में जगह नहीं बना पाया।&nbsp;</p>
<p>असल में चुनाव में जहां भाजपा का फोकस मोदी की गारंटी, मंदिर, आरक्षण और करप्शन पर रहा, वहीं इंडिया गठबंधन और कांग्रेस सहित उसके बाकी घटक दल बेरोजगारी, महंगाई, आरक्षण और संविधान संशोधन व गरीबी को मुद्दा बना कर वोट लेने की कोशिश करते रहे। लेकिन कृषि संकट इन दोनों दावेदारों के मुद्दों के केंद्र में बहुत मजबूती से नहीं दिखा।&nbsp;</p>
<p>चुनावों में सत्तारूढ़ भाजपा ने मोदी की गारंटी को ही केंद्र में रखकर किसानों से वोट मांगे और उसमें प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि को जारी रखने पर जोर दिया। इसके अलावा पार्टी ने कोई बड़े बदलाव वाला वादा किसानों और कृषि क्षेत्र के लिए नहीं किया।&nbsp;</p>
<p>हालांकि कांग्रेस ने जरूर किसान न्याय के तहत न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को कानूनी गारंटी देने, एमएसपी तय करने के लिए एम एस स्वामीनाथन फार्मूले को आधार बनाने और किसानों के कर्ज माफ करने जैसे वादे किये।</p>
<p>तीन कृषि कानूनों की वापसी के बाद किसान संगठनों ने आंदोलन तो समाप्त कर दिया, लेकिन एमएसपी की कानूनी गारंटी की मांग को उन्होंने हमेशा केंद्र में रखा। इसके लिए दिल्ली के रामलीला मैदान में चुनाव के पहले संयुक्त किसान मोर्चा ने रैली की। संयुक्त किसान मोर्चा (अराजनैतिक) ने पंजाब और हरियाणा के शंभू बार्डर पर मोर्चा जारी रखा हुआ है जिसमें एमएसपी की कानूनी गारंटी एक मुख्य मुद्दा है।</p>
<p>चुनावों को लेकर किसान संगठनों का रुख भी अलग-अलग रहा है। मसलन, सबसे अधिक लोक सभा सीट वाले राज्य उत्तर प्रदेश में किसान संगठनों ने केंद्र और राज्य में सत्तारूढ़ भाजपा का चुनावों में खुलकर विरोध नहीं किया और मत के मामले में फैसला संगठन के लोगों के विवेक पर छोड़ दिया।&nbsp;</p>
<p>लेकिन हरियाणा और पंजाब में रुख इससे अलग दिखा। हरियाणा में भाजपा के उम्मीदवारों को ग्रामीण इलाकों में प्रचार में किसानों के विरोध के चलते मुश्किलें आईं और कई जगह वह गावों में प्रचार नहीं कर सके। पंजाब में यह विरोध हरियाणा से भी मुखर दिखा और वहां लगातार किसान संगठन भाजपा का विरोध करते रहे। यही नहीं, किसान संगठनों ने पंजाब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सभाओं का भी विरोध किया। इन दोनों राज्यों में किसान संगठनों ने भाजपा के विरोध में मत देने की अपील किसानों से की।&nbsp;</p>
<p>इसके अलावा महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में प्याज, गन्ना और कपास किसानों के मुद्दे चुनावों में चर्चा में आ सके। सरकार को चुनावों के बीच प्याज निर्यात पर प्रतिबंध हटाने का फैसला करना पड़ा ताकि इसके चलते हो रहे राजनीतिक नुकसान की भरपाई की जा सके।</p>
<p>केंद्र की मौजूदा नरेंद्र मोदी सरकार के 10 साल के कार्यकाल और उसके पूर्ववर्ती कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के 10 साल के कार्यकाल की बात करें तो कृषि क्षेत्र की स्थिति में बहुत बड़ा बदलाव नहीं दिखता है। यूपीए सरकार के दस साल में 2013-14 तक कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर 3.46 फीसदी रही थी और मोदी सरकार के दस साल में 2023-24 तक यह 3.69 फीसदी रही है। इसमें फसल उत्पादन की वृद्धि दर यूपीए के दौरान 3.39 फीसदी और मोदी सरकार के दौरान 1.98 फीसदी रही है।</p>
<p>हालांकि चुनावी शोर में भावनाएं और जल्दी पकड़ में आने वाले मुद्दे ही नारे और कैच वर्ड बनते हैं। ऐसे में कृषि संकट, कृषि कर्ज की समस्या, फसलों की कीमतें, कृषि शोध पर खर्च, बढ़ती लागत और घटती कमाई जैसे नीरस मुद्दों पर हवा नहीं बनती है और यही वजह है कि संकट के बावजूद कृषि संकट इन चुनावों में बड़ा केंद्रीय मुद्दा नहीं दिखा। &nbsp;&nbsp;</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/06/image_750x500_665adf407dc13.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ लोक सभा चुनाव में महंगाई, मंदिर और आरक्षण के बीच खो गया कृषि संकट ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/06/image_750x500_665adf407dc13.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[इकोसिस्टम मॉडलिंग और डेटा आधारित नीति&amp;#45;निर्माण की जरूरत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/ecosystems-modeling-and-need-of-data-informed-policy-decision.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 30 Apr 2024 13:53:50 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/ecosystems-modeling-and-need-of-data-informed-policy-decision.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) की लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट के अनुसार 1970 के दशक से वन्यजीवों की आबादी में लगभग 69 फीसदी की गिरावट आई है। इसका एक प्रमुख कारण प्राकृतिक आवासों का नष्ट होना है। इससे वन्यजीवों के लिए जगह कम रह गई है और बदलती परिस्थितियों के अनुकूल ढलने की उनकी क्षमता सीमित हो गई है। बढ़ते जलवायु खतरों के साथ वन्यजीव आबादी की बढ़ती हानि को देखते हुए पर्यावरण संरक्षण के लिए पारिस्थितिकी तंत्र और भू-दृश्य आधारित दृष्टिकोण पर अधिक जोर दिया जा रहा है। पर्यावरण संरक्षण के लिए यह अधिक समग्र दृष्टिकोण है, जिसमें भूमि और जल संसाधनों के साथ-साथ पारिस्थितिक तंत्र में रहने वाले सभी जीवों के एकीकृत प्रबंधन को महत्व दिया जाता है।&nbsp;</p>
<p>सदी के अंत तक, दुनिया के अनुमानित 23 फीसदी पर्यावास जलवायु परिवर्तन के कारण नष्ट हो जाने की आशंका है और वर्तमान तापमान वृद्धि के कारण दुनिया के लगभग 10 फीसदी स्तनधारियों के आवास खत्म होने की आशंका है। समग्र भू-दृश्य आधारित संरक्षण में डेटा का उपयोग कर यह अनुमान लगाया जाता है कि भविष्य में पारिस्थितिक तंत्र कैसे प्रभावित हो सकते हैं। जलवायु मॉडलिंग ने जलवायु कार्रवाई के लिए मानक स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जो यह दर्शाता है कि कहां महत्वपूर्ण बदलाव आने की संभावना है और मानव आबादी पर उनके व्यापक प्रभाव पड़ने की संभावना है। अब पारिस्थितिक तंत्र के लिए इसी तरह के पूर्वानुमानित मॉडल की आवश्यकता है। नीतिगत निर्णयों के लिए बेंचमार्क बनाए जाएं जो जलवायु संकट से निपटने और ग्रामीण समुदायों के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पारिस्थितिकी तंत्र की पहचान कर सकें।</p>
<p><strong>इकोसिस्टम मॉडलिंग </strong></p>
<p>जलवायु विज्ञान यह निर्धारित करने के लिए परिष्कृत मॉडलिंग प्रणालियों पर बहुत अधिक निर्भर करता है कि बदलते वायुमंडलीय कारक जैसे - ग्रीनहाउस गैसें, बदलते तापमान, ग्लेशियर, जलधाराएं और मौसम प्रणालियां आपस में कैसे जुड़े हैं और एक-दूसरे को कैसे प्रभावित करते हैं। जलवायु-आधारित पारिस्थितिकी तंत्र मॉडल के जरिए कार्बन सिंक (जैसे अमेजोन वर्षावन) के रूप में कार्य करने वाले प्रमुख पारिस्थितिक तंत्रों के टिपिंग बिंदु की भविष्यवाणी की जा सकती है। अध्ययनों से पता चला है कि जलवायु परिवर्तन से वैश्विक स्वास्थ्य को खतरा है क्योंकि तापमान बढ़ने से मच्छरों जैसे रोग वाहकों के आवास का विस्तार हो रहा है। भविष्य में, इससे पारंपरिक उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के बाहर मलेरिया और डेंगू जैसी बीमारियों का प्रसार बढ़ने की आशंका है।&nbsp;</p>
<p>फिलहाल पारिस्थितिकी तंत्र मॉडलिंग का मुख्य रूप से छोटे पैमाने पर उपयोग किया जा रहा है जो एक विशेष पारिस्थितिकी तंत्र या लैंडस्कैप पर ध्यान केंद्रित करता है। आमतौर पर इसका उपयोग संरक्षण से जुड़े विभिन्न निर्णयों के परिणामों का परीक्षण करने के लिए किया जाता है। जैसे कि एक नई प्रजाति को लाने के व्यापक प्रभाव, प्रजातियों की आबादी का प्रबंधन, प्रवासन और आवासों को बहाल करना। जलवायु परिवर्तन भारत में जंगलों को कैसे प्रभावित कर रहा है, यह समझने के लिए 2022 के एक अध्ययन से पता चला कि यह प्रभाव कितना जटिल हो सकता है। 2000 से 2018 के बीच के आंकड़ों के अध्ययन में पाया गया कि जलवायु परिवर्तन की उच्च दर यानी जलवायु वेग का वन हानि पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ा। जांच करने पर पता चला कि उत्तर पश्चिम भारत में तेजी से घटती वर्षा और बढ़ता तापमान वन हानि का एक मजबूत पूर्वानुमान था। उत्तर पूर्व भारत में, वर्षा और तापमान में गिरावट हो रही थी, जिससे वनों का नुकसान हो रहा था। कृषि उपज में गिरावट और अधिक ईंधन की लकड़ी की पैदावार जैसे मध्यस्थ कारक वनों के नुकसान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे।&nbsp;</p>
<p>किसी पारिस्थितिकी तंत्र के भीतर व्यक्तियों के व्यवहार की भविष्यवाणी करना पारिस्थितिकी तंत्र मॉडल के लिए सबसे कठिन बाधाओं में से एक को दर्शाता है। जलवायु मॉडल काफी हद तक स्थलीय प्रणालियों पर निर्भर करते हैं। पारिस्थितिकी तंत्र मॉडल पारिस्थितिकी तंत्र में व्यक्तिगत कारकों द्वारा प्रभावित होते हैं। इसमें लोग और वन्यजीव दोनों शामिल होते हैं, जिससे भविष्यवाणियां जटिल हो जाती हैं।</p>
<p><strong>नीति निर्माण में इकोसिस्टम मॉडलिंग का महत्व&nbsp;</strong></p>
<p>भारत दुनिया में सबसे अधिक जलवायु संकटग्रस्त देशों में से एक है। यह तेजी से अनियमित मानसून, बढ़ते तापमान और कृषि आय के लिए मौसम पर निर्भर अत्यधिक ग्रामीण आबादी की चुनौती का सामना कर रहा है। भारत का पांचवां हिस्सा सूखे जैसी स्थितियों से प्रभावित रहता है। जलवायु परिवर्तन के कारण 2050 तक फसलों की पैदावार में 9 फीसदी तक की गिरावट आने की आशंका है। भारतीय वन सर्वेक्षण रिपोर्ट-2021 के अनुसार, इस दशक के भीतर भारत के 45-64 फीसदी वन जलवायु परिवर्तन हॉटस्पॉट के भीतर होंगे। यह समझने के लिए कि बदलते जलवायु पैटर्न वनों को कैसे प्रभावित कर रहे हैं और यह अनुमान लगाने के लिए कि वे भविष्य में कैसे प्रभावित होते रहेंगे, जंगलों और जलवायु के डेटा की मदद से पारिस्थितिकी तंत्र मॉडलिंग की आवश्यकता है।&nbsp;&nbsp;</p>
<p>वन हानि और पारिस्थितिकी तंत्र और जलवायु डेटा पर रिमोट सेंसिंग डेटा को सक्रिय रूप से ट्रैक करना भी महत्वपूर्ण है कि वन हानि आस-पास के क्षेत्रों को कैसे प्रभावित करती है। उदाहरण के लिए माइक्रॉक्लाइमेट में परिवर्तन, मिट्टी की संरचना और उर्वरता में परिवर्तन, जैव विविधता डेटा, आस-पास के समुदायों में कृषि उपज, मानव-पशु संघर्ष आदि से जुड़े आंकड़े पारिस्थितिकी तंत्र मॉडलिंग के लिए महत्वपूर्ण हैं। इन मॉडलों का उपयोग पूर्वानुमान के लिए किया जा सकता है ताकि यह पता लगाया जा सके कि बदलते वन भू-दृश्य सामाजिक परिदृश्य को कैसे बदलते हैं। इन मॉडलों और प्रणालियों के निर्माण के लिए देश के भीतर शैक्षणिक और गैर-शैक्षणिक अनुसंधान को प्रोत्साहित करने के लिए अधिक निवेश की आवश्यकता है। इन प्रणालियों की मदद से जलवायु परिवर्तन के संकट के मद्देनजर भविष्य के लिए साक्ष्य-आधारित डेटा-संचालित निर्णय लेने में मदद मिल सकती है।</p>
<p><strong><em>(लेखक सामाजिक उद्यमी और बालीपारा फाउंडेशन के अध्&zwj;यक्ष हैं। बालीपारा फाउंडेशन पूर्वी हिमालयी समुदायों के साथ मिलकर पर्यावरण संरक्षण, कृषि और आजीविका के क्षेत्र में काम करता है।)&nbsp;</em></strong></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/04/image_750x500_6630ae4828403.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ इकोसिस्टम मॉडलिंग और डेटा आधारित नीति-निर्माण की जरूरत ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/04/image_750x500_6630ae4828403.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[पार्टियों के चुनावी घोषणा पत्र में पंचायतों के लिए कुछ खास नहीं]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/parties-pay-lip-service-to-panchayats-in-ls-election-manifesto.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 22 Apr 2024 13:16:03 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/parties-pay-lip-service-to-panchayats-in-ls-election-manifesto.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">18वीं लोकसभा चुनाव के लिए मतदान की प्रक्रिया शुरू हो गई है। हमेशा की तरह राजनीतिक दल अपने घोषणा पत्र लेकर आए हैं और बताया है कि सत्ता में आने पर वे क्या करेंगे। इन घोषणा पत्रों में उठाए गए मुद्दों में भ्रष्टाचार, सरकार में स्थिरता, सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता आदि शामिल हैं। लेकिन इनमें पंचायती राज व्यवस्था को सशक्त बनाने कोई जिक्र नहीं है, जबकि यही एक तरीका है कि शासन में जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करके ग्राम वासियों को राष्ट्र निर्माण में भागीदार बनाया जा सकता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इस लेख में यह बताया गया है कि विभिन्न राजनीतिक दलों ने अपने घोषणा पत्र में पंचायती राज को कितनी जगह दी है। इसके साथ ही इसमें यह बताने की भी कोशिश की गई है कि अतीत में स्थानीय ग्रामीण शासन में इन राजनीतिक दलों ने क्या कदम उठाए हैं।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">भारत इस समय जिन समस्याओं से जूझ रहा है उनमें से यह समस्या दो कारणों से अहम हो जाती है। पहला कारण तो यह है कि देश की 68% आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है, इसलिए इस क्षेत्र में घटित होने वाली हर घटना पूरे देश को प्रभावित करती है। दूसरा, 73वें संविधान संशोधन के बाद गांव, ब्लॉक और जिला स्तर के करीब 34 लाख पंचायत प्रतिनिधि हैं। यह निचले स्तर पर दुनिया का सबसे बड़ा प्रतिनिधित्व है और इसकी अनदेखी करने का मतलब है देश हित की अनदेखी करना। यहां हम कुछ चुनावी घोषणा पत्रों की तुलना करते हैं और इस बात का आकलन करते हैं कि राजनीतिक दलों ने विकेंद्रीकृत लोकतंत्र को गहरा बनाने की क्या मंशा दिखाई है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;"><strong>इंडियन नेशनल कांग्रेस</strong> ने न्याय पत्र नाम से जो घोषणा पत्र जारी किया है, उसमें कहा गया हैः</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">-जीएसटी रेवेन्यू का एक हिस्सा पंचायतों को दिया जाएगा।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">-हम राज्य सरकारों के साथ मिलकर ऐसा फार्मूला बनाएंगे ताकि जीएसटी रेवेन्यू का एक हिस्सा समेत विभिन्न फंड को सीधे पंचायत और निगमों को दिया जा सके।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">-हम रिन्यूएबल एनर्जी स्कीम लागू करेंगे जिस पंचायत और निगम बिजली के मामले में यथासंभव आत्मनिर्भर हो सकेंगे।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">-73वें और 74वें संविधान संशोधन के निर्माता के रूप में कांग्रेस पार्टी राज्यों से इनके प्रावधानों को वास्तविक अर्थों में लागू करने तथा पंचायतों और निगमों को फंड मुहैया कराने के लिए कहेगी। कांग्रेस ग्राम पंचायत से जुड़े मसलों में ग्राम सभा की भूमिका और उनकी अथॉरिटी बढ़ाएगी। हम निम्नलिखित नियमों के पालन में ग्राम सभा की भूमिका बढ़ाएंगेः</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">क) पंचायत एक्सटेंशन टू शेड्यूल्ड एरियाज एक्ट 1996</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">ख) द फॉरेस्ट राइट्स एक्ट 2006</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">ग) द लैंड एक्विजिशन एक्ट 2013</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">-कांग्रेस उत्तर पूर्वी राज्यों में स्वायत्त जिला परिषदों को आर्थिक मदद बढ़ाएगी।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">-कांग्रेस उत्तर पूर्वी राज्यों में स्वायत्त जिला परिषदों को रिवाइव करेगी तथा उन्हें स्थानीय प्रशासन के लिए एक सक्षम इंस्ट्रूमेंट बनाएगी। हम यह सुनिश्चित करेंगे कि विकास कार्यों के लिए स्वायत्त जिला परिषदों के माध्यम से ज्यादा फंड आवंटित किए जाएं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">घोषणा पत्र में कहा गया है कि प्राकृतिक संसाधनों की खोज और उनके खनन के प्रोजेक्ट को शुरू करने से पहले संबंधित पंचायत अथवा निगम प्रतिनिधियों के साथ सलाह मशविरा किया जाएगा।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">-कांग्रेस पानी तक पहुंच और पानी के लोकतांत्रिक वितरण पर विशेष ध्यान देगी। बांधों और जल निकायों में भंडारण पर फोकस, भूजल स्तर बढ़ने के उपाय तथा जल प्रबंधन के बड़े भागीदारी कार्यक्रम शुरू करके हम इन मुद्दों का समाधान तलाशने की कोशिश करेंगे। इनमें राज्य सरकारों, सिविल सोसाइटी संगठनों, किसानों, पंचायत और ग्राम सभाओं तथा निगमों को भी शामिल किया जाएगा।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;"><strong>भारतीय जनता पार्टी</strong> ने संकल्प पत्र नाम से अपने चुनावी घोषणा पत्र में मोदी की गारंटी टैगलाइन के साथ ये वादे किए हैंः</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">-हम पंचायती राज संस्थाओं को वित्तीय स्वायत्तता और सस्टेनेबिलिटी के लिए कदम उठाएंगे।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">-पर्वतीय राज्यों में सतत विकास की बात करते हुए घोषणा पत्र में कहा गया है, हम राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों के साथ मिलकर विशेष मास्टर प्लान बनाएंगे ताकि उन स्थानों की नैसर्गिक सुंदरता और जैव विविधता बरकरार रहे। इसमें स्थानीय भूगोल, संस्कृति और परंपराओं का ध्यान रखते हुए पर्वतीय क्षेत्र का संतुलित विकास किया जाएगा।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;"><strong>भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी</strong> ने अपने घोषणा पत्र में यह वादा किया हैः जीडीपी का एक हिस्सा स्थानीय स्व-शासन के खर्च के रूप में निर्धारित किया जाएगा। स्थानीय निकायों को दी जाने वाली राशि राज्य सरकारों के माध्यम से दी जाएगी।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;"><strong>समाजवादी पार्टी</strong> ने अपने घोषणा पत्र को जनता का मांग पत्र; हमारा अधिकार बताया है। इसमें डॉ राम मनोहर लोहिया का जिक्र कई जगहों पर है लेकिन ग्रामीण स्थानीय शासन के लिए एक शब्द भी नहीं कहा गया है, जबकि डॉ. लोहिया इसके बड़े समर्थक थे। डॉ लोहिया गांव, जिला, राज्य और केंद्र को &lsquo;चार पिलर स्टेट&rsquo; कहते थे, उसका पार्टी विकेंद्रीकरण की नीति के तहत जिक्र कर सकती थी और अपना आशय बता सकती थी।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">पार्टी के घोषणा पत्र में पिछड़ों, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं के विकास की बात कही गई है। पंचायती राज संस्थाओं को मजबूत बनाकर स्थानीय स्तर पर इसे आसानी से हासिल किया जा सकता है, लेकिन स्थानीय ग्रामीण शासन के संदर्भ में चुनावी घोषणा पत्र में कोई चिंता नहीं दिखाई गई है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इसी तरह <strong>राष्ट्रीय जनता दल</strong> के घोषणा पत्र में पंचायत को सशक्त बनाने का कोई जिक्र नहीं है। द्रविड़ मुनेत्र कषगम ने भी पंचायत को मजबूत बनाने का कोई वादा नहीं किया है। ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने पंचायत को मजबूत बनाने की कोई बात नहीं कही है, सिवाय इसके कि सेवाओं की डिलीवरी के लिए समय-समय पर ग्राम पंचायत और वार्ड स्तर पर कैंप का आयोजन किया जाएगा।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">उम्मीद तो यह थी कि समाजवाद में भरोसा रखने वाले और डॉ. लोहिया के अनुगामी मजबूत स्थानीय शासन की पैरोकारी करते। लेकिन शायद यह भी कहा जा सकता है कि समाजवादी पार्टी, आरजेडी, डीएमके और टीएमसी यह सभी राजनीतिक दल इंडिया ब्लॉक का हिस्सा हैं। वे कांग्रेस पार्टी के घोषणा पत्र पर आश्रित हैं। पंचायत के रूप में विकेंद्रीकृत लोकतंत्र को मजबूत बनाने का वादा करने वाली कांग्रेस एक मात्र पार्टी दिखती है।</span></p>
<p><strong>टिप्पणी</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">पंचायत के बारे में विभिन्न राजनीतिक दलों के घोषणा पत्र में जो जिक्र किया गया है, उससे यही लगता है कि सिवाय कांग्रेस के, अन्य किसी भी पार्टी ने इस दिशा में प्रयास नहीं किया है। कांग्रेस पार्टी ने न सिर्फ पंचायत के साथ जीएसटी साझा करने का वादा किया है, बल्कि स्थानीय शासन को उत्तर-पूर्वी राज्यों तथा देश के जनजातीय इलाकों में भी मजबूत बनाने की बात कही है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">ग्रास रूट स्तर पर लोकतंत्र को मजबूत बनाने की दिशा में एक और कदम यह है कि स्थानीय समस्याओं के समाधान में ग्राम सभाओं को शामिल किया जाए। बेहतर होता अगर कांग्रेस उन विषयों का भी जिक्र करती जो पंचायत से जिला पंचायत स्तर तक विकेंद्रीकरण के लिए जरूरी हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कांग्रेस बीआरजीएफ जैसे कार्यक्रम लागू करने का वादा कर सकती थी। इस कार्यक्रम के तहत जिला प्लानिंग कमेटी का गठन अनिवार्य है। इनके अलावा स्थानीय स्तर पर विकेंद्रीकृत न्यायपालिका को भी पार्टी के घोषणा पत्र में शामिल किया जा सकता था।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">भारतीय जनता पार्टी ने पंचायती राज संस्थाओं की आर्थिक स्वायत्तता और उनकी सस्टेनेबिलिटी की बात कही है। आशय तो बहुत अच्छा है, लेकिन सवाल है कि यह होगा कैसे। इस संदर्भ में हर घर जल स्कीम अथवा जल जीवन मिशन का जिक्र उदाहरण के तौर पर किया जा सकता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कार्यक्रम के ऑपरेशनल गाइडलाइंस (2019) में सिर्फ ग्राम पंचायत को शामिल करने की बात कही गई है। इंटरमीडिएट (पंचायत समिति, ब्लॉक समिति, जनपद पंचायत, क्षेत्र पंचायत) और अपेक्स स्तर (जिला पंचायत) को इसमें शामिल नहीं किया गया है। आश्चर्यजनक रूप से लागू करने वाली सपोर्ट एजेंसी, जैसे एनजीओ का जिक्र है लेकिन ब्लॉक और जिला स्तर पर पंचायत को शामिल नहीं किया गया है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">जिला स्तर पर एक अलग जिला जल एवं स्वच्छता मिशन शुरू किया गया है, लेकिन जिला पंचायत संस्थानों में कोई भरोसा नहीं दिखाया गया है, जो एक संवैधानिक निकाय है। इस व्यवस्था के तहत कार्यक्रम को लागू करने में बेमेल भाव दिखता है। दूसरी बात यह कि उन्होंने पंचायत के ग्रांट लेने को नकारात्मक तरीके से प्रभावित किया है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">एशियाई विकास बैंक (एडीबी) ने गवर्नेंस को परिभाषित करते हुए कहा था, &ldquo;विकास के लिए किसी देश के आर्थिक और सामाजिक संसाधनों के प्रबंधन में अधिकारों का किस तरह इस्तेमाल होता है।&rdquo; यह बात मौजूद संदर्भ में प्रासंगिक नहीं लगती है। इसके विपरीत गवर्नेंस वह है जिसमें प्रासंगिक नियमों तथा प्रावधानों को देश के लोगों को साथ जोड़ते हुए लागू किया जाए।</span></p>
<p><em><strong>(लेखक स्थानीय प्रशासन और विकास मामलों के विशेषज्ञ हैं)</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ पार्टियों के चुनावी घोषणा पत्र में पंचायतों के लिए कुछ खास नहीं ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[एमएसपी में बढ़ोतरी के बावजूद खाद्य उत्पादों के दाम कम रखने का करिश्मा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/the-miracle-of-keeping-the-prices-of-food-products-low-despite-the-increase-in-msp.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 26 Mar 2024 15:37:38 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/the-miracle-of-keeping-the-prices-of-food-products-low-despite-the-increase-in-msp.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>लोकसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है और ऐसे में सरकार की पुरजोर कोशिश है कि खाद्य उत्पादों की कीमतें नियंत्रण में बनी रहें। खास बात यह है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य सात फीसदी बढ़ने के बाद भी खाद्य उत्पादों की महंगाई दर तीन-साढ़े तीन फीसदी से अधिक नहीं होनी चाहिए। सरकारी अधिकारी इसी कोशिश में जुटे हैं। यह बात अलग है कि सरसों जैसी प्रमुख तिलहन फसल बाजार में आने के दो माह बाद तक सरकारी खरीद नहीं होने से इसकी कीमतें न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे चल रही हैं, वहीं प्याज के निर्यात पर प्रतिबंध को बढ़ा दिया गया है।</p>
<p>पिछले दिनों एक बड़े अधिकारी के लिए यह बात सरदर्द बन गई कि जब एमएसपी में अधिक बढ़ोतरी हुई है तो फिर बाजार में उत्पाद के दाम में कम बढ़ोतरी कैसे हो सकती है। लेकिन सरकार का तो यही मानना है। उसका उपाय गेहूं और चावल के मामले में तो ढूंढ लिया गया है। लगातार एमएसपी के आसपास की कीमत पर खुले बाजार की बिक्री योजना के तहत गेहूं और चावल की नीलामी की जाए। ऐसे में कारोबारी वैसे ही फसलों को खरीदने के लिए बाजार में नहीं आएगा। लेकिन जिस तरह से मध्य प्रदेश में नवंबर और दिसंबर में तापमान सामान्य से अधिक रहा और उसके बाद गेहूं की फसल को ठीक से धूप नहीं मिली, वहां गेहूं की उत्पादकता प्रभावित हुई है। नतीजा मध्य प्रदेश और दूसरे पश्चिमी राज्यों में गेहूं का उत्पादन कम रहने की सूचनाएं आ रही हैं। इसलिए कारोबारियों को गेहूं की खरीद से हतोत्साहित किया जा सकता है। आवश्यक वस्तु अधिनियम का इस्तेमाल भी लगातार हो रहा है। पिछले साल गेहूं के खरीद सीजन के बीच ही स्टॉक लिमिट लागू कर दी गई गई थी। इस तरह के कदम इस साल भी दिख सकते हैं।</p>
<p>वहीं अन्य फसलों में प्याज के निर्यात पर प्रतिबंध जारी है जिसका खामियाजा प्याज उत्पादक किसान भुगत रहे हैं। चीनी के निर्यात पर रोक जारी है और एथेनॉल उत्पादन के लिए सीधे गन्ने का जूस इस्तेमाल करने की सीमा को चालू पेराई सीजन में 17 लाख टन पर ही सीमित रखा गया है। महाराष्ट्र में शुरुआती अनुमानों के मुकाबले अधिक उत्पादन के चलते चीनी उद्योग इस सीमा को बढ़ाने की मांग कर रहा है। ऐसा नहीं होने की स्थिति में उसकी मांग है कि सरकार चीनी का बफर स्टॉक बनाए ताकि किसानों को गन्ना मूल्य भुगतान का संकट पैदा नहीं हो।</p>
<p>खाद्य तेलों की कीमतों को नियंत्रण में रखने के लिए रियायती व शून्य आयात शुल्क पर खाद्य तेलों के आयात की सुविधा को 31 मार्च, 2025 तक जारी रखा गया है। वहीं दालों के आयात के मामले में भी मात्रात्मक प्रतिबंध से 31 मार्च, 2025 तक दालों को मुक्त रखा गया है। वहीं पीली मटर के आयात की भी छूट दे दी गई है। दूसरी ओर मसूर जैसी दाल के दाम एमएसपी से नीचे चल रहे हैं। हालांकि प्राइस सपोर्ट स्कीम (पीएसएस) के तहत दालों की सरकारी खरीद करने के लिए नेफेड को सक्रिय किया गया है। लेकिन एक बड़े मसूर उत्पादक राज्य बिहार ने इसके तहत मसूर की खरीद लिए कोई मात्रा ही केंद्र सरकार को नहीं बताई है जबकि वहां मसूर के दाम एमएसपी से नीचे चल रहे हैं।</p>
<p>गौरतलब है कि बिहार ऐसा राज्य है जहां एग्रीकल्चरल प्रोड्यूस मार्केट कमेटी (एपीएमसी) एक्ट लागू ही नहीं है और वहां इस एक्ट के तहत मंडिया भी काम नहीं करती है। ऐसे में बाजार शक्तिओं के भरोसे रहने वाले बिहार के किसानों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है।</p>
<p>इन सबके बीच हमें खाद्य तेलों और दालों में आत्मनिर्भर भी बनना है, लेकिन चुनावी साल में महंगाई ना बढ़ जाए इसलिए किसानों को अधिक दाम मिलने से रोकने के लिए सरकारी विभाग पूरी तरह मुस्तैद हैं। क्योंकि उपभोक्ताओं को अधिक कीमत चुकानी पड़ी तो उसका असर राजनीतिक हो सकता है।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/03/image_750x500_6602a3720701f.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ एमएसपी में बढ़ोतरी के बावजूद खाद्य उत्पादों के दाम कम रखने का करिश्मा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में 16वें वित्त आयोग की भूमिका]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/16th-finance-commission-and-conservation-of-natural-resources.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 13 Mar 2024 06:25:04 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/16th-finance-commission-and-conservation-of-natural-resources.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>16वें वित्त आयोग के गठन की अधिसूचना जारी कर दी गई है। डॉ. अरविंद पानगड़िया इसके अध्यक्ष बनाए गए हैं। वित्त आयोग के कार्य क्षेत्र (टर्म्स ऑफ रेफरेंस) इस प्रकार हैंः-<br />i.करों से जमा होने वाली कुल राशि का केंद्र और राज्यों के बीच बंटवारा, जिसे संविधान के चैप्टर 1, पार्ट 12 के तहत विभाजित किया जा सकता है अथवा किया जाना है, साथ ही इस राशि में राज्यों का हिस्सा तय करना।<br />ii.कंसोलिडेटेड फंड ऑफ़ इंडिया में राज्यों के राजस्व में ग्रांट इन एड निर्धारित करने के सिद्धांत क्या होंगे और संविधान के अनुच्छेद 275 के तहत राज्यों को उनके राजस्व में ग्रांट इन एड के रूप में दी जाने वाली राशि क्या होगी, यह राशि इस अनुच्छेद के क्लॉज़ 1 में उल्लिखित उद्देश्यों के अलावा अन्य कार्यों के लिए है।<br />iii.राज्य के वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर वहां की पंचायतों और नगर निगमों के संसाधनों के लिए राज्य के कंसोलिडेटेड फंड में कैसे वृद्धि की जाए।<br />वित्त आयोग के लिए जो कार्य क्षेत्र तय किए गए हैं, वह वही हैं जो संविधान के अनुच्छेद 280 में बताए गए हैं। 15वें वित्त आयोग के कार्य क्षेत्र के विपरीत 15वें आयोग की अधिसूचना में विवाद वाले संदर्भों को दूर रखा गया है। इससे आयोग को राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को हासिल करने के लिए संसाधन आवंटित करने में आसानी हो सकती है। पूर्व के वित्त आयोगों ने गरीबी, आबादी और भौगोलिक क्षेत्र को प्रमुख बेंचमार्क के तौर पर माना था। 15वें वित्त आयोग ने वन और पारिस्थितिकी को 10% वेटेज दिया था।<br />13वें वित्त आयोग ने जल संरक्षण और प्रबंधन के प्रयासों का विशेष उल्लेख किया था। उसने कहा था कि विभिन्न सेक्टर के बीच और एक सेक्टर के विभिन्न क्षेत्रों के बीच पानी का अविवेकपूर्ण वितरण, पानी के इस्तेमाल की कम एफिशिएंसी, जल संसाधन की प्लानिंग और उनके विकास के प्रति खंडित नजरिया, पानी के इस्तेमाल के बदले कम यूजर चार्ज और बहुत कम रिकवरी देश में जल संसाधनों के प्रबंधन की प्रमुख समस्याओं में हैं। राज्यों के स्तर पर एक वैधानिक स्वायत्त संस्था का गठन इन मुद्दों के समाधान में मदद कर सकता है।<br />हमारा सुझाव है कि हर राज्य में एक जल नियामक प्राधिकरण (वाटर रेगुलेटरी अथॉरिटी) का गठन किया जाए और पानी के लिए रिकवरी का एक न्यूनतम शुल्क तय किया जाए। इस प्रस्तावित नियामक प्राधिकरण को निम्नलिखित कार्यों का जमा दिया जा सकता हैः-<br />i)घरेलू, कृषि, उद्योग तथा अन्य कार्यों में इस्तेमाल होने वाले पानी का एक टैरिफ सिस्टम और शुल्क तय किया जाए और उसका नियमन किया जाए।<br />ii) विभिन्न श्रेणियों में और एक श्रेणी के विभिन्न क्षेत्रों में होने वाले इस्तेमाल में पानी के वितरण की पात्रता तय करना और उसे रेगुलेट करना।<br />iii) जल क्षेत्र की लागत और राजस्व की समय-समय पर समीक्षा तथा इसकी मॉनिटरिंग करना।<br />आयोग ने इस उद्देश्य के लिए 5000 करोड़ रुपए आवंटित किए थे। हालांकि इसका कोई बड़ा प्रभाव नहीं पड़ा और ना ही आगे चलकर उस दिशा में कोई प्रयास हुआ। जो भी हो, पानी उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों में सबसे प्रमुख है।<br />प्राकृतिक संसाधनों, खासकर मिट्टी और पानी का जिस तेजी से क्षरण हो रहा है, वह गंभीर चिंता का विषय है। देश के अनेक हिस्सों में नीति निर्माता इसे लेकर चिंतित हैं तो किसान भी कृषि के भविष्य को लेकर पसोपेश में हैं। वे इस बात को समझते हैं कि इस समस्या के समाधान के लिए व्यक्तिगत रूप से वे ज्यादा कुछ करने की स्थिति में नहीं हैं। इस स्थिति को सुधारने के लिए राज्य के स्तर पर बड़े नीतिगत कदमों की जरूरत है।<br />ऐसा करने में भारत की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं कभी ख्याल रखा जाना चाहिए, जिनमें प्रमुख हैंः-<br />-वर्ष 2027 तक एक करोड़ हेक्टेयर जमीन में प्राकृतिक खेती शुरू करना।<br />-वर्ष 2030 तक खराब हो चुकी 2.6 करोड़ हेक्टेयर जमीन को सुधार कर खेती योग्य बनाना (यूएनसीसीडी कॉप 2019)।<br />-वर्ष 2024 तक 41 लाख हेक्टेयर भूमि पर फसल अपशिष्ट प्रबंधन शुरू करना (आउटकम बजट 2023-24)<br />-भारत के 33 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र में वनों का विस्तार करना और पेड़-पौधे लगाना (एनएपीसीसी 2008)।<br />-वर्ष 2030 तक 2.5 से 3 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर अतिरिक्त कार्बन सिंक का इंतजाम करना (यूएनएफसीसीसी 2015)।<br />-वर्ष 2070 तक कार्बन न्यूट्रलिटी हासिल करना।</p>
<p>राज्यों को अतिरिक्त संसाधनों के आवंटन के बगैर इन लक्ष्यों को हासिल करना मुमकिन नहीं है। वित्त आयोग प्राकृतिक संसाधनों के सतत संरक्षण के लिए राज्यों को संसाधन आवंटित करने में एक महत्वपूर्ण माध्यम हो सकता है। वित्त आयोग पानी और मिट्टी जैसे संसाधनों का क्षरण करने वाले राज्यों को दंडित करे अथवा नहीं, यह बहस का विषय हो सकता है, लेकिन यह स्पष्ट होना चाहिए कि जो राज्य कृषि पारिस्थितिकी, पानी, नमी और मृदा संरक्षण को विभिन्न योजनाओं, नीतिगत पहल और सिविल सोसाइटी के प्रयासों से बढ़ावा देंगे, उन्हें पुरस्कृत किया जाएगा। इसके मानदंड और डिजाइन तैयार करने का जिम्मा आयोग पर ही छोड़ दिया जाना चाहिए। कहा जा सकता है कि वित्त आयोग की गणनाओं में कृषि पारिस्थितिकी के साथ प्राकृतिक संसाधनों और वनों का संरक्षण को ज्यादा तवज्जो मिलनी चाहिए।<br /><em><strong>(लेखक भारत सरकार के पूर्व खाद्य एवं कृषि सचिव हैं)</strong></em></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/03/image_750x500_65e3057ee0128.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में 16वें वित्त आयोग की भूमिका ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[नीति निर्माण के केंद्र में दोबारा कृषि को लाना जरूरी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/bringing-agriculture-back-to-the-centre-of-policy-making.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 04 Mar 2024 07:52:22 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/bringing-agriculture-back-to-the-centre-of-policy-making.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारतीय कृषि को चार समस्याओं ने बुरे तरीके से प्रभावित किया है। पहला आय का संकट है। कृषक परिवारों की आमदनी या तो स्थिर है या घट रही है, जिसका नतीजा खेती में परिवार का निवेश न होना है। दूसरा संकट है प्राकृतिक संसाधनों, खासकर मिट्टी और पानी का क्षरण। तीसरा मानव संसाधन का बढ़ता अभाव है। किसी भी राज्य में युवा पीढ़ी का एक आकर्षक रोजगार के विकल्प के तौर पर खेती में भरोसा नहीं रह गया है। युवा वैकल्पिक आजीविका के लिए शहरों अथवा दूसरे देशों में जाना चाहता है। इन सब के साथ नया संकट जलवायु परिवर्तन का जुड़ गया है, जो हमारी कठिन मेहनत से हासिल की गई खाद्य सुरक्षा को चुनौती दे रहा है।</p>
<p>एक बात ऐसी भी है जो इन चारों संकटों को जोड़ती है। वह है इन चुनौतियों से निपटने के लिए एक सुसंगत और समन्वय वाली नीति का नितांत अभाव। केंद्र सरकार 2020 में जो तीन कृषि कानून लेकर आई थी, उसके पक्ष अथवा विरोध में मत हो सकते हैं, लेकिन यह सच है कि कृषक समुदाय के एक बड़े वर्ग की तरफ से इन कानूनों के विरोध के बाद कृषि के प्रति नीतिगत गंभीरता नहीं दिख रही है। किसानों के विरोध के बाद तीनों कृषि कानूनों को वापस लेना पड़ा था। हालांकि कृषि से जुड़ी योजनाओं पर अमल जारी है और कुल मिलाकर फूड इकोनॉमी में सरकार की तरफ से अनेक कदम उठाते देखे जा सकते हैं, लेकिन आम जन को नहीं मालूम कि ऊपर बताई चुनौतियों से निपटने के लिए दीर्घकालिक योजना क्या है।</p>
<p>खाद्य सुरक्षा हासिल करने के अपने इतिहास पर ही अगर हम गौर करें तो हमें इस बात के संकेत मिलते हैं कि आगे क्या करने की जरूरत है। 1950 में भारत खाद्यान्नों की भीषण कमी वाला देश था। उस समय सिर्फ 5 करोड़ टन खाद्यान्नों का सालाना उत्पादन होता था। पिछले वर्ष का आंकड़ा देखें तो हम 33 करोड़ टन तक पहुंच गए हैं। किसी भी पैमाने पर देखें तो स्वतंत्र भारत की यह सबसे बड़ी उपलब्धियों में एक है। अंग्रेजों की एक सदी से भी ज्यादा चली शोषणकारी नीतियों के कारण कृषि क्षेत्र को काफी नुकसान पहुंचा था, लेकिन इसमें सिर्फ तीन दशक में उल्लेखनीय सुधार किया गया। केंद्र और राज्य सरकारों की तरफ से इसके लिए दूरदर्शी नीतियां अपनाई गईं। कृषि वैज्ञानिकों ने समर्पण दिखाया तो फील्ड में तैनात प्रशासकों ने भी कठिन परिश्रम किया। इन सब के ऊपर जटिल नई टेक्नोलॉजी और कृषि प्रबंधन प्रणाली को अपनाने में कृषक समुदाय की भागीदारी रही।</p>
<p>तथाकथित हरित क्रांति एक व्यापक इकोसिस्टम के विकास को दर्शाती है, जिसे भारतीय कृषि को आधुनिक बनाने और खाद्य सुरक्षा हासिल करने के मकसद से अपनाया गया था। इस इकोसिस्टम में अनुसंधान संस्थानों, एक्सटेंशन मशीनरी, क्रेडिट और इनपुट, सप्लाई चेन, मार्केटिंग और खरीद का इंफ्रास्ट्रक्चर तथा पूरे देश में सार्वजनिक वितरण प्रणाली शामिल हैं, जिनकी मदद से खाद्य की भीषण कमी और अकाल जैसी परिस्थितियों को स्थायी रूप से खत्म किया जा सका। इस महत्वाकांक्षी परियोजना में बड़ा काम केंद्र सरकार की तरफ से किया गया, लेकिन इस प्रयास को राज्यों का भी पूर्ण समर्थन मिला। यहां यह बात भी उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा की ऐतिहासिक उपलब्धि को लेकर नई पीढ़ी के नेताओं, नीति निर्माताओं, वैज्ञानिकों और प्रशासकों में गर्व का अभाव तथा अज्ञानता आज के समय की बड़ी पहेली है।</p>
<p>हरित क्रांति के दौर की उपलब्धियों की इस संक्षिप्त समीक्षा से तीन बड़ी सीख मिलती हैं।</p>
<p>1.नीति के स्तर पर लक्ष्य स्पष्ट रूप से निर्धारित थे, उन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए एक इकोसिस्टम तैयार किया गया तथा समग्र नजरिया अपनाया गया।</p>
<p>2. तीन दशक के लंबे समय तक केंद्र और राज्य सरकारों ने बेहतरीन समन्वय के साथ काम किया, सभी पक्ष उन्हें दी गई जिम्मेदारियों और भूमिका के प्रति पूरी तरह समर्पित थे।</p>
<p>3. नीति निर्माण का आधार नॉलेज यानी जानकारी था। केंद्र और राज्य सरकारों के संस्थानों में गुणवत्तापूर्ण अनुसंधान को बड़ी अहमियत दी जाती थी। साथ ही एक मजबूत डेटा संग्रह और मॉनिटरिंग ढांचा तैयार किया जा रहा था।</p>
<p>क्या हरित क्रांति का समय हमें भविष्य के लिए कोई दिशा दे सकता है? मेरे विचार से हमें उस दौर से मिली सीख पर अमल करना चाहिए जिसने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के महत्वपूर्ण लक्ष्य को हासिल करने में हमारी मदद की।</p>
<p>इस संदर्भ में तीन विचार ध्यानार्थ रख रहा हूं-</p>
<p>सबसे पहली जरूरत केंद्र और राज्यों के बीच भरोसे और समन्वय के रिश्ते को दोबारा स्थापित करने की है, ताकि कृषि में अगले चरण की नीतिगत चुनौतियों से निपटा जा सके। इसके बिना हम जो इकोसिस्टम को दुरुस्त करने और मजबूत बनाने की बात कर रहे हैं, उसे हासिल कर पाना मुश्किल लगता है। चाहे केंद्र हो अथवा राज्य, शीर्ष राजनीतिक स्तर पर अभी ऐसी कोई स्थायी व्यवस्था नहीं नजर आती जहां बिना राजनीतिक पक्षपात के कृषि नीति की चुनौतियों और उनके विकल्पों पर चर्चा की जा सके। हमें कृषि के क्षेत्र में भी जीएसटी काउंसिल की तर्ज पर एक बॉडी गठित करने की जरूरत है जिसकी अध्यक्षता स्वयं प्रधानमंत्री, या नहीं तो कम से कम केंद्रीय कृषि मंत्री करें। बीते दो दशकों में नीति के स्तर पर जो सुस्ती देखने को मिल रही है, उसे तोड़ने की दिशा में यह पहला कदम होगा। इसके बाद ही कृषि इकोसिस्टम के पुनर्निर्माण की महती जरूरत पर फोकस किया जा सकेगा।</p>
<p>दूसरी राय यह है कि अनुसंधान से लेकर एक्सटेंशन तक, फाइनेंसिंग से लेकर ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर तक और टेक्नोलॉजी से लेकर मार्केटिंग तक, कृषि इकोसिस्टम के बिखरे पुर्जों की पहचान की जाए। विभिन्न एग्री वैल्यू चेन के समेकित विचार और विश्व बाजार में भारत के वांछित स्थान से निवेश, अनुसंधान, स्केलिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण आदि का आधार बन सकता है। हरित क्रांति की शुरुआत 5 दशक से भी अधिक पहले की गई थी। तब और अब में एक बड़ा परिवर्तन निजी क्षेत्र द्वारा क्षमता निर्माण और उनका इस सेक्टर में रुचि दिखाना है। कृषि इकोसिस्टम की क्षमता को तेजी से सुधारने में इसका सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया जा सकता है, खासकर मूल्य संवर्धन और ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार सृजन के मामले में।</p>
<p>तीसरा लेकिन समान रूप से महत्वपूर्ण पहलू यह है कि योजना बनाने और उन पर अमल करने में पूरी तरह से विकेंद्रीकृत नजरिया अपनाया जाए। इसमें स्थानीय स्तर पर जमीन की स्थिति, खाद्य एवं पोषण, कृषि जलवायु स्थिति और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को शामिल किया जाए। अनुसंधान, एक्सटेंशन और नीतियों को अमल में लाने की क्षमता राज्यों और उनमें भी निचले स्तर पर विकसित की जानी चाहिए। 1960 और 1970 के दशक की तुलना में आज का कृषक समुदाय काफी अधिक जानकारी रखता है और सजग है। उस समय काफी हद तक केंद्रीकृत योजना और निवेश की जरूरत थी जिसका नेतृत्व वैज्ञानिक और प्रशासक कर रहे थे। कृषक समुदाय के इनोवेशन और उनकी जानकारी को उसमें शामिल करने की गुंजाइश बहुत कम थी। लेकिन आज के दौर में योजना बनाने और उन पर अमल करने में कृषक समुदाय को बड़ी और सक्रिय भूमिका देने की जरूरत है। उन्हें सिर्फ नीतियों के अमल में नहीं, बल्कि नीतियां बनाने में भी सहयोगी बनाने की जरूरत है।</p>
<p>लेख की शुरुआत में मैंने कृषि क्षेत्र के जिन चार संकटों का जिक्र किया था, उनसे निपटने के लिए ये कुछ समाधान हैं। हालांकि ये अपने आप में कोई अनूठे अथवा अंतिम समाधान नहीं हैं। जरूरी यह है कि कृषि क्षेत्र की चुनौतियां को व्यापक रूप से स्वीकार किया जाय। पूरे देश को एक इकाई के तौर पर समझने के बाद ही इसका समाधान निकाला सकता है। राजनीतिक संघर्ष तो लोकतंत्र की रगों में लहू के समान है। यह संघर्ष बना रह सकता है और रहना भी चाहिए। लेकिन खाद्य और पोषण सुरक्षा विवाद का विषय नहीं हो सकता है। इसलिए यह काम करने और आगे बढ़ने का समय है।</p>
<p><em><strong>(लेखक समुन्नति एग्रो के डायरेक्टर और मध्य प्रदेश सरकार के पूर्व कृषि सचिव हैं। लेख में व्यक्ति विचार उनके निजी हैं)&nbsp;</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ नीति निर्माण के केंद्र में दोबारा कृषि को लाना जरूरी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[डॉ.एम.एस. स्वामीनाथन का सदा ऋणी रहेगा कृषक समाज]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/the-farmer-community-will-always-remain-indebted-to-dr-ms-swaminathan.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 03 Mar 2024 10:08:11 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/the-farmer-community-will-always-remain-indebted-to-dr-ms-swaminathan.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत में हरित क्रांति के जनक डॉ.एम.एस. स्वामीनाथन को भारत रत्न से सम्मानित करने की घोषणा की। कृषि वैज्ञानिक समुदाय ने इसका सहर्ष स्वागत किया। डॉ. स्वामीनाथन को किसानों का वैज्ञानिक कहकर संबोधित करना भी सर्वथा उचित है, क्योंकि वे आजीवन कृषक समुदाय के कल्याण के लिए काम करते रहे। वे संभवतः एकमात्र गणमान्य व्यक्ति हैं जिन्हें सभी प्रतिष्ठित नागरिक पुरस्कारों से नवाजा गया- पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्मविभूषण। उनके बेहतरीन नेतृत्व और अमूल्य योगदान का ही नतीजा है कि आज भारत पूरी दुनिया में गर्व से सिर उठाकर खड़ा है। यह सबसे अधिक आबादी वाला देश होने के बावजूद खाद्यान्न की घरेलू जरूरत को पूरा करने में सक्षम है।<br />आज हम दुनिया में एक प्रमुख खाद्य निर्यातक देश बन गए हैं। राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली को मजबूत बनाना, पुनर्गठित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पहले महानिदेशक की भूमिका निभाना, कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के सचिव के रूप में कार्य करना, कृषि अनुसंधान सेवा की शुरुआत करना तथा ऐसे अनेक सुधार कार्य हैं जिन्हें डॉ.स्वामीनाथन के योगदान के रूप में याद किया जाएगा। वे दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित कृषि वैज्ञानिकों में शुमार किए जाते हैं।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/03/image_750x_65e30152c8d8b.jpg" alt="" /></p>
<p>डॉ. स्वामीनाथन को 1987 में पहला वर्ल्ड फूड प्राइज मिला। सामुदायिक नेतृत्व के लिए उन्हें 1971 में मैगसेसे अवार्ड से भी सम्मानित किया गया। उन्हें 1987 में अल्बर्ट आइंस्टीन वर्ल्ड साइंस अवार्ड, 1994 में इंदिरा गांधी शांति पुरस्कार, 1994 में ही यूएनईपी सासाकावा एनवायरमेंट पुरस्कार, 1999 में यूनेस्को गांधी गोल्ड मेडल तथा अन्य अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। वे इंडियन साइंस कांग्रेस के प्रेसिडेंट के साथ खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) काउंसिल के चेयरमैन भी थे। वे अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (आईआरआरआई) के महानिदेशक पद पर भी रहे और चेन्नई स्थित एमएस स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन के संस्थापक अध्यक्ष भी थे। अपने जीवन काल में उन्होंने जो सम्मान हासिल किया वह उनके अमूल्य योगदान की गवाही देता है। ये सम्मान कृषि और ग्रामीण विकास के लिए उनकी प्रतिबद्धता को भी दर्शाते हैं।<br />उनके जाने से जो स्थान रिक्त हुआ उसे भर पाना बहुत मुश्किल है। वे दूरद्रष्टा होने के साथ महान व्यक्तित्व के भी मालिक थे। और सबसे बड़ी बात किसान आयोग के अध्यक्ष के तौर पर उनकी सिफारिशों के कारण उनका पूरे देश में सम्मान किया जाता है। उन्होंने न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के लिए किसान की लागत और 50% राशि (सी2 प्लस 50%) की सिफारिश की थी। किसानों और भारतीय कृषि के प्रति उनके प्रेम के कारण पूरा कृषक समुदाय उनका कृतज्ञ है।<br />समस्त कृषि वैज्ञानिक समुदाय इस बात से प्रसन्न है कि खाद्य एवं पोषण सुरक्षा में डॉ. स्वामीनाथन के योगदान को स्वीकार करते हुए उन्हें देश का सर्वोच्च सम्मान, भारत रत्न दिया गया। उनके जीवित रहते अगर यह सम्मान दिया जाता तो बेहतर होता।<br />डॉ. स्वामीनाथन एक महानायक, महान द्रष्टा, नीति निर्माता और बेहतरीन व्यक्ति थे। वे भारत के महान सपूत थे। अखिल भारतीय कृषि अनुसंधान सेवा (एआरएस) गठित करने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। इसकी वजह से देश के हर कोने में कृषि वैज्ञानिकों को अनुसंधान में मदद मिली। देश को खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बनाने में उनका योगदान अमूल्य है। उन्होंने बौने गेहूं की वैरायटी विकसित की जिसके कारण देश में खाद्यान्न उत्पादन जो 1950 में 5 करोड़ टन था, अब 33 करोड़ टन पहुंच गया है। इसलिए भारत आयातक देश से निर्यातक देश बन सका।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/03/image_750x_65e3015714076.jpg" alt="" /></p>
<p><br />वैज्ञानिक खोजों और उन्हें धरातल पर लागू करने के बीच अंतर को पाटने की उनकी प्रतिबद्धता का नतीजा लैब टू लैंड प्रोग्राम है। इस पहल के तहत कृषि टेक्नोलॉजी सीधे किसानों को हस्तांतरित की जाती है, ताकि अनुसंधान का लाभ हमारे खेतों में मेहनत करने वालों को तक पहुंचे। अपने पूरे विशिष्ट करियर में उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कृषि क्षेत्र को अनेक योगदान दिया।<br />प्रो. स्वामीनाथन का प्रभाव और नेतृत्व भारत की सीमा के बाहर भी था। वर्ष 1982 से 1988 तक फिलीपींस में अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान के महानिदेशक के तौर पर उन्होंने इस संस्थान को आगे बढ़ने की दिशा दी, जिसका पूरी दुनिया के चावल उत्पादक क्षेत्र को लाभ हुआ। वे पगवॉश कॉन्फ्रेंस और इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर के प्रेसिडेंट भी रहे। वर्ष 1999 में वे महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर के साथ तीसरे भारतीय थे जिन्हें टाइम मैगजीन ने 20वीं सदी में एशिया के बीच सर्वाधिक प्रभावशाली लोगों में रखा था।<br />कृषक समुदाय के कल्याण के लिए उन्होंने आजीवन अथक प्रयास किया। किसान आयोग के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने सरकार को राष्ट्रीय किसान कल्याण नीति लाने पर राजी किया और किसानों को बतौर एमएसपी लागत और 50% राशि (सी2 प्लस 50%) देने की सिफारिश की। इसके लिए कृषक समुदाय में उनका काफी सम्मान किया जाता है। उम्मीद है कि एक राष्ट्रीय किसान कल्याण नीति के उनके सपने को संसद में यथाशीघ्र मंजूरी मिल जाएगी।<br />प्रासंगिकता के साथ उत्कृष्टता, जोश के साथ कठिन परिश्रम, समाज के लिए विज्ञान, विनम्रता के साथ गुणवत्ता, यह सब उनके पूरे जीवन काल की अमूल्य सीख हैं। मेरा मानना है कि उनकी उपलब्धियां युवा पीढ़ी को भारतीय कृषि को एक बेहतर भविष्य की ओर ले जाने के लिए प्रेरित करती रहेंगी।<br /><em><strong>(पद्मभूषण से सम्मानित लेखक आईसीएआर के पूर्व डीजी और डेयर के पूर्व सचिव हैं)</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ डॉ.एम.एस. स्वामीनाथन का सदा ऋणी रहेगा कृषक समाज ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[एमएसपी &amp;apos;क्यों&amp;apos; की बजाय एमएसपी &amp;apos;कैसे&amp;apos; की सोच बनानी होगी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/instead-of-msp-why-we-have-to-think-about-how-msp.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 28 Feb 2024 12:32:21 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/instead-of-msp-why-we-have-to-think-about-how-msp.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को लेकर किसान एक बार फिर आंदोलनरत हैं। दिल्ली की सीमाओं पर नवंबर 2020 से दिसंबर, 2021 तक चले पिछले किसान आंदोलन यह आंदोलन क्यों अलग है, हमे यह देखने की जरूरत है। असल में पिछले आंदोलन की मुख्य मांग केंद्र सरकार द्वारा बनाये गये तीन कृषि कानूनों की वापसी और एमएसपी की कानूनी गारंटी उसके साथ एक अतिरिक्त मांग थी। कृषि कानूनों को लेकर पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों का डर और आशंका थी कि इसका सरकारी, एग्रीकल्चरल प्रॉडयूस मार्केट कमेटी (एपीएमसी) यानी मंडी व्यवस्था और कांट्रैक्ट खेती के चलते होने उनकी जोत के मालिकाना हक प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए उस समय मुख्य मुद्दे से इन राज्यों के किसान ही अधिक जुड़े थे क्योंकि वह इनके फायदे हासिल करते रहे हैं। बिहार जैसे राज्य में जहां एपीएमसी की मंडियां ही नहीं है और पूर्वी व मध्य उत्तर प्रदेश के वह किसान जिनको मंडी का कोई खास फायदा नहीं मिलता वह कानूनों के मुद्दे से खुद को बहुत अधिक जुड़ा महसूस नहीं कर रहे थे। लेकिन हर किसान चाहता है कि उसे उसकी उपज का बेहतर दाम मिले और इसके लिए एमएसपी जरूरी है इस धारणा ने एमएसपी के मुद्दे की अपील को यूनिवर्सल बना दिया है। इसके चलते 2024 का यह किसान आंदोलन देश भर में ट्रैक्सन पाने की संभावना रखता है।</p>
<p>इसकी आहट मुझे तब मिली थी जब मैं पिछले साल देश के पांच राज्यों में करीब 600 किसानों से मिला तो फसलों के कम दाम और किसान व ग्रामीण परिवारों की बढ़ती मुश्किलें उनकी साझी वेदना थी। ग्रामीण भारत की जमीनी हकीकत और किसानों की स्थिति व उनके नजरिये उसका हल ढूंढ़ने की इस कवायद में हमने राजस्थान के जोधपुर, उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर, ओड़िशा के भुवनेश्वर, मेघालय के शिलांग और तमिलनाडु के कोयंबटूर में किसानों और ग्रामीण नागरिकों के साथ बातचीत की। इस पूरी कवायद में यह बात साफ उभर कर आई कि किसान और कृषि पर जीवन बसर करने वाले लोगों की मुश्किलें बढ़ रही हैं। इस मुश्किल का हल उन्हें अपनी फसलों के बेहतर दाम के रूप में दिखता है। दिल्ली की सीमाओं पर चले ऐतिहासिक किसान आंदोलन के करीब डेढ़ साल बाद छह माह की अवधि में यह मुलाकातें हुई थी और इनमें यह बात साफ हो गई है कि देश के हर कोने में किसान फसलों का एमएसपी तो चाहता ही है साथ ही उसकी गारंटी भी चाहता है। और उसके करीब तीन माह बाद ही किसान एमएसपी की कानूनी गारंटी मांग को लेकर दिल्ली आने के लिए सड़कों पर आ गये। वह भी पंजाब की अनजान की दो यूनियनें ऐसा आंदोलन खड़ा करने में कामयाब हो रही है जिसकी गूंज पूरे देश में सुनाई पड़ रही है।</p>
<p><strong>दिसंबर 2021</strong> में जब किसान संगठनों की दिल्ली की सीमाओं से वापसी हुई तो उस समय केंद्रीय कृषि सचिव <strong>संजय अग्रवाल</strong> द्वारा संयुक्त किसान मोर्चा को लिखे गये पत्र में कहा गया था कि एमएसपी के मुद्दे का हल ढ़ूंढ़ने के लिए सरकार एक समिति गठित करेगी। जुलाई, 2021 में संजय अग्रवाल की ही अध्यक्षता में करीब 40 सदस्यों की एक समिति गठित कर दी गई। लेकिन इसके टर्म्स ऑफ रेफरेंस (टीओआर) में एमएसपी के साथ कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीसीएपी) की कार्यप्रणाली, नेचुरल और आर्गेनिक फार्मिंग जैसे विषय भी जोड़ दिये गये। इस समिति में संयुक्त किसान मोर्चा के तीन प्रतिनिधियों की जगह दी गई थी लेकिन मोर्चा ने इसे स्वीकार नहीं किया और समिति में शामिल नहीं हुआ। बहरहाल समिति की रिपोर्ट अभी तक नहीं आई है जो किसानों की उस आशंका को सच करती दिखती पैदा करती है जिसे वह समिति को केवल खानापूर्ति बताते रहे हैं। सरकार को शायद यह अहसास नहीं था कि एमएसपी का मुद्दा जाने वाला नहीं है और यह फिर लौटकर आएगा।</p>
<p><strong>असल में</strong> देश में किसानों आय में वृद्धि की दर या तो बहुत कम है या वह घट रही है। देश के सबसे बेहतर फसल उत्पादकता वाले राज्यों में फसलों की उत्पादकता की वृद्धि लगभग रुक गई है जबकि फसल उत्पादन लागत लगातार बढ़ रही है। या यूं कहें कि किसानों के निवेश पर इंक्रीमेंटल रिटर्न घट गया है। पिछले करीब चार दशकों में जमीनों की होल्डिंग्स का बंटवारा होने से उनकी आय घटी है और इसका उनके जीवन स्तर पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। शहरी मध्य वर्ग और ग्रामीण आबादी के बीच आर्थिक खाई चौड़ी होती गई है। सूचना माध्यमों की क्रांति ने ग्रामीण परिवारों की आकांक्षाओं में इजाफा किया है। सरकारें कूछ भी दावा करें शिक्षा और स्वास्थ्य पर व्यक्तिगत व्यय तेजी से बढ़े हैं और उनकी गुणवत्ता गिरी है जबकि इन क्षेत्रों में सार्वजनिक सुविधाओं की स्थिति खराब हुई है। बेहतर शैक्षिण गुणवत्ता की कमी के चलते किसान परिवारों के लिए कृषि के अलावा दूसरे क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों में कमी आई है।</p>
<p>ऐसे में एमएसपी की एक <strong>यूनिवर्सल</strong> अपील है क्योंकि यह किसानों की आजीविका से सीधे जुड़ी है। फसल उत्पादन और कीमतों के मोर्चे पर बढ़ी अनिश्चितता से किसान छुटकारा पाना चाहता है। वह गेहूं,धान, गन्ना का किसान हो या फिर आलू, प्याज और नारियल का किसान हो। हर किसान अपनी फसल के लिए एक बेहतर और स्थिर कीमत चाहता है। यहां हमें अपनी सोच में बदलाव करते हुए यह सोचना चाहिए कि भारत 140 करोड़ लोगों की आबादी वाला देश है यह कोई न्यूजीलैंड या चिली जैसा देश नहीं है जहां कृषि को बिजनेस और विदेशी मुद्रा कमाने का जरिया माना जाता है। हमें देश की बड़ी आबादी के लिए भोजन चाहिए जिसे हम किसी भी तरह आयात से पूरा नहीं कर सकते हैं। हमें कृषि उत्पादन खाद्य सुरक्षा के रूप में देखते हुए इसे देश के रणनीतिक क्षेत्र के रूप मे देखना चाहिए। वहीं देश में 14 करोड़ जोत हैं और उनसे जुड़े लोगों की बेहतरी हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। हमें अमेरिका जैसे देश से इसे समझना चाहिए जो केवल 20 लाख किसानों की बेहतरी के लिए हर संभव कदम उठाता है क्योंकि वह खाद्य उत्पादों पर किसी ब्राजील, अर्जेंटीना या दूसरे देशों के आयात पर निर्भर नहीं होना चाहता। रक्षा क्षेत्र के बाद अमेरिका सबसे अधिक कृषि को अहम मानता है। वह भी तब वहां 1935 के 65 लाख कृषि जोत के उच्चतम स्तर से घटकर 2022 में केवल 20 लाख किसान रह गये हैं। वहीं हमारे देश में जोत संख्या बढ़ रही है।</p>
<p>उपभोक्ताओं को भी अपना नजरिया बदलना चाहिए। उन्हें यह सोच बनानी होगी कि किसानों को उनकी मेहनत का बेहतर दाम मिले। उपभोक्ता बनाम किसान की बजाय यह सोचना चाहिए कि किसान को उसकी लागत पर उचित रिटर्न कैसे मिल सकता है।&nbsp;</p>
<p>सरकार हर साल करीब दो लाख करोड़ रुपये से अधिक का खाद्यान्न सरकारी खरीद में किसानों से खरीदती है। देश जब खाद्यान्न आयात पर निर्भर था तो उस समय फोर्ड फाउंडेशन की 1959 की एक रिपोर्ट में किसानों को एश्योर्ड प्राइस देने और बड़ी संख्या में एग्रीकल्चर मार्केट स्थापित करने की सिफारिश की गई। यही रिपोर्ट पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और उनके मंत्रीमंडल में कृषि मंत्री सी सुब्रमण्यम के फैसलों की वजह बनी जिसके चलते एल के झा कमीशन बना। जिसने प्रॉड्यूसर्स प्राइस की सिफारिश की और 1964-65 में पहली बार धान का खऱीद मूल्य तय हुआ। 1965 में ही एग्रीकल्चर प्राइस कमीशन बना और फूड कारपोरेशन ऑफ इंडिया (एफसीआई) की स्थापना हुई। इन कदमों के चलते हम 330 मिलियन खाद्यान्न उत्पादन के साथ आत्मनिर्भरता साथ आज बड़े कृषि निर्यातक बने। इसे हमें एमएसपी की अहमियत और उसके जरिये हासिल उपलब्धियों के रूप में देखना चाहिए।</p>
<p>जो लोग एमएसपी की गारंटी की व्यवस्था को अव्यवहारिक मानते हैं उनके एक उदाहरण है। केंद्र सरकार गन्ने के लिए<strong> फेयर एंड रिम्यूनिरेटिव प्राइस</strong> (एफआरपी) तय करती है और 14 दिन के भीतर किसानों को उसके भुगतान का वैधानिक प्रावधान है। देश में कुल गन्ना उत्पादन का करीब 75 फीसदी चीनी मिलों को जाता है और यह व्यवस्था करीब सात दशकों से जारी है। यही नहीं सरकार ने चीनी के लिए न्यूनतम बिक्री मूल्य (एमएसपी) तय कर रखा है और कोई चीनी मिल उससे कम दाम पर चीनी नही बेच सकती है। अगर यह व्यवस्था चल सकती है तो किसानों के लिए एमएसपी गारंटी क्यों लागू नहीं हो सकती है।</p>
<p><strong>एमएसपी गांरटी</strong> का तरीका सरकार तय कर सकती है। केंद्र सरकार भावांतर व्यवस्था के पक्ष में है। नीति आयोग इसके पक्ष में है। अगर किसान को एमएसपी से कम दाम पर फसल बेचनी पड़ती है वहां एमएसपी और बिक्री मूल्य के बीच की राशि का सरकार किसानों को सीधे भुगतान कर सकती है। मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह चौहान सरकार के दौरान इस पर अमल हो चुका है। अगर इसे लागू करने में कोई गड़बड़ी होती है तो सरकार उसकी खामी कर सकती है। सरकार को एमएसपी क्यों की बजाय एमएसपी कैसे की सोच बनानी होगी।</p>
<p>जहां तक हरियाणा और पंजाब की सीमाओं पर चल रहा मौजूदा किसान आंदोलन है, इसमें भले ही पंजाब की अनजान सी किसान जत्थेबंदियां शामिल हों लेकिन उनकी मांग पर अगर कोई रास्ता नहीं निकलता है तो पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश समेत अन्य राज्यों के किसान संगठन धीरे-धीरे इन आंदोलन का हिस्सा बन जाएंगे। एमएसपी की गारंटी सभी संगठनों की मांग है अगर वह आंदोलन में शिरकत नहीं करते हैं तो उनकी साख प्रभावित होगी जो वह नहीं चाहेंगे। केंद्र सरकार के उपर आगामी लोक सभा चुनावों के एकदम पहले चल रहे इस आंदोलन का राजनीतिक दबाव भी है। बेहतर होगा कि वह एमएसपी के मुद्दे का हल ढ़ूंढ़े, अन्यथा एमएसपी का मुद्दा बार-बार आता रहेगा।&nbsp; &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ एमएसपी 'क्यों' की बजाय एमएसपी 'कैसे' की सोच बनानी होगी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[ज्वाइंट फार्मिंग का विरोध है चरण सिंह का सबसे बड़ा योगदान]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/greatest-contribution-of-charan-singh-is-resistance-to-collectivization.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 18 Feb 2024 11:07:02 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/greatest-contribution-of-charan-singh-is-resistance-to-collectivization.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">भारत में राजनीति में सफलता और यहां तक कि महानता इस बात से देखी जाती है कि राजनीतिक नेता किस पद पर था, वह कितने दिनों तक उस पद पर रहा इत्यादि। लेकिन यह पैमाना गलत है। उदाहरण के लिए महात्मा गांधी और जयप्रकाश नारायण ने कभी कोई सरकार नहीं चलाई, लेकिन 20वीं सदी में वे किसी वायसराय अथवा प्रधानमंत्री से अधिक महत्वपूर्ण थे। इसलिए चौधरी चरण सिंह, जिन्हें नरेंद्र मोदी सरकार ने हाल ही भारत रत्न दिया, का मूल्यांकन सत्ता के ढांचे में उनके स्थान से नहीं बल्कि उनकी उपलब्धियों से किया जाना चाहिए। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि कृषि के कलेक्टिवाइजेशन (ज्वाइंट फार्मिंग) की बुराइयों से लड़ाई में मिली सफलता थी।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका में कलेक्टिवाइजेशन की परिभाषा इस प्रकार है- सोवियत सरकार द्वारा अपनाई गई नीति जिसे 1929 से 1933 के दौरान काफी सघनता से लागू किया गया। इसका उद्देश्य सोवियत संघ में पारंपरिक खेती को बदलने और कुलक (अमीर किसानों) की आर्थिक ताकत कम करना था। इस सामूहिकीकरण के तहत किसानों को अपनी व्यक्तिगत जमीन छोड़ कर बड़े सामूहिक खेत (कोलखोजी) में शामिल होने के लिए मजबूर किया गया।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">जैसा कि ब्रिटानिका ने लिखा है, इसके नतीजे बड़े भयावह निकले, उत्पादन गिर गया। इसके बावजूद सरकार कृषि उत्पादों को बड़ी मात्रा में हासिल करती रही ताकि औद्योगिक निवेश के लिए पूंजी की जरूरत पूरी की जा सके। इसका नतीजा यह हुआ कि 1932-33 में ग्रामीण इलाकों में भीषण अकाल पड़ गया और लाखों किसानों की मौत हो गई।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">चीन में भी परिणाम अलग नहीं थे। ब्रिटानिका के अनुसार, 1955 में माओवादियों ने कृषि सामूहिकीकरण की प्रक्रिया तेज कर दी। उसके बाद पूरे चीन में ग्रेट लीप फॉरवर्ड नाम से सामाजिक-आर्थिक अभियान चलाया गया। इसमें पारंपरिक पंचवर्षीय योजना में बदलाव करते हुए बड़ी आबादी को लघु उद्योगों (बैकयार्ड स्टील फर्नेस) में लगाया गया। इस प्रयोग के भी बुरे परिणाम निकले, भ्रम फैला। अक्षम प्रबंधन और प्राकृतिक आपदाओं के कारण 1959 से 1961 तक अकाल की स्थिति रही, जिसमें 1.5 से 3 करोड़ लोगों की जान चली गई।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">समाजवाद और कम्युनिज्म के परिणाम देखिए- सामूहिकीकरण से पूरी दुनिया में 20 करोड़ से ज्यादा लोगों की मौत हो गई, कम्युनिष्ट आततायियों ने अनेक सामूहिक हत्याएं कीं। शीत युद्ध खत्म होने के बाद यह सब दुनिया के सामने आया। 1950 के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू कार्ल मार्क्स और उनके अनुयायियों के अव्यावहारिक वादों से काफी प्रभावित थे। यही कारण था कि नेहरू साझा और सहकारी खेती को बढ़ावा दे रहे थे।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">लेकिन कृषक पृष्ठभूमि वाले चरण सिंह बेहतर जानते थे। ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह थी कि उनमें नेहरू के विचारों का विरोध करने का साहस था। उस समय ग्रामीण पृष्ठभूमि वाले और नेता भी थे लेकिन उन्होंने सामूहिकीकरण के खतरनाक विचार का विरोध नहीं किया। यह कुछ वैसा ही था जैसे आज भारतीय जनता पार्टी का कोई नेता किसी नीतिगत मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विरोध करे। चरण सिंह उस समय कांग्रेस पार्टी के सदस्य थे। उन्होंने 1959 में नागपुर में आयोजित कांग्रेस के सालाना सत्र में अपने विचार सबके सामने रखे।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">उसी साल उन्होंने &lsquo;ज्वाइंट फार्मिंग एक्सरेडः द प्रॉब्लम एंड इट्स सॉल्यूशन&rsquo; (साझा खेती पर नजरः समस्या और इसके समाधान) नाम से किताब लिखी। इसमें उन्होंने नेहरू के अव्यावहारिक विचारों के खिलाफ प्रभावशाली तर्क दिए हैं। उन्होंने लिखा है, &ldquo;जमीन के साथ किसानों का जुड़ाव दुनिया के हर देश में है। जैसे, फ्रांस के किसान अपनी जमीन को &lsquo;मिस्ट्रेस&rsquo; कहकर बुलाते हैं।&rdquo;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">उन्होंने आगे लिखा है, &ldquo;मानव स्वभाव हर जगह एक सा होता है।&rdquo; हमारे किसान जमीन को धरती माता कहते हैं क्योंकि यह सभी जीवों के लिए भोजन उपलब्ध कराती है। हर जगह किसान स्वतंत्रता के लिए जमीन को जरूरी समझते हैं। इसलिए सामूहिकीकरण की अर्थव्यवस्था का वह भावनात्मक तौर पर विरोध करेगा। आखिरकार यह आर्थिक क्षमता या संगठन के रूप का सवाल नहीं, बल्कि सवाल यह है कि व्यक्तिवाद या सामूहिकतावाद में से कौन बना रहेगा। खेती अर्थव्यवस्था का एक रूप मात्र नहीं बल्कि जीवन का भी एक रूप है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">दुर्भाग्यवश चरण सिंह को किसानों के ऐसे नेता के रूप में जाना जाता है जो चंद हफ्तों के लिए प्रधानमंत्री बने। इसका कारण यह है कि हमारे देश में लोग उन आपदाओं के बारे में नहीं जानते जहां सामूहिकीकरण लागू किया गया। भारत में वैसी आपदा की आशंका को भांपकर उन्होंने उसे रोकने में जो भूमिका निभाई, उससे भी लोग अनभिज्ञ हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">चौधरी चरण सिंह सामूहिकीकरण जैसे समाजवादी चलन के लोकतंत्र पर अहितकारी प्रभाव से भी वाकिफ थे। उन्होंने लिखा है, &ldquo;आजादी का पौधा सामूहिक खेत की जमीन पर नहीं उग सकता। जब हम भारत में ऐसे लोगों को देखते हैं जो लोकतंत्र का तो समर्थन करते हैं, लेकिन इसके साथ ग्रामीण समस्याओं के समाधान के लिए विशाल, साझा तौर पर चलने वाली उत्पादन इकाइयों की स्थापना की बात करते हैं, तो वैसे लोगों के साथ सहानुभूति ही रखी जा सकती है, और यह कामना की जा सकती है कि वे आराम कुर्सी पर बैठकर कोई समाधान बताने से पहले ग्रामीण भारत को ठीक से जानें।&rdquo; सौभाग्यवश चौधरी चरण सिंह ग्रामीण भारत को भलीभांति जानते थे।</span></p>
<p><em><strong>(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ ज्वाइंट फार्मिंग का विरोध है चरण सिंह का सबसे बड़ा योगदान ]]></media:description>
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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[किसानों को आरक्षण दिलवाना चाहते थे चौधरी चरण सिंह, उनके हक में बनाए तीन भूमि सुधार कानून]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/chaudhary-charan-singh-wanted-to-give-reservation-to-farmers-children-made-many-laws-in-favor-of-farmers.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 12 Feb 2024 12:36:55 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/chaudhary-charan-singh-wanted-to-give-reservation-to-farmers-children-made-many-laws-in-favor-of-farmers.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p dir="ltr"><span>पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह उन चंद नेताओं में हैं जिनकी राजनीति के केंद्र में किसान थे। किसान हित में उन्होंने अनेक कार्य किए थे। वे एक मात्र नेता थे जिन्होंने किसानों का एक <strong>मध्य वर्ग</strong> तैयार करने की जमीन तैयार की थी। उनके द्वारा उत्तर प्रदेश में लागू किये गये <strong>तीन भूमि सुधार&nbsp;कानून</strong> राज्य की कृषि और किसानों की स्थिति में आमूलचूल बदलाव लाने वाले साबित हुए। वे ग्रामीण भारत को भलीभांति समझते थे, इसलिए शहरी वर्ग और गांव व किसान के बीच के अंतर को पाटने के लिए किसान परिवारों के बच्चों को सरकारी नौकरियों में 50 फीसदी आरक्षण के पक्षधर थे। उन्होंने इस पर एक पेपर भी लिखा था। समय के साथ बदलाव को स्वीकार करते हुए उन्होंने 1939 के इस पेपर में 1960 में तब्दीली भी की और किसान परिवारों के लिए 60 फीसदी आरक्षण और खेती पर निर्भर भूमिहीन परिवारों को मिलाकर आरक्षण को 75 फीसदी करने की बात कही।</span></p>
<p dir="ltr"><span>चौधरी साहब जिस किसान मध्य वर्ग की बात कहते थे, वह इस समय संकट में है। इसकी झलक हमने 2020-21 में दिल्ली की सीमाओं पर हुए किसान आंदोलन के रूप में देखी। उसकी अगली कड़ी अगले कुछ दिनों में दिख सकती है क्योंकि घटती आय और बढ़ती आकांक्षाओं के चक्र में फंसे किसानों की हकीकत सबके सामने है। पिछली शताब्दी के चौथे दशक से नौवें दशक तक उनका जीवन बदलने की क्षमता और सोच रखने वाले चौधरी चरण सिंह जैसे नेता न केवल राजनीति में थे बल्कि सरकारों में रहते हुए उनके लिए कानून बनाने और लागू करने की क्षमता रखते थे। विडंबना यह है कि आज उनकी जगह भरने वाला कोई राजनेता या किसान नेता नहीं है।</span></p>
<p dir="ltr"><span>चौधरी चरण सिंह के राजनीतिक जीवन पर <strong>पॉल ब्रास</strong> की दो खंडों की किताब अहम दस्तावेज तो है ही, यह उनके कामकाज की शैली और राजनीतिक लोगों के बीच उनके पत्र व्यवहार से लेकर सरकारी विभागों के फैसलों को सामने रखती है। आरक्षण की वकालत करते हुए चौधरी चरण सिंह कहते हैं कि कृषि विभाग में ऐसे अधिकारी हैं जो जौ और गेहूं के पौधे के बीच अंतर नहीं कर सकते। इन लोगों नहीं पता कि किस फसल में कब सिंचाई की जरूरत है।&nbsp;</span></p>
<p dir="ltr"><span>नौकरियों में किसानों के बच्चों को 60 फीसदी <strong>आरक्षण</strong> क्यों मिलना चाहिए, इस शीर्षक से उन्होंने 21 मार्च, 1947 को एक पेपर लिखा था। इसमें उन्होंने साफ लिखा था कि खेती करने वालों के बेटों और आश्रितों को सरकारी नौकरियों और सार्वजनिक खर्च से चलने वाले शिक्षण संस्थानों में आरक्षण देना चाहिए। इसमें किसी जाति का जिक्र नहीं है। अगर हम अभी देखें तो खेती पर निर्भर रहने वाली जातियां जाट, मराठा, कापू और पटेल आरक्षण के लिए आंदोलन करती रहती हैं क्योंकि शहरी वर्ग के मुकाबले उनकी आर्थिक व सामाजिक स्थिति काफी कमजोर हो गई है। यह बात अलग है कि उत्तर प्रदेश में उनके बनाये कानूनों का जिन जातियों ने फायदा लिया, उसके एक बड़े हिस्से को अगस्त 1990 में लागू किये मंडल कमीशन की सिफारिशों से आरक्षण मिल गया। जिस मोरारजी देसाई सरकार ने जनवरी, 1979 में बी पी मंडल की अध्यक्षता में <strong>पिछड़ा वर्ग आयोग</strong> गठित किया था, चौधरी चरण सिंह उस सरकार में गृह मंत्री थे। दिसंबर, 1980 में आई इस आयोग की रिपोर्ट के आधार पर ही अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को जाति आधारित 27 फीसदी आरक्षण देने का प्रावधान लागू किया गया। अनुसूचित जाति और जनजाति को पहले से ही 22.5 फीसदी आरक्षण प्राप्त है।</span></p>
<p dir="ltr"><span>उन्होंने 1961 के एक सर्वे का हवाला देते हुए कहा कि भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में किसान परिवार की पृष्ठभूमि रखने वाले लोगों की हिस्सेदारी मात्र 11.5 फीसदी है, जबकि सरकारी नौकरी करने वालों के बच्चों की हिस्सेदारी 45.8 फीसदी है। इसके मद्देनजर उन्होंने कहा कि किसानों के बच्चों को <strong>60 फीसदी आरक्षण</strong> तो मिलना ही चाहिए। साथ ही, सरकारी नौकरी का लाभ ले चुके लोगों के बच्चों को सरकारी नौकरियों के लिए अयोग्य माना जाए। उनका तर्क था कि इससे सरकारी विभागों की कार्यकुशलता बढ़ेगी क्योंकि किसानों के बच्चे कामकाज में बेहतर हैं और मुश्किल परिस्थिति में बेहतर फैसला लेने में भी सक्षम हैं। शहरी पृष्ठभूमि से आने वाले अधिकारी की तरह सख्त फैसला लेने में उसके हाथ नहीं कांपेंगे। वह उस तहसीलदार से बेहतर साबित होगा जो ओलावृष्टि से नष्ट फसल के लिए 100 रुपये के मुआवजे के मामले की सुनवाई के लिए दर्जन भर तारीखें लगाता है।&nbsp;</span></p>
<p dir="ltr"><span>असल में गांव और शहरों के बीच अंतर को लेकर उनकी राय पुख्ता थी। उनका मानना था कि असल अंतर गांव और शहर का है। शहरी लोग गांव के लोगों को देहाती और गंवार समझते हैं। यह स्थिति तब है जब 1950-51 में देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कृषि की भागीदारी 54 फीसदी थी और देश के 70 फीसदी लोग रोजगार के लिए कृषि पर निर्भर थे। इस अंतर को समाप्त करने के लिए आरक्षण जरूरी है, क्योंकि अभी सरकारी नौकरियों में शहरी लोगों का कब्जा है। मौका नहीं मिलने के कारण किसान और ग्रामीण लोग गरीबी का दंश झेल रहे हैं। उन्होंने यह भी साफ कहा कि सरकारी नौकरी और शिक्षण संस्थानों में प्रवेश के समय किसी की जाति नहीं पूछी जानी चाहिए।</span></p>
<p dir="ltr"><span>किसानों के बच्चों के लिए आरक्षण का पहला प्रस्ताव उन्होंने अप्रैल 1939 में उत्तर प्रदेश (उस समय संयुक्त प्रांत) कांग्रेस विधायक दल की एक्जीक्यूटिव समिति के सामने रखा था, जिसमें 50 फीसदी आरक्षण की बात कही गई थी। भूमिहीन लोगों को आरक्षण से बाहर रखने की उनकी राय की आलोचना हुई तो उन्होंने कहा कि मुझे उस पर कोई आपत्ति नहीं है और आरक्षण को बढ़ाकर 75 फीसदी कर देना चाहिए। 1951 की जनगणना के मुताबिक कृषि कार्यों में लगे इन लोगों की हिस्सेदारी 28.1 फीसदी थी।</span></p>
<p dir="ltr"><span>उन्होंने कभी खुद को अपनी जाति जाट के रूप में दिखाने की कोशिश नहीं की, बल्कि सभी किसानों के लिए काम किया। इसी के चलते उन्होंने राजनीतिक ताकत के रूप में <strong>मुस्लिम, अहीर, जाट, गुर्जर और राजपूत (मजगर)</strong> का गठजोड़ खड़ा किया।</span></p>
<p dir="ltr"><span>चौधरी चरण सिंह के तीन कानूनों की बात करें तो पहला है <strong>उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार कानून (जेडएएलआर) 1950</strong>, जिसके जरिये जमींदारों से जमीन लेकर उसका मालिकाना हक उस पर खेती करने वाले बटाईदार किसानों को दिया गया। 1950 का यह कानून उत्तर प्रदेश के किसानों किस्मत बदल गया। जमींदारों की तमाम कोशिशें नाकाम हो गईं और खेती करने वाले किसान जमीन के मालिक बन गये। इस कानून के जरिये सरकार को टैक्स देकर खेती कराने वाले जमींदारों की व्यवस्था हमेशा के लिए समाप्त हो गई। वहीं खेती करने वाले किसान पुश्तैनी हक के साथ जमीन के मालिक बन गये। इस कानून का सबसे अधिक फायदा यादव, कुर्मी, गुर्जर, मुस्लिम और तमाम पिछड़ी जातियों को मिला।</span></p>
<p dir="ltr"><span><strong>यूपी कंसोलिडेशन ऑफ होल्डिंग्स एक्ट, 1953</strong> दूसरा कानून था। इस कानून के तहत वह चाहते थे कि जिन लोगों को पुरानी व्यवस्था बदलने के बाद जमीन मिली, उनको अधिक कुशल किसान बनाया जाए। उसके लिए किसानों की अलग-अलग जगहों पर मौजूद जोत को एक जगह लाने का काम किया गया ताकि उसका पूरी जोत एक स्थान पर हो। इससे उसकी उत्पादकता और कुशलता बढ़ेगी। इस कानून के चलते 1976-77 में उत्तर प्रदेश में 146 लाख हेक्टेयर जमीन में से 142 लाख हेक्टेयर की चकबंदी की प्रक्रिया इस कानून के तहत पूरी हो चुकी थी।</span></p>
<p dir="ltr"><span>इसके बाद आया तीसरा कानून <strong>यूपी इंपोजिशन ऑफ सीलिंग ऑन लैंड होल्डिंग्स एक्ट 1960</strong>। इस कानून के तहत पांच व्यक्तियों के परिवार के लिए बेहतर गुणवत्ता की 40 एकड़ भूमि की सीमा तय की गई। उनका मानना था कि किसी किसान की जोत का न्यूनतम से अधिकतम ढाई एकड़ से 27.5 एकड़ का आकार आदर्श है। इसमें वह अपने परिवार के साथ खुद खेती कर सकता है और ट्रैक्टर समेत उत्पादकता में बढ़ोतरी करने वाली मशीनों का इस्तेमाल भी कर सकता है।&nbsp;</span></p>
<p dir="ltr"><span>चौधरी चरण सिंह के इन कानूनों के साथ <strong>हरित क्रांति</strong> का किसानों को फायदा हुआ। अधिक उत्पादकता वाली फसलों की प्रजातियां, उर्वरकों की उपलब्धता, एमएसपी व्यवस्था के तहत सरकारी खरीद जैसे प्रावधानों ने किसानों का एक बड़ा मध्य वर्ग खड़ा कर दिया।&nbsp;</span></p>
<p dir="ltr"><span>करीब चार दशकों तक हासिल यह<strong> उपलब्धि</strong> अब इतिहास बन चुकी है। हरित क्रांति की कामयाबी वाले इलाकों में उत्पादकता स्थिर हो जाने, जमीनों का बंटवारा होने से छोटी होती जोत, बढ़ती फसल उत्पादन लागत और असामान्य मौसमी बदलाव ने हालात को बदल कर रख दिया है। इसके चलते गांव, किसान व उसके परिवार संकट में हैं। उनको इस संकट से निकालने की दृषि और नीतिगत बदलावों को नेतृत्व देने की क्षमता रखने वाला राष्ट्रीय स्तर का किसान नेता अब मौजूद नहीं है। इसके चलते खेती किसानी पर निर्भर लोगों और अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्रों में काम कर रहे लोगों के बीच आर्थिक-सामाजिक असमानता तेजी से बढ़ी है। नतीजा, चौधरी चरण सिंह और सर छोटूराम जैसे नेताओं के कदमों व कानूनों की बदौलत खड़ा हुआ किसान इसी कश्मकश के बीच आंदोलन की ओर बढ़ रहा है। लेकिन आंदोलन की राह भी केवल एमएसपी जैसे मुद्दों तक ही जाती है। कोई बड़ा समग्र उपाय उसमें नहीं है जो इस संकट से किसानों को निजात दिला सके। सरकार द्वारा चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न देने की घोषणा ने एक बार फिर उनकी नीतियों और कदमों को समझने और किसानों संकट की समीक्षा का मौका दिया है।</span></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ किसानों को आरक्षण दिलवाना चाहते थे चौधरी चरण सिंह, उनके हक में बनाए तीन भूमि सुधार कानून ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[डब्ल्यूटीओ की 13वीं मंत्रिस्तरीय बैठक में भी ‘पीस क्लॉज’ के स्थायी समाधान की उम्मीद नहीं]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/no-permanent-solution-of-peace-clause-expected-at-13th-ministerial-conference-of-wto.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 11 Feb 2024 13:12:28 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/no-permanent-solution-of-peace-clause-expected-at-13th-ministerial-conference-of-wto.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">इस माह के अंत में विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में विदेश व्यापार मंत्रियों का 13वां मंत्रिस्तरीय सम्मेलन होने वाला है। अबू धाबी में यह सम्मेलन 26 फरवरी से शुरू होना है। मंत्रियों की यह बैठक ऐसे समय हो रही है जब बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली अस्तित्व की लड़ाई में हारती दिख रही है। &lsquo;नियम आधारित संगठन&rsquo; यानी डब्ल्यूटीओ को विश्व व्यापार में व्यवस्था सुनिश्चित करने के उद्देश्य से बनाया गया था। लेकिन इसके नियम 1990 से पहले बने जब सदस्यों की संख्या 100 से भी कम थी। साढ़े चार दशक में विश्व अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव होने के बाद व्यापार के मामले में सदस्य देशों की जरूरतें और आकांक्षाएं बदल गई हैं। इनमें अनेक बदलाव बिगड़ती आर्थिक परिस्थितियों के कारण हुए जिसने प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की आर्थिक दिशा बदल कर उसे अंतर्मुखी बना दिया। तेरहवीं मंत्रिस्तरीय बैठक (एमसी13) से पहले डब्ल्यूटीओ सदस्यों के सामने इस बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था को सामयिक जगत की जरूरतों के मुताबिक ढालने की अहम चुनौती है, खास कर विकासशील देशों की जरूरतों के मुताबिक।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">बड़े खेद की बात है कि सदस्य देश सिस्टम की उन खामियों की बात नहीं कर रहे जो डब्ल्यूटीओ की राह में बड़ी बाधा हैं। फिलहाल सदस्य मुद्दा आधारित चर्चा में लगे हैं। इनमें कृषि से संबंधित विभिन्न विषयों की समीक्षा और फिशरीज सेक्टर के लिए सब्सिडी को अपनाना शामिल है। भारत के लिए ये दोनों मुद्दे महत्वपूर्ण हैं।</span></p>
<p><strong>कृषि के अनसुलझे मुद्दे</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कृषि संबंधी समझौते (एग्रीमेंट ऑन एग्रीकल्चर) में कृषि को घरेलू (सरकारी) मदद का जो विषय जोड़ा गया है, उसमें निर्यात सब्सिडी को छोड़कर बाकी हर तरह की सब्सिडी शामिल हैं। यह सबसे विवादास्पद मुद्दा है क्योंकि इसमें घरेलू कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए कई तरह के नीतिगत समर्थन को हटाने की बात है। घरेलू मदद विषय के निशाने पर दो पारंपरिक सब्सिडी हैं जो किसानों को मिलती रही हैं। ये हैं प्राइस सपोर्ट और इनपुट सब्सिडी। अमेरिका ने कृषि कानूनों के माध्यम से वर्ष 1933 में सब्सिडी देना शुरू किया था। उसके बाद तमाम देश अपनी घरेलू खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए घरेलू कृषि को मदद करते आए हैं। भारत जैसे देशों में खाद्य सुरक्षा के अलावा सब्सिडी का एक और कारण है। वह है, प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से कृषि पर निर्भर बड़ी संख्या में लोगों के जीवन यापन की सुरक्षा सुनिश्चित करना।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अन्य तरह की सब्सिडी हटाने पर विशेष फोकस के कारण घरेलू मदद विषय में खाद्य सुरक्षा के महत्वपूर्ण लक्ष्य की अनदेखी की गई है, जिसका जिक्र कृषि संबंधी समझौते की प्रस्तावना में नॉन-ट्रेड समझौते के रूप में किया गया है। समझौते में ऐसा कोई प्रावधान नहीं जो नॉन-ट्रेड चिंताओं पर ध्यान देता हो। वर्ष 1995 में डब्ल्यूटीओ की स्थापना के बाद विकासशील देशों ने कृषि संबंधी समझौते में व्यापक बदलाव के पक्ष में तर्क दिए। दोहा मंत्रिस्तरीय बैठक के बाद जारी घोषणा पत्र कृषि समझौते की समीक्षा के लिए डब्ल्यूटीओ सदस्यों का अब तक का सबसे विस्तृत प्रस्ताव है। इसमें विकासशील देशों में कृषि की विशेष भूमिका को स्वीकार किया गया है। उस बैठक में इस बात पर सहमति हुई कि विकासशील देशों में कृषि को विशेष स्थान दिया जाना वार्ता के सभी तत्वों का अभिन्न अंग रहेगा, सभी तरह की छूटों और प्रतिबद्धताओं की अनुसूची में शामिल रहेगा और आगे जो भी नियम तथा विषय चर्चा में रहेंगे उनमें भी इसे स्थान मिलेगा। इसका मकसद यह था कि विकासशील देश खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण उत्थान समेत अपने विकास की जरूरतों के मुताबिक कदम उठा सकें।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">लेकिन कृषि संबंधी समझौते की यह व्यापक समीक्षा वर्ष 2017 में एजेंडे से हटा दी गई। उसके बाद से विकसित देश कृषि समझौते की ऐसी समीक्षा के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं जिसमें घरेलू खाद्य सुरक्षा और आजीविका बढ़ाने में कृषि सब्सिडी के इस्तेमाल की संभावनाओं को सीमित किया जा सके। 13वीं मंत्रिस्तरीय बैठक से पहले भी इस तरह के प्रयास जारी है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कृषि संबंधी समझौते की समीक्षा का एक भाग ऐसा है जो भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। पिछले दशक की शुरुआत से ही डब्ल्यूटीओ के सदस्य खाद्य सुरक्षा के उद्देश्य से सरकारी स्टॉक होल्डिंग के मुद्दे पर चर्चा कर रहे हैं। यह भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) का आधार है। भारत के लिए इसका महत्व तब और बढ़ गया जब सरकार ने देश की दो-तिहाई आबादी को सब्सिडी वाली दरों पर अनाज उपलब्ध कराने के लिए राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून (एनएफएसए) लागू करने का निर्णय लिया।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">खाद्य सुरक्षा कानून का लागू किया जाना कृषि समझौते में सब्सिडी के विषय के तहत आता है। इसमें कहा गया है कि डब्ल्यूटीओ के सदस्य फसलों और इनपुट के लिए जो सब्सिडी देंगे, वह कृषि उपज के मूल्य के अधिकतम 10% तक होगा। कृषि समझौते के अनुसार किसी भी कमोडिटी के लिए उसके मौजूदा प्रशासित मूल्य अथवा मार्केट प्राइस सपोर्ट और 1986-88 की अंतरराष्ट्रीय कीमत (जिसे तय बाह्य संदर्भ मूल्य कहा जाता है) का अंतर उसकी सब्सिडी होगी। इनपुट सब्सिडी को बजटीय खर्च माना जाता है। हालांकि यह फार्मूला किसी भी आर्थिक लॉजिक से परे है, फिर भी ज्यादातर फसलों के मामले में भारत में जो सब्सिडी दी जाती रही वह 10% की सीमा के भीतर थी।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून लागू होने के बाद यह स्थिति बदल गई। कृषि समझौते के अनुसार सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए अनाज खरीद की कीमत और उसके बाह्य संदर्भ मूल्य के अंतर को सब्सिडी माना जाता है। इसका मतलब है कि भारत की कुल सब्सिडी 10% की सीमा से अधिक होगी। इस तरह यह व्यवस्था सरकार को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून लागू करने से रोकती है। भारत का लगातार यह तर्क रहा है कि सब्सिडी के विषय में संशोधन किया जाए। इसके लिए या तो नया बाह्य संदर्भ मूल्य तय किया जाए और/अथवा विभिन्न देशों को अपनी सब्सिडी की गणना करने में महंगाई को भी शामिल करने की अनुमति दी जाए। भारत के इस तर्क को अभी तक स्वीकार नहीं किया गया है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">सार्वजनिक वितरण प्रणाली के भविष्य को फिलहाल कोई खतरा नहीं है, क्योंकि डब्ल्यूटीओ का कोई भी सदस्य देश &lsquo;पीस क्लॉज&rsquo; के कारण 10% की सीमा से अधिक सब्सिडी देने पर भारत को चुनौती नहीं दे सकता है। इस क्लॉज पर 2013 में सहमति बनी थी, लेकिन उसके साथ यह भी तय हुआ था कि डब्ल्यूटीओ के सदस्य सरकारी स्टॉक होल्डिंग के लिए 2017 तक स्थायी समाधान निकालेंगे। इस समय सीमा के 6 साल बीत जाने के बाद भी 13वीं मंत्रिस्तरीय बैठक में भी इसकी कोई उम्मीद नहीं है, क्योंकि अमेरिका ने अबू धाबी में इसका विरोध किया है। इस तरह भारत के सबसे बड़े कल्याणकारी कार्यक्रम पर तलवार लटक रही है, जिसे सरकार ने दिसंबर 2028 तक बढ़कर नया जीवन दिया है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">पीस क्लॉज में भारत के लिए एक बड़ी बाधा यह है कि सार्वजनिक स्टॉक से अनाज का निर्यात नहीं किया जा सकता है। कृषि समझौते पर नजर रखने वाली डब्ल्यूटीओ की कृषि समिति में अनेक देश भारत से इस विषय पर स्पष्टीकरण मांग रहे हैं। वे यह जानना चाहते हैं कि सरकार जो अनाज खरीदती है और जो उसके बफर स्टॉक में रहता है, वह आखिरकार अंतरराष्ट्रीय बाजार में तो नहीं पहुंच रहा है। इन देशों का आरोप है कि भारत वैश्विक बाजार में सब्सिडी वाला अनाज डंप कर रहा है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">यहां यह बात उल्लेखनीय है कि भारत के निर्यात के खिलाफ आवाज उठाने वाले ज्यादातर विकसित देश हैं। ये देश विश्व अनाज बाजार में अपने यहां की बड़ी कंपनियों की मदद करते हैं। कहने का मतलब यह है कि जब बड़ी सब्सिडी वालों ने विश्व अनाज बाजार पर प्रभुत्व बना रखा है तो भारत के लिए पीस क्लॉज में निर्यात पर रोक की शर्त हटाने के पक्ष में तर्क देने का यह मजबूत आधार बनता है। इसमें भी महत्वपूर्ण बात यह है कि खाद्य आयात करने वाले देश के हितों की रक्षा के लिए इस मुद्दे का समाधान किया जाना चाहिए क्योंकि अगर भारत को निर्यात करने से रोका जाता है तो वैश्विक खाद्य संकट और गहरा होगा।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;"><strong>फिशरीज सब्सिडी पर समस्याग्रस्त समझौता</strong></span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">फिशरीज सब्सिडी पर समझौते को वर्ष 2022 में 12वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में अंतिम रूप दिया गया था। यह समझौता तब अमल में आएगा जब डब्ल्यूटीओ के दो-तिहाई सदस्य देश, अर्थात कम से कम 110 सदस्य, फिशरीज सब्सिडी के समझौते के प्रोटोकॉल को औपचारिक रूप से स्वीकार करेंगे। अभी तक सिर्फ 30 देशों ने इस प्रोटोकॉल को स्वीकार किया है।</span></p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/02/image_750x_65c879cbb1f2b.jpg" alt="" /></p>
<p><em><strong>चित्र परिचयः 13वीं मंत्रिस्तरीय बैठक से पहले फिशरीज के मुद्दे पर अधिकारी स्तर की बैठकें हो रही हैं</strong></em></p>
<p><span style="font-weight: 400;">फिशरीज सब्सिडी पर भारत का एक मजबूत आर्थिक और नैतिक पक्ष है। भारत लगातार यह कहता रहा है कि कॉमर्शियल हितों के लिए दी जाने वाली सब्सिडी को खत्म करना जरूरी है, क्योंकि यह वैश्विक स्तर पर मछलियों के स्टॉक के लिए खतरा बन रहा है। लेकिन इसके साथ ही छोटे मछुआरों को सब्सिडी जारी रखने की व्यवस्था होनी चाहिए, जिन्होंने आमतौर पर पर्यावरण की दृष्टि से सस्टेनेबल तरीके अपनाए हैं। सब्सिडी को जारी रखना छोटे मछुआरों की आजीविका की सुरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">फिशरीज सब्सिडी पर समझौते में भारत की चिंताएं परिलक्षित नहीं होती हैं। यह समझौता विकासशील देशों को अपने एक्सक्लूसिव आर्थिक क्षेत्र में अवैध, बिना रिपोर्टिंग के और अनियमित तरीके (आईयूयू) से मछली पकड़ने वाले जहाज या ऑपरेटर अथवा जरूरत से ज्यादा मछली पकड़ने पर दो साल के लिए सब्सिडी की अनुमति देता है। दो साल बाद इन मछुआरों को दी जाने वाली सब्सिडी का क्या होगा, उसके बारे में इसमें कुछ नहीं कहा गया है। समझौते में ऐसा कोई और प्रावधान नहीं जो विकासशील देशों को विशेष और अलग ट्रीटमेंट का अधिकार देता हो तथा जिसके आधार पर भारत सब्सिडी दे सके।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">यह मुद्दा फिशरीज सब्सिडी समझौते के एक प्रावधान के कारण महत्व रखता है। इस प्रावधान में कहा गया है कि सदस्य देश मछली पकड़ने अथवा इससे संबंधित गतिविधियों के लिए सब्सिडी देते वक्त उन स्टॉक का विशेष ध्यान रखेगा जिनके बारे में कोई जानकारी नहीं होती है। इस तरीके से आईयूयू तथा जरूरत से ज्यादा मछली पकड़ने के लिए दी जाने वाली सब्सिडी को भी समझौते की परिधि में शामिल किया गया है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">भारत के छोटे मछुआरे ना तो आईयूयू जैसी गतिविधियों में शामिल होते हैं, न ही वे जरूरत से ज्यादा मछली पकड़ते हैं। ऐसे में फिशरीज सेक्टर को दी जाने वाली सब्सिडी जारी रखने में समझौते का यह प्रावधान बाधक बन सकता है। दरअसल डब्ल्यूटीओ में मूड यह है कि भारत और चीन को विशेष तथा अलग ट्रीटमेंट के फायदे से वंचित रखा जाए। इस विशेष वजह से आगे की बातचीत में विशेष तथा अलग ट्रीटमेंट के प्रावधान को शामिल किए जाने की संभावना कम लगती है। 13वीं मंत्रिस्तरीय बैठक की जो तैयारी चल रही है उसमें फिशिंग अथवा इससे जुड़ी गतिविधियों के बारे में अतिरिक्त प्रावधानों पर विचार किया जा रहा है। इनमें विशेष एवं अलग ट्रीटमेंट का प्रावधान सिर्फ उन देशों के लिए रखने का विचार है जो अल्प विकसित हैं अथवा वे ऐसे विकासशील देश हैं जो समुद्र में बहुत कम मछलियां पकड़ते हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">डब्ल्यूटीओ की पिछली मंत्रिस्तरीय बैठकों की तरह इस बार भी भारत का मुख्य लक्ष्य यह रहेगा कि अबू धाबी में होने वाले निर्णय से इसके छोटे किसानों तथा मछुआरा समुदाय को बड़ा नुकसान ना हो। हमें यह उम्मीद नहीं रखनी चाहिए कि बहुपक्षीय व्यापार के नियम देश के विकास के लिए मददगार होंगे।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;"><em><strong>(डॉ. बिस्वजीत धर जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर और काउंसिल फॉर सोशल डेवलपमेंट के वाइस प्रेसिडेंट हैं)</strong></em></span></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/02/image_750x500_65c87a3f903f8.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ डब्ल्यूटीओ की 13वीं मंत्रिस्तरीय बैठक में भी ‘पीस क्लॉज’ के स्थायी समाधान की उम्मीद नहीं ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[चौधरी चरण सिंह कैसे बने किसानों के मसीहा, जानिए उनके 10 बड़े काम]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/how-chaudhary-charan-singh-became-the-messiah-of-farmers-know-his-10-big-works.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 10 Feb 2024 16:42:56 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/how-chaudhary-charan-singh-became-the-messiah-of-farmers-know-his-10-big-works.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>असली भारत गांवों में बसता है और देश की खुशहाली का रास्ता खेत- खलिहानों से होकर गुजरता है। इन बातों को देश की राजनीति में स्थापित करने वाले पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह को भारत सरकार ने सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित करने का ऐलान किया है। किसान-मजदूर और वंचित वर्ग की भलाई और गांवों की तरक्की के पैरोकार चौधरी चरण सिंह ने जब भी मौका मिला, तब ऐसे काम किए जो आज भी याद किए जाते हैं। वे लोकप्रिय जननेता ही नहीं, बल्कि गांधी जी के ग्राम स्वराज से प्रेरित प्रबुद्ध विचारक भी थे। आईये, जानते हैं ऐसे 10 बड़े काम जिनकी वजह से चौधरी चरण सिंह किसान मसीहा कहलाए:&nbsp;</p>
<ol>
<li>चौधरी चरण सिंह ने जब कांग्रेस के जरिए राजनीति में कदम रखा तो काश्तकार जमींदारों के शोषण त्रस्त थे। इसलिए अपनी राजनीति को उन्होंने किसान-कमेरा वर्ग की भलाई का माध्यम बनाया। 1937 में जब चौधरी चरण सिंह पहली बार कांग्रेस के टिकट पर संयुक्त प्रांत के विधायक चुने गये थे, तभी से <strong>जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार</strong> के प्रयासों में जुट गये। किसानों को व्यापारियों व आढ़तियों के उत्पीड़न से बचानें के लिए संयुक्त प्रांत धारासभा में उन्होंने प्राइवेट मेंबर बिल के रूप में <strong>एग्रीकल्चरल प्रोड्यूस मार्केट बिल</strong> (कृषि उत्पादन विपणन बिल) प्रस्तुत किया। हालांकि, यह बिल पारित नहीं हो पाया। लेकिन यही से कृषि उपज मंडियों को संचालित करने वाले एपीएमसी एक्ट की नींव पड़ी जो तीन दशक बाद 1964 में चौधरी चरण सिंह यूपी में कृषि मंत्री रहने के दौरान पारित हुआ।</li>
<li>किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाले चौधरी चरण सिंह खेतिहर किसानों और काश्तकारों की मुश्किलों को समझते थे। सन 1939 में उन्होंने कांग्रेस विधान मंडल दल की कार्यसमिति के सामने किसान परिवारों की संतानों के लिए सरकारी नौकरियों में 50 फीसदी <strong>आरक्षण</strong> की मांग रखी थी। हालांकि, पार्टी द्वारा इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया गया, लेकिन इससे उनकी किसान हितैषी सोच का पता चलता है। &nbsp;</li>
<li>उत्तर प्रदेश में <strong>जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधारों</strong> को श्रेय चौधरी चरण सिंह को जाता है। सन 1946 में मुख्यमंत्री गोविंदबल्लभ पंत ने चौधरी चरण सिंह को अपना संसदीय सचिव नियुक्त किया। उसी दौरान उन्होंने <strong>संयुक्त प्रांत जमींदारी उन्मूलन समिति</strong> की रिपोर्ट तैयार करने में अहम भूमिका निभाई। यही रिपोर्ट उत्तर प्रदेश में भूमि सुधारों का आधार बनी। हालांकि कांग्रेस और राज्य की सरकार का एक वर्ग इन भूमि सुधारों का धुर विरोधी था। इसी दौरान जमींदारी उन्मूलन पर उन्होंने अपनी पहली पुस्तक "एबोलिशन ऑफ जमींदारी : टू अल्टेरनेटिव्स" लिखी। यहीं से चौधरी साहब ग्रामीण और कृषक वर्ग के पैरोकार के तौर पर स्थापित होते चले गये।&nbsp;</li>
<li>आजादी के बाद <strong>उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि व्यवस्था विधेयक, 1950</strong> <span>को तैयार करने और इसे पारित कराने में चौधरी चरण सिंह ने गांव-किसान के प्रतिनिधि की भूमिका निभाई। इस कानून के जरिए लाखों काश्तकारों को जमीन का </span>मालिकाना हक मिलने का रास्ता साफ हुआ। जमींदारों की ताकत और पार्टी के भीतर तमाम विरोध के बावजूद चौधरी चरण सिंह इस कानून में किसान और काश्तकार हित की बातों की शामिल करवाने में सफल रहे। इससे न सिर्फ जमींदारी प्रथा का अंत हुआ बल्कि काश्तकार जमीन के मालिक बन गये।&nbsp;</li>
<li>यूपी में राजस्व और <span>कृषि मंत्री रहते हुए चौधरी चरण सिंह ने कृषि एवं ग्राम उद्योगों को कई तरह की रियायतें </span><span>दिलाने में मदद की। जबकि उस समय विकास का नेहरूवादी मॉडल बड़े शहरों और बड़े उद्योंगों के विकास पर केंद्रित था।&nbsp;</span>1953 में राजस्व और कृषि मंत्री के रूप में उन्होंने <strong>उत्तर प्रदेश चकबंदी अधिनियम</strong> को पारित कराया। इसके बाद 1960 में उन्होंने <span>&nbsp;<strong>भू-जोतों पर हदबंदी अधिनियम] 1960</strong></span> बनवाया। सीलिंग से प्राप्त भूमि को अनुसूचित जाति के लोगों को आवंटित करने की नीति बनाई गई। उन्होंने साढ़े तीन एकड़ भूमि वाले किसानों को लगान में छूट भी दिलवाई। उनकी किसान हितैषी नीतियों के कारण आजादी के बाद देश में खेती-किसानी को बढ़ावा मिला।&nbsp; &nbsp;</li>
<li>चौधरी चरण सिंह साफ-सुथरी छवि वाले, <span>स्पष्टवादी</span>, <span>ईमानदार नेता और सख्त प्रशासक थे। 1953 में जब वे यूपी के राजस्व मंत्री थे तो प्रदेश में <strong>पटवारियों</strong> ने जमींदारों की शह पर हड़ताल कर दी। यह वो दौर था जब जमींदारी उन्मूलन कानून लागू हो रहा था। सरकार पर दबाव बनाने के लिए 27 हजार पटवारियों ने इस्तीफे दे दिए। लेकिन चौधरी चरण सिंह ने सख्त रुख अपनाते हुए अनुचित मांगों के आगे झुकने से इंकार कर दिया और सभी 27 हजार पटवारियों के इस्तीफे स्वीकार कर उनकी जगह लेखपाल का पद सृजित किया।&nbsp;</span></li>
<li>&nbsp;1950 के दशक में देश के प्रधानमंत्री पंडित <strong>जवाहरलाल नेहरू</strong> सोवियत संघ की <strong>कॉआपरेटिव फार्मिंग</strong> के मॉडल से प्रभावित होकर इसे भारत में बढ़ावा देना चाहते थे। तब चौधरी चरण सिंह कांग्रेस की ही यूपी सरकार में मंत्री थे। लेकिन किसानों के हितों को लेकर वह तत्कालीन प्रधानमंत्री और अपनी पार्टी के सर्वोच्च नेता से भी भिड़ गए थे। सन 1959 में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में चौधरी चरण सिंह ने सहकारी खेती के नेहरू मॉडल का पुरजोर तरीके से विरोध किया कर अपने राजनैतिक कॅरियर को दांव पर लगा दिया। इस कदम ने चौधरी साहब को किसानों के बीच बहुत लोकप्रिय बना दिया। लेकिन कांग्रेस नेतृत्व से मतभेद के चलते उन्हें 19 महीने प्रदेश सरकार से बाहर रहना पड़ा। इस दौरान उन्होंने <strong>ज्वाइंट फार्मिंग एक्स-रेड: प्राब्लम एंड इट्स सॉल्यूशन</strong> किताब लिखकर सहकारी खेती के विरोध को वैचारिक और तार्किक आधार दिया।&nbsp;</li>
<li>1967 में कांग्रेस से अलग होने से पहले ही चौधरी चरण सिंह सरकारी नीतियों और शासन पर शहरी, <span>पूंजीपति वर्ग के वर्चस्व के मुखर विरोधी थे। 1967 में कांग्रेस से अलग होने के बाद उन्होंने गांव-किसान विरोधी नीतियों को पुरजोर विरोध किया और देश में किसान राजनीति को स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई।&nbsp;</span>1977 <span>तक चौधरी चरण सिंह खुद को किसान-कमेरा वर्ग के प्रमुख प्रवक्ता के तौर पर खुद को स्थापित कर चुके थे। कांग्रेस से अलग होकर उन्होंने भारतीय क्रांति दल और फिर भारतीय लोकदल पार्टी बनाई तो उसके चुनाव चिन्ह में किसान था। आगे चलकर <strong>हलधर</strong>&nbsp;किसान ही जनता पार्टी का चुनाव चिन्ह बना</span>, <span>जिसने देश में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनाई। </span></li>
<li>चौधरी चरण सिंह किसान, <span>मजदूर</span>, <span>वंचित वर्ग और ग्रामीण भारत की समस्याओं को बखूबी समझते थे। वे शहरों और बड़े उद्योगों के विकास के साथ-साथ कृषि और गांवों की तरक्की पर जोर देते थे। कृषि के अलावा गांवों के परंपरागत और लघु उद्योगों को बढ़ावा देने की वकालत करते थे। </span>उन्होंने अपने 76वें जन्म दिन पर 23 दिसंबर 1978 को दिल्ली में बोट क्लब पर ऐतिहासिक किसान रैली कर देश की राजनीति को <strong>किसानों की ताकत</strong> का अहसास कराया।</li>
<li>1979 में उपप्रधानमंत्री और वित्त मंत्री रहते हुए उन्होंने जो केंद्रीय बजट पेश किया, जो <strong>ग्रामीण बजट</strong> के नाम से चर्चित हुआ। इसमें उन्होंने किसानों, ग्राम विकास और लघु उद्योगों पर सर्वाधिक जोर दिया। कृषि और ग्रामीण विकास के संस्थागत ऋण की समीक्षा के लिए शिवरामन कमेटी का गठन किया, जिससे आगे चलकर <strong>नाबार्ड</strong> की नींव पड़ी। प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने ही गांवों के लिए अलग से <strong>ग्रामीण पुनरुत्थान मंत्रालय</strong> बनवाया। जब भी वह सत्ता में कुछ करने की स्थिति में आए उन्होंने किसानों, भूमिहीनों, समाज के वंचित वर्ग और छोटे उद्योगों के हित में नीतिगत निर्णय लेने का प्रयास किया।</li>
</ol> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/02/image_750x500_65c7524d7f09d.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ चौधरी चरण सिंह कैसे बने किसानों के मसीहा, जानिए उनके 10 बड़े काम ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[महंगाई रोकने के उपायों से कृषि व ग्रामीण इकोनॉमी पर प्रतिकूल असर]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/inflation-targeting-measures-adversely-impact-agriculture-and-rural-economy.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 29 Jan 2024 14:43:27 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/inflation-targeting-measures-adversely-impact-agriculture-and-rural-economy.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>महंगाई पर अंकुश लगाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) और केंद्र सरकार की इन्फलेशन टारगेटिंग की रणनीति कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ रही है। यही वजह है कि इस साल (2023-24) असामान्य मानसून ने जहां कृषि और सहयोगी क्षेत्र की विकास दर को पिछले वित्त वर्ष के चार फीसदी से घटाकर 1.8 फीसदी पर ला दिया है, वहीं ग्रामीण क्षेत्र की मांग रिकवर नहीं हो पा रही है। इसका मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र खासतौर से एफएमसीजी और कंज्यूमर डयूरेबल सेक्टर की मांग पर सीधा असर दिख रहा है। दूसरी तरफ, आम आदमी की जेब पर भारी पड़ने वाली हाउसिंग, ट्रांसपोर्टेशन, मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज की महंगाई रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाए जा रहे हैं।</p>
<p>रिजर्व बैंक ने खुदरा महंगाई दर (सीपीआई) के लिए चार फीसदी (दो फीसदी कम या ज्यादा) का लक्ष्य तय कर रखा है। इसे हासिल करने के लिए रिजर्व बैंक को काफी मशक्कत करनी पड़ रही है। खुदरा महंगाई दर का बड़ा हिस्सा फूड बॉस्केट से आता है इसलिए कोशिश रहती है कि खाद्य महंगाई दर में बढ़ोतरी न हो। इस काम में आपूर्ति बेहतर करने के लिए सरकार की मदद की जरूरत पड़ती है क्योंकि केवल मौद्रिक नीति के जरिए ब्याज दरों और मौद्रिक तरलता जैसे कदमों से महंगाई रोकना संभव नहीं है।</p>
<p>इसलिए सरकार की कोशिश है कि खाद्य उत्पादों के दाम ना बढ़ें। इसके लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में कामचलाऊ बढ़ोतरी की जा रही है ताकि उसका असर खुदरा कीमतों पर कम से कम पड़ें। दूसरी तरफ, आपूर्ति बढ़ाने की नीति के तहत गेहूं, चीनी, चावल, प्याज और दूसरे खाद्य उत्पादों के निर्यात को हतोत्साहित करने या प्रतिबंध लगाने के फैसले लिए गये। गेहूं के लिए दशकों बाद स्टॉक लिमिट लागू की गई और पिछले दिनों इस स्टॉक लिमिट को कम किया गया। यही नहीं पेट्रोल में एथनॉल ब्लैंडिंग के अपने महत्वाकांक्षी कार्यक्रम (ईबीपी) को दांव पर लगाते हुए सरकार ने दिसंबर, 2023 में गन्ने के जूस से सीधे एथेनॉल बनाने पर प्रतिबंध लगा दिया, ताकि कम चीनी उत्पादन के कारण चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी पर अंकुश लगाया जा सके। हालांकि, चीनी उद्योग की लॉबिंग के बाद गन्ने के जूस से सीधे एथेनॉल उत्पादन के लिए 17 लाख टन की सीमा तय की गई। साथ ही सी-हैवी मोलेसेज से बनने वाले एथेनॉल के दाम बढ़ाये गये। मोलेसेज के निर्यात पर 50 फीसदी शुल्क लगाया और मक्का से बनने वाले एथेनॉल के दाम भी बढ़ाये गये। लेकिन ये सब कदम उद्योग के लिए अधिक थे किसान के लिए कम।</p>
<p>दालों की महंगाई दर 20 फीसदी से अधिक है। इसके आयात को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने 31 मार्च, 2025 तक शुल्क में छूट और मात्रात्मक प्रतिबंधों में ढील जैसे फैसले लिए गये। इसी तरह खाद्य तेलों की कीमतों को कम रखने के लिए खाद्य तेलों के रियायती दरों पर आयात की छूट 31 मार्च, 2025 तक बढ़ा दी गई। ये दो कदम साफ करते हैं कि सरकार को घरेलू उत्पादन से मांग पूरी होने की उम्मीद नहीं है, लेकिन किसानों को अधिक दाम ना मिले इसके लिए आयात को बढ़ावा देने की नीति भी वह उपभोक्ता हितों के नाम पर अपना रही है। यही नहीं 80 करोड़ लोगों को पांच किलो मुफ्त अनाज देने के साथ सब्सिडी पर केंद्रीय पूल से गेहूं की आपूर्ति कर सस्ता आटा भी बाजार में उतारा गया है।</p>
<p>अब सवाल उठता है कि जब किसान को अधिक दाम मिलने की संभावना को ही रोक दिया जाएगा तो पहले से ही आय कमी से जूझ रहे किसान की आर्थिक स्थिति कैसे बेहतर होगी। सरकार कुछ भी दावे करें लेकिन सात फीसदी की दर से बढ़ रही अर्थव्यस्था में ग्रामीण मांग का रिकवर नहीं होना इस बात का सुबूत है कि कृषि से होने वाली आय में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं हो पा रही है। इसके पीछे मौसम की मार तो एक वजह है कि लेकिन महंगाई पर काबू पाने के लिए अपनाई जा रही इन्फ्लेशन टार्गेटिंग की नीति भी एक बड़ी वजह है।</p>
<p>&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ महंगाई रोकने के उपायों से कृषि व ग्रामीण इकोनॉमी पर प्रतिकूल असर ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[गन्ना बकाया को इक्विटी में बदल किसानों को शेयर होल्डर बनाया जाए, इससे नई ब्रांड इक्विटी का होगा निर्माण]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/make-farmers-shareholders-in-corporate-india-convert-sugarcane-outstanding-into-equity.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 21 Jan 2024 07:30:00 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/make-farmers-shareholders-in-corporate-india-convert-sugarcane-outstanding-into-equity.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर अगर आप आर्थिक खबरों पर गौर करें तो पाएंगे कि शेयर बाजार की खबरें ही ज्यादा होती हैं। उनके बारे में विस्तृत रिपोर्ट छपती है, यह बताया जाता है कि भारत की ग्रोथ स्टोरी के साथ शेयर बाजार के निवेशक किस तरह अमीर हो रहे हैं। विभिन्न सेक्टर की कंपनियों की वैल्यूएशन में अच्छी वृद्धि देखने को मिली है, लेकिन ऐसी कंपनियों की भी कमी नहीं जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खासतौर से कृषि क्षेत्र जुड़ी हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">बलरामपुर चीनी, चंबल फर्टिलाइजर, एनएफएल, राष्ट्रीय केमिकल्स, पारादीप फॉस्फेट, डीसीएम श्रीराम, यूपीएल, दीपक नाइट्राइट, गुजरात स्टेट फर्टिलाइजर ऐसी ही कंपनियां हैं जिनका बिजनेस कृषि क्षेत्र से जुड़ा है। खुदरा निवेशकों ने इन कंपनियों की वैल्यूएशन में वृद्धि के साथ अच्छा फायदा उठाया होगा।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">खुदरा निवेशकों में शेयर बाजार की लोकप्रियता बढ़ने के बावजूद यह खासतौर से शहरों तक सीमित रहा है। यहां तक कि म्युचुअल फंड भी ग्रामीण बाजार में अपनी पैठ नहीं बना पाए हैं। फलस्वरूप किसान और देश की 60% से अधिक आबादी शेयर बाजार की ग्रोथ स्टोरी से पूरी तरह कटी हुई है। इसे हम निश्चित तौर पर समावेशी विकास तो नहीं कह सकते।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">ऐसे में क्या किया जा सकता है? चीनी और एथेनॉल के बिजनेस में जितनी भी सूचीबद्ध कंपनियां हैं उन सबको गन्ने की बकाया भुगतान राशि, जो हजारों करोड़ रुपए में है, को इक्विटी में बदलकर गन्ना किसानों को यह विकल्प देना चाहिए कि वे चाहें तो बकाया भुगतान के बदले इक्विटी शेयर लें। ग्रामीण इलाकों में भी निवेशकों की जागरूकता बढ़ी है। ऐसे में किसान कॉरपोरेट इंडिया के अच्छे सहयोगी बन सकते हैं। अभी तो अनेक जगहों पर दोनों एक दूसरे के खिलाफ खड़े नजर आते हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कर्ज को इक्विटी में बदलने का रास्ता आमतौर पर बैंक ही चुनते हैं। कंपनी कानून में बदलाव करके गन्ने की बकाया राशि को इक्विटी में बदलने के समाधान पर तत्काल विचार किया जाना चाहिए। इससे चीनी कंपनियों और गन्ना किसानों दोनों को फायदा होगा।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इसके अलावा टाटा कंज्यूमर, आईटीसी, एस्कॉर्ट्स, महिंद्रा, एचयूएल जैसी कंपनियों को किसानों को प्रेफरेंशियल एलॉटमेंट के तहत शेयर देने चाहिए। दालों, मसाले और कॉफी के बिजनेस में बड़े पैमाने पर मौजूद टाटा कंज्यूमर राइट्स इश्यू जारी करती है। तो क्यों ना यह राइट्स दाल और कॉफी किसानों को दी जाए। इसके लिए जरूरी हो तो सरकार को खुशी-खुशी नियमों में बदलाव करना चाहिए। 60% आबादी को शेयरधारक बनाना कॉरपोरेट इंडिया के नई ब्रांड इक्विटी निर्माण में बड़ा कदम होगा। सरकार को इस दिशा में फैसिलिटेटर की भूमिका निभानी चाहिए।</span></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/01/image_750x500_65ac0abb5fb8c.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ गन्ना बकाया को इक्विटी में बदल किसानों को शेयर होल्डर बनाया जाए, इससे नई ब्रांड इक्विटी का होगा निर्माण ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[पंजाब को धान से बचाने के लिए फसल विविधिकरण पर इंसेंटिव और बिजली सब्सिडी को तर्कसंगत बनाने की जरूरत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/saving-punjab-from-paddy.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 01 Jan 2024 00:03:18 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/saving-punjab-from-paddy.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">पंजाब को अब संभावनाओं की धरती की तरह नहीं देखा जाता। यहां के युवाओं में मायूसी साफ झलकती है। बीते कुछ वर्षों के दौरान, खासकर अच्छे आशय लेकिन गलत तरीके से लाए गए कृषि कानून के खिलाफ आंदोलन के बाद, ग्रामीण पंजाब थोड़ा बदला हुआ महसूस होता है, जबकि दूसरों को लगता है कि इस प्रदेश को कुछ ज्यादा ही तवज्जो दी जा रही है। कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन करने वालों को एक तरह से बहिष्कृत करने के मकसद से सोशल मीडिया के माध्यम से जो हमले हुए, उससे यह वैचारिक भेद और बढ़ा है। इससे एक दूसरे से जुड़े मुद्दे - पंजाब की इकोलॉजिकल सस्टेनेबिलिटी और भारत की खाद्य सुरक्षा - का स्थायी समाधान दूर की कौड़ी लगने लगी है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">पंजाब के लिए सबसे प्रमुख समस्या धान की खेती है। इससे जल स्तर गिरता जा रहा है और जैव विविधता को नुकसान हो रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम में बदलाव, बढ़ता तापमान और घटते ग्लेशियर अस्तित्व के लिए खतरा बनते जा रहे हैं। धान के खेत में लगने वाले मानव कार्य दिवस अन्य फसलों की तुलना में आधे से कम होते हैं। यह बात दीवार पर लिखी इबारत की तरह स्पष्ट है कि संपन्नता के लिए पंजाब को आर्थिक विविधीकरण की जरूरत है। विशेषज्ञ लगातार कहते आ रहे हैं कि अन्य फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) देना किसानों के लिए इन्सेंटिव की तरह होगा ताकि वे धान की खेती छोड़कर अन्य फसल अपनाएं। लेकिन सामान्य तर्क यह है कि धान पर रिटर्न अन्य फसलों से ज्यादा है, और धान की फसल को मौसम से होने वाला नुकसान भी कम होता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">पंजाब भारत के खाद्य भंडार में लगभग 30% का योगदान करता है, जबकि देश की सिर्फ 1.52 प्रतिशत जमीन यहां है। लेकिन इस प्रक्रिया में भूजल का स्तर काफी नीचे चला गया है। एक दशक के भीतर 153 ब्लॉक में से 80 ब्लॉक ऐसे हैं जो कृषि उत्पादन के लिए भूजल निकालने के लिहाज से अव्यवहार्य होते जा रहे हैं। दूसरी बात यह है कि पंजाब एक दशक तक सीमा पार से फैलाए गए आतंकवाद के कारण अब भी सहमा हुआ है। राज्य अभी तक आर्थिक और भावनात्मक रूप से उससे उबर नहीं पाया है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो आजादी के पहले से सशस्त्र बलों में इस प्रदेश का बड़ा योगदान रहा है। पंजाब को लगता है कि इसके बलिदानों और कठिन परिश्रम का पर्याप्त पुरस्कार उसे नहीं मिल रहा है। दिल्ली में सर्दियों की शुरुआत में प्रदूषण बढ़ने के कारण पंजाब के किसानों और शहरी मध्य वर्ग के बीच दोषारोपण भी बढ़ने लगा है। दुर्भाग्यवश यह शहरी मध्य वर्ग नया नैतिक बहुमत बन गया है। पंजाब के किसानों को लगता है कि फसलों के अवशेष नहीं जलाने के लिए उन्हें कंपेन्सेशन दिया जाना चाहिए, जबकि दूसरे लोग &lsquo;प्रदूषण फैलाने वाला ही भुगतान करे&rsquo; के सिद्धांत की बात करते हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">पंजाब के किसानों को हर साल लगभग 9000 करोड़ रुपए की मुफ्त बिजली मिलती है, जिसका भुगतान राज्य सरकार की तरफ से किया जाता है। केंद्र सरकार की एजेंसियां हर साल प्रदेश के किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर 60000 करोड़ रुपए से अधिक का गेहूं और धान खरीदती हैं। यह औसत उत्पादन लागत से लगभग 50 से प्रतिशत अधिक बैठता है। यह एमएस स्वामीनाथन के सी2 प्लस 50% फॉर्मूला नाम से लोकप्रिय है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इसके अतिरिक्त किसान जो भी गेहूं और धान बेचने के लिए मंडियों में लाते हैं, सरकार उन्हें पूरा खरीदती है और तत्काल उसका भुगतान भी किया जाता है। सी2 प्लस 50 फॉर्मूला वाली कीमत तथा असीमित खरीद की सुविधा अन्य फसलों के लिए अथवा अन्य राज्यों (हरियाणा को छोड़कर) के किसानों को नहीं मिलती है। इसी का नतीजा है कि पंजाब के किसान परिवार की औसत मासिक आय पूरे भारत के औसत का ढाई गुना है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">पंजाब को लेकर केंद्र की दो चिंताएं थीं। एक तो पंजाब के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों की बेचैनी सीमा पार से प्रायोजित आतंकवाद के फलने-फूलने की अच्छी जमीन बन गई थी। दूसरा, भारत को खाद्य सुरक्षा के लिए पंजाब के अनाज की जरूरत थी। लेकिन आज स्थिति यह है कि राज्य आर्थिक रूप से दिवालिया होने के करीब है। राजनीतिक इच्छा शक्ति, दूरदर्शिता और क्षमता का अभाव है। राजनीतिक नेतृत्व कठिन फैसले लेने से बचता है। दुख की बात यह है कि ऐसे बदलाव, जिनमें राज्य को आंशिक खर्च ही करना है, उन पर भी चर्चा नहीं होती है। पंजाब में धान की खेती ऐसा नशा है जिसे केंद्र सरकार दशकों से देती आ रही है और राज्य अब इसका आदी हो चुका है। यहां के किसानों को इससे दूर करना अब मुश्किल हो गया है। ऐसी विषम परिस्थितियों में बदलाव के लिए केंद्र सरकार को विविधीकरण का खर्च वहन करना पड़ेगा। मेरा प्रस्ताव है कि राज्य 8 साल के एक पैकेज की मांग करे, जो सतत बदलाव के लिए हो तथा राजनीतिक रूप से भी व्यवहार्य हो।</span></p>
<p><strong>इस पैकेज में ये बातें होनी चाहिएः</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">क) बिना मीटर के बिजली की सप्लाई बंद की जाए, ख) मुफ्त बिजली उन्हीं परिवारों को मिले जिनके पास 7.5 एकड़ या उससे कम जमीन है, ग) मुफ्त बिजली प्रति परिवार एक ट्यूबवेल कनेक्शन तक सीमित हो, घ) सस्ती बिजली सिर्फ उन्हें दी जाए जो ड्रिप सिंचाई या अन्य उन्नत तकनीक का इस्तेमाल करते हैं, ङ) बाजार समितियों (मंडी) के चुनाव कराए जाएं, च) राज्य के संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल हो, छ) विज्ञापनों पर पाबंदी लगे, जिन पर मेरे अनुमान के मुताबिक सरकार रोजाना दो करोड़ रुपए खर्च कर रही है, ज) इन कदमों से जो बचत होगी उसका इस्तेमाल i) फल एवं सब्जी मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर तथा मंडी बनाने में किया जाए ii) कृषि अनुसंधान एवं एक्सटेंशन सर्विसेज पर खर्च दोगुना किया जाए iii) शिक्षा, स्वास्थ्य और इस तरह के अन्य क्षेत्रों में निवेश के जरिए मानव क्षमता सुधारी जाए।</span></p>
<p><strong>कुछ काम केंद्र सरकार के लिए भी हैंः&nbsp;</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">क) न्यूनतम समर्थन मूल्य पर धान की खरीद प्रति परिवार पांच एकड़ जमीन तक सीमित की जाए, ख) धान के वैकल्पिक फसलों की खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य पर हो, इसके लिए पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी और आईसीएआर ब्लॉक स्तर पर उत्पादन की योजना बनाएं, ग) धान की जगह दूसरी फसल लगाने के लिए 100% प्रीमियम भुगतान किया जाए, घ) धान की जगह अन्य फसलों की खेती के इच्छुक ऐसे परिवार जो पीएम किसान के पात्र हैं, उन्हें पांच एकड़ तक प्रति एकड़ 12000 रुपए दिए जाएं ङ) कृषि क्षेत्र में रोजगार के लिए निजी क्षेत्र को इन्सेंटिव दिया जाए ताकि वे इसमें निवेश करें, च) नदियों में पानी की उपलब्धता का नए सिरे से आकलन हो और उसके बाद विभिन्न राज्यों के बीच जल बंटवारे के मुद्दे पर निर्णय लिया जाए।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">मैं जानता हूं कि ये सिफारिशें सभी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए काफी नहीं हैं, ना ही यह सबकी उम्मीद पर खरी उतरेंगी। लेकिन दीर्घकाल में ये ज्यादातर लोगों के हित में होंगी और इसके सकारात्मक नतीजे भी आएंगे। विचारों का अपना एक जीवन काल होता है। यह पैकेज टुकड़ों में लागू करने से बात नहीं बनेगी।</span></p>
<p><em><strong>(अजय वीर जाखड़, भारत कृषक समाज के चेयरमैन हैं)</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ पंजाब को धान से बचाने के लिए फसल विविधिकरण पर इंसेंटिव और बिजली सब्सिडी को तर्कसंगत बनाने की जरूरत ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[महंगाई पर लगाम लगाने के लिए सरकार और आरबीआई का आपूर्ति प्रबंधन पर जोर]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/govt-and-rbi-on-the-same-page-for-supply-side-management-to-rein-in-inflation.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 19 Dec 2023 16:13:48 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/govt-and-rbi-on-the-same-page-for-supply-side-management-to-rein-in-inflation.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>लोकसभा चुनाव से पहले व्यापारियों के लिए गेहूं के स्टॉक लिमिट को घटाकर आधा करना, &nbsp;मार्च 2024 तक प्याज के निर्यात पर प्रतिबंध लगाना, गन्ने के जूस से एथेनॉल बनाने पर अंकुश लगाना और डी-ऑयल राइस ब्रान के निर्यात पर रोक लगाना महंगाई को नियंत्रित करने के लिए सरकार के आपूर्ति पक्ष प्रबंधन उपायों में से एक है। भारतीय रिजर्व बैंक भी ''खाद्य कीमतों में अनिश्चितताओं'' का हवाला देते हुए ऊंची ब्याज दर को कम करने को तैयार नहीं है।</p>
<p>हालांकि, खुदरा महंगाई अपने शिखर से काफी नीचे आ गई है और नवंबर 2023 में यह 5.56 फीसदी रही है। फिर भी, यह आरबीआई के चार फीसदी के लक्ष्य से ऊपर है। सरकार और आरबीआई दोनों को परेशान करने वाली बात खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि है। नवंबर में उपभोक्ता खाद्य मूल्य सूचकांक 8.70 फीसदी रही है।</p>
<p>महाराष्ट्र में प्याज उत्पादक निर्यात प्रतिबंध के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। वहीं गेहूं और चावल पर निर्यात प्रतिबंध के खिलाफ सुगबुगाहट है। आपूर्ति प्रबंधन के लिए सरकार के पास इन हस्तक्षेपों के अलावा और कोई विकल्प बचा नहीं है। ये उपाय केवल निर्यात पाबंदियों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि इनमें दालों का उदार आयात भी शामिल है। आपूर्ति बढ़ाने के लिए इस साल अप्रैल से अक्टूबर के बीच करीब 20 लाख टन दालों का आयात किया गया है। इसके बावजूद दालों की खुदरा महंगाई 20.23 फीसदी पर बनी हुई है। इसी तरह, निर्यात प्रतिबंधों के बावजूद नवंबर 2023 में अनाजों की महंगाई दर 10.27 फीसदी दर्ज की गई है। मगर वसा और खाद्य तेलों की कीमतों में नरमी आई है। समग्र रूप से देखें तो खुदरा महंगाई बढ़कर आरबीआई के अनुकूल स्तर से ऊपर पहुंच गई है।</p>
<p>अच्छी बात यह है कि सरकार और आरबीआई दोनों यह अच्छी तरह से जानते हैं कि मुद्रास्फीति का दबाव मानसून के असमान प्रसार के कारण खरीफ उत्पादन में गिरावट की वजह से है। आरबीआई ने 8 दिसंबर को अपनी मौद्रिक नीति में स्पष्ट तौर पर कहा, ''खाद्य कीमतों में अनिश्चितताओं के साथ-साथ प्रतिकूल आधार प्रभावों से नवंबर-दिसंबर में मुद्रास्फीति में बढ़ोतरी होने की संभावना है। अल नीनो की स्थिति के साथ-साथ खरीफ फसल की आवक और रबी की बुवाई में प्रगति पर नजर रखने की जरूरत है। अनाज के लिए पर्याप्त बफर स्टॉक और अंतरराष्ट्रीय खाद्य कीमतों में नरमी के साथ-साथ सरकार द्वारा &nbsp;आपूर्ति पक्ष में सक्रिय हस्तक्षेप से खाद्य कीमतों के दबाव को नियंत्रण में रखा जा सकता है।''</p>
<p>आरबीआई की मौद्रिक नीति के बयान में अनाज के पर्याप्त बफर स्टॉक के माध्यम से सरकार द्वारा आपूर्ति पक्ष के उपायों पर जोर दिया गया था। खैर, घरेलू और अंतरराष्ट्रीय उत्पादन परिदृश्य को देखते हुए यह एक चुनौती बनी रहेगी। रूरल वॉयस ने खाद्यान्न उत्पादन में कमी को उजागर करने वाली कई रिपोर्टें प्रकाशित की हैं। इन रिपोर्टों के अनुसार, खरीफ चावल का उत्पादन लगभग चार फीसदी घटकर 10.6 करोड़ टन रहने का अनुमान लगाया गया है। इसी तरह, रबी फसलों, मुख्य रूप से गेहूं की बुवाई में देरी के कारण उत्पादन अनुमान बहुत अच्छे नहीं हैं।</p>
<p>संक्षेप में कहें तो कच्चे तेल की कम कीमतों के बावजूद महंगाई जल्दी कम होने वाली नहीं है। यह सरकार के लिए लगातार चुनौतियां पैदा कर रही है। हालांकि, ऐसा देखा गया है कि ध्रुवीकृत राजनीति में मुद्रास्फीति कोई चुनावी मुद्दा नहीं है, लेकिन चुनिंदा क्षेत्रों में इसका प्रभाव पड़ता है। इसलिए, सरकार द्वारा निर्यात प्रतिबंधों को लेकर और अधिक उपाय किए जाने की उम्मीद है, जबकि आरबीआई कम से कम चालू वित्त वर्ष में ब्याज दरों में कोई कटौती करने नहीं जा रहा है।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/12/image_750x500_658173c5b9715.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ महंगाई पर लगाम लगाने के लिए सरकार और आरबीआई का आपूर्ति प्रबंधन पर जोर ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/12/image_750x500_658173c5b9715.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कृषि शिक्षा को 21वीं सदी के युवाओं के लिए तैयार करना]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/tailoring-agricultural-education-for-twenty-first-century-youths.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 17 Dec 2023 06:46:59 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/tailoring-agricultural-education-for-twenty-first-century-youths.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत 1.41 अरब लोगों के साथ चीन (1.45 अरब) के बाद दुनिया का दूसरा सबसे अधिक आबादी वाला देश है। संयुक्त राष्ट्र के विश्व जनसंख्या संभावनाओं के 2022 के संस्करण के अनुसार, 2050 तक इसके जल्द ही चीन से आगे निकलने और 1.668 अरब के अनुमानित आंकड़े तक पहुंचने का अनुमान है। इसके अलावा, केंद्रीय सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने 'भारत में युवा 2022' पर अपनी हाल ही में जारी रिपोर्ट में अनुमान लगाया है कि 2021 में 15-29 वर्ष की आयु वर्ग के युवाओं की आबादी 27.2 प्रतिशत थी जिसके 2036 तक घटकर 22.7 हो जाने की उम्मीद है। बहरहाल, आज भारत में 10-24 वर्ष के आयु की 35.6 &nbsp;करोड़ की सबसे बड़ी वैश्विक युवा आबादी है, जिसमें ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लगभग 20 करोड़ युवाओं का बड़ा अनुपात है। इसके अलावा, भारत के युवाओं के बीच साक्षरता की समग्र दर में वृद्धि हुई है, जिसमें लगभग 90 प्रतिशत पढ़ने या लिखने में सक्षम हैं।</p>
<p>सोशल मीडिया की व्यापकता और इंटरनेट की पहुंच के साथ बड़े पैमाने पर डिजिटल रूप से समझदार युवा आबादी है जो ऑनलाइन संसाधनों तक पहुंच रखते हैं जिससे सीखने और कौशल को बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन मिलता है। इस प्रकार, देश को 'जनसांख्यिकीय लाभांश' का लाभ मिलता है। जब युवाओं का यह विशाल संसाधन कार्यबल में प्रवेश करता है, तो इससे जनसंख्या की आयु संरचना में बदलाव के परिणामस्वरूप अधिक आर्थिक विकास हो सकता है, मुख्य रूप से तब जब कामकाजी आयु की आबादी आश्रितों की संख्या से बड़ी होती है। ये युवा नवाचार, उद्यमशीलता और विविधता की संस्कृति को बढ़ा रहे हैं। इन्हें कृषि क्षेत्र में शामिल करने की अधिक आवश्यकता है, जो देश की जीडीपी में लगभग 20 प्रतिशत का योगदान देता है।</p>
<p>कोविड-19 संकट ने स्पष्ट रूप से बताया है कि आर्थिक गतिविधियों के सबसे गंभीर लॉकडाउन के तहत भी कृषि को बिना किसी रुकावट के उत्पादन जारी रखने की आवश्यकता है। महामारी के दौरान कई देश आर्थिक मंदी की चपेट में आ गए और महामारी के कारण लगे झटकों से उबरने के लिए उन अर्थव्यवस्थाओं को पुनर्जीवित करने के प्रयास चल रहे हैं। सामान्य रूप से शिक्षा और कृषि शिक्षा इस प्रक्रिया के लिए सबसे महत्वपूर्ण होगी। केवल उच्च गुणवत्ता, समावेशी और न्यायसंगत प्रशिक्षण के साथ ही देश महामारी के झटके से उबरने में सफल होंगे, जिसने लाखों बच्चों, युवाओं और वयस्कों, विशेष रूप से निम्न आय समूहों को प्रभावित किया है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में कृषि एक केंद्रीय गतिविधि है जो राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में महत्वपूर्ण योगदान देती है। आने वाले वर्षों में कृषि क्षेत्र डिजिटलीकरण और अन्य तकनीकी प्रगति का लाभ उठाते हुए एक और गुणात्मक छलांग लगाएगा।<br /><strong></strong></p>
<p><strong>कृषि क्षेत्र से जुड़ने में युवा अनिच्छुक क्यों हैं?</strong></p>
<p>पिछले कुछ वर्षों में घटती जोत (छोटी जोत) के कारण कृषक समुदाय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है, जिसमें कुल कृषक परिवारों का 80 प्रतिशत से अधिक शामिल है। तेजी से बढ़ते वैश्वीकरण, ईंधन और खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतें, अस्थिर बाजारों और बढ़ती जलवायु अस्थिरता से प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन के कारण कृषि से जुड़े कई जोखिम चुनौतियों को बढ़ा देते हैं। अनुमान है कि वर्तमान में लगभग पांच प्रतिशत युवा ही कृषि से जुड़े हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे कृषि को रचनात्मक, लाभदायक और सम्मानजनक पेशा नहीं मानते हैं। युवा एक बड़े संसाधन हैं जिसका उपयोग कृषि विकास के लिए किया जाना चाहिए। इसलिए कृषि में युवाओं को बनाए रखने की चुनौतियों (बॉक्स-1) को प्रभावी ढंग से संबोधित किया जाना चाहिए। विकासशील देशों में एक बड़ी दुविधा कृषि की खराब सामाजिक छवि है जिसके कारण ग्रामीण युवा विकल्प और बेहतर अवसरों की तलाश में शहरी क्षेत्र की ओर पलायन कर रहे हैं। सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के अग्रणी संगठनों के साथ-साथ बहुराष्ट्रीय कंपनियों (उदाहरण के लिए आईटी क्षेत्र) के सफल व्यवसाय मॉडल के माध्यम से यह स्पष्ट है कि युवा अधिक नवीन और उत्पादक होने के साथ-साथ नई प्रौद्योगिकियों के प्रति ग्रहणशील भी हैं। इसके विपरीत, कृषि क्षेत्र में ऊर्जा (युवा) और अनुभव (बूढ़े लोगों) के बीच एक बड़ा अंतर है, जो खेती की पिछड़ी प्रकृति और नवाचारों और नई प्रौद्योगिकियों को धीमी गति से अपनाने का कारण है। खराब प्रौद्योगिकी प्रसार के कारण विज्ञान का समाज से नाता टूट गया है जिससे खेती गैर-लाभकारी होने के साथ-साथ गैर लचीली भी हो गई है। जब तक बौद्धिक रूप से संतोषजनक प्रौद्योगिकियां नहीं होंगी, युवाओं का कृषि की ओर आकर्षित होने की संभावना नहीं है।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>कृषि में युवाओं को बनाए रखने की चुनौतियां</strong><br /><br /></p>
<table border="1" style="border-collapse: collapse; width: 100%;">
<tbody>
<tr>
<td style="width: 100%;">
<p>- ज्ञान, सूचना और शिक्षा तक अपर्याप्त पहुंच</p>
<p>- भूमि तक सीमित पहुंच</p>
<p>- वित्तीय सेवाओं तक अपर्याप्त पहुंच</p>
<p>- नौकरी को लेकर औपचारिक और अनौपचारिक प्रशिक्षण का अभाव</p>
<p>- बाजारों तक सीमित पहुंच</p>
<p>- निर्णय लेने और नीतिगत संवादों में सीमित भागीदारी</p>
<p></p>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<p>वास्तव में, ग्रामीण युवाओं (पुरुष और महिला दोनों) को सूचना संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी), उच्च मूल्य वाली कृषि, प्रसंस्करण, मूल्य-संवर्धन, पैकेजिंग, आपूर्ति-श्रृंखला प्रबंधन, भंडारण आदि जैसे संभावित क्षेत्रों में व्यावसायिक प्रशिक्षण की आवश्यकता है। यह उन्हें विशिष्ट कृषि, उच्च तकनीक बागवानी, संरक्षित खेती, आईपीएम/जैव नियंत्रण, डेयरी, मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन, सामुदायिक नर्सरी, बीज उत्पादन, किसानों को बाजारों से जोड़ना आदि जैसे प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में ज्ञान और कौशल के साथ सशक्त बनाएगा। अच्छी तरह से प्रशिक्षित और सक्षम युवा निश्चित रूप से उच्च स्तर के आत्मविश्वास के साथ कृषि को अपनाएंगे। उपरोक्त परिदृश्य में युवा कृषि को एक लाभकारी और सम्मानजनक पेशा नहीं मानते हैं। साथ ही इसे भोजन, पोषण और आजीविका सुरक्षा को पूरा करने के लिए एक स्थायी मार्ग नहीं माना जाता है। इससे यह अच्छी तरह से समझ में आता है कि आज के युवाओं (पुरुष और महिला दोनों) की मानसिकता और दृष्टिकोण अलग हैं। वे बौद्धिक रूप से संतोषजनक, व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य और सामाजिक रूप से सशक्त गतिविधियों को अपनाना पसंद करते हैं।</p>
<p>दुर्भाग्य से भारत जैसे विकासशील देश में 'आकांक्षा-प्राप्ति का अंतर' मौजूद है। इसलिए उनकी आकांक्षाओं की प्राथमिकता पर ध्यान दिया जाना चाहिए। इसलिए युवाओं को देश के समग्र कृषि और ग्रामीण विकास में उनकी भूमिका के प्रति उन्नत कौशल और सकारात्मक दृष्टिकोण के माध्यम से नवाचार, क्षमता विकास, साझेदारी और भागीदारी दृष्टिकोण में प्रगति के माध्यम से प्रेरित किया जाना चाहिए। इसके लिए मानसिकता में आमूल-चूल बदलाव की आवश्यकता होगी, आजीविका के साधन के रूप में पारंपरिक कृषि से व्यवसाय-उन्मुख और ग्रामीण क्षेत्रों में कुशल युवाओं को विशेष कृषि की ओर शामिल करने वाली मानसिकता अपनानी होगी। नए नवाचारों और उद्यमशीलता के माध्यम से वर्तमान कृषि व्यवसाय परिदृश्य को आकर्षक और लाभकारी बनाना होगा। गुणवत्तापूर्ण / कुशल युवाओं को खेती में तभी आकर्षित किया जा सकता है और बनाए रखा जा सकता है जब यह बेहतर ग्रामीण बुनियादी ढांचे और बेहतर शैक्षिक और संबंधित सुविधाओं से जुड़ा हो। इससे भविष्य में संभावित परिवर्तन के लिए व्यापक रणनीतियां ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में समान अवसरों और सुविधाओं के साथ सभी कृषि-आधारित और कृषि-संबंधित गतिविधियों में अधिक फायदेमंद नौकरियों की मांग होगी, कृषि और ग्रामीण क्षेत्र के बुनियादी ढांचे में सार्वजनिक-निजी क्षेत्र के निवेश के लिए बेहतर विकल्प और कृषि-खाद्य और मूल्य-श्रृंखला प्रणालियों को बढ़ावा देने के लिए छोटी कृषि-फर्मों और उत्पादक कंपनियों को बढ़ावा मिलेगा। महिलाओं सहित ग्रामीण युवाओं को सशक्त बनाने के लिए विस्तार प्रणाली को एक नवाचार विस्तार मंच में बदलने की तत्काल आवश्यकता है जो प्रौद्योगिकी-उन्मुख ज्ञान, इनपुट और मूल्य वर्धित सेवाएं प्रदान करता है। विस्तार दृष्टिकोण को व्यक्तिगत कृषि घरेलू दृष्टिकोण की बजाय कृषक समुदायों पर ध्यान केंद्रित करना होगा, जैसा कि अतीत में हुआ था। ये सभी किसी भी राष्ट्र के भविष्य के विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं और इसलिए सभी संबंधित पक्षों द्वारा नीति और संस्थागत समर्थन के माध्यम से एक सक्षम वातावरण की आवश्यकता होगी।</p>
<p><strong>भारत में कृषि शिक्षा की प्रमुख चिंताएँ</strong></p>
<p>भारत की राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान और शिक्षा और विस्तार प्रणाली (एनएआरईईएस) भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के तत्वाधान में 4 डीम्ड-विश्वविद्यालयों, 3 केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालयों, 63 राज्य कृषि विश्वविद्यालयों (एसएयू), 93 आईसीएआर संस्थान और 731 कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) के साथ सबसे बड़ी कृषि शिक्षा प्रणालियों में से एक है। पिछले कुछ वर्षों में आईसीएआर ने कृषि के क्षेत्र में अनुसंधान और तकनीकी उत्पादन दोनों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। बॉक्स 2 में दर्शाई गई कृषि शिक्षा की चिंताओं के अलावा, वर्तमान प्रणाली में दो अन्य प्रणालीगत कमजोरियां हैं: (1) शैक्षिक पाठ्यक्रम विकास कार्यक्रमों से अभिन्न रूप से जुड़े नहीं हैं और (2) कृषि-स्नातकों और कृषक समुदाय के बीच एक अलगाव है जो पूर्व और बाद वालों को आवश्यक सेवाएं प्रदान नहीं कर रहा है। इसके अलावा, पिछले कुछ वर्षों में राज्य कृषि विश्विद्यालयों द्वारा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और 'स्थान-विशिष्ट क्षेत्रीय अनुसंधान' पर अधिक जोर देने के कारण ज्ञान सृजन हमेशा पीछे रहा है। इसके अलावा, छात्र अपने करियर की शुरुआत से ही कार्यकारी पदों की आकांक्षा रखते हैं जिससे कृषि क्षेत्र के निचले स्तरों पर कुशल संचालन की कमी पैदा हो जाती है।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>भारत में कृषि शिक्षा की प्रमुख चिंताएँ</strong></p>
<table border="1" style="border-collapse: collapse; width: 100%;">
<tbody>
<tr>
<td style="width: 100%;">- इंजीनियरिंग, चिकित्सा, कानून, अकाउंटेंसी आदि की तुलना में स्नातक पाठ्यक्रमों में कृषि शिक्षा में प्रवेश अधिकांश छात्रों की पहली प्राथमिकता नहीं है।<br />- कृषि शिक्षा का सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) बहुत कम है, देश में कुल पात्र जनसंख्या में से कृषि शिक्षा के लिए जीईआर केवल 0.03% है, जबकि उच्च शिक्षा के लिए यह 26% है।<br />- कृषि शिक्षा राज्य का विषय है जिसके कारण फंडिंग, संकाय भर्ती और वेतन, बुनियादी ढांचे और संकाय/छात्र विकास कार्यक्रमों के मामले में विविधताएं आई हैं। केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय भी अपर्याप्त है।<br />- कृषि विश्वविद्यालयों/महाविद्यालयों में अपर्याप्त निवेश और घटते वित्तीय संसाधन।<br />- कृषि में छात्रों का ठहराव कम है (केवल 30% स्नातक ही इस क्षेत्र में बने रहते हैं)।<br />- संसाधनों और मानदंडों के अनुरूप बिना नए संस्थान खोलना, विशेष रूप से निजी क्षेत्र द्वारा जो कृषि में डिग्री दे रहे हैं, जिनमें से कुछ में गुणवत्ता नियंत्रण की कमी है और वे बहुत अधिक ट्यूशन फीस और अन्य फीस वसूलते हैं।<br />- कृषि शिक्षा, रोजगार और उद्योगों की आवश्यकताओं के बीच संबंध विच्छेद।<br />- पर्याप्त कौशल, उद्यमिता और अनुभवात्मक शिक्षा का अभाव, कृषि स्नातकों की कुल मिलाकर खराब रोजगार क्षमता।<br />- अपर्याप्त शैक्षणिक कठोरता और उभरती चुनौतियों का संदर्भीकरण और अवसर।<br /><strong>अवसर</strong><br />- कृषि पाठ्यक्रमों से बुनियादी विज्ञान का क्षरण।<br />- शिक्षा, अनुसंधान और विस्तार के बीच बढ़ते अलगाव के परिणामस्वरूप ज्ञान की कमी हो रही है।<br />- मूल्यांकन, निगरानी, प्रभाव मूल्यांकन, जवाबदेही और प्रोत्साहन प्रणालियों की खराब प्रणाली।<br />- सीमित डिजिटलीकरण और अकुशल शासन।</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<p><strong>कृषि-शिक्षा प्रणाली को बदलना</strong></p>
<p>आकांक्षाओं और जीवनशैली में बदलाव को ध्यान में रखते हुए युवाओं को कृषि और संबद्ध क्षेत्रों के लिए प्रेरित और आकर्षित करने के लिए कृषि-शिक्षा पारिस्थितिकी तंत्र में बदलाव लाने की आवश्यकता है। युवाओं को कृषि में तभी बनाए रखा जा सकता है जब आवश्यक ज्ञान और शिक्षा, तकनीकी कौशल, निरंतर प्रोत्साहन और सक्षम नीति का वातावरण प्रदान किया जाए। इसके अलावा, युवा प्रतिभाओं को आधुनिक खेती करने के लिए आकर्षित करने की आवश्यक नीतियां, प्रोत्साहन और पुरस्कार देने की आवश्यकता है जो न केवल लाभदायक और टिकाऊ हो बल्कि सम्मानजनक भी हो। यह युवाओं को अपने सुखी जीवन के लिए कृषि को एक पेशे के रूप में अपनाने के लिए प्रेरित करने के साथ-साथ आकर्षित भी करेगा। कृषि में युवाओं के नेतृत्व वाले समावेशी विकास को सुनिश्चित करने के लिए ऐसा दृष्टिकोण स्थानीय, राज्य और देश स्तर पर एक रणनीतिक प्राथमिकता होनी चाहिए। इस प्रकार, नई रणनीति वर्तमान कृषि को फसल आधारित से 'हल-टू-प्लेट' दृष्टिकोण पर जोर देते हुए कृषि प्रणाली पर आधारित करने की होनी चाहिए, जो अधिक प्रासंगिक, कुशल, मांग-संचालित, उत्पादक, प्रतिस्पर्धी और लाभदायक है। इसे सभी के लिए भोजन, पोषण और पर्यावरण सुरक्षा भी सुनिश्चित करनी होगी।</p>
<p>आईसीएआर ने हाल के दिनों में सभी संबंधित हितधारकों के सहयोग से भारतीय कृषि शिक्षा में कुछ महत्वपूर्ण सुधार किए हैं। उच्च कृषि शिक्षा में गुणवत्ता आश्वासन को मान्यता प्रणाली, उच्च शिक्षा के लिए न्यूनतम मानकों के निर्धारण, शैक्षणिक नियमों, कार्मिक नीतियों, पाठ्यक्रम &nbsp;और वितरण प्रणालियों की समीक्षा, बुनियादी ढांचे और सुविधाओं को मजबूत करने के लिए समर्थन, संकाय क्षमता और अखिल भारतीय परीक्षा के माध्यम से छात्रों के प्रवेश में सुधार &nbsp;किया गया है। आईसीएआर की पांचवीं डीन समिति की रिपोर्ट ने प्रासंगिक व्यावहारिक कौशल, उद्यमशीलता योग्यता, स्व-रोजगार, नेतृत्व गुणों और स्नातकों के बीच आत्मविश्वास और कृषि में युवाओं को आकर्षित करने और बनाए रखने के लिए पाठ्यक्रम का पुनर्गठन किया। इसने नए कॉलेजों की स्थापना के लिए मानदंड भी सुझाए। क्षेत्रीय विशिष्टताओं का उपयोग करने और क्षेत्र विशिष्ट आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए तटीय कृषि, पहाड़ी कृषि, जनजातीय कृषि आदि जैसे कुछ वैकल्पिक पाठ्यक्रम तैयार किए गए थे। जीनोमिक्स (जैव प्रौद्योगिकी), नैनो टेक्नोलॉजी, जीआईएस, सटीक खेती, संरक्षित खेती, माध्यमिक खेती, हाई-टेक खेती, विशेष कृषि, नवीकरणीय ऊर्जा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बड़े डेटा एनालिटिक्स, मेक्ट्रोनिक्स, कृषि में प्लास्टिक जैसे उभरते क्षेत्रों में नए डिग्री कार्यक्रमों और पाठ्यक्रमों की सिफारिश की गई।</p>
<p>साथ ही, शुष्क भूमि में बागवानी, कृषि-मौसम विज्ञान और जलवायु परिवर्तन, अपशिष्ट निपटान और प्रदूषण उपशमन, खाद्य संयंत्र नियम और लाइसेंसिंग, खाद्य गुणवत्ता, सुरक्षा मानक और प्रमाणन, खाद्य भंडारण इंजीनियरिंग, खाद्य संयंत्र स्वच्छता और पर्यावरण नियंत्रण, उभरती खाद्य प्रसंस्करण प्रौद्योगिकियां, रेशम उत्पादन, सामुदायिक विज्ञान और खाद्य पोषण और आहार विज्ञान जैसे क्षेत्रों के लिए भी पाठ्यक्रमों की सिफारिश की गई। 2015 में शुरू किए गए स्टूडेंट रेडी कार्यक्रम के अनुपालन में समिति ने सभी यूजी विषयों में एक साल का कार्यक्रम डिजाइन किया है जिसमें (1) जहां भी संभव हो, अंतर्राष्ट्रीय अनुभवात्मक शिक्षण सहित अनुभवात्मक शिक्षण, (2) ग्रामीण कृषि कार्य अनुभव, (3) इन-प्लांट ट्रेनिंग/इंडस्ट्रियल अटैचमैंट (4) व्यावहारिक प्रशिक्षण (एचओटी)/कौशल विकास प्रशिक्षण, (5) छात्र परियोजनाएँ और (6) एग्रीकल्चरल साइंस परस्यूट फॉर इंस्पायर्ड रिसर्च एक्सीलेंस (एस्पायर) कार्यक्रम शामिल हैं। &nbsp;विश्व बैंक समर्थित मौजूदा राष्ट्रीय कृषि उच्च शिक्षा परियोजना (एनएएचईपी), जो पूर्ववर्ती विश्व बैंक परियोजनाओं, विशेष रूप से एनएटीपी और एनएआईपी पर बनाई गई है, फैकल्टी और छात्रों की क्षमताओं को मजबूत कर रही है, वैश्विक ज्ञान अर्थव्यवस्था के साथ राष्ट्रीय प्रणाली के लिकेंज के संबंधों को बढ़ावा दे रही है, अंतरराष्ट्रीय अनुभवात्मक सीखने, शिक्षण-केंद्रित शिक्षा को बढ़ावा देने और निजी उद्योगों के साथ कृषि को मजबूत करने की सुविधा प्रदान कर रही है। उपरोक्त पहलों के बावजूद तकनीकी और नीतिगत पहलुओं पर अधिक ध्यान देकर कृषि में युवाओं को प्रेरित करने और आकर्षित करने के लिए कृषि शिक्षा पारिस्थितिकी तंत्र में अभी भी और सुधार की अच्छी गुंजाइश है।</p>
<p><strong>तकनीकी पहलू</strong></p>
<p>- जैसा कि एनईपी 2020 में कहा गया है, कृषि शिक्षा को ऐसे मानकों को बनाए रखना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि भारत के कृषि स्नातक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों से निपटने के लिए पेशेवर रूप से सुसज्जित हैं।<br />- एनएआरईईएस को पाठ्यक्रम और कौशल विकास में आवश्यक समायोजन करने के लिए तेजी से परिवर्तनशील, ज्ञान-गहन कृषि की जनशक्ति आवश्यकताओं का आकलन करना चाहिए, अनुभवात्मक शिक्षा और राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों के संपर्क पर जोर देना चाहिए।<br />- आईसीटी, डिजिटलीकरण, बायो टेक्नोलॉजी, नैनो टेक्नोलॉजी, एग्रो प्रोसेसिंग, सटीक कृषि और सिस्टम सिमुलेशन के विषयों में अधिक तकनीकी हस्तक्षेप की संभावना है, इसलिए संबंधित कार्यबल की मांग और शिक्षाशास्त्र में बदलाव को उसी के मुताबिक शामिल किया जाना चाहिए।<br />- स्थानीय विस्तार को सूक्ष्म स्तर पर चुनौतियों के प्रति संवेदनशील बनाने, फीडबैक तंत्र को मजबूत करने और सही प्राथमिकताएं निर्धारित करने के लिए व्यवसाय/विपणन/आय पर ध्यान केंद्रित करने वाले बहुलवादी दृष्टिकोण और सार्वजनिक-निजी भागीदारी की आवश्यकता है।<br />- उद्यमिता और एग्री-स्टार्टअप को बढ़ावा देना, बाजार के नेतृत्व वाली विस्तार नीतियों को प्रोत्साहित करना और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के उपयोग को शैक्षिक कार्यक्रमों में विधिवत शामिल किया जाना चाहिए।</p>
<p><strong>नीतिगत पहलू</strong></p>
<p>- मंत्रालय एक नियामकीय प्राधिकरण के रूप में 'भारतीय कृषि शिक्षा परिषद (एईसीआई)' की स्थापना पर विचार कर सकता है, जिसे भारतीय पशु चिकित्सा परिषद (वीसीआई) के समान काम करना चाहिए।<br />- चूंकि उच्च शिक्षा समवर्ती सूची में है इसलिए प्रस्तावित सुधारों में एकरूपता लाने के लिए कृषि शिक्षा को समवर्ती सूची में लाया जाना चाहिए।<br />- निर्णय लेने के लिए आवश्यक स्वायत्तता के साथ आईआईटी और आईआईएम की तर्ज पर विश्व स्तरीय संस्थान स्थापित किए जाने चाहिए।<br />- कृषि स्नातकों में रोजगार योग्य कौशल विकसित करने पर फोकस किया जाना चाहिए जिनकी आज के प्रतिस्पर्धी व्यावसायिक परिदृश्य में नियोक्ताओं द्वारा अपेक्षा की जाती है, कृषि प्रौद्योगिकियों में अनौपचारिक शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण पर निवेश करें।<br /><br />शैक्षिक सुधारों में अब युवाओं को 'नौकरी मांगने वाले' &nbsp;की बजाय 'नौकरी निर्माता' बनने के लिए सशक्त बनाने को कौशल उन्मुख व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रदान करने के लिए डिप्लोमा और सर्टिफिकेट कोर्स को गैर-औपचारिक डिग्री कार्यक्रमों में शामिल करना चाहिए। इससे राज्य कृषि विश्वविद्यालयों को अपने प्रशिक्षण कार्यक्रमों को अधिक प्रासंगिक और दूरदर्शी उन्मुख बनाने की आवश्यकता होगी।</p>
<p><strong>निष्कर्ष</strong></p>
<p>कृषि शिक्षा क्षेत्र में अन्य विषयों की तरह युवाओं के साथ एक प्रशिक्षित मानव पूंजी की आवश्यकता होती है जो (1) सामाजिक चेतना रखते हैं और ग्रामीण समुदायों से जुड़े और प्रतिबद्ध हों, (2) मजबूत उद्यमशीलता कौशल और भावना रखते हैं और नई नौकरी के अवसर शुरू करने में सक्षम हैं, (3) सकारात्मक मूल्यों और उच्च नैतिक मानकों द्वारा निर्देशित होते हैं, (4) टिकाऊ कृषि उत्पादन की दिशा में एक नई दृष्टि के लिए प्रतिबद्ध हैं, (5) वैज्ञानिक और तकनीकी सिद्धांतों में एक ठोस आधार है जो विश्वास निर्माण के लिए महत्वपूर्ण व्यावहारिक अनुभव का आधार है, (6) सामान्य तैयारी करें जो उन्हें अपने करियर में आने वाली समस्याओं का समग्र समाधान विकसित करने में सक्षम बनाएगी, (7) रचनात्मक होने और वास्तविक समस्याओं का समाधान करने के आत्मविश्वास वाले नवप्रवर्तक हैं, (8) मजबूत नेतृत्व, पारस्परिक और टीम निर्माण के अधिकारी हैं, कौशल और मजबूत संचार कौशल प्रदर्शित करें जिसमें अंतरराष्ट्रीय व्यापार भाषाओं और सूचना प्रौद्योगिकी का प्रभावी उपयोग शामिल है, (9) रोजगार और धन पैदा करने के लिए 'व्यावसायिक कौशल' रखें और विशेष रूप से ग्रामीण समुदायों के साथ काम करने में सक्षम हों। 'नौकरी मांगने वालों से नौकरी देने वालों' में बदलने के लिए युवाओं पर केंद्रित हमारे दृष्टिकोण और नीति में एक आदर्श बदलाव की आवश्यकता है। अनौपचारिक और व्यावसायिक प्रशिक्षण के माध्यम से युवाओं का क्षमता विकास और माध्यमिक और विशिष्ट कृषि सहित कृषि में नए अवसरों के बारे में जागरूकता पैदा करने से युवाओं को कृषि में आकर्षित किया जा सकेगा, ग्रामीण और शहरी के बीच अंतर को पाटने में मदद मिलेगी और तेजी से राष्ट्रीय आर्थिक विकास में योगदान देने के लिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा।<br />अंत में, सक्षम वातावरण, संस्थागत समर्थन और आवश्यक सहयोग के माध्यम से युवाओं को प्रेरित करने से वे न केवल कृषि की ओर आकर्षित होंगे बल्कि प्रधानमंत्री द्वारा लक्षित पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था में से कम से कम एक ट्रिलियन डॉलर का योगदान देने के लिए कृषि क्षेत्र का त्वरित विकास सुनिश्चित होगा।<br /><strong><em></em></strong></p>
<p><strong><em>(लेखक ट्रस्ट फॉर एडवांसमेंट ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज- TAAS के चेयरमैन, कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग- DARE के पूर्व सचिव एवं भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के पूर्व महानिदेशक हैं।)</em></strong><br /><br /></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ कृषि शिक्षा को 21वीं सदी के युवाओं के लिए तैयार करना ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[विधानसभा चुनाव 2023ः चुनावी शोर में असली मुद्दे छूमंतर]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/real-issues-disappear-in-election-noise.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 20 Nov 2023 16:04:27 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/real-issues-disappear-in-election-noise.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>आजादी के<span> 75</span>वें अमृत महोत्सव में देश के पांच अहम राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। पश्चिम में राजस्थान तो पूर्व में मिजोरम, मध्य भारत में छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और दक्षिण में तेलंगाना शामिल है। ये चुनाव देश की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था को नई दिशा देंगे।</p>
<p>बड़े-बड़े वादों की गारंटी, फ्री की रेवड़ियों, ईडी की छापेमारी और दलों के भीतर व दलों के बीच मचे घमासान के शोर में असली मुद्दों की ओर किसी का ध्यान नहीं है, न तो नेताओं का, न पार्टियों का और न ही सरकारों का। हर दल को सत्ता पर काबिज होने की आपाधापी है। इन सबके बीच असल मतदाता यानी जनता से सीधे जुड़े मुद्दे पीछे छूटते जा रहे हैं। गांव<span>-</span>गांव, मोहल्ले<span>-</span>मोहल्ले जाकर सभाएं करने वाले राजनेताओं को असली मुद्दों का अंदाजा ही नहीं हैं कि उनके मतदाताओं की असल समस्याएं क्या हैं<span>? </span></p>
<p>युवाओं, किसानों और महिलाओं को सरकार से किस प्रकार की सहायता चाहिए, विकास पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के बदलते स्वरूप<span>, </span>समाज में उत्पन्न होती नई रूढ़िवादी परंपराएं, घटती आय, आय में बढ़ती असमानता<span>, </span>बेरोजगारी के इस आलम में नशे का बढ़ता चलन, कोरोना महामारी से उत्पन्न बीमारियों से उजड़ते<span>-</span>बिगड़ते आशियाने और शिक्षा की नई व्यवस्था के चलते कर्ज में डूबे परिवार जैसे अहम मुद्दे चुनावी वादों से नदारद हैं।</p>
<p>चुनाव के इस माहौल में जब राजनीतिक दल हर बार की तरह अपने एजेंडा और चुनाव प्रचार में खूब सारे लुभावने वादे कर रहे हैं, तीन विशेष मुद्दे जो ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में आम जनजीवन को बुरी तरह से प्रभावित कर रहे हैं। पहला, ग्रीमीण क्षेत्रों में नशे का बढ़ता चलन जो हर गांव में तकरीबन<span> 60-70</span> फीसदी परिवारों को बर्बाद कर रहा है। अफीम और डोडा पोस्त के नशे में चूर ग्रामीण नौजवान और बुजुर्ग इस बुरी आदत के कारण कर्ज में डूब रहा है। अफीम के नशे से पीढ़ियां बर्बाद हो रही हैं। ये नशा शहरी क्षेत्रों की बजाय ग्रामीण क्षेत्रों में कैंसर का स्वरूप ले चुका है। मादक फसल उत्पादन, भंडारण और वितरण के कड़े कानून होने के बावजूद अफीम व डोडा पोस्त ग्रामीण क्षेत्रों में कैसे पहुंच रहा है, इसकी रोकथाम क्यों नहीं की जा रही है। हर ग्रामीण समारोह, चाहे शादी हो या मृत्यु भोज या आम सभा, अफीम और डोडा पोस्त के बगैर अधूरी मानी जाती हैं। गिने चुने संपन्न परिवार, गांवों में अपना प्रभाव बनाने और राजनीतिक हित साधने के लिए अफीम जैसे महंगे नशे परोस कर आम जन को नशे की लत में झोंक रहा है। डोडा पोस्त का नशा एक ऐसी बीमारी है जिसका कोई इलाज नहीं है। क्या जनप्रतिनिधियों को नशे के इस कैंसर की रोकथाम करने और नशा मुक्ति करवाने को अपना चुनावी मुद्दा नहीं बनाना चाहिए।</p>
<p>दूसरा, शिक्षा का व्यावसायीकरण और स्कूल की उच्च शिक्षा में<span> &ldquo;</span>डमी क्लासेज<span>&rdquo; </span>का बढ़ता प्रचलन।<span> &ldquo;</span>डमी क्लासेज<span>&rdquo;, </span>जिसे<span> &ldquo;</span>कोचिंग ट्यूशन सेंटर<span>&rdquo;</span>के रूप में भी जाना जाता है, का नियमित सरकारी स्कूल और सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालयों के साथ ऐसा अवैध गठजोड़ है जहां छात्र<span>-</span>छात्राओं को अपने विद्यालय में नियमित कक्षाओं में भाग लेने की आवश्यकता नहीं होती है और छात्र अपनी अंतिम बोर्ड परीक्षा के लिए वर्ष में एक बार ही नियमित स्कूल में उपस्थित होते हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे जेईई मेन<span>, </span>जेईई एडवांस्ड और नीट में सफलता का झुनझुना दिखा कर बच्चों को<span> 1</span>1वीं और<span> 12</span>वीं में नियमित स्कूल से वंचित कर दिया जाता है। वास्तविकता यह है कि यहां सफलता सिर्फ 100 में से 2-3 बच्चों को ही मिलती हैं।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/11/image_750x_655b496f379a8.jpg" alt="" /></p>
<p><span>&ldquo;</span>डमी क्लासेज<span>&rdquo; </span>के चलते परिवारों पर दोहरी आर्थिक मार तो पड़ती ही है, नियमित स्कूल नहीं जाने से छात्र समन्वित शिक्षा, सहकर्मी समूह, मित्र मंडली, पारस्परिक कौशल, पाठ्येतर गतिविधियों और खेल<span>-</span>कूद गतिविधियों से वंचित हो जाते हैं। इससे उनके व्यक्तित्व का समग्र विकास नहीं हो पाता। इससे बच्चों में चिड़चिड़ापन, मानसिक रोग और आत्मघाती प्रवृत्ति बढ़ जाती है। राजस्थान पुलिस के आंकड़ों के अनुसार, कोटा में<span> 2022 </span>में<span> 15</span>,<span> 2019 </span>में<span> 18</span>,<span> 2018 </span>में<span> 20</span>,<span> 2017 </span>में 7,<span> 2016 </span>में<span> 17 </span>और<span> 2015 </span>में<span> 18 </span>छात्रों ने आत्महत्या की है।<span> 2020 </span>और<span> 2021 </span>में<span>&nbsp; </span>कोविड<span>-19 </span>महामारी के कारण कोचिंग संस्थानों के बंद होने के चलते कोटा में एक भी आत्महत्या दर्ज नहीं हुई। यह इस बात का साक्षात प्रमाण है कि<span> &ldquo;</span>डमी क्लासेज<span>&rdquo; </span>ही छात्रों में आत्महत्या की प्रवृत्ति का मुख्य कारण है।</p>
<p>&ldquo;डमी क्लासेज<span>&rdquo; </span>का अवैध धंधा क्यों और किसकी शह पर फैल रहा है, सीबीएसई इस पर सख्त कदम क्यों नहीं उठा रही<span>? </span>सरकारी विद्यालियों के प्राचार्य और शिक्षक छात्रों को नियमित स्कूल में वंचित रहने की अनुमति क्यों देते हैं और गैर <span>&nbsp;</span>कानूनी तरीके से स्कूल छात्रों की नियमित कक्षा में पूर्ण उपस्थिति सीबीएसई को जमा करते हैं जो कि छात्रों के लिए बोर्ड परीक्षा में बैठने के लिए अनिवार्य है। क्यों नहीं सीबीएसई<span> 11</span>वीं और<span> 12</span>वीं कक्षा के पाठ्यक्रम और प्रतियोगी परीक्षा के पाठ्यक्रम की विसंगतियों को दूर करे ताकि<span> "</span>डमी क्लासेज<span>" </span>की आवश्यकता ही खत्म हो जाए। कुछ ट्यूशन सेंटर के व्यापार के चलते छात्रों के भविष्य के साथ ऐसा खिलवाड़ खुले आम हो रहा है। सितंबर<span> 2023 </span>में दिल्ली हाई कोर्ट ने एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए कहा कि दिल्ली में स्कूल<span> &ldquo;</span>डमी क्लासेज<span>&rdquo; </span>कक्षा<span> 1</span>1वीं और<span> 12</span>वीं के छात्रों को उपस्थिति की आवश्यकता के बिना परीक्षा में बैठने की अनुमति दे रहे हैं जो<span> '</span>सीबीएसई उपनियम<span>' 75</span> फीसदी अनिवार्य उपस्थिति का उल्लंघन है। इस प्रकार, खुले आम पनपती अवैध शिक्षा प्रणाली आज हमारे राजनेताओं का चुनावी मुद्दा क्यों नहीं है।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/11/image_750x_655b49e059cd1.jpg" alt="" /></p>
<p><span>&nbsp;</span>तीसरा और आखिरी मुद्दा कोरोना महामारी से उत्पन्न बीमारियों से उजड़ते<span>-</span>बिगड़ते आशियाने को लेकर है। आज हर परिवार<span>, </span>चाहे वह ग्रामीण हो या शहरी<span>, </span>स्वास्थ्य से जुड़ी नई बीमारियों और उनसे होने वाले नुकसान से त्रस्त है। युवा पीढ़ी में ब्रेन हेमरेज और हार्ट अटैक जैसी जानलेवा बीमारियां आम हो गई हैं। हर रोज इन बीमारियों से मरने वाले युवाओं के हृदय विदारक समाचार अच्छे खासे परिवारों को नष्ट कर रहे हैं। ये बीमारियां अचानक क्यों फैल रही हैं<span>, </span>इन जानलेवा बीमारियों से कौन अतिसंवेदनशील है और कौन प्रतिरक्षित, इसकी कोई जानकारी नहीं है। आलम यह है कि इन जानलेवा बीमारियों के लक्षण, एहतियाती उपाय और रोगनिरोधी कदम क्या हैं, के बारे में हमारे चिकित्सा अनुसंधान भी आश्चर्यचकित हैं। हाल ही में गुजरात में<span> '</span>गरबा<span>' </span>आयोजनों के दौरान हृदय संबंधी समस्याओं के कारण कई मौतें हुई हैं। पिछले माह केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने कहा था कि आईसीएमआर ने एक विस्तृत अध्ययन किया है जो बताता है कि जो लोग कोरोना संक्रमण से पीड़ित हुए हैं<span>, </span>उन्हें अधिक परिश्रम नहीं करना चाहिए। उन्हें एक या दो साल के लिए कड़ी कसरत<span>, </span>दौड़ने और भारी व्यायाम से दूर रहना चाहिए<span>, </span>ताकि दिल के दौरे से बच सकें। जीने और मरने का ये मुद्दा भी पांचों राज्यों के चुनाव प्रचार और पार्टियों के घोषणा-पत्र में कहीं भी देखने को नहीं मिल रहा है।</p>
<p><strong><em>(लेखक </em></strong><strong><em>दक्षिण </em></strong><strong><em>एशिया </em></strong><strong><em>जैव </em></strong><strong><em>प्रौद्योगिकी </em></strong><strong><em>केंद्र</em></strong><strong><em>, </em></strong><strong><em>जोधपुर के संस्थापक निदेशक हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)</em></strong></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/11/image_750x500_655b35d0042e7.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ विधानसभा चुनाव 2023ः चुनावी शोर में असली मुद्दे छूमंतर ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/11/image_750x500_655b35d0042e7.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[खाद्य तेलों के रिकॉर्ड आयात पर बढ़ती निर्भरता और धुंधला होता आत्मनिर्भरता का सपना व जमीनी हकीकत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/increasing-dependence-on-import-of-edible-oils-and-blurring-of-the-dream-of-self-reliance.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 20 Nov 2023 08:27:46 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/increasing-dependence-on-import-of-edible-oils-and-blurring-of-the-dream-of-self-reliance.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>चालू रबी सीजन (2023-24) में फसलों की बुवाई का जो आंकड़ा 17 नवंबर को कृषि मंत्रालय ने जारी किया है उसके मुताबिक सबसे बड़े खाद्य तेल सरसों का क्षेत्रफल पिछले साल से कम चल रहा है। यह स्थिति इस बात को साबित करने के लिए काफी है कि खाद्य तेलों के आयात पर हमारी निर्भरता घटने की बजाय बढ़ सकती है।&nbsp; इसी बीच पिछले सप्ताह ही खाद्य तेलों के आयात के जो आंकड़े आये हैं उनके मुताबिक पिछले खाद्य तेल वर्ष (नवंबर, 2022 से अक्तबूर, 2023) के दौरान देश में खाद्य तेलों का आयात 165 लाख टन रहा जो इसके पहले साल के मुकाबले 25 लाख टन अधिक है। सरकार की खाद्य तेलों के लिए आत्मनिर्भरता की कोशिशों के बावजूद पिछले दस साल में खाद्य तेल आयात में डेढ गुना बढ़ोतरी हुई है। पिछले साल कुल घरेलू उपलब्धता में घरेलू उत्पादन की हिस्सेदारी 38.6 फीसदी रही है जबकि आयात की हिस्सेदारी 61 फीसदी से भी अधिक रही है।&nbsp; चीन के बाद भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा खाद्य तेल आयातक देश है। देश में खाद्य तेलों की खपत और उत्पादन के अंतर को देखते हुए आयात में लगातार बढ़ोतरी के संकेत हैं। पिछले साल के आयात के यह आंकड़े साल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन (एसईए) ने जारी किया हैं। ऐसे में वैश्विक बाजार में होने वाली कोई भी कीमत बढ़ोतरी मुश्किलें पैदा कर सकती है और 2021 में रूस-यूक्रेन युद्ध व उससे कुछ पहले इंडोनेशिया में पॉम ऑयल के उत्पादन में गिरावट के चलते कीमतों में भारी तेजी से असर हम घरेलू बाजार की कीमतों में देख चुके हैं।&nbsp;</p>
<p>जहां तक आयात के मूल्य की बात तो पिछले तेल वर्ष (2022-23) में 16.7 अरब डॉलर रहा जो इसके पहले 19.6 अरब डॉलर रहा था। रुपये में आयात 2022-23 में 1,38.424 करोड़ रुपये और 2021-22 में 1,56,800 करोड़ रुपये रहा था। मूल्य के हिसाब से आयात में कमी की वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य तेलों के दाम का 2021 के उच्चतम स्तर के मुकाबले घटकर आधे से भी कम रह जाना रहा है। लेकिन वैश्विक बाजार में खाद्य तेलों की अनिश्चितता कभी भी खड़ी हो सकती है। जहां 2021 में रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद खाद्य तेलों की कीमतों में भारी तेजी आयी थी वहीं लगभग उसी दौर में इंडोनेशिया में सूखे के चलते पॉम ऑयल के उत्पादन में गिरावट से कीमतों में भारी बढ़ोतरी हुई थी। &nbsp;संयुक्त राष्ट्र के कृषि एवं खाद्य संगठन (एफएओ) का खाद्य तेल सूचकांक मार्च, 2022 में 251.8 अंकों पर था। जो अक्तूबर, 2023 में कम होकर 120 अंकों पर आ गया है। इसकी वजह से भारत में आयातित पॉम ऑयल की कीमत मार्च, 2022 के 1828 डॉलर प्रति टन से कम होकर 910 डॉलर प्रति टन रह जाना है। वहीं इसी दौरान सुरजमुखी तेल की आयात कीमत 225 डॉलर प्रति टन से कम होकर 1005 डॉलर प्रति रह गई। जिसके चलते खाद्य तेलों की महंगाई दर फरवरी से लगातार ऋणात्मक बनी हुई है।</p>
<p>भारत के कुल आयात में करीब आधा हिस्सा पॉम ऑयल का है। वहीं बाकी मात्रा में सुरजमुखी तेल, सोयाबीन तेल और कैनोला तेल शामिल है। &nbsp;खाद्य तेल आयात में लगातार हो रही बढ़ोतरी को इससे समझा जा सकता है कि पिछले दस साल में 2013-14 के 116 लाख टन से बढ़कर 2022-23 में यह 165 लाख टन पर पहुंच गया है। वहीं उसके पहले दस साल में 2004-05 से 2013-14 के बीच यह 50 लाख टन से बढ़कर 116 लाख टन पर पहुंचा था। &nbsp;</p>
<p>वहीं अगर हम खाद्य तेलों की घरेलू उपलब्धता को देखें तो इसमें बढ़ोतरी की बजाय कमी आ रही है। देश की कुल खाद्य तेल उपलब्धता 268 लाख टन है और इसमें 165 लाख टन आयात के आधार पर घरेलू उत्पादन की आपूर्ति केवल 103.3 लाख टन है जो कुल उपलब्धता का 38.6 फीसदी है। यानी आयात पर हमारी निर्भरता 61 फीसदी से भी अधिक है। वहीं अगर अगर 2004-05 की बात करें तो उस समय घरेलू उत्पादन 70 लाख टन था और आयात 50 लाख टन था। यानी घरेलू उत्पादन और आयात की स्थिति उस समय मौजूदा समय के उलट थी क्योंकि घरेलू आपूर्ति कुल आपूर्ति की 60 फीसदी पर थी। खाद्य तेल उद्योग के मुताबिक घरेलू खपत करीब 250 लाख टन है और साल 2029-30 में यह 300 से 320 लाख टन पर पहुंच जाएगी। ऐसे में आयात पर निर्भरता में बढ़ोतरी होने की संभावना है।</p>
<p>देश में खाद्य तेल उत्पादन में सबसे बड़ी हिस्सेदारी सरसों की है और उसके बाद सोयाबीन की हिस्सेदारी है। साल 2022-23 में सरसों तेल का उत्पादन 39.80 लाख टन रहा। सोयाबीन तेल का उत्पादन 18.53 लाख टन रहा। जबकि कॉटनसीड तेल का उत्पादन 12.44 लाख टन और राइसब्रान ऑयल का उत्पादन 11 लाख टन रहा। मूंगफली 9.90 लाख टन और नारियल तेल का उत्पादन 3.90 लाख टन और पॉम ऑयल का उत्पादन 3.50 लाख टन रहा। इनके अलावा बाकी तेलों में सूरजमुखी, तिल और दूसरे स्रोतों से प्राप्त खाद्य तेल का उत्पादन 68 हजार टन से डेढ़ लाख टन के बीच रहा। साल 2022-23 में कुल खाद्य तेल उत्पादन 103.35 लाख टन रहा। वहीं 2013-14 में कुल घरेलू खाद्य तेल उत्पादन 78.02 लाख टन रहा था। यानी दस साल में इसमें करीब 25 लाख टन की ही बढ़ोतरी हो सकी है।</p>
<p>जहां तक आयात की बात&nbsp; है तो 2022-23 में आयातित 164.7 लाख टन खाद्य तेल में से 98 लाख टन पॉम ऑयल का आयात इंडोनेशिया, मलयेशिया और थाइलैंड से हुआ। वहीं 37 लाख टन सोयाबीन तेल का आयात अर्जेंटीना और ब्राजील से हुआ जबिक 30 लाख टन सूरजमुखी तेल का आयात रूस, यूक्रेन और अर्जेंटीना से हुआ।</p>
<p>आयात में बढ़ोतरी का सिलसिला जारी रहने की वजह घरेलू उत्पादन में बढ़ोतरी की नीतियों का नाकाम रहना रहा है। इसमें किसानों को मिलने वाले दाम से लेकर बेहतर उत्पादकता और तेल की मात्रा वाले बीजों पर शोध नहीं होना रहा है। वहीं सरकार की आयात नीति में आयात शुल्क दरों का झुकाव आयातकों और उपभोक्ताओं के पक्ष में रहा है। मसलन पिछले साल जब सरसों की फसल बाजार में आ रही थी तो उस समय भी सरकार ने सस्ती आयात शुल्क दरों पर खाद्य तेलों का आयात जारी रखा। इसकी वजह से पिछले 2022-23 रबी सीजन के लिए तय 5450 रुपये प्रति क्विटंल के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के मुकाबले अधिकांश किसानोंको 4000 रुपये से 4500 रुपये प्रति क्विटंल पर सरसों बेचनी पड़ी। जबकि इसके पहले साल सरसों की कीमतें 8000 रुपये प्रति क्विटंल तक चली गई थी। जिसके चलते किसानों ने 2022-23 के रबी सीजन मे सरसों के क्षेत्रफल में बढ़ोतरी की थी।</p>
<p>लेकिन इस साल सरसों का उत्पादन क्षेत्रफल प्रभावित हो सकता है। जो 17 नवंबर तक के आंकड़ों में पिछले साल से कम चल रहा है। दूसरे बड़े खाद्य तेल सोयाबीन का उत्पादन इस साल कम रहेगा। कृषि मंत्रालय के पहले अग्रिम अनुमानों के मुताबिक खरीफ 2023-24 में सोयाबीन का उत्पादन पिछले साल से करीब 40 लाख टन कम रहेगा। जहां तक कॉटनसीड ऑयल की बात तो इस साल कपास का उत्पादन पिछले साल से कम और इसमें कई साल से लगातार गिरावट आ रही है। जिसके चलते कॉटनसीड ऑयल का उत्पादन भी कम रहेगा। बाकी तेलों में भी किसी में कोई बड़ी बढ़ोतरी खरीफ सीजन में तो नहीं हो रही है। ऐसे में अगर चालू तेल वर्ष (2023-24) में आयात में बढ़ोतरी होती है और घरेलू हिस्सेदारी और अधिक गिरता है तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। सरकार ने ऑयल पॉम मिशन के तहत पूर्वोत्तर के राज्यों में पॉम प्लांटेशन का प्रोजेक्ट शुरू किया है लेकिन वहां के कई राज्य उसके विरोध में है। ऑयल पाम मिशन का मकसद पॉम ऑयल का घरेलू उत्पादन बढ़ाकर आयात&nbsp; निर्भरता को कम करना है। लेकिन पारंपरिक सरसों तेल की उपलब्धता बढ़ाने के लिए इसकी अधिक उत्पादकता वाली किस्मों पर शोध और मंजूरी को लेकर सरकार की सक्रियता बहुत अधिक नहीं दिखती है। ऐसे में खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता का सपना पूरा होने में अभी लंबा समय लगेगा। या फिर खाद्य तेलों के मामले में भी कच्चे तेल के आयात जैसी स्थिति बनी रह सकती है। ऐसे में जिस तरह दो साल पहले वैश्विक बाजार में खाद्य तेलों की कीमतों में भारी इजाफा हुआ था उसके चलते आयात पर हमारी निर्भरता घरेलू कीमतों के मोर्चे पर कभी भी मुश्किलें खड़ी कर सकती है।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/02/image_750x500_63ef81cd4ee94.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ खाद्य तेलों के रिकॉर्ड आयात पर बढ़ती निर्भरता और धुंधला होता आत्मनिर्भरता का सपना व जमीनी हकीकत ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[एमएसपी के गणित को नाकाम करता धान व गेहूं किसानों का वोट]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/vote-of-paddy-and-wheat-farmers-foils-the-mathematics-of-msp.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 17 Nov 2023 08:45:56 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/vote-of-paddy-and-wheat-farmers-foils-the-mathematics-of-msp.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की चुनाव जीतने की होड़ ने देश के किसानों को दो वर्गों में बांट दिया है। एक वह जो मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में हैं और दूसरे बाकी राज्यों में। चुनाव वाले राज्यों में दोनों दल किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से डेढ़ गुना तक के दाम पर धान और गेहूं खरीदने का वादा कर रहे हैं, जबकि दूसरे राज्यों में उनकी सरकारें किसानों को एमएसपी भी ठीक से सुनिश्चित नहीं कर पा रही है। वैसे भी देश में 23 फसलों के लिए एमएसपी निर्धारित होता है लेकिन सबसे अधिक खरीद गेहूं और चावल की ही होती है। दिलचस्प बात यह है कि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ गेहूं और धान की सरकारी खरीद में सबसे बड़े हिस्सेदारों में शुमार हैं। ऐसे में वहां भारी भरकम कीमत पर गेहूं और धान की खरीद किसानों के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है, वहीं दूसरी ओर क्या इन दलों की सरकार वाले अन्य राज्यों के किसान इस कीमत के हकदार नहीं हैं।</p>
<p>केंद्र सरकार ने खरीफ मार्केटिंग सीजन (2023-24) के लिए धान की सामान्य किस्म का एमएसपी 2183 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। वहीं आगामी रबी मार्केटिंग सीजन (2024-25) के लिए गेहूं का एमएसपी 2275 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। इन कीमतों के मुकाबले अपने चुनाव घोषणा-पत्र में कांग्रेस ने वादा किया है कि वह छत्तीसगढ़ में धान के लिए किसानों को 3200 रुपये प्रति क्विंटल की कीमत देगी और इस कीमत पर प्रति एकड़ 20 क्विंटल धान खरीदा जाएगा। इसके मुकाबले भाजपा ने अपने चुनाव घोषणा-पत्र में वादा किया है कि वह राज्य में कृषि उन्नति स्कीम के तहत 3100 रुपये प्रति क्विंटल की कीमत पर 21 क्विंटल धान प्रति एकड़ खऱीदेगी।</p>
<p>छत्तीसगढ़ देश में सरकारी खरीद में सबसे अधिक धान देने वाले चुनिंदा राज्यों में है। यहां खरीफ मार्केटिंग सीजन 2022-23 में 87.53 लाख टन धान की सरकारी खरीद हुई थी। खास बात यह है कि साल 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने धान की खरीद 2500 रुपये प्रति क्विंटल पर करने का वादा किया था। उसका कांग्रेस को भारी चुनावी फायदा हुआ और वह वहां भारी बहुमत से सत्ता पर काबिज हो गई। गौरतलब बात है कि 2017-18 सीजन में वहां 47.87 लाख टन धान की सरकारी खरीद हुई थी, जो 2022-23 में 40 लाख टन की बढ़ोतरी के साथ 87.53 लाख टन पर पहुंच गई। भूपेश बघेल के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ऊंचे दाम पर 15 क्विंटल प्रति एकड़ के हिसाब से धान की सरकारी खरीद करती रही है, जिसे अब 3200 रुपये प्रति क्विंटल पर 20 क्विंटल प्रति एकड़ के हिसाब से खरीदने का वादा किया गया है।</p>
<p>मध्य प्रदेश में भाजपा ने धान की सरकारी खरीद 3100 रुपये प्रति क्विंटल और गेहूं की खरीद 2700 रुपये प्रति क्विंटल पर खरीदने का वादा किया है। यहां कांग्रेस ने गेहूं 2600 रुपये प्रति क्विंटल और धान 2500 रुपये प्रति क्विंटल पर खऱीदने का वादा किया है। मध्य प्रदेश से पिछले रबी सीजन में 70.97 लाख टन गेहूं की सरकारी खरीद हुई, जबकि यहां धान की सरकारी खरीद पिछले साल 46.30 लाख टन रही थी। साल 2021-22 में मध्य प्रदेश में गेहूं की सरकारी खरीद 128 लाख टन रही थी।</p>
<p>अब बात राजस्थान की। यहां पर भाजपा ने अपने चुनाव घोषणा-पत्र में गेहूं की सरकारी खरीद 2700 रुपये प्रति क्विंटल पर करने का वादा किया है और बाजरा व ज्वार की खरीद एमएसपी पर करने का वादा किया है। खरीफ मार्केटिंग सीजन 2023-24 में ज्वार का एमएसपी 3225 रुपये प्रति क्विंटल और बाजरा का एमएसपी 2500 रुपये प्रति क्विंटल है। राजस्थान में पिछले साल 4.38 लाख टन गेहूं की सरकारी खरीद हुई थी लेकिन 2021-22 में यहां 23.40 लाख टन गेहूं की सरकारी खरीद हुई थी। एक अन्य चुनावी राज्य तेलंगाना में पिछले साल धान की सरकारी खरीद 131.86 लाख टन रही थी। यहां पर सिंचाई सुविधाओं के बढ़ने से धान के उत्पादन और सरकारी खरीद में भारी बढ़ोतरी हुई है। यह अब पंजाब के बाद देश में दूसरा सबसे अधिक धान की सरकारी खरीद वाला राज्य है। पंजाब में पिछले साल 182.11 लाख टन धान की सरकारी खरीद हुई थी।</p>
<p>अब अगर भाजपा शासित कुछ दूसरे राज्यों की बात करें तो उत्तर प्रदेश में पिछले सीजन में धान की सरकारी खरीद 65.5 लाख टन रही थी और गेहूं की सरकारी खरीद मात्र 2.20 लाख टन पर अटक गई थी, जबकि यह गेहूं का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है। वहीं हरियाणा में धान की सरकारी खरीद 59.36 लाख टन और गेहूं की 63.17 लाख टन रही थी। यहां 2021-22 में गेहूं की सरकारी खरीद 84.93 लाख टन रही थी। भाजपा शासित उत्तराखंड में पिछले साल धान की सरकारी खरीद 8.96 लाख टन रही थी। &nbsp;</p>
<p>अब इस पूरे मसले को दूसरे नजरिये से देखें। देश भर के किसान संगठन न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की गारंटी की मांग कर रहे हैं।&nbsp; एमएसपी को फसलों की सी-2 लागत पर 50 फीसदी मुनाफा जोड़कर तय करने की उनकी बड़ी मांग है। सरकार ने खरीफ और रबी की फसलों के लिए जो एमएसपी तय किये हैं उसके मुताबिक वह लागत से 50 फीसदी से 102 फीसदी तक ज्यादा हैं। ऐसे में 2275 रुपये के एमएसपी वाले गेहूं को 2600 और 2700 रुपये प्रति क्विंटल पर खरीदने का वादा कांग्रेस और भाजपा ने किया है। वहीं 2183 रुपये प्रति क्विटंल वाले धान को 3100 रुपये और 3200 रुपये प्रति क्विटंल की कीमत पर खरीदने का वादा किया गया है।</p>
<p>सत्ता में आने पर ये दल अगर इस वादे को पूरा करते हैं तो मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के किसानों को तो फायदा होगा लेकिन उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और उत्तराखंड समेत इन फसलों को पैदा करने वाले दूसरे राज्यों के किसानों का क्या दोष है जो उनको यह कीमत नहीं मिलेगी, जबकि उत्तर प्रदेश, हरियाणा और उत्तराखंड में तो भाजपा की ही सरकार है। यहां यह बात भी गौर करने लायक है कि साल 2014 में केंद्र में भाजपा सरकार आने से पहले मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकारें गेहूं और धान पर एमएसपी के अलावा बोनस देती थी जिसे केंद्र सरकार ने बंद करने का फरमान जारी करते हुए कहा था कि अगर इसे बंद नहीं किया जाता है तो वह धान व गेहूं की खरीद नहीं करेगी। मगर छत्तीसगढ़ में 2018 के कांग्रेस के वादे और उसके चुनावी नतीजे ने भाजपा की राय बदल दी है। छत्तीसगढ़ और तेलंगाना की सरकार को केंद्रीय पूल में धान की खरीद को लेकर राजनीतिक लड़ाई भी लड़नी पड़ी है।</p>
<p>मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में 17 नवंबर को मतदान पूर्ण हो रहा है और राजस्थान में 25 नवंबर व तेलंगाना में 30 नवंबर को मतदान है। अब यह तो 3 दिसंबर को ही पता लगेगा कि भाजपा व कांग्रेस में से किसानों ने किसके वादे पर भरोसा किया। जहां तक दूसरे राज्यों की बात है तो शायद वहां के किसान वोट के मामले में उतने प्रभावी नहीं हैं कि उनको एमएसपी से अधिक दाम देने की जरूरत इन दलों को लगे।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/11/image_750x500_655636572a120.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ एमएसपी के गणित को नाकाम करता धान व गेहूं किसानों का वोट ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[सरकार का विकेंद्रीकरणः केरलीयम 2023 में कहां है स्थानीय शासन]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/where-is-local-governance-in-the-keraleeyam-2023.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 16 Nov 2023 10:52:30 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/where-is-local-governance-in-the-keraleeyam-2023.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>केरल के तिरुवनंतपुरम में आयोजित केरलीयम 2023 में 'केरल में स्थानीय सरकारें' विषय पर चर्चा में हिस्सा लेते हुए पूर्व केंद्रीय पंचायती राज मंत्री मणि शंकर अय्यर ने कहा, "निस्संदेह केरल पंचायती राज में देश का नेतृत्व करता है।" 1-7 नवंबर तक आयोजित इस कार्यक्रम में राज्य के विकास और उपलब्धियों के साथ-साथ लोकतांत्रिक मूल्यों, सतत विकास, कल्याण और वैज्ञानिक स्वभाव पर आधारित आधुनिक अर्थव्यवस्था बनने की इसकी यात्रा को प्रदर्शित किया गया। इस चर्चा में जमीनी स्तर के नेताओं, शिक्षाविदों, नौकरशाहों और राजनेताओं से लेकर कई लोगों ने हिस्सा लिया। इसमें कोई संदेह नहीं है कि विकेंद्रीकरण में केरल देश का नेतृत्व करता है। यह इस तथ्य से स्पष्ट है कि पंचायतों को सत्ता और अधिकार हस्तांतरित करने में राज्यों के हस्तांतरण सूचकांक में यह शीर्ष (77%) पर है। केंद्रीय पंचायती राज मंत्रालय के लिए मुंबई स्थित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज द्वारा 2015 में किए गए स्वतंत्र मूल्यांकन में यह बात सामने आई है।</p>
<p>राज्यों के बीच शीर्ष स्थान हासिल करना एक या दो दिन में नहीं हुआ है। इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है जिसमें सार्वजनिक कार्रवाई और लोगों को उनके विकास के लिए संगठित करना शामिल है। हालांकि आजादी के समय समाज को प्रभावित करने वाले विभिन्न मुद्दों पर विरोध और आंदोलन के मामले में कुछ असमानता थी, लेकिन बेहतर शासन के लिए राजनीतिक लामबंदी जारी रही। केरल इस तरह लामबंदी की प्रतिक्रियाओं के लिए काफी अनुकूल था। अमर्त्य सेन ने केरल की विकास उपलब्धियों में इसे सार्वजनिक कार्रवाई के महत्वपूर्ण घटक के रूप में नामित किया है, जिसे अक्सर 'मॉडल' के रूप में माना जाता है। दूसरे शब्दों में कहें, तो केरल मॉडल बेहतर शासन के लिए सार्वजनिक कार्रवाई का मॉडल है।</p>
<p>लगभग तीन दशक पहले ग्रामीण क्षेत्रों के लिए हुए 73वें संविधान संशोधन और शहरी क्षेत्रों के लिए 74वें संविधान संशोधन ने लोगों को भागीदारीपूर्ण तरीके, योजना और विकास के बेहतर परिणामों के लिए खुद को संगठित करने का एक नया अवसर दिया।</p>
<p>इसके लिए जुलाई 1996 से शुरू हुई नौवीं पंचवर्षीय योजना में जन योजना अभियान इस उद्देश्य से शुरू किया गया था कि पंचायती राज/नगर निकाय वैज्ञानिक तरीके से एकीकृत योजनाओं की एक शेल्फ तैयार करें और उसे प्राथमिकता दें ताकि नौवीं योजना के कार्यक्रम प्राथमिकता के आधार पर उनमें से चुने जा सकें और कार्यात्मक रूप से प्रासंगिक और उद्देश्यपूर्ण लोगों की भागीदारी विकसित की जा सके। इसमें यह भी प्रस्तावित किया गया था कि योजना का कम से कम 35-40 फीसदी हिस्सा स्थानीय निकायों द्वारा उनसे संबंधित जिम्मेदारी वाले क्षेत्रों के लिए तैयार और कार्यान्वित की जाने वाली योजनाओं से युक्त होनी चाहिए।</p>
<p>इस अभियान का उद्देश्य पंचायतों को स्वशासित संस्था के रूप में मजबूत करने में कार्यात्मक, प्रशासनिक और वित्तीय बाधाओं को दूर करना है। 73वें संविधान संशोधन के अनुच्छेद 243 जी में इसकी परिकल्पना की गई है। यह जन योजना अभियान के दृष्टिकोण और कार्यप्रणाली की मान्यता है जिसे 2018 में देश भर के सभी पंचायतों के लिए अपनाया गया था। गरीबी पर नीति आयोग के 2021 के अध्ययन से पता चलता है कि भारत में बहुआयामी गरीबी के नवीनतम आंकड़े के आधार पर केरल की केवल 0.7 फीसदी आबादी गरीब है, जबकि गरीबी का राष्ट्रीय आंकड़ा 25.1 फीसदी है। गरीबी उन्मूलन, आजीविका सुरक्षा और आय आधारित रोजगार पर ध्यान केंद्रित करने वाले सामुदायिक संगठन के रूप में 1998 में शुरू हुए कुदुम्बश्री मिशन ने भी केरल के विकास&nbsp; में योगदान दिया। 2019-20 में कुदुम्बश्री समूहों के तीन लाख से अधिक समूहों में 45 लाख महिलाओं की समग्र भागीदारी थी।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/11/image_750x_6554363a4fc50.jpg" alt="" /></p>
<p>राज्य की विकास शासन प्रणाली को मौलिक रूप से पुनर्गठित करने वाले इन महत्वपूर्ण निर्णयों को शुरू हुए 25 साल से अधिक का समय बीत चुका है। इसे देखते हुए केरल सरकार ने विकेंद्रीकरण की अनूठी विशेषताओं को प्रतिबिंबित करने और आगे बढ़ने के लिए केरलीयम 2023 के एक भाग के रूप में चर्चा का आयोजन किया।</p>
<p>इस सेमिनार में केरल के स्थानीय स्वशासन और उत्पाद शुल्क मंत्री एमबी राजेश ने विकेंद्रीकरण, खासकर पीपीसी हस्तांतरण कार्यों, फाइनेंस और स्थानीय सरकारों के पदाधिकारियों के जरिये राज्य के लोगों को हुए लाभ गिनाते हुए प्रतिभागियों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि विकेंद्रीकृत सरकारी प्रणाली की क्षमता को 2018 के बाढ़ और कोविड महामारी के दौरान व्यावहारिक अभिव्यक्ति मिली।</p>
<p>कुदुम्बश्री आंदोलन के साथ विकेंद्रीकरण से न केवल लोगों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार आया, बल्कि आर्थिक और सामाजिक विकास की संभावनाओं का भी विस्तार हुआ। नवा केरलम की कल्पना करते हुए उन्होंने विश्वास जताया कि स्थानीय सरकारें विकसित देशों की तरह विकास और रोजगार को बढ़ावा देकर आर्थिक विकास की अग्रणी बनेंगी, जैसा कि मानव विकास के मामले में हुआ है। स्थानीय स्वशासन विभाग की अतिरिक्त मुख्य सचिव सारदा मुरलीधरन ने कहा कि पिछले 25 साल नवाचार और प्रयोग के समय रहे हैं जिसमें नियमों के ढांचे को संस्थागत रूप दिया गया है। स्थानीय सरकार के भविष्य की तलाश में उन्होंने स्थानीय स्तर पर अधिक संसाधन पैदा करने, डिजाइन और सिस्टम को प्रशासन में शामिल करने, डिजिटल शासन को मजबूत बनाने,&nbsp; शहरीकरण की गतिशीलता को समझने, प्रवासी लोगों को समायोजित करने और टिकाऊ व लचीली विकास की आवश्यकता को बनाए रखा। उपरोक्त जरूरतों को पूरा करने के लिए उन्होंने स्थानीय लोकतंत्रों में स्वायत्तता के सुधार पर जोर दिया ताकि वे जनता के प्रति उत्तरदायी शासन और समावेशी कल्याण प्रदान करने में सक्षम हो सकें।</p>
<p>केरल के पूर्व वित्त मंत्री टीएम थॉमस इसाक ने कहा कि राजनीतिक इच्छाशक्ति की वजह से पीपीसी और योजना कार्यान्वित हो सकी जिसे एक तकनीकी अभ्यास माना जाता है। यह सामाजिक गतिशीलता और सशक्तिकरण की प्रक्रिया के रूप में उभरी है। विकेंद्रीकरण के दूसरे संस्करण के रूप में उन्होंने प्रतिनिधि लोकतंत्र से आगे जाने की आवश्यकता पर जोर दिया। केंद्रीय पंचायती राज मंत्रालय के पूर्व सचिव एसएम विजयानंद ने वास्तविक स्थानीय सरकार के उद्भव के माध्यम से मौजूदा दृष्टिकोण को कल्याणकारी राज्य से दयालु राज्य में स्थानांतरित करने का आह्वान किया। राष्ट्रीय ग्रामीण विकास और पंचायती राज संस्थान के पूर्व महानिदेशक डब्ल्यूआर रेड्डी ने शासन और बुनियादी ढांचे के विकास में प्रौद्योगिकी पर जोर दिया।</p>
<p>केंद्रीय पंचायती राज मंत्रालय के पूर्व सचिव सुनील कुमार ने प्रतिभागियों का ध्यान याचिका निकायों की बजाय स्थानीय सरकारी समाधान निकाय बनाने की ओर आकर्षित किया। चर्चा में सेवानिवृत्त आईएएस मीनाक्षीसुंदरम ने नीति निर्माण में पंचायती राज संस्थाओं को शामिल करने का सुझाव दिया। इस चर्चा में मैं भी भागीदार था। मैंने जिला योजना समिति को और आगे ले जाकर जिला स्तर पर जिला सरकार की स्थापना करने और कार्य आवंटन के सहायक सिद्धांत को लागू करके उप-जिला स्तर पर शक्तियां और अधिकार सौंपने का सुझाव दिया। केरल इंस्टीट्यूट ऑफ लोकल एडमिनिस्ट्रेशन के महानिदेशक जॉय एलामोन ने पीपीसी में क्षमता निर्माण की भूमिका पर जोर दिया और प्रतिभागियों का ध्यान इस ओर आकर्षित किया कि पीपीसी के माध्यम से सामाजिक गतिशीलता से भी लोगों और उनके नेताओं को सहभागी शासन, योजना और विकास&nbsp; के विभिन्न स्तरों को संभालने के लिए क्षमता निर्माण में लाभ हुआ।</p>
<p>स्थानीय शासन की चुनौतियों का भविष्य में सामना करने के लिए प्रतिभागियों ने स्थानीय सरकार को पेशेवर सहायता देने के तहत स्वैच्छिक तकनीकी फसलों (वीटीसी) के पुनरुद्धार, अधिक स्थानीय संसाधन जुटाने, नए केरल के लिए 2017 में शुरू किए गए पीपीसी के दूसरे चरण को तेज करने, विभिन्न विभागों के बीच समन्वय बढ़ाने का सुझाव दिया। साथ ही कुशल और प्रभावी थोझिल सभा (रोजगार सभाएं) आयोजित करने, एक स्वतंत्र ऑडिट कमीशन की स्थापना करने और स्वायत्त स्थानीय टैक्स निगरानी बोर्ड की स्थापना करने भी सुझाव दिया।</p>
<p><em><strong>(लेखक भारतीय आर्थिक सेवा के पूर्व अधिकारी और करपा फाउंडेशन, गाजियाबाद के अध्यक्ष हैं।)</strong></em></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/11/image_750x500_6554363028a58.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ सरकार का विकेंद्रीकरणः केरलीयम 2023 में कहां है स्थानीय शासन ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[अल नीनो के चलते दाल&amp;#45;चावल, चीनी, तिलहन समेत अधिकांश फसलों का उत्पादन घटा, खाद्य महंगाई पर अंकुश की चुनौती]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/el-nino-impact-made-food-inflation-a-challenge-for-government-as-all-major-kharif-crops-production-decline.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 15 Nov 2023 11:07:07 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/el-nino-impact-made-food-inflation-a-challenge-for-government-as-all-major-kharif-crops-production-decline.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">मजबूत अल नीनो के मानसून पर पड़े असर के चलते चालू फसल वर्ष (2023-24) में कृषि उत्पादन पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका सही साबित होती दिख रही है। चालू खरीफ सीजन (2023-24) के लिए फसल उत्पादन के पहले अग्रिम अनुमान इस आशंका को सच में तब्दील कर रहे हैं। इन अनुमानों के मुताबिक चावल, दाल, मोटे अनाज, तिलहन, गन्ना, कपास और जूट का उत्पादन पिछले साल (2022-23) के खरीफ उत्पादन से कम रहेगा। इन अनुमानों से महंगाई के मोर्चे पर सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक की मुश्किलें बनी रह सकती हैं। दाल-रोटी के मामले में आम आदमी को कीमतों के मोर्चे पर कोई बड़ी राहत जल्द मिलने की संभावना कम है। तमाम फसलों का उत्पादन गिरने के चलते किसानों को भी आय का भारी नुकसान झेलना पड़ रहा है, जिसके चलते ग्रामीण इकोनॉमी का पटरी पर आना मुश्किल हो गया है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">ऐसे में पहले से ही 14 माह से दो अंकों में चल रही खाद्यान्न महंगाई के काबू में आने की संभावना कमजोर दिख रही है। सितंबर, 2022 से खाद्यान्न महंगाई दर दो अंकों में चल रही है। अक्तूबर, 2023 में यह 10.65 फीसदी रही है जो अक्तूबर, 2022 में 12.08 फीसदी थी। जून, 2022 से दो अंकों में बनी हुई दालों की ताजा महंगाई दर 18.79 फीसदी पर पहुंच गई है, जो अगस्त 2016 के बाद का उच्चतम स्तर है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">सरकार ने 27 अक्तूबर को एक प्रेस रिलीज जारी कर चालू खरीफ सीजन (2023-24) में उत्पादन के पहले अग्रिम अनुमान जारी किये थे। इसमें फसलों का उत्पादन तो बताया गया था लेकिन पिछले साल के मुकाबले यह कितना कम या ज्यादा है उसके बारे में विस्तृत जानकारी नहीं दी गई थी। लेकिन उसी दिन तैयार की गई फसलों के उत्पादन की टाइम सीरीज को देखने से स्थिति साफ हो जाती है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कृषि मंत्रालय के पहले अग्रिम अनुमानों के मुताबिक चालू खरीफ सीजन में कुल खाद्यान्न उत्पादन (दलहन समेत) 1485.69 लाख टन रहेगा जबकि पिछले साल खरीफ सीजन (2022-23) में 1557.11 लाख टन खाद्यान्न उत्पादन हुआ था। यानी पिछले साल के मुकाबले चालू साल में खाद्यान्न उत्पादन में 71.42 लाख टन गिरावट आने का अनुमान है। चालू खरीफ सीजन में चावल उत्पादन 1063.13 लाख टन रहने का अनुमान है जो पिछले साल खरीफ सीजन के चावल उत्पादन 1105.12 लाख टन से 41.99 लाख टन कम है। मोटे अनाजों में मक्का और बाजरा का उत्पादन भी पिछले साल से कम रहेगा। अंतरराष्ट्रीय मिलेट साल के इस आयोजन वर्ष में श्रीअन्न न्यूट्री सीरिअल्स ज्वार, बाजरा, रागी और स्माल मिलेट्स का उत्पादन पिछले साल से 12.49 लाख टन कम होकर 126.55 लाख टन रहने का अनुमान है। मोटे अनाजों का कुल उत्पादन 25 लाख टन से अधिक गिरने का अनुमान कृषि मंत्रालय के पहले अग्रिम अनुमानों में लगाया गया है। मोटे अनाजों समेत कुल खाद्यान्न उत्पादन 1414.50 लाख टन रहने का अनुमान है जो पिछले साल के खरीफ सीजन के 1480.90 लाख टन उत्पादन के मुकाबले 66.40 लाख टन कम है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">दालों के मामले में स्थिति काफी परेशान करने वाली है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक दालों की महंगाई दर 18.79 फीसदी पर है जो अगस्त, 2016 के बाद से सबसे ऊंचा स्तर है। यही नहीं, जून 2022 से दालों की महंगाई दर दहाई अंकों में बनी हुई है। अनुमानों के मुताबिक खरीफ सीजन की दालों का कुल उत्पादन 71.18 लाख टन रहेगा जो पिछले साल (2022-23) के मुकाबले करीब पांच लाख टन कम है। चिंता की बात यह है कि 2016-17 के बाद दालों का यह उत्पादन स्तर सबसे कम है। साल 2016-17 के खरीफ सीजन में दालों का उत्पादन 95.85 लाख टन रहा था। उसके बाद से अभी तक खरीफ सीजन में उत्पादन 2016-17 के स्तर से कम ही रहा है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">खाद्य तेलों के आयात पर निर्भरता कम होने के आसार भी नहीं हैं। पिछले खाद्य तेल साल (2022-23) में भारत ने इनका रिकार्ड आयात किया। कृषि मंत्रालय के पहले अग्रिम अनुमान के मुताबिक चालू खरीफ सीजन (2023-24) में कुल तिलहन उत्पादन 215.33 लाख टन रहने का अनुमान है जो पिछले साल (2022-23) के 261.50 लाख टन से 46.17 लाख टन कम है। सबसे अधिक 34.17 लाख टन की गिरावट सोयाबीन के उत्पादन में आने का अनुमान है। पिछले साल सोयाबीन का उत्पादन 149.85 लाख टन रहा था जिसके इस साल घटकर 115.28 लाख टन रह जाने का अंदेशा है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">नकदी फसलों में गन्ना का उत्पादन 4905.33 लाख टन से घटकर 4347.93 लाख टन रहने का अनुमान है। यानी पिछले साल के मुकाबले गन्ना उत्पादन में 557.40 लाख टन गिरावट आएगी। वहीं कपास का उत्पादन 336.60 लाख गांठ (170 किलो प्रति गांठ) के पिछले साल के स्तर से घटकर चालू साल में 316.57 लाख गांठ रहने का अनुमान है। जूट और मेस्ता का उत्पादन 91.91 लाख गांठ (180 किलो प्रति गांठ) रहने का अनुमान है जो पिछले साल से दो लाख गांठ कम है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अमेरिकी एजेंसी एनओएए के मुताबिक जून 2024 तक अल नीनो के मजबूत बने रहने की संभावना 62 फीसदी है। ऐसे में चालू रबी सीजन में भी उत्पादन बहुत बेहतर नहीं रहने की आशंका बन रही है, क्योंकि मानसून के बाद की बारिश काफी कमजोर बनी हुई है और साथ ही जलाशयों में भी पानी का स्तर कम है। जहां तक खरीफ सीजन में उत्पादन गिरने की बात है तो उसकी वजह जहां मानसून का देरी से आना और कई राज्यों में बारिश का असामान्य रहना रहा है। कर्नाटक और महाराष्ट्र में गन्ना, दालों और मोटे अनाजों का उत्पादन इससे सीधे प्रभावित हुआ है वहीं मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में सोयाबीन की कमजोर फसल की वजह कम और देर से हुई बारिश रही है। वहीं कई राज्यों में पिंक बालवॉर्म ने कपास की फसल को भारी नुकसान पहुंचाया है।</span></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/08/image_750x500_64d1d0d873d03.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ अल नीनो के चलते दाल-चावल, चीनी, तिलहन समेत अधिकांश फसलों का उत्पादन घटा, खाद्य महंगाई पर अंकुश की चुनौती ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[नारायण मूर्ति ने तो 70 घंटे की बात कही लेकिन हफ्ते  में 98 घंटे काम करते हैं किसान]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/outrage-at-narayana-murthy-70-hrs-week-farmer-logs-in-over-98-hrs.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 09 Nov 2023 14:21:16 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/outrage-at-narayana-murthy-70-hrs-week-farmer-logs-in-over-98-hrs.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>आईटी कंपनी इंफोसिस के संस्थापक एनआर नारायण मूर्ति के सप्ताह में 70 घंटे काम करने के बयान ने मध्यम वर्ग के नौकरीपेशा लोगों में हलचल पैदा कर दी है। उनके इस सुझाव पर नौकरीपेशा वर्ग के ज्यादातर लोगों ने नाराजगी जताई है, जबिक अन्य उद्योगों के उद्योगपतियों में आगे 'श्रम सुधारों' की उम्मीद जगी है।</p>
<p>मूर्ति ने क्या कहा? भारत की कार्य उत्पादकता दुनिया में सबसे कम में से एक है। हमारे युवाओं को कहना होगा- 'यह मेरा देश है, मैं हफ्ते में 70 घंटे काम करना चाहता हूं।' उनके इस सुझाव पर विस्फोटक प्रतिक्रिया देखने को मिली। यह बहस काफी हद तक शहरी थी, &nbsp;वह भी बड़े शहरों में। 140 करोड़ लोगों का यह देश केवल 4-5 महानगरों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इस तरह की बहसों को बड़े संदर्भ में लिया जाना चाहिए। हमारे गांवों को भी इसमें क्यों नहीं शामिल किया जाए?</p>
<p>पश्चिमी उत्तर प्रदेश या पड़ोसी हरियाणा के किसी भी गांव के पांच-छह सदस्यों वाले एक सामान्य परिवार का उदाहरण लें और देखें कि वे सप्ताह के सातों दिन कितने घंटे काम करते हैं। वैसे, ग्रामीण अर्थव्यवस्था में 'रविवार' नाम की कोई चीज नहीं होती है। गांव में काम का सिलसिला रविवार से रविवार तक जारी रहता है।</p>
<p>परिवार का मुखिया पत्नी के साथ सुबह 5 बजे बिस्तर छोड़ देता है। पारंपरिक पारिवारिक कार्य विभाजन के अनुसार, परिवार का पुरुष मुखिया पशुओं (गाय-भैंस) की देखभाल करता है- उन्हें चारा देता है और महिला सदस्य सुबह के घरेलू कामों में लग जाती है। इसमें मुख्य रूप से घर की साफ-सफाई करने, भोजन बनाने और रात में जमाई गई दही को मथने और मक्खन एवं छाछ बनाने की प्रक्रिया शामिल है। इसके बाद वह भी गाय-भैंस चराने में अपने पति की मदद करती है।</p>
<p>इसमें करीब दो घंटे लगते हैं जिसके बाद नाश्ते के लिए एक छोटा सा ब्रेक लिया जाता है। नाश्ते में मक्खन के साथ रोटी और एक गिलास लस्सी या छाछ या चाय शामिल होता। जैसे ही गांव का दूधिया घर में आता है, वे फिर से काम पर लग जाते हैं और गाय-भैंस का दूध निकालना शुरू कर देते हैं। इसके बाद पुरुष सदस्य खेत की ओर चला जाता है और महिला बच्चों की देखभाल करती है। वह बच्चों को खाना देती है और स्कूल भेजती है। इसके बाद वह फिर से पालतू पशुओं की देखभाल में जुट जाती है। इस समय उसे यह काम अकेले करना पड़ता है।</p>
<p>यह सिलसिला दिन के लगभग 12.30-1 बजे तक चलता है। उसके बाद दोनों लगभग एक घंटे का विराम लेते हैं। मगर इस समय तक दंपति 7-8 घंटे काम कर चुके होते हैं। दोपहर बाद शाम से लेकर रात तक की दिनचर्या में कम से कम छह घंटे और लगते हैं। इसका मतलब है कि वे रोजाना 14 घंटे या सप्ताह में 98 घंटे काम करते हैं, जबकि नारायण मूर्ति ने &nbsp;70 घंटे काम करने का सुझाव दिया है।</p>
<p>ज्यादातर भारतीय (शहरों और गांवों दोनों में) कड़ी मेहनत करते हैं और कम उत्पादकता के लिए उसे दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए। एक कैब ड्राइवर दिन में कम से कम 12 घंटे काम करता है, जबकि कंपनी के अधिकारियों का ड्राइवर पूर्णकालिक काम करता है। हाउसिंग सोसायटियों में गेट पर तैनात सुरक्षा गार्ड 12 घंटे काम करते हैं। दुकानदार भी 10-12 घंटे तो दुकान में बिताते ही हैं। लेकिन मूर्ति के सुझाव को आदर्श नहीं माना गया है। उनके सुझाव का स्पष्ट संदर्भ कॉरपोरेट्स में उन लोगों के लिए था जो दिन में कम से कम 8 घंटे या सप्ताह में 40-45 घंटे काम करते हैं। नौकरियों में किसी किसान या ग्रामीण मजदूर की कड़ी मेहनत शामिल नहीं होती है, लेकिन इनमें बहुत अधिक मानसिक परिश्रम की आवश्यकता होती है और ये मानसिक तनाव में रहते हैं।</p>
<p>कम उत्पादकता की समस्या हम भारतीयों में प्रतिबद्धता की कमी की वजह से नहीं है, बल्कि शहरों या गांवों में बोझिल प्रणालियों और आधुनिकीकरण की कमी की वजह से है। हमारे गांवों में आज भी पशुपालन का कठिन परिश्रम वैसा ही है जैसा पांच दशक पहले था। हमें अपने गांव के घरों, खेतों, मंडियों में अपनी प्रथाओं को आधुनिक बनाने की जरूरत है ताकि उन्हें उपभोग और उत्पादन दोनों की स्मार्ट और उत्पादक आपूर्ति श्रृंखलाओं में एकीकृत किया जा सके।</p>
<p>मूर्ति नेक इरादे वाले एक प्रतिष्ठित उद्योगपति हैं। उनके सुझाव को भारतीय संदर्भ और जमीनी हकीकत के मुताबिक ढालना होगा।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ नारायण मूर्ति ने तो 70 घंटे की बात कही लेकिन हफ्ते  में 98 घंटे काम करते हैं किसान ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[विश्व खाद्य दिवस: डॉ. एमएस स्वामीनाथन को देश का सलाम]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/on-the-occasion-of-world-food-day-nation-salutes-dr-ms-swaminathan.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 16 Oct 2023 13:36:06 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/on-the-occasion-of-world-food-day-nation-salutes-dr-ms-swaminathan.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>इस वर्ष भारत जश्न की तिकड़ी मना रहा हैं। एक ओर संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा घोषित अंतरराष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष 2023 मनाया जा रहा है, तो दूसरी ओर आजादी के 75वें अमृत महोत्सव में जी-20 की अध्यक्षता कर रहा है। आज (16 अक्टूबर) विश्व खाद्य दिवस के उपलक्ष में हम सब भारतवासी छोटे और सीमांत किसानों के परिश्रमी जीवन और उससे मिली समृद्धि तथा इस समृद्धि के जनक डॉ. एमएस स्वामीनथन के जीवन का भी जश्न मनाएं जिनका पिछले महीने निधन हो गया। सही मायने में यही डॉ. स्वामीनाथन को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।</p>
<p>भारत छोटे किसानों और लघु उद्योगों का देश है, जो इसके आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक ताने-बाने का आधार है। यह देश की खाद्य सुरक्षा और पर्यावरणीय स्थिरता में किसानों का अहम योगदान है। 140 करोड़ भारतीयों के लिए खाद्य सुरक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता है। किसान, छोटे व्यवसाय और लचीली खाद्य आपूर्ति श्रृंखला देश में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जो राष्ट्रीय सुरक्षा का महत्वपूर्ण पूरक है। नोबल पुरस्कार विजेता कृषि वैज्ञानिक डॉ. नॉर्मन बोरलॉग ने 1970 में नोबल पुरस्कार स्वीकार करते हुए कहा था कि "आप भूखे पेट समाज में शांति का निर्माण नहीं कर सकते।&ldquo;</p>
<p>इस कथन को ध्यान में रखते हुए भारत के हजारों कृषि वैज्ञानिकों ने डॉ. एम.एस स्वामीनाथन के मार्गदर्शन में देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में आपार योगदान दिया है। उनकी तीन सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक आजादी के बाद राजनीतिक और नीति निर्माताओं द्वारा कृषि विज्ञान, तकनीक और नवाचार को भारतीय कृषि में स्वीकार करवाना था। इसका सबसे बड़ा परिणाम यह रहा की राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली (एनएआरएस) का निर्माण हो सका और देश के कोने-कोने में फसल आधारित और स्थानीय कृषि जलवायु परिस्थितियों के मुताबिक कृषि अनुसंधान संस्थाओं का बुनियादी ढांचा खड़ा हो सका। वर्तमान में भारत में कृषि शिक्षा, अनुसंधान और प्रसार संस्थानों जिसमे तकरीबन 113 आईसीएआर संस्थानों, 74 राज्य कृषि विश्वविद्यालयों, 4 मानद विश्वविद्यालयों, 3 केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालयों और 4 केंद्रीय विश्वविद्यालयों के साथ देश की राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली दुनिया में सबसे बड़ी है।</p>
<p>प्रोफेसर स्वामीनाथन की दूसरी सबसे बड़ी उपलब्धि विश्व स्तर पर कृषि अनुसंधान और तकनीकी सहयोग को सफलतापूर्वक स्थापित करना और कृषि समृद्ध विकसित देशों से भारत में कृषि प्रौद्योगिकी का हस्तांतरण करना था। उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि अर्द्ध-बौनी और उच्च उपज वाली किस्मों का किसानों द्वारा स्थानीय स्थिति में सही मूल्यांकन करना ताकि किसानों को सही मायने में फायदा हो सके। गेहूं और चावल की अर्द्ध-बौनी और उच्च उपज वाली किस्मों के उत्पादन के परिणाम अभूतपूर्व थे। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के नेतृत्व में प्रो. एमएस स्वामीनाथन ने गेहूं में मेक्सिको की नोरिन-10 से प्राप्त अर्द्ध-बौनी आरएचटी जीन और&nbsp; विशेष रूप से ताइवान से प्राप्त डी-जियो-वू-जीन चावल की किस्म से प्राप्त अर्द्ध-बौनी एसडी-1 जीन ने भारत में पहली सबसे लोकप्रिय अर्द्ध-बौनी आईआर-8 चावल किस्म का विकास किया। इससे कृषि विज्ञान और अनुसंधान को गति मिली और अगले पांच दशकों तक देश में अर्द्ध-बौनी जीन आरएचटी और एसडी-1 का बड़े पैमाने पर उपयोग विभिन्न कृषि जलवायु क्षेत्रों के लिए आधुनिक गेहूं और चावल की किस्मों को विकसित करने के लिए&nbsp; किया गया। देश के किसानों ने गेहूं और चावल की अर्द्ध-बौनी और उच्च उपज वाली किस्मों को खूब अपनाया और इसके साथ सिंचाई, उर्वरक और मशीनीकरण जैसे कृषि उद्योगों के विकास की एक नई लहर खेतों और खलिहानों में दौड़ पड़ी।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/10/image_750x_652cee4da8323.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>(विश्व खाद्य पुरस्कार फाउंडेशन ने प्रो. एमएस स्वामीनाथन को भारत में उच्च उपज देने वाली गेहूं और चावल की किस्मों को विकसित करने के लिए पहला विश्व खाद्य पुरस्कार 1986 में दिया था। प्रो. नॉर्मन बोरलॉग के 2009 में देहांत के बाद प्रो. स्वामीनाथन कई वर्षो तक विश्व खाद्य पुरस्कार चयन समिति के अध्यक्ष रहे।)</strong></p>
<p>प्रोफेसर स्वामीनाथन की तीसरी बड़ी उपलब्धि उनका सरल और सौम्य तरीके से जटिल कृषि तकनीकों पर समाज के विभिन स्तर पर संवाद करना, आसान भाषा में समझाना और तकनीकी ज्ञान और प्रोद्योगिकी को खेत खलिहान तक पहुंचना था।</p>
<p>उनकी इन्हीं खूबियों से अनाज की फसलों में कृषि विज्ञान और प्रौद्योगिकी का वो दौर आगे बढ़ा और 1980 के दशक में संकर पद्धति का उपयोग अधिक उपज वाले संकर बीजों के रूप में बाजरा, जवारी, कपास और सब्जियों में व्यापक स्तर पर होने लगा। 2002 के आते-आते जैव प्रौद्योगिकी के सही इस्तेमाल से देश में कपास की नई क्रांति आई और भारत कपास का सबसे बड़ा उत्पादक देश बना। उनके दिशा-निर्देशों और किसनों की मेहनत के परिणामस्वरूप आज देश में अन्न के भंडार भरे हैं। वर्ष 2022-23&nbsp; में भारत ने खाद्यान्न और बागवानी फसलों के उत्पादन में क्रमशः 33 करोड़ और 34.2 करोड़ टन का रिकॉर्ड उत्पादन किया। अपनी खाद्य सुरक्षा को पूरा कर आज दुनिया भर में कृषि और खाद्य पदार्थों का भारत का निर्यात 50 अरब अमेरिकी डॉलर के पार कर चुका है।</p>
<p>हमारे गोदामों में पर्याप्त अनाजों की उपलब्धता के कारण कोविड-19 जैसी महामारी के दौरान भी भारत खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित कर सका। देश की आबादी को दो वक्त का भोजन सुनिश्चित करने के साथ ही दूसरे देशों को भी पर्याप्त मात्रा में खाद्य पदार्थ उपलब्ध करवा कर दुनिया के समक्ष भारत ने मिसाल कायम की। मगर ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के इस दौर में किसानों को खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अनगिनत चुनौतियां का सामना करना पड़ रहा है। ऐसी प्रतिकूल परिस्थितियों में खाद्य उत्पादन के वैज्ञानिक तरीकों पर ध्यान केंद्रित करने और खाद्य सुरक्षित राष्ट्र बनाने की दिशा में पुरजोर कोशिश करनी होगी। चाहे जैविक या प्राकृतिक खेती हो या निवेश गहन व्यावसायिक खेती, हमें खाद्य उत्पादन के लिए साक्ष्य और विज्ञान आधारित दृष्टिकोण अपनाना होगा। हमें अपने कृषक समुदाय को नए तरीकों और आधुनिक प्रणाली को अपनाने के लिए प्रेरित करना होगा ताकि उनकी आय तथा मूल्य प्राप्ति में वृद्धि हो सके। इस प्रकार किसान समुदाय देश की प्रगति का महत्वपूर्ण अंग बन सकेंगे। भारत की नीतियों और कार्यक्रमों में किसानो को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी और उन्हें जैविक व अजैविक चुनौतियों से निपटने के लिए मजबूत बनाना होगा।</p>
<p>प्रोफेसर स्वामीनाथन के सिखाए रास्तों पर चलते हुए कृषि अनुसंधान संस्थानों को वैज्ञानिक पद्धति को अपनाने के लिए किसानों तथा किसान उत्पाद संगठनों को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण काम करना पड़ेगा। खाद्य सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए भारत में, विशेषकर संसाधनों की कमी वाले कृषि क्षेत्रों में, कृषि के वातावरण व कृषि की संपदाओं में काफी विविधताएं हैं, ये विविधताएं सीमित संसाधन तथा तकनीक के सीमित प्रसार के कारण कृषि उद्योग में आय-व्यय में काफी अंतर है। इस अंतर को कृषि विज्ञान, तकनीक और नवाचार से पाटना तथा सामान्य कृषि क्षेत्रों को और अधिक लाभदायक बनाना होगा। इसके साथ ही किसानों की आय में बढ़ोतरी और कृषि से जुड़े व्यवसाय के जरिये किसान कल्याण को प्राथमिकता देनी होगी। हमारा हर कदम कृषकों के कल्याण के लिए उठे, हम सब को मिल कर यही सुनिश्चित करना होगा।</p>
<p>आधुनिक तकनीक और कृषि के ज्ञान को किसानों तक पहुंचाना जिसे हमारे किसान इसे अपनी आवश्यकताओं व जलवायु के लिए अनुकूल तकनीक को क्रियान्वित कर सकें। उचित कृषि ज्ञान, तकनीक और नवाचार के खेत-खलिहान में पहुंचने से खेती की पैदावार में बढ़ोतरी होगी, उत्पादकता में स्थिरता आएगी, उत्पाद गुणवत्ता से भरपूर होगा तथा निर्यात की कसौटी पर सही उतरेगा। ऐसे प्रयासों से कृषि क्षेत्र में समृद्धि आएगी, किसानों की आय बढ़ेगी और खाद्य सुरक्षा सुनिचित होना ही प्रोफेसर स्वामीनाथन के "हरित क्रांति' से 'सदाबहार क्रांति' की ओर बढ़ना मुमकिन हो पाएगा।</p>
<p><strong><em>(लेखक जोधपुर स्थित </em></strong><strong><em>साउथ एशिया बायोटेक्नोलॉजी सेंटर</em></strong><strong><em> के संस्थापक निदेशक हैं।)</em></strong>&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ विश्व खाद्य दिवस: डॉ. एमएस स्वामीनाथन को देश का सलाम ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[आखिर प्राकृतिक खेती को क्यों बढ़ावा दे रही सरकार?]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/why-the-government-is-focusing-on-natural-farming.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 01 Oct 2023 06:36:34 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/why-the-government-is-focusing-on-natural-farming.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">भारत ने पौधों को पोषक तत्व उपलब्ध कराने वाले महत्वपूर्ण इनपुट के तौर पर उर्वरकों को आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 के तहत आवश्यक कमोडिटी का दर्जा दे रखा है। उर्वरकों के बिना कृषि उत्पादकता बहुत कम हो जाएगी और देश की खाद्य सुरक्षा को प्रभावित करेगी। अगर बाजार में सरकार हस्तक्षेप न करे और वैसी स्थिति में बाजार विफल हो जाए तो भारत जैसे देश में इसका बड़ा नकारात्मक असर होगा। यहां आज भी प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से आबादी का बड़ा हिस्सा कृषि पर निर्भर है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">उर्वरक सेक्टर में उत्पादक, उपभोक्ता और सरकार शामिल हैं। सरकारी हस्तक्षेप के माध्यम से इसे रेगुलेट करने के महत्व का पता उस स्थिति के विश्लेषण से लगाया जा सकता है जब इस सेक्टर को प्रतिस्पर्धी मान कर सरकार हस्तक्षेप ना करे। उर्वरकों के प्रत्येक उपभोक्ता को किसी ने किसी स्रोत से एक निश्चित लागत पर इसकी सप्लाई होगी। उस लागत में उत्पादन, ट्रांसपोर्ट और डिस्ट्रीब्यूशन का खर्च शामिल होगा। फर्टिलाइजर प्रोडक्ट बनाने वाले को विभिन्न कंज्यूमर को होने वाली बिक्री से समान रिटर्न मिलेगा। जिन लोगों को अभी वह फर्टिलाइजर प्रोडक्ट नहीं बचता है, उन्हें बेचने से उसे ज्यादा रिटर्न नहीं मिलेगा।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">ऐसे बाजार में अगर किसी उपभोक्ता की डिमांड प्राइस, सप्लाई प्राइस से कम रहती है तो उसे सप्लाई नहीं मिलेगी। उन उत्पादकों को भी मुश्किल होगी जो उपभोक्ता की डिमांड प्राइस से अधिक कीमत पर अपने उत्पादों की सप्लाई करेंगे। ऐसी स्थिति में उत्पादक को अपनी मैन्युफैक्चरिंग इकाई बंद करने की नौबत आ सकती है। इसी तरह, वे उत्पादक जो यूनिट वेरिएबल लागत से अधिक कीमत पा रहे हैं लेकिन उन्हें उत्पादन की कुल कीमत से अधिक नहीं मिल रहा, वे भी लंबे समय में अपनी इकाई बंद करने पर मजबूर होंगे (Segura, Shetty and Mieko. 1986)। इससे बाजार विफल हो जाएगा। लेकिन अगर हस्तक्षेप की नीति से सरकार की लागत बढ़ती है तो उसका क्या?</span></p>
<p><strong>बढ़ती फर्टिलाइजर सब्सिडी</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">उर्वरकों का इस्तेमाल बढ़ाने, फसलों की लागत बढ़ने से रोकने तथा कृषि को सब्सिडी देने के लिए महत्वपूर्ण है कि किसानों को उर्वरकों की आपूर्ति उचित कीमत पर की जाए। उर्वरक सब्सिडी की प्रासंगिकता ऐसे समय में ही आती है जब किसानों के लिए कीमत उर्वरक उत्पादन की औसत लागत से बहुत कम निर्धारित की जाती है। सरकार इन दोनों के बीच के अंतर को सब्सिडी के तौर पर उर्वरक निर्माता को देती है। वर्ना उर्वरक निर्माता बाजार से चले जाएंगे। मराठे समिति (1976) की सिफारिशों के आधार पर सरकार ने 1976-77 से उर्वरक सब्सिडी देना शुरू किया। उस वर्ष कुल उर्वरक सब्सिडी सिर्फ 60 करोड़ रुपए थी जो 2022-23 में 225222.3 करोड़ तक पहुंच गई।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इस समय भारत यूरिया तथा गैर-यूरिया उत्पादों पर सब्सिडी देता है। यहां उर्वरक के तौर पर सबसे अधिक उत्पादन और खपत यूरिया की ही होती है। खेती में इस्तेमाल होने वाली यूरिया की कीमत सरकार तय करती है। सरकार द्वारा निर्धारित कीमत और उत्पादन लागत के बीच के अंतर की राशि सरकार यूरिया निर्माताओं/आयातकों को सब्सिडी के तौर पर देती है। गैर-यूरिया प्रोडक्ट न्यूट्रिएंट आधारित सब्सिडी (एनबीएस) के तहत आते हैं। यहां सरकार नाइट्रोजन, फास्फेट, पोटाश और सल्फर जैसे न्यूट्रिएंट की प्रति किलो के हिसाब से सब्सिडी की दर तय करती है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">पिछले कुछ वर्षों के दौरान उर्वरक सब्सिडी का विश्लेषण किया जाए तो हम पाते हैं कि बीते 3 वर्षों में यह एक लाख करोड़ रुपए से अधिक रही है। वर्ष 2022-23 के संशोधित आकलन में सब्सिडी की राशि अब तक के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई। 2019-20 की तुलना में 2022-23 में उर्वरक सब्सिडी 177.62 प्रतिशत बढ़ गई। इस वृद्धि के दो कारण रहे- वैश्विक स्तर पर उर्वरक संकट और उर्वरक आयात पर भारत की निर्भरता। विश्व बैंक के अनुसार फर्टिलाइजर प्राइस इंडेक्स इस साल 15% बढ़ा है और दो साल पहले की तुलना में दाम तीन गुना से अधिक बढ़े हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इस संकट के छह कारण हैं- वैश्विक मांग में वृद्धि, उर्वरक उत्पादन के लिए इनपुट की बढ़ी कीमत, अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में सप्लाई की कमी, घरेलू नीतियां, भू राजनीतिक जोखिम और रूस-यूक्रेन युद्ध। फसल उत्पादन वाले प्रमुख क्षेत्रों में रासायनिक उर्वरकों की मांग बढ़ी है और इनकी कीमतें बढ़ाने में इसने बड़ी भूमिका निभाई है। मक्का और सोयाबीन जैसी फसलों के लिए पोटाश और फास्फेटिक उर्वरकों की जरूरत विश्व स्तर पर बढ़ी क्योंकि इनकी खेती का रकबा बढ़ा है। इनपुट लागत बढ़ने से भी उर्वरकों की कीमतें बढ़ी हैं। फास्फेटिक उर्वरकों के मामले में देखें तो सल्फर और अमोनिया जैसे कच्चे माल के दाम कोविड-19 महामारी के प्रतिबंधों के कारण काफी बढ़ गए। दूसरी तरफ यूरिया के मामले में फीड स्टॉक लागत 2021 में रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गई, खासकर एशियाई एलएनजी और पश्चिम अमेरिकी प्राकृतिक गैस की कीमतों के कारण।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इनपुट लागत बढ़ने से लेकर मौसम के विपरीत प्रभाव जैसे कारणों ने अनेक देशों के घरेलू बाजारों में उर्वरकों की सप्लाई को बाधित किया। कई देशों में उर्वरकों की उपलब्धता घटने के कारण वहां की सरकारों ने अपने यहां उपलब्धता बढ़ाने की नीतियां लागू की। उदाहरण के लिए दुनिया के सबसे बड़े उर्वरक उत्पादक और उपभोक्ता चीन ने इनके निर्यात पर रोक लगा दी। जुलाई 2021 में नेशनल डेवलपमेंट एंड रिफॉर्म कमिशन ने घरेलू बाजार में उर्वरकों की अधिक कीमत के कारण इनका निर्यात रोकने का फैसला किया। इस कदम से अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों की सप्लाई कम हो गई। चीन में कोयले की बढ़ती कीमतों ने भी उर्वरक उत्पादक कंपनियों को उत्पादन घटाने के लिए मजबूर किया। रूस और मिस्र ने भी अपनी नीतियों के तहत एक्सपोर्ट की सीमा निर्धारित कर दी। भू राजनीतिक स्तर पर देखें तो बेलारूस पर यूरोपियन यूनियन और अमेरिका के प्रतिबंधों के चलते पोटाश बाजार में अनिश्चित पैदा हो गई है। बेलारूस अंतरराष्ट्रीय बाजार में 20% पोटाश की सप्लाई करता है। इस तरह के प्रतिबंधों ने उर्वरकों की कीमतें बढ़ाने का काम किया। रूस और यूक्रेन के बीच तनाव ने भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में सप्लाई के साथ प्राकृतिक गैस की कीमतों को प्रभावित किया।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">वैश्विक स्तर पर उर्वरक संकट ने भारत को भी प्रभावित किया है। भारत अपनी जरूरत के 25% यूरिया, 90% फास्फेटिक उर्वरक और 100% पोटाश उर्वरकों के लिए आयात पर निर्भर है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उर्वरकों की कीमतों में वृद्धि का भारत पर बड़ा असर होता है। भारत उर्वरकों का बड़ा आयातक है, इसलिए यह खरीदार के रूप में जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रवेश करता है तो कीमतें बढ़ जाती हैं, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में डिमांड और सप्लाई से ही कीमतें होती हैं। हालांकि भारत ने कुछ देशों के साथ लॉन्ग टर्म सप्लाई के समझौते भी किए हैं।</span></p>
<p><strong>नीतिगत बदलाव की ओर कदम</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">उर्वरकों के लिए सब्सिडी की नीति अपनाने के बाद भारत में इनकी खपत तेजी से बढ़ी है। हालांकि यहां चीन, बांग्लादेश और ब्राजील जैसे देशों की तुलना में प्रति हेक्टेयर उर्वरकों की औसत खपत कम है, फिर भी हाल में भारत ने प्राकृतिक खेती पर जोर देना शुरू कर दिया है। इसकी मुख्य वजह क्या है?</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">बढ़ती उर्वरक सब्सिडी सरकार के लिए चिंता का विषय है। इसे नियंत्रित करने के लिए सरकार प्राकृतिक या ऑर्गेनिक खेती बढ़ाने की बात कर रही है। 16 दिसंबर 2021 को प्राकृतिक खेती पर राष्ट्रीय कॉन्क्लेव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में देश की मिट्टी को रासायनिक उर्वरकों तथा कीटनाशकों से मुक्त करने का आह्वान किया था। इसके बाद 1 जनवरी 2022 को पीएम किसान कार्यक्रम में उन्होंने किसानों से रसायन मुक्त खेती अपनाने को कहा। पिछले साल 28 मई को इफको के सेमिनार में प्रधानमंत्री ने एक बार फिर यह कहकर ऑर्गेनिक खेती बढ़ाने की बात कही कि यह नया मंत्र है और इससे उर्वरकों के लिए दूसरे देशों पर हमारी निर्भरता कम होगी। प्रधानमंत्री ने देश के किसानों से यूरिया का इस्तेमाल 50% कम करने की भी बात कही ताकि मिट्टी की सेहत को सुधारा जा सके और धीरे-धीरे रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल कम किया जा सके।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">आर्थिक सर्वेक्षण 2021-22 में भी वैकल्पिक उर्वरकों के महत्व के साथ रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल कम करने की बात कही गई है। इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए सरकार ने 2023-24 के बजट में पीएम प्रणाम (प्रोग्राम फॉर रेस्टोरेशन, अवेयरनेस, नरिशमेंट एंड एमेलियोरेशन ऑफ मदर अर्थ) नाम से नई योजना शुरू करने का प्रस्ताव रखा। इसका मकसद सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में वैकल्पिक उर्वरकों को बढ़ावा देना तथा रासायनिक उर्वरकों के संतुलित प्रयोग को प्रोत्साहित करना है। इसके लिए यूरिया की खपत घटाना जरूरी है क्योंकि भारत में सबसे अधिक इसी की खपत होती है। इस बजट में सरकार ने भारतीय प्राकृतिक खेती बायो इनपुट रिसोर्स सेंटर के माध्यम से किसानों को प्राकृतिक खेती अपनाने की बात भी कही है। जुलाई 2023 में सरकार ने ऑर्गेनिक उर्वरकों को बढ़ावा देने के लिए एक नीति की घोषणा की। इसके लिए गोबरधन (गैलवानाइजिंग ऑर्गेनिक बायो-एग्रो रिसोर्सेस धन) पहल की शुरुआत की गई है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">बिना पर्याप्त तैयारी और किसानों को जागरूक किए ऑर्गेनिक अथवा प्राकृतिक खेती पर जोर देना कृषि उत्पादन को प्रभावित कर सकता है। हम श्रीलंका में ऐसा देख चुके हैं जहां रासायनिक उर्वरकों के बजाय किसानों से अचानक ऑर्गेनिक खेती करने को कहा गया था।</span></p>
<p><em><strong>(लेखक सेंटर फॉर डेवलपमेंट स्टडीज-जेएनयू में डॉक्टोरल स्कॉलर हैं)</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ आखिर प्राकृतिक खेती को क्यों बढ़ावा दे रही सरकार? ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[डॉ. एमएस स्वामीनाथन को ‘भारत रत्न’ देना ही होगी उनको सच्ची श्रद्धांजलि]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/giving-bharat-ratna-to-ms-swaminathan-would-be-the-true-tribute-to-him.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 29 Sep 2023 13:38:06 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/giving-bharat-ratna-to-ms-swaminathan-would-be-the-true-tribute-to-him.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>कृषि क्षेत्र की दूरदर्शी शख्सियत का निधन देश के लिए एक मार्मिक क्षण है। आज हम एक सच्ची विभूति डॉ. एमएस स्वामीनाथन को विदाई देते हैं। एक ऐसे व्यक्ति जिनका नाम प्रगति, नवाचार और खाद्य सुरक्षा की दिशा में प्रयास का पर्याय बन गया। उन्होंने अपना पूरा जीवन भारत के कृषि परिदृश्य की बेहतरी के लिए समर्पित कर दिया। उनकी यह विरासत निश्चित रूप से पीढ़ियों तक गूंजती रहेगी।</p>
<p>अपने अभूतपूर्व कार्य के अलावा उन्होंने भारत में कृषि अनुसंधान और विकास के भविष्य को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। डॉ. स्वामीनाथन ने अखिल भारतीय कृषि अनुसंधान सेवा (एआरएस) के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसने देश के सभी क्षेत्रों के वैज्ञानिकों के बीच सहयोगात्मक अनुसंधान प्रयासों को सुविधाजनक बनाया। वैज्ञानिक दिमागों की इस नेटवर्किंग ने कृषि में नए समाधान की नींव रखी जिससे हमारे कृषि परिदृश्य को बेहतर बनाने के लिए समर्पित शोधकर्ताओं के बीच एकता की भावना को बढ़ावा मिला।</p>
<p>इसके अलावा वैज्ञानिक खोजों और व्यावहारिक कार्यान्वयन के बीच अंतर को पाटने की उनकी प्रतिबद्धता के कारण लैब-टू-लैंड कार्यक्रम की शुरुआत हुई। इस दूरदर्शी पहल का उद्देश्य कृषि प्रौद्योगिकियों को सीधे किसानों तक पहुंचाना था जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि रिसर्च का लाभ हमारे खेतों में मेहनत करने वालों तक पहुंचे। यह भारत के कृषक समुदाय के कल्याण के प्रति उनके समर्पण का प्रमाण था। अपने पूरे करियर के दौरान डॉ. स्वामीनाथन ने वह हासिल किया जिसे कुछ लोग लगभग असंभव मान सकते हैं।</p>
<p>डॉ. स्वामीनाथन का प्रभाव और नेतृत्व भारत की सीमाओं से परे तक फैला था। 1982 से 1988 तक फिलीपींस में अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान के महानिदेशक के रूप में उन्होंने चावल अनुसंधान में महत्वपूर्ण प्रगति के लिए संस्थान का मार्गदर्शन किया। दुनिया भर में चावल उगाने वाले क्षेत्रों को इसका लाभ मिला।</p>
<p>भारत की प्रगति के प्रति उनका अटूट जुनून प्रेरणादायक था। उनके पास वैज्ञानिक ज्ञान को व्यावहारिक समाधान में बदलने, हमारे खेतों में मेहनत करने वालों के लिए आशा और जीविका लाने की दुर्लभ क्षमता थी। उन्हें मिले पुरस्कार और प्रशंसाएं उनके असाधारण योगदान की गवाही देते हैं। 1971 में सामुदायिक नेतृत्व के लिए मिले रमन मैग्सेसे पुरस्कार से लेकर 1987 में प्रथम विश्व खाद्य पुरस्कार विजेता तक उनका वैश्विक प्रभाव निर्विवाद था। अल्बर्ट आइंस्टीन विश्व विज्ञान पुरस्कार, शांति के लिए इंदिरा गांधी पुरस्कार, यूएनईपी ससाकावा पर्यावरण पुरस्कार और यूनेस्को गांधी स्वर्ण पदक जैसे सम्मानों ने कृषि और ग्रामीण विकास के प्रति उनके असाधारण समर्पण को और उजागर किया। उनके अपार योगदान के लिए देश ने उन्हें पद्म भूषण और पद्म विभूषण से सम्मानित किया।</p>
<p>डॉ. स्वामीनाथन केवल एक वैज्ञानिक नहीं थे, वह एक कुशल नेतृत्वकर्ता थे जिन्होंने हमारे कृषक समुदाय के कल्याण की अथक वकालत की। किसान आयोग के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने सरकार को राष्ट्रीय किसान कल्याण नीति लाने के लिए राजी किया और किसानों को खेती की लागत पर 50 फीसदी मुनाफा देकर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का भुगतान करने की सिफारिश की। इससे उन्हें पूरे कृषक समुदाय का सम्मान और आभार प्राप्त हुआ।</p>
<p>आज जब हम उनके निधन पर शोक मना रहे हैं, इस दूरदर्शी व्यक्तित्व द्वारा छोड़ा गया शून्य अथाह है। डॉ. स्वामीनाथन एक कुशल योजनाकार, अत्यंत सम्मानित व्यक्ति थे जिनका किसानों और भारतीय कृषि के प्रति प्रेम अटूट था। बौनी गेहूं की किस्मों को पेश करके और उनका प्रजनन करके देश को अच्छे अनाज के मामले में आत्मनिर्भर बनाने में उनके योगदान से 1950 में जहां उत्पादन 5 करोड़ टन था वह अब बढ़कर अब 33 करोड़ टन हो गया है। इसलिए भारत एक आयातक देश से दुनिया का एक प्रमुख खाद्य निर्यातक बन गया है।</p>
<p>अंत में, भारी मन से मैं भारत के नीति निर्माताओं द्वारा उन्हें हमारे सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित करने का अवसर चूक जाने पर पूरे कृषि वैज्ञानिक समुदाय की इच्छा को प्रतिबिंबित करते हुए उन्हें भारत रत्न देने की मांग करता हूं। उनके प्रति हमारी यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी। डॉ. एमएस स्वामीनाथन की मृत्यु से भारत ने एक महान सपूत खो दिया। उनकी उपलब्धियां युवा पीढ़ी को भारतीय कृषि के बेहतर भविष्य के प्रयास करने के लिए प्रेरित करती रहेंगी। पूरा कृषि वैज्ञानिक समुदाय उनके निधन पर शोक व्यक्त कर रहा है और हम उनकी महान आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं।</p>
<p><em><strong>(</strong></em><em><strong>लेखक पद्म भूषण से सम्मानित</strong></em><em><strong>, </strong></em><em><strong>आईसीएआर के पूर्व डायरेक्टर जनरल</strong></em><em><strong>, </strong></em><em><strong>कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के पूर्व सचिव और इंडियन साइंस कांग्रेस के पूर्व प्रेसिडेंट हैं)</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ डॉ. एमएस स्वामीनाथन को ‘भारत रत्न’ देना ही होगी उनको सच्ची श्रद्धांजलि ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[खाद्य सुरक्षा में आत्मनिर्भर बनाने वाले डॉ. एम एस स्वामीनाथन का देश हमेशा ऋणी रहेगा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/the-country-will-always-be-indebted-to-dr-swaminathan-who-made-the-country-self-reliant-in-food-security.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 28 Sep 2023 18:05:45 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/the-country-will-always-be-indebted-to-dr-swaminathan-who-made-the-country-self-reliant-in-food-security.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत की 'हरित क्रांति' के शिल्पकारों में से एक डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन का उम्र संबंधी समस्याओं के कारण 98 वर्ष की आयु में 28 सितंबर को चेन्नई में निधन हो गया। बहुआयामी व्यक्तित्व वाले डॉ. मनकोम्बु संबासिवन स्वामीनाथन ने आजादी के बाद भारतीय कृषि क्षेत्र के समग्र विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1987 में उन्हें पहला विश्व खाद्य पुरस्कार मिला जिसे कृषि क्षेत्र में 'नोबेल पुरस्कार' के समकक्ष माना जाता है। भारत सरकार ने भी उन्हें उनके योगदान के लिए पद्म विभूषण पुरस्कार से सम्मानित किया।</p>
<p>विश्व प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक रहे डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन ने तीन दशक पहले चेन्नई में &nbsp;डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन की स्थापना की थी। उनके परिवार में तीन बेटियां- मधुरा, नित्या और सौम्या हैं। पत्नी मीना की पहले ही मृत्यु हो चुकी है। संयोग से डॉ. सौम्या स्वामीनाथन कोविड-19 महामारी के महत्वपूर्ण चरण के दौरान विश्व स्वास्थ्य संगठन की मुख्य वैज्ञानिक थीं और उन्होंने इसका मुकाबला करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।</p>
<p>देश में ज्यादा पैदावार वाली गैहूं और चावल की किस्मों के विकास को बढ़ावा देने के अलावा डॉ. स्वामीनाथन ने कृषि अनुसंधान, विस्तार और प्रयोगशाला से खेत तक की अवधारणा को स्थापित करने और मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों के नेटवर्क में इन उपायों ने दशकों से बढ़ती खाद्य जरूरतों को पूरा करने के लिए भारतीय कृषि को अच्छी स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया।</p>
<p>संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) ने पर्यावरण के प्रति उनकी चिंताओं के लिए उन्हें 'आर्थिक पारिस्थितिकी का जनक' कहा। उन्होंने 1960 और 1970 के दशक के दौरान चावल और गेहूं की ज्यादा पैदावार वाली किस्मों को विकसित करने और उनको किसानों तक पहुंचाने के कार्यक्रमों का नेतृत्व किया था। उस समय भारत मुश्किल खाद्य स्थिति से जूझ रहा था और भोजन की समस्या बहुत विकट थी। इस चुनौती से निपटने के लिए भारत सरकार ने तत्कालीन कृषि मंत्री सी. सुब्रमण्यन के नेतृत्व में डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन, डॉ. डी.एस. अटवाल,नोबल पुरस्कार विजेता कृषि वैज्ञानिक डॉ. नॉर्मन बोरलॉग और अन्य भारतीय कृषि वैज्ञानिकों का एक समर्पित दल तैयार किया। पीएल-480 के जरिये अमेरिका की सहायता से उन्होंने 1960 के दशक के अंत में संगठित रणनीति को अमलीजामा पहनाया जिसे 'हरित क्रांति' का नाम दिया गया। इसने देश को संभावित अकाल से बाहर निकाला और अगले कुछ दशकों में देश की खाद्य आत्मनिर्भरता को आगे बढ़ाया। वर्ष 2000 के बाद से भारत कई कृषि उत्पादों का बड़ा निर्यातक है जो इस उल्लेखनीय प्रयास का प्रमाण है।</p>
<p>7 अगस्त, 1925 को तमिलनाडु के कुंभकोणम जिले में एक मध्यवर्गीय परिवार में जन्मे डॉ. स्वामीनाथन 1940 के दशक की शुरुआत में बंगाल के अकाल की भयावहता से प्रभावित हुए थे। माता-पिता की डॉक्टर बनने की इच्छा के विपरीत वह खेती की ओर आकर्षित हुए।</p>
<p>भारत की हरित क्रांति के वास्तुकारों में से एक डॉ. स्वामीनाथन से 1983 में मेरी पहली मुलाकात हुई थी। तब मैं प्रशिक्षु के रूप में न्यूज एजेंसी पीटीआई से जुड़ा था। पीटीआई ज्वॉइन करने के कुछ ही हफ्तों बाद अप्रैल 1983 में उनसे मुलाकात हुई थी। दिलचस्प बात यह है कि डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन पहले शीर्ष वैज्ञानिक थे जिनका इंटरव्यू लेने का मौका मुझे करियर की शुरुआत में ही मिल गया था। मैं उनकी आसानी से उपलब्धता, संचार कौशल और सरल शैली में समझाने की क्षमता से प्रभावित हुआ था। इससे मुझे भी एक अच्छी स्टोरी मिल गई थी।</p>
<p>अगले तीन दशकों में अनगिनत मौकों पर उनसे मुलाकात हुई और&nbsp; मैने उन्हें कवर किया। डॉ. स्वामीनाथन को 40 से अधिक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं। कुछ साल पहले 93 वर्ष की आयु में उन्हें भारतीय खाद्य एवं कृषि परिषद द्वारा स्थापित प्रथम विश्व कृषि पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। दुनिया में शायद ही कोई ऐसा पुरस्कार हो जो डॉ. स्वामीनाथन को न मिला हो। रमन मैग्सेसे पुरस्कार और अल्बर्ट आइंस्टीन पुरस्कार उनकी अन्य उल्लेखनीय उपलब्धियां हैं।</p>
<p>पिछले 50 वर्षों में भारत की सभी कृषि नीतियों पर उनकी छाप दिखती है। भारतीय कृषि की दिशा पर उन्होंने अनगिनत रिपोर्टें लिखीं और कई समितियों की उन्होंने अध्यक्षता की। कई राज्य सरकारों ने उन्हें अपना सलाहकार बनाया। वह हमेशा एक फील्ड मैन थे जो वैज्ञानिकों का नेतृत्व करते थे और सर्वोत्तम प्रथाओं को लागू करने और सीखने के लिए खेतों में किसानों का अनुसरण करते थे।</p>
<p>डॉ. स्वामीनाथन वैश्विक कृषि क्षेत्र में भी एक अग्रणी व्यक्ति थे। वह फिलीपींस के मनीला स्थित अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (आईआरआरआई) के निदेशक बने। उन्होंने कई भारतीय वैज्ञानिकों के लिए भी उस संस्थान से जुड़ने का मार्ग प्रशस्त किया। उन्हें अंतर्राष्ट्रीय कृषि नेटवर्क और संस्थानों से कई वैश्विक सहयोग और आर्थिक सहयोग मिले। चेन्नई स्थित उनका एमएस स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन सरकार और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से मिले आर्थिक सहयोग की बदौलत आकार, गतिविधि और पहुंच में काफी आगे बढ़ गया है। ग्रामीण, आदिवासी और वंचित क्षेत्रों में, विशेष रूप से खेती और पारिस्थितिक चिंताओं के साथ आजीविका में इस फाउंडेशन के योगदान की व्यापक रूप से सराहना की जाती है।</p>
<p>डॉ. स्वामीनाथन का विवादों से भी गहरा नाता रहा है। आनुवंशिक अनुसंधान पर उनके विचारों पर मिश्रित प्रतिक्रियाएं देखने को मिली। उनके नेतृत्व में आईसीएआर और आईएआरआई में कठिन समय के दौरान युवा कृषि वैज्ञानिकों के बीच कुछ समय के लिए निराशा सामने आई। कृषि भूमि पर हरित क्रांति का नकारात्मक प्रभाव, विशेष रूप से इंडो-गंगेटिक क्षेत्र में रसायनों के ज्यादा इस्तेमाल का असर होने और इसकी वजह से भूमि की उर्वरता में कमी ने उन्हें आलोचना के केंद्र में ला दिया। सर्वोत्तम अनुसंधान अद्यतनों से लैस होने चलते डॉ. स्वामीनाथन ने पर्यावरण की रक्षा की अंतर्निहित जिम्मेदारी के साथ टिकाऊ कृषि को सुनिश्चित करने के लिए 'सदाबहार क्रांति' शब्द को गढ़ा।</p>
<p>डॉ. स्वामीनाथन के विचारों को भारतीय और वैश्विक वैज्ञानिक जगत में दशकों तक भारी महत्व और सम्मान मिला। 1990 के दशक के मध्य में उनके प्रभाव ने यह सुनिश्चित किया कि कृषि अनुसंधान और शिक्षा विभागों का नेतृत्व पेशेवर कृषि विशेषज्ञों द्वारा किया जाए, न कि नौकरशाहों द्वारा। मामला आईसीएआर (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद) के तत्कालीन महानिदेशक डॉ. आरएस परोदा का था जो आरोपों के घेरे में आ गए थे। यह डॉ. स्वामीनाथन का ही हस्तक्षेप था जिसने आईसीएआर प्रणाली और डॉ. परोदा की प्रतिष्ठा को बरकरार रखने में मदद की।&nbsp;</p>
<p>अपनी महान उपलब्धियों के बावजूद डॉ. एमएस स्वामीनाथन हमेशा विनम्र और आसानी से उपलब्ध रहे। उन्होंने मीडिया में योगदान देकर और देश और दुनिया भर में अक्सर व्याख्यान देकर अपने लेखन और संचार कौशल का प्रभावी उपयोग किया।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ खाद्य सुरक्षा में आत्मनिर्भर बनाने वाले डॉ. एम एस स्वामीनाथन का देश हमेशा ऋणी रहेगा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[जमीन हो या अंतरिक्ष, वैज्ञानिक इनोवेशन अति आवश्यक]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/no-success-on-land-or-space-without-scientific-innovations.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 24 Sep 2023 12:03:26 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/no-success-on-land-or-space-without-scientific-innovations.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">चांद पर चंद्रयान-3 उतारने में भारत की सफलता ने हमारा सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है। ऐसी ही सफलता 1960 के दशक के उत्तरार्ध में मिली थी जब हरित क्रांति के जरिए हमारी बढ़ती आबादी के लिए खाद्य की मांग पूरी की गई। उन दिनों हर साल लगभग एक करोड़ टन गेहूं का आयात अमेरिका से (पीएल 480 के तहत) किया जाता था। आज जब हमारी आबादी 4.5 गुना (143 करोड़) हो गई है और चीन को पीछे छोड़ते हुए हम दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाला देश बन गए हैं, तो हमारा खाद्यान्न उत्पादन भी 6.5 गुना बढ़कर 33.05 करोड़ टन हो गया है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">हमारा बफर स्टॉक एक दशक से भी ज्यादा समय से 5 से 7 करोड़ टन के बीच बना हुआ है। कोविड-19 महामारी और रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण खाद्य सुरक्षा को लेकर दुनिया भर में चिंता बढ़ी है। इन समस्याओं से पहले दुनिया के 80 करोड़ लोगों के लिए खाद्य असुरक्षा थी, जिसमें इन समस्याओं ने 15.7 करोड़ का इजाफा किया है। लेकिन इसके विपरीत भारत अनाज के मामले में आत्मनिर्भर है और अपनी खाद्य ज़रूरतें खुद पूरी करता है। इसके लिए हमारे कृषि वैज्ञानिक, एक्सटेंशन कर्मी और किसान बधाई के पात्र हैं। यह हमारी मजबूत राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली (एनएआरएस) के कारण संभव हो सका है। भारत आज दूध, दाल, जीरा, ग्वार, केला इत्यादि का सबसे बड़ा और चावल, गेहूं, फल, सब्जियों तथा कपास का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक बन गया है। इस प्रगति के कारण हमारा सालाना कृषि निर्यात 55 अरब डॉलर तक पहुंच गया है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">जाहिर है कि अंतरिक्ष या जमीन पर इस तरह की उपलब्धियां वैज्ञानिक उत्कृष्टता के साथ नीतिगत समर्थन और राजनीतिक इच्छा शक्ति, आईसीएआर, इसरो, सीएसआईआर जैसे संस्थानों, मानव संसाधन और पार्टनरशिप के कारण संभव हो पाई है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इन उपलब्धियों के बावजूद अब भी कुछ कमियां हैं जिनके लिए हमें आयात पर निर्भर रहना पड़ता है। वित्त वर्ष 2022-23 में भारत ने 1,67,200 करोड़ रुपए के 135.4 लाख टन वनस्पति तेल और 15780.73 करोड़ रुपए की 25.2 लाख टन दालों का आयात किया, ताकि घरेलू मांग पूरी की जा सके। दलहन और तिलहन में हमारी औसत यील्ड विश्व औसत से कम है। देश में दालों और तिलहन की उत्पादकता और उत्पादन बढ़ाना एक प्रमुख चुनौती है, जिस पर हमें तत्काल ध्यान देना चाहिए। उत्पादन और उत्पादकता दोनों बढ़ाने के लिए जेनेटिक मोडिफिकेशन ऐसा इनोवेशन है जिसे दुनिया भर में 30 से अधिक फसलों में सफलतापूर्वक प्रयोग किया गया है। किसानों के खेत में पहली जीएम फसल 1996 में उगाई गई। इस समय जीएम मक्का, सोयाबीन, कनोला, कपास तथा अन्य फसलों की 29 देशों में 20 करोड़ हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में खेती की जाती है। भारत में बीटी कपास की खेती होती है। अभी तक इसके पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर किसी विपरीत प्रभाव की रिपोर्ट नहीं आई है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">वर्ष 2002 में सरकार की दूरदर्शिता और साहसिक नीतिगत निर्णय का नतीजा है कि हम बीटी कपास की किस्म जारी कर सके, ताकि किसान उत्पादन बढ़ा सकें और कीटनाशकों का प्रयोग कम कर सकें। उस समय कृषि में जितने कीटनाशकों का इस्तेमाल होता था उसका लगभग 50% कपास में जाता था। बीटी कपास के कारण ही भारत में फाइबर क्रांति हुई। हम न सिर्फ कपास के दूसरे सबसे बड़े उत्पादक बने, बल्कि हमने प्रमुख निर्यातक का दर्जा भी हासिल किया। इस टेक्नोलॉजी के कारण ही हम कपास की खेती का क्षेत्रफल 80 लाख हेक्टेयर से बढ़ाकर 120 लाख हेक्टेयर तक ले जा सके, कपास का उत्पादन लगभग तीन गुना और प्रति हेक्टेयर उत्पादकता दोगुना हो गई। कीटनाशकों का प्रयोग भी लगभग 40 प्रतिशत कम हो गया। इसका परिणाम यह हुआ कि ज्यादातर छोटे किसानों की आय बढ़ी तथा उन्होंने टेक्नोलॉजी को सहर्ष अपनाया। यह उन लोगों के संदेहों के विपरीत था जो जीएम का विरोध करते हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">दुर्भाग्यवश जीएम फसलों का विरोध करने वालों ने ऐसे निराधार तथ्य पेश किए जो अन्य जेनेटिकली मोडिफाइड खाद्य फसलों को अपनाने में बड़ी बाधा बन गये। इसलिए किसान मक्का, सोयाबीन, सरसों, बैंगन जैसी फसलों की उत्पादकता और उत्पादन नहीं बढ़ा सके। यहां यह बताना प्रासंगिक होगा कि दुनिया में अनेक वैज्ञानिक अकादमिक संस्थानों ने जीएम टेक्नोलॉजी की गहन समीक्षा के बाद जीएम फसलों को जारी किया है। इनमें अमेरिका की नेशनल एकेडमी ऑफ़ साइंसेज, द अमेरिकन एसोसिएशन फॉर द एडवांसमेंट ऑफ साइंस, द रॉयल सोसाइटी लंदन, द अफ्रीकन एकेडमी ऑफ़ साइंसेज, यूरोपियन एकेडमीज साइंस एडवाइजरी काउंसिल, अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन, यूनियन ऑफ जर्मन एकेडमिक्स ऑफ़ साइंस एंड ह्यूमैनिटीज शामिल हैं। ये सब अकादमी इस निष्कर्ष पर पहुंची हैं कि जीएम फसलों का जारी किया जाना मानव और पर्यावरण सबके लिए सुरक्षित है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">वर्ष 2019 में करंट साइंस में प्रकाशित एक लेख में भारत के प्रतिष्ठित कृषि वैज्ञानिकों ने भी इस बात का उल्लेख किया था कि उत्पादकता को बरकरार रखने में चुनौतियां आएंगी, इन चुनौतियों से निपटने के लिए वैज्ञानिकों की उचित संसाधनों तक पहुंच होनी चाहिए और उन्हें नए समाधन लेकर आने चाहिए। सौभाग्यवश भारत की रेगुलेटरी संस्थाएं मूल्यांकन के लिए सबसे सख्त प्रोटोकॉल का पालन करती हैं। वैज्ञानिक जब नई टेक्नोलॉजी विकसित करते हैं तो विशेषज्ञों को सख्त रेगुलेटरी व्यवस्था के जरिए मूल्यांकन करने की जरूरत है ताकि नए जेनेटिकली मोडिफाइड इनोवेशन और उन्हें रिलीज करने पर जल्दी नीतिगत फैसला लिया जा सके। चाहे वह बाहर से जीन ट्रांसफर पर आधारित हो, अथवा पौधों में मौजूद जीन में बदलाव पर आधारित। वर्ष 2018 में 129 नोबेल पुरस्कार से सम्मानित वैज्ञानिकों ने &lsquo;ग्रीन पार्टीज&rsquo; को समझाने के लिए एक अभियान चलाया गया था उसमें बताया गया कि जीएमओ सुरक्षित हैं और विकासशील विश्व में खाद्य और पोषण की सुरक्षा के लिए इनका समर्थन किया जाना चाहिए।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">दुर्भाग्यवश भारत में पिछली सरकार ने करीब 10 साल पहले नई जीएम फसलों पर रोक लगा दी थी। हालांकि पर्यावरण, वन एवं जलवायु मंत्रालय ने 18 अक्टूबर 2022 को एक साहसिक फैसला लिया। जीईएसी की सिफारिश के आधार पर इसने सरसों के ट्रांसजेनिक हाइब्रिड डीएमएच-11 और इसकी पैरेंटल लाइंस को जारी करने का निर्णय लिया। दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर जेनेटिक मैनिपुलेशन ऑफ़ क्रॉप प्लांट्स के वैज्ञानिकों ने इसे भारत में ही विकसित किया है। इसमें तीन ट्रांसजीन का प्रयोग किया गया है। पहला है बार जीन जो पौधे को खरपतवार रोधी बनता है, दूसरा है बार्नेस जो पौधों में मौजूद पुरुष जींस को स्टेराइल बनाता है और तीसरा है बारस्टार जो फर्टिलिटी रेस्टोरेशन का काम करता है। यह जीन कनाडा में रेपसीड में पहले ही इस्तेमाल किए जा रहे हैं। सच तो यह है कि कनाडा में 1996, अमेरिका में 2002 और ऑस्ट्रेलिया में 2003 से जीएम रेपसीड हाइब्रिड की खेती की जा रही है। इससे पर्यावरण अथवा मनुष्य के स्वास्थ्य पर किसी नकारात्मक प्रभाव की रिपोर्ट नहीं आई है। इस तरह देखें तो हम इस अत्यधिक क्षमता वाली टेक्नोलॉजी के फायदे उठाने में दो दशक पीछे हैं। दूसरी तरफ, हम अपनी जरूरत पूरी करने के लिए कनाडा से लंबे समय से जीएम आधारित कनोला तेल का आयात कर रहे हैं। तिलहन के मामले में आत्मनिर्भर बनने के लिए जीएम सरसों को जारी किया जाना देश में हमारे प्लांट ब्रीडर द्वारा नई हाइब्रिड किस्में विकसित करने का रास्ता तैयार करता है। इससे उत्पादन और उत्पादकता दोनों में वृद्धि हो सकती है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">हमने 2030 तक के लिए जो सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) निर्धारित किए हैं उनमें दो महत्वपूर्ण हैं जीरो हंगर यानी कोई भूखा ना रहे और सबके लिए अच्छी सेहत। इसे हासिल करने में हमारे सामने गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले करीब 20 करोड़ लोगों और 5 साल से कम उम्र के लगभग 43 लाख कुपोषित बच्चों को पोषक आहार उपलब्ध कराने की चुनौती है। इसके अलावा जमीन, पानी, हवा और कृषि जैव विविधता जैसे घटते प्राकृतिक संसाधनों, वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर जलवायु परिवर्तन के विपरीत प्रभाव, तापमान में वृद्धि और बाढ़ तथा सूखा की बढ़ती फ्रीक्वेंसी जैसी चुनौतियों से भी प्रभावी तरीके से निपटने की जरूरत है। जेनेटिकली मोडिफाइड मक्का और सोयाबीन जैसी जीएम फसलों की खेती निश्चित रूप से राष्ट्रीय स्तर पर इन चिंताओं को दूर करने में मददगार साबित होगी। इससे आमदनी बढ़ने के साथ गरीबी में भी कमी आएगी। इसलिए हमें व्यापक राष्ट्रीय हित में नई प्रौद्योगिकीय तकनीकों को अपनाने और सरकारी-निजी साझेदारी का वातावरण तैयार करने के लिए आक्रामक रवैया अपनाने की जरूरत है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">उम्मीद है कि तिलहन के मामले में आत्मनिर्भर बनने और मेक इन इंडिया टेक्नोलॉजी को प्रमोट करने के सरकार के लक्ष्य को सुप्रीम कोर्ट सही ठहराएगा। सार्वजनिक प्रणाली में विकसित टेक्नोलॉजी देश को आत्मनिर्भर बनाने में मददगार होगी। हमारा मुख्य लक्ष्य यह होना चाहिए कि कोई भी नागरिक भूखा ने सोये और कोई भी गरीबी रेखा से नीचे ना रहे। वर्ष 2030 तक सतत विकास के इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए समय तेजी से निकलता जा रहा है। जीएम सरसों टेक्नोलॉजी का किसानों के खेतों में मौजूदा सीजन में ही व्यापक परीक्षण किया जाना चाहिए। इसमें देरी का मतलब है और एक साल गंवा देना। हमारे सामने घरेलू मांग पूरी करने के लिए दो विकल्प हैं- या तो अधिक कीमत पर तेल का आयात किया जाए या देश में ही हम उत्पादन बढ़ाकर हम अपनी जरूरत पूरी करें।</span></p>
<p><strong><em>(लेखक पद्म भूषण से सम्मानित, आईसीएआर के पूर्व डायरेक्टर जनरल, कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के पूर्व सचिव और इंडियन साइंस कांग्रेस के पूर्व प्रेसिडेंट हैं)</em></strong></p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ जमीन हो या अंतरिक्ष, वैज्ञानिक इनोवेशन अति आवश्यक ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[वैश्विक सेब उत्पादकों के लिए भारत आकर्षक बाजार, घरेलू किसानों को सुरक्षा की जरूरत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/india-offers-a-juicy-market-for-global-apple-growers-domestic-farmers-need-protection.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 15 Sep 2023 08:39:24 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/india-offers-a-juicy-market-for-global-apple-growers-domestic-farmers-need-protection.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>हिमाचल प्रदेश के एप्पल फार्मर्स फेडरेशन के कन्वेनर सोहन ठाकुर के मुताबिक, &ldquo;दिसंबर-जनवरी में बर्फबारी नहीं होने और मार्च-अप्रैल में बारिश होने की वजह से सेब उत्पादकों, खासकर हिमाचल प्रदेश में उत्पादन का काफी नुकसान हुआ है। मौसम में इस बदलाव से सिर्फ 40 फीसदी ही उत्पादन हो पाया है।&rdquo; &nbsp;</p>
<p>ऐसे परिदृश्य में घरेलू आपूर्ति में कमी के कारण सेब की कीमतों में तेज वृद्धि होनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा हुआ क्या? बिल्कुल नहीं, क्योंकि एक या दो नहीं बल्कि दो दर्जन से अधिक देशों से होने वाला सेब का आयात इस कमी को पूरा करने के लिए तैयार था। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इनमें से कई देशों ने वित्त वर्ष 2022-23 में लगभग 30 करोड़ अमरिकी डॉलर (लगभग 2500 करोड़ रुपये) मूल्य का सेब भारत को निर्यात किया।</p>
<p>दिल्ली की आजादपुर थोक मंडी में सामान्य किस्म की सेब की कीमत 14 सितंबर को 4,925 रुपये प्रति क्विंटल रही। प्रीमियम किस्म की कीमत 100 रुपये प्रति किलो तक है। यह थोक मंडी की दरें हैं। इससे भ्रमित न हों कि यह कीमत उत्पादकों को मिल रही है। वास्तव में सेब किसानों को मिलने वाली कीमत इससे बहुत कम है। सोहन ठाकुर कहते हैं, ''इसमें कोई संदेह नहीं है कि कीमतों में गिरावट बढ़ते आयात के कारण है।'' उन्होंने इस बात पर भी चिंता जताई कि बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों को निर्यात पर भी विभिन्न प्रकार की बाधाएं हैं।</p>
<p>सेब उत्पादकों को उत्पादन में घाटा हुआ लेकिन आयात के कारण उन्हें बेहतर कीमत नहीं मिल पाई। उत्पादकों के लिए सिर्फ यही प्रतिकूल स्थिति नहीं है, बल्कि केंद्र सरकार ने अमेरिका से सेब के आयात पर अतिरिक्त 20 फीसदी शुल्क को भी हटाने की घोषणा कर दी है। 2019 में अमेरिका के साथ हुए एक विवाद के निपटारे के तहत यह शुल्क हटाया गया है। एक समझौता के तहत ऐसा किया गया है जिसमें भारतीय इस्पात पर अमेरिका द्वारा आयात प्रतिबंध हटाना शामिल था, जबकि भारत ने सेब आयात पर लगाए गए अतिरिक्त शुल्क को हटा दिया।</p>
<p>इस मुद्दे ने राजनीतिक रंग ले लिया क्योंकि यह फैसला जी20 शिखर सम्मेलन के लिए &nbsp;अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के भारत आने से कुछ ही दिन पहले हुआ था। कांग्रेस ने इसे किसानों के लिए निराशाजनक बताया, तो वाणिज्य मंत्रालय ने तकनीकी बातें साझा करते हुए जवाब दिया। सरकार का दावा है कि 20 फीसदी अतिरिक्त शुल्क हटाने से घरेलू उत्पादकों पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा, बल्कि इसके परिणामस्वरूप सेब, अखरोट और बादाम के प्रीमियम बाजार में प्रतिस्पर्धा होगी और घरेलू उपभोक्ताओं के लिए प्रतिस्पर्धी कीमतों पर बेहतर गुणवत्ता सुनिश्चित होगी।</p>
<p>इसके अलावा, सरकार ने बताया कि अमेरिका से आयात पर अतिरिक्त शुल्क हटाने का कदम कैसे अमेरिकियों के लिए तुर्की, न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसे कई अन्य देशों की तरह निर्यात करना एक जैसा हो गया है। &nbsp;एक बात तो स्पष्ट है कि फलों का भारतीय बाजार कई देशों के लिए पर्याप्त रूप से रसदार है। इसलिए, मकसद केवल अमेरिकी सेब उत्पादकों को अतिरिक्त बाजार पहुंच प्रदान करना नहीं है, बल्कि चुनावी वर्ष में खुदरा महंगाई (जो लगभग 7 फीसदी के करीब है) को नियंत्रण में रखना भी है। मगर किसानों का सवाल है कि ऐसा किसकी कीमत पर किया जा रहा है?</p>
<p>ऐसा लगता नहीं है कि सरकार के पास बहुत अधिक विकल्प हैं, लेकिन कोल्ड स्टोरेज और नियंत्रित वातावरण सुविधाओं की स्थापना में बड़े निवेश की घोषणा निश्चित रूप से सेब उत्पादकों के लिए मददगार साबित हो सकती है। भारतीय बागवानी को बुनियादी ढांचे की गुणवत्ता के साथ-साथ फसल पद्धतियों के मामले में भी आधुनिक बनाना होगा। वैश्विक प्रतिस्पर्धा के हमले का सामना करने के लिए किसानों को केंद्र और राज्यों दोनों की सरकारों द्वारा उदार सब्सिडी की भी जरूरत है।</p>
<p><em><strong>(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये विचार उनके निजी हैं।)</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ वैश्विक सेब उत्पादकों के लिए भारत आकर्षक बाजार, घरेलू किसानों को सुरक्षा की जरूरत ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[प्याज पर निर्यात शुल्क से किसानों एवं व्यापारियों की बढ़ी मुश्किलें]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/duty-on-onion-exports-leaves-pungent-taste-with-onion-growers-traders.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 31 Aug 2023 07:03:03 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/duty-on-onion-exports-leaves-pungent-taste-with-onion-growers-traders.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>केंद्र सरकार द्वारा प्याज पर 40 फीसदी निर्यात शुल्क लगाए जाने पर महाराष्ट्र में प्याज उत्पादकों और व्यापारियों ने विरोध शुरू कर दिया। व्यापारियों ने जहां कृषि उपज मंडियों में प्याज की नीलामी रोक दी, वहीं आंदोलनकारी किसानों ने जगह-जगह सड़कें जाम कर दी। करीब दो-तीन साल बाद प्याज किसानों को उनकी उपज के वाजिब दाम मिलने लगे थे। इस साल रबी की प्याज की कटाई से पहले बेमौसम भारी बारिश के कारण फसल खराब हो गई &nbsp;और प्याज की बड़ी मात्रा भंडारण योग्य नहीं रह गई। इस कारण किसानों को उस समय कम दाम पर प्याज बेचना पड़ा।</p>
<p>इस महीने जब प्याज के दाम बढ़ने लगे और भंडारित स्टॉक की बेहतर कीमत मिलने की उम्मीद बढ़ी तो केंद्र सरकार ने जल्दबाजी में फैसला लेते हुए निर्यात शुल्क बढ़ा दिया। जो प्याज 2500-3000 रुपये प्रति क्विंटल बिक रहा था, निर्यात शुल्क लगाए जाने के बाद वह गिरकर 1700-1800 रुपये प्रति क्विंटल पर आ गया। इससे किसानों में असंतोष भड़कना स्वाभाविक था क्योंकि इसकी वजह से किसानों के कई काम और सपने ध्वस्त हो गए, जैसे कर्ज चुकाना, बेटी की शादी, बच्चों की पढ़ाई, घर का काम-काज आदि प्याज की अच्छी कीमत मिलने से ही पूरा होना था। नासिक जिले के हजारों किसानों की कृषि भूमि बैंकों द्वारा कर्ज वसूली के लिए नीलाम होने की कगार पर है। केंद्र सरकार की उपभोक्ताओं के हित में और किसानों की शोषणकारी नीति के कारण ऐसा हो रहा है।</p>
<p>भारत दुनिया का सबसे बड़ा प्याज निर्यातक देश है। भारत ने कई बार प्याज की घरेलू कीमतों को नियंत्रित करने के लिए इसी तरह से अचानक निर्यात पर प्रतिबंध लगाए हैं या न्यूनतम निर्यात मूल्य तय किया है या फिर निर्यात शुल्क लगाया है। अचानक लिए गए ऐसे फैसलों के कारण निर्यातक अपनी पिछली प्रतिबद्धताओं को पूरा नहीं कर पाते। बंदरगाहों पर या देश की सीमाओं पर निर्यात के लिए भेजे गए प्याज के वाहन फंस जाते हैं, रास्ते में प्याज सड़ जाता है और इससे लागत बहुत बढ़ जाती है।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/08/image_750x_64e348d8041f0.jpg" alt="" /></p>
<p>प्याज को निर्यात के लिए वातानुकूलित कंटेनरों में बंदरगाहों पर भेजना पड़ता है। अचानक लिए गए ऐसे फैसलों से बंदरगाहों पर कंटेनर को ठंडा रखने के लिए बिजली की लागत बढ़ जाती है जो रोजाना 5,000-6,000 रुपये है। इसके अलावा, ट्रक के लिए प्रत्येक दिन 10,000 रुपये अतिरिक्त देने पड़ते हैं क्योंकि उसे कई दिनों तक इंतजार करते रहना पड़ता है। इस बार व्यापारियों ने अपनी जेब से 40 फीसदी शुल्क चुकाकर प्याज निर्यात किया। फिर भी खेप लोड करने की अनुमति के इंतजार में बंदरगाहों पर 800 टन प्याज खराब हो गया। प्याज व्यापारी किसानों को कम कीमत देकर अपने घाटे की तो भरपाई कर लेंगे और अंततः किसानों को ही नुकसान उठाना पड़ेगा।</p>
<p>जिस दिन निर्यात शुल्क में वृद्धि की घोषणा की गई उस दिन पुणे में प्याज की खुदरा कीमत 35 रुपये प्रति किलो थी। यह दर बहुत ज्यादा नहीं है लेकिन मीडिया द्वारा शुरू किए गए आकलन ''टमाटर के बाद अब प्याज भी आम लोगों को रुलाएगा'' से सरकार घबरा गई &nbsp;जिसके चलते यह फैसला लेना पड़ा।</p>
<p>2020 के तीन कृषि कानून पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त समिति में मैं भी था। समिति में काम करते समय प्याज के आंकड़ों को देखते हुए यह पता चला कि एक किलो प्याज के लिए उपभोक्ताओं द्वारा चुकाई गई रकम का केवल 30 फीसदी (29.60 फीसदी) ही किसानों तक पहुंचता है। उस कृषि कानून में प्याज को आवश्यक वस्तुओं की सूची से बाहर कर दिया गया था लेकिन उसमें एक क्लॉज था कि अगर कीमत 100 फीसदी बढ़ गई तो प्याज को फिर से आवश्यक वस्तुओं की सूची में शामिल कर लिया जाएगा और सभी प्रतिबंध दोबारा लगा दिए जाएंगे। उसमें प्रावधान था कि कीमतों में वृद्धि की गणना के लिए पिछले पांच वर्षों के प्याज के खुदरा बिक्री मूल्य के औसत मूल्य को ध्यान में रखा जाएगा।</p>
<p>खाद्य और उपभोक्ता मामले मंत्रालय के अधिकारी जब समिति के समक्ष चर्चा करने आए, तो मैंने पूछा कि पिछले पांच वर्षों में प्याज का औसत बिक्री मूल्य क्या है? उन्होंने कहा 25 रुपये प्रति किलो। इसका 30 फीसदी यानी आठ रुपये ही किसान को मिलेंगे!! जबकि प्याज की उत्पादन लागत 20 रुपये प्रति किलो है। उस कानून के प्रावधानों के अनुसार 100 फीसदी वृद्धि यानी यदि कीमत 50 रुपये किलो है तो फिर से निर्यात प्रतिबंध, स्टॉक पर सीमा, न्यूनतम निर्यात मूल्य, निर्यात शुल्क लगाने और आयात आदि किया जा सकेगा।</p>
<p>जब उपभोक्ता प्याज के लिए प्रति किलो 50 रुपये का भुगतान करता है, तो किसान को केवल 16 रुपये मिलते हैं। यह उत्पादन लागत की भरपाई करने के लिए पर्याप्त नहीं है। हमारी समिति ने प्याज को आवश्यक वस्तु अधिनियम से स्थायी रूप से हटाने की सिफारिश की और कहा कि यदि इसे इसमें बरकरार रखना है, तो खुदरा कीमत में 200 फीसदी की वृद्धि होने पर ही इसे फिर से लागू करें। मगर किसानों का दुर्भाग्य है कि सरकार ने हमारी सिफारिश पर ध्यान नहीं दिया और कानून वापस ले लिए गए।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/08/image_750x_64ef36847345e.jpg" alt="" /></p>
<p>प्याज पर निर्यात शुल्क लगाने के विरोध में आंदोलन शुरू होते ही महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़णवीस को पार्टी की छवि बचाने के लिए कदम उठाना पड़ा। वह उस समय जापान गए हुए थे और उन्होंने जापान से ही केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल से संपर्क किया और नेफेड के माध्यम से 2,410 रुपये प्रति क्विंटल की दर पर प्याज खरीदने का फैसला किया। मिनट भर के अंदर जापान से दिल्ली तक संदेश भेज दिया गया, लेकिन एक सप्ताह बीत जाने के बाद भी प्याज खरीद का आदेश दिल्ली से नासिक नहीं पहुंचा। नेफेड द्वारा प्याज की खरीद अभी शुरू नहीं हुई है लेकिन कीमतों में 700-800 रुपये की गिरावट आ चुकी है। आगे भी दाम में गिरावट की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है।</p>
<p>केंद्र सरकार द्वारा कीमत 2410 रुपये प्रति क्विंटल तय करने के पीछे क्या तर्क है यह तो पता नहीं, खासतौर से तब जब खुले बाजार में प्याज उत्पादकों को 30-35 रुपये प्रति किलो कीमत मिलने की संभावना है, लेकिन व्यापारियों को यह संदेश गया कि वे इससे अधिक कीमत पर प्याज न खरीदें। प्याज का खरीद मूल्य घोषित करने का सरकार के पास कोई कारण नहीं था। अगर सरकार लोगों को सस्ता प्याज मुहैया कराना चाहती है तो खुले बाजार से मौजूदा कीमत पर प्याज खरीदना चाहिए था और फिर उसे उस कीमत पर बेचना चाहिए जिस कीमत पर जरूरतमंद लोग खरीद सकें।</p>
<p>इससे साफ है कि सरकार की यह चाल सिर्फ प्याज की कीमतें कम करने के लिए है। यदि सरकार इसे प्याज का एमएसपी कहती है, तो जब खुले बाजार में प्याज का भाव गिरकर 500 रुपये प्रति क्विंटल पर पहुंच जाता है, तो इसे नेफेड के माध्यम से 2410 रुपये प्रति क्विंटल की दर से खरीदा जाना चाहिए। मगर जब कीमतें घटती हैं, तो सरकार खुले बाजार से तत्कालीन दर पर प्याज खरीदती है। नेफेड के जरिये प्याज खरीद में बड़ा घोटाला हुआ है। नेफेड द्वारा प्याज खरीद की जानकारी को अत्यंत गुप्त रखने का और क्या कारण हो सकता है? सरकार सिर्फ निर्यात शुल्क लगाने तक ही नहीं रुकी है, बल्कि अफगानिस्तान से प्याज आयात करने की अनुमति भी व्यापारियों को दे दी है। मगर प्याज आयात करने में व्यापारियों को घाटा होने के कारण बड़ी मात्रा में आयात नहीं हुआ है।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/08/image_750x_64ef361aeeec6.jpg" alt="" /></p>
<p>भारत से कई देशों को प्याज का निर्यात किया जाता है। एक समय प्याज के निर्यात बाजार में भारत की हिस्सेदारी करीब 40 फीसदी थी। सरकार द्वारा अचानक प्याज निर्यात पर रोक लगाने के फैसलों के कारण कई देशों ने भारत से मुंह मोड़ लिया है। अब प्याज निर्यात में भारत की हिस्सेदारी घटकर मात्र 8 फीसदी रह गई है। भारत से सबसे ज्यादा प्याज का निर्यात बांग्लादेश को किया जाता है। कुल प्याज निर्यात में बांग्लादेश की हिस्सेदारी 26 फीसदी है। भारत ने जब अक्टूबर 2020 में अचानक निर्यात पर प्रतिबंध लगाया, तो बांग्लादेश की प्रधानमंत्री ने भारत की सीमा पर खड़े प्याज के ट्रकों को सीमा पार कर बांग्लादेश भेजने का अनुरोध किया, लेकिन भारत सरकार ने इससे साफ इनकार कर दिया गया। इसके बाद बांग्लादेश ने प्याज की जगह भारत से प्याज के बीज आयात किए और अपने किसानों को प्याज उगाने के लिए प्रोत्साहित किया।</p>
<p>इस बार अचानक निर्यात शुल्क लगाए जाने से निर्यात पर एक तरह से प्रतिबंध लग गया है। &nbsp;अब बांग्लादेश ने नौ अन्य देशों से प्याज आयात करने का फैसला किया है। इसका मतलब है कि हम एक प्रमुख आयातक देश को हमेशा के लिए खो देंगे। इससे पहले जब निर्यात पर प्रतिबंध लगाया गया था तो जापान और अमेरिका ने विश्व व्यापार संगठन में भारत की व्यापार नीति की शिकायत की थी। किसी भी देश को अपनी अर्थव्यवस्था को बढ़ाने के लिए विदेशी मुद्रा अर्जित करने की आवश्यकता होती है। क्या हमें प्याज का निर्यात करके डॉलर नहीं मिल रहा है? आज सिर्फ प्याज ही नहीं, उन सभी कृषि उत्पादों पर प्रतिबंध है जिनका भारत निर्यात कर सकता है। चावल, गेहूं, चीनी, तिलहन और कुछ दालों के निर्यात पर सरकार ने प्रतिबंध लगा रखा है, जबकि आयात धड़ल्ले से किया जा रहा है। सरकार का यह फैसला किसानों के लिए घातक है जो अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की साख को खत्म कर देगा।</p>
<p>भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहां सत्ता में बने रहने के लिए चुनाव जीतना पड़ता है। लोगों को सस्ता भोजन चाहिए मगर जब महंगाई बढ़ती है तो विपक्षी दलों को सरकार को घेरने का मौका मिल जाता है। चूंकि हुक्मरान ऐसा नहीं चाहते इसलिए हंगामा शुरू होने से पहले ही कुछ फैसले ले लिए जाते हैं। महंगे प्याज ने सरकारें गिराई हैं लेकिन सस्ते प्याज से कभी सरकारें नहीं गिरी हैं। यदि प्याज के मुद्दे पर किसान संगठित होकर सरकार का विरोध करेंगे तो सरकार किसान विरोधी फैसले लेने से पहले दस बार सोचेगी।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/08/image_750x_64d74777986fd.jpg" alt="" /></p>
<p>अपने विशिष्ट स्वाद के कारण भारतीय प्याज की दुनिया भर में अच्छी मांग है। इसका लाभ उठाते हुए प्याज के साथ-साथ सभी कृषि उत्पादों के आयात-निर्यात को लेकर एक स्पष्ट दीर्घकालिक नीति बनाई जानी चाहिए। इससे भारत को अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्थिरता हासिल करने में मदद मिलेगी। यदि सरकार निर्यात पर प्रतिबंध या स्टॉक लिमिट लगाना चाहती है, यदि घरेलू उपलब्धता में कमी के संकेत हैं, तो सरकार को कम से कम निम्नलिखित काम करना चाहिए:</p>
<p>1) इस संबंध में संबंधित देशों, व्यापारियों और किसानों को कम से कम डेढ़ से दो महीने पहले सूचना दी जानी चाहिए। तत्काल फैसला लागू करने की कवायद को हमेशा के लिए बंद कर देना चाहिए।</p>
<p>2) यदि संभव हो तो सरकार को प्याज के व्यापार में हस्तक्षेप हमेशा के लिए बंद कर देना चाहिए। अगर प्याज की कीमत 200 फीसदी से ज्यादा बढ़ती है तो जरूरत पड़ने पर ही सरकार को हस्तक्षेप करना चाहिए।</p>
<p>3) प्याज की खेती और उत्पादन के बारे में जानकारी इकट्ठा करने की एक विश्वसनीय प्रणाली स्थापित की जानी चाहिए और वह जानकारी व्यापारियों और किसानों को आसानी से उपलब्ध कराई जानी चाहिए।</p>
<p>4) प्याज भंडारण प्रौद्योगिकी में अनुसंधान के लिए प्रोत्साहन और धन उपलब्ध कराया जाना चाहिए।</p>
<p>5) प्याज के प्रसंस्करण और भंडारण के लिए उन्नत तकनीक का उपयोग करने की आवश्यकता है। लोगों को डिहाइड्रेट या स्लाइस्ड और फ्रोजेन प्याज का इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। प्रसंस्करण उद्योग के लिए विदेशी निवेश का स्वागत किया जाना चाहिए तथा इस उद्योग को आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई जानी चाहिए। उपलब्धता में कमी के समय में इस प्रसंस्कृत प्याज का उपयोग किया जा सकता है और किसानों को नुकसान पहुंचाए बिना महंगाई को नियंत्रण में रखा जा सकता है।</p>
<p>प्याज के कारोबार में सरकारी हस्तक्षेप रोकने मात्र से बड़ा फर्क आ सकता है। इसके लिए कृषि वस्तुओं की कीमतों को नियंत्रित करने की नीति लागू करने वाली पार्टियों को सत्ता से हटया जाना चाहिए और उस पार्टी को सत्ता में लाया जाना चाहिए जो कृषि वस्तुओं के व्यापार में किसी भी हस्तक्षेप की गारंटी नहीं देती है।</p>
<p><strong><em>(अनिल घनवत शेतकारी संगठन की राजनीतिक शाखा स्वतंत्र भारत पार्टी के अध्यक्ष हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)</em></strong></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ प्याज पर निर्यात शुल्क से किसानों एवं व्यापारियों की बढ़ी मुश्किलें ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[मजबूत होते अल&amp;#45;नीनो प्रभाव का महंगाई पर असर और बढ़ता राजनीतिक जोखिम]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/strong-el-nino-is-fueling-inflation-and-increasing-political-risk.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 28 Aug 2023 07:29:38 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/strong-el-nino-is-fueling-inflation-and-increasing-political-risk.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>महंगाई और राजनीति के बीच एक सीधा रिश्ता है। महंगाई कम हो तो राजनीतिक जोखिम कम होता है लेकिन महंगाई बढ़ने के साथ ही राजनीतिक जोखिम बढ़ जाता है, खासतौर से चुनावी साल में। इसी तरह अल-नीनो का महंगाई के साथ रिश्ता है। मजबूत होता अल-नीनो प्रभाव महंगाई में बढ़ोतरी का कारण बनता है क्योंकि इसका भारत में मानसून की बारिश पर सीधा असर पड़ता है जो इस साल दिख रहा है। अभी तक के जो हालात हैं उसे देख कर लग रहा है कि इस साल का अगस्त बारिश के आंकड़ों की उपलब्धता के समय से अभी तक का सबसे कम बारिश वाला अगस्त होने वाला है। 27 अगस्त तक इस माह में सामान्य से 30.7 फीसदी कम बारिश हुई है। जिसके चलते देश भर में बारिश 27 अगस्त तक दक्षिण पश्चिम मानसून (जून से सितंबर) की बारिश सामान्य से 7.6 फीसदी कम रह गई है। जिसका सीधा असर केवल खऱीफ सीजन ही नहीं बल्कि रबी सीजन की फसलों के उत्पादन पर भी पड़ेगा। यह स्थिति बढ़ती खाद्य महंगाई के कारण केंद्र की मोदी सरकार के लिए राजनीतिक जोखिम को बढ़ाने वाली साबित हो सकती है। इस साल पांच राज्यों में विधान सभा चुनाव हैं और 2024 के अप्रैल-मई में लोक सभा के चुनाव होने हैं।</p>
<p>अब बात अल-नीनो की। अमेरिकी नेशनल ओशनिक एंड एटमोस्फिरिक एडमिनिस्ट्रेशन (एनओएए) के आंकड़ों के मुताबिक ओशनिक नीनो इंडेक्स (ओएनआई) एक डिग्री पर पहुंच गया है। यह पूर्वी सेंट्रल इक्वेटोरियल पेसिफिक क्षेत्र में समुद्र की सतह के तापमान के सामान्य से अधिक होने के स्तर को दर्शाता है। ओएनआई का एक डिग्री होने का मतलब है कि यह अल-नीनो के प्रभाव के स्तर 0.5 डिग्री से दोगुना है। अप्रैल में ही एनओएए ने अल नीनो के प्रभाव के बढ़ने का आकलन जारी किया था। उस समय रूरल वॉयस ने इस बारे में रिपोर्ट की थी और इसके मानसून पर प्रतिकूल असर का अंदेशा जताया था जो अब सही साबित हो रहा है। एनओएए ने ओएनआई के अक्तबूर से दिसंबर के दौरान 1.5 डिग्री और मार्च-अप्रैल, 2024 में एक डिग्री पर रहने का अनुमान जारी किया है। यानी दक्षिण पश्चिम मानसून को प्रभावित करने के बाद यह दक्षिण पूर्व मानसून पर भी प्रतिकूल असर डाल सकता है। जो देश में रबी सीजन की फसलों के उत्पादन पर भी प्रतिकूल असर डाल सकता है।</p>
<p>दूसरी ओर चालू खरीफ सीजन में फसलों की बुआई का क्षेत्रफल जुलाई में बेहतर बारिश के चलते तेजी से बढ़ा है। लेकिन कुल क्षेत्रफल सामान्य से कम रहा है। साथ ही बाढ़ के चलते पंजाब और हरियाणा में करीब एक लाख हैक्टेयर क्षेत्रफल में धान की दोबारा रोपाई करनी पड़ी है। वहीं दालों का क्षेत्रफल पिछले साल से करीब दस लाख हैक्टेयर कम बना हुआ है। दक्षिणी व पश्चिमी राज्यों में अगस्त माह में कम बारिश के चलते वहां खरीफ की फसलों के उत्पादन पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। दूसरी ओर कम बारिश के चलते 24 अगस्त तक देश भर के 146 रिजरवायर्स में पानी का स्तर पिछले साल से 21.4 फीसदी कम और दस साल के औसत स्तर से 6.1 फीसदी कम है। इस स्थिति के चलते रबी सीजन की फसलों की सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता कम रहेगी। अगर अगले एक माह में बारिश कम रहती है तो महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों को पीने के पानी और सिंचाई के पानी के बीच के बीच संतुलन बनाना होगा।</p>
<p>बारिश में कमी के अलावा सरकार की एक बड़ी चिंता यह है कि दो साल में गेहूं की सरकारी खरीद कम रहने के चलते केंद्रीय पूल में एक अगस्त को खाद्यान्नों का कुल स्टॉक 655 लाख टन था जो पिछले छह साल का सबसे कम स्तर है।</p>
<p>जुलाई में खुदरा महंगाई का स्तर 15 माह में सबसे अधिक रहा और खाद्य महंगाई दर 11.5 फीसदी पर पहुंच गई। यह महंगाई गेहूं, चावल, चीनी, फल, सब्जियों और दालों के दाम बढ़ने के चलते इस स्तर पर पहुंची है।</p>
<p>यही वजह है कि सरकार खाद्य महंगाई पर अंकुश लगाने के लिए ताबड़तोड़ फैसले कर रही है। पिछले साल 13 मई, 2022 को गेहूं के निर्यात पर रोक लगाने से लेकर चीनी के निर्यात को मुक्त से रेस्ट्रिक्टेड सूची में डालने, ब्रोकन राइस के निर्यात पर रोक लगाने और गैर-बासमती व्हाइट राइस पर 20 फीसदी निर्यात शुल्क लगाने के बाद इस साल जून में गेहूं पर स्टॉक लिमिट लागू करना, उसके बाद प्याज के निर्यात पर 40 फीसदी शुल्क लगाने के साथ ही गैर-बासमती व्हाइट राइस के निर्यात पर रोक लगाने के बाद सेला चावल के निर्यात पर 20 फीसदी शुल्क लगाने और बासमती चावल के निर्यात के लिए 1200 डॉलर से अधिक की कीमत की शर्त लागू करने जैसे फैसले लिये ताकि देश से चावल निर्यात पर अंकुश लगाया जा सके। वहीं अरहर और उड़द दालों पर भी स्टॉक लिमिट पहले ही लागू की जा चुकी है। यह सब कदम बताते हैं कि सरकार खाद्य महंगाई के राजनीतिक नुकसान से बचना चाहती है।</p>
<p></p>
<p>महंगाई और राजनीतिक फायदे नुकसान के पुराने अनुभव मोदी सरकार को सचेत कर रहे हैं। केंद्र की यूपीए-दो सरकार के आखिरी दिनों और 2014 के अप्रैल-मई माह में हुए चुनावों की एक साल की अवधि में महंगाई दर का औसत 11.1 फीसदी रहा रहा था। जबकि मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के अंतिम दिनों और अप्रैल-मई 2019 में हुए चुनावों को दौरान एक साल की अवधि में महंगाई दर का औसत स्तर 0.4 फीसदी रहा था। दोनों चुनावों के नतीजे हमारे सामने हैं। जहां 2014 में यूपीए-दो के बाद चुनावों में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए गठबंधन को हार का सामना करना पड़ा। वहीं कमजोर महंगाई दर का 2019 में मोदी के नेतृत्व वाले एनडीए को चुनावी फायदा मिला और उसकी सत्ता में वापसी हुई।</p>
<p>यही वजह है कि तेजी से बढ़ती खाद्य महंगाई के राजनीतिक जोखिम को समझते हुए भारतीय जनता पार्टी के नेतृव वाली केंद्र सरकार खाद्य महंगाई पर अंकुश लगाने के लिए तमाम जरूरी कदम उठाने की कोशिश करती दिख रही है। लेकिन इसमें वह कितनी कामयाब होगी अभी कहना मुश्किल है। इसमें सबसे बड़ी बाधा अन-नीनो के मजबूत होते असर के चलते मानसून पर पड़ रहा प्रतिकूल असर है। अगर खरीफ सीजन में उत्पादन में कमी आती है तो खाद्य महंगाई सबसे बड़ा राजनीतिक जोखिम बन कर उभरेगी क्योंकि जनमानस में महंगाई एक बड़ी समस्या के रूप में दिखने लगी है। &nbsp;&nbsp;</p>
<p>&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ मजबूत होते अल-नीनो प्रभाव का महंगाई पर असर और बढ़ता राजनीतिक जोखिम ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[जलवायु परिवर्तन से हो जाएं सावधान]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/be-careful-of-climate-change.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 15 Aug 2023 07:01:34 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/be-careful-of-climate-change.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>साधारण शब्दों में पर्यावरण एक प्रकार से प्राकृतिक वातावरण का रहवासिय आवरण है, जो सभी प्रकार के जीवों व गैर-जीवों के लिए असीमित व अनमोल जीवन रेखा है। इस आवरण की अनुपातित दिशा, दशा तथा मात्रा का दृश्य व अदृश्य प्रभाव जलवायु पर पड़ता है। भूमंडल के घटकों पर पर्यावरण के नकारात्मक प्रभावों के कारण भूमंडल, वायुमंडल, जलमंडल व जीवमंडल के आदानों व कारकों का विघटन शुरू हो जाता है। प्रकृति के बदलते, बिगड़ते स्वरूप को ही सरल भाषा में जलवायु परिवर्तन कहा जाता है। अतः प्रकृति के प्राकृतिक स्वरूप को जो हमें करोड़ों सालों पूर्व मिला था, उसी रूप में सुरक्षित व संरक्षित करना ही जलवायु प्रबंधन है। दूषित पर्यावरण को लगातार नजरंदाज करते रहना भूमंडल को धधकती आग में झोंक, भस्म कर देने वाले कदम माने जाएंगे।</p>
<p>जलवायु परिवर्तन का प्रभाव पूरे संसार में महसूस किया जा रहा है। स्थानीय स्तर पर यदि इसके प्रभाव का आकलन किया जाए तो इस वर्ष व पूर्व के 2 वर्षों में सभी प्रकार की कृषि पर भारी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। वर्ष 2021 में खरीफ फसलो की बुवाई के बाद 40-50 दिन तक बारिश बिल्कुल नहीं हुई और इसके बाद फसल के पकने तक लगातार बारिश होती रही है। इसलिए फसलों के उगने के बाद और पकने तक फसलें बरबाद हुई। इसके विपरीत वर्ष 2022 में लगभग 25 जून से मध्य अगस्त तक लगातार वर्षा होती रही। फसलों के पौधों की संख्या बहुत अधिक हो गई जिस कारण निराई-गुड़ाई न होने के कारण फसलों को खरपतवार से भारी नुकसान हुआ। कीटों और बीमारियां का भारी प्रभाव रहा और उन पर नियंत्रण नहीं किया जा सका। यह वर्षा की अधिकता का प्रभाव था जिसके कारण क्षेत्रफल बढ़ा मगर उत्पादकता और उत्पादन की गुणवत्ता काफी प्रभावित हुई।</p>
<p>वर्ष 2023 में फरवरी-मार्च में असामयिक वर्षा और आंधी-तूफान का आना जलवायु परिवर्तन की एक बहुत बड़ी घटना थी जिसके कारण रबी की फसलें (गेहूं, सरसों और जीरा) काफी हद तक बर्बाद हुई। 10 मई तक मौसम ठंडा बना रहा और मध्य जुलाई तक लगभग 60% वर्षा हो चुकी थी। ये सारी वातावरणीय घटनाएं बिपरजॉय तूफान से प्रभावित थी जो कि जलवायु परिवर्तन का जीता जागता उदाहरण है। यही कारण है कि इस समय सब्जियों और फलों के दाम आसमान छू रहे हैं और इसका असर अन्य खाद्य पदार्थों पर बड़े स्तर पर पड़ रहा है।</p>
<p>यदि वायुमंडल प्रदूषण की बात करें तो परिणाम बहुत भयावह हैं, मानव जाति की जिंदगी व आर्थिक स्थिति को झकझोरने वाले हैं। वायुमंडल प्रदूषण का एक मुख्य कारण आग लगना है। उदाहरण के तौर पर ऑस्ट्रेलिया में लगी 2019-20 की भयंकर आग कैलिफोर्निया के आधे भाग के बराबर थी। साइंस पत्रिका में प्रकाशित लेख के अनुसार, आग के कारण वायु की गुणवत्ता पर पड़े प्रभाव के कारण अमेरिका में लगभग 4,000 लोगों की मृत्यु हर साल समय पूर्व हो जाती है। इस आग से करीब 36 अरब डॉलर की हानि सालाना आंकी गई है। कनाडा के अल्बर्टा में महीनों तक आग सुलगी रहती है जो पूर्वी अमेरिका की वायु को प्रदूषित कर देती है। कजाकिस्तान में भी खतरनाक आग लगने लगी है जिससे लगभग 60 हजार हेक्टेयर वन क्षेत्र बर्बाद हो गया है। ये आग पर्यावरण के लिए खतरे की घंटी है। पिछले दो दशकों में वन क्षेत्रों में दोगुना नुकसान हुआ है।</p>
<p>हमारा वायुमंडल सहज, शुद्ध व स्वच्छ वायु से परिपूर्ण रहता है। इसमें लगभग 78.9% नाइट्रोजन, 20.94% ऑक्सीजन, 0.93% आर्गन तथा सूक्ष्म मात्रा में बाकी गैसें (कार्बन डाई ऑक्साइड, कार्बन मोनो ऑक्साइड, सल्फर डाईऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, अमोनिया, नाइट्रस ऑक्साइड, हाइड्रोजन, मीथेन, हीलियम, जीनान, क्रिपटोन) पाई जाती हैं। इनका संतुलन बिगड़ना ही वायु प्रदूषण है। ज्वालामुखी का फटना, जंगलों की आग व वानस्पतिक अवषेशों का अपघटन वायु प्रदूषण के प्राकृतिक कारण हैं। वाहनों का धुआं, घरेलू गैस, खनन, वायुयान, परमाणु सयंत्र, परमाणु विस्फोट, भोपाल गैस कांड, चेर्नोबिल परमाणु दुर्घटना इत्यादि मानव जनित कारण हैं। वायु प्रदूषण तीन प्रकार के होते हैं।</p>
<p>दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में लगी भयंकर आग के कारण बढ़ती भूमंडलीय गर्मी से अल-नीनो के खतरनाक परिणाम हमारे सामने हैं। अल-नीनो मानसून के बनने, इसकी गति व दिशा को प्रभावित करके कृषि उत्पादकता पर भारी प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है। फसलों की जैविक क्षमता घट रही है, कृषि व कृषि उद्योग अस्थिर हो रहे हैं। अकेले अल-नीनो के प्रभाव से अगली सदी तक दुनिया की अर्थव्यवस्था में लगभग 84 ट्रिलियन डॉलर की हानि का अनुमान है।</p>
<p>एक अनुमान के अनुसार, वायु प्रदूषण से दुनियाभर में सालाना 65-70 लाख मोतें होती हैं। पराली जलाने से दिल्ली-एनसीआर में दीवाली के आसपास दिन में अंधेरा छा जाता है। वायु प्रदूषण के कारण कार्बन डाई ऑक्साइड, कार्बन मोनो ऑक्साइड, मीथेन, हाइड्रोजन, सल्फाइड इत्यादि गैसों से व विषैले धूल के कणों से स्वांस संबंधी रोग लग जाते हैं। हम ऑक्सीजन के बिना तीन मिनट भी जीवित नहीं रह सकते हैं। यह सभी पदार्थों को जोड़ कर रखती है। अधिक तापमान व प्रदूषित वातवरण के कारण आंधी, तूफान, सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदा आती है और विषमता एवं आपदाओं को बढ़ावा मिलता है जिन्हें रोका नहीं जा सकता है।</p>
<p><strong>क्या करें :</strong> ग्रीन हाउस गैसों का समयबद्ध तरीके से उत्सर्जन कम किया जाए। इसके लिए राष्ट्रीय व&nbsp; अंतरराष्ट्रीय स्तर की पहल की जाए। ऐसे उद्योग बंद किए जाएं और ऑक्सीजन उत्पन्न करने वाले उद्योगों को बढ़ावा दिया जाए। साथ ही आमजनों की भागीदारी भी सुनिश्चित की जाए।</p>
<p><strong>कार्बन की खेती :</strong> साइंस मैग्जीन के अनुसार, वायु प्रदूषण से बचने के लिए कार्बन की खेती करने पर जोर दिया जाना चाहिए। इस कृषि प्रणाली में वायुमंडल से उत्सर्जित कार्बन डाई ऑक्साइड व दूसरी विषैली गैसों का उत्सर्जन घटाया जाता है। इस प्रणाली में कार्बन डाई ऑक्साइड को वातवरण से लेकर पादप भागों-पदार्थों तथा भूमि में कार्बनिक रूप में परिवर्तित कर संग्रहित किया जाता है। अमेरिकी प्रशासन जलवायु परिवर्तन का सामना करने के लिए कार्बन बैंक की योजना बना रहा है। यह एक बहुवर्षीय विस्तृत प्रणाली है। भारत का कृषि क्षेत्र कुल ग्रीन हाउस गैस की 14% हिस्सेदारी रखता है। हमारे देश में मुख्य कृषि उत्सर्जन पशु क्षेत्र (54.6%) व नाइट्रोजन उर्वरक (19%) के उपयोग से होता है। धान की खेती से ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन लगभग 32 करोड़ टन कार्बन डाई ऑक्साइड के बराबर होता है।</p>
<p><strong>बांस की खेती :</strong> केंद्रीय सड़क एवं परिवहन मंत्रालय के अनुसार, बांस सबसे अधिक कार्बन डाई ऑक्साइड सोखता है, इसलिए बांसों को सड़क के दोनों ओर लगाया जाए तथा सड़क के पानी से बांसों को उगाया जा सकता है। बांसों के 3-6 सेंटीमीटर के टुकड़े कर बॉयलर में डाला जाए जिससे ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन रुकेगा। साथ ही कोयले का आयात रुक सकेगा और ग्रामीण रोजगार पैदा होंगे।</p>
<p><strong>कचरा प्रबंधन :</strong> दिल्ली की रिंग रोड पर 20 लाख टन तथा अहमदाबाद की मुख्य सड़क पर 30 लाख टन कचरा डाल कर पर्यावरण की रक्षा की गई है।</p>
<p><strong>बिजली, </strong><strong>एथेनॉल, </strong><strong>मीथेनॉल का वाहनों में प्रयोग :</strong> बस, ट्रक, कार, दोपहिया वाहनों को बिजली से चलाने की व्यवस्था 5 वर्ष में 100% पूरा करने की योजना है। एथेनॉल से चलने वाले वाहन व इसे डीजल- पेट्रोल में मिला कर उपयोग करने से ईंधन सस्ता होगा तथा वायु प्रदूषण पर नियंत्रण किया जा सकेगा।</p>
<p><strong>मृदा क्षमता को बढ़ाना :</strong> मृदा, वायु प्रदूषण तथा कुल मिला कर जलवायु परीवर्तन को रोकने के लिए, सबसे उपयुक्त व आर्थिक उपाय है, मगर इसका उपयोग कम ही किया गया है। स्वस्थ मृदा को कार्बन सिंक का कुशल स्रोत जाना जाता है। हमें डिकार्बनिंग का स्तर बढ़ाने के लिए मृदा को कार्बन से लबालब&nbsp; रखना चाहिये। अंतरराष्ट्रीय अध्यन बताते हैं कि उपयुक्त भूमि प्रति वर्ष संसार के जीवांश-ईंधन उत्सर्जन का लगभग 25% घटाती है, मगर इसका उपयोग नहीं किया गया है।</p>
<p><strong>ऑक्सीजन के उद्योग :</strong> यह सबसे महत्वपूर्ण सस्ता रास्ता है। जलवायु शुद्धिकरण करने, ऑक्सीजन पैदा करने के उद्योग लगाएं, कार्बन डाई ऑक्साइड की खपत बढ़ाने के उद्योग लगाने के लिए निरंतर वृक्ष लगाते रहें। हमें मुफ्त ऑक्सीजन वृक्षों से मिल जाती है। एक आदमी को प्रतिदिन 2100 रुपये की ऑक्सीजन चाहिये। हम 40,000 रुपये के एसी लगाने की बजाय 40 वृक्ष लगाएं। वृक्ष हमारे जैविक हथियार बन जलवायु परिवर्तन के रसायनिक हथियार से मुक्ति दिलाएंगे।</p>
<p><em><strong>(डॉ. डी. कुमार , जोधपुर स्थित साउथ एशिया बॉयोटेक्नोलॉजी सेंटर के वैज्ञानिक सलाहकार हैं और भगीरथ चौधरी, सेंटर के फाउंडर डायरेक्टर हैं)</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ जलवायु परिवर्तन से हो जाएं सावधान ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[नई आईटीआई से छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में स्किल के अंतर को पाटना संभव]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/bridging-the-rural-skill-gap-with-new-itis-in-chhattisgarh.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 14 Aug 2023 10:53:36 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/bridging-the-rural-skill-gap-with-new-itis-in-chhattisgarh.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>इन दिनों भारत में स्किल ट्रेनिंग, स्किल बेहतर बनाने तथा नए सिरे से स्किल सिखाने जैसे कार्यक्रम कामकाजी प्रोफेशनल, फ्रेशर और नौकरी तलाश रहे युवाओं के लिए पहली प्राथमिकता बन गए हैं। वित्त वर्ष 2022-23 के केंद्रीय बजट में प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना 4.0 लॉन्च की गई, जिसका मकसद लाखों युवाओं को नए जमाने के पाठ्यक्रमों के मुताबिक तैयार करना है। जुलाई 2023 में क्राफ्ट्समैन ट्रेनिंग स्कीम (सीटीएस) के तहत एक प्रमुख उपलब्धि हासिल की गई जब वामपंथ उग्रवाद से प्रभावित राज्यों में 48 औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (आईटीआई) की स्थापना हुई। इन 48 जिलों में छत्तीसगढ़ के 9 ग्रामीण जिले शामिल हैं। यह हैं- दंतेवाड़ा, बस्तर, कांकेर, सरगुजा, राजनांदगांव, बीजापुर, नारायणपुर, सुकमा और कोडागांव।</p>
<p>इन संस्थानों का प्राथमिक लक्ष्य विभिन्न औद्योगिक क्षेत्र के लिए स्किल्ड वर्कफोर्स तैयार करना तथा इन क्षेत्रों के युवाओं के लिए स्वरोजगार के अवसर बढ़ाना है। आईटीआई के आधुनिकीकरण के लिए छत्तीसगढ़ सरकार के साथ टाटा टेक्नोलॉजी का एमओयू युवाओं को उद्योग आधारित स्किल ट्रेनिंग देने का अच्छा उदाहरण है।&nbsp;युवा आबादी इंडस्ट्री 4.0 के मुताबिक तैयार हो सके, इसके लिए जरूरी है कि उन्हें स्किल ट्रेनिंग दी जाए तथा कोडिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, मेकाट्रॉनिक्स, इंटरनेट ऑफ थिंग्स जैसे विषयों के प्रति जागरूकता बढ़ाई जाए। इसके साथ सॉफ्ट स्किल भी आवश्यक है।</p>
<p>प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना एक मांग आधारित स्कीम है। इसकी शुरुआत भारत के ग्रामीण जिलों में युवाओं को कम अवधि वाले प्रशिक्षण उपलब्ध कराना है। बजट 2023 में ग्रामीण युवाओं तथा कामकाजी आबादी के लिए एक और कार्यक्रम लॉन्च किया गया था जिसका नाम है जन शिक्षण संस्थान। इसे ऐसे स्थानीय लोगों को व्यावसायिक शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए तैयार किया गया है जिन्होंने आठवीं कक्षा तक बेसिक शिक्षा हासिल की है अथवा 12वीं कक्षा में पढ़ाई छोड़ दी है। यह कार्यक्रम मुख्य रूप से 15 से 45 आयु वर्ग के लोगों के लिए है। इसमें महिलाओं, अनुसूचित जनजाति, जाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यकों को प्राथमिकता दी जाती है। पिछले कुछ महीनों में इस कार्यक्रम को काफी लोकप्रियता मिली है। बड़ी संख्या में युवा स्किल सीखने और अपने लिए नौकरी के अवसर बेहतर करने के मकसद से इसमें आ रहे हैं।</p>
<p><strong>स्किल की आवश्यकता पूरी करने के लिए इंडस्ट्री और सरकार में साझेदारी</strong></p>
<p>स्किल डेवलपमेंट कार्यक्रमों को इंडस्ट्री की मांग के मुताबिक तैयार किया जाना चाहिए। मांग आधारित औपचारिक स्किलिंग, जिसमें नियोक्ता के साथ युवाओं को जोड़ा जाए, तथा उद्यमिता स्कीमों तक पहुंच बढ़ाना आज की जरूरत है। जुलाई 2023 में टाटा टेक्नोलॉजीज ने छत्तीसगढ़ सरकार के साथ इंडस्ट्री 4.0 को प्रमोट करने तथा ग्रामीण क्षेत्रों में उद्योगीकरण को बढ़ावा देने के लिए हाथ मिलाया है। इसका मुख्य लक्ष्य राज्य सरकार के स्वामित्व वाले 36 आईटीआई को अपग्रेड करना है। इस पर 1188.36 करोड़ रुपए खर्च आने का अनुमान है।</p>
<p>यह साझेदारी ग्रामीण विकास प्रोजेक्ट को समर्थन देने में उद्योग की प्रतिबद्धता को दर्शाती है। यह सरकार की प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना जैसे राष्ट्रीय विकास कार्यक्रमों के पूरक के तौर पर काम करती है। इस तरह की पहल ऐसी वर्कफोर्स तैयार करने में मददगार साबित होगी जो इंडस्ट्री 4.0 के मुताबिक तथा रोजगार के काबिल होगी। इससे स्किल आधारित लर्निंग की सफलता सामने आएगी, साथ ही भारत के ग्रामीण क्षेत्र के समग्र आर्थिक विकास में मददगार बनेगी।</p>
<p><strong>एमएसएमई को बढ़ावा देने के कदम</strong></p>
<p>ग्रामीण जिलों में स्थापित होने वाले टेक्नोलॉजी सेंटर एमएसएमई के लिए इंडस्ट्रियल हब के तौर पर भी काम करेंगे। टाटा टेक्नोलॉजीज ने युवाओं के लिए स्किल आधारित पाठ्यक्रम लागू किए हैं। यह पाठ्यक्रम मैन्युफैक्चरिंग और ऑटोमेशन, इंडस्ट्रियल रोबोटिक्स, मेकैनिकल इलेक्ट्रिक व्हीकल, वर्चुअल वेरिफिकेशन, एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग तथा ऐसे अनेक क्षेत्रों के लिए है।</p>
<p>आईटीआई को अपग्रेड करने के लिए और अधिक इंडस्ट्री पार्टनर सामने आ सकते हैं तथा नए ट्रेड स्थापित कर सकते हैं। इंडस्ट्री 4.0 की जरूरतों को पूरा करने के लिए कम अवधि वाले कोर्स शुरू कर सकते हैं। यह केंद्र हर साल 10000 से अधिक छात्रों को प्रशिक्षित करेंगे। प्रोडक्ट डिजाइन और डेवलपमेंट, एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग, मॉडर्न आटोमोटिव्स मेंटेनेंस-रिपेयर, बैटरी, इलेक्ट्रिक व्हीकल ट्रेनिंग तथा अन्य अनेक सेक्टर में यह लोगों की स्किल को बेहतर कर सकते हैं। इससे और अधिक संख्या में एमएसएमई की स्थापना की जमीन तैयार होगी तथा इससे इन राज्यों में निवेश भी बढ़ेगा।</p>
<p>ग्रामीण इंडस्ट्रियल हब जमीन, बिजली, पानी, शेड, प्रशिक्षण, वाई-फाई, बैंकिंग लिकेज जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध करवा कर क्षेत्रीय और स्थानीय विकास को बढ़ावा दे सकते हैं। इसमें स्टार्टअप्स को भी बढ़ावा मिलेगा। यह हब लघु उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए तैयार किए गए हैं। यहां बड़ी संख्या में ग्रामीण कामकाजी लोगों को अपने घर के करीब काम मिल सकता है।</p>
<p>छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने गांवों को प्रोडक्शन हब तथा शहरों को विकसित बिजनेस सेंटर के रूप में विकसित करने के सरकार के प्रयासों पर बल दिया है। उन्होंने 300 ग्रामीण इंडस्ट्रियल पार्क और गांव में लघु उद्योग स्थापित करने की योजना भी बताई। उन्होंने टाटा की तरह अन्य कंपनियों से भी इन ग्रामीण केंद्रों को विकसित करने में मदद का आह्वान किया और कहा कि वह इन केंद्रों में आधुनिक उद्योग और अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी लेकर आएं। इन इलाकों में इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध करवाने से यह ग्रामीण हब छोटी कंपनियों को अपना कामकाज शुरू करने के लिए आकर्षित कर सकते हैं। इससे स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा तथा स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा मिलेगा। इससे परिवहन की व्यवस्था सुधरेगी, डिलीवरी की सेवा बेहतर होगी और ग्रामीण जिलों में उद्योग का इकोसिस्टम खड़ा होगा।</p>
<p><strong>ग्रामीण वर्कफोर्स को स्किल सिखाना तथा सशक्त बनाना</strong></p>
<p>ग्रामीण वर्कफोर्स के लिए स्किल डेवलपमेंट कार्यक्रम पूरे गांव को नए उत्पादन केंद्रों के रूप में बदल सकते हैं। यह आर्थिक और सामाजिक विकास की दिशा में एक बड़ा कदम होगा। इसके साथ ऐसी नीति की जरूरत है जो इन क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर उत्पादन को बढ़ावा दे, रोजगार के अवसर मुहैया कराए, लोगों की आमदनी बढ़ाए तथा उनकी जीवन शैली में सुधार करे।</p>
<p>गांव को प्रोडक्शन हब के रूप में तैयार करने और ग्रामीण इंडस्ट्रियल पार्क स्थापित करना इलाकों की वर्कफोर्स को सशक्त बनाने तथा उनकी स्किल बेहतर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर मुहैया करवाकर यह वहां के लोगों को नौकरी की तलाश में अपना घर छोड़कर बड़े शहरों तथा महानगरों की ओर जाने से रोक सकता है।</p>
<p>ट्रेनिंग और स्किल डेवलपमेंट की यह पहल ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को आधुनिक उद्योगों में प्रवेश के योग्य बना सकती है, उन्हें रोजगार के लायक बेहतर बना सकती है तथा उनकी आमदनी में भी वृद्धि कर सकती है। दीर्घकाल में इस तरह की पहल गरीबी में कमी लाएगी, ग्रामीण इलाकों की क्रय क्षमता बढ़ाएगी तथा आर्थिक विकास को गति देगी।</p>
<p>छत्तीसगढ़ में तकनीकी शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव डॉ आलोक शुक्ला ने आईटीआई के आधुनिकीकरण में टाटा जैसी कंपनियों के सहयोग के महत्व को रेखांकित किया। इस तरह की साझेदारी युवाओं की शिक्षा तथा क्षमता को उद्योगों की उभरती जरूरतों से जोड़ने के सरकार के लक्ष्य को पूरा करने में महत्वपूर्ण योगदान कर सकती है। अगर युवा नई प्रौद्योगिकी के साथ तैयार होकर आते हैं तो इससे स्किल्ड वर्कफोर्स की मांग और आपूर्ति के अंतर को कम किया जा सकता है। साथ ही इससे नौकरियों के ज्यादा अवसर निकलेंगे तथा युवा राज्य में अपना करियर बनाने के लिए प्रोत्साहित होंगे। इससे राज्य को उद्योगों के लिए निवेश की बेहतर जगह के रूप में भी स्थापित किया जा सकता है। उद्योग यहां अपना मैन्युफैक्चरिंग प्लांट लगाने के साथ अपने फैक्ट्री आउटलेट भी स्थापित कर सकते हैं।</p>
<p><strong>निष्कर्ष</strong></p>
<p>इस तरह की और साझेदारी होने से ग्रामीण क्षेत्रों में ऑन द जॉब ट्रेनिंग के अधिक अवसर खुलेंगे। जैसा कि केंद्रीय बजट 2023 में कहा गया है, विभिन्न राज्यों में स्किल इंडिया इंटरनेशनल सेंटर स्थापित किए जाएंगे। एकीकृत स्किल इंडिया डिजिटल प्लेटफॉर्म के तहत स्किलिंग के लिए डिजिटल इकोसिस्टम का विस्तार किया जाएगा। इससे मांग आधारित औपचारिक स्किलिंग में मदद मिलेगी, युवाओं को टेक्नोलॉजी का ज्ञान होगा तथा देश के विभिन्न राज्यों और ग्रामीण जिलों में नई नौकरियों के दरवाजे खुलेंगे।</p>
<p>भारत में प्रचुर संख्या में प्रतिभाएं हैं। इन्हें टेक्निकल तथा नॉन टेक्निकल क्षेत्र में प्रशिक्षण के लिए और अधिक मदद की जरूरत है ताकि उन्हें ऐसे औद्योगिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों की जानकारी मिल सके। अकादमिक संस्थान और इंडस्ट्री एसोसिएशन इन कार्यक्रमों के बारे में ग्रामीण जिलों में जागरूकता फैला सकते हैं और स्किल डेवलपमेंट तथा रोजगार के बीच के अंतर को कम कर सकते हैं।</p>
<p><strong><em>(प्रियाश्री एंडले</em></strong><strong><em>&nbsp;स्किल और एजुकेशनल डेवलपमेंट कंसल्टेंट हैं)</em></strong></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/08/image_750x500_64d9b9e2f29d1.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ नई आईटीआई से छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में स्किल के अंतर को पाटना संभव ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[आम होती महंगाई से कृषि कारोबार के उदारीकरण का सपना बिखरा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/the-dream-of-liberalization-of-agriculture-trade-collapsed-due-to-generalisation-of-inflation.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 13 Aug 2023 10:51:48 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/the-dream-of-liberalization-of-agriculture-trade-collapsed-due-to-generalisation-of-inflation.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>सरकार ने साल 2020 में जब कृषि क्षेत्र के उत्पादों के कारोबार को आर्थिक सुधारों का जामा पहनाते हुए तीन कृषि कानूनों को लागू करने का फैसला लिया तो शायद उसे दूर-दूर तक इस बात की उम्मीद नहीं थी कि तीन साल के भीतर ही देश में कृषि उत्पादों के कारोबार को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक वस्तु अधिनियम (ईसीए) जैसे सख्त कानून के प्रावधानों को लागू करना पड़ेगा। साथ ही खाद्यान्नों और चीनी के रिकॉर्ड उत्पादन के बावजूद गेहूं, चावल और चीनी जैसे कृषि उत्पादों के निर्यात को प्रतिबंधित करना पड़ेगा। लेकिन साल 2023 में यह बात हकीकत है और उसकी वजह है महंगाई का आम हो जाना।</p>
<p>उपभोक्ता हितों को संरक्षित करने के लिए सरकार पिछले साल से लगातार कदम उठा रही है ताकि खाने-पीने की वस्तुओं की कीमतें नियंत्रित रहें, लेकिन फिलहाल जो स्थिति है वह सरकार के कदमों के बहुत प्रभावी होने की पुष्टि नहीं करती। बात केवल एक वस्तु की महंगाई की नहीं है, अब खाद्य महंगाई आम हो चली है, खाने-पीने की किसी भी वस्तु की आप बात कर लें सब महंगे हो चुके हैं। यही वह स्थिति है जो सरकार के साथ-साथ भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के लिए भी चिंता का सबब है। अगर बात एक खाद्य उत्पाद की हो तो उसको लेकर सरकार और आरबीआई को बहुत चिंतित नहीं होना पड़ता, क्योंकि उसका आम लोगों पर बहुत असर नहीं पड़ता है। लेकिन जब गेहूं, चावल, आटा, दाल, टमाटर, चीनी, प्याज और तमाम सब्जियों और फलों की कीमतों में तेजी का दौर हो तो उन पर बहुत तेजी से नियंत्रण करना एक टेढ़ा काम है। इस स्थिति का राजनीतिक नुकसान भी बड़ा होता है। यहां पर सरकार को उपभोक्ता और उत्पादक (यहां उत्पादक से तात्पर्य किसान से है) के बीच संतुलन बनाना भी मुश्किल काम है। हालांकि उत्पादक भी कई उत्पादों का उपभोक्ता है।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/02/image_750x_63f84103ef3fc.jpg" alt="" /></p>
<p>सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पिछले फसल सीजन (2022-23) में देश में गेहूं का रिकॉर्ड 11.23 करोड़ टन का उत्पादन हुआ। चावल का भी रिकॉर्ड उत्पादन हुआ। इसके बावजूद, सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पिछले एक साल में आटा का औसत दाम 30 रुपये से 35 रुपये किलो हो गया। इसी अवधि में चावल का औसत दाम 34 रुपये किलो से बढ़कर 40 रुपये किलो हो गया। दालों की कीमतों में भी लगातार बढ़ोतरी हो रही है। सरकार के पास चना का भारी भंडार होने के बावजूद पिछले दस दिन में 10 रुपये महंगा होकर इसका दाम 50 रुपये किलो को पार कर गया है। हालांकि, यह अभी न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से कम है, लेकिन इसमें बढ़ोतरी होना इस बात का संकेत है कि यह और महंगा होगा।</p>
<p>जून में महाराष्ट्र की लासलगांव मंडी में प्याज का दाम 13.5 रुपये किलो था लेकिन अब यह 22 रुपये प्रति किलो पर पहुंच गया है। कर्नाटक की कोलार मंडी में टमाटर का दाम जरूर 100 रुपये किलो से घटकर 35 रुपये किलो रह गया है। लेकिन टमाटर की कम होती महंगाई की जगह को प्याज की महंगाई भर देगी। प्याज के दाम में वृद्धि शुरू हो चुकी है। एक हफ्ते पहले तक 25-30 रुपये बिकने वाला प्याज खुदरा बाजार में 40 रुपये प्रति किलो पर पहुंच गया है। जीरा ने 60 हजार रुपये प्रति क्विटंल का रिकॉर्ड बनाया है, तो अदरक की कीमत भी 800 रुपये प्रति किलो को पार कर गई है। वैसे हरी मिर्च की कीमत भी 200 रुपये किलो को पिछले दिनों पार कर गई। यानी आम खाद्य उत्पादों के साथ मिर्च-मसाला की महंगाई भी आम आदमी को परेशान कर रही है। हां, खाद्य तेलों के मामले में रिकॉर्ड आयात और रियायती आयात शुल्क ने उपभोक्ताओं को राहत जरूर दी। लेकिन देश की करीब 65 फीसदी खाद्य तेल जरूरत आयात से पूरी होती है और इस मोर्चे पर आत्मनिर्भरता में मदद करने वाले किसान को इस साल के रबी मार्केटिंग सीजन में सरसों न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से कम कीमत पर बेचनी पड़ी। कुछ राज्यों में प्राइस सपोर्ट स्कीम (पीएसएस) के तहत नेफेड के जरिये किसानों से एमएसपी पर सरसों की खरीद जरूर हुई, लेकिन बड़े पैमाने पर किसानों को सरसों की एमएसपी नहीं मिली।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/07/image_750x_64ae749bc6b9b.jpg" alt="" /></p>
<p>ऐसा नहीं है कि सरकार ने खाद्य महंगाई को नियंत्रित करने लिए काम नहीं किया। पिछले साल सरकारी खरीद में गेहूं की खरीद में भारी गिरावट के चलते रबी मार्केटिंग सीजन के बीच ही 13 मई, 2022 को गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। उसके कुछ माह बाद सितंबर, 2022 में ब्रोकन राइस के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया गया था और गैर बासमती चावल के निर्यात पर 20 फीसदी निर्यात शुल्क लगा दिया था। चीनी के निर्यात को फ्री एक्सपोर्ट से बदलकर कर रेस्ट्रिक्टिव कर दिया गया। उसके बाद अप्रैल, 2023 में निर्यात कोटा पूरा होते ही नया कोटा जारी करने पर रोक लगा दी यानि निर्यात पर रोक लग गई।</p>
<p>इस बीच तुअर (अरहर) और उड़द दाल पर स्टॉक लिमिट लागू की गई। साथ ही इसके स्टॉक की नियमित जानकारी सरकार को देने का नियम लागू कर दिया गया। इसके लिए आवश्यक वस्तु अधिनियम का उपयोग किया गया। उसके बाद 12 जून, 2023 को गेहूं पर स्टॉक लिमिट लागू कर दी गई जो 31 मार्च, 2024 तक जारी रहेगी। वहीं 20 जुलाई से गैर-बासमती सफेद चावल (व्हाइट राइस) के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इन सब उपायों के बावजूद चावल, आटा, दाल और चीनी की कीमतें बढ़ रही हैं। पिछले साल दूध की कीमतों में जो बढ़ोतरी हुई, वह इससे अलग है। सब्जियों और फलों की कीमतों ने नए रिकॉर्ड बनाये हैं। हां, केवल आलू और आम इस साल महंगाई के मोर्चे पर राहत देने वाले रहे हैं।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2021/07/image_750x_60e1e2ee2543a.jpg" alt="" /></p>
<p>अब मसला ऐसा है कि भले ही रिजर्व बैंक ने 10 अगस्त, 2023 को जारी मौद्रिक नीति समीक्षा में लगातार तीसरी बार नीतिगत ब्याज दरों को स्थिर रखा हो, लेकिन वह भी इस महंगाई को ठीक से नहीं समझ पा रहा है। यही वजह है कि नीतिगत ब्याज दरों को स्थिर रखने के साथ ही रिजर्व बैंक गर्वनर महंगाई पर भी चिंता जताते हैं और रिजर्व बैंक महंगाई के अपने पुराने अनुमान को बढ़ा देता है।</p>
<p>बात केवल आंकड़ों की नहीं, माहौल की भी है। कोविड के दौरान एक ऐसा समय था जब केंद्रीय पूल में खाद्यान्न भंडार उफन रहे थे जिसके चलते सरकार ने 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज दिया और उसने महंगाई में कमी लाने का काम किया। उस समय दुनिया के अमीर देश अपने नागरिकों को पैसों से मदद कर रहे थे, जो महंगाई में इजाफा करने वाला कदम था। लेकिन अब हमारे पास उतना स्टॉक नहीं है। केंद्रीय पूल में खाद्यान्न भंडार पांच साल के निचले स्तर पर है। सरकार रिकॉर्ड गेहूं और चावल उत्पादन की बात कर रही है लेकिन बाजार की प्रतिक्रिया सरकारी आंकड़ों के प्रतिकूल है।</p>
<p>बात राजनीतिक नुकसान की भी है। अपने पहले कार्यकाल के बाद मोदी सरकार जब 2019 में चुनाव में गई थी तो महंगाई रिकॉर्ड गिरावट की ओर थी। अब जहां इस साल चार महत्वपूर्ण राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं और करीब आठ माह बाद लोकसभा चुनाव हैं, तो सरकार खाद्य महंगाई को नियंत्रित करने के लिए जूझ रही है, जो एक या दो उत्पादों तक सीमित रहने की बजाय आम होती जा रही है। ऐसे में राजनीतिक जोखिम भी बढ़ गया है। इसलिए जिस भारतीय जनता पार्टी को बाजार की उदारीकृत नीतियों का समर्थक माना जाता है, वह कीमतों को नियंत्रित करने के लिए बाजार नियंत्रण की नीति पर अमल कर रही है। भले वह घरेलू बाजार हो या वैश्विक बाजार, दोनों मोर्चों पर यह नियंत्रण बढ़ रहा है।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/08/image_750x_64d74777986fd.jpg" alt="" /></p>
<p>असल में भारत जैसे बड़ी आबादी वाले देश के लिए खाद्य उत्पादों के कारोबार का उदारीकरण करने की सीमा है, क्योंकि जहां अभी भी कृषि उत्पादन के मामले में मानसून पर काफी निर्भरता है, वहीं सरकारी दावों के बावजूद उत्पादन के आंकड़ों को लेकर सवाल खड़े होते रहते हैं। इसकी प्रतिक्रिया बाजार में कीमतों के रूप में सामने आती है। इसलिए घरेलू बाजार में कीमतों पर नियंत्रण के लिए निर्यात पर प्रतिबंध और आवश्यक वस्तु अधिनियम के जरिये स्टॉक लिमिट और स्टॉक डिक्लेरेशन जैसे कदम सरकारें उठाती रही हैं। मसलन कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दौरान चीनी निर्यात पर अचानक प्रतिबंध लगा दिया गया था जो कृषि मंत्रालय के गन्ना उत्पादन के आंकड़ों के चलते हुआ था जबकि उत्पादन ज्यादा हुआ और उसके बाद करीब तीन साल तक चीनी की कीमतों में भारी गिरावट के चलते चीनी मिलों और किसानों को संकट का सामना करना पड़ा।</p>
<p>उससे पहले अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत स्टॉक लिमिट लगाने के अधिकार केंद्र के तहत ला दिये थे लेकिन बाद में यूपीए सरकार के दौरान महंगाई बढ़ने के चलते इस आदेश को वापस लेकर राज्यों को अधिकार दिए गए। वैसे, कृषि कारोबार को उदार करने की कवायद आजादी के तुरंत बाद शुरू हो गई थी लेकिन साल भर के भीतर ही नियंत्रण लागू करने पड़े थे। यह सिलसिला आजादी के 76वें साल में भी जारी है।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/07/image_750x500_64aa4deef0472.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ आम होती महंगाई से कृषि कारोबार के उदारीकरण का सपना बिखरा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/07/image_750x500_64aa4deef0472.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[जलवायु के साथ संतुलनः जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में छोटे किसानों की राय]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/voice-of-smallholder-farmers-in-the-context-of-climate-change.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 07 Aug 2023 11:30:34 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/voice-of-smallholder-farmers-in-the-context-of-climate-change.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">कृषि से जुड़े जलवायु संकट का समाधान आज की महती जरूरत है। भारत में 18% ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कृषि कार्यों की वजह से होता है। किसानों के लिए जलवायु और पर्यावरण भी बड़ी चुनौतियां हैं, खासकर उन 27% कृषक आबादी के लिए जिन्हें छोटी जोत वाला किसान माना जाता है। इसलिए यह आवश्यकता दोहरी हो जाती है- एक तो जलवायु संकट का समाधान खेती के तौर-तरीकों में सुधार के बिना नहीं हो सकता और दूसरी तरफ, छोटी जोत वाले किसानों की आमदनी जलवायु के नकारात्मक प्रभावों का समाधान किए बिना नहीं बढ़ाई जा सकती है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">छोटी जोत के किसानों के सामने पहले ही कई तरह की बाधाएं होती हैं जिनके कारण उनकी आमदनी बढ़ नहीं पाती है। इनमें अवैज्ञानिक तरीके से खेती, इनपुट और श्रम की ऊंची लागत तथा बाजार तक उचित पहुंच का अभाव शामिल हैं। इन बाधाओं के बीच द रॉकफेलर फाउंडेशन की मदद से हाल में आयोजित एक रिसर्च में वर्षा पर निर्भर 75% छोटे किसानों ने बारिश को अपनी प्रमुख चिंता बताया। सिंचाई के साधन वाले 55% छोटे किसानों ने कीटों और बीमारियों को अपनी प्रमुख चिंता बताया। इस बात के महत्व का हमें तब पता चलता है जब हम छोटे किसानों पर जलवायु संकट के नकारात्मक प्रभावों पर गौर करते हैं। वर्षा पर आधारित हर चार में से तीन और सिंचाई सुविधा वाले हर दो में से एक किसान को आधे या उससे अधिक फसल का नुकसान होता है। यह नुकसान औसतन तीन साल में दो बार होता है। इसका मुख्य कारण बारिश है। वर्षा पर निर्भर किसानों, जिनकी उत्पादकता बीते पांच वर्षों में कम हुई है, उनमें से 83% ने कहा कि बारिश के कारण उनकी उत्पादकता कम हुई है। सिंचाई की सुविधा वाले 54% किसानों ने कीटों और बीमारियों को तथा 29% ने बारिश को कारण बताया।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">लगभग 75% किसानों को कीटों, बीमारियों और खरपतवार का ज्यादा सामना करना पड़ा है। इनमें से कुछ किसान असामान्य बारिश बढ़ने को इसकी मुख्य वजह मानते हैं। इन परिस्थितियों के बावजूद छोटे किसान अपनी आय बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। तथ्य तो यह है कि बीते पांच वर्षों के दौरान हर दो में से एक छोटे किसान के खेत की उत्पादकता कम हुई। बाकी आधे किसानों की उत्पादकता समान रही या बढ़ गई।</span></p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/08/image_750x_64d088378fdb3.jpg" alt="" /></p>
<p><span style="font-weight: 400;">बीते पांच वर्षों के दौरान 76% छोटे किसानों ने कीटनाशकों का इस्तेमाल दोगुना से ज्यादा कर दिया है और 54% रासायनिक उर्वरकों का दोगुना इस्तेमाल कर रहे हैं। 59% किसानों का मानना है कि 5 वर्षों में उनके खेत की मिट्टी की उर्वरता कम हुई है जबकि 37% का मानना है कि इसमें कोई बदलाव नहीं आया है। इसी तरह 44% किसानों को लगता है कि मिट्टी का टेक्सचर और खराब हुआ है जबकि 46% के अनुसार इसमें कोई खास बदलाव नहीं आया है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">रसायनों के ज्यादा प्रयोग से मिट्टी की उर्वरता घटती है लेकिन किसानों के नजरिए से देखें तो इससे उन्हें उत्पादकता बढ़ाने या बरकरार रखने में मदद मिलती है। जिन किसानों के खेत की उत्पादकता बढ़ी, उनमें से आधे का कहना है कि ऐसा रसायनों के इस्तेमाल के कारण हुआ है। कीटों, बीमारियों और खरपतवारों का हमला झेलने वाले आधे या इससे अधिक किसानों के अनुसार उचित केमिकल के प्रयोग से उन्हें इसे नियंत्रित रखने में मदद मिली। यहां एक और बात गौर करने लायक है कि खेतों में काम करने वाली महिलाएं पांच साल पहले की तुलना में अब खेत में कम समय देती हैं। लगभग सभी महिलाओं का कहना है कि खरपतवार नाशकों के प्रयोग से उन्हें इन्हें हटाने के लिए अब कम समय लगाना पड़ता है। इस तरह जिन महिलाओं की खेती का समय बचा है उनमें से हर पांच में से तीन महिलाएं इस समय का प्रयोग किसी और के खेत में काम करने तथा अन्य कार्यों में करती हैं ताकि आमदनी बढ़ाई जा सके।</span></p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/08/image_750x_64d08853113e1.jpg" alt="" /></p>
<p><span style="font-weight: 400;">छोटे किसान मिट्टी की सेहत से वाकिफ हैं और उसे सुधारने के लिए तरीके भी अपना रहे हैं। उदाहरण के लिए 61% छोटी जोत के किसान फसलों में रोटेशन का तरीका अपनाते हैं। इसमें हर सीजन अथवा हर साल उगाई जाने वाली फसल बदल दी जाती है। हर चार में से तीन छोटे किसान खेत में तैयार खाद का प्रयोग करते हैं। ऐसे एक चौथाई किसानों को खाद खरीदने की जरूरत पड़ती है क्योंकि अपने मवेशियों से उनकी जरूरत पूरी नहीं हो पाती है। आगे और अधिक किसानों को वैकल्पिक स्रोतों की जरूरत पड़ सकती है क्योंकि बीते पांच वर्षों में न सिर्फ मवेशी पालने वाले किसानों की संख्या 79% से घटकर 66% रह गई है, बल्कि उनके पास औसत मवेशी की संख्या भी कम हुई है। इन किसानों के पास पहले औसतन चार मवेशी होते थे, जबकि अब सिर्फ तीन हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">ज्यादातर छोटे किसानों को बारिश के पूर्वानुमान की जरूरत होती है और वह उसे पर ध्यान भी देते हैं। 74% किसान बारिश के पूर्वानुमान के अनुसार ही अपनी गतिविधियां तय करते हैं। उदाहरण के लिए 64% इस सूचना से यह निर्णय लेते हैं कि फसल की बुवाई अथवा कटाई कब करनी है, 45% इसके आधार पर यह तय करते हैं कि फसल पर रसायनों का छिड़काव कब करना है। जब बारिश होने वाली होती है तब वह छिड़काव नहीं करते हैं। व्हाट्सएप और मौसम के ऐप जैसे डिजिटल स्रोतों ने किसानों के बीच जगह बनाई है, फिर भी बड़ी संख्या में किसान (62%) इस सूचना के लिए टेलीविजन, अखबार अथवा रेडियो पर निर्भर करते हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अगर छोटे किसानों की जरूरतों को ध्यान में रखा जाए तो क्लाइमेट स्मार्ट खेती काफी लोकप्रिय हो सकती है। उदाहरण के लिए, फंड उपलब्ध कराने वालों को यह सोचना चाहिए कि रसायनों के कम इस्तेमाल से खरपतवार निकालने के श्रम सघन काम पर क्या असर होगा। ऐसे ज्यादातर काम महिलाएं करती हैं। खेत में खाद बनाने को प्रमोट करने वाली नीति बनाते समय किसानों के पास मवेशियों की घटती संख्या को ध्यान में रखना चाहिए। साथ ही यह भी देखना चाहिए कि इससे किसानों के लिए खेत में प्राकृतिक इनपुट देने की क्षमता पर कितना प्रभाव पड़ेगा।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">जलवायु संकट से जुड़े समाधान अलग-थलग रहकर तैयार नहीं किए जा सकते हैं। यह सरकार, निजी क्षेत्र, फंड उपलब्ध कराने वालों और सिविल सोसाइटी सभी पक्षों पर निर्भर करता है कि वे ऐसा सिस्टम तैयार करें जिसमें क्लाइमेट स्मार्ट और रीजेनरेटिव तौर-तरीके से खेती किसानों के लिए बेहतर बिजनेस के अवसर साबित हों। ऐसा न हो कि उन तरीकों से किसानों की चुनौतियों और जोखिमों की लंबी फेहरिस्त में एक और चुनौती जुड़ जाए।</span></p>
<p><em><strong>(पुनीत गोयनका और आशीष करमचंदानी, द नज इंस्टीट्यूट में ट्रांसफॉर्मिंग एग्रीकल्चर फॉर स्मॉल फार्मर्स- टीएएसएफ का हिस्सा हैं। यह इंस्टीट्यूट सरकारों, बाजार और सिविल सोसायटी के साथ मिलकर गरीबी-मुक्त भारत के लिए काम करता है)</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ जलवायु के साथ संतुलनः जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में छोटे किसानों की राय ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[महंगाई में कमी की उम्मीदों पर बाढ़ ने फेरा पानी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/floods-wash-away-hopes-of-drop-in-inflation.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 19 Jul 2023 15:41:53 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/floods-wash-away-hopes-of-drop-in-inflation.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>जून में खुदरा महंगाई की दर तीन महीने के उच्च स्तर 4.81 फीसदी को पार कर गई, जबकि सब्जियों की कीमतों में 0.93 फीसदी की नकारात्मक गिरावट देखी गई। टमाटर की आसमान छूती कीमतों के बीच जून में सब्जियों की कीमतों में नकारात्मक रुझान पर आश्चर्यचकित न हों। जुलाई में टमाटर की कीमतों ने नया रिकॉर्ड बनाया है। टमाटर की ऊंची कीमतों को तो हम झेल सकते थे, लेकिन हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों, असम और बिहार में बाढ़ से सब्जियों को भारी नुकसान तो हुआ ही, साथ ही मानसून की बारिश में देरी की वजह से देर से बोए गए धान भी बह गए।</p>
<p>थोक मंडियों और पड़ोस की दुकानों दोनों में कीमतें बढ़ गई हैं और इसमें तत्काल सुधार के कोई संकेत नहीं हैं। राष्ट्रीय राजधानी के आजादपुर जैसी मंडियों के व्यापारियों का मानना है कि कीमतों पर दबाव कम से कम कुछ महीनों तक जारी रहेगा। मंडियों में आवक कम होने के कारण फलों और सब्जियों जैसी आवश्यक वस्तुओं की कीमतें और बढ़ने के लिए खुद को तैयार रखें।</p>
<p>टमाटर की मौजूदा स्थिति से गृहणियां परेशान हैं क्योंकि वे इसके बिना खाना बनाना सीख रही हैं। इसके अलावा आलू, प्याज, शिमला मिर्च, हरी मिर्च, फूलगोभी, बैंगन और अन्य सब्जियों पर लगातार निगरानी रखने की आवश्यकता है क्योंकि उनके दाम में भी तेजी का रुख है। अनाज एवं इससे बने उत्पाद और दालें गरीब और निम्न मध्यम वर्ग की जेब काटने वाली अन्य खाद्य वस्तुएं साबित हो रही हैं क्योंकि जून 2023 में अनाज और उत्पादों की मुद्रास्फीति साल-दर-साल 12.71 फीसदी बढ़ी है। यह समस्या गरीबों और निम्न मध्यम वर्ग के लोगों के लिए अधिक गंभीर है।</p>
<p>दिल्ली की आजादपुर जैसी मंडियों से आ रही रिपोर्टों के अनुसार, खाद्य वस्तुओं की आवक पर दोहरी मार पड़ी है। एक तो इन राज्यों के कई हिस्सों में फसलें नष्ट हो गई हैं, और दूसरी, पहाड़ी राज्यों में राजमार्गों के बह जाने के कारण परिवहन अस्त-व्यस्त हो गया है। पंजाब और हरियाणा के कुछ हिस्सों में भी बाढ़ के पानी से सड़कें या तो डूबी हुई हैं या फिर टूट गई हैं। टमाटर और फलों के प्रमुख उत्पादक राज्यों में से एक हिमाचल प्रदेश में पहाड़ी सड़कें बह जाने के कारण हालात अस्त-व्यस्त हो गए हैं।</p>
<p>मौसम का यह खतरनाक रुख खेती पर कहर बरपा रहा है। मौसम की मार का प्रभाव अर्थव्यवस्था के अन्य प्रमुख क्षेत्रों पर भी महसूस किया जा रहा है, खासकर उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों पर, जो बागवानी और पर्यटन सहित ज्यादातर कृषि पर निर्भर है। इन दोनों राज्यों को बड़ा झटका लगा है, क्योंकि मौसम का रुख विरोधाभासी हो गया है। या तो बारिश बहुत कम हो रही है या फिर हो रही है तो कम समय में ही बहुत ज्यादा हो जा रही है। इससे हिमालयी क्षेत्र में मानसून का कैलेंडर गड़बड़ा गया है।</p>
<p>बाढ़ प्रभावित राज्यों में रहने और जीवन जीने का खर्च अन्य राज्यों में रहने की तुलना में काफी बढ़ जाएगा। उदाहरण के लिए दिल्ली को ही लीजिए, पुराने दिनों में यहां वजीराबाद से ओखला तक यमुना नदी के किनारे कुछ मौसमी सब्जियां उगाई जाती थीं। अब यह सब इतिहास का हिस्सा है। यमुना नदी उफान पर है और झोपड़ियों में रहने वाले गरीबों को पीड़ा और दर्द दे रही है। बहरहाल, हम अपनी मुख्य कहानी पर ध्यान केंद्रित करते हैं और वह है कीमतों पर असर।</p>
<p>रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में सख्ती बरतने के बावजूद जून में मुद्रास्फीति तीन महीने के उच्च स्तर 4.81 फीसदी पर पहुंच गई। फलों और सब्जियों की महंगाई में क्रमशः 1.36 फीसदी और शून्य से नीचे 0.93 फीसदी की मामूली वृद्धि के बावजूद ऐसा हुआ। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) में फलों और सब्जियों का संयुक्त भार लगभग 10 फीसदी है। आने वाले महीनों में अनाज एवं उत्पादों और दालों के साथ-साथ फलों एवं सब्जियों के &nbsp;बास्केट की महंगाई दर में निश्चित रूप से बढ़ोतरी होगी। अनाजों एवं दालों की महंगाई अभी 10 फीसदी से ऊपर बनी हुई है।</p>
<p>बाढ़ ने आरबीआई की मुद्रास्फीति आकलन प्रक्रिया को पूरी तरह से बाधित कर दिया है। आरबीआई ने अनुमान लगाया था कि अगली कुछ तिमाहियों में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) 4 फीसदी के उसके अनुकूल लक्ष्य पर वापस आ सकता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों और विदेशी मुद्रा दरों में स्थिरता के कारण भले ही मुद्रास्फीति में कमी मीडिया की सुर्खियां बटोरती रहे लेकिन मूल्य वृद्धि का शैतान उभोक्ताओं को परेशान करता रहेगा।</p>
<p>देश के कुछ हिस्सों में बाढ़ का कहर और कुछ हिस्सों में मानसून की बारिश सामान्य से कम रहने की वजह से खरीफ फसलों की संभावनाएं भी बहुत अच्छी नहीं दिख रही हैं। <strong>रूरल वॉयस</strong> की एक हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि कैसे धान की बुआई में 10 फीसदी और अरहर की बुआई में 42 फीसदी की गिरावट देखी गई है। यह सब मौसम देवता के हाथ में है। सरकार और उपभोक्ता दोनों को उनसे उम्मीद लगी हुई है!</p>
<p><em><strong>(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ महंगाई में कमी की उम्मीदों पर बाढ़ ने फेरा पानी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[गेहूं की कीमत और खरीद के आंकड़ों से इसके उत्पादन के सरकारी अनुमान पर सवाल]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/the-price-and-procurement-data-of-wheat-raise-questions-on-production-estimates-of-the-government.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 10 Jul 2023 08:54:01 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/the-price-and-procurement-data-of-wheat-raise-questions-on-production-estimates-of-the-government.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने 12 जून को गेहूं पर स्टॉक लिमिट लगा दी। ऐसा 15 वर्षों में पहली बार हुआ। मंत्रालय ने अपनी अधिसूचना में स्टॉक लिमिट की घोषणा करते हुए कहा कि खाद्य सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए तथा जमाखोरी और सट्टेबाजी रोकने के लिए यह निर्णय लिया गया है। सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में व्यापारियों, थोक विक्रेताओं, खुदरा विक्रेताओं, बड़े चेन रिटेलर तथा प्रोसेसर के लिए यह स्टॉक लिमिट लागू की गई है, जो 31 मार्च 2024 तक जारी रहेगी। अधिसूचना के अनुसार व्यापारी/थोक विक्रेता के लिए 3000 मीट्रिक टन गेहूं रखने की सीमा है। रिटेलर के लिए हर रिटेल आउटलेट में 10 टन की सीमा निर्धारित की गई है। इसी तरह, बड़े चेन रिटेलर्स को हर आउटलेट में 10 टन और डिपो में तीन हजार टन गेहूं रखने की अनुमति दी गई है। प्रोसेसर अपनी सालाना क्षमता के 75% तक अथवा 2023-24 के बाकी बचे महीनों के लिए मासिक स्थापित क्षमता के बराबर (दोनों में से जो भी कम हो) गेहूं रख सकते हैं।<br />खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग के व्हीट स्टॉक मॉनिटरिंग सिस्टम के पास इन सबको हर सप्ताह अपने स्टॉक की स्थिति बतानी है। अगर उनके पास अधिसूचना जारी होने के समय निर्धारित सीमा से अधिक मात्रा में गेहूं था तो उन्हें 30 दिनों के भीतर उसे कम करना पड़ेगा।<br />गेहूं की सप्लाई सुधारने के लिए केंद्र सरकार ने सेंट्रल पूल से 15 लाख टन गेहूं जारी करने का भी निर्णय लिया है। खुले बाजार की बिक्री योजना (ओएमएसएस) के तहत यह गेहूं आटा मिलों, निजी ट्रेडर, थोक खरीदारों तथा गेहूं के उत्पाद बनाने वालों को बेचा जाएगा। यह बिक्री ई-नीलामी के जरिए की जाएगी। सरकार ने 23 जून को भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) को ई-नीलामी के माध्यम से गेहूं और चावल बेचने का निर्देश दिया। इस निर्देश के अनुसार निगम को 5 जुलाई से इनकी बिक्री करनी थी। बाजार हस्तक्षेप योजना के तहत इन दोनों कमोडिटी की कीमतों को नियंत्रित करने के मकसद से यह निर्णय लिया गया। इस ई-नीलामी में कोई भी खरीदार अधिकतम 100 टन खरीद के लिए बोली लगा सकता है। उचित औसत क्वालिटी वाले गेहूं के लिए कम से कम 2150 रुपए प्रति क्विंटल की कीमत रखी गई है। यह कीमत घोषणा वाले सप्ताह के दौरान औसत थोक मूल्य की तुलना में छठवां हिस्सा कम है।<br />गेहूं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए किए गए उपाय अहम जान पड़ते हैं, क्योंकि सरकार ने ऐसा कोई संकेत नहीं दिया है कि उत्पादन में कमी से गेहूं की किल्लत हो सकती है। सरकार ने तो फरवरी में जारी खाद्यान्न उत्पादन के दूसरे अग्रिम अनुमान में 1121.8 लाख टन रिकॉर्ड गेहूं उत्पादन की बात कही थी। मई के अंत में जारी तीसरे अग्रिम अनुमान में इसे संशोधित कर 1127.4 लाख टन कर दिया था। इन अनुमानों के आधार पर माना जा रहा था कि 2022-23 में गेहूं उत्पादन में वृद्धि बीते 5 वर्षों के दौरान (2017-18 के बाद) सबसे अधिक होगी। 2021-22 में उत्पादन में गिरावट को देखते हुए यह अच्छी खबर थी।&nbsp;<br />महीने के अंत में रबी मार्केटिंग सीजन शुरू हुआ तो गेहूं की सप्लाई को लेकर स्थिति अच्छी लग रही थी। सरकार का अनुमान था कि इस बार 342 लाख टन गेहूं की खरीद होगी। सरकार ने रबी मार्केटिंग सीजन 2022-23 के दौरान 187.9 लाख टन गेहूं की खरीद की थी। 9 मई तक सरकारी खरीद सुचारू रूप से चल रही थी। उस समय तक 252 लाख टन गेहूं की खरीद हो चुकी थी जो पिछले साल की तुलना 75 लाख टन अधिक थी।<br />गेहूं की बाजार परिस्थितियों को लेकर पहली बार मई के मध्य में चिंता उभरने लगी। एफसीआई के आंकड़े बताते हैं कि उसके बाद से गेहूं की खरीद बहुत मामूली रह गई। मई के अंत तक केंद्र और राज्य की एजेंसियों की कुल खरीद 262 लाख टन तक ही पहुंच सकी। महत्वपूर्ण बात यह है कि जून में खत्म होने वाला खरीद का सीजन मई तक भी नहीं चल सका। खरीद सीजन खत्म हुआ तो वास्तविक खरीद सरकार के 342 लाख टन के लक्ष्य की तुलना में लगभग 25% काम थी।<br />इस तरह मौजूदा रबी मार्केटिंग सीजन में गेहूं की खरीद का स्तर 2016-17 के बाद दूसरा सबसे कम था। उस वर्ष 230 लाख टन गेहूं की खरीब दुई थी। पिछले साल गेहूं उत्पादन में गिरावट से पहले 5 वर्षों के दौरान सालाना औसत खरीद 366 लाख टन थी। यह इस साल की तुलना में काफी ज्यादा है। यही नहीं, रबी मार्केटिंग सीजन 2021-22 में 433.4 लाख टन की खरीद हुई थी। वह भी तब जब उत्पादन सरकार के इस साल के अनुमान से भी कम था। उत्पादन के अनुमानों और वास्तविक खरीद के बीच तारतम्य न होने पर सरकार की तरफ से कोई बयान नहीं आया है, लेकिन ऐसे अनेक संकेत हैं जो इसकी वजह बताते हैं।<br />सरकार इस साल गेहूं उत्पादन को लेकर काफी उत्साहित थी, लेकिन मौसम ने विलेन का काम किया। मार्च और अप्रैल में गेहूं उत्पादन वाले प्रमुख इलाकों में बेमौसम बारिश से उत्पादन प्रभावित हुआ। इसके असर को देखते हुए केंद्र सरकार ने गेहूं खरीद के लिए गुणवत्ता मानकों में ढील देने का फैसला किया, खासकर बारिश के कारण गेहूं की चमक खोने के चलते। पिछले साल अपेक्षाकृत कम गुणवत्ता वाला गेहूं एफसीआई के गोदामों में पहुंचा था, जबकि निजी ट्रेडर और मिलिंग इंडस्ट्री ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से अधिक कीमत देकर अच्छी क्वालिटी का गेहूं खरीदा था। इंडस्ट्री ने सीधे बाजार से गेहूं खरीदने का जो फैसला किया वह खुली बाजार बिक्री योजना के तहत गेहूं सप्लाई करने की सरकार की क्षमता को लेकर उनके नकारात्मक एसेसमेंट को दर्शाता है। इस सेंटीमेंट का एक प्रमुख कारण यह हो सकता है कि सेंट्रल पूल में गेहूं का स्टॉक बहुत कम रह गया। अप्रैल में यह सिर्फ 83.5 लाख टन था जो 2008 के बाद सबसे कम है। उसी वर्ष गेहूं पर पहली बार स्टॉक लिमिट लगाई गई थी। जून में सेंट्रल पूल में गेहूं का स्टॉक 314 लाख टन पहुंच गया जो जून 2022 के 311 लाख टन की तुलना में थोड़ा अधिक है। पिछले साल का स्टॉक भी 2008 के बाद सबसे कम था।<br />मौजूदा खरीद सीजन में निजी ट्रेडर्स और मिलिंग इंडस्ट्री के अत्यधिक सक्रिय रहने के पीछे उनका यह आकलन हो सकता है कि 2022-23 में गेहूं का उत्पादन 2021-22 से भी कम रहेगा। रोलर फ्लोर मिलर्स फेडरेशन के अनुसार गेहूं का उत्पादन सरकार के तीसरे अग्रिम अनुमान 1127.4 लाख टन से कम से कम 10 प्रतिशत नीचे रहेगा। गेहूं की कीमतों और खरीद का ट्रेंड बताता है कि इसके उत्पादन को लेकर इंडस्ट्री का आकलन ज्यादा सटीक है।<br />गेहूं की मौजूदा बाजार परिस्थितियां संकेत देती हैं कि आने वाले महीनों में इसकी सप्लाई कम हो सकती है। इसलिए महंगाई के रिजर्व बैंक की निर्धारित सीमा से नीचे आने से पहले ही अनाजों के दाम बढ़ सकते हैं। गेहूं की कीमतों में तेजी तो है ही, धान उत्पादन को लेकर भी संशय बना हुआ है। खासकर बीते हफ्तों के दौरान मानसून की स्थिति को देखते हुए। किसी भी तरह की सट्टेबाजी को रोकने के लिए सरकार ने तत्काल स्टॉक लिमिट लगाने का निर्णय लिया है। इसे उचित समय पर आवश्यक वस्तु अधिनियम लागू करने के लिए भी तैयार रहना चाहिए।</p>
<p><em><strong>(डॉ. बिस्वजीत धर जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर और काउंसिल फॉर सोशल डेवलपमेंट के वाइस प्रेसिडेंट हैं। लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं)</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ गेहूं की कीमत और खरीद के आंकड़ों से इसके उत्पादन के सरकारी अनुमान पर सवाल ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[वर्ल्ड जूनोसिस डेः नई और उभरती पशुजन्य बीमारियां और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर उनका प्रभाव]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/new-and-emerging-zoonoses-and-their-public-health-importance.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 06 Jul 2023 13:29:21 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/new-and-emerging-zoonoses-and-their-public-health-importance.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>मानव आबादी के विस्तार के साथ-साथ पशुजन्य (जूनोटिक) बीमारियों का एक लंबा इतिहास रहा है जो जानवरों और मनुष्यों के बीच फैलती है। हवाई परिवहन और वैश्वीकरण की प्रगति ने दुनिया भर में संक्रामक रोगों के तेजी से प्रसार को और भी आसान बना दिया है। संक्रामक रोगों के विस्तार, पशुजन्य संबंधी नई-नई बीमारियों के आने, रोग संचरण (ट्रांसमिशन) पर शहरीकरण के प्रभाव और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए पशुजन्य रोगों (जूनोसेस) के महत्व की इस लेख में पड़ताल की गई है।</p>
<p><strong>उभरती पशुजन्य बीमारियां</strong></p>
<p>हाल के अध्ययनों से पता चला है कि अधिकांश उभरती संक्रामक बीमारियां (ईआईडी) जूनोसेस (पशुजन्य रोग) हैं जो सभी संक्रामक बीमारियों का 60.3 फीसदी है। इनमें से 71.8 फीसदी वन्यजीवों में उत्पन्न होते हैं, जैसे सार्स (सीवियर एक्यूट रेसपेरिटरी सिंड्रोम) और इबोला वायरस। पिछले चार दशकों में ऐसी लगभग 50 नई बीमारियों की पहचान की गई है। इनमें इक्वाइन मॉर्बिली वायरस, निपाह वायरस, दक्षिण अमेरिकी हंता वायरस और नए स्ट्रेन एर्लिचिया एवं बेबेसिया शामिल हैं जो मनुष्यों में गंभीर बीमारियों या मृत्यु का कारण बन सकते हैं।</p>
<p><strong>शहरीकरण और रोग संचरण</strong></p>
<p>शहरीकरण की प्रक्रिया ने ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर बड़े पैमाने पर श्रमिकों की आवाजाही को बढ़ाया है। इसकी वजह से पशुजन्य रोगों का संभावित प्रसार हुआ है। लीमा, पेरू जैसे शहरी समुदायों और गाजा पट्टी और वेस्ट बैंक जैसे संघर्ष वाले क्षेत्रों में ब्रुसेलोसिस जैसी बीमारियों का प्रकोप अनियंत्रित शहरीकरण के परिणामों को उजागर करता है। नए क्षेत्रों में मानव आबादी का विस्तार भी पशुजन्य रोगों के उत्पन्न होने में योगदान देता है। उदाहरण के लिए, पेरू और ब्राजील के सुदूर जंगलों में नए कृषि समुदायों के बसने से पिशाच-चमगादड़ रेबीज का बड़ा प्रकोप हुआ।</p>
<p>एशिया में जापानी एन्सेफलाइटिस एक महत्वपूर्ण पशुजन्य बीमारी है जो हर साल हजारों लोगों को प्रभावित करती है। यह बीमारी धान के खेत की सिंचाई पद्धतियों से करीब से जुड़ी हुई है। धान का खेत स्थिर पानी का बड़ा क्षेत्र होता है जो वायरस फैलाने वाले मच्छरों के लिए एक आदर्श प्रजनन भूमि प्रदान करती है। इन स्थिर जल निकायों में मच्छर पनपते हैं और इन क्षेत्रों में मानव आबादी की निकटता से संचरण का खतरा बढ़ जाता है। एशिया में जापानी एन्सेफलाइटिस की घटना खासतौर पर अधिक है। सालाना इसके लगभग 30 हजार मानव मामले आते हैं जिससे लगभग 7,000 लोगों की &nbsp;मौत हो जाती है।</p>
<p><strong>सार्वजनिक स्वास्थ्य </strong></p>
<p>जहां तक मानव स्वास्थ्य की बात है तो पशुजन्य रोगों की ज्यादा संख्या, उनकी बढ़ती आवृत्ति (फ्रीक्वेंसी) और गंभीरता के कारण यह सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। अनुमान है कि दुनिया भर में सालाना 40-70 हजार लोग रेबीज से मरते हैं, खासकर कुत्ते के काटने के कारण। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की पशुजन्य रोग विशेषज्ञ समिति ने 250 से अधिक पशुजन्य रोगों की पहचान की है। आमतौर पर इनसे संक्रमण तब होता है जब मनुष्य संक्रमित जानवरों के संपर्क में आता है, जैसा कि रेबीज, ब्रुसेलोसिस और टीबी जैसी बीमारियों में देखा जाता है। पशुजन्य बीमारियों से न केवल मानव जीवन का नुकसान होता है, बल्कि रोगग्रस्त पशुओं का नुकसान, कृषि उत्पादन में कमी, इसकी रोकथाम और उपचार की लागत और मानव उत्पादकता में कमी के कारण महत्वपूर्ण आर्थिक बोझ भी पड़ता है।</p>
<p><strong>रोकथाम एवं नियंत्रण</strong></p>
<p>पशुजन्य रोगों की रोकथाम और नियंत्रण में तीन स्तरीय दृष्टिकोण शामिल हैं- मनुष्यों की प्रत्यक्ष सुरक्षा, पशुओं में संक्रमण को कम करना या समाप्त करना और वेक्टर-विरोधी उपाय। मनुष्यों की प्रत्यक्ष सुरक्षा करने के तहत विशिष्ट टीकाकरण कार्यक्रम आवश्यक हो सकते हैं, जैसे सीवेज श्रमिकों के लिए लेप्टोस्पायरोसिस टीकाकरण या पशु चिकित्सकों और टैक्सिडर्मिस्ट जैसे उच्च जोखिम वाले व्यक्तियों के लिए रेबीज टीकाकरण। पशुओं में संक्रमण को कम करने के लिए कुत्तों में रेबीज की रोकथाम के लिए टीकाकरण, जानवरों को बांध कर या बंद रखना, काटने वाले कुत्तों को अलग रखना और आवारा जानवरों को हटाना आवश्यक है। इसके अलावा जानवरों में रोग नियंत्रण के लिए बीमार और संक्रमित जानवरों को मारने के साथ-साथ संक्रमित झुंडों को अलग रखने एवं उनकी जांच जरूरी है। खेतों और बूचड़खानों में स्वच्छ (हाइजेनिक) प्रबंधन प्रथाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। संक्रामक वायरस के प्रसार को रोकने के लिए वेक्टर और वाहन नियंत्रण उपाय आवश्यक हैं। साथ ही खाद्य श्रृंखला से संक्रमित सामग्रियों को पूरी तरह से हटाना आवश्यक है। खाद्य और कृषि संगठन, विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन और डब्ल्यूएचओ जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठन पशुजन्य रोगों के प्रसार को रोकने और नियंत्रित करने के लिए नियमों और अंतर-एजेंसी सहयोग के सामंजस्य की सुविधा प्रदान करते हैं।</p>
<p>दुनिया में लोगों के बीच बढ़ती परस्पर संबद्धता के साथ-साथ पशुजन्य बीमारियां सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण खतरा बन गई हैं। पशुजन्य संबंधी नई बीमारियों के उत्पन्न होने, शहरीकरण और पर्यावरणीय परिवर्तनों से रोग संचरण का खतरा बढ़ गया है। इसे रोकने और नियंत्रित करने के लिए मानव और पशु स्वास्थ्य क्षेत्रों, वेक्टर नियंत्रण, टीकाकरण और प्रभावी निगरानी प्रणालियों को शामिल करते हुए एक व्यापक दृष्टिकोण की आवश्यकता है। इन बीमारियों की रोकथाम और नियंत्रण को प्राथमिकता देकर हम मानव और पशु आबादी पर इनके प्रभाव को कम कर सकते हैं, सार्वजनिक स्वास्थ्य परिणामों में सुधार ला सकते हैं और इनसे जुड़े आर्थिक बोझ को कम कर सकते हैं।</p>
<p><strong><em>(</em></strong><strong><em>डॉ. अब्दुस सबूर शेख</em></strong> <strong><em>सामुदायिक पशु चिकित्सा विशेषज्ञ हैं।</em></strong> <strong><em>ग्रामीण भारत में पशुधन आधारित आजीविका विकास में उन्हें 20</em></strong> <strong><em>वर्षों से अधिक का अनुभव है।)</em></strong>&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ वर्ल्ड जूनोसिस डेः नई और उभरती पशुजन्य बीमारियां और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर उनका प्रभाव ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[अमेरिका की बाजार केंद्रित कृषि नीति में बदलाव से ही भारत के साथ द्विपक्षीय सहयोग सार्थक]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/bilateral-cooperation-with-india-meaningful-only-because-of-change-in-americas-market-oriented-agricultural-policy.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 20 Jun 2023 13:33:48 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/bilateral-cooperation-with-india-meaningful-only-because-of-change-in-americas-market-oriented-agricultural-policy.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>हरित क्रांति के जनक और 1970 में नोबेल शांति पुरस्कार विजेता डॉ. नॉर्मन बोरलॉग ने कहा था, "आप भूखे पेट विश्व में शांति नहीं बना सकते&rdquo;। कोविड-19 महामारी के बाद की दुनिया में उनके इस कथन के दूरगामी और गंभीर परिणाम देखने को मिल रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार 2021 में वैश्विक भुखमरी के शिकार और कुपोषित लोगों की संख्या बढ़कर 82.8 करोड़ हो गई जो की दुनिया की आबादी का करीब 10 फीसदी है। दुनिया भर में बढ़ते जातीय संघर्ष, युद्ध और जलवायु परिवर्तन के कारण सस्ती कीमत पर भोजन की उपलब्धता दूर की कौड़ी बनती जा रही है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। यहां के लगभग 80 करोड़ लोग अपनी खाद्य संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सरकारी सब्सिडी वाले राशन पर निर्भर हैं, जबकि भारत 142 करोड़ की आबादी के साथ दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाला देश बन गया है।</p>
<p>एक ओर हरित क्रांति ने भारत को खाद्य उत्पादन में अपनी जरूरतों को पूरा करने में सक्षम बनाया, वहीं कृषि शिक्षा, विज्ञान और अनुसंधान के मूलभूत ढांचे और सरंचना ने खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने में अहम् भूमिका निभाई। भारत में कृषि शिक्षा, अनुसंधान और प्रसार की विशाल दीवार भारत और अमेरिका के घनिष्ट संबंधों का जीता जागता उदहारण हैं। वर्तमान में &nbsp;भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के 113 संस्थानों, 74 राज्य कृषि विश्वविद्यालयों, 4 मानद विश्वविद्यालयों, 3 केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालयों और 4 केंद्रीय विश्वविद्यालयों के साथ देश की राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली दुनिया में सबसे बड़ी है। कृषि विश्वविद्यालयों की नींव अमेरिका के लैंड ग्रांट यूनिवर्सिटी (एलजीयू) की तर्ज पर इंडो-अमेरिकन टीमों की सिफारिशों पर अमेरिकी सरकार, फोर्ड और रॉकफेलर फाउंडेशन की मदद से की गई। इसकी बदौलत भारत में एलजीयू की तर्ज पर पहला राज्य कृषि विश्वविद्यालय 1960 में पंतनगर में स्थापित किया गया था। इसी के साथ 1960 के दशक के मध्य में भारत में अमेरिका के सहयोग से हरित क्रांति की शुरुआत ने देश को विनाशकारी अकाल से बचाया।</p>
<p>गेहूं और चावल की अर्द्ध-बौनी और उच्च उपज वाली किस्मों के उत्पादन के परिणाम अभूतपूर्व थे। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के नेतृत्व में प्रो. एम.एस. स्वामीनाथन ने गेहूं में मेक्सिको की नोरिन-10 से प्राप्त अर्द्ध-बौना आरएचटी जीन और विशेष रूप से ताइवान से प्राप्त डी-जियो-वू-जीन चावल की किस्म से प्राप्त अर्द्ध-बौना एसडी-1 जीन से भारत में पहली सबसे लोकप्रिय अर्द्ध-बौनी आईआर-8 चावल किस्म का विकास किया। इसकी स्वीकृति और प्रचलन से कृषि विज्ञान और अनुसंधान को गति मिली और अगले पांच दशकों तक देश में अर्द्ध-बौना जीन आरएचटी और एसडी-1 का विभिन्न कृषि जलवायु क्षेत्रों के लिए आधुनिक गेहूं और चावल की किस्मों को विकसित करने के लिए बड़े पैमाने पर उपयोग किया गया। देश के किसानों ने गेहूं और चावल की अर्द्ध-बौनी और उच्च उपज वाली किस्मों को खूब अपनाया। इसके साथ ही सिंचाई, उर्वरक और मशीनीकरण जैसे कृषि उद्योगों के विकास की एक नई लहर खेतों और खलिहानों में दौड़ पड़ी।</p>
<p>अनाज की फसलों में कृषि विज्ञान का वो दौर आगे बढ़ा और 1980 के दशक में संकर पद्धति का उपयोग अधिक उपज वाले संकर बीजों के रूप में बाजरा, जवारी, कपास और सब्जियों में व्यापक स्तर पर होने लगा। इसके परिणामस्वरूप आज देश में अन्न के भंडार भरे हैं। वर्ष 2022-23 में भारत ने खाद्यान्न और बागवानी फसलों का क्रमशः 33 करोड़ और 34.2 करोड़ टन उत्पादन कर नया रिकॉर्ड बनाया। अपनी खाद्य सुरक्षा को पूरा कर आज भारत दुनिया भर में कृषि और खाद्य उत्पादों का 50 अरब डॉलर से ज्यादा का निर्यात कर रहा है।</p>
<p>इक्कीसवीं सदी में अमेरिकी सरकार कृषि और खाद्य नीति में बड़ा बदलाव कर कृषि में बौद्धिक संपदा अधिकारों की सुरक्षा, प्रौद्योगिकियों का व्यावसायीकरण और व्यापार के माध्यम से अपनी बहुराष्ट्रीय कंपनियां के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार खोलने में लग गई। भारत में भी इसका प्रभाव देखने को मिला। अमेरिकी सरकार, उसकी सहायक एजेंसियों और विकास संस्थानों का ध्यान और दृष्टिकोण कृषि में द्विपक्षीय सहयोग से निजी व्यवसाय और बाजार व्यवस्था को सक्षम करने में निहित किया गया। चाहे 2001 में अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश और भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा हस्ताक्षरित &ldquo;उच्च प्रौद्योगिकी सहयोग समूह (एचटीसीजी)&rdquo; हो या 2005 में राष्ट्रपति जॉर्ज बुश और भारतीय प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा हस्ताक्षरित &ldquo;यूएस-इंडिया नॉलेज इनिशिएटिव ऑन एग्रीकल्चर एजुकेशन, टीचिंग, रिसर्च, सर्विस और कमर्शियल लिंकेज (एकेआई)&rdquo; हो, कृषि का बाजार खोलने की व्यवस्था और कृषि व्यवसाय द्विपक्षीय सहयोग का अभिन्न अंग बन गया। यही नहीं, 2021 के भारत-अमेरिकी टीपीएफ के अंतर्गत "2 बनाम 2 कृषि बाजार खोलने" की व्यवस्था के मुताबिक अमेरिका ने&nbsp; भारतीय आमों और अनार/अनार के दानों का बाजार इस शर्त पर खोला कि भारत अमेरिकी चेरी और अमेरिकी अल्फाल्फा घास के लिए अपना बाजार खोले।</p>
<p>वैश्वीकरण के इस दौर में सरकारों के बीच द्विपक्षीय सहयोग के माध्यम से बाजार को खोलना विकासशील और विकसित देशों के बीच कोई फर्क नहीं रखता है। जहां तक विकसित और विकासशील देशों की बात है, तो जलवायु परिवर्तन के इस काल में जहां गरीबी, भुखमरी और कुपोषण विकासशील देशों में अपने पैर फैला रही है, वहीं विकसित देशों का मानवीय कर्तव्य कि बाजार व्यवस्था के साथ-साथ विकासशील देशों को द्विपक्षीय सहयोग के माध्यम से कृषि के क्षेत्र में अच्छी पद्धति, नई तकनीक और नवाचार के लिए सहयोग करें। साथ ही नई तकनीक और नवाचार को इन देशों में खाद्य पदार्थों की उत्पादकता को बढ़ाने के लिए साझा करें।</p>
<p>भारत और अमेरिकी सहयोग और व्यापर तभी सार्थक होगा जब अमेरिका भारत में द्विपक्षीय सहयोग से कृषि विज्ञान, अनुसंधान और संयुक्त तकनीकी विकास कार्यक्रमों को तेज करे। अमेरिकी कांग्रेस को तेजी से विकसित हो रहे वैश्विक व्यापार और प्रौद्योगिकियों में कृषि तकनीकियों जैसे बायोटेक, जीनोम एडिटिंग, डिजिटल एवं प्रिसिजन खेती को आकार देने के लिए पर्याप्त संसाधनों का आवंटन कर जलवायु-स्मार्ट एवं सतत कृषि से खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित किया जा सके। भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी को बाजार खोलने और व्यापार से परे देखना चाहिए और कृषि विज्ञान और विकास में सहयोग करना चाहिए।</p>
<p>भारत और अमेरिका दुनिया के दो सबसे बड़े कृषि उत्पादक देश हैं। उन्हें एक-दूसरे से बहुत कुछ सीखना है। भारत और अमेरिका को कृषि क्षेत्र में सिंजेंटा और एडामा जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के अधिग्रहण के साथ चीन का वैश्विक स्तर पर कृषि क्षेत्र में उभरती उद्योग संरचना से होने वाले प्रभावों को समझाना हैं और नई कृषि रणनीति बनाने की अवश्यकता है।</p>
<p>भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिकी यात्रा में दोनों देशों के बीच 21वीं सदी में कृषि व्यापार के साथ कृषि विज्ञान, अनुसंधान, नवाचार और विकास की जुगलबंदी और साझेदारी की जरूरत हैं। कृषि विकास में सहयोग कर भारत और अमेरिका एक मजबूत और अधिक टिकाऊ कृषि क्षेत्र का निर्माण कर सकते हैं जो दोनों देशों को सतत लाभान्वित करने में सहायक साबित होगी।</p>
<p><em><strong>(</strong><strong>भगीरथ चौधरी जोधपुर स्थित दक्षिण एशिया बायोटेक्नोलॉजी केंद्र के संस्थापक हैं।)</strong>&nbsp;</em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ अमेरिका की बाजार केंद्रित कृषि नीति में बदलाव से ही भारत के साथ द्विपक्षीय सहयोग सार्थक ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[प्रकृति की शक्तिः अगली पीढ़ी के बायोलॉजिकल्स से आएगी कृषि में क्रांति]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/nature-arsenal-unleashed-next-generation-biologicals-can-revolutionise-the-agriculture.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 12 Jun 2023 08:34:16 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/nature-arsenal-unleashed-next-generation-biologicals-can-revolutionise-the-agriculture.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">कृषि क्षेत्र में हमेशा बदलाव होते रहे हैं। अगली पीढ़ी के बायोलॉजिकल्स के उभरने से कृषि में परिवर्तनकारी प्रगति देखने को मिली है। बीते दो दशकों में इस क्षेत्र में वैज्ञानिक खोज और तकनीकी क्षमता, दोनों में काफी तरक्की हुई है। इससे मिट्टी से संबंधित माइक्रोबायोलॉजी, पौधों और जीवाणुओं के बीच परस्पर क्रिया तथा पौधों की नियमन व्यवस्था को हम बेहतर तरीके से समझ पाए हैं। इस लेख का उद्देश्य उन वैज्ञानिक जटिलताओं और प्रौद्योगिकीय सफलताओं को समझना है जिनकी वजह से उन्नत बायोलॉजिकल सॉल्यूशंस का विकास हो रहा है। हम भारतीय बाजार के साथ अमेरिका और यूरोप के बाजारों की तुलना करेंगे। उनके बीच खास अंतर और अवसरों को देखेंगे। इसके अतिरिक्त, हम भारत के लिए सबसे अधिक प्रासंगिक बायोलॉजिकल्स के बारे में जानेंगे। मिट्टी की सेहत, खाद्य पदार्थों के उत्पादन, जलवायु के प्रति लचीलेपन की क्षमता तथा किसानों के मुनाफे पर उनके असर की भी चर्चा करेंगे। उपलब्ध आंकड़ों, वैज्ञानिक रिपोर्ट, शोध के उदाहरण तथा कॉमर्शियल उत्पादों के व्यापक विश्लेषण के जरिए हम कृषि क्षेत्र में एक टिकाऊ और संपन्न भविष्य का रास्ता तलाशेंगे।</span></p>
<p><strong>मिट्टी से संबंधित माइक्रोबायोलॉजी और जीवाणुओं की परस्पर क्रिया के क्षेत्र में प्रगति</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">पिछले दो दशक के दौरान मिट्टी में पाए जाने वाले जीवाणुओं तथा पौधों के बीच परस्पर क्रिया पर अनेक शोध कार्य हुए हैं। उदाहरण के लिए स्मिथ एवं अन्य (2018) की एक स्टडी नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित हुई थी। उसमें बताया गया है कि खास तरह के जीवाणु समुदाय पौधों में पोषक तत्वों को ग्रहण करने की क्षमता बढ़ा सकते हैं। इससे फसल की उत्पादकता 15 फीसदी तक बढ़ सकती है। इस जानकारी से ऐसे माइक्रोबॉयल इनोकुलेंट और बायोफर्टिलाइजर विकसित करने में मदद मिली जिनसे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है तथा उनमें पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ती है। राइजोबियम आधारित बायोफर्टिलाइजर और माइकोरिजल इनोकुलेंट जैसे कॉमर्शियल उत्पादों को अमेरिका तथा यूरोपीय बाजारों में बड़े पैमाने पर स्वीकार किया गया है। इनका फसलों की उत्पादकता तथा मिट्टी की सेहत पर महत्वपूर्ण एवं सकारात्मक असर पड़ा है।</span></p>
<p><strong>पौधों के बीच परस्पर क्रिया तथा नियमन की जटिलताओं को समझना</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">हाल के कुछ प्रयोगों से दो पौधों के बीच परस्पर क्रिया की जटिलताओं तथा पौधों के विकास का नियमन करने वाली व्यवस्था को समझने का अवसर मिला है। उदाहरण के लिए बाल्डविन एवं अन्य (2020) का एक शोध प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल अकादमी ऑफ साइंसेस में प्रकाशित हुआ है। इस शोध में पौधों के बीच संचार में सिग्नलिंग मॉलिक्यूल की भूमिका को बताया गया है। इससे आसपास के पौधों को आसन्न संकट से निपटने का मौका मिलता है। इस जानकारी से इनोवेटिव बायोकंट्रोल एजेंट, बायोस्टिम्युलेंट और प्लांट ग्रोथ रेगुलेटर विकसित करने में मदद मिली है। एलिसिटर आधारित बायोस्टीमुलेंट और सिस्टेमिक एक्वायर्ड रेजिस्टेंस (एसएआर) इंड्यूसर जैसे कॉमर्शियल उत्पादों से पौधों में सुरक्षा मेकैनिज्म और फसलों की प्रतिरोधी क्षमता को सुधारने में मदद मिली है।</span></p>
<p><strong>इनोवेशन के लिए टेक्नोलॉजिकल टूल</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी से अगली पीढ़ी के बायोलॉजिकल्स के विकास में क्रांति आई है। उदाहरण के लिए CRISPR-Cas9 जैसी जेनेटिक इंजीनियरिंग तकनीक में प्रगति से माइक्रोबॉयल स्ट्रेन और प्लांट जीनोम में खास तरह के बदलाव किए गए ताकि अपेक्षित नतीजे मिल सकें। शोधकर्ताओं ने ऐसे माइक्रोबॉयल स्ट्रेन तैयार करने में सफलता पाई है जिनसे बीमारियों के लिए प्रतिरोधी क्षमता के साथ पोषक तत्वों को ग्रहण करने की क्षमता बढ़ाई जा सके। इससे कॉमर्शियल प्रोडक्ट के डेवलपमेंट का भी रास्ता साफ हुआ। इसके अतिरिक्त हाई थ्रूपुट स्क्रीनिंग तथा ओमिक्स टेक्नोलॉजी के प्रयोग से नए बायोएक्टिव कंपाउंड, फायदेमंद माइक्रोबॉयल स्ट्रेन विकसित करने में तेजी आई है। साथ ही पौधों के साथ उनकी परस्पर क्रिया को भी बेहतर समझा जा सका है। इससे ऐसे पेटेंट वाले माइक्रोबॉयल फॉर्मूलेशन और बायो आधारित प्रोडक्ट विकसित करने में सफलता मिली जो क्षमता और विशिष्टता के मामले में बेहतर होते हैं।</span></p>
<p><strong>हम कहां हैं? अमेरिका, यूरोप और भारत का नजरिया</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">बायोलॉजिकल्स की स्वीकार्यता विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग है। अमेरिका और यूरोप में रेगुलेटरी ढांचा अनुकूल होने तथा उपभोक्ताओं में सस्टेनेबल प्रोडक्ट की मांग होने के कारण बाजार का विकास हुआ है। मार्केट रिसर्च फ्यूचर की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में वर्ष 2000 से 2020 के दौरान बायोलॉजिकल के बाजार के विभिन्न सेगमेंट में 150 से अधिक प्रोडक्ट उतारे गए हैं। इनमें बायोपेस्टिसाइड, बायो फर्टिलाइजर और बायोस्टिम्युलेंट शामिल हैं। इसी तरह यूरोप के बायोलॉजिकल बाजार में 200 से ज्यादा माइक्रोबॉयल स्ट्रेन तथा बायो मॉलिक्यूल का इसी अवधि में रजिस्ट्रेशन हुआ है। इनसे वहां सस्टेनेबल (टिकाऊ) खेती की प्रमुख चुनौतियों का समाधान निकालने में मदद मिली है। इसके विपरीत भारत में अभी तक इस तरह के उत्पादों को अपनाना शुरुआती चरण में है। यहां कमर्शियल प्रोडक्ट की संख्या बहुत कम है। हालांकि यहां के बाजार में संभावनाएं काफी अधिक हैं क्योंकि भारत के कृषि क्षेत्र में बहुत अधिक विविधता है तथा सरकार भी खेती के सस्टेनेबल तौर-तरीकों पर जोर दे रही है।</span></p>
<p><strong>भारत के लिए सबसे अधिक प्रासंगिक बायोलॉजिकल्स और उनका प्रभाव</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">भारत की कृषि जलवायु विविधता और चुनौतियों को देखते हुए कुछ खास तरह के बायोलॉजिकल अधिक महत्वपूर्ण हैं। उदाहरण के लिए बेसिलस थुरिन्जिएंसिस आधारित बायोपेस्टिसाइड, जैसे माइक्रोबॉयल बायोकंट्रोल एजेंट के प्रयोग से कीटों को नियंत्रित करने तथा रासायनिक कीटनाशकों के इस्तेमाल में कमी लाने में उल्लेखनीय सफलता मिली है। बायोफर्टिलाइजर के क्षेत्र में एजोटोबेक्टर और राइजोबियम जैसे नाइट्रोजन फिक्सिंग बैक्टीरिया स्ट्रेन नाइट्रोजन की उपलब्धता बढ़ाने और सिंथेटिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने में महत्वपूर्ण साबित हुए हैं। सीवीड सत्व, ह्यूमिक पदार्थ और माइक्रोबॉयल मेटाबोलाइट से भरपूर बायोस्टिम्युलेंट से फसल की ग्रोथ, विपरीत परिस्थितियों को झेलने की क्षमता तथा उत्पादकता सुधारने में अच्छे नतीजे मिले हैं। इन बायोलॉजिकल समाधान को अपनाने तथा सस्टेनेबल खेती के तौर-तरीके से मिट्टी की सेहत में सुधार हो सकता है, संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल हो सकता है और भारतीय कृषि क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन को लेकर प्रतिरोधक क्षमता विकसित की जा सकती है।</span></p>
<p><strong>भविष्य का परिदृश्यः पेप्टाइड, एप्टेमर, सिग्नलिंग मॉलिक्यूल तथा अन्य</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">भविष्य की बात करें तो अगले 10 साल के दौरान कृषि क्षेत्र में बायोलॉजिकल्स की प्रगति के लिए काफी संभावनाएं हैं। शोधकर्ता पेप्टाइड, एप्टेमर, सिग्नलिंग मॉलिक्यूल तथा अन्य बायो मॉलिक्यूल के इस्तेमाल की संभावनाएं तलाश रहे हैं। यह टारगेटेड कीटों और बीमारियों पर नियंत्रण के लिए है। उदाहरण के लिए पेप्टाइड आधारित बायोपेस्टिसाइड ने खास तरह के कीटो को नियंत्रित करने में अच्छा प्रदर्शन किया है। एप्टेमर के जरिए बीमारी का शुरुआती दिनों में ही पता लगाने के लिए पैथोजेन को पहचानने में मदद मिली है। इसी तरह कोरम सेंसिंग मॉलिक्यूल जैसे माइक्रोबॉयल स्रोतों से प्राप्त सिग्नलिंग मॉलिक्यूल का प्रयोग पौधों की रिस्पांस क्षमता सुधार सकता है, तथा उनमें विपरीत परिस्थितियों को झेलने की क्षमता विकसित कर सकता है। जिस तरह के शोध चल रहे हैं और पेटेंट्स की फाइलिंग की गई है, उनसे पता चलता है कि इस तरह की प्रौद्योगिकी में लोगों की रुचि बढ़ रही है। इनसे पौधों को बचाने तथा उनकी ग्रोथ के रेगुलेशन में क्रांतिकारी नतीजे देखने को मिल सकते हैं।</span></p>
<p><strong>निष्कर्ष</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अगली पीढ़ी के बायोलॉजिकल्स की इस यात्रा में वैज्ञानिक आविष्कार, तकनीकी उन्नयन और मार्केट डायनामिक्स ईंधन का काम कर रहे हैं। मिट्टी की माइक्रोबायोलॉजी, पौधों के बीच परस्पर क्रिया और पौधों के नियमन की व्यवस्था को समझने से बेहतर माइक्रोबॉयल स्ट्रेन, पौधों के सत्व और बायोएक्टिव कंपाउंड विकसित करने का रास्ता खुला है। बायोलॉजिकल्स को अपनाने तथा कॉमर्शियलाइजेशन से अमेरिका और यूरोप के बाजारों में अच्छी प्रगति देखने को मिली है। भारत का विशाल बाजार अब तक अनछुई संभावनाओं वाला है। भारत के विशाल कृषि क्षेत्र में अनेक विविधताएं हैं। सस्टेनेबल खेती के तरीके पर लगातार जोर देने, प्रासंगिक बायोलॉजिकल सॉल्यूशन को अपनाने से मिट्टी की सेहत में सुधार आ सकता है, फसलों की उत्पादकता बढ़ सकती है, पौधों में जलवायु रोधी क्षमता विकसित हो सकती है और आखिरकार किसानों का मुनाफा बढ़ सकता है। जैसे-जैसे हम अगले दशक की ओर बढ़ रहे हैं, पेप्टाइड, एप्टेमर, सिग्नलिंग मॉलीक्यूल, जेनेटिक इंजीनियरिंग तथा अन्य उभरती टेक्नोलॉजी के इंटीग्रेशन में कृषि क्षेत्र के भविष्य को आकार देने की संभावनाएं नजर आती हैं। इस उन्नति से न सिर्फ मिट्टी की सेहत और खाद्य उत्पादन में सुधार आएगा, बल्कि ये जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने और दुनियाभर के किसानों के लिए सस्टेनेबल और संपन्न भविष्य सुनिश्चित करने में भी अहम भूमिका निभा सकते हैं।</span></p>
<p><em><strong>(डॉ. रेणुका दीवान, बायोप्राइम एग्रीसॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड की सीईओ हैं)</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ प्रकृति की शक्तिः अगली पीढ़ी के बायोलॉजिकल्स से आएगी कृषि में क्रांति ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कृषि सब्सिडी पर डब्लूटीओ में विकासशील देशों की निष्क्रियता और इसका परिणाम]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/inaction-of-developing-countries-on-agricultural-subsidy-in-wto-and-its-implications.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 05 Jun 2023 08:30:33 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/inaction-of-developing-countries-on-agricultural-subsidy-in-wto-and-its-implications.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के कृषि समझौते में एग्रीकल्चर सब्सिडी का मुद्दा सबसे विवादास्पद मुद्दों में एक रहा है। इस विषय पर विकसित और विकासशील देश एक दूसरे के बिल्कुल विपरीत रहे हैं। विकासशील देशों का तर्क है कि विकसित देश बड़े पैमाने पर कृषि सब्सिडी देते हैं। इसकी मदद से कई महत्वपूर्ण फसलों के ग्लोबल बाजार में उन्होंने अपना बड़ा हिस्सा बना लिया है। इन देशों के लिए यह दोधारी तलवार की तरह हो गया है। एक तरफ तो सब्सिडी के कारण बड़े एग्री बिजनेस अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपने प्रोडक्ट को डंप करते हैं, जिससे विकासशील देशों के छोटे किसान वंचित रह जाते हैं। उन्हें उन बाजारों में पहुंचने का अवसर नहीं मिल पाता है, जबकि 1995 के डब्ल्यूटीओ के उरुग्वे दौर की वार्ता में उनके लिए समान अवसरों की बात कही गई थी। दूसरी बात यह है कि सब्सिडी का इस्तेमाल करके एग्री बिजनेस विकासशील देश के बाजारों का आसानी से दोहन कर सकते हैं। इस तरह ये इन देशों के कृषक समुदाय की आजीविका को विपरीत रूप से प्रभावित करते हैं। इसका असर इन देशों की घरेलू खाद्य सुरक्षा पर पड़ सकता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अमेरिका में कॉटन पर जो सब्सिडी दी जाती है, उसके विपरीत प्रभावों के बारे में ब्राजील ने विश्व व्यापार संगठन की विवाद निस्तारण बॉडी के सामने अपनी बात रखी थी। ब्राजील का कहना था कि कपास किसानों को अमेरिका की तरफ से जो सब्सिडी भुगतान और गारंटी दी जा रही है, वह डब्लूटीओ के कृषि समझौते (एओए) में सब्सिडी के प्रावधानों के विपरीत है। इस सब्सिडी की वजह से बाजार में विकृति पैदा हुई और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कपास के दामों में गिरावट आई। इसके अलावा अमेरिका निर्यात सब्सिडी भी दे रहा है जबकि डब्ल्यूटीओ के कृषि समझौते में इसकी बिल्कुल अनुमति नहीं है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अमेरिका और ब्राजील के बीच विवाद ने विकासशील देशों को यह मौका दिया कि इस तरह की असमानता वाली सब्सिडी को दूर करने के लिए वह कृषि समझाते में संशोधन की मांग कर सकें। बेनिन, बुर्किना फासो, चाड और माली को कॉटन 4 नाम से जाना जाता है। पश्चिम अफ्रीका के ये देश विदेशी मुद्रा आय के लिए कपास निर्यात पर ही बड़े पैमाने पर निर्भर करते हैं। अमेरिकी सब्सिडी के बाद वहां पैदा हुई दुर्दशा को भी सामने लाया गया। इन सबको दोहा दौर की वार्ता में व्यापक रूप से शामिल किया गया। उसमें तय किया गया कि डब्ल्यूटीओ के कृषि समझौते में नियम इस तरह होंगे कि विकासशील देश अपने विकास की जरूरतों को प्रभावी तरीके से लागू कर सकें। इसमें खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण विकास भी शामिल है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">डब्ल्यूटीओ के इतिहास में पहली बार विकासशील देशों ने एक समूह के रूप में बात की ताकि संबंधित नियमों को उनके हितों की सुरक्षा को देखते हुए संशोधित किया जा सके। एक तरफ तो उन्होंने विकसित देशों की सब्सिडी कम करने का दबाव दिया ताकि ग्लोबल मार्केट में पैदा हुई विकृति को कम किया जा सके, दूसरी तरफ सब्सिडी की व्यवस्था में अतिरिक्त लचीलापन लाने की बात हुई जिससे विकासशील देश अपनी उभरती चुनौतियों, खासकर खाद्य एवं आजीविका की सुरक्षा एवं ग्रामीण विकास से निपट सकें।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">लेकिन डब्ल्यूटीओ के कृषि समझौते में इन संशोधनों के दो दशक बाद पूरा एजेंडा जेनेवा में बातचीत की मेज से बाहर चला गया लगता है। विकासशील देशों के हिमायती, वह भी खासतौर से भारत जैसे देश कृषि समझौते की अन्यायपूर्ण सब्सिडी को नए सिरे से संतुलित बनाने के प्रयासों में पीछे छूट गए जान पड़ते हैं। यही नहीं, संकटग्रस्त कृषि क्षेत्र में जुटे अपने किसानों के हितों की रक्षा करने में भी उनके प्रयासों में कमी झलकती है। सवाल उठता है कि इन दोनों मुद्दों पर विकासशील देशों की निष्क्रियता उनके अपने हितों को किस तरह प्रभावित कर रही है?</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">पहली बात तो यह कि विकासशील देशों ने विकसित देशों की तरफ से बाजार को विकृत करने वाली सब्सिडी पर लगातार निगरानी करना बंद कर दिया है, जबकि पहले वे ऐसा कर रहे थे। डब्ल्यूटीओ में अमेरिका के खिलाफ ब्राज़ील कपास पर सब्सिडी का जो मुद्दा लेकर गया था वह इसी निगरानी का परिणाम था। विकासशील देशों की तरफ से सक्रियता में कमी इस हद तक चली गई है कि उन्होंने विकसित देशों से यह कहना भी बंद कर दिया है कि वे समयबद्ध तरीके से अपने सब्सिडी नोटिफिकेशन को जमा करें। इसी नोटिफिकेशन से कृषि सब्सिडी के बारे में आवश्यक सूचनाओं की जानकारी मिलती है। डब्ल्यूटीओ पर उपलब्ध नवीनतम जानकारी के अनुसार घरेलू मदद अथवा उत्पादन से संबंधित सब्सिडी के लिए नोटिफिकेशन जमा करने में अमेरिका और यूरोपियन यूनियन दोनों भारत से 2 साल पीछे हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">सब्सिडी के सवाल पर विकासशील देशों की निष्क्रियता का दूसरा प्रभाव अपने किसानों को इन देशों की तरफ से दी जाने वाली मदद में दिखता है। भारत में सरकार ने सब्सिडी में बढ़ोतरी की है और हाल के वर्षों में यह बढ़ोतरी तीव्र रही है। घरेलू मदद यानी उत्पादन संबंधित सब्सिडी पर भारत के नोटिफिकेशन से पता चलता है कि सब्सिडी की राशि 43.4 अरब डॉलर से बढ़कर 2021-22 में 87.7 अरब डॉलर पर पहुंच गई है। इस तरह भारत में कृषि पर जो सब्सिडी दी जा रही है वह डब्ल्यूटीओ के कृषि समझौते की प्रतिबद्धताओं के तहत सरकार की अधिकतम सीमा के करीब पहुंच गई है। उदाहरण के लिए चावल के मामले में देखें तो 2021-22 में कुल उत्पादन की वैल्यू के 15% के बराबर भारत में प्राइस सपोर्ट दिया। जबकि डब्ल्यूटीओ के समझौते में कहा गया है कि यह 10% से अधिक नहीं हो सकता है। इसलिए आश्चर्य नहीं की भारत पर चावल के मामले में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) घटाने का काफी दबाव है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">डब्ल्यूटीओ के कृषि समझौते में सब्सिडी का जो आकलन किया गया है, उसमें सबसे प्रमुख मुद्दा इसकी गणना का तरीका है। रूरल वॉयस पर पिछले दिनों एक लेख (</span><a href="https://eng.ruralvoice.in/opinion-14/msp-in-india-targeted-using-wto-deeply-flawed-methodology.html"><span style="font-weight: 400;">https://eng.ruralvoice.in/opinion-14/msp-in-india-targeted-using-wto-deeply-flawed-methodology.html</span></a><span style="font-weight: 400;">) में मैंने इसके बारे में विस्तार से बताया था। संक्षेप में कहें तो सब्सिडी की गणना में 1986-88 की औसत अंतरराष्ट्रीय कीमत को लिया जाता है। उस कीमत में से एमएसपी को घटाकर जो आंकड़ा बनता है उसमें सरकार की खरीद की मात्रा को गुना किया जाता है। यह तरीका इसलिए गलत है क्योंकि इसमें जो अंतरराष्ट्रीय कीमत ली जाती है वह चार दशक पुरानी है। यह तरीका पूरी तरह भारत के हित के खिलाफ है। 1986-88 के बाद भारत में सालाना महंगाई (4% से अधिक) काफी रही है। इस तरह देखा जाए तो इस आधार पर सब्सिडी की गणना करना बेमतलब है। भारत के मामले में 1986-88 से 2021 के दौरान खुदरा महंगाई 970% बढ़ी है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कुछ वर्ष पहले तक भारत कई अन्य विकासशील देशों के साथ मिलकर लगातार यह कहता आ रहा था कि डब्ल्यूटीओ के कृषि समझौते में सब्सिडी के नियमों में संशोधन करना जरूरी है ताकि उनके हितों की रक्षा की जा सके। विकसित देशों की सब्सिडी को नियंत्रित करने से न सिर्फ विकासशील देश ग्लोबल मार्केट में अपनी मौजूदगी बढ़ा सकेंगे, बल्कि अपने घरेलू किसानों को भी सब्सिडी वाले कृषि उत्पादों की डंपिंग से बचा सकेंगे। लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं है कि डब्ल्यूटीओ में विकासशील देशों ने अपनी आवाज उठाना क्यों बंद कर दिया है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">जहां तक भारत की बात है, तो सब्सिडी के सवाल की अनदेखी करने का तत्काल प्रभाव द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) की बातचीत पर पड़ेगा। इस समय भारत यूरोपियन यूनियन के साथ बातचीत कर रहा है। इसके अलावा भारत, अमेरिका के नेतृत्व वाले इंडो पेसिफिक इकोनॉमिक्स फ्रेमवर्क (आईपीईएफ) का भी हिस्सा है। यह 14 देशों की क्षेत्रीय व्यापार व्यवस्था है। अमेरिका की प्रमुख आकांक्षाओं में एक टैरिफ समेत सभी तरह की व्यापार बाधाओं को हटाकर कृषि बाजार का उदारीकरण है। लेकिन न तो यूरोपियन यूनियन के साथ एफटीए, न ही आईपीईएफ के साथ बातचीत में कृषि सब्सिडी मुद्दा है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">वार्ताओं में सब्सिडी का मुद्दा शामिल न होने तथा टैरिफ में कमी का भारत के लिए क्या मतलब है? अभी भारत प्रमुख खाद्य फसलों पर ऊंचा टैरिफ लगाकर विकसित देशों की सब्सिडी को न्यूट्रलाइज कर देता है। लेकिन जब टैरिफ में कमी हो जाएगी तब भारत की कृषि अर्थव्यवस्था को अभूतपूर्व चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।</span></p>
<p><em><strong>(डॉ. बिस्वजीत धर जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर और काउंसिल फॉर सोशल डेवलपमेंट के वाइस प्रेसिडेंट हैं)</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ कृषि सब्सिडी पर डब्लूटीओ में विकासशील देशों की निष्क्रियता और इसका परिणाम ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[प्राकृतिक खेती के जरिये स्वास्थ्य और समृद्धि]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/swasthya-and-samridhi-through-natural-farming.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 30 May 2023 11:31:31 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/swasthya-and-samridhi-through-natural-farming.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>हम सभी यह सुन-सुन कर बड़े हुए हैं कि भारत गांवों में बसता है। मैं 500 से ज्यादा गांवों की यात्रा कर चुका हूं और खुद को सौभाग्यशाली मानता हूं। मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि भारत न केवल गांवों में बसता है, बल्कि इसका भविष्य भी वहीं निहित है। इसका नमूना देखिए। हमारे देश में लगभग 6 लाख गांव हैं जो किसी भी देश की तुलना में अधिक हैं। यहां के 65 फीसदी नागरिक गांवों में रहते हैं जो दुनिया की किसी भी बड़ी अर्थव्यवस्था की ग्रामीण आबादी से ज्यादा है। चीन में 38 फीसदी, जर्मनी में 22 फीसदी, ब्रिटेन में 16 फीसदी, जापान में 8 फीसदी और अमेरिका में 13 फीसदी लोग गांवों में रहते हैं।</p>
<p>हमारे 6 लाख गांव क्षमताओं और संभावनाओं के मामले में सोने की खान हैं। यदि अच्छी तरह से इनका इस्तेमाल किया जाए तो खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण पलायन सहित हमारी ज्यादातर समस्याओं का समाधान हो सकता है। कोविड की चपेट में आने से बहुत पहले ही बजाज फाउंडेशन गांवों की क्षमता के प्रति सजग हो गया था। कोविड ने हमारे आर्थिक मॉडल की कमजोरियों को उजागर कर दिया था। उस दौरान हर कोई बेहतर जिंदगी और आजीविका के लिए शहरों से गांवों की ओर भाग रहा था। आज हमारे पास महाराष्ट्र और राजस्थान में सैकड़ों ऐसे गांव हैं जो अपनी आबादी के लिए पर्याप्त, सुरक्षित और पौष्टिक भोजन का उत्पादन करते हैं और ऐसा जीवन भी मुहैया कराते हैं जो हमारे शहरों में नहीं है।</p>
<p>वर्धा इसका एक अच्छा उदाहरण है। कभी पानी की कमी वाला यह क्षेत्र जो किसानों की आत्महत्याओं के लिए बदनाम था, अब लखपति किसानों वाला इलाका है। यहां के लगभग 21,000 किसानों ने प्राकृतिक खेती को अपना लिया है। वे अपने खेतों में कीटनाशकों और रसायनों के बगैर सभी तरह के अनाज, सब्जियां और फल उगा रहे हैं और स्थानीय बाजार में बेच रहे हैं। इनमें से कई किसान तो शहरों से वापस गांव लौटे हैं। वे दोबारा शहरों में रहने के लिए नहीं जाना चाहते। इतने खुशहाल वे पहले कभी नहीं रहे।</p>
<p>वर्षों से रसायनों के अत्यधिक इस्तेमाल और सिंचाई की असुविधा आदि के कारण मिट्टी की उर्वरता में कमी से पीड़ित कृषक समुदायों पर हमने ध्यान केंद्रित किया। हमने उन्हें प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए प्रेरित किया और जहां आवश्यक था वहां जल संसाधन प्रबंधन में उनकी मदद की। 2010 में मैं जब पद्मश्री सुभाष पालेकर जी से मिला तो प्राकृतिक खेती की ओर मेरा रुझान बढ़ा। तब से मैं उनका प्रशंसक हूं। प्राकृतिक खेती प्राचीन कृषि तकनीकों से प्रेरित है जिसके केंद्र में गाय का गोबर और गोमूत्र है। यह आत्मनिर्भर, घरेलू उत्पादित, कम लागत और पर्यावरण के अनुकूल है। लाभार्थी किसान एक देसी गाय के साथ 30 एकड़ तक जमीन में खेती कर रहे हैं। वे इनपुट लागत को काफी हद तक कम करने और मिट्टी की उर्वरता, स्वाद और फसल की शेल्फ लाइफ (जीवन चक्र) में सुधार करने में भी कामयाब हुए हैं।</p>
<p>किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) की बदौलत उन्हें अपनी उपज का सही मूल्य भी मिल रहा है। जैसा कि आप जानते हैं, एफपीओ किसानों को बिना बिचौलियों के सीधे बाजार तक पहुंचने में सक्षम बनाता है। किसान एफपीओ के अन्य लाभ भी उठा रहे हैं। एफपीओ हमारे मॉडल का अभिन्न अंग हैं। यह देखकर बहुत खुशी होती है कि अधिक से अधिक एफपीओ आ रहे हैं। एफपीओ की खरीद के अलावा कस्बों और शहरों में भी खरीदार बनाने की योजना है ताकि &ldquo;गांव का पैसा गांव में और शहर का पैसा भी गांव में&rdquo; आए।</p>
<p>धीरे-धीरे ही सही लेकिन निश्चित रूप से अधिक से अधिक किसान प्राकृतिक खेती को अपना रहे हैं। किसान एक दूसरे को प्राकृतिक खेती और मार्केटिंग के गुर सिखा रहे हैं और इस कारवां को बढ़ाने में मदद कर रहे हैं। जो इस कारवां में शामिल नहीं हो पा रहे हैं उनकी फसल खरीदकर वे उनका समर्थन कर रहे हैं। यह बहुत खुशी की बात है। मुझे बीते जमाने का मशहूर गाना "जोत से जोत जलाते चलो" याद आ गया। यह गति पकड़ रहा है। छोटे पैमाने पर कृषि आधारित उद्योगों की स्थापना इसे आगे बढ़ाने में और प्रेरक होगी।</p>
<p>&ldquo;आत्मनिर्भर गांव&rdquo; बजाज फाउंडेशन के लिए सिर्फ एक नारा नहीं, यह एक मिशन है। व्यक्तिगत, घरेलू और सामुदायिक स्तरों पर सावधानी से चुने गए हस्तक्षेपों के माध्यम से गांवों को आत्मनिर्भर, मजबूत आर्थिक इकाइयों में बदलने का मिशन। हम अब अपने मॉडल को उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में ले गए हैं और जल्द ही इसे देश के अन्य हिस्सों में भी ले जाने का इरादा रखते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर गांव के सपने को हकीकत में बदलते हुए देखना बहुत खुशी की बात है। मैं उत्साहित हूं।</p>
<p><strong><em>(अपूर्व नयन बजाज, बजाज फाउंडेशन के ट्रस्टी हैं। वह आत्मनिर्भर गांव की अवधारणा पर केंद्रित ग्रामीण क्षेत्रों में बदलाव की पहल के कार्यों को लेकर गंभीरता के साथ काम कर रहे हैं। साथ ही राजस्थान, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के जिन गावों&nbsp; में&nbsp; बजाज ट्रस्ट इस लक्ष्य को लेकर अपने कार्यक्रम चला रहा है उन स्थानों पर वह खुद जाकर समय-समय पर कार्यों की प्रगति का जायजा लेते हैं )</em></strong></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/05/image_750x500_647493e501ea7.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ प्राकृतिक खेती के जरिये स्वास्थ्य और समृद्धि ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[पौधों का स्वास्थ्य और वैश्विक खाद्य सुरक्षा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/plant-health-and-global-food-security.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 12 May 2023 07:36:49 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/plant-health-and-global-food-security.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>आज पूरी दुनिया &lsquo;अंतरराष्ट्रीय पौधा स्वास्थ्य दिवस&rsquo; यानी इंटरनेशनल डे ऑफ प्लांट हेल्थ मना रही है। इससे मनुष्य के जीवन में फसली पौधों के महत्व का पता चलता है। सभ्यता की शुरुआत से बीमारियों, कीटों और प्राकृतिक आपदाओं से बचाव के लिए अच्छी क्वालिटी के बीज और स्वस्थ पौधों का महत्व जगजाहिर है। दुनिया में हर साल बीमारियों और कीटों से 200 से 300 अरब डॉलर की फसलों का नुकसान होता है। कीटो से फसलों को होने वाला नुकसान 10 से 40% तक है। जलवायु परिवर्तन भी पौधों के स्वास्थ्य पर विपरीत असर डाल रहा है जिससे विश्व खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा उत्पन्न हो गया है।</p>
<p>वर्ष 2050 तक दुनिया की आबादी 10 अरब हो जाएगी। तब 60% अतिरिक्त खाद्य पदार्थों की जरूरत होगी, जबकि जमीन, पानी, जैव-विविधता जैसे प्राकृतिक संसाधन कम होंगे। इसलिए वर्ष 2030 तक सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल (एसडीजी) को हासिल करना बहुत मुश्किल काम होगा। खास तौर से गरीबी दूर करने (एसडीजी 1), कोई भूखा ना रहे (एसडीजी 2), क्लाइमेट एक्शन (एसडीजी 13) और भूमि पर स्वस्थ जीवन (एसडीजी 15) से संबंधित लक्ष्यों को। इस दिशा में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तत्काल कदम उठाने की जरूरत है ताकि स्वस्थ फसलें तैयार की जा सकें, साथ ही बायोटिक और एबायोटिक दबाव और जलवायु परिवर्तन के विपरीत प्रभावों से बचाया जा सके।</p>
<p><strong>कीट एवं बीमारियां- पौधों की सेहत के लिए वास्तविक खतरा</strong></p>
<p>पौधों पर कीटों और बीमारियों के हमले विश्व खाद्य सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा हैं। उदाहरण के लिए, पश्चिम बंगाल में ब्राउन स्पॉट फंगस (हेलमिंथोस्पोरियम ओरिजाइ) के हमले ने चावल की फसल को 50 से 90% तक नुकसान पहुंचाया। इसका नतीजा 20 लाख लोगों की मौत (बंगाल का अकाल 1942-43) के रूप में सामने आया। फाइटोप्थोरा इनफेस्ट के हमले से आलू में लेट ब्लाइट से आयरलैंड में 10 लाख से अधिक लोगों की जान चली गई (आयरिश अकाल 1845)। टारो लीफ ब्लाइट (फाइटोप्थोरा कोलोकासिया) से 1993 में समोआ में लगभग 100% नुकसान हुआ, जिससे प्रशांत क्षेत्र में खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा उत्पन्न हो गया।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/05/image_750x_645d9e13a1976.jpg" alt="" /></p>
<p>दशकों से गेहूं की फसल भी ब्लैक, ब्राउन और येलो रस्ट तथा करनाल बंट से प्रभावित होती रही है। दो दशकों से ताकतवर स्टेम ब्लैक रस्ट (ug99), जिसे पहले सबसे पहले युगांडा में देखा गया था, का बोरलॉग ग्लोबल रस्ट इनीशिएटिव (बीजीआरआई) के तहत समाधान किया जा रहा है। गेहूं की 90% किस्मों को इससे खतरा है और अब यह ईरान तक पहुंच गया है। हाल में फॉल आर्मीवर्म (स्पोडोप्टेरा फ्रूगीपर्डा) के पूर्वी अफ्रीका, बांग्लादेश और भारत के पश्चिम बंगाल में हुए हमले से फसलों को 40% तक नुकसान हुआ।</p>
<p><a href="https://www.ruralvoice.in/opinion/innovations-and-technological-interventions-for-agri-food-systems-transformation-in-india.html" title="एग्री इनोवेशन" target="_blank" rel="noopener"><strong>यह भी पढ़ेंः भारत में कृषि खाद्य प्रणाली में बदलाव के लिए इनोवेशन और प्रौद्योगिकीय हस्तक्षेप जरूरी</strong></a></p>
<p>भारत में 2001 में जेनेटिकली मॉडिफाइड बीटी कॉटन रिलीज किए जाने से पहले बॉलवर्म (हेलीकॉवेरपा आर्मीगेरा) से फसल को बचाने के लिए रासायनिक कीटनाशकों के स्प्रे की जरूरत पड़ती थी। कृषि में रासायनिक कीटनाशकों का लगभग आधा इन्हीं पर इस्तेमाल होता था। सौभाग्यवश बीटी कॉटन से छोटे किसानों को बीते दो दशक में काफी फायदा हुआ है। उनका कीटनाशकों का प्रयोग लगभग 40% कम हो गया है। इस तरह जेनेटिकली मॉडिफाइड कॉटन को अपनाने से भारत न सिर्फ कपास का दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक बना बल्कि एक महत्वपूर्ण निर्यातक भी बन गया है।</p>
<p>एकाधिक देशों में फैलने वाली बीमारियों की रोकथाम के लिए विकासशील देशों में पूरे देश के स्तर पर एक प्रभावी क्वारंटाइन उपाय अपनाने की जरूरत होती है। उदाहरण के लिए ऑस्ट्रेलिया में प्रभावी क्वारंटाइन सिस्टम अपनाने से गेहूं की फसल को करनाल बंट से तथा अन्य फसलों को भी दूसरे कीटों से बचाया जा सका है। इस तरह विभिन्न फसलों और क्षेत्रों में बीमारियों और कीटों से पौधों को बचाने के लिए मजबूत प्लांट क्वॉरंटाइन सिस्टम महत्वपूर्ण है।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/05/image_750x_645d9dfd9a5ef.jpg" alt="" /></p>
<p>ग्लोबल एक्सचेंज और केला, कसावा, आलू, जिमीकंद, मीठा आलू के साथ नींबू और सेब जैसे फलों के उत्पादन में स्वस्थ पौधे तैयार करने और अच्छी क्वालिटी की उपज हासिल करने में सर्टिफाइड प्लांटिंग मैटेरियल की महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी।</p>
<p><strong>पौधों की सेहत सुधारने के लिए क्रॉप ब्रीडिंग</strong></p>
<p>वैश्विक खाद्य, पोषण और पर्यावरण सुरक्षा के लिए प्लांट जेनेटिक रिसोर्स महत्वपूर्ण हैं। आकार छोटा करके जेनेटिक सुधार और प्रकाश के प्रति असंवेदनशील जीन से गेहूं और चावल के मामले में दक्षिण एशिया में हरित क्रांति में सफलता मिली। वाइल्ड जर्म्प्लाज्म के प्रयोग द्वारा नोबिलाइजेशन से भारत में गन्ना उत्पादन में भी क्रांति आई। नोबिलाइजेशन से गन्ने का उत्पादन उष्णकटिबंधीय दक्षिण से उत्तर भारत के समशीतोष्ण क्षेत्रों तक फैलाने में मदद मिली। खासकर समय से पहले फसल और तने को सड़ने से रोकने के मामले में।</p>
<p><a href="https://www.ruralvoice.in/national/maize-prices-continues-to-decline-farmers-are-losing-rs-20000-per-acre.html" title="मक्का में गिरावट जारी" target="_blank" rel="noopener"><strong>यह भी पढ़ेंः मक्का में गिरावट जारी, भाव घटने से किसानों को 20 हजार रुपये प्रति एकड़ का हो रहा नुकसान</strong></a></p>
<p>जलवायु परिवर्तन के विपरीत प्रभावों से बचने के लिए हमें तत्काल ऐसे जीन की आवश्यकता है जिनमें सूखा, अधिक गर्मी, बाढ़, बीमारी, कीटों के हमले आदि की प्रतिरोधी क्षमता हो। इसके अलावा इनोवेटिव जीनोम एडिटिंग (क्रिस्पर/सीएस9) टेक्नोलॉजी के प्रयोग से एकाधिक रजिस्टेंस जीन की स्टैकिंग के लिए भी प्रयास तेज करने की जरूरत है। इसके लिए विश्व स्तर पर प्लांट ब्रीडिंग के प्रयास तेज करने पड़ेंगे। इसमें नार्स और सीजीआईएआर (NARS and CGIAR) के बीच मजबूत साझेदारी के साथ के अलावा निजी क्षेत्र के साथ साझेदारी भी शामिल है।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/05/image_750x_645d9df5b4ac9.jpg" alt="" /></p>
<p>संयुक्त राष्ट्र के संगठन एफएओ की स्टडी के अनुसार अनेक विकासशील देशों में प्लांट ब्रीडिंग के प्रयासों में बड़े पैमाने पर कमी आई है। इसलिए बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन की मदद से चलने वाले ग्लोबल इनीशिएटिव ऑन प्लांट ब्रीडिंग को एफएओ विकासशील देशों में अमल में ला रहा है।</p>
<p><strong>&lsquo;एक स्वास्थ्य&rsquo; की अवधारणा को बढ़ावा</strong></p>
<p>हालांकि संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2020 को &lsquo;इंटरनेशनल प्लांट हेल्थ इयर&rsquo; घोषित किया था, लेकिन कोविड-19 महामारी के कारण इस पर ज्यादा काम नहीं हो सका। इसके विपरीत &lsquo;एक स्वास्थ्य&rsquo; (मिट्टी, पौधा, पशु, मनुष्य) की अवधारणा को व्यापक प्रमुखता दी जा सकती है। एक सेहत ऐसा एकीकृत अप्रोच है जो विभिन्न पारिस्थितिकी में मिट्टी, पौधे, पशु और मनुष्य की सेहत को दीर्घकालिक तरीके से संतुलित और अप्टिमाइज करता है। एक सेहत अवधारणा का एक प्रमुख लक्ष्य खाद्य सुरक्षा भी है, क्योंकि इसमें स्वस्थ खाद्य उत्पादन, प्रोसेसिंग, वैल्यू चेन और मार्केटिंग की बात कही गई है। इसलिए सभी पक्षों (किसानों, उपभोक्ताओं, शोधकर्ताओं, निजी क्षेत्र, एनजीओ और सरकारी अधिकारियों) को ज्यादा समन्वित तरीके से सस्टेनेबल खाद्य उत्पादन की दिशा में काम करने की जरूरत है, ताकि ऐसे स्वस्थ फसली पौधे तैयार किए जा सकें जो हमारी खाद्य और पोषण सुरक्षा को पूरा करें। इसके अलावा हमें कम से कम प्रमुख खाद्य फसलों के मामले में कीटों और बीमारियों के हमले का पूर्वानुमान बताने वाले ऑटोमेटेड सिस्टम विकसित करने की जरूरत है।</p>
<p><a href="https://www.ruralvoice.in/latest-news/wheat-procurement-likely-to-remain-incomplete-this-year-procurement-of-252-lakh-tonnes-still-89-point-5-lakh-tonnes-behind-the-target.html" title="गेहूं खरीद" target="_blank" rel="noopener"><strong>यह भी पढ़ेंः गेहूं की सरकारी खरीद इस साल भी अधूरा रहने की संभावना, 252 लाख टन की हुई खरीद, लक्ष्य से अब भी 89.5 लाख टन पीछे</strong></a></p>
<p><strong>सस्टेनेबिलिटी के लिए फसल विविधीकरण</strong></p>
<p>सब्जियों, फलों, मसालों, औषधीय पौधों इत्यादि जैसी अधिक कीमत दिलाने वाली फसलों की ओर खेती के विविधीकरण से किसानों की आमदनी बढ़ेगी और गरीबी में कमी आएगी। अनाज, मिलेट, दाल, तिलहन, सब्जियों और फलों की हाल में विकसित बायोफोर्टीफाइड वैरायटी को अब बढ़ावा देने की जरूरत है। इनमें पोषण अधिक होता है।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/05/image_750x_645d9e1ab9ebc.jpg" alt="" /></p>
<p>वर्ष 2023 अंतरराष्ट्रीय मिलेट वर्ष भी है। मिलेट में सूखा, अधिक गर्मी के साथ कीटों और बीमारियों की प्रतिरोधी क्षमता होती है। चावल और गेहूं की तुलना में इनमें प्रोटीन, फाइबर, मिनरल और विटामिन अधिक पाए जाते हैं। फूड बास्केट में उनके अधिक इस्तेमाल से वैश्विक भूख की समस्या (ग्लोबल हंगर) के समाधान में मदद मिल सकती है। हाल में आयोजित संयुक्त राष्ट्र खाद्य प्रणाली सम्मेलन (यूएन फूड सिस्टम्स समिट) में भी स्थानीय फसलों पर शोध तथा उनका इस्तेमाल बढ़ाने पर जोर दिया गया।</p>
<p>अनाज केंद्रित क्रॉपिंग सिस्टम से हटकर विविध और एकीकृत कृषि प्रणाली (अनाज और फलीदार पौधे आधारित) को अपनाना अधिक सस्टेनेबल होगा। इससे प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण तथा पुनरुत्थान वाली खेती को बढ़ावा देने में मदद मिलेगी। अभी तक फसल विविधीकरण और सेहतमंद फसलों को उपजाने से वैश्विक खाद्य सुरक्षा को पाने में मदद मिली है। लेकिन स्वस्थ पौधों के बीजों का प्रयोग करते हुए स्थानीय खाद्य प्रणाली को बढ़ावा देकर कृषि क्षेत्र में सस्टेनेबिलिटी को हासिल करने में अधिक मदद मिल सकती है।</p>
<p><em><strong>(डॉ. आर एस परोदा TAAS के चेयरमैन,&nbsp; DARE के पूर्व सचिव और ICAR के पूर्व डायरेक्टर जनरल हैं)&nbsp;</strong></em></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/05/image_750x500_645cde6f9f68f.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ पौधों का स्वास्थ्य और वैश्विक खाद्य सुरक्षा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[भारत में कृषि खाद्य प्रणाली में बदलाव के लिए इनोवेशन और प्रौद्योगिकीय हस्तक्षेप जरूरी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/innovations-and-technological-interventions-for-agri-food-systems-transformation-in-india.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 08 May 2023 13:09:29 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/innovations-and-technological-interventions-for-agri-food-systems-transformation-in-india.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>दुनिया की आबादी वर्ष 2050 तक 920 करोड़ हो जाने की संभावना है। लगातार बढ़ती आबादी को खिलाने तथा टिकाऊ विकास लक्ष्य (सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल - एसडीजी) को हासिल करने के लिए कृषि विकास की गति बढ़ाना जरूरी है। खासकर गरीबी, भूख और पर्यावरण की चिंताओं को देखते हुए। जिन देशों ने अपने कृषि अनुसंधान को नए इनोवेशन तथा उनके व्यापक इस्तेमाल की ओर मोड़ा है, वे लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में तेजी से बढ़ रहे हैं। सच बात तो यह है कि कृषि अनुसंधान और इनोवेशन पर जितना अधिक जोर दिया गया, कृषि जीडीपी की वृद्धि दर उतनी अधिक हुई है।</p>
<p>हरित क्रांति अपने आप में एक इनोवेशन थी। इसमें ज्यादा पैदावार और छोटे आकार के गेहूं तथा चावल के पौधों की वैरायटी विकसित की गई। इन किस्मों पर इनपुट का अच्छा असर हुआ जिससे उत्पादन तथा उत्पादकता दोनों में काफी तेज वृद्धि हुई। इसी का परिणाम है कि आबादी चार गुना बढ़ने के बावजूद भारत अनाज का उत्पादन छह गुना बढ़ाने में कामयाब हुआ और इस तरह खाद्य सुरक्षा हासिल की।</p>
<p>इस सफलता के प्रमुख कारण थे- 1) राजनीतिक इच्छाशक्ति 2) अच्छे संस्थान 3) बीज, पानी, उर्वरक जैसे इनपुट के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर 4) कृषि एक्सटेंशन के क्षेत्र में सक्षम कर्मी और किसान तथा 5) वैश्विक स्तर पर साझेदारी (जैसे CIMMYT और IRRI)।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/05/image_750x_6458a3eebff8b.jpg" alt="" /></p>
<p>भारत की आबादी में अब भी हर साल 1.5 करोड़ लोग जुड़ते हैं, जिनके लिए 50 लाख टन अनाज की जरूरत पड़ती है। यह चुनौती हरित क्रांति की दूसरी पीढ़ी की चुनौतियों से अलग है। इनमें फैक्टर उत्पादकता में कमी, प्राकृतिक संसाधनों में गिरावट, इनपुट की लागत में वृद्धि, बीमारियों और कीटों के अधिक हमले, परिवारों की पोषण सुरक्षा की बढ़ती चिंता, किसानों की कम होती आय और सबसे बड़ी बात, जलवायु परिवर्तन पर विपरीत प्रभाव शामिल हैं। इन चुनौतियों से निपटने के लिए हमें विकास के लिए कृषि अनुसंधान (AR4D) से हटकर विकास के लिए कृषि अनुसंधान एवं इनोवेशन (ARI4D) की ओर जाना पड़ेगा।</p>
<p>80 फ़ीसदी छोटे और सीमांत किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए ऐसे इनोवेशन और टेक्नोलॉजिकल विकास की जरूरत है, जिनसे न सिर्फ प्राकृतिक संसाधनों की बचत होगी बल्कि इनपुट की लागत में कमी आएगी, न सिर्फ उत्पादकता बढ़ेगी और कृषि आय में निरंतरता आएगी बल्कि मौजूदा कृषि खाद्य प्रणाली में बदलाव करके किसानों की आमदनी बढ़ाने में भी सहायक होगी।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/05/image_750x_6458a3deec969.jpg" alt="" /></p>
<p>इस संदर्भ में कुछ इनोवेशन का इस्तेमाल व्यापक पैमाने पर बढ़ाने की जरूरत है। ये हैं हाइब्रिड टेक्नोलॉजी, जेनेटिकली मॉडिफाइड फसलें, सस्टेनेबल इंटेंसिफिकेशन के लिए संरक्षण कृषि, लघु सिंचाई, फर्टिगेशन (माइक्रो स्प्रिंकलर अथवा ड्रिप सिस्टम के जरिए सिंचाई के पानी के साथ उर्वरक का प्रयोग), एकीकृत पोषण प्रबंधन (आईएनएम), एकीकृत कीट प्रबंधन (आईपीएम), संरक्षित खेती, वर्टिकल खेती, जीनोम एडिटिंग के साथ नैनो टेक्नोलॉजी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का प्रयोग। इनसे खेती में लचीलापन और सस्टेनेबिलिटी के बेहतर मौके मिल सकते हैं। इसे हासिल करने के लिए उचित पॉलिसी के माध्यम से सरकार की मदद, सार्वजनिक निजी साझेदारी, इनोवेटिव एक्सटेंशन प्रणाली, जिसमें बेहतर जानकारी देने के लिए युवाओं को शामिल किया जाए, खासकर सेकेंडरी और स्पेशलिटी खेती के मामले में, जैसे उपाय महत्वपूर्ण हैं।</p>
<p>इन्सेंटिव और पुरस्कार के साथ-साथ बौद्धिक संपदा की रक्षा के बिना इनोवेशन का बड़े पैमाने पर प्रयोग संभव नहीं हो सकेगा। इसके लिए संस्थागत और नीतिगत स्तर पर इनोवेटिव सुधारों की आवश्यकता है। इनमें ARI4D पर निवेश दोगुना करना, मंत्रालयों और संस्थाओं के बीच बेहतर समन्वय और मिशन मोड में समयबद्ध तरीके से कार्यक्रम लागू करना शामिल हैं।&nbsp;</p>
<p>इसलिए ARI4D में जी-20 देशों के बीच एक मजबूत समन्वय भविष्य में हमारी खाद्य पोषण और पर्यावरण सुरक्षा की कुंजी बनेगा।</p>
<p><em><strong>(लेखक TAAS के चेयरमैन, DARE के पूर्व सचिव और ICAR के पूर्व डीजी हैं।&nbsp; यह आलेख वाराणसी में आयोजित जी20 के मुख्य कृषि वैज्ञानिकों की बैठक (MACS) में डॉ. परोदा द्वारा पेश किए पेपर का सार है।)</strong></em></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/05/image_750x500_6458a3d063788.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ भारत में कृषि खाद्य प्रणाली में बदलाव के लिए इनोवेशन और प्रौद्योगिकीय हस्तक्षेप जरूरी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[Aquaculture: अगली नीली क्रांति की राह आसान करेगा  डिजिटाइजेशन]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/unlocking-the-possibilities-in-the-next-blue-revolution-with-digitization.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 25 Apr 2023 09:54:56 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/unlocking-the-possibilities-in-the-next-blue-revolution-with-digitization.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">पिछले लेख में हमने वैश्विक खाद्य सुरक्षा में समुद्री खाद्य पदार्थ यानी सीफूड तथा एक्वाकल्चर की अहम भूमिका के बारे में चर्चा की थी। इस सेक्टर को अधिक उत्पादक तथा सक्षम बनाने में टेक्नोलॉजी आधारित समाधानों की आवश्यकता की भी बात की गई थी। साथ ही अफोर्डेबिलिटी और कस्टमाइजेशन जैसी व्यावहारिक चुनौतियों को दूर करने के महत्व को भी रेखांकित किया गया था ताकि जागरूकता बढ़ाई जा सके और इन समाधानों पर अधिक से अधिक लोग अमल कर सकें।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">टेक्नोलॉजी आधारित समाधान को अपनाकर और पारदर्शिता तथा क्षमता बढ़ाकर हम इस सेक्टर के आगे बढ़ने की गति को त्वरित सकते हैं। ऐसा सिर्फ व्यक्तिगत स्तर पर नहीं बल्कि पूरे सेक्टर के स्तर पर करने की जरूरत है। हालांकि ऐसा कहना आसान है,&nbsp; करना मुश्किल। हम करीब 2000 साल पुरानी इंडस्ट्री की बात कर रहे हैं। यह सबसे पारंपरिक सेक्टर में एक है जहां डिजिटाइजेशन अभी तक पूरी तरह नहीं पहुंचा है। यहां डिजिटाइजेशन को बढ़ावा देने में कई चुनौतियां हैं, खासकर भौगोलिक विविधता और ग्रामीण तथा तटीय क्षेत्रों में लोगों में टेक्नोलॉजी को अपनाने की अलग-अलग क्षमता को देखते हुए।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">एक्वाकल्चर के बारे में होने वाली चर्चाएं अक्सर इंडस्ट्री की खामियों, विस्तार योजनाओं और विकास की रणनीतियों के इर्द-गिर्द घूमती हैं। लेकिन क्या हमारे पास सही समस्या को पहचानने की व्यवस्था है? सिर्फ डाटा सही जवाब दे सकता है। इसलिए डिजिटाइजेशन लाने की दिशा में पहला कदम उत्पादन और हार्वेस्टिंग के बाद वैल्यू चेन के विभिन्न स्तरों पर डाटा तैयार करना है। समस्या की जड़ को पहचानने तथा यह समझने में कि क्या हम सही मुद्दों पर गौर कर रहे हैं, डाटा आधारित अप्रोच बेहद अहम हो जाता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;"><a href="https://www.ruralvoice.in/latest-news/wheat-procurement-crossed-150-lakh-tonnes-in-the-current-rabi-marketing-season.html" title="गेहूं की सरकारी खरीद" target="_blank" rel="noopener"><strong>यह भी पढ़ेंः Wheat procurement News: गेहूं की सरकारी खरीद ने पकड़ी रफ्तार, चालू रबी सीजन में 150 लाख टन के पार पहुंची</strong></a><br /></span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">ग्रामीण और तटीय क्षेत्रों से सूचनाएं जुटाने की व्यवस्था तैयार करना और भविष्य में कल्चर डाटा के आंकड़े जुटाने का ऑटोमेटिक तरीका बनाना जरूरी है। इसके लिए किसानों के विशाल नेटवर्क को एनरोल करना एक जटिल कार्य है। चुनौतियों के बावजूद विश्व का दूसरा सबसे बड़ा एक्वाकल्चर उत्पादक होने के नाते भारत को आगे रहना चाहिए और हर मोर्चे पर अगली क्रांति का नेतृत्व करना चाहिए। भारतीय फिशरीज सेक्टर में हाल के वर्षों में जो आधुनिकीकरण तथा टेक्नालॉजी को अपनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल हुई, वह काफी उत्साहजनक है।</span></p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/04/image_750x_6444c16540014.jpg" alt="" /></p>
<p><span style="font-weight: 400;">उदाहरण के लिए एक एक्वाकल्चर टेक स्टार्टअप के तौर पर हमने ऐसा मोबाइल ऐप लॉन्च किया जो उत्पादन के आंकड़े जुटाने तथा रोजमर्रा के कल्चर कार्यों में किसानों को गाइडेंस उपलब्ध कराने में एक एडवाइजरी टूल के तौर पर काम करता है। इस ऐप ने हमें अलग-अलग पैरामीटर, फीडिंग और विकास के पैटर्न के बीच संबंधों को समझने में मदद की। लेकिन ऐसा करते समय हमारे सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि इसका कितने बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा सकता है, जमीनी चुनौतियों को देखते हुए भारत के हर कोने तथा शेष विश्व से हम आंकड़े किस तरह जुटा सकते हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">आदर्श जवाब तो यह है कि हर किसान के पास एक स्मार्टफोन और बेहतर कनेक्टिविटी होनी चाहिए, मोबाइल ऐप के बारे में जागरूकता होनी चाहिए और अंत में, उसे प्रतिदिन डाटा की एंट्री करनी चाहिए। दूसरे तरीके से कहें तो हर खेत आईओटी डिवाइस के साथ ऑटोमेटेड होना चाहिए जो पानी की क्वालिटी से लेकर फीडिंग, ग्रोथ की निगरानी और हमारे एपीआई के साथ रियल टाइम में डाटा साझा कर सके।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;"><a href="https://www.ruralvoice.in/national/in-global-market-dap-prices-come-down-to-553-dollars-and-that-of-urea-to-315-dollars-per-ton.html" title="यूरिया-डीएपी की कीमत" target="_blank" rel="noopener"><strong>यह भी पढ़ेंः वैश्विक बाजार में डीएपी की कीमत गिरकर 553 डॉलर और यूरिया की 315 डॉलर तक आई</strong></a><br /></span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">लेकिन यह परिदृश्य सच्चाई से बहुत दूर है। इसी बिंदु को लेकर हमने अपना काम शुरू किया। हमने महसूस किया कि एक्वाकल्चर के लिए सेटेलाइट रिमोट सेंसिंग किस तरह गेम चेंजर बन सकता है। ऐसे समाधान पर फोकस करके जिनका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो सकता है तथा जिनसे सेक्टर की प्रमुख चुनौतियों को दूर किया जा सकता है, हमने अपना ध्यान सेटेलाइट रिमोट सेंसिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस्तेमाल पर फोकस किया। सेटेलाइट रिमोट सेंसिंग का प्रयोग करके हमने एक तरफ से आसमान में नजर (आई इन द स्काई) बिठा दी। इससे भौगोलिक सीमाएं टूट गईं। इस तरह हम व्यक्तिगत तालाबों से बढ़कर राष्ट्रीय स्तर पर काम करने योग्य हो गए। इसमें कोई भौतिक समस्या नहीं रही।</span></p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/04/image_750x_6444c155097e2.jpg" alt="" /></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अब हमें ऐसे समाधानों पर गौर करना चाहिए जिनसे सीफूड वैल्यू चेन में पारदर्शिता लाने के मिशन का लक्ष्य हासिल किया जा सके। हमारा शुरुआती कदम मछली अथवा श्रिंप के तालाबों की पहचान करना तथा डीप लर्निंग एल्गोरिदम के प्रयोग से सीमाओं का निर्धारण करना था। यह बड़ा आश्चर्यजनक है कि हमने जिस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मॉडल को प्रशिक्षित किया है वे ट्रेनिंग टाटा में हमारी गलतियों को बता रहे हैं। स्मार्ट आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मॉडल ने इसी तरह देश के किसी भी कोने में तालाबों की पहचान करने की क्षमता हासिल की है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">हां, अब हम बड़े पैमाने पर इसका प्रयोग भी कर सकते हैं। एक बार तालाब की पहचान हो जाने पर हमें यह देखना चाहिए कि तालाब किस तरह का है। एक्वाकल्चर में मछली और श्रिंप के तालाब ही प्रमुख श्रेणी के होते हैं। इसलिए उनका वर्गीकरण करना महत्वपूर्ण है। हमने अतिरिक्त आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मॉडल तैयार किए जिनसे श्रिंप तथा मछलियों के तालाब के बीच विभिन्न पैरामीटर के आधार पर भेद किया जा सकता है। इसका अगला महत्वपूर्ण कदम कल्चर के दिन (डीओसी) का अनुमान लगाना है जिससे तालाब के स्टेटस को समझने में मदद मिलती है।</span></p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/04/image_750x_6444c1763681d.jpg" alt="" /></p>
<p><span style="font-weight: 400;">सबसे पहले हमें यह देखना होता है कि तालाब किस अवस्था में है। उदाहरण के लिए वे सक्रिय हैं अथवा सूखे हैं, तैयारी के चरण, स्टॉकिंग के चरण या विकास के चरण में है, हार्वेस्टिंग के लिए तैयार हैं या उनमें हार्वेस्टिंग की जा चुकी है। इस तरह एक क्रम में रियल टाइम में क्रॉप रिव्यू किया जा सकता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कल्पना कीजिए कि इस तरह का इंटेलिजेंस लगभग रियल टाइम में सिर्फ तालाब के स्तर पर नहीं, बल्कि गांव, तालुका, जिला अथवा राज्य के स्तर पर तैयार किया जा रहा है। यह सब खेत में कदम रखे बगैर हो रहा है। यह वास्तव में एक बड़ी उपलब्धि है। हम जमीनी इंटेलिजेंस का भी इस्तेमाल करते हैं जिसे 'बूट्स ऑन द ग्राउंड' कहा जाता है। सेटेलाइट रिमोट सेंसिंग के पूरक के तौर पर जब भी जरूरत पड़ती है, हम इसका इस्तेमाल करते हैं। इस तरह 'बूट्स ऑन द ग्राउंड' और 'आई इन द स्काई' का मिलाजुला रूप डिजिटाइजेशन और क्वांटिफिकेशन के माध्यम से सीफूड वैल्यू चेन में पारदर्शिता और बेहतर क्षमता लाने का प्रयास कर रहा है।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">एक्वाकल्चर सेक्टर में पारदर्शिता लाकर इस उद्योग में क्रांति लाई जा सकती है। लगभग रियल टाइम में क्रॉप की समीक्षा जैसे इनोवेटिव टूल हमें चुनौतियों को पहचानने के लिए बेहतर तरीके से सक्षम बनाते हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">उत्पादन के मौजूदा ट्रेंड, हार्वेस्ट पैटर्न और समय से पहले हार्वेस्टिंग के बारे में अध्ययन से हमें बेहतर मूल्यांकन में मदद मिलती है। इससे रोग प्रबंधन क्षेत्र की पहचान करने, लक्षित कदम उठाने और बड़े पैमाने पर बीमारी फैलने से रोकने में भी सहायता मिलती है। इतने बड़े स्तर पर जानकारी मिलने से कम दोहन वाले संसाधनों की पहचान करने के साथ इंडस्ट्री को उन क्षमताओं को समझने में भी मदद मिलती है जिनका अभी तक प्रयोग नहीं किया गया है।</span></p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/04/image_750x_6444c15cf3248.jpg" alt="" /></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इस जानकारी के साथ हम इस सेक्टर में मौजूद अलग तरह की चुनौतियों तथा अवसरों से निपटने की रणनीति तैयार कर सकते हैं। बेहतर जानकारी के आधार पर निर्णय लेने की क्षमता से संसाधनों का बेहतर आवंटन हो सकेगा, उत्पादन की प्लानिंग बेहतर होगी तथा अति सक्रिय तरीके से जोखिम प्रबंधन के कदम उठाए जा सकेंगे। इस तरह इसके जरिए इस सेक्टर की दीर्घकालिक सफलता सुनिश्चित की जा सकेगी।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">ऐसे समय जब एक्वाकल्चर इंडस्ट्री विकसित हो रही है, डेटा आधारित निर्णय लेने में मददगार सॉल्यूशन इस सेक्टर की जटिल चुनौतियों को पहचानने तथा विकास की गति तेज करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इस तरह हम यह भी सुनिश्चित कर सकते हैं कि यह सेक्टर वैश्विक खाद्य सुरक्षा के साथ करोड़ों लोगों की आजीविका में निरंतर मददगार बना रहे।</span></p>
<p><strong><em>(मुरुगन चिदंबरम चेन्नई स्थित स्टार्टअप एक्वाकनेक्ट के डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन एवं मार्केटिंग प्रमुख हैं)</em></strong></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/04/image_750x500_6444c15cac2f7.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ Aquaculture: अगली नीली क्रांति की राह आसान करेगा  डिजिटाइजेशन ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/04/image_750x500_6444c15cac2f7.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[थ्री इडियट्स की ऑल इज वेल और दो बीघा जमीन की दुखदायी कहानी के बीच किसानों को स्वदेश के समाधान की जरूरत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/between-all-is-well-message-of-3-idiots-and-pathetic-tale-of-do-bigha-zameen-india-needs-swades-solutions-for-farmers.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 21 Apr 2023 14:09:51 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/between-all-is-well-message-of-3-idiots-and-pathetic-tale-of-do-bigha-zameen-india-needs-swades-solutions-for-farmers.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>क्या आप हीटवेव या जून से सितंबर तक मानसून के महीनों में होने वाली बारिश में कमी को लेकर चिंतित हैं? अगर ऐसा है तो आप निश्चिंत होकर बैठ जाइए। किसानों को भी कम बारिश को लेकर चिंता नहीं करनी चाहिए। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव डॉ एम रविचंद्रन ने &lsquo;सब चंगा है&rsquo; का संदेश दिया है। ऐसा लगता है कि वह बहुत बड़े आशावादी हैं और फिल्म &lsquo;थ्री ईडियट्स&rsquo; में अभिनेता आमिर खान के किरदार &lsquo;रैंचो&rsquo; के &lsquo;ऑल इज वेल&rsquo; से प्रभावित हैं। सरकार की तरफ से &lsquo;ऑल इज वेल&rsquo; का संदेश 11 अप्रैल को आया जब पावर पॉइंट ग्राफिक्स में दक्षिण-पश्चिम मानसून के बारे में बताया गया। यह मानसून ईश्वर के अपने देश केरल के रास्ते भारत में प्रवेश करता है।</p>
<p>बेहद जटिल आईएमडी (मौसम विभाग) की भाषा में जो आधिकारिक अनुमान जारी किया गया है, उसके मुताबिक मात्रा के लिहाज से मानसून सीजन में बारिश लॉन्ग पीरियड एवरेज (एलपीए) के 96% रहने की संभावना है। इसमें 5% की कमी-बेशी हो सकती है। एलपीए के 95% से कम होने को सामान्य से कम तथा इससे अधिक को सामान्य कहा जाता है। अब मौसम विभाग ने 5% कमी-बेशी की संभावना जताई है तो हमें भगवान इन्द्र से प्रार्थना करनी होगी ताकि आईएमडी के अनुमान से 5% कम बारिश न हो। ऐसा हुआ तो बारिश एलपीए के 91% तक रह जाएगी। बादल बनने की प्रक्रिया पर अल नीनो जैसे समुद्री प्रभाव का खतरा मंडरा रहा है। ऐसे में औसत से 5% अधिक बारिश की संभावना बहुत कम है। मौसम विभाग के ग्राफिक के अनुसार सामान्य बारिश की संभावना 35% है। सामान्य से कम बारिश की संभावना 69% और कम बारिश की संभावना 22% है। इस तरह सामान्य से कम तथा कम, दोनों मिलाकर 51% बनते हैं। कुल मिलाकर कहा जाए तो इस बार बारिश कम रहने के ही आसार हैं।</p>
<p>यह आलेख लिखने का मकसद विमल राय की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसित फिल्म &lsquo;दो बीघा जमीन&rsquo; का रिप्ले दिखाना नहीं है। उस फिल्म में सूखा की कहानी बताई गई थी जिसमें अभिनेता बलराज साहनी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। फिल्म में दिखाया गया था कि अगर इंद्र देवता हमारी प्रार्थना नहीं सुनते हैं तो हमारे पास प्लान बी भी होना चाहिए। (वैसे बलराज साहनी स्क्रीन भूमिका के विपरीत व्यक्तिगत रूप से काफी ऐशो-आराम भरा जीवन बिताते थे। दो बीघा जमीन के बाद भारत ने बड़ी लंबी यात्रा पूरी की है। हरित क्रांति ने हमें न सिर्फ अनाज के मामले में आत्मनिर्भर बनाया बल्कि आज हम सरप्लस की स्थिति में हैं। वही स्थिति ऑपरेशन फ्लड से दूध के मामले में हुई। लेकिन आज भी हमारी 60 प्रतिशत सिंचाई की भूमि बारिश पर निर्भर करती है। इसलिए हर साल नई चुनौतियां उभर कर सामने आती रहती हैं। यूक्रेन-रूस युद्ध के कारण ग्लोबल खाद्य आपूर्ति बाधित होने से स्थिति और विकट हो गई है। मौसम के सालाना असर के अलावा गेहूं, चीनी, तिलहन आदि को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना मुश्किल हो गया है।</p>
<p>इस वर्ष मौसम को लेकर चिंता क्यों करनी चाहिए? चिंता कई मामलों को लेकर है जिन पर न सिर्फ विचार करने बल्कि अमल करने की भी आवश्यकता है ताकि मौसम के असर का पहले अनुमान लगाया जा सके। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गेहूं की कटाई से पहले मार्च में बारिश और ओले पड़ने के कारण फसल को काफी नुकसान होने की खबर है। इस वर्ष गेहूं का उत्पादन 11.1 करोड़ टन पर स्थिर रहने या इससे कम होने की आशंका है। अगर मानसून की बारिश कम हुई तो खरीफ की प्रमुख फसल धान पर भी असर होगा। हालांकि सरकारी अधिकारी ऐसा नहीं मानते। उन्हें लगता है कि मानसून सीजन के पहले चरण में अच्छी बारिश होगी और धान की बुआई के लिए परिस्थितियां अनुकूल रहेंगी। लेकिन बुवाई के बाद पौधों की सिंचाई के लिए पानी कहां से आएगा? ऐसा लगता है कि कृषि मंत्रालय ने भूजल से उम्मीदें लगा रखी हैं, मानो उसकी प्राकृतिक रिचार्जिंग की जरूरत नहीं पड़ती है</p>
<p>उपभोक्ताओं के लिए इसका असर अनाज की अधिक कीमत के रूप में होगा। खुदरा महंगाई में 1% गिरावट की बड़ी-बड़ी हेडलाइंस के बावजूद पिछले साल की तुलना में इस वर्ष मार्च में अनाज के दाम 15.27% बढ़ गए। इसी तरह दूध और इसके उत्पादों की सालाना महंगाई 9.31% और मसालों की 18.21% बढ़ गई। थोक में देखें तो मंडियों में गेहूं के दाम मार्च में 10% अधिक रहे। गेहूं के दाम नीचे लाने के लिए सरकार को अपने स्टॉक से खुले बाजार में इसे जारी करना पड़ा।</p>
<p>एलपीए के 96% बारिश के अनुमान को देखते हुए हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाना महंगा पड़ेगा। कुछ ही महीनों में इसका पता चल जाएगा। दरअसल मानसून का यह पूरा डाटा देश के विभिन्न क्षेत्रों के औसत का खेल है। जरूरी यह है कि सभी क्षेत्रों में समान रूप से बारिश हो ताकि सबको उसका फायदा मिल सके। भगवान इंद्र को हम सब पर मेहरबान होना चाहिए, किसी एक पर उन्हें अधिक मेहरबानी नहीं दिखानी चाहिए।</p>
<p>मानसून के अप्रैल के अनुमान का नक्शा देखें तो पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे अनाज उपजाने वाले प्रमुख राज्य में बारिश कम होती नजर आ रही है। इस मामले में केरल, कर्नाटक और पूर्वी भारत के कुछ हिस्से सौभाग्यशाली हो सकते हैं। मौसम विभाग के पूर्वानुमान में कहा गया है कि प्रायद्वीपीय भारत, पूर्वी मध्य भारत, उत्तर पूर्व भारत तथा उत्तर पश्चिम भारत के कुछ हिस्सों में सामान्य तथा सामान्य से अधिक बारिश होगी। उत्तर पश्चिम भारत, पश्चिमी मध्य भारत और उत्तर पूर्व भारत के कुछ हिस्सों में सामान्य तथा सामान्य से कम बारिश के आसार हैं।</p>
<p>ऐसे में प्लान बी की जरूरत महसूस होती है। किसानों को खरीफ या गर्मियों की फसल के विविधीकरण के बारे में बताया जाना चाहिए। मानसून के पहले चरण में जो बारिश होगी, उसे जमा करने की सलाह उन्हें दी जानी चाहिए। दो बीघा जमीन से लेकर थ्री इडियट्स के बीच नीति निर्माताओं को शाहरुख खान की अभिनीत फिल्म &lsquo;परदेस&rsquo; भी देखनी चाहिए। परदेस की स्टोरीलाइन क्या है? यह 2004 की फिल्म है। इसे आप यूट्यूब पर मुफ्त में देख सकते हैं।</p>
<p><em><strong>(प्रकाश चावला सीनियर&nbsp;</strong></em><em><strong>इकोनॉमिक जर्नलिस्ट है और आर्थिक नीतियों पर लिखते हैं)</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ थ्री इडियट्स की ऑल इज वेल और दो बीघा जमीन की दुखदायी कहानी के बीच किसानों को स्वदेश के समाधान की जरूरत ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[भारत के डेयरी क्षेत्र में  उत्कृष्टता के सपने का रोडमैप]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/the-road-to-india-dairy-excellence-dreams.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 03 Apr 2023 10:13:49 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/the-road-to-india-dairy-excellence-dreams.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">हाल में गुजरात के गांधीनगर में 49वीं डेयरी इंडस्ट्री कॉन्फ्रेंस का आयोजन हुआ। यह डेयरी इंडस्ट्री के एक बड़े समागम के साथ इसकी उपलब्धियों का उत्सव मनाने का भी अवसर था। गुजरात में इस सालाना कॉन्फ्रेंस का आयोजन 27 वर्षों के बाद, 16 से 18 मार्च 2023 के दौरान किया गया।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">केंद्रीय मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्री पुरुषोत्तम रुपाला ने इस कॉन्फ्रेंस का शुभारंभ किया तथा केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में भारतीय दुग्ध सम्मेलन (इंडियन डेयरी समिट) का आयोजन हुआ। सर्वोच्च स्तर के नीति निर्माताओं और डेयरी इंडस्ट्री के शीर्ष एग्जीक्यूटिव्स ने इंडस्ट्री की उपलब्धियों की सराहना करते हुए इस सेक्टर के भविष्य के लक्ष्य भी निर्धारित किए। यह कॉन्फ्रेंस की केंद्रीय थीम &lsquo;भारतः दुनिया की डेरीः अवसर एवं चुनौतियां&rsquo; के बिल्कुल उपयुक्त था।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">भारत ने कुछ ही दिनों पहले आजादी का 75 वर्षों का जश्न मनाया है। भारत के विकास की गाथा डेयरी इंडस्ट्री का जिक्र किए बिना अधूरी रहेगी। डॉ. वर्गीज कुरियन तथा अन्य की अगुवाई में जो श्वेत क्रांति हुई, उसने भारत को 1970 के दशक में दूध की कमी वाले देश से दुनिया के सबसे बड़े दूध उत्पादक में तब्दील कर दिया है। भारत लगातार कई वर्षों से दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक बना हुआ है। यह कहना इस उपलब्धि को कमतर आंकना होगा कि डेयरी फार्मिंग भारत में नाटकीय रूप से बढ़ी है। हकीकत तो यह है कि ग्रामीण भारत में यह पारंपरिक खेती के पूरक तथा सशक्तीकरण के एक औजार के रूप में विकसित हुई है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">भारत अभी दुनिया का 23% दूध उत्पादन करता है। अमित शाह ने अगले 10 वर्षों में इसे बढ़ाकर 33% तक पहुंचाने का लक्ष्य दिया है। यह निश्चित रूप से चुनौतीपूर्ण लक्ष्य नहीं है। बीते 10 वर्षों के दौरान दुनिया का दूध उत्पादन तो सालाना 1 से 2 फ़ीसदी की दर से बढ़ा है जबकि भारत में इसकी वृद्धि दर 5% रही है। उत्पादन की मात्रा कोई चुनौती नहीं है, लेकिन उसकी गुणवत्ता को बरकरार रखना निश्चित रूप से चुनौती है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">देश में अब भी ज्यादातर दूध असंगठित क्षेत्र में बेचा जाता है जहां प्रोसेसिंग और गुणवत्ता मानकीकरण पर कोई नियंत्रण नहीं होता। कोऑपरेटिव सिस्टम और आनंद के पैटर्न पर हम छोटे किसानों की ताकत को एकजुट करने और उसे 14899 अरब डॉलर (IMAARC ग्रुप रिपोर्ट, जनवरी 2023) का उद्योग बनाने में सफल रहे हैं, लेकिन इसका बहुत कम हिस्सा निर्यात किया जाता है। उचित प्रोसेसिंग तो और भी कम होती है। अगर हमने दुनिया की डेयरी बनने का लक्ष्य निर्धारित किया है तो सिर्फ उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। हमें दूध के स्टोरेज, ट्रांसपोर्ट, प्रोसेसिंग और मार्केटिंग सबमें समान रूप से सक्षम होना पड़ेगा। दूध से बने उत्पादों की प्रोफाइल का विस्तार करने और उन्हें सुधारने की भी जरूरत है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">देश में रोजाना 22 करोड़ टन दूध का उत्पादन होता है। यह लगभग 58 करोड़ लीटर प्रतिदिन बैठता है। हमारी मौजूदा दूध प्रोसेसिंग क्षमता 11 करोड़ लीटर प्रतिदिन की है। जाहिर है कि क्षमता का 100% इस्तेमाल किया जाए तब भी बड़ी मात्रा में दूध की प्रोसेसिंग नहीं की जा सकती है। बाकी दूध का कच्चा इस्तेमाल नहीं होता, इसकी प्रोसेसिंग असंगठित क्षेत्र में की जाती है। अभी 70% दूध को प्रोसेसिंग के लिए खरीदा जाता है और इसकी प्रोसेसिंग स्थानीय मिठाई की दुकानों, त्योहारों तथा घरों में विभिन्न उत्पाद बनाने के रूप में होती है जो असंगठित है। यह बड़े पैमाने पर डिरेगुलेटेड है। इससे विशाल ग्रामीण और अर्ध-शहरी आबादी की जरूरतें भले पूरी हो रही हों, यह भी सच है कि इसमें स्वास्थ्य और सफाई को लेकर चिंता रहती है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">दूध के मामले में हमारी क्षमता का पूरा इस्तेमाल ना होने का एक और उदाहरण कम डेयरी निर्यात है। दुनिया के डेयरी ट्रेड में भारत का हिस्सा नगण्य है। नीति आयोग के वर्किंग ग्रुप की 2018 की रिपोर्ट के अनुसार 1990 के दशक में भारत में दूध का उत्पादन घरेलू मांग से अधिक हो गया था और वह ट्रेंड अभी तक बना हुआ है। अभी भारत मुख्य रूप से बटर, घी और दूध पाउडर का निर्यात मध्य पूर्व, बांग्लादेश और मलेशिया को करता है। दूध के प्रमुख आयातक देश जर्मनी, चीन, नीदरलैंड और फ्रांस हैं तथा डेयरी ट्रेड का आधा तरह-तरह के चीज उत्पादों के रूप में होता है। भारत में चीज उत्पादन का प्राकृतिक लाभ नहीं है, लेकिन हमारे पारंपरिक दुग्ध उत्पाद हैं जिन्हें दुनिया भर में फैले भारतीय मूल के लोगों के बीच प्रमोट किया जा सकता है। हमारी पारंपरिक मिठाईयां तथा अन्य उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए बड़े निवेश की जरूरत होगी ताकि उन उत्पादों की शेल्फ लाइफ बढ़ाई जा सके और उनकी उच्च स्तर की गुणवत्ता निर्धारित की जा सके। इस प्रक्रिया में जाहिर है कि बैकवर्ड लिंकेज को मजबूत करना पड़ेगा। गुणवत्ता की प्रक्रिया के साथ ग्लोबल पहचान के लिए एक मजबूत ब्रांड स्थापित करने की भी जरूरत पड़ेगी।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">स्पष्ट है कि आने वाले समय में मौजूदा और संगठित डेयरी बाजार में औपचारीकरण और मानकीकरण बढ़ाना पड़ेगा। अक्सर देखा गया है कि किसी भी प्रोडक्ट का जब उद्योगीकरण होता है तो सबसे निचले स्तर के कर्मियों और उत्पादकों का शोषण होने लगता है। सबसे खराब स्थिति तब होती है जब चुनिंदा कंपनियों का एकाधिकार हो जाता है और छोटे इनपुट प्रदान करने वालों की मोलभाव करने की क्षमता खत्म हो जाती है। लेकिन दूध के मामले में हमने देखा है कि मजबूत कॉपरेटिव नेटवर्क के जरिए इस आशंका को दूर किया जा सकता है। हमने देखा है कि दूध उद्योग के विकास के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में दुग्ध किसानों की संपन्नता भी बढ़ी है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">डेयरी इंडस्ट्री कॉन्फ्रेंस के शुभारंभ के मौके पर इंडियन डेयरी एसोसिएशन के प्रेसिडेंट डॉ आर एस सोढ़ी ने बताया कि 27 वर्ष पहले जब गुजरात में पिछली कॉन्फ्रेंस आयोजित हुई थी, उसके बाद राज्य में डेरी इंडस्ट्री किस तरह बदल गई है। गुजरात ना तो देश का सबसे बड़ा दूध उत्पादक है ना ही यहां सबसे अधिक दूध देने वाले मवेशी रहते हैं। लेकिन संगठित क्षेत्र में सबसे अधिक डेयरी किसान यहीं हैं। ये किसान कोऑपरेटिव और मेंबर प्रोड्यूसर कंपनियों के साथ जुड़े हुए हैं। इसलिए गुजरात किसानों से खरीदे गए दूध की मार्केटिंग में अव्वल है। पूरे देश में कोऑपरेटिव तथा मेंबर प्रोड्यूसर कंपनियां जितना दूध खरीदती हैं उसका 40% गुजरात से आता है। पूरे देश में जो कोल्ड स्टोरेज क्षमता है उसका 30% गुजरात की कोऑपरेटिव के पास है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">यह सफलता निश्चित रूप से डेयरी सेक्टर में इनोवेटिव टेक्नोलॉजी को लागू करने से हासिल हुई है। इसमें किसानों और कोऑपरेटिव के बीच मजबूत साझेदारी का भी बड़ा योगदान है। कोऑपरेटिव का सिद्धांत है कि किसान जो भी दूध लाएगा उसे पूरा खरीदा जाएगा। इससे किसानों को आजीविका के स्थायी स्रोत का भरोसा मिलता है। बेहतर वसा (फैट कंटेंट) के आधार पर दाम अलग होने के कारण किसानों में दूध की क्वालिटी सुधारने के लिए भी प्रतिस्पर्धा रहती है। दूध उत्पादन की मात्रा बढ़ाने और ब्रीड तथा फीड की क्षमता सुधारने का काम एक मजबूत संस्थागत और नॉलेज सपोर्ट के बिना हासिल नहीं किया जा सकता है। गुजरात के डेरी किसानों को यह सब उनके कोऑपरेटिव से हासिल होता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">गुजरात के कोऑपरेटिव की सफलता दशकों से सराही जाती रही है। विभिन्न राज्यों और अलग-अलग सेक्टर में इस मॉडल को अपनाया गया लेकिन हर जगह सीमित सफलता ही मिली। यहां कॉमर्शियल सफलता हासिल करने के साथ किसान कल्याण का भी सिद्धांत है। इस सिद्धांत को व्यवहार में बदलने के भी अनेक दृष्टांत हैं। गुजरात में हमने अनियंत्रित विकास को सस्टेनेबल विकास में बदल दिया है। ऐसे समय जब देश डेयरी क्षेत्र में उत्कृष्टता हासिल करने की ओर बढ़ रहा है, इंडस्ट्री यह नहीं भूल सकती कि यह करोड़ों डेयरी किसानों तथा उन मवेशियों के दम पर संभव है जिन्हें किसान अपने परिवार का अंग मानते हैं। डेयरी इंडस्ट्री में दीर्घकालिक प्रभाव वाले तथा सस्टेनेबल विकास के लिए हमें डेयरी किसानों के साथ बेहतर साझेदारी करनी पड़ेगी तथा पूरे देश में डेयरी पशुओं की उत्पादकता बढ़ानी पड़ेगी। दूध किसानों के आधार को मजबूत बनाकर ही हम इंडस्ट्री के लिए पर्याप्त मात्रा तथा गुणवत्ता सुनिश्चित कर सकते हैं। उसके बाद ही इंफ्रास्ट्रक्चर, प्रोसेसिंग और दूध उत्पादों के निर्यात में बढ़ोतरी संभव है। यह कोई एक बार का काम नहीं, बल्कि एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जिसमें हर एक दूसरे को आगे बढ़ने में मदद करता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">49वीं डेयरी इंडस्ट्री कॉन्फ्रेंस का समापन इस इंडस्ट्री के सामने मौजूद अवसरों और चुनौतियों पर चर्चा के साथ हुआ। कई तरह के टेक्नोलॉजिकल इनोवेशन, नए बाजार, नीतिगत मदद तथा रिसर्च पर उद्यमियों, शिक्षाविदों तथा नीति निर्माताओं ने चर्चा की। लेकिन हमें इस प्रक्रिया में डेयरी किसानों को भी शामिल करना चाहिए और डेयरी क्षेत्र में भारत की उत्कृष्टता की ओर बढ़ने में उन्हें भी साथ रखना चाहिए।</span></p>
<p><em><span style="font-weight: 400;"><strong>(प्रोफेसर डॉ. जे.बी. प्रजापति वर्गीज कुरियन सेंटर ऑफ एक्सीलेंस, इंस्टीट्यूट ऑफ़ रूरल मैनेजमेंट आनंद के चेयरपर्सन हैं। डेयरी क्षेत्र में उनका 40 वर्षों का अनुभव है। वे इंडियन डेयरी एसोसिएशन, वेस्ट जोन के चेयरमैन भी हैं। हर्षदा सामंत, वर्गीज कुरियन सेंटर ऑफ एक्सीलेंसइसी सेंटर में रिसर्च फेलो हैं&nbsp; और एग्रीबिजनेस इकोनॉमिक्स उनका कार्यक्षेत्र है)</strong><br /></span></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ भारत के डेयरी क्षेत्र में  उत्कृष्टता के सपने का रोडमैप ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारत की खाद्य सुरक्षा काफी मजबूत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/food-security-of-india-strong-despite-global-challenges.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 28 Mar 2023 10:34:30 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/food-security-of-india-strong-despite-global-challenges.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>कृषि भारत की अधिकांश आबादी (58 फीसदी) की आजीविका है। यही कारण है कि आज कृषि क्षेत्र में भारत काफी आत्मनिर्भर हो चुका है। इसकी बदौलत देश अब कृषि और इससे जुड़े उत्पादों का निर्यातक बन चुका है। साल 2023 में भारत कृषि क्षेत्र में जहां और मजबूत होने की स्थिति में वहीं निर्यात के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा।</p>
<p>मौजूदा दौर में खरीफ उत्पादन में गिरावट देखी जा रही है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आने वाले समय में इस स्थिति में सुधार नहीं होगा। अगर हम आंकड़ों पर नजर डालें तो 6 फीसदी गिरावट के साथ चालू फसल वर्ष (2022-23) में खरीफ फसलों का उत्पादन 4.6 करोड़ टन रहा। इसमें 11.2 फीसदी धान का उत्पादन है। अगर हम गेहूं और चावल के वर्तमान भंडारण की बात करें तो यह क्रमश: 50 और 46 फीसदी है जो आज की स्थिति में 30 फीसदी ज्यादा है। चालू फसल वर्ष में गेहूं का उत्पादन 12.5 फीसदी ज्यादा होने की उम्मीद है। मार्च 2023 की बात करें तो देश का गेहूं भंडारण 1.1 करोड़ टन रहेगा जो 35 लाख टन के बफर स्टॉक से कहीं ज्यादा है।</p>
<p>मौजूदा समय में भारत का खाद्यान्न उत्पादन काफी मजबूत स्थिति में है। हम इस मामले में विश्व गुरु बनने को तैयार हैं। इतना ही नहीं अगर भारत की मौजूदा मुद्रास्फीति ​स्थिर रहती है तो हम और भी मजबूत होने की स्थिति में होंगे क्योंकि दूसरे देशों में जो खाद्यान्न की चुनौती है वह हमारे यहां नहीं है। इसका कारण साफ है कि हमारे यहां जो बफर स्टाक वाली व्यवस्था है जो सदियों से चली आ रही है वह इस देश की खाद्यान्न व्यवस्था को और मजबूत बनाता है। रुस और यूक्रेन युद्ध के चलते कई देशों में खाद्यान्न संकट का असर पड़ा है लेकिन भारत पर इसका असर नहीं है। हालांकि, पिछले साल की &lsquo;कैरी फॉरर्वड स्टॉक&rsquo; की स्थिति जरूर प्रभावित हुई है।</p>
<p>अप्रैल 2023 तक देश में अनाजों के दाम स्थिर रह सकते हैं क्योंकि सरकार ने रबी फसलों के विपणन सीजन 2023-24 के लिए एमएसपी में वृद्धि की है ताकि किसानों के लिए उनकी उपज का लाभकारी मूल्य सुनिश्चित किया जा सके। सरकार को अनाजों की खरीद में 19 फीसदी के इजाफे का अनुमान है। इसलिए साल 2023 में गेहूं और चावल की पर्याप्त मात्रा का स्टॉक दिखाई पड़ रहा है। हालांकि यह समय सावधानी बरतने का है क्योंकि रुस और यूक्रेन के बीच जो युद्ध चल रहा है वह अभी खत्म होता नहीं दिखाई पड़ रहा है। इसका असर आने वाले दिनों में भारत को भी झेलना पड़ सकता है लेकिन मौजूदा समय में हमारी स्थिति काफी मजबूत है।</p>
<p><strong><em>(लेखक एसएलसीएम के ग्रुप सीईओ हैं।)</em></strong></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारत की खाद्य सुरक्षा काफी मजबूत ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[मिलेट से किसानों के साथ उपभोक्ताओं और अर्थव्यवस्था को भी फायदा ]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/growth-potential-for-millet-a-boon-for-health-as-well-as-farmers-and-economy.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 25 Mar 2023 12:35:49 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/growth-potential-for-millet-a-boon-for-health-as-well-as-farmers-and-economy.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">एशिया और अफ्रीका में मनुष्य ने जो पहली फसल की खेती की थी वह मिलेट ही थे। छोटे बीज आकार के मिलेट पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं। इन्हें पीसकर आटा बनाया जा सकता है अथवा पशुओं के चारे के रूप में भी इनका इस्तेमाल किया जा सकता है। शुष्क और कम पोषण वाली मिट्टी समेत अलग-अलग तरह के वातावरण में इनकी खेती की जा सकती है। इस तरह जो इलाके सूखे अथवा मिट्टी के क्षरण से प्रभावित रहते हैं वहां के किसानों के लिए यह प्रमुख फसल है। इनमें खाद्य सुरक्षा बढ़ाने की क्षमता के साथ अन्य फायदे भी हैं। यह प्रोटीन, फाइबर, विटामिन जैसे पोषक तत्वों के अच्छे स्रोत हैं। इनमें ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है इसलिए यह डायबिटीज की बीमारी से ग्रस्त अथवा उनकी आशंका वाले लोगों के लिए भी पोषक आहार हो सकते हैं। मिलेट ऐसी फसलें हैं जिनके लिए न्यूनतम इनपुट की जरूरत पड़ती है। इन पर कीटों अथवा बीमारियों के लगने का खतरा भी कम रहता है। इस तरह यह रासायनिक उर्वरकों पर किसानों की निर्भरता को भी कम करते हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">मिलेट को उपजाना आसान होता है। इनकी कटाई हाथों से ही की जा सकती है। इस तरह छोटे किसान भी इन्हें उगा सकते हैं। भारत तथा दुनिया के अन्य अनेक क्षेत्रों में मिलेट की खेती की प्रचुर संभावनाएं हैं।&nbsp; इनसे किसानों की आमदनी बढ़ सकती है साथ ही इनसे खाद्य और पोषण सुरक्षा भी मिल सकती है। लेकिन मिलेट का उत्पादन कई मुश्किलों का सामना कर रहा है। सभी प्रमुख मिलेट फसलों के रकबे और उत्पादन में गिरावट आई है। उत्पादन बढ़ाने के सरकार के प्रयासों के बावजूद ऐसा हो रहा है। एक समय मिलेट लोगों के भोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा होते थे लेकिन हरित क्रांति के बाद गेहूं और चावल जैसी फसलों ने इनकी जगह ले ली।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">2013-14 से 2021-22 के दौरान प्रमुख मिलेट फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में 80 से 125 फ़ीसदी की बढ़ोतरी की गई है। इसके बावजूद बीते 8 वर्षों में इनका उत्पादन 7% घटकर 156 लाख रह गया है। लेकिन गेहूं और धान की तरह एमएसपी पर सरकारी खरीद नहीं होने के कारण किसान इनमें रुचि नहीं दिखा रहे हैं। ज्वार और रागी दोनों के उत्पादन में गिरावट आई है जबकि बाजरा का उत्पादन स्थिर बना हुआ है। जब तक इनकी खपत बढ़ाने के प्रयास नहीं होंगे तब तक किसान इनकी खेती की ओर आकर्षित नहीं होंगे। किसानों को मिलेट उत्पादन के लिए प्रेरित करने के लिए नीतिगत स्तर पर हस्तक्षेप की जरूरत है ताकि किसानों को उनके उपज की उचित कीमत मिले और रिटर्न धान जैसी फसलों से बेहतर हो।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">भारत की पहल पर संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2023 को अंतरराष्ट्रीय मिलेट वर्ष घोषित किया है। इसका मकसद लोगों में मिलेट के महत्व को बताना तथा खाद्य सुरक्षा व पोषण सुरक्षा बढ़ाने के साथ टिकाऊ खेती को बढ़ावा देना है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">भारत दुनिया में मिलेट का सबसे बड़ा उत्पादक है। ये मुख्य रूप से सूखे कृषि जलवायु वाले क्षेत्र में उगाए जाते हैं। भारत में हर साल लगभग 170 लाख टन मिलेट का उत्पादन होता है। यह एशिया के कुल मिलेट उत्पादन का 80% और दुनिया का 20% है। 2012 में 160.3 लाख टन मिलेट का उत्पादन हुआ था। एक दशक में 0.94% की सालाना वृद्धि के साथ यह 2022 में 176 लाख टन तक पहुंचा है। 2012 में भारत में मिलेट की खेती 154 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में हुई थी जो 2022 में घटकर 140 लाख हेक्टेयर रह गई। हालांकि मिलेट की उत्पादकता बढ़ी है। 2012 में यह 1.04 टन प्रति हेक्टेयर थी जो 2022 में 1.26 टन हो गई। यह सालाना 2% की वृद्धि को दर्शाता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">भारत में राजस्थान में मिलेट का सबसे बड़ा उत्पादक है। 2020-21 में यहां 51.5 लाख टन मिलेट का उत्पादन हुआ था। यह देश में पूरे उत्पादन का 28.61% है। कर्नाटक दूसरे स्थान पर है जहां 25.6 लाख टन उत्पादन हुआ और यह देश के कुल उत्पादन का 14.26% था। मिलेट उत्पादन करने वाले अन्य प्रमुख राज्यों में महाराष्ट्र (25.1 लाख टन, 13.95%), उत्तर प्रदेश (22.9 लाख टन, 12.75%), हरियाणा (13.6 लाख टन, 7.58%) और गुजरात (10.9 लाख टन, 6.06%) शामिल हैं। इन छह राज्यों ने 2020-21 में देश के 80% में मिलेट का उत्पादन किया था।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">वर्ष 2022 में भारत में लगभग 177.5 लाख टन मिलेट की खपत हुई। 2012 में यह 160.5 लाख टन थी। इस तरह एक दशक में इसमें 1% सालाना की दर से वृद्धि हुई है। 1960 में भारत में प्रति व्यक्ति मिलेट की खपत 30.94 किलोग्राम प्रतिवर्ष थी, यह 2022 में घटकर 3.87 किलोग्राम रह गई। उत्पादन लगभग एक समान बना रहा जबकि देश में आबादी बढ़ती रही। इस तरह प्रति व्यक्ति खपत में गिरावट आई। विभिन्न राज्यों में मिलेट की पैदावार अलग-अलग है। कई राज्यों में गेहूं और धान की तुलना में इसकी पैदावार बहुत कम होती है। राष्ट्रीय औसत ज्वार का एक टन, बाजरे का 1.5 टन, रागी का 1.7 टन है जबकि गेहूं का राष्ट्रीय औसत 3.5 टन और धान का 4 टन है। इसलिए बेहतर सिंचाई सुविधा उपलब्ध होने पर किसान धान, गेहूं, गन्ना अथवा कपास की खेती करना पसंद करते हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने हाल के बजट में मिलेट पर काफी फोकस किया है। सस्टेनेबल अर्थात टिकाऊ खेती के तरीके के रूप में मोटे अनाज यानी मिलेट की प्रासंगिकता पर काफी बातें कही गई हैं। भारत में मिलेट की औसत पैदावार 1239 किलो प्रति हेक्टेयर है जबकि वैश्विक औसत 1269 किलो प्रति हेक्टेयर है। वित्त मंत्री ने हैदराबाद स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मिलेट रिसर्च को सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में बदलने का प्रस्ताव रखा है। यह पहल भारत को मिलेट रिसर्च में ग्लोबल हब बनाने के मकसद से है। उन्होंने यह भी कहा कि फसल तैयार होने के बाद वैल्यू एडिशन, घरेलू खपत बढ़ाने और देश-विदेश में मिलेट प्रोडक्ट की ब्रांडिंग को भी सरकार की तरफ से मदद दी जाएगी।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">सरकार को मिलेट की खपत बढ़ाने के उपायों पर विचार करना चाहिए। उदाहरण के तौर पर 26 करोड़ एनरोल्ड छात्रों के लिए मध्यान्ह भोजन योजना में मिलेट बच्चों का मुख्य आहार हो सकते हैं। आंगनवाड़ी केंद्रों के जरिए 7.71 करोड़ बच्चों तथा 1.8 करोड़ गर्भवती तथा बच्चों को दूध पिलाने वाली महिलाओं को पूरक पोषण के रूप में मिलेट दिए जा सकते हैं। प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण तथा सक्षम आंगनवाड़ी एवं पोषण 2.0 योजनाओं के तहत 30496.82 करोड़ रुपए का बजट है जिसे मिलेट पर फोकस किया जा सकता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">मिलेट को प्रमोट करने के लिए निम्नलिखित कदम भी उठाए जा सकते हैंः-</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">1.किसानों के लिए जागरूकता एवं प्रशिक्षण अभियान।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">2.रिसर्च एंड डेवलपमेंट में निवेश, जैसे मिलेट की ऐसी नई वैरायटी विकसित करना जो सूखा तथा बीमारी रोधी हो तथा जिनकी उत्पादकता अधिक हो।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">3.सिंचाई इन्फ्रास्ट्रक्चर में सरकार का निवेश तथा सिंचाई उपकरण खरीदने में किसानों को सब्सिडी। हालांकि मिलेट सूखा प्रतिरोध क्षमता वाली फसलें हैं फिर भी सिंचाई से इनकी उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">4.मार्केट लिंकेज स्थापित करना जैसे किसानों को खरीदारों, प्रोसेसर तथा निर्यातकों के साथ जोड़ना।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">5.सरकार तथा अन्य संगठन किसानों को एक्सटेंशन सेवाएं उपलब्ध करा सकते हैं। जैसे, तकनीकी सहायता, मिट्टी की जांच, फसल प्रबंधन सलाह इत्यादि।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इन उपायों पर अमल करके भारत में मिलेट का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। इससे किसानों के साथ-साथ उपभोक्ताओं और समग्र अर्थव्यवस्था को फायदा होगा।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;"><span><strong>(अभय दंडवते, नेशनल बल्क हैंडलिंग कॉरपोरेशन के&nbsp; चीफ रिस्क ऑफिसर और बसंत वैद, हेड मार्केट रिसर्च एंड प्राइस इंटेलीजेंस हैं)</strong></span></span></p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/11/image_750x500_636fd9e82567b.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ मिलेट से किसानों के साथ उपभोक्ताओं और अर्थव्यवस्था को भी फायदा  ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[अगली नीली क्रांति की सफलता के लिए चुनौतियों का समाधान जरूरी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/breaking-the-barriers-overcoming-challenges-to-unlock-the-next-blue-revolution.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 16 Mar 2023 10:51:46 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/breaking-the-barriers-overcoming-challenges-to-unlock-the-next-blue-revolution.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>समुद्री खाद्य पदार्थ अर्थात सीफूड प्रोटीन का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं तथा प्रोटीन की वैश्विक डिमांड पूरी करने में अहम भूमिका निभाते हैं। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार दुनिया की 20% आबादी प्रोटीन के प्राथमिक स्रोत के रूप में मछलियों पर निर्भर करती है। सीफूड विश्व खाद्य सुरक्षा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, खासकर विकासशील देशों में जहां यह प्रोटीन तथा अन्य पोषक तत्वों के बड़े स्रोत के रूप में कार्य करते हैं। वर्ष 2020 में दुनिया में 414 अरब डॉलर की करीब 21.4 करोड़ टन मछलियों का उत्पादन हुआ। इससे मछली पकड़ने, मछली पालन, प्रोसेसिंग, मार्केटिंग जैसे क्षेत्र में करोड़ों लोगों को रोजगार भी मिला।</p>
<p>सीफूड सबसे अच्छा प्रोटीन जनरेटर भी है। एक किलोग्राम मछली के लिए 1.2 किलो फीड की जरूरत होती है जबकि पोल्ट्री के लिए 2 किलो और बीफ के लिए 5 किलो फीड की आवश्यकता होती है। इस तरह सीफूड ज्यादा सस्टेनेबल विकल्प भी है। बीते एक दशक में दुनिया में प्रति व्यक्ति मछलियों की खपत 3 गुना हो गई है। इससे विश्व खाद्य सुरक्षा में इसके महत्व का भी पता चलता है।</p>
<p>सीफूड हमें मुख्य रूप से 2 स्रोतों से मिलता है। एक है समुद्र से मछली पकड़ना और दूसरा एक्वाकल्चर। एक्वाकल्चर मछली, शेल फिश जैसे जलीय जीवों और पौधों की खेती है। यह तालाब, टैंक जैसी जगहों पर नियंत्रित वातावरण में किया जाता है।&nbsp;</p>
<p>बीते कुछ दशकों में ज्यादा मछलियां पकड़ने और जलवायु परिवर्तन के असर से समुद्र से मछली पकड़ना कम होता जा रहा है। इस अंतर को एक्वाकल्चर के जरिए पूरा किया जा रहा है। आज हर दो में से एक मछली समुद्र के बजाय जमीन पर की जाने वाली खेती से आती है। इससे हमारे रोज के जीवन में एक्वाकल्चर के महत्व का पता चलता है। अनुमान है कि अगले एक दशक में दुनिया का 75% मछली उत्पादन एक्वाकल्चर से ही आएगा। सस्टेनेबिलिटी, समुद्री संसाधनों पर कम दबाव, नियंत्रित वातावरण तथा उत्पादन बढ़ाने में टेक्नोलॉजी के प्रयोग जैसी वजहों से ऐसा संभव हो सकेगा।</p>
<p>यह तथ्य आश्चर्यजनक है लेकिन सभी इससे वाकिफ नहीं हैं कि भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एक्वाकल्चर उत्पादक, तीसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक और चौथा सबसे बड़ा सीफूड निर्यातक है। यह दुनिया के श्रिंप उत्पादन में 10% का योगदान करता है। सीफूड निर्यात से भारत को 7.7 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा की आय होती है। इसमें हर साल 10% से अधिक की ग्रोथ है और बाजार का कुल अवसर 25 अरब डॉलर का है। एक्वाकल्चर भारत में एक उभरता सेक्टर है। यह ग्रामीण तथा तटीय इलाकों में 50 लाख लोगों को आजीविका मुहैया कराता है। एक्वाकल्चर में हम कतला, रोहू, मिर्गल, तिलापिया रूपचंद जैसी प्रजाति की मछलियों और श्रिंप की खेती करते हैं। श्रिंप झींगे की तरह होते हैं लेकिन झींगा नहीं होते।</p>
<p>आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, गुजरात, ओडिशा जैसे राज्यों में मछली उद्योग राजस्व का बड़ा स्रोत है। श्रिंप का बाजार पूरी तरह निर्यात आधारित है। इसका निर्यात मुख्य रूप से अमेरिका, जापान, चीन, वियतनाम जैसे देशों को किया जाता है।</p>
<p>समुद्र में मछली पकड़ने के विकल्प के तौर पर एक्वाकल्चर का महत्व बढ़ने के बावजूद इस क्षेत्र में कई चुनौतियां हैं। यह चुनौतियां उत्पादन से लेकर हार्वेस्टिंग के बाद वैल्यू चेन तक हैं। एक्वाकल्चर की क्षमता बढ़ाने और अगले दशक में इंडस्ट्री की ग्रोथ के लिए इन चुनौतियों का समाधान करना जरूरी है।&nbsp;</p>
<p>इस इंडस्ट्री की सबसे बड़ी चुनौती कम उत्पादकता और बड़े पैमाने पर बीमारी है। उदाहरण के लिए उड़ीसा में श्रिंप की औसत उत्पादकता सिर्फ 50% है। यह आंध्र प्रदेश तथा अन्य राज्यों की तुलना में बहुत कम है। यह अंतर पारंपरिक खेती के तौर तरीके अपनाने की वजह से है जिनके कारण उत्पादन कम होता है तथा बीमारियां भी अधिक फैलती हैं।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/03/image_750x_640db204430c5.jpg" alt="" /></p>
<p>वैज्ञानिक पद्धति ना अपनाने से दो तरह की परेशानियां आती हैं। एक तो इससे उत्पादकता कम होती है और दूसरे टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म ना होने से उत्पादन के पैरामीटर का डिजिटाइजेशन नहीं हो पाता है। यह भी उत्पादन क्षमता बढ़ाने में बाधा है।</p>
<p>एक्वाकल्चर का आधार 4 आवश्यक पैमाने पर आधारित है। पहला है पानी की श्रेष्ठ गुणवत्ता का प्रबंधन। एक्वाकल्चर जल आधारित उद्योग है इसलिए इसकी सफलता में पानी की गुणवत्ता को बरकरार रखना अहम होता है। दूसरा, उचित फीड मैनेजमेंट भी जरूरी है। अधिक फीड देने से उत्पादन की लागत काफी बढ़ जाती है साथ ही तालाब या टैंक का तल काफी प्रदूषित भी हो जाता है। इससे उस पानी में पलने वाले जीवों की सेहत पर असर होता है। दूसरी तरफ कम फीड देने से श्रिंप की ग्रोथ पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। तीसरा, ग्रोथ मैनेजमेंट भी आवश्यक है। इसमें मिनिरल यानी खनिज, प्रोबायोटिक तथा अन्य आवश्यक चीजों का उचित अनुपात में देना शामिल है। चौथा, रोग प्रबंधन भी अहम है। इसमें बीमारी के लक्षण को पहचानने के लिए लगातार जीवों की मॉनिटरिंग जरूरी है।</p>
<p>हमें इस तथ्य को स्वीकार करना चाहिए कि एक्वाकल्चर के क्षेत्र में पिछले दशक में टेक्नोलॉजी का अधिक इस्तेमाल नहीं हुआ है। आज उन्नत तकनीक उपलब्ध होने के कारण किसानों की मदद के लिए समाधान भी उपलब्ध हैं। पानी की गुणवत्ता जांचने वाले सेंसर और आईओटी रियल टाइम में आंकड़े बताते हैं। ऑटो फीडर रोजाना जीवों को निश्चित मात्रा में फीड उपलब्ध कराते हैं। जीवों के विकास की निगरानी करने वाले डिवाइस उपलब्ध हैं। रिसर्कुलेटिंग एक्वाकल्चर सिस्टम की तरह वैकल्पिक उत्पादन के साधन भी मौजूद हैं।</p>
<p>फिर भी सवाल यह है कि क्या जमीनी स्तर पर इन टेक्नोलॉजी को अपनाया जा रहा है? क्या भारतीय इकोसिस्टम के मुताबिक उनका कस्टमाइजेशन किया गया है? इससे भी महत्वपूर्ण बात है कि क्या वह टेक्नोलॉजी छोटे और सीमांत किसानों के लिए आर्थिक रूप से अफोर्डेबल है?</p>
<p>भारत में एक्वाकल्चर के क्षेत्र में टेक्नोलॉजी आधारित समाधान को प्रमोट करना आसान नहीं है। यह इसलिए भी चुनौतीपूर्ण है क्योंकि इसमें हमें ऐसे लोगों के साथ काम करना पड़ता है जो ग्रामीण तथा तटीय इलाकों में रहते हैं, जहां आधुनिक तकनीक को लोग जल्दी स्वीकार नहीं करते। इसका एक कारण जो है उसे मैं एनसेसट्रल इंटेलिजेंस कहता हूं। इससे आशय उन मान्यताओं और परंपराओं से है जो पीढ़ियों से चली आ रही हैं।</p>
<p>जब एक्वाकल्चर इंडस्ट्री लगातार विकसित हो रही है यह आवश्यक हो जाता है कि टेक्नोलॉजी कंपनियां आगे आएं और इस महत्वपूर्ण सेक्टर की मदद करने में अहम भूमिका निभाएं। वास्तविक अर्थों में प्रभाव डालने के लिए टेक्नोलॉजी कंपनियों को जागरूकता बढ़ाने पर फोकस करना चाहिए, किसानों को प्रशिक्षित करने के मकसद से उनकी हैंडहोल्डिंग करनी चाहिए और टेक्नोलॉजी को आसान तरीके से स्वीकार किया जाना सुनिश्चित करना चाहिए। इसके अलावा कंपनियों को ऐसे कस्टमाइज्ड सॉलूशन लाने चाहिए जिनसे इंडस्ट्री की अलग तरह की जरूरतें पूरी हों और वह सबके लिए सस्ता और सुलभ हो।</p>
<p>A3 = Awareness (जागरूकता) + Adoption (अपनाना) + Affordability (कम कीमत)</p>
<p>ऐसा करके भी हम समीकरण के सिर्फ एक पक्ष को हल कर रहे हैं। दूसरी तरफ डाटा के अभाव में वैल्यू चेन की पारदर्शिता नहीं रह जाती है। ना तो किसान अपने उपज की मांग को लेकर कोई अनुमान लगा सकते हैं ना ही सीफूड के खरीदार आपूर्ति के बारे में कोई अनुमान व्यक्त कर सकते हैं। इससे अंततः किसान अपनी उपज का उचित मूल्य पाने से वंचित रह जाएंगे। हार्वेस्टिंग के बाद की वैल्यू चेन अक्षम चैनलों के कारण बाधित हो जाती है।&nbsp;</p>
<p>ऐसे समय जब हम एक्वाकल्चर में नई लहर के लिए तैयार हो रहे हैं, हमें इस सेक्टर की विशालता को पहचानना होगा। साथ ही वैल्यू चेन के हर कदम में प्रौद्योगिकी समाधान शामिल करने की आवश्यकता को भी महसूस करना पड़ेगा। ऐसा करके हम समस्या को समझने की अपनी क्षमता बढ़ा सकते हैं, उचित सॉफ्टवेयर मॉडल अपनाकर रियल टाइम में डाटा आधारित फैसला भी ले सकते हैं। एक्वाकनेक्ट की भूमिका यहीं पर आती है। यह एक्वाकल्चर में किसी समाधान को बड़े पैमाने पर लागू करने का रास्ता तैयार कर रहा है। इसके लिए वह सैटेलाइट रिमोट सेंसिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की नवीनतम तकनीक का इस्तेमाल करता है।</p>
<p>एक्वाकनेक्ट का मिशन एक्वाकल्चर वैल्यू चेन में पारदर्शिता लाना और उसे सक्षम बनाना है। इसके साथ ही यह डाटा की कमी और अक्षम चैनल की दीर्घकालिक समस्याओं का भी समाधान करता है। इन समस्याओं ने हार्वेस्टिंग के बाद की प्रक्रिया को काफी है नुकसान पहुंचाया है। अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी के जरिए एक्वाकनेक्ट भारतीय एक्वाकल्चर में क्रांति लाना चाहता है।</p>
<p>अगले लेख में हम एक्वाकनेक्ट की टेक्नोलॉजी की चर्चा करेंगे और देखेंगे कि भारतीय एक्वाकल्चर में बदलाव लाने के लिए जमीनी स्तर पर चुनौतियां से किस तरह निपटते हैं।</p>
<p><strong><em>( मुरुगन चिदंबरम, एक्वाकनेक्ट के डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन और मार्केटिंग के प्रमुख हैं)</em></strong></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/03/image_750x500_640db20d2d408.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ अगली नीली क्रांति की सफलता के लिए चुनौतियों का समाधान जरूरी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कृषि में इनोवेशन के लिए कर्ज की जरूरत पूरी करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं कृषि केंद्रित एनबीएफसी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/agri-focused-nbfcs-and-fintech-plays-critical-role-to-augment-credit-requirement-for-agricultural-innovation.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 05 Mar 2023 11:54:01 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/agri-focused-nbfcs-and-fintech-plays-critical-role-to-augment-credit-requirement-for-agricultural-innovation.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था का एक प्रभावशाली सेक्टर है। यहां लगभग 85% कृषि भूमि 2 हेक्टेयर से कम आकार की है। फिर भी वह हमारी 1.41 अरब की विशाल आबादी के लिए पर्याप्त फूड (खाद्य) और फाइबर उत्पन्न करती है। इसके अतिरिक्त यह निर्यात के लिए सरप्लस उत्पादन भी करती है। किसानों के योगदान के बिना यह संभव नहीं होता। छोटे और सीमांत किसानों के लिए पर्याप्त, समय पर और सस्ता संस्थागत कर्ज आवश्यक है। नीति निर्माताओं ने संस्थागत कर्ज तक किसानों की पहुंच बेहतर बनाने के लिए अनेक कदम उठाए हैं। इन नीतियों में छोटे और सीमांत किसानों को मजबूत बनाने पर फोकस किया गया है ताकि खेती के तौर-तरीके को सुधारा जा सके।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कृषक समुदाय को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने के लिए कृषि ऋण सुधार के क्षेत्र में कई प्रोएक्टिव कदम उठाए गए हैं, फिर भी यह कई पड़ोसी देशों की तुलना में पीछे है। हाल के दशकों में कर्ज की संख्या तो बढ़ी है, इसकी क्वालिटी और कृषि पर इसका असर कमजोर ही हुआ है। कृषि में पूंजी की जरूरत पड़ती है क्योंकि अधिकतर किसानों को उपकरणों की खरीद पर काफी खर्च करना पड़ता है। फिर भी किसानों को दिया जाने वाला अधिकतर कृषि कर्ज वर्किंग कैपिटल प्रकृति का होता है। इससे 80% से अधिक किसानों की आमदनी स्थिर हो गई है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">भारत में कर्ज की मांग के विश्लेषण से पता चलता है कि बैंक तथा अन्य वित्तीय संस्थान प्राथमिकता क्षेत्र के तहत कृषक समुदाय के बीच अपनी पहुंच तेजी से बढ़ा रहे हैं। फिर भी यह पहुंच जरूरत से बहुत कम है। इस परिदृश्य में गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनी (NBFC) सेक्टर ने कृषि मैकेनाइजेशन पर फोकस करके सफलता की उल्लेखनीय मिसाल पेश की है। यह वास्तव में भारत की विविध और उद्यमी भावना को प्रदर्शित करता है। बड़े कृषि इंफ्रास्ट्रक्चर की फाइनेंसिंग से लेकर छोटे किसानों को माइक्रोफाइनेंसिंग तक, इन एनबीएफसी ने समय के साथ इनोवेशन किए और समस्त कृषक समुदाय की कर्ज की जरूरतों को पूरा करने का रास्ता निकाला। कृषि पर फोकस करने वाले एनबीएफसी-फिनटेक अच्छे और नियमित संस्थान के रूप में विकसित हुए हैं। उन्होंने टेक्नोलॉजी, इनोवेशन, जोखिम प्रबंधन तथा गवर्नेंस के सर्वश्रेष्ठ तरीकों को अपनाया है। इन संस्थानों ने माध्यम बनकर वित्तीय समावेशन के सरकार के एजेंडे को आगे भी बढ़ाया है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कृषि केंद्रित एनबीएफसी-फिनटेक किसानों की दीर्घकालिक कर्ज की जरूरतों को पूरा कर सकते हैं क्योंकि ग्रामीण भारत में उनकी अच्छी पहुंच है और उनका ज्यादातर कर्ज वितरण छोटे और सीमांत किसानों के बीच है। आंकड़ों से पता चलता है कि सिर्फ 30% छोटे और सीमांत किसानों की पहुंच बैंकों तथा अन्य औपचारिक वित्तीय संस्थानों तक है। दूरदराज के इलाकों तक पहुंच न होने और महत्वपूर्ण टेक्नोलॉजी का अभाव के चलते बैंकों को किसानों को कर्ज उपलब्ध कराने में दिक्कतें आती हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">छोटे किसानों को कर्ज देने तथा अन्य बैंकिंग गतिविधियों की और भी सीमाएं हैं। जैसे सीमांत किसानों के लिए सेवा का अधिक खर्च और कर्ज डिफॉल्ट करने का बड़ा जोखिम। बैंकों को कुछ और समस्याओं का भी सामना करना पड़ा है। जैसे खेत का डाटा एकत्र करना तथा किसानों को होने वाले कैशफ्लो की जानकारी, उनके कर्ज के इतिहास की जानकारी का न होना। यही वह जगह है जहां कृषि केंद्रित एनबीएफसी-फिनटेक की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्होंने ऐसी टेक्नोलॉजी हासिल की है जिनसे कृषि क्षेत्र तथा व्यक्तिगत किसानों के बारे में उन्हें सभी आवश्यक सूचनाएं उपलब्ध होती हैं, जिनकी मदद से किसानों को बेहतर तरीके से कर्ज उपलब्ध कराया जा सकता है। वे कम कागजी कार्रवाई के साथ किसानों को जल्दी कर्ज भी उपलब्ध करा सकते हैं। उन्नत एनालिटिक्स और ग्रामीण बाजार के बारे में जानकारी उपलब्ध होने से उन्हें कर्ज देने की प्रक्रिया को सक्षम बनाने और कर्ज वितरण का समय घटाने में भी मदद मिलती है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कृषि केंद्रित एनबीएफसी जिन कार्यों के लिए किसानों को कर्ज देते हैं उनमें उपकरण और मशीनरी खरीदना, सिंचाई के आधुनिक और सक्षम तरीके अपनाना तथा खेती के समग्र वैल्यू चेन के अवयव शामिल हैं। उन्होंने ब्याज की दर को भी नीचे लाने में कामयाबी हासिल की है। भारत के विशाल ग्रामीण क्षेत्र में जो अनौपचारिक कर्ज व्यवस्था है वहां 24% से 60% तक ब्याज वसूला जाता है, जबकि यह संस्थान 12% से 18% तक ब्याज लेते हैं। कर्ज की डिमांड के आकलन में आधुनिक टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल, कर्ज के इस्तेमाल पर नजर, सिंचाई सुविधाओं की ट्रैकिंग आदि ऐसे खास प्रोडक्ट हैं जो एनबीएफसी किसानों को मुहैया कराते हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">समय आ गया है कि नीति निर्माता ऐसे एनबीएफसी की सहायता करें जो कृषि क्षेत्र में औपचारिक फाइनेंसिंग में आमूलचूल बदलाव लाने की क्षमता रखते हैं। ये एनबीएफसी अभी जिस बड़ी चुनौती का सामना कर रहे हैं वह है सुधारों में उन्हें शामिल ना किया जाना। यह अभी बैंकों तक सीमित है। नीति निर्माताओं को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कृषि केंद्रित एनबीएफसी-फिनटेक को सरकार की सब्सिडी स्कीम जैसे प्रभावी कार्यक्रमों में शामिल किया जाए। अभी यह लाभ सिर्फ बैंकों को मिलता है। इससे ये एनबीएफसी बेहतर तरीके से कर्ज देने, किसानों की कर्ज की जरूरत पूरी करने और उनकी आय बढ़ाने में मदद करने में कारगर भूमिका निभा सकेंगे। इससे दीर्घ काल में कृषि फाइनेंसिंग को मजबूत करने में मदद मिलेगी तथा भारतीय कृषि क्षेत्र का विश्व स्तर पर प्रभुत्व भी बनेगा।</span></p>
<p><strong><em>(लेखक नेटाफिम एग्रीकल्चरल फाइनेंसिंग एजेंसी प्रा. लि. के सीईओ हैं)</em></strong></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ कृषि में इनोवेशन के लिए कर्ज की जरूरत पूरी करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं कृषि केंद्रित एनबीएफसी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[डेयरी और खाद्य महंगाई के चक्र में किसान बनाम उपभोक्ता]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/dairy-and-food-inflation-farmer-versus-the-consumer.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 25 Feb 2023 19:08:58 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/dairy-and-food-inflation-farmer-versus-the-consumer.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>महंगाई की चर्चा इन दिनों हर जगह है। इस पर नियंत्रण रखने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने हाल के महीनों में रेपो रेट 6 बार बढ़ाया है। गृहिणियां पशोपेश में हैं। उन्हें आलू तो 7 रुपए किलो मिल रहा है, टमाटर 20 रुपए किलो लेकिन एक किलो घी के लिए उन्हें 675 रुपए देने पड़ रहे हैं। दूध और इसके अन्य उत्पादों के दाम कितने बढ़ेंगे इसे लेकर भी अनिश्चितता है। उत्तर भारत में मदर डेयरी और अमूल ने बीते 10 महीने में अलग-अलग वैरायटी के दूध के दाम 8 रुपए प्रति किलो बढ़ाए हैं।</p>
<p>दूध और दुग्ध उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी पूरे देश में हुई है। सिर्फ डेयरी कोऑपरेटिव नहीं बल्कि निजी क्षेत्र की डेयरी ने भी दाम बढ़ाए हैं। दक्षिण भारत के प्रमुख डेयरी ब्रांड तिरुमाला, जर्सी, वल्लभ और हेरिटेज ने हाल ही कीमतों में 2 से 4 रुपए लीटर तक की बढ़ोतरी की है। कीमतों में नई बढ़ोतरी के बाद प्निजी ब्रांड के फुल क्रीम दूध की कीमत 72 रुपए, स्टैंडर्ड दूध की 64 रुपए और टोंड किस्म की 52 रुपए प्रति लीटर हो गई है। हालांकि तमिलनाडु की कोऑपरेटिव आविन इन्हीं किस्मो के दूध क्रमशः 12 रुपए, 21 रुपए और 12 रुपए दाम पर बेच रही है। जैसा कि सीएनबीसी टीवी 18 के साथ इंटरव्यू में जीसीएमएमएफ (अमूल) के पूर्व एमडी आर एस सोढ़ी ने कहा, इस वर्ष दिवाली तक कीमतों में गिरावट की कोई उम्मीद ना करें। अतीत में दूध को महंगाई कम करने वाला माना जाता था लेकिन अब यह स्वयं महंगाई बढ़ाने वाला हो गया है। आश्चर्यजनक बात यह है कि ज्यादातर कृषि उपज की कीमतें नीचे जा रही है जबकि दूध के दामों में बढ़ोतरी हो रही है।</p>
<p>खाद्य महंगाई में उतार-चढ़ाव को देखना भी रोचक है। दिसंबर 2022 महंगाई 4.19% यानी जनवरी 2022 से सबसे निचले स्तर पर थी। सब्जियों, खाद्य तेल, मीट और इसके उत्पाद तथा दालों के दाम में तेज गिरावट इसकी वजह थी। महंगाई बढ़ाने वाले कारकों में अनाज, अंडे और दूध शामिल हैं। महंगाई बढ़ाने में अनाज का योगदान 7%, दूध का 8.23% और अंडे का 6.91% रहा। जनवरी और फरवरी 2023 में दूध के दामों में और बढ़ोतरी ने स्थिति को विकट बना दिया है।</p>
<p>विश्व स्तर पर देखें तो 2022 में खाद्य पदार्थों के दाम रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गए। संयुक्त राष्ट्र की खाद्य एजेंसी एफएओ के अनुसार एक साल पहले की तुलना में कीमतों में 14% से ज्यादा की वृद्धि हुई। खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के मुताबिक दिसंबर में खाद्य पदार्थों की कीमतों का इंडेक्स 132.4 और नवंबर में 135 पर था। पूरे 2022 के लिए बेंचमार्क इंडेक्स का औसत 143.7 रहा। यह 2021 के मुकाबले 18 अंक अथवा 14.3% ज्यादा है। यह 1990 के बाद सबसे अधिक है। दिसंबर में इंडेक्स में गिरावट की मुख्य वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में वनस्पति तेल के साथ कुछ अनाज और मीट के दाम में गिरावट रही। हालांकि एफएओ के मुताबिक इस गिरावट के असर को चीनी और डेयरी के दामों में बढ़ोतरी ने काफी हद तक बेअसर कर दिया।</p>
<p>पिछले साल फरवरी में यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद काला सागर में व्यापार बाधित होने की आशंका में खाद्य पदार्थों के दाम बढ़े थे। हालांकि बाद में संयुक्त राष्ट्र की पहल से काला सागर के रास्ते यूक्रेन से काफी मात्रा में अनाज का निर्यात हुआ। एफएओ ने कहा था कि 2022 में खाद्य आयात की लागत सबसे गरीब देशों को प्रभावित करेगी और वह कम मात्रा में आयात करेंगे। एफएओ के फूड प्राइस इंडेक्स में मांस, डेयरी, अनाज, वनस्पति तेल और चीनी की कीमतों के इंडेक्स शामिल होते हैं। इनका वेटेज 2014 से 2016 के दौरान औसत निर्यात पर निर्भर है।</p>
<p><strong>दूध की खरीद और इसके बाजार का ट्रेंड&nbsp;</strong></p>
<p>दूध के दामों में बढ़ोतरी की एक प्रमुख वजह इसकी खरीद और इसके बाजार में असमानता है। जुलाई 2022 से नवंबर 2022 में पशुपालन और डेयरी विभाग ने अपनी समीक्षा में इसकी बात कही थी। सितंबर 2021 की तुलना में सितंबर 2022 में दूध की खरीद 3.27% घट गई जबकि बिक्री 10% बढ़ी है। स्किम्ड मिल्क पाउडर (एसएमपी), व्हाइट बटर और घी के स्टॉक क्रमशः 55%, 76% और 87% कम हो गए। ज्यादातर डेयरी कॉपरेटिव ने दूध खरीद में 10% तक गिरावट की सूचना दी। दूसरी तरफ उन्होंने यह भी बताया कि दूध और इसके उत्पादों की मांग बढ़ रही है। उदाहरण के लिए कर्नाटक मिल्क फेडरेशन ने कहा कि उनके घी की बिक्री 2021-22 में प्रतिमाह 2000 टन थी जो घटकर 1700 टन रह गई। इसी तरह बटर का उत्पादन पिछले साल की तुलना में 150 टन प्रति माह कम हो गया। क्षीर भाग्य स्कीम के तहत फेडरेशन को सरकारी स्कूलों में दूध पाउडर की सप्लाई कम करनी पड़ी।</p>
<p>दूध और इसके उत्पादों की कीमतों में लगातार तेज बढ़ोतरी का असर देखने के लिए एक सर्वे किया गया। सर्वे में पता चला कि प्रत्येक 10 में से 6 परिवार अधिक कीमत देखकर अपने पुराने ब्रांड से उतना ही दूध खरीद रहे हैं जितना पहले खरीद रहे थे। लेकिन 19% लोगों ने कहा कि उन्होंने दूध खरीदने की मात्रा कम कर दी है। 16% ने कहा कि वे उसी ब्रांड के सस्ते विकल्प खरीद रहे हैं। 3% ने यह भी कहा कि वे सस्ते ब्रांड या स्थानीय सप्लाई का सहारा ले रहे हैं और 3% ने तो दूध खरीदना ही बंद कर दिया।</p>
<p><strong>लंपी स्किन रोग ने दूध की उत्पादकता घटाई&nbsp;</strong></p>
<p>ज्यादातर राज्यों में दूध खरीद में गिरावट के लिए लंपी स्किन रोग (एलएसडी), मुंह पका खुर पका रोग, बाढ़ और खराब क्वालिटी का चारा, महंगा चारा तथा महंगी बिजली को कारण बताया गया। गर्मियों में हरा चारा कम मिलता है इसलिए दूध उत्पादन में और गिरावट की आशंका है। सप्लाई में कमी ने दूध और इसके उत्पादों के दाम बढ़ा दिए हैं।</p>
<p>सबसे नया कारण लंपी स्किन रोग है। लोकसभा में सरकार की तरफ से दी गई जानकारी के अनुसार 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 29.4 लाख मवेशी इससे प्रभावित हुए। इनमें से 1.5 लाख की मौत हो गई। मौत वाले राज्यों में राजस्थान सबसे ऊपर है जहां 75000 मवेशियों की इस रोग से जान गई। उसके बाद महाराष्ट्र में 24430, पंजाब में 17932, कर्नाटक में 12244 और हिमाचल प्रदेश में 10661 की जान गई। कुछ मवेशी गुजरात में भी मारे गए। मवेशियों को गोट पॉक्स वैक्सीन लगाकर इस बीमारी को फैलने से रोकने वाला गुजरात पहला राज्य था। बाद में यह वैक्सीन अन्य जगहों पर भी उपलब्ध कराई गई और 6 करोड़ से अधिक मवेशियों को वैक्सीन लगाई गई। इससे हर्ड इम्यूनिटी बनाने और बीमारी को फैलने से रोकने में मदद मिली। लेकिन इस बीमारी ने दूध के उत्पादन पर बड़ा असर डाला है। जिन गायों को यह बीमारी हुई व अब पहले की तुलना में आधा दूध दे रही हैं। बीमारी खत्म होने के बाद भी गायें पहले जितना दूध नहीं दे रही हैं। इस बात का अध्ययन किया जाना चाहिए कि अगली बार बच्चा देने के बाद एलएसडी से प्रभावित गाय पहले जितना दूध दे सकेंगी अथवा नहीं।</p>
<p><strong>फीड और चारे के दाम में बढ़ोतरी</strong></p>
<p>आसान शब्दों में कहा जाए तो दूध उत्पादन की आधी लागत पशुओं के फीड, सूखे और हरे चारे तथा फीड इनग्रेडिएंट से तय होता है। राष्ट्रीय दुग्ध विकास बोर्ड के चेयरमैन के अनुसार बीते 1 साल में चारे और फीड के दाम 25% बढ़ गए हैं। तमिलनाडु डेयरी फेडरेशन के मुताबिक चारा 2019 की तुलना में 50% महंगा हो चुका है। उडुपी जिला सहकार भारती के डेयरी किसानों ने 19 जनवरी 2023 को उडुपी के डिप्टी कमिश्नर कार्यालय के सामने धरना दिया। उनकी मांग थी कि पशुओं के फीड पर ₹5 प्रति किलो की सब्सिडी दी जाए।</p>
<p>केंद्रीय फिशरीज, पशुपालन और डेयरी राज्यमंत्री संजीव कुमार बालियान ने संसद में एक सवाल के जवाब में बहुत अच्छा विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि डेयरी कोऑपरेटिव यह सुनिश्चित करती हैं कि उपभोक्ता द्वारा दिया गया 75% पैसा दुग्ध किसानों को मिले। किसानों और उपभोक्ताओं के बीच संतुलन की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि किसानों को डेयरी फार्मिंग अपनाने के लिए दूध की अधिक कीमत मिलनी चाहिए। हाल के समय में फीड और चारे के दाम बढ़ने से दूध भी महंगा हुआ है। अगर चारा सस्ता हो तो दूध के दाम अपने आप कम हो जाएंगे।</p>
<p>दूध और इसके उत्पादों की प्रोसेसिंग का खर्च भी बढ़ा है। डेयरी सेक्टर की कंपनियां इसे भी दाम बढ़ाने का प्रमुख कारण बताती हैं। ऑपरेशन और लॉजिस्टिक्स दोनों के लिए ऊर्जा की कीमतें बढ़ी हैं, पैकेजिंग महंगा हुआ है और श्रमिकों की लागत जैसे मदों में खर्चे भी बढ़े हैं।</p>
<p><strong>दुग्ध उत्पादों का निर्यात&nbsp;</strong></p>
<p>बीते 6 महीने के दौरान दूध और दुग्ध उत्पादों का आयात और निर्यात कम हुआ है। यूक्रेन और रूस के बीच युद्ध से दूध, चीज, बटर, मिल्क पाउडर, अंडे, बीफ के साथ गेहूं और फलोत्पादन का यूरोप को निर्यात प्रभावित हुआ है। इससे पहले भारत से डेयरी प्रोडक्ट का निर्यात 2021 के 2400 करोड़ की तुलना में 2022 में लगभग 2 गुना होकर 4700 करोड़ रुपए पहुंच गया है। 2015 के 1200 करोड़ से तुलना करें तो यह वृद्धि लगभग 4 गुना है।</p>
<p>आंकड़े बताते हैं कि निर्यात बढ़ाने में स्किम्ड मिल्क पाउडर का बड़ा योगदान रहा है। अनेक डेयरी कंपनियां ताजा दूध और विभिन्न तरह के डेयरी प्रोडक्ट के निर्यात की संभावनाएं तलाश रही हैं। ताजे दूध का निर्यात अभी कम है क्योंकि आयातक बेहतर क्वालिटी और हाइजीन की मांग करते हैं। अमूल ने निर्यात बढ़ाने पर पहले ही विचार करना शुरू कर दिया है। हाल के महीनों में कर्नाटक की हासन मिल्क यूनियन ने ट्रायल के तौर पर मालदीव को 1.5 लाख लीटर टेट्रा पैक दूध भेजा है। यूनियन को पश्चिमी एशियाई देशों को 2 लाख लीटर दूध और 20 टन बटर निर्यात करने की उम्मीद है। अरब देशों के प्रतिनिधिमंडल ने अपनी संतुष्टि के लिए हासन यूनियन की फैसिलिटी की जांच भी की। वे देखना चाहते थे कि जो दूध पैक किया जा रहा है उसकी क्वालिटी कैसी है। कर्नाटक मिल्क फेडरेशन को दूध निर्यात से सालाना 500 करोड़ रुपए का रेवेन्यू मिलने की उम्मीद है। दूध उत्पादन बढ़ने का वैश्विक औसत 2% सालाना है जबकि भारत में हर साल 6% उत्पादन बढ़ रहा है।</p>
<p>देश में मांग और आपूर्ति का मौजूदा अंतर खत्म होने पर डेयरी प्रोडक्ट का निर्यात फिर बढ़ने की उम्मीद है। सरकार की नई पहल से इसे और बल मिलेगा। केंद्रीय सहकारिता मंत्री अमित शाह ने कहा है कि सरकार ने अगले 3 वर्षों में हर पंचायत में 1 प्राथमिक डेयरी खोलने का निर्णय लिया है। इसके लिए मंत्रालय ने 3 साल का एक्शन प्लान भी बनाया है। उन्होंने कहा, "हम 3 वर्षों के दौरान पूरे देश में ग्राम स्तर पर 2 लाख प्राथमिक डेयरी की स्थापना करेंगे। इसके माध्यम से हम देश भर के किसानों को जोड़ेंगे और इस तरह भारत दुग्ध क्षेत्र में एक बड़ा निर्यातक बन कर उभरेगा।" शाह ने बताया कि वित्त वर्ष 2023-24 के केंद्रीय बजट में 2 लाख से ज्यादा बहुद्देशीय प्राइमरी एग्रीकल्चर क्रेडिट सोसायटी (पैक्स) के रजिस्ट्रेशन के लिए पर्याप्त फंड आवंटित किया गया है। उन्होंने कहा कि पैक्स के गठन का उद्देश्य यह है कि कोई भी पंचायत डेयरी अथवा फिशरीज कोऑपरेटिव सोसाइटी से वंचित ना हो। कोऑपरेटिव पर पहले 26% की दर से इनकम टैक्स लगता था जिसे घटाकर 15% कर दिया गया है।&nbsp;</p>
<p><strong>अधिकारों का ढांचा</strong></p>
<p>कृषि उत्पादों के दाम नियंत्रण अथवा नियमन करने वाली संस्था के अधिकारों से भी तय होते हैं। उपभोक्ता सस्ती सब्जियां खरीद कर खुश है जबकि किसान कम दाम में बेच कर परेशान है। सब्जियों के मौजूदा बाजार भाव पर गौर कीजिए। उपभोक्ता 1 किलो आलू 7 रुपये, गोभी 10 रुपये, टमाटर और मटर 20 रुपये में खरीद रहा है। अब दूसरी तरफ किसान पर भी नजर डालिए। वह अपने घर से ट्रैक्टर ट्रॉली, बैलगाड़ी अथवा ट्रक पर सब्जियां लादकर 20-30 किलोमीटर दूर मंडी में आता है। उसके सामान की नीलामी होती है जहां खरीदार भी गिने-चुने रहते हैं। उसे जो भी भाव मिले उसे स्वीकार करने को बाध्य होता है। वह घर से जितनी सब्जियां तौल कर लाता है मंडी में वजन उससे कम निकलता है। उसे वजन कराने, सब्जियां उतारने के पैसे के साथ मंडी टैक्स भी चुकाना पड़ता है। आखिरकार सिर्फ उत्पादन लागत लेकर वह घर लौटता है। मुनाफा और मजदूरी का खर्च उसे नसीब ही नहीं होता।</p>
<p>अब इसकी तुलना उस किसान से कीजिए जो प्रतिदिन कुछ लीटर दूध पैदा करता है। उसके गांव में कोऑपरेटिव है। वह अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ कतार में खड़ा है। अपनी बारी आने से पहले वह उनके साथ खेती किसानी के बारे में बात करता है। नंबर आने पर वह अपने बर्तन का ढक्कन खोलता है, क्वालिटी और दाम तय करने के लिए सैंपल देता है और कंप्यूटर नियंत्रित भार तोलने वाली मशीन पर एक बर्तन में दूध उड़ेल देता है। पूरी प्रक्रिया उसकी आंखों के सामने होती है। सैंपल देते समय जिस भाव पर उसने सहमति जताई होती है उस भाव पर उसे पैसे मिल जाते हैं। किसान यह भी खुद तय कर सकता है कि उसे नकद पैसा तत्काल चाहिए अथवा कुछ दिनों के बाद। वह यह भी तय कर सकता है कि वह उसे पूरी रकम चाहिए अथवा अपनी गाय अथवा भैंस के लिए उसमें से कुछ फीड भी खरीदना है।</p>
<p>जाहिर है कि शक्ति का यह ढांचा किसानों की किस्मत तय करता है। सब्जी उगाने वाले किसान को यह नहीं मालूम होता कि उसे कौन सा भाव मिलेगा। वह जो कुछ उगाता है उसकी कीमत कोई और तय करता है। वह दिग्भ्रमित, असंतुष्ट, नाराज और यहां तक कि कई बार निराश होकर घर लौटता है। उसकी नाखुशी और निराशा साझा करने वाला कोई नहीं होता। लेकिन वही किसान जब दूध, अंडे या संतरे बेचकर घर लौटता है तो उसके चेहरे पर खुशी होती है। वह जानता है कि उसके पास कुछ अधिकार है। उसके मिल्क कोऑपरेटिव के अधिकार, उसे अंडा समन्वय समिति का समर्थन है, अथवा एसोसिएशन उसके साथ है। वह जानता है कि इन कोऑपरेटिव अथवा यूनियन के कारण उसे उपभोक्ता की चुकाई गई कीमत का उचित हिस्सा मिलेगा। उसे संभवतः यह भी मालूम होता है कि उसका कोऑपरेटिव अथवा संगठन उपभोक्ताओं से इतनी अधिक कीमत नहीं लेगा कि भविष्य चौपट हो जाए।</p>
<p>सभी कृषि उत्पादों के किसान कोऑपरेटिव किसानों को उत्पादकता, उपभोक्ताओं को संतुष्टि तथा राष्ट्रीय संपन्नता में दीर्घकालिक समाधान दे सकते हैं। इसलिए आइए हम हाथ मिलाएं।</p>
<p><strong><em>(लेखक अंतरराष्ट्रीय डेयरी कंसलटेंट हैं)</em></strong></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ डेयरी और खाद्य महंगाई के चक्र में किसान बनाम उपभोक्ता ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[मोटे अनाज का मोटा फायदा तभी जब उचित मूल्य और सुनिश्चित खरीद की होगी व्यवस्था]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/big-benefits-of-millets-will-be-available-only-when-proper-price-and-assured-purchase-will-be-arranged.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 20 Feb 2023 11:01:37 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/big-benefits-of-millets-will-be-available-only-when-proper-price-and-assured-purchase-will-be-arranged.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अंतरराष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष 2023 की घोषणा के बाद से भारत सरकार ने देश में मोटा अनाज के उत्पादन और खपत को बढ़ावा देने के लिए अभियान शुरू किया है। इसके स्वास्थ्य और पोषण संबंधी फायदों के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए प्रत्येक मंत्रालय, मिशन और दूतावासों के तहत एक विस्तृत कार्य योजना तैयार की गई है। इन कार्यक्रमों में उच्च स्तर पर सार्वजनिक और राजनीतिक प्रतिनिधियों को शामिल करते हुए मोटे अनाजों पर देशव्यापी प्रचार शामिल है। भारत सरकार का उद्देश्य विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से समाज के सबसे निचले तबके तक पहुंचना है जो देश के कोने-कोने में मोटे अनाजों का प्रमुख उत्पादक है।</p>
<p>देश में 1.7 करोड़ टन मोटे अनाज का उत्पादन करीब 13 लाख हेक्टेयर में लाखों छोटे और सीमांत किसानों द्वारा किया जा रहा है। ज्वार, रागी, जौ, कागनी और कुटकी के साथ बाजरे का मोटे अनाजों में लगभग 60 फीसदी योगदान है। सामान्यतः मोटे अनाजों का उत्पादन संसाधन रहित छोटे और सीमांत किसान करते हैं। अन्य प्रचलित अनाजों जैसे गेहूं और धान की तुलना में मोटे अनाज को अधिक पोषक माना जाता है क्योंकि ये खनिज, जिंक, आयरन और कैल्शियम, विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होते हैं। वास्तव में मोटा अनाज पोषण और सूक्ष्म पोषक तत्वों का खजाना है। कुपोषण से लड़ने के लिए हमें इसे नियमित आहार का हिस्सा बनाना होगा ताकि ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में कुपोषण और मधुमेह जैसी स्वास्थ्य समस्याओं से निपटा जा सके।</p>
<p>मोटे अनाजों के उत्पादन में बढ़ोतरी तभी संभव है जब इनकी बाजार में मांग बढ़े और किसानों को इसे उगाने कि लिए प्रेरित किया जाए। जब तक मोटा अनाज आधारित आहार की बाजार में मांग नहीं बढ़ती तब तक केंद्र सरकार को इसके उत्पादन के लिए प्रोत्साहित करने के तहत न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) सुनिश्चित करने और उत्पादकों से उनकी उपज को एमएसपी पर खरीदने की व्यवस्था करनी पड़ेगी।</p>
<p><strong>मोटे अनाजों पर एमएसपी वैधता और सरकारी खरीद</strong></p>
<p>भारत मोटे अनाज उत्पादन का वैश्विक केंद्र है। देश के विभिन्न राज्यों में 1.7 करोड़ टन मोटे अनाज का उत्पादन होता है जो एशिया के कुल उत्पादन का 80 फीसदी और दुनिया के कुल उत्पादन का 20 फीसदी है। मोटे अनाज का वैश्विक उत्पादन 8.6 करोड़ टन सालाना है। भारत अंतरराष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष 2023 मना रहा है। यही सही समय है कि भारत सरकार मोटे अनाजों के प्रमुख अनाज बाजरा, ज्वार और रागी का एमएसपी वैध घोषित करे और 2023 में इन प्रमुख मोटे अनाजों के कुल उत्पादन का एक तिहाई सरकारी खरीद कर छोटे और मझोले किसानों को इसके उत्पादन के लिए प्रोत्साहित करे। यह कदम न केवल व्यावहारिक बल्कि जायज भी है क्योंकि मोटे अनाजों का बाजार मूल्य हमेशा घोषित एमएसपी से काफी कम रहा है। छोटे किसान बाजार व्यवस्था से काफी परेशान हैं और गरीबी से जूझ रहे हैं। 2,250 रुपये प्रति क्विंटल की मौजूदा एमएसपी दर पर केंद्र सरकार द्वारा 50 लाख टन या कुल उत्पादन का लगभग एक तिहाई हिस्सा खरीदने पर 11,250 करोड़ रुपये खर्चा आएगा। यह फैसला एक बड़ा नीतिगत फैसला होगा जो देश की राजनीति में किसानों की अहम् भूमिका को निर्णायक दिशा देगा।</p>
<p>भारत सरकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस), मिड-डे मील, आंगनबाड़ी, मनरेगा योजनाओं के तहत खरीदे गए मोटे अनाज का निस्तारण और संगठित कर सकती है। इसके अलावा जरूरत पड़ने पर खरीदे गए बाजरे का उपयोग पशु आहार के रूप में भी कर सकती है। इस तरह, सरकार मोटे अनाज खरीद की लागत को वहन कर सकती है। यह एक तीर से दो शिकार यानी कुपोषण और गरीबी को दूर करने की पहल साबित हो सकती है।</p>
<p><strong>मोटा अनाज</strong> <strong>आधारित खाद्य </strong><strong>उत्पादों</strong> <strong>की मांग बढ़ाना </strong></p>
<p>राष्ट्रीय मिलेट वर्ष 2018 से सरकार मोटे अनाजों के स्वास्थ्य लाभों के बारे में उपभोक्ताओं को जानकारी दे रही है। नए-नए उत्पाद बनाने के लिए उद्यमियों को प्रोत्साहित कर रही और प्रचार-प्रसार कर मोटे अनाज की खपत को बढ़ाने के भरसक प्रयास कर रही है। दरअसल, संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा वर्ष 2023 को मोटे अनाजों का अंतरराष्ट्रीय वर्ष घोषित करने का निर्णय भी भारत द्वारा 2018 के राष्ट्रीय मिलेट वर्ष के सफल संचालन को दिया जा सकता है। इस बीच, सरकार ने 2018 से राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के तहत "मोटा अनाज पर उप मिशन" को शामिल किया, कई राज्यों ने मोटे अनाजों पर मिशन शुरू किया और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा पोषण मिशन अभियान शुरू किया गया है।</p>
<p>यही नहीं, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के प्रयासों से तकरीबन 200 स्टार्टअप और 400 उद्यमी 1,220 करोड़ रुपये की लागत से विभिन्न इन्क्यूबेशन केंद्र में मोटा अनाज प्रसंस्करण और मोटा अनाज आधारित व्यवसाय के लिए प्रेरित हुए हैं। मोटे आनाज की 15 फसलों को न्यूट्री सीरियल्स की श्रेणी में रखने का निर्णय लिया गया है जिससे उपभोक्ताओं को मोटे अनाज की तरफ आकर्षित किया जा सके। किनुआ के बढ़ते चलन को देखते हुए आईसीएआर ने हिम शक्ति नामक किनुआ की एक किस्म जारी की है। साथ ही किनुआ को एक नई फसल के रूप में न्यूट्री सीरियल्स की श्रेणी में शामिल करने की सिफारिश की है। मोटे अनाज के बढ़ते प्रचलन को ध्यान में रखते हुए सरकार ने बाजरे की चार बायोफोर्टिफाइड किस्मों के साथ मोटे अनाजों की अधिक उपज देने वाली 13 किस्में जारी की हैं।</p>
<p>मोटे अनाजों पर आईसीएआर के भारतीय मिलेट अनुसंधान केंद्र ने 67 मूल्य वर्धित प्रौद्योगिकियां विकसित की हैं और मोटे अनाज आधारित व्यंजनों की एक किताब का विमोचन भी किया है। यह किताब रोजाना के भोजन को जायकेदार बनाने में मोटे अनाज की अहमियत को दर्शाती है। 2023 के बजट में केंद्र सरकार ने मोटे अनाज को 'श्री अन्न' का नाम देकर उपभोक्ताओं को भगवान के भोजन के प्रति आकर्षित किया है। मगर ये प्रयास तभी सफल होंगे जब मोटे अनाज का रकबा और उत्पादन बढ़ाने के लिए उचित मूल्य और सुनिश्चित खरीद की व्यवस्था की जाए।</p>
<p><strong><em>(लेखक </em><em>दक्षिण एशिया जैव प्रौद्योगिकी केंद्र और नाबार्ड कृषि निर्यात सुविधा केंद्र, जोधपुर</em> <em>के </em><em>संस्थापक निदेशक</em><em> हैं)</em></strong></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/11/image_750x500_636fd9e82567b.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ मोटे अनाज का मोटा फायदा तभी जब उचित मूल्य और सुनिश्चित खरीद की होगी व्यवस्था ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[ग्रामीण क्षेत्र के लिए कितना हितकारी है 2023&amp;#45;24 का बजट?]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/how-much-rural-friendly-is-budget-2023.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 19 Feb 2023 13:23:49 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/how-much-rural-friendly-is-budget-2023.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">पिछले साल 2022-23 के लिए जब बजट पेश किया गया तो मैंने उसे जातिगत भेदभाव वाला बताया था। अगले वित्त वर्ष के लिए जो बजट पेश किया गया है, उसके प्रस्तावों पर गौर करें तो इसमें भी जातिगत भेदभाव झलकता है। तमाम मीडिया में नई स्कीम की घोषणाओं और पूंजी निर्माण के लिए अधिक आवंटन को &lsquo;अमृत काल&rsquo; जैसे लुभावन शब्दों के रूप में पेश किया गया। लेकिन निवेश की पूंजी के प्रबंधन पर बहुत कम लोगों ने टिप्पणी की है। इस लेख में बजट प्रस्तावों पर ग्रामीण नजरिए से चर्चा की गई है और ऐसे प्रस्तावों की बात कही गई है जिनसे लोगों को गरीबी, बेरोजगारी और असमानता के भंवरजाल से निकाला जा सके।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">आगे बढ़ने से पहले कुछ तथ्यों पर गौर करते हैं। ग्लोबल मल्टीडाइमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स यानी वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक (GMPI) बताता है कि भारत के 6 में से 5 व्यक्ति बहुआयामी गरीबी में जीवन बिता रहे हैं, अर्थात वे कई पैमाने पर गरीब हैं। आदिवासी समुदाय में गरीबी का स्तर सबसे अधिक, 50.6% है। उसके बाद अनुसूचित जाति में यह 33.3% और अन्य पिछड़ा वर्ग में 27.2% है। इन तीनों वर्गों के अलावा बाकी लोगों में गरीबी का स्तर सिर्फ 15.6% है। अखिल भारतीय ऋण एवं निवेश सर्वेक्षण (</span><i><span style="font-weight: 400;">AIDIS</span></i><span style="font-weight: 400;">) बताता है कि अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग की परिसंपत्तियां अन्य वर्गों की तुलना में कम हैं। ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत 121 देशों में पिछले साल के 101वें स्थान से फिसलकर 107वें स्थान पर पहुंच गया। ये आंकड़े बताते हैं कि बजट प्रस्तावों के केंद्र में लोगों को रखा जाना चाहिए।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">सबसे पहले ग्रामीण विकास मंत्रालय (MoRD) के आवंटन की बात करते हैं। लेकिन उससे पहले यह समझते हैं कि इस मंत्रालय का मुख्य कार्य क्या है। ग्रामीण विकास मंत्रालय का मुख्य कार्य &ldquo;बहुआयामी मदद से वंचित ग्रामीण परिवारों का उत्थान, जिसमें परिसंपत्ति, आजीविका, इंफ्रास्ट्रक्चर और सर्विसेज सभी शामिल हों। परिवारों तथा समुदायों के लिए लचीलापन सुनिश्चित करना... गरीब कल्याण से जुड़ी संस्थाओं को ऊपर उठाना और पंचायती राज संस्थानों तथा परिवर्तन के अन्य वाहकों के साथ साझेदारी करना।&rdquo;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">यदि मंत्रालय के कार्य के आलोक में आवंटन को देखेंगे तो हताशा होगी, क्योंकि वर्ष 2022-23 के संशोधित अनुमानों की तुलना में वर्ष 2023-24 के लिए आवंटन में 13 प्रतिशत से अधिक की कटौती की गई है। इतना ही नहीं, कुल केंद्रीय बजट और जीडीपी के प्रतिशत के रूप में भी ग्रामीण विकास विभाग के बजट आवंटन/व्यय को घटा दिया गया है। कुल बजटीय व्यय का प्रतिशत जो 2022-23 के संशोधित अनुमान में 4.3% था, उसे 2023-24 के बजट अनुमान में घटाकर 3.5% कर दिया गया है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">जीडीपी के प्रतिशत के रूप में देखें तो 2022-23 के संशोधित अनुमान में आवंटन 0.66% था, जिसे 2023-24 में घटाकर 0.52% कर दिया गया है। स्पष्ट है कि ग्रामीण विकास के लिए वित्तीय सहायता कम कर दी गई है। मंत्रालय के कार्यक्षेत्र को देखकर कहा सकता है कि सरकार गांधी के नाम का उपयोग अनगिनत कार्यों के लिए करती है, लेकिन उनकी जो बातें नीति निर्माताओं के लिए मानदंड होनी चाहिए उनपर पालन नहीं होता। उन्होंने कहा था, "सबसे गरीब और सबसे कमजोर व्यक्ति का चेहरा याद करो जिसे तुमने देखा है, और अपने आप से पूछो कि तुम जो कदम उठा रहे हो वह उसके लिए किसी काम का होगा या नहीं।"</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">प्रधानमंत्री ने सात साल पहले 21 फरवरी, 2016 को 5142.08 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ श्यामा प्रसाद मुखर्जी रूर्बन मिशन (SPMRM) लांच किया था। इसके पीछे विजन था, "गांवों का एक समूह विकसित करना जो ग्रामीण सामुदायिक जीवन के सार को संरक्षित रखे तथा उसका विकास करे, जिसका फोकस अनिवार्य रूप से शहरी प्रकृति का हो। इस तरह अनिवार्य रूप से शहरी प्रकृति की सुविधाओं के साथ समझौता किए बिना समानता और समावेशिता का क्लस्टर तैयार करना। अर्थात रूर्बन गांवों का एक समूह बनाना।&rdquo;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">दूसरे शब्दों में, वह एक ऐसा शरीर होगा जिसमें आत्मा हो और आत्मा को ढंकने के लिए हाड़-मांस की संरचना हो। यहां गांवों की संस्कृति/सामुदायिक जीवन ही आत्मा है और बुनियादी ढांचे उसके हाड़-मांस हैं। इस पर अमल की बात करते हुए अपने संदेश में प्रधानमंत्री ने कहा था, &ldquo;ग्रामीण विकास का कोई भी प्रयास तब तक सफल नहीं होगा जब तक हमारी ग्राम पंचायतें इसकी योजना और कार्यान्वयन में शामिल नहीं होंगी। इसलिए मैं राज्य और जिला मशीनरी से रूर्बन क्लस्टर की पहचान में ग्राम पंचायतों को शामिल करने का अनुरोध करता हूं।&rdquo; अपने संदेश का समापन करते हुए उन्होंने कहा था, "इस मिशन के माध्यम से हम ग्रामीण क्षेत्रों को अपना गणतंत्र बनाने के लिए गांधीजी के ग्राम स्वराज के दृष्टिकोण को साकार करने का प्रयास करेंगे।&rdquo;&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">लेकिन जिस योजना की इतनी प्रशंसा की गई थी, वह अब ग्रामीण विकास मंत्रालय की योजनाओं का हिस्सा नहीं है। इसे मंत्रालय की योजनाओं की सूची से हटा दिया गया है। आखिर समग्र विकास कहां है? ग्राम पंचायतें कहां हैं जो इतनी महत्वपूर्ण थीं? गांधी का अन्योन्याश्रित पर विचार कहां गया? क्या ये महज 'जुमले' हैं?</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">2022-23 के संशोधित अनुमान की तुलना में 2023-24 के बजट अनुमान में मनरेगा के तहत आवंटन एक तिहाई कम कर दिया गया है। आवंटन में इतनी कटौती से ग्रामीण इलाकों के श्रमिकों की आय में कमी आएगी, जिन्हें इस योजना के तहत काम मिलने की उम्मीद थी। इससे श्रमिकों की क्रय क्षमता कम होगी और परिणामस्वरूप गैर-कृषि उत्पादों की मांग कम हो जाएगी। इसके अलावा, कार्यक्रम के तहत कम आवंटन से महिलाएं आर्थिक रूप से कैसे सशक्त होंगी?</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अब हम पंचायती राज मंत्रालय (MoPR) के विभिन्न मदों/योजनाओं के तहत आवंटन पर गौर करते हैं। इस मंत्रालय का गठन मई 2004 में किया गया था। इसका उद्देश्य संविधान के भाग IX के प्रावधानों, अनुच्छेद 243ZD और PESA के अनुसार जिला योजना समितियों (DPC) से संबंधित प्रावधानों का अनुपालन सुनिश्चित करना है। मंत्रालय का विजन पंचायतों या पंचायती राज संस्थानों के माध्यम से विकेन्द्रीकृत और सहभागी स्थानीय स्वशासन को हासिल करना है। इसका मिशन संविधान का सशक्तीकरण, लोगों को सक्षम बनाना और जवाबदेही सुनिश्चित करना है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अब इसी आलोक में 2023-24 के बजट प्रावधानों पर नजर डालते हैं। पंचायतों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने स्तर पर आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए योजनाएं तैयार करें और उन्हें लागू करें। संविधान में भी इसकी परिकल्पना की गई है। अन्य कार्यों के अलावा इन समितियों को स्थानिक योजना पर भी ध्यान देना है। 30 लाख से अधिक निर्वाचित प्रतिनिधि सामाजिक न्याय के साथ आर्थिक विकास की योजनाएं तैयार करें, इसके लिए पंचायतों के विभिन्न स्तरों पर समुचित प्लानिंग आवश्यक है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इन बातों को ध्यान में रखते हुए, यह अपेक्षा थी कि पंचायतों के नियोजित विकास के लिए ग्रामीण क्षेत्र विकास योजना निर्माण और कार्यान्वयन (Rural Areas Development Plan Formulation and Implementation) के दिशानिर्देशों को क्रियान्वित किया जाएगा। बजट में इसके लिए धन आवंटित होना चाहिए था। क्योंकि योजनाएं बनाने और उनके क्रियान्वयन के पंचायतों के बुनियादी कार्य पर अभी तक पूरी तरह से अमल नहीं किया गया है। इस प्रकार बजट में स्वशासी संस्था के रूप में पंचायतों की उपेक्षा की गई है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">जैविक खेती और प्राकृतिक खेती पर बहुत बात हो रही है। आइए इस पर भी नजर डालें। परम्परागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई) नाम की एक योजना थी। उसके लिए न तो 2022-23 में कोई बजट आवंटन किया गया था और न ही 2023-24 में। हालांकि, प्राकृतिक खेती पर राष्ट्रीय मिशन (National Mission on Natural Farming) नाम से एक नई योजना 2023-24 के बजट में घोषित की गई है, जिसके लिए 459 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। पीकेवीवाई जैसी अन्य योजनाओं का हश्र देखकर यह कहना मुश्किल है कि यह अगले बजट में भी होगा या किसी और नाम से नई योजना आ जाएगी।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कुल केंद्रीय बजट व्यय और सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के अनुपात में कृषि और संबद्ध क्षेत्रों के लिए केंद्र सरकार का बजट परिव्यय कम कर दिया गया है। कुल बजट की तुलना में इन क्षेत्रों के लिए आवंटन 2022-23 के संशोधित अनुमान में 2.95% था, जिसे 2023-24 में घटाकर 2.92% कर दिया गया है। इसी तरह, जीडीपी की तुलना में यह 2022-23 के संशोधित अनुमान में 0.45% था, जिसे 2023-24 में घटाकर 0.44% कर दिया गया है। यदि हम ग्रामीण विकास और कृषि के लिए आवंटन को मिला दें, तो हम पाएंगे कि किसान, महिला और श्रमिक हित वाले इन क्षेत्रों को हाशिये पर रखा गया है। इसका न केवल इन क्षेत्रों पर, बल्कि गैर-कृषि क्षेत्र पर भी उनके उत्पादों की मांग के माध्यम से प्रभाव पड़ेगा।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">जीडीपी की तुलना में 2023-24 में कर और गैर-कर राजस्व का अनुपात कमोबेश वही है जो वर्ष 2022-23 में था। हालाकि, 2023-24 में राजकोषीय घाटा 2022-23 के 6.4% से घटाकर 5.9% कर दिया गया है। इस तथ्य पर केरल के पूर्व वित्त मंत्री डॉ. टी. एम. थॉमस इसाक का कहना है कि इस राजकोषीय लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कृषि, ग्रामीण विकास और गरीबी उन्मूलन पर खर्च में कटौती के अलावा कोई विकल्प नहीं था। क्या गरीबों की कीमत पर राजकोषीय स्थिरता प्राप्त करना ग्रामीण क्षेत्र के लिए उचित है? यह निर्णय लेना और टिप्पणी करना मैं पाठकों पर छोड़ता हूं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;"><em><strong>(लेखक इंडियन इकोनॉमिक सर्विस के पूर्व अधिकारी और कृपा फाउंडेशन के अध्यक्ष हैं। लेख में व्यक्त विचार उनके निजी विचार हैं)&nbsp;</strong></em></span></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/02/image_750x500_63f0752e16e39.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ ग्रामीण क्षेत्र के लिए कितना हितकारी है 2023-24 का बजट? ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[बजट में अर्थव्यवस्था को समावेशी विकास की राह पर लाने का अवसर चूक गईं वित्त मंत्री सीतारमण]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/sitharaman-missed-opportunity-of-putting-economy-on-inclusive-growth-path-in-budget.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 14 Feb 2023 08:34:12 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/sitharaman-missed-opportunity-of-putting-economy-on-inclusive-growth-path-in-budget.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अभी तक जो पांच बजट पेश किए हैं उनमें एक बात काफी मिलती-जुलती है, और वह है बजट में लगातार पूंजीगत खर्च का ऊंचा स्तर। 2019-20 के बजट में केंद्र सरकार का पूंजीगत व्यय और पूंजीगत संपत्ति निर्माण के लिए ग्रांट-इन-एड 5.5 लाख करोड़ रुपए से भी कम था। वित्त वर्ष 2023-24 के बजट में वित्त मंत्री ने इस मद में 13.7 लाख करोड़ रुपए आवंटित किए हैं। वास्तविक अर्थों में देखा जाए तो 5 वर्षों में पूंजीगत खर्च के लिए आवंटन उन्होंने दोगुना कर दिया है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">2019-20 से लेकर मौजूदा वित्त वर्ष तक हर साल केंद्रीय बजट में पूंजीगत व्यय कम से कम 26% बढ़ा है। इसमें 2020-21 का महामारी वाला साल भी शामिल है। वित्त मंत्री ने 2023-24 में और अधिक वृद्धि की है। इस वर्ष पूंजीगत व्यय के लिए आवंटन 2022-23 के संशोधित अनुमानों से 30% अधिक है। जीडीपी की तुलना में देखें तो यह 3.8% के मुकाबले 2023-24 में 4.5% हो गया है। इस सरकार के कार्यकाल में एक रोचक बात यह है कि राजस्व व्यय सालाना औसतन सिर्फ 4.4% की दर से बढ़ा है। अगले वित्त वर्ष के लिए राजस्व व्यय में सिर्फ 1.2% की वृद्धि की गई है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में पूंजीगत व्यय का हिस्सा बढ़ाने की वजह बताई है। हाल की बजट घोषणा में उन्होंने कहा, &ldquo;इंफ्रास्ट्रक्चर और उत्पादन क्षमता में निवेश का विकास और रोजगार पर कई गुना असर होता है। निवेश और रोजगार सृजन बढ़ाने के लिए बजट में एक बार फिर प्रयास किए गए हैं।&rdquo; वित्त मंत्री सीतारमण के अनुसार सार्वजनिक निवेश में यह वृद्धि विकास और रोजगार सृजन की संभावनाओं को बढ़ाने, निजी निवेश आकर्षित करने तथा वैश्विक उतार-चढ़ाव से घरेलू अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखने के लिए है, और यह सरकार के प्रयासों के केंद्र में है। 2019-20 से पूंजीगत व्यय लगातार ऊंचे स्तर पर बना हुआ है और यहां तक कि महामारी के दौरान भी इसका स्तर ऊंचा था। इसे उचित ठहराते हुए वित्त मंत्री ने 2021 के अपने बजट भाषण में कहा था, हमारा प्रयास यह रहा कि संसाधनों की कमी के बावजूद हम पूंजीगत खर्च अधिक करेंगे।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">वित्त मंत्री के तर्क का अभिप्राय यह है कि सार्वजनिक निवेश अधिक होगा तो वह निजी निवेश को भी आकर्षित करेगा। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो अगर सरकार निवेश बढ़ाएगी तो कंपनियां भी अपना निवेश बढ़ाएंगी। हालांकि इस तर्क को सार्वभौमिक रूप से स्वीकार नहीं किया जा सकता है। बाजार हितैषी लोगों का तर्क होगा कि अगर सरकार राजकोषीय घाटे का स्तर अवांछनीय रूप से ऊंचा रखते हुए पूंजीगत खर्च बढ़ाती है तो निजी निवेश वास्तव में कम हो सकता है। जब सरकार बाजार से पैसे उठाएगी तो दरअसल वह उन सब के साथ प्रतिस्पर्धा कर रही होगी जो बाजार से पैसे जुटाना चाहते हैं। यह तर्क वित्त मंत्री के तर्क के बिल्कुल विपरीत है। सार्वजनिक निवेश का ऊंचा स्तर निजी निवेश को बढ़ावा देगा- यह बात तथ्यों से साबित भी नहीं होती है। निजी क्षेत्र ने पिछले दिनों निवेश बढ़ाने में रुचि नहीं दिखाई। बीते कुछ हफ्तों से ही निजी क्षेत्र में निवेश बढ़ने के संकेत मिले हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">वित्त मंत्री के पूंजीगत व्यय के फोकस में मुख्य रूप से तीन मंत्रालय रहे हैं- सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय, रेलवे और रक्षा सेवाएं। वर्ष 2021-22 में कुल पूंजीगत व्यय का 62% हिस्सा इन 3 मंत्रालयों का था। मौजूदा वित्त वर्ष के संशोधित अनुमानों को देखें तो यह बढ़कर 71% हो गया है। अगले वित्त वर्ष के लिए वित्त मंत्री ने इन 3 मंत्रालयों के लिए पूंजीगत व्यय का हिस्सा सकल का 66% किया है। मौजूदा वित्त वर्ष के संशोधित अनुमानों को देखें तो सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय तथा रेलवे का पूंजीगत व्यय बजट प्रावधानों से अधिक है। अर्थात केंद्र सरकार ने इन दो मंत्रालयों पर योजना से अधिक खर्च किया है। आश्चर्य नहीं कि संशोधित अनुमानों में कई अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों के पूंजीगत व्यय में कटौती की गई है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">सड़क और रेलवे में लगातार अधिक पूंजीगत व्यय और कुछ प्रमुख सेक्टर में निवेश की अनदेखी के ट्रेंड से वित्त मंत्री बच सकती थीं। एक ऐसा सेक्टर जिसमें सार्वजनिक निवेश कि वास्तव में बेहद जरूरत है वह है कृषि। ऐसा इसलिए क्योंकि निजी क्षेत्र ने इस सेक्टर में और कृषक समुदाय के फायदे वाले कार्यों में निवेश करने में बहुत कम रुचि दिखाई है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कृषि से जुड़े लोगों की परिस्थिति में सुधार के लिए इस क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश बहुत जरूरी है। दशकों से देश के कुल निवेश में कृषि क्षेत्र को लगातार बहुत कम हिस्सा मिलता रहा है। 2000-01 में भारत के कुल निवेश का 10% हिस्सा कृषि क्षेत्र में गया था। उसके बाद इसमें लगातार गिरावट आती रही और 2018-19 में कुल निवेश का सिर्फ 6% कृषि क्षेत्र को मिला। यह बात समझ से परे है कि एक के बाद एक सभी सरकारों ने लगातार कृषि क्षेत्र को फंड से महरूम रखा, जबकि कृषि क्षमता में सुधार और किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए ऐसा करना जरूरी है। इसके विपरीत कृषि क्षेत्र पूरी तरह बैठ ना जाए, इसके लिए इसे निरंतर सब्सिडी और खैरात पर आश्रित बना दिया गया। लेकिन सब्सिडी बढ़ने के साथ विश्व व्यापार संगठन के कई सदस्यों की आपत्तियां भी तेज हुई हैं। उनका कहना है कि भारत नियम के मुताबिक कृषि क्षेत्र को जितनी सब्सिडी दे सकता है, उससे काफी ज्यादा सब्सिडी दे रहा है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">सीधी-सहज बात तो यह है कि कृषि में पर्याप्त निवेश से अर्थव्यवस्था को दो तरह से फायदे होंगे। पहला, कृषि में रोजगार और आमदनी बढ़ाने की प्रचुर क्षमता है, खासकर यह देखते हुए कि लगभग 60% कार्यबल प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इस क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। दूसरा, ज्यादा निवेश से कृषि क्षेत्र में जब आय बढ़ेगी तो उससे अर्थव्यवस्था में मांग में भी वृद्धि होगी। यह वृद्धि अन्य किसी भी सेक्टर के मुकाबले अधिक होगी। इस तरह कृषि क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था को तेज विकास के रास्ते पर ला सकता है। अतीत में हम देख चुके हैं कि जब कृषि क्षेत्र में आमदनी में वृद्धि हुई तो दूसरे क्षेत्रों के उत्पाद और सेवाओं की मांग भी बढ़ी। अर्थात संपन्न कृषि क्षेत्र का फायदा गैर-कृषि क्षेत्रों को प्रत्यक्ष रूप से मिल सकता है। कृषि क्षेत्र में अतिरिक्त निवेश के अर्थव्यवस्था में अनेक फायदे हो सकते हैं। इस लिहाज से वित्त वर्ष 2023-24 के बजट प्रस्तावों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को टिकाऊ और समावेशी विकास की राह पर ले जाने का अवसर खो दिया है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;"><em><strong>(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज के सेंटर फॉर इकोनॉमिक स्टडीज एंड प्लानिंग में प्रोफेसर हैं)</strong></em></span></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/02/image_750x500_63ea61c27db53.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ बजट में अर्थव्यवस्था को समावेशी विकास की राह पर लाने का अवसर चूक गईं वित्त मंत्री सीतारमण ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[बजट में कृषि क्षेत्र के लिए आवंटन वास्तविक अर्थों में 2 साल में कम हुआ, सिंचाई को भी तवज्जो नहीं]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/no-hike-in-budget-outlays-for-agriculture-in-2-years-reduction-in-real-terms-irrigation-given-a-bad-miss.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 11 Feb 2023 14:23:26 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/no-hike-in-budget-outlays-for-agriculture-in-2-years-reduction-in-real-terms-irrigation-given-a-bad-miss.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>सबसे पहले सुर्खियां। वित्त वर्ष 2023-24 के आम बजट में कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय का आवंटन 2022-23 के 1.24 लाख करोड़ रुपए के बजट अनुमान से घटाकर 1.15 लाख करोड़ रुपए कर दिया गया है। महंगाई को समायोजित करें तो बीते 2 वर्षों के दौरान वास्तविक अर्थों में आवंटन कम हुआ है। दूसरी सुर्खी- कृषि के लिए महत्वपूर्ण सिंचाई की पूरी तरह अनदेखी की गई है। ऐसे में जाहिर है कि किसानों की आय दोगुनी करना दूर की कौड़ी होगी।</p>
<p>देश में कृषि विकास और किसान कल्याण की जिम्मेदारी वाले इस मंत्रालय के बजट आवंटन में कटौती को कुछ लोग उचित ठहरा सकते हैं। मौजूदा वित्त वर्ष 2022-23 के लिए 1.24 लाख करोड़ रुपए के आवंटन की तुलना में मंत्रालय की तरफ से सिर्फ 1.10 लाख करोड़ रुपए खर्च किए जाने की संभावना है, जैसा कि बजट के संशोधित अनुमानों में बताया गया है। अगर मंत्रालय उसे आवंटित राशि पूरी तरह खर्च नहीं कर पाता है तो क्यों ना उसे कम राशि आवंटित की जाए?</p>
<p>अब इन आंकड़ों पर गौर कीजिए। 2023-24 के बजट में कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय को जो राशि आवंटित की गई है उतनी ही राशि (1.14 लाख करोड़ रुपए) मंत्रालय ने 2 साल पहले 2021-22 में खर्च की थी। अब अगर आप इसमें महंगाई को समायोजित करें तो नया आवंटन 2 साल पहले की तुलना में वास्तव में 10% तो कम है ही।</p>
<p>पिछले बजट की तरह इस बार भी कृषि में शायद ही कहीं नए सार्वजनिक निवेश की बात की गई हो, जिससे भारत में कृषि पैदावार बढ़ाई जा सके। पूरा फोकस लगता है फसल उत्पादन के बाद मार्केटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर पर हो गया है। इसके लिए लॉजिस्टिक्स, डाटा डिजिटाइजेशन और डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क पर निजी निवेश की उम्मीद जताई गई है। किसानों को बेहतर मूल्य दिलाने के लिए उत्पादन के बाद के इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन क्या हम पैदावार को लेकर आश्वस्त होकर बैठ सकते हैं? दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाले देश में जिस स्तर पर खाद्य सुरक्षा की जरूरत है क्या उसके लिए कृषि में सालाना 3 से 4 फ़ीसदी की ग्रोथ काफी रहेगी? सालाना 31.5 करोड़ टन अनाज उत्पादन के साथ भारत इस मामले में सरप्लस स्थिति में है, लेकिन क्या हम इस पर आश्वस्त होकर रह सकते हैं? समय की जरूरत अगले 25 वर्षों के विजन की है। अगर किसी सेक्टर को अमृत काल के विजन की जरूरत है तो वह है कृषि। सवाल है क्या हमारे पास वह विजन है?</p>
<p>सरकार ने कुछ ही महीने पहले संसद में यह जानकारी दी थी- देश में 180888 हजार हेक्टेयर कृषि भूमि है जिसमें से 153888 हजार हेक्टेयर पर खेती होती है। इसमें भी 71554 हजार हेक्टेयर सिंचित भूमि है। इसका मतलब यह हुआ कि भारत की कृषि भूमि का 40% से भी कम क्षेत्र सिंचित है। जो लोग खेती के बारे में थोड़ा-बहुत भी जानते हैं वह समझेंगे कि किसी भी फसल की पैदावार के लिए सिंचाई का कितना महत्व है। जिन इलाकों में सिंचाई की सुविधा नहीं है उनकी तुलना में नदी बेसिन अथवा नहर वाले क्षेत्रों में पैदावार दोगुनी या उससे भी ज्यादा होती है।</p>
<p>आर्थिक सर्वेक्षण को सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार का विजन डॉक्यूमेंट माना जाता है। क्या उसमें सिंचाई में निवेश की कोई बात कही गई है? नहीं, सिवाय चुनाव वाले राज्य कर्नाटक में 5300 करोड़ रुपए वाले अपर भद्रा माइक्रो इरिगेशन प्रोजेक्ट के। यह राशि कहां से दी जाएगी यह भी स्पष्ट नहीं है। जल शक्ति मंत्रालय का कुल खर्च ही 4692 करोड़ रुपए है तथा ग्रामीण विकास मंत्रालय के भू संसाधन विभाग को सिर्फ 2419 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं। फ्लैगशिप प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना को बजट अथवा आर्थिक सर्वेक्षण में ज्यादा महत्व नहीं दिया गया है।</p>
<p>एक समय था जब छोटी बड़ी सिंचाई परियोजनाओं को बजट भाषणों में प्राथमिकता दी जाती थी और उनके लिए काफी आवंटन भी किया जाता था। नए बजट भाषण में आपको ड्रोन, स्टार्टअप, मोर क्रॉप पर ड्रॉप (प्रति बूंद अधिक फसल) जैसे शब्द मिलेंगे। जल संरक्षण और उससे जुड़ी टेक्नोलॉजी महत्वपूर्ण है लेकिन भारतीय कृषि को जरूरत इस बात की है कि देश में कृषि भूमि 100% संचित हो। मार्केटिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर भी महत्वपूर्ण है लेकिन इस तरह की पहल संभावनाओं के सागर में महज कुछ बूंदों की तरह है।</p>
<p><em><strong>(प्रकाश चावला सीनियर&nbsp;</strong></em><em><strong>इकोनॉमिक जर्नलिस्ट है और आर्थिक नीतियों पर लिखते हैं)</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ बजट में कृषि क्षेत्र के लिए आवंटन वास्तविक अर्थों में 2 साल में कम हुआ, सिंचाई को भी तवज्जो नहीं ]]></media:description>
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        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[बजट 2023: कृषि क्षेत्र को अपने अमृतकाल का इंतजार]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/agriculture-sector-has-to-wait-for-its-amrit-kaal-budget.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 01 Feb 2023 23:12:57 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/agriculture-sector-has-to-wait-for-its-amrit-kaal-budget.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बुधवार को संसद में अमृत काल का बजट 2023-24 पेश किया है। ढांचागात सुविधाओं&nbsp; में भारी पूंजीगत निवेश, युवाओं को नये भारत की ओर ले जाने के लिए डिजिटलाइजेशन, डिजिटल इकोनॉमी, आय कर का नया टैक्स विकल्प, ग्रीन हाइड्रोजन, डिजिटल लाइब्रेरी, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स को बढ़ावा देने से लेकर पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए तमाम घोषणाएं इस बजट में की है। लेकिन वित्त मंत्री द्वारा कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए किये गये बजटीय प्रावधानों को देखने से लगता है कि किसानों और कृषि क्षेत्र को अपने अमृत काल लिए अभी इंतजार करना होगा। कृषि क्षेत्र से जुड़ी अधिकांश योजनाओं और मदों के लिए नये बजट आवंटन घटा दिया गया है। यही नहीं दस लाख करोड़ रुपये के पूंजीगत निवेश में भी आधी से अधिक आबादी को जीवन-यापन का विकल्प दे रहे कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी नहीं दिखती है। बजटीय प्रावधानों के आकार को लगभग चालू वित्त वर्ष (2022-23) के स्तर पर ही समेट दिया गया है। अब हो सकता है कि कृषि क्षेत्र के लिए उठाये जाने वाले कुछ कदम इस साल के अंत में होने वाले कई महत्वपूर्ण राज्य विधान सभा चुनावों के पहले घोषित किये जाएं या फिर अगले लोक सभा चुनावों के पहले आने वाले अंतरिम बजट में इनको जगह मिले।</p>
<p>बात ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार की गारंटी देने वाली योजना महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना से शुरू करते हैं। चालू साल के संशोधित अनुमानों में इस पर खर्च होने वाली राशि 89400 करोड़ रुपये रहने की बात कही गई है लेकिन आगामी वित्त वर्ष (2023-24) के लिए बजट में इसके लिए केवल 60 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है जो चालू साल के संशोधित अनुमानों से 29 हजार 400 करोड़ रुपये कम है। कृषि क्षेत्र की ढांचागत सुविधाओं में सबसे अहम सिंचाई सुविधा की योजना प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के लिए चालू साल के बजट में 12954 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया था लेकिन इस पर खर्च 8085 करोड़ रुपये रहने का संशोधित अनुमान है। वहीं अगले साल के लिए आवंटन 10,787 करोड़ रुपये कर दिया गया है। यानी सिंचाई योजना पर बहुत बड़ा खर्च करने की जरूरत नहीं है। प्रधानमंत्री सुक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण औद्योगिकीकरण स्कीम के लिए पिछले साल 900 करोड़ रुपये का बजटीय प्रावधान था लेकिन खर्च केवल 290 करोड़ रुपये हुए और अब इसके लिए नये साल में प्रावधान 639 करोड़ रुपये कर दिया गया है।</p>
<p>राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के लिए चालू साल के बजट में 10443 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था लेकिन इसमें खर्च हुए 7000 करोड़ रुपये। वहीं आगामी साल के लिए बजटीय आवंटन को ही 7500 करोड़ रुपये कर दिया गया है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि को लेकर किसानों को उम्मीद थी कि इस बार योजना में शायद अधिक पैसा देने की घोषणा होगी। चालू साल के बजट में इसके लिए 68 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था लेकिन खर्च 60 हजार करोड़ रुपये रहने का संशोधित अनुमान है इसलिए अगले साल के बजट में भी प्रावधान घटाकर 60 हजार करोड़ रुपये कर दिया गया है। किसान उत्पादक संगठनों के लिए चालू साल के बजट में 500 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था लेकिन इस पर खर्च 955 करोड़ रुपये होने का संशोधित अनुमान लगाया गया है और अगले साल के भी 955 करोड़ रुपये का बजटीय प्रावधान कर दिया गया है।</p>
<p>फसल बीमा योजना के लिए चालू साल के बजट में 15500 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया था लेकिन इस पर खर्च आया 12376 करोड़ रुपये। इसीलिए अगले साल के लिए इस योजना का आवंटन पिछले साल के बजट से घटाकर 13625 करोड़ रुपये कर दिया गया है। सस्ता कर्ज देने के लिए लागू संशोधित ब्याज सबवेंशन योजना के लिए चालू साल के लिए 19500 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था लेकिन खर्च 22 हजार करोड़ रुपये होने का अनुमान है। इसके लिए आवंटन बढ़ाकर 23 हजार करोड़ रुपये किया गया है। बजट में कृषि कर्ज के चालू साल के 18.5 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 20 लाख करोड़ रुपये का लक्ष्य&nbsp; रखा गया है। यूरिया सब्सिडी में चालू साल के खर्च के मुकाबले 22998 करोड़ रूपये कम खर्च होने की संभावना के तहत इसके लिए 1,31,100 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। वैश्विक बाजार में यूरिया की कीमतों में गिरावट के चलते सरकार को सब्सिडी की बचत होगी। इसी तरह न्यूट्रिएंट आधारित सब्सिडी योजना में भी सबसे 27122 करोड़ रुपये खर्च होने के अनुमान के तहत इसके लिए आगामी साल का बजटीय प्रावधान 44 हजार करोड़ रुपये किया गया है।</p>
<p>राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत खाद्यान्नों की विकेंद्रित खरीद के लिए बजट में 59793 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है जिस पर चालू साल में 72283 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। वहीं राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत भारतीय खाद्य निगम को दी जाने वाली सब्सिडी के लिए 1,37,207 करोड़ रुपये का प्रावधान नये बजट में किया गया है जबकि चालू साल में इस पर 2,14,696 करोड़ रुपये का खर्च आने का अनुमान&nbsp; है। इन आंकड़ों से लगता है कि इन खाद्य सब्सिडी के मोर्चे पर सरकार को अधिक बचत होगी और उसे कम खाद्यान्न खरीद का जरूरत पड़ेगी।</p>
<p>उपर दिये गये आंकड़े कृषि क्षेत्र को लेकर सरकार की प्राथमिकता और गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है और साबित करता है कि जिस तरह से ढांचागत सुविधाओं और उद्योग में निवेश को बढ़ावा देने के कदम बजट में उठाये गये हैं इस तरह की प्राथमिकता कृषि और ग्रामीण क्षेत्र के लिए नहीं दिखती है।</p>
<p>हालांकि सरकार द्वारा बजट घोषणाओं की जानकारी देने के लिए बनाये गये ग्राफिक काफी आकर्षक हैं और इनमें कृषि से जुड़े प्रावधानों की बेहतर प्रस्तुति की गई है। मसलन 20 लाख करोड़ रुपये का कृषि कर्ज का लक्ष्य, मत्स्य संपदा योजना की एक उपयोजना के लिए छह हजार करोड़ रुपये का प्रावधान, हार्टिककल्चर प्लांट मैटीरियल के लए 2200 करोड़ रुपये योजना, एग्रीकल्चर एक्सीलरेटर फंड जो ग्रामीण क्षेत्र में स्टार्ट-अप के लिए बनेगा और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए जरिये कृषि में इंफोर्मेशन सर्विसेज के जरिये समाधान देने की घोषणा की गई है।</p>
<p>इसके अलावा मिलेट्स को श्री अन्न कहकर काम चला लिया गया है हालांकि इनको बढ़ावा के लिए कोई ठोस योजना बजट में नहीं दिखी है। मिलेट किसानों की आय में इजाफा करने वाला कोई कदम साफ तौर से नहीं दिखता है। हां एक करोड़ किसानों को प्राकृतिक खेती के तहत लाने की बात तो कही गई है लेकिन अभी तो देश के कृषि वैज्ञानिक ही प्राकृतिक खेती के फायदों और खेती की इस पद्यति पर भी बहुत बेहतर राय नहीं बना सके हैं।</p>
<p>हां कृषि के साथ सहकारिता क्षेत्र को लेकर जरूरत कुछ कारगर कदम इस बजट में हैं जो प्राथमिक सहकारी समितियों को अधिक प्रभावी बनाने के लेकर बहुउद्देश्यीय समितियों को कार्य क्षेत्र को बढ़ावा देने वाले हैं। वहीं विकेंद्रिकृत भंडारण सुविधाओं के विकास में इनका योगदान हो सकता है। साथ ही सहकारी क्षेत्र के लिए टीडीएस, नकद जमा, नकद निकासी और सहाकारी समितियों द्वारा उत्पादन शुरू करने के समय कंपनियों की तर्ज पर कर की कम दरों जैसे प्रावधान&nbsp; इस क्षेत्र के लिए बेहतरी लाने वाले साबित हो सकते हैं।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ बजट 2023: कृषि क्षेत्र को अपने अमृतकाल का इंतजार ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[खुले बाजार में गेहूं बिक्री का फैसला अगले सीजन में सरकारी खरीद का खर्च कम करने की कोशिश]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/wheat-weaving-a-story-of-farmers-shrugging-msp-putting-govt-in-tight-spot.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 28 Jan 2023 19:52:20 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/wheat-weaving-a-story-of-farmers-shrugging-msp-putting-govt-in-tight-spot.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">इस साल गेहूं की कहानी कुछ अलग दिख रही है। तीन हजार रुपए प्रति क्विंटल को पार करने के बाद अभी मंडियों में इसकी कीमत 2700 से 2800 रुपए प्रति क्विंटल चल रही है। उत्तर और पश्चिमी भारत के लोगों के भोजन का मुख्य हिस्सा, गेहूं की लगातार ऊंची कीमत ने सरकार की पेशानी पर बल डाल दिए हैं। इसने भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) को खुले बाजार में 30 लाख टन गेहूं बेचने का निर्देश दिया है। जाहिर है कि इसका मकसद कीमतों को नियंत्रित करना है। इस समय रेगुलर वैरायटी का आटा 35 रुपए किलो के भाव बिक रहा है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">सरकार की परेशानी दो वजहों से है। पहला, खुदरा महंगाई जो कम होने लगी थी वह फिर से बढ़ सकती है, और दूसरा, जब हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश, राजस्थान तथा अन्य राज्यों में अप्रैल के दूसरे हफ्ते में गेहूं की नई फसल आएगी तब उसे बफर स्टॉक के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से अधिक कीमत पर गेहूं खरीदना पड़ेगा। अभी गेहूं का एमएसपी 2125 रुपए प्रति क्विंटल है। राशन दुकानों की जरूरतें पूरी करने के लिए केंद्रीय पूल में कम से कम 240 लाख टन गेहूं होना चाहिए।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">किसान संगठन भले ही एमएसपी को कानूनी दर्जा दिए जाने की मांग कर रहे हैं, लेकिन इस साल हालात कुछ अलग रहने के आसार हैं। सरकार की प्रमुख खरीद, स्टोरेज और डिस्ट्रीब्यूशन एजेंसी एफसीआई 2125 रुपए प्रति क्विंटल एमएसपी के भाव पर गेहूं खरीद कर खुश होगी, दूसरी तरफ किसानों को खुले बाजार में एमएसपी से अधिक का भाव मिल सकता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">आमतौर पर हम किसानों को एमएसपी पर ऊपज खरीदे जाने की मांग करते और सरकार की तरफ से टालमटोल का रवैया अपनाना देखते रहे हैं। लेकिन बाजार की ऊंची कीमतों ने हालात को बदल दिया है। सरकारी (एफसीआई) काउंटर अप्रैल में खरीद के समय किसानों का स्वागत करते दिख सकते हैं। दूसरी तरफ किसान यह सोचकर सरकारी खरीद केंद्रों पर जाने से मना कर सकते हैं कि खुले बाजार में उन्हें अनाज की अधिक कीमत मिल जाएगी।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">ऐसे में सरकार के पास एमएसपी से अधिक कीमत चुकाने के अलावा कोई और विकल्प नहीं रह जाएगा। इसे मंडी की भाषा में आमतौर पर बोनस कहा जाता है। निश्चित तौर पर यह किसानों के लिए अच्छी स्थिति होगी, लेकिन केंद्र सरकार के राजस्व पर इसका बड़ा प्रभाव पड़ेगा। बजट प्रावधान चाहे जो हो, वैसी परिस्थिति में 2023-24 में खाद्य सब्सिडी 2.5 लाख करोड़ रुपए से अधिक हो सकती है। इस वर्ष भी खाद्य सब्सिडी 1.46 लाख करोड़ रुपए के बजट प्रावधान की तुलना में काफी अधिक रहने की उम्मीद है। यह प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के कारण होगा।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण, कृषि तथा वित्त मंत्रालय के बड़े अधिकारी निश्चित रूप से इन बातों का अनुमान लगा रहे होंगे। गेहूं और आटा की कीमतें नीचे लाने के लिए सरकार ने जो कदम उठाए हैं उसे अगले सीजन में सरकारी खरीद का खर्च कम करने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है। सरकार ने दो कदम उठाए हैं। पहला, वाणिज्य मंत्रालय ने निर्यात पर प्रतिबंध लगा रखा है और दूसरा, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग ने खुले बाजार में 30 लाख टन गेहूं जारी करने की घोषणा की है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">फिलहाल सरकार गेहूं के दाम में गिरावट को लेकर बेचैन दिख रही है। उसे उम्मीद है कि 1 अप्रैल से अगला खरीद सीजन शुरू होने से पहले दाम कम हो जाएंगे। इस सीजन में पिछली बार के 339.8 लाख हेक्टेयर की तुलना में थोड़ा ज्यादा, 341 लाख हेक्टेयर में गेहूं की बुवाई हुई है। हालांकि अगले 2 महीने में मौसम की भी महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी। उपभोक्ता हित के नाम पर सरकार गेहूं के दाम नीचे लाने के लिए और प्रयास कर सकती है, क्योंकि तब उसे खाद्य सब्सिडी में भी बचत होगी। अगर एफसीआई को एमएसपी से अधिक दाम पर अनाज खरीदना पड़ा तो खाद्य सब्सिडी भी बढ़ेगी। बहरहाल, किसानों के लिए वर्षों बाद ऐसा सुनहरा मौका आया है जब उन्हें अपनी उपज की अच्छी कीमत मिल रही हो।</span></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ खुले बाजार में गेहूं बिक्री का फैसला अगले सीजन में सरकारी खरीद का खर्च कम करने की कोशिश ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[स्टार्टअप्स से एक्सपोर्ट तक, अब एग्रीटेक स्टार्टअप्स को प्रोत्साहन देने का समय]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/from-start-ups-to-export-promotion-of-agri-start-ups-is-need-of-the-hour.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 16 Jan 2023 13:46:12 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/from-start-ups-to-export-promotion-of-agri-start-ups-is-need-of-the-hour.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">भारत छोटे व्यवसायों का देश है। छोटे व्यवसाय देश के कोने-कोने में फैले हुए हैं जो सामान्यतः&nbsp; शहरी क्षेत्रों में अधिकांश लोगों की आय और आजीविका को सुनिश्चित करते है। समाज का एक विशेष वर्ग उनके पेशे यानी छोटे व्यवसायों से भी जाना जाता है। इन्हें आम तौर पर मारवाडी़ या गुजराती व्यवसायी कहा जाता है। भारत में, छोटे और मंझले व्यवसाय सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों के वाहक हैं, जो भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी हैं। ये बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन करते हैं। वैश्वीकरण व उदारीकरण के मौजूदा परिप्रेक्ष्य में, छोटे और मंझले व्यवसायों को अपना अस्तित्व बनाए रखने और विकास के लिए अनगिनत चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा हैं। आजकल अधिकांश व्यवसाय संचार माध्यमों, ऑनलाइन मार्केटप्लेस और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर संचालित हो रहे हैं। इसी का परिणाम है कि स्टार्टअप व्यवसायों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।</span></p>
<p><b>क्या हैं स्टार्टअप इंडिया के मायने</b></p>
<p><span style="font-weight: 400;">2015 में घोषित स्टार्टअप इंडिया का मुख्य उद्देश्य है- भारत में नवोदित उद्यमियों की पहचान और प्रोत्साहन, नियमों का सरलीकरण कर हैंडहोल्डिंग करना, वित्त पोषण सहायता और सार्वजनिक-निजी भागीदारी को </span><span style="font-weight: 400;">बढ़ावा</span><span style="font-weight: 400;"> देना। 2021-22 में स्टार्टअप इंडिया को सीड फंड योजना, फंड ऑफ फंड्स, और क्रेडिट गारंटी योजना का संबल मिला। ये योजनाएं स्टार्टअप व्यवसाय के विभिन्न चरणों में सहायता प्रदान करने, पूंजी जुटाने और व्यापार में सरकारी जटिलता को कम करने में काफी उपयोगी साबित हो रही हैं।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">2022 तक 84,000 से अधिक पंजीकृत स्टार्टअप के साथ, भारत दुनिया में तीसरे सबसे बड़े स्टार्टअप तंत्र (इकोसिस्टम) के रूप में उभरा है। देश में उद्यमशीलता कौशल और आकार को देखते हुए, स्टार्टअप पहल छोटे व्यवसायों को मजबूत करने और अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करने में सहायक हैं। यह नवोदित उद्यमियों के साथ ही लघु और छोटे व्यवसायों को वैश्वीकरण, उदारीकरण और डिजिटलीकरण की मुख्यधारा से जोड़ने में मील का पत्थर साबित हो सकती हैं। स्टार्टअप पहल शहरी क्षेत्रों में सफल रहे छोटे व्यवसायों को ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचाने की दिशा में एक कदम मानी जा सकती है।</span></p>
<p><b>कृषि क्षेत्र में पहल</b></p>
<p><span style="font-weight: 400;">भारत में हाल के वर्षों में खाद्यान्न, फलों और सब्जियों का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ है। हमारा कृषि और खाद्य निर्यात 2021-22 में 50 बिलियन डॉलर के जादुई आंकड़े को पार कर गया है। यद्यपि कृषि 500 बिलियन डॉलर के साथ राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद में 17 प्रतिशत से अधिक का योगदान करती है। ये आंकड़े ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि व्यवसाय की क्षमता के प्रमाण हैं, जिन्हें भारतीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान और दहाई अंकों में विकास के लिए इस्तेमाल करने की आवश्यकता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि और खाद्य व्यवसाय में कोई बड़ी सफलता नहीं मिली है। राज्य और भारत सरकार द्वारा किए गए प्रयासों के परिणामस्वरूप ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं, उत्पाद विशिष्ट व्यवसाय समूहों और एक व्यापार पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण हो रहा है। देश के विभिन्न हिस्सों में स्टार्टअप्स की पहचान और&nbsp; इनक्यूबेट करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों में कई कृषि इन्क्युबेशन&nbsp; कार्यक्रम और सुविधाएं स्थापित की की गयी हैं। एक कदम आगे बढ़ते हुए, नाबार्ड ने महाराष्ट्र और राजस्थान से कृषि निर्यात की सुविधा के लिए विशिष्ट कार्यक्रम भी शुरू किया है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्टार्टअप्स और कृषि व्यवसाय पारिस्थितिकी तंत्र के परिदृश्य में परिवर्तन के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">स्टार्टअप योजना को कृषि व ग्रामीण व्यवसायों में प्रोहत्सान देने का समय आ गया है। इसके तहत 10,000 किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) की स्थापना, कृषि अवसंरचना निधि (एआईएफ)&nbsp; की शुरुआत और तीन राष्ट्रीय स्तर की बहु-राज्य सहकारी समितियों की स्थापना जैसी अन्य मेगा योजनाओं के साथ स्टार्टअप योजना को जोड़ा जा सकता है। इसका उद्देश्य ग्रामीण और अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में कृषि और खाद्य व्यवसायों, एकत्रीकरण, भंडारण, प्रसंस्करण और निर्यात को गति देना है। साथ ही गुणवत्ता और बाजार की चुनौतियों से निपटने के लिए स्टार्ट अप योजना के तहत हस्तकला, खादी और कृषि पर्यटन जैसे ग्रामीण व्यवसायों के आधुनिकीकरण पर ध्यान देने की भी जरूरत है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">पिछले दशक में, हमने नवीन विचारों, डिजिटल प्रौद्योगिकी और लागत प्रभावी समाधानों के साथ पुरानी कृषि प्रणाली को बदलने के लिए कृषि उद्यमियों और एग्रीटेक स्टार्टअप की एक नई लहर देखी है। नए एग्रीटेक स्टार्टअप किसानों, इनपुट डीलरों, थोक विक्रेताओं, खुदरा विक्रेताओं और उपभोक्ताओं के बीच की कड़ी बन गए हैं। नवाचार और प्रौद्योगिकी का लाभ उठाकर एग्रीटेक स्टार्टअप आईसीटी ऐप से लेकर फार्म ऑटोमेशन, मौसम की भविष्यवाणी से लेकर ड्रोन के उपयोग, इनपुट रिटेलिंग और उपकरण किराए पर लेने, मार्केट लिंकेज, ऑनलाइन सब्जी-फल मार्केटिंग तक नए कृषि व्यवसाय को जन्म दे रहे हैं।&nbsp;</span></p>
<p><b>चक दे भारत</b></p>
<p><span style="font-weight: 400;">तमाम कोशिशों के बावजूद, पिछले एक दशक में कुल मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स में कृषि और खाद्य स्टार्टअप का योगदान केवल 5 प्रतिशत है। अब ग्रामीण भारत में एग्रीटेक स्टार्टअप्स को प्रोहत्सान देने का समय आ गया हैं ताकि कृषि नवाचार और प्रौद्योगिकी से गुणवत्तापूर्वक उत्पादन करने, किसानों को उत्पादन की लागत कम करने और किसानों की उपज के लिए बाजार खोजने के लिए प्रौद्योगिकी अपनाने में मदद मिल सके। निंजाकार्ट, वेकूल, एग्रोस्टार, देहात, एब्सोल्यूट और जनरल एरोनॉटिक्स सहित कुछ सफल एग्रीटेक स्टार्टअप हैं, जो भारत में हमारे कृषि और खाद्य व्यवसाय करने के तरीके को बदल रहे हैं।</span></p>
<p><em><strong>(भागीरथ चौधरी, संस्थापक निदेशक, दक्षिण एशिया जैव प्रौद्योगिकी केंद्र और नाबार्ड कृषि निर्यात सुविधा केंद्र, जोधपुर)</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ स्टार्टअप्स से एक्सपोर्ट तक, अब एग्रीटेक स्टार्टअप्स को प्रोत्साहन देने का समय ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[‘मुफ्त अनाज वितरित करने का फैसला सस्टेनेबल डेवलपमेंट लक्ष्य हासिल करने की दिशा में साहसिक कदम’]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/free-distribution-of-foodgrains-a-bold-step-in-achieving-sustainable-development-goals.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 14 Jan 2023 11:00:37 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/free-distribution-of-foodgrains-a-bold-step-in-achieving-sustainable-development-goals.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल (SDG) को हासिल करने की संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबद्धता के तहत भारत को 2030 तक गरीबी खत्म करने (नो पॉवर्टी) और किसी को भूखा ना छोड़ने (जीरो हंगर) का लक्ष्य हासिल करना है। इस विशाल लक्ष्य को हासिल करने के लिए निश्चित रूप से सरकार की तरफ से प्रतिबद्धतापूर्ण कार्रवाई और नीतिगत समर्थन की जरूरत है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून (एनएफएसए 2013) के तहत हाल में कैबिनेट ने खाद्य सब्सिडी बढ़ाने का फैसला किया है। यह वास्तव में सस्टेनेबल डेवलपमेंट लक्ष्य (एसडीजी) को हासिल करने की दिशा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक साहसिक कदम है।</p>
<p>आजादी के बाद हरित, श्वेत, नीली और रेनबो क्रांतियों के जरिए कृषि के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धियों के कारण भारत घरेलू खाद्य सुरक्षा और हासिल करने और गरीबी का स्तर 70% से घटाकर 16.4% कम करने में सफल रहा है। भूख की समस्या भी काफी हद तक खत्म हुई है। इसके बावजूद भारत में 5 साल से कम उम्र के 57 लाख बच्चे (लगभग 40%) कुपोषण के शिकार हैं (यूनिसेफ, मई 2022)। इस कुपोषण के प्रमुख कारणों में आर्थिक असमानता, गरीबी, लोगों के लिए खाद्य पदार्थों का महंगा होना, साफ-सफाई और स्वच्छ पेयजल की कमी शामिल हैं।</p>
<p>केंद्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री पीयूष गोयल ने लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (TPDS) के माध्यम से 81.35 करोड़ लोगों को 5 किलो अनाज मुफ्त में वितरित करने की जो घोषणा की है, वह प्रशंसा के योग्य है। इसके अतिरिक्त अंत्योदय अन्न योजना (AAY) के तहत बेहद गरीब परिवारों को 35 किलो अनाज (21 किलो चावल और 14 किलो गेहूं) देने से राजस्व पर दो लाख करोड़ रुपए का सालाना बोझ आएगा। लेकिन इन पहलों से गरीबों को सस्ता भोजन उपलब्ध हो सकेगा।</p>
<p>राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून (NFSA) को पूरी दुनिया में गरीबों की चिंता दूर करने का अनोखा कानून माना जाता है। इससे उन्हें कम कीमत में खाद्य और पोषण सुरक्षा मिलती है, आर्थिक स्थिरता आती है, साथ ही इसके दीर्घकालिक स्वास्थ्य फायदे हैं। यह महिला सशक्तीकरण और पर्यावरण सुरक्षा की दिशा में भी बड़ा कदम है। भारत इस लिहाज से भी सौभाग्यशाली है कि इसके पास एक दशक से पांच से सात करोड़ टन का बफर स्टॉक रहता है। दूसरी ओर, विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) के अनुसार अनेक विकासशील देशों में खाद्य की उपलब्धता प्रमुख समस्या बनती जा रही है।</p>
<p>कोविड-19 महामारी के दौरान दुनियाभर में 15 करोड़ नए लोगों के सामने खाद्य सुरक्षा का संकट उत्पन्न हो गया। यह संख्या पहले से गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले 80 करोड़ लोगों के अतिरिक्त है। कोविड-19 से पहले दुनिया में 81.5 करोड़ लोगों के भूखे होने और हर तीसरे व्यक्ति के कुपोषित थे। यह खाद्य प्रणाली के असंतुलन को दर्शाता है।</p>
<p>माइग्रेशन का मौजूदा संकट भी बीते 70 वर्षों में सबसे ऊंचे स्तर पर है। जमीन और पानी जैसे संसाधनों के सीमित होने के चलते ग्रामीण लोगों के बीच सामाजिक सामंजस्य और सांस्कृतिक परंपराओं के लिए खतरा उत्पन्न होता जा रहा है। विश्व खाद्य कार्यक्रम के अनुसार युद्ध, जलवायु संकट और कोविड-19 महामारी के कारण पूरी दुनिया में खाद्य संकट बढ़ा है। यह संकट मूलतः यूक्रेन रूस युद्ध से शुरू हुआ जिसकी वजह से खाद्य पदार्थ, ईंधन और उर्वरकों के दाम बढ़ गए। अगर विकासशील देशों ने मिलकर और बड़े पैमाने पर प्राथमिकता के साथ कदम नहीं उठाए तो अनेक देशों में करोड़ों लोगों के सामने भूखों मरने की नौबत आ जाएगी।</p>
<p>सौभाग्यवश भारत में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून (NFSA) और अंत्योदय अन्न योजना (AAY) के अलावा राष्ट्रीय पोषण मिशन भी लागू है। इसे पोषण अभियान भी कहा जाता है। इसका उद्देश्य अविकसित बच्चों की संख्या घटाकर 25% करना है। मध्यान्ह भोजन योजना (1995) को प्रभावी रूप से लागू करके बच्चों में कुपोषण की समस्या से निजात मिल सकती है। इसके लिए दूध, दाल और सोयाबीन का इस्तेमाल बढ़ाने की रणनीति अपनाई जानी चाहिए। सोयाबीन में दालों की तुलना में दोगुना प्रोटीन (40%) होता है।</p>
<p>28 महीने पहले कोविड-19 महामारी के समय शुरू की गई प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY) को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून में विलय करना और 81.35 करोड़ लोगों को 5 किलो अनाज मुफ्त में देना दीर्घकालिक सस्टेनेबिलिटी की दिशा में एक और कदम है। खासकर यह मानते हुए कि सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल को हासिल करने के लिए राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून 2030 तक लागू रहेगा। इसके अतिरिक्त यह समीक्षा करने की भी जरूरत है कि सभी 81 करोड़ (लगभग 58%) लोगों को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत मदद की आवश्यकता है या नहीं। यहां यह बात उल्लेखनीय है कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा), जिसे 2006 में शुरू किया गया था और जिस पर अभी सालाना खर्च लगभग 98000 करोड़ रुपए है, ने गरीबी एक तिहाई 32% कम करने में मदद की है।</p>
<p>2015-16 की 10वीं कृषि जनगणना के अनुसार देश में 14.6 करोड़ किसान परिवार हैं। इनमें से 86.2 प्रतिशत छोटे और सीमांत किसान हैं जिनके पास 2 हेक्टेयर से भी कम जमीन है। ये कुल खेती योग्य जमीन के 45.6 प्रतिशत हिस्से पर खेती करते हैं। देश के कुल कृषि उत्पादन में इनकी हिस्सेदारी 50% से ज्यादा है। ये छोटे और सीमांत किसान भारत की कृषि अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं।&nbsp;</p>
<p>इस बात को स्वीकार करने की आवश्यकता है कि सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल एक बेहतर कल को हासिल करने में कृषि क्षेत्र को अनोखा अवसर प्रदान करता है, क्योंकि दुनिया में सबसे अधिक अल्प पोषित और गरीब भारत में ही हैं। अर्थात इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए कृषि क्षेत्र के विकास की गति बढ़ानी पड़ेगी। यह भी स्पष्ट है कि इसमें आत्मसंतुष्टि की कोई जगह नहीं है। विकास के लिए कृषि अनुसंधान (AR4D) को उच्च प्राथमिकता देना जरूरी है। इसके लिए आईसीएआर का बजट आवंटन बढ़ाना पड़ेगा जो बीते एक दशक से स्थिर बना हुआ है। देखा जाए तो AR4D मैं निवेश पर मिलने वाला रिटर्न 10 से 15 गुना होता है। यह शिक्षा, ऊर्जा, सड़क परिवहन, इन्फ्राट्रक्चर जैसे अन्य सेक्टर में मिलने वाले रिटर्न की तुलना में काफी ज्यादा है।</p>
<p>इन बातों को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल भारत के लिए अवसर के साथ भविष्य का विजन भी है। यह स्पष्ट है कि विश्व स्तर पर लक्षित समय (2030) के भीतर सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल को हासिल करने के लिए जरूरी है कि भारत केंद्रीय पटल पर उभरे। संभवतः इसके बिना संयुक्त राष्ट्र का लक्ष्य हासिल नहीं हो सकेगा। इस लिहाज से एक सुनियोजित रणनीति और उस पर अमल की योजना की जरूरत हैः-</p>
<p>1. कृषि विकास को मिशन मोड के तहत आगे बढ़ाना जिसमें यह बातें शामिल हों- i) पोषण से भरपूर और अधिक उत्पादकता वाली वैरायटी तथा हाइब्रिड फसलों को बढ़ावा, ii) सरसों, सोयाबीन, मक्का जैसी जीएम खाद्य फसलों को अपनाना, iii) फसलों का विविधीकरण और सस्टेनेबल गहनता के लिए कंजर्वेशन कृषि, iv) सेकेंडरी और विशिष्टता वाली खेती को बढ़ावा मजबूत बनाना, v) स्थानीय खाद्य प्रणाली को इको क्षेत्र के हिसाब से बढ़ावा देना, जिसमें फसलों, बागवानी, मवेशी, फिशरीज, एग्रोफोरेस्ट्री इत्यादि पर जोर हो।</p>
<p>2. जो क्षेत्र हरित क्रांति से अछूते रह गए वहां सस्टेनेबल डेवलपमेंट इंडेक्स (SDI) सुधारने के लिए नीतिगत वातावरण और संस्थानों को मजबूत बनाना, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां कृषि विकास की दर बढ़ाने के लिए जरूरी प्राकृतिक संसाधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।</p>
<p>3. ग्रामीण क्षेत्र को कर्ज, स्वास्थ्य बीमा, फसल बीमा, मवेशियों का बीमा, गरीबों को आवास, बेहतर और सक्षम सिंचाई प्रणाली, गांव में भंडारण, युवाओं में कौशल विकास और स्वरोजगार, मिट्टी का परीक्षण करके जरूरत के मुताबिक उर्वरकों का इस्तेमाल, किसानों को ई- नाम समेत बाजार से जोड़ने जैसे कदम उठाए जाने चाहिए।</p>
<p>निष्कर्ष यह है कि समय बहुत कम है और हमें सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल को हासिल करने के लिए तेजी से कार्य करने की जरूरत है, ताकि सबके लिए बेहतर खाद्य, पोषण और पर्यावरण सुरक्षा हासिल की जा सके।</p>
<p>(<em>लेखक तास के चेयरमैन, आईसीएआर के पूर्व महानिदेशक, डीएआरई के पूर्व सचिव और इंडियन साइंस कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष हैं। वे पद्मभूषण से सम्मानित किए जा चुके हैं)</em></p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ ‘मुफ्त अनाज वितरित करने का फैसला सस्टेनेबल डेवलपमेंट लक्ष्य हासिल करने की दिशा में साहसिक कदम’ ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[विश्व की डेयरी बन सकता है भारत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/india-dairy-to-the-world.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 08 Jan 2023 13:57:41 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/india-dairy-to-the-world.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">भारत की अर्थव्यवस्था पिछले चार-पांच दशकों से निरंतर विकास कर रही है। इसका कृषि, मैन्युफैक्चरिंग और सेवा जैसे अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर बड़ा सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। दुनिया ने भी भारत को एक महत्वपूर्ण वैश्विक शक्ति के रूप में स्वीकार किया है। लेकिन 1947 में स्थिति बिल्कुल अलग थी। देश औपनिवेशिक जंजीरों से तो मुक्त हो गया था लेकिन सच्चे अर्थों में आर्थिक स्वतंत्रता और खाद्य सुरक्षा हासिल करना बाकी था। आजादी के बाद हमारा पूरा फोकस देश की बढ़ती आबादी के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना था, क्योंकि उस समय भारत विकसित देशों की तरफ से मिलने वाली खाद्य सहायता पर निर्भर था।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">देश के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने आणंद में संभावनाओं की तलाश की और आगे चलकर डॉ वर्गीज कुरियन के साथ चर्चा के बाद राष्ट्रीय दुग्ध ग्रिड का ढांचा तैयार हुआ। यह नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड की निगरानी में बना था। इस बोर्ड ने ग्रामीण भारत में सामाजिक आर्थिक क्रांति ला दी और 'अरब लीटर' के विचार को अमली जामा पहनाया। उसी का नतीजा है कि विश्व के दुग्ध क्षेत्र में भारत आज शीर्ष देशों में शामिल है। ऑपरेशन फ्लड के तहत दुग्ध कोऑपरेटिव के अमूल मॉडल को पूरे देश में अपनाया गया। राष्ट्रीय स्तर पर इस आंदोलन के चलते सिस्टम से बिचौलियों को हटाने में कामयाबी मिली और यह सुनिश्चित किया गया कि पूरी वैल्यू चेन पर किसानों का नियंत्रण रहे। यह श्वेत क्रांति पूरी तरह से भारत के दूरदर्शी लोगों के विचारों का परिणाम थी, जबकि हरित क्रांति को पश्चिम से उधार लिया गया था।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">आज भारत का डेरी और पशुपालन क्षेत्र 10 करोड़ ग्रामीण परिवारों के लिए आय का मुख्य साधन बन गया है। इसने खास तौर से सीमांत और महिला किसानों को रोजगार तथा टिकाऊ आजीविका का साधन मुहैया कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कृषि अर्थव्यवस्था में डेरी और पशुपालन का हिस्सा करीब 30% है। डेयरी क्षेत्र इकोनॉमी में 9.6 लाख करोड रुपए का योगदान करता है जबकि पोल्ट्री,&nbsp; फिशरीज और अन्य संबंधित क्षेत्रों का योगदान तीन लाख करोड़ रुपए है। देश में हर साल जितने दूध का उत्पादन होता है उसका मूल्य गेहूं, धान और दालों के कुल मूल्य से भी ज्यादा है। इस तरह देसी बिजनेस मॉडल को अपनाते हुए भारत ने डेयरी सेक्टर में आत्मनिर्भरता हासिल की है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">भारत के डेयरी क्षेत्र की विशाल सफलता के पीछे दो दर्शन माने जा सकते हैं-</span></p>
<ol>
<li style="font-weight: 400;" aria-level="1"><span style="font-weight: 400;">वैल्यू फॉर मेनी: मतलब हमारे किसानों ने जितना दूध निकाला उसकी उन्हें अधिकतम कीमत मिली। उपभोक्ता दूध के लिए जितना पैसा देता है उसका 70 से 80% किसानों को मिलता है। इसके विपरीत अमेरिका और यहां तक कि यूरोप के देशों में भी किसानों को 35 से 40 फ़ीसदी हिस्सा ही मिलता है।</span></li>
<li style="font-weight: 400;" aria-level="1"><span style="font-weight: 400;">वैल्यू फॉर मनी: भारत का डेयरी सेक्टर इतना आगे बढ़ा तो इसके पीछे एक बड़ी वजह है यह भी है कि यहां के मध्य वर्ग को अच्छी क्वालिटी के प्रोडक्ट कम कीमत पर मिले।</span></li>
</ol>
<p><span style="font-weight: 400;">औसत ग्राहक दूध के पोषण के महत्व को समझता है। बाजार में निजी और कोऑपरेटिव दोनों ब्रांड की मौजूदगी के कारण उन्हें उत्पाद कम कीमत पर मिलते हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">डेयरी सेक्टर में कोऑपरेटिव की मौजूदगी से उत्पादकों और उपभोक्ताओं दोनों का लाभ सुनिश्चित हुआ है। कोऑपरेटिव ने ऐसे मानक स्थापित किए हैं जिन्हें निजी क्षेत्र हासिल करने की कोशिश करता रहता है। आर्थिक पहलू के अलावा भारत का डेयरी उद्योग एक सक्षम सप्लाई चेन मैनेजमेंट और तकनीकी इंटीग्रेशन का भी सफल उदाहरण बन गया है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">भारत के डेयरी सेक्टर में कोऑपरेटिव मॉडल कितना सक्षम और प्रभावी है यह बात आंकड़ों से साबित होती है। 1950 में जब भारत खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहा था उस समय हमारा कुल दूध उत्पादन सिर्फ 1.7 करोड़ टन था।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">1970 के दशक में ऑपरेशन फ्लड शुरू हुआ तो भारत दूध के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर था, जिस तरह आज हम खाद्य तेल आयात पर निर्भर करते हैं। दूध उत्पादन 2.1 करोड़ टन पर स्थिर था और विश्व के कुल 42.5 करोड़ टन उत्पादन में भारत का हिस्सा सिर्फ 5% था। अमेरिका की तुलना में एक तिहाई और यूरोप की तुलना में आठवें हिस्से के बराबर दूध उत्पादन भारत में होता था।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">ऑपरेशन फ्लड के नतीजे तब देखने को मिले जब 1997 में भारत विश्व का सबसे बड़ा दूध उत्पादक बना। यहां सालाना 7.4 करोड़ टन दूध का उत्पादन हो रहा था। उस दौरान देश में प्रति व्यक्ति दूध की उपलब्धता 110 ग्राम से बढ़कर 214 ग्राम हो गई थी। 1997 से लेकर आज तक भारत दुनिया का शीर्ष दुग्ध उत्पादक बना हुआ है। आज यहां 21 करोड़ टन दूध का उत्पादन होता है और दुनिया के 91 करोड टन उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी 23% पहुंच गई है। अन्य देशों से तुलना करें तो अमेरिका की तुलना में भारत का उत्पादन दोगुना और यूरोप से 30% ज्यादा है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">भारत में दूध का उत्पादन पिछले 20 वर्षों के दौरान सालाना 4.8% की दर से औसत दर से बढ़ा है, जबकि इस अवधि में दूध का वैश्विक उत्पादन 1.8% के और सबसे बढ़ा है। सच तो यह है कि दूध के उत्पादन में जो वृद्धि हुई है उसके 50% से ज्यादा भारत, पाकिस्तान और दक्षिण एशियाई देशों से आया है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">सालाना 4.6% की अनुमानित वृद्धि दर से भारत 2047 तक 63 करोड़ टन के स्तर को हासिल कर सकता है। उस समय दूध का वैश्विक उत्पादन 135 से 140 करोड़ टन रहने का अनुमान है। इस तरह विश्व के दूध उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी 45% होगी।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">हालांकि अन्य उद्योगों की तरह डेयरी और पशुपालन उद्योग के सामने भी चुनौतियां हैं। अगले 25 वर्षों (2047 तक) में 63 करोड़ टन दूध उत्पादन के लक्ष्य को हासिल करने के लिए भारत को तत्काल निर्यात के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धी क्षमता विकसित करने की आवश्यकता है। 2047 तक देश में 10 करोड़ टन सरप्लस दूध उपलब्ध होगा जिससे निर्यात के काफी अवसर निकलेंगे। अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बिक्री के नए बाजार नहीं तलाशे गए तो किसानों को उचित कीमत नहीं मिल पाएगी और वह डेयरी बिज़नेस को अपनाने के प्रति हतोत्साहित होंगे।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अगले 2 वर्षों के दौरान भारत के डेयरी सेक्टर को अपनी स्थिति मजबूत करने और नई दिशाएं तलाशने की आवश्यकता है। डेयरी और पशुपालन को नई पीढ़ी के डेयरी किसानों के सामने आर्थिक रूप से मुनाफे वाले सेक्टर के रूप में रखा जाना चाहिए। देश के नेतृत्व को इस क्षेत्र की कमजोरियों के साथ संभावनाओं को भी समझना पड़ेगा। इसलिए हमारे प्रमुख लक्ष्यों में एक राजनीतिक नेतृत्व और नीति निर्माताओं को इस लिहाज से संवेदनशील बनाने की जरूरत है। देश की जीडीपी में डेयरी सेक्टर जो योगदान कर रहा है उसी अनुपात में इसके लिए बजट आवंटन भी होना चाहिए। इसके साथ साथ हमें 2050 में देश के 165 करोड़ लोगों की खाद्य सुरक्षा भी सुनिश्चित करने की दिशा में काम करना चाहिए।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">हमारे सामने भारत को विश्व की डेयरी के रूप में स्थापित करने का मौका है। चाहे वह कोऑपरेटिव सेक्टर के कामकाज का तरीका हो, उनके मॉडल को लागू करना हो, विशेषज्ञता का इस्तेमाल हो या फिर नई मैन्युफैक्चरिंग टेक्नोलॉजी अपनाने की बात हो, हमें अपने आप को इस तरह तैयार करने की जरूरत है कि विश्व डेयरी क्षेत्र में हर समाधान के लिए भारत की ओर देखे। हमारा लक्ष्य सिर्फ सबसे बड़ा उत्पादक बनना नहीं होना चाहिए, बल्कि भारत और विश्व के लोगों के लिए सेहत और पोषण भी सुनिश्चित करना होना चाहिए। इससे भारत के डेयरी किसान की संपन्नता की लगातार बढ़ती रहेगी।</span></p>
<p><strong><em>(लेखक गुजरात कोआपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन (जीसीएमएमएफ), अमूल के&nbsp; मैनेजिंग डायरेक्टर और इंडियन डेयरी एसोसिएशन के प्रेसिडेंट हैं)</em></strong></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/01/image_750x500_63ba79738e283.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ विश्व की डेयरी बन सकता है भारत ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[आर्गनाइज्ड सेक्टर में तब्दील होता कृषि क्षेत्र]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/agriculture-is-turning-into-a-formal-sector.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 07 Jan 2023 07:24:51 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/agriculture-is-turning-into-a-formal-sector.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>देश का कृषि क्षेत्र एक स्लो चेंज (धीमे लेकिन सतत बदलाव) के दौर में है। कृषि क्षेत्र अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा निजी क्षेत्र है। सरकार के अलग-अलग आंकड़ों के मुताबिक 12 से 14 करोड़ जोत के मालिक छोटे-मझोले और बड़े किसान इस निजी क्षेत्र को चलाते हैं। सरकार की नीति अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों को असंगठित (अनआर्गनाइज्ड) से संगठित (आर्गनाइज्ड) में तब्दील करने की है। गुड्स एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) और नोटबंदी के बाद इसमें तेजी आई है। छोटे और असंगठित कारोबार सिमट रहे हैं और बड़े यानी आर्गनाइज्ड सेक्टर का दायरा तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन कृषि क्षेत्र में इसका स्वरूप अलग है। जोत के छोटे आकार और मैन्यूफैक्चरिंग व सर्विस सेक्टर में रोजगार के सीमित अवसरों के चलते कृषि क्षेत्र पर निर्भर लोगों की संख्या में कोई बड़ा बदलाव बहुत जल्द आने वाला नहीं है। लेकिन जो बदलाव हो रहा है, वह है सरकार की भूमिका का धीरे-धीरे कम होते जाना और निजी क्षेत्र का बढ़ते जाना।<br />बात ढांचागत सुविधाओं से शुरू की जा सकती है। किसानों की आर्थिक स्थिति में बेहतरी के लिए पहली जरूरत सिंचाई सुविधाओं का विकास है। पिछले कुछ बरसों में सिंचाई की कोई बड़ी परियोजना शुरू नहीं हुई है। हां, सिंचाई के लिए उपयोग होने वाले पानी की एफिसिएंसी कैसे बढ़े इस पर कुछ काम हुआ है। यानी सरकारों ने सिंचाई सुविधाओं पर निवेश बहुत कम कर दिया है। जहां तक हर बूंद से अधिक उत्पादन की बात है, तो यह एक महंगा विकल्प है। इसमें नई तकनीक का इस्तेमाल कर ड्रिप या स्प्रिंकलर सिंचाई सुविधाओं का उपयोग होता है। इन सुविधाओं के लिए केंद्र और राज्य सरकारें सब्सिडी देती हैं ताकि किसान पर आर्थिक बोझ कम हो सके। यानी सरकार खुद इस काम को नहीं कर किसान और कंपनियों पर छोड़ रही है। इसके साथ ही सिंचाई उपकरणों का निजी उद्योग तेजी से बढ़ रहा है।<br />कृषि शोध दूसरा अहम हिस्सा है जो कृषि विकास के लिए जरूरी है। लेकिन पिछले कई वर्षों में इसके लिए आवंटित राशि में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं हुई है। चालू वित्त वर्ष का भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) का बजट पिछले वित्त वर्ष के बराबर ही था। इसका अधिकांश हिस्सा वेतन और दूसरे व्यय में जाता है, रिसर्च के लिए संसाधन बहुत कम रह जाते हैं। नया शोध कारपोरेट क्षेत्र से आ रहा है। इसकी वजह से नई किस्मों के बीज निजी क्षेत्र से आएंगे और किसानों को लिए उत्पादन लागत बढ़ेगी।<br />गेहूं और धान की बड़ी खाद्यान्न फसलों में सामान्य बीज प्रजातियां अभी सरकारी क्षेत्र से आ रही हैं। लेकिन धान की हाइब्रिड किस्म में निजी क्षेत्र का दबदबा है। इनके अलावा बाकी फसलों की हाइब्रिड किस्में निजी क्षेत्र से ही आ रही हैं। यानी यहां से सरकार ने अपने हाथ धीरे-धीरे खींच लिए हैं जिसके चलते बेहतर गुणवत्ता के बीज के लिए किसान को अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है। इसी के जरिये एक संगठित बीज उद्योग खड़ा हो रहा है। राष्ट्रीय बीज निगम, स्टेट फार्म कारपोरेशन ऑफ इंडिया, राज्यों के बीज निगम और सरकारी विश्वविद्यालयों के जरिये बीज की उपलब्धता का दायरा कम हो रहा है। यह आने वाले दिनों में और अधिक तेजी से कम होगा। सरकारें बीज पर सब्सिडी देने की योजनाएं जरूर चला रही हैं। राज्य सरकारें कई बार बीज किट देती हैं। लेकिन इस तरह दिए गए बीज की गुणवत्ता को लेकर अक्सर सवाल उठते हैं। 1970 के दशक में निजी क्षेत्र ने कपास जैसी फसलों का बीज मल्टीप्लाई कर बेचना शुरू किया और उसके बाद 1980 और 1990 के दशक में इन कंपनियों ने खुद के ब्रीडिंग प्रोग्राम के जरिये बीज उत्पादन कर बाजार खड़ा किया। वहीं करीब 25 साल पहले बहुराष्ट्रीय कंपनियों की भी एंट्री इस बाजार में हो गई और अब देश के निजी क्षेत्र की बीज कंपनियों का कारोबार करीब 15 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।<br />विपणन ढांचागत सुविधाओं को कृषि विकास और किसानों की बेहतर आमदनी के लिए महत्वपूर्ण माना गया और सातवें व आठवें दशक में देश भर में मंडियों व सरकारी भंडारण सुविधाओं पर सरकारों ने तेजी से काम किया। लेकिन अब सरकार इस ढांचागत सुविधा को कृषि क्षेत्र के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानते हुए किसी बड़े आवंटन की कोशिश करती नहीं दिखती है। हालांकि यहां परोक्ष रूप से काम करते हुए जरूर दिखना चाहती है। इसके लिए सरकार ने एक लाख करोड़ रुपये का नेशनल एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर फंड बनाया है। लेकिन यह कोई ऐसा फंड नहीं है जिसका उपयोग ढांचागत सुविधाओं के लिए सीधे होना है। सरकार रियायती कर्ज के लिए सब्सिडी देगी। यानी सरकार खुद ढांचागत सुविधाएं बनाने की बजाय संस्थाओं को इसके लिए सस्ता कर्ज देगी। किसी बड़ी ढांचागत सुविधा इसके तहत बनने की संभावना नहीं है क्योंकि कर्ज की सीमा बहुत बड़ी नहीं है। लेकिन सरकार ने निजी क्षेत्र के साथ दीर्घकालिक समझौते किये हैं जिसके तहत निजी क्षेत्र की बड़ी कंपनियों ने आधुनिक भंडारण सुविधाएं विकसित की हैं और लगातार इसकी क्षमता बढ़ा रही हैं। यानी यहां भी संगठित क्षेत्र का स्वरूप बढ़ रहा है।<br />टेक्नोलॉजी का उपयोग कृषि में तेजी से बढ़ रहा है। यह फसल उत्पादन प्रक्रिया से लेकर जरूरी आंकड़े जुटाने, वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता, विपणन और उत्पादों के बाजार व वैश्विक बाजार तक पहुंचने और फसल के लिए जरूरी उर्वर तत्वों समेत हर क्षेत्र में तेजी से अपनी जगह बना रही है। प्रिसिजन फार्मिंग का दुनिया के विकसित देशों में चलन बढ़ रहा है। यह लागत को कम करने से लेकर श्रम के कम उपयोग और बेहतर उत्पादकता व गुणवत्ता जैसे नतीजे हासिल करने में मददगार साबित हो रही है।<br />हमारे देश में भी इस दिशा में काम तो हो रहा है लेकिन अधिकांश निजी क्षेत्र में है। सरकारी संस्थानों ने इंटरनेट ऑफ थिंग्स और आईटी प्लेटफॉर्म के उपयोग जैसे प्रोजेक्ट तो शुरू किये हैं लेकिन इनके नतीजे आने में समय लगेगा। इनका व्यावहारिक उपयोग कब और कैसे होगा उसके बारे में अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी। वहीं निजी क्षेत्र की कंपनियां और खासतौर से भारतीय कृषि क्षेत्र में तेजी से कारोबार बढ़ा रही बड़ी घरेलू कंपनियां और दुनिया की बड़ी एग्रीकल्चर बिजनेस करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियां इस दिशा में तेजी से काम कर रही हैं। यही वजह है कि सरकार ने भी एग्री स्टैक और फार्मर्स आईडी जैसे तमाम प्रोजेक्ट के लिए घरेलू और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ करीब दस समझौते किये हैं। यह इस बात का संकेत है कि सरकार व सरकारी संस्थानों की भूमिका कम होगी और निजी क्षेत्र की बढ़ेगी।<br />किसानों के स्तर पर भी आर्गनाइज्ड सेक्टर बनाने की कवायद है और उसके लिए एफपीओ बनाने पर सरकार का जोर है। सरकार ने 10 हजार एफपीओ बनाने का लक्ष्य रखा है। कोआपरेटिव्स का दायरा बढ़ाने पर फोकस किया जा रहा है और प्राइमरी कोआपरेटिव को मल्टी फंक्शनल सोसायटी में बदलने की योजना है। एफपीओ और कोआपरेटिव के विकल्प किसानों के लिए कितने फायदेमंद हैं, इसकी समीक्षा भी किया जाना जरूरी है।<br />जहां तक अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र की भूमिका की बात है तो पिछले तीन साल से वह बेहतर स्थिति में है। कोरोना के समय जहां कृषि क्षेत्र के बेहतर उत्पादन ने अर्थव्यवस्था को सहारा दिया, वहीं सरकारी योजनाओं के लिए खाद्यान्न की उपलब्धता भी इसके चलते ही संभव हो सकी। चालू साल में कृषि क्षेत्र के विकास के बेहतर आंकड़ों के चलते ही अर्थव्यवस्था सात फीसदी की वृद्धि दर के करीब है। चालू वित्त वर्ष के पहले छह माह में कृषि क्षेत्र की विकास दर 4.5 फीसदी से अधिक बनी हुई है। लगातार चार साल सामान्य मानसून ने इसमें बड़ी मदद की है। वैश्विक बाजार में तेल और उर्वरकों की कीमतों में आई भारी तेजी के चलते सरकार को उर्वरकों पर सब्सिडी में भारी बढ़ोतरी करनी पड़ी। इसके चलते चालू वित्त वर्ष में उर्वरक सब्सिडी 2.25 लाख करोड़ रुपये से अधिक रहने का अनुमान है। कृषि उत्पादन की बेहतर स्थिति के चलते ही भारत महंगाई पर काबू पाने में सफल हो रहा है। हालांकि खाद्य तेलों के आयात पर 20 अरब डॉलर खर्च करना पड़ रहा है, जिसे नीतियों में ढील के रूप में देखा जा सकता है।<br />इन सबके बीच सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार कृषि क्षेत्र में कई सारे कदम उठाती दिखती तो है लेकिन उसके पास कोई स्पष्ट नीतिगत एजेंडा नहीं है। अमेरिका जैसा देश हर पांच साल में एक बार नई कृषि नीति लेकर आता है, लेकिन हम जरूरत पड़ने पर फैसला लेकर आगे बढ़ने की नीति पर ही अमल कर रहे हैं। जरूरी है कि एक समग्र कृषि नीति बने जिसमें उत्पादन से लेकर विपणन तक के सभी पक्षों की बात हो, घरेलू बाजार और वैश्विक बाजार से जुड़े आयात-निर्यात के मुद्दों पर स्पष्टता हो, बीज से लेकर टेक्नोलॉजी और वित्तीय सुविधाओं का एक साफ खाका हो और भू-स्वामित्व जोत के रिकॉर्ड से लेकर डिजिटलाइजेशन के भावी स्वरूप का दृष्टिकोण हो जो किसानों को आर्थिक रूप से अधिक सक्षम इकाई रूप में स्थापित कर सके। सुधारों को लेकर भी बात हो, लेकिन लगता है कि सरकार 2020 में लाये गये तीन नये कृषि कानूनों के विरोध और उनकी वापसी से पैदा हुई नीतिगत जड़ता को तोड़ना नहीं चाहती है। इसलिए अपनी भूमिका को सीमित करने की नीति पर धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है।<br />सवाल कृषि क्षेत्र के सबसे बड़े भागीदार, किसानों के प्रतिनिधि संगठनों और उनके नेतृत्व पर भी है। लगता है कि वे अभी तक एमएसपी और कर्ज माफी जैसे मुद्दों पर ही अटके हुए हैं। कृषि क्षेत्र में जो बड़ा बदलाव आ रहा है उस पर उनकी समझ बहुत साफ नहीं दिखती है। बेहतर होगा कि किसान संगठन और उनके पदाधिकारी इस बदलाव को समझकर इस मोर्चे पर भी अपना पक्ष साफ करें या किसान हित के लिए जरूरी बातों को लेकर नीतिगत फैसलों में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करें। यह तभी संभव है जब सरकार और किसान प्रतिनिधियों के बीच संवाद शुरू हो, जो फिलहाल दिख नहीं रहा है। बदलाव हो रहा है और यह जारी रहेगा, लेकिन अगर इसमें सभी हितधारकों की भागीदारी रहेगी तो इस बदलाव में किसानों के हितों को सुरक्षित रखा जा सकेगा।</p>
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<div class="adL"></div> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ आर्गनाइज्ड सेक्टर में तब्दील होता कृषि क्षेत्र ]]></media:description>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    <item>
        <title><![CDATA[कोऑपरेटिव के जरिए खाद्य प्रणाली प्रबंधन]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/food-system-management-through-cooperatives.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 06 Jan 2023 11:08:24 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/food-system-management-through-cooperatives.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p dir="ltr"><span>आज दुनिया के अनेक देशों में खाद्य संकट सबसे बड़ा खतरा बन गया है। रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध के कारण गेहूं- चावल जैसी रोजाना खाई जाने वाली चीजों और उर्वरकों की सप्लाई बाधित हुई, लेकिन इससे पहले ही विश्व में भूख की समस्या दूर करने के सस्टेनेबल डेवलपमेंट लक्ष्य (एसडीजी) की दिशा में प्रगति रुक गई थी। दुनिया में भीषण खाद्य असुरक्षा से जूझने वाले सबसे अधिक एशिया और प्रशांत क्षेत्र में हैं। कोविड-19 से पहले की तुलना में इनकी संख्या 3 गुना हो गई है। महामारी के अलावा जलवायु से संबंधित आपदाओं और मैक्रोइकोनॉमिक दबाव के चलते ऐसा हुआ है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार कोविड-19 महामारी के कारण दुनिया में गरीबी कम करने के लक्ष्य को बड़ा आघात पहुंचा है और अब खाद्य पदार्थों तथा ऊर्जा की बढ़ती कीमतों के साथ जलवायु के कारण होने वाली आपदाओं और युद्ध ने स्थिति में सुधार को ठहरा दिया है।</span></p>
<p dir="ltr"><span>भारत इन प्राकृतिक और मानव जनित समस्याओं से अछूता नहीं है। खाद्य सुरक्षा के मोर्चे पर संतुष्ट हो जाने की कोई गुंजाइश भी नहीं है। 2022 के ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत 121 देशों की सूची में 107 में स्थान पर है। बाढ़, सूखा, बीमारी और अन्य जलवायु प्रभावों के कारण यह संकट और बढ़ सकता है, क्योंकि इनकी वजह से खाद्य उत्पादन कम होगा और आजीविका के साधन भी प्रभावित होंगे। इससे खाद्य संकट और बढ़ेगा तथा जलवायु से प्रभावित माइग्रेशन में भी इजाफा होगा। भारत में दुनिया की लगभग 20% आबादी रहती है। इतनी बड़ी आबादी को निरंतर खिलाने के लिए कार्यक्रम तैयार करना और उन्हें लागू करना देश की सुरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण है।</span></p>
<p dir="ltr"><span>खाद्य पदार्थों का होने वाला नुकसान और उनकी बर्बादी पहले से कमजोर खाद्य इकोसिस्टम को और कमजोर बनाता है। अनुमान है कि भारत में जितना खाद्य उत्पादन होता है उसका लगभग 40% सप्लाई चेन अथवा उपभोक्ता के स्तर पर नष्ट या बर्बाद हो जाता है। खाद्य पदार्थों का नुकसान और उनकी बर्बादी श्रम, पूंजी, पानी, ऊर्जा, जमीन तथा अन्य संसाधनों की भी बर्बादी है क्योंकि खाद्य पदार्थों के उत्पादन में इन संसाधनों का इस्तेमाल होता है। यह सस्टेनेबिलिटी के लिए खतरा है। खाद्य उत्पादन और खपत की श्रृंखला में नुकसान और बर्बादी को कम करना बड़े बिजनेस के लिए भी अवसर पैदा करता है।</span></p>
<p dir="ltr"><span>इस संकट का कोई सरल समाधान नहीं है, लेकिन आगे बढ़ने की राह स्पष्ट दिखाई दे रही है। मेरा दृढ़ मानना है कि ऐसी कोई भी व्यवस्था जिसमें संसाधनों के इस्तेमाल की क्षमता से समझौता किया गया हो, वह राष्ट्रीय हित के खिलाफ है। उसे ना तो सहन किया जाना चाहिए ना ही उसे आदर्श बताया जाना चाहिए। खाद्य सुरक्षा और सस्टेनेबिलिटी के लिए भारत को नए तरीकों की जरूरत है। सस्टेनेबल खाद्य सुरक्षा हासिल करने के लिए खाद्य उत्पादन, सप्लाई और उपभोक्ता श्रृंखला, हर बिंदु पर बड़े बदलावकारी कदमों की जरूरत है। हमें ऐसे इनोवेटिव सिस्टम की आवश्यकता है जो प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करने के साथ उन्हें बढ़ा सके, इसके साथ उत्पादकता में भी इजाफा कर सके।</span></p>
<p dir="ltr"><span>इसके लिए एक समग्र नजरिया अपनाने की जरूरत है जो घरेलू और पारंपरिक ज्ञान पर आधारित हो। साथ ही जिसमें कोऑपरेटिव जैसे ही कम्युनिटी आधारित संस्थानों के महत्व और उनकी केंद्रीयता को स्वीकार किया गया हो। मिट्टी की क्वालिटी सुधारने, जैव विविधता को बचाने, विपरीत मौसम के प्रति फसलों की क्षमता और उत्पादकता सुधारने और आजीविका के क्षेत्र में किसानों को उनके अपने कोऑपरेटिव के माध्यम से सक्रिय और प्रभावी तरीके से जोड़ना पड़ेगा। कृषि उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ इकोसिस्टम को दोबारा खड़ा करने के लिए हमें प्रकृति आधारित समाधान ही तलाशने होंगे।</span></p>
<p dir="ltr"><span>कृषि क्षेत्र को मदद और खाद्य सुरक्षा कार्यक्रमों के लिए सरकार पर भारी वित्तीय और गवर्नेंस का बोझ आता है। हमारे यहां कोऑपरेटिव की जड़ें काफी मजबूत हैं। मेरे विचार से सरकार को खाद्य उत्पादन और खाद्य सुरक्षा प्रबंधन से निकल जाना चाहिए और इसकी जिम्मेदारी किसान कोऑपरेटिव को सौंप देनी चाहिए। सरकार को यह बात स्वीकार करनी चाहिए कि कोऑपरेटिव खाद्य सुरक्षा, रोजगार, गरीबी कम करने और वित्तीय समायोजन जैसे कार्यों के लिए सबसे योग्य संस्थान हैं। वह इन क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान कर सकते हैं।</span></p>
<p dir="ltr"><span>भारत की सबसे बड़ी और सबसे महत्वपूर्ण ताकत यहां के लोगों में निहित है, खासकर यहां के लाखों किसान परिवारों में। किसानों की ताकत को प्रोफेशनल मैनेजमेंट के साथ जोड़कर भारत किसी भी लक्ष्य को हासिल कर सकता है। मेरे लिए यह देखना बड़ा कष्टप्रद है कि जो किसान खाद्य उत्पादन में सक्षम हैं, वह अपने परिवार को खिलाने के लिए सरकार के राहत कार्यक्रमों पर निर्भर हैं। भारतीय संस्कृति में दूसरों की दी गई मदद पर जीवन बिताने को अच्छा नहीं माना गया है। इसे किसी भी व्यक्ति की क्षमता और उसकी प्रतिष्ठा पर कलंक माना गया है। बिना मर्यादा के व्यक्ति आत्मविश्वास खो देता है और समाज तथा देश के लिए बोझ बन जाता है।</span></p>
<p dir="ltr"><span>सच तो यह है कि हर भारतीय को इतना सक्षम बनाना संभव है कि वह अपने परिवार को खिलाने के लिए पर्याप्त भोजन पैदा कर सकें और सम्मान के साथ जिंदगी जी सके। मेरा सुझाव है कि सरकार उचित नीतियों और इंसेंटिव के माध्यम से किसानों को कोऑपरेटिव के तौर पर संगठित करने में मदद करे। इसके अलावा देश के हर गांव को आत्मनिर्भर सहकार ग्राम की दिशा में बढ़ने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।</span></p>
<p dir="ltr"><span>&lsquo;सहकार ग्राम&rsquo; की अवधारणा कृषि विकास और खाद्य प्रबंधन के गुरुत्व बल को बदलकर गांवों और किसानों तक ले जाने से जुड़ी है। किसानों को अपने प्राकृतिक और आर्थिक संसाधनों की पूलिंग करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए ताकि उन संसाधनों का प्रभावी और सस्टेनेबल इस्तेमाल हो सके, उन्हें संरक्षित रखा जा सके। जमीन, पानी और मवेशी जैसे संसाधनों का तार्किक और सक्षम प्रबंधन यह सुनिश्चित करेगा कि कोई बर्बादी ना हो और रासायनिक इनपुट का प्रयोग तभी हो जब दूसरा कोई विकल्प ना रहे।</span></p>
<p dir="ltr"><span>मेरा यह सुझाव भी है कि सरकार को नेशनल कोऑपरेटिव फूड ग्रिड (एनसीएफजी) के गठन की दिशा में कदम बढ़ाना चाहिए। देश के हर गांव में एक कृषि कोऑपरेटिव हो जो सहकारिता के सिद्धांतों पर समस्त आर्थिक गतिविधियों का संचालन और प्रबंधन करे। इससे उत्पादन की लागत कम होगी और उत्पादकता बढ़ेगी। ग्राम स्तर के हर कोऑपरेटिव के पास कृषि से जुड़ी मशीनरी और मवेशी प्रबंधन केंद्र होने चाहिए।</span></p>
<p dir="ltr"><span>इस तरह के दो या तीन ग्राम स्तरीय कोऑपरेटिव को मिलकर एक बहुउद्देशीय ग्राम कोऑपरेटिव सोसायटी (एमपीवीसीएस) को प्रमोट करना चाहिए जो जल्दी नष्ट होने वाले और अन्य उपज के भंडारण, उनकी छंटाई, ग्रेडिंग, पैकेजिंग और ट्रेडिंग सुविधाओं का ख्याल रखे। यह बहुउद्देशीय कोऑपरेटिव सोसायटी अपने सदस्यों को कर्ज की सुविधा देने में भी सक्षम होने चाहिए। इसके अलावा यह पर्यटन, उपभोक्ता, स्वास्थ्य और शिक्षा प्रशिक्षण केंद्र भी चलाएं। एमपीवीसीएस को सरकार की तरफ से चलाए जाने वाले खाद्य सुरक्षा कार्यक्रमों की एकमात्र एजेंसी बनाया जाना चाहिए।</span></p>
<p dir="ltr"><span>गांव में उपजाए जाने वाले अनाज का एक-एक दाना इन्हीं कोऑपरेटिव के जरिए एनसीएफजी तक पहुंचे। इससे खाद्य पदार्थों का नुकसान और उनकी बर्बादी पूरी तरह दूर हो जाएगी। ग्राम कोऑपरेटिव सदस्य किसानों की पूरी उपज का संग्रह करे और उसे एमपीवीसीएस तक ले जाए, जो उस सदस्य के खाते में सरकार की तरफ से तय की गई दर के मुताबिक तत्काल रकम का भुगतान करे। जिन फसलों के लिए सरकार ने कोई दर तय नहीं की है, उनके लिए किसानों को बाजार की सबसे अच्छी कीमत दी जा सकती है। अगर कोई सदस्य अपनी उपज तत्काल नहीं बेचना चाहता है तो वह कोऑपरेटिव को उसकी जानकारी दे सकता है। किसान के पास अपनी इच्छा के मुताबिक विकल्प चुनने, अपनी बात रखने और कीमत तय करने का अधिकार होना चाहिए। एमपीवीसीएस खाद्य सुरक्षा कार्यक्रमों के लिए अनाज का भंडारण भी कर सकता है। इसके लिए सरकारी एजेंसियां उन्हें उपयुक्त भुगतान कर सकती हैं।</span></p>
<p dir="ltr"><span>अगर पूरे देश में इस अवधारणा को लागू किया जाए तो कुल मिलाकर लगभग सात लाख ग्राम कृषि कोऑपरेटिव और लगभग 3.5 लाख बहुद्देशीय कोऑपरेटिव सोसायटी होंगी। नेशनल कोऑपरेटिव फूड ग्रिड का गठन ग्राम स्तरीय कोऑपरेटिव और एमपीवीसीएस के पूरे नेटवर्क को डिजिटल तरीके से जोड़कर किया जा सकता है। मेरा मानना है कि खाद्य उत्पादन की लागत घटाकर और खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम पर सरकारी खर्च में कटौती करके एनसीएफजी हर साल दो लाख करोड़ रुपए बचाने में मदद कर सकता है। एनसीएफजी से ग्रामीण इलाकों में बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा होंगे तथा इससे ग्रामीण विकास की नई लहर पैदा होगी।</span></p>
<p dir="ltr"><span>एनसीएफजी के पूरक के तौर पर एक डेडिकेटेड नेशनल रूरल एंड फार्म प्रोस्पेरिटी फंड (एनआरएफपीएफ) का गठन किया जा सकता है। यह फंड कोऑपरेटिव के मूल्यों पर आधारित आत्मनिर्भर भारत के आंदोलन के लिए वित्तीय मदद उपलब्ध करा सकता है। इनोवेटिव और रचनात्मक दृष्टिकोण अपनाकर मौजूदा बजटीय प्रावधानों में ही एनआरएफपीएफ और एनसीएफजी के लिए आवश्यक संसाधन जुटाए जा सकते हैं। अगर सरकार और कॉरपोरेट की तरफ से दी जाने वाली वित्तीय सहायता का उचित तरीके से इस्तेमाल किया जाए तो यह आर्थिक और सामाजिक कल्याण का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है। इस तरह देश के नागरिकों की प्रतिष्ठा और आत्मविश्वास भी अक्षुण्ण रहेगा।</span></p>
<p dir="ltr"><span>कृषि उत्पादन प्रणाली का प्रभावी प्रबंधन, खाद्य सुरक्षा और खाद्य आपूर्ति चयन का प्रबंधन, स्वच्छ और हरित मार्ग से ऊर्जा की सुरक्षा, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, जलवायु परिवर्तन के विपरीत प्रभावों को कम करना और सामाजिक समरसता की सुरक्षा को बरकरार रखना- आने वाले दिनों में ये देश की प्रमुख चुनौतियां होंगी। इन चुनौतियों के समाधान में कोऑपरेटिव की बड़ी भूमिका हो सकती है। मेरा अपना अनुभव मुझे यह कहने का भरोसा देता है कोऑपरेटिव इन अवसरों का लाभ उठाने का सबसे उपयुक्त संस्थानिक रूप है। यह भी कि अगर सच्चे कोऑपरेटिव मूल्यों पर आधारित उद्यमिता की पहल की जाए तो वह कभी विफल नहीं होगा, आर्थिक और बाजार परिस्थितियां चाहे जो हो।</span></p>
<p dir="ltr"><span>अपने अनुभवों से मैंने यह जाना है कि एक सक्षम और सदस्यों द्वारा चलाए जाने वाला कोऑपरेटिव कैसा चमत्कार कर सकता है। ऐसे कोऑपरेटिव के जरिए ही एक मनुष्य दूसरे मनुष्य का शोषण रोक सकता है। इसी से हर तरफ संपन्नता भी आएगी। विकसित भारत का मार्ग निश्चित रूप से इसके नागरिकों, गांवों, नदियों, खेतों, प्राकृतिक संसाधनों और इसके सहकारिता के मूल से होकर गुजरता है।</span></p>
<p dir="ltr"><em><strong>(लेखक सहकार भारती के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं)</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ कोऑपरेटिव के जरिए खाद्य प्रणाली प्रबंधन ]]></media:description>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[एफटीए, ग्रामीण भारत और किसान]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/ftas-rural-india-and-farmers.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 05 Jan 2023 11:16:10 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/ftas-rural-india-and-farmers.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत कई विकसित देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) के लिए बातचीत कर रहा है। यह भारत के नजरिए में बड़ा बदलाव दर्शाता है क्योंकि पहले भारत एफटीए करने में सावधानी पूर्वक कदम उठाता था। पहले भारत सरकार विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ) के व्यापार नियमों के विपरीत द्विपक्षीय व्यापार समझौते करने में झिझकती थी, जबकि अब वह झिझक खत्म हो गई है। इन समझौतों में कानूनी रूप से बाध्यकारी प्रावधान होते हैं। इसलिए अब भारत को अपने से काफी अधिक ताकतवर ट्रेडिंग पार्टनर की मांगों को स्वीकार करना पड़ेगा, जबकि पहले वह मजबूत बौद्धिक संपदा अधिकार और सस्टेनेबिलिटी चैप्टर जैसी मांगों का विरोध करता रहा है।<br />भारत जिन देशों के साथ बातचीत कर रहा है वहां ना तो ग्रामीण आबादी अधिक है ना ही छोटे किसान जिनकी भारत की तरह उन्हें चिंता करनी पड़े। 2011 की जनगणना के अनुसार 83.3 करोड़ भारतीय ग्रामीण इलाकों में रहते हैं। यह देश की कुल आबादी के दो-तिहाई से भी अधिक है। देश में किसानों की वास्तविक संख्या को लेकर बहस जरूर है, फिर भी 2011 की जनगणना के आधार पर कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय का दावा है कि भारत की 54.6% आबादी कृषि और इससे जुड़ी गतिविधियों पर निर्भर है। इसलिए व्यापार नीति में यह सुनिश्चित होना चाहिए कि मुक्त व्यापार समझौते से यहां के बहुसंख्य लोगों को नुकसान ना हो।<br />ऐसा कहा जा रहा है कि विदेशी बाजारों में भारत के कृषि उत्पादों की पहुंच बढ़ने से भारत के कृषि क्षेत्र को फायदा होगा। कृषि निर्यात नीति 2018 में इस आशय को स्पष्ट रूप से बताया गया है। हालांकि पॉलिसी में यह भी स्वीकार किया गया है कि बाजार में पहुंच का फायदा तभी मिलेगा जब उसके साथ इंफ्रास्ट्रक्चर और संस्थागत समर्थन हो, पैकेजिंग और ट्रांसपोर्ट जैसी सुविधाएं आंतरिक उत्पादन प्रणाली के साथ जुड़ें। पॉलिसी में यह भी माना गया है कि नॉन-टैरिफ बैरियर और सख्त क्वालिटी फाइटोसैनिटरी स्टैंडर्ड बाजार पहुंच कम करने अथवा रोकने के आम तरीके बनते जा रहे हैं। इसलिए सिर्फ व्यापार समझौते पर दस्तखत करने का मतलब यह नहीं कि छोटे किसानों और कृषि मजदूरों को उसका फायदा मिलने लगेगा। बल्कि इन छोटे किसानों के लिए संभावित लागत और फायदे का पहले ही आकलन किया जाना चाहिए। निर्यात के लिए कृषि उत्पादन के तौर-तरीके में बदलाव का पारिस्थितिकी और समाज पर क्या असर होगा, इसका मूल्यांकन भी किया जाना चाहिए।<br />इन सबके अतिरिक्त, समझौते में जो लिखा गया है उसकी मॉनिटरिंग की भी व्यवस्था होनी चाहिए। हाल में भारत ने जो मुक्त व्यापार समझौते किए हैं उनमें सबसे नया संयुक्त अरब अमीरात के साथ व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (सीईपीए) है। दोनों पक्षों ने 18 फरवरी 2022 को समझौते पर दस्तखत किए थे और यह 1 मई 2022 से लागू हुआ है। समझौते के चैप्टर 4 में कहा गया है कि जिन एसपीएस उपायों पर आपसी सहमति हुई है वह भारत और अमीरात दोनों पर लागू होंगे। लेकिन अब लगता है संयुक्त अरब अमीरात कई कीटनाशकों और फूड कमोडिटी के लिए यूरोपियन यूनियन के कीटनाशक से संबंधित 0.01 पीपीएम एमआरएल मानदंड को लागू कर रहा है। इससे भारत के कृषि निर्यात के कंसाइनमेंट खारिज हो सकते हैं।<br />इसी तरह ऑस्ट्रेलिया के साथ 2 अप्रैल 2022 को आर्थिक सहयोग एवं व्यापार समझौता (ईसीटीए) पर दस्तखत किए गए। ऑस्ट्रेलिया की संसद ने इसी साल 22 नवंबर को उसे स्वीकृति दी। ऑस्ट्रेलिया-भारत ईसीटीए 29 दिसंबर 2022 से लागू होगा। ग्रेन ट्रेड ऑस्ट्रेलिया (जीटीए) प्राइवेट लिमिटेड ने इस समझौते का स्वागत किया है। यह ऑस्ट्रेलिया में कमर्शियल अनाज उद्योग का फोकल प्वाइंट है। जीटीए ने कहा है कि नजदीकी, आबादी और भारतीय उपभोक्ताओं की बढ़ती क्रय शक्ति ऑस्ट्रेलिया के कृषि निर्यात के लिए नए अवसर खोलेगी, खासकर अनाज के लिए।<br />बाजार पहुंच के मामले में जीटीए ने ऑस्ट्रेलिया सरकार से आग्रह किया है कि वह टैरिफ मुक्त बाजार पहुंच की मांग करे। अगर ऐसा ना हो सका तो कम से कम ऑस्ट्रेलियाई अनाज के लिए टैरिफ मुक्त कोटा और मोस्ट फेवर्ड नेशन (एमएफएन) का दर्जा मांगे। ऑस्ट्रेलिया अपने यहां से दालें, वाइन और बागवानी उत्पादों का भी भारत को निर्यात बढ़ाना चाहता है। मुक्त व्यापार समझौते से ऑस्ट्रेलियाई भेड़ों के मांस और ऊल का निर्यात भी आसान हो जाएगा। इस समझौते से भारत के डेयरी सेक्टर को बाहर रखा गया है। हालांकि भारत ने मवेशियों को किसी भी तरह की टैरिफ में कमी की प्रतिबद्धता के &lsquo;एक्सक्लूजन लिस्ट&rsquo; में रखा है। ऑस्ट्रेलिया ईसीटीए के इस रूप को अंतरिम मान रहा है और उसे उम्मीद है कि भविष्य में व्यापक समझौते पर सहमति बनेगी।<br />भारत कनाडा सरकार के साथ भी व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (सीईपीए) पर बातचीत कर रहा है। कनाडा से भारत को 2021 में कृषि उत्पादों में सबसे अधिक छिलका युक्त मसूर दाल का निर्यात हुआ। कनाडा ने इनका 51.04 करोड़ कनाडाई डॉलर का निर्यात किया। कनाडियन एग्री फूड ट्रेड अलायंस (सीएएफटीए-काफ्टा) कृषि और एग्री-फूड उत्पादों के लिए भारत को एक बड़े निर्यात बाजार के रूप में देखता है। अभी भारत कनाडा से मसूर के आयात पर 30% टैरिफ लगाता है। काफ्टा को उम्मीद है कि सीईपीए से टैरिफ खत्म करने में मदद मिलेगी। इससे 5 वर्षों में कनाडा से इनका निर्यात 147% बढ़ सकता है। जहां तक भारत की बात है, तो भारत सरकार ने कह रखा है कि देश में दालों का उत्पादन बढ़ाया जाएगा ताकि आयात पर निर्भरता कम हो सके।<br />यहां एक और महत्वपूर्ण एफटीए का उल्लेख करने की जरूरत है, और वह है इंग्लैंड के साथ। इंग्लैंड के नए प्रधानमंत्री ऋषि सुनक के साथ अभी यह मुद्दा बातचीत की मेज पर है। ब्रेक्जिट के बाद इंग्लैंड का व्यापार बढ़ाने के लिए उनसे पहले के प्रधानमंत्रियों ने भी इसे समान प्राथमिकता दी थी। यूकेआईबीसी चुनिंदा सेक्टर में ही टैरिफ घटाने का समर्थन करती है। इनमें अल्कोहलिक स्पिरिट, खाद्य और हेल्थ केयर सेक्टर शामिल हैं। 5 सितंबर तक भारत और इंग्लैंड के ट्रेड वार्ताकार प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते के 26 चैप्टर में से 19 पर बातचीत पूरी कर चुके थे। बौद्धिक संपदा और अल्कोहल उद्योग को शामिल करना अभी विवाद का बिंदु बना हुआ है।<br />यूरोपियन यूनियन के साथ मुक्त व्यापार समझौते पर 2007 से बातचीत चल रही थी। उसे 2013 में रोक दिया गया था, लेकिन अब फिर उसे रिवाइव किया जा रहा है। इसकी तीसरे दौर की वार्ता नई दिल्ली में 28 नवंबर से 9 दिसंबर 2022 तक हुई। इस एफटीए से यूरोपियन यूनियन में दी जाने वाली कृषि सब्सिडी को लेकर भारत की दीर्घकालिक चिंताओं का कोई समाधान नहीं होगा। दूसरी तरफ यह भारत के छोटे डेयरी उत्पादकों के लिए जोखिम भरा हो सकता है। इसके अलावा बौद्धिक संपदा को लेकर जो मांगे हैं, जैसे यूपीओवी-1991 को स्वीकार करना, उनसे किसानों के लिए पीपीवी एंड एफआर एक्ट के तहत बीज चुनने की आजादी जोखिम में पड़ सकती है। यूरोपियन यूनियन ज्योग्राफिकल इंडिकेशन (जीआई) पर अलग समझौता चाहता है जबकि भारत यूरोपियन यूनियन के कृषि उत्पादों, जैसे इटली से आने वाले हैम को पहले ही जीआई सुरक्षा दे रहा है। जीआई पर यूरोपियन यूनियन और भारत के बीच विशेष समझौते के लिए बातचीत ब्रसेल्स में 10 से 12 अक्टूबर तक हुई। तीसरे दौर की वार्ता 12 और 13 दिसंबर को 2022 को हुई।<br />&lsquo;ट्रांसपेरेंसी पॉलिसी इन डीजी ट्रेड&rsquo; के कारण यूरोपीय कमीशन मुक्त व्यापार समझौते के लिए समय-समय पर वैध टेक्स्ट और बातचीत के सुझाव की सिफारिशें जारी करता रहता है, ताकि सभी संबंधित पक्षों को आसानी हो। भारत और यूरोपियन यूनियन के बीच एफटीए के लिए यूनियन ने जो टेक्स्ट जारी किया है उसे यहां पढ़ा जा सकता है<span>&nbsp;</span><a href="https://policy.trade.ec.europa.eu/eu-trade-relationships-country-and-region/countries-and-regions/india/eu-india-agreement/documents_en" target="_blank" data-saferedirecturl="https://www.google.com/url?q=https://policy.trade.ec.europa.eu/eu-trade-relationships-country-and-region/countries-and-regions/india/eu-india-agreement/documents_en&amp;source=gmail&amp;ust=1672819009410000&amp;usg=AOvVaw3ErEnJp_MNHUEnFGe7A2Ba" rel="noopener">https://policy.trade.ec.<wbr />europa.eu/eu-trade-<wbr />relationships-country-and-<wbr />region/countries-and-regions/<wbr />india/eu-india-agreement/<wbr />documents_en</a><span>&nbsp;</span>&nbsp;लेकिन भारत के प्रस्ताव सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं।<br />मुक्त व्यापार समझौते में जाने की प्रक्रिया पर भी किसान समूहों समेत आम नागरिकों को ध्यान देने की जरूरत है। आमतौर पर इस तरह की बातचीत पारदर्शी नहीं होती और उनमें सभी पक्षों को शामिल भी नहीं किया जाता है। आधिकारिक बातचीत का ड्राफ्ट गोपनीय रहता है। अक्सर बड़े बिजनेस और सीआईआई जैसी कॉर्पोरेट बॉडी की सलाह ली जाती है। इस प्रक्रिया में किसान समूहों के साथ सलाह-मशविरा नहीं किया जाता है। संसद के दोनों सदनों में भी इस पर विस्तृत चर्चा नहीं होती। कृषि निर्यात नीति में राज्य सरकारों को अधिक से अधिक शामिल करने की बात कही गई है, लेकिन वास्तविकता यह है कि किसी भी एफटीए की वार्ता में उनकी सलाह ही नहीं ली जाती है। भारत के संविधान में अनेक विषय राज्यों की सूची अथवा समवर्ती सूची में हैं। इसके बावजूद राज्य सरकारों की सहभागिता बेहद सीमित होती है। इसलिए समझौते की शर्तों के अलावा एफटीए में जाने की प्रक्रिया को भी गंभीरता पूर्वक देखने की जरूरत है। खासकर किसान समूह और उन लोगों के लिए जो कृषि खाद्य प्रणाली में सस्टेनेबिलिटी को लेकर चिंतित हैं।<br />इनके अलावा भारत बहु-देशीय इंडो-पैसिफिक आर्थिक फ्रेमवर्क (आईपीईएफ) में भी शामिल है। यह समझौता पारंपरिक व्यापार और निवेश मुद्दों से इतर है। इसका प्रस्ताव अमेरिका लेकर आया था और वही इसे आगे बढ़ा रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने इसे लांच किया। इसमें इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के 14 देशों को एक साथ लाने की बात है ताकि इस क्षेत्र में चीन के प्रभाव को संतुलित किया जा सके। यह बातचीत भी गोपनीय तरीके से हो रही है ताकि अमेरिकी कॉरपोरेट हितों को आगे बढ़ाया जा सके। ईपीएफओ की पहली बातचीत ऑस्ट्रेलिया के ब्रिसबेन में 10 से 15 दिसंबर तक हुई। भारत ने फिलहाल अभी अपने आप को आईपीईएफ के ट्रेड पिलर से बाहर रखा है, लेकिन तीन अन्य महत्वपूर्ण पिलर मे वह शामिल है। इनमें सप्लाई चैन, क्लीन इकोनॉमी और फेयर इकोनॉमी शामिल हैं। इसका भारत की मैक्रोइकोनॉमिक पॉलिसी पर भी बड़ा प्रभाव होगा और घरेलू नीति के लिए जगह सीमित हो जाएगी।<br />हाल में हुए मुक्त व्यापार समझौतों और आने वाले दिनों में होने वाले ऐसे समझौतों का कृषि पर कई तरीके से प्रभाव पड़ेगा। नई पीढ़ी के मुक्त व्यापार समझौते में कई अलग तरह के मुद्दे भी शामिल किए गए हैं। उदाहरण के लिए, वित्तीय सेवाओं पर कई चैप्टर हैं जो भविष्य में ग्रामीण क्षेत्रों में दिए जाने वाले कर्ज को प्रभावित कर सकते हैं। एफटीए में व्यापार की मात्रा बढ़ाने की भी बात है। इसका मतलब है कि मैन्युफैक्चर्ड और कृषि उत्पादों का अधिक मात्रा में आयात किया जाएगा। इससे कृषि तथा उन घरेलू उद्योगों पर विपरीत प्रभाव पड़ने की आशंका है जिनमें बड़ी संख्या में श्रमिक कार्य करते हैं। यह खासकर एग्रो प्रोसेसिंग और डेयरी जैसे सेक्टर में देखने को मिल सकता है। दूसरी तरफ बड़े मानक बैरियर के चलते इस बात की संभावना कम ही है कि भारत अपने निर्यात को ज्यादा बढ़ाने में सक्षम होगा।<br />इनके अलावा यूरोपियन यूनियन, अमेरिका और इंग्लैंड इन एफटीए में सरकारी खरीद में उदारीकरण अपनाने को भी बढ़ावा दे रहे हैं। इससे सरकार की तरफ से की जाने वाली वस्तुओं और सेवाओं की खरीद, कंस्ट्रक्शन और अन्य सार्वजनिक कार्यों में बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को बोली लगाने का मौका मिल जाएगा। यह भारतीय रेलवे जैसे सेक्टर में दिख सकता है। सिद्धांत के तौर पर देखा जाए तो सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) में भी ऐसा हो सकता है। सरकारी खरीद में किसी भी तरह का उदारीकरण भारत की एमएसएमई, महिलाओं के नेतृत्व वाले छोटे बिजनेस, खादी और ग्रामीण उद्योग को प्रभावित कर सकते हैं। इन क्षेत्रों में करोड़ों की संख्या में लोग काम करते हैं।<br />अंत में, दवाओं, वैक्सीन और टेस्ट में विदेशी कंपनियों को पहुंच मिलना नकारात्मक हो सकता है। कोविड-19 महामारी के दौरान इसकी जरूरत काफी शिद्दत से महसूस की गई थी। इन मामलों में ट्रेड पार्टनर डब्ल्यूटीओ के ट्रिप्स प्लस मानकों के मुताबिक बौद्धिक संपदा अधिकार लागू करने की मांग करेंगे। इससे बहुराष्ट्रीय पेटेंट होल्डर कंपनियों को बाजार में अधिक अधिकार मिल जाएंगे। दूसरी तरफ, भारत की जेनेरिक मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के लिए टेक्नोलॉजी तक पहुंच कम हो जाएगी जिसका असर उनकी उत्पादन क्षमता पर होगा। इसका रोजगार पर तो विपरीत प्रभाव पड़ेगा ही, जेनेरिक दवाओं का उत्पादन कम होने के साथ दवाओं की कीमत भी बढ़ जाएगी।<br />अर्थशास्त्र के पारंपरिक सिद्धांत भले ही कहते हों कि व्यापार नीतियों को उदार बनाने से अर्थव्यवस्था को खोलने वाले देशों को फायदा होता है, लेकिन इसका कुछ देशों पर विपरीत प्रभाव भी पड़ सकता है, खासकर गरीबों पर। भारत के सामने विकास की चुनौतियां कुछ अलग तरह की हैं। जिन विकसित देशों के साथ भारत एफटीए कर रहा है उनके सामने यह चुनौतियां नहीं हैं। व्यापार में उदारीकरण अलग-अलग देशों और समूहों को अलग तरीके से प्रभावित करता है। कृषि नीति निर्माताओं और ट्रेड वार्ताकारों को पूरक नीतियों पर भी गौर करना चाहिए ताकि एफटीए से होने वाले विपरीत प्रभावों को कम किया जा सके, खासकर कमजोर वर्ग के लिए।</p>
<p><em><strong>(लेखिका नई दिल्ली में लीगल रिसर्चर और नीति विश्लेषक हैं। भारत के 1995 में डब्लूटीओ का सदस्य बनने के समय से वे व्यापार नियमों पर नजर रखती रही हैं। उनका फोकस समुदाय और संरक्षण पर रहा है)</strong></em></p>
<div class="adL"></div> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ एफटीए, ग्रामीण भारत और किसान ]]></media:description>
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	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[खाद्य पदार्थों के नुकसान और इनकी बर्बादी से बढ़ती खाद्य असुरक्षा ]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/food-losses-and-wastage-contribute-to-food-insecurity.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 04 Jan 2023 11:41:11 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/food-losses-and-wastage-contribute-to-food-insecurity.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p dir="ltr"><span>जैसे-जैसे हम उथल-पुथल भरे वर्ष 2022 को पार कर चुके हैं खाद्य सुरक्षा कई देशों में संकटपूर्ण स्थिति बनती जा रही है। कोविड-19 महामारी और उसके बाद उपजी परिस्थितियों के कारण बड़ी संख्या में लोग अल्पपोषित या कुपोषित हैं। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने ऐसे लोगों के आंकड़ों का आकलन किया है जिनका रोज का भोजन उनकी सामान्य गतिविधियों और स्वस्थ जीवन के लिए अपर्याप्त है। यह आंकड़े काफी चिंतित करने वाले हैं। विश्व की कुल आबादी में ऐसे लोगों का अनुपात 2019 में 8% था जो 2020 में 9.3% हो गया। 2021 में इनका अनुपात बढ़कर 9.8% हो गया। इसका मतलब यह है कि 2021 में करीब 82.8 करोड़ लोगों को पर्याप्त भोजन नहीं मिला और उन्हें भूखे रहना पड़ा।</span></p>
<p dir="ltr"><span>अफ्रीका के अनेक देशों में एक तिहाई से अधिक आबादी कुपोषण का शिकार है। भारत में भी गरीबों को ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। हालांकि विपरीत वैश्विक परिस्थितियों के बावजूद भारत में खाद्य महंगाई अपेक्षाकृत कम है। अक्टूबर 2022 में कोर खुदरा महंगाई दर (खाद्य और ईंधन को छोड़कर) 6% से अधिक थी। लेकिन विश्व स्तर पर खाद्य महंगाई के लिए जिम्मेदार कई कारकों का प्रभाव भारत में उतना अधिक नहीं था।</span></p>
<p dir="ltr"><span>आईएमएफ के अक्टूबर में प्रकाशित एक ब्लॉग में बताया गया कि ज्यादातर देशों में खाद्य महंगाई ऊंची रहने के चार प्रमुख कारण थे। ग्लोबल स्तर पर 2022 में इन सभी कारणों का प्रभाव रहा, लेकिन भारत में कई कारणों से इनका असर विपरीत रहाः-</span></p>
<p dir="ltr"><span>-ग्लोबल स्तर पर उपज एक प्रतिशत घटने से खाद्य कमोडिटी के दाम 8.5 प्रतिशत बढ़ जाते हैं। </span><span>यह भारत में भी दिखा जब रबी 2021-22 के मौसम में मार्च-अप्रैल 2022 के दौरान तापमान अधिक होने से गेहूं का उत्पादन प्रभावित हुआ।</span></p>
<p dir="ltr"><span>-अमेरिका का फेडरल रिजर्व ब्याज दर 1% बढ़ाता है तो खाद्य कमोडिटी के दाम एक तिमाही के बाद 13% कम हो जाते हैं।</span></p>
<p dir="ltr"><span>रिजर्व बैंक अप्रैल 2022 से रेपो दर (जिस ब्याज दर पर आरबीआई बैंकों को कर्ज देता है) 225 आधार अंक बढ़ा चुका है। यह फेडरल रिजर्व द्वारा की गई बढ़ोतरी से कम है जिसने इसी अवधि में ब्याज दर में 350 आधार अंकों की बढ़ोतरी की है, लेकिन खाद्य पदार्थों के दाम इस दौरान 13% नहीं घटे।</span></p>
<p dir="ltr"><span>-हाल में प्राकृतिक गैस के दाम बढ़ने से उर्वरक भी महंगे हुए हैं। उर्वरकों की कीमतें 1% बढ़ने से खाद्य कमोडिटी की कीमत 0.45% बढ़ जाती है। </span><span>हालांकि भारत में उर्वरक, खासकर यूरिया पर केंद्र सरकार काफी सब्सिडी देती है। वित्त वर्ष 2022-23 में कुल उर्वरक सब्सिडी 2.5 लाख करोड़ रुपए तक पहुंचने की संभावना है जबकि पिछले साल यह 1.6 लाख करोड़ रुपए थी।</span></p>
<p dir="ltr"><span>-कच्चा तेल 1% महंगा होने पर खाद्य कमोडिटी के दाम 0.2% बढ़ जाते हैं। </span><span>पश्चिम की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं और चीन में मंदी की आशंका के चलते कच्चा तेल हाल के दिनों में सस्ता हुआ है। 9 दिसंबर 2022 को ब्रेंट क्रूड की कीमत 76.10 डॉलर प्रति बैरल थी। यह इस साल इस के सबसे ऊंचे स्तर 123.70 डॉलर प्रति बैरल की तुलना में बहुत कम है।</span></p>
<p dir="ltr"><span>खाद्य पदार्थों की ऊंची कीमतों ने पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित किया है। खासकर रूस के हमले और काला सागर के बंदरगाहों से निर्यात बाधित होने के चलते यूक्रेन से गेहूं, मक्का और सनफ्लावर ऑयल का निर्यात रुकने के बाद। लेकिन किसी भी देश में खाद्य पदार्थों के नुकसान और उनकी बर्बादी पर नीति निर्माता पर्याप्त ध्यान नहीं देते हैं। यहां खाद्य पदार्थों के नुकसान का मतलब फसल की कटाई से लेकर थोक विक्रेता, प्रोसेसर और रिटेलर तक पूरी चेन में होने वाला नुकसान है। इस सप्लाई चेन के हर स्टेज में मात्रा (और कुछ हद तक क्वालिटी) का नुकसान होता है।</span></p>
<p dir="ltr"><span>उपभोक्ता जब खाद्य पदार्थों का नुकसान करता है तो उसे बर्बादी कहते हैं। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय ने वर्ष 2013-14 में आईसीएआर को खाद्य पदार्थों के नुकसान का आकलन करने का जिम्मा दिया था। सर्वे आधारित वह स्टडी सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ पोस्ट हार्वेस्ट इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी (सीफेक्ट) और इंडियन एग्रीकल्चरल स्टैटिसटिक्स रिसर्च इंस्टीट्यूट (आईएएसआरआई) ने की थी। नुकसान की वास्तविक मात्रा पर आधारित वह स्टडी फसलों, फिशरीज, दूध, पोल्ट्री, मीट, फल और सब्जियों पर की गई। उस स्टडी में उत्पाद के सूखने/नमी कम होने, किचन और खाने की मेज पर होने वाले नुकसान को नहीं जोड़ा गया। क्वालिटी और मूल्य के नुकसान, नाम अथवा प्रतिष्ठा को नुकसान, बीज की क्वालिटी को नुकसान आदि को भी नहीं जोड़ा गया क्योंकि इस तरह के नुकसान का मात्रा में आकलन नहीं किया जा सकता था।</span></p>
<p dir="ltr"><span>उस स्टडी में 92,651 करोड़ रुपए के खाद्य पदार्थों के नुकसान का आकलन किया गया। नीचे दिए गए टेबल में सप्लाई चेन में होने वाले नुकसान का ब्योरा दिया गया है। सप्लाई चेन में होने वाले नुकसान की जानकारी के बावजूद जन जागरूकता और सरकारी हस्तक्षेप जिस स्तर पर होना चाहिए वह नहीं दिखता है। बेहतर उत्पादकता वाले बीज, जलवायु के लिए प्रतिरोधी क्षमता वाले पौधों, पानी बचाने के लिए सिंचाई की बेहतर सुविधाएं और कोल्ड चेन इंफ्रास्ट्रक्चर पर सब्सिडी के लिए तो बड़े पैमाने पर काम हो रहा है, लेकिन खाद्य पदार्थों का नुकसान कम करने पर ज्यादा निवेश नहीं हो रहा है।</span></p>
<p dir="ltr"><span>अनेक राज्यों में एपीएमसी मौजूद नहीं है या उसका इंफ्रास्ट्रक्चर बहुत कमजोर है। जिन राज्यों में एपीएमसी अपेक्षाकृत मजबूत और बेहतर प्रबंधन वाला है वहां भी किसानों की उपज को नीलामी के फ्लोर पर पटक दिया जाता है। किसान अक्सर आपने भंडार से एपीएमसी तक उपज को बहुत ही खराब क्वालिटी के सेकंड हैंड गनी (टाट) बैग में लेकर जाते हैं। एपीएमसी में बिक्री के पहले बिंदु से आगे की जगह तक भी उन वस्तुओं को गनी बैग में ही ले जाया जाता है। बहुत कम एपीएमसी में उपज को सुखाने, उनकी छंटाई और ग्रेडिंग की सुविधा है। इस पूरी प्रक्रिया में न सिर्फ खाद्य पदार्थों का नुकसान होता है, बल्कि किसानों के साथ भी गलत हिसाब किया जाता है क्योंकि नीलामी से पहले उनकी उपज की टेस्टिंग का कोई वैज्ञानिक तरीका नहीं होता। उदाहरण के लिए, राजस्थान के एपीएमसी में किसान जो सरसों लेकर आते हैं उन्हें सिर्फ देख कर ही तय कर दिया जाता है कि उसमें तेल की मात्रा कितनी होगी। किसान के पास कमीशन एजेंट द्वारा इस तरह से तय की गई दर को स्वीकार करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होता है।</span></p>
<p dir="ltr"><span>ज्यादातर राज्यों में वेयरहाउसिंग की क्वालिटी भी बेहद खराब है। वेयरहाउसिंग (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) एक्ट 2007 लागू होने के बाद भी डब्लूडीआरए के पास इनका रजिस्ट्रेशन अभी तक आवश्यक नहीं किया गया है। बैंक भी रजिस्टर्ड वेयरहाउस में कमोडिटी रखने पर जोर नहीं देते हैं। बैंक उनके बदले जो कर्ज देते हैं, वह थर्ड पार्टी कोलेटरल के आधार पर होता है। इसका नतीजा यह है कि वेयरहाउसिंग के विकास के लिए एक दूरदर्शी रोड मैप का अभाव लगातार बना हुआ है। देश में अभी सिर्फ 3444 वेयरहाउस डब्लूडीआरए के पास रजिस्टर्ड हैं। भारत के सबसे एडवांस कृषि राज्य पंजाब में 27 रजिस्टर्ड वेयरहाउस हैं। इनमें से 24 सेंट्रल वेयरहाउसिंग कॉरपोरेशन (सीडब्ल्यूसी) के हैं। निजी स्वामित्व वाले सिर्फ तीन वेयरहाउस रजिस्टर्ड हैं।</span></p>
<p dir="ltr"><strong>खाद्य पदार्थों के नुकसान का अनुमान</strong></p>
<table width="244" style="width: 374px;">
<tbody>
<tr>
<td style="width: 178.333px;">
<p><strong><em>फसल /उत्पाद&nbsp;</em></strong></p>
</td>
<td style="width: 188.368px;">
<p><strong>&nbsp;नुकसान&nbsp; (%)</strong></p>
</td>
</tr>
<tr>
<td style="width: 178.333px;">
<p>&nbsp;चावल</p>
</td>
<td style="width: 188.368px;">
<p>5.5%</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td style="width: 178.333px;">
<p>&nbsp;गेहूं</p>
</td>
<td style="width: 188.368px;">
<p>4.9%</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td style="width: 178.333px;">
<p>&nbsp;मक्का</p>
</td>
<td style="width: 188.368px;">
<p>4.7%</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td style="width: 178.333px;">
<p>&nbsp;आलू</p>
</td>
<td style="width: 188.368px;">
<p>7.3%</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td style="width: 178.333px;">
<p>&nbsp;टमाटर</p>
</td>
<td style="width: 188.368px;">
<p>12.4%</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td style="width: 178.333px;">
<p>&nbsp;फूलगोभी</p>
</td>
<td style="width: 188.368px;">
<p>9.6%</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td style="width: 178.333px;">
<p>बंदगोभी</p>
</td>
<td style="width: 188.368px;">
<p>9.4%</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td style="width: 178.333px;">
<p>प्याज</p>
</td>
<td style="width: 188.368px;">
<p>8.2%</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td style="width: 178.333px;">
<p>सेब&nbsp;</p>
</td>
<td style="width: 188.368px;">
<p>10.4%</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td style="width: 178.333px;">
<p>&nbsp;अंगूर</p>
</td>
<td style="width: 188.368px;">
<p>8.6%</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td style="width: 178.333px;">
<p>&nbsp;केला</p>
</td>
<td style="width: 188.368px;">
<p>7.8%</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td style="width: 178.333px;">
<p>&nbsp;अंडा</p>
</td>
<td style="width: 188.368px;">
<p>7.2%</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td style="width: 178.333px;">
<p>&nbsp;मछली (समुद्री)</p>
</td>
<td style="width: 188.368px;">
<p>10.5%</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td style="width: 178.333px;">
<p>&nbsp;दूध</p>
</td>
<td style="width: 188.368px;">
<p>0.9%</p>
</td>
</tr>
<tr>
<td style="width: 178.333px;">
<p>मीट (भेड व बकरी)&nbsp;</p>
</td>
<td style="width: 188.368px;">
<p>2.7%</p>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<p dir="ltr"><strong>(स्रोतः सीफेट-आईएएसआरआई स्टडी, 2015)</strong></p>
<p dir="ltr"><span>जिन राज्यों में एपीएमसी कमजोर है, खासकर पूर्वी राज्यों में, किसान अपनी उपज लेकर गांव के हाट में आते हैं। 2018-19 के केंद्रीय बजट में जब किसानों की आय दोगुनी करना सरकार की प्राथमिकता में था, तब यह घोषणा की गई थी कि देशभर के 22000 ग्रामीण हॉट को अपग्रेड करके ग्रामीण कृषि बाजार (GrAM) बनाया जाएगा। अभी तक कितने हाट अपग्रेड किए गए हैं इसकी कोई जानकारी नहीं है। इन हाटों में खासकर छोटे और सीमांत किसान जो उपज लेकर आते हैं उनका नुकसान होता है।</span></p>
<p dir="ltr"><span>सप्लाई चेन में होने वाले नुकसान को कम करने के लिए मार्केटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर में और अधिक निवेश की जरूरत है। उम्मीद की जानी चाहिए कि 2023-24 के बजट में इसके लिए अधिक संसाधन का प्रावधान किया जाएगा। देश में खाद्य पदार्थों के नुकसान को लेकर जागरूकता तो है, उपभोक्ता के स्तर पर होने वाली बर्बादी को लेकर बहुत कम शोध किए गए हैं।</span></p>
<p dir="ltr"><span>वर्ल्ड रिसोर्सेस इंस्टीट्यूट और फूड एंड लैंड यूज (FOLU) कोलिशन ने एक वर्किंग पेपर (फूड लॉस एंड वेस्ट इन इंडियाः द नोन्स एंड द अननोन्स, 2021) में यह समझने का प्रयास किया है कि भारत में खाद्य पदार्थों की कितनी बर्बादी होती है। उस स्टडी में पता चला कि घरेलू स्तर पर इस तरह के नुकसान का कोई आंकड़ा ही नहीं है। इस नुकसान पर 22 अध्ययन हुए लेकिन सिर्फ 10 में प्राथमिक आंकड़े जुटाए गए।</span></p>
<p dir="ltr"><span>रिपोर्ट में कहा गया है कि शादियों और अन्य सामाजिक कार्यक्रमों में काफी मात्रा में खाद्य पदार्थों की बर्बादी होती है। होटलों में खाना पकाने के तरीके में कमी और अधिक खाना बनाने के कारण भी काफी खाना नष्ट होता है।</span></p>
<p dir="ltr"><span>खाद्य पदार्थों की बर्बादी पर पर्याप्त अध्ययन ना होने का एक कारण यह है कि सरकार के किसी भी मंत्रालय के पास इसे कम करने की जिम्मेदारी नहीं है। वर्ष 2011 में तत्कालीन केंद्रीय खाद्य मंत्री के. वी. थॉमस ने राज्यों के सामने यह मुद्दा उठाया था। उन्होंने आग्रह किया था कि माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर स्कूल पाठ्यक्रमों में खाद्य पदार्थों की बर्बादी को एक विषय के तौर पर शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने शादियों और अन्य मौकों पर बड़ी संख्या में खाने के आइटम तैयार करने के चलन का भी जिक्र किया जिनकी वजह से खाद्य पदार्थों की बर्बादी अधिक होती है।</span></p>
<p dir="ltr"><span>इस बर्बादी को कम करने के महत्व को पहचानने के क्षेत्र में इंग्लैंड ने एक सफल उदाहरण पेश किया है। वहां 2000 में वेस्ट एंड रिसोर्सेज एक्शन प्रोग्राम (डब्ल्यूआरएपी) नाम से एक ब्रिटिश चैरिटी की स्थापना की गई। यह एक गैर सरकारी संगठन है। इसलिए खाद्य पदार्थों की बर्बादी कम करने के इसके लक्ष्य से बिजनेस, व्यक्ति और समुदाय के लिए जुड़ना आसान हो गया है। यह लोगों के बीच या जागरूकता फैलाने में कामयाब रहा है कि मानव जनित ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में 8 से 10% योगदान खाद्य पदार्थों के नुकसान और बर्बादी का है। यानी चीन और अमेरिका के बाद सबसे अधिक उत्सर्जन खाद्य पदार्थों के नुकसान और बर्बादी से ही होता है। यह दावा किया जाता है कि विभिन्न पक्षों के हस्तक्षेप के कारण इंग्लैंड में रिटेल और मैन्युफैक्चरिंग की प्रक्रिया में 2007 से खाद्य पदार्थों की बर्बादी 18% कम हुई है।</span></p>
<p dir="ltr"><span>1991 में आर्थिक सुधार लागू होने के बाद विकास की गति तो बढ़ी लेकिन बड़ी संख्या में भारतीय अब भी कुपोषित हैं। फसलों, मवेशियों और फिशरीज की उत्पादकता बढ़ाने कृषि तथा इससे संबंधित क्षेत्रों में जलवायु रोधी टेक्नोलॉजी का विकास करने के प्रयास जारी रहने चाहिए, लेकिन इसके साथ खाद्य पदार्थों के नुकसान और उनकी बर्बादी को भी केंद्र में लाने की महती आवश्यकता है। खाद्य पदार्थों के नुकसान में कमी तो सरकार की नीतियों और पहल से ही होगी, लेकिन इनकी बर्बादी कम करने की पहल बिजनेस और भारत के अमीर तथा मध्य वर्ग की तरफ से होनी चाहिए।</span></p>
<p><span>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मार्च 2017 में अपने &lsquo;मन की बात&rsquo; कार्यक्रम में खाद्य पदार्थों की बर्बादी कम करने की जरूरत की बात कही थी। अगर सरकार इसे चुनौती के रूप में स्वीकार करे तो आने वाले वर्षों में नुकसान और बर्बादी को निश्चित रूप से कम किया जा सकता है।</span></p>
<p><em><strong>(लेखक भारत सरकार के कृषि मंत्रालय और खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय के पूर्व सचिव हैं। अभी वह फिक्की में फूड प्रोसेसिंग विभाग के सलाहकार हैं)&nbsp;</strong></em></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/01/image_750x500_63b41b84a27e0.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ खाद्य पदार्थों के नुकसान और इनकी बर्बादी से बढ़ती खाद्य असुरक्षा  ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[जी&amp;#45;20: कृषि में भारत के लिए प्राथमिकताएं]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/priorities-for-india-in-agriculture-in-g20.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 03 Jan 2023 12:07:08 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/priorities-for-india-in-agriculture-in-g20.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p dir="ltr"><span>भारत को जी-20 की अध्यक्षता ऐसे समय मिली जब विश्व मानव इतिहास के सबसे अनिश्चित पलों से गुजर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दुनिया के सबसे बड़े और शक्तिशाली देशों की अध्यक्षता ग्रहण करने के साथ सरकार की प्राथमिकताएं भी बताईं। उन्होंने कहा कि भारत का एजेंडा भोजन, उर्वरक और चिकित्सा उत्पादों की वैश्विक आपूर्ति का अराजनीतिकरण करके जी-20 देशों के बीच सहयोग और समन्वय को मजबूत बनाना है ताकि भू-राजनैतिक तनाव से मानवीय संकट पैदा हो।</span></p>
<p dir="ltr"><span>उन्होंने कहा कि मनुष्य जिन बड़ी चुनौतियों का सामना कर रहा है, जिनमें जलवायु परिवर्तन से उपजा संकट भी है, उनका समाधान आपस में लड़कर नहीं बल्कि साथ काम करके ही किया जा सकता है। विकासशील देशों में भूख और खाद्य असुरक्षा की समस्या पुरानी है। इनके समाधान के लिए अगर जी-20 देश कदम उठाएं तो &lsquo;साथ काम करने&rsquo; का इससे बड़ा उदाहरण और नहीं हो सकता। इन समस्याओं के समाधान के लिए ज्यादा लचीली और टिकाऊ कृषि और खाद्य आपूर्ति प्रणाली की आवश्यकता है।</span></p>
<p dir="ltr"><span>खाद्य प्रणाली के इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए जी-20 को उन देशों का ध्यान रखना होगा जहां की आबादी का बड़ा हिस्सा आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर करता है। खाद्य सुरक्षा हासिल करने में भारत ने महत्वपूर्ण प्रगति की है। इसका अनुभव जी-20 के लिए काफी उपयोगी हो सकता है।</span></p>
<p dir="ltr"><span>वर्ष 2015 में जब सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल (एसडीजी) को अपनाया गया था, तब उस पर दस्तखत करने वाले देशों में उम्मीद थी कि 2030 तक विश्व समुदाय भूखे रहने की समस्या से निजात पाने, खाद्य सुरक्षा हासिल करने और बेहतर पोषण उपलब्ध कराने में सफल होगा। इस बात पर सहमति बनी कि इन लक्ष्यों को टिकाऊ उत्पादन प्रणाली सुनिश्चित करके, खेती के तौर-तरीके में बदलाव तथा उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाकर हासिल किया जा सकता है।</span></p>
<p dir="ltr"><span>इस एसडीजी के केंद्र में दूसरा लक्ष्य यह था कि कोई भूखा न रहे। लेकिन इस लक्ष्य पर अमल शुरू हुए सात साल बीतने के बाद ऐसा लग रहा है कि हम लक्ष्य के विपरीत दिशा में जा रहे हैं।</span></p>
<p dir="ltr"><span>संयुक्त राष्ट्र की &lsquo;सस्टेनेबल गोल्स रिपोर्ट&rsquo; 2022 में चेतावनी दी गई है कि दुनिया खाद्य संकट के कगार पर खड़ी है। भूख और खाद्य असुरक्षा से जूझ रहे लोगों की संख्या बढ़ रही है। यह परिदृश्य महामारी के पहले से बना हुआ है। कोविड-19 के बाद करोड़ों लोगों को भीषण खाद्य संकट का सामना करना पड़ा क्योंकि महामारी के कारण आम जनजीवन और लोगों की आजीविका अभूतपूर्व रूप से प्रभावित हुई। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक 2021 में 82.8 करोड़ लोगों के सामने भूखे रहने का संकट था।</span></p>
<p dir="ltr"><span>यूक्रेन पर रूस के हमले ने इस पर एक और बड़ा प्रहार किया। इस युद्ध के कारण इन दोनों देशों से गेहूं का लगभग एक-तिहाई वैश्विक निर्यात बाधित हुआ। पश्चिमी देशों ने रूस पर जो प्रतिबंध लगाया उसकी वजह से रूस से उर्वरकों का निर्यात प्रभावित हुआ। इससे बड़े पैमाने पर भारत समेत खेती करने वाले अनेक देशों में उर्वरकों की किल्लत हो गई।</span></p>
<p dir="ltr"><span>खाद्य, ऊर्जा और फाइनेंस पर संयुक्त राष्ट्र के &lsquo;ग्लोबल क्राइसिस रेस्पांस ग्रुप&rsquo; के अनुसार जनवरी से मार्च 2022 के दौरान एफएओ का खाद्य मूल्य सूचकांक लगभग 18% बढ़ गया। हालांकि 2022 की दूसरी छमाही में खाद्य पदार्थों के दाम कम हुए हैं, लेकिन अनाज, डेयरी उत्पाद और मांस की कीमतें अब भी इस साल की शुरुआत की तुलना में ज्यादा हैं।</span></p>
<p dir="ltr"><span>वैश्विक अनिश्चितता जिस तरह लगातार बनी हुई है और खाद्य प्रणाली के लिए खतरा बढ़ा हुआ है, उसे देखते हुए जी-20 की तरफ से सामूहिक प्रयास की जरूरत है। विविध और गहरा अनुभव होने के चलते ये देश ही कुछ करने में सक्षम है। भारत इन प्रयासों में विशेष योगदान कर सकता है क्योंकि इसके पास गंभीर खाद्य सुरक्षा से निकलने का अनुभव है।</span></p>
<p dir="ltr"><span>जी-20 देशों के पास एक और एडवांटेज है कि इस समूह के पास एक मजबूत खाद्य सुरक्षा और पोषण (एफएसएन) फ्रेमवर्क है। खाद्य प्रणाली अप्रोच पर आधारित यह फ्रेमवर्क 2014 में तैयार किया गया था। इस फ्रेमवर्क में प्राथमिकता वाले तीन लक्षणों की पहचान की गई है (i) खाद्य प्रणाली में जवाबदेही पूर्ण निवेश बढ़ाना (ii) खाद्य प्रणाली में आमदनी और क्वालिटी रोजगार बढ़ाना तथा (iii) खाद्य आपूर्ति बढ़ाने के लिए उत्पादकता में टिकाऊ रूप से इजाफा करना।</span></p>
<p dir="ltr"><span>इन प्राथमिकता वाले लक्ष्यों के तहत कई संभावित कदमों की पहचान की गई थी। इनमें फूड वैल्यू चेन के लिए सरकारी-निजी साझेदारी के तहत इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश को बढ़ावा देना, विकासशील देशों में डेवलपमेंट फाइनेंस बढ़ाना और कृषि बाजार की विफलताओं को दूर करना, ग्रामीण और कृषि आधुनिकीकरण के संदर्भ में श्रम बाजार की प्लानिंग और कार्यक्रमों के अनुभवों को साझा करना, अनुसंधान के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना, विकासशील देशों की जरूरतों के मुताबिक विकास और इनोवेशन तथा उनका एडेप्टेशन।</span></p>
<p dir="ltr"><span>इन ढांचागत और संस्थागत सुधारों के अलावा एफएसएन फ्रेमवर्क में एक खुले, पारदर्शी और सक्षम खाद्य एवं कृषि व्यापार की बात कही गई थी, जिससे विकासशील देशों को अपनी नीति बनाने का मौका मिले जो डब्ल्यूटीओ के नियमों और प्रतिबद्धताओं के मुताबिक हो। इससे सस्टेनेबल कृषि के विकास को बढ़ावा मिलेगा, देश की खाद्य आपूर्ति में विविधता आएगी और लचीलापन बढ़ेगा, खाद्य पदार्थों की कीमत कम होगी और उनकी कीमतों में अत्यधिक उतार-चढ़ाव पर अंकुश लगेगा।</span></p>
<p dir="ltr"><span>एफएसएन फ्रेमवर्क में जो मुद्दे प्राथमिकता के आधार पर तय किए गए थे उनमें से वैश्विक कृषि व्यापार व्यवस्था में सुधार के लक्ष्य को आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। इसका कारण यह है कि जी-20 देश सभी प्रमुख क्षेत्रों में डब्ल्यूटीओ की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने वाले रहे हैं। इनमें कृषि भी शामिल है। इसलिए एफएसएन नेटवर्क में जिस लक्ष्य को हासिल किया जाना है उसके लिए इन देशों के बीच सहमति होना जरूरी है।</span></p>
<p dir="ltr"><span>कृषि पर डब्ल्यूटीओ की चर्चाओं में भारत एक प्रभावशील भागीदार रहा है। इसलिए यह खाद्य सुरक्षा और पोषण सुनिश्चित करने में उचित भूमिका निभा सकता है। भारत की अध्यक्षता का एक लाभ यह भी है कि पिछले दो अध्यक्षों के कार्यकाल के दौरान जो महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए, उन्हें वह आगे बढ़ा सकता है। 2021 में इटली की अध्यक्षता में जी-20 के विदेश मामलों और विकास मंत्रियों ने खाद्य सुरक्षा, पोषण और खाद्य प्रणाली पर मटेरा घोषणापत्र को सहमति दी थी। उस घोषणापत्र में एक खुले, पारदर्शी, पूर्वानुमानेय और भेदभाव रहित बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली के महत्व को प्रमुखता से दर्शाया गया था। वह व्यापार प्रणाली विश्व व्यापार संगठन के नियमों के मुताबिक होगी। उससे कृषि खाद्य व्यापार का प्रवाह इस तरह होगा जिससे वह खाद्य सुरक्षा और पोषण में योगदान कर सके। इसमें यह भी कहा गया कि इनपुट, वस्तुओं एवं सेवाओं तक पहुंच सुनिश्चित करने, पोषक और सस्ता भोजन उपलब्ध कराने के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार महत्वपूर्ण है।</span></p>
<p dir="ltr"><span>लगभग उसी तरह बाली में जी-20 के नेताओं ने खुले, पारदर्शी, समावेशी, पूर्वानुमानेय, भेदभाव रहित और डब्ल्यूटीओ के नियम आधारित कृषि व्यापार का समर्थन किया। उन्होंने निरंतर खाद्य आपूर्ति बनाए रखने (जो कुछ हद तक स्थानीय स्रोतों पर निर्भर करेगी) तथा खाद्य पदार्थों और उर्वरकों के विविध उत्पादन को लेकर प्रतिबद्धता जताई ताकि खाद्य व्यापार सप्लाई चेन में बाधाओं से प्रभावित होने वालों की मदद की जा सके। सबसे महत्वपूर्ण बात, जी-20 के सभी नेताओं ने इस बात पर जोर दिया कि वे खाद्य सुरक्षा को दुष्प्रभावित करने से बचेंगे।</span></p>
<p dir="ltr"><span>कृषि व्यापार और उत्पादन में पारदर्शिता और पूर्वानुमेयता सुनिश्चित करने में डब्ल्यूटीओ की एक प्रमुख भूमिका है। विभिन्न देशों की सरकारें इस सेक्टर के लिए जो पॉलिसी इंस्ट्रूमेंट का इस्तेमाल कर रही हैं वह कृषि पर समझाते (एओए) से नियंत्रित होती है। यहां यह बताया जाना जरूरी है कि कृषि समझौते के तहत जो नियम तय किए गए हैं वह सिर्फ खुली और बिना भेदभाव वाली व्यापार प्रणाली के लिए नहीं है। समझौते में व्यापार से इतर अन्य चिंताओं पर भी जोर दिया गया है। खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका और ग्रामीण विकास को भी उचित महत्व दिया जाना चाहिए।</span></p>
<p dir="ltr"><span>कृषि समझौते की प्रस्तावना में खाद्य सुरक्षा के महत्व को एक नॉन-ट्रेड चिंता के रूप में बताया गया है। दूसरी तरफ, डब्ल्यूटीओ के तीसरे मंत्रिस्तरीय सम्मेलन के अंत में जिस घोषणापत्र को अपनाया गया उसमें ग्रामीण आजीविका और ग्रामीण विकास को नॉन-ट्रेड चिंताओं के रूप में दिखाया गया है। इनका कृषि समझौते पर अमल करते समय ध्यान रखा जाना चाहिए। भारत इन नॉन-ट्रेड समस्याओं को दूर करने वाले कदम उठाने का मजबूत समर्थक रहा है।</span></p>
<p dir="ltr"><span>जैसा कि ऊपर बताया गया है, बाली सम्मेलन में जी-20 नेताओं ने डब्ल्यूटीओ नियमों पर आधारित खुले, पारदर्शी, समावेशी, पूर्वानुमानेय और भेदभाव रहित कृषि व्यापार का समर्थन किया था। जी-20 नेताओं का यह घोषणा पत्र आयोजक देश इंडोनेशिया के लिए महत्वपूर्ण था। यहां यह बात उल्लेखनीय है कि अनेक विकासशील देशों के साथ भारत और इंडोनेशिया भी कृषि समझौते के कई प्रावधानों में बदलाव का प्रयास कर रहे हैं, खासकर उन प्रावधानों में जो कुछ विकसित देशों में दी जा रही सब्सिडी से जुड़े हैं, ताकि कृषि उत्पादों के बाजार में समानता हो सके।</span></p>
<p dir="ltr"><span>इस संदर्भ में इस तथ्य को स्वीकार करना आवश्यक है कि एक लचीली और सस्टेनेबल कृषि प्रणाली के विकास के लिए कृषि सब्सिडी का उद्देश्य नए सिरे से निर्धारित करना पड़ेगा। बाली में जी-20 नेताओं ने जो लक्ष्य तय किया है उसे हासिल करने के लिए जरूरी सब्सिडी को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। अभी खाद्य फसलों की विशाल सरप्लस मात्रा उपजाने के लिए जो सब्सिडी दी जाती है उसकी जगह इन कार्यों के लिए सब्सिडी दी जानी चाहिए, क्योंकि इन फसलों को आगे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बेचा जाता है। इस तरह के सरप्लस ने न सिर्फ गरीब देशों में स्थानीय खाद्य प्रणाली को नुकसान पहुंचाया है बल्कि उन देशों में कृषि पर निर्भर आजीविका को भी प्रभावित किया है। भारत की अध्यक्षता में जी-20 से उम्मीद की जाती है कि यह समूह इस क्षेत्र में एक टिकाऊ समाधान उपलब्ध कराएगा।</span></p>
<p dir="ltr"><em><strong>(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज के सेंटर फॉर इकोनॉमिक स्टडीज एंड प्लानिंग में प्रोफेसर हैं)</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ जी-20: कृषि में भारत के लिए प्राथमिकताएं ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[हाशिए पर रखी गई भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और इसकी चुनौतियां]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/the-marginalized-indian-rural-economy-its-challenges.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 02 Jan 2023 15:22:43 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/the-marginalized-indian-rural-economy-its-challenges.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>ग्रामीण अर्थव्यवस्था काफी जटिल है। इसमें कृषि के साथ उद्योग और सेवाएं भी हैं। लेकिन वहां ज्यादातर गतिविधियां असंगठित क्षेत्र में होती हैं। इनमें शहरी इलाकों की तुलना में आमदनी कम होती है। यही कारण है कि देश की 70 प्रतिशत आबादी ग्रामीण होने के बावजूद सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में उनका योगदान शहरी क्षेत्रों की तुलना में बहुत कम है।<br />रोजगार के पर्याप्त अवसर न होने के चलते ग्रामीण क्षेत्र में समस्या ज्यादा है, हालांकि कृषि और असंगठित क्षेत्र को श्रम सघन माना जाता है। इन समस्याओं के चलते गांव से शहर की ओर लोगों का बड़े पैमाने पर पलायन हुआ है। यह पलायन सिर्फ मौसमी नहीं, बल्कि स्थायी भी है। पहले जो चुपचाप होता था, वह लॉकडाउन के दौरान काफी खुलकर हुआ। लाखों की संख्या में प्रवासी मजदूर विपरीत परिस्थितियों का सामना करते हुए पैदल अपने गांव की ओर जा रहे थे। दुनिया की अन्य किसी बड़ी अर्थव्यवस्था में ऐसा पलायन कभी नहीं दिखा।<br />ग्रामीण अर्थव्यवस्था का इस तरह हाशिए पर जाना नीति निर्माताओं के उस फोकस का नतीजा है जिसमें संगठित अर्थात अर्थव्यवस्था के आधुनिक हिस्से को वरीयता दी जाती है। अर्थव्यवस्था का आधुनिकीकरण पश्चिम की आधुनिकता की नकल के तौर पर हुआ है। भारत में आधुनिकता के अपने तरीके का प्रयास नहीं किया गया। ऐसा प्रयास जो ग्रामीण इलाकों में बड़ी तादाद में रहने वाले लोगों की जरूरतें पूरी कर सके। इसलिए आश्चर्य नहीं कि खपत में सबसे महत्वपूर्ण सामग्री, यानी खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराने वाला कृषि क्षेत्र हाशिए पर चला गया।<br />आजादी के बाद से नीतियां ट्रिकल डाउन सिद्धांत पर आधारित रही हैं। इस सिद्धांत के अनुसार आधुनिक सेक्टर आगे बढ़ेंगे और उनके फायदे छनकर हाशिए पर पड़े सेक्टर तक पहुंचेंगे। यह उम्मीद भी लगाई गई कि आधुनिक सेक्टर विकास करेगा और पिछड़े क्षेत्रों को अपने में शामिल कर लेगा। दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि आधुनिक सेक्टर काफी पूंजी सघन है और इसमें रोजगार के अवसर ज्यादा नहीं निकलते। इसलिए जो लोग पिछड़े क्षेत्रों में कार्यरत थे वे वहीं रह गए। सिर्फ यही नहीं, आमदनी का बड़ा हिस्सा भी उन लोगों के हक में गया जो आधुनिक सेक्टर में हैं। बाकी सेक्टर में काम करने वालों को आमदनी का मामूली हिस्सा ही मिला।<br />यह भी दुर्भाग्य है कि असंगठित क्षेत्र में अधिकांश के आंकड़े स्वतंत्र रूप से उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए इनके प्रदर्शन को भी संगठित क्षेत्र के समान मान लिया जाता है। इसका नतीजा यह होता है कि आर्थिक आंकड़े हकीकत से ज्यादा अच्छे नजर आते हैं। संगठित क्षेत्र भले ही आगे बढ़ रहा हो, असंगठित क्षेत्र स्पष्ट रूप से नीचे जा रहा है। इसलिए इस तरीके से भारत के आर्थिक प्रदर्शन का आकलन गलत है। वास्तविक आर्थिक विकास को दर्शाने के लिए इस तरीके में बदलाव की जरूरत है।<br />ग्रामीण क्षेत्र का नजरअंदाज और उपनिवेशीकरण<br />पहले नोटबंदी, उसके बाद वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी), एनबीएफसी संकट और फिर लॉकडाउन, इन सबने असंगठित क्षेत्र को बुरी तरह नुकसान पहुंचाया ह, जबकि सरकारी आंकड़ों में इन्हें कहीं नहीं दिखाया जाता है। अगर असंगठित क्षेत्र के आंकड़ों को भी शामिल किया जाए तो आज भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर 7% से अधिक नहीं, बल्कि नकारात्मक होगी। इस तरह यह सेक्टर न सिर्फ आंकड़ों में हाशिए पर रहता है बल्कि नीतियों में भी इसे जगह नहीं मिल पाती है। इस खामी भरे आंकड़ों के बूते अगर अर्थव्यवस्था तेज गति से बढ़ती दिख रही हो तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था के संकट को दूर करने के लिए विशिष्ट नीतियों को अपनाया ही नहीं जाएगा। होता यह है कि सिर्फ फौरी राहत दी जाती है, समस्या का समाधान नहीं किया जाता। दूसरे शब्दों में कहें तो ग्रामीण क्षेत्र को आंकड़ों और नीति दोनों में अदृश्य कर दिया जाता है।<br />काले धन की अर्थव्यवस्था इस तस्वीर को और अधिक पेचीदा बना देती है। काला धन संगठित क्षेत्र में ही पैदा होता है, क्योंकि असंगठित क्षेत्र में ज्यादातर लोगों की आमदनी आयकर सीमा से कम ही होती है। दूसरी ओर काले धन पर लगाम लगाने के नाम पर असंगठित क्षेत्र में डिजिटाइजेशन, फॉर्मलाइजेशन जैसी नीतियां लागू की जाती हैं। इनसे असंगठित क्षेत्र को और नुकसान होता है। यहां यह बात भी महत्वपूर्ण है कि काले धन की मौजूदगी के कारण आंकड़े और अधिक गलत हो जाते हैं। इसलिए जो नीतियां बनती हैं, वह गलत आंकड़ों के आधार पर ही बनती हैं। यह सच्चाई है कि काला धन चुनिंदा लोगों तक ही सीमित है। इसलिए उनके और गरीबों के बीच असमानता काफी बढ़ी है। सरकारी आंकड़ों में इस हकीकत को भी शामिल नहीं किया जाता है।<br />कुल मिलाकर देखें तो असंगठित क्षेत्र न सिर्फ हाशिए पर रहता है बल्कि वह संगठित क्षेत्र के उपनिवेशीकरण का भी शिकार होता है। संगठित क्षेत्र का विकास असंगठित क्षेत्र की कीमत पर होता है क्योंकि असंगठित क्षेत्र ही संगठित क्षेत्र को बाजार उपलब्ध कराता है। यह ठीक उसी तरह है जैसा अंग्रेजी शासन के दौरान ब्रिटिश इंडस्ट्री के लिए भारत बाजार मुहैया कराता था।<br />असंगठित क्षेत्र को इस तरह हाशिए पर किया जाना और उसका उपनिवेशीकरण 1991 में नई आर्थिक नीतियों के लागू होने के बाद अधिक तेजी से बढ़ा। ये नीतियां आधुनिक सेक्टर और बड़ी इंडस्ट्री के लिए ज्यादा मुफीद हैं। 1947 से जो नीतियां लागू थीं, उनके विपरीत नई आर्थिक नीतियां असंगठित क्षेत्र के लिए जुबानी खर्च भी नहीं करती हैं। यहां तक कि कृषि और ग्रामीण क्षेत्र के लिए भी वे आधुनिकीकरण और मशीनीकरण की बात करते हैं, जबकि भारत के विशाल ग्रामीण आबादी की जरूरतें इन तरीकों से पूरी नहीं हो सकती हैं।<br />कृषि क्षेत्र में लोगों को रोजगार देने की लोचता शून्य रह गई है। गैर कृषि क्षेत्र में नौकरियों की संख्या सीमित है इसलिए लोग वहीं फंस कर रह गए हैं। इसका नतीजा बड़े पैमाने पर &lsquo;प्रच्छन्न बेरोजगारी&rsquo; है। इससे गरीबी और बढ़ती है क्योंकि निर्भरता अनुपात बढ़ जाता है। आजादी के बाद से कृषि क्षेत्र के सरप्लस का इस्तेमाल शहरीकरण और उद्योगीकरण के लिए किया जाता रहा। किसान के लिए व्यापार के नियम कभी अनुकूल नहीं रहे। शहरीकरण और उद्योगीकरण दोनों काफी खर्चीले हैं, इसलिए ग्रामीण क्षेत्र के लिए बहुत कम संसाधन रह जाते हैं जिसका नतीजा उन्हें भुगतना पड़ता है।<br />मार्जिनलाइजेशन का मैक्रोइकोनॉमी पर प्रभावः बढ़ती अस्थिरता<br />असंगठित क्षेत्र भारत के 94% कार्यबल को रोजगार उपलब्ध कराता है और जीडीपी में 45% का योगदान करता है। जीडीपी में कृषि क्षेत्र का योगदान 14% है। इसकी अनदेखी से मैक्रोइकोनॉमी को नुकसान होता है। इससे डिमांड में कमी आती है और अर्थव्यवस्था की गति धीमी होती है। नोटबंदी के बाद अर्थव्यवस्था के बढ़ने की दर हर तिमाही घटती हुई 8% से 3.1% (2019 की चौथी तिमाही में) तक पहुंच गई। उसके ठीक बाद कोविड-19 महामारी ने भारत को अपनी गिरफ्त में लिया।<br />इन आंकड़ों पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए। जब अर्थव्यवस्था के इतने बड़े हिस्से की अनदेखी होगी तो क्रय शक्ति कम होगी तथा गैर ग्रामीण क्षेत्र की विकास दर भी घटेगी। अगर अमीरों की बजाय गरीबों की आमदनी बढ़ी तो खपत भी बढ़ेगी। गरीबों की अनेक बुनियादी जरूरतें होती हैं। वे उन बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए अपनी अतिरिक्त आमदनी खर्च करेंगे। जैसे कपड़े, भोजन आदि। संपन्न लोगों की आय बढ़ने पर आमतौर पर वे उसकी बचत करते हैं। जब तक उस अतिरिक्त आय का नए बिजनेस अथवा उद्योग में निवेश न किया जाए तब तक उससे अतिरिक्त मांग नहीं बढ़ती है।<br />संपन्न वर्ग की आय अधिक बढ़ी और उन्होंने निवेश ज्यादा किया तो असमानता भी बढ़ती रहेगी। अगर निवेश कम होता है तो मांग में भी कमी आएगी जिसका नतीजा अर्थव्यवस्था की विकास दर में गिरावट के रूप में सामने आएगा। यह किसी भी अर्थव्यवस्था में असमानता और अस्थिरता बढ़ाने की अच्छी रेसिपी है।<br />कृषि क्षेत्र की चुनौतियां<br />कृषि क्षेत्र जिन चुनौतियों का सामना कर रहा है उनसे भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर होता है, क्योंकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा कृषि पर ही आश्रित है। गैर-कृषि क्षेत्र में पर्याप्त नौकरियां उपलब्ध न होना एक बड़ा मुद्दा है। बड़ी संख्या में लोग सिर्फ इसलिए खेती में जुटे हुए हैं क्योंकि उनके पास कहीं और जाने का उपाय नहीं है। इससे ग्रामीण परिवारों में गरीबी की समस्या और बढ़ जाती है। किसानों के खेत का आकार बहुत छोटा रह गया है। 85% किसानों के खेत 5 एकड़ से भी कम के हैं। ज्यादातर छोटे खेत ऐसे हैं कि उनसे पूरे परिवार के लिए पर्याप्त आमदनी नहीं हो सकती। आय का दूसरा विकल्प उनके लिए महत्वपूर्ण होता है।<br />सरप्लस के लीकेज का यह मतलब भी है कि निवेश और तकनीकी बदलाव लागू करने के लिए संसाधन कम रह जाते हैं, जिनसे आमदनी बढ़ाने में मदद मिल सके। इसका यह मतलब भी है कि बच्चों की अच्छी शिक्षा या जरूरत के समय परिवार को अच्छी स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराने के लिए लोगों के पास पर्याप्त पैसा नहीं होता। इस तरह परिवार का भविष्य सुधारने का अवसर खत्म हो जाता है और गरीबी बनी रहती है। सरकार का दावा है कि वह 80 करोड़ लोगों को मुफ्त भोजन उपलब्ध करा रही है। इसके बावजूद ग्रामीण इलाकों में गरीबी है। अर्थात अगर मुफ्त भोजन उपलब्ध न कराया जाता तो लोगों की गरीबी और अधिक होती। इसका यह अर्थ भी है कि इन लोगों को जो भी काम मिलता है उसके बदले उन्हें इतने पैसे नहीं मिलते कि वे अपना जीवन चला सकें। नतीजा, वे गरीब रह जाते हैं।<br />कृषि क्षेत्र की कमजोरी का एक कारण यह भी है कि खेती करने वाले परिवारों की संख्या बहुत अधिक है। इस वजह से बाजार में अपनी उपज की अधिक कीमत मांगने की उनकी क्षमता नहीं होती। गरीबी के कारण छोटे किसान व्यापारियों और साहूकारों की गिरफ्त में होते हैं। इसलिए किसानों को व्यापारियों और साहूकारों का मार्जिन चुकाने के बाद ही थोड़ी बहुत कमाई होती है। कई बार उनका मार्जिन बहुत ज्यादा होता है।<br />इसलिए किसान सरकार की तरफ से न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) घोषित करने पर निर्भर रहते हैं। एमएसपी किसानों और व्यापारियों के लिए एक बेंचमार्क का काम करता है। दुर्भाग्यवश इसे लागू करने की व्यवस्था भी बहुत कमजोर है। इसी तरह कृषि मजदूरों के लिए न्यूनतम वेतन लागू करने की भी कोई व्यवस्था नहीं है। इसलिए बड़ी संख्या में किसान और कृषि मजदूर को मामूली आमदनी ही होती है।<br />खेती की लागत बढ़ती जा रही है जबकि कीमतें उस अनुपात में नहीं बढ़ाई गई हैं। इससे किसानों की आमदनी कम हुई है। अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए उनके पास एकमात्र जरिया यह है कि वे खेतिहर मजदूरों को कम पैसे दें। इसका असर यह होता है कि खाद्य पदार्थों की मांग कम हो जाती है और कृषि उपज की बाजार कीमत भी घटती है।<br />ज्यादातर फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य ना होने का पर्यावरण पर भी असर होता है। धान, गेहूं और गन्ना जैसी फसलें बड़े पैमाने पर उगाई जाती हैं क्योंकि किसानों को इनमें ही लाभ होता है। मिलेट, तिलहन, दलहन जैसी अन्य आवश्यक फसलों के बजाय किसान फायदे वाली फसलों को उपजाते हैं। इनमें से कई फसलों की देश में कमी होती है जिसकी पूर्ति आयात से की जाती है। यही नहीं, किसान ऐसी फसलें भी उगाते हैं जो उनके कृषि जलवायु क्षेत्र के माफिक नहीं होता है। उदाहरण के लिए धान और गन्ना जैसी पानी का अधिक इस्तेमाल करने वाली फसलों की खेती अर्ध शुष्क इलाकों में की जाती है। इस तरह की नीति हर तरीके से पर्यावरण के लिए समस्या खड़ी करती है।<br />अधिक पैदावार के लिए रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का इस्तेमाल बड़े स्तर पर किया जाता है। इससे मिट्टी का क्षरण और पीने का पानी प्रदूषित हो रहा है। इसका परिणाम अनेक तरह की बीमारियां हैं। कृषि में मशीनीकरण और गैर कृषि क्षेत्र में ऑटोमेशन बढ़ने से गैर-कृषि क्षेत्र में नौकरियों की संख्या भी कम हो रही है।<br />राजनीतिक चुनौतियां और सुधार की जरूरत<br />किसी भी लोकतंत्र में संख्या के लिहाज से अधिक किसान और ग्रामीण समुदाय अपने आप को हाशिए पर क्यों पाता है? इसका कारण यह है कि कृषि में अनेक आर्थिक हित होते हैं। किसानों की ही अनेक श्रेणियां हैं- अमीर, मध्यवर्गीय और छोटे, सिंचाई वाले और तथा बिना सिंचाई वाले क्षेत्रों में खेती करने वाले, फिर भूमिहीन मजदूर और छोटे किसान भी हैं जिनके पास खेती की जमीन बहुत कम होती है। इन सबके बीच हितों में टकराव होता है और उन्हें दूर करने की कोशिश भी नहीं की जाती है। राजनीतिक दल इसका फायदा उठाते हैं। जो किसान राजनीति में आते हैं वे अक्सर संपन्न होते हैं। उनके अपने बिजनेस हित होते हैं। वे देर-सबेर शहरी और बिजनेस एलीट वर्ग के लिए काम करना शुरू कर देते हैं।<br />जरूरत इस बात की है कि ग्रामीण क्षेत्र और किसानों के नेता अपने आप ही मतभेद दूर करें। उनके मतभेद आपस में उतने नहीं होते जितने गैर-कृषि और शहरी हितों से होते हैं। अगर वे सभी फसलों के लिए ऐसे न्यूनतम समर्थन मूल्य की मांग करें, जिसकी गणना कृषि मजदूरों की आजीविका पर आधारित हो, तो वह नाकाम नहीं होंगे। उन्हें फायदा होगा, क्योंकि उनकी उपज की मांग निकलेगी और बाजार में उनकी उपज की संभवतः एमएसपी से अधिक कीमत भी मिलेगी। इस तरह एमएसपी लागू करने की समस्या भी खत्म हो जाएगी।<br />जाहिर है कि इसका असर महंगाई बढ़ाने वाला होगा। मध्यवर्ग के साथ-साथ बिजनेस वर्ग भी इसका विरोध करेगा क्योंकि उन्हें अपने कर्मचारियों को अधिक वेतन देना पड़ेगा। लेकिन क्या मध्य वर्ग और विजनेस वर्ग का जीवन स्तर कृषि मजदूरों और ग्रामीण क्षेत्र की कीमत पर होना चाहिए? यह न्याय नहीं है। अर्थव्यवस्था में महंगाई का असर कम करने के लिए किसानों को अप्रत्यक्ष कर घटाने, प्रत्यक्ष कर बढ़ाने और काले धन की अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण करने की मांग करनी चाहिए। उन्हें &lsquo;पूर्ण रोजगार&rsquo; के साथ कृषि मजदूरों के लिए उचित वेतन की भी मांग करनी चाहिए ताकि गरीबी दूर हो। कुल मिलाकर कहा जाए तो अर्थव्यवस्था के लिए एक संपूर्ण पैकेज की जरूरत है। ग्रामीण क्षेत्र की समस्याओं का समाधान मैक्रोइकोनॉमी में निहित है।</p>
<div class="adL"><em><strong>(लेखक जेएनयू के इकोनॉमिक्स के पूर्व प्रोफेसर और &lsquo;इंडियन इकोनॉमीज ग्रेटेस्ट क्राइसिसः इंपैक्ट ऑफ द कोरोनावायरस एंड द रोड अहेड&rsquo; (पेंगुइन रेंडम हाउस) के लेखक हैं)</strong></em></div> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ हाशिए पर रखी गई भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और इसकी चुनौतियां ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[भारत को अपनी जरूरतों के मुताबिक खाद्य प्रणाली की जरूरत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/india-needs-a-food-systems-approach-a-unique-one-best-suited-to-its-requirements.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 01 Jan 2023 10:49:56 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/india-needs-a-food-systems-approach-a-unique-one-best-suited-to-its-requirements.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p dir="ltr"><span>पिछले साल आयोजित संयुक्त राष्ट्र का फूड सिस्टम समिट कोई खास चर्चा में नहीं रहा। कुछ आलोचकों ने तो यहां तक कह दिया कि यह समिट अब बेमतलब हो गया है। यह ऐसा वैश्विक इवेंट था जो सदस्य देशों को एक बड़े बदलाव वाली खाद्य प्रणाली का डिजाइन तैयार करने के लिए उत्साहित न कर सका। शायद इस कांसेप्ट को पूरी तरह न तो समझा गया और न ही ठीक तरीके से उसकी व्याख्या की गई।</span></p>
<p dir="ltr"><span>मौजूदा खाद्य प्रणाली को बदलना एक बहते हुए जहाज की मरम्मत और उसकी रीमॉडलिंग करने के समान है। जहाज में जो छेद हैं, उन्हें बंद करने की आवश्यकता है, उसका इंटीरियर नया करना है और इंजन की क्षमता बढ़ानी है। दूसरी तरफ जहाज अपनी यात्रा पर आगे बढ़ रहा होता है। क्या मौजूदा प्रणाली ठीक है और कुछ बदलने की जरूरत नहीं है? ऐसा नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि नीति निर्माता इस चुनौती से भयभीत हैं कि बदलाव होगा कैसे। मेरे विचार से कुछ न करना आसान तो है, लेकिन बदलाव के प्रयास न करना कोई विकल्प नहीं है।</span></p>
<p dir="ltr"><span>इसी पृष्ठभूमि में भारत कृषक समाज ने एक खाद्य प्रणाली परिचर्चा (फूड सिस्टम्स डायलॉग) का आयोजन किया। 15 और 16 नवंबर 2022 को आयोजित परिचर्चा 10 प्रमुख हिस्से में बंटी थी और हर एक की अगुवाई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित विशेषज्ञ संगठनों ने की।</span></p>
<p dir="ltr"><span>यह आयोजन किसी सम्मेलन के तौर पर नहीं, बल्कि एक परिचर्चा के तौर पर हुआ था। इसका मकसद सुनना और सीखना था। इसका मकसद किसी भी बदलाव के विभिन्न आयामों को समझना, उसके कार्यकलापों में सामंजस्य बिठाना, संभावित असर का आकलन करना और एक प्रभावी तथा कम नुकसानदायक रास्ता तलाश करना था। यह लेख निश्चित रूप से उस परिचर्चा के बारे में नहीं बल्कि भारत के लिए एक अलहदा खाद्य प्रणाली की जरूरत के बारे में है।</span></p>
<p dir="ltr"><span>खाद्य प्रणाली का पारंपरिक पश्चिमी मॉडल प्रोडक्शन प्रोसेसिंग वैल्यू चेन मार्केट लिंकेज पर निर्भर करता है। जब इसमें समावेशिता, स्वास्थ्य एवं पोषण और सस्टेनेबिलिटी को शामिल किया जाता है तो यह मॉडल दरकने लगता है।</span></p>
<p dir="ltr"><span>जाहिर है कि कोई एक वैश्विक प्रणाली पूरे विश्व में कारगर नहीं हो सकती। ठीक उसी तरह कोई एक प्रणाली समस्त भारत के लिए मुफीद नहीं हो सकती। भारतीय खाद्य प्रणाली इस मायने में औरों से अलग है कि इसमें काफी विविधता है। यह विविधता उत्पादन, खपत, व्यापार, सांस्कृतिक और पर्यावरण संबंधी चुनौतियों के मामले में है।</span></p>
<p dir="ltr"><span>इसलिए भारतीय खाद्य प्रणाली में दुनियाभर में प्रचलित श्रेष्ठ तौर-तरीकों को शामिल करने और फिर क्षेत्रीय विविधताओं तथा इनोवेशन के अनुरूप उन्हें नए सिरे से डिजाइन करने की जरूरत है। निस्संदेह यह एक दुष्कर कार्य है। इसलिए बदलाव की जरूरत को स्वीकार करने से भी लोग कतराते हैं। जलवायु परिवर्तन का जो परिदृश्य उभर रहा है, उसे देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि हरित क्रांति के मॉडल पर आधारित मौजूदा प्रणाली पर ही आगे बढ़ना आगे चलकर नाकाम होगा।</span></p>
<p dir="ltr"><span>इसमें किसानों की आमदनी को लेकर चिंता, खत्म होते प्राकृतिक संसाधन और अल्प पोषण की चुनौतियों को भी जोड़िए। मौजूदा प्रणाली में बदलाव की आवश्यकता तो स्पष्ट है। ऐसे में वह कौन से प्रमुख स्तंभ हैं जिन्हें आधार बना कर इस तरह के बदलाव किए जा सकते हैं?</span></p>
<p></p>
<p dir="ltr"><span>इसके लिए निम्नलिखित 7 बिंदुओं पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है:</span></p>
<p dir="ltr"><span>1. खाद्य एवं पोषण, आजीविका और कृषि में लचीलेपन की चिंता का समाधानः भारत को अपने नागरिकों के लिए सेहतमंद और कम कीमत वाले भोजन की जरूरत है। अभी तक खाद्य सुरक्षा की जो पहल हुई है वह सघन उत्पादन, बड़े पैमाने पर खरीद और एक प्रभावी वितरण व्यवस्था पर आधारित रही है। इस मॉडल ने सुनिश्चित किया कि हमारे लोगों को पर्याप्त, बल्कि अधिक मात्रा में चावल और गेहूं मिलता रहे। गेहूं और चावल पर ज्यादा जोर देने वाले इस मॉडल पर लगातार बने रहने से बेहतर पोषण मिलने की संभावना कम है।</span></p>
<p dir="ltr"><span>खेती लायक जमीन सीमित है और प्राकृतिक संसाधन कम होते जा रहे हैं। इन दोनों समस्याओं को देखते हुए पोषक अनाज, दालें, फल एवं सब्जियां, डेयरी, पोल्ट्री इत्यादि पर फोकस में बदलाव जरूरी है। यह पोषण के साथ-साथ आजीविका के नजरिए से भी महत्वपूर्ण है। व्यापक स्तर पर देखें तो प्राकृतिक आपदाओं के असर को झेलने में कृषि अभी तक सक्षम रही है। लेकिन जब भी मौसम से जुड़ी आपदा आती है तो आजीविका की सुरक्षा और वर्षा सिंचित खेती पर दबाव बढ़ जाता है। जलवायु में जिस तरह परिवर्तन बढ़ते जा रहे हैं उसे देखते हुए नीतियों में आवश्यक बदलाव के जरिए ज्यादा लचीला रुख अपनाने की जरूरत है।</span></p>
<p dir="ltr"><span>2. जलवायु परिवर्तन को अपनाने के लिए सब-सिस्टम बनाना जरूरीः किसानों के लिए जलवायु परिवर्तन सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। हमारी नीतियां मुख्य रूप से खाद्य सुरक्षा की चिंता दूर करने पर केंद्रित रही है, लेकिन परेशानी वाले इलाकों में किसानों की आजीविका की सुरक्षा पर उतना ध्यान नहीं दिया गया जितना देने की आवश्यकता है। असमानता कम करने के लिए नीतियों का फोकस राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के बजाय किसान केंद्रित आजीविका और माइक्रो स्तर पर खाद्य सुरक्षा उपलब्ध कराने पर होना चाहिए, और उसके लिए बजट में उचित प्रावधान किया जाना चाहिए। यह खासतौर से वर्षा सिंचित क्षेत्र के किसानों के लिए प्रासंगिक है।</span></p>
<p dir="ltr"><span>हमारी उप-प्रणालीः तकनीकी मदद और एक्सटेंशन सिस्टम, इनपुट प्लानिंग, मार्केट सपोर्ट और जोखिम कम करने के जो तौर-तरीके हैं वे मौसम के कारण पैदा होने वाली चुनौतियों से निपटने में पर्याप्त रूप से सक्षम नहीं हैं। इसके दो कारण हैं। एक है सेंट्रलाइज्ड प्लानिंग और दूसरा, रेस्पांस/समस्या कम करने की अपर्याप्त व्यवस्था। इन पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है।</span></p>
<p dir="ltr"><span>3. प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और दशकों से चले आ रहे पारंपरिक तरीकों का पालन: देश की खाद्य सुरक्षा की जरूरतें पूरी करने में हरित क्रांति निश्चित रूप से सफल रही है, भले ही यह देश के कुछ हिस्सों तक सीमित रही हो। लेकिन लंबे समय तक प्राकृतिक संसाधनों का अधिकाधिक इस्तेमाल और चुनिंदा फसलों के लिए दी जाने वाली वित्तीय इंसेंटिव ने मिट्टी, पानी, एग्रो-इकोलॉजी जैसे हमारे मौजूदा प्राकृतिक संसाधनों पर काफी दबाव डाला है। इससे इन कदमों की सस्टेनेबिलिटी पर भी सवाल उठे हैं।</span></p>
<p dir="ltr"><span>हरित क्रांति के लिए अपनाई गई नीतियां मुख्य तौर पर इस आशंका के चलते लंबे समय तक जारी रहीं कि इनमें बदलाव से देश की खाद्य सुरक्षा प्रभावित हो सकती है, और इन नीतियों से जिन किसानों को फायदा हुआ है वे नाराज हो सकते हैं। लेकिन ऐसे अनेक गरीब किसान हैं जो प्राकृतिक खेती करते रहे (इसे चाहे जो नाम दिया जाए)। सरकार की इंसेंटिव व्यवस्था का उन्हें कोई फायदा नहीं मिला क्योंकि ग्रीन रिवॉल्यूशन मॉडल में बतौर इनपुट पानी, उर्वरक, हाइब्रिड बीज या कीटनाशकों में किसी का भी इस्तेमाल उन्होंने नहीं किया। इसलिए जो किसान प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करते हैं उन्हें किसी न किसी तरीके से इंसेंटिव देने की जरूरत है, चाहे वह व्यक्तिगत स्तर पर हो अथवा सामूहिक रूप से।</span></p>
<p dir="ltr"><span>4. खाद्य पदार्थों के नुकसान और उनकी बर्बादी में कमीः खाद्य पदार्थ के नुकसान और उनकी बर्बादी पर अलग-अलग आंकड़े उपलब्ध हैं लेकिन सभी आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं कि नुकसान और बर्बादी की मात्रा बहुत ज्यादा है। मेरे विचार से टेक्नोलोजी, ट्रांसपोर्ट, स्टोरेज और मैनेजमेंट खाद्य पदार्थों को होने वाले नुकसान के लिए एक बड़ी चुनौती हैं। इसे कम करने का तरीका फसल और भौगोलिक क्षेत्र पर आधारित होना चाहिए। यह सबके फायदे की बात होगी, खासकर किसानों के लिए। खाने-पीने की चीजों की बर्बादी रोकने के लिए व्यवहार में बदलाव की जरूरत है, और आवश्यक हो तो इसके लिए दंड प्रावधान भी लागू किए जा सकते हैं।</span></p>
<p dir="ltr"><span>5. लीनियर यानी एक दिशा में चलने के बजाय सर्कुलर फूड चेन सिस्टम जरूरीः सर्कुलर खाद्य प्रणाली के बारे में अनेक सिद्धांत मौजूद हैं। यह सच है कि सर्कुलर प्रणाली में समय, ऊर्जा और पैसे की बचत होती है। इसकी शुरुआत किसानों को स्थानीय बाजारों से जोड़कर की जा सकती है। इससे स्थानीय उपज की मांग बढ़ाने में मदद मिलेगी और स्थानीय स्तर पर संपन्नता भी बढ़ेगी। मौजूदा नीतियों में ऐसे सिस्टम को बढ़ावा देने की कोई व्यवस्था नहीं है।</span></p>
<p dir="ltr"><span>6. किसानों के लिए दीर्घकालिक आय सुनिश्चित करनाः सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में खेती का आर्थिक महत्व कम होता जा रहा है, बावजूद इसके कि 50% आबादी इस पर निर्भर है। खेतों में काम करने वाले किसानों के लिए खेती गैर-मुनाफाकारी और अप्रत्याशित होती जा रही है। अनेक किसान सिर्फ इसलिए किसानी कर रहे हैं क्योंकि उनके पास और कोई विकल्प नहीं है। अगर खेती करने वालों को इससे सम्मानजनक आजीविका नहीं मिलती है तो स्वास्थ्य और पोषण युक्त खाद्य पदार्थों का उत्पादन कर पाना संभव नहीं हो सकेगा। किसानों की आय निरंतर बढ़ती रहे इसके लिए एक अच्छी नीति बनाने और संगठित प्रयास करने की दरकार है। यह नीति जितनी जल्दी संभव हो बनाई जानी चाहिए। इस तरह की योजना को उपभोक्ता वस्तुओं के दाम बढ़ने और शहरी उपभोक्ताओं की प्रतिक्रिया के आधार पर नहीं आंका जाना चाहिए।</span></p>
<p dir="ltr"><span>7. गवर्नेंस पर फोकस नहींः नई खाद्य प्रणाली के लिए एक नए गवर्नेंस ढांचे की भी जरूरत है। खाद्य एवं कृषि पर होने वाली चर्चाओं में अक्सर गवर्नेंस के मुद्दे की अनदेखी कर दी जाती है। स्थानीय स्तर पर लोगों के पास जो ज्ञान होता है या उनकी जो दक्षता और क्षमता होती है, उनका इस्तेमाल स्थानीय स्तर पर प्रासंगिक इनोवेटिव सिस्टम बनाने में नहीं किया जाता है। स्थानीय स्तर के संस्थानों को शामिल करते हुए एक बदलावकारी व्यवस्था के लिए बहुत कुछ करने की जरूरत है। खाद्य प्रणाली के ढांचे में गवर्नेंस के मुद्दे की अनदेखी करना बड़ी विफलता का कारण हो सकता है।</span></p>
<p dir="ltr"><span>निस्संदेह भारत को खाद्य प्रणाली बदलने की जरूरत है। यह बदलाव किस दिशा में हो, उसी पर नई खाद्य प्रणाली की सफलता निर्भर करेगी।</span></p>
<p><em><strong>(लेखक भारत सरकार के खाद्य और कृषि मंत्रालय के पूर्व सचिव हैं)</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ भारत को अपनी जरूरतों के मुताबिक खाद्य प्रणाली की जरूरत ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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        <title><![CDATA[जम्मू&amp;#45;कश्मीर में कृषि में बड़े बदलाव की राह तैयार कर रहा है शेर&amp;#45;ए&amp;#45; कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/skuast-making-path-of-change-in-agriculture-in-jammu-kashmir.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 21 Nov 2022 08:14:02 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/skuast-making-path-of-change-in-agriculture-in-jammu-kashmir.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><strong>एसकेयूएएसटी चट्टा कैंपस, जम्मू</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">जम्मू और कश्मीर में स्पेशियलाइज्ड एग्रीकल्चर का आधार तैयार हो रहा है। यहां</span> <span style="font-weight: 400;">जम्मू और कश्मीर में अधिक वैल्यूएशन</span> <span style="font-weight: 400;">की बागवानी</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">औषधीय प्लांट्स</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">खाद्य प्रसंस्करण के लिए उपयोगी फसलों</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">विभिन्न एग्रो क्लाइमेट में होने वाली फसलों</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">डेयरी और फिशरीज के</span> <span style="font-weight: 400;">क्षेत्र में</span> <span style="font-weight: 400;">नई पहल हो रही है। इंटीग्रेटेड फार्मिंग और नेचुरल फार्मिंग के मॉडल पर काम करने के साथ ही डेयरी</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">बॉयोटेक्नोलॉजी और फिशरीज में</span> <span style="font-weight: 400;">मौजूद संभावनाओं के दोहन की दिशा में</span> <span style="font-weight: 400;">भी</span> <span style="font-weight: 400;">काम हो रहा है। राज्य के कृषि क्षेत्र की इस नई तस्वीर की कहानी शेर-ए- कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय </span><span style="font-weight: 400;">(</span><span style="font-weight: 400;">एसकेयूएएसटी - SKUAST</span><span style="font-weight: 400;">) </span><span style="font-weight: 400;">लिख रहा है</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">जिसे पिछले दो साल में अधिक गति मिली है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">दो दिन इस यूनिवर्सिटी के कैंपस को देखने समझने और यहां आयोजित कृषक मेले के कामयाब आयोजन में मुझे वही सब देखने को मिला जिससे मैंने इस रिपोर्ट की शुरुआत की है। मैंने यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रोफेसर जे</span><span style="font-weight: 400;">.</span><span style="font-weight: 400;">पी</span><span style="font-weight: 400;">. </span><span style="font-weight: 400;">शर्मा से कहा कि आपकी यूनिवर्सिटी एग्रीकल्चर एजुकेशन</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">शोध और किसानों व आंत्रप्रेन्योर के साथ तालमेल के क्षेत्र में नया काम कर रही है। यह इसकी युवा सोच से परिपक्व होने की दिशा में एक कदम तो है ही, यह जम्मू-कश्मीर के कृषि क्षेत्र की संभावनाओं को नतीजों में बदलने की दिशा में एक बड़ी कोशिश भी है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">यहां </span><span style="font-weight: 400;">17 </span><span style="font-weight: 400;">से </span><span style="font-weight: 400;">21 </span><span style="font-weight: 400;">नवंबर के बीच आयोजित कृषि मेले का विषय &lsquo;आत्मनिर्भर भारत के लिए कृषि विविधीकरण&rsquo; रखा गया है। यह मेला विश्वविद्यालय के कार्यों को समझने का एक बेहतर माध्यम बन कर उभरा है। इसमें भाग ले रहे एग्री स्टार्टअप</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">एफपीओ, आंत्रप्रेन्योर, किसान व यूनिवर्सिटी के एग्रीकल्चरल मैनेजमेंट व टेक्नोलॉजी विभागों के छात्र अपने कार्यों के जरिये राज्य में कृषि की संभावनाओं और मूल्यवर्धन के जरिये बेहतर कृषि आय की अहमियत को साबित करते हैं। यह किसी बड़े शहर और पहले से स्थापित पहचान वाले कृषि विश्वविद्यालय का कृषक मेला तो नहीं था, फिर भी मैंने महसूस किया कि यह एक जीवंत कृषक मेला था। इसके भागीदार, जिनमें अधिकांश युवा थे, इसे कामयाब कर रहे थे।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">मेले में किसानों की मौजूदगी</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा और प्रस्तुति के साथ ही गैर कृषक वर्ग को मेले से जोड़ने के लिए लॉन प्रतिस्पर्धा और इस क्षेत्र के तालाब व वाटर बाडीज के बीच प्रतिस्पर्धा कराई गई। सांस्कृतिक और खेल प्रतिस्पर्धाओं ने कृषक मेले और आम शहरी के बीच एक पुल का काम किया।</span></p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/11/image_750x_637ae4f0c6006.jpg" alt="" /></p>
<p><span style="font-weight: 400;">वाइस चांसलर प्रोफेसर जे</span><span style="font-weight: 400;">. </span><span style="font-weight: 400;">पी</span><span style="font-weight: 400;">. </span><span style="font-weight: 400;">शर्मा <strong>रूरल वॉयस</strong> के साथ बातचीत में कहते हैं, इस मौके पर विभिन्न विभागों और संस्थानों के साथ सहमति पत्र </span><span style="font-weight: 400;">(</span><span style="font-weight: 400;">एमओयू</span><span style="font-weight: 400;">) </span><span style="font-weight: 400;">पर हस्ताक्षर किये गये। लेकिन हमारी कोशिश है कि यह एमओयू केवल दस्तखत वाले दिन की औपचारिकता नहीं रहनी चाहिए, बल्कि यह फंक्शनल हों ताकि जिस सोच और उद्देश्य के साथ यह समझौते हो रहे हैं उनको जमीनी स्तर पर अमली जामा पहनाया जाए। तभी किसानों और कृषि क्षेत्र को इसका फायदा मिलेगा।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">प्रोफेसर शर्मा एफपीओ का गठन कर मूल्यवर्धन को बढ़ावा देने के लिए काम कर रहे हैं। विश्वविद्यालय यहां स्पेशियलिटी एग्रीकल्चर को पारंपरिक फसलों के मुकाबले अधिक तरजीह देना नई संभावनाओं की राह खोल रहा है। उसमें पंपोर के अलावा किश्वतवाड़ में केसर की खेती हो या अखरोट जैसी दूसरी किस्मों की खेती की संभावना हो। पॉल्ट्री और डेयरी पर जोर देना यहां किसानों के लिए फायदेमंद है। किसानों के पास जमीन का औसत कम होने के चलते कम जमीन में अधिक कमाई वाली फसलों को बढ़ावा देना यहां जरूरी है। साथ ही यहां हर तरह के एग्रो क्लाइमेट मौजूद हैं। यह देश में अपने किस्म की खासियत रखने वाला अकेला राज्य है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">विश्वविद्यालय के डायरेक्टर एक्सटेंशन डॉ</span><span style="font-weight: 400;">. </span><span style="font-weight: 400;">एस</span><span style="font-weight: 400;">. </span><span style="font-weight: 400;">के गुप्ता एक हैक्टेयर में तैयार इंटीग्रेटेड एग्रीकल्चर मॉडल को दिखाते हुए कहते हैं कि किसानों की आय में गुणात्मक बदलाव दर्शाने वाला यह व्यावहारिक मॉडल हमने तैयार किया है। इसमें धान</span><span style="font-weight: 400;">-</span><span style="font-weight: 400;">गेहूं के साथ हल्दी जैसे मसाले</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">पशुओं के चारे</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">आम और अमरूद जैसे फलदार पौधे</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">फिशरीज</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">पॉल्ट्री</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">डेयरी फार्मिंग और बायो मास का इनपुट के रूप में इस्तेमाल किया गया है। यह फार्म पूरी तरह से आर्गेनिक है। इसके चलते इनपुट लागत में कमी और पूरे साल आय के जरिये किसान बेहतर आमदनी कर सकता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">यूनिवर्सिटी की नई पहल और कोशिशों के बारे में <strong>रूरल वॉयस</strong> के साथ बातचीत में वाइस चांसलर शर्मा बताते हैं कि यहां एग्री स्टार्टअप इको सिस्टम तैयार हो रहा है। इसको देखते हुए हम विविधीकरण</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">प्रोसेसिंग</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">वैल्यू एडिशन</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">ब्रांडिंग और मार्केटिंग पर हम जोर दे रहे हैं। हमने कई संस्थाओं के साथ एमओयू किये हैं। मनु कृषि हमारी एक बी</span><span style="font-weight: 400;">-</span><span style="font-weight: 400;">टेक स्टूडेंट का स्टार्टअप है जो एनीमल फीड पर काम कर रहा है। उसके साथ हम एमओयू कर रहे हैं</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">उसने हमारे यहां ट्रेनिंग ली है। हम बाजार मूल्यों पर गुणवत्तायुक्त उत्पाद प्राथमिकता के आधार पर उससे खरीदेंगे।</span></p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/11/image_750x_637ae53ab4563.jpg" alt="" /></p>
<p><span style="font-weight: 400;">प्रो. शर्मा के अनुसार, हमने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इंटीग्रेटेड मेडिसिन (ट्रिपल आईएम</span><span style="font-weight: 400;">) </span><span style="font-weight: 400;">के साथ एमओयू किया है। कंसास यूनिवर्सिटी के साथ समझौता किया। अब आइसोलेशन का नहीं, कनवर्जेंस का समय है। कृषि ऐसा क्षेत्र है जिसमें कनवर्जेंस की सबसे अधिक जरूरत है। हमने दूसरे विभागों के लिए अपने दरवाजे खोले हैं। दूसरी यूनिवर्सिटी भी हमारी लैब का इस्तेमाल कर सकती हैं। प्रोफेसर ऑफ प्रेक्टिस के यूजीसी के प्रावधान को हम अपने यहां अमल में लाएंगे और ऐसे किसानों को जोड़ेंगे जो अपने काम में पारंगत हैं। वह हमारे छात्रों को शिक्षा दे सकेंगे। हम ऐसे किसानो को अगले कन्वोकेशन में पीएचडी की डिग्री देंगे।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">प्रो. शर्मा के मुताबिक डायवर्सिफिकेशन के लिए यह बहुत अनुकूल राज्य है। जम्मू कश्मीर की जो क्लाइमेट कंडीशन ऐसी है कि दुनिया में कहीं भी जो चीज पैदा हो सकती है, वह यहां भी पैदा हो सकती है। यहां का मौसम सब ट्रापिकल है</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">टेंपरेट है</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">ड्राइ डेजर्ट है, कोल्ड डेजर्ट है। लेवेंडर</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">लैमन ग्रास</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">केसर</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">ओलिव</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">मेडिसिनल प्लांट</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">स्पाइसेज</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">काला जीरा ये सब यहां हो सकते हैं जो पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में संभव नहीं है।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">यहां किसानों की लैंड होल्डिंग का स्तर राष्ट्रीय औसत से कम है। यह करीब आधा हैक्टेयर है। ऐसे में हमें लो वॉल्यूम हाइ वैल्यू उत्पादों के बारे में सोचना है। यहां स्पेशियलिटी एग्रीकल्चर की मांग भी है, लेकिन हम पूरा नहीं कर पाते हैं।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">उन्होंने बताया कि इस यूनिवर्सिटी में दो फैकल्टी थी</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">एग्रीकल्चरल साइंसेज और वेरटरनरी साइंस की। हमने इसमें नई फैकल्टी जोड़ी है। </span><span style="font-weight: 400;">2005 </span><span style="font-weight: 400;">से तीन फैकल्टी जोड़ने की बात हो रही थी, पर उप राज्यपाल ने इसे मंजूरी दी। इनमें एग्रीकल्चर इंजीनियरिंग</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">डेयरी टेक्नोलॉजी और फैकल्टी हार्टिकल्चर एंड फोरेस्ट्री जुड़ गई हैं और इनमें छात्रों के एडमिशन भी हो गये हैं। यह जरूरत थी इस क्षेत्र की। यहां हार्टिकल्चर नहीं थी। हमने एमएससी फिशरीज भी शुरू की है। यहां एग्रीबिजनेस का बड़ा स्कोप है। इसके लिए इंस्टीट्यूट ऑफ एग्रीबिजनेस और इंस्टीट्यूट ऑफ बॉयोटेक्नोलॉजी भी बोर्ड से मंजूर हो गया है। इसके चलते उत्तर भारत में इस यूनिवर्सिटी ने अपनी जगह बना ली है और यह जम्मू क्षेत्र के लिए बड़े गर्व की बात है।</span></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/11/image_750x500_637ae18c39067.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ जम्मू-कश्मीर में कृषि में बड़े बदलाव की राह तैयार कर रहा है शेर-ए- कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[जीएम सरसों को मंजूरी  कृषि  विकास को गति देने  वाला कदम]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/approval-of-gm-mustard-a-step-of-accelerating-agriculture-advancement.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 07 Nov 2022 09:29:45 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/approval-of-gm-mustard-a-step-of-accelerating-agriculture-advancement.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">विज्ञान प्रदत्त इनोवेशन ने पूरी दुनिया में विकास के एजेंडे में क्रांतिकारी परिवर्तन किया है। यह परिवर्तन हर सेक्टर में है। पिछले दिनों महामारी के दौरान समाज पर विज्ञान और नई टेक्नोलॉजी के प्रभाव को मानव जगत ने महसूस किया। सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल (एसडीजी) को हासिल करने में भी टेक्नोलॉजी एक महत्वपूर्ण कारक है। यह जरूरी है कि हम अपनी आर्थिक और सामाजिक प्रगति को गति प्रदान करने के लिए टेक्नोलॉजी में भी तेजी से विकास करें।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">हरित क्रांति से लेकर अब तक कृषि के क्षेत्र में टेक्नोलॉजी के अनेक इस्तेमाल देखने को मिले हैं। हमारे किसानों को गेहूं और चावल की अधिक पैदावार वाली किस्में उपलब्ध हुईं। उर्वरक, कीटनाशक, सिंचाई प्रणाली तथा अन्य तकनीकी प्रगति का भी फायदा खेती को मिला। इसका असर किसानों की बढ़ी हुई आमदनी, गरीबी और भूख में कमी तथा बेहतर खाद्य एवं पोषण सुरक्षा के रूप में सामने आया। उत्पादकता और उत्पादन में वृद्धि से देश ना सिर्फ अनाज का बड़ा उत्पादक बना बल्कि बड़ा निर्यातक भी बन चुका है, जबकि एक समय भारत इनका आयात करता था।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">हमारे किसानों को तकनीकी विकास से किसी भी तरह वंचित न रहना पड़े, इसके लिए शोधकर्ता प्रौद्योगिकी में निरंतर हो रहे बदलावों के अनुरूप खेती में भी बदलाव लाने के लिए कठिन प्रयास करते रहे हैं। आज भारत में एक विकसित कृषि एवं बायोटेक्नोलॉजी रिसर्च और डेवलपमेंट इकोसिस्टम है जो दक्ष शोधकर्ताओं और अत्याधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर के मामले में क्षमता निर्माण पर फोकस करता है। नीतिगत वातावरण भी नए इनोवेशन में अधिक जोखिम के प्रति फेवरेबल है। यह इंडस्ट्री और अकादमिक जगत को साथ लाने के लिए पीपीपी मॉडल को बढ़ावा देने पर काम कर रहा है। साथ ही यह एक वाइब्रेंट और मजबूत स्टार्टअप इकोसिस्टम को भी बढ़ावा दे रहा है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">हाल में सरकार ने जीनोम एडिटेड फसलों की सुरक्षा के आकलन के दिशानिर्देश जारी किए। साथ ही जीएम सरसों की पर्यावरण रिलीज की अनुमति दी। यह शोध एवं वैज्ञानिक समुदायों को बढ़ावा देने के साथ खेती के विकास के लिए भी सकारात्मक कदम है, जिसका फायदा अंततः किसानों को मिलेगा। इस कदम से ना सिर्फ अत्याधुनिक रिसर्च को बढ़ावा मिलेगा बल्कि हमारे किसानों को फसलों की बेहतर किस्में भी उपलब्ध होंगी।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">जेनेटिकली मॉडिफाइड (जीएम) टेक्नोलॉजी में प्रचुर संभावनाएं हैं। इसे कम से कम 71 देश अभी तक अपना चुके हैं और 29 देशों में 20 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में जीएम फसलों की खेती हो रही है। मानव और पर्यावरण सुरक्षा दोनों लिहाज से इन टेक्नोलॉजी की क्षमता स्थापित हो चुकी है। ये किस्में बेहतर उत्पादकता, बायोटिक और एबायोटिक स्ट्रेस रेजिस्टेंस, बेहतर पोषण और जलवायु परिवर्तन के प्रति प्रतिरोधक क्षमता दिखा चुकी हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अधीन जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेजल कमेटी (जीईएसी) ने 25 अक्टूबर 2022 को बहुप्रतीक्षित फैसला किया। उसने ट्रांसजेनिक सरसों हाइब्रिड DMH-11 और बारनेस, बारस्टार तथा बार जीन वाले पैरंटल लाइन 3.6 और modbs 2.99 को पर्यावरण रिलीज की मंजूरी दी। इससे नए पैरंटल लाइन और नई हाइब्रिड किस्मों का विकास हो सकेगा। यह फैसला उत्पादकता बढ़ाने और पोषण क्वालिटी सुधारने में बड़े पैमाने पर मददगार साबित होगा, खासकर यह देखते हुए कि भारत अपनी 55 से 60% खाद्य तेल की जरूरत आयात से पूरा करता है। इस बढ़ती घरेलू मांग को पूरा करने के लिए जीएम सरसों हाइब्रिड सबसे अच्छा विकल्प है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रो. दीपक पेंटल और उनकी टीम ने 3 दशक से अधिक की रिसर्च के बाद जो जीएम सरसों की किस्म विकसित की है वह पहली खाद्य फसल है जिसे भारत में पर्यावरण रिलीज की मंजूरी मिली है। इससे पहले भारत में सिर्फ एक जीएम फसल, 2002 में बीटी कॉटन को स्वीकृति मिली थी। आज करीब 80% कपास किसान बीटी कॉटन की ही खेती करते हैं। एक अध्ययन के मुताबिक जेनेटिकली मॉडिफाइड बीटी कॉटन की खेती से भारत में रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल 37% कम हुआ है, फसल की उत्पादकता 22% बढ़ी है और किसानों का लाभ भी 68% बढ़ गया है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">जीएम सरसों लाइन और हाइब्रिड DMH-11 को भारत में कई सख्त बायोसुरक्षा परीक्षणों से गुजरना पड़ा है। जीएम सरसों हाइब्रिड DMH-11 की उत्पादकता पारंपरिक किस्मों की तुलना में प्रति हेक्टेयर 25 से 30% अधिक है। बायो सुरक्षा परीक्षण के दौरान किए गए फील्ड ट्रायल में हाइब्रिड डीएमएच 11 को सरसों की मौजूदा वैरायटी वरुणा की तुलना में 28% और क्षेत्रीय किस्मों की तुलना में 37% अधिक उपज वाला पाया गया। सरसों स्वपरागण वाला पौधा है और&nbsp; इस टेक्नोलॉजी से काफी बेहतर हाइब्रिड किस्म की सरसों विकसित की जा सकती है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">जीएम सरसों में 3 ट्रांस जीन हैं। बार जो एक मार्कर जीन है और पौधों में बास्ता हर्बिसाइड का प्रतिरोध पैदा करता है, बारनेस जो पुरुष गुण को खत्म (मेल स्टर्लिटी- MS) करता है और बारस्टार जो फर्टिलिटी रिस्टोर (RF) करता है। इन्हें मिट्टी में पाए जाने वाले बैक्टेरियम बेसिलस एमाइलोलिक्वेफेशियंस से लिया गया है। इन तीनों जीन को पहली बार रेपसीड में इस्तेमाल किया गया था और उससे हाइब्रिड बीज तैयार किया गया। रेपसीड में MS और RF लाइन तथा उनके हाइब्रिड 1996 में कनाडा में जारी किए गए और तब से वहां इसका उत्पादन हो रहा है। अमेरिका में यह 2002 में और ऑस्ट्रेलिया में 2007 से हो रहा है। बेहतर MS और RF सिस्टम उपलब्ध होने से ज्यादा उत्पादन वाले हाइब्रिड तथा बेहतर तेल और खली वाले हाइब्रिड आगे तैयार किए जा सकते हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">मार्च 2022 में सरकार का जीनोम एडिटेड फसलों की सुरक्षा से संबंधित गाइडलाइंस जारी करना भी काफी महत्वपूर्ण कदम था। यह इस बात का महत्वपूर्ण संकेत था कि हम खेती में सुधार के लिए नई टेक्नोलॉजी की तरफ बढ़ रहे हैं ताकि हमारी खाद्य एवं पोषण सुरक्षा की मांग को पूरा किया जा सके।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">हाल के समय में मानव जगत ने जो सबसे बड़ा संकट देखा, वह कोविड-19 महामारी है। हालांकि उससे भी बहुत कुछ हमने सीखा है। हमने विज्ञान आधारित इनोवेशन के महत्व और समाज पर उसके प्रभाव को समझा। हमने एक मजबूत और वाइब्रेंट शोध की ताकत तथा आपसी सहयोग को भी देखा। इन सबने मिलकर हमें घरेलू स्तर पर विकसित दवाओं और वैक्सीन पोर्टफोलियो के जरिए कोविड-19 से लड़ने में मदद की। यह सीख दूसरे क्षेत्रों, खासकर खेती के लिए भी काफी महत्वपूर्ण है। हमें बेहतर किस्म की फसलों के लिए एक मजबूत और प्रभावी इकोसिस्टम तैयार करने की जरूरत है ताकि हम अपनी बढ़ती खाद्य एवं पोषण जरूरतों को पूरा करने के लिए किसानों को वह इकोसिस्टम उपलब्ध करा सकें।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कृषि में जेनेटिक इंजीनियरिंग और जीन एडिटिंग इस तरह की टेक्नोलॉजी से जुड़ी प्रगति काफी अग्रगामी कदम है। हमने न सिर्फ बेहतर किस्म की फसलें विकसित की हैं बल्कि प्लेटफॉर्म टेक्नोलॉजी, टूल और प्रोसेस भी विकसित किया है जो हमें कम समय में ज्यादा अच्छी किस्में विकसित करने में मदद करते हैं। कृषि के क्षेत्र में इस त्वरित प्रगति (एक्सीलरेटेड एग्रीकल्चर एडवांसमेंट) से बेहतर उत्पादकता और पोषण की जरूरत पूरी करने में मदद मिलती है। यही नहीं, इसकी मदद से देश निर्यात करने में भी सक्षम होता है। यह आत्मनिर्भर भारत की दिशा में सही कदम है।</span></p>
<p><em><strong>(डॉ रेणु स्वरूप, भारत सरकार के विज्ञान एवं टेक्नोलॉजी मंत्रालय के बायोटेक्नोलॉजी विभाग की पूर्व सचिव हैं)</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ जीएम सरसों को मंजूरी  कृषि  विकास को गति देने  वाला कदम ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[जीएम सरसों की रिलीजः एक प्रगतिशील कदम]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/release-of-gm-mustard-a-progressive-decision.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 31 Oct 2022 08:52:08 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/release-of-gm-mustard-a-progressive-decision.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अधीन जीईएसी (GEAC) की सिफारिशों पर सरकार ने हाल में जीएम सरसों की हाइब्रिड किस्म DMH 11 को जो मंजूरी दी है, वह वास्तव में एक बड़ा फैसला है। यह हमारे किसानों और देश के हित में है। जीएम यानी जेनेटिकली मॉडिफाइड फसलों पर लंबे समय से चल रहे अवैज्ञानिक प्रतिबंध को हटाने का यह निर्णय आत्मनिर्भर भारत की तरफ बढ़ने की सरकार की प्रतिबद्धता को दिखाता है। यह हमारे वैज्ञानिक समुदाय और किसानों की बहुप्रतीक्षित आकांक्षाओं को भी पूरा करता है जो इस तरह की इनोवेटिव टेक्नोलॉजी के फायदे उठाना चाहते हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कुछ लोग इसे लेकर जो डर जता रहे हैं वह वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है। सच कहा जाए तो इस तरह की आपत्तियां नई नहीं हैं। 1960 के दशक के उत्तरार्ध में हरित क्रांति के जरिए खाद्य के मामले में आत्मनिर्भरता हासिल करने के मकसद से जब हमने गेहूं और चावल की ड्वार्फ बीजों का आयात किया था तब भी ऐसी आपत्तियां जताई गई थी। मेरे भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) का प्रमुख रहते जब बीटी कॉटन रिलीज किया गया था तब भी मुझे ऐसी आपत्तियों का सामना करना पड़ा था। इन किस्मों के नतीजे दुनिया भर में सर्वविदित हैं। आज हम इन मामलों में न सिर्फ आत्मनिर्भर हैं बल्कि बड़े निर्यातक भी हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">विज्ञान आधारित क्रांतियों ने हमारे देश को वह आत्म सम्मान और वैश्विक पहचान दिलाई है जिसकी बेहद आवश्यकता थी। हम आज कई कृषि उपज के बड़े निर्यातक हैं जिनमें अनाज और कपास भी शामिल हैं। हम इनका साल में 50 अरब डॉलर से अधिक का निर्यात करते हैं। यह सब सरकार की सही नीतियों, श्रेष्ठ संस्थाओं की स्थापना, सक्षम मानव संसाधन तैयार करने, प्रोग्रेसिव किसान तैयार करने और वैश्विक साझेदारी मजबूत करने की वजह से संभव हो सका है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">प्राकृतिक संसाधनों (मिट्टी, पानी, बायोडायवर्सिटी) के अत्यधिक दोहन, फैक्टर उत्पादक घटने, सस्टेनेबल डेवलपमेंट लक्ष्य (एसडीजी) को हासिल करने की जल्दी, खासकर गरीबी दूर करने और भूख की समस्या खत्म करने, जलवायु परिवर्तन के विपरीत प्रभावों के समय पर समाधान जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए वैज्ञानिक इनोवेशन पर अधिक निर्भरता और उनका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल सर्वश्रेष्ठ विकल्प जान पड़ता है। इस लिहाज से जीएम खाद्य फसलें हमारे राष्ट्र के हित में हैं। जेनेटिकली मॉडिफाइड मक्का, सोयाबीन, कपास, टमाटर और कनोला प्रमुख फसलों में हैं जिनकी विश्व में बड़े पैमाने पर खेती हो रही है। जीएम फसलों की इस समय करीब 20 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में खेती होती। भारत के अलावा अमेरिका, ब्राज़ील, अर्जेंटीना, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, फिलिपींस, पाकिस्तान, बांग्लादेश और चीन में इनकी खेती हो रही है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">जहां तक ब्रासिका (Brassica) की बात है तो एक करोड़ हेक्टेयर (कुल का लगभग 24%) से अधिक क्षेत्र 35 जीएम इवेंट के तहत है, जिसकी कॉमर्शियल खेती अमेरिका, अर्जेंटीना, ब्राज़ील, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में होती है। भारत अभी खाद्य तेलों की कमी (लगभग 55-60%) को पूरा करने के लिए हर साल करीब 130 लाख टन खाद्य तेलों का आयात करता है, जिस पर 1.17 लाख करोड़ रुपए खर्च होते हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">रोचक बात यह है कि इसमें से 20 से 25 लाख टन सोयाबीन तेल और 10 से 15 लाख टन कनोला तेल जेनेटिकली मॉडिफाइड होता है। इस तरह हम जीएम तेल पहले ही खा रहे हैं। इसके अलावा 15 लाख टन जीम कॉटन ऑयल का घरेलू उत्पादन होता है। यह बात वैज्ञानिक रूप से साबित हो चुकी है कि रिफाइंड तेल खाने पर मनुष्य के शरीर में किसी तरह का प्रोटीन नहीं जाता है। इस तरह जीएम खाद्य तेल का इस्तेमाल सेहत के लिहाज से पूरी तरह सुरक्षित है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">हमारे किसानों की एक बड़ी समस्या यह है कि सरसों की उत्पादकता कम है। यह 1260 किलो प्रति हेक्टेयर के आसपास लंबे समय से स्थिर है, जबकि वैश्विक औसत 2000 किलो प्रति हेक्टेयर है। कनाडा, चीन और ऑस्ट्रेलिया में कनोला की उत्पादकता भारत की तुलना में लगभग 3 गुना ज्यादा है क्योंकि वहां जीएम हाइब्रिड टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल हो रहा है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अरसे से सरसों हमारी प्रमुख तिलहन फसल है। मुख्य रूप से राजस्थान, हरियाणा, पंजाब और मध्य प्रदेश में 60 से 70 लाख हेक्टेयर में इसकी खेती की जाती है। इस तरह जीएम सरसों हाइब्रिड के उत्पादन की अनुमति देने के सरकार के फैसले से हमारी उत्पादकता बढ़ाने और कीटनाशकों का इस्तेमाल कम करने में मदद मिलेगी। इसलिए कृषि मंत्रालय और आईसीएआर को तेजी से आगे बढ़ना चाहिए और मौजूदा रबी सीजन में हाइब्रिड डीएमएच 11 किस्म के उपलब्ध बीजों का परीक्षण करना चाहिए। यह परीक्षण सरसों की खेती वाले इलाकों में कुछ चुने हुए किसानों के खेतों में किया जाना चाहिए और अगले साल इसका क्षेत्रफल बढ़ाने के लिए अच्छी क्वालिटी के बीज तैयार करने के मकसद से सरकारी-निजी साझेदारी को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">यही नहीं आईसीएआर के संस्थानों और राज्यों के कृषि विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिकों को जीएम सरसों की हाइब्रिड किस्में मिशन मोड में विकसित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। जीएम सोयाबीन और जीएम मक्के के उत्पादन की अनुमति देना भी अग्रगामी कदम होगा ताकि इन फसलों की भी उत्पादकता बढ़ाई जा सके और प्रधानमंत्री के विजन के मुताबिक किसानों की आय दोगुनी हो सके।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">यहां गौर करने वाली बात यह है कि ऑस्ट्रेलिया ने हाल ही हर्बिसाइड टोलरेंट जीएम भारतीय सरसों को मंजूरी दी है जो समान टेक्नोलॉजी पर आधारित है, जबकि वह सामान्य भारतीय सरसों की खेती नहीं करते हैं। जाहिर है कि वे दक्षिण एशियाई देशों में सरसों तेल की बढ़ती मांग को पूरा करना चाहते हैं।</span></p>
<p><em><strong>(लेखक ICAR के पूर्व डायरेक्टर जनरल, DARE के पूर्व सचिव और इंडियन साइंस कांग्रेस के पूर्व प्रेसिडेंट हैं)</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ जीएम सरसों की रिलीजः एक प्रगतिशील कदम ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[&amp;apos;सरकार और उपभोक्ता तो खुश, लेकिन इस वर्ष प्याज किसानों की आंखों में आंसू&amp;apos;]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/government-and-the-consumers-are-happy-but-the-onion-farmers-are-shedding-tears.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 25 Oct 2022 13:07:28 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/government-and-the-consumers-are-happy-but-the-onion-farmers-are-shedding-tears.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">सरकार और उपभोक्ता खुश हैं कि इस साल प्याज के दाम कम रहेंगे और किसी भी उपभोक्ता की आंखों में आंसू नहीं आएंगे। लेकिन इसके विपरीत इस वर्ष किसान आंसू बहा रहे हैं। अनेक किसानों ने इस साल मई से प्याज का भंडार कर रखा था। उन्हें उम्मीद थी कि आगे चलकर इसके अच्छे दाम मिलेंगे, लेकिन सिर्फ निराशा उनके हाथ लगी और वे अच्छी क्वालिटी का प्याज ओने-पौने दाम पर बेच रहे हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">प्याज एक राजनीतिक फसल बन गई है और सत्ता में काबिज कोई भी पार्टी नहीं चाहती कि इसकी कीमत ज्यादा बढ़े। सरकार ने प्याज के भंडारण की सुविधाओं का निर्माण करने के लिए किसानों को सब्सिडी दी। किसानों को लगा कि इसके पीछे सरकार का उद्देश्य यह था कि उन्हें प्याज की बेहतर कीमत मिल सकेगी। लेकिन अब यह स्पष्ट हो गया है कि वह सब्सिडी किसानों के लिए नहीं बल्कि उपभोक्ताओं के लिए थी ताकि उन्हें पूरे साल कम कीमत पर प्याज मिल सके।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">प्याज की फसल जब तैयार होती है तो सरप्लस होने की स्थिति में सरकार हस्तक्षेप करती है और नेफेड (NAFED) के माध्यम से इसे खरीदती है। इसके लिए मूल्य स्थिरीकरण फंड (PSF) बनाया गया है। हालांकि प्याज को आवश्यक वस्तुओं की सूची में शामिल किया गया है, लेकिन इसके लिए कोई न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) नहीं है। आवश्यक वस्तु अधिनियम में शामिल हर कमोडिटी के लिए एमएसपी निर्धारित करना अनिवार्य है, लेकिन जल्दी खराब होने वाली कमोडिटी के कारण प्याज का कोई एमएसपी नहीं होता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अधिसूचित एजेंसियां बाजार कीमत पर प्याज की खरीद करती हैं। ये एजेंसियां ट्रेडर से बेहद कम कीमत पर प्याज खरीदती हैं लेकिन इनकी बिलिंग काफी ऊंचे दाम पर होती है। प्याज की खरीद और बिक्री में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार होता है। बफर स्टॉक इसलिए बनाया जाता है ताकि जब दाम बढ़े तो उसे नियंत्रित करने में उस स्टॉक का इस्तेमाल हो सके। लेकिन जब दाम घटते हैं तब किसानों को ऐसी कोई मदद नहीं मिलती है। ऐसे समय जब प्याज के दाम बढ़ रहे थे और किसानों को लगने लगा कि उन्हें 20 रुपये प्रति किलो से अधिक की कीमत मिल सकती है, तो नेफेड ने अपने स्टॉक से बाजार में बड़े पैमाने पर प्याज उतार दिया। नतीजा यह हुआ कि इसकी कीमत करीब 10 रुपये नीचे आ गई।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इस साल प्याज की उत्पादन लागत लगभग 20 प्रति किलो है। चार से पांच महीने तक प्याज का भंडारण करने पर प्रति किलो लगभग 5 रुपये का खर्च और जुड़ जाता है। प्याज की शेल्फ लाइफ सीमा को पार कर चुकी है इसलिए किसान उसे जल्दी बेचने के लिए मजबूर हैं, बदले में उन्हें चाहे जो कीमत मिले।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">सरकार ने प्याज के व्यापार में हमेशा हस्तक्षेप किया है। कभी स्टॉक लिमिट लगा कर, कभी एक राज्य से दूसरे राज्य में ले जाने पर अंकुश लगाकर, कभी न्यूनतम निर्यात मूल्य (MEP) बढ़ाकर तो कभी निर्यात पर पूरी तरह पाबंदी लगाकर। यह सभी कदम उपभोक्ताओं के लिए हैं और इनसे किसानों के हितों को नुकसान पहुंचा है। उपभोक्ताओं को प्याज की नियमित सप्लाई होती रहे और किसानों को उचित कीमत मिले, यह सुनिश्चित करने के लिए सरकार को हस्तक्षेप बंद करना होगा। बाजार और व्यापारियों को यह तय करने दिया जाए कि प्याज का निर्यात अथवा आयात करना है या नहीं, या फिर इसे बाजार में किस कीमत पर बेचा जाना है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">भारत घरेलू खपत के दोगुने से भी ज्यादा प्याज का उत्पादन करता है। इसलिए निर्यात के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में हमने अपना हिस्सा कम कर लिया है। कुछ साल पहले तक प्याज के वैश्विक निर्यात में 40% हिस्सा भारत का होता था जो अब घटकर 8.5% रह गया है। निर्यात को लेकर अनिश्चितताओं से भरी नीति के कारण हमने बड़े आयातकों के बाजार को खो दिया है। इससे हमारे प्रतिस्पर्धी देशों को फायदा मिला है। अतिरिक्त प्याज की खपत प्रोसेसिंग इकाइयों में हो सकती है, लेकिन प्याज से जुड़ी प्रोसेसिंग इकाइयों में निवेश करने का कोई साहस नहीं दिखाता है। इसका कारण सरकार की अप्रत्याशित नीति है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">उपभोक्ता और केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी भले खुश हो, लेकिन इस देश के प्याज उत्पादक किसान रो रहे हैं। हमें उनके परिवार और उनकी आजीविका के बारे में भी सोचना चाहिए।</span></p>
<p><em><strong>(लेखक स्वतंत्र भारत पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं शेतकारी संघटन के पूर्व अध्यक्ष हैं व सुप्रीम कोर्ट द्वारा किसान आंदोलन के समाधान के लिए नियुक्त समिति के सदस्य रहे हैं)</strong></em></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2021/10/image_750x500_616d2b1b48378.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ 'सरकार और उपभोक्ता तो खुश, लेकिन इस वर्ष प्याज किसानों की आंखों में आंसू' ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[महंगाई को नियंत्रित रखने में हम दूसरों से बेहतर कर सकते हैं]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/lets-manage-our-potato-and-onion-as-we-can-do-better-than-others-in-inflation-control.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 23 Oct 2022 10:20:20 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/lets-manage-our-potato-and-onion-as-we-can-do-better-than-others-in-inflation-control.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">दुनिया इन दिनों महंगाई के ऐसे दौर का सामना कर रही है जैसा कई दशकों में नहीं देखा गया था। हालांकि भारत की स्थिति उतनी बुरी नहीं जितनी अन्य देशों की है। भारत में भी लोग महंगाई का सामना कर रहे हैं लेकिन यह तथ्य उनके लिए एक राहत की बात है। स्थिति अवांछनीय है और सरकार तथा रिजर्व बैंक को उसे संभालने के लिए आगे आना पड़ेगा। यहां लोग दोहरे संकट का सामना कर रहे हैं। एक तो महंगाई अधिक है और दूसरे रुपया कमजोर हो रहा है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">खुदरा महंगाई की 4% (इससे 2% कम या ज्यादा) की सीमा को हम सितंबर 2020 में ही पार कर चुके थे। थोक महंगाई भी 18 महीने से दोहरे अंकों में बनी हुई है। सितंबर 2022 में खुदरा महंगाई 7.41% और थोक महंगाई 10.7% दर्ज हुई है। इस साल जनवरी से रुपया 10% कमजोर हो चुका है। यह स्थिति तब है जब रिजर्व बैंक बीते एक साल में भारतीय करेंसी को संभालने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार से 90 अरब डॉलर खर्च कर चुका है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">महंगाई पर अपने पिछले लेखों में मैंने बताया था कि महंगाई अलग-अलग स्तर पर लोगों को किस तरह प्रभावित कर रही है। निष्पक्षता के साथ कहा जाए तो अमेरिका, इंग्लैंड या अन्य कई विकसित देश जितनी बुरी तरह प्रभावित हुए हैं वैसी स्थिति भारत की नहीं है। लेकिन हमें पाकिस्तान और श्रीलंका से भी अपनी तुलना नहीं करनी चाहिए क्योंकि उन्होंने भारत की तरह खुद को विकसित देशों में गिने जाने का लक्ष्य नहीं रखा है। लेकिन यह भी हकीकत है कि विकसित देशों की तुलना में भारतीय ज्यादा परेशानी में हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">ऐसा आखिर क्यों है। इसका जवाब आसान है- हमारी प्रति व्यक्ति आय विकसित देशों की तुलना में बहुत कम है। वे बड़ा झटका सहने की स्थिति में हैं लेकिन हम नहीं। हमारी प्रति व्यक्ति सालाना आय 2,500 डॉलर से कुछ कम है जबकि अमेरिका में लोगों की प्रति व्यक्ति सालाना आय हमारी तुलना में कम से कम 20 गुना ज्यादा है। इस स्थिति को अमीर बनाम बहुत कम अमीर कह सकते हैं। ऐसी हालत में महंगाई से अधिक कौन प्रभावित होगा?</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">महंगाई को नियंत्रित रखने के उपाय के बारे में बात करें तो इसके दो पारंपरिक तरीके रहे हैं। एक है मांग कम करना, अमेरिका का फेडरल रिजर्व इस तरीके पर आगे बढ़ रहा है जिससे वहां मंदी की आशंका व्यक्त की जा रही है। दूसरा तरीका है सप्लाई बढ़ाने का, जिससे उत्पादन बढ़ेगा और ज्यादा संख्या में लोगों को नौकरियां भी मिलेंगी। भारत को इस दूसरे विकल्प पर ही विचार करते हुए सप्लाई बढ़ाने के साथ बेहतर सप्लाई मैनेजमेंट पर भी ध्यान देना चाहिए।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">थोक मूल्य सूचकांक के आंकड़ों पर नजर डालें तो आपको सप्लाई मैनेजमेंट की स्थिति का अंदाजा मिलेगा और यह भी कि उसमें अभी कितनी बेहतरी की गुंजाइश है। सितंबर में आलू के दाम सालाना आधार पर 50% बढ़ गए जबकि प्याज के दामों में 21% की गिरावट है। आलू और प्याज दोनों हमारी रसोई की आवश्यक वस्तुएं हैं और इन पर सूखा, अधिक बारिश या अन्य किसी बाधा का काफी असर होता है। हालांकि सामान्य परिस्थितियों में दोनों आवश्यक जिंसों का उत्पादन पर्याप्त होता है, इसके बावजूद सालों से हम इनके दाम में काफी उतार-चढ़ाव देखते आ रहे हैं। इससे उपभोक्ताओं और किसानों दोनों को नुकसान होता है। यह सप्लाई मैनेजमेंट में खामी का एक बेहतरीन उदाहरण है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">सरकार के थोक मूल्य सूचकांक चार्ट में आलू, प्याज और सब्जियों को अलग-अलग हेड के तहत रखा गया है। अप्रैल 2022 से 6 महीने के दौरान सब्जियों के दाम सालाना आधार पर 18% या उससे अधिक ही बढ़े हैं। सितंबर में मंडियों में सब्जियों की कीमत पिछले साल की तुलना में 40% अधिक थी। आलू में भी यही देखने को मिला। इसमें अप्रैल से सितंबर के बीच 19.84% से 50% तक वृद्धि हुई है।य़ लेकिन प्याज की कहानी कुछ अलग है जिसने इस बार किसानों को रुलाया है। अप्रैल से इसके दाम लगातार नीचे रहे हैं। सितंबर में इसकी कीमत में 21% की गिरावट रही।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">जहां तक प्राथमिक खाद्य वस्तुओं की बात है तो हम सप्लाई में आने वाली विभिन्न समस्याओं की ओर उंगली उठा सकते हैं। हमारे कोल्ड स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर, सप्लाई चेन मैनेजमेंट, रेगुलेटरी मेकैनिज्म और व्यापारी समुदाय के मानक श्रेष्ठ नहीं कहे जा सकते। इसके लिए हम रूस-यूक्रेन युद्ध को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">क्रूड पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस को छोड़ दें तो बाकी वस्तुओं के लिए हर बार वैश्विक कारकों को जिम्मेदार ठहराने का कोई मतलब नहीं है। हालांकि पेट्रोलियम महंगा होने का असर दूसरी वस्तुओं पर भी पड़ता है। सच्चाई तो यही है कि अनेक वस्तुओं, खास कर खाने-पीने की चीजों के स्टॉक और सप्लाई को </span><span style="font-weight: 400;">स्मार्ट इन्वेंटरी और बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर से सुधारा जा सकता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;"><em><strong>(प्रकाश चावला सीनियर&nbsp;</strong></em><em><strong>इकोनॉमिक जर्नलिस्ट है और आर्थिक नीतियों पर लिखते हैं)</strong></em></span></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ महंगाई को नियंत्रित रखने में हम दूसरों से बेहतर कर सकते हैं ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[टियर 2 और टियर 3 शहरों में करियर ग्रोथ के लिए स्किल गैप कम करना जरूरी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/bridge-skill-gap-to-enhance-career-growth-in-tier-2-and-3-cities.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 09 Oct 2022 11:14:34 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/bridge-skill-gap-to-enhance-career-growth-in-tier-2-and-3-cities.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">कामकाजी युवा कैसे रहते हैं और भविष्य में वे किस तरह काम करेंगे, महामारी ने इसमें बड़ा बदलाव किया है। अकादमिक क्षेत्र और उद्योग के बीच जुड़ाव का अभाव आज ज्यादा परिलक्षित हो रहा है। वर्चुअल तरीका एक नया सामान्य बनता जा रहा है। ऐसे में युवाओं के लिए स्किल डेवलपमेंट पर नए सिरे से काम करने और मेंटरिंग की जरूरत है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय ने हाल ही &lsquo;यूथ इन इंडिया 2022&rsquo; रिपोर्ट जारी की है, जिसमें बताया गया है कि 2021 तक बिहार और उत्तर प्रदेश में कुल आबादी में युवाओं का अनुपात बढ़ा है। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और राजस्थान में देश के आधे से अधिक 52% युवा होने का अनुमान है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इन आंकड़ों को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि आज भारत में बेरोजगारी का संकट बढ़ा है। इस समस्या के पीछे एक कारण तो यह है कि यहां हर साल बड़ी संख्या में युवा कॉलेज से निकल रहे हैं। हालांकि विभिन्न उद्योगों में नए करियर के विकल्प और नई तरह की नौकरियां निकल रही हैं, लेकिन युवाओं को यह नहीं मालूम कि इन नई भूमिकाओं के लिए उन्हें किस तरह के स्किल की जरूरत है। इसलिए स्किल डेवलपमेंट और रोजगार के बीच बड़ा अंतर दिखता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इसका नतीजा यह हो रहा है कि युवा चुपचाप नौकरी छोड़ रहे हैं। लगातार अधिक काम करने की अपेक्षा में वे पहले ही बोझ से दबे थे, जबकि उन्हें स्किल डेवलपमेंट में कोई मदद नहीं मिलती थी और उनका वेतन भी स्थिर था। अब आईटी और उससे संबंधित सेक्टर में बड़े पैमाने पर इस्तीफे का डर सताने लगा है। इस संदर्भ में हमें कई इंडस्ट्री लीडर और मेंटर के शब्दों को ध्यान में रखना चाहिए जिन्होंने कहा है कि करियर शुरू करना और अवसर तलाश ना हमेशा मुश्किल होगा लेकिन वह असंभव कभी नहीं होगा।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">देश के डिजिटल रूप से सक्षम लोग इंडस्ट्री और अकादमिक क्षेत्र में शीर्ष स्तर तक पहुंचने की क्षमता रखते हैं। इसके लिए वे ऑनलाइन उपलब्ध अपस्किलिंग और मेंटरशिप प्रोग्राम की मदद ले सकते हैं। आकांक्षी युवाओं और प्रोफेशनल को ऐसे प्रोग्राम पर कोई खर्च भी नहीं आता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">e2eHiring आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म और रूरल वॉयस की साझीदारी का उद्देश्य टियर 2, 3 और टियर 4 शहरों में युवाओं के बीच इन विकल्पों के बारे में जागरूकता पैदा करना है। इन विकल्पों को अपनाने से उनके लिए नौकरियों के कई अवसर खुल सकते हैं। मेंटरशिप प्रोग्राम की भूमिका जागरूकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण होती है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">स्कूल-कॉलेज में युवाओं की मेंटरिंग करने से उनके मानसिक और शारीरिक तनाव को कम करने में मदद मिलेगी। खासकर तब जब वे कामकाजी आबादी का हिस्सा बनेंगे और अपनी इच्छा के मुताबिक करियर में प्रोफेशनल चुनौतियों का सामना करेंगे।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">e2eHiring के सीईओ मोनुरंजन बोरगोहेन मानते हैं कि ऐसे समय जब भारत अगली डिजिटल औद्योगिक क्रांति की तरफ बढ़ रहा है, तब बेहतर स्किल ताथा युवाओं के लिए अधिक संख्या में इंटरएक्टिव कैरियर प्लेटफार्म की जरूरत महसूस होगी। e2eHiring अकादमिक क्षेत्र और इंडस्ट्री के बीच इस अंतर को खत्म करने के लिए युवाओं की शिक्षा और रोजगार के प्रति नया समग्र दृष्टिकोण अपना रहा है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">e2eHiring टियर 2 और टियर 3 शहरों के कॉलेजों में ऑनलाइन और ऑफलाइन कैंपस ड्राइव संचालित करता है। हर कॉलेज के छात्र अंबेसडर अपनी चिंताओं और चुनौतियों के बारे में बताते हैं जिसका सामना उन्होंने नौकरी के आवेदन के दौरान किया है। इन सवालों के जवाब छात्रों के लिए काफी उपयोगी होते हैं। यह पहल छात्रों को भविष्य का लीडर बना सकती है जो भारत के भविष्य को आकार देंगे। प्रतिभाशाली और मोटिवेटेड युवाओं को करियर में अथवा स्टार्टअप बिजनेस में सफल होने में यह अहम भूमिका निभाते हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">रिक्रूटमेंट प्लेटफॉर्म टियर-2 और टियर-3 शहरों में बिना किसी शुल्क के इंटर्नशिप, मॉक इंटरव्यू, पर्सनैलिटी टेस्ट और मेंटरशिप जैसे कार्यक्रमों से लाखों युवाओं की मदद कर सकते हैं। इससे युवाओं की प्रोडक्टिविटी बढ़ेगी। भारत में 50% आबादी 25 साल अथवा उससे कम उम्र की है और 2050 तक यह अनुपात बढ़ेगा। ऐसे में युवाओं के लिए यह समझना जरूरी है कि उन्हें बिजनेस ग्रोथ के साथ अपनी प्रोफेशनल ग्रोथ के लिए भी नई चीजें सीखने को लेकर प्रतिबद्धता दिखानी होगी।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">हमें इस बात को स्वीकार करना पड़ेगा की टेक्नोलॉजी के उपयोग से आर्थिक विकास का रास्ता पूरी तरह बदल सकता है। ज्यादातर भारतीय छात्र कानून, इंजीनियरिंग, मेडिसिन, अकाउंट्स-फाइनेंस, डिजाइन, कंप्यूटर एप्लीकेशन और आईटी जैसे करियर विकल्पों के बारे में ही जानते हैं। लेकिन इनके अलावा भी कई विकल्प हैं जिन्हें छात्र भारत में ही आजमा सकते हैं। भविष्य के करियर विकल्पों के बारे में जानकारी ना होना देश के आर्थिक विकास को भी बाधित करता है। युवाओं को लाइव प्रोजेक्ट पर प्रशिक्षित करने की जरूरत है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">भारत के टियर 2 और टियर 3 शहर दुनिया में सबसे तेज गति से आगे बढ़ रहे हैं। उन शहरों में युवा आबादी काफी है। चंडीगढ़, इंदौर, वडोदरा, कोच्चि, कोयंबटूर और त्रिवेंद्रम ऐसे शहर हैं। आने वाले वर्षों में यह आईटी हब बन सकते हैं। इन शहरों की शिक्षा प्रणाली विकसित हो रही है लेकिन यह अब भी उस मुकाम से काफी पीछे हैं जहां उन्हें होना चाहिए। ऑर्गेनाइजेशन भी इन शहरों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं जो चिंता का विषय है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इन शहरों के कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों में प्रोजेक्ट आधारित लर्निंग और इंटर्नशिप बहुत जरूरी हो गया है। स्किल्ड और काम के लिए तैयार ग्रेजुएट की मांग की बात काफी दिनों से की जा रही है। अब लर्निंग अर्थात सीखने के महत्व को समझने की जरूरत है जिससे काम के अवसर बढ़ सके और स्किल गैप भी कम हो। जब सरकार लाइव स्किल डेवलपमेंट प्रायोजित कर रही है तो उसे स्किल डेवलपमेंट पार्टनर को लाइव प्रोजेक्ट की भी पहुंच देनी चाहिए ताकि युवाओं को उसका अनुभव हो सके और वह बड़ी चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं के लिए अपने आपको तैयार कर सके।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इंडिया स्किल्स रिपोर्ट 2020 को देखने पर पता चलता है कि युवाओं में रोजगार की दर 3 साल से स्थिर बनी हुई है। ग्लोबल बिजनेस सॉल्यूशंस फॉर एजुकेशन (GBC-Education), यूनाइटेड नेशंस चिल्ड्रन फंड (यूनिसेफ) और एजुकेशन कमीशन के अनुसार 2030 तक रोजगार के लिए जिस तरह की शिक्षा और स्किल की आवश्यकता होगी वैसी शिक्षा देश के 50% से अधिक युवाओं को नहीं मिल रही है। इंडस्ट्री के विभिन्न सेक्टर में जब प्रतिभाओं को निखारने की बात होती है तब इन आंकड़ों को ध्यान में रखना जरूरी है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">स्किल अपग्रेडेशन के साथ तकनीकी दक्षता बढ़ाना भी जरूरी है। यह क्वालिटी शिक्षा देकर, जागरूकता बढ़ाकर, मेंटरशिप प्रोग्राम, करियर काउंसलिंग और प्रतिस्पर्धी स्किल विकसित करके हासिल किया जा सकता है। यह स्किल प्रशिक्षण और इंटर्नशिप के माध्यम से दिया जा सकता है। इस तरह का नजरिया निश्चित रूप से युवाओं को जागरूक करने के साथ उनमें प्रतिभा का विकास करेगा, उन्हें अपने आप के प्रति भरोसा बढ़ेगा और वह दूसरे देशों के युवाओं के समकक्ष खुद को खड़ा कर सकेंगे।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">भारत में टियर 2 और टियर 3 शहरों में जॉब प्लेटफॉर्म की भूमिका युवाओं को एम्पावर करने के साथ वैश्विक शिक्षा के अवसर मुहैया कराना भी है। नया ग्लोबल टेक हब विकसित करने और देश भर में छिपी हुई प्रतिभाओं को सामने लाने के लिए यह जरूरी है। नौकरियां किसी खास शहर अथवा राज्य तक सीमित नहीं होती हैं। आप अपनी क्षमता विकसित कीजिए और आप कहीं भी पहुंच सकते हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इंडस्ट्री इन हब में प्रोएक्टिव भूमिका निभा सकती है। इससे युवा शहरों की तरफ भागना बंद करेंगे जो पहले ही बढ़ती आबादी से परेशान हैं। ऐसे कदम से बेहतर बिजनेस प्लानिंग होगी और वित्तीय तथा ढांचागत संसाधनों का प्रबंधन भी बेहतर हो सकेगा।</span></p>
<p><b>राज्यों में प्रतिभा अर्जन की डिजिटल चुनौतियों से कैसे निपटें</b></p>
<p><span style="font-weight: 400;">e2eHiring यह देखती है कि अच्छी प्रतिभा को तलाशा जाए, उनकी स्क्रीनिंग की जाए तथा उनका मूल्यांकन किया जाए ताकि वे युवा विभिन्न पार्टनर कंपनियों की मानव संसाधन जरूरतों को पूरा कर सकें। यह टियर 2 और टियर 3 शहरों के युवाओं के लिए बड़ा अवसर है क्योंकि उन्हें ऑनलाइन रिक्रूटमेंट, इंटरव्यू, ट्रेनिंग और मेंटरशिप बिना किसी शुल्क के मुहैया कराई जाती है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">e2eHiring प्लेटफॉर्म कंपनियों को बिना किसी बाधा के कंप्यूटर आधारित टेस्ट (CBT) आयोजित करने की सुविधा देता है। विभिन्न टेक्नोलॉजी और जटिलता के स्तर पर आधारित एक हजार से अधिक सवाल कंपनियों को नौसिखिये से लेकर अनुभवी उम्मीदवारों के चयन में मदद करता है। e2eHiring रिक्रूटमेंट की प्रक्रिया में अनेक छोटे-मोटे कार्यों की आवश्यकता को खत्म कर देता है। इसके बदले यह एचआर की जरूरत वाले हर तरह के डाटा उपलब्ध कराता है जिनके आधार पर भर्ती का फैसला लिया जा सके। शिक्षा के क्षेत्र में सार्वजनिक और निजी भागीदारी आज की जरूरत है इस बात को ध्यान में रखते हुए e2eHiring ने हाल ही तमिलनाडु की आईसीटी अकादमी के साथ सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इस प्लेटफॉर्म के साथ साझेदारी करने वाले अन्य संस्थानों में डॉ आंबेडकर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी बेंगलुरु, यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी मेघालय, लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी पंजाब, गांधी इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजी एंड मैनेजमेंट विशाखापत्तनम, पारूल यूनिवर्सिटी वडोदरा, एमिटी यूनिवर्सिटी कोलकाता भी शामिल हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">e2eHiring प्लेटफॉर्म छात्रों अथवा नौकरी तलाशने वालों को अपने ऑनलाइन पोर्टल पर मुफ्त में एनरोलमेंट की सुविधा देता है। किसी भी पृष्ठभूमि के युवा इस पोर्टल पर एनरोल कर सकते हैं और नौकरी के लिए आवेदन कर सकते हैं। उन्हें अपना स्किल विकसित करने के लिए प्रशिक्षण दिया जाएगा और उनकी मेंटरिंग की जाएगी। प्रशिक्षण के बाद वे पोर्टल पर उपलब्ध विभिन्न सेक्टर की नौकरियों के लिए आवेदन कर सकते हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">उम्मीदवारों के लिए नौकरी के आवेदन की कोई सीमा नहीं होगी। यूनिवर्सिटी और कॉलेजों से भी कोई फीस नहीं ली जाएगी। यह प्लेटफॉर्म सरकारी और निजी सेक्टर तथा अकादमिक संस्थानों में मुफ्त इंटर्नशिप की सुविधा भी मुहैया कराता है।</span></p>
<p><strong><em>(प्रियाश्री एंडले e2eHiring प्राइवेट लिमिटेड में कम्युनिकेशंस प्रमुख हैं। यह एक एआई पेटेंटेड प्लेटफॉर्म है जो भारत के टियर 2 और टियर 3 शहरों में कंपनियों, अकादमिक क्षेत्र और प्रतिभाशाली युवाओं के बीच अंतर को पाटता है)</em></strong></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/10/image_750x500_63416299625f0.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ टियर 2 और टियर 3 शहरों में करियर ग्रोथ के लिए स्किल गैप कम करना जरूरी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[गांधी के सपनों का भारत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/what-gandhi-dreamed-of-india.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 02 Oct 2022 16:58:37 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/what-gandhi-dreamed-of-india.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>देश की स्वतंत्रता के 75वें वर्ष में आजादी का अमृत महोत्सव मनाते हुए गांधी के सपनों के भारत की दिशा में हम कितना बढ़े हैं इसका भी मूल्यांकन करना उतना ही समीचीन है जितना संघषों से प्राप्त की गई अपनी इस आजादी का। गांधी की भारत की कल्पना क्या थी? वह कैसा भारत चाहते थे? गांधी के सपनों का भारत कैसा होगा? देश ने विभिन्न क्षेत्रों में निस्संदेह उत्साहजनक विकास किया है पर देश कई क्षेत्रों में पिछड़ा भी है। गांधी ने अपने सपनों का भारत बनाने के लिए कठिन संघर्ष किया। इसलिए गांधी ने अपने संघर्ष को दो आयामों पर समानांतर चलाया। एक आन्दोलनात्मक पक्ष रहा तो दूसरा रचनात्मक पक्ष। स्वाधीनता गांधी के लिए मात्र ब्रिटिश राज से मुक्ति भर नहीं थी। बल्कि गांधी के लिए गरीबी, निरक्षरता और अस्पृश्यता जैसी बुराइयां मुक्ति का बड़ा सपना थे। गांधी ऐसा भारत चाहते थे कि देश का हर नागरिक समान रूप से आज़ादी और समृद्धि को जी सके। इसके लिए गांधी ने भारतीय जीवन-दर्शन से जुड़ा एक भरा-पूरा विचार दुनिया को दिया जिसे हम गांधीयन वैचारिकी कह सकते है।</p>
<p>गांधीवादी वैचारिकी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक पुंजों की ऐसी समग्रता है जो विकासशील समाजों के लिए आज पहले से भी ज्यादा प्रासंगिक है। लेकिन उस प्रासंगिकता की स्थापना हो कैसे? असल संकट यही है। गांधी निर्विवादित ढंग से पूरी दुनिया के लिए प्रकाश पुंज हैं। आज दुनिया के सामने जितने भी संकट हैं उन सब पर गांधी 1909 में &ldquo;हिन्द स्वराज&rdquo; को लिखते समय चिंतित थे। गांधी इन सभी संकटों के समाधान सुझा रहे थे। आज समाज में जो भी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक समस्यायें हैं, उनके लिए गांधी-विचार मार्गदर्शक सिद्धांतों के रूप में सहायक हैं। गरीबी, बेकारी, अशिक्षा, असमानता, अन्याय, भेदभाव और शोषण ये सब सामाजिक प्रगति के अवरोध हैं। समाज के सामाजिक एवं आर्थिक विकास में गांधी के विचार अपनी उपादेयता इसी दूरदृष्टि के साथ रखते हैं।&nbsp;</p>
<p>गांधी ग्राम-स्वराज, सत्याग्रह, स्वदेशी और सर्वोदय की अवधारणा में भारतीय चिंतन परम्परा की मौलिकता में सहेजे जीवन मूल्यों को रेखांकित करते हैं। भारत और भारतीयता के आधारभूत तत्व आध्यात्मिकता में संजोये जीवन-दर्शन को विकास के छलावे में बहकी दुनिया को बताने के लिए सभ्यता-विमर्श के काम में लाते हैं। गांधी का यह मौलिकपन ही उन्हें तमाम विचारकों से बहुत आगे ले जाता है। यही वजह है कि गांधी को वैचारिक फ्रेमों में फिट करना बौद्धिक जमात के बस की बात कभी नहीं रही। यह गांधी की मौलिकता ही है कि गांधी ने आध्यात्मिक नैतिकता की सहायता से हमारी अर्थनैतिक और सैनिक कमजोरी को ताकत में बदल दिया। अहिंसा को समाज की सबसे बड़ी शक्ति बना दी। सत्याग्रह का अमोघ अस्त्र हमें थमा दिया। गांधी प्राचीन भारतीय बौद्धिक विरासत को सहेजते हैं और उसको बीज रूप में इस्तेमाल कर समाज में बोते हैं, समाज को खड़ा करते हैं। गांधी ने भारतीय विचार-दर्शन में निष्क्रिय पड़ी सहिष्णुता जैसी शक्ति को सक्रिय किया। एक शक्तिहीन अशक्त समाज को सशक्त समाज में बदलने का उद्यम किया।&nbsp;</p>
<p>गांधी चिन्तन के केन्द्र में गांव और गरीब रहा है। उनकी &ldquo;सर्वोदय&rdquo; की संकल्पना और &ldquo;गांव की ओर लोटो&rdquo; की चिंतन दृष्टि सबका साथ सबका विकास का व्यावहारिक विचार प्रस्तुत करती है। गांधी आह्वान करते हुए पश्चिमीकृत आधुनिकता का खंडन करते हैं और भारतीय जीवन मूल्यों की सर्व कल्याणकारी वैचारिकता का उदघोष करते हैं। जिसमें गांव विकास के केन्द्र में है। वैकल्पिक टेक्नॉलोजी उन नवाचारों में निहित है जो मावनीय सृजन क्षमता से उभरेगी। समाज के सशक्तीकरण की राह स्वदेशी और सर्वोदय के सिद्धांतों पर बनेगी। गांधी भारतीय परम्परा से निकले जीवन मूल्यों में सत्य और अहिंसा को सर्वोच्च स्थान देते हैं और जीवन के हर क्षेत्र को इनसे आप्लावित करना चाहते हैं। यही गांधी का सपना था और उनके जीवन का मिशन भी। गांधी के भारत में सब धर्मों, सम्प्रदायों, भाषाओं, आस्थाओं, राजनीति, व्यापार और सामाजिक-आर्थिक संबंधों की अपनी-अपनी विशिष्ट जगह होनी थी और अहिंसा इन संबंधों की मुख्य संचालक शक्ति तथा सत्ता, धन, शिक्षा, धर्म, सामाजिक व्यवहार सभी परस्पर दायित्वबोध से बंधे हों।</p>
<p>गांधी सर्वधर्म समभाव के हिमायती थे। वे सब धर्मों को सच्चा मानते थे पर अभी सब अपूर्ण हैं यह भी उनकी दृढ़ मान्यता थी। सब धर्म एक-दूसरे से मिलकर रहे। सब सबसे कुछ सीखे, तभी सबका विकास होगा और सब धर्म एक-दूसरे के पूरक बनेंगे। गांधी पश्चिमी सभ्यता, पश्चिमी विकास की अवधारणाओं और आदर्शों का अनुकरण करने के पक्षधर नहीं थे। गांधी का भारत स्वराजयी स्फुरण से महकने वाला भारत होना था। वह मानसिक स्वराज सबसे पहले चाहते थे। उनकी चाहत थी कि भारत संसार से सीखे भी और उसे सिखाए भी। तब भारत अपने हिसाब से स्वायत्त और स्वाधीन बुद्धि वाला राष्ट्र बने। वह सबका भारत बनाना चाहते थे। गांधी के भारत में सबको समान अधिकार और आदर मिलना था। गांधी का भारत दूसरों से होड़ करता भारत नहीं था। गांधी प्रतिस्पर्धा और वर्चस्व की जगह सहयोग और प्रेम के पक्षधर थे। जिससे एक आत्मनिष्ठ, स्वायत्त और आत्मविश्वस्त भारत राष्ट्र का निर्माण हो सके। गांधी साध्य और साधन के बीच की दूरी को कम से कम करने पर बल देते रहे। वह साध्य के लिए साधन की बलि देने को तैयार नहीं थे। उनकी स्पष्ट मान्यता थी कि उदात्त की प्राप्ति साध्य-साधन के संतुलन से ही संभव है। गांधी की आध्यात्मिकता और आधुनिकता दोनों संतुलन साधने की शक्तियां हैं। गांधी यथावश्यक अपनी प्राचीन विरासत को संशोधित करने को भी तत्पर रहते हैं और आधुनिकता को अपनी शर्तों और अपने समाज के स्वभावानुसार ढ़ालकर आत्मसात् करने में भी नहीं हिचकते हैं। गांधी के भारत में नकार नहीं है पर स्वीकार उसी का है जो भारत को सुदृढ़ करता हो। गांधी का चिंतन उनका बताया रास्ता उलझी हुई दुनिया को दिग्दर्शन कराने वाला विचार है। आज दुनिया के अधिकांश मौजूदा संकटों का समाधान गांधी-दर्शन में निहित है। जो यह सिद्ध करता है कि गांधी का विचार इक्कीसवीं सदी के लिए भी सार्थक और उपयोगी हैं।&nbsp;</p>
<p>भारत की पुर्नःसत्ता स्थापना में गांधी &ldquo;स्वराज&rdquo; को केन्द्रीय महत्व देते हुए दुनिया के मार्गदर्शन की दिशा में भारत को प्रस्थान बिन्दु मानते हैं। गांधी का स्वराज से अभिप्राय लोक-सम्मति से संचालित शासन है। &ldquo;स्वराज&rdquo; जनता में इस बात की समझ पैदा करना है कि सत्ता में कैसे सबकी सहभागिता हो और उसका नियमन करने की क्षमता का विकास समाज में कैसे हो। गांधी का &ldquo;स्वराज&rdquo; व्यक्ति की आतंरिक शक्ति के विकास पर निर्भर करता है। स्वतंत्र भारत में गांधी &ldquo;स्वराज&rdquo; की जिस कल्पना को भारतीय संविधान के जरिए साकार करना चाहते थे उसमें हर व्यक्ति स्वावलम्बी बने। हर कोई स्वतंत्र और मुक्त महसूस करे। यहां तक कि प्रत्येक व्यक्ति को पाप तक करने का अधिकार हो। गांधी के राष्ट्र निर्माण की दृष्टि अद्भुत है &rsquo;&rsquo;मैं ऐसे भारत के लिए कोशिश करूँगा, जिसमें गरीब-से-गरीब लोग भी यह महसूस करे कि यह उनका देश है। जिसके निर्माण में उनकी आवाज का महत्त्व है। मैं ऐसे भारत के लिए कोशिश करूँगा। जिसमें ऊँचे और नीचे वर्गों का भेद नहीं होगा और जिसमें विविध सम्प्रदायों में पूरा मेल-जोल होगा। ऐसे भारत में अस्पृश्यता या शराब जैसी दूसरी नशीली चीजों के अभिशाप के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता। उसमें स्त्रियों को वही अधिकार होंगे जो पुरुषों को होंगे। सारी दुनिया के साथ हमारा सम्बन्ध शान्ति और प्रेम का होगा। हम सर्व कल्याण की कामना वाले राष्टृ बनेंगे। ऐसा होगा मेरे सपनों का भारत&rdquo;।</p>
<p><em><strong>(लेखक युवा समाजशास्त्री हैं। यंग सोशल साइंटिस्ट्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के संस्थापक अध्यक्ष हैं और एम.एम.एच. कालेज गाजियाबाद में एसोसिएट प्रोफेसर हैं )</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ गांधी के सपनों का भारत ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[आज के दौर में गांधी के ग्राम स्वराज की हकीकत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/gandhi-and-gram-sawaraj-theory-and-practice.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 02 Oct 2022 07:56:19 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/gandhi-and-gram-sawaraj-theory-and-practice.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">गांधी जी स्वशासन के जरिए गांवों को आदर्श गांव बनाने के लिए पूरी स्वायत्तता के साथ पंचायती राज कायम करने की चाह रखते थे। उनके जन्म दिवस पर यह इस बात का मूल्यांकन करना उचित होगा कि गांधी जी ने जिस ''ग्राम स्वराज'' की कल्पना की थी वह कहां खड़ा है। इस लेख में उदाहरणों की मदद से इस बात कि विवेचना कि गई है कि गांधी जी के सपनों का ग्राम स्वराज ग्रामीण क्षेत्र में कितना और किस रूप में स्थापित है।</span></p>
<p><strong>ग्राम स्वराज पर गांधी के विचार</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">गांधी जी का मानना था कि एक आदर्श भारतीय गांव का निर्माण इस तरह किया जाए कि वह अपने आप में पूर्ण स्वच्छता का उदाहरण हो। उस गांव में ऐसे घर हों जिनमें रौशनी और वेंटिलेशन की पर्याप्त व्यवस्था हो, उसे बनाने में ऐसी वस्तुओं का इस्तेमाल किया गया हो जो पांच मील के दायरे में पाई जाती हों। हर घर के साथ खुला प्रांगण हो जहां परिवार अपनी जरूरत की सब्जियां उगा सके और अपने मवेशी बांध सके।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">गांव की गलियों में गंदगी या धूल ना हो। पर्याप्त संख्या में कुएं हों जो सभी के लिए सुलभ हों। गांव में सबके लिए पूजा स्थल हो, एक आम सभा स्थल, एक सहकारी डेयरी, प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय (जिसमें औद्योगिक शिक्षा दी जाए) और विवादों को निपटाने के लिए पंचायतें हों। गांव अपने लिए अनाज, सब्जियां, फल और अपनी खादी उत्पादन करेगा। यह मोटे तौर पर एक आदर्श गांव के बारे में मेरा विचार है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">आज की परिस्थितियों में गांव में घरों की हालात पहले से थोड़ी बेहतर होगी। गांव में अगर अच्छा जमींदार है या लोगों में आपसी सहयोग है, तो मॉडल घर को छोड़कर बाकी कार्य किए जा सकते हैं। ये कार्य ग्रामीण और जमींदार के स्तर पर, बिना सरकारी सहायता के किए जा सकते हैं। अगर सरकार सहायता देती है तो गांवों में पुनर्निर्माण की संभावना की कोई सीमा नहीं है।&nbsp;&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">मैं अभी इस बात पर ध्यान दे रहा हूं कि अगर ग्रामीणों का आपसी सहयोग हो और स्वैच्छिक श्रम दाम करें तो वे क्या कर सकते हैं। मेरा मानना है कि यदि एक बेहतर मार्गदर्शन में गांव में काम किया जाय तो लोगों की व्यक्तिगत आय से अलग गांव की आय दोगुनी की जा सकती है। हमारे गांवों में व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए तो नहीं, लेकिन ग्रामीणों के अपने इस्तेमाल के लिए अशेष संसाधन हैं। लेकिन सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि गांववासी खुद अपने आपको बेहतर बनाने के प्रति अनिच्छुक होते हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">गांव की पहली समस्या सफाई को लेकर है। यह सबसे उपेक्षित बात है। इससे लोगों की सेहत को नुकसान होता है और बीमारियां फैलती हैं। अगर कर्मचारी स्वेच्छा से सफाई का कार्य करें तो वे लोगों को बता सकते हैं कि नित्य क्रिया कहां करनी चाहिए। वे लोगों को सफाई का महत्व और इसकी उपेक्षा से होने वाले नुकसान के बारे में बता सकते हैं।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">मोटे तौर पर देखा जाय तो गांधी के आदर्श गांव के पांच प्रमुख पहलू हैं। पहला, स्वशासी या स्वायत्त होना। दूसरा, अपनी जरूरतें खुद पूरी करना। तीसरा, स्वच्छ वातावरण और साफ-सफाई।&nbsp; चौथा, अपनी बेहतरी के लिए अनिच्छुक रहना और पांचवां, स्वयंसेवक ग्रामीणों को एक बेहतर व समृद्ध गांव बनाने के लिए जागरूक करें।</span></p>
<p><strong>व्यवहार में क्या है?</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">जमीनी हकीकत को देखते हुए गांधी जी का स्वावलंबी गांव का विचार आज व्यावहारिक नहीं लगता है। स्वावलंबी गांव की जगह आत्मनिर्भर गांव का विचार बेहतर लगता है। ऐसे ग्राम वासियों के पास पर्याप्त आमदनी की सुविधा होती है ताकि वह गांव के बाहर से जरूरत का सामान खरीद सकें। स्वच्छता के लिए एक कार्यक्रम शुरू किया गया है और उसमें अच्छी प्रगति भी हुई है, लेकिन ऐसी घटनाएं भी हो रही हैं जब गांव में दोबारा गंदगी फैलने लगी है। इस संदर्भ में निरंतर स्वच्छता का विचार महत्वपूर्ण है जिस पर व्यापक रूप से अमल किया जाना चाहिए।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">गांधी का यह कहना पूरी तरह से ठीक नहीं कि गांव के लोग खुद अपना भला नहीं चाहते। जो लोग अपने गांव से बाहर निकले वे ऐसा नहीं होते। वह इस बात को समझते हैं कि उनके जीवन को बेहतर बनाने के लिए क्या जरूरी है। जीवन में आगे बढ़ने की लालसा के लिए धर्म की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। उदाहरण के लिए जिन ग्राम वासियों अथवा परिवारों ने आर्य समाज पद्धति का पालन किया है उनमें विकास में बाधक बनने वाली प्रथाओं और परंपराओं के प्रति सोच बदली है। आर्य समाज में महिलाओं और लड़कियों के लिए शिक्षा को भी स्थान दिया गया है ताकि वे अपनी पसंद के क्षेत्र में आगे बढ़ सकें।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">जहां तक गांवों के स्वशासन की बात है, तो भारत सरकार ने संविधान में 73वें संशोधन के जरिए इस दिशा में प्रयास किए हैं। तत्कालीन ग्रामीण विकास मंत्री जी वेंकटस्वामी ने संसद में 1 दिसंबर 1992 को 73 वां संशोधन विधेयक पेश करते हुए कहा था, &ldquo;ग्राम पंचायत स्थापित करना तथा उन्हें आगे बढ़ाना केंद्र और राज्य सरकारों का कर्तव्य है, ताकि वे एक प्रभावी और स्वशासी संस्थान बन सकें।&rdquo; यहां संविधान संशोधन विधेयक से जुड़े अनुच्छेद 243 जी का उल्लेख जरूरी है जो पंचायतों की स्वायत्तता से संबंधित है। संविधान के प्रावधानों के अनुरूप राज्य की विधायिका पंचायतों को ऐसे अधिकार और शक्ति दे सकती है जो उन्हें स्वशासन के संस्थान के रूप में कार्य करने के लिए आवश्यक हैं। ऐसे कानून में पंचायतों को अधिकार और उत्तरदायित्व सौंपने की बात रहे। इसमें इन बातों का स्पष्ट उल्लेख हो-&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">क) आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए योजनाएं बनाना।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">ख) आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय की योजनाओं पर अमल। इनमें ग्यारहवीं अनुसूची में शामिल विषयों समेत अन्य विषय भी शामिल हों। संशोधन कानून का यह अनुच्छेद अधिकारों के हस्तांतरण की संपूर्ण योजना का मूल है। यह पंचायतों को केंद्र और राज्य सरकारों के बाद सरकार के तीसरे स्तर के रूप में स्थापित करता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इस संदर्भ में 2001 की पंचायतों पर टास्क फोर्स की रिपोर्ट में सही लिखा गया है कि पंचायतों को अपने फैसले लागू करने के लिए पर्याप्त कर्मियों, फाइनेंस और फंक्शन की जरूरत है। पंचायतों को पंचायती राज संस्थानों को मजबूत बनाने में यह तीनों एक दूसरे के पूरक हैं। सही मायने में देखा जाए तो पंचायती राज संस्थानों को अधिकारों के हस्तांतरण का मतलब है संविधान की ग्यारहवीं अनुसूची में शामिल 29 विषय (ग्राम पंचायत, पंचायत समिति अथवा जिला पंचायत के स्तर पर कार्यों का हस्तांतरण) स्पष्ट रूप से परिभाषित हों और उसके लिए पर्याप्त फंड (विभिन्न कार्यों को पूरा करने के लिए पंचायत को कितने फंड की आवश्यकता है) की व्यवस्था हो। इसके लिए कर्मी भी सुनिश्चित किए जाएं ।पंचायतों के पास पर्याप्त संख्या में कर्मी होते हैं जो उचित कानूनी ढांचे के दायरे में मुक्त वातावरण में निर्धारित कार्यों को करते हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इस संदर्भ में हम यह देखते हैं कि वास्तविकता क्या है-</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">पंचायती राज मंत्रालय ने 2015-16 में विभिन्न राज्यों में इस बात का अध्ययन कराया कि पंचायतों को कितने अधिकार हस्तांतरित किए गए हैं। अध्ययन में यह बात सामने आई कि किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में 73वें संविधान संशोधन के ढाई दशक बाद भी अधिकारों का 100% हस्तांतरण नहीं हुआ था। आज भी परिस्थितियां बेहतर नहीं हुई हैं। इस दिशा में राजनीतिक नेताओं और अफसरों ने कभी कोई उत्साह नहीं दिखाया ताकि पंचायत वास्तविक अर्थों में स्वशासित संस्थानों के रूप में कार्य कर सकें। सिर्फ केरल ने तीन चौथाई अधिकारों का हस्तांतरण किया है। उसके अलावा केरल, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, तेलंगाना, सिक्किम और पश्चिम बंगाल ने 50% अधिकार पंचायतों को सौंपे हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">गांधी जी के जन्मदिन पर पंचायतों को पर्याप्त अधिकारों और शक्ति के साथ तीसरे स्तर की सरकार के रूप में स्थापित किया जाना चाहिए। ये केंद्र और राज्य सरकारों के पूरक मात्र नहीं होने चाहिए। इसके साथ ही पंचायतों के 30 लाख से अधिक निर्वाचित प्रतिनिधियों को भी पंचायती राज कानून के प्रावधानों को लागू करने के लिए आगे आना चाहिए। उन्हें अपने स्तर पर अतिरिक्त फाइनेंस जुटाने और शांति तथा सामाजिक सौहार्द स्थापित करने की दिशा में कार्य करना चाहिए। इसके लिए उन्हें वार्ड सभा और ग्राम सभा की बैठकें आयोजित करनी चाहिए। ग्राम वासियों और पंचायत नेताओं को उनकी जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक करने में सिविल सोसाइटी की भूमिका भी महत्वपूर्ण है।</span></p>
<p><em><strong>(लेखक इंडियन इकोनॉमिक सर्विस के पूर्व अधिकारी और कृपा फाउंडेशन के अध्यक्ष हैं। उनसे&nbsp;<a href="mailto:mpal1661@gmail.com">mpal1661@gmail.com</a>&nbsp;पर संपर्क किया जा सकता है)</strong></em></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/10/image_750x500_633877abe2797.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ आज के दौर में गांधी के ग्राम स्वराज की हकीकत ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[खाद्यान्न की उत्पादकता और उनका उत्पादन बढ़ाने के लिए क्या कदम  हैं  जरूरी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/how-to-increase-the-productivity-and-production-of-foodgrains.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 26 Sep 2022 14:38:35 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/how-to-increase-the-productivity-and-production-of-foodgrains.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">भारत की आबादी अभी 139 करोड़ है और 2030 तक इसके 151 करोड़ हो जाने की उम्मीद है। 2030 तक देश में लगभग 35.5 करोड़ टन अनाज की जरूरत पड़ेगी। यानी अभी की तुलना में 5 करोड़ टन अधिक। इसका मतलब है हर साल अनाज उत्पादन लगभग 50 लाख टन बढ़ाना पड़ेगा। ऐसे में मौलिक सवाल उठता है कि अनाज उत्पादन में क्या भारत आत्मनिर्भर बना रहेगा। उत्पादन बढ़ाने की चुनौती सचमुच गंभीर है क्योंकि प्रति व्यक्ति औसत जमीन और सिंचाई के लिए पानी, दोनों कम होते जा रहे हैं। इसके अलावा बायोटिक और एबायोटिक दबाव बढ़ता जा रहा है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">दुनिया की आबादी 2050 तक 980 करोड़ हो जाएगी। यह विश्व की मौजूदा आबादी से 34 प्रतिशत अधिक होगी। संयुक्त राष्ट्र की 2017 की रिपोर्ट के अनुसार विश्व के 79.46 करोड़ अल्प पोषित लोगों में 77.99 करोड़ लोग विकासशील देशों में रहते हैं। अनुमान है कि अगर खानपान का मौजूदा पैटर्न, आमदनी और खपत की परिस्थितियां यही बनी रहीं तो विश्व को 70% अधिक खाद्य पदार्थ की जरूरत पड़ेगी (एफएओ 2009)।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">यील्ड यानी उत्पादकता में अंतर कम करने में आ रही दिक्कतों पर चर्चा करने और अनाज उत्पादन तथा उत्पादकता बढ़ाने की रणनीति पर सुझाव देने के लिए तटस्थ थिंक टैंक <em> ट्रस्ट फॉर एडवांसमेंट ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज</em> (तास) और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने आईआरआरआई (IRRI), इक्रीसैट और आईसीएआरडीए के साथ मिलकर एक राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया। यह आयोजन 26 अगस्त 2021 को हुआ था। केंद्र और राज्य सरकारों, सीजी सेंटर, वैज्ञानिक संस्थाओं, प्राइवेट बीज उद्योग और किसान संगठनों के 119 प्रतिभागियों ने उस कार्यशाला में हिस्सा लिया।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कार्यशाला के तीन प्रमुख उद्देश्य थे। पहला, यील्ड गैप कम करने के लिए फसल के हिसाब से क्षेत्रों पर चर्चा करना और उन्हें लक्षित करना, दूसरा, अनाज उत्पादन बढ़ाने के मकसद से फसल और क्षेत्र के हिसाब से उत्पादकता बढ़ाने में आ रही दिक्कतों को पहचानना और उन्हें दूर करने के विकल्प तलाशना तथा तीसरा, अनाज उत्पादन और उत्पादकता दोनों बढ़ाने के लिए एक स्पष्ट स्ट्रेटजी का सुझाव देना और उसमें आने वाली दिक्कतों को पहचानना।</span></p>
<p><strong>रणनीतिक पहल</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">वर्कशॉप में कई बहुमूल्य सुझाव आए और सिफारिशें दी गईं। यह महसूस किया गया कि फूड बास्केट में मौजूदा विविधीकरण को ध्यान में रखते हुए और भविष्य में खाद्य तथा चारे की जरूरतों को देखते हुए अनाज की अनुमानित मांग पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">वर्कशॉप में आईसीएआर, एनएएएस और तास की तरफ से एक साझा स्ट्रेटजी पेपर तैयार करने की जरूरत बताई गई, जिसमें भविष्य में अनाज की मांग को देखते हुए खाद्य और चारे की उपलब्धता का विश्लेषण हो। उस स्ट्रेटजी पेपर में विभिन्न अनाज फसलों की उत्पादकता में अंतर को कम करने का एक स्पष्ट रोड मैप हो, फसल वार और राज्यवार यील्ड गैप विश्लेषण हो ताकि सालाना आधार पर प्रमुख अनाजों के उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया जा सके। इनके अलावा हर फसल के लिए एक विजन डॉक्यूमेंट भी तैयार किया जाना चाहिए। वर्कशॉप में डीडीजी क्रॉप साइंस, डीडीजी हॉर्टिकल्चर साइंस, डीडीजी नेचुरल रिसोर्स मैनेजमेंट और कृषि/बागवानी कमिश्नर को मिलाकर तत्काल एक समिति बनाने की सिफारिश की गई।</span></p>
<p><strong>रिसर्च को मजबूत बनाना</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">जर्मप्लाज्म एनहांसमेंट और प्री-ब्रीडिंग पर जोर देने की जरूरत है। मॉलेक्युलर मार्कर असिस्टेड सिलेक्शन, जिनोमिक सिलेक्शन (GS), ट्रांसजेनिक और जिनोम एडिटिंग (CRISPR/Cas9), स्पीड ब्रीडिंग का इस्तेमाल, प्रिसीजन फेनोटाइपिंग, इम्पीरिकल ब्रीडिंग और जिनोमिक्स असिस्टेड ब्रीडिंग (GAB) का इंटीग्रेशन और डबल हैप्लॉयड टेक्नोलॉजी जैसी बायो टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल बेहतर वैरायटी विकसित करने में बढ़ाया जाना चाहिए। राज्य कृषि विश्वविद्यालयों और आईसीएआर केंद्रों के ब्रीडर को इन टेक्नोलॉजी में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। उन्हें एनआईपीबी जैसे आईसीएआर के केंद्रों और इक्रीसैट जैसे सीजीआईएआर के केंद्रों में प्रशिक्षित किया जा सकता है। आईसीएआर की तरफ से 1000 करोड़ रुपए के आवंटन से हाइब्रिड रिसर्च पर राष्ट्रीय मिशन मोड प्रोजेक्ट प्राथमिकता के आधार पर शुरू किया जाना चाहिए।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">रिसर्च योग्य कई प्रमुख मुद्दों पर प्राथमिकता के आधार पर गौर किया जाना चाहिए। इनमें कुछ प्रमुख मुद्दे हैं- चावल के मामले में जीनोम असिस्टेड ब्रीडिंग का इस्तेमाल एनहांस्ड जेनेटिक फायदे के लिए किया जाना चाहिए। सुपर राइस (प्रति हेक्टेयर 10 टन से अधिक उत्पादन) ज्यादातर इकोलॉजी के लिए विकसित की जानी चाहिए। रोग प्रतिरोधक क्षमता और सूखे को सहने की बेहतर क्षमता वाले हाइब्रिड गेहूं की किस्मों का विकास किया जाना चाहिए।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">मक्के के मामले में जेनेटिक विविधीकरण पर फोकस किया जाना चाहिए। स्वीट कॉर्न, बेबी कॉर्न, पॉपकॉर्न, स्पेशलिटी कॉर्न, सिंगल क्रॉस और क्यूपीएम हाइब्रिड जैसे स्पेशलिटी मक्के पर अधिक फोकस किया जाना चाहिए। ऐसा करते वक्त उसके पोषण का भी ख्याल रखा जाना चाहिए। बाजरा के क्षेत्र में दोहरे उद्देश्य वाले हाइब्रिड बीजों का विकास किया जाना चाहिए। यह सबसे सूखे वाले ए1 जोन के प्रति सहनशील, डाउनी मिलडायू के प्रतिरोध, सूखे और गर्मी के प्रति सहनशील तथा सूक्ष्म पोषक तत्वों से भरपूर हो। इसके अलावा कम अवधि में तैयार और अधिक उत्पादकता वाली दालों की वैरायटी भी विकसित की जानी चाहिए।</span></p>
<p><strong>विकास के प्रयास</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">वर्कशॉप में यह महसूस किया गया कि उत्पादकता में अंतर को पाटने के लिए दो तरफा नीति अपनाने की जरूरत है। एक तो उत्पादकता बढ़ाकर वर्टिकल गैप कम करना और दूसरा अधिक क्षेत्रफल में खेती करके हॉरिजॉन्टल गैप कम करना। फसल विविधीकरण के जरिए गैर पारंपरिक फसलों को बढ़ावा देने की भी जरूरत है। आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और कर्नाटक में कम अवधि में तैयार होने वाले काबुली चने की खेती का क्षेत्रफल बढ़ाया जाना चाहिए। केंद्रीय और प्रायद्वीपीय क्षेत्र में काला चना, हरा चना, काबुली चना जैसी फसलों की मिश्रित खेती की जा सकती है। उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में कम अवधि में तैयार होने वाली अरहर की किस्म शुरू की जा सकती है। बिहार, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में धान के खेतों में मसूर और मटर की खेती की जा सकती है। उत्तर में मूंग को ग्रीष्म फसल के तौर पर प्रमोट किया जा सकता है। उत्तर पूर्वी राज्यों में दालों तथा दक्षिण के तटीय इलाकों में उड़द तथा मूंग की खेती को बढ़ावा दिया जा सकता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में बाजरे की उत्पादकता बढ़ाने और हाइब्रिड चावल की खेती को बढ़ावा देने की जरूरत है। पूर्वी और मध्य भारत में चावल की जगह सिंगल क्रॉस मक्के की हाइब्रिड किस्म का क्षेत्र बढ़ाया जाना चाहिए। पश्चिम बंगाल और बिहार में मक्के के साथ बोरो चावल की खेती की जानी चाहिए। फली और छोटी मिलेट की पोषण से भरपूर वैरायटी तत्काल विकसित करने की भी आवश्यकता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">हाइब्रिड फसलों की अधिक उत्पादकता वाली किस्मों की अच्छी क्वालिटी वाले बीज तैयार करने पर फोकस किया जाना चाहिए। महत्वपूर्ण अनाजों के मामले में सीड रिप्लेसमेंट रेट (SRR) पर भी फोकस किया जाना चाहिए। राज्यों को सेल्फ पोलिनेटेड क्रॉप्स के लिए 35 फ़ीसदी एसआरआर और क्रॉस पोलिनेटेड क्रॉप्स के लिए 90 फ़ीसदी (एसआरआर) का लक्ष्य रखना चाहिए।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">मौजूदा एक्सटेंशन सिस्टम को नए सिरे से तैयार करने की जरूरत है ताकि इसे निजी क्षेत्र, सिविल सोसायटी और युवाओं को शामिल करते हुए ज्यादा प्रभावी बनाया जा सके। कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी (CSR) तथा सरकारी निजी भागीदारी (PPP) के माध्यम से हर किसान विकास केंद्र (KVK) एक बेहतर जानकारी और इनोवेशन का केंद्र बन सकता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कृषि मंत्रालय तथा आईसीएआर के बीच एक प्रभावी समन्वय की भी जरूरत है। साथ ही राज्यों के कृषि विभागों तथा कृषि विश्वविद्यालयों के बीच भी समन्वय होना चाहिए। मृदा परीक्षण, बीज रेट, बीज ट्रीटमेंट, प्लांट पॉपुलेशन, सिंचाई शेड्यूल, बायोफर्टिलाइजर के इस्तेमाल, बायो कीटनाशकों के इस्तेमाल, अकार्बनिक उर्वरकों के इस्तेमाल के लिए स्थान विशेष आधारित नीति अपनाने की भी जरूरत है।</span></p>
<p><strong>नीतियों पर अमल</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">वर्कशॉप में यह महसूस किया गया कि फसल और इकोसिस्टम दोनों हिसाब से अनाज उत्पादन बढ़ाने के लिए सरकार की तरफ से नीतिगत समर्थन की जरूरत है। किसानों को अच्छी क्वालिटी के बीज और कर्ज देने तथा बेहतर खेती के तौर तरीके बताने की भी जरूरत है ताकि उत्पादकता बढ़ाई जा सके। बायोफोर्टीफाइड वैरायटी/हाइब्रिड का इस्तेमाल बढ़ाया जाना चाहिए। हाइब्रिड फसलों के लिए बेहतर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) हो और हाइब्रिड चावल अनुसंधान बीज उत्पादन और एक्सटेंशन एजेंसियों के बीच बेहतर लिंकेज हो। जिनोम एडिटिंग (CRISPR/Cas9) जैसी नई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल तत्काल बढ़ाए जाने की आवश्यकता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">सरकारी निजी साझेदारी और नीतिगत समर्थन के जरिए हाइब्रिड और बायोफोर्टीफाइड फसलों को अधिक अपनाया जाना चाहिए। मक्का किसानों को उचित उत्पादन इंसेंटिव देकर मदद की जानी चाहिए। उन्हें बाजार मूल्य और एमएसपी के बीच अंतर का भुगतान किया जाना चाहिए।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अधिक उपज वाली वैरायटी और हाइब्रिड को तेजी से अपनाने के लिए सरकार को तत्काल नया नीतिगत फैसला लेना चाहिए। इसके लिए प्रतिष्ठित रिसर्च एंड डेवलपमेंट निजी बीज कंपनियों को क्षेत्रवार विशेष लाइसेंस के अधिकार दिए जा सकते हैं, ताकि वे उस क्षेत्र विशेष में अच्छी क्वालिटी के बीज तैयार कर किसानों को बेच सकें। इसके अलावा किसानों को भी किसान संगठनों, कोऑपरेटिव, एफपीओ आदि के माध्यम से संगठित होने और इंडस्ट्री के साथ सीधे जुड़ने की जरूरत है।</span></p>
<p><strong><em>(डॉ. आर.एस. परोदा,&nbsp; ट्रस्ट फॉर एडवांसमेंट ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज-TAAS के चेयरमैन, आईसीएआर के पूर्व महानिदेशक और कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग-DARE के पूर्व सचिव हैं)</em></strong></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/02/image_750x500_62032a8e931e8.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ खाद्यान्न की उत्पादकता और उनका उत्पादन बढ़ाने के लिए क्या कदम  हैं  जरूरी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[महंगाई से हर वर्ग प्रभावित, इसी कारण उद्योग भी नए निवेश से हिचक रहे]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/inflation-could-derail-india-consumption-story.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 17 Sep 2022 16:00:28 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/inflation-could-derail-india-consumption-story.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">अर्थव्यवस्था के लिए सबसे मुश्किल चुनौती बनकर उभरी महंगाई अब सबको चुभने लगी है। इसका असर अब सिर्फ उपभोक्ताओं तक सीमित नहीं रहा, जो बीते 2 वर्षों से इसका असर झेल रहे हैं। चाहे हम उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी खुदरा महंगाई के लिहाज से देखें अथवा थोक मूल्य सूचकांक यानी थोक महंगाई के लिहाज से, ऐसा लगता है कि फिलहाल कुछ समय तक महंगाई दर ऊंचे स्तर पर बनी रहेगी। महंगाई का ऊंचा या नीचा आधार आंकड़ों की बाजीगरी के अलावा और कुछ नहीं, क्योंकि इसकी वजह से महंगाई बढ़ती या घटती हुई लग सकती है लेकिन संभव है कि चीजों के दाम ना घटें और उपभोक्ताओं को राहत ना मिले।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">सरकार की तरफ से जारी आंकड़ों के अनुसार खुदरा महंगाई अगस्त में 7.62 फ़ीसदी दर्ज की गई जबकि जुलाई में यह 6.71 फ़ीसदी थी। थोक महंगाई भी पिछले महीने 12.41 फ़ीसदी रही है। समस्या यह है कि 12.41 फ़ीसदी का आंकड़ा अगस्त 2021 के 11.64 फ़ीसदी के बावजूद है। इसका सीधा मतलब यह है कि अगस्त 2020 से तुलना करें तो चीजें लगभग 24 फ़ीसदी महंगी हो गई हैं। जब महंगाई इतनी बढ़ रही हो तब खपत की मांग को कैसे बरकरार रखा जा सकता है। आम तौर पर थोक महंगाई मंडियों और बिजनेस टू बिजनेस की कीमतों को बताती है और इसी से खुदरा महंगाई भी परिचालित होती है। लगातार 17 महीने से थोक महंगाई 10 फ़ीसदी से ऊपर बनी हुई है। खुदरा महंगाई भी रिजर्व बैंक की तरफ से निर्धारित 6 फ़ीसदी की अधिकतम सीमा से लगातार 8 महीने से ऊपर बनी हुई है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">गेहूं हो या अन्य अनाज, मंडियों में दाम काफी ऊंचे बने हुए हैं जिसकी वजह से रिटेल स्टोर में भी लोगों को ऊंची कीमत चुकानी पड़ रही है। उदाहरण के लिए थोक महंगाई के आंकड़ों को देखें तो प्राथमिक वस्तुओं के दाम 15 फ़ीसदी, गेहूं के 17.35 फ़ीसदी और अन्य अनाजों के 11.77 फ़ीसदी बढ़ गए। इसके कारणों में एक तो हरियाणा और पंजाब में जलवायु परिवर्तन की समस्या है। दूसरे, रूस यूक्रेन युद्ध के कारण ग्लोबल सप्लाई चेन प्रभावित है। अगर आप बेहतर क्वालिटी या साफ-सफाई के लिहाज से पैकिंग वाला गेहूं खरीदते हैं तो उस पर वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के रूप में अतिरिक्त खर्च होता है। यही स्थिति रोजाना खाई जाने वाली अन्य वस्तुओं की भी है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">मंडियों में धान के दाम तो सिर्फ 4.33 फ़ीसदी ही बढ़े हैं, इस साल असमान बारिश के कारण उत्पादन में होने वाले नुकसान का असर देर-सबेर पड़ने वाला है। फल तो 31.75 फीसदी महंगे हुए हैं और अब यह लग्जरी हो गए हैं। सब्जियां मंडियों में 22.29 फ़ीसदी महंगी हुई हैं और आम लोगों के भोजन से यह भी गायब होती जा रही हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कच्चा पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस, जिनका पेंट, केमिकल तथा फ़र्टिलाइज़र समेत अनेक औद्योगिक उत्पादों पर असर होता है, के दाम अगस्त में सालाना आधार पर 59.84 प्रतिशत बढ़ गए हैं। इसी तरह पेट्रोल, हाई स्पीड डीजल और रसोई गैस (एलपीजी) की कीमतों में भी काफी उछाल आया है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">जहां तक खुदरा महंगाई की बात है, तो हमेशा की तरह ग्रामीण आबादी पर इसका असर शहरों की तुलना में अधिक है। अगस्त 2022 में ग्रामीण क्षेत्र में खुदरा महंगाई दर 7.15 फ़ीसदी रही तो शहरी इलाकों में यह 6.72 फ़ीसदी दर्ज की गई।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अनाज और इनके दाम भी एक साल पहले की तुलना में 9.57 फ़ीसदी बढ़ गए। यहां भी ग्रामीण इलाकों में असर अधिक हुआ जहां इनकी महंगाई दर 10.08 फ़ीसदी रही। अनाज कौन उगाता है? किसान। लेकिन जब अनाज खरीदने की बारी आती है तो उन्हीं किसानों को अधिक पैसे चुकाने पड़ते हैं</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">शहरों और गांवों दोनों को मिलाकर देखें तो फल, सब्जियां, मसाले, दुग्ध उत्पाद, खाद्य पदार्थ तथा पेय पदार्थों की कीमतों में तेज वृद्धि हुई है। लेकिन मांस तथा इसके उत्पादों, दालों, चीनी और कन्फेक्शनरी की कीमतों में वृद्धि की रफ्तार कम है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कपड़े और जूते चप्पल के दाम भी बढ़े हैं। खुदरा महंगाई में इनकी कीमतों में 10% की वृद्धि दर्ज की गई है। यही स्थिति पर्सनल केयर प्रोडक्ट की है, जिनके दामों में सात फ़ीसदी वृद्धि हुई है। जैसा कि पहले कहा गया है, महंगाई का असर सब पर हो रहा है। छोटी और बड़ी कंपनियां सभी इससे प्रभावित हो रही हैं, भले ही शेयर बाजार में तेजी का माहौल हो।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">वास्तविकता तो यह है कि वैश्विक और घरेलू स्तर पर ऊंची महंगाई के कारण नया निवेश रुका हुआ है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को उद्योगों से कहना पड़ा कि आखिर वह कौन सी बाधा है जो निवेश करने से आपको रोक रही है। आखिर सरकार तो कॉरपोरेट टैक्स की दर घटा चुकी है और प्रोडक्शन लिंक्ड इन्सेंटिव भी दे रही है। इस सवाल का जवाब महंगाई में छिपा है। जब तक महंगाई दर ऊंची बनी रहेगी और इससे निपटने के लिए बड़े कदम नहीं उठाए जाते, तब तक अर्थव्यवस्था में वास्तविक अर्थों में बदलाव नहीं होंगे।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;"><em><strong>(प्रकाश चावला सीनियर&nbsp;</strong></em><em><strong>इकोनॉमिक जर्नलिस्ट है और आर्थिक नीतियों पर लिखते हैं)</strong></em></span></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/09/image_750x500_6325a094db507.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ महंगाई से हर वर्ग प्रभावित, इसी कारण उद्योग भी नए निवेश से हिचक रहे ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/09/image_750x500_6325a094db507.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[महिला सशक्तीकरण के लिए एनआरएलएम एक बेहतर उदाहरण, टेक्नोलॉजी तक पहुंच और मार्केटिंग में सुधार की दरकार]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/women-empowerment-under-day-nrlm.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 06 Sep 2022 20:23:57 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/women-empowerment-under-day-nrlm.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">दीनदयाल अंत्योदय योजना राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (डीएवाई-एनआरएलएम) का उद्देश्य 10 करोड़ परिवारों को स्वयं सहायता समूह के रूप में संगठित करना है, ताकि टेक्नोलॉजी और मार्केटिंग के क्षेत्र में उनकी मदद की जा सके और उनका विकास हो सके। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन को 3 जून 2011 से पूरे देश में मिशन मोड में लागू किया गया है। मई 2013 और दिसंबर 2015 में इसका पुनर्गठन किया गया और नाम डीएवाई-एनआरएलएम रखा गया।</span></p>
<p><strong>1. डीएवाई-एनआरएलएम के मुख्य फीचर</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">हर ग्रामीण गरीब परिवार की कम से कम एक महिला को स्वयं सहायता समूह नेटवर्क से जोड़ा जाना है। गरीब इस कार्यक्रम के मुख्य भागीदार हैं और कार्यक्रम को लागू भी गरीब ही कर रहे हैं। गरीबों की शक्ति को देखते हुए इस कार्यक्रम को &lsquo;गरीबों के लिए, गरीबों का और गरीबों के द्वारा&rsquo; कहा जा सकता है। इस कार्यक्रम का मुख्य मंत्र केंद्र सरकार, राज्य सरकार और पंचायतों की विभिन्न योजनाओं को राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के साथ मिलाना है। संस्थागत विकास और प्रभावी गवर्नेंस के लिए विभिन्न स्तरों पर स्वयं सहायता समूहों को जोड़ा गया है।</span></p>
<p><strong>2. डीएवाई-एनआरएलएम के मुख्य भाग</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">संस्था निर्माणः गरीबों को संगठित करना, उन्हें संस्थागत रूप देना और उनकी क्षमता बढ़ाना ताकि सामूहिक रूप से उनकी गरीबी दूर की जा सके। इस मिशन के तहत गरीबों के संस्थानों को रिवाल्विंग फंड (10000 से 15000 रुपए), कम्युनिटी इन्वेस्टमेंट फंड (सीआईएफ) जैसे फंड मुहैया कराए जाते हैं। इसका उद्देश्य उनका वित्तीय आधार मजबूत करना है। बैंकिंग कॉरेस्पांडेंट सखी के माध्यम से दूरदराज के इलाकों में फाइनेंशियल इनक्लूजन को लागू किया जा सकता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">ब्याज में छूटः स्वयं सहायता समूह के सदस्य 7 फ़ीसदी कर्ज की दर और बैंक की दर के बीच अंतर के बराबर ब्याज में छूट के हकदार हैं। 250 जिलों में सभी महिला स्वयं सहायता समूह 7 फ़ीसदी ब्याज पर तीन लाख रुपए तक का कर्ज ले सकती हैं। समय पर कर्ज लौटाने पर ब्याज में 3 फ़ीसदी अतिरिक्त छूट का प्रावधान है। इस तरह प्रभावी ब्याज की दर 4 फ़ीसदी रह जाती है।</span></p>
<p><strong>3. आजीविका प्रमोशन</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">टिकाऊ खेती, मवेशी और नेशनल टिंबर फॉरेस्ट प्रोड्यूस (एनपीएसपी) के लिए कृषि आजीविका में मदद की जाती है। यह मदद महिला किसान सशक्तीकरण प्रोग्राम (एमकेएसपी) प्रोजेक्ट और राज्यों के लाइवलीहुड एनुअल एक्शन प्लान के माध्यम से की जाती है। आजीविका को बढ़ावा देने में सामुदायिक स्तर पर कृषि सखी, पशु सखी और वन सखी जैसे व्यक्ति होते हैं। गैर कृषि आजीविका को स्टार्टअप विलेज आंत्रप्रेन्योरशिप प्रोग्राम (एसवीईपी) और आजीविका ग्रामीण एक्सप्रेस योजना (एजीईवाई) के माध्यम से लागू किया जाता है। नेशनल रूरल इकोनॉमिक ट्रांसफॉर्मेशन प्रोजेक्ट (एनआरईटीपी) के तहत भी इसे बढ़ावा दिया जाता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">उप योजनाएं</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">महिला किसान सशक्तीकरण कार्यक्रम (एमकेएसपी) कृषि और एनटीएफपी में महिलाओं को सशक्त करने के उद्देश्य के साथ लांच किया गया था। इसके लिए कृषि आधारित आजीविका में उनकी भागीदारी और उत्पादकता बढ़ाने, एनटीएफपी के लिए टिकाऊ हार्वेस्टिंग क्षमता निर्माण करने और हार्वेस्टिंग के बाद की तकनीक विकसित करने में निवेश किया गया।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">एसवीवीपी में ग्रामीण इलाकों में छोटे बिजनेस स्थापित करने के लिए उद्यमियों की मदद की जाती है। इसके लिए उन्हें बिजनेस की व्यावहारिकता, मैनेजमेंट की जानकारी मुहैया कराने के साथ बिजनेस शुरू करने और उसके विस्तार के लिए कर्ज लेने में भी मदद की जाती है। एजीईवाई ग्रामीण इलाकों में सुरक्षित, सस्ता और कम्युनिटी की मॉनिटरिंग पर आधारित ट्रांसपोर्ट सेवा मुहैया कराने के लिए है। इसके वाहन के मालिक स्वयं सहायता समूह के सदस्य होते हैं और वही उन इलाकों में ऑपरेट करते हैं जहां नियमित ट्रांसपोर्ट कंपनियां अपनी सेवाएं नहीं देती हैं। आरएसईटीआई हर जिले में उपलब्ध है और इसके तहत युवाओं को शॉर्ट टर्म ट्रेनिंग दी जाती है। कुछ आरएसईटीआई युवाओं को ऑफसाइट ट्रेनिंग भी देते हैं। ट्रेनिंग के बाद इंटरएक्टिव वेब पोर्टल, कॉल सेंटर, बिजनेस काउंसलिंग सेंटर और एल्यूमनी सम्मेलन में भी मदद की जाती है।</span></p>
<p><strong>4. लागू करने की रणनीति</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इस मिशन को सभी 28 जिलों और 6 केंद्र शासित प्रदेशों में लागू किया गया है। हर स्तर पर स्पेशलाइज्ड राज्य मिशन मैनेजमेंट यूनिट (एसएमएमयू), जिला मिशन मैनेजमेंट यूनिट (डीएमएमयू) और ब्लॉक मिशन मैनेजमेंट यूनिट (बीएमएमयू) स्थापित किए गए हैं। अभी इस मिशन के तहत 706 जिलों के 6782 ब्लॉक में कार्य चल रहा है। वित्त वर्ष 2023-24 के अंत तक इसके पूरा होने की उम्मीद है।</span></p>
<p><strong>5. डीएवाई-एनआरएलएम की मौजूदा स्थिति</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि मिशन के तहत चल रहा कार्य उत्साहजनक है। वित्त वर्ष 2011-12 से 2013-14 के दौरान स्वयं सहायता समूह में महिलाओं की संख्या 2.35 करोड़ थी जो मई 2022 में 5.96 करोड़ हो गई। यह एक दशक में 153% वृद्धि दर्शाता है। इसी तरह स्वयं सहायता समूहों की संख्या भी बढ़ी है। 2011-12 से 2013-14 तक इनकी संख्या 19.29 लाख थी जो मई 2022 में 76.21 लाख हो गई। यानी इसमें 300% की वृद्धि हुई है। स्वयं सहायता समूहों को आरएस और सीआईएफ के रूप में दिए गए कर्ज और कैपिटलाइजेशन की राशि भी कई गुना बढ़ी है। 31 मई 2014 तक गैर निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) 9.58% थी जो 21 जून 2022 को घटकर 2.35% रह गई। इससे पता चलता है कि मिशन लागू होने के एक दशक में एनपीए में बड़ी गिरावट आई है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">मिशन के तहत 78,549 बैंकिंग कॉरस्पॉडेंट कार्य कर रहे हैं। एजीईवाई के तहत वाहनों की संख्या 1811 है और कम्युनिटी द्वारा मैनेज किए जाने वाले कस्टम हायरिंग सेंटर की संख्या 24,381 है। वित्त वर्ष 2013-14 में प्रोड्यूसर एंटरप्राइज की संख्या 34 थी जो मई 2022 में बढ़कर 183 हो गई। इस तरह इस में 400% से अधिक की वृद्धि हुई है। इसी प्रकार वित्त वर्ष 2013-14 में एमकेएसपी की संख्या एक दशक में 600% से अधिक बढ़कर 170 हो गई है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इन आंकड़ों के आधार पर कहा जा सकता है कि मिशन लागू होने के बाद से इसका प्रदर्शन अच्छा रहा है। एनपीए में गिरावट से यह भी पता चलता है कि निचले स्तर पर परिसंपत्तियों में सुधार हुआ है। यह तथ्य बताते हैं कि लोकल अब वोकल हो रहा है।</span></p>
<p><strong>6. मिशन का मूल्यांकन और असेसमेंट&nbsp;</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इंस्टीट्यूट आफ रूरल मैनेजमेंट आनंद (आईआरएमए) के असेसमेंट से पता चला कि 1) जिन इलाकों में मिशन लागू नहीं किया गया उनकी तुलना में मिशन लागू किए जाने वाले इलाकों में प्रत्येक परिवार के पास 2.34 मवेशी अधिक थे। 2) संस्थाओं को बचाने के लिए लोगों में झुकाव देखा गया। 3) गैर मिशन वाले इलाको में कर्ज का आकार 67% अधिक था। 4) बिना मिशन वाले इलाकों की तुलना में मिशन लागू किए गए इलाकों में परिवारों की आमदनी 22% अधिक थी, खासकर एंटरप्राइज से होने वाली आमदनी के कारण। 5) एनआरएलएम परिवार पंचायत गतिविधियों में अन्य की तुलना में 3 गुना अधिक हिस्सेदारी करते हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">क्वालिटी काउंसिल ऑफ इंडिया (क्यूसीआई) ने 2019 में एसवीईपी का मध्यावधि असेसमेंट किया था। इससे पता चला कि 1) 82% आंत्रप्रेन्योर अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग श्रेणी के हैं। 2) 75 फ़ीसदी उपक्रम का प्रबंधन महिलाएं कर रही थीं। 3) परिवारों की कुल आय का 57% एसवीईपी के तहत प्रमोट किए गए उद्यमों से आता है। 4) उद्यमों का औसत मासिक राजस्व 39000 रुपए के आसपास है। 5) 99% उद्यमियों ने उद्यम से अतिरिक्त आमदनी की बात स्वीकार की।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका कार्यक्रम का 2019 में मूल्यांकन किया गया। इससे पता चला कि 1) परिवारों की आय 19 फ़ीसदी बढ़ी है। 2) अनौपचारिक कर्ज में 20% की गिरावट आई है। 3) बचत 28% बढ़ी है। 4) गैर मिशन वाले इलाकों की तुलना में मिशन वाले इलाकों में परिवारों को अन्य योजनाओं का भी लाभ अधिक मिला है।</span></p>
<p><strong>7. मिशन की चुनौतियां</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">मिशन के तहत प्रगति का अंदाजा इस बात से होता है कि इसके लिए जो फंड का आवंटन 2011-12 में 2914 करोड़ रुपए का था वह एक दशक में 358% बढ़कर 13336.42 करोड़ रुपए हो गया। 2021-22 के संशोधित अनुमानों की तुलना में 2022-23 के बजट अनुमान में भी बढ़ोतरी की गई है। फिर भी कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिनका आगे समाधान किया जाना चाहिए।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">ग्रामीण विकास मंत्रालय के पांचवें कॉमन रिव्यू मिशन ने 2019 में सुझाव दिया कि 1) बड़ी संख्या में रिक्तियों को भरा जाए 2) कॉन्ट्रैक्ट अथवा आउटसोर्स किए गए लोगों के लिए बेहतर एचचार मैनुअल हो। 3) सुमित बोस की अध्यक्षता में गठित टास्क फोर्स की सिफारिशों पर अमल किया जाए। राज्य की ट्रेजरी से एनआरएलएम अकाउंट में फंड ट्रांसफर में देरी और एनआरएलएम के डायरेक्टर के बार बार तबादले से भी मिशन को आगे बढ़ाने में बाधा आती है।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">केरल में कुदुंबश्री, छत्तीसगढ़ में बिहान कैंटीन और बिहान आउटलेट, उड़ीसा में सोशल ऑडिट स्वयं सहायता समूहों के लिए अच्छे कदम हैं। हालांकि जैसा 5वें कॉमन रिव्यू मिशन 2019 की सिफारिशों में कहा गया है, मणिपुर, मेघालय, राजस्थान जैसे राज्यों पर अधिक फोकस किया जाना चाहिए। आरएसईटीआई के तहत सावधानीपूर्वक लाभार्थियों की पहचान की जानी चाहिए।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अंत में कहा जा सकता है कि युद्ध के लिए पुरुष और चौका चूल्हा के लिए स्त्री, हाथ में कलम हो लेकिन लिखना न जानता हो, हाथ में तलवार हो लेकिन उसका इस्तेमाल करना ना जानता हो, जैसी कहावतें अब बेकार हो चुकी हैं। महिलाओं के विकास के लिए उनका उचित सामाजिक मोबिलाइजेशन जरूरी है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">गांव के सभी युवाओं चाहे वह महिला हो अथवा पुरुष, को इस मिशन का फायदा उठाना चाहिए। जानकार लोगों को जिले की वेबसाइट देखनी चाहिए अथवा डीएवाई-एनआरएलएम के डिप्टी कमिश्नर के साथ व्यक्तिगत मुलाकात करनी चाहिए। उत्तर प्रदेश में ऐसे डिप्टी कमिश्नर चीफ डेवलपमेंट ऑफिसर के कार्यालय परिसर में बैठते हैं। सभी राज्यों में इस तरह के कार्यालय हैं। लोगों को उनके बारे में जरूरी सूचनाएं जुटानी चाहिए और उनका फायदा लेना चाहिए।&nbsp;</span></p>
<p><em><strong>(लेखक इंडियन इकोनॉमिक सर्विस के पूर्व अधिकारी और कर्प फाउंडेशन&nbsp; के प्रेसिडेंट हैं। उनसे <a href="mailto:mpal1661@gmail.com">mpal1661@gmail.com</a> पर संपर्क किया जा सकता है।</strong></em></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/08/image_750x500_630246fbe4578.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ महिला सशक्तीकरण के लिए एनआरएलएम एक बेहतर उदाहरण, टेक्नोलॉजी तक पहुंच और मार्केटिंग में सुधार की दरकार ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[स्वच्छ जल का लोगों की पहुंच में होना  जरूरी, लेकिन हर  घर जल मिशन की सस्टेनेबिलिटी बड़ी चुनौती]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/access-to-safe-drinking-water-is-welcome-but-sustainability-is-key-to-har-ghar-jal.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 27 Aug 2022 10:51:53 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/access-to-safe-drinking-water-is-welcome-but-sustainability-is-key-to-har-ghar-jal.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">हिंदुस्तान टाइम्स ने 20 अगस्त को प्रधानमंत्री की यह घोषणा प्रकाशित की कि 52 फ़ीसदी ग्रामीण आबादी को उनके घर में सुरक्षित नल का जल मिल रहा है। यह स्वागत योग्य है लेकिन पेयजल की आपूर्ति पर दीर्घकालीन नजरिए से विचार करने की जरूरत है। सुरक्षित पेयजल लोगों की बुनियादी और महत्वपूर्ण जरूरतों में एक है। कहा भी जाता है कि जल ही जीवन है। पृथ्वी पर मौजूद जन आबादी और मवेशियों की संख्या लें तो इन दोनों का 33 प्रतिशत भारत में रहते हैं जबकि सिर्फ 2 फ़ीसदी जमीन और 4 फ़ीसदी ताजा पानी ही भारत के पास है। नीचे दिए गए टेबल से पता चलता है कि दशक दर दशक समस्या गंभीर होती गई है। स्थिति की गंभीरता को समझने के लिए यह आंकड़ा काफी है- 1951 में प्रति व्यक्ति सालाना ताजे पानी की उपलब्धता 5177 घन मीटर थी और अगर यही ट्रेंड बना रहा तो यह उपलब्धता 2050 में सिर्फ 1140 घन मीटर रह जाएगी।</span></p>
<p><b>भारत में पेयजल की उपलब्धता</b></p>
<p><span style="font-weight: 400;">साल - प्रति व्यक्ति पेयजल उपलब्धता घन मीटर में</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">1951 - 5177&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">2011 - 1545</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">2019 - 1368</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">2025 - 1293</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">2050 - 1140</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">(स्रोत जल जीवन मिशन ऑपरेशनल गाइडलाइंस)</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">भूजल स्तर गिरने के कारण मांग और आपूर्ति के बीच का अंतर और अधिक बढ़ता जा रहा है। भूजल स्तर गिरने के कई कारण हैं- अत्यधिक दोहन, कम रिचार्ज, स्टोरेज क्षमता कम होना, जलवायु परिवर्तन के कारण असमान बारिश, जल प्रदूषण, जलापूर्ति व्यवस्था का खराब ऑपरेशन और मेंटेनेंस इत्यादि।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">जल जीवन मिशन के तहत 2019 में यह निर्णय लिया गया था कि 2024 तक भारत के लगभग 19.2 करोड़ सभी ग्रामीण परिवारों को नल से जल की सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी। जब यह घोषणा हुई थी तब सिर्फ छठे हिस्से के बराबर घरों को नल से जल मिल रहा था। इस तरह बहुत ही कम समय में 52 फ़ीसदी घरों तक यह सुविधा पहुंच गई है। प्रधानमंत्री ने गोवा में एक वीडियो कांफ्रेंस के जरिए यह जानकारी दी। गोवा में 100% ग्रामीण परिवारों को नल से जल मिलने लगा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अभी तक 8,65,000 यानी 84.2% सरकारी स्कूलों और 8,94,000 आंगनवाड़ी केंद्रों को नल से जल की सुविधा उपलब्ध कराई जा चुकी है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">झोपड़ियों और कच्चे घरों में रहने वालों के लिए यह सुविधा किसी लक्जरी की तरह है। लेकिन इस कार्यक्रम के तहत बाकी आधे घरों तक निर्धारित समय में इस सुविधा को पहुंचाना चुनौतीपूर्ण होगा क्योंकि भौगोलिक परिस्थितियां भी इसके आड़े आएंगी बाकी बचे 9.2 करोड़ घरों तक नल से जल कितने दिनों में उपलब्ध कराया जाता है, यह काफी हद तक राज्यों पर निर्भर करेगा क्योंकि इस योजना पर अमल राज्यों को ही करना है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">राज्यों की आर्थिक प्रतिबद्धता भी मायने रखती है। केंद्र सरकार ने इस मिशन के लिए 3.5 लाख करोड़ रुपए निर्धारित किए हैं। इस योजना के लिए केंद्र और राज्यों के बीच जो राशि का बंटवारा है वह बिना विधायिका वाले केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 100%, विधायिका वाले केंद्र शासित प्रदेशों और उत्तर पूर्वी राज्यों के लिए 90ः10 और बाकी राज्यों के लिए 50ः50 का अनुपात है। 15वें वित्त आयोग में ग्रामीण स्थानीय निकायों के लिए पेयजल और स्वच्छता पर योजनाओं के लिए 26,900 करोड़ रुपए का अतिरिक्त फंड उपलब्ध कराया गया है। अध्ययनों से यह भी पता चला है कि सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने से लोगों की सेहत पर फर्क पड़ा है। राष्ट्रीय रोग निवारण केंद्र के मुताबिक 2019 से 2021 के दौरान उन इलाकों में जहां स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराया गया है जल जनित बीमारियां 66 फीसदी कम हो गई हैं। इनकी संख्या 177 लाख से घटकर 59 लाख रह गई।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">योजना की मौजूदा स्थिति को देखा जाए तो पता चलता है कि पंजाब, गुजरात, हिमाचल प्रदेश और बिहार में 90% कवरेज हो गई है। तेलंगाना, दादरा नागर हवेली, दमन और दीव भी लक्ष्य की तरफ बढ़ रहे हैं। लेकिन कुछ राज्यों में इसकी गति काफी धीमी है जिस पर ध्यान देने की जरूरत है। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश और झारखंड में अभी तक लक्ष्य का 25% भी हासिल नहीं किया जा सका है। छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और राजस्थान उन 13 राज्यों में हैं जिन्हें फोकस राज्य के तौर पर चिन्हित किया गया है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">यह कोई नई व्यवस्था नहीं है क्योंकि राज्य सरकारों ने आजादी के बाद से ही ग्रामीण आबादी को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने के लिए जलापूर्ति कार्यक्रम चलाए हैं। न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम के हिस्से के तौर पर केंद्र सरकार त्वरित ग्रामीण जलापूर्ति कार्यक्रम के तहत 1972 से राज्यों की मदद कर रही है। 2017 में ही पानी के महत्व को समझते हुए सेल्फ डेवलपमेंट गोल का एक लक्ष्य सभी घरों को सुरक्षित और पर्याप्त पेयजल उपलब्ध कराना था। इस लक्ष्य को 2030 तक हासिल किया जाना है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">प्रत्येक ग्रामीण परिवार तक नल से जल उपलब्ध कराना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। इस कार्य को करने के दौरान कुछ बातें ध्यान में आईं जिन्हें यहां साझा किया जा रहा है। यह बातें हैं- 1) पूंजी निर्माण और ऑपरेशन तथा मेंटेनेंस के लिए कम निवेश से जलापूर्ति सिस्टम अधूरा रह गया या काम नहीं कर सका। आमतौर पर खराब मेंटेनेंस के चलते पूरा निवेश बेकार हो जाता है। 2) कृषि के लिए भूजल का इस्तेमाल पहले ही बहुत ज्यादा हो रहा है। ऐसे में भूजल पर निर्भरता से उद्देश्य की पूर्ति नहीं होती है। 3) जल की उपलब्धता बढ़ाने के लिए वाटर रीचार्ज, वर्षा जल का संचय, वाटर बॉडी में जल धारण की क्षमता बढ़ाना, गाद की सफाई करना इत्यादि जरूरी हैं जिनसे जलापूर्ति व्यवस्था लंबे समय तक चलती है। 4) अगर जलापूर्ति का आश्वासन हो तो उपभोक्ता भी पैसे देने के लिए तैयार हैं। 5) समुदाय को स्वामित्व दिए जाने से पूंजी निर्माण अधिक होता है और जलापूर्ति व्यवस्था का रखरखाव भी बेहतर होता है।</span></p>
<p></p>
<p><b>अबाधित जलापूर्ति को बनाए रखना</b></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कंस्ट्रक्शन और ऑपरेशन तथा मेंटेनेंस के लिए इंजीनियरों, अधिकारियों, कांट्रैक्टर, पंचायती राज संस्थानों के निर्वाचित प्रतिनिधियों और श्रमिकों की बड़ी संख्या इस मिशन में शामिल है। यह सब मिलकर करीब 40 लाख किलोमीटर लंबी पाइपलाइन बिछा रहे हैं। ग्रामीण जलापूर्ति योजना के अनुभव से यह भी पता चलता है कि जलापूर्ति का बने रहना समुदाय के स्वामित्व पर निर्भर करता है। अगर समुदाय प्लानिंग उसे लागू करने, मैनेजमेंट ऑपरेशन और मेंटेनेंस में शामिल है तो व्यवस्था सुचारू रूप से चलती रहेगी। लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि क्या ग्रामीण अपने आप को समुदाय के तौर पर देखते हैं, क्या वह खुद को जलापूर्ति व्यवस्था के स्वामी के तौर पर मानते हैं। मेरे विचार से सब लोग तो ऐसा नहीं सोचते क्योंकि समुदाय और स्वामित्व को संस्थागत रूप नहीं दिया गया है। इस संदर्भ में 73वें संविधान संशोधन का उल्लेख किया जा सकता है जिसमें जलापूर्ति की चर्चा की गई है। लेकिन समस्या है कि गांव में किसका राज चलता है- लोगों का अथवा अधिकारी का? मेरा अनुभव कहता है कि वहां अफसर राज अधिक चलता है। गांव में समुदाय कहां है? हो सकता है पहले रहे हों लेकिन अब वह जाति और वर्ग में बैठे हुए हैं। इसलिए हमें लोगों की भागीदारी के लिए नए तौर-तरीके सोचने पड़ेंगे।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">73वें संशोधन एक्ट में पंचायती राज संस्थानों को स्व सरकार संस्थान (आईएसजी) के तौर पर चिन्हित किया गया है। दूसरे शब्दों में पंचायत ही स्थानीय सरकारें हैं। इनकी संख्या करीब 2.5 लाख है जिनमें करीब 30 लाख सदस्य और चेयरपर्सन हैं। आईएसजी के रूप में पंचायतों को कम से कम तीन &lsquo;एफ&rsquo; का पालन करना चाहिए। पहला, अच्छी तरह से परिभाषित फंक्शन यानी कार्य। दूसरा, उन कार्यों को पूरा करने के लिए पर्याप्त फंड। तीसरा, विभिन्न कार्यों की देखरेख के लिए पर्याप्त संख्या में फंक्शनरी यानी लोगों का होना। इन संस्थानों से आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय की योजना तैयार करने की भी उम्मीद की जाती है। संविधान की ग्यारहवीं अनुसूची में इनके लिए 29 विषयों का उल्लेख है। इस अनुसूची में पेयजल भी एक विषय है। दूसरे शब्दों में पंचायतें अपने स्तर पर सरकार हैं, लेकिन उनकी स्थिति क्या है? 2015-16 की एक डिवॉल्यूशन रिपोर्ट बताती है कि किसी भी राज्य अथवा केंद्र शासित प्रदेश में डिवॉल्यूशन यानी अधिकार देने के लक्ष्य को 73वां संविधान संशोधन लागू होने के ढाई दशक बाद भी 100% लागू नहीं किया गया है। पंचायतें आईएसजी के तौर पर वास्तव में कार्य कर सकें इसके लिए राजनीतिक नेतृत्व अथवा अफसरशाही की जरा भी रुचि नहीं दिखती है। केरल एकमात्र राज्य है जहां अधिकारों का डिवॉल्यूशन तीन चौथाई हुआ है। केरल के अलावा कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, तेलंगाना, सिक्किम और पश्चिम बंगाल ही वे चुनिंदा राज्य हैं जहां यह लक्ष्य 50 फ़ीसदी तक पहुंचा है। राज्य सरकारों, केंद्र शासित प्रदेशों से पंचायतों को अधिकार, अथॉरिटी और जिम्मेदारी सौंपने के इस अध्ययन में पता चला कि सिवाय दक्षिणी राज्यों के पंचायतों का सशक्तीकरण राज्य सरकारों की प्राथमिकता में नहीं रहा है। अगर पंचायतों को संविधान में दिए गए अधिकार नहीं मिलेंगे तो हम उनसे यह कैसे उम्मीद करें कि वे स्थानीय स्तर पर स्वामित्व के विचार को लागू करेंगे। भारत के संघीय ढांचे में ग्राम स्तर पर स्वामित्व है ही नहीं, इसलिए सस्टेनेबिलिटी को हासिल करना मुश्किल है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">हर घर जल में सस्टेनेबिलिटी का मुद्दा 2024 के बाद भी बना रहेगा। अगर जलापूर्ति व्यवस्था लागू करने के पुराने अनुभवों को नहीं दोहराना है तो उसके लिए पंचायतों को अधिकार देना और उन्हें जवाबदेह बनाना जरूरी है। सही मायने में देखा जाए तो ये संस्थान है नियम कायदे के बीच उलझे रह जाते हैं। पेयजल की सस्टेनेबिलिटी के लिए पंचायतों को संस्थागत रूप देना जरूरी है ताकि वे स्थानीय सरकार के रूप में उभर सकें। ऐसा करने पर ही ग्रामीण यह समझेंगे कि जलापूर्ति व्यवस्था को चलाना और देखरेख करना उनकी जिम्मेदारी है। तो इस कार्य को कैसे किया जा सकता है? इसके लिए कुछ समितियां बनाई जा सकती हैं। कौन सी और कैसी समिति बने, कौन से लोग उनमें कार्य करेंगे और कौन नहीं, यह सब तय करने का जिम्मा पंचायतों पर ही छोड़ दिया जाना चाहिए।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">(लेखक इंडियन इकोनॉमिक सर्विस के पूर्व अधिकारी और कर्प फाउंडेशन गाजियाबाद के अध्यक्ष हैं। उनसे </span><a href="mailto:mpal1661@gmail.com"><span style="font-weight: 400;">mpal1661@gmail.com</span></a><span style="font-weight: 400;"> पर संपर्क किया जा सकता है)</span></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/08/image_750x500_6309aaba49a9c.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ स्वच्छ जल का लोगों की पहुंच में होना  जरूरी, लेकिन हर  घर जल मिशन की सस्टेनेबिलिटी बड़ी चुनौती ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/08/image_750x500_6309aaba49a9c.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[डब्ल्यूटीओ के विवादास्पद नियमों के बहाने भारत की एमएसपी व्यवस्था पर निशाना]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/msp-in-india-targeted-using-wto’s-deeply-flawed-methodology.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 17 Aug 2022 11:23:59 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/msp-in-india-targeted-using-wto’s-deeply-flawed-methodology.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">अमेरिका के करीब एक दर्जन सांसदों ने 1 जुलाई 2022 को राष्ट्रपति जो बाइडेन को पत्र लिखा जिसमें उन्होंने एक दशक से विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के नियमों के उल्लंघन के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराते हुए उसके खिलाफ शिकायत दर्ज कराने का आग्रह किया था। सांसदों का कहना है कि भारत डब्ल्यूटीओ के नियमों का उल्लंघन करते हुए अपने किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) दे रहा है। अपने हितों को बढ़ावा देकर भारत अमेरिकी किसानों के हितों के खिलाफ काम कर रहा है। राष्ट्रपति को पत्र लिखने की पहल दो सांसदों ने की थी- रिक क्रॉफर्ड और ट्रेसी क्रॉफर्ड। महत्वपूर्ण बात यह है कि दोनों सांसदों को अमेरिकी कृषि व्यापारियों से कैंपेन फंडिंग मिलती है। इस तरह भारतीय कृषि पर निशाना साधना अमेरिकी एग्री बिजनेस की तरफ से भारत के किसानों के खिलाफ एक और मोर्चा खोलना है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अमेरिकी सांसदों का तर्क है कि भारत गेहूं और चावल किसानों को जो न्यूनतम समर्थन मूल्य दे रहा है वह डब्ल्यूटीओ के नियमों का उल्लंघन है। कृषि पर जो समझौता (एओए) हुआ था उसके मुताबिक किसी भी फसल के लिए उसके उत्पादन के कुल मूल्य के 10 फ़ीसदी से अधिक सब्सिडी नहीं दी जा सकती है। अमेरिकी सांसदों का दावा है कि वर्षों से गेहूं और चावल के मामले में भारत कुल उत्पादन मूल्य के 50 फ़ीसदी से अधिक की सब्सिडी दे रहा है। इन सांसदों ने डब्ल्यूटीओ के नियमों का उल्लंघन करने और फेयर ट्रेड प्रैक्टिस की अवहेलना करने के आरोप में बाइडेन प्रशासन से भारत के खिलाफ डब्ल्यूटीओ में विवाद प्रक्रिया शुरू करने का आग्रह किया है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">ऐसा नहीं कि भारत की एग्रीकल्चर सब्सिडी पर पहली बार सवाल उठाए गए हैं। 2018 में अमेरिका ने चावल, गेहूं और कपास के लिए भारत के न्यूनतम समर्थन मूल्य, जिसे कृषि समझौते में मार्केट प्राइस सपोर्ट (एमपीएस) कहा गया है, पर सवाल उठाए थे। गन्ना किसानों के लिए घोषित होने वाले उचित एवं पारिश्रमिक मूल्य (एफआरपी) तथा राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) पर ऑस्ट्रेलिया ने आपत्ति जताई थी। अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के प्रशासन तथा वहां के सांसदों के दावे को समझने के लिए कृषि सब्सिडी के नियमों को समझना जरूरी है जो कृषि समझौते में बताए गए हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कृषि समझौते के मुताबिक मार्केट प्राइस सपोर्ट (एमपीएस) के आधार पर सब्सिडी की गणना सरकार की गारंटी वाले मूल्य (या एमएसपी) तथा 1986-88 के दौरान उस फसल के औसत अंतरराष्ट्रीय मूल्य के आधार पर की जाएगी। समझौते के वक्त माना गया था कि 1986-88 के दौरान कीमतें स्थिर थीं और उन पर किसी भी देश का दबाव नहीं था। इसलिए उन्हें प्रतिस्पर्धी मूल्य के तौर पर स्वीकार किया जा सकता है।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">किसी एक फसल पर साल भर में कितनी सब्सिडी दी गई वह तय करने के लिए 1986-88 के औसत अंतरराष्ट्रीय मूल्य और उस साल के एमपीएस के अंतर को सरकार की तरफ से खरीदी गई मात्रा से गुणा किया जाता है। इस तरह जो राशि निकलती है वह उस फसल के कुल उत्पादन की कीमत के 10 फ़ीसदी से कम होनी चाहिए। अगर यह राशि इस सीमा से अधिक होती है तो वह डब्ल्यूटीओ के नियमों का उल्लंघन है, जैसा कि अमेरिकी कांग्रेस के सदस्य दावा कर रहे हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">2018 में अपनी शिकायत में अमेरिका ने कहा था कि 2010-11 से 2013-14 तक चावल के लिए भारत का एमपीएस कुल उत्पादन के मूल्य के 70 फ़ीसदी से अधिक था। गेहूं के मामले में यह 60 फ़ीसदी से अधिक था। (टेबल 1)</span></p>
<p><strong>टेबल 1: चावल और गेहूं के लिए भारत का मार्केट सपोर्ट प्राइस रुपये में</strong></p>
<table>
<tbody>
<tr>
<td>
<p><span style="font-weight: 400;">फसल</span></p>
</td>
<td>
<p><b>मद&nbsp;</b></p>
</td>
<td>
<p><b>MY 2010/11</b></p>
</td>
<td>
<p><b>MY 2011/12</b></p>
</td>
<td>
<p><b>MY 2012/13</b></p>
</td>
<td>
<p><b>MY 2013/14</b></p>
</td>
</tr>
<tr>
<td rowspan="2">
<p><span style="font-weight: 400;">चावल</span></p>
</td>
<td>
<p><span style="font-weight: 400;">अमेरिका की एमपीएस गणना मिलियन रुपये में</span></p>
</td>
<td>
<p><span style="font-weight: 400;">1,121,561</span></p>
</td>
<td>
<p><span style="font-weight: 400;">1,365,406</span></p>
</td>
<td>
<p><span style="font-weight: 400;">1,652,817</span></p>
</td>
<td>
<p><span style="font-weight: 400;">1,780,185</span></p>
</td>
</tr>
<tr>
<td>
<p><span style="font-weight: 400;">उत्पादन के कुल मूल्य का प्रतिशत</span></p>
</td>
<td>
<p><b>74.0%</b></p>
</td>
<td>
<p><b>80.1%</b></p>
</td>
<td>
<p><b>84.2%</b></p>
</td>
<td>
<p><b>76.9%</b></p>
</td>
</tr>
<tr>
<td>
<p><span style="font-weight: 400;">&nbsp;</span></p>
</td>
<td>
<p><span style="font-weight: 400;">&nbsp;</span></p>
</td>
<td>
<p><span style="font-weight: 400;">&nbsp;</span></p>
</td>
<td>
<p><span style="font-weight: 400;">&nbsp;</span></p>
</td>
<td>
<p><span style="font-weight: 400;">&nbsp;</span></p>
</td>
<td>
<p><span style="font-weight: 400;">&nbsp;</span></p>
</td>
</tr>
<tr>
<td rowspan="2">
<p><span style="font-weight: 400;">गेहूं</span></p>
</td>
<td>
<p><span style="font-weight: 400;">अमेरिका की एमपीएस गणना मिलियन रुपये में</span></p>
</td>
<td>
<p><span style="font-weight: 400;">618,688</span></p>
</td>
<td>
<p><span style="font-weight: 400;">731,486</span></p>
</td>
<td>
<p><span style="font-weight: 400;">904,191</span></p>
</td>
<td>
<p><span style="font-weight: 400;">964,973</span></p>
</td>
</tr>
<tr>
<td>
<p><span style="font-weight: 400;">उत्पादन के कुल मूल्य का प्रतिशत</span></p>
</td>
<td>
<p><b>60.1%</b></p>
</td>
<td>
<p><b>60.9%</b></p>
</td>
<td>
<p><b>68.5%</b></p>
</td>
<td>
<p><b>65.3%</b></p>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<p><span style="font-weight: 400;">अमेरिका के इस दावे के जवाब में भारत सरकार ने डब्ल्यूटीओ में बताया कि चावल और गेहूं दोनों पर उसका एमपी 10 फीसदी की सीमा से कम है। भारत के अनुसार 2013-14 तक चावल पर एमएसपी 7 फ़ीसदी से अधिक था और यह 2013-14 में 5.5% के आसपास रह गया था। गेहूं के मामले में एमएसपी ज्यादातर वर्षों में नेगेटिव रही है। नेगेटिव इसलिए क्योंकि भारत गेहूं पर जो एमएसपी दे रहा था वह 1986-88 के औसत अंतरराष्ट्रीय मूल्य से कम था।</span></p>
<p><strong>टेबल 2: चावल और गेहूं के लिए भारत का मार्केट प्राइस सपोर्ट अमेरिकी डॉलर में&nbsp;</strong></p>
<table>
<tbody>
<tr>
<td>
<p><span style="font-weight: 400;">फसल</span></p>
</td>
<td>
<p><b>मद</b></p>
</td>
<td>
<p><b>MY 2010/11</b></p>
</td>
<td>
<p><b>MY 2011/12</b></p>
</td>
<td>
<p><b>MY 2012/13</b></p>
</td>
<td>
<p><b>MY 2013/14</b></p>
</td>
</tr>
<tr>
<td rowspan="2">
<p><span style="font-weight: 400;">चावल</span></p>
</td>
<td>
<p><span style="font-weight: 400;">भारत की एमपीएस गणना मिलियन डॉलर में</span></p>
</td>
<td>
<p><span style="font-weight: 400;">2,282.17</span></p>
</td>
<td>
<p><span style="font-weight: 400;">2,647.39</span></p>
</td>
<td>
<p><span style="font-weight: 400;">2,796.70</span></p>
</td>
<td>
<p><span style="font-weight: 400;">1,983.73</span></p>
</td>
</tr>
<tr>
<td>
<p><span style="font-weight: 400;">उत्पादन के कुल मूल्य का प्रतिशत</span></p>
</td>
<td>
<p><b>7.22%</b></p>
</td>
<td>
<p><b>7.44%</b></p>
</td>
<td>
<p><b>7.68%</b></p>
</td>
<td>
<p><b>5.45%</b></p>
</td>
</tr>
<tr>
<td>
<p><span style="font-weight: 400;">&nbsp;</span></p>
</td>
<td>
<p><span style="font-weight: 400;">&nbsp;</span></p>
</td>
<td>
<p><span style="font-weight: 400;">&nbsp;</span></p>
</td>
<td>
<p><span style="font-weight: 400;">&nbsp;</span></p>
</td>
<td>
<p><span style="font-weight: 400;">&nbsp;</span></p>
</td>
<td>
<p><span style="font-weight: 400;">&nbsp;</span></p>
</td>
</tr>
<tr>
<td rowspan="2">
<p><span style="font-weight: 400;">गेहूं</span></p>
</td>
<td>
<p><span style="font-weight: 400;">भारत की एमपीएस गणना मिलियन डॉलर में</span></p>
</td>
<td>
<p><span style="font-weight: 400;">-161.98</span></p>
</td>
<td>
<p><span style="font-weight: 400;">117.76</span></p>
</td>
<td>
<p><span style="font-weight: 400;">-604.23</span></p>
</td>
<td>
<p><span style="font-weight: 400;">-817.81</span></p>
</td>
</tr>
<tr>
<td>
<p><span style="font-weight: 400;">उत्पादन के कुल मूल्य का प्रतिशत</span></p>
</td>
<td>
<p><b>-0.73%</b></p>
</td>
<td>
<p><b>0.48%</b></p>
</td>
<td>
<p><b>-2.50%</b></p>
</td>
<td>
<p><b>-3.53%</b></p>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<p><span style="font-weight: 400;">टेबल से स्पष्ट है कि भारत और अमेरिका के दावे में अंतर इसलिए है क्योंकि सब्सिडी की गणना करते करने में अलग-अलग करेंसी का इस्तेमाल किया गया है। भारत सरकार ने अमेरिकी डॉलर में गणना करते हुए रुपए में हुए अवमूल्यन को शामिल कर लिया है। यहां गौर करने वाली बात यह है कि चावल और गेहूं दोनों दोनों के लिए भारत की कुल सब्सिडी 10 फ़ीसदी की सीमा से बहुत कम है। लेकिन अमेरिका डॉलर में की गई गणना को नहीं मानता है। यह आश्चर्य की बात है क्योंकि कृषि समझौते में कहीं भी इस बात का उल्लेख नहीं है कि डब्ल्यूटीओ के सदस्य देश अपनी घरेलू करंसी से में ही सब्सिडी की गणना करेंगे।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अमेरिकी डॉलर में सब्सिडी की गणना करने से भारत फायदे की स्थिति में है इसका अंदाजा टेबल 1 और 2 से हो जाता है। अमेरिका की डिमांड को स्वीकार करते हुए अगर भारत ने रुपए में सब्सिडी की गणना की होती तो 10 फीसदी की सीमा बहुत पहले पार हो चुकी होती। इसका यह नतीजा होता कि सरकार अभी की तरह हर साल फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं बढ़ा सकती थी।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">लेकिन यह बात स्पष्ट है कि डब्ल्यूटीओ में तय की गई एक गलत पद्धति के आधार पर भारत को टारगेट किया जा रहा है। वैसे तो खामियां कई हैं लेकिन यहां सिर्फ प्रमुख खामियों की चर्चा की जा रही है। सबसे महत्वपूर्ण खामी यह है कि 1986-88 की अंतरराष्ट्रीय कीमतों और हर साल घोषित होने वाली फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य के आधार पर सब्सिडी की गणना की जाती है। 1986-88 के अंतरराष्ट्रीय मूल्यों को प्रतिस्पर्धी मान लेना उचित नहीं है क्योंकि उस दौरान प्रमुख कमोडिटी के दाम में काफी उतार-चढ़ाव आ रहा था। इसकी दो वजहें थीं। पहली, अमेरिका और यूरोपीय समुदाय के सदस्य देशों की 1980 के उत्तरार्ध में गेहूं, मक्का कपास जैसी प्रमुख फसलों के निर्यात में बड़ी हिस्सेदारी थी। दूसरे शब्दों में कहें तो उस समय की अंतरराष्ट्रीय कीमतें इन प्रमुख देशों के द्वारा ही तय की जा रही थीं&nbsp; इसलिए उन्हें प्रतिस्पर्धी नहीं माना जा सकता है। दूसरा कारण यह है कि अमेरिका और यूरोपीय देश ग्लोबल मार्केट में अपने किसानों को प्रतिस्पर्धी बनाए रखने के लिए काफी सब्सिडी दे रहे थे। इसका मतलब यह है कि उस समय की जो अंतरराष्ट्रीय कीमतें थी वह मैनिपुलेटेड थीं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">दूसरी गंभीर खामी यह है कि मौजूदा समर्थन मूल्य की तुलना चार दशक पुराने अंतरराष्ट्रीय कीमतों से की जा रही है। भारत जैसे देशों के लिए यह काफी नुकसानदायक है क्योंकि 1986-88 के बाद इन देशों को ऊंची महंगाई दर का सामना करना पड़ा है। इनकी सालाना औसत महंगाई 4% से अधिक रही है। इसलिए चार दशक पुराने अंतरराष्ट्रीय कीमतों से तुलना करना बेमतलब है। भारत की बात करें तो 1986-88 से 2021 के दौरान खुदरा मूल्य सूचकांक महंगाई 970 फ़ीसदी रही है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अमेरिकी डॉलर में एमएसपी की गणना करके भारत महंगाई के असर को कम करने में सफल रहा है। उदाहरण के लिए 1986-88 से 2010-11 और 2013-14 के बीच डॉलर की तुलना में रुपया 300% गिरा और इस दौरान खुदरा महंगाई 600% बढ़ी। अमेरिका ने 2018 में इसी अवधि के समर्थन मूल्य पर सवाल उठाए थे। सरकार ने इस वर्ष की शुरुआत में डब्ल्यूटीओ को बताया कि 2020-21 में चावल पर एमपीएस उसके कुल उत्पादन के मूल्य के 15% से अधिक हो गया था। इस तरह भारत में कृषि समझौते में तय की गई 10% की सीमा को पार कर गया था।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कृषि समझौते के प्रावधानों से पता चलता है कि ड्राफ्ट तैयार करने वाले इस बात से अवगत थे कि आने वाले दिनों में समझौते को लागू करने में महंगाई के कारण समस्या आ सकती है। लेकिन वे ऐसा कोई विकल्प नहीं रखना चाहते थे जिससे सब्सिडी के नियमों पर दोबारा बातचीत का कोई दरवाजा खुले।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इसके कारण का अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है। कृषि समझौता दरअसल कृषि व्यापार उदारीकरण का चार्टर था। उसमें विकासशील देशों की दीर्घकालिक चिंताओं पर बहुत कम ध्यान दिया गया। खासकर खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की आजीविका पर। कृषि समझौते में इस चार्टर को अपनाया गया क्योंकि वह अमेरिका और यूरोपियन यूनियन के बीच द्विपक्षीय डील (ब्लेयर हाउस एकॉर्ड 1992 ) थी। बहुपक्षीय व्यापार पर उरुग्वे दौर की वार्ता में 125 देशों ने कृषि समझौते पर चर्चा की थी, इसके बावजूद उस चार्टर को अपनाया गया था।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इसलिए आश्चर्य नहीं कि विकासशील देशों ने समझौते के लागू होने से पहले से ही निराशा जतानी शुरू कर दी थी। 1994 में डब्ल्यूटीओ के गठन को औपचारिक मंजूरी देने के लिए मारकेश मंत्रिस्तरीय सम्मेलन बुलाई गई थी। भारत के तत्कालीन वाणिज्य मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा था कि कृषि समझौते को भविष्य में संशोधित करने की जरूरत पड़ेगी ताकि ज्यादा उदारीकरण हासिल किया जा सके और व्यापार को बाधित करने वाले प्रैक्टिस को अनुशासित किया जा सके। सम्मेलन में उन्होंने यह भी कहा था कि भारत सरकार देश की जीवन रेखा माने जाने वाले किसानों के हितों की रक्षा और अपने नागरिकों की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है। अमेरिकी कांग्रेस के दबाव के बाद मौजूदा सरकार के सामने भारत के पूर्व राष्ट्रपति के उस वादे को पूरा करने की चुनौती है जो उन्होंने तीन दशक पहले किया था। सरकार को किसानों के पक्ष में खड़ा होना ही चाहिए।</span></p>
<p><strong><em>(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज में सेंटर फॉर इकोनॉमिक स्टडीज ऐंड प्लानिंग के प्रोफेसर हैं)</em></strong></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2021/11/image_750x500_618aa50298ad7.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ डब्ल्यूटीओ के विवादास्पद नियमों के बहाने भारत की एमएसपी व्यवस्था पर निशाना ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2021/11/image_750x500_618aa50298ad7.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[आजादी का अमृत महोत्सव तो ठीक, गांवों की दुर्दशा आखिर कब खत्म होगी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/azadi-ka-amrit-mahotsav-is-ok-but-when-the-situation-of-villages-will-improve.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 15 Aug 2022 23:43:35 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/azadi-ka-amrit-mahotsav-is-ok-but-when-the-situation-of-villages-will-improve.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">1 अक्टूबर 2014 को "सांसद आदर्श ग्राम योजना" की घोषणा भी अन्य बहुसंख्य सरकारी योजनाओं की भांति ही पूरे तामझाम ढोल नगाड़े के साथ की गई थी। इस योजना को "समावेशी विकास का ब्लूप्रिंट"&nbsp; कहा गया। सरकारी वेबसाइट के अनुसार 'सांसद आदर्श ग्राम योजना'&nbsp; (SAGY)&nbsp; संसद के दोनों सदनों के सांसदों को प्रोत्साहित करती है कि वे अपने निर्वाचन क्षेत्र के कम से कम एक गांव की पहचान करें और 2016 तक एक आदर्श गांव का विकास करें। इस योजना के उद्देश्य हैं-</span></p>
<ul>
<li><span style="font-weight: 400;"> ग्राम पंचायतों के समग्र विकास के लिए नेतृत्व की प्रक्रियाओं को गति प्रदान करना।</span></li>
<li><span style="font-weight: 400;"> सभी वर्गों के जीवन यापन और जीवन की गुणवत्ता व स्तर में पर्याप्त रूप से सुधार करना।</span></li>
<li><span style="font-weight: 400;"> पंचायत तथा गांव का ऐसा समग्र विकास करना कि अन्य गांव तथा पंचायती प्रेरणा लें।</span></li>
<li><span style="font-weight: 400;"> चुने गए आदर्श ग्रामों को स्थानीय विकास के ऐसे केंद्र के रुप में विकसित करना जो अन्य ग्राम पंचायतों को प्रशिक्षित कर सकें।&nbsp;</span></li>
</ul>
<p><span style="font-weight: 400;">इनके अलावा बुनियादी सुविधाओं में सुधार करना, उच्च उत्पादकता, मानव विकास, आजीविका के बेहतर अवसर,&nbsp; असमानताओं को कम करना, अधिकारों और हक की प्राप्ति आदि भी उसके उद्देश्य हैं। यानी कि इतना सब कुछ कि विकसित से विकसित शहर भी इन गांवों से रश्क करें। लिखने पढ़ने सुनने में बड़ा अच्छा लगता है सब।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">प्रधानमंत्री की इस मंशा तथा इस प्रेरणा का कितना असर हमारे माननीय सांसदों पर पड़ा? देश में यह योजना कितनी फलीभूत हुई? देश की ग्रामीण जनता तथा ग्राम्य भारत&nbsp; इस समावेशी विकास के ब्लूप्रिंट से कितना लाभान्वित हुआ ? योजना के लागू होने के&nbsp; 8 आठ साल बीत जाने के बाद, आज इन प्रश्नों का उत्तर ढूंढ़ना, जांच पड़ताल करना और समुचित उत्तर नहीं मिलने पर सरकार से इन सवालों के जवाब लेना इस देश के हर मतदाता का, प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य और अधिकार है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">भारत को सदैव गांवों का, किसानों का देश कहा जाता है। नवीनतम उपलब्ध सरकारी जानकारी के अनुसार हमारे देश में 6 लाख, 49 हज़ार 481 गांव हैं। महाकवि सुमित्रानंदन पंत द्वारा "ग्रामवासिनी" भारत माता का चित्रण इस कविता में जरा देखें:-</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">भारतमाता</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">ग्रामवासिनी।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">खेतों में फैला है श्यामल</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">धूल भरा मैला सा आँचल,</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">गंगा यमुना में आँसू जल,</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">मिट्टी की प्रतिमा</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">उदासिनी।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">दैन्य जड़ित अपलक नत चितवन,</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अधरों में चिर नीरव रोदन,</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">युग युग के तम से विषण्णा मन,</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">वह अपने घर में</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">प्रवासिनी।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इन लाइनों में गुलाम भारत में भारत-माता तथा भारत के गांवों की दुर्दशा का जो मार्मिक चित्रण हुआ है, आजादी के 75 साल बाद भी इस चित्र में कोई विशेष परिवर्तन नहीं दिखाई देता। आजादी का अमृतोत्सव मना रहे इस अभागे देश का ये दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है?</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">2014 में जब प्रधानमंत्री जी ने इस नई योजना की घोषणा की, तो तमाम विज्ञापनों के जरिए यह स्थापित करने का प्रयास किया गया कि यह कोई विलक्षण क्रांतिकारी सोच है, पर दरअसल ऐसा नहीं है। आजादी के बहुत पहले संभवत 1909&nbsp; में&nbsp; महात्मा गांधी ने अपनी किताब "हिन्द स्वाराज" में "आदर्श ग्राम" की संकल्पना की थी। यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि गांधीजी के आदर्शों की बातें तो बहुत की गईं, आज भी रोज गांधी जी के आदर्शो की दुहाई दी जाती है, पर गांधी के सपनों के गांव हम आज तक नहीं बना सके।&nbsp;&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">2009-10 में भी गांवों के समग्र विकास की एक योजना लाई गई थी "प्रधानमंत्री आदर्श ग्राम योजना" (PMAGY)। इस योजना&nbsp; में ऐसे गांवों का चयन करना था जहां अनुसूचित जाति के लोगों की संख्या 50 प्रतिशत से अधिक हो। संविधान में देश के सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समानता का अधिकार दिया गया है, इसलिए इन वर्गों को समाज में बराबरी के स्तर पर लाना इसका प्रमुख उद्देश्य था। 18 राज्यों के लगभग 16 हजार गांवों का चयन किया गया, हर गांव के लिए 21 लाख रुपए की राशि का भी प्रावधान किया गया। इस योजना में कुल 13 बिंदुओं में ग्रामीण विकास की इतनी अच्छी अच्छी योजनाओं का उल्लेख किया गया है, कि अगर सारी योजनाओं का शतप्रतिशत क्रियान्वयन हो जाता गांव स्वर्ग से भी बेहतर हो जाते और मनुष्य स्वर्ग जाने से भी इंकार कर भारत के गांवों में ही रहना श्रेयस्कर समझता।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">समय-समय पर ऐसी कई मनमोहक योजनाएं बनाई गईं, जैसे कि लोहिया ग्राम योजना, अंबेडकर ग्राम योजना और गांधी ग्राम योजना, अटल आदर्श ग्राम योजना उत्तराखंड वगैरह वगैरह, जिन्होंने देश के गांवों को 'आदर्श ग्राम' बनाने का दावा किया, वादे किए, सपने दिखाए, वोट बटोरा, अपनी-अपनी सरकारें बनाईं, पर न तो&nbsp; गांवों का भाग्य बदला और न ही उनकी तस्वीर। तत्कालीन सरकारों से आज यह सवाल क्यों नहीं पूछा जाना चाहिए कि क्या इस योजना के एक दशक बाद भी इन वर्गों को हम समानता के स्तर पर ला सके हैं, और अगर ऐसा नहीं कर पाए तो इसके लिए दोषी कौन है और उसके लिए कौन सी सजा का प्रावधान होना चाहिए?</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">ऐसा नहीं है कि गांवों में परिवर्तन नहीं आया है। गांवों में ढेरों परिवर्तन दिखाई दे रहे हैं। गांव में साइकिलों को विस्थापित कर मोटरसाइकिलें आ गई हैं। पंच सरपंचों पंचों के घर पक्के हो गए हैं, इनके घरों में चार पहिया वाहन भी देखे जा सकते हैं। और कुछ चाहे मिले या ना मिले किंतु मोबाइल और टीवी हर घर की अनिवार्य आवश्यकताओं में शुमार हैं। असीमित कमीशन खोरी के साथ ही साथ पंचायत अस्पताल, स्कूलों के पक्के भवन भी बनते जा रहे हैं, पर इन गुणवत्ताविहीन भवनों में न तो सुयोग्य शिक्षक हैं, ना ही नियमित डॉक्टर, ना पर्याप्त दवाइयां।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">जहां जहां सड़कें बनीं भी, उसे भी अनियंत्रित कमीशन खोरी के अजगर ने आधा पौना लील लिया है। कहीं-कहीं तो विकास के नाम पर गांवों के पहले से ही चल रहे अस्पतालों का ही नाम बदलकर उन्हें "वैलनेस सेंटर"&nbsp; जैसा फैंसी नाम दे दिया गया, पर हमारे इन अस्पताल कम वैलनेस सेंटर्स की जमीनी हकीकत को कोरोना ने उधेड़कर दुनिया को दिखा दिया था।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">बहुत कुछ ऐसा भी है जो आज भी नहीं बदला है, जैसे कि गांवों में अव्वल तो नालियां हैं ही नहीं, और जहां कच्ची पक्की कुछेक हैं भी, वहां आज भी पहले की तरह ही नालियां बदस्तूर बजबजा रही हैं। पहले की तरह गंदगी तथा मच्छरों, बीमारियों का साम्राज्य आज भी कायम है। इंच इंच जमीन के लिए लड़ाई -झगड़ों के मामले आज भी जारी हैं। आज भी गांव के समझदार चतुर सुजान लोग सुबह उठते ही तैयार होकर कोर्ट कचहरी, कार्यालयों का रुख करते हैं। अपवादों को छोड़कर ज्यादातर जींन्स पैंट पहनने वाली ग्रामीण युवा पीढ़ी को भी पढ़ें लिखे सभ्य लोगों की तरह ही मिट्टी कीचड़ गोबर, गाय गोरू, खेत खलिहान की जहमत से सख्त परहेज है। किसान का युवा बेटा बाप की 4 एकड़ जमीन पर खेती करने के बजाए उसकी 2 एकड़ जमीन बिकवा कर उस रकम की रिश्वत देकर शहर में चपरासी की नौकरी करने की जुगाड़ में लगा हुआ है। गांव अब बिना देर किए, किसी भी कीमत पर जल्द से जल्द शहर बनना चाहते हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">बड़े शहरों में रहने वाले कान्वेंट के बच्चे कभी कभार भूले-भटके अपने चाचा ताऊ के यहां गांवों में आने पर अक्सर यह सवाल पूछ ही लेते हैं कि जब अमूल और मदर डेयरी इतना अच्छा दूध दे रहे हैं, तो आप लोग गांवों में दूध के लिए गोबर गौमूत्र की गंदगी क्यों बना कर रखे हैं, और इस बदबू और मच्छरों के बीच आप लोग भला रह कैसे पाते हैं?</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इसी योजना के तहत स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भी बनारस से 25 पच्चीस किलोमीटर दूर स्थित 2974 जनसंख्या वाले गांव जयापुर को गोद लिया गया था।&nbsp; जयापुर बनारस से 25 किलोमीटर दूर स्थित है। इस ग्राम के चयन के भी कई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कारण रहे होंगे। विजय को प्रेरित करता हुआ इसका&nbsp; जयापुर नाम भी एक कारण हो सकता है। वैसे कहा जाता है कि यह गांव शुरू से ही संघ का गढ़ रहा है। इस पर अंतिम मोहर लगने का यह भी एक कारण हो सकता है। समाचारों में ही हमने सुना कि इस गांव के करीब 300 वर्ष पुराने महुआ के पेड़ को संरक्षित करने की कवायद हो रही है, दूसरी और देश के हजारों-हजार साल पुराने जैविक विविधता से भरपूर जंगलों के लाखों पेड़ों को पूरी निर्ममता के साथ केवल इसलिए काटा&nbsp; जा रहा है ताकि इन राजनीतिक पार्टियों तथा नेताओं को मोटा चुनावी चंदा देने वाली बड़ी कंपनियों द्वारा लीज पर ली गई खदानों से अवैध रूप से अनमोल खनिज संपदा को जल्द से जल्द निकाल कर बेचा जा सके।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">मोदी जी की प्रधानमंत्री सांसद आदर्श ग्राम योजना पार्ट वन- 2014 एवं पार्ट टू -2021 की अगर बात करें तो सांसद आदर्श ग्राम योजना 2021 की वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक,इस योजना के तहत 2314 ग्राम पंचायतों का चयन किया गया है।&nbsp; प्रधानमंत्री जी के गोद लिए गए गांव में भी इतने सालों बाद भी एक चौथाई परियोजनाओं पर काम ही शुरू नहीं हुआ (नौ अक्टूबर 2021 की स्थिति)। और अगर काम हो गया हो ,तो गांव वालों को बधाई।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">झारखंड की बात करें तो&nbsp; यहां सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत राज्य के सांसदों ने अब तक कुल 89 पंचायतों का चयन किया है। कुल 5230 स्कीमें स्वीकृत की गईं। जिनमें से 2065&nbsp; योजनाएं लंबित बताई गई हैं। जिन योजनाओं पर काम हुआ बताया जाता है इनमें हर स्तर पर तरह तरह की कमियां-खामियां उजागर हो रही हैं। कमोबेश यही हाल पूरे 800 सांसदों के द्वारा चयनित 2314 ग्राम पंचायतों के गांवों का भी कहा जा सकता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">ऐसा नहीं है कि इस योजना के पूर्ण न होने के पीछे फंड या पैसों की कमी है। देश में यही एक ऐसी योजना है, जिसे पूर्ण करने के लिए फंड की कोई समस्या ही नहीं है। आदर्श सांसद ग्राम योजना के तहत विकास कार्य पूरा करने के लिए कई तरह से फंड मिलते हैं। इनमें इंदिरा आवास,पीएम ग्रामीण सड़क योजना और मनरेगा भी शामिल है। इसके अलावा सांसदों को मिलने वाला स्थानीय क्षेत्र विकास फंड (एमपीलैड)&nbsp; भी कार्यक्रम पूरा करने में मददगार है।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">सरकार ने संसद की एक समिति को यह जानकारी दी है कि माननीय पूर्व सांसदों द्वारा स्थानीय क्षेत्र विकास निधि की&nbsp; 1,723 करोड़ रुपये की राशि खर्च नहीं की जा सकी है। जरा सोचिए... जो माननीय सांसद महोदय&nbsp; हाथ जोड़कर वोट मांगते वक्त आपकी सेवा करने का वादा करते हैं, जीतने के बाद, आपकी सेवा के लिए मिली हुई रकम को 5 वर्षों में भी समुचित तरीके से खर्च करने वक्त भी उनके पास नहीं है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">आज आठ साल&nbsp; बीत जाने के बाद भी ऐसे कई गोद लिए गांवों में&nbsp; "समग्र समावेशी विकास" की तो छोड़िए समुचित शिक्षा, स्वास्थ्य, एवं रोजगार&nbsp; तथा बुनियादी जरूरतों को तरसते इन गांवों में आज तक सामान्य योजनाएं तक भली भांति नहीं पहुंच पाई हैं। सोचने वाली बात यह है कि जब देश के माननीय प्रधानमंत्री तथा माननीय सांसदों द्वारा गोद लिए गए गांवों का यह हाल है, तो बाकी देश के गांवों के समावेशी समग्र विकास के बारे में बात करना,और सवाल पूछना ही बेमानी और फिजूल है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कहने को हम आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं, लेकिन कुल मिलाकर इन 75 वर्षों में "ग्राम-निवासिनी भारत माता"&nbsp; का चेहरा चमकाने के नाम पर नाना नामधारी योजनाओं के जरिए जो सतही रंगरोगन की कवायद की गई उसने स्थिति को और बिगाड़ दिया है। यह कहना गलत नहीं होगा कि प्रधानमंत्री जी की इस सांसद आदर्श ग्राम योजना&nbsp; में ना तो माननीय सांसद पर्याप्त रुचि&nbsp; ले रहे हैं, और ना ही इन योजनाओं में दूर दूर तक आदर्श नामक कोई चिड़िया दिखाई नहीं दे रही है। यही कारण है कि इससे ना तो भारत के गांवों की दशा बदल रही है,और ना ही पंत जी की उदासिनी भारत माता की तस्वीर।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">(लेखक अखिल भारतीय किसान महासंघ, आईफा के राष्ट्रीय संयोजक हैं)</span></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/08/image_750x500_62f93b42a2984.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ आजादी का अमृत महोत्सव तो ठीक, गांवों की दुर्दशा आखिर कब खत्म होगी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[देश को खाद्य सुरक्षा की आत्मनिर्भरता देने वाले कृषि क्षेत्र और किसान को चाहिए आर्थिक आत्मनिर्भरता]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/farmers-too-need-economic-independence-as-they-made-the-country-atmanirbhar-in-food-security.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 15 Aug 2022 09:32:45 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/farmers-too-need-economic-independence-as-they-made-the-country-atmanirbhar-in-food-security.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">आजादी के बाद पहली जनगणना के मुताबिक 1951 में भारत की जनसंख्या 36.11 करोड़ थी। उस साल देश का खाद्यान्न उत्पादन मात्र 5.082 करोड़ टन था। साल 2021 में जनगणना तो नहीं हुई लेकिन देश की आबादी करीब 140 करोड़ आंकी जा रही है। इस तरह आजादी के बाद से देश की आबादी करीब चार गुना हो चुकी है। पहले कई दशक तक खाद्यान्न आयात पर निर्भर रहने वाले देश की आज अपनी चार गुना हो चुकी जनसंख्या को खाद्य सुरक्षा देने के साथ ही दुनिया के बड़े खाद्य निर्यातकों में गिनती हो रही है। पिछले साल देश का खाद्यान्न उत्पादन 30 करोड़ टन को पार कर गया। यह आजादी के 75 साल में देश के लिए कृषि क्षेत्र और किसानों के योगदान को दर्शाता है। खाद्य सुरक्षा किसी भी देश के लिए कितनी अहम है, वह इस साल फरवरी में यूक्रेन और रूस के युद्ध के बाद दुनिया के देशों और हमारे पड़ोसी देश श्रीलंका ने भी महसूस किया है।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">बात केवल खाद्यान्न उत्पादन की ही नहीं है बल्कि दूध उत्पादन से लेकर कई व्यावसायिक फसलों कपास और चीनी उत्पादन में भी हमने बड़ी सफलताएं हासिल की हैं। लेकिन यह सब बहुत आसानी से हो गया हो ऐसा नहीं है। आजादी के समय संसाधनों की बहुतायत तो नहीं थी लेकिन इन उपलब्धियों के लिए दृष्टि जरूर थी और उस पर सरकार ने नीतियां बनाकर अमल करना शुरू किया जिसके नतीजे सामने आये। मसलन 1951 में देश में सिंचित कृषि भूमि केवल 18 फीसदी थी। खाद्यान्न उत्पादकता मात्र 522 किलो प्रति हैक्टेयर थी और कुल 97.32 लाख हैक्टेयर पर खाद्यान्न उत्पादन हो रहा था। खाद्यान्न उत्पादन का रकबा 2020-21 में 129.34 लाख हैक्टेयर पर पहुंचा है लेकिन 2.386 टन प्रति हैक्टेयर की उत्पादकता से इस साल खाद्यान्न उत्पादन 30.86 करोड़ टन पर पहुंच गया। खाद्यान्न उत्पादन में लगातार वृद्धि की वजह से ही ऐसा पहली बार हुआ है कि देश में कोरोना जैसी महामारी के दौरान&nbsp; किसी के भी भूखे रहने की स्थिति पैदा नहीं हुई क्योंकि सरकार के पास पर्याप्त खाद्यान्न उपलब्ध था। आजादी के पहले बंगाल में उसके बाद एक बार बिहार के अकाल के समय देश को भयावह मानवीय त्रासदी से गुजरना पड़ा था।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">यह सब बहुत आसान नहीं था। आजादी के बाद से ही सरकार ने जिस तरह कृषि क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश किया यह उसके चलते ही संभव हुआ। नेहरू के प्रधानमंत्री कार्यकाल में ही देश में पंतनगर, हैदराबाद और भुवनेश्वर में कृषि विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई। कृषि विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों के विकास का सिलसिला जारी रहा। कृषि में शोध और उसके लिए जरूरी ढांचागत सुविधाओं पर निवेश हुआ। इसके साथ ही भाखड़ा नांगल से लेकर हीराकुंड और नागार्जुन सागर जैसे बांधों के जरिये सिंचाई सुविधाओं को बढ़ाया गया। ऐसे में छठे दशक में जब अधिक उत्पादकता वाली गेहूं और चावल की नई प्रजातियों के जरिये देश में हरित क्रांति पर काम शुरू हुआ तो पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के सिंचाई सुविधाओं वाले क्षेत्रों ने तुरंत नतीजे देने शुरू किए और देश को खाद्यान्न आत्मनिर्भरता प्रदान की। इसके बाद इसका दायरा पश्चिम बंगाल, मध्य भारत और पश्चिमी भारत के साथ देश के दूसरे हिस्सों तक पहुंचा।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कृषि शोध एवं विकास पर निवेश करने के साथ ही नई प्रजातियों के लिए किसानों को इनपुट मैटीरियल उपलब्ध कराने और सरकारी खरीद का तंत्र तैयार हुआ। सिंचाई सुविधाओं को बढ़ाने पर काम हुआ और यह 1951 के 18 फीसदी से बढ़कर 2018-19 में 54.32 फीसदी पर पहुंच गई। यह बाद अलग है कि आजादी के शुरुआती दशकों में जिस तेजी से सिंचाई क्षेत्रफल बढ़ाने पर काम हुआ, हाल के दशकों में यह गति काफी धीमी रही है। मसलन साल 2014-15 में देश में सिंचित क्षेत्रफल 53.06 फीसदी था लेकिन 2018-19 तक यह 54.32 फीसदी पर ही पहुंचा है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की व्यवस्था अस्तित्व में आई और भारतीय खाद्य नियम, सेंट्रल वेयर हाउसिंग कारपोरेशन और स्टेट वेयर हाउसिंग कारपोरेशन की स्थापना के जरिये भंडारण सुविधाएं स्थापित हुई। इनके जरिये सरकारी खरीद की व्यवस्था शुरू हुई। नई प्रजातियों के लिए सिंचाई के साथ उर्वरक जरूरी थे। इसके लिए जहां सार्वजनिक क्षेत्र में उर्वरक कारखाने स्थापित हुए, वहीं इफको जैसी सहकारी संस्था अस्तित्व में आई। कई दशकों तक प्राइमरी एग्रीकल्चरल क्रेडिट कोआपरेटिव सोसाइटीज ने किसानों को संस्थागत कर्ज मुहैया कराने में भूमिका निभाई। एक समय सहकारी क्षेत्र की किसानों को कर्ज में हिस्सेदारी 40 फीसदी तक थी। वहीं खाद्य सुरक्षा के इस दौर में ही कृषि उत्पाद मंडी समिति (एपीएमसी) कानून के तहत मंडियां स्थापित हुईं और इन पर निवेश हुआ। इसी दौरान देश में आपरेशन फ्लड लागू हुआ और नेशनल डेयरी डेवलपमेंट कारपोरेशन (एनडीडीबी) जैसी संस्थाएं स्थापित हुईं जिनके जरिये देश भर में अमूल मॉडल लागू कर दूध उत्पादन में बढ़ोतरी के लिए काम किया गया। आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">यहां तक तो सब ठीक है क्योंकि इन उपलब्धियों का देश और नागरिकों को फायदा हुआ लेकिन कृषि क्षेत्र की मौजूदा स्थिति को इन उपलब्धियों के समकक्ष नहीं रखा जा सकता है। हरित क्रांति वाले क्षेत्रों में उत्पादकता में स्थिरता आ गई है। कृषि क्षेत्र पर सार्वजनिक निवेश लगातार कम होता गया है। शोध पर खर्च के मामले में स्थिति काफी कमजोर है। हम दुनिया के विकसित देशों में कृषि में हो रहे तकनीकी उपयोग और शोध के मामले में लगातार पिछड़ते जा रहे हैं। किसान की आय लगातार कमजोर बनी हुई है और उसकी सामाजिक हैसियत काफी घटी है क्योंकि अर्थव्यवस्था के बाकी क्षेत्रों और सार्वजनिक सेवाओं में काम कर रहे लोगों और किसानों की आय के बीच अंतर तेजी से बढ़ा है। भले ही सरकार कुछ भी दावे करे लेकिन हकीकत यह है कि ग्रामीण और शहरी क्षेत्र के बीच आय और जीवन की सुविधाओं का अंतर बहुत अधिक बढ़ गया है। जिसके चलते शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की खाई बढ़ती जा रही है।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">जलवायु परिवर्तन से लेकर मिट्टी की सेहत और पानी जैसे प्राकृतिक संसाधनों की गुणवत्ता में तेजी से गिरावट आई है। जलवायु परिवर्तन का कृषि पर सबसे अधिक असर हमने 2021-22 कृषि साल में देखा है। इस साल में सितंबर, अक्तूबर, नवंबर, दिसंबर और जनवरी में&nbsp; लगातार पांच माह अधिक बारिश हुई। वहीं मार्च के मध्य में अचानक तापमान में बढ़ोतरी हुई। इसका नतीजा गेहूं की फसल के उत्पादन में जबरदस्त गिरावट के रूप में दिखा वहीं सरसों की फसल दिसंबर और जनवरी की अधिक बारिश के चलते फ्लावरिंग के समय प्रभावित हुई और उसका उत्पादन भी गिरा। इसके पहले खरीफ सीजन मेंं अधिक बारिश और बाढ़ ने प्याज और टमाटर जैसी सब्जियों की फसलों को भारी नुकसान पहुंचाया। इस सबके बावजूद सरकार ने कृषि में तीन फीसदी विकास दर का दावा किया है लेकिन यह जमीनी हकीकत से दूर है।&nbsp; सवाल यह है कि क्या हम जलवायु परिवर्तन के कृषि पर पड़ने वाले असर को कम करने के लिए काम कर रहे हैं इसके लिए जरूरी शोध पर निवेश बढ़ा रहे हैं, फिलहाल तो ऐसा नहीं दिख रहा है। लंबे समय से देश के कृषि वैज्ञानिक कृषि जीडीपी का एक फीसदी शोध पर निवेश करने की मांग कर रहे हैं लेकिन सरकार ऐसा नहीं कर रही है। ऐसे में जलवायु परिवर्तन जिस तरह किसानों और कृषि क्षेत्र के लिए एक गंभीर चुनौती की तरह सामने आ रहा है उसके लिए समय रहते कदम उठाने की जरूरत है।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;"> किसान की लागत बढ़ रही है जबकि कृषि में निवेश पर रिटर्न काफी कम होने के साथ ही सार्वजनिक निवेश की कमी के चलते कृषि क्षेत्र में पूंजी निर्माण की दर बहुत कम है। जिस तरह छठे, सातवें और आठवें दशक में देश में कृषि विपणन कि ढांचागत सुविधाओं पर निवेश हुआ वह अब लगभग बंद हो गया है। जो लोग के डिजिटल मार्केटिंग और ई-नाम जैसे विकल्पों में इसका हल देख रहे हैं उन्हें हकीकत को पहचानने की जरूरत है। इसलिए नई परिस्थितियों में सार्वजनिक निवेश में बढ़ोतरी सबसे अहम है और इसकी भरपाई निजी निवेश से नहीं हो सकती है। कुछ चुनिंदा फसलों के मामले में निजी क्षेत्र निवेश कर सकता है लेकिन मुख्य फसलों के मामले में सार्वजनिक निवेश का कोई विकल्प नहीं है।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">देश के कृषि क्षेत्र को एक विजन की जरूरत है जिस पर समग्र रूप में काम किया जाना चाहिए। केवल कुछ फसलों के एमएसपी बढ़ाने या कीमतों में उतार-चढाव के बाद लागू होने वाले प्रतिक्रियात्मक कदम कृषि और किसानों का भविष्य नहीं सुधार सकते हैं। अब भी देश के 46 फीसदी से अधिक लोग कृषि क्षेत्र में ही रोजगार पाते हैं। आंकड़ों के मुताबिक&nbsp; 1951 में देश की 36.11 करोड़ आबादी में से 82.7 फीसदी ग्रामीण आबादी थी। देश में कुल में 6.99 करोड़ किसान थे। वहीं 2011 की जनगणना के मुताबिक किसानों की संख्या 11.88 करोड़ पर पहुंच गई जो जोत को छोटे होता आकार का नतीजा है। इसके बावजूद देश के अधिकांश लोग अभी भी कृषि में ही रोजगाररत हैं जबकि 2021-22&nbsp; में सकल घरेलू उत्पाद में कृषि की हिस्सेदारी 18.6 फीसदी है। वहीं&nbsp; साथ ही अर्थव्यवस्था के आंकड़े साबित करते हैं कि छह फीसदी से अधिक की वृद्धि दर के बावजूद मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में रोजगार वृद्धि दर एक फीसदी से भी कम है। यानी कृषि से कामगारों को औद्योगिक इकाइयों में शिफ्ट करने का ख्वाब भी अब खत्म होता जा रहा है। ऐसे में कृषि क्षेत्र के लिए एक नये विजन की जरूरत है।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कृषि व सहयोगी क्षेत्र में ही लोगों के लिए काम के अवसर पैदा करने होंगे। जैसा कि नीति आयोग के सदस्य प्रोफेसर रमेश चंद का कहना है कि अब हमें फार्म फैक्टरी के कंसेप्ट पर काम करना होगा। आधुनिकतम तकनीक का उपयोग कर फार्म को फैक्टरी में कनवर्ट करने के आइडिया पर काम करना होगा। जब हम न्यू इंडिया के शोर में डूबे जा रहे हैं वहां हम न्यू एग्रीकल्चर पर काम क्यों नहीं कर रहे, यह अपने आप में एक बड़ा सवाल है। कृषि क्षेत्र में मौजूदा चुनौतियों का सामना करने के लिए एक नई दृष्टि की जरूरत है जिसके केंद्र में किसान की आर्थिक आत्मनिर्भरता हो।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">आजादी के बाद के कुछ दशकों में राजनेताओं ने दृष्टि और सोच के जरिये हरित क्रांति का सपना साकार किया और देश चार गुना आबादी की चुनौती का सामना करते हुए सही मायने में खाद्य सुरक्षा में आत्मनिर्भरता हासिल कर सका। उसी तरह की सोच के जरिये आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर किसान का लक्ष्य हासिल करना ही हमारा उद्देश्य होना चाहिए। उसके लिए यथास्थिति में बड़े बदलाव की जरूरत है न कि बदलाव के नाम पर कामचलाऊ फैसलों की।&nbsp; </span></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/08/image_750x500_62f9c55ae120a.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ देश को खाद्य सुरक्षा की आत्मनिर्भरता देने वाले कृषि क्षेत्र और किसान को चाहिए आर्थिक आत्मनिर्भरता ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[‘सरकारी मानदेय पाने वालों की कमेटी से किसान हित की उम्मीद बेमानी’]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/how-can-farmers-expect-fair-treatment-from-committee-of-people-who-are-on-payroll-of-government.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 07 Aug 2022 09:33:51 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/how-can-farmers-expect-fair-treatment-from-committee-of-people-who-are-on-payroll-of-government.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>हमारे प्राच्य वांग्मय में कृषि तथा कृषकों की बड़ी महिमा गाई गई है। पराशर नाम के एक महान ऋषि ने अपने ग्रंथ 'कृषि पराशर' में लिखा है,</p>
<p>"कृषिर्धन्या कृषिर्मेध्या जन्तूनां जीवनं कृषि।"</p>
<p>अर्थात कृषि धन और ज्ञान प्रदान करती है तथा कृषि ही मानव जीवन का आधार है। चाणक्य अर्थात कौटिल्य जिन्हें विष्णुगुप्त के रूप में भी पहचाना जाता है, के ग्रंथ अर्थशास्त्र में आर्थिक नीति, राज्य शिल्प और युद्ध नीति के साथ ही कृषि को राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बताते हुए व्यवस्था दी गई है। इनके उद्धरण आज भी समाज को राह दिखाते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में भी जीवन कर्मों में कृषि को सर्वोच्च महत्ता देते हुए इसे प्रथम स्थान दिया गया है। शास्त्रों में कहा गया है, "कृषि मूलम जगत सर्वम"। खेती किसानी को लेकर हमारे देश में एक कहावत बड़ी मशहूर है, "उत्तम खेती मध्यम बान, अधम चाकरी भीख निदान।"</p>
<p>खेती किसानी की वर्तमान दुर्दशा तथा देश में किसानों की आए दिन हो रही आत्महत्याओं ने इस स्थापित कहावत के मायने एकदम उलट दिए हैं।</p>
<p>भारत सदैव कृषि प्रधान देश के रूप में जाना जाता रहा है। इस देश में किसानों को अन्नदाता का सम्मानित दर्जा दिया गया है। यह देश अगर विश्व में सोने की चिड़िया कहलाता था, तो वास्तव में इसके पीछे भी तत्कालीन सुदृढ़ खेती किसानी तथा आत्मनिर्भर किसानों की मजबूत ताकत ही थी। अब सवाल यह उठता है कि आखिर ऐसा क्या घटित हुआ, अथवा देश के नीति निर्माताओं ने या फिर किसानों ने ऐसे कौन से पाप किए कि किसान आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो रहे हैं। आखिर क्यों अन्नदाताओं के दुर्दिन खत्म होने का नाम नहीं ले रहे है ?</p>
<p>दरअसल, ज्यादातर खेती आज घाटे का सौदा बन गई है। किसान परिवारों की नई पीढ़ी अब खेती छोड़, इतर छोटे-मोटे रोजगार तलाशने शहरों की ओर दौड़ लगा रही है। ऐसा भी नहीं कि सरकारों ने खेती तथा किसानों की दशा सुधारने के लिए कोई प्रयास नहीं किया। साल दर साल अनेक योजनाएं बनीं पर सब भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गईं।&nbsp;</p>
<p>हाल के दिनों में तो देश के किसानों की दशा बेहद शोचनीय हो गई है। यह कहना अनुचित न होगा कि देश की खेती किसानी और बहुसंख्य किसान मानो आईसीयू में पड़े हैं। पिछले ढाई साल कोरोनावायरस और आंदोलन की भेंट चढ़ गए। हालांकि इन कठिन परिस्थितियों में भी किसानों ने खेती के पहिए को रुकने नहीं दिया और समूचा देश जब अपने घरों में दुबका हुआ था तब भी सबका पेट भरा। लेकिन मौसम की बेवफाइयों और कोरोना की बेहिसाब बंदिशों ने किसानों के खेत से लेकर बाजार के बीच हजारों कठिनाइयां पैदा कर दीं, जिनके कारण छोटे बड़े सभी किसानों ने भारी घाटा उठाया है।&nbsp;</p>
<p>देश की कृषि बाजार ने कभी किसानों की खून पसीने की कमाई के साथ न्याय नहीं किया और उनके उत्पादों का वाजिब मूल्य नहीं दिया। किसानों से बिना सलाह के लाए गए तीनों विवादास्पद कानूनों को नाराज किसानों के ऐतिहासिक लंबे आंदोलन के बाद सरकार ने बेमन से वापस तो ले लिया, पर पूरे मसले को सरकार ने अपनी हार जीत से जोड़ते हुए इसे अपनी नाक का सवाल बना लिया है। आंदोलन की वापसी के समय न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कानून लाने के लिए कमेटी गठन की बात हुई थी। पर अन्य कई मौकों की तरह इस बार भी सरकार अपने वादे से सीधे पलट गई।&nbsp;</p>
<p>कृषि मंत्री ने तो हाल में एक बयान में यहां तक कह दिया कि किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कानून लाने बाबत कभी कोई बात ही नहीं हुई थी, बल्कि न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था को और अधिक कारगर तथा पारदर्शी बनाने की बात की गई थी। कोई यह तो पूछे कि न्यूनतम समर्थन मूल्य की आप की पूर्व व्यवस्था अगर कारगर और पारदर्शी नहीं थी तो आप लोगों ने आठ सालों में उसे बदला क्यों नहीं। अब अगर सरकार के नुमाइंदे ही वादों से पलट जाएं और सफेद झूठ बोलने लगें तो जनता बेचारी कहां जाए?</p>
<p>इन सबसे यह समझ में आ जाता है कि सरकार की मंशा किसी भी हालत में किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य देने की नहीं है। वह तीनों कानूनों की वापसी पर अपनी हार को पचा नहीं पा रही है और बदला लेने के मूड में है। किसान संगठन भी सरकार की नीयत को लेकर शंकित हैं, इसीलिए नई कमेटी के गठन की घोषणा के साथ ही उसके स्वरूप को देखकर सरकार की मंशा को भांप गए। यही कारण है कि किसान हितों के लिए वास्तविक रूप से संघर्षशील सभी किसान संगठनों ने इस कमेटी से कन्नी काट लिया।</p>
<p>संयुक्त किसान मोर्चा में अन्य मुद्दों को लेकर भले ही मतभेद हों या ना हों लेकिन इसमें भाग न लेने को लेकर सभी संगठन एकजुट व एकमत नजर आए। देश के 40 से अधिक किसान संगठनों के राष्ट्रीय महासंघ आईफा ने तो एमएसपी पर गठित इस कमेटी को "शोकान्तिका नौटंकी" ही कह दिया। दरअसल सरकार की नीयत किसानों को एमएसपी देने की है ही नहीं। अगर सरकार की ऐसी मंशा होती, तो वह कमेटी का खेल खेलने के बजाय एमएसपी पर एक सक्षम कानून लेकर आती।&nbsp;</p>
<p>गौरतलब है कि हाल में ही सरकार ने एमएसपी पर कमेटी गठित की है। इस 29 सदस्यीय कमेटी में शामिल लगभग सभी सदस्य या तो सरकार में शामिल लोग हैं, या फिर सरकार के वेतन भोगी अधिकारी हैं, अथवा सरकारी मानसेवी लाभार्थी विशेषज्ञ हैं अथवा सत्तारूढ़ पार्टी के जेबी संगठनों के लोग हैं, अथवा सरकार के कृपा पात्र तथा लाभार्थी कंपनियों के लोग हैं।&nbsp;</p>
<p>इनका इतिहास देश के किसानों को भली-भांति पता है। इसलिए इनसे किसान हितों के बारे में ईमानदारी से सोचने की कोई उम्मीद नहीं की जा सकती। इस कमेटी में शामिल ज्यादातर लोग किसान आंदोलन के समय सरकारी पाले में खड़े होकर, आंदोलनकारी किसानों को भला बुरा कहते हुए कोसते रहते थे,और उन काले कानूनों को लेकर सरकार की तरफ से अधिवक्ता की तरह कार्य करते हुए सरकार का बचाव करते थे।&nbsp;</p>
<p>किसान संगठनों के जले घाव पर नमक छिड़कते हुए सरकार ने इस कमेटी का अध्यक्ष उन्हीं संजय अग्रवाल को बनाया है, जिनकी अगुवाई में उन तीनों कार्पोरेट परस्त कानूनों का ड्राफ्ट तैयार किया गया था। समझने वाली बात यह है कि आखिर जिनकी तनख्वाह या मानदेय सरकार देती है, भला उनसे किसान हित के लिए सरकार के खिलाफ जाने की उम्मीद कैसे की जा सकती है?</p>
<p>एक और महत्वपूर्ण तथ्य है कि इस कमेटी को मूल लक्ष्य से विचलित करने के लिए नन्यूनतम समर्थन मूल्य के साथ ही जैविक खेती, जीरो बजट जैसे विवादास्पद मुद्दों पर विचार के लिए भी अधिकृत किया है। इनका कोई हल कभी नहीं निकलने वाला। जीरो बजट खेती किसानों को बहकाने के लिए एक जुमला मात्र है। यह भी विचारणीय तथ्य है कि आज हर देश अपने कृषि सेक्टर को मजबूत बनाने के लिए खेती में जबरदस्त अल्पकालिक तथा दीर्घकालिक निवेश कर रहा है, जबकि हमारा कृषि प्रधान देश खेती में निवेश को हतोत्साहित करते हुए तथाकथित "जीरो बजट" का झुनझुना बजा रहा है।</p>
<p>अगर न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारण की बात करें तो माना जाता है कि "कृषि मूल्य लागत आयोग" अलग अलग फसलों की खेती में होने वाले सभी खर्चे जोड़कर उनकी लागत निकालता है। हालांकि उसका यह आकलन हमेशा वास्तविक कृषि लागत से काफी कम होता है, इसीलिए किसान को 'न्यूनतम समर्थन मूल्य' मिलने के बावजूद खेती में घाटा होता है।&nbsp;</p>
<p>समझने वाली बात यह है कि जब इस सरकारी "जीरो बजट" फार्मूले से खेती होगी, तब तो खेती की लागत ही जीरो होगी। कुल मिलाकर बिना एक टके लागत के खेती में थोड़ा बहुत जो भी उत्पादन हो वह किसान का सौ टका फायदा माना जाएगा। ना तो इस 'जीरो बजट' पर खेती होनी है, ना उससे कोई लाभ होना है, ना किसानों को सही समर्थन मूल्य देना है, ना ही इन मुद्दों पर कोई फैसला होना है।&nbsp;</p>
<p>दीवाल पर लिखी यह इबारत अब बड़े आराम से पढ़ने में आ रही है कि, इस कमेटी से ना तो किसानों को एमएसपी मिलनी है, और ना ही एमएसपी गारंटी कानून मिलना है। अब लाख टके का सवाल यह उठता है कि जब किसानों को न एमएसपी देना है ना ही एमएसपी गारंटी कानून देना है, तो भला इस कमेटी को गठित क्यों किया गया है? यह दरअसल आने वाले चुनावों के मद्देनजर देश के किसानों को भ्रमित करने हेतु सोच समझकर उठाया गया राजनैतिक रणनीतिक कदम है।</p>
<p>इस कदम के जरिए सरकार किसानों को यह संदेश देना चाहती है कि हमने तो एमएसपी के लिए कमेटी बना दी है, ये किसान संगठन तो मूर्ख, नासमझ और अड़ियल हैं जो आपके हित में बनाई गई इस कमेटी में भाग नहीं ले रहे। यानी कि देश के वास्तविक जुझारू किसान संगठनों को किसान समुदाय की नजरों में नीचे गिराने की यह एक सोची समझी साजिश है। सरकार को उम्मीद है कि इस भ्रम जाल में फंस कर शायद किसान उन्हें आंख मूंदकर वोट देंगे। पिछले कई मौकों पर सरकारों ने इस तरह किसानों के एकमुश्त वोट हासिल करके अपनी सरकारें भी बनाई हैं। इस बार भी सरकार देश के किसान समुदाय को मूर्ख बना रही है। किसानों की बुद्धिमानी और जागरूकता को लेकर सरकार का आकलन कितना सही या कितना गलत है यह तो आने वाले चुनाव ही बताएंगे।</p>
<p>आज परिस्थितियां बदल गई हैं, सरकार की कलई पूरी तरह से खुल गई है। किसान समझने लगे हैं कि सही तथ्य यही है कि सरकार वास्तव में देश के किसानों को एमएसपी देना ही नहीं चाहती। क्योंकि इससे किसानों की अरबों-खरबों की उपज हर साल औने-पौने दामों में खरीद कर मोटा मुनाफा कमाने वाले और उनकी पार्टी को मोटा चंदा देने वाले वाले पसंदीदा व्यापारियों की तिजोरी पर अतिरिक्त भार पड़ेगा ।&nbsp;</p>
<p>सरकार उन चुनिंदा व्यापारियों के खजाने की रक्षा हेतु कृत संकल्प प्रतीत होती है । आईफा तथा साथी किसान संगठनों ने तो सरकार से साफ कहा था, कि आप तो वैसे भी दिन प्रतिदिन नये नये क़ानून ला रहे ही हैं, तो किसानों पर कृपा कर एक कानून आप एमएसपी पर भी लेकर आ जाइये, जिसमें सीधे-सीधे उल्लेख हो कि किसानों के उत्पाद को न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम कीमत पर यदि कहीं भी कोई भी खरीदता है तो वह कानूनन जुर्म होगा।&nbsp;</p>
<p>इस मुद्दे पर सरकार लगातार यह सफेद झूठ बोलती है कि सरकार के पास इतना पैसा नहीं है कि वह सरकारों व किसानों का पूरा उत्पाद न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद सके। हम तो यह कहते ही नहीं कि किसानों का सारा का सारा उत्पाद सरकार खरीदे। सरकार को जरूरत है तो खरीदे वरना एक दाना भी किसानों से न खरीदे। वैसे भी सरकार किसानों से जो भी खरीदी करती है, वह प्राय: समर्थन मूल्य पर ही करती है, इसलिए एमएसपी कानून लाने से सरकार पर कोई अतिरिक्त आर्थिक भार नहीं पड़ने वाला। हां सरकार को तो बस यही कानून लागू करना है कि जो भी कंपनी, संस्था अथवा व्यापारी किसानों का माल खरीदे, वह किसी भी हालत में न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम पर न की जाए। सीधी सी बात है कि तब व्यापारियों को किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य देना पड़ेगा, सरकारी खजाने से इसमें एक रुपया भी अतिरिक्त खर्चा नहीं होने वाला। हां व्यापारियों को जरूर अपनी थैली का मुंह किसानों के लिए थोड़ा सा और खोलना पड़ेगा।</p>
<p>लेकिन इस कमेटी के गठन से सरकार का किसान हितैषी मुखौटा अब पूरी तरह से गिर गया है । जाहिर है ये देश के किसानों की कीमत पर चुनिंदा बड़े व्यापारियों के हित रक्षा हेतु समर्पित हैं, और शायद इसीलिए यह नहीं चाहते कि इनके चहेते व्यापारियों की जेबें ढीली हों। इस कमेटी में किसान हितों के लिए ईमानदारी से सोचने वालों के लिए कोई जगह हो ही नहीं सकती।</p>
<p>रहीम ने लिखा है कि "कहु रहीम कैसे निभै, बेर केर को संग?" सरकारी बाबुओं और सत्तारूढ़ दल के हितैषी संगठनों के लोगों से भरी हुई यह कमेटी केवल सरकार के चहेते व्यापारियों के हितों के बारे में ही सोच सकती है। वैसे भी हमारे देश में यह कहा जाता है कि जिस समस्या को हल ना करना हो उसके लिए आप एक कमेटी बना दो, फिर उस कमेटी ने क्या किया इसकी जांच के लिए एक और कमेटी बना दो, फिर उन दोनों कमेटियों के कार्यों के मूल्यांकन के लिए एक और कमेटी बना दो। यह कहना गलत नहीं होगा कि यह कमेटी केवल आगामी चुनावों में लाभ प्राप्त करने के लिए बनाई गई है।&nbsp;&nbsp;</p>
<p>न्यूनतम समर्थन मूल्य की मांग कोई नई मांग नहीं है। एमएसपी कानून को लेकर "आईफा" भी लंबे समय से लड़ाई लड़ रही है। विगत दिनों देश के लगभग 200 दिग्गज किसान नेताओं ने दिल्ली में लगातार बैठकें कीं। उन्होंने सभी कृषि उत्पादों पर एमएसपी कानून लाने के लिए "राष्ट्रीय एमएसपी गारंटी मोर्चा" का गठन किया गया है। ये देश के सभी राज्यों के गांव - गांव में एमएसपी गारंटी कानून के लिए "जनजागरण अभियान" चला रहे हैं।&nbsp;</p>
<p>इसी संदर्भ में आगामी 6 से 8 अक्टूबर को देश के सारे अग्रणी किसान नेता पुनः दिल्ली में इकट्ठे होने वाले हैं। इस तीन दिवसीय महासम्मेलन में देश के हर राज्य की खेती की दिशा दशा तथा "एमएसपी गारंटी मोर्चा" की राष्ट्रीय रूपरेखा तय कर दी जाएगी। इन तैयारियों को देखते हुए सरकार को अब यह समझना होगा कि सरकार के तनखैय्या कलाकारों की इस "शोकांतिका नौटंकी" कमेटी से किसान अब भरमाने वाले नहीं हैं। इससे पहले कि देश के किसानों की नाराज़गी विस्फोटक रूप ले, सरकार को आगे बढ़कर सार्थक पहल करनी चाहिए तथा देश के किसान संगठनों से चर्चा कर इस दिशा में तत्काल जरूरी ठोस कदम उठाना चाहिए। अपने उत्पादन का न्याय पूर्ण न्यूनतम समर्थन मूल्य प्राप्त करना किसानों का वाजिब हक है,और किसानों को उनका यह हक हर हाल में मिलना ही चाहिए।&nbsp;</p>
<p>बात-बात पर प्राचीन संस्कृति, प्राचीन ज्ञान तथा प्राच्य विद्वानों की उक्तियों की दुहाई देने वाली इस सरकार को कौटिल्य के अर्थशास्त्र के संस्कृत श्लोक के निहितार्थ भी समझने चाहिए, तथा अपने पसंदीदा धनकुबेरों को भी समझाना चाहिए ;</p>
<p>" अलबद्ध लाभार्थ, लब्ध परिरक्षणी "</p>
<p>अर्थात जो प्राप्त न हो उसे प्राप्त करना, जो प्राप्त हो गया उसे संरक्षित रखना और जो संरक्षित हो गया है उसे समानता के आधार पर बांटना शुरू करें। अब देखने वाली बात यह है कि प्राच्य संस्कृति तथा ज्ञान के संरक्षण संवर्धन के साथ ही उनके अनुकरण का दावा करने वाली यह सरकार , प्राचीन वांग्मयों में सदैव पूजित सम्मानित तथा रक्षित इस देश के अन्नदाता कृषक समुदाय के साथ उचित न्याय कब करती है।</p>
<p><em><strong>(लेखक अखिल भारतीय किसान महासंघ आईफा के राष्ट्रीय संयोजक हैं, लेख में व्यक्त विचार उनके निजी विचार हैं )</strong></em></p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ ‘सरकारी मानदेय पाने वालों की कमेटी से किसान हित की उम्मीद बेमानी’ ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[इंडिया में 5जी की तैयारी, पर भारत में बेहतर फोन कनेक्टिविटी का जिम्मा बीएसएनएल को]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/urban-india-aspiring-for-5g-bharat-connectivity-is-mandated-to-bsnl.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 05 Aug 2022 11:42:43 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/urban-india-aspiring-for-5g-bharat-connectivity-is-mandated-to-bsnl.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>आप चाहें या ना चाहें, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि रिलायंस जियो और भारती एयरटेल जैसे टेलीकॉम सर्विस प्रोवाइडर के पास आज हमारे नागरिकों के जीवन की कुंजी है। यह बात गांवों की तुलना में शहरों के लिए ज्यादा मुफीद है। उनकी सेवाओं के बिना जीवन ठहर जाएगा।</p>
<p>हमारे जीवन में यह महत्वपूर्ण भूमिका निजी क्षेत्र निभा रहा है। ऐसा उस अर्थव्यवस्था में हो रहा है जो अन्य बातों के अलावा बाजार पर ज्यादा निर्भर है। सरकार भी ऐसा कहने में संकोच नहीं करती। वह बिना किसी लाग-लपेट के कहती है कि बिजनेस में सरकार का कोई काम नहीं है। सरकार की अवधारणा तब और पुष्ट हुई जब उसने राष्ट्रीय एयरलाइन एयर इंडिया को टाटा को बेच दिया। टेलीकॉम सेक्टर को सक्सेस स्टोरी के मॉडल के तौर पर दिखाते हुए किसी भी सेक्टर को नहीं छोड़ा गया।</p>
<p>इसलिए जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट ने आर्थिक तंगी में फंसी भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) के लिए 1.64 लाख करोड़ रुपए के बेलआउट पैकेज को मंजूरी दी तो खुशनुमा आश्चर्य का एहसास हुआ। इस सार्वजनिक कंपनी का आधार अब मूलतः ग्रामीण क्षेत्र में रह गया है। बेलआउट पैकेज की घोषणा करते हुए सरकार ने जो विज्ञप्ति जारी की उसकी शुरुआत कुछ इस तरह थी, &ldquo;टेलीकॉम एक रणनीतिक क्षेत्र है। इस सेक्टर में बीएसएनएल की मौजूदगी बाजार को संतुलित करने का काम करती है।&rdquo;</p>
<p>सरकार की घोषणा उन लोगों के लिए खुशी की बात है जो ग्रामीण क्षेत्रों में खराब कनेक्टिविटी की शिकायत करते हैं। कोविड-19 संकट के दौरान इसकी जरूरत अधिक महसूस की गई। जब स्कूल-कॉलेज में नियमित पढ़ाई नहीं हो रही थी उस दौरान वही बच्चे ठीक से पढ़ सके जिनके पास ब्रॉडबैंड कनेक्शन या 4जी डाटा कनेक्शन था। उन दिनों इसके अलावा पढ़ाई का और कोई विकल्प भी नहीं था।</p>
<p>यह कोई नीतिगत बदलाव है या सरकार को इस बात का एहसास हुआ है कि सब कुछ निजी क्षेत्र पर नहीं छोड़ा जा सकता है? खासतौर से ग्रामीण क्षेत्र में जहां बिजनेस के नियम वैसे नहीं होते जैसे शहरों में होते हैं। बीएसएनएल को ग्रामीण क्षेत्र में टेलीडेंसिटी सुधारने का जिम्मा दिया गया है। यह सिर्फ वॉयस यानी कॉल के लिए नहीं बल्कि डाटा पैकेज के मामले में भी है जो वॉयस टेलिफोनी की तुलना में अधिक आवश्यक हो गया है। जैसा कि दूरसंचार मंत्री अश्विनी वैष्णव ने वादा किया है, बीएसएनल को गांवों और छोटे शहरों में 4जी और ब्रॉडबैंड वायर लाइन यानी वाईफाई सुधारने के लिए अलग-अलग मदों में पैसे दिए जाएंगे। माना जा सकता है कि इससे कंपनी प्रोफेशनल और प्रतिस्पर्धी बन सकेगी।</p>
<p>बीएसएनल का पैकेज काफी महत्वाकांक्षी लगता है। ऐसे समय जब दूसरे टेलीकॉम सर्विस प्रोवाइडर शहरों में 5जी सेवा देने के लिए ऊंची बोली लगा रहे हैं, देश के हजारों गांव अभी तक 2जी या बहुत हुआ तो 3जी की सुविधा ही ले पा रहे हैं। सरकार ने जो 1.64 लाख करोड़ रुपए के पैकेज की घोषणा की है उसके तहत कंपनी को 4जी इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए संसाधन उपलब्ध कराए जाएंगे।&nbsp;</p>
<p>उसे 900/1800 मेगाहर्ट्ज बैंड में स्पेक्ट्रम दिया जाएगा जिसकी कीमत 44993 करोड़ रुपए होगी। इसके बदले कंपनी में सरकार इक्विटी लेगी। विज्ञप्ति के अनुसार, &ldquo;इक्विटी के जरिए निवेश का मतलब है कि कंपनी के मालिक के तौर पर सरकार पैसे देगी और उस रकम को कंपनी की बैलेंस शीट में कर्ज के तौर पर नहीं माना जाएगा। यह स्पेक्ट्रम मिलने पर बीएसएनल बाजार में प्रतिस्पर्धा कर सकेगी और अपने विशाल नेटवर्क का इस्तेमाल करते हुए हाई स्पीड डाटा उपलब्ध करा सकेगी।&rdquo; उम्मीद करनी चाहिए कि सरकार की योजना बिना किसी खास अड़चन के लागू होगी।</p>
<p>बेहतर टेक्नोलॉजी सॉल्यूशंस के जरिए ग्रामीण और दूरदराज इलाकों में सेवाएं देने वाली बीएसएनएल 4जी टेक्नोलॉजी का इंफ्रास्ट्रक्चर भी खड़ा कर सकेगी। सरकार ने पूंजीगत खर्च के लिए 22,471 करोड़ रुपए का प्रावधान किया है।</p>
<p>बेहतर सामंजस्य के लिए भारतनेट और भारत ब्रॉडबैंड नेटवर्क लिमिटेड का बीएसएनएल में विलय किया जाएगा। हालांकि सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि भारतनेट के तहत जो इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा किया गया है वह राष्ट्रीय संपत्ति होगी, जो सभी टेलीकॉम सर्विस प्रोवाइडर्स को बिना किसी भेदभाव के उपलब्ध होगी। यह ग्रामीण इलाकों के ग्राहकों के लिए अच्छी बात है।</p>
<p>यह घटनाक्रम कितना महत्वपूर्ण है, दूरसंचार रेगुलेटर ट्राई के डाटा से इसका आकलन किया जा सकता है। गांवों में भले ही शहरों की तुलना में अधिक लोग रहते हो लेकिन टेलीडेंसिटी इसके विपरीत है। ट्राई के अनुसार 30 अप्रैल 2022 को देश में 117 करोड़ टेलीफोन ग्राहक थे, जिनमें शहरी क्षेत्र में 65 करोड़ और ग्रामीण क्षेत्र में 52 करोड़ थे। शहरों में टेलीडेंसिटी 135% है जबकि ग्रामीण इलाकों में यह सिर्फ 58% है। वाईफाई के मामले में तो स्थिति और भी खराब है जबकि गवर्नेंस, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं गांवों तक पहुंचाने के लिए यह जरूरी है। देश में कुल 25 करोड़ वाईफाई कनेक्शन हैं जिनमें ग्रामीण इलाकों में सिर्फ दो करोड़ हैं।</p>
<p>ग्रामीण इलाकों में कनेक्टिविटी के मामले में समस्या दोहरी हो जाती है। निजी क्षेत्र की बड़ी कंपनियों का एकमात्र मकसद मुनाफा होता है। उनके बिजनेस का आधार सिर्फ ग्राहकों की संख्या नहीं बल्कि प्रति यूजर औसत रेवेन्यू (आरपू) भी होता है। उनके लिए शहरों में आरपू तो 130 से 140 रुपए है जबकि गांवों में यह सिर्फ 50 रुपए है। ये कंपनियां प्रति यूजर औसत रेवेन्यू 200 रुपए तक ले जाना चाहती हैं। ऐसे में वे ग्रामीण इलाकों में निवेश करने में क्यों रुचि दिखाएंगी। इसका बोझ तो बीएसएनल को ही उठाना पड़ेगा। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए वह संसाधन की पूरी हकदार है।</p>
<p><em><strong>(प्रकाश चावला सीनियर&nbsp;</strong></em><em><strong>इकोनॉमिक जर्नलिस्ट है और आर्थिक नीतियों पर लिखते हैं)</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ इंडिया में 5जी की तैयारी, पर भारत में बेहतर फोन कनेक्टिविटी का जिम्मा बीएसएनएल को ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[समिति के बड़े कार्यक्षेत्र में एमएसपी के अलावा भी बहुत कुछ, गठित होने के साथ ही उठे सवाल]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/terms-of-reference-of-new-agriculture-committee-has-many-more-things-other-than-msp.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 20 Jul 2022 14:03:21 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/terms-of-reference-of-new-agriculture-committee-has-many-more-things-other-than-msp.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>केंद्र सरकार द्वारा जून 2020 में लाये गये तीन केंद्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ किसान आंदोलन का हल निकालने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक एक्सपर्ट कमेटी गठित की थी। समिति की रिपोर्ट आंदोलन समाप्त होने के बाद सार्वजनिक हुई और उसके साथ ही लोग उसे भूल गये। अब सरकार ने 18 जुलाई को कृषि से जुड़े मुद्दों पर एक समिति गठित करने की जानकारी गजट में प्रकाशित की है जो 12 जुलाई की कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय की अधिसूचना है। यह 29 सदस्यीय समिति है। किसान आंदोलन को समाप्त करने की शर्त के तहत न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर एक समिति गठित करने की बात सरकार ने कही थी। माना जा रहा है कि यह समिति उसी शर्त को पूरा करने के लिए गठित की गई है। लेकिन जिस तरह से समिति में सदस्यों की भागीदारी है और अधिसूचना में समिति के कार्यक्षेत्र का जो दायरा बताया गया है उसे देखकर इसे केवल एमएसपी पर समिति कहना तथ्यात्मक नहीं होगा। दूसरे, समिति की अधिसूचना जारी होने के साथ ही इसको लेकर विवाद भी शुरू हो गया है। किसान आंदोलन का नेतृत्व करने वाले संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) के इसमें शामिल नहीं होने की बात भी अब सामने आ गई है। <strong>रूरल वॉयस</strong> ने 18 जुलाई को समिति के गठन की घोषणा के समय&nbsp; ही संकेत दिया था कि एसकेएम की समिति में शामिल होने की संभावना न के बराबर है। हालांकि समिति में तीन सदस्य संयुक्त किसान मोर्चा से होने की जानकारी अधिसूचना में है और इसके लिए मोर्चा द्वारा सदस्यों के नाम भेजने के बाद उनको शामिल करने की बात कही गई है।&nbsp;&nbsp;</p>
<p>कषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा गठित समिति के&nbsp; कार्यक्षेत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा तीन कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा के लिए राष्ट्र को संबोधित करते हुए कही बातों को ही मुख्य आधार बनाया गया है। इस बात को समिति के कुछ सदस्यों ने <strong>रूरल वॉयस</strong> के साथ अनौपचारिक बातचीत में स्वीकार भी किया है।</p>
<p>समिति के कार्यक्षेत्र में एमएसपी का मुद्दा अहम है। इसे देश भर में कैसे प्रभावी और पारदर्शी बनाया जाए उसके लिए समिति सुझाव देगी। लेकिन इसमें यह कहीं भी नहीं कहा गया है कि समिति एमएसपी की कानूनी गारंटी के बारे में राय देगी। किसान संगठनों की यही सबसे मुख्य मांग रही है। इस पर संयुक्त मोर्चा के सदस्यों का कहना है कि समिति के गठन के पहले हम टर्म्स ऑफ रेफरेंस की मांग कर रहे थे जो हमें नहीं बताई गई। इसलिए इस समिति को हम अपनी मांग के अनुरूप नहीं मानते हैं।</p>
<p>कृषि मामलों के एक नीतिगत एक्सपर्ट का कहना है कि 29 सदस्यीय समिति होने से इसकी सदस्य संख्या इतनी बड़ी है कि इसका किसी ठोस नतीजे पर आना काफी टेढ़ा काम है। समिति एमएसपी को प्रभावी बनाने के साथ ही कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) को अधिक स्वायत्त बनाने, विपणन व्यवस्था को बेहतर करने, प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने और फसल विविधीकरण पर काम करेगी। समिति में सरकारी अधिकारियों की बड़ी संख्या है। विभिन्न मंत्रालयों के सचिवों के शामिल होने का अर्थ है कि समिति के सामने रखे गये मुद्दों में से अधिकांश पर तो पहले ही काम हो जाना चाहिए था। वह तो इन विभागों को पहले ही चला रहे हैं।</p>
<p>संयुक्त किसान मोर्चा में शामिल किसान संगठनों के पदाधिकारियों का कहना है कि समिति की अध्यक्षता पूर्व कृषि सचिव संजय अग्रवाल को दी गई है। तीन विवादित केंद्रीय कृषि कानूनों को तैयार करने से लेकर उनको लागू करने, उनका बचाव करने और किसान संगठनों के साथ वार्ता में भी उनकी अहम भूमिका रही थी। ऐसे में यह समिति कैसे किसानों का भरोसा कैसे जीतेगी। वहीं किसानों के प्रतिनिधियों के नाम पर इसमें तीन केंद्रीय कृषि कानूनों के पक्षधर लोगों को शामिल करना भी किसान संगठनों को अखर रहा है।</p>
<p>हालांकि समिति में नीति आयोग के सदस्य प्रोफेसर रमेश चंद भी हैं। वहीं इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ के डॉ. सी एस सी शेखर और भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) के डॉ. सुखपाल सिंह भी हैं। आईसीएआर के महानिदेशक भी इसमें सदस्य हैं। लेकिन अध्यक्ष के अलावा पांच केंद्रीय सचिव और चार राज्यों के अधिकारियों के साथ समिति में अधिकारियों का ही वर्चस्व है।</p>
<p>कुछ एक्सपर्ट्स का कहना है कि जिस तरह से संयुक्त किसान मोर्चा इस समिति का हिस्सा नहीं बनना चाहता है तो कहीं इस समिति का हश्र सुप्रीम कोर्ट द्वारा तीन कृषि कानूनों पर गठित एक्सपर्ट समिति की तरह तो नहीं हो जाएगा। वहीं किसानों की आय दोगुना करने के लिए गठित दलवई समिति की हजारों के पेज की सिफारिशें पहले से ही हैं। नई समिति के कामकाज का दायरा जिस तरह से बड़ा रखा गया है यह भी उसी तरह की समिति बन जाएगी। इसलिए इसे केवल एमएसपी पर फोकस करने वाली समिति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। खास बात यह है कि अधिसूचना में समिति की रिपोर्ट सौंपने की कोई समयसीमा नहीं बताई गई है।</p>
<p>एक बड़ा सवाल यह भी है कि इन सभी मुद्दों पर सरकार लगातार काम करने की बात करती रही है। फसल विविधीकरण और मार्केटिंग पर काम करने की बातें होती रही हैं। ऐसे में इस समिति की सिफारिशों के क्या मायने होंगे।&nbsp;</p>
<p>वहीं किसान आंदोलन के हल के रूप में सामने आए समिति के गठन के विकल्प ने इसके मुख्य मकसद के उलट संयुक्त किसान मोर्चा को फिर एक नया मुद्दा दे दिया है। वहीं इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों ने भी सरकार की आलोचना शुरू कर दी है।&nbsp;</p>
<p>यह भी एक संयोग है कि उत्तर प्रदेश के अमरोहा से लोक सभा सांसद कुंवर दानिश अली ने सरकार द्वारा किसानों को एमएसपी की कानूनी गारंटी देने के बारे में सवाल पूछा था जिसका जवाब 19 जुलाई, 2022 को सदन में केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने दिया गया। इसमें एमएसपी पर कानूनी गारंटी के जवाब में 'जी नहीं' का इस्तेमाल करते हुए कहा गया है सरकार ने एमएसपी और दूसरे मुद्दों पर गठित की है। साथ ही फसलों पर दी जाने वाली एमएसपी पर जानकारी दी गई है। इसमें कहा गया कि सरकार ने एमएसपी को प्रभावी बनाने और कृषि विविधीकरण, सीएसीपी की स्वायत्ता सहित संबंधित मुद्दों पर एक समिति गठित की है।</p>
<p>ऐसे में गठन के समय ही समिति के पुनर्गठन की मांग होने के लगी है तो यह समिति की सिफारिशों को कितना गंभीरता से लिया जाएगा यह तो आने वाला समय ही बताएगा लेकिन यह बात जरूर है कि समिति को लेकर गंभीरता पर शुरू में ही सवाल खड़े हो गये हैं।</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ समिति के बड़े कार्यक्षेत्र में एमएसपी के अलावा भी बहुत कुछ, गठित होने के साथ ही उठे सवाल ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[जब महंगाई आसमान पर हो तो जीवन जीना आसान कैसे हो सकता है]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/ease-of-living-not-easy-as-long-as-cost-of-living-is-on-rooftop.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 18 Jul 2022 09:07:47 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/ease-of-living-not-easy-as-long-as-cost-of-living-is-on-rooftop.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>हम अक्सर सरकार को यह कहते सुनते हैं कि वह किस तरह भारतवासियों का जीवन आसान (ईज ऑफ लिविंग) करना चाहती है। आशय बहुत उम्दा है लेकिन इज ऑफ लिविंग तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक लोगों के लिए रोजमर्रा के खर्चे (कॉस्ट ऑफ लिविंग) कम नहीं होते। सवाल है कि क्या कॉस्ट ऑफ लिविंग कम है। इस सवाल का जवाब तलाशना कोई मुश्किल बात नहीं है। कॉस्ट ऑफ लिविंग ना सिर्फ ज्यादा है बल्कि महंगाई दर लगातार ऊंची बने रहने के कारण यह दिनोंदिन असहनीय होती जा रही है। दूसरे शब्दों में, खुदरा और थोक महंगाई के सरकारी आंकड़ों पर ही गौर करें तो कॉस्ट ऑफ लिविंग कम होने का नाम नहीं ले रही है। ऊंची महंगाई दर के कारण कॉस्ट ऑफ लिविंग असहनीय हो रही है, जिससे ईज आफ लिविंग लगातार छह महीने से असंभव हो गई है। आने वाले दिनों में इससे राहत मिलने के आसार भी नहीं दिख रहे हैं।</p>
<p>अगर जून 2022 के थोक महंगाई के आंकड़ों पर गौर करें तो इससे पता चलता है कि कॉस्ट ऑफ लिविंग 6 महीने से किस तरह ऊंचे स्तर पर बनी हुई है। जाहिर है कि थोक महंगाई का असर खुदरा महंगाई पर भी पड़ता है। जून में थोक महंगाई 15.18 फ़ीसदी थी। इससे पहले मई में यह 15.88 फ़ीसदी, अप्रैल में 15.38 फ़ीसदी, मार्च में 14.63 फ़ीसदी, फरवरी में 13.43 फ़ीसदी और जनवरी में 13.68 फ़ीसदी थी।</p>
<p>अनाज, फल और सब्जियां जैसी प्राथमिक वस्तुओं की स्थिति तो और विकट है। इनकी महंगाई जून में 19.22 फ़ीसदी रही। परिवारों का घरेलू बजट रसोई गैस ने भी बिगाड़ा जिसके दाम सालाना आधार पर 53.20 फ़ीसदी बढ़ गए। यही स्थिति बाइक और कार चलाने वालों की है जिन्हें 57.82 फ़ीसदी अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है। ट्रक ऑपरेटरों के लिए ईंधन की लागत बढ़ गई है क्योंकि डीजल 55 फ़ीसदी महंगा हो गया है। इसका असर माल भाड़े के साथ पूरी सप्लाई चेन पर देखा जा सकता है।</p>
<p>ऊंची महंगाई दर के लिए यूक्रेन संकट और डॉलर की बढ़ती कीमत को इतनी बार जिम्मेदार ठहराया गया है कि आम लोगों की अब इनमें कोई रुचि नहीं रह गई है। ताज्जुब तो तब होता है जब कुछ तथाकथित विशेषज्ञ यह तर्क देते हैं कि मानसून की बारिश के साथ कीमतों में गिरावट आएगी। यह तो स्पष्ट है कि या तो वे ग्रामीण इलाकों और मौसम की खबरों से कोई वास्ता नहीं रखते या फिर वे ऊपर बैठकर नीचे देखने की जहमत नहीं उठाना चाहते। मौसम की इस खबर पर गौर कीजिए - पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और अन्य कई राज्यों में कम बारिश के चलते खरीफ में धान की बुवाई का रकबा पिछले साल के मुकाबले 17.38 फ़ीसदी घटकर 128.5 लाख हेक्टेयर रह गया है। अब आप बताइए कि रकबा घटने पर अनाज उत्पादन बढ़ने और कीमतों में गिरावट का अनुमान कैसे लगाया जा सकता है। वह भी तब जब पूरी दुनिया खाद्य संकट का सामना कर रही है।</p>
<p>जो लोग फल और सब्जियों के दाम में गिरावट की उम्मीद लगाए बैठे हैं उन्हें भी भारत के मौसम के मानचित्र पर गौर करना चाहिए। उन्हें यह देखना चाहिए कि महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना और उत्तर पूर्व में किस तरह बाढ़ ने तबाही मचा रखी है। फसल, मवेशी और उनके चारे को हुए नुकसान से किसानों और उपभोक्ताओं दोनों के लिए कॉस्ट ऑफ लिविंग बढ़ जाएगी।</p>
<p>ऐसा लगता है कि रिजर्व बैंक भी महंगाई के अनुमानों को लेकर आश्वस्त नहीं है। संभव है कि वित्त वर्ष के अंत तक ऊंचे बेस के कारण महंगाई दर में कुछ कमी नजर आए। यह 2024 में आम चुनावों से एक साल पहले केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी के मनमाफिक होगा क्योंकि तब खुदरा महंगाई दर कम होगी, भले ही खाद्य तेलों के दाम 200 रुपए प्रति लीटर के आसपास पहुंच जाएं।</p>
<p>हालांकि यह भी एक अनुमान है और यह गलत भी हो सकता है। अगर यूक्रेन संकट बना रहता है, कच्चे तेल की कीमत ऊंची रहती है और रुपए में कमजोरी का दबाव बना रहता है तो बेस इफेक्ट ज्यादा कारगर नहीं होगा। कुल मिलाकर आयातित महंगाई और बढ़ जाएगी। बदलाव के लिए ही सही, महंगाई अब नीति निर्माताओं और रिजर्व बैंक की प्राथमिकता में नजर आने लगी है। बहरहाल, हम चाहे जो ख्वाहिश रखें, कॉस्ट ऑफ लिविंग फिलहाल ऊंची ही बनी रहेगी। इसलिए ईज ऑफ लिविंग के बारे में बस कल्पना ही की जा सकती है।</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ जब महंगाई आसमान पर हो तो जीवन जीना आसान कैसे हो सकता है ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[महंगाई पर आम आदमी की मुश्किलें कम होती नहीं दिखती, थोक महंगाई दर 15 माह से दो अंकों में   ]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/no-relief-for-common-man-on-price-front-june-wpi-at-15.18-per-cent-in-double-digit-since-last-15-months.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 14 Jul 2022 17:46:54 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/no-relief-for-common-man-on-price-front-june-wpi-at-15.18-per-cent-in-double-digit-since-last-15-months.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>जून माह के लिए थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) 15.18 फीसदी रहा है जो मई के 15.88 फीसदी के मुकाबले मामूली रूप से कम है वहीं जून माह के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक 7.01 फीसदी रहा है जो मई की 7.04 फीसदी की खुदरा महंगाई दर के मुकाबले मामूली रूप से कम है। जून में थोक महंगाई दर के उच्च स्तर के पीछे पेट्रोलियम उत्पादों और खाद्य तेलों की महंगाई रही है। वहीं थोक और खुदरा महंगाई में आई इस मामूली कमी को इस बात का संकेत नहीं मान लेना चाहिए कि महंगाई को लेकर आम आदमी की मुश्किलें जल्द ही कम होने जा रही हैं या फिर भारतीय रिजर्व बैंक का महंगाई को काबू करने के लिए पॉलिसी दरों में बढ़ोतरी का रुख&nbsp; बदलने जा रहा है। खुद रिजर्व बैंक के गर्वनर कह चुके हैं कि दिसंबर तक महंगाई दर रिजर्व बैंक के लक्षित (चार फीसदी से दो फीसदी कम या ज्यादा)&nbsp; स्तर से अधिक बनी रह सकती है। हालांकि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण कह रही हैं कि सरकार की महंगाई पर पैनी नजर है। लेकिन उनके इस बयान का यह मतलब नहीं है कि आम आदमी को इससे राहत मिल जाएगी।</p>
<p>इसके लिए हमें अमेरिका में महंगाई के आये ताजा आंकड़े को देखना चाहिए जो 9.1 फीसदी रही है और 1981 के बाद से इसका सबसे ऊंचा स्तर है। हालांकि हम अभी अपने देश के मामले में इस तरह के स्तर पर नहीं आए हैं लेकिन यह भी सच है कि खुदरा महंगाई दर पिछले चार माह से रिजर्व बैंक के टारगेट से अधिक बनी हुई है । जून के लिए आया थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) 15.18 फीसदी रहा है तो मई में 15.88 फीसदी रहा था और यह नई सीरीज में अभी तक का उच्चतम स्तर है साथ ही यह पिछले 15 माह से दो अंकों में बना हुआ है। असल में घरेलू और वैश्विक स्तर पर महंगाई के पीछे कच्चे तेल और गैस की ऊंची कीमतें, खाद्य उत्पादों की ऊंची कीमतें, उर्वरकों की ऊंची कीमतें और रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध के चलते कमोडिटीज की आपूर्ति में आई बाधाएं व उनकी कीमतों में आई तेजी रही है। हालांकि खाद्य उत्पादों की कीमतों ने नीचे का रुख किया है लेकिन बाकी कारक अभी भी अनिश्चिता पैदा कर रहे हैं जिसका सीधा असर घरेलू महंगाई पर पड़ रहा है। हमारी आयात पर बढ़ती निर्भरता महंगाई का एक बड़ा कारण है।&nbsp;</p>
<p>अमेरिका में आये महंगाई के ताजा आंकड़ों के बाद इकोनॉमिस्ट और मार्केट एक्सपर्ट का आकलन है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा कम से कम 75 आधार अंकों की ब्याज दर बढ़ोतरी लगभग तय है। कुछ एक्सपर्ट्स ब्याज दर में एक फीसदी तक की वृद्धि का अनुमान लगा रहे हैं। अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने जून में ब्याज दर में 0.75 फीसदी की बढ़ोतरी की थी, जो 1994 के बाद से अभी तक का सबसे ऊंचा स्तर है। दिलचस्प बात यह है कि खुद तेल और गैस के बड़े उत्पादकों में शुमार अमेरिका में महंगाई में वृद्धि की सबसे बड़ी वजह गैस और तेल की कीमतों और खाद्य उत्पादों की बढ़ती कीमतों को माना जा रहा है। अब सवाल उठता है जब भारत अपनी जरूरत का करीब 85 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है और गैस का बड़ा आयात करता है तो यहां इन इनर्जी उत्पादों की कीमतों में कमी की गुंजाइश बहुत अधिक नहीं है। हालांकि सुकून की बात है कि अमेरिका और यूरोपीय देशों के प्रतिबंधों के बावजूद रूस दुनिया का दूसरा बड़ा कच्चा तेल निर्यातक देश बना हुआ है और भारत इसका फायदा उठा रहा है। रूस द्वारा डिस्काउंट पर बेचे जा रहे तेल के खरीदारों में चीन और भारत सबसे ऊपर बताये जा रहे हैं। वहीं देश के सबसे बड़े खाद्य उत्पाद आयात, खाद्य तेलों की कीमतों में भी वैश्विक बाजार में गिरावट आई है और इसका फायदा भारतीय आयातकों को हो रहा है। लेकिन दोनों मामलों में डॉलर के मुकाबले रूपये का लगातार कमजोर होना इस फायदे को सीमित या लगभग खत्म कर दे रहा है। गुरुवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रूपये की विनिमय दर 79.90 रुपये प्रति डॉलर पर पहुंच गई। रुपये की लगातार कमजोरी के&nbsp; चलते आयातित महंगाई का असर बढ़ रहा है।</p>
<p>दूसरे अमेरिका में महंगाई के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने का सीधा मतलब है वहां ब्याज दरों में बढ़ोतरी होना और इसके नतीजे के रूप में भारत जैसी इमर्जिंग इकोनॉमी से विदेशी पूंजी के बाहर जाने की संभवनाएं बढ़ना। यानी स्टॉक मार्केट और रूपया दोनों अमेरिकी फेडरल रिजर्व के फैसले से प्रभावित होंगे।</p>
<p>असल में वैश्विक स्तर पर खाद्य महंगाई के रिकॉर्ड पर पहुंचने के साथ ही खाद्य उत्पादों के आयातकों की मुश्किलें बढ़ रही हैं। वहीं ब्लैक सी में मालवाहक जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने और रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते उर्वरकों की उपलब्धता का संकट बढ़ा है और उनकी कीमतों में भी भारी तेजी आई है। जिसके चलते खाद्य उत्पादों की उत्पादन लागत दुनिया भर में बढ़ रही है। विश्व में 1974, 2008 और उसके बाद अब 2022 में तीन बड़ी इनर्जी क्राइसिस पैदा हुई हैं। इस तीन इनर्जी क्राइसिस के दौरान 1974 में नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों की कीमतों में 341 फीसदी, 2008 में 68 फीसदी और 2022&nbsp; में 169 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। जिसका सीधा असर खाद्य सुरक्षा पर पड़ रहा है। दुनिया भर में यूरिया के निर्यात बाजार में रूस की हिस्सेदारी 16 फीसदी है जबकि डीएपी और एमएपी में इसकी हिस्सेदारी 12 फीसदी है। रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते यह आपूर्ति प्रभावित हुई है। वहीं गेहूं, जौं और खाद्य तेलों के निर्यात में भी इन देशों की 25 फीसदी व उससे अधिक की भागीदारी है। इसकी सीधा असर इन उत्पादों की कीमतों पर पड़ा है। यह बात अलग है कि गेहूं और खाद्य तेलों समेत दूसरे खाद्य उत्पादों की कीमतों में गिरावट का रुख आ गया है।</p>
<p>जहां तक भारत की बात है तो महंगाई का असर समाज के हर वर्ग पर पड़ रहा है। मैन्यूफैक्चरिंग महंगाई दर बढ़ने से तमाम उत्पाद महंगे हुए हैं और खाद्य महंगाई दर में भी अभी कोई बड़ी राहत नहीं मिली है। हालांकि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा है कि सरकार की महंगाई पर पैनी नजर है। लेकिन उनका बयान देश के नागरिकों को महंगाई के चलते पैदा हो रही मुश्किलों को कम नहीं कर सकता है। वहीं इसे देखते हुए आने वाले दिनों में रिजर्व बैंक द्वारा एक बार फिर पॉलिसी ब्याज दरों में बढ़ोतरी को टालना मुश्किल होगा। रिजर्व बैंक ने 8 जून को रेपो रेट में आधा फीसदी की बढ़ोतरी की थी। यह स्थिति केवल भारत की ही नहीं है बल्कि यूरोप के देशों में भी महंगाई लगातार बढ़ी है। साथ ही अमेरिका समेत कई दूसरी विकसित अर्थव्यवस्थाओं के मंदी में जाने की आशंका व्यक्त की जा रही है। इन हालात का प्रतिकूल असर भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर पर भी पड़ेगा। इसलिए जब तक सरकार कर दरों में कटौती नहीं करती तब तक राहत मिलना मुश्किल है। लेकिन आने वाले दिनों में गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) के तहत कुछ उत्पादों और सेवाओं के लिए कर दरों में बढ़ोतरी की संभावना को देखते हुए आम आदमी की मुश्किलें बढ़ेगी। हालांकि दिलचस्प बात यह है कि गुरुवार को महाराष्ट्र की नई सरकार ने पेट्रोल पर वैट में कटौती कर कुछ राहत दी है।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2021/07/image_750x500_60f6778578e46.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ महंगाई पर आम आदमी की मुश्किलें कम होती नहीं दिखती, थोक महंगाई दर 15 माह से दो अंकों में    ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[डब्ल्यूटीओ बैठक में खाद्यान्न भंडारण पर चर्चा न होना निराशाजनक, फिशरीज सब्सिडी समझौते से भी होंगी मुश्किलें]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/not-discussing-psh-in-wto-ministerial-conference-is-disappointing.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 23 Jun 2022 07:55:51 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/not-discussing-psh-in-wto-ministerial-conference-is-disappointing.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) ने जिनेवा में अपना 12वां मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (एमसी12) ऐसे समय आयोजित किया, <span>जब यह बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था दो महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना कर रही है। पहला, दोहरे आघात के कारण विश्व अर्थव्यवस्था नाजुक दौर से गुजर रही है। इसलिए विश्व व्यापार संगठन को अपने सदस्य देशों</span>, <span>विशेष रूप से विकासशील देशों को यह सुनिश्चित करने के लिए सक्षम वातावरण प्रदान करना है कि वहां जल्दी रिकवरी हो। दूसरे</span>, <span>विश्व व्यापार संगठन पर लंबे समय से उसकी वैधता को लेकर सवाल उठ रहे हैं। लगभग चार दशक पहले इसकी स्थापना के बाद पिछले कुछ वर्षों से मुख्य रूप से निर्णय लेने में असमर्थता के कारण सवाल अधिक उठ रहे हैं। इसलिए</span>, <span>जब गहन विचार-विमर्श के बाद एमसी12 मंत्रिस्तरीय निर्णयों को अंततः सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया</span>, <span>तो उसे उपलब्धि के तौर पर दिखाया गया। अब समय है कि सम्मेलन में लिए गए निर्मयों का निष्पक्ष रूप से विश्लेषण किया जाए और यह देखा जाए कि परिणाम किस हद तक भारत की अपेक्षाओं को पूरा करते हैं।</span></p>
<p><span><strong>कृषि के अनसुलझे मुद्दे</strong></span></p>
<p><span>जहां तक ​​कृषि क्षेत्र का संबंध है, भारत को एमसी12 से दो बड़ी उम्मीदें थीं। खाद्य सुरक्षा उद्देश्यों के लिए खाद्यान्न के सार्वजनिक भंडारण (पीएसएच) पर शुरू से बादल मंडराते रहे हैं। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के संचालन के लिए यह भंडारण अनिवार्य है। इस मुद्दे का स्थायी समाधान खोजना था। पीडीएस पर किसी भी तरह का खतरा खाद्यान्न की सार्वजनिक खरीद की पूरी प्रणाली को पटरी से उतार सकता है, क्योंकि दोनों प्रणालियां एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। </span></p>
<p><span>पीडीएस के संचालन को विश्व व्यापार संगठन में चुनौती दी गई थी, लेकिन वर्तमान में इसे 2013 में तय हुए पीस क्लॉज के तहत राहत मिली हुई है। लेकिन जब पीस क्लॉज पर सहमति हुई, तो यह निर्णय भी लिया गया था कि विश्व व्यापार संगठन के सदस्य 2017 तक पीएसएच के स्थायी समाधान के लिए एक समझौते पर बातचीत करेंगे। उस समय सीमा के पांच साल बाद भी मंत्रिस्तरीय सम्मेलन भारत के लिए इस महत्वपूर्ण मुद्दे का संज्ञान लेने में विफल रहा। सम्मेलन के बाद जारी एमसी12 दस्तावेज़ में इस मुद्दे का कोई उल्लेख नहीं है। यह इस तथ्य के बावजूद हुआ कि जी-33 (भारत सहित 47 विकासशील देशों का एक समूह जो खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित कर रहा था) ने वार्ता आगे ले जाने के लिए एक प्रस्ताव पेश किया था। व्यापार मंत्रियों की मौजूदगी के बावजूद इस पर चर्चा नहीं होने को निराशाजनक परिणाम के तौर पर देखा जाना चाहिए।</span></p>
<p><span>हालांकि पीडीएस को तत्काल कोई खतरा नहीं है, लेकिन पीस क्लॉज की एक विवादास्पद शर्त पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है जो भारत को अनाज के सार्वजनिक भंडार से निर्यात करने से रोकता है। यह शर्त तब से अधिक फोकस में है जब से भारत गेहूं और गैर-बासमती चावल के बड़े निर्यातक के रूप में उभरा है। कृषि समझौते पर नजर रखने वाली विश्व व्यापार संगठन की कृषि समिति में कई देश भारत से स्पष्टीकरण मांग रहे हैं कि क्या सरकार द्वारा खरीदे गए और बफर स्टॉक में रखे गए खाद्यान्न का निर्यात किया जा रहा है। इन देशों का तर्क है कि भारत सब्सिडी वाले अनाज को वैश्विक बाजारों में डंप कर रहा है।</span></p>
<p><span>उल्लेखनीय है कि भारत के निर्यात के खिलाफ झंडा उठाने वाले अधिकांश उन्नत देश हैं जो वैश्विक अनाज बाजारों में बड़ा दखल रखने वाली अपनी बड़ी कंपनियों के संचालन में मदद करते रहे हैं। इस प्रकार, जब बड़े सब्सिडी वाले देश अनाज के वैश्विक बाजार पर हावी हो रहे हैं, तो भारत के पास पीस क्लॉज में निर्यात प्रतिबंध की शर्त हटाने को कहने का एक मजबूत तर्क है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इस मुद्दे को शुद्ध रूप से खाद्य आयात करने वाले देशों के हित में हल किया जाना चाहिए, क्योंकि अगर भारत को निर्यात करने से रोका गया तो वैश्विक खाद्य कमी और बदतर हो जाएगी।&nbsp;</span></p>
<p><span><strong>फिशरीज सब्सिडी समझौते की समस्या</strong></span></p>
<p>एमसी12 में फिशरीज सब्सिडी समझौता भी संपन्न हुआ, जिसके लिए वार्ता 2001 में दोहा मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में शुरू की गई थी। भारत के पास फिशरीज सब्सिडी पर लगाम लगाने के मुद्दे पर एक मजबूत आर्थिक और नैतिक पक्ष था। भारत लगातार यह कहता रहा है कि वैश्विक मछली स्टॉक के लिए खतरा पैदा करने वाले वाणिज्यिक हितों की सब्सिडी समाप्त करना महत्वपूर्ण है, लेकिन छोटे मछुआरों को सब्सिडी जारी रखने के लिए एक विकल्प होना चाहिए। इन मछुआरों ने आमतौर पर पर्यावरण अनुकूल तौर-तरीकों का पालन किया है। भारत का यह भी तर्क है कि छोटे मछुआरों की आजीविका की रक्षा के लिए सब्सिडी जारी रखना महत्वपूर्ण है।</p>
<p>फिशरीज सब्सिडी समझौते में भारत की चिंताओं को दूर नहीं किया गया है। समझौते के मुताबिक विकासशील देश अपने विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र (ईईजेड) के भीतर अवैध, गैर-सूचित, और अनियमित (आईयूयू) तरीके से मछली पकड़ने में लगे जहाजों/ऑपरेटरों अथवा ओवरफिश्ड मछलियां पकड़ने/उससे जुड़ी गतिविधियों के लिए दो साल तक सब्सिडी दे सकते हैं। दो वर्षों के बाद मछुआरों को दी जाने वाली सब्सिडी का क्या होगा, यह अनिश्चित बना हुआ है। क्योंकि समझौते में कोई अन्य प्रावधान नहीं है जो विकासशील देशों को विशेष और अलग व्यवहार (एसएंडडीटी) की छूट देता हो, जिसका उपयोग करके भारत सब्सिडी दे सके।</p>
<p>मत्स्य पालन सब्सिडी समझौते में एक प्रावधान के कारण यह मुद्दा महत्व रखता है। यह प्रावधान है: "जिन स्टॉक (मछली) की स्थिति अभी अज्ञात है, उन्हें पकड़ने या उससे जुड़ी गतिविधियों के लिए सब्सिडी प्रदान करते समय सदस्य देश विशेष ध्यान रखेगा और उचित संयम अपनाएगा।" इसका तात्पर्य यह है कि आईयूयू और ओवरफिश्ड स्टॉक के अलावा बाकी मामलों में भी मछली पकड़ने और इससे जुड़ी गतिविधियों के लिए दी गई सब्सिडी को जांच के दायरे में रखा गया है।</p>
<p>भारत में छोटे मछुआरे न तो आईयूयू में लिप्त हैं और न ही ओवरफिश्ड स्टॉक से जुड़ी मछलियां पकड़ने की गतिविधियों में। फिर भी फिशरीज सब्सिडी समझौते में उपर्युक्त प्रावधान मत्स्य पालन क्षेत्र को सब्सिडी के निरंतर प्रावधान की दिशा में एक बाधा साबित हो सकता है। इसका कारण यह है कि विश्व व्यापार संगठन में मूड चीन और भारत को एसएंडडीटी प्रावधानों के लाभों से वंचित करने का है, जिसके उपयोग से छोटे मछुआरों को सब्सिडी जारी रखी जा सकती है। इस वजह से भविष्य की बातचीत में एसएंडडीटी प्रावधानों को शामिल करना मुश्किल लगता है।</p>
<p><em><strong>(डॉ. बिश्वजीत धर जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज के सेंटर फॉर इकोनॉमिक स्टडीज एंड प्लानिंग में प्रोफेसर हैं )&nbsp;</strong></em></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/06/image_750x500_62b3624a5b885.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ डब्ल्यूटीओ बैठक में खाद्यान्न भंडारण पर चर्चा न होना निराशाजनक, फिशरीज सब्सिडी समझौते से भी होंगी मुश्किलें ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[डब्ल्यूटीओ की 12वीं मंत्रिस्तरीय बैठक में सरकारी खाद्यान्न स्टॉक और सब्सिडी का मुद्दा सुलझाना भारत की चुनौती,  पुराने सहयोगी भी बने विरोधी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/agriculture-subsidy-in-the-12th-wto-ministerial-conference.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 10 Jun 2022 13:52:57 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/agriculture-subsidy-in-the-12th-wto-ministerial-conference.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था के अब तक के इतिहास में ऐसा होता रहा है और इस बार भी वही हो रहा है। जिनेवा में 12 से 15 जून तक होने वाले डब्ल्यूटीओ के 12वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन से पहले कृषि को लेकर काफी विवाद हो रहे हैं। यह सम्मेलन दो बार स्थगित हो चुका है। उम्मीद थी कि इसमें कुछ महत्वपूर्ण फैसले लिए जाएंगे और कृषि पर समझौते में सुधार के लिए बातचीत वापस पटरी पर आ जाएगी। लेकिन पिछले कुछ हफ्तों से सदस्य देशों के बीच वार्ता दो मुद्दों पर आकर सिमट गई है जो भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।</p>
<p>पहला मुद्दा खाद्य सुरक्षा के लिए अनाज की सार्वजनिक स्टॉकहोल्डिंग से जुड़ा है जो भारत की सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) का आधार है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून 2013 में लागू किया गया था। इसके जरिए सरकार देश की लगभग दो-तिहाई आबादी को सब्सिडी पर अनाज उपलब्ध कराती है। हाल में निर्यात पर अंकुश लगाने का मुद्दा भी भारत के लिए महत्वपूर्ण रहा है, खासकर गेहूं निर्यात पर प्रतिबंध का मुद्दा मौजूदा। मौजूदा फसल वर्ष (जुलाई 2021 से जून 2022) के दौरान घरेलू उत्पादन कम होने और बफर स्टॉक का स्तर घटने के बाद सरकार ने यह कदम उठाया है।</p>
<p><strong>खाद्य सुरक्षा के लिए अनाज की सार्वजनिक स्टॉकहोल्डिंग</strong></p>
<p>कृषि में भारत के लिए सबसे अहम मुद्दा सार्वजनिक स्टॉकहोल्डिंग का है। यह मुद्दा इसलिए उठा क्योंकि कृषि समझौते में घरेलू खाद्य सुरक्षा की समस्या से निपटने के मकसद से सार्वजनिक स्टॉक में डब्ल्यूटीओ के सदस्य देशों के लिए दो शर्तें हैं। पहली शर्त यह है कि प्रत्येक सदस्य देश खाद्य पदार्थ खरीदेगा और उन्हें प्रशासित मूल्य पर बेचेगा। दूसरी शर्त है कि अगर खाद्य पदार्थ प्रशासित मूल्य से कम कीमत पर बेचे जाते हैं, अर्थात उन पर सब्सिडी दी जाती है, तो प्रशासित मूल्य और बिक्री मूल्य के अंतर को उस सदस्य देश की तरफ से दी जाने वाली सब्सिडी में जोड़ा जाएगा।</p>
<p>कृषि समझौते में गरीबों को सब्सिडी पर खाद्य पदार्थ मुहैया कराने को बाजार विकृत करने वाला माना गया है। इसलिए जो देश सार्वजनिक स्टॉक से खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम चलाते हैं उनके लिए कुल कृषि उत्पादन के 10 फ़ीसदी मूल्य तक सब्सिडी की सीमा निर्धारित की गई है। कृषि समझौते में भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यही सीमा तय है। समझौते के अनुसार प्रशासित मूल्य (या भारत में न्यूनतम समर्थन मूल्य- एमएसपी) जिस पर अनाज खरीदा जाता है और उनके बाहरी संदर्भ मूल्य (अर्थात 1986-88 के दौरान अंतरराष्ट्रीय मूल्य) के बीच अंतर को सब्सिडी माना गया है। अनाज के मौजूदा प्रशासित मूल्य की तुलना 35 साल पुराने अंतरराष्ट्रीय मूल्य से करके सब्सिडी का निर्धारण करना बेमतलब है। लेकिन विकसित अर्थव्यवस्थाओं ने कृषि समझौते को वास्तविकता के करीब लाने के लिए उसमें संशोधन से इनकार कर दिया है।</p>
<p>जैसा कि पहले बताया गया है, 2013 में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून लागू होने के बाद सार्वजनिक स्टॉकहोल्डिंग से जुड़े प्रावधान भारत के लिए महत्वपूर्ण हो गए हैं। इस कानून के तहत देश की दो तिहाई आबादी को सब्सिडी वाला अनाज उपलब्ध कराने की प्रतिबद्धता के बाद भारत के लिए 10 फ़ीसदी सब्सिडी की सीमा को पार करने का जोखिम हो गया है। अगर सब्सिडी की सीमा पार करने के बाद भारत इस कानून के तहत कम कीमतों पर अपनी आबादी को खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराना जारी रखता है, तो डब्ल्यूटीओ का कोई दूसरा सदस्य देश भारत के खिलाफ शिकायत दर्ज करा सकता है। अगर उस विवाद में भारत की हार हो जाती है तो सब्सिडी दरों पर अनाज का वितरण करना तत्काल रोकना पड़ जाएगा।</p>
<p>2013 में भारत एक पीस क्लॉज लागू करवाने में सफल रहा था। यह एक अस्थाई व्यवस्था थी जिसके तहत अगर कोई देश राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून जैसी योजना लागू करने में 10 फ़ीसदी सब्सिडी की सीमा का उल्लंघन करता है तो उसके खिलाफ कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई जाएगी। भारत की इस समस्या पर डब्ल्यूटीओ के सदस्यों को स्थाई समाधान तलाशना पड़ेगा। पीस क्लॉज में एक महत्वपूर्ण एंटी सरकम्वेंशन प्रावधान है, जिसमें कहा गया है कि सार्वजनिक स्टॉक से खाद्य पदार्थ का इस्तेमाल व्यापार विकृत करने अथवा अन्य देशों की खाद्य सुरक्षा को प्रभावित करने में नहीं किया जा सकता है। इसका मतलब यह है कि भारत इस स्टॉक से खाद्य पदार्थों का निर्यात नहीं कर सकता। इसके अलावा भारत को हर साल सार्वजनिक स्टॉकहोल्डिंग की सूचना डब्ल्यूटीओ को देनी पड़ेगी। इसमें बताना पड़ेगा कि सार्वजनिक स्टॉक की स्थिति क्या है, उसके लाभार्थियों की संख्या कितनी है, पूरे देश में लाभार्थियों के लिए कितना अनाज जारी किया गया है, संभव हो तो राज्यों के स्तर पर भी और उस स्टॉक से अगर निर्यात हुआ है तो उसकी जानकारी भी देनी पड़ेगी। अर्थात भारत की सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर डब्ल्यूटीओ के सदस्य देश बारीक निगरानी करते हैं।</p>
<p>इसलिए आश्चर्य नहीं कि जब हाल के वर्षों में भारत से कृषि निर्यात, खासकर अनाज का निर्यात बढ़ा तो भारत की निगरानी और तेज हो गई। कृषि पर समिति की बैठक में जापान, रूस, अमेरिका समेत कई देशों ने भारत से यह स्पष्टीकरण मांगा है कि क्या वह जो निर्यात कर रहा है उसका भारतीय खाद्य निगम की तरफ से खुले बाजार में की जाने वाली बिक्री योजना से कोई संबंध है या नहीं।</p>
<p>12वी मंत्रिस्तरीय&nbsp;कॉन्फ्रेंस से पहले ऐसा कभी नहीं लगा कि सदस्य देश सार्वजनिक स्टॉकहोल्डिंग के मुद्दे के स्थाई समाधान की दिशा में बढ़ रहे हैं, क्योंकि उनके बीच मतभेद काफी हैं। ब्राजील और अफ्रीकी समूह एसीपी (अफ्रीका, कैरीबियन और प्रशांत) ने दो विरोधाभासी प्रस्ताव दिए हैं। एक प्रस्ताव जी33 (जिसमें भारत भी है) ने भी दिया है।</p>
<p>ब्राजील के प्रस्ताव में तर्क दिया गया है कि सिर्फ तीन तरह के देशों को सार्वजनिक स्टॉकहोल्डिंग का अधिकार होना चाहिए। ये हैं- सबसे कम विकसित देश, ऐसे विकासशील देश जो खाद्य पदार्थों का आयात करते हैं और तीसरा वे देश जिन्हें बीते 2 वर्षों के दौरान कम से कम एक बार खाद्य पदार्थों के लिए बाहरी मदद की जरूरत पड़ी हो। दूसरे अर्थों में कहा जाए तो ब्राजील चाहता है कि भारत को सार्वजनिक वितरण प्रणाली लागू करने का अधिकार ना मिले।</p>
<p>एसीपी ग्रुप और जी33 के प्रस्तावों में सब्सिडी गणना के तरीके को बदलने का सुझाव है। इसमें कहा गया है कि बाहरी संदर्भ मूल्य इनमें से एक तरीके से निकाला जाना चाहिए- पहला, बीते 5 वर्षों के दौरान किसी भी उत्पाद की उच्चतम और न्यूनतम कीमत को छोड़कर बाकी 3 वर्षों का औसत मूल्य निकाला जाए। दूसरा, कीमत में महंगाई दर को समायोजित किया जाए। इस प्रस्ताव में एंटी सरकम्वेंशन प्रावधान और पीडीएस की रिपोर्टिंग की जरूरतों को भी शामिल किया गया है। ये दोनों प्रावधान पीस क्लॉज में पहले से हैं। डब्ल्यूटीओ के सदस्य देशों के बीच मतभेद को देखते हुए सार्वजनिक स्टॉकहोल्डिंग पर किसी स्थाई समाधान पर पहुंचना मुश्किल लग रहा है।</p>
<p><strong>निर्यात पर अंकुश</strong></p>
<p>कृषि कमोडिटी के निर्यात पर अंकुश का मुद्दा कोविड-19 के दौरान तब अधिक चर्चा में आया जब कुछ देशों ने अपने नागरिकों की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ऐसे कदम उठाए। जनवरी 2021 में डब्ल्यूटीओ के 80 सदस्य देशों ने एक बयान जारी किया जिसमें कहा गया कि वर्ल्ड फूड प्रोग्राम द्वारा गैर-वाणिज्यिक मानवीय आधार पर खरीदे गए खाद्य पदार्थों के निर्यात पर वे किसी तरह का प्रतिबंध या अंकुश नहीं लगाएंगे। परोक्ष रूप से यह भारत पर दबाव बनाने की रणनीति थी, ताकि भारत भी खाद्य पदार्थों के निर्यात पर किसी तरह का अंकुश ना लगाने की घोषणा करे।</p>
<p>भारत ने ऐसी किसी घोषणा करने से इनकार कर दिया क्योंकि यहां खाद्य सुरक्षा बड़ी चुनौती है। खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार दुनिया में खाद्य के लिहाज से सबसे अधिक असुरक्षित लोग भारत में ही हैं। ऐसे में अगर घरेलू स्तर पर खाद्य पदार्थों की कमी के बावजूद भारत निर्यात पर अंकुश लगाने से बचता है तो यहां जो माननीय समस्या उत्पन्न होगी उसे नियंत्रित करना सरकार के लिए मुश्किल हो जाएगा। यहां इस बात को समझना महत्वपूर्ण है कि खाद्य की कमी के समय जब अंतरराष्ट्रीय मूल्य बढ़ जाते हैं तब भारत से अनाज का खुले बाजार में लीकेज हो सकता है। क्योंकि व्यापारी घरेलू बाजार में कम मार्जिन पर बेचने के बजाय अधिक मार्जिन पर दूसरे बाजार में बेचना चाहेंगे। इसलिए डब्ल्यूटीओ के सदस्य देश भले ही निर्यात पर अंकुश खत्म करने के लिए यह तर्क देते हों कि बाजार खुला रखने से पूरे विश्व में खाद्य सुरक्षा बढ़ेगी, लेकिन ऐसा करते वक्त वे इस तथ्य को भूल जाते हैं कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार भारत की घरेलू खाद्य सुरक्षा के संकट को और बढ़ा सकता है।</p>
<p>निर्यात पर प्रतिबंध के विरोधी खाद्य सुरक्षा से जुड़े तीन महत्वपूर्ण प्रावधानों की अनदेखी करते हैं। पहला, कृषि समझौते का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उसमें खाद्य सुरक्षा को एक नॉन-ट्रेड समस्या के तौर पर स्वीकार किया गया है। समझौते की प्रस्तावना में कहा गया है, &ldquo;सुधार कार्यक्रम (कृषि समझौते में सुधार) ऐसा हो जो सभी सदस्य देशों के लिए समानता की बात करे, इसमें खाद्य सुरक्षा समेत नॉन-ट्रेड समस्याओं पर विचार किया जाए...&rdquo;</p>
<p>दूसरा, दोहा घोषणापत्र जिसमें कृषि समझौते में विकासशील देशों के साथ अलग बर्ताव करने की बात है, वह वार्ता के सभी तत्वों का अभिन्न हिस्सा होना चाहिए। उसका प्रभावी कार्यान्वयन भी होना चाहिए ताकि विकासशील देश खाद्य सुरक्षा समेत आपने विकास की जरूरतों को प्रभावी तरीके से पूरा कर सकें।</p>
<p>तीसरा, जनरल एग्रीमेंट ऑन टैरिफ एंड ट्रेड (गैट, जो डब्ल्यूटीओ से पहले था) का अनुच्छेद 11 निर्यात पर प्रतिबंध लगाने से मना करता है। लेकिन यह खाद्य संकट से जूझने वाले देशों को अस्थाई तौर पर निर्यात पर अंकुश लगाने की अनुमति देता है। इस लिहाज से देखा जाए तो भारत के पास गेहूं निर्यात पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार है, खासकर घरेलू उत्पादन और स्टॉक में गिरावट को देखते हुए।</p>
<p>भारत निर्यात पर अंकुश पर पूरी तरह रोक लगाने का हमेशा विरोध करता रहा है। इसका उसे फायदा भी मिला है। वर्ल्ड फूड प्रोग्राम के लिए खरीद में निर्यात पर प्रतिबंध या रोक लगाने से छूट के विषय पर मंत्रिस्तरीय फैसले के ड्राफ्ट में इसका जिक्र किया गया है। कृषि पर विशेष सत्र के लिए बनी समिति में एंबेसडर ग्लोरिया अब्राहम पेरालटा ने प्रस्ताव रखा है कि डब्ल्यूटीओ के प्रासंगिक प्रावधानों के अनुरूप घरेलू स्तर पर खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सदस्य देशों को कोई भी कदम उठाने से नहीं रोका जाएगा। यह एक महत्वपूर्ण नीतिगत पहल है। भारत गरीबों की खाद्य सुरक्षा जारी रखना सुनिश्चित करने में सफल रहा है।</p>
<p><strong>(लेखक जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज के सेंटर फॉर इकोनॉमिक स्टडीज एंड प्लानिंग में प्रोफेसर हैं)</strong></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/06/image_750x500_62a2fc2592f17.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ डब्ल्यूटीओ की 12वीं मंत्रिस्तरीय बैठक में सरकारी खाद्यान्न स्टॉक और सब्सिडी का मुद्दा सुलझाना भारत की चुनौती,  पुराने सहयोगी भी बने विरोधी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[&amp;apos;कोई भी देश अपने नागरिकों की अनदेखी कर अनाज निर्यात नहीं कर सकता&amp;apos;]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/no-country-can-export-grains-without-caring-its-own-population.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 29 May 2022 10:43:19 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/no-country-can-export-grains-without-caring-its-own-population.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>दुनिया में खाद्य संकट चिंताजनक स्थिति पर पहुंच गया है। अनेक देशों के सामने अपनी आबादी को खिलाने के लिए अनाज खासकर गेहूं की कमी पड़ गई है। अनेक देशों में लोग भुखमरी की तरफ बढ़ रहे हैं। इसी बात को ध्यान में रखते हुए अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से गेहूं निर्यात पर लगी पाबंदी हटाने का आग्रह करना पड़ा, ताकि इन देशों को भुखमरी से बचाया जा सके। रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध के कारण अनेक पश्चिमी देशों में खाद्य का संकट बना है क्योंकि यह दोनों देश दुनिया के बड़े गेहूं उत्पादक देश ही नहीं बल्कि बड़े निर्यातक भी हैं।</p>
<p>इन हालात में भारत इस समय काफी बेहतर स्थिति में है। यहां देश की आबादी को खिलाने के लिए पर्याप्त मात्रा में अनाज उपलब्ध है। हालांकि इस वर्ष मौसम की गड़बड़ी के कारण उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है। मानवीय आधार पर मौलिक सवाल यह है कि किसी आवश्यक खाद्य कमोडिटी का निर्यात अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक या व्यापार आधारित मुद्दों के चलते रोका जाना चाहिए? विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) अंतरराष्ट्रीय व्यापार के नियम तय करता है, इसलिए किसी एक देश के लिए डब्ल्यूटीओ के दिशानिर्देशों का उल्लंघन करना संभव नहीं है।</p>
<p>भारत ऐसे संकट के समय बड़ा दिल और मानवीय सोच रखने वाला देश माना जाता है। उदाहरण के लिए अनेक देशों को कोविड-19 महामारी की करोड़ों वैक्सीन निर्यात की गई। लेकिन प्रधानमंत्री ने मौजूदा हालात में जो सावधानी दिखाई है उसे समझा जा सकता है। कोई भी देश अपने नागरिकों की आवश्यकताओं की अनदेखी करते हुए किसी कमोडिटी का निर्यात नहीं कर सकता है। खासकर तब जब उससे समाज के गरीब वर्ग को वह कमोडिटी ना मिलने का खतरा हो।</p>
<p>जब तक डब्ल्यूटीओ अपने नियमों में ढील नहीं देता या संशोधन नहीं करता है और जब तक आईएमएफ के नेतृत्व में सभी प्रभावित देश डब्ल्यूटीओ पर दबाव नहीं बनाते हैं, तब तक भारत निर्यात पर प्रतिबंध नहीं हटा सकता है। अगर सरकार को दया दिखानी ही है तो नीति ऐसी हो कि उन देशों को प्राथमिकता मिले जिन्हें गेहूं की आवश्यकता बहुत अधिक है। इसके लिए डब्ल्यूटीओ भी मंजूरी दे और भारत पर निर्यात के लिए दबाव ना बनाया जाए बल्कि भारत मानवीय आधार पर निर्यात करे।</p>
<p>यह 'अन्नदाता सुखीभव' और 'अन्नपूर्णी' के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए सही कदम होगा। मानवता की भलाई के लिए इस आध्यात्मिक संदेश और सामाजिक उद्देश्य को ध्यान में रख भारत सरकार गेहूं निर्यात की दिशा में कदम उठा सकती है। संदेश बिल्कुल साफ है कि डब्ल्यूटीओ/आईएमएफ को बिना देरी किए इस दिशा में कदम बढ़ाना पड़ेगा। उम्मीद है कि करोड़ों लोगों का जीवन बचाने के लिए वे आगे आएंगे।</p>
<p><em><strong>(लेखक सीपीसीआरआई, कासरगोड के पूर्व डायरेक्टर हैं और सोसाइटी फॉर हंगर एलीमिलेशन (एसएचई) के प्रेसिडेंट हैं, लेख में व्यक्त विचार उनके निजी विचार हैं)</strong></em></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/04/image_750x500_6251269996252.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ 'कोई भी देश अपने नागरिकों की अनदेखी कर अनाज निर्यात नहीं कर सकता' ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/04/image_750x500_6251269996252.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[महंगाई से आम लोग ही नहीं, किसानों और छोटे उद्यमियों का भी बढ़ा संकट]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/inflation-pain-points-for-households-but-existential-risk-for-small-businesses-and-farmers.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 20 May 2022 11:08:19 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/inflation-pain-points-for-households-but-existential-risk-for-small-businesses-and-farmers.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>महंगाई के रिकॉर्ड बनाने की बातें तो भूल जाइए, यह एक दशक में सबसे अधिक है या उससे भी ज्यादा। कठोर सत्य यही है कि देश के अनेक लोगों के लिए महंगाई असहनीय हो गई है। इन दिनों किसी भी चीज के दाम बढ़ने के लिए रूस-यूक्रेन युद्ध और चीन जैसे देशों में लॉकडाउन के चलते ग्लोबल सप्लाई चेन बाधित होने को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है।</p>
<p>अप्रैल 2022 में थोक महंगाई दर 15.08 फ़ीसदी पर पहुंच गई। इस पर सरकार का जो बयान है उससे स्पष्ट होता है कि महंगाई किस तरह चौतरफा है। 22 कमोडिटी ग्रुप में से 18 में कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। ईंधन और बिजली ग्रुप में वृद्धि 38.6 फ़ीसदी और मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट सेगमेंट में 10.85 फ़ीसदी है।</p>
<p>थोक मूल्य सूचकांक के आधार पर निकाली जाने वाली महंगाई दर मुख्य रूप से मैन्युफैक्चरर की कीमतों को बताती है। दूसरी तरफ खुदरा महंगाई, जो अभी 8 फ़ीसदी के आसपास है, वह उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित है, जिसमें मुख्य रूप से आम लोगों की खपत वाले खाद्य पदार्थ तथा अन्य वस्तुओं की कीमतों को देखा जाता है। महंगाई के ये दोनों आंकड़े चुभने वाले हैं।</p>
<p>समस्या यह है कि उद्योग अधिक उत्पादन नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि मांग घट रही है। मार्च में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर बमुश्किल 0.9 फ़ीसदी बढ़ा है जबकि इस सेक्टर में दाम में वृद्धि 10 फ़ीसदी हुई है। अर्थशास्त्र का पारंपरिक ज्ञान यही कहता है कि जब मांग घटती है तो कीमतों में भी गिरावट आती है। दोनों का घटना या बढ़ना एक ही दिशा में होता है। लेकिन अभी हो यह रहा है कि दोनों विपरीत दिशा में चल रहे हैं। यह नीति निर्माताओं के लिए बड़ी चुनौती है। रिजर्व बैंक के लिए भी जिसने सिस्टम में इतना पैसा डाला कि अब बिना किसी समस्या के तरलता कम करना मुश्किल हो गया है।</p>
<p>असर छोटे उद्यमियों पर भी हो रहा है। बड़ी कंपनियों ने तो 2020 की दूसरी छमाही से लगभग डेढ़ साल तक शेयर बाजार में तेजी का भरपूर फायदा उठाया। लेकिन अनौपचारिक क्षेत्र जिसमें छोटे दुकानदार, घरेलू उत्पाद बनाने वाले उद्यमी या सब्जियां बेचने वाले शामिल हैं, उनके लिए अस्तित्व का संकट पैदा हो गया है। कभी लॉकडाउन लगने कभी हटने के बाद जब अर्थव्यवस्था खुली तो इन छोटे उद्यमियों के लिए उम्मीद की किरण जगी थी। लेकिन महंगाई ने उन्हें बुरी तरह प्रभावित किया है। इस संदर्भ में जाने-माने अर्थशास्त्री कौशिक बसु का ट्वीट उल्लेखनीय है-</p>
<p>&ldquo;भारत की थोक महंगाई दर 15 प्रतिशत को पार कर गई। यह 25 वर्षों में सबसे ज्यादा है। खुदरा महंगाई इससे काफी कम है। इस परिस्थिति ने भारत को फिलिप्स कर्व के टर्निंग पॉइंट पर पहुंचा दिया है। इसके दो जोखिम हैं- या तो छोटे उद्यमी का धंधा बंद हो जाएगा और बेरोजगारी बढ़ जाएगी या खुदरा महंगाई और बढ़ेगी। नीतियों का फोकस इस स्थिति को दूर करने पर होना चाहिए।&rdquo;</p>
<p>कॉर्नेल यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर और वर्ल्ड बैंक के पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री बसु ने जो कहा है उस पर नीति आयोग और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद को गौर करना चाहिए। उपभोक्ता मामले, कृषि, वित्त और वाणिज्य मंत्रालयों के अफसर भी अगर कौशिक बसु की बातों पर गौर करें तो उन्हें फायदा ही होगा।</p>
<p>कौशिक बसु ने छोटे बिजनेस पर फोकस किया है। हालांकि इस बात पर उन्होंने भी गौर नहीं किया कि महंगाई ग्रामीण अर्थव्यवस्था को किस तरह प्रभावित कर रही है। अगले महीने से पंजाब, हरियाणा तथा अन्य राज्यों में धान की बुवाई होनी है लेकिन इधर तापमान 50 डिग्री सेल्सियस के आसपास चल रहा है। ऐसे में किसान काफी हद तक अनिश्चित हैं। पंजाब की भगवंत मान सरकार में उनसे अलग-अलग शेड्यूल के हिसाब से धान की रोपाई करने का आग्रह किया है।</p>
<p>हम उम्मीद ही कर सकते हैं कि जून के दूसरे हफ्ते में उत्तरी राज्यों में मानसून की बारिश शुरू हो जाएगी। मौसम विभाग ने अभी तक सामान्य मानसून की बात कही है। एक और समस्या उर्वरकों की कमी की है। उनके दाम भी बढ़े हैं। डीजल इतना महंगा हो गया है कि पंपसेट चला कर खेतों में पानी देना काफी महंगा हो गया है। मार्च के दूसरे पखवाड़े में अचानक तापमान तेजी से बढ़ने के कारण गेहूं का उत्पादन गिरा है। हालांकि ग्लोबल मार्केट में गेहूं के दाम बढ़ने से खुले बाजार में किसानों को गेहूं की अच्छी कीमत मिली। इसलिए इस बार किसानों ने एमएसपी पर गेहूं खरीदने के लिए अधिक शोर भी नहीं मचाया।</p>
<p>महंगाई के लिए भू राजनैतिक परिस्थितियों को दोष देना सरकार के लिए बहुत ही आसान है। लेकिन एक तथ्य यह भी है कि खुदरा मूल्य बढ़ने पर सरकार को फायदा होता है। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) किसी भी चीज की कीमत पर लगता है। ज्यादातर वस्तुएं 18 फ़ीसदी कैटेगरी में हैं। कीमत बढ़ने का मतलब है सरकार को जीएसटी के रूप में अधिक राजस्व मिलता है। इसलिए अप्रैल में जो 1.68 लाख करोड़ रुपए का रिकॉर्ड जीएसटी कलेक्शन हुआ है उसका कुछ श्रेय महंगाई को भी दिया जाना चाहिए। जीएसटी तथा कीमतों पर लगने वाले अन्य अप्रत्यक्ष करों से सरकार को जो अतिरिक्त कमाई हो रही है, उसे उसको टैक्स में कटौती करके उपभोक्ताओं को वापस देना चाहिए। इससे न सिर्फ परेशान हाल उपभोक्ताओं को राहत मिलेगी बल्कि यह अर्थव्यवस्था के लिए भी सकारात्मक होगा।</p>
<p><em><strong>(प्रकाश चावला सीनियर इकोनॉमिक जर्नलिस्ट है और आर्थिक नीतियों पर लिखते हैं)</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ महंगाई से आम लोग ही नहीं, किसानों और छोटे उद्यमियों का भी बढ़ा संकट ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[अस्पष्ट सोच और फैसलों में देरी ने गेहूं के आसान से मुद्दे को पहेली बना दिया]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/lack-of-clarity-and-late-decision-turned-a-simple-issue-of-wheat-in-to-complex-one.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 19 May 2022 01:58:53 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/lack-of-clarity-and-late-decision-turned-a-simple-issue-of-wheat-in-to-complex-one.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>जमीनी हकीकत को स्वीकारने से बचने और अधिकारियों द्वारा इसे ठीक से बयां नहीं करने से कोई आसान मसला कैसे जटिल मुद्दा बन जाता है, गेहूं को लेकर ताजा घटनाक्रम उसका बेहतर उदाहरण है। उत्पादन में कमी, सरकारी खऱीद का गिरना, निर्यात के बड़े दावे, निर्यात प्रोत्साहन की घोषणाएं, फिर निर्यात पर प्रतिबंध व उसके बाद का घटनाक्रम सही समय पर फैसले नहीं लेने और विभागीय तालमेल की खामियों को उजागर करते हैं। इसके चलते जहां गेहूं किसानों की बेहतर दाम की संभावनाओं को झटका लगा है वहीं कारोबारियों के बीच और वैश्विक बाजार में भारत की एक टिकाऊ निर्यातक की साख भी धूमिल हुई है। बात सिर्फ इतनी है कि सरकार को उत्पादन को लेकर पैदा हुई स्थिति का बेहतर आकलन करने की जरूरत थी जिससे अव्यावहारिक फैसलों से बचा जा सकता था।&nbsp;</p>
<p>असल में सरकार के अनुमान और लक्ष्यों के मुताबिक इस साल हम 11.10 करोड़ टन उत्पादन और 444 लाख टन गेहूं की सरकारी खरीद के साथ रिकार्ड बनाने वाले थे। इसी के आधार पर घोषणाएं की गईं कि यूक्रेन और रूस के बीच चल रहे युद्ध के चलते वैश्विक बाजार में करीब 25 फीसदी आपूर्ति की कमी के संकट को कम करने में भारत रिकार्ड गेहूं का निर्यात कर मदद करने वाला है। निर्यात के लक्ष्य तय किये जा रहे थे और निर्यातकों के लिए मंडी टैक्स में छूट से लेकर विदेशों में बाजार तलाशने के लिए प्रतिनिधिमंडल भेजने की घोषणाएं की जा रही थी। लेकिन 13 मई, 2022 की शाम अचानक सब कुछ बदल गया। सरकार ने गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा कर दी। क्या वाकई यह सब अचानक हुआ? नहीं, यह सब अचानक नहीं हुआ बल्कि जमीनी हकीकत से बेपरवाह होते हुए जरूरी कदम नहीं उठाये गये, जिसके चलते निर्यात पर प्रतिबंध का फैसला लिया गया। खाद्य सचिव सुधांशु पांडे ने पिछले दिनों बताया था कि मौजूदा तिमाही के लिए 40 लाख टन गेहूं निर्यात के सौदे हुए जिनमें से 10 लाख टन का निर्यात किया जा चुका था। पिछले साल 70 लाख टन से अधिक गेहूं का निर्यात किया गया था।</p>
<p>एक तरफ सरकार कृषि से संबंधित डाटा बैंक बनाने के लिए काम करने की बात कर रही है। दुनिया की बड़ी आईटी कंपनियां इसमें भागीदारी कर रही हैं। यानी कृषि और कृषि उत्पादन से जुड़े तमाम आंकड़ों और जानकारियों को जुटाने के लिए अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। खेत की मिट्टी से लेकर फसल के हर चरण की जानकारी इकट्ठा की जाएगी और उसके आधार पर किसानों को फैसले लेने के लिए प्रेरित किया जाएगा। लेकिन जब एक सामान्य किसान को भी पता था कि मार्च में तापमान के असामान्य रूप से बढ़ने से उत्पादन में भारी कमी की स्थिति पैदा हो गई है, उस समय सरकार निर्यात की संभावनाओं पर काम कर रही थी। फरवरी के अंत और मार्च माह का तापमान गेहूं की फसल के बहुत संवेदनशील होता है। इसी समय गेहूं की फसल में दाना तैयार होता है और इसके ड्राई होने की प्रक्रिया पूरी होती है। ऐसे में तापमान असामान्य रूप से बढ़ने का अर्थ है गेहूं के उत्पादन पर सीधे प्रतिकूल असर पड़ना। ऐसे में कृषि मंत्रालय के अधिकारियों और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के वैज्ञानिकों ने गेहूं के उत्पादन में होने वाली गिरावट का आकलन क्यों नहीं किया? जब पंजाब , हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में फसल की कटाई शुरू हुई तो उस समय किसानों ने साफ किया कि उत्पादन में पिछले साल के मुकाबले 15 से 25 फीसदी की गिरावट आई है। ऐसे में सरकार का 444 लाख टन की सरकारी खरीद के लक्ष्य पर टिके रहने का कोई मतलब नहीं रह गया था। मंडियों में गेहूं की आवक कम रही और कई राज्यों में तो कुछ समय तक सरकारी खऱीद में खाता भी नहीं खुला। सरकारी खऱीद में बड़ी हिस्सेदारी वाले मध्य प्रदेश में खरीद एक तिहाई से भी नीचे अटक गई और हरियाणा में आधे के करीब ही पहुंची। पंजाब में भी यह अभी तक दो तिहाई के करीब ही पहुंची है। लेकिन सरकार ने मई तक इंतजार किया और तब खाद्य सचिव ने बताया कि इस साल उत्पादन 5.7 फीसदी कम रहेगा। पिछले साल 10.96 करोड़ टन गेहूं का उत्पादन हुआ था और इस साल शुरुआती अनुमान 11.1 करोड़ टन का था, जिसे बाद में संशोधित कर 10.5 करोड़ टन किया गया। हालांकि स्वतंत्र विशेषज्ञों का अनुमान है कि उत्पादन 9.6 करोड़ टन के आसपास ही रहेगा। सरकारी खरीद को भी 444 लाख टन के लक्ष्य से घटाकर 195 लाख टन कर दिया गया जो 13 साल में सबसे कम है।&nbsp;</p>
<p>वहीं सरकार द्वारा लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (टीपीडीएस) और प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (पीएमजीकेएवाई) के तहत पांच किलो प्रति व्यक्ति मुफ्त खाद्यान्न आवंटन के चलते केंद्रीय पूल में गेहूं का स्टॉक एक अप्रैल, 2022 को तीन साल के न्यूनतम स्तर 189 लाख टन पर आ गया था। इसके बावजूद खाद्य मंत्रालय ने सरकारी खऱीद के लिए कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं किया। लेकिन लगता है कि कृषि मंत्रालय और खाद्य मंत्रालय के बीच उत्पादन को लेकर बेहतर तालमेल नहीं था। जब अप्रैल के शुरू में ही बाजार में रबी मार्केटिंग सीजन (2022-23) के 2015 रुपये प्रति क्विटंल के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से अधिक कीमत पर कारोबारियों ने गेहूं की खरीद शुरू कर दी थी तो मार्केट इंटेलीजेंस के आधार पर गेहूं की सरकारी खरीद का आकलन क्यों नहीं किया गया। वहीं मध्य प्रदेश सरकार ने गेहूं के निर्यात पर मंडी शुल्क में छूट की घोषणा कर दी और मुख्यमंत्री ने निर्यात का लक्ष्य भी तय कर दिया। मध्य प्रदेश केंद्रीय पूल में पंजाब के बाद दूसरा सबसे बड़ा गेहूं देने वाला राज्य है। मध्य प्रदेश में निजी कंपनियां और कारोबारी 2100 रुपये से 2400 रुपये प्रति क्विटंल पर गेहूं की खरीद कर रहे थे। वहां निजी क्षेत्र ने करीब 40 लाख टन गेहूं खरीदा है। उत्तर प्रदेश में भी यही दाम थे और पंजाब में करीब एक दशक बाद निजी क्षेत्र द्वारा छह लाख टन से अधिक गेहूं की खरीद की गई। हालांकि उसके बाद भी पंजाब में ही गेहूं की सबसे अधिक 96.10 लाख टन की खरीद की गई। मध्य प्रदेश में खरीद पिछले साल की करीब एक तिहाई 41.89 लाख टन और हरियाणा में पिछले साल के आधे करीब 40.64 लाख टन पर अटक गई। उत्तर प्रदेश में किसी तरह 2.47 लाख टन गेहूं की सरकारी खरीद हुई तो राजस्थान, गुजरात, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू एवं कश्मीर में खाता खुलने की औपचारिकता ही हुई। क्या ऐसे समय में किसानों को 250 रुपये प्रति क्विटंल का बोनस देकर खऱीद को नहीं बढ़ाया जा सकता था? यह संभव था क्योंकि अधिकांश किसानों को एमएसपी से मामूली अधिक कीमत ही मिली। अगर आने वाले दिनों में कुछ गेहूं सरकारी खऱीद में नहीं आता है तो ऐसा पहली बार होगा जब एक अप्रैल को केंद्रीय पूल में बकाया गेहूं नई खरीद से अधिक होगा। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 19 मई तक गेहूं की कुल खरीद 181.16 लाख टन पर ही पहुंची है। इसलिए इसके 195 लाख टन तक पहुंचना भी एक चुनौती है। हो सकता है कि निर्यात पर प्रतिबंध के बाद कीमतें घटने के चलते कुछ और किसान सरकारी खऱीद में एमएसपी पर गेहूं बेचने आ जाएं। दूसरे, गेहूं की गुणवत्ता को लेकर किसान परेशान थे तो सरकार को भी असलियत पता थी। लेकिन इसके लिए गेहूं के निर्यात पर रोक के बाद 15 मई को फैसला लिया गया कि 18 फीसदी तक के सिकुड़े और टूटे दाने की खरीद पर भी किसानों को एमएसपी का पूरा भुगतान किया जाएगा। क्या यह उत्पादन में गिरावट की हकीकत को स्वीकारने वाला तथ्य नहीं है? गेहूं के दाने का 18 फीसदी सिकुड़ना उत्पादन में गिरावट का कितना बड़ा कारक हो सकता है इसे किसी को बताने की जरूरत नहीं है।</p>
<p>वहीं सरकार ने प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत पांच किलो मुफ्त खाद्यान्न को छह माह के लिए बढ़ा दिया। इसके लिए करीब 110 लाख टन गेहूं की जरूरत है। अगर हिसाब लगाया जाए तो एक अप्रैल को केंद्रीय पूल में 189.90 लाख टन गेहूं बकाया था अगर इतना ही गेहूं और सरकारी खऱीद में आता है तो सरकार के पास अधिकतम 380 लाख टन गेहूं होगा। जबकि टीपीडीएस के तहत 260 लाख टन गेहूं की जरूरत है और गरीब कल्याण अन्न योजना के लिए साल भर के लिए करीब 220 लाख टन गेहूं की जरूरत है। ऐसे में 1 अप्रैल, 2023 को केंद्रीय पूल में बफर मानक के तहत 75 लाख टन गेहूं कहां से आएगा। हालांकि स्थिति को भांपते हुए खाद्य मंत्रालय ने टीपीडीएस और पीएमजीकेएवाई के तहत गेहूं की मात्रा घटाकर चावल की मात्रा बढ़ा दी है।</p>
<p>इस बीच बाजार में आटा की कीमतों में भारी इजाफा हुआ जो गेहूं की कीमतों में बढ़ोतरी के अनुपात में कहीं अधिक है। सरकार ने गेहूं निर्यात पर प्रतिबंध लगाने के फैसले में इस कीमत बढ़ोतरी को वजह बताया और वास्तविक उत्पादन गिरावट पर अभी भी चुप्पी साध रखी है। दूसरे हमें इस हकीकत को भी स्वीकारना चाहिए कि इस साल किसान की उत्पादन लागत बढ़ी है क्योंकि डीजल कीमतों में बढ़ोतरी और डीएपी उर्वरक की उपलब्धता का उत्पादन लागत पर सीधे असर पड़ा है। गेहूं का उत्पादन गिरना किसानों पर दोहरी मार लेकर आया है। ऐसे में निर्यात पर रोक का फैसला किसानों के लिए नुकसानदेह साबित होने वाला है। निर्यात पर प्रतिबंध लगाये जाने के बाद अधिकांश राज्यों में गेहूं के दाम 200 रुपये प्रति क्विटंल तक घट गये हैं और अब कीमतें एमएसपी के करीब आ गई हैं। कई जगह कम गुणवत्ता वाले गेहूं के दाम एमएसपी से नीचे आ गये हैं। यह बात सच है कि निजी कारोबारियों, निर्यातकों के अलावा किसानों ने भी बड़ी मात्रा में बेहतर दाम की उम्मीद में गेहूं की बिक्री नहीं की है। हो सकता है कि इस फैसले के बाद उनमें से कुछ लोग बिक्री कर दें। इसका अंदाजा 13 मई के बाद होने वाली सरकारी खऱीद की मात्रा से लगाया जा सकता है।&nbsp;</p>
<p>सवाल है कि दो साल पहले जून, 2020 में कृषि उत्पादों की मार्केटिंग में सुधारों को लागू करने के लिए कानून लाने वाली सरकार अब अपनी नीतियों से पूरी तरह पलट गई है। वैश्विक बाजार में गेहूं की मांग बढ़ने से अधिक दाम मिलने की संभावना को किसानों से छीन लिया गया है। इसके साथ ही इस फैसले से सरकार द्वारा कृषि उत्पादों के आयात-निर्यात के बारे में फैसले लेने की अनिश्चितता भी सामने आई है। वह भी तब जब देश में जरूरत का पर्याप्त गेहूं मौजूद है लेकिन इसके प्रबंधन के लिए जिस कौशल की जरूरत थी वह सामने नहीं आया है। शायद महंगाई की बढ़ती दर के मद्देजनर भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी जैसा कदम उठाये जाने के बाद सरकार अतिरिक्त सावधानी बरत रही है। कुछ दिन पहले तक वह फैसले लेने में सुस्त थी, लेकिन अब अधिक फुर्ती दिखाने की कोशिश कर रही है।&nbsp;&nbsp;</p>
<p></p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ अस्पष्ट सोच और फैसलों में देरी ने गेहूं के आसान से मुद्दे को पहेली बना दिया ]]></media:description>
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        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कृषि पर जलवायु परिवर्तन का असर: आईसीएआर की रिपोर्ट में फसल चक्र बदलने की थी सिफारिश, लेकिन अमल नहीं]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/time-to-shift-to-climate-resistant-agriculture-icar-template-needs-fast-follow-up.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 02 May 2022 09:02:21 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/time-to-shift-to-climate-resistant-agriculture-icar-template-needs-fast-follow-up.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत के दो प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों पंजाब और किसान के किसानों के लिए मार्च 2022 की शुरूआत तक सब कुछ ठीक चल रहा था। उनकी गेहूं की फसल पककर तैयार होने वाली थी और ओले तथा बारिश ना पड़ने के कारण उन्हें बंपर पैदावार की उम्मीद थी। लेकिन उसके बाद अभूतपूर्व तरीके से गर्मी बढ़ी और इन किसानों की उम्मीदों पर पानी फिर गया। मंडियों में गेहूं पहुंचने तक दाने 15 से 20 फ़ीसदी सिकुड़ चुके थे। किसानों के अनुसार प्रति एकड़ पैदावार 20 से 40 फ़ीसदी तक गिर गई। यह गिरावट जिले के हिसाब से अलग है। अभी तक सरकार ने नुकसान का कोई आकलन जारी नहीं किया है, न ही उसने फसल बीमा योजनाओं के तहत किसी मुआवजे की घोषणा की है। उम्मीद की जानी चाहिए कि जिन किसानों को मौसम की मार से नुकसान हुआ है उन्हें कुछ मुआवजा मिलेगा।</p>
<p>इस लेख में चर्चा का मुख्य बिंदु उस व्यापक स्टडी का बुरा हश्र है जिसे तैयार करने में करीब 8 साल लगे। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने 2011 में एक बड़े प्रोजेक्ट की शुरुआत की थी जो दो चरणों में 2019 में पूरा हुआ। पहले का नाम नेशनल इनीशिएटिव ऑन क्लाइमेट रेसिलियंट एग्रीकल्चर है जो 2017 में पूरा हुआ। दूसरा भाग नेशनल इनोवेशन इन क्लाइमेट रेसिलियंट एग्रीकल्चर 2019 में पूरा हुआ। पिछले साल संसद में सवाल के एक जवाब में इस व्यापक रिपोर्ट का जिक्र किया गया था और पूरी रिपोर्ट का लिंक भी दिया गया था। उस रिपोर्ट में सबसे महत्वपूर्ण सिफारिश यह थी कि क्या मार्च में तापमान बढ़ने को देखते हुए, जब गेहूं की फसल तैयार होती है, तब फसल चक्र में बदलाव किया जा सकता है? सीधे शब्दों में कहें तो जलवायु परिवर्तन को देखते हुए गेहूं की बिजाई से लेकर कटाई तक पूरा चक्र कुछ हफ्तों के लिए एडवांस किया जा सकता है या नहीं?</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/05/image_750x_626f6420c65fd.jpg" alt="" /></p>
<p>पूरी रिपोर्ट के लिए इस लिंक पर क्लिक कर सकते हैं</p>
<p><a href="http://www.nicra-icar.in/nicrarevised/images/publications/Risk%20&amp;%20vulnerability%20assessment%20of%20Indian%20agriculture%20to%20climate%20change.pdf">http://www.nicra-icar.in/nicrarevised/images/publications/Risk%20&amp;%20vulnerability%20assessment%20of%20Indian%20agriculture%20to%20climate%20change.pdf</a></p>
<p>रिपोर्ट में कहा गया है, जलवायु परिवर्तन के अनुमान बताते हैं कि तापमान का बढ़ना लगभग निश्चित है और अधिकतम तापमान की तुलना में न्यूनतम तापमान (रात में) में अधिक वृद्धि हो रही है। फसल पैदावार निर्धारण में बढ़ता तापमान महत्वपूर्ण फैक्टर बनकर उभर रहा है। भारत के संदर्भ में बारिश में गिरावट पर जितना ध्यान दिया गया है उतना तापमान में वृद्धि पर नहीं। इस विश्लेषण में बताया गया है कि 271 जिलों में न्यूनतम तापमान का बढ़ना पैदावार में सबसे बड़ा जोखिम है। कई अध्ययनों में गेहूं जैसी रबी की फसल पर न्यूनतम तापमान बढ़ने के असर को देखा जा चुका है।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/05/image_750x_626f6455a4aed.jpg" alt="" /></p>
<p>दूसरी सिफारिश भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। इसमें कहा गया है कि बिजाई पहले शुरू करना और कम अवधि वाली वैरायटी अपनाना इस दिशा में बेहतर कदम हो सकता है। लेकिन केंद्र और राज्य सरकारों, केंद्रीय और राज्यों के कृषि विश्वविद्यालयों और सबसे बड़ी बात खुद आईसीएआर, जिसने यह स्टडी की थी, उसने इन सिफारिशों पर अमल करने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया।</p>
<p>अब बस यह उम्मीद की जा सकती है कि रिपोर्ट पर आपात आधार पर अमल किया जाए। इस बात के पर्याप्त सबूत मिलने लगे हैं कि फसलों, मवेशी और मछली की उत्पादकता पर असर पड़ेगा और इसका प्रभाव खाद्य सुरक्षा के साथ-साथ कृषि पर निर्भर लोगों की आजीविका और सस्टेनेबिलिटी पर भी होगा। जलवायु परिवर्तन से फसलों और मवेशियों की ग्रोथ और पैदावार दोनों प्रभावित होगी। कहा जा सकता है कि बढ़ते तापमान और कम होती बारिश का कृषि उत्पादकता पर विपरीत असर होगा। हालांकि इसके कुछ अपवाद हो सकते हैं। जैसे पर्वतीय क्षेत्रों में तापमान बढ़ने से फसलों की पैदावार बढ़ सकती है।</p>
<p>भारत में कई अध्ययनों में यह अनुमान लगाया गया है कि अनुकूलन का कोई तरीका ना अपनाने से जलवायु परिवर्तन, खासकर तापमान में वृद्धि के कारण फसलों की पैदावार में गिरावट आएगी। वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड गैस का स्तर बढ़ने का पौधों पर जो सकारात्मक असर होता है उससे कहीं अधिक तापमान बढ़ने का नकारात्मक असर होता है। कार्बन डाई ऑक्साइड का स्तर बढ़ने को कार्बन फर्टिलाइजेशन इफेक्ट कहते हैं। आठ साल में तैयार की गई स्टडी की सबसे अच्छी बात यह है कि उसमें जिला स्तर पर जलवायु परिवर्तन के कृषि पर असर का विश्लेषण किया गया है।</p>
<p>आगे संभावनाएं कुछ इस तरह हो सकती हैं- कुछ नए स्टार्टअप खड़े हो सकते हैं जो जिला स्तर पर जलवायु परिवर्तन से निपटने का दावा करें। कुछ ने तो ऐसा करना शुरू भी कर दिया है। ऐसे स्टार्टअप की बढ़-चढ़कर तारीफ भी होगी लेकिन आईसीएआर की ओर से तैयार अध्ययन रिपोर्ट को भुला दिया जाएगा।&nbsp;</p>
<p>हमें जलवायु परिवर्तन के खतरे के प्रति जल्दी चेत जाना चाहिए। उस रिपोर्ट में जो सिफारिशें की गई थी उन पर अमल करना चाहिए। यहां कुछ महत्वपूर्ण सिफारिशॅ का दोबारा जिक्र किया जा रहा है।</p>
<p>-कृषि के संदर्भ में तापमान और बारिश के पैटर्न में बदलाव दो सबसे महत्वपूर्ण पहलू हैं। ऐतिहासिक ट्रेंड से बढ़ते तापमान का पता चलता है और इससे सिंचाई के साधनों तक पहुंच के महत्व का भी पता चलता है। कम से कम 116 जिलों में सिंचाई के साधनों तक कम पहुंच सबसे अधिक जोखिम बनकर उभरा है।&nbsp;</p>
<p>-सिंचाई के साधनों का विस्तार, उस तक सबकी पहुंचे पर किसी भी अनुकूलन रणनीति में अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए। बारिश के पानी की हार्वेस्टिंग, उनका जगह-जगह संरक्षण और भूजल की रिचार्जिंग रेनफेड इलाकों में जल प्रबंधन के तीन महत्वपूर्ण बिंदु होने चाहिए।&nbsp;</p>
<p>-सिंचाई वाले और रेनफेड दोनों इलाकों में सिंचाई के लिए पानी की मांग का प्रबंधन पानी के अधिक सस्टेनेबल इस्तेमाल के लिए महत्वपूर्ण है। इसके लिए फसल बिजाई के पैटर्न में बदलाव जरूरी है। रेनफेड इलाकों में ऐसी फसलों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए जिनके लिए कम पानी की जरूरत पड़ती है।</p>
<p>-माइक्रो इरिगेशन जैसी टेक्नोलॉजी, नीतियों और अन्य बातों में इस तरह समन्वय स्थापित किया जाना चाहिए कि वह विभिन्न क्षेत्रों की आवश्यकताएं पूरी कर सके।&nbsp; सालाना बारिश में गिरावट 91 जिलों में बड़ा जोखिम बनकर सामने आई है।&nbsp;</p>
<p>-54 जिलों में मार्च से मई के दौरान असामान्य रूप से अधिक तापमान वाले दिन की संख्या एक से अधिक बढ़ सकती है। इनमें से ज्यादातर जिले जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर पूर्वी राज्य और पंजाब में हैं।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/05/image_750x_626f6448d99ef.jpg" alt="" /></p>
<p>-जलवायु परिवर्तन का जोखिम 109 जिलों में बहुत अधिक है। इनमें सबसे अधिक जिले उत्तर प्रदेश (22), राजस्थान (17), बिहार (10), केरल (8), उत्तराखंड (7), ओडिशा (6), पंजाब ( 5) हैं। बाकी जिले पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, हरियाणा, गुजरात, मिजोरम, असम हिमाचल प्रदेश के हैं।</p>
<p>-अधिक जोखिम वाले 201 जिले उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, राजस्थान, बिहार, ओडिशा और महाराष्ट्र में हैं। खेती और किसानों को जलवायु परिवर्तन के विपरीत प्रभावों से बचाने के लिए इन जिलों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।</p>
<p><em><strong>(प्रकाश चावला सीनियर इकोनॉमिक जर्नलिस्ट है और आर्थिक नीतियों पर लिखते हैं)</strong></em></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/04/image_750x500_6262d8c475f32.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ कृषि पर जलवायु परिवर्तन का असर: आईसीएआर की रिपोर्ट में फसल चक्र बदलने की थी सिफारिश, लेकिन अमल नहीं ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[भारत के खाद्यान्न निर्यात पर डब्ल्यूटीओ की टेढ़ी नजर, रूस, जापान और अमेरिका ने की है शिकायत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/india-foodgrains-exports-under-wto-scanner.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 24 Apr 2022 22:56:39 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/india-foodgrains-exports-under-wto-scanner.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>मर्केंडाइज यानी फैक्ट्री में बनी वस्तुओं का निर्यात 2021-22 में पहली बार 400 अरब डॉलर को पार कर गया, जिसे बड़ी उपलब्धि कहा जा सकता है। प्रोविजनल आंकड़ों के अनुसार बीते वित्त वर्ष में लगभग 420 अरब डॉलर का निर्यात हुआ है। यह इससे पहले के 2018-19 के रिकॉर्ड 330 अरब डॉलर से 27 फ़ीसदी ज्यादा है।</p>
<p>निर्यात के इस प्रदर्शन खास बात यह है कि अर्थव्यवस्था के लगभग हर क्षेत्र ने इसमें अपना योगदान किया है। कृषि क्षेत्र में कई गैर पारंपरिक कमोडिटी के कारण निर्यात में वृद्धि हुई है। उदाहरण के लिए गैर बासमती चावल और गेहूं दोनों का रिकॉर्ड निर्यात हुआ। कुछ समय पहले तक कुल चावल निर्यात में गैर बासमती का हिस्सा एक तिहाई से आधा तक होता था। लेकिन 2021-22 में यह दो तिहाई पहुंच गया। गेहूं का निर्यात 2019-20 में सिर्फ छह करोड़ डॉलर का हुआ था लेकिन 2021-22 में दो अरब डॉलर का गेहूं निर्यात हुआ।</p>
<p>इन कमोडिटी के मामले में भारत ने विश्व बाजार में अपनी स्थिति मजबूत की है। अमेरिकी कृषि विभाग (यूएसडीए) के आंकड़ों के मुताबिक विश्व चावल निर्यात में भारत का हिस्सा 2018-19 में 22 फ़ीसदी था जो 2021-22 में 40 फ़ीसदी पहुंच गया। गेहूं निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 2019-20 में 0.3 फ़ीसदी थी जो अब 5 फ़ीसदी हो गई है। चीनी निर्यात में भी भारत का प्रदर्शन अच्छा रहा है। विश्व चीनी निर्यात में 2017-18 में भारत का हिस्सा 3.4 फ़ीसदी था जो अब 11 फ़ीसदी से ऊपर जा चुका है। लगातार सातवें वर्ष अनाज उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर रहने की उम्मीद है। इसे देखते हुए मौजूदा वित्त वर्ष में कृषि निर्यात और बढ़ने की संभावना है।</p>
<p>लेकिन अच्छी खबर बस इतनी ही है, क्योंकि भारत के कृषि निर्यात की विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में सघन जांच चल रही है। 2019 में ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील और ग्वाटेमाला ने डब्ल्यूटीओ की विवाद निस्तारण समिति में शिकायत दर्ज कराई थी कि चीनी निर्यात बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार कई तरह की सब्सिडी दे रही है। शिकायत में कहा गया है कि इस तरह की सब्सिडी स्कीम चला कर सरकार ने डब्ल्यूटीओ के कृषि समझौते का उल्लंघन किया है, जिसमें निर्यात की जाने वाली वस्तुओं पर सब्सिडी देने की मनाही है। दिसंबर 2021 में विवाद निस्तारण समिति ने भारत के खिलाफ निर्णय दिया था।</p>
<p>बड़ी समस्या यह है कि भारत से अनाज का निर्यात डब्ल्यूटीओ की जांच की जद में है। कृषि समिति की चर्चा में जापान, रूस और अमेरिका समेत कई देशों ने भारत से इस बात पर स्पष्टीकरण मांगा है कि क्या वह बाली में मंत्रिस्तरीय बैठक में लिए गए फैसले का पालन कर रहा है? वह फैसला 2013 में अनाज की सरकारी स्टॉकहोल्डिंग को लेकर था। उस फैसले का मकसद कृषि समझौते को उन देशों पर सख्ती से लागू करना था जो अनाज की सरकारी स्टॉकहोल्डिंग के जरिए खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम चलाते हैं, जैसे भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी पीडीएस।</p>
<p>कृषि समझौते के मुताबिक इस तरह के खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम चलाने वाले देशों को प्रशासित मूल्य पर अनाज खरीदने और जारी करने की अनुमति है, जैसे भारत में एमएसपी पर खरीदा जाता है। लेकिन वे ऐसा तभी कर सकते हैं जब वे अनाज के खरीद मूल्य और बाहरी संदर्भ मूल्य (1986-88 के दौरान अंतरराष्ट्रीय कीमत के अंतर) को अपने सब्सिडी बिल में शामिल करें। कृषि समझौते के अनुसार भारत जैसे विकसित देश जो सब्सिडी देते हैं वह उनके कुल कृषि उत्पादन के मूल्य के 10 फ़ीसदी से अधिक नहीं हो सकता है। अगर भारत में पीडीएस के जरिए दी जाने वाली सब्सिडी, किसानों को एमएसपी के रूप में दी जाने वाली सब्सिडी तथा इनपुट सब्सिडी को जोड़ा जाए तो यह निश्चित रूप से 10 फ़ीसदी की सीमा को पार कर जाएगी।</p>
<p>कृषि समझौते के प्रावधानों में सरकारी स्टॉकहोल्डिंग के प्रावधान कम से कम दो पैमाने पर सही नहीं लगते। पहला, भारत अभी कृषि उपज पर जो न्यूनतम समर्थन मूल्य देता है उसकी तुलना 1986-88 के दौरान रहे अंतरराष्ट्रीय कीमतों से की जाती है। भारत का तर्क है कि बाहरी संदर्भ मूल्य के लिए हाल के वर्षों को आधार बनाया जाए या उसमें महंगाई दर को एडजस्ट किया जाए। दूसरा, कुपोषित आबादी को सब्सिडी पर अनाज उपलब्ध कराना और किसानों को उत्पादन से संबंधित सब्सिडी मुहैया कराना, दोनों को एक ही नजर से देखना त्रुटिपूर्ण है। यह इस बात का उदाहरण है कि अमेरिका और यूरोपियन यूनियन ने किस तरह कृषि से संबंधित नियम लिखे जो विकासशील देशों के हितों के खिलाफ हैं।</p>
<p>जिस दिन भारत ने अपनी दो तिहाई आबादी को सस्ता खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराने के लिए राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून को लागू किया, उसी दिन यह बात स्पष्ट हो गई थी कि सरकारी स्टॉकहोल्डिंग पर डब्ल्यूटीओ के कृषि समझौते के नियम भारत के हितों के खिलाफ होंगे। वर्ष 2013 में बाली मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में डब्ल्यूटीओ के सदस्य इस बात पर राजी हुए कि अगर भारत राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून को लागू करने में 10 फ़ीसदी सब्सिडी की सीमा को पार करता है तो भी उसके खिलाफ कोई विवाद नहीं खड़ा किया जाएगा। उसे पीस क्लॉज नाम दिया गया जिसकी पुष्टि 2015 में हुई। इसमें स्थाई समाधान होने तक भारत को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत सस्ता खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराने की छूट दी गई है। यह कृषि समझौते के नियमों से भारत के पीडीएस को बचाने का एक रास्ता था।</p>
<p>लेकिन उस पीस क्लॉज में एक महत्वपूर्ण शर्त जोड़ी गई कि सरकारी स्टॉक का इस्तेमाल व्यापार की परिस्थितियों को बिगाड़ने या दूसरे सदस्य देशों की खाद्य सुरक्षा को प्रभावित करने में नहीं किया जाएगा। इसका सीधा मतलब यह है कि भारत इस स्टॉक से अनाज का निर्यात नहीं कर सकता है। डब्ल्यूटीओ के सदस्य देशों ने भारत से स्पष्टीकरण मांगा है कि भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) की खुले बाजार में बिक्री योजना, जिसके तहत समय-समय पर पूर्व निर्धारित कीमत पर खुले बाजार में गेहूं और चावल की बिक्री की जाती है, क्या उसके कारण भारत से खाद्य पदार्थों का आयात बढ़ा है? दूसरे शब्दों में कहें तो सीधा सवाल यह है कि भारत से खासकर गेहूं और चावल का निर्यात क्या एफसीआई के स्टॉक से किया जा रहा है?</p>
<p>भारत से अनाज का निर्यात बढ़ने के बाद डब्ल्यूटीओ में इस तरह के सवाल अधिक उठने लगे हैं। इससे पता चलता है कि डब्ल्यूटीओ के अन्य सदस्य देश अब ज्यादा सघन निगरानी कर रहे हैं। सरकार को इन चुनौतियों का जवाब देने के लिए एक मजबूत रणनीति तैयार करनी चाहिए।</p>
<p><strong><em>(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ सोशल साइंस में सेंटर फॉर इकोनॉमिक स्टडीज एंड प्लानिंग में प्रोफेसर हैं। यहां व्यक्त विचार उनके निजी हैं)</em></strong></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ भारत के खाद्यान्न निर्यात पर डब्ल्यूटीओ की टेढ़ी नजर, रूस, जापान और अमेरिका ने की है शिकायत ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[राजकोषीय संघवाद में पंचायतों का स्थान क्या है?]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/where-are-panchayats-in-fiscal-federalism.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 24 Apr 2022 12:55:04 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/where-are-panchayats-in-fiscal-federalism.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>हाल ही 15वें वित्त आयोग के चेयरमैन एन.के. सिंह ने दिल्ली विश्वविद्यालय के दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के सालाना समारोह को मुख्य अतिथि के तौर पर संबोधित किया। उन्होंने कहा, &ldquo;राजनीतिक लाभ के लिए लोगों को मुफ्त चीजें देने की नई संस्कृति विकसित होने से यह सवाल उठने लगा है कि क्या भारत को राज्यों के दिवालिया होने के कॉन्सेप्ट पर विचार करना चाहिए। केंद्र की शक्ति राज्यों की शक्ति में ही निहित है। इसलिए केंद्र और राज्य दोनों की वृहद आर्थिक स्थिरता में ही भारतीय संघ की स्थिरता निहित है।&rdquo;</p>
<p>दरअसल, उन्होंने जो कहा उतना पर्याप्त नहीं है। अभी &lsquo;मुफ्त&rsquo; की जो प्रतिस्पर्धी राजनीति चल रही है उसे सही अर्थों में प्रतिस्पर्धी बनाने की जरूरत है ताकि लोग &lsquo;वार्डसभा से लेकर लोकसभा&rsquo; तक सबमें अपना योगदान कर सकें और उससे लाभान्वित हो सकें। प्रधानमंत्री ने भी संसद में कहा कि वे सहकारी संघवाद में विश्वास करते हैं। सहकारी संघवाद क्या है? सामान्य अर्थों में देखा जाए तो सहकारी संघवाद को केंद्र और राज्यों के बीच, विभिन्न राज्यों के बीच और पंचायती राज संस्थानों के बीच संबंधों को दिशानिर्देशित करना चाहिए। लेकिन ऐसा लगता है कि राजकोषीय संघवाद या सहकारी संघवाद मौजूदा ढांचे में राज्य के स्तर से आगे नहीं बढ़ पाता है।</p>
<p>संविधान का अनुच्छेद 243जी राज्य की विधायिका को यह अधिकार देता है कि वह पंचायतों को ऐसे अधिकार प्रदान करे जिससे वे स्वशासन संस्थान के रूप में कार्य कर सकें। ये संस्थान अपने अधिकारों का इस्तेमाल इस तरह करें कि (1) वे आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए योजनाएं तैयार कर सकें और (2) आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए योजनाओं पर अमल कर सकें, जिनमें ग्यारहवीं अनुसूची में शामिल योजनाएं भी हैं। ग्यारहवीं अनुसूची में कृषि से लेकर सामुदायिक संपत्ति की देखरेख तक 29 विषय हैं।</p>
<p>सहकारी संघवाद कैसे स्थापित किया जा सकता है? अभी सरकारें चार स्तर पर काम करती हैं- केंद्र, राज्य, ग्रामीण (पंचायत) और शहरी (निगम)। बेहतर गवर्नेंस के लिए सहकारी संघवाद को एक तरफ केंद्र और राज्यों के बीच संबंधों को निर्देशित करना चाहिए तो दूसरी तरफ विभिन्न राज्यों के बीच तथा पंचायती राज संस्थानों और निगमों के बीच संबंधों को भी। सहकारी संघवाद के तहत विभिन्न स्तरों पर सरकार द्वारा संसाधनों को जुटाना और आम लोगों के हित में उनका इस्तेमाल करना संभव है। लेकिन सहकारी संघवाद एक शाब्दिक आडंबर मात्र बनकर रह गया है। क्योंकि इसके केंद्र में पंचायत नहीं है। देश में लगभग 2.55 लाख पंचायतें हैं जिनमें 31 लाख चुने हुए प्रतिनिधि चेयरपर्सन और सदस्य के रूप में कार्य करते हैं।</p>
<p>सहकारी संघवाद को मजबूत बनाने के लिए राज्य और केंद्र के स्तर पर एक फोरम गठित करने की आवश्यकता है जहां पंचायती राज संस्थानों के प्रतिनिधि सांसदों और विधायकों के साथ वार्ता करें। उदाहरण के लिए गुजरात पंचायत कानून की धारा 266 में पंचायतों के लिए एक राज्य स्तरीय परिषद का प्रावधान है जिसके चेयरमैन पंचायत मंत्री होंगे। यह परिषद पंचायतों को सुझाव देगी और उनके साथ समन्वय स्थापित करेगी। हरियाणा में भी अंतर जिला परिषद के रूप में कुछ ऐसी ही व्यवस्था है, जिसके प्रमुख मुख्यमंत्री हैं।</p>
<p>ग्रामीण स्थानीय सरकार के रूप में कार्य करने के बजाय पंचायती राज संस्थान वास्तव में केंद्र और राज्य सरकार की एजेंसियों के तौर पर काम कर रहे हैं। इनका काम ग्रामीण इलाकों में केंद्र और राज्य की योजनाओं को लागू करना मात्र रह गया है। इन संस्थानों के पास स्थानीय स्तर पर प्राथमिकताएं तय करने की आजादी नहीं होती है।</p>
<p>केंद्रीय वित्त आयोग ने केंद्र सरकार से सीधे पंचायतों को फंड ट्रांसफर करने की सिफारिश की है। लेकिन यहां भी मुद्दा यह है कि फंड खास योजनाओं से जुड़े होते हैं अथवा उनके इस्तेमाल करने के लिए पंचायतों पर अनेक शर्तें थोप दी जाती हैं। उदाहरण के लिए 15वें वित्त आयोग ने जो कुल ग्रांट की सिफारिश की है उसका 60 फ़ीसदी पेयजल, रेन वाटर हार्वेस्टिंग और वॉटर रीसाइकलिंग, स्वच्छता और ओडीएफ स्टेटस को बरकरार रखने, घरेलू कचरा के प्रबंधन एवं उनके निस्तारण तथा मानव मल के प्रबंधन से जुड़ा हुआ है।</p>
<p>वित्त आयोग के अनुसार कुल ग्रांट की 40 फ़ीसदी राशि किन्हीं खास कार्यों के लिए नहीं है और उसका इस्तेमाल ग्यारहवीं अनुसूची में शामिल 29 विषयों पर जरूरत के मुताबिक किया जा सकता है। हालांकि इसका इस्तेमाल भी वेतन और अन्य संस्थागत खर्चों में नहीं किया जा सकता। लेकिन सही अर्थों में देखा जाए तो फंड का यह हिस्सा भी सशर्त है क्योंकि इसका इस्तेमाल भी ग्यारहवीं अनुसूची में शामिल 29 विषयों पर ही किया जा सकता है। यानी पंचायत इन विषयों से इतर अन्य कार्यों के लिए उस राशि का इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं।</p>
<p>पंचायती राज संस्थानों को सहकारी संघवाद का महत्वपूर्ण अंग बनाने की जरूरत है, क्योंकि गरीबी दूर करने और लोगों के जीवन स्तर में सुधार लाने में ग्रामीण सरकारी संस्थानों की अहम भूमिका है। इस संदर्भ में सुभोजित बागची की स्टडी रिपोर्ट (साउदर्न कंफर्टः इंडियाज ग्लोबल पॉवर्टी इंप्रूव्स, हिंदू, कोलकाता, 12 मई 2018) का उल्लेख किया जा सकता है। इस स्टडी में बताया गया है कि भारत में मल्टीडाइमेंशनल गरीबी 2006-07 के 55 फ़ीसदी से घटकर 2015-16 में 21 फ़ीसदी रह गई। इसका प्रमुख कारण दक्षिण भारत के 5 राज्यों केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश का अच्छा प्रदर्शन है।</p>
<p>मल्टीडाइमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन शैली तीन मानकों पर आधारित गरीबी को मापने का अंतरराष्ट्रीय तरीका है। यदि मल्टीडाइमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स के नतीजे को पंचायतों को दिए जाने वाले अधिकारों से मिलाकर देखा जाए तो पता चलता है कि जिन पांच राज्यों में गरीबी में उल्लेखनीय कमी आई उनमें से चार राज्यों में पंचायतों को काफी मजबूत बनाया गया। इससे जाहिर होता है कि पंचायतों को मजबूत बनाने और गरीबी कम करने के बीच सीधा संबंध है। पंचायतों को सशक्त बनाने के पीछे कोविड-19 के दौरान उनकी अहम भूमिका भी एक वजह है।</p>
<p>पंचायतों को सहकारी संघवाद का प्रभावी अंग बनाने के लिए संविधान की सातवीं अनुसूची से एक स्थानीय सूची बनाने की जरूरत है। इस सूची को तीन हिस्से में बांटा जाना चाहिए। पहली ग्राम पंचायत के लिए, दूसरी पंचायतों के मध्यवर्ती स्तर के लिए और तीसरी जिला पंचायतों के लिए। इससे देश में सहकारी संघवाद और गहरा होगा।</p>
<p><em>(लेखक इंडियन इकोनॉमिक सर्विस के पूर्व अधिकारी हैं)</em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ राजकोषीय संघवाद में पंचायतों का स्थान क्या है? ]]></media:description>
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	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[पंजाब की मान सरकार को वादे पूरे करने के लिए चाहिए वक्त]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/mann-needs-time-regular-flow-of-money-for-fulfilling-kejriwal-guarantees-in-punjab.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 15 Apr 2022 07:56:15 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/mann-needs-time-regular-flow-of-money-for-fulfilling-kejriwal-guarantees-in-punjab.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार अपने एक महीने पूरे करने वाली है। इसने कई लोकलुभावन घोषणाएं की हैं लेकिन अभी तक ये घोषणा मात्र ही हैं, उन पर अमल नहीं हो सका है। मुख्यमंत्री भगवंत मान और पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल अच्छी तरह जानते हैं कि उनका यह हनीमून पीरियड ज्यादा दिनों तक नहीं चलेगा, खासकर ऐसे समय जब प्रदेश के किसान मंडियों में गेहूं की खरीद की समस्या से परेशान हैं और राज्य में बिजली की मांग दिनोंदिन बढ़ती जा रही है।</p>
<p>यदि बिजली की बढ़ती मांग को पूरा ना किया गया तो पार्टी को मिले भारी बहुमत का उत्साह जल्दी ही बेचैनी में तब्दील हो सकता है। आगे धान का सीजन आने वाला है जिसके लिए भूजल की जरूरत होगी और उस पानी के लिए बिजली के मोटर या डीजल जनरेटर सेट की जरूरत पड़ेगी। डीजल के दाम उबल रहे हैं और किसान प्रदेश के नए मुख्यमंत्री को उनका 300 <span>यूनिट बिजली मुफ्त देने का वादा याद दिला रहे हैं। वे केजरीवाल की अन्य गारंटी भी याद दिलाने से नहीं चूक रहे।</span></p>
<p>मान इस बेचैनी को महसूस कर सकते हैं। वे घायल विपक्ष से भी चिंतित होंगे जो आप सरकार पर हमला करने का कोई मौका नहीं छोड़ेंगे। इसलिए मान कहते हैं, &ldquo;<span>पंजाबियों थोड़ा समा देव</span>&rdquo; (<span>पंजाबियों मुझे थोड़ा समय दीजिए</span>)<span>। </span>12 <span>अप्रैल को दिल्ली रवाना होने से पहले उन्होंने सोशल मीडिया पर यह पोस्ट किया था। कहा जा रहा है कि </span>300 <span>यूनिट मुफ्त बिजली देने के वादे को कैसे पूरा किया जाए, इस पर केजरीवाल से चर्चा के लिए वे दिल्ली गए थे। इसके अलावा प्रदेश की सभी वयस्क महिलाओं को प्रति माह </span>1000 <span>रुपए पेंशन देने का भी वादा है।</span></p>
<p>पिछले दिनों हुए विधानसभा चुनाव में प्रदेश की 117 <span>सीटों में से आम आदमी पार्टी को </span>92 <span>सीटों पर जीत मिली थी। पार्टी के वादों को लेकर शुरू से ही सवाल किए जा रहे हैं कि इन सब के लिए पैसे कहां से आएंगे। पंजाब प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू ने चुनाव अभियान के दौरान भी यह सवाल उठाए। हालांकि सवाल उठाने से पहले उन्होंने अपने ही सरकार के वित्त मंत्री मनप्रीत बादल के बजट भाषण को नहीं पढ़ा। </span>2021-22 <span>के बजट में मुफ्त बिजली के लिए </span>7<span>,</span>180 <span>करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया था। कांग्रेस के </span>5 <span>वर्षों के शासनकाल में </span>15<span> लाख किसानों को </span>30,000 <span>करोड़ रुपए की मुफ्त बिजली दी गई। कहा जा सकता है कि सिद्धू को शायद यह नहीं मालूम था कि वह केजरीवाल के खिलाफ लड़ रहे हैं या अपनी ही कांग्रेस सरकार के खिलाफ।</span></p>
<p>इसी तरह कांग्रेस सरकार के समय अनुसूचित जाति, जनजाति, दलित और कई अन्य वंचित वर्ग की महिलाओं को पेंशन दी जा रही थी। इन सभी वर्गों को मिला लें तो प्रदेश की बड़ी महिला आबादी को पेंशन मिल रही थी।</p>
<p>कांग्रेस अपनी इन योजनाओं का राजनीतिक लाभ लेने में कैसे चूक गई यह एक अलग मुद्दा हो सकता है। अब जो बात है वह यह कि मुफ्त बिजली और महिला पेंशन दोनों पहले से चल रही थी और आप सरकार को सिर्फ उन्हें जारी रखना है। निश्चित रूप से इसके लिए ज्यादा संसाधन चाहिए और प्रचार-प्रसार का भी बजट लंबा चौड़ा होगा। लेकिन इतना तो कहा ही जा सकता है कि मान के विरोधी इन बातों पर अमल को जितना मुश्किल बता रहे हैं वास्तव में वह उतना मुश्किल नहीं होगा।</p>
<p>विधानसभा के पहले सत्र में वित्त मंत्री हरपाल चीमा ने 3 <span>महीने के लिए </span>37<span>,</span>1<span>2</span>0 <span>करोड़ रुपए का जो लेखानुदान पेश किया है, उसमें इन मदों में ज्यादा प्रावधान किए गए हैं। बजट के आंकड़ों को देखा जाए तो पता चलता है कि शिक्षा पर ज्यादा फोकस किया गया है। शिक्षा के लिए इस लेखानुदान में </span>4<span>,</span>643 <span>करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा कृषि के लिए </span>2<span>,</span>367 <span>करोड़, सामाजिक सुरक्षा तथा महिला एवं बाल विकास के लिए </span>1<span>,</span>484 <span>करोड़ और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण के लिए </span>1<span>,</span>345 <span>करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। ध्यान देने की बात यह है कि यह प्रावधान सिर्फ अप्रैल-जून तिमाही के लिए हैं। चीमा अभी पूर्ण बजट बना रहे हैं, उससे पता चलेगा कि वादों पर पूरी तरह अमल किया जा रहा है या नहीं।</span></p>
<p>अल्पावधि से मध्यम अवधि तक देखें तो राज्य को 4<span>,</span>788 <span>करोड़ रुपए के ब्याज भुगतान के बावजूद वित्तीय स्थिति को मैनेज करने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए। राज्य पर करीब तीन लाख करोड़ रुपए का कर्ज है जो सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) का </span>45 <span>फ़ीसदी है। करीब दो लाख करोड़ रुपए के सालाना बजट में से </span>20000 <span>करोड़ रुपए ब्याज भुगतान के लिए होंगे। कर्ज की स्थिति ठीक नहीं है, लेकिन यह देखकर कि दूसरे राज्यों के हालात भी लगभग ऐसे ही हैं (सिवाय दिल्ली के), स्थिति को गंभीर नहीं कहा जा सकता। कांग्रेस के वित्त मंत्री मनप्रीत बादल ने तो इस बात पर खुशी जताई थी कि राज्य के कर्ज को </span>2021-22 <span>तक </span>2.73 <span>लाख करोड़ रुपए तक सीमित रखा गया और राज्य उन पर समय पर ब्याज चुकाने में भी सक्षम था। बादल ने इसका श्रेय स्वयं को और कांग्रेस सरकार को दिया था। दूसरी तरफ प्रदेश कांग्रेस के पूर्व प्रमुख नवजोत सिंह सिद्धू ने ही कर्ज को बहुत ज्यादा करार दिया था।</span></p>
<p>दीर्घ काल में देखा जाए तो मुख्य मुद्दा राज्य के आर्थिक ढांचे में है। अगर इस ढांचे में धीरे-धीरे बदलाव नहीं होता है तो हालात आप सरकार के लिए मुश्किल होंगे, खासकर इससे बंधी उम्मीदों को देखते हुए। महंगाई की ऊंची दर को देखते हुए खर्च तेजी से बढ़ेगा तो दूसरी तरफ राजस्व जुटाने के साधन सीमित हैं। पंजाब सरकार की तरफ से केंद्र को हाल ही दिए गए मेमोरेंडम में यह मुद्दा उठाया गया है और जीएसटी मुआवजा तत्काल जारी करने की मांग की गई है।</p>
<p>मेमोरेंडम में कहा गया है पंजाब के ग्रामीण और शहरी दोनों इलाकों के खपत पैटर्न के अध्ययन से पता चलता है कि शहरी इलाकों में प्रति व्यक्ति प्रतिमाह कुल खपत का 56 <span>फ़ीसदी खाद्य पदार्थों, इंधन, बिजली और कपड़ों पर होता है। इन पर या तो जीएसटी नहीं लगता है या जीएसटी की दर कम है। इनका </span>31 <span>फ़ीसदी खर्च सेवाओं पर होता है। सेवाओं पर होने वाले कुल खर्च का </span>22 <span>फीसदी स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्र में जाता है, जिनपर जीएसटी से छूट मिली हुई है।</span></p>
<p>ग्रामीण पंजाब की कहानी भी अलग नहीं है। मेमोरेंडम में कहा गया है कि ग्रामीण इलाकों में प्रति व्यक्ति प्रति माह खपत का 60 <span>फ़ीसदी खाद्य पदार्थों, इंधन, बिजली और कपड़ों पर जाता है, जिन पर या तो जीएसटी नहीं लगती है या जीएसटी की दर कम है। प्रति व्यक्ति प्रति माह कुल खर्च का </span>26 <span>फ़ीसदी सेवाओं पर जाता है। सेवाओं पर होने वाले कुल खर्च का </span>57 <span>फ़ीसदी स्वास्थ्य व शिक्षा पर होता है जिन पर जीएसटी से छूट मिली हुई है।</span></p>
<p>राज्य को मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर में बड़ा जोर लगाने की जरूरत है, लेकिन समस्या यह है कि अगर मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में गंभीरतापूर्वक कार्य किया जाए तब भी नतीजे आने में कई साल लगेंगे। सर्विस सेक्टर में पर्यटन जैसे क्षेत्रों में कम अवधि में नतीजे मिल सकते हैं। राज्य में युवा आबादी का लाभ उठाने के लिए खेती से परे जाकर सोचने की जरूरत है। प्रदेश के लगभग तीन लाख युवा हर साल विदेश जाने की कतार में रहते हैं।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ पंजाब की मान सरकार को वादे पूरे करने के लिए चाहिए वक्त ]]></media:description>
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	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[संविधान सभा की बहस में पंचायतों के बारे में क्या थी डॉ भीमराव आंबेडकर की राय]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/dr-br-ambedkar-dalits-and-panchayats-sidelights-from-the -constituent-assembly-debate.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 14 Apr 2022 11:26:14 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/dr-br-ambedkar-dalits-and-panchayats-sidelights-from-the -constituent-assembly-debate.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>बाबा साहब भीमराव आंबेडकर भारत के महान सपूतों में एक थे। वे सिर्फ सांसद, जाने-माने विद्वान और संविधान विशेषज्ञ ही नहीं बल्कि भारत में दलित उत्थान के बड़े सुधारक भी थे (1)। वे अपनी पूरी जिंदगी ऐसी सामाजिक व्यवस्था स्थापित करने के लिए संघर्ष करते रहे जो स्वाधीनता, समानता और सार्वभौमिक भाईचारे पर आधारित हो। इसके लिए ना सिर्फ समाज के दलित और शोषित वर्ग की आजादी और मुक्ति जरूरी है, बल्कि ऐसे संस्थानों की स्थापना भी जरूरी है जो लोकतांत्रिक होने के साथ-साथ आम जन के नजदीक हो तथा सरकार में विभिन्न स्तरों पर महिलाओं और वंचित वर्ग का प्रतिनिधित्व हो। इसे हासिल करने के लिए विकेंद्रीकृत ग्रामीण गवर्नेंस बहुत महत्वपूर्ण है ताकि समाज के हर व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए सामाजिक आर्थिक विकास का उचित वातावरण तैयार किया जा सके (2)। इस नजरिए से यह देखना बड़ा ही रोचक है कि संविधान सभा में बहस के बाद किस तरह पंचायतें संविधान का हिस्सा बनीं, संविधान में पंचायतों को शामिल करने पर बाबासाहेब के क्या विचार थे और आखिरकार किस तरह ये संस्थान संविधान का हिस्सा बने। इस लेख में इन सवालों पर विचार किया गया है ताकि विद्वानों और शोधकर्ताओं कि इस क्षेत्र में रुचि जगे।</p>
<p>1.संविधान सभा में बहस और पंचायतें</p>
<p>आंबेडकर ने 4 नवंबर 1948 को संविधान सभा में एक प्रस्ताव रखा। मैटकाफ को उद्धृत करते हुए उन्होंने लिखा, "एक के बाद एक राजवंश खत्म हो जाते हैं, एक के बाद दूसरी क्रांति आती है, हिंदू, पठान, मुगल, मराठा, सिख, अंग्रेज सभी बारी बारी से मालिक बनते हैं, लेकिन ग्रामीण समुदाय वहीं रहते हैं। मुसीबत के समय वे एकजुट होकर अपना बचाव करते हैं। जब शत्रु की सेना गुजरती है तो यह ग्राम समुदाय अपने मवेशियों को बाड़े के भीतर रखते हैं और शत्रु सेना को गुजर जाने देते है।" (जाकर, 1964, पेज 35) मैटकाफ के उद्धरण के बाद आंबेडकर ने टिप्पणी की, "ग्राम समुदायों ने अपने देश के इतिहास में इस तरह की भूमिका निभाई है। यह जानकर किसी के मन में उनके प्रति गर्व का क्या भाव आता है? तमाम विपत्तियों में उन्होंने अपने आप को सुरक्षित रखा। लेकिन जीवित रहने मात्र का कोई मोल नहीं है। सवाल है कि वह किस धरातल पर जीवित रहे। निश्चित रूप से वह एक निचले और खुदगर्ज धरातल पर थे। मेरा मानना है कि यह गांव भारत के लिए तबाही की तरह थे। इसलिए मुझे आश्चर्य होता है कि जो लोग क्षेत्रवाद और संप्रदायिकता का विरोध करते हैं वे गांव के बड़े पैरोकार बनते हैं। स्थानीय बोली, अज्ञानता, संकीर्णता और सांप्रदायिकता के सिवाय गांव और क्या है? मुझे खुशी है कि संविधान के ड्राफ्ट में गांव को खत्म कर व्यक्ति को इकाई माना गया है। (वही, 1964, पेज 35)</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/04/image_750x_6257b767a5972.jpg" alt="" /></p>
<p>संविधान सभा में आंबेडकर के इन शब्दों के कहने के बाद ग्राम पंचायत के मुद्दे पर बहस शुरू हुई। संविधान सभा के कुछ सदस्यों के विचार यहां दिए जा रहे हैं ताकि यह समझा जा सके कि संविधान में पंचायतों को कैसे शामिल किया गया।</p>
<p>दामोदर स्वरूप सेठ ने स्थानीय स्व सरकार की वकालत की। प्रोफेसर एस एल सक्सेना ने ग्राम स्वराज या ग्राम पंचायत के लिए महात्मा गांधी के विचारों का समर्थन किया। एच वी कामत ने भी पंचायतों का समर्थन करते हुए कहा कि अगर पंचायती राज नहीं तो डॉ आंबेडकर गांवों के विकास के लिए और क्या सुझाव देते हैं। के संथानम ने डॉ आंबेडकर के कुछ बातों पर तो सहमति जताई लेकिन उन्होंने यह स्वीकार नहीं किया की ग्राम पंचायत ही सभी राष्ट्रीय समस्याओं की जड़ हैं। आरके सिधवा ने कहा, यह संविधान इस देश में लोकतंत्र के लिए तैयार किया गया है और डॉ आंबेडकर ने स्थानीय निकायों और गांव की अनदेखी कर लोकतंत्र के विचार का ही विरोध किया है। स्थानीय निकाय देश की सामाजिक और आर्थिक जीवन का आधार हैं और अगर इस संविधान में स्थानीय निकायों के लिए कोई जगह नहीं है तो मैं आपसे कहना चाहूंगा कि यह संविधान विचार के काबिल ही नहीं है। (वही, 1964, पेज 39)</p>
<p>डॉ मनमोहन दास ग्राम पंचायत से असहमत तो नहीं थे लेकिन उन्होंने चेताया कि जब तक हमारे गांव के लोगों को शिक्षित ना किया जाए, जब तक वे राजनीतिक रूप से जागरूक ना हों, जब तक वह अपने नागरिक अधिकारों और जिम्मेदारियों से वाकिफ ना हों तब तक ग्राम पंचायत की व्यवस्था उनके लिए फायदेमंद के बजाय नुकसानदायक साबित होगी। (वही, 1964, पेज 40)</p>
<p>प्रो एनजी रंगा ने कहा, हम प्रशासन का केंद्रीकरण चाहते हैं अथवा विकेंद्रीकरण? महात्मा गांधी ने 30 वर्षों तक विकेंद्रीकरण की वकालत की। हम कांग्रेसी होने के तौर पर भी विकेंद्रीकरण को समर्पित हैं। सच तो यह है कि आज पूरी दुनिया विकेंद्रीकरण के पक्ष में है। (वही, 1964, पेज 41)</p>
<p>तमाम सदस्यों के विचारों से यह तो स्पष्ट होता है कि संविधान सभा के लगभग सभी सदस्य संविधान में पंचायत को शामिल करने के पक्ष में थे। इसलिए उन्होंने डॉ आंबेडकर के विचारों के प्रति असहमति जताई।</p>
<p>के. संथानम ने 22 नवंबर 1948 को यह प्रस्ताव रखा:-</p>
<p>अनुच्छेद 31 के बाद अनुच्छेद 31ए जोड़ा जाए। राज्य ग्राम पंचायतों को संगठित करने के लिए कदम उठाएंगे और उन्हें वह अधिकार देंगे जो स्वशासन इकाई के तौर पर कार्य करने के लिए आवश्यक होंगे। डॉ आंबेडकर ने तत्काल यह कहकर संशोधन प्रस्ताव का समर्थन किया कि मुझे और कुछ नहीं जोड़ना है। इस तरह प्रस्ताव को सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया और अनुच्छेद 31ए अंततः राज्य नीति के डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स के हिस्से के रूप में अनुच्छेद 40 बना। (वही, 1964, पेज 43)</p>
<p>यहां यह बात गौर करने लायक है कि पंचायतों की आलोचना करने वाले आंबेडकर संविधान में ग्राम पंचायतों को शामिल करने के संथानम के प्रस्ताव पर सहमत हुए।&nbsp;</p>
<p>2.पंचायतों पर 1932 में डॉ आंबेडकर के विचार</p>
<p>यह जानना रोचक है कि डॉ आंबेडकर ने 1948 में संविधान सभा की बहस में पंचायतों में कमजोर वर्ग के लिए जगह की वकालत क्यों नहीं की, जबकि 16 साल पहले 6 अक्टूबर 1932 को जब बांबे असेंबली में ग्राम पंचायत विधेयक पर चर्चा हो रही थी तब उन्होंने वंचित वर्ग के लिए विशेष प्रावधान की खातिर अधिकारों के हस्तांतरण की नीति का समर्थन किया था। तब डॉ आंबेडकर ने कहा था, मैं यह कहना चाहूंगा कि अधिकार सौंपने की नीति में सिद्धांत रूप से मेरी कोई आपत्ति नहीं है। अगर ऐसा लगता है कि इस प्रेसिडेंसी के स्थानीय बोर्ड पर स्थानीय बोर्ड अधिनियम के तहत बताए गए कार्यों के कारण अधिक काम का बोझ होता है और वह अपने काम को प्रभावी तरीके से अंजाम नहीं दे पा रहे हैं, तब मैं कहना चाहूंगा कि स्थानीय बोर्ड के बोझ को कम करने के लिए ग्राम पंचायतों की स्थापना की जाए। (मून, 1982, पेज 106)</p>
<p>जहां तक वंचित वर्ग के लिए स्थान की बात है तो डॉ आंबेडकर ने टिप्पणी की, "बिल में यह प्रावधान है कि ग्राम पंचायत को सभी वयस्क पुरुष और स्त्रियां मिलकर चुनें। लेकिन मैं यहां वंचित वर्गों की तरफ से बोलते हुए यह स्पष्ट करना चाहूंगा कि मुझे इस बात में जरा भी संदेह नहीं कि वयस्क मताधिकार हमारे लिए पर्याप्त नहीं हैं। माननीय मंत्री महोदय यह बात भूल रहे हैं कि हर गांव में वंचित वर्ग अल्प संख्या में हैं। उनकी स्थिति बेहद खराब है। ऐसे में यह मान लेना ठीक नहीं कि वह वयस्क मताधिकार को सहर्ष स्वीकार करेंगे। मेरा मानना है कि सिर्फ वयस्क मताधिकार से अल्पसंख्यक बहुसंख्यक नहीं हो जाएंगे।</p>
<p>इसलिए मैं यह कहने को बाध्य हूं कि यदि पंचायत गठित की जाती हैं तो उनमें अल्पसंख्यकों के लिए विशेष प्रतिनिधित्व होना चाहिए। किसी भी सूरत में वंचित वर्गों के लिए विशेष स्थान होना चाहिए। मैं तब तक भारत में स्वशासन के सिद्धांत को स्वीकार नहीं कर सकता जब तक प्रत्येक स्वशासन संस्थान में वंचित वर्ग को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए विशेष प्रतिनिधित्व का प्रावधान ना किया जाए।</p>
<p>3.आलोचना</p>
<p>शुरुआत में डॉ आंबेडकर ने संविधान में पंचायतों को शामिल करने का विरोध किया लेकिन जब संविधान सभा के ज्यादातर सदस्यों ने पंचायतों के पक्ष में तर्क दिया और संथानम ने पंचायतों को राज्यों के डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स में शामिल करने का प्रस्ताव रखा तो डॉ आंबेडकर पंचायतों को संविधान में शामिल करने पर राजी हो गए। उनके सहमत होने की एक वजह शायद यह रही होगी कि उन्होंने यह सोचा होगा कि पंचायतें राज्य सरकारों की इच्छा पर निर्भर करेंगी, इसलिए यह संस्थान मजबूत नहीं होंगे और अनुच्छेद 40 के प्रावधान संविधान तक ही सीमित रहेंगे। 1932 के बाद पंचायतों के कामकाज के अनुभव से डॉ आंबेडकर को एहसास हुआ होगा कि अगर पंचायतों को राज्यों के डायरेक्टिव प्रिंसिपल का हिस्सा बनाया जाए तो राजनीतिक नेता और अफसर उन्हें मजबूत नहीं होने देंगे क्योंकि वह खुद नहीं चाहेंगे कि पंचायतें मजबूत हों।</p>
<p>आजादी के बाद पंचायतों के कामकाज से यह स्पष्ट है कि उन्होंने ग्रामीणों के विकास में कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं निभाई है। जिन नेताओं ने संविधान सभा में ग्राम पंचायत के विकास के पक्ष में बढ़-चढ़कर बहस की थी उन्होंने एक दशक तक पंचायतों के विकास में कोई सक्रिय योगदान नहीं किया। (जाकर, 1964, पेज 45)</p>
<p>हालांकि इस लेखक का मानना है कि डॉ आंबेडकर को संविधान के भाग 9 में पंचायतों को रखने के पक्ष में बहस करनी चाहिए थी। उन्हें अनुसूचित जाति, जनजाति और महिलाओं को इन संस्थानों में पर्याप्त स्थान देने के प्रावधान के लिए संविधान सभा को सुझाव देना चाहिए था। अगर ऐसा उसी समय किया जाता, जैसा संविधान लागू होने के 43 वर्षों बाद 73वें संविधान संशोधन के तहत किया गया, तो आज वंचित वर्ग की स्थिति बेहतर होती। संभव है कि डॉ आंबेडकर ने पंचायतों में समाज के समृद्ध वर्ग के अधिकारों और शक्तियों को तथा वंचित वर्ग की दुर्दशा को देखा हो, इसलिए वह पंचायतों के खिलाफ थे। लेकिन इसके लिए वह प्रतिनिधि चुनने की क्षमता विकसित करने के पक्ष में बहस कर सकते थे, खासकर वंचित वर्ग के लिए।</p>
<p>अंत में यही कहा जा सकता है कि डॉ आंबेडकर ने जो कहा था पंचायतों के कामकाज में आखिरकार वही दिख रहा है। अगर डॉ आंबेडकर की बातों को हमें गलत साबित करना है तो उसके लिए पंचायतों को भारतीय संघवाद का अभिन्न अंग बनाना पड़ेगा। जिस तरह संविधान में केंद्र और राज्यों के अधिकार अलग-अलग बताए गए हैं उसी तरह राज्यों और पंचायतों के अधिकारों का भी बंटवारा होना चाहिए। पंचायतों को राज्य की विधायिका की दया पर नहीं छोड़ा जाना चाहिए, संविधान में उनके लिए अधिकार निर्धारित किए जाने चाहिए।</p>
<p><em><strong>(लेखक इंडियन इकोनामिक सर्विस के पूर्व अधिकारी और स्थानीय गवर्नेंस के विशेषज्ञ हैं)</strong></em></p>
<p>&mdash;--</p>
<p>1.दलित का अभिप्राय ग्रामीण भारत के दमित, शोषित और वंचित वर्ग से है। मोटे तौर पर अनुसूचित जाति, जनजाति, अत्यधिक पिछड़ा वर्ग और महिलाएं इस परिभाषा के दायरे में आती हैं।&nbsp;</p>
<p>2.गवर्नेंस का अर्थ आमजन, सिविल सोसाइटी, सरकार और बाजार को शामिल करते हुए सामूहिक कार्य है। यहां विकेंद्रीकृत ग्रामीण स्थानीय गवर्नेंस का मतलब पंचायती राज संस्थानों के माध्यम से गवर्नेंस है।</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ संविधान सभा की बहस में पंचायतों के बारे में क्या थी डॉ भीमराव आंबेडकर की राय ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[चुनाव में महंगाई कोई मुद्दा नहीं? इतनी जल्दी नतीजे पर न पहुंचें]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/inflation-is-a-non-issue-in-elections-do-not-rush-to-conclusion.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 28 Mar 2022 17:00:44 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/inflation-is-a-non-issue-in-elections-do-not-rush-to-conclusion.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के लगातार दूसरी बार सरकार बनाने के बाद यह धारणा मजबूत होने लगी है कि लोगों के जीवन से जुड़े महंगाई जैसे मुद्दे चुनाव में क्या कोई मायने नहीं रखते हैं! भारतीय जनता पार्टी ने राजनीतिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण उत्तर प्रदेश के अलावा तीन और राज्यों उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में सत्ता में वापसी की है।</p>
<p>समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने महंगाई और बेरोजगारी के मुद्दे उठाए। उन्हें ज्यादा वोट शेयर के रूप में इसका लाभ भी मिला लेकिन वह भाजपा की चुनावी मशीनरी का मुकाबला नहीं कर सके जिसका नेतृत्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके भरोसेमंद गृह मंत्री अमित शाह के हाथों में था। अंततः पेट के सवाल पर ध्रुवीकरण का अभियान भारी पड़ा।</p>
<p>तो क्या हम यह कह सकते हैं कि सत्तारूढ़ दल को महंगाई की कोई राजनीतिक कीमत कभी नहीं चुकानी पड़ेगी? मीडिया के 24 घंटे चलने वाले शोर, जिसमें सोशल मीडिया भी शामिल है, में चुनाव अब बिल्कुल अलग तरह का खेल हो गए हैं। अब चुनाव इस आधार पर जीते जाते हैं कि जमीनी हकीकत से ज्यादा लोगों की धारणाओं को अपने पक्ष में करने के लिए आपने कैसी रणनीति बनाई है।</p>
<p>जो लोग यह तर्क देते हैं कि पेट्रोल के बढ़ते दाम या घर का बजट बढ़ना मतदाताओं के लिए कोई मुद्दा नहीं है, उनकी बात कम से कम आंशिक रूप से तो ठीक है ही। लेकिन हमें पूरी तरह इस नतीजे पर पहुंचने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। आप पंजाब को देखिए जहां आम आदमी पार्टी ने महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दे उठाकर तथा खराब गवर्नेंस के मुद्दे पर प्रदेश की दो प्रमुख पार्टियों को झाड़ू मार दिया।&nbsp;</p>
<p>मूल्य वृद्धि के विषय पर बात करें तो हालात वास्तव में खराब हैं। थोक मूल्य सूचकांक लगातार 11 महीने से दहाई अंकों में है। खुदरा महंगाई भी 6 फ़ीसदी से अधिक है जो रिजर्व बैंक के 4 फ़ीसदी (2 फ़ीसदी कम या ज्यादा) के लक्ष्य से ऊपर है। रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्ति कांत दास ने भी महंगाई के परेशान करने वाले आंकड़ों को यह कह कर खारिज करने की आदत बना ली है कि यह आंकड़े ट्रांजिटरी हैं। कोई नहीं जानता कि इस शब्द के जरिए वे क्या कहना चाहते हैं। हम जानते हैं कि ट्रांजिटरी शब्द का अर्थ अस्थाई या गुजरता हुआ होता है। 130 करोड़ भारतीयों की अर्थव्यवस्था एक साल से ऊंची महंगाई दर से जूझ रही है और आरबीआई गवर्नर इसे ट्रांजिटरी कहकर खारिज कर रहे हैं। दास जानते हैं कि वह क्या कह रहे हैं लेकिन वह बढ़ती कीमतों की अनदेखी करना जारी रखेंगे। जबकि इस महंगाई ने छोटी बचत करने वालों के रिटर्न को नेगेटिव बना दिया है और आम परिवार इसकी पीड़ा झेल रहे हैं।</p>
<p>फरवरी 2022 में थोक महंगाई दर 13.11 फ़ीसदी और खुदरा महंगाई दर 6.07 फ़ीसदी थी। यह स्थिति तब है जब नवंबर 2021 से हाल तक पेट्रोल और डीजल के दामों में बढ़ोतरी नहीं की गई थी। अलिखित आदेश हटने के बाद इनके दाम फिर से बढ़ने लगे हैं और विभिन्न राज्यों में इनकी कीमत 100 रुपए प्रति लीटर के आसपास पहुंच गई है। लगभग 5 महीने तक पेट्रोल और डीजल के दाम ना बढ़ने के बावजूद फरवरी में ईंधन और बिजली सेगमेंट की थोक महंगाई 31.5 फ़ीसदी थी। पेट्रोल-डीजल के दामों में बढ़ोतरी एक बार फिर शुरू होने के बाद जब मार्च आंकड़े आएंगे तब देखिए क्या होता है।</p>
<p>इस मूल्यवृद्धि की एक और खास बात है कि सभी सेगमेंट इससे प्रभावित हैं, चाहे वह प्राइमरी वस्तुओं का हो (13.39 फ़ीसदी), मैन्युफैक्चरिंग हो (9.84 फ़ीसदी) या खाद्य पदार्थ हो (8.47 फ़ीसदी)। कोई यह सवाल कर सकता है कि इस विश्लेषण में खुदरा महंगाई के बजाय थोक महंगाई पर इतना फोकस क्यों किया गया है? रिजर्व बैंक तो पॉलिसी दरें तय करते समय खुदरा महंगाई को ध्यान में रखता है। इसका जवाब यह है कि किसी भी सप्लाई चेन का शुरुआती बिंदु थोक स्तर पर ही होता है। अगर वहां ऊंची कीमतें लगातार बनी रहीं तो उसका असर उपभोक्ताओं पर पड़ना तय है।&nbsp;</p>
<p>थोक महंगाई और खुदरा महंगाई के बीच इतना अंतर इतने लंबे समय तक पहले कभी नहीं रहा। इसके दो कारण हो सकते हैं। पहला, कोविड-19 महामारी का असर कम होने और प्रतिबंध हटने के बाद भी सप्लाई चेन अभी तक बाधित है और दूसरा, कम मांग के कारण खुदरा व्यापारियों की स्थिति खराब है। हम एक ऐसी परिस्थिति से गुजर रहे हैं जहां मांग बढ़ने की वजह से महंगाई ज्यादा नहीं है, बल्कि महंगाई ऐसे कारणों से है जिनकी व्याख्या करना मुश्किल है।</p>
<p>आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि इंडस्ट्री को बढ़ती कीमतों का फायदा नहीं हो रहा है। वह ऐसी परिस्थिति का सामना कर रही है जहां कच्चे माल की लागत तो काफी बढ़ गई है लेकिन दूसरी तरफ उत्पादन नहीं बढ़ पा रहा है। जनवरी में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक मुश्किल से 1.3 फ़ीसदी बढ़ा है। थोक महंगाई और खुदरा महंगाई के बीच एक और अंतर यह है कि थोक महंगाई में मैन्युफैक्चरिंग का वेटेज 64 फ़ीसदी है, खुदरा महंगाई में सबसे अधिक 46 फ़ीसदी वेटेज खाने पीने की चीजों को दिया गया है।</p>
<p>औद्योगिक महंगाई का मुख्य कारण बेसिक मेटल, टेक्सटाइल, कागज और उसके उत्पाद, केमिकल और इसके उत्पाद हैं। थोक मंडियों में अनाज, तिलहन और रसोई में इस्तेमाल होने वाले अन्य चीजों के दाम भी काफी ऊंचे हैं। तिलहन के दाम 22.88 फ़ीसदी, गेहूं के 11.03 फ़ीसदी और सब्जियों के 26.93 फ़ीसदी बढ़े हैं।</p>
<p>चार राज्यों के चुनाव नतीजों पर महंगाई का असर भले ना दिखता हो, इसे मुद्दा के रूप में स्वीकार ना करना आत्म संतुष्टि के सिवाय और कुछ नहीं।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ चुनाव में महंगाई कोई मुद्दा नहीं? इतनी जल्दी नतीजे पर न पहुंचें ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[क्यों महत्वपूर्ण है भारत&amp;#45;अमीरात आर्थिक समझौता, इससे कैसे बढ़ेगा निर्यात]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/why-india-uae-cepa-is-important-in-increasing-export-from-india.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 07 Mar 2022 12:21:06 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
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        <description><![CDATA[ <p style="margin: 0in 0in 12.0pt 0in;"><span style="font-family: 'Mangal','serif'; color: black;" lang="HI">संयुक्त अरब अमीरात के साथ भारत का व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (सीईपीए) हाल ही पूरा हुआ है। इसे इस लिहाज से उल्लेखनीय माना जाना चाहिए कि इसमें कई बातें पहली बार हुई हैं। </span><span style="font-family: 'Mangal','serif'; color: black;">2019 <span lang="HI">के क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (आरसीईपी) के बाद पहली बार भारत सरकार ने आर्थिक सहयोग समझौते (ईसीए) में तेजी दिखाई है। भारत और अमीरात के बीच सीईपीए पहला ईसीए है जिसपर एक दशक से भी ज्यादा समय में भारत ने अमल किया है। इससे पहले </span>2011 <span lang="HI">में जापान के साथ सीईपीए हुआ था। यह खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के किसी सदस्य के साथ भारत का पहला ईसीए है। भारत सरकार कम से कम सात और ईसीए करना चाहती है और अमीरात के साथ हुआ सीईपीए उस दिशा में पहला कदम है। इसमें ऑस्ट्रेलिया के साथ अर्ली हार्वेस्ट डील में शामिल है जिसके अगले कुछ हफ्तों में पूरा हो जाने की उम्मीद है।</span></span><o:p></o:p></p>
<p style="margin: 12.0pt 0in 12.0pt 0in;"><span style="white-space: pre-wrap;"><span style="font-family: 'Mangal','serif'; color: black;" lang="HI">इस समय जिन ईसीए पर वार्ता चल रही है उन्हें पूरा करने में सरकार जल्दबाजी में नजर आती है। यह उस धारणा के विपरीत भी होगा कि भारत इस तरह की वार्ताओं में बेहद सुस्त गति से आगे बढ़ता है। अतीत की वार्ताओं में डिजिटल इकोनॉमी और सरकारी खरीद जैसे विषयों को सरकार दृढ़ता से बाहर रखती आई थी</span><span style="font-family: 'Mangal','serif'; color: black;">, <span lang="HI">लेकिन भारत-अमीरात सीईपीए में इसे शामिल किया गया है। यह इस बात का संकेत हो सकता है की ऐसी वार्ताओं में सरकार लचीला रुख अपनाने के लिए तैयार है। यह लचीलापन श्रम और पर्यावरण मानकों के मामले में भी दिखेगा या नहीं, अभी यह नजर आना बाकी है। यूरोपियन यूनियन और इंग्लैंड के साथ संभावित सीईपीए में वे देश इन मुद्दों को रखना चाहते हैं।</span></span></span><o:p></o:p></p>
<p style="margin: 12.0pt 0in 12.0pt 0in;"><span style="white-space: pre-wrap;"><span style="font-family: 'Mangal','serif'; color: black;" lang="HI">संयुक्त अरब अमीरात के साथ सीईपीए तीन कारणों से महत्वपूर्ण है। पहला तो यह कि अमीरात ना सिर्फ मध्य पूर्व एवं उत्तर अफ्रीका (मेना) क्षेत्र के लिए गेटवे की तरह काम करता है, बल्कि अफ्रीका के अन्य क्षेत्रों के लिए भी। भारत सरकार ने भी अमीरात की भौगोलिक स्थिति के फायदे को समझा है जो फार्मा प्रोडक्ट के लिए ग्लोबल लॉजिस्टिक सेंटर के रूप में काम कर सकता है। अमीरात के पास तकनीकी रूप से एडवांस ट्रांसपोर्ट और स्टोरेज सुविधाएं उपलब्ध हैं और फार्मा प्रोडक्ट भारत के प्रमुख निर्यात आइटम में शामिल है। संयुक्त अरब अमीरात </span><span style="font-family: 'Mangal','serif'; color: black;">2030 <span lang="HI">तक फार्मा प्रोडक्ट का ग्लोबल डिस्ट्रीब्यूशन हब बनने की तैयारी कर रहा है और भारत सरकार का मानना है कि इससे अन्य बाजारों तक भारतीय प्रोडक्ट की पहुंच बढ़ाने में मदद मिलेगी।</span></span></span><o:p></o:p></p>
<p style="margin: 12.0pt 0in 12.0pt 0in;"><span style="white-space: pre-wrap;"><span style="font-family: 'Mangal','serif'; color: black;" lang="HI">सीईपीए का दूसरा फायदा यह है के इससे उस देश के साथ गिरते व्यापारिक संबंधों को सुधारने में मदद मिलेगी जो </span><span style="font-family: 'Mangal','serif'; color: black;">20<span lang="HI">1</span>2 <span lang="HI">तक भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार था। उस साल भारत और अमीरात के बीच </span>74.8 <span lang="HI">अरब डॉलर का कारोबार हुआ था। भारत का सबसे अधिक निर्यात संयुक्त अरब अमीरात को ही होता था।</span>&nbsp;2011 <span lang="HI">में अमीरात को सबसे अधिक </span>38.3 <span lang="HI">अरब डॉलर का निर्यात किया गया था।</span>&nbsp;<span lang="HI">उसके बाद निर्यात में लगातार गिरावट आई है। </span>2021 <span lang="HI">में भारत से अमीरात को सिर्फ </span>25.4 <span lang="HI">अरब डॉलर (नॉमिनल) का निर्यात हुआ। यह </span>2010 <span lang="HI">के </span>29.3 <span lang="HI">अरब डॉलर के निर्यात से भी कम है। </span>2021 <span lang="HI">में कोविड-</span>19 <span lang="HI">का असर खत्म होने के बाद भारत से निर्यात में तेजी से बढ़ोतरी देखने को मिली, लेकिन अमीरात को निर्यात नहीं बढ़ा। इसलिए सीईपीए भारत के लिए एक मौका है कि वह अपने इस पुराने सबसे बड़े निर्यात बाजार तक पहुंच बढ़ाने के अवसरों को खंगाले और बाधाओं को दूर करें।</span></span></span><o:p></o:p></p>
<p style="margin: 12.0pt 0in 12.0pt 0in;"><span style="white-space: pre-wrap;"><span style="font-family: 'Mangal','serif'; color: black;" lang="HI">तीसरा लाभ यह है कि भारत जीसीसी सदस्य देशों के साथ अपने रिश्तों को प्रगाढ़ बना सकता है। भारत ने </span><span style="font-family: 'Mangal','serif'; color: black;">2004 <span lang="HI">में इस समूह के साथ फ्रेमवर्क एग्रीमेंट ऑन इकोनॉमिक कोऑपरेशन पर दस्तखत किए थे जिसका मकसद मुक्त व्यापार समझौते को अंजाम देना था। भारत और संयुक्त अरब अमीरात के बीच सीईपीए से उस मुक्त व्यापार समझौते की बातचीत नए सिरे से शुरू की जा सकती है।</span></span></span><o:p></o:p></p>
<p style="margin: 12.0pt 0in 12.0pt 0in;"><span style="white-space: pre-wrap;"><span style="font-family: 'Mangal','serif'; color: black;" lang="HI">अमीरात के साथ सीईपीए इस साल </span><span style="font-family: 'Mangal','serif'; color: black;">1 <span lang="HI">मई से लागू हो जाएगा और सरकार अमीरात के बाजार में भारत की पहुंच को लेकर काफी आशान्वित है। ऐसा इसलिए क्योंकि अमीरात ने </span>97 <span lang="HI">फ़ीसदी टैरिफ लाइन, यानी वस्तुओं पर आयात शुल्क में छूट देने का ऑफर दिया है। यानी जिस दिन समझौता लागू होगा उसी दिन भारत के </span>90 <span lang="HI">फ़ीसदी निर्यात (मूल्य के लिहाज से) पर वहां कोई शुल्क नहीं लगेगा। अगले </span>5 <span lang="HI">से </span>10 <span lang="HI">वर्षों में भारत के </span>99 <span lang="HI">फ़ीसदी निर्यात पर अमीरात में कोई शुल्क नहीं लगेगा। माना जा रहा है कि अमीरात की तरफ से दी गई इस छूट से दोनों देशों के बीच व्यापार अगले </span>5 <span lang="HI">वर्षों में 100 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा। पिछले साल द्विपक्षीय व्यापार </span>68.4 <span lang="HI">अरब डॉलर का था। सरकार के मुताबिक जो सेक्टर सबसे अधिक फायदे में रहेंगे उन में जेम्स और ज्वेलरी</span>, <span lang="HI">टैक्सटाइल, लेदर, फुटवियर, स्पोर्ट्स गुड्स, प्लास्टिक, फर्नीचर, कृषि और वुड प्रोडक्ट, इंजीनियरिंग प्रोडक्ट, फार्मास्युटिकल्स, मेडिकल डिवाइस और ऑटोमोबाइल शामिल हैं। अभी संयुक्त अरब अमीरात को भारत से होने वाले कुल निर्यात का दो तिहाई पेट्रोलियम प्रोडक्ट, जेम्स एंड ज्वेलरी, अपैरल, आयरन और स्टील और उनके प्रोडक्ट तथा दूरसंचार उपकरणों का होता है। भारत के कुल निर्यात में इन वस्तुओं की </span>5 <span lang="HI">फ़ीसदी से अधिक हिस्सेदारी है। यही कारण है कि सीईपीए लागू होने के बाद भारत अपने निर्यात बास्केट में व्यापक बदलाव की उम्मीद कर रहा है।</span></span></span><o:p></o:p></p>
<p style="margin: 12.0pt 0in 12.0pt 0in;"><span style="white-space: pre-wrap;"><span style="font-family: 'Mangal','serif'; color: black;" lang="HI">सवाल है कि संयुक्त अरब अमीरात के आयात शुल्क में छूट दिए जाने से भारत का निर्यात बढ़ने की उम्मीद कितनी वास्तविक है। कहा जा सकता है कि भारत सरकार की उम्मीदों का पूरा होना दो बातों पर निर्भर करता है। पहला, सीईपीए लागू होने के बाद भारतीय उत्पादों को कितना वरीयता मार्जिन (प्रेफरेंस मार्जिन) मिलता है और दूसरा, रेगुलेटरी बाधाओं को कितने प्रभावी तरीके से दूर किया जाता है। प्रेफरेंस मार्जिन का मतलब मौजूदा शुल्क (मोस्ट फेवर्ड नेशन टैरिफ) और अमीरात की तरफ से भारत को ऑफर किए गए प्रेफरेंशियल टैरिफ के बीच अंतर से है। यहां गौर करने वाली बात यह है कि यह अंतर बहुत ज्यादा नहीं है। संयुक्त अरब अमीरात के एमएफएन टैरिफ पर विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के आंकड़ों के मुताबिक अमीरात जितनी वस्तुओं का आयात करता है उनमें से </span><span style="font-family: 'Mangal','serif'; color: black;">87.2 <span lang="HI">फ़ीसदी पर </span>5 <span lang="HI">फ़ीसदी आयात शुल्क लगता है और </span>11.2 <span lang="HI">फ़ीसदी पर कोई शुल्क नहीं लगता। बाकी बची </span>1.6 <span lang="HI">फ़ीसदी वस्तुओं पर ही </span>100 <span lang="HI">फ़ीसदी शुल्क लागू होता है। इनमें तंबाकू उत्पाद ज्यादा हैं जो विशेष वस्तु (प्रतिबंधित) श्रेणी में आते हैं। इसका मतलब यह है कि ज्यादातर उत्पादों पर प्रेफरेंस मार्जिन </span>5 <span lang="HI">फ़ीसदी से अधिक नहीं होगा। इसके अलावा, अमीरात ने ज्यादातर फार्मा प्रोडक्ट पर मोस्ट फेवर्ड नेशन के आधार पर आयात शुल्क पहले ही खत्म कर दिया है। दूसरे शब्दों में कहें तो अमीरात की तरफ से शुल्क खत्म किया जाना भारत की निर्यात बढ़ोतरी में बहुत बड़ी भूमिका नहीं निभाने वाला। इसमें बड़ी भूमिका रेगुलेटरी बाधाएं दूर करने की हो सकती हैं।</span></span></span><o:p></o:p></p>
<p style="margin: 12.0pt 0in 12.0pt 0in;"><span style="white-space: pre-wrap;"><span style="font-family: 'Mangal','serif'; color: black;" lang="HI">इस संदर्भ में एक सकारात्मक उपाय फार्मास्युटिकल्स से जुड़ा है, जिससे भारतीय उत्पादों की बाजार पहुंच बढ़ जाएगी। इसमें यह प्रावधान किया गया है कि अमेरिका, इंग्लैंड, यूरोपियन यूनियन और जापान के रेगुलेटर जिन उत्पादों को स्वीकृति दे चुके होंगे उन उत्पादों को अमीरात में </span><span style="font-family: 'Mangal','serif'; color: black;">90 <span lang="HI">दिनों के भीतर ऑटोमेटिक रजिस्ट्रेशन और मार्केटिंग ऑथराइजेशन की सुविधा मिल जाएगी। भारत का निर्यात बढ़ाने के लिए इस तरह के कदम दूसरे क्षेत्रों में भी उठाने की जरूरत है।</span></span></span><o:p></o:p></p>
<p style="margin: 12.0pt 0in 12.0pt 0in;"><span style="white-space: pre-wrap;"><span style="font-family: 'Mangal','serif'; color: black;" lang="HI">अभी तक भारत सरकार ने सिर्फ उन फायदों के बारे में बताया है जो अमीरात की शुल्क कटौती से भारत को मिलेंगे। भारत को किन वस्तुओं पर और कितना शुल्क कम करना पड़ेगा इसके बारे में कोई स्पष्टता अभी तक नहीं दी गई है। सरकार जानती है कि यह किसी भी ईसीए का एक महत्वपूर्ण पहलू होता है क्योंकि इसी से तय होता है कि भारत अपने बाजार की पहुंच किस हद तक उपलब्ध कराएगा और भारत के शुल्क घटाने से अमीरात के साथ जो व्यापार असंतुलन बढ़ रहा है आने वाले दिनों में क्या वह और बढ़ेगा।</span></span><o:p></o:p></p>
<p style="margin: 12.0pt 0in 12.0pt 0in;"><span style="white-space: pre-wrap;"><span style="font-family: 'Mangal','serif'; color: black;" lang="HI">संयुक्त अरब अमीरात जैसे पुनर्निर्यात करने वाले किसी देश के साथ मुक्त व्यापार समझौता भी एक बड़ी समस्या है। ऐसे में कोई तीसरा देश अमीरात के जरिये भारत द्वारा समझौते के तहत शुल्क दरों में की गई कटौती का फायदा उठाकर अपने उत्पादों का भारत को निर्यात कर सकता है इस तरह के तरीके को सर्कमवेंशन कहा जाता है। हालांकि भारत ने इस तरह आशंका को देखते हुए कुछ संवेदनशील उत्पादों को समझौते के तहत </span><span style="font-family: 'Mangal','serif'; color: black;"><span lang="HI">शुल्क कटौती से बाहर रखा है। जिनमें डेयरी उत्पाद, चाय, कॉफी, रबड़, मसाले, चीनी, तंबाकू उत्पाद, फार्मास्यूटिकल उत्पाद, कुछ रसायन, एलुमिनियम और कॉपर के स्क्रैप, स्टील के कुछ उत्पाद, हेलीकॉप्टर और विमान शामिल हैं।</span></span></span><o:p></o:p></p>
<p style="margin: 12.0pt 0in 12.0pt 0in;"><span style="white-space: pre-wrap;"><span style="font-family: 'Mangal','serif'; color: black;" lang="HI">इसके अलावा सरकार के पास दो रक्षात्मक उपाय लागू करने का भी अधिकार है। पहला, किसी वस्तु की आयात मांग में अचानक तेजी से बढ़ोतरी होती है तो भारत को अस्थाई सेफगार्ड मेकैनिज्म लागू करने का अधिकार होगा। भारत और अमीरात के बीच सीईपीए पहला समझौता है जिसमें ऐसी व्यवस्था की गई है। दूसरा उपाय रूल ऑफ ओरिजिन का है। अमीरात के साथ सीजीपीए में इसका प्रावधान भी किया गया है। हालांकि इन उपायों पर लगातार निगरानी रखने की जरूरत है ताकि वे प्रभावी रह सकें।</span></span><span lang="HI"><o:p></o:p></span></p>
<p style="margin: 12.0pt 0in 12.0pt 0in;"><span style="white-space: pre-wrap;"><span style="font-family: 'Mangal','serif'; color: black;" lang="HI"><em><strong>(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज के सेंटर फॉर इकोनॉमिक स्टडीज एंड प्लानिंग के प्रोफेसर हैं)</strong></em></span></span></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ क्यों महत्वपूर्ण है भारत-अमीरात आर्थिक समझौता, इससे कैसे बढ़ेगा निर्यात ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[रूस&amp;#45;यूक्रेन संकट से विश्व अर्थव्यवस्था फिर अनिश्चितता के दौर में, हालात और बिगड़ेंगे]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/world-economy-faces-uncertainty-as-russia-invades-ukraine.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 03 Mar 2022 17:55:45 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/world-economy-faces-uncertainty-as-russia-invades-ukraine.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p style="margin: 0in 0in 12.0pt 0in;"><span style="font-family: 'Mangal','serif'; color: black;" lang="HI">पहले से ही लड़खड़ा रही विश्व अर्थव्यवस्था को यूक्रेन पर रूस के हमले ने और विकट स्थिति में ला दिया है। विकासशील देशों में नौकरियां और आमदनी कोविड-</span><span style="font-family: 'Mangal','serif'; color: black;">19 <span lang="HI">से पहले के स्तर से अब भी बहुत नीचे हैं। विकसित देश कई दशकों की सबसे ऊंची महंगाई दर का सामना कर रहे हैं। रूस की सेना के यूक्रेन सीमा पार करने के साथ ही कच्चे तेल के दाम तेजी से बढ़ने लगे</span>,<span lang="HI"> इससे स्थिति और खराब होगी। रूस दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल उत्पादक है। विश्व उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी </span>15.5 <span lang="HI">फ़ीसदी है। प्राकृतिक गैस का यह सबसे बड़ा उत्पादक है। अंतरराष्ट्रीय कच्चा तेल बाजार में व्यवधान की आशंका को देखते हुए ब्रेंट क्रूड के दाम गुरुवार को </span>113 <span lang="HI">डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गए। यह </span>2014 <span lang="HI">के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। ऐसे में जब फिलहाल रूस-यूक्रेन युद्ध फिलहाल खत्म होने के आसार नहीं लग रहे हैं</span>, <span lang="HI">आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमतों में और वृद्धि होने की आशंका है।</span>&nbsp;</span><o:p></o:p></p>
<p style="margin: 12.0pt 0in 12.0pt 0in;"><span style="white-space: pre-wrap;"><span style="font-family: 'Mangal','serif'; color: black;" lang="HI">महंगाई के दबाव ने अनेक देशों में यूक्रेन संकट से पहले ही बजटीय गणित को उलट-पुलट करना शुरू कर दिया था। कच्चे तेल के दाम जिस तेजी से बढ़ रहे हैं उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि यह स्थिति आगे और खराब होगी। ऊंची महंगाई दर ने पूरी दुनिया में उपभोक्ताओं को प्रभावित किया है, उनकी क्रय शक्ति कम हुई है। महंगाई का सबसे अधिक असर समाज के उस वर्ग पर हुआ है जिन्हें महामारी के दौरान नौकरी से हाथ धोना पड़ा था और जिनकी कमाई घट गई थी। इससे पहले कि वे अपना जीवन पटरी पर वापस ला पाते उनके सामने घटती क्रय शक्ति की नई समस्या खड़ी हो गई है।</span></span><o:p></o:p></p>
<p style="margin: 12.0pt 0in 12.0pt 0in;"><span style="white-space: pre-wrap;"><span style="font-family: 'Mangal','serif'; color: black;" lang="HI">भारत जैसे देशों में आय में असमानता पहले ही अस्वीकार्य स्तर पर पहुंच गई थी और अब यह भी स्पष्ट है कि उससे भी बुरा वक्त आने वाला है। तेल की कीमतों का झटका अर्थव्यवस्था के हर सेक्टर पर होगा और अपेक्षाकृत कम आय वाले लोग इससे अधिक प्रभावित होंगे। उपभोक्ताओं की खरीद क्षमता कम होगी तो मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में डिमांड घटेगी। यह सेक्टर पहले ही काफी दबाव में है क्योंकि ज्यादातर उद्योग महामारी से पहले ही मांग में गिरावट का सामना कर रहे थे। इनके सामने मौजूदा समस्याएं तो बरकरार हैं ही</span><span style="font-family: 'Mangal','serif'; color: black;">, <span lang="HI">उन्हें ऊंची इनपुट लागत का भी सामना करना पड़ रहा है जिससे उनके लिए हालात और बिगड़ रहे हैं।</span></span></span><o:p></o:p></p>
<p style="margin: 12.0pt 0in 12.0pt 0in;"><span style="white-space: pre-wrap;"><span style="font-family: 'Mangal','serif'; color: black;" lang="HI">अनेक विकसित देशों में महंगाई कई दशकों के सबसे ऊंचे स्तर पर है और वहां वित्तीय बाजार कई हफ्ते से लगातार अस्थिरता का सामना कर रहे हैं। अमेरिका का केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ब्याज दरें बढ़ाने पर विचार कर रहा है जिससे वैश्विक पूंजी बाजार में बड़ा झटका लग सकता है। निवेशक वित्तीय पूंजी को सुरक्षित जगहों पर लगाना चाहेंगे</span><span style="font-family: 'Mangal','serif'; color: black;">, <span lang="HI">जिसका नतीजा यह होगा कि भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं में व्यापक अनिश्चितता व्याप्त हो जाएगी। इन परिस्थितियों में विदेशी निवेशकों के पैसे निकालने से उभरती अर्थव्यवस्थाओं के ना सिर्फ शेयर बाजार गिरेंगे बल्कि उन्हें लंबे समय तक पूंजी प्रवाह का भी सामना करना पड़ेगा। वहां प्रत्यक्ष विदेशी निवेश भी कम हो सकता है।</span></span></span><o:p></o:p></p>
<p style="margin: 12.0pt 0in 12.0pt 0in;"><span style="white-space: pre-wrap;"><span style="font-family: 'Mangal','serif'; color: black;" lang="HI">यूक्रेन पर रूस के हमले के तत्काल बाद कृषि कमोडिटी के दाम में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला। हालांकि दाम पहले बढ़ने के बाद फिर उनमें गिरावट आई, लेकिन युद्ध जारी रहने से आने वाले हफ्तों और महीनों में स्थितियां और खराब होंगी। रूस और यूक्रेन वैश्विक कमोडिटी बाजार में बड़े खिलाड़ी हैं और युद्ध के हालात में इन देशों से निश्चित रूप से सप्लाई में कमी आएगी। </span><span style="font-family: 'Mangal','serif'; color: black;">2020 <span lang="HI">में रूस और यूक्रेन ने गेहूं के कुल वैश्विक निर्यात में </span>30 <span lang="HI">फ़ीसदी योगदान किया था। मोटे अनाज के कुल वैश्विक निर्यात में इनकी हिस्सेदारी </span>19.4 <span lang="HI">फ़ीसदी और खाद्य तेलों में </span>14 <span lang="HI">फ़ीसदी से अधिक थी। यही नहीं</span>, 2019-20 <span lang="HI">में रासायनिक उर्वरकों की सप्लाई में भी </span>14 <span lang="HI">से </span>16 <span lang="HI">फ़ीसदी हिस्सा रूस का था। वहां से सप्लाई बाधित होने पर भारत समेत अनेक देशों में उर्वरकों की कमी हो सकती है</span>, <span lang="HI">खासकर वे देश जो अभी तक इनके लिए रूस पर निर्भर थे। दुनिया के कोयला बाजार पर भी असर होगा जिसकी सप्लाई में रूस की हिस्सेदारी </span>16 <span lang="HI">फ़ीसदी है। आयरन और स्टील के कुछ प्रोडक्ट में भी रूस के निर्यात का हिस्सा बहुत अधिक है तो जाहिर है कि इस बाजार पर भी असर होगा।</span></span></span><o:p></o:p></p>
<p style="margin: 12.0pt 0in 12.0pt 0in;"><span style="white-space: pre-wrap;"><span style="font-family: 'Mangal','serif'; color: black;" lang="HI">सिवाय कुछ प्रतिबंधों के यूक्रेन में रूस को रोकने के लिए पश्चिमी देशों की कोई ठोस योजना अभी नजर नहीं आती है। इन प्रतिबंधों से पुतिन प्रशासन पर बहुत असर होता अभी तक तो नहीं लग रहा। इसलिए यह उम्मीद करना बेमानी होगी कि प्रतिबंधों से पुतिन रुक जाएंगे। रूस जिन चीजों का बड़े पैमाने पर निर्यात करता है अभी तक पश्चिमी देशों ने उन पर प्रतिबंध नहीं लगाया है। यह रूस के लिए लाभ की स्थिति है। पश्चिमी देश जानते हैं कि अगर इन पर प्रतिबंध लगाया गया तो विश्व अर्थव्यवस्था जो पहले ही संकट के दौर से गुजर रही है</span><span style="font-family: 'Mangal','serif'; color: black;">, <span lang="HI">वह और गहरे गर्त में चली जाएगी। विश्व समुदाय के लिए यह निश्चित रूप से बेहद खराब स्थिति है। ऐसे समय जब दुनिया रूस को यूक्रेन से बाहर निकालने में असहाय दिख रही है</span>, <span lang="HI">आगे अनिश्चितता का दौर और लंबा खिंच सकता है।</span></span></span></p>
<p style="margin: 12.0pt 0in 12.0pt 0in;"><span style="white-space: pre-wrap;"><span style="font-family: 'Mangal','serif'; color: black;"><span lang="HI"><em><strong>(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज के सेंटर फॉर इकोनॉमिक स्टडीज एंड प्लानिंग के प्रोफेसर हैं)</strong></em></span></span></span></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ रूस-यूक्रेन संकट से विश्व अर्थव्यवस्था फिर अनिश्चितता के दौर में, हालात और बिगड़ेंगे ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[उत्तर प्रदेश में सामाजिक न्याय अहम मुद्दा, वोट मांगने आए प्रत्याशियों से इस पर सवाल करें]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/social-justice-is-an-issue-in-up-elections.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 18 Feb 2022 08:03:55 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/social-justice-is-an-issue-in-up-elections.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए दो चरणों के मतदान हो चुके हैं और 20 फरवरी को तीसरे चरण का मतदान होना है। शुरू से ही राजनीतिक पार्टियां सघन प्रचार अभियान चला रही हैं। सोशल मीडिया पर तमाम तरह के कमेंट और वीडियो चल रहे हैं। केंद्र सरकार के ज्यादातर वरिष्ठ मंत्री भी प्रचार अभियान में जुटे हैं और मतदाताओं को रिझाने का प्रयास कर रहे हैं। प्रदेश की राजनीति में ऐसा संभवत: पहली बार हो रहा है। मतदाताओं को अपने पाले में लाने के लिए छोटी-छोटी बातों को भी मुद्दा बनाकर पेश किया जा रहा है। लेकिन जो लोग थोड़े जागरूक हैं वह अपनी बातें ना सिर्फ उठा रहे हैं बल्कि राजनीतिक दलों को भी झुकने के लिए मजबूर कर रहे हैं। ऐसे मतदाताओं में सबसे ऊपर किसान हैं जो आमदनी दोगुनी किए जाने, बजट में किसानों के लिए प्रावधान, रोजगार जैसे मुद्दे लगातार उठा रहे हैं।</p>
<p>सोशल मीडिया पर कुछ वीडियो ऐसे भी चल रहे हैं जिनमें राजा मिहिर भोज गुर्जर की गौतम बुद्ध नगर के दादरी में प्रतिमा से जुड़े विवाद को दिखाया गया है। लेकिन इस चुनाव में साधारण लोगों से जुड़े वास्तविक मुद्दे दरकिनार कर दिए गए हैं। खासतौर से रोजगार, स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाओं और बुनियादी सामाजिक सुविधाओं से जुड़े मुद्दे। यहां विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों से सवाल पूछने के लिए मतदाताओं में जागरूकता पैदा करने के मकसद से उत्तर प्रदेश के 2021-22 के बजट का विश्लेषण किया जा रहा है। इस लेख के तर्कों के लिए पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च के बजट विश्लेषण को आधार बनाया गया है।</p>
<p>2021-22 के उत्तर प्रदेश के बजट में ट्रांसपोर्ट, पुलिस, स्वास्थ्य, परिवार कल्याण, ऊर्जा, समाज कल्याण, पोषण, शहरी विकास, सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण, जल आपूर्ति तथा सैनिटेशन के लिए जो बजट प्रावधान किए गए वह 2020-21 के प्रावधान की तुलना में अधिक है। लेकिन राज्य की अर्थव्यवस्था के कुछ महत्वपूर्ण सेक्टर के लिए किए गए आवंटन पिछले साल की तुलना में कम हैं। ग्रामीण विकास के लिए 2020-21 का बजट आवंटन 31,402 करोड़ रुपए था जिसे 2021-22 के बजट अनुमानों में घटाकर 27,455 करोड़ रुपए कर दिया गया। यानी ग्रामीण विकास के लिए बजट आवंटन 13 फ़ीसदी कम हुआ है। इसके विपरीत हम देखें तो शहरी विकास के लिए बजट आवंटन 17 फ़ीसदी बढ़ा है। यह 2020-21 में 20,461 करोड़ रुपए था जिसे 2021-22 के बजट अनुमान में 23,980 करोड़ रुपए किया गया। अगर इस विभाग के लिए 2020-21 के संशोधित अनुमानों से तुलना करें तो 2021-22 में आवंटन 58 फ़ीसदी अधिक है। इससे पता चलता है कि ग्रामीण इलाकों की तुलना में शहरी विकास को अधिक तवज्जो दी गई है, जबकि शहरी इलाकों की अनेक समस्याएं दरअसल ग्रामीण इलाकों की समस्याओं से ही उपजती हैं। अगर ग्रामीण विकास के लिए उचित रणनीति अपनाई जाए तो बहुत सी समस्याओं का वहीं समाधान हो सकता है। बजट आवंटन से शहरी क्षेत्र की तुलना में ग्रामीण क्षेत्र के प्रति पक्षपात भी दिखता है। विश्लेषण से यह भी पता चलता है कि उत्तर प्रदेश के कुल व्यय में से ग्रामीण विकास पर होने वाला व्यय सिर्फ 5.4 फ़ीसदी है जबकि देश के सभी राज्यों का औसत 6.1 फ़ीसदी है।</p>
<p>कला और संस्कृति समेत शिक्षा की बात करें तो 2021-22 के लिए बजट आवंटन (67,683 करोड़) 2020-21 के बजट आवंटन (64,805 करोड़) की तुलना में अधिक है। लेकिन हकीकत यह है कि पिछले वित्त वर्ष में इसे संशोधित करके 53,043 करोड़ कर दिया गया था। अर्थात पिछले साल इस मद के लिए जो आवंटन बजट में किया गया था वह पूरा खर्च ही नहीं हो सका। उत्तर प्रदेश के कुल बजट का 13.3 फ़ीसदी शिक्षा के लिए आवंटित किया गया। यह देश के सभी राज्यों के 2020-21 के औसत बजट आवंटन (15.8 फ़ीसदी) से कम है। इसी तरह अगर हम कृषि क्षेत्र के लिए किए गए आवंटन पर गौर करें तो पाते हैं कि कृषि और संबद्ध क्षेत्र के लिए उत्तर प्रदेश के बजट में 2.7 फ़ीसदी आवंटन किया गया है। यह सभी राज्यों के औसत आवंटन, 6.3 फ़ीसदी का आधा भी नहीं है।&nbsp;</p>
<p>स्वास्थ्य जनहित से जुड़ा एक अहम मुद्दा है। विश्व बैंक, नीति आयोग और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने हाल ही राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की रैंकिंग पर हेल्दी स्टेट्स प्रोग्रेस इन इंडिया नाम से साझा रिपोर्ट जारी की है। इसमें राज्यों के वासियों के स्वास्थ्य की स्थिति का पता चलता है। देश के 19 बड़े राज्यों में उत्तर प्रदेश सबसे निचले स्थान पर है। इस सूची में केरल का स्थान सर्वोपरि है और तमिलनाडु दूसरे नंबर पर है। ऐसा क्यों है। एक कारण इस क्षेत्र के लिए बजट में कम आवंटन हो सकता है। 2020-21 के बजट अनुमानों की तुलना में 2021-22 का बजट अनुमान 22 फ़ीसदी अधिक है। लेकिन हकीकत यह है कि 2020-21 के संशोधित अनुमानों में स्वास्थ्य के लिए आवंटन 21.53 फ़ीसदी घटा दिया गया।</p>
<p>युवाओं की सबसे बड़ी समस्याओं में एक बेरोजगारी है। इसके अलावा कम रोजगारी (अंडर एंप्लॉयमेंट) की भी समस्या है। कम रोजगारी का मतलब यह है कि युवाओं को उनकी योग्यता हिसाब से नौकरी नहीं मिल रही। उन्हें निचले स्तर की नौकरी करनी पड़ रही है। यह समस्या वैसे तो पूरे प्रदेश में देखी जा सकती है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में अधिक है। प्रदेश की अर्थव्यवस्था में 2019-20 के दौरान कृषि क्षेत्र का योगदान 23 फ़ीसदी, मैन्युफैक्चरिंग का 27 फ़ीसदी और सर्विस सेक्टर का 50 फ़ीसदी था। आंकड़ों से पता चलता है कि 2018-19 की तुलना में 2019-20 के दौरान तीनों सेक्टर का विकास कम हुआ है। विकास का पारंपरिक सिद्धांत कहता है कि सेकेंडरी और टर्शियरी सेक्टर में विकास होने पर इन क्षेत्रों में कृषि क्षेत्र से श्रमिक आते हैं। लेकिन भारत में ऐसा देखने को नहीं मिल रहा है। यहां सेकेंडरी और टर्शियरी सेक्टर या तो पूंजी सघन हो गया है या उनमें मानव श्रम को कम करने वाली टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल होने लगा है। भारत में जो परिस्थितियां हैं उसमें एग्रीबिजनेस और कृषि को केंद्र में रखकर स्थानीय मॉडल विकसित किया जाना चाहिए था। इस समस्या के समाधान के लिए सरकार ने कौन से कदम उठाए हैं, राजनीतिक नेताओं को यह बात मतदाताओं को बतानी चाहिए थी। उसी तरह विपक्ष के नेताओं को भी मतदाताओं को यह बताना चाहिए था कि उन्होंने इस समस्या के समाधान के लिए क्या सुझाव दिए जिन पर सरकार ने अमल नहीं किया। धर्म, जाति और क्षेत्रवाद पर आधारित चुनावी नारों के बजाए प्रचार अभियान में अगर विकास और सामाजिक न्याय के मुद्दे उठाए जाते तो अभियान में परिपक्वता आती।</p>
<p>यह लेख लिखने का एकमात्र मकसद यह है कि मतदाता वास्तविक मुद्दों के प्रति सजग हों और जो भी चुनावी उम्मीदवार उनसे वोट मांगने के लिए आए उनसे इन मुद्दों पर सवाल जवाब करें। वे उम्मीदवार चाहे जिस पार्टी के हों।</p>
<p>(लेखक इंडियन इकोनॉमिक सर्विस के पूर्व अधिकारी हैं)</p>
<p></p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ उत्तर प्रदेश में सामाजिक न्याय अहम मुद्दा, वोट मांगने आए प्रत्याशियों से इस पर सवाल करें ]]></media:description>
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        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[उत्तर प्रदेश चुनाव के बहाने गुर्जर खुद को सशक्त करें]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/as-up-election-is-going-on-gurjars-must-empower-themselves.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 29 Jan 2022 12:35:22 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/as-up-election-is-going-on-gurjars-must-empower-themselves.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत में चुनावों में जातियों की हमेशा अहम भूमिका रही है। हम जाति विहीन समाज की चाहे जितनी बात करें, लेकिन विभिन्न निर्णय लेने का आधार जाति ही होता है। चाहे वह लोकसभा, विधानसभा या पंचायतों के चुनाव हों या नौकरी और सामाजिक एवं आर्थिक उत्थान के लिये विभिन्न कार्यक्रम/योजनाएं हों। यहां हम गुर्जर जाति व उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के सम्बंध में चर्चा करेंगे। गुर्जर उत्तर प्रदेश के अलावा जम्मू-कश्मीर<strong>, </strong>हिमाचल प्रदेश<strong>, </strong>पंजाब<strong>, </strong>हरियाणा<strong>, </strong>उत्तराखंड<strong>, </strong>राजस्थान<strong>, </strong>मध्य प्रदेश<strong>, </strong>गुजरात व छत्तीसगढ़ में भी काफी संख्या में हैं।</p>
<p>राजनीति में जाति की भूमिका पर प्रसिद्ध राजनीतिशास्त्री प्रो. रजनी कोठारी ने कार्य किया है। उनके अलावा डॉ. राम मनोहर लोहिया ने भी सरकार में पिछड़ी जातियों की भागीदारी के लिये कार्य किया था। उनकी समाजवादी पार्टी का नारा था <strong>&lsquo;</strong>संयुक्त समाजवादी पार्टी ने बांधी गांठ, पिछड़े पाएं सौ में साठ<strong>&rsquo;</strong>। अर्थात पिछड़ी जातियों की भागीदारी सरकार में <strong>60</strong> प्रतिशत होनी चाहिये क्योंकि कुल आबादी में उनकी इतनी हिस्सेदारी है। मार्क्सवादी भी जाति के राजनैतिक प्रभाव से नहीं बच सके। <strong>2018</strong> में तेलंगाना के विधानसभा चुनावों में सीपीएम ने वर्ग की बजाय जाति को तवज्जो दिया।</p>
<p>उत्तर प्रदेश में <strong>403 </strong>विधानसभा चुनाव क्षेत्र हैं, इनमें गुर्जर जाति की उपस्थिति <strong>77</strong> चुनाव क्षेत्रों (अर्थात <strong>19</strong> प्रतिशत) में है। इस जाति के विधायकों की संख्या मात्र पांच है, अर्थात सभी चुनाव क्षेत्रों का मात्र एक प्रतिशत। हां, यह बात जरूर है कि गुर्जर मतदाताओं की संख्या विभिन्न चुनाव क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न है। इन <strong>77</strong> चुनाव क्षेत्रों को अध्ययन की दृष्टि से छह वर्गों में विभाजित किया गया है। विभिन्न चुनाव क्षेत्रों के मतदाताओं की संख्या की जानकारी राजनैतिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं से प्राप्त की गई है।</p>
<p>ये छह वर्ग इस प्रकार हैं - 10 हजार आबादी तक, 10 से 20 हजार तक, 20 से 30 हजार तक, 30 से 40 हजार तक, 40 से 50 हजार तक और 50 हजार से अधिक आबादी वाले क्षेत्र। इस वर्गीवरण से यह तथ्य सामने आता है कि जिन चुनाव क्षेत्रों में गुर्जर मतदाताओं की संख्या 50 हजार या उससे अधिक है, वे <strong>19</strong> प्रतिशत हैं। इस <strong>19</strong> प्रतिशत को यदि सीटों की संख्या में बदलें तो यह <strong>15</strong> होती है। इसी तरह, 40 से 50 हजार मतदाता वाले चुनाव क्षेत्र नौ प्रतिशत हैं और उनकी सीटों की संख्या सात बैठती है। जहां मतदाताओं की संख्या 30 से 40 हजार के बीच है<strong>, </strong>ऐसे क्षेत्र आठ प्रतिशत और सीटें छह हैं। 20 से 30 हजार मतदाता वाले क्षेत्र 13 प्रतिशत हैं और सीटों की संख्या <strong>10</strong> है। दस से 20 हजार मतदाता वाले क्षेत्र करीब <strong>30</strong> प्रतिशत हैं और उनकी सीटें <strong>23</strong> होती हैं। दस हजार से कम गुर्जर मतदाता वाली 16 सीटें होती है। इससे स्पष्ट है कि अगर मतदाताओं की संख्या <strong>20</strong> हजार से ऊपर लें तो कम से कम <strong>38</strong> सीटों पर गुर्जर जाति की दावेदारी होनी चाहिए। यानी कम से कम <strong>38</strong> विधायक तो इस समाज के होने ही चाहिए।</p>
<p>भारत में अनेक राजनैतिक दल जातियों पर आधारित हैं। प्रो. आर. विद्यानाथन ने अपनी पुस्तक <strong>&lsquo;</strong>कास्ट ऐज सोशल कैपिटल<strong>&rsquo;</strong> में बताया है कि कर्नाटक में जनता दल (सेकुलर) <strong>&lsquo;</strong>वोक्कालिगा<strong>&rsquo;</strong> जाति पर, तमिलनाडु में एआईएडीएमके <strong>&lsquo;</strong>थवेर<strong>&rsquo;</strong> जाति पर<strong>,</strong> पीएमके <strong>&lsquo;</strong>वन्नियार<strong>&rsquo;</strong> जाति पर, डीएमके <strong>&lsquo;</strong>ओबीसी<strong>-</strong>मुस्लिम<strong>&rsquo;</strong> पर, आन्ध्र प्रदेश में टीडीपी <strong>&lsquo;</strong>कम्मा<strong>&rsquo;</strong> जाति पर<strong>, </strong>महाराष्ट्र में शिवसेना मराठा जाति पर<strong>, </strong>उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी <strong>&lsquo;</strong>यादव<strong>-</strong>मुस्लिम<strong>&rsquo;</strong> पर व बीएसपी अनुसूचित जातियों पर और आरएलडी <strong>&lsquo;</strong>जाट<strong>&rsquo;</strong> जाति पर आधारित है।</p>
<p>इन सभी जातियों से मजबूत स्थिति गुर्जर जाति की है क्योंकि उनकी मौजूदगी उत्तर प्रदेश में ही नहीं, अन्य <strong>10</strong> राज्यों में भी है। यह जाति ओबीसी में होने के साथ-साथ कुछ जगहों पर विमुक्त जाति में है तो कहीं अनुसूचित जनजाति में। इन वजहों से गुर्जर जाति की स्थिति अधिक मजबूत हो जाती है।</p>
<p>विभिन्न राजनैतिक पार्टियों का नाम इस तरह रखा गया है कि जैसे वे ही सामाजिक न्याय एवं आर्थिक विकास की प्रणेता और न्याय व्यवस्था के पुजारी हैं। लेकिन उन पार्टियों को चलाने का आधार तो जाति ही है। उदाहरण के लिये बीएसपी का आधार जाटव जाति है। अगर जाटव सपोर्ट न रहे तो पार्टी धराशायी हो जाएगी। इस पार्टी का वर्चस्व पार्टी धीरे-धीरे कम हो रहा है। उसका कारण भी यही है कि जाटवों में उसका आधार कमजोर हो रहा है। इसी तरह समाजवादी पार्टी में अहीर एवं रालोद में जाट जाति है। इसी मॉडल को गुर्जर जाति को अपनाना है।</p>
<p>गुर्जरों को विभिन्न राजनैतिक दलों का पिछलग्गू न बनकर आधार बनने की जरूरत है। गुर्जर समाज अन्य समाज को अपने साथ लेकर चले, इसके लिए उनमें लीडरशीप विकसित करने की जरूरत है। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश में कुछ विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं जहां गुर्जर विरादरी की संख्या <strong>10,000</strong> मतदाताओं से भी कम है, लेकिन वहां विधायक गुर्जर हैं। इसलिए यहां लीडरशीप महत्वपूर्ण हो जाती है। इसके लिए राजनैतिक नेताओं को <strong>&lsquo;</strong>सामाजिक पूंजी<strong>&rsquo;</strong> का निर्माण करने की जरूरत है। इसके लिये समाज में एसोसिएशन बनाना एवं उनका नेटवर्क करना जरूरी है। दूसरे, उनमें विश्वास पैदा करना है ताकि गुर्जर समाज में उचित समन्वय व सहयोग हो और वही सहयोग वे अन्य जातियों से भी करें। इसके लिए महत्वपूर्ण है कि <strong>&lsquo;</strong>रोटी<strong>&rsquo; </strong>का जो सम्बन्ध समान जातियों में है, उसे <strong>&lsquo;</strong>बेटी<strong>&rsquo; </strong>के सम्बन्ध तक बढ़ाएं। इस काम के लिये गुर्जर समाज के सामाजिक संगठन सामने आएं, वे विभिन्न राजनैतिक दलों के नेताओं को अपने प्लेटफॉर्म पर बुलाएं और गुर्जर जाति के राजनैतिक सशक्तीकरण पर चर्चा करें।</p>
<p>यहां मेरा मकसद जातिवाद को बढ़ाना नहीं, बल्कि कम करना और अंततः खत्म करना है। वह तभी सम्भव है जब गुर्जर जाति अपने आप मजबूत होकर अन्य जातियों से सम्पर्क करेगी। तभी उन्हें पता चलेगा कि अपने समाज को आगे बढ़ाने के लिए अन्य जातियों का सहयोग लेना भी जरूरी है। इस एक जाति की चेतना दूसरी जाति की चेतना के साथ जुड़ कर विभिन्न जातियों को एक वर्ग में परिवर्तित करेगी और कहेगी कि हम सभी का शत्रु एक ही है।</p>
<p>हाल ही में किसान आन्दोलन इसका उदाहरण है। इस आन्दोलन में विभिन्न खेतिहर जातियां शमिल थीं, लेकिन किसी भी जाति ने अपना अलग से आन्दोलन चलाने की बात नहीं कही क्योंकि उनको यह ज्ञान हो गया था कि अगर वे जाति में बंटी रहेंगी तो उनका नुकसान होगा। इसलिए किसान आन्दोलन विभिन्न जातियों का नहीं, बल्कि एक वर्ग संघर्ष के रूप में उभर कर आया। जब गुर्जर जाति में चेतना आएगी तो वह अन्य जातियों में भी चेतना लाकर कहेगी कि हम सब एक वर्ग बन कर राजनैतिक सशक्तीकरण के लिये सत्ता में हिस्सेदारी मांगें।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ उत्तर प्रदेश चुनाव के बहाने गुर्जर खुद को सशक्त करें ]]></media:description>
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	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[सरकार और दलों की केंद्रीकृत व्यवस्था से कद्दावर नेताओं में बेचैनी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/strong-obc-leaders-are-feeling-heat-in-centralised-style-of-politics-and-governance.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 24 Jan 2022 12:53:00 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/strong-obc-leaders-are-feeling-heat-in-centralised-style-of-politics-and-governance.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>हाल ही में भाजपा से पाला बदलने वाले एक राजनेता से रूबरू होने का मौका मिला। उनका दर्द था कि कई दशक तक खुद को राजनीति में प्रभावी बनाये रखकर राजनीति करने का दौर सिमटने का संकट उनके पार्टी बदलने की मुख्य वजह है। उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनावों के ऐन पहले पिछले दिनों अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के कई दिग्गज नेताओं के भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) छोड़ने की यही वजह है। असल में यह किसी एक राजनीतिक दल की बात नहीं, बल्कि अधिकांश दलों में स्थिति लगभग एक जैसी है और वहां अधिकारों का केंद्रीकरण बढ़ रहा है। बात यहां तक सीमिति रहती तो भी ठीक था लेकिन अब यह परिपाटी सरकारों के कामकाज की कार्यप्रणाली में तेजी से शामिल हो रही है। उसके चलते नेताओं को अपने राजनीतिक भविष्य पर खतरा महसूस होने लगा है। इसलिए हाल की पार्टी बदलने की घटनाओं को केवल एक चुनाव और राजनीतिक मौकापरस्ती से आगे देखने की जरूरत है।</p>
<p>केंद्र सरकार और राज्य सरकारों में फैसलों का केंद्रीकरण बहुत तेजी से बढ़ा है। उत्तर प्रदेश सरकार से इस्तीफा देने वाले मंत्री धरम सिंह सैनी ने बयान दिया है कि उनके पास फाइलें ही नहीं आती थीं। हालांकि यह पूरी तरह सही नहीं हो सकता है क्योंकि किसी भी विभाग के फैसलों पर संबंधित मंत्री की मुहर जरूरी है। कहा जा सकता है कि फैसले लेने की पूरी छूट उनको नहीं रही होगी, इसलिए वह यह आरोप लगा रहे हैं। विभागीय फैसलों को लेकर उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य भी कुछ समय पहले नाराजगी जाहिर कर चुके थे। पिछले कुछ बरसों में राज्यों में मुख्यमंत्री कार्यालय और कुछ चुनिंदा बड़े अधिकारियों के स्तर पर ही अधिकांश फैसले लेने का चलन बढ़ा है। उत्तर प्रदेश इसका अपवाद नहीं है। ऐसे में मंत्रियों और चुने हुए प्रतिनिधियों के राजनीतिक लाभ लेने की गुंजाइश कम होती जा रही है। यही वह मसला है जो राजनीतिक रूप से प्रभावी नेताओं को अधिक बेचैन कर रहा है।</p>
<p>अक्सर राजनेता रोजगार देने और विकास परियोजनाओं का श्रेय लेकर अपना आधार मजबूत करते हैं या बचाये रखते हैं। लेकिन जिस तरह से राज्य सरकारें सरकारी नौकरियों में भर्तियां नहीं कर रही हैं, और अगर कर रही हैं तो उसमें काफी देरी हो रही है, उसके चलते केंद्र और राज्य सरकारों के सरकारी विभागों में रिक्त पदों की संख्या बढ़ती जा रही है। इसके साथ ही निजीकरण को लगातार बढ़ावा देने की नीतियों से पिछड़े और अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों के लिए सरकारी नौकरियां सिकुड़ती जा रही हैं। यह बदलाव पिछड़ी जाति के नेताओं के लिए खतरे की घंटी की तरह है, क्योंकि उनके हाथ से अपनी राजनीतिक ताकत के लिए लोगों को लुभाने का एक बड़ा मौका संकुचित होता जा रहा है।</p>
<p>पिछले कुछ बरसों में दूसरे दलों से भाजपा में पिछड़ी जातियों के नेताओं की एंट्री बड़ी तेजी से हुई थी, लेकिन उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के ठीक पहले भाजपा छोड़ने वालों में इन जातियों के नेताओं ने ही तेजी दिखाई। स्वामी प्रसाद मौर्य हों, दारा सिंह चौहान हों या फिर धरम सिंह सैनी हों, इन नेताओं ने पार्टी पर अगड़ी जाति के नेताओं के वर्चस्व का आरोप लगाया। सरकारी अधिकारियों की नियुक्ति और सरकारी पदों की बंदरबांट को लेकर भी इसी तरह के आरोप लगाए।</p>
<p>इस घटनाक्रम ने भाजपा के मतदाताओं के उस ओबीसी अंब्रेला को छोटा कर दिया है जिसके चलते उसके मत प्रतिशत में भारी बढ़ोतरी हुई थी। पिछले सात साल में पार्टी ने जो भी मत प्रतिशत बढ़ाया और केंद्र व राज्य में सत्ता हासिल करने के लिए अधिक सीटें जीतीं, उसमें इस ओबीसी अंब्रेला की बड़ी भूमिका रही है। पिछले कुछ सप्ताह के घटनाक्रम को भाजपा भले ही सार्वजनिक रूप से हल्के में लेती दिखे, हकीकत इसके उलट है।</p>
<p>इन नेताओं के पाला बदलने से पहले ही पिछड़ी जाति राजभर के नेता ओमप्रकाश राजभर राज्य में गठबंधन अलग हो चुके थे। हालांकि 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले अलग हुए राजभर उन चुनावों में भाजपा का नुकसान नहीं कर पाये थे। लेकिन इस बार विधानसभा चुनावों में स्थिति अलग है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन के असर वाले इस इलाके में रालोद और सपा गठबंधन से परेशान भाजपा के लिए ओबीसी नेताओं का पार्टी छोड़ना मध्य उत्तर प्रदेश और पूर्वांचल में मुश्किलें पैदा कर सकता है। भाजपा इससे पार पाने की रणनीति बना रही है और नुकसान कम करने की कोशिशों में है।</p>
<p>सरकार और पार्टी चलाने की केंद्रीकृत व्यवस्था में खुद के राजनीतिक आधार वाले नेताओं की बेचैनी आने वाले दिनों में और बढ़ेगी। कोई भी राजनेता नहीं चाहता है कि वह सांसद और विधायक तो बना रहे लेकिन स्थानीय प्रशासन से लेकर राज्य और केंद्र सरकार के स्तर तक उसकी कोई सुनवाई न हो। पिछले दिनों भाजपा के एक बड़े नेता ने इस लेखक को कहा था कि हमारी पार्टी में नेता चुनाव नहीं लड़ता है, पार्टी चुनाव लड़ती है इसलिए किसको टिकट मिले इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। हालांकि जिस तरह से भाजपा ने अभी तक उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के प्रत्याशियों की सूची में मौजूदा विधायकों के बड़े पैमाने पर टिकट काटने से परहेज किया है, वह इस आत्मविश्वास को नहीं दिखाता है। राजनीतिक दलों और सरकार चलाने वाले नेताओं को केंद्रीकृत व्यवस्था को लेकर आने वाले दिनों में क्या वाकई सोचने को मजबूर होना पड़ेगा, इसका असर उत्तर प्रदेश के चुनाव नतीजों के बाद दिख सकता है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ सरकार और दलों की केंद्रीकृत व्यवस्था से कद्दावर नेताओं में बेचैनी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[पिछड़े राज्य पहले कृषि और फिर उद्योग को मजबूत करें, इससे विकास टिकाऊ और समावेशी होगा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/slow-growth-states-must-focus-on-agriculture-followed-by-industry-and-service-sector-for-sustainable-and-inclusive-growth.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 16 Jan 2022 13:54:12 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/slow-growth-states-must-focus-on-agriculture-followed-by-industry-and-service-sector-for-sustainable-and-inclusive-growth.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत में विकास को कई चरणों में बांटा जा सकता है। हर चरण की अलग खासियत रही है। राज्यों के विकास पर नजर डालने पर हमें उनमें कई पैटर्न देखने को मिलते हैं। यहां हम उन पैटर्न की चर्चा करने के साथ यह भी देखेंगे कि उनमें कौन सा पैटर्न सबसे मुफीद है, और जो राज्य अभी तक विकास की परिधि से बाहर हैं, उन्हें कौन सा तरीका अपनाना चाहिए।</p>
<p>हरित क्रांति के साथ विकास की पहली लहर को शुरू में पंजाब,&nbsp; हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश के डेल्टा क्षेत्र और तमिलनाडु ने अपनाया। दूसरे राज्यों के उन इलाकों में भी इसे अपनाया गया जहां सिंचाई के बेहतर साधन थे। इसका राज्य की अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक असर हुआ। गैर कृषि क्षेत्र को भी फॉरवर्ड और बैकवर्ड लिंकेज से फायदा मिला। 1991 के आर्थिक सुधारों का सबसे अधिक असर महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु और हरियाणा में देखने को मिला। इससे महाराष्ट्र 1990 के दशक के मध्य तक सबसे अधिक प्रति व्यक्ति आय वाला राज्य बन गया। प्रमुख राज्यों में जब आईटी और अन्य सर्विसेज सेक्टर में विकास का चरण आया तो उसका भी सबसे अधिक फायदा महाराष्ट्र, हरियाणा, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश ने अन्य राज्यों की तुलना में ज्यादा उठाया। इसकी वजह से कर्नाटक 2015-16 में हरियाणा के बाद दूसरा सबसे अधिक प्रति व्यक्ति आय वाला राज्य बन गया।</p>
<p>यहां विकास के अलग अलग पैटर्न देखने को मिलते हैं। पहला पैटर्न है हरित क्रांति टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके, कृषि को केंद्र में रखते हुए विकास का मॉडल अपनाना। यह मॉडल समावेशी था और इसने काफी हद तक गरीबी को भी कम किया। अगर कृषि के बाद औद्योगिक विकास ना होता तो वह ग्रोथ भी टिकाऊ नहीं होता। इसका अच्छा उदाहरण पंजाब है जो हरित क्रांति के दौरान 1994-95 तक प्रति व्यक्ति आय में सबसे ऊपर था और हाल में इसमें गिरावट आई। दूसरा पैटर्न कृषि की अगुवाई में बदलाव और उसके बाद औद्योगीकरण है। यह मॉडल समावेशी होने के साथ टिकाऊ भी है। हरियाणा इसका अच्छा उदाहरण है। तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश ने भी इस मॉडल को अपनाया लेकिन उन्होंने कृषि टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कम किया।&nbsp; विकास का यह मॉडल सबसे अच्छा कहा जा सकता है। हरियाणा 2003-04 से प्रति व्यक्ति आय में शीर्ष पर है। वहां गरीबी भी राष्ट्रीय औसत का आधा है।</p>
<p>तीसरा पैटर्न विकास के लिए उद्योगों पर फोकस करने का है। यह मॉडल तेज विकास तो देता है लेकिन वह समावेशी नहीं होता। महाराष्ट्र इसका बड़ा उदाहरण है,&nbsp; और कुछ हद तक गुजरात भी। महाराष्ट्र में ज्यादातर विकास औद्योगिक क्षेत्रों और पुणे और मुंबई के आसपास हुआ है। राज्य के बाकी हिस्से में प्रति व्यक्ति आय महाराष्ट्र के औसत से कम है। प्रति व्यक्ति आय में शीर्ष तक जाने के बावजूद यहां तमिलनाडु की तुलना में गरीबी घटने की दर कम है।</p>
<p>चौथा पैटर्न सर्विस सेक्टर और आईटी सेक्टर की अगुवाई में ग्रोथ का है। कर्नाटक इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। उसके बाद आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र हैं। कर्नाटक में सर्विसेज और आईटी सेक्टर की ग्रोथ बेंगलुरु और मैसूर के इर्द-गिर्द है। बाकी कर्नाटक में ऐसा बदलाव नहीं दिखता। तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश की तुलना में गरीबी हटाने में कर्नाटक भी पीछे है।</p>
<p>राज्यों के विकास के पैटर्न से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि कृषि की अगुवाई में ग्रोथ समावेशी तो है लेकिन अगर उसके बाद औद्योगीकरण न किया जाए तो वह टिकाऊ नहीं होता। कृषि की अगुवाई में ग्रोथ और उसके बाद औद्योगीकरण से प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि और गरीबी में गिरावट स्थाई होती है।&nbsp; उद्योग की अगुवाई में विकास, जिसमें पहले कृषि का विकास ना हुआ हो, उससे अर्थव्यवस्था की गति और प्रति व्यक्ति आय तो बढ़ेगी लेकिन वह समावेशी नहीं होगा। सर्विस सेक्टर की अगुवाई में होने वाला ग्रोथ चुनिंदा इलाकों तक सीमित रहेगा।</p>
<p>ये नतीजे बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और ओडिशा जैसे राज्यों के लिए मायने रखते हैं। इन राज्यों को कृषि विकास को शीर्ष वरीयता देनी चाहिए। इससे समावेशी विकास की मजबूत जमीन तैयार होगी। उसके बाद उन्हें उद्योगों पर और तीसरे नंबर पर सर्विस सेक्टर पर ध्यान देना चाहिए। अगर इस क्रम का पालन नहीं किया गया तो समावेशी और टिकाऊ विकास के लक्ष्य को हासिल करना मुश्किल होगा। औद्योगिक या सर्विस सेक्टर में ऊंची विकास दर से समावेशी विकास ना होने का प्रमुख कारण इन दोनों सेक्टर में इस्तेमाल की जाने वाली टेक्नोलॉजी है। इन दोनों सेक्टर में पूंजी सघन टेक्नोलॉजी का अधिक इस्तेमाल किया जाता है और इससे श्रमिकों को हटाना पड़ जाता है।</p>
<p>मेरे विचार से आर्थिक विकास का संदर्भ अब बदल गया है। अब रोजगार, टिकाऊ विकास, पर्यावरण, गरीबी, पोषण, स्वास्थ्य हमारे लिए बड़ी चिंता के विषय बन गए हैं। इस बदले हुए संदर्भ में कृषि बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। खेती में प्राकृतिक संसाधनों का प्रचुर इस्तेमाल होता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में 80 से 90 फीसदी पानी का इस्तेमाल खेती में ही होता है, जबकि वैश्विक औसत 70 फीसदी है। फिर भी खेती का आधा इलाका असिंचित है। बाढ़ सिंचाई के कारण देश में 30-35 फीसदी पानी का ही इस्तेमाल हो पाता है। सभी राज्यों में भूजल स्तर गिर रहा है। शहरों में वर्षा जल संचय और पानी की रिसाइक्लिंग से बहुत लाभ नहीं होने वाला। वास्तविक फर्क तो खेती में पानी के उचित इस्तेमाल से पड़ेगा।</p>
<p>खेती के कार्यों में निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसों के बारे में भी कोई चर्चा नहीं होती है। मिट्टी में ऑर्गेनिक और इनऑर्गेनिक इनपुट के प्रयोग, बायोमास के सड़ने, फसल उत्पादन, मवेशियों आदि से ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन होता है। भारत में ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में कृषि का हिस्सा 17 फीसदी है, इतना ही योगदान यह क्षेत्र जीडीपी में भी करता है। इसमें से तीन-चौथाई उत्सर्जन धान की खेती और मवेशियों से होता है, बाकी 26 फीसदी उर्वरक से निकलने वाली नाइट्रस ऑक्साइड से। अगर पराली जलाने को भी शामिल किया जाए तो कुल ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में कृषि का हिस्सा और अधिक होगा।</p>
<p>विकास के एजेंडे में कृषि की अग्रणी भूमिका को लेकर पूरी दुनिया में एक नया विचार उभर रहा है। अब इसे अपनाना हमारे ऊपर है कि हम औद्योगीकरण में कृषि की भूमिका देखते हैं या विकास के लिए कृषि को अपनाते हैं। राज्यों को कृषि की क्षमता की अनदेखी करके विकास के लिए औद्योगीकरण के पीछे नहीं भागना चाहिए। जिन राज्यों में कृषि उत्पादकता कम है उन्हें कृषि को ही प्राथमिकता देनी चाहिए। उसके बाद उद्योग और सर्विस सेक्टर को चुनना चाहिए। इससे विकास समावेशी तो होगा ही, विकास दर और लोगों की आमदनी में वृद्धि भी स्थायी होगी।</p>
<p><strong>(प्रोफेसर रमेश चंद </strong><em><strong>नीति आयोग के सदस्य हैं। यह लेख भोपाल स्थित अटल बिहारी वाजपेयी इंस्टीट्यूट ऑफ गुड गवर्नेंस एंड पॉलिसी एनालिसिस में इंडियन इकोनॉमिक एसोसिएशन के 104वें सालाना कांफ्रेंस में दिए गए अध्यक्षीय भाषण &lsquo;आर्थिक वृद्धि और समावेशी विकास: क्या एक नए ग्रोथ मॉडल की जरूरत है&rsquo; का अंश है)</strong></em></p>
<p><em><strong>&nbsp;</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ पिछड़े राज्य पहले कृषि और फिर उद्योग को मजबूत करें, इससे विकास टिकाऊ और समावेशी होगा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कृषि को केंद्र में रखकर नीति बनाने से टिकाऊ और समावेशी विकास संभव]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/for-sustainable-and-inclusive-growth-agriculture-should-be-at-the-core-of-the-development-agenda.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 13 Jan 2022 20:42:32 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/for-sustainable-and-inclusive-growth-agriculture-should-be-at-the-core-of-the-development-agenda.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अर्थशास्त्री जॉनसन और मेलर ने 1961 में कहा था कि विकास के अगुआ के तौर पर कृषि केंद्रीय भूमिका निभाती है, खासकर औद्योगीकरण के शुरुआती चरण में। बाद में दूसरे अर्थशास्त्रियों ने भी आधुनिक सेक्टर के रूप में उभरने और विकास में महत्वपूर्ण योगदान देने में कृषि की भूमिका को स्वीकार किया। उसके बाद अर्थशास्त्रियों ने कृषि के विकास के गैर-कृषि क्षेत्र पर असर और दोनों के बीच संबंधों को भी पहचाना। कृषि क्षेत्र आर्थिक विकास में कई तरह से योगदान करता है- कृषि में इस्तेमाल होने वाले इनपुट की मांग के तौर पर, इंडस्ट्री को कच्चे माल की सप्लाई देकर और उद्योगों द्वारा तैयार सामान की ग्रामीण इलाकों में मांग पैदा करके।</p>
<p>यह जानना बड़ा रोचक है कि आर्थिक विकास के पारंपरिक और आधुनिक, दोनों सिद्धांतों में आर्थिक बदलाव की प्रकृति पर जो निष्कर्ष निकाला गया है, उनमें काफी समानताएं हैं। सभी डेवलपमेंट अर्थशास्त्री इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि प्रति व्यक्ति आय बढ़ने पर जीडीपी और रोजगार में कृषि का हिस्सा घटता है। औद्योगिक देशों तथा विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में इस बात के उदाहरण मिलते हैं। लेकिन हाल के वर्षों में यह पैटर्न बदला है।</p>
<p>टिमर (2009) के अनुसार कुल श्रम बल में कृषि श्रमिकों के हिस्से की तुलना में जीडीपी में कृषि का हिस्सा ज्यादा तेजी से घटता है। ब्रूस गार्डनर (2002) ने लिखा कि कृषि और गैर-कृषि क्षेत्र की आमदनी के बीच समानता के लिए जरूरी है कि कृषि श्रमिकों को गैर-कृषि क्षेत्र में तेजी से जोड़ा जाए। लेकिन इसमें काफी वक्त लगेगा। हाल के वर्षों में जीडीपी और रोजगार में कृषि के हिस्से के बीच समानता की गति और धीमी पड़ गई है, क्योंकि औद्योगिक क्षेत्र में रोजगार के अवसर गैर-कृषि क्षेत्र की जीडीपी वृद्धि दर की तुलना में कम हैं। भारत, चीन, वियतनाम जैसे देशों में कृषि और गैर-कृषि क्षेत्र के श्रमिकों के बीच की आमदनी में अंतर लगातार बना हुआ है।</p>
<p>आज सभी देशों में रोजगार सबसे गंभीर चुनौती है। रोबोटिक, मशीन लर्निंग, ऑटोमेशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे तकनीकी विकास श्रम सघन के बजाय पूंजी सघन उत्पादन को बढ़ावा देते हैं। इसलिए आधुनिक ग्रोथ को कुछ अर्थशास्त्री &lsquo;जॉबलेस ग्रोथ&rsquo; भी कहते हैं।</p>
<p>मैंने 2004-05 से 2011-12 के दौरान ग्रामीण जीडीपी और ग्रामीण रोजगार के बीच बदलाव की तुलना करने के लिए एक अध्ययन किया। इस अवधि में ग्रामीण भारत में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की जीडीपी सालाना 15.87 फ़ीसदी की दर से बढ़ी। इसके विपरीत उद्योगों में रोजगार की वृद्धि सिर्फ 0.67 फ़ीसदी हुई। यहां यह सवाल उठता है कि पूंजी सघन की जगह श्रम सघन उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए इंसेंटिव क्यों नहीं दिया जाता है। इसमें एक समस्या प्रतिस्पर्धी क्षमता की है। आज विश्व अर्थव्यवस्था में इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती है।</p>
<p>फूड प्रोसेसिंग इसका अच्छा उदाहरण है। इस सेक्टर को दो भागों में बांटा जा सकता है- संगठित और असंगठित। संगठित का मतलब पूंजी सघन वाली आधुनिक फैक्ट्रियां हैं और असंगठित में छोटे और लघु उद्यम आते हैं। संगठित क्षेत्र में इस सेक्टर के 20 फ़ीसदी लोग काम करते हैं लेकिन उत्पादन 80 फ़ीसदी होता है। इसके विपरीत असंगठित क्षेत्र में इस सेक्टर के 80 फ़ीसदी लोग काम करते हैं लेकिन उत्पादन में उनका हिस्सा सिर्फ 20 फ़ीसदी है। यही कारण है कि असंगठित क्षेत्र तेजी से सिकुड़ रहा है। रोजगार पर इसका असर आसानी से समझा जा सकता है।</p>
<p>क्या हमें कम आय वाली अर्थव्यवस्था के विकास के शुरुआती चरण में कृषि को केंद्र में रखकर विकास का मॉडल बनाना चाहिए और उसके बाद औद्योगीकरण में तेजी लानी चाहिए? क्या यह मॉडल भारत जैसे विकासशील देशों के लिए बेहतर होगा?</p>
<p>सिद्धांत स्तर पर देखा जाए तो कृषि की अगुवाई में आर्थिक बदलाव हो, इसके लिए बायोटेक्नोलॉजी जैसे कृषि विज्ञान में इनोवेशन जरूरी है। मैं यह भी मानता हूं कि डिजिटल टेक्नोलॉजी का नौकरियों पर जो विपरीत प्रभाव पड़ा है उसका मुकाबला प्लांट बायोटेक्नोलॉजी से किया जा सकता है। हरित क्रांति की टेक्नोलॉजी, जो विकासशील देशों को 1960 के दशक के मध्य में मिली, उसे लुइस मॉडल का पहला विभेद कहा जा सकता है। इसका कारण कृषि क्षेत्र में तेज विकास के कारण होने वाला बैकवर्ड और फॉरवर्ड लिंकेज है।</p>
<p>भारत में विकास का पहला चरण हरित क्रांति लेकर आया। 1991-92 में शुरू हुए आर्थिक सुधारों से विकास का दूसरा चरण आया और 2003-04 के आसपास आईटी और आईटी इनेबल्ड सर्विसेज में क्रांति से तीसरा चरण आया है। इन तीनों चरणों में कृषि, गैर-कृषि और पूरी अर्थव्यवस्था में विकास की दर एक रोचक तथ्य बताती है। 1950-51 से 1966-67 (हरित क्रांति से पहले) तक कृषि क्षेत्र की सालाना वृद्धि दर 1.77 फ़ीसदी और गैर-कृषि क्षेत्र की 5.5 फ़ीसदी थी। तब पूरी अर्थव्यवस्था की औसत विकास दर 3.41 फ़ीसदी थी। हरित क्रांति के बाद कृषि क्षेत्र की विकास दर 1991-92 तक औसत 3.02 फ़ीसदी रही। 1991 में आर्थिक सुधारों के बाद कृषि की विकास दर में थोड़ी गिरावट आई, लेकिन गैर-कृषि क्षेत्र की विकास दर 7.01 फ़ीसदी हो गई। कृषि में गिरावट के बावजूद अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 5.73 फ़ीसदी थी। यह मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को समर्थन देने वाली नीतियों के चलते संभव हुआ।</p>
<p>2003-04 से 2019-20 तक कृषि और गैर-कृषि दोनों क्षेत्रों में वृद्धि दर तेज रही। इससे पूरी अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर भी बढ़कर 6.71 फ़ीसदी जा पहुंची। यह ट्रेंड बताता है कि अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर तेज करने और प्रति व्यक्ति आय बढ़ाने में कृषि क्षेत्र ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और साथ ही इसने गरीबी कम करने में भी मदद की।</p>
<p><em><strong>(प्रोफेसर रमेश चंद, नीति आयोग के सदस्य हैं। यह लेख उनके द्वारा भोपाल स्थित अटल बिहारी वाजपेयी इंस्टीट्यूट ऑफ गुड गवर्नेंस एंड पॉलिसी एनालिसिस में इंडियन इकोनॉमिक एसोसिएशन के 104वें सालाना कांफ्रेंस में दिए गए अध्यक्षीय भाषण &lsquo;आर्थिक वृद्धि और समावेशी विकास: क्या एक नए ग्रोथ मॉडल की जरूरत है&rsquo; का अंश है)</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ कृषि को केंद्र में रखकर नीति बनाने से टिकाऊ और समावेशी विकास संभव ]]></media:description>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[एग्री बिजनेस से गांवों का विकासः चुनौतियां और उनका समाधान]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/rural-development-through-agribusiness-and-its-challenges.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 08 Jan 2022 18:40:45 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/rural-development-through-agribusiness-and-its-challenges.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>पिछले दिनों किसान दिवस (23 दिसंबर) के मौके पर रूरल वॉयस ने &lsquo;एग्रीकल्चर कॉन्क्लेव एंड नेडाक अवार्ड्स 2021&rsquo; का आयोजन किया। उस कार्यक्रम में कई नीति निर्माताओं, वरिष्ठ अधिकारियों, विशेषज्ञों और पत्रकारों ने भाग लिया। अन्य विषयों के अलावा कार्यक्रम में इस बात की भी चर्चा हुई कि कृषि को किस तरह कृषि व्यवसाय (एग्री बिजनेस) बनाया जाए, जो आज की जरूरत है। जिन किसानों को खेतों में होना चाहिए, वे पिछले दिनों सड़कों पर थे। सरकार से उनकी नाराजगी इस बात को लेकर भी थी कि खेती में इस्तेमाल होने वाले इनपुट और उनकी उपज की कीमतों के मामले में उनके साथ उचित बर्ताव नहीं होता है, भले ही उन्हें 2.2 लाख करोड़ रुपए की सब्सिडी मिलती हो। यह सब्सिडी उर्वरक, बिजली, फसल बीमा, बीज, कर्ज, सिंचाई जैसे मदों में होती है। यह कृषि जीडीपी का 10 फीसदी और औसत कृषि आय का 12 फीसदी है। आखिर ऐसा क्यों है?&nbsp;</p>
<p>इसका कारण यह है कि कृषि क्षेत्र अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों की तुलना में धीमी प्रगति कर रहा है। इस पर क्षमता से अधिक लोगों का बोझ है। यह बात इस तथ्य से जाहिर होती है कि 1951-52 से लेकर 2016-17 तक साढ़े छह दशक तक उद्योग जगत की सालाना वृद्धि दर छह फीसदी से अधिक रही। सेवा क्षेत्र ने भी छह फीसदी से अधिक की दर से विस्तार किया। लेकिन कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर तीन फीसदी से भी कम थी। इसका नतीजा जीडीपी में कृषि की हिस्सेदारी घटने के रूप में सामने आया। 1950-51 में जीडीपी में कृषि की हिस्सेदारी 53.1 फीसदी थी जो 2016-17 में सिर्फ 15.2 फीसदी रह गई। हालांकि अगर विकसित देशों से तुलना करें तो दक्षिण कोरिया की जीडीपी में कृषि की हिस्सेदारी दो फीसदी, फ्रांस में 1.5 फीसदी, जापान और अमेरिका में एक फीसदी और इंग्लैंड में सिर्फ 0.5 फीसदी है। उन देशों में कृषि क्षेत्र में रोजगार एक से पांच फीसदी के बीच है जबकि भारत में यह 45 फीसदी है।</p>
<p>आज भारत में कृषि विकास का नहीं बल्कि संकट का प्रतिबिंब बन गई है। इस बदलाव का मुख्य कारण किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य ना मिलना और भीषण बेरोजगारी है। यदि किसानों को खेती से अधिक कमाई हो और उन्हें अपने इर्द-गिर्द ही अतिरिक्त कार्य के अवसर मिलें तो वे बेहतर स्थिति में होंगे। इसी बात को ध्यान में रखते हुए कृषि को एग्री बिजनेस में बदलने की चर्चा हो रही है और विभिन्न क्षेत्रों से इस बहस को समर्थन भी मिल रहा है।</p>
<p><strong>एग्री बिजनेस का अर्थ</strong></p>
<p>कृषि व्यवसाय में चार क्षेत्र हैं, (1) कृषि इनपुट (2) कृषि उत्पादन (3) प्रोसेसिंग और (4) मार्केटिंग तथा ट्रेड। अगर इन चारों को हम मिला कर देखें तो फसल उत्पादन, वितरण, कृषि रसायन, चारा, ब्रीडिंग, कृषि उपकरण, बीज वितरण, कच्ची और प्रोसेस्ड कमोडिटी, भंडारण, ट्रांसपोर्टेशन, पैकिंग, मृदा परीक्षण, मार्केटिंग, रिटेल बिक्री आदि सब इसमें आ जाते हैं।</p>
<p><strong>कृषि व्यवसाय को बढ़ावा देने में सरकार के प्रयास</strong><strong>&nbsp;</strong></p>
<p>किसानों की आमदनी बढ़ाने के मकसद से देश में एग्री बिजनेस को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके लिए आईसीएआर ने नेशनल एग्रीकल्चर इनोवेशन फंड (एनएआईएफ) के तहत देश के अलग-अलग राज्यों में एग्री बिजनेस इनक्यूबेशन (एबीआई) केंद्रों का नेटवर्क तैयार किया है। ये एबीआई केंद्र टिकाऊ बिजनेस के प्रयासों को आगे बढ़ाने और टेक्नो-आत्रप्रेन्योर को तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इन केंद्रों में अनुसंधान में मदद, बिजनेस प्लानिंग, ऑफिस की जगह, सूचना और संचार प्रौद्योगिकी तक पहुंच जैसी अनेक तरह की सेवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। इसके अलावा यहां प्रबंधन, मार्केटिंग, तकनीकी, कानूनी और वित्तीय मामलों में उद्यमियों को सलाह भी दी जाती है।</p>
<p>एग्री बिजनेस को बढ़ावा देने के लिए 12वीं योजना में कृषि में युवाओं को आकर्षित करने एवं बरकरार रखने (अट्रैक्टिंग एंड रिटेनिंग यूथ इन एग्रीकल्चर- आर्य) की योजना की शुरुआत की गई थी। इसे हर राज्य के एक जिले में किसान विकास केंद्र (केवीके) के जरिए लागू किया जाता है। कार्य की प्रकृति के आधार पर इसके तहत व्यक्तिगत या समूह आधारित गतिविधियों/उद्यमों को प्रोत्साहित किया जाता है। ग्रामीण उद्यमिता जागरूकता विकास योजना (रूरल आंत्रप्रेन्योरशिप अवेयरनेस डेवलपमेंट योजना- रेडी) की शुरुआत 2015-16 में हुई थी। रेडी में प्रायोगिक शिक्षा, ग्रामीण जागरूकता, कार्य का अनुभव, प्लांट प्रशिक्षण, उद्योग से जुड़े अन्य प्रशिक्षण जैसे कार्य किए जाते हैं। हर छात्र को छह महीने तक वित्तीय सहायता भी उपलब्ध कराई जाती है। नियमित थोक बाजारों के नेटवर्क के जरिए कृषि मार्केटिंग की जाती है। इनका गठन राज्य कृषि उपज बाजार समिति (एपीएमसी) एक्ट के तहत किया गया है। सरकार ने राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-नाम) लागू किया है। यह एक ऑनलाइन ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म है जहां किसानों को प्रतिस्पर्धी ऑनलाइन नीलामी व्यवस्था के तहत अपनी उपज की उचित और लाभकारी कीमत तय करने का अवसर मिलता है।</p>
<p><strong>चुनौतियां</strong></p>
<p>सरकार ने देश में एग्रीबिजनेस को बढ़ावा देने के लिए कई उपाय किए हैं, लेकिन इस लक्ष्य को हासिल करने में कई चुनौतियां हैं। किसानों के विकास के लिए अभी तक जो प्रयास किए गए हैं उनका सर्वाधिक लाभ उठाने के लिए आगे बताए अतिरिक्त नीतिगत कदम उठाए जा सकते हैं। पहला, किसानों को निरंतर इन पहलुओं के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए। पीआरआई और उनके चेयरपर्सन तथा सदस्य इस कार्य में शामिल किए जा सकते हैं। दूसरा, विभिन्न कार्यक्रमों के बीच समयबद्ध तरीके से प्रभावी सामंजस्य स्थापित किया जाना चाहिए। अन्य कार्यक्रमों के अलावा महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना और राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन इस लिहाज से काफी महत्वपूर्ण हैं और एग्री बिजनेस गतिविधियों में इनका पूरा लाभ उठाया जाना चाहिए। तीसरा, जमीनी स्तर पर सेवाओं की डिलीवरी मजबूत की जानी चाहिए। इसमें प्रशिक्षित लोगों का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके अलावा गांव, ब्लॉक और जिला स्तर पर खाली पड़े विभिन्न पदों को तत्काल भरे जाने की जरूरत है। चौथा, कृषि से जुड़ी विभिन्न गतिविधियों में बैंक किसी सरकारी कार्यालय की तरह नहीं बल्कि दोस्त, फिलॉस्फर और गाइड बनकर किसानों के साथ काम करें। राजनीतिक दलों को कर्ज माफी की घोषणाओं से बचना चाहिए क्योंकि यह न तो अच्छी राजनीति है और ना ही अच्छा अर्थशास्त्र।</p>
<p>एग्री बिजनेस की पहल ग्रामीण क्षेत्र को प्रभावित करने वाले सभी मुद्दों के हल के लिए एक रामबाण प्रतीत होती है। ग्रामीण क्षेत्र में विकास लोगों के हित में होना चाहिए। गांव से गन्ना गुड़ के रूप में बाहर निकलेगा या शक्कर के रूप में, आलू निकलेगा या आलू के चिप्स। इसी तरह गांव गेहूं के बजाय आटे की पैकिंग और टमाटर की जगह टमाटर सूप की सप्लाई कर सकते हैं। इसे संभव बनाना कोई मुश्किल काम नहीं है। बशर्ते केंद्र, राज्य और स्थानीय स्तर पर प्रभावी नेतृत्व हो।</p>
<p><em><strong>(लेखक इंडियन इकोनॉमिक सर्विस के अधिकारी रह चुके हैं, अभी कृपा फाउंडेशन के अध्यक्ष हैं)</strong></em></p>
<p>&nbsp;</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/01/image_750x500_61d98d4455b14.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ एग्री बिजनेस से गांवों का विकासः चुनौतियां और उनका समाधान ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[प्रभावी एमएसपी हो किसानों और सरकार की सहमति का केंद्र बिंदु]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/effective-msp-must-be-the-central-point-for-consensus-between-farmers-and-government.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 07 Jan 2022 14:20:44 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/effective-msp-must-be-the-central-point-for-consensus-between-farmers-and-government.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>एक साल तक धरना-प्रदर्शन करने के बाद किसान 11 दिसंबर को घर लौट गए। किसानों की यह वापसी उन तीन कृषि कानूनों के खिलाफ साहसिक संघर्ष का अंत हो सकता है जिन्हें संसद ने पारित किया था और पिछले महीने रद्द भी किया। लेकिन एक बेहतर कृषि नीति और उपज की लाभकारी कीमत की किसानों की मांग अभी पूरी होनी बाकी है। किसानों ने न सिर्फ निजी पूंजी के ज्यादा निवेश के साथ-साथ सरकारी समर्थन और उसकी सुरक्षा वापस लेने के सरकार के प्रयासों को नाकाम किया, बल्कि उन्होंने न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की गारंटी को आगे की बातचीत के एजेंडा में शुमार करने में भी सफलता हासिल की।</p>
<p>अभी यह स्पष्ट नहीं है कि एमएसपी की गारंटी का क्या मतलब है और पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान तथा उत्तराखंड जैसे उत्तर-पश्चिमी राज्यों के ज्यादातर किसानों पर इसका क्या असर होगा। किसान आंदोलन का ज्यादा असर इन्हीं राज्यों में देखा गया। पूर्वी, मध्य और दक्षिण के राज्यों में तो एमएसपी की व्यवस्था बड़ी मुश्किल से चलती है। इसलिए वहां भी इसका असर देखने वाली बात होगी। किसान आंदोलन की चुनौती सिर्फ यह नहीं कि यह उत्तर-पश्चिमी राज्यों तक केंद्रित रहा, बल्कि आंदोलन को व्यापक बनाना भी है ताकि कृषि मजदूर समेत हर श्रेणी के किसानों को इसमें शामिल किया जा सके। यह कोई कठिन काम नहीं है। समर्थन मूल्य के जरिए हस्तक्षेप के सिद्धांत पर आधारित एक व्यापक एमएसपी व्यवस्था, जिसमें गारंटी भी हो, ज्यादा समावेशी होगी।</p>
<p>इस बात को कमोबेश हर कोई स्वीकार करता है कि एमएसपी की मौजूदा व्यवस्था क्षेत्रीय आधार पर असंतुलित है। चुनिंदा राज्यों के किसानों को ही एमएसपी पर खरीद का फायदा मिलता है और वह भी चुनिंदा फसलों, गेहूं और चावल के लिए। सबसे बड़ी समस्या यह है कि मौजूदा व्यवस्था, एमएसपी की व्यवस्था है ही नहीं, यह वास्तव में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून की जरूरतों को पूरा करने के लिए एक सार्वजनिक खरीद योजना है। हालांकि इस कानून में मोटे अनाज, दालें, खाद्य तेल जैसे पोषक खाद्य की बात कही गई है, इसके बावजूद मौजूदा सार्वजनिक वितरण प्रणाली पूरी तरह गेहूं और चावल पर केंद्रित है। इसलिए गेहूं और चावल की तरफ अत्यधिक झुकाव किसानों के लिए एक प्रभावी एमएसपी की जरूरत का जवाब नहीं है। बल्कि यह प्राकृतिक संसाधनों पर होने वाले हानिकारक प्रभावों की चिंता दूर करने में भी अक्षम है।</p>
<p>एक प्रभावी न्यूनतम समर्थन मूल्य क्या होगा? जब उपज की कीमत एक तयशुदा कीमत से कम हो जाती है तो किसानों को लाभकारी मूल्य दिलाना ही एमएसपी व्यवस्था है। कीमत में यह गिरावट अधिक उत्पादन और ज्यादा सप्लाई अथवा दूसरे आंतरिक कारणों से हो सकती है। परिस्थिति चाहे जो भी हो, परिभाषा के हिसाब से एमएसपी व्यवस्था में जब फसल की कीमत समर्थन मूल्य से कम हो जाती है तो सरकार को उसे खरीद कर हस्तक्षेप करना होता है। सरकार के इस कदम से बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति कम होती है और घरेलू बाजार में दाम ऊपर जाते हैं। इस तरह कीमत एमएसपी के बराबर या उससे अधिक हो जाएगी। सरकार को पूरी उपज खरीदने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि उससे एक कृत्रिम कमी पैदा होगी और दाम और अधिक बढ़ जाएंगे। सरकार को निजी कारोबार को किसी खास मूल्य पर बाध्य करने की भी जरूरत नहीं है। लेकिन इसका यह मतलब जरूर है कि अगर बाजार में कीमत एमएसपी के बराबर या उससे अधिक रहे तो सरकार उपज को नहीं खरीदेगी। एमएसपी का यही बुनियादी सिद्धांत है जिसे दरकिनार कर दिया गया है। इसलिए पूरी एमएसपी व्यवस्था राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून को समर्थन देने का जरिया बनकर रह गई है।</p>
<p>सरकार 23 फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा करती है, लेकिन प्रभावी खरीद सिर्फ गेहूं और चावल की होती है। बाकी फसलों की खरीद थोड़ी बहुत ही हो पाती है। कभी-कभार सरकार दालें और कपास खरीदती है। गेहूं और चावल के लिए भी सरकारी खरीद कीमतों को स्थिर करने के लिए नहीं बल्कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून की जरूरतों को पूरा करने के लिए किया जाता है। हालांकि हाल में ऐसा देखा गया कि सरकार ने गेहूं और चावल की अधिक मात्रा में खरीद की, जिससे बाजार में कृत्रिम कमी पैदा हुई। 1 दिसंबर 2021 को गेहूं और चावल का 8.3 करोड़ टन का भंडार था। यह 1 जनवरी को 2.1 करोड़ टन के बफर स्टॉक और रणनीतिक जरूरत का 4 गुना है। अतिरिक्त भंडारण राष्ट्रीय संसाधनों की बर्बादी तो है ही, यह कीमतों में भी विकृति लाता है, जबकि एमएसपी का लक्ष्य इसके उलट कीमतों में स्थिरता लाना है।</p>
<p>यहां यह बात कहना जरूरी है कि दो लाख करोड़ रुपए से अधिक का तथाकथित खाद्य सुरक्षा बिल किसानों के लिए सब्सिडी नहीं, बल्कि उपभोक्ताओं के लिए सब्सिडी है जिसे राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत पूरा करने के लिए सरकार बाध्य है। लेकिन इसका दूसरा मतलब यह भी है कि अन्य अनेक फसलों की, जिनकी बाजार कीमत एमएसपी की तुलना में बहुत कम होती है, उन्हें कीमतों की कोई सुरक्षा नहीं मिल पाती है। यह बात बिहार की प्रमुख फसल मक्के के साथ-साथ अन्य मोटे अनाजों पर भी लागू होती है जिन्हें देश के वर्षा आधारित और शुष्क इलाकों में उपजाया जाता है। दलहन और तिलहन के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य के अभाव के कारण ही बीते दो दशकों में भारत इनके आयात पर आश्रित हो गया जबकि 1990 के दशक में इन दोनों मामलों में भारत आत्मनिर्भर था।</p>
<p>एक सक्षम एमएसपी व्यवस्था को लागू करना कितना मुश्किल है? बुनियादी जरूरत यह है कि एमएसपी में सिर्फ उत्पादन की लागत को नहीं बल्कि खाद्य सुरक्षा की रणनीतिक जरूरत का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। इसका मतलब है कि दलहन और तिलहन के लिए एमएसपी इतना हो कि लागत के साथ मुनाफा भी हो। बल्कि इसे उन फसलों की तुलना में अधिक लाभकारी होना चाहिए जिनके उत्पादन के मामले में देश सरप्लस स्थिति में है। अभी कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) एमएसपी की सिफारिश करता है, लेकिन इसकी सिफारिशें बाध्यकारी नहीं हैं। एक और सच्चाई यह है कि वास्तविक एमएसपी राजनीतिक नफा-नुकसान देखकर घोषित किए जाते हैं।</p>
<p>इसलिए पहला कदम तो यह होना चाहिए कि सीएसीपी की सिफारिशों को सरकार के लिए वैधानिक रूप से बाध्यकारी बनाया जाए। दूसरा कदम कीमत निगरानी की व्यवस्था बनाने की है। इसे क्षेत्रीय आधार पर करने की जरूरत है। अभी सरकार की एक व्यवस्था है जिसे और मजबूत बनाया जा सकता है। लेकिन एमएसपी की वास्तविक गारंटी के लिए सरकार को बाजार में हस्तक्षेप करना पड़ेगा और किसानों की उपज खरीदनी पड़ेगी ताकि मूल्य एमएसपी के स्तर पर आ जाएं या उससे अधिक हो जाएं। सरकार का हस्तक्षेप राजनीतिक आधार पर ना हो बल्कि उसका एक फॉर्मूला हो और वह खरीद एजेंसियों के लिए बाध्यकारी हो। यह हस्तक्षेप पूरी तरह से वैज्ञानिक रहे और इसमें अन्य किसी बात को शामिल न किया जाए।</p>
<p>सरकार पर इसका कितना बोझ आएगा? अगर सरकार खरीदी हुई उपज को वितरित करती है तो बोझ ज्यादा नहीं होगा। अच्छी व्यवस्था तो यह होगी कि जब उपभोक्ताओं के लिए कीमतें बढ़ती हैं और महंगाई दर अधिक हो जाती है, तब सरकार उस खरीदी हुई फसल को बाजार में बेचे। इस तरह एमएसपी की व्यवस्था महंगाई के दबाव को कम करने के साथ-साथ गरीब कामगार वर्ग को जरूरी राहत भी मुहैया कराएगी। अंतरराष्ट्रीय बाजार में दाम अगर घरेलू बाजारों से अधिक हो तो कभी-कभार निर्यात भी किया जा सकता है। इससे सरकार को अतिरिक्त राजस्व की प्राप्ति होगी। कुल मिलाकर देखा जाए तो सरकार के लिए शुद्ध लागत, खरीद की जरूरत और वितरण की व्यवस्था पर निर्भर करेगी।</p>
<p>एक बेहतर तरीका यह हो सकता है कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत मौजूदा वितरण व्यवस्था (पीडीएस) का इस्तेमाल मोटे अनाज, दालें, खाद्य तेल आदि के वितरण के लिए किया जाए। इससे देश के बड़े गरीब वर्ग के लिए पोषण की सुरक्षा को मजबूत करने में मदद मिलेगी। इसके अलावा उपेक्षित इलाकों में छोटे और सीमांत किसानों को भी एमएसपी का लाभ मिल सकेगा। बिहार जैसे गरीब राज्यों में इसकी जरूरत बहुत अधिक है जहां एमएसपी पर खरीद नगण्य है। इसके अलावा विदर्भ, तेलंगाना, कर्नाटक के शुष्क और वर्षा आधारित इलाकों में भी इसका फायदा होगा जहां मुख्य रूप से दालें, तिलहन और मोटे अनाज उपजाए जाते हैं। इससे इन फसलों का उत्पादन भी बढ़ेगा और सरकार को दलहन और तिलहन का आयात घटाकर विदेशी मुद्रा की बचत करने में भी मदद मिलेगी। इन सबके साथ खाद्य सुरक्षा भी सुनिश्चित होगी।</p>
<p>यह सब आसानी से किया जा सकता है और सरकार के अधिकार क्षेत्र में है। एक प्रभावी एमएसपी व्यवस्था सिर्फ आपातकालीन प्रावधान है। इससे खेती की वास्तविक समस्याओं का समाधान नहीं होता है। बीते एक दशक में देश के किसानों को अनेक अनकही समस्याओं का सामना करना पड़ा है। पोषण आधारित उर्वरक सब्सिडी की व्यवस्था के चलते किसान पहले ही उर्वरकों की अधिक कीमत से जूझ रहे हैं। साल 2014 और 2015 में उन्हें लगातार दो साल बिना सरकारी मदद के सूखे का सामना करना पड़ा। फिर अगस्त 2014 से जिंसों के दाम में भारी गिरावट आ गई। इसके बावजूद किसान लड़ते रहे और धीरे-धीरे कृषि में रिकवरी हो ही रही थी कि तभी नोटबंदी और जीएसटी का झटका लगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ टूट गई। उसके बाद से अर्थव्यवस्था में जारी सुस्ती और कोविड-19 महामारी के कारण किसानों की आमदनी और ग्रामीण इलाकों में पारिश्रमिक घट रहा है तथा बेरोजगारी बढ़ रही है। इन समस्याओं के साथ कृषि को सरकार की असंवेदनशीलता का भी सामना करना पड़ा जिससे कृषि क्षेत्र में वास्तविक निवेश में गिरावट आई और डीजल तथा बिजली महंगी होने के कारण किसानों की लागत बढ़ गई।</p>
<p>किसानों पर कर्ज का बोझ बढ़ने और उनकी कमाई घटने का मुख्य कारण सरकारी नीतियों की असंवेदनशीलता ही है। फिलहाल एमएसपी की गारंटी की मांग से कृषि में कम निवेश, कम अनुसंधान तथा अर्थव्यवस्था में घटती मांग जैसी ढांचागत समस्याओं का समाधान होने की उम्मीद कम है। लेकिन यह जरूर है कि इससे किसानों का कष्ट कुछ हद तक दूर होगा। इसके साथ ही देश के हर क्षेत्र के किसानों को एमएसपी की व्यवस्था का लाभ मिलने लगेगा।&nbsp;</p>
<p><strong><em>( हिमांशु , जेएनयू के स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज के सेंटर फॉर इकोनॉमिक&nbsp; स्टडीज&nbsp; एंड प्लानिंग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं )&nbsp;</em></strong></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ प्रभावी एमएसपी हो किसानों और सरकार की सहमति का केंद्र बिंदु ]]></media:description>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    <item>
        <title><![CDATA[कृषि कानून तो खत्म लेकिन आगे का रास्ता क्या होगा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/repeal-of-the-farm-laws-what-next.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 05 Jan 2022 20:14:35 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/repeal-of-the-farm-laws-what-next.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>केंद्र सरकार के तीनों कृषि कानून रद्द कर दिए हैं। अभूतपूर्व संघर्ष के बाद किसान अपने घरों को लौट चुके हैं। यह उनके लिए एक तरह से जीत के समान है, लेकिन देश के किसानों के लिए आगे बहुत कुछ किया जाना बाकी है।</p>
<p>इस तरह के &lsquo;नेट जीरो&rsquo; सुधारों तक पहुंचने के लिए क्या ऐसी दर्द भरी प्रक्रिया से गुजरना जरूरी था? क्या ज्यादा भागीदारी वाली और सलाह-मशविरे वाली प्रक्रिया अपनाई जा सकती थी? क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सलाह देने वाले विशेषज्ञों और बुद्धिजीवियों ने उन्हें नीचा दिखाया? क्या अति उत्साह के कारण जांची-परखी विचार विमर्श की प्रक्रिया का रास्ता छोड़कर अध्यादेश का रास्ता अपनाया गया? भविष्य के लिए कई सीख हैं और उम्मीद की जानी चाहिए कि इस बार मिले कष्ट को व्यर्थ नहीं जाने दिया जाएगा।</p>
<p>अब देखते हैं कि उन कानूनों की क्या स्थिति है। कृषक उपज व्&zwj;यापार और वाणिज्&zwj;य (संवर्धन और सरलीकरण) कानून, 2020 <span>(एफपीटीसी) तथा कृषक (सशक्&zwj;तीकरण व संरक्षण) कीमत आश्&zwj;वासन और कृषि सेवा पर करार कानून</span>, 2020<span> (एफएएफपीएस) </span>अब पूरी तरह से खत्म हो गए हैं। आवश्यक वस्तु अधिनियम अब संशोधन से पहले की अवस्था में आ गया है। स्टॉक लिमिट तथा अन्य नियंत्रणकारी उपाय लागू करने के सरकार के अधिकार वापस आ गए हैं। सरकार अब आवश्यक वस्तु अधिनियम के प्रावधानों को जब जरूरी चाहे समझे, लागू कर सकती है। इसने नीतिगत व्यवस्था को एक बार फिर अप्रत्याशित बना दिया है।</p>
<p>क्या इसका मतलब कृषि क्षेत्र में सुधारों का खत्म हो जाना है? उम्मीद है कि ऐसा नहीं होगा। केंद्र सरकार राज्य सरकार के अधिकारियों, किसान प्रतिनिधियों और विशेषज्ञों को मिलाकर एक बड़ी समिति बनाने पर सहमत हुई है। इसका आशय एमएसपी के दायरे को बढ़ाना और मजबूत करना जान पड़ता है। यह कदम निश्चित रूप से बाजार सुधारों की तुलना में राजनीतिक अधिक होगा। प्रस्ताव को देखकर लगता है कि बड़ी समिति किसी भी फैसले पर पहुंचने में लंबा वक्त लेगी। मुझे जल्दी ही किसी रिपोर्ट के आने की उम्मीद नहीं है। क्या यह मुद्दे को 2024 तक डालने का तरीका है? निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता।</p>
<p>कानून वापस लेकर क्या सरकार कृषि क्षेत्र में सुधारों को त्याग रही है? शायद नहीं। लेकिन क्या आगे बढ़ने का कोई रास्ता है? बिल्कुल है। भले ही बातचीत का रास्ता काफी धीमा हो लेकिन यही उचित जान पड़ता है। सबसे अहम बात यह है कि कृषि क्षेत्र में बाजार सुधार ही एकमात्र जरूरी चीज नहीं है। अकेले बाजार सुधार लागू करने पर उसका असर अधिक नहीं होगा। कृषि के लिए एक व्यापक नया नजरिया अपनाने की जरूरत है जिसमें जलवायु परिवर्तन, खाद्य पोषण और किसानों की आमदनी सब बातों पर फोकस किया जाए।</p>
<p>इस पहेली को सुलझाने का एक तरीका यह हो सकता है कि शुरुआत फूड सिस्टम अप्रोच के साथ की जाए, जिसमें सस्टेनेबिलिटी मुख्य स्तंभ हो। इसका मतलब यह है कि हम एक केंद्रीकृत इनपुट में अधिक सब्सिडी वाली खेती से विकेंद्रीकृत और धरती के लिए अनुकूल खेती की तरफ बढ़ें। जिसमें राष्ट्रीय मुद्दों से ज्यादा स्थानीय मुद्दों की चिंता की जाए। इसके लिए स्थानीय स्तर पर योजना बनाने, इनोवेशन और फैसले लेने की विकेंद्रीकृत प्रक्रिया अपनानी पड़ेगी।</p>
<p>अभी केंद्रीकृत अनाज वाली कृषि (गेहूं और चावल) पर फोकस किया जाता है। इसकी जगह राज्य विशेष के आधार पर हस्तक्षेप करने की जरूरत है। इससे मौजूदा हितों की तरफ से विरोध होगा लेकिन इस तरह के कदम उठाना दीर्घ काल के लिए आवश्यक है। इस बदलाव का डिजाइन तैयार करना और उसे लागू करना एक चुनौती है। एक बार यह वृहद योजना सामने आने के बाद बाजार सुधारों को उसके अंग के तौर पर लागू किया जा सकता है। इस नजरिए को पूरी तरह अपनाने में समय लग सकता है, लेकिन बाजार सुधार के लिए आगे की राह कुछ इस तरह हो सकती है।</p>
<p>तीनों कानूनों में से आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन सबसे कम समस्या वाला था। स्टॉक लिमिट लगाने के लिए एक प्रत्याशित तरीका अपनाना जरूरी था। इस कानून का विरोध इसके प्रावधानों की वजह से कम, बल्कि अन्य कानूनों के साथ जोड़कर देखे जाने की वजह से अधिक हुआ। आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन खत्म किए जाने के बाद भी ज्यादातर राज्यों में इसे अपनाया जा सकता है। राज्यों के पास मौजूदा अधिनियम के तहत भी स्टॉक लिमिट लागू करने का अधिकार है। केंद्र सरकार महज एक आदेश के जरिए राज्य सरकारों को अतिरिक्त अधिकार दे सकती है और अपने आप को आयात-निर्यात के नियंत्रण तथा निर्यातकों के लिए स्टॉक लिमिट से संबंधित नियमों तक सीमित रख सकती है।</p>
<p>इस तरह की नीति के दो स्पष्ट फायदे हैं। पहला, जिन राज्यों में सरप्लस उत्पादन होता है आमतौर पर स्टॉक लिमिट लगाने में उनकी रुचि नहीं होगी। इस तरह की मांग खपत वाले राज्यों से आती है। दूसरा, राज्य स्थानीय जरूरतों के आधार पर अलग-अलग कमोडिटी के लिए अलग स्टॉक लिमिट लगाने का फैसला कर सकते हैं। इस तरह का नजरिया अपनाने से साझेदारी वाली जवाबदेही सुनिश्चित होगी।</p>
<p>कांट्रैक्ट फार्मिंग आज की तारीख में एक हकीकत है। इसकी जरूरत कई कारणों से है- उचित और नई टेक्नोलॉजी को लाने, बाजार की मांग के मुताबिक फसल तैयार करने, एरोमेटिक पौधों, मसाले और स्पेशलिटी फूड जैसे खास तरह के खाद्य की बढ़ती मांग को पूरा करने, फसलों की कटाई इस तरह करने कि नुकसान कम हो और कचरा कम निकले तथा किसानों को उत्पाद की पूर्व निर्धारित कीमत मिले। अनेक फूड प्रोसेसिंग कंपनियां, बीज उत्पादक और सबसे महत्वपूर्ण पोल्ट्री कंपनियां कांट्रैक्ट फार्मिंग करती हैं। इनकी कांट्रैक्ट फार्मिंग सफल है और किसानों ने उसे स्वीकार भी कर लिया है। इसलिए अब अलग से कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कानून की जरूरत है या नहीं यह बहस का विषय है। कांट्रैक्ट फार्मिंग के लिए इंडियन कांट्रैक्ट एक्ट में अलग अध्याय जोड़ना (जिस तरह उत्पादक कंपनियों के लिए कंपनी कानून में जोड़ा गया था) ज्यादा अच्छा तरीका हो सकता है। कोई यह तर्क दे सकता है कि अन्य किसी भी कांट्रैक्ट की तरह यह भी खरीदार को पूर्व निर्धारित कीमत पर सामान की आपूर्ति करने का एक कांट्रैक्ट है, भले ही वह कृषि उत्पादों का हो। इससे जमीन छिन जाने की किसानों की जो मुख्य चिंता है वह भी दूर होगी। इसके अलावा यह केंद्र सरकार के कानूनी दायरे में भी आएगा।</p>
<p>इन तथ्यों के बाद हम सबसे विवादास्पद एपीएमसी कानून को देखते हैं। इस बात में कोई संदेह नहीं कि एपीएमसी में बड़े सुधार करने की जरूरत है। इस सुधार के पांच महत्वपूर्ण बिंदु हैः (1) किसानों को इस बात की स्वतंत्रता होनी चाहिए कि वे जब चाहें, जिस कीमत पर चाहें, जिसे चाहें और जहां चाहें अपनी उपज बेच सकें। (2) इस तरह की बिक्री पर एकाधिक टैक्स नहीं होना चाहिए, ना ही बिक्री से पहले या बाद में उपज लाने-ले जाने पर कोई रोक-टोक होनी चाहिए। (3) कृषि बाजार देश के कुछ हिस्सों में ही सफलतापूर्वक कार्य कर रहे हैं, खासकर ग्रामीण और जनजातीय बाजारों को बड़े पैमाने पर अपग्रेड करने और उन्हें बड़े बाजारों से जोड़ने की जरूरत है। (4) एग्री वैल्यू चेन में किसानों को बेहतर कीमत मिलनी चाहिए और इसके लिए ज्यादा पारदर्शिता और सूचनाओं की जरूरत है। (5) एपीएमसी को किसानों के मालिकाना वाले संस्थान में बदलने की जरूरत है, इनके गवर्नेंस में व्यापारियों और सरकार का प्रतिनिधित्व कम करना चाहिए। उनके नियंत्रण को तोड़ना मुश्किल है, अतः केंद्र सरकार को इसमें हस्तक्षेप करना पड़ेगा। 15 वें वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर सुधार लागू करने के लिए राज्यों को इंसेंटिव दिया जा सकता है। जेएनएनयूआरएम की तरह अन्य स्कीमों के लिए भी केंद्रीय ग्रांट को सुधारों से जोड़ा जा सकता है।&nbsp; राज्यों में सुधारों की गति तेज करने के लिए सभी केंद्रीय योजनाओं के लिए ऐसी शर्तें रखी जा सकती है। ग्रामीण बाजारों में बड़े निवेश की योजना पहली शर्त हो सकती है।</p>
<p>राज्य सरकारें क्या करें? कृषि राज्यों का विषय है इसलिए राज्यों के स्तर पर ज्यादा जिम्मेदारी और फैसले लेने में ज्यादा बड़ी भूमिका निभाने की जरूरत है। कृषि से जुड़ी अनेक नीतियां अतिकेंद्रीकरण के कारण नाकाम हो गई। पहले तो खाद्य सुरक्षा, पूरे देश में सरप्लस उत्पादों के बेहतर वितरण और हरित क्रांति की मांग के नाम पर इसे उचित करार दिया गया। लेकिन अब समय बदल गया है और उसके साथ चुनौतियां भी बदली हैं। अब लंबे समय से स्थानीय जरूरतों के आधार पर कृषि और फूड मैनेजमेंट सिस्टम अपनाने की जरूरत महसूस की जा रही है।</p>
<p>वर्षा आधारित इलाकों में कम संसाधन वाले किसानों ने अधिक चुनौतियों का सामना किया है और तुलनात्मक रूप से भी ज्यादा गरीब भी हैं। आमतौर पर सब्सिडी इनपुट पर आधारित होती है, इसलिए उन्हें इसका फायदा नहीं मिल पाता है। कृषि पारिस्थितिकी के नजरिए से देखा जाए तो संरक्षण और पुनरोत्पादन के लिए सरकारी ग्रांट पर उनका भी पूरा हक है। अब समय आ गया है कि उनके प्रयासों की पहचान की जाए और उन्हें पुरस्कृत किया जाए। इक्विटी आधारित सिस्टम अपनाकर भी उनके प्रयासों को पुरस्कृत किया जा सकता है।</p>
<p>इसका मतलब यह है कि कृषि के लिए बिल्कुल नया नजरिया अपनाना पड़ेगा जो इन बातों पर आधारित होगा: हमारे लोगों के लिए खाद्य एवं पोषण की आवश्यकता, यानी सेहतमंद और अलग तरह के खाद्य पदार्थ; आर्थिक टिकाउपन और किसानों का भला; मृदा, जल और पारिस्थितिकी को दीर्घ काल के लिए टिकाऊ बनाना और कृषि सुधारों के पक्ष में इंसेंटिव का ढांचा तैयार करना। इस तरह की नीति अपनाने के लिए विकेंद्रीकृत नजरिया होना जरूरी है, जिसमें स्थानीय चुनौतियों, समाधान और इनोवेशन को पर्याप्त जगह मिल सके।</p>
<p>जरूरी नहीं कि इन्हें राज्य स्तर तक सीमित किया जाए, बल्कि इन्हें पंचायत, गांव और समुदाय के स्तर तक ले जाया जा सकता है। 'लोकल के लिए लोकल' नया मंत्र हो सकता है। समग्र पॉलिसी ढांचे में स्पष्ट लक्ष्य और प्राथमिकताएं तय की जा सकती हैं। उत्साहित और हतोत्साहित किए जाने वाले सभी कदमों को ऐसे नतीजों से जोड़ने की जरूरत है जिन्हें मापा जा सके।</p>
<p>एक बार स्थानीय अपेक्षाओं और क्षमताओं की पहचान कर ली जाए तो फिर ऐसे बाजार सुधारों की जरूरत होगी जो एकीकृत राष्ट्रीय बाजार (ई-नाम तक सीमित नहीं) की बाधाओं को दूर करने में सक्षम होंगे। किसानों को अपनी उपज कहीं भी, किसी भी समय और किसी को भी बेचने की आजादी के साथ ग्रामीण क्षेत्र में इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत बनाना जरूरी है। मौजूदा हालात कृषि के बारे में नए सिरे से विचार करने का अच्छा अवसर है।</p>
<p><em><strong>(टी. नंद कुमार, कृषि और&nbsp; खाद्य मंत्रालय, भारत सरकार के पूर्व सचिव रह चुके हैं )</strong></em></p>
<p>&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ कृषि कानून तो खत्म लेकिन आगे का रास्ता क्या होगा ]]></media:description>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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        <title><![CDATA[समावेशी कृषि हो 2022 के लिए विकास का रोडमैप]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/inclusive-agriculture-is-the-right-roadmap-for-development-in-2022.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 04 Jan 2022 16:30:25 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/inclusive-agriculture-is-the-right-roadmap-for-development-in-2022.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अब देश के नीति निर्माताओं को अभी की जरूरत, वर्तमान संकट का उपाय जैसे शब्दों को नकार कर देश की समस्याओं के लिए स्थायी समाधान तलाशने होंगे। भ्रष्टाचार, निरक्षरता, शिक्षा व्यवस्था, स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली, गरीबी, जलवायु परिवर्तन, घटता भूजल स्तर, वायु प्रदूषण, ठोस अवशेष, महिला सशक्तीकरण, बेरोजगारी, कृषि संकट, बाढ़, सुखाड़, लंबित न्याय, सकल घरेलू उत्पाद आदि मुद्दे आज देश के सामने हैं जिनको प्राथमिकता के आधार पर हल करने की जरूरत है।</p>
<p>समस्या यह है कि नीति निर्माता, समाजसेवी, जन प्रतिनिधि, शासन, प्रशासन सभी वर्तमान समस्याओं का एक-एक हल करने में अपनी ऊर्जा लगाते हैं। अगर &ldquo;एकै साधे सब सधे, सब साधे सब जाय&rdquo; पर ध्यान दिया जाए तो शायद देश के विकास के लिए एक उचित रास्ता हम सब तय कर सकेंगे। इसलिए जरूरत है एक न्याय संगत अर्थव्यवस्था की, क्योंकि विश्व असमानता रिपोर्ट के अनुसार भारत एक "गरीब और बहुत असमान देश, एक समृद्ध अभिजात वर्ग के साथ" के रूप में खड़ा है, जहां शीर्ष 10 फीसदी के पास कुल राष्ट्रीय आय का 57 फीसदी हिस्सा है, जिसमें शीर्ष 1 फीसदी के पास 22 फीसदी है, जबकि नीचे के 50 फीसदी के पास सिर्फ 13 फीसदी है। इसके अलावा कोविड महामारी का दौर अरबपतियों के लिए स्वर्णयुग साबित हुआ। यह सिद्ध करता है कि जिन्दा रहने के लिए &lsquo;कौशल&rsquo; व जीने के लिए &lsquo;मानवीय&rsquo; जैसे पाठ्यक्रम शिक्षा में शामिल नहीं होंगे तब तक एक सर्कुलर इकोनॉमी स्थापित नहीं होगी।</p>
<p>शिक्षा, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और सकल घरेलू उत्पाद, कृषि, रोजगार, जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याओं में से किस मुद्दे को केंद्र में रखकर कार्य किया जाए जिसमें सभी समस्याओं का हल निकल सके। स्वास्थ्य को लेकर फिर से बिल गेट्स ने चेतावनी दी है कि अगली महामारी के लिए हम तैयार नहीं हैं। जलवायु परिवर्तन की समस्या से छुटकारा पाने के लिए फ्यूल व कोयले का उपयोग कम करने की बात की जाती है, कोई डार्विन के सिंद्धांत पर खेती करने की बात करता है, देश के नीति निर्माता किसान की आय बढ़ाने के लिए सिंचाई के लिए बांध बनाने की बात करते हैं, पलायन रोकने के लिए उद्योगों की, कभी बच्चों को अपने शरीर को समझने (सेक्स) के लिए शिक्षा पर जोर देने की बात की जाती है। यानी अलग-अलग तरीके से समस्याओं को हल करने की बात होती है।</p>
<p>मेरा मानना है कि भारत जैसे देश में अहिंसात्मक कृषि ही ऐसा माध्यम है जिनसे सभी समस्याओं का हल पाया जा सकता है। अहिंसात्मक कृषि से ही जल, जमीन, जैवविविधता, जलवायु परिवर्तन, मिट्टी, रोज़गार, कुपोषण, महिला सशक्तीकरण, पलायन, पशु, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य, सर्वमान्य बराबरी सभी का हल मिल सकता है।&nbsp;इसलिए सरकार को कृषि को केंद्र में रखकर योजनाएं बनानी चाहिए, तभी देश सर्व जन हिताय, सर्व जन सुखाय के सिद्धांत को प्रतिपादित कर सकता है।</p>
<p>अभी तक देश में विकास के लिए जो भी योजनाएं बनीं उनमें से हरित क्रांति ने देश की उपजाऊ मिट्टी, स्वास्थ्य, पशुधन आदि को, बांधों ने नदियों को, अर्थव्यवस्था ने मानवता व पर्यावरण को, निगल लिया। उदाहरण के लिए, जब खाद्य सुरक्षा की बात आती है, तो जनसंख्या भारत के लिए एक दायित्व बन गई है। दुनिया के कुल भूमि क्षेत्र के केवल 2.4 प्रतिशत के साथ भारत के पास दुनिया की कुल आबादी का 14 प्रतिशत हिस्सा है। जल संसाधनों का लगभग 4% हिस्सा है। यही कारण है कि भारतीय जल की कमी से परेशान हैं। 1951 में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 5,177 घन मीटर थी। 2011 की जनगणना के आंकड़ों में यह घटकर 1,545 घन मीटर हो गई। यानी 60 वर्षों में लगभग 70 प्रतिशत की गिरावट हुई है।</p>
<p>सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) की नई रिपोर्ट 'स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरनमेंट इन फिगर्स 2021' के अनुसार, भारत में चार जैव विविधता वाले हॉटस्पॉट हैं और इस क्षेत्र का 90% नष्ट हो चुका है। इतना ही नहीं, शिकागो विश्वविद्यालय के वायु गुणवत्ता जीवन सूचकांक (एक्यूएलआई) की रिपोर्ट के अनुसार भारत दुनिया का सबसे प्रदूषित देश है, 48 करोड़ से अधिक लोग या इसकी लगभग 40% आबादी उत्तर में भारत-गंगा के मैदानों में रहती है, जहां प्रदूषण का स्तर नियमित रूप से दुनिया में कहीं और पाए जाने वाले स्तर से अधिक है। अगर जलवायु परिवर्तन की बात की जाए तो एनसीईआई की रिपोर्ट के मुताबिक इस बर्ष नवम्बर का औसत तापमान सामान्य से 0.91 डिग्री सेल्सियस ज्यादा दर्ज किया गया। बीते 142&nbsp;वर्षों में यह चौथा मौका है जब नवंबर में बढ़ा हुआ तापमान दर्ज किया गया।</p>
<p>धरती पर जीवन के लिए छोटे से छोटा एवं बड़े से बड़ा जीव, पेड़-पौधे, नदियां, पहाड़ प्रत्येक जीव व वस्तु एक दूसरे पर प्राकृतिक चक्र से जुड़ा हुआ है। उदाहरण के लिए, मधुमक्खियां अगर लुप्त हो गईं तो इससे सारे मानव समाज का विनाश हो जाएगा क्योंकि मधुमक्खियों को अन्य किसी चीज अथवा प्राणी से विस्थापित नहीं किया जा सकता है। मधुमक्खियों तथा फूल-पौधों के बीच संबंध पृथ्वी पर सबसे व्यापक, सामंजस्यपूर्ण और परस्पर निर्भरता का है। करीब 10 करोड़ वर्षों पूर्व मधुमक्खियों तथा फूलों के मध्य सामंजस्य से यह पृथ्वी समृद्ध बनी थी। अतः इस ग्रह पर संपूर्ण मानव जाति के उत्थान में भी मधुमक्खियों का महत्व है।</p>
<p>एक सर्वे के मुताबिक यह भी पता चला कि इस विश्व में 87 प्रमुख खाद्य फसलें सम्पूर्ण या आंशिक रूप से परागण से ही संचालित हो पाती हैं। परागण की इस प्रक्रिया में मधुमक्खियां बहुत योगदान देती हैं। जिससे वे हजारों पशु-पक्षियों की विभिन्न प्रजातियों को भोजन उपलब्ध कराती हैं। पृथ्वी पर पौधों की विविध प्रजातियां पाई जाती हैं। इसका श्रेय मधुमक्खियों को ही जाता है। इसलिए विलुप्त होती प्रजातियों एवं प्रकृति के चक्र को संतुलित करने के लिए भारत को दो पहल करनी चाहिए। एक तो यह कि पर्यावरण संरक्षण के लिए &lsquo;ब्रह्माण्ड एक है&rsquo; के तहत पूरे विश्व में एक कानून लागू हो और दूसरा, ईकोसाइड को पांचवा अंतर्राष्ट्रीय अपराध घोषित कराने की पहल करनी चाहिए। विश्व बैंक जैसे संस्थानों को कुछ ऐसी योजनाएं शुरू करनी चाहिए जिनमें पैसे की जगह वस्तु विनिमय हो। इससे कुटीर उद्योगों को बढ़ावा मिलेगा और कुछ हद तक असमानता की खाई को भी पाटा जा सकेगा।&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; &nbsp;&nbsp;&nbsp;</p>
<p>अल्बर्ट&nbsp;आइंस्टीन ने भी पूंजीवाद को लेकर यह कहा था कि इस विकास का परिणाम निजी पूंजी का एक कुलीन वर्ग है, जिसकी विशाल शक्ति को लोकतांत्रिक रूप से संगठित राजनीतिक समाज द्वारा प्रभावी ढंग से नियंत्रित नहीं किया जा सकता है। कुल मिलाकर प्राकृतिक संसाधनों का खनन या उपयोग (जल, खनिज पदार्थ) देश की पर्यावरणीय वहन क्षमता का आकलन करने के बाद ही किया जाए। इसके लिए पंचतत्वों के लिए एक समग्र कानून बने क्योंकि जैव विविधता, जल, वायु आदि के लिए अलग-अलग नियम-कानून होने के कारण इनके कार्यान्वयन में दिक्क्त होती है। अतः पर्यावरण को जान बूझ कर नुकसान पहुंचाने वाले आसानी से बच निकलते हैं।</p>
<p>सरकार को चाहिए कि स्नातक और परास्नातक स्तर के छात्रों को जीवन के सभी पहलुओं विज्ञान, उदारता, अर्थ, समाज, यहां तक कि शरीर की जरूरतें (सेक्स) तक की जानकारी और युवाओं को कृषि के जोड़ने के मकसद से किसानों के पास तीन से छह महीने के लिए व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए भेजना चाहिए। इससे किसानों की कृषि मॉनिटरिंग होगी और कृषि क्षेत्र में नए आविष्कार तथा गांव स्तर पर कृषि से संबंधित उद्योगों को बढ़ावा भी मिलेगा।</p>
<p>विकास के लिए सिर्फ बड़ी परियोजनाओं की जरूरत नहीं है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिनमें छोटी योजनाओं से भी सुखद परिणाम प्राप्त किए गए हैं। गांधी के सिद्धान्तों को केंद्र में रखकर भविष्य की विकास योजनाएं अगर बनाई जाएं तो देश एक समग्र विकास की ओर न्याय संगत तरीके से चल पाएगा। हालांकि केंद्र सरकार ने गांधी के बताये ग्रामस्वराज के लिए कई योजनाएं लागू की हैं, लेकिन सकल घरेलू उत्पाद के चलते कुछ पहलुओं को नकार दिया जाना देश के विकास के लिए अच्छा नहीं माना जा सकता है। उदाहरण के लिए नदी जोड़ने की परियोजना के तहत केन-बेतवा नदी परियोजना है जिसमें जल, जंगल, जमीन के वास्तविक मूल्य को नकार दिया गया। जबकि ये सिद्ध हो चुका है कि तालाबों के माध्यम से बिना किसी नुकसान के लोगों की सिंचाई व पीने के लिए जल उपलब्ध करवाया जा सकता है। विकास परियोजनाओं में मानवीय दृष्टिकोण को शामिल करते हुए आम आदमी की भागीदारी सुनिश्चित हो, तभी हम गांधी के भारत को खुशहाल बना सकेंगे।</p>
<p><em><strong>&nbsp;(गुंजन मिश्रा पर्यावरणविद हैं और बुंदेलखंड उनका कार्यक्षेत्र है)&nbsp;&nbsp;</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ समावेशी कृषि हो 2022 के लिए विकास का रोडमैप ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[बढ़ती महंगाई से कोई अछूता नहीं,  इस पर लगाम जरूरी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/inflation-is-a-pick-pocket-must-be-arrested-soon.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 19 Dec 2021 12:53:32 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/inflation-is-a-pick-pocket-must-be-arrested-soon.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) के आधार पर&nbsp; थोक बाजारों में मुद्रास्फीति &nbsp;की दर &nbsp;नवंबर में 14.23 फीसदी पर पहुंच गई जो&nbsp; पिछले &nbsp;कई दशकों &nbsp;में सबसे ज्यादा है । यह स्थिति &nbsp;देश के नीति विश्लेषकों और&nbsp; अर्थशास्त्रियों के अनुसार बहुत बडा झटका देने वाली है लेकिन इस स्थिति से वास्तव&nbsp; मे नीतिनिर्धारक कितने चिंतित है इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है।&nbsp; पिछले आठ महीने से मुद्रास्फीति दहाई &nbsp;में बनी हुई है &nbsp;।</p>
<p>जैसे पहले के लेखों मे भी उल्लेख किया गया है ,खुदरा और थोक दोनों स्तरों पर मुद्रास्फीति सिस्टेमेटिक हो गई है । कीमतों की वृद्धि दर में अधिक उछाल &nbsp;मुख्य रूप से अधिकांश उपसमूहों में आया है। जिनमें हमेशा की तरह ईंधन औऱ बिजली जैसे उत्पादों की कीमतों में अधिक&nbsp; बढोतरी हुई है। जिनमें नवंबर, 2021 में सालाना आधार पर वृद्धि दर 40 फीसदी तक &nbsp;पहुंच गई &nbsp;है ।</p>
<p>मंहगाई उस &nbsp;जेब कतरे की तरह &nbsp;है जो किसी को भी नही बख्शता है । लेकिन चाहे गांव हो या शहर&nbsp; मंहगाई की मार &nbsp;को सबसे ज्यादा अधिक गरीब &nbsp;को ही सहना पडता &nbsp;है। यह विडंबना ही है कि गांव के लोग, विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसान खुद को इस बात से ठगा हुआ पाते हैं कि जिस फसल को अन्होंने &nbsp;कम कीमतों पर बेचा था वह उस समय अचानक &nbsp;प्रीमियम हो जाता है, जब उनके पास उनके खुद &nbsp;के उपयोग &nbsp;के &nbsp;लिए स्टॉक खत्म हो जाता है। पीड़ा तब और बढ़ जाती है जब उन्हें एक ही वस्तु को उनके बिक्री मूल्य की तुलना में अधिक कीमत पर खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ता है । लेकिन, क्या किसान साल भर के लिए स्वयं के उपभोग के लिए पर्याप्त अनाज का भंडारण नहीं करते हैं? खैर, जो लोग ग्रामीण अर्थव्यवस्था से वाकिफ हैं, उन्हें पता होगा कि स्व-उपभोग के लिए भी भंडारण की यह सुविधा सभी किसानों के लिए उपलब्ध नहीं है, क्योंकि वह फसल के समय नकदी के लिए बेताब होते &nbsp;हैं ।</p>
<p>इसके लिए गेहूं एक उत्कृष्ट उदाहरण है। जब अप्रैल में फसल आती है, तो किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य पाने के लिए संघर्ष करते हैं, लेकिन दिसंबर, जनवरी आते ही इस मुख्य खाद्यान्न की कीमत &nbsp;बढ़ जाती है। इसके अलावा &nbsp;वार्षिक मुद्रास्फीति इस स्थिति को &nbsp;और भी कठिन बना देती है।</p>
<p>नवंबर, 2021 में गेहूं की कीमतों में लगातार दूसरे साल &nbsp;10 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है। &nbsp;अगर इस वृद्धि को तिलहन के साथ मिलाएं, जिसमें लगभग 25 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई तो रसोई का बजट खराब हो जाता है &nbsp;क्योंकि तिलहन की ऊंची कीमत का मतलब है खाना पकाने के तेल की खुदरा कीमत में वृद्धि ।</p>
<p>डब्ल्यूपीआई के आधार पर&nbsp; थोक मुद्रास्फीति और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) द्वारा मापी गई खुदरा मुद्रास्फीति के बीच एक बहुत बड़ा अंतर है। नवंबर में थोक मूल्य सूचकांक में 14.23 फीसदी की बढ़ोतरी के मुकाबले सीपीआई में 4.91 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। इससे हम क्या समझ सकते है? सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण, थोक मूल्य सूचकांक खुदरा स्तर पर मूल्य वृद्धि की उच्च गति के लिए एक प्रारंभिक संकेत है। इसमें कम से कम एक दो महीने का अंतराल है। डब्ल्यूपीआई बास्केट में अधिकांश मदों में अंतिम खपत के उत्पादों के इनपुट शामिल होते हैं। हमारे पास ऐसी स्थिति नहीं हो सकती है जहां थोक मूल्य सूचकांक एक ऊंचे स्तर पर बना रहे, जबकि सीपीआई तथाकथित भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के चार फीसदी (दो फीसदी प्लस-माइनस) के लक्ष्य &nbsp;के भीतर बना रहे। पिछले 18 महीनों से भी अधिक समय से, आरबीआई ने जमाकर्ताओं को नकारात्मक रिटर्न देना जारी है, जो &nbsp;सरकार सहित बड़े उधारकर्ताओं के पक्ष में है।</p>
<p>थोक और खुदरा मुद्रास्फीति के बीच व्यापक अंतर का एक अन्य संभावित कारण मांग में कमी के कारण खुदरा विक्रेताओं की मूल्य निर्धारण शक्ति का ह्रास हो सकता है। हम एक अजीबोगरीब स्थिति में हैं। आमतौर पर, बढ़ती मुद्रास्फीति बढ़ती मांग का संकेत है के लेकिन मांग में वृद्धि केवल पूर्व-कोविड स्तर पर आंशिक वापसी है। क्या यह मुद्रास्फीतिजनित मंदी है? यह &nbsp;नहीं कहा जा &nbsp;सकता!</p>
<p>तो मुद्रास्फीति को तत्काल रूप में मात देने के लिए सरकार क्या कर सकती है? प्रणालीगत कारकों को ठीक करने के बारे में भूल जाइए क्योंकि उनमें से ज्यादातर को सरकार द्वारा तय नहीं किया जा सकता है। &nbsp;उदाहरण के लिए ऊर्जा की कीमतों को ही ले लीजिए। सबसे पहले तो, सरकार को कम से कम &nbsp;सचिवों की एक अधिकार प्राप्त अंतर-मंत्रालयी समिति को फिर से सक्रिय करना चाहिए। इस समिति को साप्ताहिक आधार पर बैठक करनी चाहिए और चर्चा &nbsp;करनी चाहिए कि सबसे प्रभावी कदम क्या हो जा सकता है। जैसे आयात शुल्क में बदलाव, जीएसटी में कटौती (राज्यों के सहयोग से), वस्तुओं की स्टॉक सीमा की समीक्षा करना, परिवहन सब्सिडी देना आदि। इसके अलावा, सरकार अपनी एजेंसियों जैसे भारतीय खाद्य निगम, नैफेड और राज्य स्तरीय सहकारी समितियों की मदद से बाजार में हस्तक्षेप कर सकती है। इस तरह के हस्तक्षेप का मुनाफाखोरी पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है। साथ ही मंत्री और सचिव &nbsp;उद्योग के शीर्ष नेताओं की बैठकें बुलाकर उन्हें सीमेंट, स्टील, रिफाइंड खाना पकाने के तेल जैसी वस्तुओं की कीमतों पर लगाम लगाने के लिए कह &nbsp;सकते है।</p>
<p>&nbsp;बढ़ती महंगाई के ग्राफ को उलटने और एक आम महिला की कठिनाई को कम करने के लिए तत्काल सरकारी हस्तक्षेप बेहद जरूरी है।</p>
<p><em><strong>(प्रकाश चावला सीनियर इकोनॉमिक जर्नलिस्ट है और आर्थिक नीतियों पर लिखते हैं)</strong></em></p>
<p>&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ बढ़ती महंगाई से कोई अछूता नहीं,  इस पर लगाम जरूरी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[क्यों चंपारण और खेड़ा के किसान आंदोलनों से बड़ा है मौजूदा किसान आंदोलन]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/why-current-farmers-movement-is-bigger-than-champaran-and-khera-movements.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 11 Dec 2021 11:53:02 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/why-current-farmers-movement-is-bigger-than-champaran-and-khera-movements.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>आज यानी 11 दिसंबर को गुरू ग्रंथ साहिब के पाठ और हवन के बाद किसान दिल्ली की सीमाओं पर लगे मोर्चों से अपने घरों को वापसी करेंगे। 378 दिन चला किसान आंदोलन देश और दुनिया के इतिहास में एक ऐसा मुकाम बना चुका है जिसके दोहराये जाने की कल्पना अभी संभव नहीं है। केंद्र सरकार द्वारा जून, 2020 में अध्यादेशों के जरिये लाये गये तीन नये कृषि कानूनों के खिलाफ लगभग शांतिपूर्ण चले इस आंदोलन ने कई लोकतांत्रिक मूल्यों और अहिंसक विरोध की सफलता को मजबूती से दर्ज किया है। महात्मा गांधी के आदर्शों पर चलने वाला हाल के दशकों का यह सबसे बड़ा उदाहरण है। जिसके केंद्र में अहिंसा, धैर्य और अपने मकसद की कामयाबी के लिए आंदोलनरत किसानों का भरोसा था। यह आंदोलन आजादी के पहले और उसके बाद से अभी तक के देश के सभी किसान आंदोलनों के मुकाबले समग्रता और अपने उद्देश्यों को हासिल करने वाला सबसे सफल आंदोलन माना जा सकता है। इस आंदोलन ने देश में कृषि और किसान को देखने का नजरिया बदलने के साथ ही 1991 की आर्थिक उदारीकरण की नीतियों के बाद पहली बार कृषि क्षेत्र को नीति-निर्धारण, संसदीय बहस, राजनीतिक विमर्श और आर्थिक नीतियों के केंद्र में ला खड़ा किया है।</p>
<p>इन कारकों के चलते ही यह आंदोलन आजादी के पूर्व और बाद में चले डेक्कन रॉयट्स, मापला रिबैलियन, चंपारण, खेड़ा और बारदौली के किसान आंदोलनों से अलग छाप इतिहास में दर्ज कर गया है। मई- जून 1875 में पुणे और अहमदनगर के आसपास के मराठा किसानों द्वारा साहूकारों के घरों, संपत्तियों और जमीनों के दस्तावेजों जला दिया था। इसीलिए इस हिंसक किसान आंदोलन को डेक्कन रॉयट्स कहा गया। 1921 से 1922 के बीच केरल के मालाबार इलाके के मुस्लिम किसानों ने भी साहूकारों के खिलाफ हिंसक आंदोलन किया था जिसे मापला विद्रोह कहा गया। लेकिन चंपारण में 1917 में गांधी जी के नेतृत्व वाला किसान आंदोलन, 1918 में खेड़ा भी महात्मा गांधी के नेतृत्व में और बारदौली में 1928 में सरदार पटेल और दूसरे किसान नेताओं द्वारा चलाये गये आंदोलन अहिंसक आंदोलन थे। गुजरात के किसान आंदोलन में पाटीदार किसानों की भागीदारी थी। मौजूदा किसान आंदोलन चंपारण, खेड़ा और बारदौली के आंदोलनों की तरह अहिंसक रहा लेकिन इसकी व्यापकता इन सबसे कहीं अधिक है जो पिछले आंदोलन से इसे बड़ा और अधिक कामयाब साबित करती है। &nbsp;&nbsp;</p>
<p>तीन नये कृषि कानूनों के बनने के बाद से ही जिस तरह से किसान इन कानूनों के खिलाफ जाना शुरू हुए उसकी सुबगुबाहट को देख उस वक्त इस लेखक को नहीं लगता था कि आने वाले दिन देश में किसान आंदोलनों का नया इतिहास लिखने जा रहे हैं। हर दिन इसका आकार और दायरा बढ़ने के साथ मांगों को मानवाने के लिए रणनीति बनाने और उन पर अमल करने में सुधार होता गया। आंदोलन शुरू हुआ तो न इसका नेतृत्व बहुत साफ और प्रभावशाली था और न ही किसान संगठनों को एक साथ लाने के लिए बड़ा मंच बनता दिख रहा था। पंजाब में 30 से ज्यादा किसान जत्थेबंदियों ने आंदोलन तेज किया, लेकिन लगा कि इतने संगठन कैसे लंबा आंदोलन चला पाएंगे और कैसे साथ चल पाएंगे। हरियाणा में भी शुरुआत में कोई बड़ा संगठन आंदोलन चलाता नहीं दिख रहा था और उत्तर प्रदेश में दो किसान संगठनों ने कृषि कानूनों का विरोध शुरू किया। लेकिन सितंबर, 2020 से इस आंदोलन ने अपना स्वरूप राष्ट्रीय बनाना शुरू किया। संगठनों के बीच तालमेल शुरू हुआ, जो 26 नवंबर, 2020 के दिल्ली कूच की घोषणा और 8 दिसंबर के भारत बंद के आह्वान के फैसले के रूप में सामने आया। उसके बाद 27 नवंबर, 2020 को किसानों का दिल्ली की सीमाओं पर पहुंचना, पंजाब के किसानों और हरियाणा के किसानों का एकजुट होना। उत्तर प्रदेश की सीमा पर 29 नवंबर से मोर्चा लगना, यह सब इसे धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्वरूप दे रहा था। इस तालमेल ने 40 किसान सगंठनों का संयुक्त किसान मोर्चा दिया। जो सरकार के साथ वार्ताओं की शर्त तय करने के साथ ही आंदोलन की समाप्ति की मुख्य मांग तक उस पर अडिग रहा। 11 दौर की वार्ता की नाकामी, सुप्रीम कोर्ट में मामले के जाने, समिति गठित करने, 26 जनवरी, 2021 का दिल्ली का ट्रैक्टर मार्च और लालकिला हिंसा। 22 जनवरी के बाद वार्ता का टूटना, यह सब कुछ इस आंदोलन के पड़ाव बनते गये लेकिन आंदोलन चलता रहा। बैक डोर डिप्लोमेसी, किसानों के ऊपर दर्ज हजारों मुकदमें, संयुक्त किसान मोर्चा के मुताबिक आंदोलन के दौरान 700 से अधिक किसानों की मौत होना। इतना सब कुछ होने के बाद भी 26 और 28 जनवरी, 2021 की शाम तक के मौकों को छोड़ दें तो कहीं ऐसा नहीं लगा कि आंदोलन कमजोर हो रहा है, आंदोलन टूट रहा है, किसानों का हौसला कमजोर हो रहा है। हां कई बार नेतृत्व में यह आशंका जरूर दिखी कि शायद सरकार किसी भी कीमत पर तीन कानूनों को वापस लेने के लिए तैयार होगी। यह अकेला ऐसा आंदोलन है जिसने सर्दी, गरमी और बरसात तीनों मौसम और उनकी दिक्कतों को दिल्ली की सीमाओं पर झेला। लेकिन हर मुश्किल के साथ यह आंदोलन देश के जनमानस को झकझोर रहा था। खासतौर से उन लोगों के मानस को जो खेती, किसानी, गांव और उस पर जीवन बसर करने वाले लोगों को थोड़ा सा भी समझते हैं। कई तरह के आरोप-प्रत्यारोप, मीडिया मैनेजमेंट, अप्रत्यक्ष दबाव आये लेकिन आंदोलन में शिरकत कर रहे किसान और आंदोलन का नेतृत्व अपनी मांग पर अडिग रहा। &ldquo;तीन कानूनों की वापसी के बाद ही घर वापसी&rdquo; और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर कानूनी गारंटी की मांग को इस आंदोलन ने समाज के हर वर्ग तक पहुंचाने में कामयाबी हासिल की।</p>
<p>आंदोलन का एक अहम पक्ष इसको सामाजिक व्यवस्था और सांस्कृतिक क्षेत्र की मदद रही। मीडिया के खास नजरिये के चलते अक्सर आरोपों में रहने वाली खाप पंचायतों ने इस आंदोलन के दौरान साबित किया वह किसान आंदोलन को ऊर्जा देने वाली एक अहम व्यवस्था रही। वहीं गुरुद्वारों के लंगर और सिख समुदाय की कम्यूनिटी सर्विस इस आंदोलन के ऐसे पक्ष हैं जिसने आंदोलन को खड़ा रखने वाली रीढ़ का काम किया। वहीं पंजाब और हरियाणा के मुख्यधारा के गायकों और लोक गायकों व संस्कृति कर्मियों ने आंदोरनरत युवाओं, बुजुर्गों, बच्चों और महिलाओं के बीच लगातार अपनी मांगों के लिए डटे रहने की भावनात्मक ताकत देने का काम किया। जो अभी तक के किसी आंदोलन में इतने व्यापक स्तर पर देखने को नहीं मिला था।</p>
<p>पिछले कई दशकों में ऐसा पहली बार हुआ है कि जब देश में मीडिया के तमाम माध्यमों प्रिंट, डिजिटल और इलेक्ट्रानिक में कृषि क्षेत्र, कृषि नीति और किसान व ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर इतनी कवरेज और चर्चा हुई हो। साथ ही अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भारत की कवरेज का भी इस आंदोलन ने नया कीर्तिमान बनाया है। वैश्विक मीडिया के लिए भी यह आंदोलन चौंकाने वाला तो था कि साथ ही एक उदाहरण पेश कर रहा था क्योंकि दुनिया में इस तरह का इतने बड़े जनमानस की भागीदारी वाला आंदोलन इतना लंबा हाल के दशकों में कहीं नहीं चला है।</p>
<p>जहां से इस लेख की शुरुआत होती है उसकी तुलना में कुछ बातें प्रासंगिक हैं। चंपारण का आंदोलन महात्मा गांधी के उस आंदोलन का हिस्सा होने के चलते मजबूत हुआ और कामयाब हुआ। खेड़ा और बारदौली में गुजरात के किसानों के साथ महात्मा गांधी और पटेल जैसा नेतृत्व था। लेकिन मौजूदा किसान आंदोलन के साथ ऐसा कोई चमत्कारिक नेतृत्व नहीं है। इसके बावजूद आंदोलन चला और कामयाब हुआ। इस आंदोलन की खूबसूरती यह है कि इसने एक सामूहिक नेतृत्व पैदा किया। सहकार की भावना से एक उद्देश्य के लिए काम करने वाले तमाम संगठनों के इस सामूहिक नेतृत्व ने यह उदाहरण पेश कर दिया कि किसी बड़ी कामयाबी के लिए चमत्कारिक नेतृत्व जरूरी नहीं है। साथ ही किसी एक व्यक्तित्व की छत्रछाया की बजाय लोकतांत्रिक तरीके से भी फैसले लेकर उन पर अमल संभव है। इसलिए आज जब 11 दिसंबर को दिल्ली की सीमाओं से किसानों कि वापसी शुरू हो रही है तो उस दिन किसानों के पास उनके मुद्दों को उठाने और उन पर लड़ने के लिए संयुक्त किसान मोर्चा के रूप में नेतृत्व का एक सामूहिक संगठनात्मक ढांचा है। साथ ही साल भर से अधिक चले किसान आंदोलन ने किसान नेताओं के वह चेहरे देश के सामने ला दिये हैं जिन्हें लोग पहचानते हैं। वह भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत हो, बलबीर सिंह राजेवाल हों, अशोक धवले हों, जोगिंदर सिंह उग्राहा हों, गुरनाम सिंह चढ़ूनी हों, दर्शनपाल हों, योगेंद्र यादव हों, युद्धवीर सिंह हों या दूसरे किसान नेता, इनकी पहचान देश के हर हिस्से में किसानों के बीच बन चुकी है।</p>
<p>दूसरे जहां चंपारण का आंदोलन नील की खेती करने वाले किसानों के मुद्दे और मौजूदा बिहार के एक खास भौगोलिक हिस्से में था वहीं डेक्कन रॉयट्स, मापला विद्रोत, खेड़ा और बारदौली का आंदोलन किसानों के ऊपर लगने वाले लगान के मुद्दे तक तक सीमित था। मौजूदा आंदोलन को भले ही मोर्चों की मौजूदगी के आधार पर हम पूरे देश में उपस्थिति के रूप में नहीं देखें लेकिन राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में इसकी भौगोलिक स्तर पर सक्रियता और आंदोलन के दौरान देश के अधिकांश राज्यों में आयोजित हुई किसान पंचायतें इसे अभी तक के सबसे बड़े आंदोलन के रूप में स्थापित करती हैं।</p>
<p>आंदोलन की मागों के दायरे की बात करें तो इस आंदोलन ने देश की समग्र कृषि नीति और उससे जुड़े फैसलों को बदल दिया है। साथ ही सरकार द्वारा जिन कानूनों को अध्यादेश के जरिये बहुत जल्दी लागू करने के मकसद से लाया गया था। उनको संसद में पारित कर कानून में तब्दील कराया गया, उसी तरह से इन कानूनों को संसद के जरिये निरस्त करने का विधेयक भी उसी तेजी के साथ पारित कराया गया। स्वतंत्र भारत के इतिहास में इस तरह का शायद ही कोई दूसरा उदाहरण है जिसमें किसी एक सरकार द्वारा लागू किये गये कानूनों को इतने कम समय में निरस्त किया गया हो। इस आंदोलन की दूसरी प्रमुख मांग एमएसपी पर कानूनी गारंटी का कानून बनेगा या नहीं, यह भविष्य के गर्भ में है लेकिन किसानों के बीच एमएसपी की अहमियत और उसके जरिये किसानों को उनकी फसलों का वाजिब दाम को लेकर ऐसी जागरूरता पैदा हो गई है कि यह सरकार की कृषि नीति के केंद्र में रहने वाले सबसे अहम मुद्दा बन गया है।</p>
<p>कल शुक्रवार 10 दिसंबर की शाम को जब यह लेखक गाजीपुर बार्डर के आंदोलन के मोर्चे पर गया तो देखा कि वहां किसानों ने अपनी ट्रालियों को दीवाली की तरह सजाया हुआ था। मंच के पास से दूर तक रोशनी करने वाली फ्लैश लाइटें चल रही थी। कहीं कोई तनाव नहीं था। कुछ जगहों पर मिठाई बांटी जा रही थी। अब यहां पुलिस और प्रशासन सहज और सब कुछ पहले जैसा हो जाने की बात कर रहा था। वहीं फ्लाइओवर के नीचे इस लेखक और आंदोलन के सबसे प्रमुख चेहरे राकेश टिकैत ने एक लंगर में भोजन करते हए बातचीत की तो उनका कहना था कि इस जगह की किस्मत है कि इसने साल भर तक किसानों को यहां आंदोलन चलाने का ठिकाना दिया। जिस तरह से आंदोलन देश दुनिया में अपनी पहचान बना गया उसी तरह गाजीपुर बार्डर को भी दुनिया जान गई। कल सुबह गुरू ग्रंथ साहिब के पाठ और हवन के बाद किसान अपने घरों को लौटना शुरू हो जाएंगे।</p>
<p>इस आंदोलन ने बहुत सारे उतार-चढ़ाव देखे। सरकार और संयुक्त किसान मोर्चा के बीच मांगों पर सहमति बनने के बाद इस आंदोलन की समाप्ति भी एक नया उदाहरण पेश कर रही है। अंतिम दौर में भले ही दोनों पक्षों के बीच टेबल पर कोई वार्ता तो नहीं हुई लेकिन 19 नवंबर को गुरू पर्व के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राष्ट्र को संबोधन में तीन कानूनों की वापसी की घोषणा, उसके बाद कानूनों को निरस्त करने की संसदीय प्रक्रिया का पूरा होना, संयुक्त किसान मोर्चा और सरकार के बीच मांगों पर सहमति बाद केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के सचिव का पत्र संयुक्त किसान मोर्चा को पत्र आंदोलन को इसकी परिणति तक ले गया। यह घटनाक्रम भी अपने आप में ऐतिहासिक बन गया है। &nbsp;&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ क्यों चंपारण और खेड़ा के किसान आंदोलनों से बड़ा है मौजूदा किसान आंदोलन ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[किसानों को वोट बैंक के रूप में खारिज करने की बजाय कारपोरेट जगत उन्हें सहयोगी मान कर काम करे]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/do-not-dismiss-farmers-as-vote-banks-india-inc-treating-them-as-partners-must-be-the-way-forward.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 07 Dec 2021 16:35:10 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/do-not-dismiss-farmers-as-vote-banks-india-inc-treating-them-as-partners-must-be-the-way-forward.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p></p>
<p>भारत जैसे जीवंत लोकतंत्र में बहुराष्ट्रीय कंपनियों सहित कॉरपोरेट्स राजनीतिक अर्थव्यवस्था को नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं। सरकारें उन लोगों द्वारा चुनी जाती हैं जिनका राजनीतिक शक्तियों पर पहला दावा होता है। लेकिन जो लोग सरकारों और नेताओं को चुनते हैं उन्हें तिरस्कारपूर्वक ''<span>वोट बैंक</span>'' <span>का नाम दिया जाता&nbsp; है। वोट बैंक एक बुरा शब्द बन गया है</span>, <span>हालांकि यह वही वोट हैं जो सरकार की प्राथमिकताओं को प्रभावित करती है क्योंकि वोट ही सरकार चुनते हैं। ऐसी स्थिति &nbsp;होना नामुमकिन &nbsp;है जहां तथाकथित जानकार लोगों द्वारा विशुद्ध आर्थिक सिद्धांतों के तर्क पर वोट बैक को &nbsp;खारिज कर दिया जाता है। &nbsp;कुछ ऐसा ही हाल भारतीय कारपोरेट जगत का है। जमीनी स्तर पर लोकप्रिय राय को सही ढंग से देखने की बजाय</span>, <span>जब आम जनता के कल्याण की अनुकूल नीतियों और निर्णयों की बात होती तो वह इनके विरोधी के रूप में दिखते हैं। </span></p>
<p>भारतीय कारपोरेट जगत आम तौर पर लोक लुभावन माहौल को समझने में सक्षम नहीं है, <span>खासतौर से यह बात उस समय अधिक सटीक बैठती है जब बात &nbsp;किसानों की होती है। जब एक &nbsp;बैवरेजेज और&nbsp; स्नैक्स&nbsp; बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनी ने गुजरात के किसानों के खिलाफ आलू की एक खास किस्म पर पेटेंट का दावा किया था। फिर उस जानी-मानी आलू चिप्स बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनी ने करोड़ों रुपये का &nbsp;दावा किया किसानो के खिलाफ किया था। &nbsp;सरकार से बातचीत के बाद कंपनी ने विवाद का निपटारा किया। इसके बाद प्रोटेक्शन ऑफ प्लांट वेरायटी एंड फार्मर्स राइट अथारिटी (पीपीवीएफआर) में दायर एक आवेदन के चलते आलू की इस किस्म के पंजीकरण को हाल ही में रद्द कर दिया गया। &nbsp;पिछले दिनों आये एक फैसले में आलू की इस विशेष किस्म के पंजीकरण को रद्द करने तक घटनाक्रम &nbsp;इस&nbsp; बात को &nbsp;दर्शाता है कि कैसे कॉर्पोरेट जगत किसान सबसे महत्वपूर्ण हितधारकों के साथ बिल्कुल भी सहानुभूति नहीं रखते है - चाहे वह किसान हों या असंगठित कामगार।</span></p>
<p>पीपीवीएफआरए का यह फैसला संयोग से उस समय आया है जब देश के किसान हाल ही में रद्द किये गये तीन कृषि कानूनों के खिलाफ और कई अन्य मांगों पर आंदोलन चला रहे किसानों के मुद्दों में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के लिए कानूनी गारंटी की मांग के अलावा लंबित बीज विधेयक और बिजली संशोधन विधेयक के खिलाफ नाराजगी भी शामिल है। निरस्त कानूनों के अलावा,<span> दो अन्य विधेयक</span>, <span>जिन्हें आर्थिक सुधारों के रूप में जाना जाता है उनके भी रुकने की संभावना बन रही है ।</span></p>
<p>विपक्षी दलों और आंदोलनकारी किसानों की आम धारणा यह रही है कि सरकार ने किसानों के साथ व्यापक चर्चा और परामर्श के बिना ही बदलाव लाने की कोशिश की जिसके नतीजे को लेकर ज्यादातर किसानों में बहुत सारे संदेह और शंकाएं थी। एक तरह से सरकार को इस बात के लिए आलोचना का शिकार होना पड़ा है।</p>
<p>लेकिन उन कॉरपोरेट्स के बारे में क्या जो &nbsp;भारतीय कृषि कारोबार में एक बड़े हिस्से की उम्मीद कर रहे थे और उसके लिए उनका रास्ता वह था जिसे अक्सर पिछले दरलवाजे से एंट्री के रूप में जाना जाता है। &nbsp;इसे जहां कानूनी रूप से और समानता के सिद्धांत में गलत माना जाता है वहीं व्यावसायिक अर्थों में भी यह उचितनहीं है। आखिरकार खाद्य, <span>सब्जियां</span>, <span>दूध</span>, <span>खाद्य तेल</span>, <span>पशुधन और प्रसंस्करण से जुड़ी कृषि अर्थव्यवस्था में उत्पादकों</span>, <span>प्रसंस्करण करने वाले उद्योगों</span>, <span>मार्केटिंग और उपभोक्ताओं के बीच &nbsp;विश्वास की जरूरत होती है। सरकार का काम केवल जरूरत पड़ने पर रेगुलेट करना है । इस व्यवसाय को विश्वास की नींव पर खड़ा किया जाना चाहिए &nbsp;जिसमें हितधारकों का हाथ थामने की जरूरत होती है</span>, <span>न कि उन्हें मुकदमेबाजी में फंसाकर उनका उत्पीड़न का तरीका अपनाना।&nbsp; पीपीवीएफआरए का आदेश इसी कठिनाई की ओर इशारा करता है।</span></p>
<p>आलू की किस्म के रजिस्ट्रेशन को रद्द कराने वाले&nbsp; याचिकाकर्ता के इस दावे में &nbsp;कोई संदेह नहीं है कि कंपनी के कदम ने ऐसे बहुत&nbsp; से किसानों को कठिनाई में डाल दिया गया था जिनके ऊपर किस्म का दुरुपयोग कर करने के चलते &nbsp;भारी जुर्माना देने की संभावना बन रही थी। हालांकि इत्तेफाक से ऐसा अभी तक नहीं हो पाया था। शुक्र है कि पीपीवीएफआरए के फैसले के चलते यह स्थिति नहीं आई और उस स्थिति में सरकार किसानों के ऊपर ही दोष मढ़ती। जहां तक भारतीय कारपोरेट जगत की बात है तो उसे यह बात समझ लेनी चाहिए कि वोट बैंक जैसे शब्द के जो मायने वह निकालता है उसे छोड़कर किसानों के साथ मिल कर काम करना चाहिए जिसमें सभी के हित निहित हैं।&nbsp;</p>
<p><em><strong>(प्रकाश चावला सीनियर बिजनेस जर्नलिस्ट हैं और आर्थिक नीतियों व विषयों पर लिखते हैं)</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ किसानों को वोट बैंक के रूप में खारिज करने की बजाय कारपोरेट जगत उन्हें सहयोगी मान कर काम करे ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[सुधारों के जरिये  इनपुट लागत पर नियंत्रण की कोशिश होती है, खाद्य सब्सिडी को लेकर भ्रम टूटना जरूरी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/reforms-mean-controlling-input-costs-food-subsidy-goes-to-poor-not-pocketed-by-farmers.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 25 Nov 2021 20:32:47 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/reforms-mean-controlling-input-costs-food-subsidy-goes-to-poor-not-pocketed-by-farmers.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>विवादास्पद कृषि कानूनों को वापस लेना संसदीय प्रक्रिया का मामला है। जो लोग इन तीन कानूनों को वापस लेने पर कृषि सुधारों के लिए गंभीर झटका मान रहे है। वह लोग इस निर्णय लेकर काफी &nbsp;निराश भी होंगे । उन लोगों का कहना है कि कृषि में जब तक निजी क्षेत्र की भागीदारी नहीं आएगी तब तक भारतीय कृषि की प्रगति के बारे में सोचा नहीं जा सकता है। निजी निवेश के बिना जहां आज कृषि है उसी स्थिति में रहेगी। हाल ही में बैंकरों के एक &nbsp;शिखर सम्मेलन में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा चिंता व्यक्त की गई थी कि कृषि में निजी क्षेत्र का निवेश लगभग नगण्य है।</p>
<p>इसलिए कृषि सुधारों के पैरोकार यह मानते हैं कि जब तक भारतीय कृषि को पूरी तरह से बाजार के हवाले नहीं किया जाता है तब तक चीजें नहीं बदलेगी। लोग अक्सर खाद्य सब्सिडी का&nbsp; उदाहरण देते हुए किसानों को सब्सिडी नहीं &nbsp;देने की बात करते हैं ।</p>
<p>खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय द्वारा चालू वित्त वर्ष के बजट साल 2021-22 में 2.43 लाख करोड़ रूपए की खाद्य सब्सिडी प्रदान की गई है। यह पैसा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में राशन की दुकानों पर लगभग मुफ्त राशन उपलब्ध कराने पर खर्च किया जाता है। आइए जानते&nbsp; सब्सिड़ी किसको जाती है। यह किसानों के पास जाती है या नही ? हम शोर मचाते रहते हैं, 'खाद्य सब्सिडी' किसानों की जेब में जाती है।</p>
<p>पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के एक विश्लेषण के अनुसार, खाद्य सब्सिडी का उद्देश्य इस तरह पूरा होता है। एफसीआई और राज्य एजेंसियां ​​सरकार द्वारा अधिसूचित न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर किसानों से खाद्यान्न खरीदती हैं। यह खाद्यान्न सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत उचित मूल्य की दुकानों के माध्यम से आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को रियायती मूल्य पर उपलब्ध कराया जाता है। केंद्र और राज्य सरकारें राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के साथ-साथ कुछ अन्य कल्याणकारी योजनाओं जैसे मध्याह्न भोजन योजना के तहत लाभार्थियों को रियायती खाद्यान्न उपलब्ध कराती हैं। खाद्य सब्सिडी को खत्म करने की मांग करने वालों को पता होना चाहिए कि इसका मतलब सभी राशन की दुकानों को बंद करना होगा। खाद्य सब्सिडी शहरों और गांवों में गरीबों की मदद करने के लिए दी जाती है, न कि किसानों को आर्थिक मजबूती के लिए ।</p>
<p>अब आइए&nbsp; किसानों की आय को दोगुना करने के लक्ष्य और फलस्वरूप संपूर्ण ग्रामीण अर्थव्यवस्था सुधार की ओर &nbsp;लौटते हैं। ऐसा करने का सबसे अच्छा तरीका है पानी, उर्वरक, बीज, परिवहन, भंडारण कृषि में डीजल जैसे इनपुट की लागत को कम करना । इस तरह की लागत को सरकार के प्रभावी तरीके से हस्तक्षेप किए बिना कम नहीं किया जा सकता है। जो लोग इस उम्मीद में हैं कि बाजार खुद इस तरह की लागतों को कम रहेगा वह&nbsp; भ्रम में जी रहे हैं।</p>
<p>किसानों की आय को बढ़ाने के लिए &nbsp;मानक सुनिश्चित करने होंगे जिससे किसानों को कृषि उत्पाद का उचित मूल्य मिल सके जो &nbsp;किसानों के लिए लाभकारी हो। &nbsp;इन मानकों के जरिये किसानों की उपज के उपभोक्ता तक पहुंचने के बीच की मूल्य श्रृंखला में बिचौलियों की जेब में जाने वाले हिस्से को रोकना होगा। इसलिए जरूरी है कृषि मंत्रालय औऱ दूसरे शीर्ष विभागों के साथ साथ राज्यों को प्रतिक्रियाशील भूमिका के बजाय एक सक्रिय भूमिका निभानी होगी।&nbsp;</p>
<p>इस साल अक्टूबर के महीने में के थोक मूल्य सूचकांक पर नजर डालें तो आपको आसानी से पता चल जाएगा कि खेती लिए जरूरी इनपुट की कीमतों के सामने मंड़ी में मिलने वाले दाम कहीं नहीं टिकते हैं। इन आंकड़ों के मुताबिक अक्टूबर में डीजल महंगाई दर 71.68 फीसदी, पेट्रोल 64.72 फीसदी, रसायन और रासायनिक उत्पाद 14 फीसदी पर थी। अक्टूबर में डब्लूपीआई सालाना आधार 12.54 फीसदी बढ़ा है। इन आंकड़ों को गहराई से देखने पर सही स्थिति का पता चलता है जो अर्थव्यवस्था के दूसरे सेक्टरों के साथ-साथ हमारी कृषि की कमर तोड़ रहे हैं। कृषि इनपुट लागतों की&nbsp; वृद्धि की तुलना किसान के उत्पादों की कीमतों से करेगे तो पाएंगे कि &nbsp;खाद्य वस्तुओं के मूल्यों में गिरावट आई है या मामूली वृद्धि हुई है। थोक स्तर की मंडी की बात करें , यहां हम&nbsp; खुदरा मुद्रास्फीति के बारे में बात नहीं कर रहे हैं, &nbsp;खाद्य वस्तुओं में 1.69 फीसदी की गिरावट आई है। धान में जहां 0.55 फीसदी की गिरावट आई, वहीं गेहूं में 8.14 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई। मंडी स्तर पर सब्जियों में 18 फीसदी की गिरावट आई है। वहीं दूसरी ओर अनाज की कीमतों में मामूली 3.22 फीसदी की वृद्धि हुई है।</p>
<p>इस तरह बाजार में कीमतों का यह असंतुलन कृषि क्षेत्र के लिए हानिकारक है जो हमारे देश के अधिकांश लोगों की जीवन रेखा है। &nbsp;<span>निजी क्षेत्र और खासतौर से बड़े कारपोरेट समूह के निवेश और छोटी जोत को एक साथ लाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। </span>भारतीय खेती की कम उत्पादकता के पीछे मौसम की अनिश्चितता, सिंचाई सुविधाओं की कमी, खराब परिवहन जैसे कारक हैं। देश में फसल बीमा योजनाएं भी जटिल हैं जो अधिकांश जरूरतमंद किसानों तक नहीं पहुंचती हैं।</p>
<p>कृषि क्षेत्र में कृषि मशीनरी और ट्रैक्टर जैसे उद्योग में निवेश के लिए अपार मौके मोजूद हैं । इसमें निवेश से निजी क्षेत्र को कोई नहीं रोक रहा है। इसका ताजा उदाहरण जापान की कंपनी कुबोता द्वारा देश की प्रमुख ट्रैक्टर निर्माता कंपनी एस्कॉर्ट्स को खरीदने का फैसला है। कंपनी पहले से तय सौदे के तहत 1600 रुपये प्रति शेयर के दाम के मुकाबले 2000 रुपये प्रति शेयर की कीमत पर आधिक्य हिस्सेदारी खरीद रही है। अगर कृषि में अवसर नहीं होते तो जापानी कंपनी निवेश क्यों करती। तीन कृषि कानूनों को हटना इस तरह के निवेश में कहीं बाधक नहीं है क्योंकि जापानी कंपनी भारत के ट्रैक्टर और कृषि मशीनरी क्षेत्र में एक उज्जवल भविष्य देख रही &nbsp;है।</p>
<p><em><strong>(प्रकाश चावला सीनियर इकोनामिक जर्नलिस्ट हैं और समसामयिक आर्थिक मुद्दों व नीतियों पर लिखते हैं)</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ सुधारों के जरिये  इनपुट लागत पर नियंत्रण की कोशिश होती है, खाद्य सब्सिडी को लेकर भ्रम टूटना जरूरी ]]></media:description>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    <item>
        <title><![CDATA[राजनीतिक और आर्थिक परिदृष्य पर  किसान लॉबी की वापसी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/return-of-farm-lobby-on-political-and-economic-sphere.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 21 Nov 2021 20:53:43 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/return-of-farm-lobby-on-political-and-economic-sphere.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>गुरू पर्व के मौके पर 19 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा तीन विवादास्पद कृषि कानूनों की वापसी की घोषणा करने के साथ ही यह बात अब साफ हो गई है कि देश के राजनीतिक और आर्थिक परिदृष्य पर किसान लॉबी की वापसी हो गई है। आने वाले दिनों में राजनीति की दिशा के साथ ही आर्थिक नीतियों पर भी इसका असर देखने को मिलेगा। 1991 की आर्थिक उदारीकरण की नीतियां लागू होने के बाद से कृषि क्षेत्र की अहमियत घटती गई और सरकार की प्राथमिकता अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्र रहे। इन तीन दशकों में सरकार के फैसलों में कृषि मंत्रालय का दखल भी कमजोर होता गया। लेकिन 1991 के आर्थिक सुधारों के इतिहास को दोहराने के फेर में तीन कृषि कानूनों को लाने का कदम नरेंद्र मोदी सरकार के लिए महंगा साबित हो गया। पांच जून, 2020 को अध्यादेशों के जरिये लाए गये तीन कृषि कानून कृषि क्षेत्र में सुधारों के उद्देश्य से लाये गये थे। उस समय सरकार को यह अहसास नहीं था कि यह कानून इतिहास तो बनायेंगे लेकिन जो इतिहास बनने जा रहा है वह बहुत कुछ बदलने जा रहा है जिनका असर आने वाले दशकों तक जारी रहेगा।</p>
<p>तीन कानून, आवश्यक वस्तु अधिनियम (संशोधन) कानून, 2020, <span>द फार्मर्स प्रॉडयूस ट्रेड एंव कामर्स (प्रमोशन एंड फेसिलिटेशन) एक्ट</span>, 2020 <span>और फार्मर्स (इंपावरमेंट एंड प्रोटेक्शन) एग्रीमेंट आन प्राइस एश्यूरेंस एंड फार्म सर्विसेज एक्ट</span>, 2020 आने के कुछ दिन बाद ही इनका विरोध शुरू हो गया था। इन कानूनों को बड़े सुधारों के रूप में पेश किया गया, साथ ही अध्यादेशों के जरिये लागू किये गये इन कानूनों को लाने में जल्दबाजी भी की गई। किसानों के बढ़ते विरोध और राजनीतिक दलों द्वारा सवाल उठाने के बावजूद इन कानूनों से जुड़े विधेयकों को सितंबर, 2020 में संसद के दोनों सदनों में पारित कर कानून की शक्ल दे दी गई। संसद में और खासतौर से राज्य सभा में कानूनों को पारित कराने के तरीके पर सवाल उठे और राज्य सभा में विपक्ष का विरोध तीखा रहा। सरकार के रूख से साफ हो गया था कि वह इन कानूनों को किसी भी कीमत पर लागू करना चाहती है। लेकिन उसे इस बात का अहसास नहीं थी कि कोरोना महामारी के बीच कानूनों का विरोध किसानों द्वारा इतने बड़े पैमाने पर किया जाएगा। किसानों में सबसे अधिक आशंका मंडी से जुड़े कानून और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के भविष्य को लेकर खड़ी हुई। इसलिए मुखर विरोध की शुरुआत पंजाब से हुई। वहां करीब तीन माह तक किसानों ने रेल रोको आंदोलन के साथ ही बड़े धरने दिये। उसके बाद सितंबर, 2020 में तीन कानूनों को रद्द करने की मांग लेकर राष्ट्रव्यापी बंद का आह्वान किया गया। इसका सबसे अधिक असर पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के तराई इलाके में रहा। किसानों द्वारा कानून वापसी नहीं होने की स्थिति में 26 नवंबर, 2020 को दिल्ली कूच करने का आह्वान किया गया और 8 दिसंबर को राष्ट्रव्यापी बंद का आह्वान किया गया। किसानों के सबसे बड़े जत्थे पंजाब से चले और हरियाणा पुलिस द्वारा उन्हें रोकने की तमाम कोशिशों को नाकाम करते हुए किसान 27 नवंबर को दिल्ली की सीमा पर पहुंचे जहां दिल्ली पुलिस ने उनको दिल्ली में प्रवेश से रोक दिया। उसी दिन से दिल्ली के सिंघु बार्डर और टीकरी बार्डर पर किसानों ने मोर्चा लगा दिया। वहीं गाजीपुर बार्डर पर किसान 29 नवंबर को पहुंचे। तभी से दिल्ली की इन सीमाओं पर किसानों के धरने जारी हैं। कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के दिल्ली की सीमाओं पर चल रहे आंदोलन को साल भर होने में अब सप्ताह भर से भी कम का समय बचा है। इस दौरान आंदोलन ने कई उतार-चढ़ाव देखे।</p>
<p>किसानों के दिल्ली की सीमाओं पर आने से 22 जनवरी के बीच सरकार और किसान संगठनों के संयुक्त मोर्चा के प्रतिनिधियों के बीच 11 वार्ताएं हुईं लेकिन किसान तीनों कानूनों को रद्द करने की मांग पर अडिग रहे। इस बीच एमएसपी की कानूनी गारंटी की मांग भी मजबूत होती गई। वार्ता टूटने के बाद 26 जनवरी, 2021 के दिल्ली में ट्रैक्टर मार्च के दौरान बड़ी संख्या में किसनों के लाल पहुंचने के साथ ही हिंसा भी हुई। जिसके बाद लगा कि आंदोलन समाप्त हो जाएगा। लेकिन 28 जनवरी की शाम सरकार की सख्ती के बीच गाजीपुर बार्डर पर भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत की भावनात्मक अपील ने आंदोलन को नया जीवन दे दिया। इस घटनाक्रम ने नाटकीय ढंग से रातोंरात गाजीपुर बार्डर को किसान आंदोलन के सबसे मजबूत केंद्र के रूप में स्थापित कर दिया। वहीं राकेश टिकैत को आंदोलन और देश में किसानों के बड़े नेता के रूप में स्थापित कर दिया। इस घटना के बाद ही किसान संगठनों ने आंदोलन के लिए समर्थन जुटाने के लिए हरियाणा, राजस्थान, पंजाब, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल में किसान पंचायतें की।</p>
<p>वहीं 22 जनवरी, 2021 के बाद से किसानों और सरकार के बीच कोई वार्ता भी नहीं हुई और दोनों अपने रुख पर कायम रहे। इस बीच कुछ संगठनों के सुप्रीम कोर्ट में जाने के चलते सुप्रीम कोर्ट ने 11 जनवरी, 2021 को एक आदेश जारी कर अगले आदेश तक तीनों कानूनों के अमल पर रोक लगा दी। जो अभी तक जारी है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने एक चार सदस्यीय समिति गठित की जो किसानों और संबंधित पक्षों से बात कर एक रिपोर्ट कोर्ट को दे। इसके एक सदस्य भूपिंद्र सिंह मान ने समिति से इस्तीफा दे दिया और बाकी तीन सदस्यों, अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी, कृषि विशेषज्ञ डॉ. पी के जोशी और शेतकारी संघटना के अध्यक्ष अनिल घनवत ने तय समयावधि के भीतर 19 मार्च को सुप्रीम कोर्ट को एक सीलबंद लिफाफे में अपनी रिपोर्ट सौंप दी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद से तीनों कानून लागू ही नहीं हैं। लेकिन अहम बात यह रही कि सरकार भी इन कानूनों के ऊपर से रोक हटवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट नहीं गई। हालांकि इस दौरान सरकार द्वारा कानूनों के पक्ष में तर्क के बावजूद दालों और खाद्य तेलों के दाम बढ़ने पर उसी पुराने आवश्यक वस्तु अधिनियम के &nbsp;प्रावधानों का कई बार इस्तेमाल किया गया जिसे उसने बदल दिया था।</p>
<p>भले ही सरकार इन कानूनों के मुद्दे पर किसानों से बात नहीं कर रही थी लेकिन यह लगातार देश की राजनीति का केंद्र बने रहे। किसान संगठनों ने पश्चिम बंगाल के विधान सभा चुनावों में भाजपा के खिलाफ प्रचार किया। एक हाई पिच चुनाव में भाजपा पश्चिम बंगाल के चुनाव बहुत बुरी तरह हार गई। इस बीच विपक्षी दल किसानों के पक्ष में खड़े रहे। यही नहीं उत्तर प्रदेश के पश्चिमी जिलों में राष्ट्रीय लोकदल ने ताबड़तोड़ रैलियां की और सरकार से नाराजगी के चलते उसकी रैलियों में किसानों की भारी भीड़ जुटती रही। धीरे-धीरे आंदोलन के राजनीतिक नुकसान का अहसास भाजपा को होने लगा क्योंकि करीब 100 सीटों वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट-मुस्लिम का गठजोड़ दोबारा बनने लगा जो 2013 के मुजफ्फरनगर के सांप्रदायिक दंगों के बाद बिखर गया था। पांच सितंबर, 2021 की भारतीय किसान यूनियन और संयुक्त किसान मोर्चा की मुजफ्फरनगर में आयोजित किसान महापंचायत की जबरदस्त कामयाबी ने आंदोलन को मजबूती दी और जाट-मुस्लिम गठजोड़ की मजबूती पर मुहर लगा दी।</p>
<p>आगामी फरवरी-मार्च में पांच राज्यों में विधान सभा चुनाव होने हैं। इनमें राजनीतिक रूप से सबसे अहम उत्तर प्रदेश शामिल है जहां भाजपा सत्ता में है। साथ ही पंजाब और उत्तराखंड में विधान सभा चुनाव होने हैं जहां आंदोलन का असर है। इस बीच इन कानूनों के चलते भाजपा ने पंजाब में अपने सबसे पुराने सहयोगी शिरोमणि अकाली दल को भी खो दिया। अकाली दल को भी राजनीतिक रूप से इन कानूनों के चलते पंजाब में बड़ा राजनीति खामियाजा भुगतना पड़ रहा है क्योंकि कानूनों के लागू होने के समय अकाली दल केंद्र सरकार में भाजपा की सहयोगी थी। मूल रूप से जाट किसानों की पार्टी मानी जाने वाली अकाली दल के लिए यह काफी महंगा सौदा रहा। पंजाब में भाजपा को कोई खास प्रदर्शन की उम्मीद नहीं है हालांकि वह पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की नई पार्टी के साथ गठबंधन के जरिये वहां अपनी खोई जमीन तलाशने की कोशिश कर सकती है। अमरिंदर सिंह की शर्त थी कि अगर सरकार कानून वापस ले लेगी तो वह भाजपा के साथ गठबंधन कर सकते हैं। यह बात भी सच है कि आंदोलन में सबसे बड़ी भूमिका पंजाब के सिख किसानों की रही। भाजपा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को सिखों के उससे दूर जाने की चिंता भी इस आंदोलन के जारी रहने में साफ दिख रही थी। इसमें लखीमपुर खीरी की दुर्घटना में भाजपा के नेता और केंद्र में गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा के शामिल होने के आरोप ने भाजपा और आरएसएस की असहजता बढ़ा दी।</p>
<p>ऐसे में उत्तर प्रदेश के चुनावों में कोई भी जोखिम लेने से भाजपा बचना चाहती है क्योंकि दिल्ली की केंद्र की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर ही जाता है। वहीं राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज होती जा रही है कि भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश में दोबारा सत्ता हासिल करना उतना आसान नहीं है जितना दिखाने की कोशिश हो रही है। पश्चिम में राष्ट्रीय लोक दल के अध्यक्ष जयंत चौधरी की रैलियों में भारी भीड़ जुट रही है और मध्य व पूर्वी उत्तर प्रदेश में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की यात्रा में भारी भीड़ जुटा रही है।</p>
<p>वहीं इन राजनीतिक घटक्रमों के अलावा किसान आंदोलन के घटकों के बीच कोई विवाद न होना और उसकी एकजुटता के बरकरार रहने व सामूहिक फैसले लेने की प्रक्रिया ने उसके लगातार जारी रहने की स्थितियां बनाये रखी। किसान संगठन लगातार भाजपा के खिलाफ अधिक मुखर होते गये। करीब 700 किसानों की आंदोलन के दौरान मौत के बावजूद किसान आंदोलन अहिंसक बना रहा। इस आंदोलन में राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के साथ मध्य प्रदेश के किसानों की मौजूदगी बनी रही। साथ ही आंदोलन के नेतृत्व ने खुद को राजनीतिक मंचों से दूर रखा और न ही राजनीतिक दलों को अपना मंच दिया। जो इसके टिकाऊ होने की बड़ी वजह रही।</p>
<p>यह वह परिस्थियां और समीकरण रहे जिनके चलते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरू पर्व के शुभ दिन को मौके के रूप में इस्तेमाल कर तीन कृषि कानूनों की वापसी की घोषणा कर दी।</p>
<p>सरकार के इस फैसले की आने वाले दिनों में कई तरह से समीक्षा होगी। आर्थिक उदारीकरण के पक्षधर इसे सरकार का आत्मघाती यू टर्न बताने लगे हैं और इसे देश में आर्थिक सुधारों की गति को रोकने वाला कदम बताएंगे। साथ ही कृषि सुधारों को लेकर भविष्य में कोई भी सरकार कोई भी फैसला लेने के पहले कई बार सोचेगी। एक भारी बहुमत और मजबूत नेतृत्व वाली सरकार से कई लोगों को इन कानूनों को वापस लेने की उम्मीद दूर-दूर तक नहीं थी। इसलिए इन कानूनों की वापसी के फैसले के बाद देश में नीतिगत जड़ता (पॉलिसी पैरालाइसिस) की बात भी कही जाएगी। आर्थिक फैसलों और तरक्की की जगह राजनीतिक मौकापरस्ती की बातें भी कही जाने लगी हैं। खास तौर से उदार आर्थिक नीतियों के समर्थक अर्थविद और कारपोरेट जगत इस फैसले से अधिक परेशान है। कुछ लोग भारत में विदेशी निवेश की संभावनाओं के कमजोर होने की बात भी इन फैसलों से जोड़कर करेंगे और कहेंगे कि इसका विदेशी निवेशकों के बीच सही संदेश नहीं जाएगा। इस तरह की तमाम बातें, चर्चा और विचार आने वाले महीनों तक सामने आएंगे। लेकिन यह भी सच है इस फैसले का असर दशकों तक देश की नीतियों और फैसलों में देखने को मिलेगा।</p>
<p>हां, इस बात पर शायद लोग कम चर्चा करेंगे लेकिन जो एक सीख की तरह है। देश में जनता के बड़े वर्ग से जुड़े फैसलों को लेने की परिपाटी अब बदल जाएगी। देश में नीति निर्माण और फैसले लेने में नौकरशाही और कुछ एक्सपर्ट्स का जो दबदबा बन गया था वह अब कमजोर होगा। सरकार का कानूनों को वापस लेने का यह फैसला इस बात को साबित करता है कि फैसलों से प्रभावित होने वाले पक्षों की फैसले लेने और नीति निर्माण में भागीदारी जरूरी है। इन तीन कृषि कानूनों में सबसे बड़े पक्ष किसानों को कानून बनाने की प्रक्रिया में भागीदार नहीं बनाया गया। इसलिए जब प्रधानमंत्री ने कानूनों को वापस लेने की घोषणा की तो उसके साथ यह भी कहा कि सरकार एमएसपी की व्यवस्था को मजबूत करना चाहती है। इसके लिए एक कमेटी बनाई जाएगी जिसमें केंद्र सरकार, राज्य सरकार, किसानों के प्रतिनिधि, कृषि अर्थशास्त्री और कृषि विशेषज्ञों को शामिल किया जाएगा। यह एक सकारात्मक संकेत है।</p>
<p>साथ ही यह आंदोलन और इसकी जो परिणति कानूनों के रद्द होने के रूप में होने जा रही है उससे साफ हो गया है कि किसान संगठनों के रूप में देश में एक किसान लॉबी का उदय हो गया है। जिस अनुशासन और दृढ़ता से यह आंदोलन चल रहा है वह साफ करता है कि कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े मसलों के बारे में नीतियों और फैसलों में इस लॉबी का दखल रहेगा। साथ ही राजनीतिक रूप से इस आंदोलन के साथ खड़े होने की जो होड़ दिख रही है वह भविष्य की राजनीति में किसानों की भूमिका बढ़ने का संकेत है। पंजाब सरकार ने आंदोलन के दौरान दिल्ली में गिरफ्तार हुए किसानों को मुआवजा देने का फैसला लिया और आंदोलन में शहीद किसानों की याद में स्मारक बनाने की घोषणा की है तो सुदुर दक्षिण के राज्य तेलंगाना के मुख्यमंत्री ने आंदोलन में शहीद 700 किसानों के परिवारों को तीन लाख रुपये का मुआवजा देने की घोषणा की है। यह फैसले भविष्य की राजनीति का संकेत देने के लिए काफी हैं।</p>
<p>इस पूरे घटनाक्रम के साथ आने वाले दिन काफी अहम हैं। प्रधानमंत्री की कानूनों की वापसी की घोषणा के बाद भी किसान संगठनों ने अपने कार्यक्रम जारी रखे हैं। उनका कहना है कि संसद में कानून रद्द होने की प्रक्रिया पूरी होने तक वह धऱने जारी रखेंगे। इसके साथ ही एमएसपी पर कानूनी गारंटी की मांग पर भी वह अडिग हैं। उनका कहना है कि सरकार 29 नवंबर से शुरू हो रहे संसद के आगामी सत्र में एमएसपी पर कानूनी गारंटी का कानून लेकर आए। प्रधानमंत्री द्वारा एमएसपी के मुद्दे पर समिति बनाने की घोषणा से वह बहुत आश्वस्त नहीं दिख रहे हैं। इससे यह संकेत भी मिलता है कि सरकार और किसान संगठनों के बीच जनवरी में टूटी वार्ता का दौर फिर से शुरु हो सकता है क्योंकि सबसे विवादास्पद मुद्दे पर किसानों की मांग सरकार ने स्वीकार कर ली है। सभी को इस बात का इंतजार है कि देश के इतिहास में सबसे लंबे चले किसान आंदोलन की समाप्ति कैसे होगी और कब होगी, हालांकि अब इसकी समाप्ति की संभावनाएं काफी मजबूत हो गई हैं। लेकिन यह आने वाले दिनों में ही पता लगेगा कि कानून वापसी का फैसला सरकार के लिए राजनीतिक रूप से फायदेमंद साबित होगा या नहीं। हां यह बात तय है कि अब देश में किसानों के मुद्दों पर उनके हित संरक्षण के लिए किसान संगठनों का एक ऐसा ढांचा व नेतृत्व तैयार हो गया है जो किसान हित में सरकार के फैसलों में बदलाव का माद्दा रखता है। &nbsp;&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ राजनीतिक और आर्थिक परिदृष्य पर  किसान लॉबी की वापसी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    <item>
        <title><![CDATA[महंगाई ले चुकी है स्थायी रूप ,  शहरी से ग्रामीण तक सभी प्रभावित]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/higher-prices-are-new-normal-inflation-is-here-to-stay-affecting-rural-and-urban-population.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 16 Nov 2021 12:41:08 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/higher-prices-are-new-normal-inflation-is-here-to-stay-affecting-rural-and-urban-population.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>मंहगाई देश में होने वाले पांच राज्यों मे आगामी विधानसभा चुनावों के लिए एक अहम मुद्दा बन चुका है &nbsp;क्योंकी रोजमर्रा के खर्च में मंहगाई अब हमारे जीवन हिस्सा ही बन गई है।&nbsp; इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उपभोक्ता मूल्य सूचकां (सीपीआई) या थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) किस तरह के आंकड़े पेश करते हैं। &nbsp;हकीकत यह है कि इस बार की मंहगाई की जड़े काफी गहरी हैं और&nbsp; यह केवल फल- सब्जियों, अनाज और कुछ वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि तक ही सीमीत नहीं है ।</p>
<p>इस तरह की मंहगाई को रोकने के लिए सरकारों के पास सीमित क्षमता रह गई है। मगर विडंबना यह है कि इस मंहगाई&nbsp; सबसे ज्यादा दर्द ग्रामीण आबादी झेल रही है । गंभीर बात यह&nbsp; है कि इसका सबसे ज्यादा असर गरीबों पर पड़ा है। इस बात पर ध्यान देने की जरूरत है कि रोजमर्रा की जरुरत की चीजों की अधिक कीमतों के कारण परिवारों के लिए दैनिक खर्च का बढ़ता बोझ जीवन की मुश्किलें बढ़ा रहा है और इसका&nbsp; अक्टूबर 2021 की सीपीआई की 4.48 फीसदी वृद्धि दर के साथ जोड़ कर नहीं किया जा सकता है।</p>
<p>मंहगाई के असली रूप को समझने&nbsp; के लिए हमें मुद्दे की गहराई तक जाने की जरूरत और इसे विस्तार से समझने पर ही पूरा खेल समझ आता है। &nbsp;बहुत ही व्यवस्थित तरीके से &nbsp;पेट्रोल, डीजल, परिवहन, वनस्पति तेल, कपड़े, जूते और स्वास्थ्य से जुड़े खर्चों को लेकर को वित्तीय बोझ बढ़ रहा है वह इसकी हकीकत पेश करता है। &nbsp;इसे अक्टूबर के आंकड़ों में देखा जा सकता है, मसलन ईंधन और उर्जा &nbsp;उत्पादों की सालाना &nbsp;मूल्य वृद्धि 14.35 फीसदी , परिवहन और संचार की 10.90 फीसदी और स्वास्थ्य खर्च में वृद्धि 7.57 फीसदी &nbsp;है। हवाई चप्पल समेत फुटवियर जैसी चीजें आठ फीसदी महंगी हुई हैं। वनस्पति तेलों की कीमत में बढ़ोत्तरी के &nbsp;खिलाफ &nbsp;लोगों के आक्रोश से भी इसे समझा &nbsp;सकता है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक साल भर में 'तेल और फैट की&nbsp; मूल्य वृद्धि 33.50 फीसदी रही है। यह वृद्धि अक्टूबर 2020 की 15 फीसदी से अधिक की बढ़ोतरी के बाद दर्ज हुई है। इसका मतलब यह होगा कि आधिकारिक आंकड़ों में भी पिछले दो वर्षों में खाना पकाने के तेल की कीमतों में लगभग 50 फीसदी की वृद्धि हुई है। जिससे गांवों से लेकर शहर तक &nbsp;हर घर का बजट इससे प्रभावित हुआ है। हवाई चप्पल जैसे फुटवियर समेत तमाम जूते आठ फीसदी महंगे हुए हैं और &nbsp;इससे गांव या शहर दोनो जगह पर मजबूर तबका प्रभावित हो रहा है।</p>
<p>मंहगाई की मासिक वृद्धि दर के आंकड़े इस वास्तविक तस्वीर को नहीं दर्शाते है, क्योंकि वह नीचे आधार अंक और पुराने आंकड़ों जैसे फैक्टर से भी प्रभावित होते हैं। यह आंकड़े आम आदमी, या यूं कहें कि आम घरेलू महिला की समझ से परे &nbsp;हैं। वह इस मंहगाई के चलते&nbsp; घरेलू बजट को लेकर &nbsp;जबरदस्त दबाव में है इसलिए वह इन आंकड़ों को गंभीरता से नहीं लेती है । वह केवल यह जानती हैं कि कैसे खाना पकाने के तेल की कीमतें 200 रुपये प्रति लीटर तक बढ़ गई हैं। रसोई गैस की कीमत कैसे उसके बजट में आग &nbsp;लगा रही है।&nbsp; आज के समय में सामान्य सब्जियां भी फलों की कीमतों पर बिक रही हैं जो निम्न और मध्य वर्ग के लिए &nbsp;विलासिता की वस्तु जैसी &nbsp;बन गई हैं।</p>
<p>ग्रामीण इलाकों में तो हालात और भी खराब है क्योंकि बड़ी बिड़बंना यह है ग्रामीण परिवारों के द्वारा उपजाई &nbsp;गई चीजों को प्रसंस्कृत और पैक कर उनको &nbsp;ही उनकी चीजों को अधिक मूल्य &nbsp;पर बेचा जाता है । यह स्थिति बढ़ती मजदूरी के लिए किसानों के लिए मुसीबतें पैदा कर रही है। कहा जाता है कि देश में किसान अमीर हैं लेकिन माफ कीजिये, हकीकत कुछ और है क्योंकि देश में कोई अमीर किसान नहीं है। इस समय देश में किसानों के पास औसतन 1.15 हेक्टेयर की जोत है।&nbsp; इसमें भी &nbsp;दो-तिहाई जोत एक हेक्टेयर से कम है। ऐसे में जब तक अमीर किसानों का जो जुमला &nbsp;अमीर शहरी वर्ग और &nbsp;मध्यम वर्ग के बीच &nbsp;अक्सर उछाला उठाया जाता है वह पूरी तरह से बेबुनियाद है।</p>
<p>पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्रों में जहां बिहार जैसे पूर्वी राज्यों से बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर आते हैं वह उर्वरक, डीजल, बीज और परिवहन जैसे अन्य इनपुट की&nbsp; मंहगाई के साथ-साथ मजदूरी में बढ़ोतरी की प्रवृत्ति भी देखेंगे।</p>
<p>महंगाई दर इस तरह व्यवस्थित है कि यह उद्योग और कृषि दोनों की संपूर्ण मूल्य चेन में समाहित हो गई है इस चेन के सभी नतीजों को &nbsp;अंत में उपभोक्ता को झेलना पड़ता है। जबकि अर्थशास्त्री इसे एक विश्वव्यापी प्रभाव के रूप में वर्णित करते हैं। यहां तक कि अमेरिका, जिसने कभी मुद्रास्फीति को 1-2फी सदी &nbsp;से अधिक नहीं देखा वह &nbsp;खुद को लगभग छह फीसदी की सीपीआई वृद्धि दर के बीच पा रहा है। &nbsp;विशेषज्ञों का कहना है कि यह दुनिया के केंद्रीय बैंकों द्वारा अर्थव्यवस्था को कोराना -लॉकडाउन से बचाने के लिए सिस्टम को अतिरिक्त नकदी आपूर्ति &nbsp;के चलतेहो रहा है। &nbsp;फिर भी सेमीकंडटर जैसे जरूरी कच्चे माल की कमी जैसी समस्याएं हैं, जो अब केवल शहरी चीज नहीं हैं बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में उपयोग हो रहे उत्पादों&nbsp; कृषि उपकरण जैसे ट्रैक्टर और मोटरबाइक, जिसका उपयोग अक्सर दूधवाले और स्थानीय विक्रेताओं द्वारा किया जाता है, सभी इससे प्रभावित हैं।</p>
<p>सीमेंट, स्टील और अन्य वस्तुओं की कीमतों में पिछले 18 महीनों में 50 फीसदी से अधिक की वृद्धि हुई है, जिससे ग्रामीण आवास, कृषि मशीनरी और नलकूप सहित सिंचाई प्रणाली की लागत बढ़ी है। डीजल की कीमतों में सरकार द्वारा उत्पाद शुल्क और मूल्यवर्धित कर (वैट) में कमी के माध्यम से कुछ चिंता दिखाने के बावजूद भी किसी भी बड़े बदलाव की उम्मीद नहीं की जा सकती है क्योंकि भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का 80 फीसदी आयात के माध्यम से पूरा करता है। ग्लोबल मार्केट में ऊर्जा उत्पादों&nbsp; की कीमतें आसमान छू रही है। हम पर्याप्त मात्रा में लौह अयस्क और स्टील का उत्पादन तो कर रहे हैं, लेकिन घरेलू बाजार अंतरराष्ट्रीय रुझानों के साथ इतना एकीकृत है कि दोनों को अलग नहीं किए जा सकता है।</p>
<p>यहां तक ​​कि अगर हम खाद्य पदार्थों का एक और रिकॉर्ड उत्पादन कर लेते&nbsp; हैं तो कीमतों में कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं दिखेगा क्योंकि मंहगाई का प्रभाव इनपुट लागत में आ गया है। अगर किसी कारण से मौसमी सब्जियों और आलू और टमाटर जैसी वस्तुओं के सभी दाम गिर जाते हैं, तो किसानों को बड़ा नुकसान होगा।</p>
<p>हम अक्सर सुनते कि जब कोई नई स्थिति बनती है तो उसी में सबको ढ़लना पड़ता है वह जीवन में सामान्य बात हो जाती है। उसी के साथ रहना पड़ता है। अब मान लिया गया है कि &nbsp;खाना पकाने का तेल 200 रुपये प्रति लीटर (10 से 15 रुपये कम या ज्यादा), और आलू, प्याज, टमाटर 50 से 80 रुपये प्रति किलों पर मिलना भी एक नई &lsquo;समान्य स्थिति&rsquo; हो गई है । हालांकि यह अभी पूरी तरह से स्थापित नहीं हुआ लेकिन महंगाई की इस &nbsp;&lsquo;नई सामान्य स्थिति&rsquo; के चलते आने वाले दिनों &nbsp;कृषि श्रमिकों सहित अन्य मजदूरी के दबाव को बढ़ाने वाला एक चक्र बन जाएगा ।</p>
<p>&nbsp;<em><strong>(प्रकाश चावला सीनियर इकोनामिक जर्नलिस्ट हैं और समसामयिक आर्थिक मुद्दों व नीतियों पर लिखते हैं)</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ महंगाई ले चुकी है स्थायी रूप ,  शहरी से ग्रामीण तक सभी प्रभावित ]]></media:description>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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        <title><![CDATA[डब्ल्यूटीओ के 12वें मंत्रीस्तरीय सम्मेलन में भारत के लिए पीस क्लॉज से परमानेंट सलूशन तक जाने की गंभीर चुनौती]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/wto-mc12-india-faces-tough-challenges-in-moving-from-peace-clause-to-permanent-solution.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 10 Nov 2021 11:51:50 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/wto-mc12-india-faces-tough-challenges-in-moving-from-peace-clause-to-permanent-solution.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>विश्व व्यापार संगठन&nbsp; (डब्ल्यूटीओ) के 12वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (एमसी12) की बैठक 30 नवम्बर से लेकर 3 दिसम्बर के दौरान &nbsp;स्विटजरलैंड के जेनेवा में आयोजित की जाएगी । एमसी 12 का पिछले साल कजाकिस्तान में होने वाला यह सम्मेलन &nbsp;कोरोना महामारी के कारण स्थगित हो गया था । &nbsp;साढ़े सात दशक पहले अस्तित्व में आई बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली के समय से ही डब्ल्यूटीओ के सदस्यों के बीच कृषि सबसे &nbsp;विवादस्पद मुद्दों में से एक रहा &nbsp;है। इस क्षेत्र से संबंधित लगभग सभी मुद्दों पर डब्ल्यूटीओ के सदस्य देश बहुत ज्यादा विभाजित रहे है । हालांकि कृषि से जुड़े मुद्दों पर बातचीत समिति के चेयरमैन राजदूत ग्लोरिया अब्राहम पेराल्टा द्वारा &nbsp;जुलाई के अंत में &nbsp;प्रारंभिक मसौदा &nbsp;पेश&nbsp; करने के बावजूद भी&nbsp; कृषि पर औपचारिक &nbsp;चर्चा कम &nbsp;ही हुई &nbsp;है। &nbsp;इसके पीछे का मुख्य कारण यह रहा है &nbsp;कि पूर्व में रहे चेयरमैन जिस तरह से बातचीत और चर्चाओं का दायरा बढ़ाने की कोशिश करते रहे हैं उनके उलट पेराल्टा ने ऐसा कोई उत्साह दिखाने की बजाय न्यूनतम एजेंडा&nbsp; के विकल्प को चुना है। &nbsp;उन्होंने सभी प्रमुख मुद्दों को शामिल करते हुए मंत्रिस्तरीय निर्णयों की एक &nbsp;को अपनाने का प्रस्ताव दिया है। जो विश्व व्यापार संगठन की सदस्यता की जटिलताओं पर विचार किए बिना देशों की जरूरतों, &nbsp;चिंताओं और विकास के विभिन्न स्तरों पर विचार किये बिना कृषि पर समझौते यानि एग्रीमेंट आन एग्रीकल्चर &nbsp;(एओए) में संशोधन करने की एक कोशिश है।</p>
<p>राजदूत पेराल्टा के दृष्टिकोण के साथ प्रमुख समस्या यह है कि वह एओए के अनुच्छेद 20 के &nbsp;प्रावधानों का इस्तेमाल करते हैं &nbsp;जो 1999 में लागू&nbsp; हुए समझौते की स्वतः समीक्षा करने का अधिकार देता है। &nbsp;डब्लूटीओ &nbsp;के सदस्य देशों ने एनालसिस एण्ड इनफार्मेशन (एआईई) की प्रक्रिया शुरू की थी जिसका मकसद एओए के प्रावधानों को लागू करने के अपने अनुभवों को साझा करना है। &nbsp;जो एओए की समीक्षा करने के लिए उपयोग की जा सकती हैं।</p>
<p>एआईई प्रक्रिया ने दोहा मंत्रिस्तरीय घोषणा के लिए प्रारंभिक तैयारी का काम किया। जिसने एओए की समीक्षा और सुधार करने के लिए सदस्यों को वार्ता के लिए अधिकृत किया। जिसे दोहा डवलमेंट एजेंडा (डीडीए) के रूप में जाना जाता है। लेकिन 16 साल की वार्ता &nbsp;के बाद भी कोई नतीजा नहीं निकलने के चलते &nbsp;2017 में ब्यूनस आयर्स मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (एमसी 11) में डीडीए के भविष्य को लेकर सवाल उठे थे। कुछ प्रभावशाली सदस्यो के चलते ही डीडीए का यह हश्र होता दिखता है । इसीलिए कृषि वार्ता के लिए चेयरमैन द्वारा डीडीए से पूर्व के अनुच्छेद 20 को कृषि पर वार्ता के लिए फ्रेमवर्क बनाने के कदम से साफ है डीडीए अब पुरानी बात हो गई है।&nbsp; इस दृष्टि से डीडीए की अस्वीकृति स्पष्ट अभिव्यक्ति है कि डब्लूटीओ का कार्य और कार्यक्रम अब से विकास के आयाम से रहित होगा। जिसके बिना अधिकांश विकासशील देश पीछे रह जाएंगे।</p>
<p><strong>घरेलू सहायता पर प्रस्ताव:</strong></p>
<p>एओए के अनुशासन के लिए तीन आधार स्तंभ हैं जिनमें घरेलू सहायता यानी उत्पादन-संबंधित सब्सिडी, निर्यात प्रतिस्पर्धा जिसमें निर्यात के लिए दी जाने वाली सब्सिडी और बाजार पहुंच शामिल है। इनमें &nbsp;घरेलू सहायता के मामले में अनुशासन &nbsp;का पालन सबसे कम प्रभावी रहा हैं। सब्सिडी पर नियंत्रण का फैसला जनरल एग्रीमेंट ऑन टैरिफ एंड ट्रेड (गैट) की 1986 की उरुग्वे दौर की वार्ता में हुआ था। इसमें &nbsp;सब्सिडी पर अनुशासन का पालन करने के लिए ऐजेंडा पेश किया गया था। गैट (डब्ल्यूटीओ का पूर्व स्वरूप) के सामान्य समझौते के अनुबंध में कृषि व्यापार को प्रभावित करने वाली किसी भी तरह की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सब्सिडी को नियंत्रित करने पर सहमति हुई थी। &nbsp;हालांकि, एओए के तहत किये गये अंतिम प्रावधानों में विकसित देशों द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी के एक बड़े हिस्से को कृषि व्यापार पर प्रतिकूल असर नहीं डालने वाली सब्सिडी माना गया और उनको &ldquo;ग्रीन बॉक्स&rdquo; के तहत शामिल किया गया। ग्रीन बॉक्स के तहत दी जाने वाली सब्सिडी की कोई सीमा तय नहीं इनमें से कुछ अधिक प्रमुख "ग्रीन बॉक्स" सब्सिडी का उपयोग मार्केंट क्लीयरी सिस्टम के रूप में किया जाता है खासतौर से अमेरिका और यूरोपीय यूनियन के सदस्य देशों द्वारा ऐसा किया जाता है ।</p>
<p>वहीं &nbsp;इनपुट सब्सिडी और एडमिनिस्टर्ड प्राइस &nbsp;सिस्टम को ट्रेड डिस्टोरटिंग सब्सिडी माना जाता है। भारत इस व्यवस्था का उपयोग अपने निम्न-आय या संसाधनों&nbsp; की कमी वाले उत्पादकों की सहायता के लिए करता है। &nbsp;सरकार द्वारा डब्ल्यूटीओ को दी गई जानकारी में 99.4 फीसदी कृषि जोत को इसके तहत माना है। &nbsp;दूसरे शब्दों में कहें तो सरकार किसानों को अनिवार्य रूप से आजीविका और घरेलू खाद्य सुरक्षा की रक्षा के लिए सब्सिडी देती है। इस प्रकार, कृषि सब्सिडी को व्यापार विकृत या अन्यथा के रूप में वर्गीकृत करने का कोई स्पष्ट आधार नहीं है लेकिन एओए ऐसा मानता है। &nbsp;विडंबना यह है कि एओए के तहत "एम्बर बॉक्स" सब्सिडी के रूप में जानी जाने वाली इस सहायता को कुल उत्पादन के मूल्य के 10 फीसदी &nbsp;तक सीमित किया गया है।</p>
<p>घरेलू समर्थन के मुद्दे पर आगे का रास्ता सुझाते हुए कृषि वार्ता के चेयरमैन ने प्रस्ताव दिया है कि डब्ल्यूटीओ के सदस्य देशों के मंत्रीस्तरीय वार्ता एमसी 12 में घरेलू सहायता पर नई व्यवस्था लागू करने का फैसला लेने के लिए नये सिरे से बात करें जिसके तहत व्यापार को प्रभावित करने वाली सभी संभावित सब्सिडी को शामिल किया जा सके। &nbsp;इसमें &nbsp;(एओए का अनुच्छेद 6.2) के तहत निम्न-आय या कम संसाधनों वाले उत्पादकों को मिलने वाली इनपुट सब्सिडी भी शामिल है। इस प्रावधान का फायदा भारत भी उठा रहा है। अनुच्छेद 6.2 सब्सिडी को 10 फीसदी &nbsp;की व्यय सीमा के तहत लाने से भारतीय कृषि पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा ।</p>
<p>हम सुझाव दे सकते हैं कि आगे के प्रस्ताव पर बढ़ने के पहले राजदूत पेराल्टा को कृषि सब्सिडी और वैश्विक कृषि बाजारों की दो कठोर वास्तविकताओं पर ध्यान देना चाहिए, जो वैश्विक कृषि व्यापार को विकृत करने के लिए जिम्मेदार हैं। पहली है, अधिक सब्सिडी वाले सदस्य देश अमेरिका, यूरोपीय यूनियन और चीन द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी में एक समानता है वह है इन देशों द्वारा दी जाने वाली कुल सब्सिडी का 80 फीसदी से ज्यादा "ग्रीन बॉक्स" में होना जिस पर सब्सिडी की कोई सीमा नहीं है। दूसरी वास्तविकता है, अमेरिका और यूरोपीय यूनियन कृषि उत्पादों के सबसे बड़े निर्यातकों में से &nbsp;एक हैं। इसका अर्थ यह है कि डब्ल्यूटीओ के यह सदस्य &nbsp;देश ग्लोबल मार्केट पर कब्जा करने के लिए अपने कृषि क्षेत्र को सब्सिडी दे रहे हैं ।</p>
<p>यह तर्क दिया जा सकता है कि सब्सिडी के अनुशासन में सुधार के लिए इन दो वास्तविकताओं को ध्यान में रखना चाहिए। अमेरिका द्वारा उपलब्ध कराए गए अमेरिकी कृषि विभाग (यूएसडीए) के आंकड़ों के अनुसार, साल 2020-21 में गेहूं के तीसरे सबसे बड़े निर्यातक देश के रूप में अमेरिका ने अपने उत्पादन का 54 फीसदी &nbsp;निर्यात किया। &nbsp;अपने 20 फीसदी उत्पादन के साथ अमेरिका &nbsp;मक्का का सबसे बड़ा निर्यातक देश रहा। वहीं अमेरिका ने अपने चावल उत्पादन का 41 फीसदी निर्यात किया। यूरोपीय संघ के सदस्य सबसे बड़े गेहूं निर्यातकों में शुमार है। वह अपने &nbsp;उत्पादन का लगभग एक चौथाई निर्यात करते है। &nbsp;इसके विपरीत सबसे बड़े चावल निर्यातक के रूप में भारत अपने उत्पादन का लगभग 10 फीसदी या उससे कम निर्यात करता है । यह &nbsp;अलग बात है कि केवल 2020-21 में&nbsp; चावल उत्पादन का निर्यात 16 फीसदी&nbsp; पहुंच गया था । भारत भी 2020-21 में गेहूं के निर्यातक के रूप में उभरा लेकिन इसका निर्यात देश के कुल उत्पादन का 2.3 फीसदी ही था । यह आंकड़े बताते हैं कि भारतीय कृषि घरेलू बाजार उन्मुख है जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका की कृषि &nbsp;ग्लोबल मार्केट में निर्यात पर निर्भर है।</p>
<p>हमारा तर्क यह होना चाहिए कि डब्ल्यूटीओ के सदस्य देश अपने कृषि उत्पादों के निर्यात के लिए जितनी सब्सिडी देते हैं उसे सब्सिडी पर नियंत्रण की व्यवस्था के आधार के रूप में लिया जाना चाहिए । सब्सिडी नियंत्रण की नई व्यवस्था का घरेलू खाद्य व्यवस्था और आजीविका पर प्रतिकूल असर नहीं पड़ना चाहिए। &nbsp;विशेष रूप से उन देशों में जहां कि आबादी का बड़ा हिस्सा आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है।</p>
<p><strong>बाजार पहुंच पर प्रस्ताव</strong><strong>:</strong></p>
<p>घरेलू समर्थन के अलावा कृषि में प्रमुख मुद्दा बाजार तक पहुंच है। एओए के इस आधार स्तंभ के मामले में &nbsp;राजदूत पेराल्टा ने कुछ डब्ल्यूटीओ सदस्यों द्वारा प्रस्तुत उस प्रस्ताव पर भरोसा किया है जो पारदर्शिता और संभाव्यवता बढ़ाने की बात करता है और उसके लिए वर्तमान में लागू टैरिफ दरों" या वास्तविक टैरिफ को लागू करने की बात करता है। इस समय डब्ल्यूटीओ &nbsp;के नियमों के लिए सदस्य देशों को अधिकतम टैरिफ दरें (बाउंड रेट) &nbsp;तय करने का अधिकार है जो सांकेतिक होती हैं और जरूरत के मुताबिक इनका उपयोग किया जा सकता है। अधिकांश विकासशील देशों के लिए लागू (वास्तविक) टैरिफ दरें अक्सर बाउंड टैरिफ दरों से बहुत कम होती हैं और अपवाद स्वरूप ही यह देश टैरिफ दरों को उच्च स्तर तक बढ़ाते हैं। &nbsp;वर्तमान में सरकारों के पास यह &nbsp;एक महत्वपूर्ण नीतिगत उपाय है जो वह उपयोग कर रही हैं। &nbsp;बाउंड टैरिफ दरों की जगह एप्लाइड यानी वास्तविक लागू दरों को बातचीत के केंद्र में लाने का चेयरमैन का कदम टैरिफ पर वार्ता के आधार को बदलने की कोशिश है जिसके नतीजे दूरगामी हो सकते हैं।</p>
<p>राजदूत पेराल्टा के विशिष्ट प्रस्ताव का उद्देश्य वास्तविक टैरिफ लगाने में ट्रांसपेरेंसी और प्रिडिक्टिबिलिटी को बढ़ाना है लेकिन विडंबना यह है कि जिस प्रस्ताव पर &nbsp;यह आधारित है &nbsp;उसकी सामग्री को &nbsp;सार्वजनिक नहीं किया गया है । मोटे तौर पर यह प्रस्ताव उस शिपमेंट पर टैरिफ लगाने की बात करता है जिस दिन शिपमेंट ने अपनी यात्रा शुरू की थी। यह प्रस्ताव अगर लागू किया जाता है तो सीमा शुल्क अधिकारियों के लिए यह एक बुरे सपने की तरह हो सकता है जिन्हें &nbsp;समान सामान या आयातित उत्पादों की प्रत्येक खेप के लिए अलग-अलग टैरिफ दरें लगानी होंगी। परिणामस्वरूप यह व्यवस्था व्यापार की प्रशासनिक लागत को कम करने की प्रवृत्ति को आसानी से उलट सकती है ।</p>
<p><strong>खाद्य सुरक्षा के लिए पब्लिक स्टॉक होल्डिंग</strong></p>
<p>कृषि में भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा खाद्य सुरक्षा के लिए सार्वजनिक स्टॉक होल्डिंग है। यह मुद्दा इसलिए पैदा हुआ है क्योंकि एओए घरेलू खाद्य असुरक्षा की समस्या का समाधान करने के लिए सब्सिडी वाला भोजन उपलब्ध कराने के उद्देश्य से खाद्य भंडार बनाए रखने लिए डब्ल्यूटीओ के सदस्यों पर दो तरह की शर्तें लगाता है। पहली शर्त है सदस्य देश को खाद्य पदार्थों की खरीद करनी चाहिए और उन्हें &nbsp;प्रशासित कीमतों &nbsp;पर बेचना होगा। &nbsp;दूसरी शर्त अगर खाद्य पदार्थों को सब्सिडी देकर प्रशासित कीमतों से कम पर बेचा जाता है जो प्रशासित कीमत और सब्सिडी वाली बिक्री कीमत के बीच के अंतर को संबंधित सदस्य देश के सब्सिडी बिल में शामिल किया जाना चाहिए। इस प्रकार एओए गरीबों को रियायती दर पर खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराने को बाजार को विकृत करने वाली सब्सिडी मानता है। इसलिए खाद्य पदार्थों के सार्वजनिक स्टॉक का उपयोग करके खाद्य सुरक्षा कार्यक्रमों को लागू करने वाले देशों को कृषि उत्पादन के मूल्य के 10 फीसदी की सब्सिडी सीमा का उल्लंघन करने की अनुमति नहीं है । हमने इस लेख में उपर इस पर चर्चा की है। &nbsp;</p>
<p>भारत सरकार द्वारा 2013 में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफएसए) को लागू करने &nbsp;के बाद से पीएसएच &nbsp;के प्रावधान भारत के लिए अधिक &nbsp;लिए महत्वपूर्ण हो गए हैं। देश की लगभग दो-तिहाई आबादी को रियायती दर पर खाद्यान्न उपलब्ध कराने की प्रतिबद्धता जताने के बाद भारत ऐसी स्थिति की ओर में आ गया जहां पर उत्पादन के मूल्य के 10 फीसदी के बराबर सब्सिडी के उल्लंघन की संभावना थी। अगर सरकार सब्सिडी सीमा के उल्लंघन के बावजूद एनएफएसए को लागू करना जारी रखती तो कोई अन्य डब्ल्यूटीओ सदस्य भारत के खिलाफ विवाद शुरू कर सकता था जिसमें अगर भारत हार गया होता तो सब्सिडी वाले खाद्यान्न का वितरण तुरंत बंद करना पड़ता।</p>
<p>साल 2013 में भारत बातचीत के लिए एक &ldquo;पीस कलॉज&rdquo; जो एक अस्थायी राहत है हासिल कर पाया कि अगर एनएफएसए को लागू करते समय वह सब्सिडी की सीमा 10 फीसदी सीमा का उल्लंघन करता है तो उसके खिलाफ कोई परिवाद दाखिल नहीं किया जा सकेगा। भारत की इस समस्या के लिए डब्ल्यूटीओ के सदस्यों को "स्थायी समाधान" (परमानेंट सलूशन) खोजना होगा । लेकिन एमसी -12 से पहले की चर्चाओं से पता चलता है कि चेयर द्वारा मसौदे में शामिल दो प्रस्तावों को लेकर&nbsp; भारत के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। पहला है कि भारत जैसे विकासशील देश खाद्य सुरक्षा के उद्देश्य के लिए पब्लिक स्टॉक होल्डिंग के तहत पारंपरिक खाद्यान फसलों के उत्पादन के 15 फीसदी की सीमा तक ही सरकारी खरीद कर सकते हैं। दूसरा प्रस्ताव है कि जो देश खाद्य सुरक्षा के लिए पब्लिक स्टॉक होल्डिंग रखते हैं वह इसमें से खाद्यान्न का निर्यात नहीं कर सकती हैं। इन शर्तों का भारत पर क्या असर हो सकता है ?</p>
<p>खाद्यान्नों की सरकारी खरीद की सीमा तय करने का भारत के मुख्य उद्देश्यों पर गंभीर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। सरकार घरेलू खाद्य सुरक्षा और संसाधनों की कमी और कम आय वर्ग वाले किसानों को आजीविका को समर्थन देने के उद्देश्य से खाद्यान्नों की सरकारी खरीद करती है। खाद्यान्नो की खरीद की सीमा की शर्त का सीधा अर्थ है इन उद्देश्यों पर प्रतिकूल असर पड़ना। साल 2019-20 में भारत में 11.84 करोड़ टन चावल का उत्पादन हुआ। जिसमें से सरकार ने 520 लाख टन की खरीद की। सरकार द्वारा डब्ल्यूटीओ में दी गई जानकारी मुताबिक उसने 334 लाख टन चावल राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून की जरूरत को पूरा करने के लिए जारी किया। इस तरह से देखा जाए तो गरीबों के लिए सब्सिडी पर 340 लाख टन से अधिक चावल की जरूरत है लेकिन डब्ल्यूटीओ के प्रस्ताव के तहत भारत को लेकर 180 लाख टन चावल की ही सरकारी खऱीद करनी चाहिए।</p>
<p>इसी तरह के गेहूं के मामले में भारत ने 2019-20 में 340 लाख टन गेहूं की सरकारी खरीद की। जबकि खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग के मुताबिक 202 लाख टन गेहूं का वितरण लाभार्थियों को किया गया। किसानों और गरीबों की सहायता के लिए जरूरी इस मात्रा के उलट डब्ल्यूटीओ के मुताबिक भारत को 160 लाख टन गेहूं की ही सरकारी खऱीद करनी चाहिए।&nbsp;</p>
<p>दूसरा प्रस्ताव जी-33, विकासशील देशों के समूह का है जिसमें भारत ने अतीत में एक प्रमुख भूमिका निभाई है। वह कहता है कि खाद्य सुरक्षा स्टॉक को बनाए रखने वाले देशों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इस स्टॉक का उपयोग निर्यात को बढ़ावा देने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। पिछले दो वर्षों से भारत से अनाज के निर्यात में वृद्धि हुई है। अगर एमसी12 के इस प्रस्ताव से प्रेरणा लेते हुए पीएसएच के संबंध में एक स्थायी समाधान खोजता है तो यह भारत के लिए एक गंभीर चुनौती खड़ी कर सकता है।</p>
<p><em><strong>(डॉ. बिश्वजीत धर, जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज के सेंटर फॉर इकोनॉमिक स्टडीज एंड प्लानिंग में प्रोफेसर हैं )&nbsp;</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ डब्ल्यूटीओ के 12वें मंत्रीस्तरीय सम्मेलन में भारत के लिए पीस क्लॉज से परमानेंट सलूशन तक जाने की गंभीर चुनौती ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[किसान आंदोलन: दायरा बढ़ाकर राष्ट्रीय मंच बनाने की जरूरत ]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/farmers-movement-need-to-broaden-its-scope-by-presenting-a-national-platform.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 05 Nov 2021 19:02:11 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
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        <description><![CDATA[ <p>किसान नेता राकेश टिकैत ने कुछ महीने पहले कहा था कि अगर उनकी मांगों को नहीं माना गया तो साल 2024 तक किसान दिल्ली के बॉर्डरों पर धरने पर बैठने को तैयार हैं ।&nbsp; टिकैत ने यह बयान तब दिया था जब किसान नेताओं औऱ सरकार&nbsp; के बीच&nbsp; लगातार बढ़ती&nbsp; तनातनी के बीच जनवरी के बाद से सरकार &nbsp;की तरफ &nbsp;से औपचारिक बातचीत भी बंद हो गई । लेकिन सरकार को लगता है कि किसानों की मांगों को फिलहाल नजरअंदाज किया जा सकता है ,उनको थकाया जा सकता है।&nbsp; इसलिए उनका मांगों में से कुछ भी मानने की जरूरत नहीं है ।</p>
<p>लखीमपुर खीरी की शर्मनाक घटना भी सरकार को इस मुद्दे को सुलझाने के लिए अपना रुख बदलने के लिए तैयार नहीं मजबूर नहीं कर सकी। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) ने किसानों में बढ़ते असंतोष पर चिंता व्यक्त की है औऱ वह चाहते हैं कि सरकार औऱ किसानों के बीच कोई समझौता हो जाय और उसके लिए किसी समझौते पर पहुंचने का रास्ता तैयार हो जाय । क्योंकि किसानों के आंदोलन से सरकार के खिलाफ उपजा अंसतोष कहीं उत्तर प्रदेश चुनाव के बाद 2024 में होने होने वाले लोकसभा चुनाव पर न भारी पड़ जाय. जो उत्तर प्रदेश चुनावों से भी महत्वपूर्ण है । मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने कहा है कि किसान आंदोलन बड़े पैमाने पर सत्ताधारी पार्टी के वोट में सेंध लगाएगा इसलिए सरकार को इस मामले को सौहार्दपूर्ण तरीके से सुलझाने की जरूरत है। &nbsp;इससे &nbsp;कोई असर पड़ेगा, &nbsp;नहीं तो फिर किसान क्या कर सकते है?</p>
<p><strong>सरकार की योजना</strong></p>
<p>सरकार का रुख उसकी इस समझ पर आधारित है कि वह किसान आंदोलन बारे में कैसे सोचती है। पहला मत है कि सरकार की समझ रही की किसान आंदोलन देश के दूसरे हिस्सों में नहीं फैल रहा है, दूसरा सरकार के लिए अमीर और व्यापारी उसके लिए महत्वपूर्ण है। तीसरा सरकार के दिमाग में बातें बैठ गई हैं कि तीन नये कृषि कानूनों में जो भी&nbsp; प्रावधान हैं&nbsp; उनमें से &nbsp;अधिकांश किसानों को लाभ देने वाले हैं ।</p>
<p>देश के हर क्षेत्र&nbsp; में सरकार &nbsp;किसान समुदाय के बीच में विभाजन पर भरोसा कर रही है। जैसे बिहार या केरल की तुलना में पंजाब में खेती बहुत अलग है । जैसे कि उगाई जाने वाली फसलें, फसल पैटर्न, सिंचाई की उपलब्धता, जोतों का आकार ,भूमि का वितरण, व्यापार की प्रकृति और सरकारी सहायता की सीमा इत्यादि । सरकार अधिकांश किसानों को इन तीन कानूनों &nbsp;के&nbsp; दीर्घकालिक फायदों को स्पष्ट करने&nbsp; या इन तीन कानूनों से किसानों को &nbsp;मिलने वाले लाभ के प्रभाव को समझा नहीं पा रही है। सरकार &nbsp;इस बारे में बहाना बना रही है कि किसान इसको समझने में असमर्थ है । वह&nbsp; इस बात पर भरोसा कर रही है। सरकार को विश्वास है कि अगर सरकारी चैनलों और मीडिया के माध्यम से इस लाइन को बार-बार दोहराया जाता है तो किसानों की भलाई के लिए अधिकतर किसान इन तीन कानों को स्वीकार कर लेंगे।</p>
<p>किसान लंबे समय से संकट का सामना कर रहा है ।&nbsp; यहां तक कि वह आत्महत्याएं कर रहे हैं । इसलिए वह हताशा में विरोध कर रहे है। अब निस्संदेह ही किसानों के हालात में सुधारों की जरूरत है। इसलिए अब मुख्य मुद्दा यह होना चाहिए कि किसानों की जो मुख्य समस्याएं हैं &nbsp;उनको दूर करके उनके हालात में सुधार के लिए कदम उठाने की जरूरत है, क्योंकि अब बदलाव की बात नही चलेगी।।</p>
<p>सरकार का तर्क है कि तीन कानून औसत किसान की जरूरतों को पूरा करते हैं। किसानों की समस्या का पूरा दोष किसानों का खून चूसने वाले व्यापारी पर डाल दिया है। इन व्यापारियों की छवि सूदखोर साहूकार के रूप में ,छोटे और मध्यम किसान इतनी गहराई से चित्रित कर रहे है जैसे कि1950 से 1970 के बीच लोकप्रिय हिंदी सिनेमा औसत भारतीय के मन में अंकित था। दूसरी तऱफ इस छवि को प्रस्तुत किया जा रहा है कि मुक्त बाजार से किसानों की समस्याओं से मुक्ति मिलेगी और उनके हालात में सुधार होगा। &nbsp;कॉरपोरेट क्षेत्र की छवि को इस तरह प्रस्तुत किया जा रहा है कि मध्यम वर्ग के लोगों को इससे अच्छी नौकरियां मिलेंगी ।</p>
<p>लोगों के बीच छोटे व्यापारियों को सूदखोर &nbsp;साहूकार के रूप में &nbsp;प्रस्तुत कर किसानों को इसते चंगुल से बचाने के लिए&nbsp; सरकार यह कानून लाई है। वहीं कॉरपोरेट सेक्टर को&nbsp; कृषि उपज के व्यापार में&nbsp; प्रवेश कराने के लिए लोगों के सामने उनकी एक आदर्श छवि प्रस्तुत कर रहे हैं।&nbsp;</p>
<p><strong>किसानों का दृष्टिकोण</strong></p>
<p>तीन कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन कर रहे किसानों का तर्क है कि यह बदलाव उनके लिए विनाशकारी होगा। पूंजी और नीतियों पर अपनी पकड़ रखने वाले कॉपोरेट्स कृषि उपज के व्यापार में आ जाने से यह किसानों की हालत व्यापारियों से भी बदतर कर देंगे। किसान तीनों कानूनों को कॉर्पोरेट समर्थक के रूप में देख रहे हैं। उनका मानना है कि आने वाले समय में इनके चलते असमानता बढ़ेगी और किसानों को डर है कि वह अपनी भूमि का मालिकाना हक खो देंगे। कारपोरेट्स बाजार की प्रतिस्पर्धा को दूर करने लिए पहले अधिक मूल्य देते हैं और इसके बाद जब उनका एकाधिकार हो जाता है तो मूल्य बढ़ाकर शोषण करते हैं । जैसे साल 2015 से टैक्सी एग्रीगेटर्स ने यही किया है। किसानों का&nbsp; मानना ​​है कि शुरू में कॉरपोरेट्स मंडियों के बाहर उपज के लिए अच्छी कीमत की पेशकश कर सकते हैं जिससे सरकारी मंडियों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। &nbsp;अगर एक बार ऐसा हो गया तो देश में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की व्यवस्था को लागू करना असंभव हो जाएगा, जैसा कि बिहार में हुआ। जहां 2006 में एग्रीकल्चरल प्रॉड्यूस मार्केट कमेटी (एपीएमसी) एक्ट &nbsp;को समाप्त कर दिया गया था।</p>
<p>सरकार सैद्धांतिक तौर पर तर्क दे रही है वह&nbsp; एमएसपी या एपीएमसी को समाप्त नहीं कर रही है। लेकिन जो व्यवहारिक स्थिति है वह समय के साथ इनकी समाप्ति की ओर इशारा करती है। जैसा कुछ रिपोर्टों से पता चलता है कि तीन कानूनों के संसद में पारित होने के बाद कुछ मंडियों ने काम करना बंद कर दिया है । ऐसे में किसान चाहते हैं कि सरकार भविष्य में &nbsp;एमएसपी औऱ एपीएमसी प्रणाली के बरकरार रहने की कानूनी गारंटी दे तो उसको लेकर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।</p>
<p>अभी तक के अनुभव के आधार कहा जा सकता है कि समृद्ध वर्ग आंदोलनों का नेतृत्व करते हैं इसका मतलब यह नहीं निकाला&nbsp; जा सकता कि वह दूसरे वर्गों के हितों का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं। गरीबों के पास न तो इतना समय और साधन हैं&nbsp; कि वह अपनी मजदूरी&nbsp; छोड़ कर&nbsp; कानूनों का विरोध करें। साथ ही बाजार के कामकाज या वैश्वीकरण जैसे जटिल दीर्घकालिक मुद्दों पर विचार करने के लिए&nbsp; कहां से उनको फुरसत मिलेगी&nbsp; । यहां तक कि जाने-माने अर्थशास्त्री भी बाजारों के बारे में गलत साबित होते हैं। उदाहरण के लिए, यूएस सेंट्रल बैंक (फेडरल रिजर्व) के प्रमुख &nbsp;एलन ग्रीनस्पैन ने 2008 में सीनेट की सुनवाई (वैश्विक वित्तीय संकट के बाद) में स्वीकार किया था यह कहना &nbsp;कि मार्केट्स सेल्फ करेक्टिव है और वहां हो रहे स्पेकुलेशन पर रोक के लिए &nbsp;सरकार को हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है, सही नहीं था।</p>
<p><strong>अमीर देशों के साथ तुलना</strong></p>
<p>मार्केट्स नाकाम होते है । तो ऐसे में क्या कोई मार्केट्स के कुशलता से काम करने की धारणा पर भरोसा कर सकता है।&nbsp; देश की खेती पर निर्भर कम से कम 50 फीसदी आबादी का जीवनयापन इन कानूनों से प्रभावित होगा।&nbsp; किसानों का कहना है कि इन कानूनों पर उनसे सलाह नहीं ली गई जो हमारे &nbsp;लोकतंत्र और नीति निर्माण की प्रकृति की खामियों को उजागर करता है।</p>
<p>यह तर्क दिया जाता है कि इस विषय पर विचार विमर्श बहुत पहले से चल रहा था यहां तक ​​कि यूपीए सरकार भी इसी तरह की नीतियों को लागू करने के पक्ष में थी । लेकिन जिन किसानों और विशेषज्ञों के साथ विचार विमर्श किया गया था वह लोग भी बाजार व्यवस्था के समर्थक हैं। जब साल 1991 में नई आर्थिक नीतियों (एनईपी) को लांच किया गया था, जिसका उद्देश्य सम्पूर्ण बाजारीकरण था, उसके अधिकांश अर्थशास्त्री वाशिंगटन की आम सहमति के समर्थक बन गए। क्या भारत जैसे गरीब देश के लिए वह सही था ? &nbsp;अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसे अमीर देशो का मानना है कि &nbsp;कि कृषि बाजार विफल हो जाते हैं और सरकार का हस्तक्षेप जरूरी&nbsp; है। इसलिए उनके देशों में किसानों को भारी सब्सिडी मिलती है। &nbsp;और संभव भी है क्योंकि वहां आबादी का बहुत कम हिस्सा खेती पर निर्भर है । जबकि भारत में 50 फीसदी आबादी कृषि पर निर्भर है । भारत जैसे देश की &nbsp;सब्सिडी देने की क्षमता कम है। भारत में सामाजिक-आर्थिक स्थितियां अमीर देशों से बहुत भिन्न हैं, &nbsp;जैसे संचालन का पैमाना, कौशल स्तर, पूंजी और विपणन तक पहुंच, इत्यादि । &nbsp;&nbsp;इसलिए भारतीय किसानों की समस्याओं का समाधान अलग होना चाहिए। मुद्दा यह है कि कृषि में जो 50 फीसदी आबादी निर्भर है उसका उचित आय स्तर पर कैसे टिकाऊ रहे। अगर कृषि पर निर्भर लोगों की संख्या कम करनी है तो क्या वहां से विस्थापित होने वाले लोगों को उत्पादक काम दिया&nbsp; जा सकता है।&nbsp; यह मुश्किल लगता है। भारतीय किसानों की स्थिति अमीर देशों की &nbsp;तुलना में बदतर है जहां उनके पास आय और सरकारी सहायता दोनों का उच्च स्तर है। &nbsp;भारतीय किसानों को सरकार की मदद की जरुरत है। हमारे देश में किसानों को धनी देशो में मिलने वाली सहायता से भी अधिक सहायता&nbsp; चाहिए । इसलिए फ्री मार्केट &nbsp;की तरफ हम नहीं जा सकते ।</p>
<p><strong>भारतीय किसानों की स्थिति</strong></p>
<p>अगर सरकार का यह तर्क सही है कि पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी यूपी में विरोध कर रहे लोग धनी और समृद्ध किसान और व्यापारी हैं तो &nbsp;इसका मतलब ये है कि ये वह लोग हैं जो कृषि उपज में 'मुक्त बाजार' से डरते हैं। यदि ऐसा है तो क्या बड़े पैमाने पर गरीब, छोटे और सीमांत किसान, जो देश में कुल किसानों का 85 फीसदी &nbsp;हैं क्या उनसे यह उम्मीद की जा सकती है कि वह मुक्त बाजार से निपट लेंगे ।</p>
<p>देश में कृषक परिवारों की संख्या कितनी है? पीएम किसान सम्मान योजना 14.5 करोड़ जोत या किसान परिवारों को लाभान्वित करने के लिए थी। बेशक, इनमें से कई&nbsp; किसान परिवारों की मजदूरी जैसी गैर-खेती गतिविधियों से अधिक आय हो सकती है। ऐसे में यह तर्क दिया जाता है कि ऐसे परिवारों को किसान नहीं माना जाना चाहिए। इनको इससे बाहर करने पर किसान परिवारों की संख्या 7.5 करोड होती &nbsp;है। यह संख्या कृषि उपज बाजारों की प्रकृति को समझने की कुंजी है।</p>
<p>साढ़े सात करोड़ किसानों का&nbsp; कृषि उपज की कीमत पर कोई नियंत्रण नहीं है, वह यह तय करने की स्थिति में नहीं हैं कि उन्हें क्या दाम मिलना चाहिए। जो अधिकांश &nbsp;गैर-कृषि उत्पादों के &nbsp;बिल्कुल उलट है। इन उत्पादों के विक्रेताओं की संख्या सीमित होती है और वह &nbsp;अपनी लागत (जिसे प्राइम कॉस्ट कहा जाता है) के आधार पर अपने उत्पाद की कीमत तय करते हैं। इस लागत पर वह बाजार में अपने एकाधिकार की डिग्री के आधार पर एक मार्क-अप लागू करते हैं ताकि लाभ अर्जित किया जा सके। अगर उनके व्यवसाय में साल दर साल घाटा होने लगेगा तो उनके व्यवसाय बंद हो जाते हैं।</p>
<p>लेकिन किसान ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि यह उनके अस्तित्व का सवाल है। इसका विकल्प उनके पास नहीं है जहां वह कम उत्पादकता के बावजूद टिके रहे । जो लोग शहरी क्षेत्रों में स्थायी रूप से या अस्थाई रूप से रहते हैं, वह असंगठित क्षेत्र के कामों में शामिल हो जाते हैं वह कम मजदूरी पर काम करते हैं और अनिश्चित परिस्थितियों में अवैध मलिन बस्तियों में रहते हैं।</p>
<p>कृषि उपज के अलाभकारी मूल्य का अर्थ है कि कृषि में अगर उत्पादन अधिक होता है तो उसका कोई मतलब नही रह जाता है। इसके कारण औद्योगीकरण और शहरीकरण को बढ़ावा मिलता है। भारतीय नीति निर्धारक नीतियां तय करने में &nbsp;पश्चिमी देशों की नकल कर जो नीतियां बनाते हैं वह ऊपर से नीचे की और जाने वाली धारणा से काम करते हैं। इस तरह की नीतियों ने कृषि और ग्रामीण क्षेत्र को हाशिए पर &nbsp;ला दिया। यहां तक ​​कि जब किसान निर्णय लेने की स्थिति में रहे हैं, तब भी उनके पास एक अलग फ्रेमवर्क नहीं था। नतीजतन, कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी का दुष्चक्र और ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच बढ़ती असमानता स्थायी रूप से बनी रही। &nbsp;</p>
<p>किसानों का संकट और ऋणग्रस्तता &nbsp;का कारण है कृषि उपज के लिए लाभकारी मूल्य का नहीं मिलना &nbsp;जिससे वह लाभ कमा सके (जैसा कि गैर-कृषि में) होता है। असल में किसानों को फार्म गेट पर अनुकूल टर्म्स ऑफ ट्रेड चाहिए , पर यह होगा कैसे?</p>
<p>इसके लिए नीतियों में बदलाव की जरूरत है और इस बदलाव के लिए मानसिकता में बदलाव की जरूरत&nbsp; है। कृषि के साथ गैर-कृषि&nbsp; क्षेत्र की तरह व्यवहार नहीं किया जा सकता है। रोजगार उत्पन्न करने के लिए उत्साहित करना होगा, प्रौद्योगिकी और निवेश नीतियों को सही करना होगा, श्रमिकों को एक उचित मजदूरी देनी होगी,टैक्स नीतियों को संशोधित करना होगा साथ ही कृषि बाजारों में सरकारी हस्तक्षेप जरूरी है । क्या भारतीय अर्थव्यवस्था का ऐसा आमूलचूल परिवर्तन संभव है?</p>
<p>शहरी और औद्योगिक अभिजात्य वर्ग अर्थव्यवस्था में इस तरह के परिवर्तन का विरोध करेंगे। राजनीतिक दल भी इस तरह के बदलाव का समर्थन नहीं करेंगे क्योंकि वह भी बड़े पैमाने पर बड़े व्यवसायों के हित के लिए काम करते हैं। विकल्प को यूटोपियन के रूप में चित्रित किया जाएगा, जिसमें इससे पैदा होने वाली तथाकथित&nbsp; सैकड़ों कठिनाइयों को बताया जाएगा। लेकिन वर्तमान व्यवस्था में भारतीय समाज द्वारा &nbsp;गरीबी, असमानता, पर्यावरण का क्षरण जैसी तमाम चुनौतियों को सामना किया जा रहा है उनका क्या?</p>
<p><strong>क्रांतिकारी परिवर्तन नेतृत्व और किसान</strong></p>
<p>किसी भी सामाजिक परिवर्तन के लिए सामाजिक-आर्थिक आंदोलनों की जरूरत होती है जो अचेतना को परिवर्तन की ओर ले जाते हैं और एक राजनीतिक परिवर्तन लाते हैं। किसान आंदोलन के नेताओं को सफलता के लिए ऐसी भूमिका निभाने की जरूरत है। वर्तमान में वह केवल खुद के लिए और कृषि के लिए रियायतों की मांग करते नजर आ रहे हैं। इसे आगे &nbsp;अर्थव्यवस्था में व्यापक बदलाव की मांग तक बढ़ाया जाना चाहिए क्योंकि यही उनकी समस्या का समाधान है।</p>
<p>इन मांगों में कृषि और गैर-कृषि, श्रमिकों और व्यवसायों के विभिन्न वर्गों को शामिल किया जाना चाहिए और उन्हें राष्ट्रीय हित के रूप में चित्रित किया जाना चाहिए। बिजनेस लॉबी अपने लिए रियायतों की मांग करते हुए यही दावा करती है। वह बात करते हैं कि श्रम, व्यापार, कराधान, निवेश, बैंकिंग और वित्त और परिवहन की &nbsp;नीतियां क्या होनी चाहिए।</p>
<p>किसानों को भी इन नीतियों पर अपने विचार अपने नजरिए से पेश करने की जरूरत है। वह लैंगिक, न्यूनतम मजदूरी और विस्थापन के मुद्दों को भी उठा सकते हैं। चूंकि किसान देश की आबादी का 50 फीसदी से अधिक हैं इसलिए जो उनके हित में होगा वह राष्ट्रीय हित के खिलाफ हो ही नहीं सकता। &nbsp;बस उसे अभिव्यक्त करने का आना चाहिए। &nbsp;किसानों का 2024 तक दिल्ली की सीमाओं पर विरोध में बैठना पर्याप्त नहीं हो सकता उन्हें दीर्घकालिक सफलता के लिए इस आंदोलन को बड़ा और व्यापक बनाना होगा जिसके लिए एक नई राह की जरूरत है जिसमें लक्ष्य को हासिल करने के लिए व्यवहारिकता हो।</p>
<p><em><strong>(अरूण कुमार, इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज में माल्कॉम आदिसेशैय्या चेयर प्रोफेसर हैं। वह इंडियन इकोनॉमी सिंस इंडिपेंडेंस परसिस्टिंग कोलोनियल डिसरप्सन और इंडियन इकोनॉमीज ग्रेटेस्ट काइसिस इंपैक्ट ऑफ द कोरोनावायरस एंड द रोड अहेड किताबों के लेखक हैं ) </strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ किसान आंदोलन: दायरा बढ़ाकर राष्ट्रीय मंच बनाने की जरूरत  ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[मौजूदा दौर में किसानों के लिए अंबेडकर के  शिक्षित, आंदोलित और संगठित होने के विचार की अहमियत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/relevance-of-dr-ambedkars-ideas-of-educate-agitate-and-organize-today.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 01 Nov 2021 07:20:23 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/relevance-of-dr-ambedkars-ideas-of-educate-agitate-and-organize-today.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p style="text-align: justify;"><span>आज के समय में जिस तरह &nbsp;ग्रामीण क्षेत्रों &nbsp;जिसमें विशेष रूप से &nbsp;वर्तमान &nbsp;में किसान वर्ग में सामाजिक विभाजन,धार्मिक विभाजन, गरीबी, बेरोजगारी और उनकी &nbsp;समस्याओं को नजरअंदाज कर &nbsp;उनकी आवाज का न सुना जाना मौजूदा संकट का कारण है। उसके समाधान के लिए जरूरी है कि डॉ. भीम राव&nbsp; अंबेडकर के शिक्षित, आंदोलित और संगठित ( (ईएओ) वाले तीनों मंत्र अपनाया जाना चाहिए। अगर अंबेडकर की इस त्रिमूर्ति सिद्धांत ईएओ को व्यवहार में नहीं लाया गया तो किसान वर्ग के हितों की अनदेखी जारी रहेगी। </span><span>&nbsp;इस लेख के जरिए हम बताना चाहेंगे कि ईएओ किसानों के वर्तमान संकट के समाधान के रूप में कैसे काम कर सकता है। </span>डॉ अंबेडकर ने लिखा था कि दलित वर्ग के &nbsp;लोगों के लिए जाति के आधार पर समाज में व्याप्त ब्राहम्णवादी सामाजिक व्यवस्था (बीएसओ) के खिलाफ जागृति को एक व्यवस्थित दृष्टिकोण अपनाए बिना इस व्यवस्था के खिलाफ लड़ना मुश्किल था। इसके पीछे ईएओ मंत्र का तर्क है। किसी भी आंदोलन को सफल बनाने के लिए लोगों को सामाजिक, <span>आर्थिक और राजनीतिक कोणों से वंचित होने के कारणों को समझाने के लिए &nbsp;लोगों को शिक्षित किया जाना चाहिए। एक शिक्षित और प्रशिक्षित दिमाग ही सही दिशा में कार्रवाई करने और तथ्यों को समझकर और उसका विश्लेषण कर सकता है। </span></p>
<p style="text-align: justify;">इसमे '<span>शिक्षित</span>' <span>का अर्थ वंचितों के लिए औपचारिक शिक्षा के साथ-साथ उनके हाशिए पर और कमजोरी के लिए जिम्मेदार कारणों/कारकों/परिस्थितियों को समझने के लिए है। क्योंकि खुद को शिक्षित होन के बाद की भी सोच सकता है कि अगर उनके परिवार उनके समाज के प्रति कोई भी अन्याय या दुर्व्यवहार हो रहा है तो उसके खिलाफ अंदोलन करने का मन करेगा। इस प्रकार शिक्षित शब्द एक प्रकार से मानसिक क्रांति से संबंधित है न कि किसी प्रकार की शारीरिक हिंसा से है। जब मन में आंदोलन</span>' <span>का भाव उत्पन्न होगा तो दूसरे चरण में लोग संगठित होंगे। अगर दूसरे शब्दों में कहें तो मन के आंदोलन के माध्यम से संगठित</span>'<span> रूप में तीसरे चरण की ओर बढ़ने के लिए विचारों की क्रांति की जरुरत होती है क्योंकि शिक्षित दिमाग सामूहिक रूप से कार्य करने के लिए एक साथ आते है। अगर लोगों को सही विचारों पर संगठित नहीं किया जाता है</span>, <span>तो इस बात की संभावना नहीं है कि उनकी शिकायतों का समाधान मौजूदा व्यवस्था द्वारा किया जाएगा। ईएओ के विचार को भारत में दलितों के उत्थान के लिए प्रभावी ढंग से इस्तेमाल किया गया था</span>, <span>जो पहले बहिष्कार</span>, <span>अपमान और शोषण के रूप में त्रिस्तरीय अस्पृश्यता से पीड़ित थे। उसी तरह आज के वक्त में किसानों की मुश्किलों के&nbsp; संदर्भ में यह विचार&nbsp; बहुत प्रासंगिक है। .</span></p>
<p style="text-align: justify;">इसमें कोई दो राय नहीं है कि अंबेडकर के रणनीतिक ईएओ के विचार को लागू नहीं करने के लिए किसान वर्ग को दूसरों की तुलना में उनकी आर्थिक स्थिति को न जानने और समझने के कारण किसानों को एक कोने में धकेल दिया गया है। सभी जानते हैं कि भारत की लगभग 68<span> प्रतिशत जनसंख्या </span>6<span> लाख से अधिक गांवों में निवास करती है। किसानों और ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए कई वादे किए गए हैं</span>, <span>लेकिन व्यावहारिक रूप से किसानों और मजदूरों की स्थिति अभी भी बहुत गंभीर है। यह शहरों और कस्बों के रूप में शहरी विस्तार के उलट है जिनमें ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक सुविधाएं और आर्थिक अवसर हैं। जनसंख्या आंकड़ों का अनुमान है कि लगभग तीन दशक बाद</span> <span>&nbsp;</span>2050<span> में भी भारत की </span>50<span> प्रतिशत से अधिक जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में &nbsp;ही निवास &nbsp;करेगी।</span></p>
<p style="text-align: justify;">ग्रामीण अर्थव्यवस्था केवल ग्रामीणों के लिए ही नही &nbsp;बल्कि भारतीय समाज के विकास के लिए इसमें परिवर्तन बहुत ही जरूरी &nbsp;है। कृषि में आर्थिक नजरिये से कम उत्पादकता है के बावजूद उस पर &nbsp;अधिक निर्भरता है।&nbsp; वहीं दूसरी तरफ &nbsp;कृषि में कम वेतन वाले रोजगार की वजह से प्रति व्यक्ति आय कम होना आज के वक्त में चिंता का विषय है। ग्रामीण और शहरी श्रमिकों के बीच आय में अंतर ज्यादा है। ग्रामीण कामगारों की आय शहरी कामगारों की आय के एक तिहाई से भी कम है। ग्रामीण भारत को एक ऐसी रणनीति की जरुरत है जो रोजगार सृजन के लिए श्रमिकों को कृषि से गैर-कृषि क्षेत्र में स्थानांतरित कर सके। इसमें&nbsp; मुख्य रूप से श्रम आधारित, <span>सूक्ष्म</span>, <span>लघु और मध्यम उद्यम अहम भूमिका निभा सकते हैं।&nbsp;</span></p>
<p style="text-align: justify;">देश की ग्रामीण आबादी के सामने सामाजिक समस्याएं बहुत&nbsp; अधिक हैं। आज के वक्त में भी ग्रामीण आबादी का एक बड़ा हिस्सा&nbsp; स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सेवाओं से वंचित है। गरीबों और कमजोर &nbsp;लोगों को हाशिए पर ऱखना और उनका बहिष्कार,&nbsp; उनकी आवाज को दबाना और उनके आसपास के समाजिक वातावरण का बिगड़ना बहुत गंभीर समस्याएं हैं । इसलिए इनके विकास के लिए इस पर बारीकी से ध्यान देने की जरुरत है।</p>
<p style="text-align: justify;">ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी की समस्या भी एक गंभीर मुद्दा है <span>जो इस बात से स्पष्ट होता है कि </span>25.70 <span>फीसदी ग्रामीण जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करती है जबकि शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा मात्र </span>14 <span>फीसदी &nbsp;है। इससे जाहिर है की शहरी क्षेत्रों की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में समस्या ज्यादा गंभीर है। &nbsp;अगर राज्यों की बात करे तो छत्तीसगढ़ की </span>44.61<span> फीसदी</span>, <span>झारखंड की </span>40.84<span> फीसदी, अरुणाचल प्रदेश की </span>38.93<span> फीसदी</span>, <span>मणिपुर की </span>38.80<span> फीसदी</span>, <span>ओडिशा की </span>35.69 <span>फीसदी, बिहार की </span>34.06<span> फीसदी और</span>&nbsp;उत्तर प्रदेश<span> की </span>30.40<span> फीसदी&nbsp; ग्रामीण आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन &nbsp;कर रही है। इसे स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सकता है। इसी तरह देश में तीन सामाजिक समूह अनुसूचित जनजाति (एसटी)</span>, <span>अनुसूचित जाति (एससी) और अत्यन्त गरीब हैं। </span><span>जिसमें एसटी में </span>47.3<span> फीसदी सबसे अधिक गरीब हैं।</span>&nbsp;<span>इसके बाद एससी </span>42.2<span> फीसदी और अत्यन्त गरीब </span>28<span> फीसदी आबादी है। सभी राज्यों में</span>&nbsp;<span>यह पाया गया है कि असम को छोड़कर</span>, <span>सभी राज्यों में गरीबी एसटी के बाद एससी के अधिक है। परेशान करने वाला तथ्य यह है कि मध्य प्रदेश (</span>61.9<span> फीसदी</span>, <span>महाराष्ट्र </span>51.7<span> फीसदी</span>, <span>झारखंड </span>51.2%<span> फीसदी उत्तर प्रदेश और बिहार और छत्तीसगढ़ में लगभग </span>70 <span>प्रतिशत अनुसूचित जनजाति गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रही हैं। उत्तर प्रदेश में </span>49.8 <span>फीसदी एसटी और </span>53.6 <span>फीसदी एससी आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रही&nbsp; है।</span></p>
<p>जोत के हिसाब से कृषि जनगणना के अनुसार सीमान्त किसानों की संख्या साल 2000-01 में जहां&nbsp; 62.9 फीसदी थी वहीं साल 2010-11 में बढ़कर 67.10 फीसदी हो गई। इतना नही सभी जोत के किसानों के लिए खेती घाटे का सौदा बनती जा रही है। जबकि इसके विपरीत अन्य वर्ग के लोगों की आमदनी बढ़कर रही है। घटती जोत के हिसाब से इसे देखते हुए उचित सिंचाई सुविधाएं, उचित इनपुट प्रावधान और उपज का उचित विपणन कैसे प्रदान कर सकते हैं इसकी योजना बना सकते हैं ?</p>
<p>अब मुख्य मुद्दा यह है कि कृषि पर इस तरह का संकट और किसानों की खेती में घटती दिलचस्पी है क्योंकि किसान गैर-कृषि श्रमिकों की तुलना में 33 प्रतिशत से भी कम कमाई कर रहा है। इससे न केवल किसानों में अविश्वास पैदा हो रहा है बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा पर भी इसका गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। आजादी के सात दशक बाद भी 30 फीसदी से अधिक क्षेत्र &nbsp;में पारंपरिक किस्मों के तहत खेती की जा रही है &nbsp;क्योंकि आज के वक्त में कृषि की नई तकनीकों का कम विस्तार , गुणवत्ता वाले बीज और &nbsp;गुणवत्ता वाले पौधों की कमी के साथ प्रचार और प्रसार सामग्री का आपूर्ति श्रृंखला के साथ कोई लिंक नहीं जुडा हुआ है और कई राज्यों में तो संस्थागत ऋण की कम उपलब्धता है। साल 2017 में &nbsp;प्रोफेसर रमेश चंद ने देखा कि अन्य फसलों की तुलना में बहुत अधिक उत्पादकता वाले फलों और सब्जियों की खेती10 फीसदी से कम क्षेत्र में की जाती है।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में ईएओ रणनीति की प्रासंगिकता</strong></p>
<p>कृषि की इस परिस्थिति के लिए मुख्य कारक कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों से जुड़े मुद्दों के ज्ञान की गंभीर कमी है। इसलिए लोगों को उनकी वर्तमान स्थिति और उनके शोषण की प्रक्रियाओं के बारे में 'शिक्षित' करने की जरूरत है। जाहिर है जब लोगों को अपने शोषण के तथ्य नहीं पता होंगे &nbsp;तो उनके मन में इस बात को लेकर कोई हलचल नहीं होगी और स्थिति को बदलने के लिए क्या किया जाए। इसका उत्तर स्वाभाविक रूप से मिलता है कि पीड़ितों के बेहतर संगठन के बिना ऐसे गंभीर मुद्दों का समाधान नहीं किया जा सकता है। जिसके बारे में नीचे वर्णन करेगें।</p>
<p>किसानों और उनके सहयोगियों को उनके शोषण की प्रक्रिया के बारे में जागरूक करने के प्रयास करने के लिए किसान वर्ग के बीच शिक्षितों की एक बड़ी भूमिका है। इस संबंध में मुख्य कारक इस वर्ग की विभिन्न जातियां हैं। इन जातियों को आपस में संघर्ष नहीं करना चाहिए। इस वर्ग को महात्मा फुले, &nbsp;सर छोटू राम, &nbsp;चौधरी चरण सिंह, &nbsp;विजय सिंह पथिक, &nbsp;बीपी मंडल, &nbsp;कर्पूरी ठाकुर औप कांशीराम के बारे में किसानों को अवगत कराया जाना चाहिए कि इन किसान नेताओं ने उनके लिए क्या किया था। अपने विरोधी और उनके शोषण की प्रक्रिया को जानना सिखाया जाना चाहिए।</p>
<p>जहां तक हमे जानकारी है कि सर छोटू राम कहते थे कि दो वर्ग थे पहला कमेरा (योगदानकर्ता, उत्पादक और यहां के किसान) और दूसरा वर्ग लुटेरा (वे जो बिना किसी भौतिक योगदान के धन जमा करते हैं)। इसलिए &nbsp;सभी कामेरों को एक मंच पर आना चाहिए और वहां से खुद को मुखर करना चाहिए। इसी प्रकार चौधरी चरण सिंह जाति व्यवस्था को समप्त करने के पक्षधर थे और उन अधिकारियों के साथ विशेष व्यवहार चाहते थे जो अंतर्जातीय विवाह करते हों। कमेरा वर्ग को यह समझना चाहिए कि उनके शोषक कौन हैं और कमेरा वर्ग के सभी घटक (जातियां) एक होने चाहिए। कृषक वर्ग की विभिन्न जातियों के बीच कोई संघर्ष नहीं होना चाहिए। अगर ऐसा होता है तो यह उनके अपने हितों के लिए संघर्ष की धार को निश्चित रूप से मजबूत करेगा क्योंकि तब संघर्ष खुशी की बात बन जाएगी। वह ढांचा किसान वर्ग के दिमाग में बनाना होगा। किसानों और संबद्ध कामगारों के लिए क्षमता विकास अकादमी की स्थापना की जा सकती है जिसका प्रबंधन इस वर्ग के संबंधित और सक्षम व्यक्तियों द्वारा किया जाना चाहिए।</p>
<p>जब किसान वर्ग शिक्षित होगा तो यह उनके मन को अपने मुद्दों को हल करने और समाधान तक पहुंचने के लिए संगठित होने के लिए प्रेरित करेगा। अंबेडकर ने वंचितों की शिक्षा के लिए 1924 में बहिष्कृत हितकारिणी सभा की स्थापना की थी। इसी तरह का एक मॉडल वर्तमान में जो किसान संगठन हैं वह तैयार कर सकते हैं । यह उत्तर प्रदेश के संदर्भ में बहुत ही प्रासंगिक है जहां विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। बहुसंख्यक किसानों वाले राज्य में विभिन्न राजनीतिक दलों को यह समझना चाहिए कि चुनाव को किसान वर्ग की पहचान को ध्यान में रखकर लड़ा जाना चाहिए न कि जातिगत पहचान को ध्यान में रखकर। यह सामाजिक पूंजी बनाने में भी सहायक होगा जो बदले में इस वर्ग के लोगों के बीच बेहतर समन्वय और सहयोग को स्थापित कर सकता है। बीएसओ जातियों को सामने लाने की कोशिश करेगा लेकिन संगठित किसान वर्ग को ऐसा नहीं होने देना चाहिए। इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए किसान वर्ग और बुद्धिजीवियों को एक साथ आना चाहिए। उन्हें शोषण की प्रक्रिया, स्वतंत्रता संग्राम स्वतंत्रता और अधिकार, &nbsp;मानवाधिकार, &nbsp;संविधान और इसके कार्यान्वयन आदि पर प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए पाठ्यक्रम सामग्री विकसित करनी चाहिए।</p>
<p style="text-align: justify;"><em><strong>(डॉ. महिपाल इंडियन इकोनॉमिक सर्विस के सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और ग्रामीण मामलों के&nbsp; एक्सपर्ट हैं, लेख में व्यक्त विचार उनके निजी विचार हैं)</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ मौजूदा दौर में किसानों के लिए अंबेडकर के  शिक्षित, आंदोलित और संगठित होने के विचार की अहमियत ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>jpagrimedia73@gmail.com (Rural Voice)</author>
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        <title><![CDATA[&amp;apos;ब्रोक टू ब्रेकथ्रू&amp;apos; देश की सबसे बड़ी प्राइवेट डेयरी कंपनी के बनने की दास्तान]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/broke-to-breakthrough-is-the-journey-of-hatsun-agro-product-from-a-small-business-to-largest-indian-private-dairy-company.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 30 Oct 2021 12:42:04 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/broke-to-breakthrough-is-the-journey-of-hatsun-agro-product-from-a-small-business-to-largest-indian-private-dairy-company.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>हरीश दामोदरन द्वारा हैटसन एग्रो प्रॉडक्ट पर लिखी किताब 'ब्रोक टू ब्रैकथ्रू&rsquo; के शुरुआती हिस्से ने मुझे करीब तीस साल पुरानी दुनिया में लौटा दिया। आर. जी. चंद्रमोगन द्वारा मात्र 13 हजार रुपये के निवेश से शुरू किया गया आइसक्रीम का बिजनेस धीरे- धीरे आगे बढ़ रहा था। यही वह समय था जब मैं देश की सबसे बड़ी आइक्रीम कंपनी क्वालिटी के साथ काम कर रहा था। आठवें दशक के अंतिम बरसों में मैं उत्तर प्रदेश के हल्दवानी से लेकर बदायूं और पीलीभीत जैसे कस्बेनुमा शहरों में अपने यात्राओं के दौरान इस बिजनेस की मुश्किलें देख रहा था। यह स्थितियां उत्तर प्रदेश के बरेली और बनारस जैसे बड़े शहरों में भी कुछ अलग नहीं थी क्योंकि बिजली जैसे बेसिक इन्फ्रास्ट्रक्चर की दिक्कत के चलते यह कारोबार आसान नहीं था। साथ ही कोई बड़ा इन्नोवेशन भी यह कंपनी नहीं कर पा रही थी। उस दौर में उत्तर भारत में कई आइसक्रीम कंपनियां आई और कुछ बरसों के बाद दम तोड़ती गई। वहीं नौवें दशक में क्वालिटी जैसी कंपनी को भी हिन्दुस्तान लीवर ने खरीद लिया। असल में उस कंपनी के प्रमोटरों के पास वह विजन नहीं था जो एक नये कारोबारी के पास था। इन परिस्थितियों और बिजनेस माहौल के बीच ही जिस तरह से हैटसन आइक्रीम के बिजनेस का विस्तार करती है और पार्टनरशिप फर्म से अपने अवतार बदलते हुए स्टॉक मार्केट में शेयरधारकों को भारी मुनाफा देने वाली 5600 करोड़ रुपये के सालाना टर्नओवर और 30 हजार करोड़ रुपये के मार्केट कैपिटलाजेशन वाली देश की सबसे बड़ी निजी डेयरी कंपनी में तब्दील होती है। इसके पीछे आर. जी. चंद्रमोगन की कारोबारी दक्षता और फैसले लेने की विलक्षण प्रतिभा है जो कारोबार के नाकाम होने के करीब पहुंचने से लेकर कई तरह की चुनौतियों का सामना करते हुए आगे बढ़ रहा था। चंद्रमोगन और हैटसन का यह सफर किसाब के टाइटल &lsquo;ब्रोक टू ब्रेकथ्रू&rsquo; द राइज ऑफ इंडियाज लार्जेस्ट प्राइवेट डेयरी कंपनी को साबित करने में कामयाब होता है।</p>
<p>कंपनी के प्रमोटर आर. चंद्रमोगन के चरित्र को बहुत करीब से परखने की कोशिश इस किताब में हरीश दामोदरन ने की है। देश के सबसे अनुभवी और बेहतर पत्रकारों में शुमार कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर करीब तीन दशक से काम रहे और अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस के रूरल अफेयर्स एडिटर हरीश दामोदरन का बिजनेस बॉयोग्राफी और कंपनी की हिस्ट्री को पाठकों के सामने रखने का कौशल पाठक को विषय के करीब लाने की एक कला की तरह &nbsp;है।</p>
<p>वह इस कहानी के हर पक्ष को बहुत बारीकी के साथ सामने रखते हैं, जैसे वह विस्तार से बताते हैं कि कैसे चंद्रमोगन ने पढ़ाई बीच में छोड़ देने और उसके बाद एक आरा मिल में छोटी सी नौकरी करने के बाद 1970 में 25 हजार रुपये के निवेश से एक दुकाननुमा किराये की जगह में आइसक्रीम फैक्टरी की शुरुआत की। एक रिश्तेदार की सलाह पर शुरू किये गये इस बिजनेस के लिए तमिलनाड मर्केंटाइल बैंक से लिया गया 12 हजार रुपये का कर्ज और उनके पिता की तीन दुकानों की बिक्री से आए 13 हजार रुपये कुल निवेश था। यहां से अरूण आइसक्रीम की शुरूआत हुई। चंद्रमोगन की कंपनी को एक करोड़ रूपये के टर्नओवर तक पहुंचने में 18 साल लगे जो 1987-88 में संभव हुआ। इसके अगले 13 साल में कंपनी 100 करोड़ रुपये के टर्नओवर तक पहुंची लेकिन इसके बाद आठ साल में कंपनी ने एक हजार करोड़ रुपये का टर्नओवर हासिल कर लिया। साल दर साल नया मुकाम हासिल करते हुए कंपनी 5000 करोड़ के टर्नओवर को पार चुकी है। हैटसन एग्रो प्राडक्ट के साथ चार लाख किसान जुड़े हुए हैं। यह कंपनी कर्मचारियों, वेंडरों और बिजनेस पार्टनर्स को मिलाकर करीब 50 हजार लोगों को रोजगार दे रही है। &nbsp;&nbsp;</p>
<p>इस किताब के माध्यम से बहुत करीब से देखा जा सकता है कि जब देश में उदारीकरण की नीतियों के चलते एक आकांक्षी वर्ग खड़ा हो रहा था। साथ ही आइसक्रीम अपने आप में एक जटिल कारोबार था क्योंकि इसके लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर की खासी कमी थी। आइसक्रीम को रखने के लिए फ्रीजर को बिजली की जरूरत होती है और उस समय अधिकांश जगहों पर इस बिजनेस के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर की सुविधाएं अनुकूल नहीं थी। इसलिए बड़ी कंपनियां मेट्रो शहरों पर ज्यादा ध्यान केंद्रित कर बिजनेस विस्तार के मौके देख रही थी। लेकिन उसी समय चेन्नै से अपना छोटा आइसक्रीम बिजनेस शुरू कर चंद्रमोगन की रणनीति वहां स्थापित बड़ी कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा की बजाय छोटे शहरों में बिजनेस के नये मौके ढ़ूंढ़ने की रही। प्रॉडक्ट की क्वालिटी को बेहतर रखने की चंद्रमोगन की रणनीति ने उसे रॉ मेटेरियल की सीधे खरीद के लिए मजबूर किया और यहीं से इस आइसक्रीम कंपनी की डेयरी कंपनी में तब्दील होने की यात्रा शुरू होती है। असल में उस समय उत्तर भारत की बड़ी आइसक्रीम कंपनियों ने यह बैकवर्ड इंटीग्रेशन नहीं किया। सबसे महत्वपूर्ण कच्चे माल दूध के लिए वेंडरों के भरोसे रही। जिसकी गुणवत्ता से अक्सर इन कंपनियों को समझौता करना पड़ता था और स्किम्ड मिल्क पाउडर से लेकर व्हाइट बटर का ज्यादा इस्तेमाल करना पड़ता था। चंद्रमोगन ने यह समझौता नहीं किया। बेहतर गुणवत्ता के रॉ मैटेरियल के चलते ही हैटसन आइसक्रीम से डेयरी कंपनी में तब्दील हो गई। लेकिन यह सब अचानक नहीं हुआ इस यात्रा में कई मोड़ आये और झटके भी आये। एक ऐसा मौका भी आया जब देश के आइसक्रीम बिजनेस को हिंदुस्तान लीवर एक एक करके अधिग्रहित कर रही थी और उस समय चंद्रमोगन को भी आइसक्रीम बिजनेस हिंदुस्तान लीवर को बेचने की सलाह दी गई। उस पर उनका जवाब था कि शुरुआती 13 हजार रुपये के निवेश के बकरार रहने तक वह उम्मीद नहीं छोड़ेंगे, जो बिजनेस में उनके भरोसे को दर्शाता है। हैटसन लगातार आगे बढ़ रही थी। इसका मूलमंत्र जहां उत्पाद की बेहतर गुणवत्ता था वहीं उपभोक्ताओं को अपने साथ बांधे रखने के लिए नये उत्पाद और प्रीमियम प्रॉडक्ट्स का लगातार कंपनी द्वारा बाजार में उतारा जाना इसका दूसरा पहलू था। कंपनी की मार्केटिंग रणनीति में बड़े कमीशन एजेंट्स की बजाय सीधे सेल और आइसक्रीम पार्लर स्थापित करने जैसे फैसले थे। विज्ञापनों और प्रोमोशन को कंपनी ने अपनी मार्केटिंग रणनीति का अहम हिस्सा बनाये रखा। इसके लिए राइस एंड राइस नाम की बड़ी अमेरिकी ब्रांड कंसल्टेंसी कंपनी की सेवाओं के लिए पैसा खर्च करने में चंद्रमोगन ने कोई झिझक नहीं की। हैटसन ने आरोक्य मिल्क, अरूण आइसक्रीम, हैटसन कर्ड, हैटसन घी, हैटसन पनीर, हैटसन डेयरी व्हाटनर, इबाको और ओयालो जैसे ब्रांड विकसित किये, जिनमें कई ग्लोबल ब्रांड्स का भाव देते हैं।</p>
<p>चंद्रमोगन तमिलनाडु के विरूदनगर जिले की छोटी जगह थिरूथंगल से आते हैं। यह इलाका देश में सबसे कम बारिश वाले इलाकों में से है। जाहिर है कि वहां खेती करना बहुत आसान काम नहीं है। लेकिन इस जिले की मिट्टी में कुछ तो खास है कि उसने के. कामराज जैसा राजनेता दिया जिसने अपनी विलक्षण प्रतिभा के चलते राष्ट्रीय स्तर पर एक कुशल प्रशासक और रणनीतिकार की छवि बनाई। कांग्रेस में कामराज प्लान को राजनीति की दुनिया में कौन नहीं जानता है। साथ ही इस जिले में करीब 15 साल पहले मैने अपनी एक यात्रा के दौरान खुद अनुभव किया कि वहां कुछ तो खास है। इस कम बारिश वाले इलाके में सिवकाशी है जो प्रिटिंग, मैचबाक्स और पटाखों की देश की औद्योगिक राजधानी है और&nbsp; देश का एक बड़ा बिजनेस सेंटर है। बहुत संभव है कि इन सबसे चंद्रमोगन को प्रेरणा मिली हो जिसके चलते यहां से आने वाला सामान्य किसान परिवार का बेटा एक कामयाब बिजनेसमैन के सफर तक पहुंचा।</p>
<p>इस समय हैटसन का डेयरी बिजनेस उसके आइसक्रीम के मूल बिजनेस से बड़ा है। यह आइसक्रीम कंपनी से डेयरी कंपनी बनी। वहीं देश की सबसे बड़ी आइसक्रीम कारोबारी सहकारी संस्था अमूल दूध के बिजनेस का लंबा सफर तय करने के बाद आइक्रीम बिजनेस में उतरी थी। देश में दूध और डेयरी कारोबार में अमूल को ही सबसे बड़ा ब्रांड माना जाता है। वह है भी, क्योंकि यह ब्रांड 50 हजार करोड़ रुपये से अधिक का कारोबार करता है। दूध बिजनेस में उतरी हैटसन के आरोक्य दूध ब्रांड ने अपनी गुणवत्ता के चलते तमिलनाडु में एक समय के कोआपरेटिव डेयरी फेडरेशन के लगभग एकाधिकार वाले मार्केट में जगह बनाई और तमिलनाडु में मार्केट लीडर के साथ कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और केरल से लेकर महाराष्ट्र तक अपने मार्केट का विस्तार किया। यह सब संभव हुआ किसानों के साथ सीधे साझेदारी के जरिये। कंपनी ने जिस तरह से किसानों से सीधे दूध की खऱीद का दायरा बढ़ाया उसने कंपनी का ट्रांसफोर्मेशन किया।</p>
<p>चंद्रमोगन ने टेक्नोलॉजी और मार्केटिंग को हैटसन को एक बड़ी कंपनी में तब्दील करने के बड़े औजारों के रूप में इस्तेमाल किया। इसके लिए आइसक्रीम पार्लरों में बेहतर फ्रीजर्स हों, आइसक्रीम को ट्रांसपोर्ट करने के लिए फ्रीजर्स का इस्तेमाल हो या उत्पादन के लिए बेहतर मशीनों का इस्तेमाल करना हो। चंद्रमोगन ने अमेरिकी संस्थान एमआईटी से इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट की पढ़ाई पूरी करने वाले सोरिन ग्रामा और उसके सहयोगी सैम व्हाइट की दूध के कलेक्शन सेंटरों पर स्टोर्ड पावर से चिलर के जरिये दूध की कूलिंग की तकनीक की फंडिंग और उसका कमर्शियल उपयोग किया। हैटसन एग्रो को दूध की आपूर्ति करने वाले किसानों के दुधारू पशुओं की प्रजाति के संवंर्धन और उनके डाटा के सेंट्रलाइजेशन जैसे कदम दूसरी कंपनियों के लिए उदाहरण की तरह हैं। साथ ही तमिलनाडु एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर अधिक प्रोटीन वाले चारे की किस्म विकसित कराने में सहयोग देकर किसानों तक उसे पहुंचाया। हैटसन की इस यात्रा में कई जगह चंद्रमोगन देश में श्वेत क्रांति के जनक डॉ. वर्गीज कूरियन की तरह सोचने वाले व्यक्ति की तरह दिखते हैं जो हर मसले की बारिकियों पर ध्यान देते हैं और किसी तरह का दिखावा नहीं करते। साथ ही गुणवत्ता और कारोबार की जरूरत के मसलों पर कोई समझौता भी नहीं करते। इस बीच जैरी कैन से लेकर दूध की अल्यूमीनियम कैन के डीलर जैसे अतिरिक्त कमाई वाले बिजनेस में भी उन्होंने हाथ आजमाया। उन्होंने कोलकाता में दूध के मार्केट में उतरने और उसके लिए वहां प्लांट शुरू करने, मिल्कशेक के लिए फ्लेवर्ड कंसंट्रेट बनाने जैसे बिजनेस फैसलों को पलटा तो किसानों के साथ मिल्क कलेक्शन सेंटर पर रिटेल बिजनेस शुरू करने के फैसले को बदलते हुए पशुचारा जैसे बिजनेस को शुरू कर समय रहते भूल सुधार कर घाटे को कम किया। हैटसन की यह कहानी सीख देती है कि अगर आप अपने कारोबार से सीधे जुड़े काम में ही आगे बढ़ेंगे तो कामयाबी मिलती जाएगी। जमीनी हकीकत को समझकर फैसले करने और उनमें समय से सुधार करने का उन्हें फायदा हुआ।</p>
<p>हरीश दामोदरन की इस किसाब को मैं उनकी पहली किताब &lsquo;इंडियाज न्यू कैपिटलिस्ट&rsquo; के विस्तार के रूप में देखता हूं। उन्होंने बिजनेस की दुनिया को किताब में समेटने की खास शैली अपनाई है जो विषय की गहराई को सामने लाती है। पहली किताब में हरीश दामोदरन ने कृषि की पृष्ठभूमि से आये और वहां से आई पूंजी का उपयोग कर बिजनेस एम्पायर खड़ा करने वाली शख्सियतों के सफर और उनके कारोबार की यात्रा को सामने रखा गया था। ब्रोक टू ब्रेकथ्रू में भी एक गांव और किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाला व्यक्ति किस तरह से औपचारिक बिजनेस एजुकेशन के बिना कैसे देश का एक सफल बिजनेसमैन बना यह उसका चित्रण तो है ही साथ ही दूध और आइसक्रीम जैसे जटिल बिजनेस को किस तरह से खड़ा किया गया यह उसकी केस स्टडी भी है।&nbsp; &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ 'ब्रोक टू ब्रेकथ्रू' देश की सबसे बड़ी प्राइवेट डेयरी कंपनी के बनने की दास्तान ]]></media:description>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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        <title><![CDATA[किसान आंदोलन और राजनीति के बीच का फासला खत्म हो रहा है]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/farmers-movement-and-politics-are-merging.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 06 Oct 2021 17:22:21 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
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        <description><![CDATA[ <p>पिछला एक माह देश में चल रहे किसान आंदोलन और देश की राजनीति को एक दूसरे के करीब लाने वाले घटनाक्रमों वाला रहा है। केंद्र सरकार द्वारा लाये गये तीन नये केंद्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ पहले भारत बंद को भी एक साल हो गया है और किसानों का आंदोलन दूसरे साल में प्रवेश कर गया है। वहीं दिल्ली की सीमाओं पर चल रहा किसानों का आंदोलन 11वें माह में प्रवेश कर गया है। सुस्त पड़ते और लोगों के जेहन से दूर होते आंदोलन में इस एक माह ने नई ऊर्जा भर दी है, नतीजतन किसान आंदोलन और राजनीति के बीच का फासला बहुत कम हो गया है। इस मामले में 3 अक्तूबर, 2021 की लखीमपुर खीरी में एक केंद्रीय मंत्री की कार द्वारा प्रदर्शन के बाद लौट रहे किसानों को रौंद दिये जाने और उसमें चार किसानों की जान चले जाने की दुर्भाग्यपूर्ण घटना ने राजनीति को आंदोलन के सबसे करीब लाने का काम किया है। वहीं पांच सितंबर की मुजफ्फरनगर की किसान महापंचायत और उसके बाद करनाल में एक एसडीएम के विवादित विडियो और लाठी चार्ज में एक किसान की मौत के बाद वहां किसानों का धरना प्रदर्शन और उसके बाद सरकार का बैकफुट पर आना तीसरी बड़ी घटना है। इसके साथ ही केंद्र सरकार द्वारा पंजाब और हरियाणा में धान की सरकारी खरीद को दस दिन पीछे करने का फैसला और किसानों के आंदोलन के बाद उसे बदलकर 3 अक्तूबर से खरीद शुरू करने का कदम भी आंदोलन के लिए एक अहम घटना रही है।</p>
<p>इन घटनाओं और आंदोलन के पड़ावों के चलते केंद्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहा आंदोलन राजनीतिक रूप से अधिक प्रभावी होता जा रहा है। यही वजह है कि रविवार की घटना में किसानों की मौत के अगले ही दिन सरकार को किसान संगठनों के साथ बातचीत में समझौते का फैसला करने की जल्दी करनी पड़ी। जबकि उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार को एक सख्त सरकार के रूप में पेश किया जाता रहा है। समझौते की जल्दबाजी करने के साथ ही इसमें केंद्रीय गृह राज्य मंत्री के बेटे के खिलाफ हत्या का केस दर्ज करने व मृतक किसानों के परिवारों को मुआवजा और एक परिजन को नौकरी देने का मतलब है कि जिन किसानों को भाजपा के कई नेता और उसके सहयोगी संगठनों के पदाधिकारी उपद्रवी व राजनीति से प्रेरित कह रहे थे उनको राज्य सरकार ने पीड़ित माना है। हालांकि इस मामले में मंत्री के पुत्र की गिरफ्तारी और केंद्रीय राज्य मंत्री की केंद्रीय मंत्रीमंडल से बर्खास्तगी की किसान संगठनों की मांग पर अभी अमल नहीं हुआ है। वहीं छह अक्तूबर को पंजाब और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्रियों द्वारा मृतक किसानों के परिवारों को 50 लाख रुपये देने की घोषणा ने राज्य सरकार के मुआवजे के फैसले को फीका कर दिया है।</p>
<p>खीरी की घटना के पहले 5 सितंबर की मुजफ्फरनगर की किसान महापंचायत में राज्य और केंद्र की भाजपा नेतृत्व वाली सरकारों के खिलाफ खुलकर आरोप लगाये गये और आने वाले विधान सभा चुनावों में भाजपा को हराने का आह्वान किया गया। इस पंचायत के बाद भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत राजनीतिक निशाने पर भी आए लेकिन पंचायत में किसानों की भारी शिरकत ने उनके कद को मजबूत कर दिया। उसके बाद करनाल में किसानों की मांगों का माना जाना और 2 अक्तूबर को धान की खरीद देर से शुरू करने के फैसले को सरकार द्वारा बदलना किसानों के मजबूत आंदोलन के परिणाम के रूप में देखा जा रहा था।</p>
<p>इस बीच दिल्ली के बार्डरों पर बैठे किसानों के चलते रास्ते बंद होने का मुद्दा भी सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा और कोर्ट ने सख्त टिप्पणियां भी की। किसान महापंचायत नाम का जो संगठन जंतर मंतर पर सत्याग्रह की अनुमति की मांग लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था वह है 26 जनवरी को आंदोलन छोड़कर चला गया था। वहीं संयुक्त किसान मोर्चा के सदस्यों ने साफ किया है कि वह कोर्ट नहीं गये थे।</p>
<p>रविवार की लखीमपुर खीरी की घटना ने किसानों के आंदोलन को एक नये मोड़ पर ला दिया है। इसकी वजह है पूरे आंदोलन के दौरान पहली बार किसानों पर हमले में चार किसानों की मौत होना। इसके पहले दिल्ली के बार्डरों पर चल रहे आंदोलन के दौरान 600 से ज्यादा किसानों के शहीद होने का आंकड़ा संयुक्त किसान मोर्चा देता है लेकिन यह पहली घटना है जिसमें किसान मारे गये हैं और उसमें आरोपित भारतीय जनता पार्टी के एक केंद्रीय मंत्री का बेटा है। इसलिए इसका सीधा राजनीतिक असर पड़ना तय है। कार के नीचे किसानों के रौंदे जाने की घटना का पूरे देश में विरोध और प्रतिक्रिया हुई। उत्तर प्रदेश में आगामी विधान सभा चुनाव कुछ माह ही दूर हैं इसलिए इसका राजनीतिक नुकसान भाजपा को हो सकता है। इसीलिए उत्तर प्रदेश की राजनीतिक पार्टियों सपा, बसपा और रालोद के अलावा कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस से लेकर अकाली दल, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, वाम दल और आप जैसी पार्टियों ने इस पर तीखी प्रतिक्रियाएं दी हैं और इनके नेता लखीमपुर खीरी पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। यह बात अलग है कि 6 अक्तबूर को कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी को वहां जाने की इजाजत देने के पहले राज्य सरकार ने राजनीतिक दलों के लोगों को खीरी जान से रोकने के पुख्ता इंतजाम किये थे। वहीं इस मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी लगभग चुप्पी साधे हुए है।</p>
<p>इस अकेली घटना ने राजनीतिक दलों को किसानों के मुद्दे पर मुखर होने का सबसे बड़ा मौका दिया है। पंजाब में भी विधान सभा चुनाव हैं और उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड में चुनाव होने हैं। पंजाब में केंद्रीय कानूनों के खिलाफ आंदोलन सबसे अधिक मजबूत है और इसी तरह की स्थिति हरियाणा में है लेकिन अब उत्तराखंड के तराई और मैदानी हिस्सों में भी मजबूत हो रहा है। जबकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक सीमित किसान आंदोलन अब उत्तर प्रदेश की तराई में बरेली से बहराइच तक अधिक मुखर होगा। आंदोलन जितना मजबूत होगा विपक्षी दलों को उतना ही अधिक फायदा होगा।</p>
<p>जहां तक तीन केंद्रीय कानूनों की बात है तो उनको रद्द किये जाने की संयुक्त किसान मोर्चा की मांग पर केंद्र सरकार लगभग चुप है। लेकिन इस बढ़ते राजनीतिक दबाव के चलते यह स्थिति अधिक दिनों तक बनी रहेगी कहना मुश्किल है। हालांकि इस बीच पंजाब में मुख्यमंत्री पद से हटाये गये कैप्टन अमरिंद्र सिंह के साथ मिलकर किसान आंदोलन को खत्म करने लिए राह निकालने जैसे कयास भी मीडिया में लगाये गये थे। लेकिन लखीमपुर खीरी की घटना के बाद शायद ही इस विकल्प की कोई अहमियत अब बची है। जाहिर सी बात है कि अब केंद्र सरकार पर आंदोलन को समाप्त करने की दिशा में विकल्प तलाशने का दबाव बढ़ जाएगा। लेकिन कानूनों की वापसी जैसा विकल्प उसे मंजूर होगा इसको लेकर कहा नहीं जा सकता है क्योंकि कुछ लोगों का तर्क है कि इससे सरकार के बड़े फैसले लेने की छवि प्रभावित होगी। &nbsp;&nbsp;</p>
<p>वहीं सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के अलावा सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित कमेटी एक सदस्य अनिल धनवत द्वारा पिछले महीने देश के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर कमेटी द्वारा तैयार रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की अपील की गई। लेकिन यह रिपोर्ट अभी तक सार्वजनिक नहीं हुई है। संयुक्त किसान मोर्चा में शामिल किसान संगठनों का कहना है कि कानूनों के अमल पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई है लेकिन कानून तो कायम हैं। इसलिए रोक तो कभी भी हटाई जा सकती है। उनका कहना है कि हम तो कोर्ट गये ही नहीं क्योंकि कानून सरकार ने बनाये हैं इसलिए इनको रद्द करने का फैसला भी उसे ही लेना है। हालांकि 22 जनवरी, 2021 के बाद से संयुक्त किसान मोर्चा और सरकार के बीच बातचीत नहीं हो रही है।</p>
<p>लेकिन हाल के घटनाक्रम मामले की पेचीदगी बढ़ा रहे हैं। कुछ एक्सपर्ट किसान आंदोलन को अमीर किसानों का आंदोलन बता रहे हैं और उनका तर्क है कि सरकार को छोटे किसानों को कानून के पक्ष में जागृत करना चाहिए। लेकिन शायद यह एक्सपर्ट इस बात से अनभिज्ञ हैं कि अधिकांश किसान छोटे ही हैं और उनको आय का दूसरा कोई विकल्प नहीं मिल रहा है इसलिए वह खेती कर रहे हैं। इनमें बड़ी तादाद उन संयुक्त किसान परिवारों की है जहां अभी भूमि का बंटवारा कागजों पर नहीं हुआ है इसलिए इनको खेमों में बांटना संभव नहीं है।</p>
<p>इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि छोटे-मोटे मामलों को छोड़ दें तो संयुक्त किसान मोर्चा के सदस्य संगठन एकजुट हैं और इसके चलते आंदोलन को लंबा खींचकर खत्म करने की सरकार की रणनीति कारगर नहीं हो रही है। दस माह से अधिक समय से दिल्ली की सीमाओं पर बैठे किसानों के संगठन साबित कर रहे हैं कि आंदोलन को जारी रखने का माद्दा उनके पास है। इसलिए अब सरकार को देखना है कि किसानों के साथ बातचीत कर रास्ता निकालने के लिए अभी इंतजार करना है या फिर इसके बढ़ते राजनीतिक असर की परवाह किये बगैर आगामी विधान सभा चुनावों में इसके प्रभाव का आकलन करने तक यथास्थिति को बरकार रखना है। &nbsp;&nbsp;&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ किसान आंदोलन और राजनीति के बीच का फासला खत्म हो रहा है ]]></media:description>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

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        <title><![CDATA[सरकारी संपति के निजीकरण का दूसरा नाम है  नेशनल मोनेटाइजेशन पाइपलाइन]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/national-monetisation-pipeline-privatisation-of-govt-owned-assets-by-another-name.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 30 Sep 2021 21:18:03 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
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        <description><![CDATA[ <p style="text-align: justify;">वित्त मंत्री, <span>निर्मला सीतारमण ने &nbsp;</span>2021-22<span> के अपने बजट में घोषणा की थी कि उनकी सरकार ने ऑपरेटिंग पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर एसेट्स का मोनेटाइजेशन करने का निर्णय लिया है। इसे एक नए बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए महत्वपूर्ण वित्तीय विकल्प के रूप में घोषित किया गया । उन्होने कहा कि इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए "नेशनल &nbsp;मोनेटाइज पाइपलाइन" (एनएमपी) शुरू की जाएगी। अब &nbsp;सात महीनों बाद</span>, <span>एनएमपी का लांच किया गया</span>, <span>जो इस बात को दर्शाता है कि सरकार कई "कोर एसेट्स" यानी अति महत्वपूर्ण संस्थानों का&nbsp; मोनेटाइजेशन &nbsp;करके अगले चार वर्षों में </span>6<span> लाख करोड़ रुपये जुटाने का इरादा रखती है । इस सरकार के शब्दकोष में संपत्ति का मोनेटाइजेशन&nbsp; कोई नई बात नहीं है । जिस तरह से एयर इंडिया और अन्य पब्लिक सेक्टर के उद्यमों में&nbsp; का विनिवेश किया गया है यह उसी तरह का कदम है। यह मायने में यह मोनोटाजेशन के नाम &nbsp;पर सरकारी संपत्तियों &nbsp;का निजीकरण करना ही है ।</span></p>
<p style="text-align: justify;">निजीकरण की शब्दावली को मोनोटाजेशन का नाम दे दिया गया है और इसकी वजह &ldquo;<span>निजीकरण</span>&rdquo;<span>&nbsp; का तीखा राजनतिक विरोध होना रहा है। दो खंडों वाली नीति आयोग की रिपोर्ट</span>, <span>जो "एसेट मोनोटाजेशन गाइडबुक के रूप में कार्य करती है</span>, <span>इसमें बाताया जाता है कि एनएमपी "मूल संपत्तियों के मोनेटाजेशन के लिए एक सामान्य ढांचा विकसित करने" में मदद करेगी और इससे निजीकरण से अलग देखा जा सकेगा। लेकिन क्या एसेट मोनोटाजेशन और निजीकरण के बीच कोई व्यवहारिक अंतर है</span>?</p>
<p style="text-align: justify;">नीति आयोग की रिपोर्ट में एसेट मोनेटाजेशन को परफार्मिंग संपत्तियों का हस्तांतरण के रूप में वर्णित किया गया है। निष्क्रिय पूंजी को अनलॉक करके अन्य संपत्तियों या परियोजनाओं में पुनर्निवेष किया जाए जिससे अतिरिक्त लाभ और बेहतर परिणाम हासिल किये जा सकें। हमारे विचार में, ए<span>सेट मोनेटाजेशन से तीन प्रकार के प्रश्न उठते हैं। सबसे पहले कि क्या &nbsp;मोनेटाजेशन के लिए पहचानी गई संपत्तियां "निष्क्रिय" या " परर्फामिंग" है </span>? <span>निश्चित रूप से</span>, <span>वह दोनों नहीं हो सकती हैं । दूसरा, क्या देश के आम नागरिक कथित रुप से इससे अतिरिक्त लाभ" प्राप्त करने की उम्मीद कर सकते हैं</span>? <span>और</span>, <span>अंत में</span>, <span>क्या सरकार करदाताओं के पैसे जुटाई गई संपत्ति बेचने के बजाय संसाधन जुटाने के लिए अन्य रास्ते तलाश सकती थी </span>?</p>
<p style="text-align: justify;">सरकार ने निजी संस्थाओं को स्थानांतरित करने के लिए सामरिक और महत्वपूर्ण दोनो तरह की परफार्मिंग एसेट की पहचान की है। इनमें 26,700<span> किमी से अधिक राजमार्ग, 400 रेलवे स्टेशन, 90 पैसेजेंर ट्रेन, चार</span><span> हिल रेलवे जिसमें दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे भी शामिल है। इसके अलावा मौजूदा समय में पब्लिक सेक्टर उपक्रम जैसे &nbsp;दूरसंचार</span>, <span>पावर ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन , पेट्रोलियम</span>, <span>पेट्रोलियम उत्पाद और प्राकृतिक गैस पाइपलाइन साथ ही एनएमपी भी शामिल हैं। अगर ऐसी संपत्ति की पेशकश नहीं की जाती</span>, <span>तो क्या निजी क्षेत्र उन पर अधिकार हासिल करने में दिलचस्पी लेते </span>?</p>
<p>सरकार का इरादा एनएमपी के तहत इन संपत्तियों पर अपने अधिकारों को लीज पर देने या बेचने का है जिसके लिए लंबी अवधि की लीज के लिए अग्रिम या एक निश्चित अंतराल पर भुगतान हो सकते हैं। <span>इन संस्थाओं में सरकार के हिस्से को लीज पर देने या डिसइनवेस्टमेंट से अपेक्षित फाइनेंशियल फ्लो आएगा। इस प्रकार केंद्र सरकार जो इस समय एक वित्तीय संकट के चपेट में है&nbsp; उसको इससे एक बड़ा लाभ होगा । साल </span>2020-21<span> के अंत में केंद्र सरकार का कर्ज-जीडीपी अनुपात &nbsp;एक साल पहले के </span>48.6<span> फीसदी &nbsp;से बढकर </span>60<span> फीसदी के पार</span>&nbsp;<span>हो गया है। &nbsp;मौजूदा समय मे उम्मीद हैं कि </span>2021-22<span> में यह आंकड़ा </span>62<span> फीसदी के करीब हो जाएगा । इस स्थिति को देखते हुए</span>&nbsp;<span>एनएमपी को संसाधन जुटाने और राजकोषीय गतिरोध से बाहर निकलने के लिए सरकार की क्षमता के रूप में पेश किया जा रहा है।</span></p>
<p style="text-align: justify;">एनएमपी को लेकर वित्त मंत्री की घोषणा का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि सरकार ने एसेट मोनोटाजेशन के देश के आम नागरिक पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में कोई भी जिक्र नहीं किया है। इस मुद्दे को समझने के लिए <span>दो स्पष्ट आयामों की आवश्यकता मानी गई है। सबसे पहले</span>, <span>जो एसेट लीज या डिसइनवेस्टमेंट के लिए दिये जा रहे हैं इनकी स्थापना में </span><span>जनता के कर भुगतान से जुटाए गये संसाधानों की बड़ी भागीदारी है और इन परिसंपत्तियों के आपरेशन और प्रबंधन में उनकी हिस्सेदारी है। </span><span>दूसरे</span>, <span>इन परिसंपत्तियों का प्रबंधन अब तक सरकार और इसकी एजेंसियों द्वारा किया जाता रहा है</span>, <span>जो सार्वजनिक हित में काम करती हैं और लाभ कमाने के विचारों से प्रेरित नहीं होती हैं। इसलिए</span>, <span>इन संपत्तियों के उपयोग के बदले जनता द्वारा दिये जाने वाला &nbsp;शुल्क वाजिब रहा है और अब रेलवे ,राजमार्गों से लेकर बिजली</span>, <span>दूरसंचार और गैस तक सभी प्रमुख उपयोगिता वाली पब्लिक सेक्टर की परिसंपत्तियों&nbsp; को चलाने की जिम्मेदारी निजी कंपनियों को मिल रही है। इससे देश के नागरिकों पर दोहरा टैक्स लगेगा। सबसे पहले</span>, <span>उन्होंने संपत्ति बनाने के लिए करों का भुगतान किया और अब उपयोग कर्ता के रूप में शुल्क का भुगतान करेंगे</span>, <span>जिससे उनके घरेलू बजट पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।</span></p>
<p style="text-align: justify;">इसके पीछे का कारण स्पष्ट है । सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाओं के विपरीत, <span>निजी क्षेत्र की कंपनियों का मूल उद्देशय अपने लाभ को अधिकतम करना और शेयरधारकों को मिलने वाले रिटर्न को बढ़ाना है। दूसरे शब्दों में कहे तो यह सामाजिक लाभ नहीं है</span>, <span>बल्कि अधिकतम निजी लाभ है जो कॉरपोरेट्स को चलाता है। इसलिए</span>, <span>जैसा कि सरकार परफार्मिंग एसेट को निजी क्षेत्र को स्थानांतरित करने की तैयारी कर रही है सरकार को इस बात को सुनिश्चित करना होगा कि निजी क्षेत्र की कंपनियां उपयोग कर्ता से बाजार से अधिक कीमत न ले । नीति आयोग की रिपोर्ट में भी यह महत्वपूर्ण आयाम स्पष्ट रूप से नहीं लिखा गया है। लेकिन &nbsp;यह तो स्पष्ट है कि उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा तभी की जा सकती है जब सरकार नियमों के माध्यम से कंपनियों की लाभ-अधिकतम करने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाती है। रोजमर्रा के उपयोग की सेवाओं के निजीकरण के पिछले प्रकरणो को देखा जाय तो बेहतर नियमन की बजाय नियामक खामियों के चलते उप</span><span>भोक्ताओं का शोषण ही हुआ है । उदाहरण के लिए देश की राजधानी दिल्ली में बिजली वितरण प्रणाली के निजीकरण को ही ले लीजिए। यहां कांग्रेस सरकार ने &nbsp;दिल्ली में बिजली वितरण का निजीकरण किया इसके परिणामस्वरूप में तेजी से बिजली दरों में &nbsp;वृद्धि हुई जिससे जहां यह गरीबों की पहुंच से बाहर हो गई&nbsp; वहीं मध्यम वर्ग भी ऊंची दरों से प्रभावित हुआ। इसके बाद आम आदमी पार्टी के मुख्य चुनावी वादों में सबसे महत्वपूर्ण&nbsp; सस्ती दर पर बिजली उपलब्ध कराना था जिसे दिल्ली सरकार ने उपभोक्ता को सब्सिडी वाली बिजली देकर पूरा किया । लेकिन राजधानी के मतदाताओं को इस बात का बहुत कम एहसास है कि सरकार जो सब्सिडी दे रही है वह&nbsp; उसके लिए उनसे अधिक टैक्स के रूप मे वसूल करती है। इसका मतलब है कि शहर के करदाता या तो अधिक टैक्स दे रहे हैं या "सस्ती" बिजली दरों से "लाभ" के लिए दूसरी सार्वजनिक सेवाओं से वंचित हो रहे हैं&nbsp; जबकि निजी&nbsp; कंपनियां तो अब भी मुनाफा कमा रही हैं ।</span></p>
<p style="text-align: justify;">चूंकि प्रस्तावित एसेट मोनेटाजेशन सरकार द्वारा संसाधनों की कमी से निपटने के उपाय के रूप में लाया गया है।&nbsp; <span>सरकार से एक प्रासंगिक प्रश्न यह है कि क्या ऐसे अन्य रास्ते हो सकते थे जो संसाधनों के अंतर को पाटने के लिए उपयोग किए जा सकते थे। एक संभावना यह थी कि कर राजस्व में वृद्धि की जाए</span>&nbsp;<span>क्योंकि साल </span>2019-20<span> में </span>17.4<span> प्रतिशत के साथ भारत का सकल घरेलू उत्पाद के साथ कर अनुपात अधिकांश विकसित राष्ट्रों की तुलना में काफी कम था। टैक्स अनुपालन में सुधार और खामियों को दूर करने पर लंबे समय से जोर दिया गया है क्योंकि कर राजस्व में सुधार के लिए इसे सबसे सुरक्षित तरीके के रूप में देखा गय़ा है ।</span>, <span>लेकिन इस पर वास्तव मे बहुत कम काम किया गया है</span>, <span>जैसा कि यहां दिये जा रहे उदाहरण मे देखने को मिलता है। 2005-06 से</span><span>&nbsp;इलेक्ट्रॉनिक रूप से अपना रिटर्न दाखिल करने वाली कंपनियो द्वारा घोषित लाभ और टैक्स के भुगतान का डेटा सरकार उपलब्ध करा रही है । इस &nbsp;डेटा से पता चलता है कि 2005-06 में</span>, <span>इनमें से 40 प्रतिशत कंपनियों ने घोषणा की थी कि वे कोई लाभ नही कमा रही है </span>&nbsp;<span>और यह आंकड़ा </span>2018-19<span> में बढ़कर </span>51<span> प्रतिशत से अधिक हो गया था। इसके अलावा एक</span><span> करोड़ रुपये या उससे कम का लाभ कमाने का दावा करने वाली कंपनियों का हिस्सा 2005-06 में 55 प्रतिशत था जो 2018-19 में घटकर 43 प्रतिशत हो गया है। यह नंबर खुद मे &nbsp;दर्शाते हैं कि कैसे &nbsp;भारत की बड़ी-बडी कंपनियां &nbsp;टैक्स नेट से बचने के लिए रिपोर्टिंग खामियों का फायदा उठा रही हैं। लेकिन इसके बावजूद एक के बाद एक सरकारें इतनी उदार क्यों रही हैं </span>?</p>
<p style="text-align: justify;">नीति आयोग के अनुसार, "<span> एसेट्स &nbsp;मोनेटाइजेशन प्रोग्राम का रणनीतिक उद्देश्य है, "निजी क्षेत्र की पूंजी और क्षमता &nbsp;का दोहन करके सार्वजनिक क्षेत्र की संपत्ति में निवेश की वैल्यू को अनलॉक करना । नीति आयोग के उद्देश्य के अनुसार पब्लिक सेक्टर के उद्योग उद्यम अक्षम हैं। लेकिन यह&nbsp; वास्तविकता के विपरीत&nbsp; तर्क है। साल </span>2018-19<span> में </span><span>&nbsp;</span>28<span> प्रतिशत सार्वजनिक उद्यम घाटे में थे जबकि निजी क्षेत्र की 51 प्रतिशत बड़ी कंपनियां घाटे में थी। ऐसे में तो यह सोचने वाली बात है कि एसेट्स &nbsp;मोनेटाइजेशन प्रोग्राम क्या सच मे सक्षम होगा?</span></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ सरकारी संपति के निजीकरण का दूसरा नाम है  नेशनल मोनेटाइजेशन पाइपलाइन ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>jpagrimedia73@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[छपरौली की जयंत चौधरी की रस्म पगड़ी सभा और मुजफ्फरनगर किसान पंचायत में 1989 को दोहराने के राजनीतिक संकेत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/chaprauli-ceremony-for-jayant-chaudhary-and-muzaffarnagar-kisan-panchayat-indicates-1989-like-political-scenario-in-western-up.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 20 Sep 2021 00:04:40 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/chaprauli-ceremony-for-jayant-chaudhary-and-muzaffarnagar-kisan-panchayat-indicates-1989-like-political-scenario-in-western-up.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><em><strong>छपरौली, बागपत</strong></em></p>
<p>पिछले दो सप्ताह उत्तरी भारत और खासतौर से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन और यहां की राजनीति में बदलाव के संकेत देने वाले रहे हैं। पांच सिंतबर की मुजफ्फरनगर की संयुक्त किसान मोर्चा की पंचायत की कामयाबी और उसके दो सप्ताह बाद 19 सितंबर को छपरौली में राष्ट्रीय लोकदल के पूर्व अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह की श्रद्धांजलि सभा और उनकी जगह अध्यक्ष का पद संभालने वाले उनके बेटे जयंत चौधरी की रस्म पगड़ी के कार्यक्रम में लाखों के जनसमूह की उपस्थिति को इस संभावित बदलाव के संकेत के रूप में देखा जा सकता है। यह दोनों घटनाएं 1989 के दौर को दोहराती दिख रही हैं। यह&nbsp; इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि 1989 का लोक सभा और उत्तर प्रदेश विधान सभा का चुनाव भारतीय किसान यूनियन के राजनीतिक असर के चलते तत्कालीन जनता दल के लिए बेहतर चुनावी नतीजे लाने वाला रहा था। तब अजित सिंह जनता दल के सबसे कद्दावर नेताओं में से एक थे। वहीं भारतीय किसान यूनियन के उस सबसे मजबूत दौर में महेंद्र सिंह टिकैत यूनियन के अध्यक्ष थे।</p>
<p>अब अजित सिंह की विरासत जयंत चौधरी के पास है। चौधरी अजित सिंह के निधन के बाद पहली बार जयंत चौधरी के नेतृत्व में राष्ट्रीय लोक दल 2022 के उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनावों में उतरेगी। वहीं भारतीय किसान यूनियन की अध्यक्षता महेंद्र सिंह टिकैत के बेटे और बालियान खाप के चौधरी, नरेश टिकैत के पास है। वहीं यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत मौजूदा किसान आंदोलन के एक बड़े नेतृत्व के रूप में अपनी जगह बना चुके हैं। पांच सितंबर, 2021 की मुजफ्फरनगर की संयुक्त किसान मोर्चा की पंचायत लाखों किसानों की उपस्थिति के चलते कामयाब रही थी। यह भारतीय किसान यूनियन की अभी तक की सबसे बड़ी किसान पंचायतों में से एक रही है। वहीं यह हाल के बरसों में उत्तर प्रदेश की अधिकांश बड़ी राजनीतिक रैलियां भी इसकी बराबरी करने में सक्षम नहीं हैं। इसके चलते संयुक्त किसान &nbsp;मोर्चा में राकेश टिकैत का कद बहुत मजबूत हुआ है। एक तरह से 28 जनवरी, 2021 के दिन जिस तरह से गाजीपुर बार्डर पर राकेश टिकैत ने किसान आंदोलन को नया जीवन दिया उसी तरह मुजफ्फरनगर की किसान पंचायत ने आंदोलन को एक नये चरण में पहुंचा दिया है जो आंदोलनकारी किसान संगठनों और उनके नेतृत्व को इसके मजबूती के साथ जारी रहने के प्रति आश्वस्त कर गया।</p>
<p>केंद्र सरकार द्वारा लाये गये तीन केंद्रीय कानूनों के खिलाफ दिल्ली की सीमाओं पर चल रहा किसानों का आंदोलन दस माह पूरे करने के करीब है। सरकार और किसान संगठनों के बीच 22 जनवरी, 2021 से बातचीत भी बंद है। इसके चलते यह आंदोलन भाजपा&nbsp; के विरोध में किसानों और मतदाताओं को एकजुट करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इस आंदोलन में राजनीति को लेकर कोई भ्रम नहीं है। भले ही यह पूरी तरह के अराजनैतिक है लेकिन इसके विरोध के केंद्र में भाजपा है। अब किसान संगठनों के नेता साफतौर पर कह रहे हैं कि आगामी पांच राज्यों के विधान सभा चुनावों में किसान भाजपा को राजनीतिक नुकसान पहुंचाना चाहते हैं। यह बात मुजफ्फरनगर की किसान पंचायत में बहुत साफ कर दी गई।</p>
<p>यहां मैं एक बार फिर 1989 की समानता देख रहा हूं। साल 1988 के अक्तूबर के भारतीय किसान यूनियन के दिल्ली में वोट क्लब के धरने और 31 अक्तूबर, 1988 की रैली के साथ इसके समापन में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के खिलाफ किसानों के गुस्से को वोट में बदलने का संदेश लोगों में चला गया था। कुछ इसी तरह की नाराजगी पांच सितंबर की मुजफ्फरनगर की पंचायत में दिखी और उत्तर प्रदेश के चुनावों में किसानों के मतों पर इसका सीधा असर पड़ने वाला है। उत्तर प्रदेश में किसानों के वोट निर्णायक हैं और कोई भी राजनीतिक दल इसकी अनदेखी नहीं कर सकता है।</p>
<p>इस गुस्से का फायदा किसे मिलेगा इसको लेकर बहुत कुछ छिपा नहीं है। जहां 1989 में फायदा जनता दल को मिला था वहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय लोक दल को किसानों की पार्टी माना जाता है और उसे ही यह फायदा मिलने की संभावना है। वहीं 19 सितंबर के रस्म पगड़ी कार्यक्रम में सभी सर्व खाप चौधरियों द्वारा&nbsp; जयंत चौधरी को पगड़ी पहनाने के फैसले और उसमें भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष नरेश टिकैत समेत सभी खाप प्रमुखों की उपस्थिति इस गणित को समझने की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ती है। राकेश टिकैत लगातार भाजपा के खिलाफ किसानों को वोट की चोट करने के बयान दे रहे हैं। नरेश टिकैत लगातार भाजपा को किसान विरोधी पार्टी बता रहे हैं। ऐसे में इन वोटों की स्वाभाविक दावेदार राष्ट्रीय लोक दल ही है।</p>
<p>दूसरे पंचायतों के सिलसिले ने उत्तर प्रदेश में जाट-मुस्लिम गठजोड़ की वापसी का माहौल बना दिया है। जो 2013 के मुजफ्फरनगर के सांप्रदायिक दंगों के चलते जाट और मुस्लिमों में पैदा हुई खाई को भर रहा है। वहीं अखिलेश यादव की अध्यक्षता वाली समाजवादी पार्टी का लोक दल के साथ गठबंधन लगभग तय माना जा रहा है। दोनों दलों के उच्च सूत्रों का कहना है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गठबंधन में राष्ट्रीय लोक दल को अधिक सीटें मिलेंगी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उत्तर प्रदेश विधान सभा की 100 से अधिक सीटें हैं और इनमें से आधे से अधिक में जाट वोट निर्णायक हैं। मुस्लिम वोटों के साथ मिलकर यह काफी हद तक जीत का गणित बनाते हैं।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2021/09/image_750x_6147829874fdb.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>छपरौली में चौधरी अजित सिंह की श्रद्धांजली सभा और जयंत चौधरी के रस्म पगड़ी कार्यक्रम में जुटी भीड़</strong></p>
<p>हालांकि भाजपा नेतृत्व लगातार राज्य में विकास के बड़े दावे कर रहा है। लेकिन इस लेखक के साथ एक बातचीत में छपरौली के ही एक बड़े भाजपा नेता ने स्वीकार किया कि पश्चिम में भाजपा को नुकसान हो रहा है। इसकी वजह गिनाते हुए उन्होंने गन्ने के राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) में चार साल से वृद्धि न करना, समय पर गन्ने का भुगतान न होना, अवारा पशुओं की समस्या, बेरोजगारी और महंगाई को बताया। उक्त नेता ने साफ किया ही हमारी सरकार इन मुद्दों पर नाकाम रही है। वैसे एक तथ्य यह भी है कि उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों में भुगतान के मामले में सबसे खराब प्रदर्शन वाली चीनी मिल के रूप में छपरौली के पास की मलकपुर चीनी मिल शुमार हैं। वहीं गन्ना विकास मंत्री सुरेश राणा के गृह जिले शामली की चीनी मिलें भुगतान के मामले में सबसे खराब स्थिति में हैं।</p>
<p>आज इस लेखक ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में आजादी के पहले से एक अहम सीट छपरौली में आज सात आठ साल के छोटे बच्चों से लेकर 80 साल से अधिक की उम्र के बुजुर्गों में जयंत चौधरी के प्रति जो भावनात्मक जुड़ाव देखा वह साफ कर रहा है कि 1937 में चौधरी चरण सिंह द्वारा इस सीट से उत्तर प्रदेश की विधान सभा में पहुंचने से लेकर अभी तक यह सीट उनकी पार्टी और उनके बाद अजित सिंह की पार्टी के अलावा कोई दूसरा दल क्यों नहीं जीत सका। यह समझने के लिए आज का छपरौली का माहौल काफी है और दूसरी कोई मशक्कत करने की जरूरत नहीं है। 19 सितंबर की इस श्रद्धांजली सभा ने यह संकेत दे दिये हैं कि जयंत के नेतृत्व में राष्ट्रीय लोक दल एक बार फिर किसानों की एक पार्टी के रूप में अपनी ताकत हासिल करने की संभावनाएं मजबूत कर रहा है। इसके लिए केंद्रीय कानूनों के खिलाफ किसानों का आंदोलन और उत्तर प्रदेश में बिजली और डीजल की बढ़ती कीमतों से लेकर अवारा पशुओं की समस्या और गन्ने के दाम का मुद्दा इसके लिए जमीन तैयार कर रहा है। &nbsp;</p>
<p>&nbsp;&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ छपरौली की जयंत चौधरी की रस्म पगड़ी सभा और मुजफ्फरनगर किसान पंचायत में 1989 को दोहराने के राजनीतिक संकेत ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना: आत्मनिरीक्षण, अपेक्षाएं और भविष्य का रोडमैप]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/pmfby-introspection-expectations-and-future-road-map.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 29 Aug 2021 14:00:45 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/pmfby-introspection-expectations-and-future-road-map.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY)&nbsp;पिछले कुछ सालों से अस्तित्व में है और किसानों की परेशानियों को दूर करने में इसने भूमिका निभाई है। यह सर्वश्रेष्ठ कवरेज के साथ दुनिया की सबसे ज्यादा समग्र कृषि योजना है जो किसानों को दी जा सके। हालांकि अब सुगमता,&nbsp;पारदर्शिता और उन्नयन के संदर्भ में इस योजना के उद्देश्यों के कार्यान्वयन की प्रक्रिया को परिष्कृत करना अनिवार्य हो गया है। इस योजना में आने वाली समस्याएं निम्नलिखित हैं:<br /><br />&nbsp;कई मौकों पर क्लेम के भुगतान में देरी देखी गई है,&nbsp;जिससे किसानों को परेशानी होती है। इस बात पर प्रकाश डालना भी बहुत महत्वपूर्ण है कि उपज के आंकड़े जारी करने में देरी भुगतान में देरी होने के पीछे एक प्रमुख कारण है। इन परेशानियों से निपटने में समय पर कार्य करने की जरूरत होती है। हालांकि उचित इन्फ्रास्ट्रक्चर और संसाधनों के अभाव में इसका समाधान होने के बजाय यह स्थिति और बिगड़ गई है। किसानों की दयनीय स्थिति को और बिगाड़ने के पीछे का कारण सरकार और बीमा कंपनियों&nbsp;का कोई विवाद नहीं होना चाहिए,&nbsp;जो अक्सर होता है। खेतों से लिए गए उपज के आंकड़ों में विसंगति और स्थानीय प्रशासन या बीमा कंपनी अधिकारी द्वारा उसमें हेरफेर करना आम समस्याएं हैं,&nbsp;जिनके कारण ना सिर्फ गलत क्लेम तय होता है बल्कि उस क्षेत्र के उत्पादन का भी गलत आंकड़ा बनता है।<br /><br />आजकल नियमित तौर पर हो रहीं स्थानीय आपदाएं इस योजना के अंतर्गत कवर होती हैं। हालांकि क्लेम के निपटान में अक्सर देरी होती है या इसे खारिज कर दिया जाता है और अपर्याप्त रूप से निपटाया जाता है,&nbsp;जिससे किसान परेशान हो जाता है। यूएवी,&nbsp;रिमोट सेंसिंग,&nbsp;मौसम विश्लेषण की तकनीक के सही संतुलन के साथ हाईब्रिड विधि और कुशल स्थानीय कर्मियों की जरूरत है। यह गौर करने की बात है कि&nbsp;PMFBY&nbsp;के पांच साल होने के बाद भी कुशल कर्मियों और अनुभव के साथ फसल नुकसान का आकलन बहुत कम हुआ है।<br />&nbsp;इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं जैसी वर्तमान चुनौतियों को देखते हुए इस योजना के आयाम बदलने की जरूरत है। अब यह समझना जरूरी हो गया है कि अगर योजना के अंतर्गत कृषि कार्यों के लिए जलवायु के अनुकूल कदमों को नजरंदाज किया जाता है तो इस योजना के तहत किसानों की आय को स्थित करने का लक्ष्य हासिल करना मुश्किल हो जाएगा। इसके साथ-साथ मौसम में जल्दी-जल्दी होते बदलावों में तेजी से होते बदलाव और अनिश्चित अतिस्थानीय परिदृश्यों को देखते हुए Remote Sensing &amp; GIS Analytics जैसी उन्नत तकनीक अपनाना और आर्टीफीशियल इंटेलीजेंस (AI) का उपयोग कर मजबूत ढांचा तैयार करना और मौसम के आंकड़े प्रभावी और पारदर्शी क्लेम और जोखिम प्रबंधन के लिए अनिवार्य हो गए हैं।</p>
<p>किसानों की जरूरत को देखते हुए PMFBY को और प्रासंगिक करने के लिए युद्धस्तर पर कदम उठाने की जरूरत है। इसके साथ ही, जलवायु अनुकूल कृषि के पहलुओं को देखते हुए इस योजना के स्कोप को व्यापक बनाना बहुत महत्वपूर्ण हो गया है। अन्यथा, किसानों की आय में वित्तीय स्थिरता नहीं रहेगी। और यह समझना जरूरी है कि ऑप्टिमल क्लाइमेट स्मार्ट इंटरवेंशंस उन्नत तकनीक के अनुप्रयोगों पर निर्भर हैं। इसलिए इस योजना के तहत अब जोखिम प्रबंधन के लिए अत्याधुनिक तकनीकों के तीव्र उपयोग को बढ़ावा देना चाहिए। इसके अलावा, सरकार और बीमा कंपनियों के विवादों के कारण किसानों के गैर-जरूरी <strong><br /></strong>शोषण को रोकने के लिए एक पारदर्शी ढांचा तैयार करने की जरूरत है।</p>
<p><strong>(नवनीत रविकर लीड्स कनेक्ट सर्विसेज के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक हैं। लेख में उनके विचार निजी हैं।)</strong></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2021/08/image_750x500_612b8b43ad22b.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना: आत्मनिरीक्षण, अपेक्षाएं और भविष्य का रोडमैप ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[लोकल को वोकल बनाने के लिए पंचायत राज व्यवस्था भागीदारियों की स्किल डेवलपमेंट ट्रेनिंग जरूरी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/skill-building-of-gram-panchayat-and-line-department-functionaries-can-make-local-more-vocal.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 23 Aug 2021 13:49:06 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/skill-building-of-gram-panchayat-and-line-department-functionaries-can-make-local-more-vocal.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><strong>संदर्भ -</strong></p>
<p>उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव&nbsp; तहत हाल ही में&nbsp; ग्राम पंचायतों, क्षेत्र पंचायतों और जिला पंचायतों के पदाधिकारिों के चुनाव संपन्न हुए हैं। इन पंचायतों में निर्वाचित प्रतिनिधियों की कुल संख्या 826458 है। जिसमें 75 जिला पंचायत 822 क्षेत्र पंचायत&nbsp; और 58791 ग्राम पंचायत के &nbsp;निर्वाचित प्रतिनिधि सदस्य&nbsp; है। इन चुने हुए प्रतिनिधियों में&nbsp; अधिकतर सदस्य को इन स्थानीय&nbsp; संस्थानों के कामकाज में उनकी अपने अधिकार, भूमिकाओं और जिम्मेदारियों के बारे में जानकारी &nbsp;नहीं हैं।</p>
<p>पंचायत चुनावों के निर्वाचित प्रतिनिधि बड़े पैमाने पर उन अधिकारियों के निर्देशन में काम कर रहे है, जो ग्रामीण विकास के विभिन्न कार्यक्रमों, दिशानिर्देशों,&nbsp; योजनाओं और नियमों के बारे में अच्छी तरह से वाकिफ नहीं हैं। &nbsp;इसलिए योजना को तैयार करने और उसके क्रियान्वयन के बारे में क्या सोचें एक बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह है ?&nbsp; क्योंकि उन्हें जिला पंचायत और ग्राम सभा के बीच का अंतर भी नहीं पता है ? ऐसे में लोकल वोकल कैसे होगा? कैसे पंचायत नेता मुखर&nbsp; होंगे? &nbsp;कैसे अधिकारी का मार्गदर्शन मिलेगा और &nbsp;वे कार्यो का निऱीक्षण&nbsp; परीक्षण&nbsp; कैसे &nbsp;कर पाएंगे?</p>
<p>इसलिए ग्रामीण विकास के लिए निर्वाचित प्रतिनिधि के साथ पंचायतों के कर्मियों के अधिकार&nbsp; , कर्तव्यों और जिम्मेदारियों को प्रभावी ढंग से निर्वहन करने में सक्षम बनाने के लिए और ग्रामीणो को स्थानीय सरकार के रूप में पंचायतों को मजबूत करने के लिए जरूरी है कि &nbsp;ग्राम पंचायच&nbsp; और जिला पंचायत के अधिकारियों और लाइन विभागों के अधिकारियों का स्किल डेवलमेंट हो । पंचायत से जुड़े निर्वाचित प्रतिनिधियों और अधिकारियों को यह भी पता होना चाहिए कि समावेशी तरीके से आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए योजनाएं कैसे तैयार की&nbsp; जाती हैं । साथ ही उन्हें अपने अधिकार और कार्यों के बारे में भी पता होना चाहिए, लोकतांत्रिक निर्णय लेना सुनिश्चित करना, योजना तैयार करने और ग्रामीण विकास के लिए कई योजनाओं के कार्यान्वयन के लिए प्रक्रिया और नियमों को समझना चाहिए । उन्हें बजट और धन के प्रबंधन के बारे में जानकारी &nbsp;होनी चाहिए, पंचायत स्तर पर नियमित कार्यालय कार्य के प्रबंधन में निपुण होना चाहिए।</p>
<p>कोरोना महामारी &nbsp;के दौरान ऑनलाइन प्रशिक्षण का विचार अधिक प्रासंगिक हो गया है &nbsp;क्योंकि जमीनी हकीकत को ध्यान में रखते हुए, जमीनी रूप से जुडे नेताओं और अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्ताओं को स्किल डेवलमेंट के लिए निम्नलिखित विषय&nbsp; और विषयगत क्षेत्रों&nbsp; पर आन लाइन ट्रेनिग देने की योजना बनाई गई है ।गत क्षेत्रों/विषयों/विषयों की (1) विकेंद्रीकरण का इतिहास, संवैधानिक जनादेश और पंचायतों को शक्तियों का हस्तांतरण, इसका महत्व-एक सिंहावलोकन (2) ग्राम पंचायतों के व्यवहार संबंधी पहलू और नेतृत्व और कामकाज (3) सुशासन, पारदर्शिता, जवाबदेही, (4 ) व्यापक रूप से ग्राम पंचायतों के कार्यों&nbsp; की शक्तियां , वित्त और पदाधिकारियों की अवधि (5)निर्वाचित प्रतिनिधियों और कार्मिकों की भूमिका और जिम्मेदारियां (व्यवसाय का संचालन, विषय समितियों कागठन, आदि) (6 ) वित्तीय संसाधनों को जुटाना और उनका</p>
<p>प्रबंधन (7 ) लोगों की भागीदारी और समावेशी पंचायतें, (8 )पंचायतें और सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करना (9 ) ग्राम पंचायत विकास योजना का प्रभावी ढ़ग से कार्यान्वयन (10 ) महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन, ग्रामीण आवास स्वच्छ भारत मिशन, आदि जैसे फ्लैगशिप कार्यक्रमों का कार्यान्वयन ( 11) ग्रामीण क्षेत्रों में अनौपचारिक संस्थाएं/समुदाय &nbsp;आधारित संगठन/नागरिक समाज संगठन और भवन निर्माण सामाजिक पूंजी (12) विभिन्न हित धारकों के बीच समन्वय /अभिसरण / अंतर-क्षेत्रीय संबंध (13) कार्यक्रमों के कार्यान्वयन में सार्वजनिक वित्त प्रबंधन प्रणाली सहित सूचना प्रौद्योगिकी का अनुप्रयोग (14 ) पंचायत और आपदा प्रबंधन (15) सर्वोत्तम अभ्यास और उनका अपनाना / अनुकूलन (16 ) कार्यक्रमों की निगरानी और मूल्यांकन (16 ) ग्राम पंचायत विकास योजना(जीपीडीपी) का कार्यान्वयन</p>
<p><strong>पाठ्यक्रम की प्रकृति</strong></p>
<p>जैसा कि शीर्षक से पता चलता है, यह ऑनलाइन पाठ्यक्रम होगा । प्रतिभागियों को पठन सामग्री दिए जाने कोई &nbsp;प्रस्ताव नहीं है, फिर भी उनसे विभिन्न ट्रेनिंग के मुख्य बिंदुओं को नोट करने की अपेक्षा की जाती है ताकि भविष्य में इसको इनपुट सामग्री के रूप में उपयोग किया जा सके।</p>
<p><strong>स्किलिंग मेथडोलॉजी</strong></p>
<p>&nbsp;हालांकि प्रशिक्षण ऑनलाइन मोड पर दिया जाएगा, लेकिन इसे इंटरैक्टिव और सहभागी बनाने के प्रयास किए जाएंगे। ट्रेनिग के दौरान ट्रेनी को प्रश्न पूछने के लिए पर्याप्त अवसर दिए जाएंगे। व्याख्यान और चर्चा और इससे जुड़ा लिटरेचर स्थानीय भाषा में होगा ताकि विचार/दिशानिर्देश/कवरेज को ठीक से संप्रेषित किया जा सके। प्रशिक्षण पाठ्यक्रम के दौरान व्यावहारिक और स्थानीय उदाहरण दिए जाएंगे।</p>
<p>जो लोग ट्रेनर के रूप में कार्य करेंगे, उन्हें स्मार्ट फोन की मदद से राज्य ग्रामीण विकास संस्थान और पंचायती राज जैसे प्रशिक्षण संस्थानों में ट्रेनिग दी जाएगी। ट्रेनिग लिया हुआ व्यक्ति और अधिकारी स्मार्ट फोन/लैपटॉप की सहायता से ही ट्रेनिग &nbsp;देंगे । ट्रेनिग के बाद ट्रेनर द्वारा ट्रेनी के साथ ट्रेनिंग के समझ के स्तर के बारे में जानने के लिए जिला परिषद के सभी सदस्यों को बैठकों और मीटिंग के माध्यम से छह महीने बाद जरूरी कदम उठाए जाएंगे ताकि विभिन्न योजनाओं के बारे में जागरूकता जैसी गतिविधियों की सीमा को अमल में लाया गया है &nbsp;या नहीं।</p>
<p>हर महीने ट्रेनर&nbsp; ट्रेनी से दिये गये ट्रेनिंग के व्यावहारिक पहलुओं के बारे में पूछेंगे। उदाहरण के लिए ऑनलाइन प्रशिक्षण में बताया गया कि ग्राम पंचायत बैठक की तिथि और समय के साथ लिखित एजेंडा नोट जारी करेगी। ट्रेनर यह जांच करेगा कि क्या ग्राम पंचायत ने वार्ड सदस्य को बैठक की तारीख और समय के साथ चर्चा के लिए एजेंडा नोट जारी किया है या नहीं। यदि नहीं, तो ट्रेनर वार्ड सदस्य द्वारा प्रकट किए गए तथ्य को रिकॉर्ड करेगा और मामले में उचित कार्रवाई करने के लिए नामित अधिकारियों को भेजेंगा । इसी तरह की प्रक्रिया अन्य चीजों के लिए होगी जैसे ऑनलाइन प्रशिक्षण में पढ़ाए गए जिला परिषद &nbsp;में प्राप्त धनराशि की सीमा क्या है?। जाँच, मूल्यांकन और आवश्यक कार्रवाई करने के लिए एक अंतर्निहित तंत्र होगा। पाठ्यक्रम की अवधि दो दिन होगी।</p>
<p>इसमें निम्न लिखित सदस्य और पदाधिकाऱी ट्रेनी होगें ।</p>
<p>&nbsp;(1 ) प्रधान (ग्राम पंचायत के अध्यक्ष) (2 ) सदस्य (वार्ड सदस्य)</p>
<p>(3 ) विषय उप-समितियों के अध्यक्ष (4 ) ग्राम सचिव (5)कनिष्ठ अभियंता (6) मनरेगा रोजगर सहायक (7) किसान उत्पादक संगठन अध्यक्ष / सदस्य /सीईओ (8) आंगनवाड़ी कार्यकर्ता (9) आशा कार्यकर्ता (10) एसएचजी सदस्य (11) समुहसेवी (12) सदस्य / अध्यक्ष डब्ल्यूडीटी (13 ) लम्बरदार /चौधरी (14) स्वैच्छिक कार्यकर्ता (15) चौकीदार (16) ट्यूबवेल ऑपरेटर ( 17)मीडिया व्यक्ति (ग्रामीण डेस्क) (18) उन्नत भारत अभियान में लगे शिक्षक / सुविधाकर्ता / सामाजिक कार्यकर्ता (19) गांवों में रहने वाले सेवानिवृत्त व्यक्ति (20) कृषि विस्तार कार्यकर्ता</p>
<p>ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर स्थानीय प्रशासन के लिए ग्राम पंचायत स्तर पर निर्वाचित प्रतिनिधियों और अधिकारियों का स्किल डेवलपमेंट बहुत जरूरी &nbsp;है। प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण कार्यक्रमों के अनुभव बताते हैं कि &nbsp;प्रशिक्षण सत्रों में सिखाई गई बातों को किस हद तक व्यवहार में लाया गया है या नहीं। इसके बारे में कोई&nbsp; रेगुलर फॉलोअप नहीं किया गया है । &nbsp;जिसके कारण जमीनी स्तर पर प्रशिक्षण का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा&nbsp; क्योंकि ट्रेनी &nbsp;के मुद्दों के समाधान के लिए &nbsp;जरूरी कदम&nbsp;&nbsp; नही उठाया गया&nbsp; तो &nbsp;प्रशिक्षण और स्किल डेवलपमेंट काम &nbsp;एक औपचारिकता बन कर रह जाएगा जो स्थानीय स्तर पर मानव संसाधन के विकास में एक गंभीर बाधा है। इस लेख में दिए गए विचार को अगर लागू किया गया तो यह स्किल डेवलमेंट की ओर एक बड़ा कदम होगा ।</p>
<p><em><strong>(डॉ. महिपाल इंडियन इकोनॉमिक सर्विस के रिटायर्ड अधिकारी और कृपा फाउंडेशन के प्रेसिडेंट हैं। उनसे&nbsp;<a href="mailto:mpal1661@gmail.com">mpal1661@gmail.com</a>&nbsp;पर संपर्क किया जा सकता है, लेख में विचार उनके निजी हैं )</strong></em></p>
<p><strong></strong></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ लोकल को वोकल बनाने के लिए पंचायत राज व्यवस्था भागीदारियों की स्किल डेवलपमेंट ट्रेनिंग जरूरी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[भारत के कृषि निर्यात की चुनौतियां और डब्लूटीओ में विरोध की तेज होती आवाजें    ]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/challenges-for-indian-agricultural-exports-discordant-voices-get-louder-at-wto.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 18 Aug 2021 17:11:57 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/challenges-for-indian-agricultural-exports-discordant-voices-get-louder-at-wto.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>केंद्न सरकार द्वारा लाये गये तीन नये केंद्रीय कृषि कानूनों के उद्देश्यों में से एक कृषि विपणन में सुधार लाकर भारत को दुनिया में प्रमुख कृषि निर्यातक के रूप में स्थापित किया करना है। आधी सदी से भी अधिक समय से भारत की कृषि नीति काफी हद तक घरेलू खाद्य सुरक्षा पर केंद्रित थी । लेकिन सरकार के कृषि पर बदले हुए नीतिगत रुख के साथ ही इत्तेफाक से साल 2020-21 में भारत के कृषि निर्यात में लगभग एक चौथाई की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गयी है। जहां देश का कुल निर्यात 300 अरब डॉलर के मनोवैज्ञानिक स्तर&nbsp; नीचे आ गया था वहीं कृषि में निर्यात में वृद्धि स्वागत योग्य घटनाक्रम रहा। भारतीय कृषि के निर्यात में इस बेहतर प्रदर्शन से&nbsp; देश के नीति निर्माताओं&nbsp; द्वारा इस क्षेत्र के लिए बनाई गई नई नीति की पुष्टि भी हुई। &nbsp;</p>
<p>भारत &nbsp;का कृषि निर्यात साल 2020-21 में बढ़कर 32.5 अरब डॉलर हो गया लेकिन &nbsp;साल 2012-13 में &nbsp;निर्यात किए गये&nbsp; 32.7 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर से अभी यह नीचे है । उस साल देश के कुल निर्यात में कृषि निर्यात का हिस्सा 11 फीसदी से अधिक हो गया था जो कुल निर्यात में कृषि क्षेत्र की इस सदी की सबसे अधिक हिस्सेदारी थी। कृषि निर्यात में यह उछाल अनाज,वनस्पति तेल, चीनी और मोलेसेज के तीन उत्पाद समूहों के कारण आया। &nbsp;</p>
<p>इस साल &nbsp;10 अरब डॉलर का खाद्यान्न निर्यात किया गया जो&nbsp; &nbsp;2013-14 में हासिल किए गए 10.5 अरब डॉलर के रिकॉर्ड खाद्यान्न स्तर से थोड़ा कम है। हमेशा की तरह, चावल प्रमुख निर्यात उत्पादथा लेकिन निर्यात की जाने वाली चावल की किस्म में एक महत्वपूर्ण बदलाव आया है । चावल के निर्यात में हमेशा से बासमती का वर्चस्व रहा है लेकिन 2020-21 में गैर-बासमती चावल के निर्यात में तेजी आई है । पश्चिम एशिया के प्रमुख बाजारों में बासमती के कम निर्यात होने के कारण &nbsp;बासमती के निर्यात में गिरावट आई । भारत की इस प्रमुख चावल किस्म के आयातक देश ईरान को निर्यात में 53 फीसदी की गिरावट के कारण यह अधिक प्रभावित हुआ है।</p>
<p>साल 2020-21 के दौरान गैर बासमती सेला चावल (पारबॉयल्ड) और सामान्य गैर बासमती चावल दोनों के निर्यात में वृद्धि में यह वृद्धि हुई है । सेला चावल का निर्यात दोगुना होकर लगभग 2.4 अरब डॉलर का हो गया और सामान्य चावल की किस्म का निर्यात लगभग तीन गुना होकर 1.6 अरब डॉलर का हो गया। भारत के सेला चावल की मांग ज्यादतर अफ्रिका के देशों में है। &nbsp;कोरोना महामारी के दौरान इसका बाजार काफी तेजी से बढ़ा। &nbsp;जबकि सामान्य चावल की &nbsp;मांग के मामले में नेपाल के बाद अब मलयेशिया इसके दूसरे बड़े मार्केट के रूप में उभरा। बांग्लादेश ने चावल आयात के साथ ही गेहूं का भी आयात किया है।&nbsp; इससे भारत के दूसकरे बड़े खाद्यान्न गेहूं&nbsp; को वैश्विक बाजार में अपनी बड़ी उपस्थिति बनाने में मदद मिली है ।&nbsp;</p>
<p>चीन को वनस्पति तेल का निर्यात में काफी तेजी आई है । साल 2020-21 के दौरान वहां 10 गुना से अधिक निर्यात बढ़ गया। इसमें अधिकांश लगभग 97 फीसदी हिस्सेदारी मूंगफली तेल की &nbsp;रही जिसका निर्यात &nbsp;मूल्य लगभग 40 करोड़ &nbsp;डॉलर था।</p>
<p>भारत के कृषि निर्यात को कई आकस्मिक कारकों के चललते लाभ हुआ । वियतनाम द्वारा &nbsp;चावल के निर्यात पर लगाया प्रतिबंध और म्यांमार में राजनीतिक अनिश्चितताओं ने भारतीय निर्यातकों को बाहर के देशों में निर्यात करने का पूरा अवसर मिला जिसका उन्होंने पूरा फायदा उठाया। इसके अलावा चीन में आई बाढ़ से उसकी मूंगफली की एक तिहाई से अधिक फसल खराब हो गई थी। इस कारण चीन में खाद्य तेल की कमी को पूरा करना का अवसर&nbsp; भारत के हाथ में आ गया।</p>
<p>भारत के लिए कृषि निर्यात को प्रोत्साहित करने के लिए अनुकूल महौल बना हुआ &nbsp;हैं। &nbsp;मगर पिछले कुछ साल से विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में भारत के निर्यात के खिलाफ विरोध की आवाजें लगातार सुनी जा रही हैं और यह आवाजें तेज होती जा रही हैं। कृषि पर विश्व व्यापार संगठन की समिति में हुई एक चर्चा मे आस्ट्रेलिया, यूरोपीय संघ और अमेरिका सहित कई सदस्यों ने तर्क दिया है कि भारत का प्रमुख कृषि उत्पादों का निर्यात सब्सिडी पर आधारित है। इन सदस्यों का प्रमुख तर्क है कि भारत की वैश्विक बाजारों में मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने के पीछे किसानों को दी जा रही सब्सिडी है। &nbsp;</p>
<p>फिलहाल भारत चीनी के निर्यात पर सब्सिडी के खिलाफ विवाद का सामना कर रहा है। यह विवाद ब्राजील, आस्ट्रेलिया और ग्वाटेमाला ने डब्ल्यूटीओ के विवाद निस्तारण पंचाट में दाखिल किया हुआ है। इन देशों का आरोप है कि भारत गन्ना उत्पादक किसानों, चीनी &nbsp;उत्पादकों और चीनी निर्यात पर सब्सिडी देता है। यह सब्सिडी &nbsp;विश्व व्यापार संगठन के कृषि पर समझौते (एओए), सब्सिडी पर समझौते और काउंटरवेलिंग प्रावधानों के खिलाफ है । इस विवाद को दाखिल करने वाले तीन देशों के अलावा चीन, यूरोपीय संघ, इंडोनेशिया, जापान और अमेरिका &nbsp;सहित 14 देश तीसरे पक्ष के रूप में इसमें शामिल हो गये हैं ।</p>
<p>हाल ही में विश्व व्यापार संगठन के 33 सदस्यों के एक समूह जी-33 का एक अप्रत्य़ाशित प्रस्ताव &nbsp;दिया है जो विकासशील देशों के कृषि के मुद्दों पर हितों की बात करता है लेकिन यह प्रस्ताव भारत के निर्यात की कोशिशों को झटका लग सकता है। जी-33 विकासशील देशों द्वारा खाद्य सुरक्षा के उद्देश्यों के लिए सार्वजनिक स्टॉक होल्डिंग (पीएसएच) का समर्थन कर रहा है। उसका कहना है कि एओए के तहत लागू सब्सिडी की सीमा खाद्य सुरक्षा के मकसद से दी जा रही सब्सिडी के लिए बाधक नहीं बननी चाहिए। इस समय एक अस्थायी विराम के चलते अगर कोई देश&nbsp; कृषि उत्पादन के मूल्य के 10 फीसदी से बराबर सब्सिडी की सीमा का उल्लंघन भी करता है तो उसके खिलाफ कोई विवाद दाखिल नहीं किया जा सकता है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के चलते भारत को इस स्थिति का सबसे अधिक फायदा मिल रहा है।</p>
<p>&nbsp;जी-33 समूह का कहना है कि सार्वजनिक स्टॉक भंडारण के इस मुद्दे का स्थायी हल निकाला जाना चाहिए। भारत जी-33 का सक्रिय सदस्य रहा है लेकिन यह प्रस्ताव भारत के खिलाफ जाता है। इसमें कहा गया है कि &nbsp;अब इस आवेदन से भारत ने खुद को दूर कर लिया है क्योंकि यह निवेदन कहता है कि किसी भी सदस्य देश द्वारा खाद्य सुरक्षा के लिए खरीदे गये पब्लिक स्टॉक से निर्यात नहीं किया जाना चाहिए। किसी सदस्य देश द्वारा आयात के लिए निवेदन करने की स्थिति में ही इस सटॉक से निर्यात की इजाजत होनी चाहिए। करने का प्रयास नहीं करेगा। जब तक आयात करने वाले सदस्य से निवेदन नही आता है। दूसरे शब्दों में कहा जाय तो भारत अपने सार्वजनिक खाद्यान्न स्टॉक से तभी निर्यात कर पाएगा जब उसके पास दूसरे देश से आयात का निवेदन आता है। हालांकि भारत ने खुद को इस प्रस्ताव से अलग कर लिया है। यह प्रस्ताव दो ऐसे विकल्प रखता है जिनमें खाद्य सब्सिडी को जारी रखना या कृषि निर्यात को जारी रखने में से किसी एक का चुनाव करना भारत के लिए लगभग नामुमकिन सी बात है।</p>
<p><em><strong>( डॉ. बिस्वजीत धर, जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर इकोनॉमिक स्टडीज एंड प्लानिंग के स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज में&nbsp; प्रोफेसर हैं। लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं)<span>&nbsp;</span></strong></em><span>&nbsp;</span></p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ भारत के कृषि निर्यात की चुनौतियां और डब्लूटीओ में विरोध की तेज होती आवाजें     ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[संविधान का 97वां संशोधन और सुप्रीम कोर्ट का हाल का निर्णय:  नए सहकारिता मंत्रालय के लिए इसका क्या है मतलब और असर]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/97th-Amendment-and-recent-SC-judgement-implications-for-the-new-Ministry-of-Cooperation.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 02 Aug 2021 08:31:44 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/97th-Amendment-and-recent-SC-judgement-implications-for-the-new-Ministry-of-Cooperation.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><strong>पहले संक्षिप्त पृष्ठभूमि</strong></p>
<p>6 जुलाई 2021 को इन उद्देश्यों के साथ नए सहकारिता मंत्रालय का गठन &nbsp;किया गया... 1. सहकारिता के सभी क्षेत्रों में सहयोग और हर तरह की गतिविधियों में समन्वय की &nbsp;नीति बनाना (अपने संबंधित क्षेत्रों में सहकारिता के लिए मंत्रालय ही जिम्मेदार है)। 2. "सहयोग से समृद्धि" उद्देश्य की प्राप्ति। 3. देश में सहकारिता आंदोलन को मजबूत बनाना और उसे जमीनी स्तर तक &nbsp;पहुंचाना। 4. सहकारिता आधारित आर्थिक विकास मॉडल को बढ़ावा। 5. सहकारी समितियों को लक्ष्य हासिल करने में मदद के लिए उचित नीति और संस्थागत ढांचा बनाना । 6. राष्ट्रीय सहकारी संगठनों और राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम से संबंधित मामलों पर विचार । 7. सहकारी समितियों का गठन, उनका विनियमन और उन्हें बंद करना- जिनका कामकाज एक राज्य तक सीमित न हो। 8. सहकारी विभागों और सहकारी संस्थानों के कर्मियों का प्रशिक्षण ।</p>
<p>अनेक लोगों को लगा कि जब पहले से ही कृषि विभाग में सहकारिता विभाग को एक संयुक्त सचिव संभाल रहा था तो नया मंत्रालय&nbsp; बनाने की जरूरत क्यों पड़ी? कुछ लोगों ने इसे संविधान के 97वें संशोधन से भी जोड़कर देखा। परंतु सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के भाग IX बी को अधिकारातीत ठहराने के गुजरात उच्च न्यायालय के निर्णय को आंशिक रूप से बरकरार रखा था। यह निर्णय एक व्यक्ति की जनहित याचिका पर उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार की अपील पर सुनाया गया था। कोई राज्य सरकार इसमें पक्षकार नहीं थी।</p>
<p>लोकसभा ने 27 दिसंबर 2011 को 97वां संविधान संशोधन पारित किया था। राज्यसभा ने उसे 28 दिसंबर 2011 को पारित किया । राष्ट्रपति ने 12 जनवरी 2012 को मंजूरी दी और संशोधन 15 फरवरी 2012 से प्रभावी हो गया। गुजरात उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने 22 अप्रैल 2013 को एक फैसले में IXबी को सम्मिलित करने को अधिकारातीत करार दिया क्योंकि उसके लिए अनुच्छेद 368(2) में बदलाव की जरूरत थी। हालांकि उससे अनुच्छेद 19(1) (सी) में संशोधन और अनुच्छेद 43बी शामिल किया जाना प्रभावित नहीं हुए।</p>
<p><strong>क्या हैं प्रावधान</strong></p>
<p>अनुच्छेद 19- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े कुछ अधिकारों का संरक्षण आदि।</p>
<p>(1) सभी नागरिकों को.. (सी) एसोसिएशन, यूनियन या सहकारी समितियां बनाने का अधिकार है ;</p>
<p>अनुच्छेद 43बी- सहकारी समितियों को बढ़ावा</p>
<p>सरकार सहकारी समितियों के स्वैच्छिक गठन, स्वायत्त कामकाज, लोकतांत्रिक नियंत्रण और पेशेवर प्रबंधन को बढ़ावा देने का प्रयास करेगी ।</p>
<p>अनुसूची VII में प्रासंगिक प्रविष्टियां:</p>
<p>सूची I&mdash;संघ सूची</p>
<ol start="43">
<li>बैंकिंग, बीमा और वित्तीय निगमों सहित व्यापारिक निगमों का गठन, विनियमन और उन्हें बंद करना, लेकिन सहकारी समितियां इसमें शामिल नहीं हैं।</li>
<li>निगमों का गठन, विनियमन और उन्हें बंद करना, चाहे वे व्यापारिक निगम हों या नहीं, उनका कामकाज राज्य तक सीमित न हो, लेकिन विश्वविद्यालय इसमें शामिल नहीं हैं।</li>
</ol>
<p>सूची II&mdash;राज्य सूची</p>
<ol start="32">
<li>सूची 1 में निर्धारित निगमों को छोड़कर अन्य निगमों का गठन, विनियमन और उन्हें बंद करना, विश्वविद्यालय; अनिगमित व्यापार, साहित्यिक, वैज्ञानिक, धार्मिक और अन्य सहकारी समितियां।</li>
</ol>
<p>राज्य सूची की प्रविष्टि 32 के अनुसार "सहकारी समितियां" राज्यों का विषय है और अधिकांश राज्य विधानमंडलों ने सहकारी समितियों पर कानून बनाए हैं।&nbsp; राज्यों के कानून में बड़े पैमाने पर सहकारी समितियों के विकास को सामाजिक और आर्थिक न्याय हासिल करने विकास के समान वितरण के लिए जरूरी माना गया। लेकिन, सहकारी समितियों के काफी विस्तार के बावजूद, उनका प्रदर्शन उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा है। राज्यों के सहकारी समिति कानूनों में सुधार की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए, 2004 और 2008 के बीच राज्यों के सहकारी मंत्रियों के साथ केंद्र की कई बैठकें हुईं। इन बैठकों में राज्यों ने सहकारी समितियों को स्वतंत्र रखने के लिए संविधान में संशोधन करने की जरूरत बताई थी ताकि अनावश्यक बाहरी हस्तक्षेप न हो और उनके स्वायत्त संगठनात्मक ढांचे और लोकतांत्रिक कामकाज को सुनिश्चित किया जा सके ।</p>
<p>सुधार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि सहकारी समितियां लोकतांत्रिक, पेशेवर, स्वायत्त और आर्थिक रूप से मजबूत तरीके से काम करें । इसलिए राज्य के नीति निर्देशक तत्व में एक नया अनुच्छेद जोड़ा गया, ताकि राज्य सहकारी समितियों के स्वैच्छिक गठन, स्वायत्त कामकाज, लोकतांत्रिक नियंत्रण और पेशेवर प्रबंधन को बढ़ावा दें।</p>
<p><strong>भाग IX बी में अन्य बातों के साथ, निम्नलिखित बातें भी शामिल हैं-</strong></p>
<ol>
<li>लोकतांत्रिक सदस्यों के नियंत्रण, उनकी आर्थिक भागीदारी और स्वायत्त कामकाज के सिद्धांतों पर आधारित सहकारी समितियों के गठन, विनियमन और बंद करने के प्रावधान बनाना।</li>
<li>सहकारी समिति में निदेशकों की अधिकतम संख्या तय करना, जो 21 से ज्यादा न हो।</li>
<li>निर्वाचित बोर्ड के सदस्यों और उसके पदाधिकारियों को चुनाव की तारीख से पांच साल की निश्चित अवधि प्रदान करना।</li>
<li>सहकारी समिति के निदेशक मंडल के प्रतिबंध या निलंबन के लिए छह महीने की अधिकतम समय सीमा तय करना ।</li>
<li>स्वतंत्र पेशेवर ऑडिटिंग का प्रावधान करना।</li>
<li>सहकारी समितियों के सदस्यों को सूचना का अधिकार प्रदान करना।</li>
<li>राज्य सरकारों को सहकारी समितियों की गतिविधियों और खातों की समय -समय पर रिपोर्ट प्राप्त करने का अधिकार देना।</li>
<li>प्रत्येक सहकारी समिति के बोर्ड में अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के लिए एक सीट और महिलाओं के लिए दो सीटें आरक्षित करना।</li>
<li>सहकारी समितियों में किसी तरह का अपराध होने पर जुर्माने का प्रावधान करना।</li>
</ol>
<p><strong><u>कोर्ट का फैसला </u></strong></p>
<p>गुजरात उच्च न्यायालय ने 2013 में फैसला सुनाया कि भाग IX बी अधिकारातीत है। भारत सरकार ने इसके खिलाफ सर्वोच्च न्यालय में अपील की, जिसकी सुनवाई हाल ही में समाप्त हुई और निर्णय 20 जुलाई 2021 को सुनाया गया।</p>
<p>यहां सात सहकारी सिद्धांतों' को दिशा-निर्देशों के रूप में देखना विवेकपूर्ण होगा। सहकारी समितियां इन सिद्धांतों पर चलकर अपने मूल्यों को व्यवहार में ला सकती हैं।</p>
<p><strong>सिद्धांत निम्नलिखित हैं:-</strong></p>
<p>"पहला &nbsp;सिद्धांत: स्वैच्छिक और खुली सदस्यता वाले कोऑपरेटिव स्वैच्छिक संगठन हैं।&nbsp; ये सभी व्यक्तियों के लिए खुले हैं। इसकी सदस्यता लैंगिक, सामाजिक, नस्लीय, राजनीतिक या धार्मिक भेदभाव के बिना होनी चाहिए।</p>
<p>दूसरा सिद्धांत: लोकतांत्रिक सदस्य नियंत्रित कोऑपरेटिव, एक तरह के लोकतांत्रिक संगठन हैं जिनका नियंत्रण उसके सदस्य करते हैं, जो संगठन की नीतियां बनाने और &nbsp;निर्णय लेने में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं।</p>
<p>तीसरा &nbsp;सिद्धांत: सदस्य की आर्थिक भागीदारी। सभी सदस्य पूंजी में समान रूप से योगदान करते हैं, और कोऑपरेटिव की पूंजी को लोकतांत्रिक रूप से नियंत्रित करते हैं। निजी कंपनी के विपरीत यहां पूंजी का एक बड़ा हिस्सा आमतौर पर कॉपरेटिव की साझा संपत्ति होती है।</p>
<p>चौथा सिद्धांत: स्वायत्तता और स्वतंत्रता। &nbsp;कोऑपरेटिव स्वायत्त और स्वयं सहायता संगठन होते हैं जिनका नियंत्रण उनके सदस्य करते हैं।</p>
<p>पांचवां सिद्धांत: शिक्षा, प्रशिक्षण और सूचना। कोऑपरेटिव अपने सदस्यों, निर्वाचित प्रतिनिधियों, प्रबंधकों और कर्मचारियों को शिक्षा एवं प्रशिक्षण मुहैया करवाते हैं, ताकि वे कोऑपरेटिव के विकास में प्रभावी रूप से योगदान कर सकें ।</p>
<p>छठा सिद्धांत: सहकारी समितियों के बीच सहयोग। सहकारी समितियां अपने सदस्यों को सबसे सक्षम तरीके से सेवा प्रदान करती हैं। वे स्थानीय, राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय&nbsp; समुदायों के साथ काम करके सहकारिता आंदोलन को मजबूत बनाती हैं।</p>
<p>सातवां सिद्धांत: समुदाय की चिंता। सहकारी समितियां सदस्यों द्वारा अनुमोदित&nbsp; नीतियों के माध्यम से अपने समुदाय के स्थायी विकास के लिए काम करती हैं।</p>
<p>सुप्रीम कोर्ट ने भाग IXबी के कुछ प्रावधानों को संवैधानिक रूप से कमजोर माना। उसने हाइकोर्ट के फैसले को बरकार तो रखा लेकिन उस हिस्से को नहीं माना जिसमें संविधान के भाग IXबी को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि संविधान का भाग IXबी विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कार्यशील बहु-राज्यीय सहकारी समितियों के मामले तक सही है।</p>
<p>यहां ध्यान देने वाली एक महत्वपूर्ण बात यह है कि इस मामले का फैसला &ldquo;कानून बनाने का अधिकार किसे है?&rdquo; इस संवैधानिक सिद्धान्त के आधार पर किया गया।&nbsp; ऐसा प्रतीत होता है कि अनुच्छेद 368(2) के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन न करना प्रमुख मुद्दा है, जिस पर यह मामला टिका है। इसके मेरिट पर कोई बहस नहीं हुई।</p>
<p>यहां एक और ध्यान देने वाली बात है कि 17 राज्य IXबी के प्रावधानों को ध्यान में रखकर अपने सहकारी कानूनों में संशोधन कर चुके हैं।</p>
<p>सहकारी बैकिंग प्राणली में एक बड़ा बदलाव बैंकिग विनियमन अधिनियम में 2020 में किए गए संशोधनों से आया, जिसमें सहकारी बैकों का प्रभावी नियंत्रण भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को दे दिया गया। हालांकि प्राथमिक कृषि ऋण (पीएसी ) समितियों को इसके दायरे से बाहर रखा गया है, इसके बावजूद राज्य सहकारी बैंक, जिला सहकारी बैंक और पीएसी की त्रि-स्तरीय संरचना इससे प्रभावित हुई है। केरल ने इनमें से कुछ मुद्दों से निपटने के लिए राज्य सहकारी बैंक की जगह एक नया केरल बैंक बनाया है । यह और बात है कि सहकारी&nbsp; ऋण प्रणाली देश की अल्प अवधि वाली ऋण प्रणाली में 10 प्रतिशत से भी कम हिस्सा रखती है । लेकिन मजबूत सहकारी ढांचे वाले राज्य चिंतित हैं।</p>
<p>सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि सहकारी समितियां बनाना एक मौलिक अधिकार है और ये समितियां निदेशक सिद्धांतों का हिस्सा हैं। भाग IXबी में अनुच्छेद 243 ZH से ZT तक शामिल हैं, ये अब केवल बहु-राज्यीय सहकारी समितियों पर लागू होंगे । खास तौर से अनुच्छेद 243 ZL और ZT को राज्य विधानसभाओं के अधिकारों का अतिक्रमण पाया गया, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय दिया।</p>
<p>नए सहकारिता मंत्रालय के सामने अब तीन उपाय हैं।</p>
<ol>
<li>सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के अनुरूप चलते हुए राज्य सरकार के सभी संदर्भों को हटाने लिए एक संवैधानिक संशोधन करे, या</li>
<li>मौजूदा IXबी को मान्य करने के लिए अनुच्छेद 368(2) के तहत आगे बढ़े, या</li>
</ol>
<ul>
<li>अनुच्छेद 368(2) के तहत आगे बढ़ते हुए सहकारिता को सूची III के तहत समवर्ती सूची में डाले।</li>
</ul>
<p>तीसरा विकल्प अपनाने पर कुछ राज्यों के विरोध का सामना करना पड़ सकता है। पहला विकल्प आसान है। दूसरा विकल्प भी शायद मुश्किल ना हो क्योंकि कोई भी राज्य &nbsp;इस संविधान संशोधन के खिलाफ नहीं गया। राज्य जो कर रहे हैं, अगर उन्हें वैसा करने की अनुमति दी जाती है तो निदेशकों की सख्या पर अंकुश, सूचना के अधिकार , लोकतांत्रिक गवर्नेंस और पेशेवर प्रंबधन जैसी बातों का लागू होना मुश्किल होगा।</p>
<p><strong><u>नया</u></strong> <strong><u>मंत्रालय क्या करे</u></strong> <strong><u>?</u></strong></p>
<p>एक विकल्प तो यह है कि वह नियंत्रणकारी रवैया अपनाए। वह संविधान में संशोधन करके और सहकारी समितियों को समवर्ती सूची में डाल कर उन्हें अपने नियंत्रण में ले सकता है। &nbsp;दूसरा विकल्प यह है कि वह विकासात्मक नजरिया अपनाए। वह अनुच्छेद 43बी में लिखित चार मूल सिद्धांतों के आधार पर सहकारी समितियों को कार्य करने दे। ऐसा करके ग्रामीण भारत में समाजिक &ndash;आर्थिक क्रांति लाई जा सकती है। स्वयं सहायता समूहों और आजीविका मिशन&nbsp; की सफलता से मंत्रालय&nbsp; को प्रोत्साहन मिलना चाहिए। ग्रामीण स्तर की सहकारी समितियों को बड़े स्तर की मल्टीटास्किंग स्वयं सहायता समूह बनने के लिए प्रोत्साहित करना और अपने सदस्यों के लिए संघ बनाना (अमूल की तरह) उसकी प्राथमिकता होनी चाहिए।</p>
<p><strong>इसके लिए ये प्रयास जरूरी हैं-</strong></p>
<ol>
<li>नई सहकारी समितियों (श्रमिक, किसान, महिला, कारीगर आदि) को संगठित करना और बिजनेस मॉडल विकसित करना ताकि उसकी मार्केट वैल्यू बन सके । स्थायी सब्सिडी का पुराना तर्क काम नहीं करेगा।</li>
<li>शुरू में पूंजी, संगठनात्मक और प्रबंधकीय स्तर पर इनकी सहायता करें।</li>
</ol>
<ul>
<li>उनके प्रबंधन को पेशेवर बनाना, मौजूदा प्रबंधन को नौकरशाही से मुक्त करना।</li>
</ul>
<ol>
<li>सभी अनुदानों और रियायती वित्त को सशर्त बनाना और उन्हें स्वैच्छिक गठन, लोकतांत्रिक गवर्नेंस, स्वायत्त कामकाज और पेशेवर प्रबंधन के चार बुनियादी सिद्धांतों से जोड़ना।</li>
</ol>
<p>नया सहकारिता मंत्रालय अगर रणनीतिक विजन और बड़े विकास की भूमिका अपनाए, तो वह भारत के करोड़ों गरीबों का जीवन बदल सकता है।</p>
<p><em><strong>(टी.&nbsp; नंद कुमार,&nbsp; केंद्रीय कृषि&nbsp; एवं सहकारिता मंत्रालय के पूर्व सचिव और नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड (एनडीडीबी) के पूर्व चेयरमैन हैं। लेख में व्यक्त विचार उनके निजी विचार हैं।)</strong></em></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2021/03/image_750x500_606431d62f288.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ संविधान का 97वां संशोधन और सुप्रीम कोर्ट का हाल का निर्णय:  नए सहकारिता मंत्रालय के लिए इसका क्या है मतलब और असर ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[दो अंकों में चल रही महंगाई को सामान्य स्थिति मानने से बचने की जरूरत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/Double-digit-inflation-is-not-acceptable-as-routine.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 20 Jul 2021 06:56:44 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/Double-digit-inflation-is-not-acceptable-as-routine.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>थोक बाजारों में 10 प्रतिशत से अधिक और खुदरा बाजारों में 6 प्रतिशत तक कीमतों की वृद्धि दर (महंगाई दर) की खबरें&nbsp; एक नियमित मामले की तरह बन गया है। अफसोस की बात यह है कि खाद्य तेल, एलपीजी , दालें , ट्रेन और बसों से यात्रा जैसी चीजों की महंगाई को रोज़ाना जिंदगी से खारिज नही किया जा सकता है। इनकी &nbsp;कीमतों में नियमित रूप से बढ़ोतरी की वजह से गांव और शहरों , दोनों मे रहने वाली आम महिलाओं को इस महंगाई के कारण बहुत परेशानी होती हैं । महंगाई का दबाव और भी&nbsp; बढ़ जाता है, जब नौकरियां कम हो और अगर नौकरी करते भी हो तो वेतन की कटौती का सामना करना पड़ रहा&nbsp; हों । इस बात को कॉरपोरेट फर्म के प्रबंधन शेयर बाजार वाले टीवी चैनलों पर बयान दे रहे हैं कि किस तरह कर्मचारियों पर लागत को युक्तिसंगत बनाकर उन्होने लागत में कटौती की है । एक प्रबंधन तो यहां तक दावा किया कि उसने पिछले साल आई कोराना महामारी में 65 प्रतिशत कर्मचारियों को नियोजित&nbsp; करने के बावजूद पूर्ण क्षमता का उपयोग किया है। कंपनियों ने अपने कर्मचारियों को निकालकर और उनके वेतन की कटौती करके बैलेंस शीट को मुनाफे में बनाए रखा है&nbsp;</p>
<p>थोक मुल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) के तहत जून 2021 में महंगाई दर 12.05 प्रतिशत उच्च &nbsp;स्तर पर रही है। जबकि चालू वित्त वर्ष के तीन महीनों के लिए थोक महंगाई दर का औसत 11.91 प्रतिशत । इसके मुकाबले जून में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की&nbsp; 6.26 प्रतिशत वृद्धि दर का आंकड़ा कम लग सकता है। लेकिन थोक मंडियों में कीमतें एक अंतराल के बाद खुदरा बाजार के स्तर की कीमतों में बदल जाती हैं । इसलिए यह एक तरह से चेतावनी है कि उपभोक्ताओं के स्तर पर समस्याएं इतनी आसानी से दूर नहीं होने वाली हैं ।&nbsp;</p>
<p>&nbsp;यह दर्द छोटे से छोटे &nbsp;स्तर पर और भी ज्यादा दिखाई देता है । &nbsp;थोक मूल्य सूचकांक &nbsp;की मदद से &nbsp;देखा जा सकता है कि एलपी जी गैस की कीमतों में साल दर साल तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। पिछले साल के मुकाबले जून में इसमें 31.44 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। वहीं डीजल और पेट्रोल की&nbsp; कीमतों में&nbsp; 60 प्रतिशत की बढोतरी रही।&nbsp; वनस्पति तेलों , वसा आदि में बढोत्तरी&nbsp;&nbsp; 44 प्रतिशत से अधिक थी जबकि दालो में 11.49 प्रतिशत थी । उपभोक्ता मूल्य सूचकांक&nbsp; (सीपीआई) के आंकड़े कुछ कम हैं लेकिन अंत में को ही यह मार झेलनी है और वास्तव में खरीदारी के लिए कोई सुरक्षित जगह नही है।</p>
<p>पेट्रोल की कीमत प्रति लीटर 100 रुपये से अधिक चल रही है और डीजल की कीमत कई जगह सौ रुपये के आसपास चल रही है। इस पर राजनीतिक दलों ने सांकेतिक विऱोध प्रर्दशन शुरू कर दिया है। सरकार ने इस मामले में चुप्पी साध ली है , मानो यह सब एक&nbsp; नियमित मामला हो ।&nbsp; इन सब के बीच&nbsp; आम आदमी,&nbsp; गरीब , औऱ आम महिला पिस रहे हैं ।&nbsp; अमीर औऱ गरीब , शहरी औऱ ग्रामीण वर्ग के बीच बढ़ रहा विभाजन &nbsp;लोगों की आप बीती में साफ झलकता है। यह निर्भर करता है कि आप आखिर किससे बाते कर रहे &nbsp;है ।&nbsp; कोरोना महामारी के कारण आर्थिक तनाव तो बढ़ा ही है लेकिन उससे भी ज्यादा नुकसान&nbsp; दैनिक उपयोग की चीजों की बढ़ती कीमतों&nbsp; के कारण हो रहा है,जो महामारी से भी ज्यादा दर्द दे रहा है।&nbsp; गांव में रहने वाले गरीब और शहर में&nbsp; काम करने वाले उनके भाई-बंधु आपको यही बात बताएंगें ।&nbsp; शहर में रहने वाले औऱ सुरक्षित नौकरियों के साथ रहने वाले लोग आपको इस मंहगाई की अलग तरह से व्याख्या करेंगे कि कैसे देश को&nbsp; कोरोना की चौथी लहर से&nbsp; बचाने की जरूरत है ,टीकाकरण, प्रतिबंध , &nbsp;लाकडाउन&nbsp; और चाहे इसके लिए कोई भी&nbsp; लागत क्यों ना &nbsp;लगें।</p>
<p>महामारी की दूसरी लहर समाप्त होने के बाद अब निर्माण सहित आर्थिक गतिविधियों में तेजी देखने को मिल रही है। गांवो में खरीफ फसलों की बुआई चल रही जिससे खेती में&nbsp; फिर से &nbsp;मजदूरी के अवसर खुलना शुरू हो गये &nbsp;हैं। निसंदेह यह राहत के संकेत है। लेकिन महंगाई के कारण राहत नही मिल पा रही है।</p>
<p>&nbsp;इन सबके बीच किसान अजीबो गरीब मुश्किल स्थिति में हैं । बढ़ती महंगाई के हाथों उपभोक्ता के रूप में&nbsp; पीड़ित होने के अलावा &nbsp;उन्हें &nbsp;फसल उत्पादक के रूप में हर फसल के लिए लगने वाली लागत जैसे &nbsp;ईंधन की कीमत से लेकर उर्वरक&nbsp; और कीटनाशक और बढ़ती मजदूरी में मूल्य वृद्धि को सहने के लिए के लिए भी मजबूर किया जा रहा है। &nbsp;किसानों पर हर तरह से बढ़ती लागत &nbsp;का चौतरफा दबाव है। गांवो में जो मजदूरी दरें कम हो गयी थी वह अब बढ़ती महंगाई के कारण बढ़ने लगी है। लेकिन यह बढ़ी मजदूरी श्रमिकों की जेब में नहीं जा रही है बल्कि महंगाई की जेब में जा रही है।</p>
<p>&nbsp;इसलिए महंगाई को एक नियमित कहानी बनने से बचाना है क्योंकि यह अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाला गंभीर मुद्दा है। जहां कड़वा तेल ( सरसो का तेल ) केवल अमीरों के लिए विलासिता बन गया है । तथाकथित बैश्विक कमोडिटी मूल्य दबाव और&nbsp; आपूर्ति श्रृंखला&nbsp; अड़चन के परिणाम के रूप में इस समस्या को खारिज करना एक अलग बात है । अगर इस समस्या को हल करना है तो इस दर्द को जड़ से खत्म करने की जरूरत है। क्योंकि सिर्फ टालने से&nbsp; यह समस्या रहेगी और बढ़ती भी जाएगी इसलिए इसका समाधान ढूंढ़ना होगा और इस पर गंभीर होकर हल खोजना होगा। अंत में यह जवाबदेरी सरकार की है उसे ही इसे हल करना है।&nbsp;&nbsp;&nbsp;</p>
<p>&nbsp;</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2021/07/image_750x500_60f6778578e46.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ दो अंकों में चल रही महंगाई को सामान्य स्थिति मानने से बचने की जरूरत ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[वैज्ञानिक कृषि पद्धतियां अपनाने से भारतीय कपास  की वैश्विक  मांग बढ़ेगी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/Adaptation-of-scientific-agriculture-practices-will-drive-global-demand-towards-Indian-cotton-farmer.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 18 Jul 2021 11:14:44 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/Adaptation-of-scientific-agriculture-practices-will-drive-global-demand-towards-Indian-cotton-farmer.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>कपास भारत के साथ-साथ पूरी दुनिया में कपड़ा उद्योग के लिए सबसे उम्दा और सबसे पसंदीदा फाइबर बना हुआ है। यह भारतीय &nbsp;किसान को स्थायी रूप से आजीविका देने वाली एक बेहद महत्वपूर्ण फसल है। वर्तमान में भारत के अंदर 5 से 6 करोड़ लोग अपनी आजीविका चलाने के लिए कपास की खेती, इसकी मार्केटिंग, प्रसंस्करण और इसके निर्यात के&nbsp; कार्यो पर निर्भर हैं। पिछले कुछ वर्षों से कपास की खेती में&nbsp; वैश्विक स्तर पर लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है और कोविड-19 महामारी के कारण पैदा हुए दबाव के कारण 2020/21 के दौरान विश्व भर में कपास की खेती ने नाटकीय बदलाव झेले हैं।</p>
<p>भारत दुनिया के सबसे बड़े कपास उत्पादक देशों में गिना जाता है, लेकिन अधिक पानी चाहने वाली इस फसल के लिए गैर-टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाने औऱ&nbsp; रासायनिक उर्वरकों व कीटनाशकों का अंधाधुंध इस्तेमाल&nbsp; करने के साथ-साथ आनुवंशिक संशोधन ने एक ऐसी अर्थपूर्ण चुनौती पेश कर दी है, जिस पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है। दुनिया के दूसरे देशों की तुलना में भारत के कपास के &nbsp;पैदावार के औसत में अभी भी एक बड़ा अंतर है, क्योकि अपने देश में &nbsp;इसकी खेती के लिए अधिक भूमि का इस्तेमाल करने के बावजूद किसानों की आमदनी कम है । आज 10 फीसदी से भी कम &nbsp;उस हिसाब से कपास उगाया जाता है जो सही रूप से किसान को &nbsp;आर्थिक विकास और पर्यावरण को सुरक्षा दे सके ।</p>
<p>नवीनतम ट्रेंड से पता चलता है कि कोविड-19 के प्रकोप के बाद से कपड़ा उद्योग अपनी कपड़ा सप्लाई चैन &nbsp;को आगे बढ़ाने के लिए टिकाऊ फाइबर चुनने के मामले में बड़ा संवेदनशील हो गया है। इस प्रकार भारतीय कपास की खेती को पुनर्जीवन &nbsp;और इसको टिकाऊ खेती के लिए किसानों को प्रेरित करेगा।</p>
<p><strong>कपास उत्पादन और खपत का वैश्विक परिदृश्य</strong></p>
<p>कपास उत्पादन और खपत का वैश्विक परिदृश्य यूनाइटेड स्टेट्स डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2020/21 में कपास की वैश्विक खेती पिछले वर्ष हुई 11.41 करोड़ गांठों की तुलना में 6.5 प्रतिशत घट गई है । प्रमुख कपास उत्पादक देशों &nbsp;(भारत, चीन,यूनाइटेड स्टेट्स, ब्राजील और पाकिस्तान) के किसानों को प्रति हेक्टेयर लाभ के साथ-साथ प्रति हेक्टेयर पैदावार के मामले में भी अपने समकक्ष देशों के किसानों के साथ प्रतिस्पर्धा करने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। क्योकि &nbsp;प्रतिकूल मौसम, कपास की फसल में गुलाबी सुंडी का प्रकोप, घटती कीमतें, मजदूरी की बढ़तीलागत और नीतिगत अनिश्चितता ने एक साथ मिलकर इस गिरावट को तेज किया है। इसके अलावा तेल की बेहद सस्ती कीमतों के चलते सिंथेटिक फाइबर की घटती कीमतों ने विश्व कपास बाजारों पर भारी&nbsp; प्रतिस्पर्धात्मक दबाव डाला। भारत ~3.5 करोड़ गांठ कपास का उत्पादन करता है, जबकि चीन ~3.25 करोड़ गांठ, यूएसए 2.5 करोड़ गांठ का उत्पादन करता है, इसके बाद ब्राजील और पाकिस्तान क्रमशः~1.5 और 0.65 करोड़ गांठ कपास का उत्पादन करते हैं। हालांकि अमेरिका और ब्राजील कपास के प्रमुख निर्यातक हैं, लेकिन दोनों देशों के कपास उत्पादन में दो वर्षों से लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। इसके&nbsp; परिणामस्वरूप वैश्विक आयात की मांग को पूरा करने और कपास की ऊंची कीमत बरकरार रखने में समस्या उत्पन्न हो गई है।</p>
<p>कपास की खपत के मामले में एशियाई देश ग्लोबल मार्केट &nbsp;में अपना दबदबा रखते हैं। चीन में कपास की खपत लगभग 4.75 से 5 करोड़ गांठ तक की है, जो दुनिया के अन्य देशों की तुलना में सबसे अधिक है। जबकि पाकिस्तान में मात्र1.35 करोड़ गांठ कपास की खपत होती है। &nbsp;हाल के वर्षों में कताई और कपड़ा उद्योग की मजबूत तरक्की के चलते बांग्लादेश और वियतनाम में कपास की खपत तेजी से बढ़ी है।अब बांग्लादेश को 90 लाख से 1 करोड़ गांठ कपास और वियतनाम को 75 से 80 लाख गांठ की जरूरत पड़ रही है। अपनी निकटता के कारण ये सभी एशियाई देश भारत से पर्याप्त मात्रा में कपास का आयात करते हैं। अगर हम भारत के हालातकी बात करें तो यहां भी कपास की खपत बढ़ रही है। पिछले दो दशकों में भारतीय कताई उद्योग के साथ-साथ घरेलू कपड़ा उद्योग की अभूतपूर्व तरक्की के कारण भारत कपास के सबसे बड़े उपभोक्ताओं में शामिल हो गया है,अर्थात्&zwnj; पूरी दुनिया की खपत का लगभग 23% कपास हमारे देश में खप जाता है।</p>
<p><strong>वैश्विक स्तर पर कपास किसानों के लिए उज्जवल बिंदु</strong></p>
<p>पिछले कुछ वर्षों से कपास की खेती का दुनिया में रकबा स्थिर बना हुआ है। साल 2020 की भयंकर मंदी से विश्व अर्थव्यवस्था के गिरावट बावजूद अमेरिकी कृषि विभाग (यूएसडीए) के अनुसार वैश्विक कपास की खपत 2021-22 के सीजन में 4.1 प्रतिशत की दर से बढ़ने की उम्मीद है, जो कि 1.7 प्रतिशत की दीर्घकालिक औसत दर से काफी अधिक है। विश्व कपास उत्पादन 1.5 फीसदी प्रति वर्ष की दर से बढ़ने का अनुमान है जो 2029 में लगभग 30 मिलियन टन हो जाएगा। ओईसीडी-एफएओ एग्रीकल्चरल आउटलुक 2020-2029 ने संकेत दिया है कि यह कामयाबी कपास उगाने के रकबे का विस्तार (0.5 फीसदी प्रति वर्ष) करने के साथ-साथ औसत वैश्विक पैदावार(1 फीसदी प्रति वर्ष) बढ़ाने से हासिल होगी।</p>
<p><strong>भारतीय कपास की खेती,&nbsp; एक नजर में</strong></p>
<p>भारत दुनिया के सबसे बड़े कपास उत्पादक देशों में गिना जाता है, जो पूरे दुनिया के कपास का लगभग 26% हिस्सा उत्पादित करता है। देश में कपास की खेती के हिस्से सबसे बड़ा रकबा आता है जो 12.5 मिलियन हेक्टेयर से लेकर 13.0 मिलियन हेक्टेयर के बीच बैठता है। यह कपास की वैश्विक खेती का लगभग 41 फीसदी रकबा है। कपास का उत्पादन मुख्य रूप से देश के गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश,कर्नाटक, राजस्थान, तमिलनाडु और ओडिशा राज्य में किया जाता है। भारत में कपास उत्पादन केआधुनिकीकरण (बीटी किस्मों को अपनाने सहित) ने भारत को कपास उत्पादक देशों के शीर्ष पर पहुंचा दिया।</p>
<p>कपास के क्षेत्र में अनुसंधान और विकास पर अधिक जोर देने जैसी सरकारी नीतियों ने ऐसे इनपुट और मूल्य समर्थन उपायों के लिए सब्सिडी प्रदान करके किसानों को गुणवत्ता वाले बीजों और कीटनाशकों के इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित किया है जिससे भारत में कपास के परिदृश्य को बदलने में योगदान दिया है।</p>
<p>भारतीय कपास की खेती के असरदार आंकड़ों के बावजूद प्रति हेक्टेयर उत्पादकता&nbsp; जो होनी चाहिए वह नहीं मिल पा रही है । इस फसल में पानी &nbsp;की अधिक खपत और गैर-टिकाऊ कृषि पद्धतियों को&nbsp; बिना सोचे समझे अपनाने&nbsp; और उर्वरकों व कीटनाशकों का अंधाधुंध इस्तेमाल करने के साथ-साथ आनुवंशिक संशोधन ने एक ऐसी अर्थपूर्ण चुनौती पेश कर दी है, जिस पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है।&nbsp;</p>
<p>मौजूदा परिदृश्य को बदलने के लिए यह अनिवार्य हो गया है कि किसानों को कपास-कृषि की गुणकारी पद्धतियों एवं वैज्ञानिक खेती की तकनीकों को अपनाने के बारे में जागरूक किया जाए। &nbsp;सिंचाई के पानी का उचित इस्तेमाल, संतुलित खाद &nbsp;उर्वरकों एवं कीटनाशकों का प्रभावी इस्तेमाल के साथ&nbsp; -साथ इसकी खेती के लिए&nbsp; ऐसी पद्धतियों को बढ़ावा देना जिससे &nbsp;नकदी फसल के रूप में &nbsp;पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ &nbsp;बन सके, भारतीय किसान कपास की खेती में टिकाऊ विकास हासिल कर पाएंगे।</p>
<p>अध्ययनों से साबित हो चुका है कि कपास की खेती में माइक्रो-इरिगेशन जैसी उपयुक्त तकनीक को अपनाने से इनपुट लागत कम करने में मदद मिलती है और किसानों के द्वारा उगाई जाने वाली फसलों की संख्या बढ़ने से उनकी आय में वृद्धि होती है।</p>
<p>इन लाभों में- पानी की जरूरत घटने से पानी के उपयोग दक्षता में 80-90 फीसदी&nbsp; तक की वृद्धि, प्रति हेक्टेयर बिजली की लगभग 20 फीसदी कम खपत और उर्वरक उपयोग दक्षता में 70- 80 फीसदी&nbsp; तक की वृद्धि शामिल है, जो एक बहुत बड़ी लागत बचत में तब्दील हो जाती है। पानी और उर्वरक के नियंत्रित उपयोग से फसलों की उत्पादकता में 50 फीसदी&nbsp; तक की वृद्धि देखी गई है। यह सभी मिलकर किसान की आय के स्तर को असाधारण रूप से बढ़ा देते हैं।</p>
<p>तकनीक आर्थिक लाभों के अलावा कई सामाजिक और पर्यावरण-संबंधी लाभ भी प्रदान करती है। चूंकि भारतीय किसान किसी भी ऐसी तकनीक को अपनाने के लिए तैयार रहते हैं, जो उनके जीवन में निश्चितता लाए और उनकी आय बढ़ाए, इसलिए कपास की खेती में ड्रिप इरिगेशन का व्यापक प्रसार करने की आवश्यकता है। कपास की खेती में माइक्रो-इरिगेशन के क्रियान्वयन की सफलता जागरूकता अभियानों और किसानों केप्रभावी प्रशिक्षण पर निर्भर करती है।</p>
<p>&nbsp;<em><strong>( सी.के. पटेल ,नेटाफिम इंडिया के एजीएम (एग्रोनॉमीएंड मार्केटिंग) हैं, लेख में व्यक्त विचार उनके निजी विचार हैं।)</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ वैज्ञानिक कृषि पद्धतियां अपनाने से भारतीय कपास  की वैश्विक  मांग बढ़ेगी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[ई&amp;#45;रिटेल और एकाधिकार की सामाजिक कीमत को समझने की जरूरत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/Understanding-social-costs-of-E-Retail-and-Monopoly.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 16 Jul 2021 12:33:53 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/Understanding-social-costs-of-E-Retail-and-Monopoly.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>यह बात सिर्फ जियो मार्ट, अमेजन, वालमार्ट या टाटा ग्रुप की नहीं है, जिनकी हिस्सेदारी भारतीय खुदरा बाज़ार के एक बड़े हिस्से पर है। साल 2030 तक इनका व्यवसाय&nbsp; लगभग दो ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। यह बात सिर्फ अलीबाबा और टेनसेंट जैसी उन चीनी कंपनियों के बारे में भी नहीं है जो &nbsp;बाजार का केवल एक हिस्सा चाहते है, लेकिन इंडो-चाइनीज असहमति के कारण उन्हें पीछे हटना पड़ रहा है । इसका प्रभाव केवल उन दो करोड़ छोटे किराना स्टोर &nbsp;और चार करोड़ परिवारों पर ही&nbsp; नही पड़ेगा, बल्कि इसके प्रभाव अनौपचारिक और औपचारिक रिटेल चेन पर निर्भर लोगों पर भी पड़ेंगे। इतना ही नहीं यह संकट इन सबसे भी बड़ा है औऱ बहुत ही गंभीर है ।</p>
<p>चाहे वह इस&nbsp; महामारी के समय में हो या अन्य किसी विपदा की घड़ी &nbsp;में हो, जिन कंपनियों ने ऐसे वक्त में डिजिटल उत्पादों और ढांचे पर निवेश किया है वह हमेशा फली फूली हैं । जब अचानक से भारत मे नोटबंदी का ऐलान किया गया था, तब पेटीएम जैसी कुछ कंपनियों ने इस हालात का फायदा उठाया था । दरअसल इन कंपनियों को घरेलू स्टार्ट-अप के रूप में खड़ा किया गया था । लेकिन इसके बावजूद आज पेटीएम &nbsp;पूर्ण रूप से &nbsp;भारतीय मूल की कंपनी नहीं है । इस कंपनी में एक छोर पर चीन के अलीबाबा का प्रतिनिधित्व करने वाले निवेशक हैं तो, दूसरे छोर पर वॉरेन बफे द्वारा समर्थित एक अमेरिकी इकाई ने भी निवेश किया हैं । यह एक सचाई है कि वास्तविकता में &nbsp;पूँजी &nbsp;की कोई राष्ट्रीयता नहीं होती ।</p>
<p>&ldquo;स्वदेशी बनाम विदेशी&rdquo; को राष्ट्रवाद से जोड़ना &nbsp;केवल एक मार्केटिंग रणनीति है । अगर आप याद करने की कोशिश करें, तो &nbsp;जब कोका कोला कंपनी भारत मे आई&nbsp; थी तब पारले ग्रुप के &nbsp;रमेश चौहान ने &ldquo;स्वदेशी&rdquo; के नाम की हुंकार केवल इसीलिए लगाई ताकि वह अपनी कंपनी थम्स अप को कोका कोला को अधिक कीमत &nbsp;पर बेच सकें । इसी तरह, लगभग एक दशक पहले स्वदेशी का नारा लगाने वाली कई कंपनियां&nbsp; जिन्होने &ldquo; रीटेल मे &nbsp;एफ.डी.आई&rdquo; का &nbsp;आने का विरोध किया था, आज वह अपनी कंपनी की &nbsp;शाखाएं&nbsp; विदेशी कंपनियो के हाथों &nbsp;बेच चुकी हैं, क्योंकि अब राजनीति की हवा का रुख भी बदल गया है । भारत में ट्रेडर्स के सबसे बड़े संगठन का कहना है कि ई-कॉमर्स की क्रांति छोटे कारोबारियों के लिए बेहतर साबित होगी, मगर इसके उलट असल में इन छोटे दुकानदारों के साथ यह धोखा है। आज के वक्त में किसान की तरह कोई दुखी वर्ग है तो वह छोटे दुकानदार हैं ।</p>
<p>फेडरल रिजर्व बैंक ऑफ क्लीवलैंड मे 2014 में तैयार की गई एक रिपोर्ट में बताया गया है कि अमेरिकियों के नया व्यवसाय शुरू करने की गति में पिछले साढ़े तीन दशकों में भारी गिरावट आई है । साथ ही पहले से मौजूद बिजनेस संस्थानों ने नई कम्पनियों और कारोबार शाखाओं के जरिये अपने कारोबार का विस्तार किया है। जहां पहले बाजार स्वतंत्र उद्यमियों द्वारा चलाए जाते थे ,आज उसी &nbsp;व्यवसाय के बाजार को विस्तार करके चलाया जा रहा है । एक राष्ट्र की प्रगति के लिए जरूरी है वह अपनी उद्यमशीलता के लिए स्वतंत्र रहे लेकिन यह व्यवस्था उस &nbsp;लकीर को मिटाने का काम कर रही है। क्योंकि &nbsp;अक्सर देखने को मिला है कि हद से ज्यादा पूंजीवाद से ऐसे एकाधिकार उत्पन्न होते हैं जिससे प्रतिस्पर्धा कम होती है और बाजार में नवाचार का गला घोंट देते हैं। छोटे&nbsp; व्यवसायों&nbsp; जिससे वास्तव में रोजगार बढ़ता है और वह बाजार में &nbsp;आर्थिक गतिशीलता उत्पन्न करते है उनका यह मनोबल तोड़ देते है। पहले खुद चीन ने अलीबाबा, टेनसेंट जैसी कंपनियों को दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में शामिल कराने में इनकी मदद की &nbsp;लेकिन &nbsp;जब चीन को अचानक से यह अहसास हुआ कि यह कंपनियां अब चीन के लिए ही खतरा बन चुकी हैं तो वह खुद इन कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई कर रहा है । इस बात से &nbsp;चीन से &nbsp;हमें सीख लेनी चाहिए।</p>
<p>बडी-बडी ई-रिटेल कंपनियां &nbsp;बड़ी मात्रा में माल को खरीदती हैं जिससे वजह से वह &nbsp;नीचे तक की कीमतों को स्वंय निर्धारित करती हैं और उत्पादन करने वाले लोगों &nbsp;पर कठोर शर्तें थोप देती हैं । दूसरी तरफ आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) और प्रोसेस सिस्टम में निवेश करने की वजह से ई- रिटेल कम्पनियों के उपभोक्ताओं के खरीद मूल्य किराना स्टोर के खरीद मूल्य से कम होते है, जो एक स्वभाविक परिणाम है। ई-रिटेल कंपनियां न सिर्फ किराना स्टोरों के सबसे बड़े वितरणकर्ता के रूप मे उभर रहे हैं बल्कि ई-रिटेल कंपनियां इन किराना स्टोर को ऑर्डर किए गए समानो के पिक अप प्वाइंट्स की तरह भी इस्तेमाल करेंगे । जिसके चलते, किराना स्टोर्स को न्यूनतम ऑर्डर के आकार को बढ़ाने के लिए मजबूर किया जाएगा, जिसके चलते छोटे दुकानों की इन्वेंट्री लागत बढ़ जाएगी और ऐसे में उनको नुकसान झेलना पड़ेगा । यह व्यवस्था ज्यादा दिनों तक नही चलने वाली है।&nbsp; अगले बीस सालों में &nbsp;अधिकांश किराना स्टोर इस व्यवस्था के चलते बंद हो जाएंगे। उनके साथ, ऐसे व्यवसाय जो आपूर्ति &nbsp;के लिए एक &ndash;दूसरे पर आश्रित है और आपूर्ति करने वाले सैकड़ों- हजारों &nbsp;छोटे उद्यम धीरे-धीरे खत्म हो जाएंगे। जाहिर सी बात है कि जैसे-जैसे स्टोर की संख्या कम होती जाएंगी,उपभोक्ताओं को कुछ ही आपूर्तिकर्ता मिलेंगे और उपभोक्ताओं को उन्ही से खरीदारी करनी पड़ेगी ।</p>
<p>एक स्वतंत्र उपभोक्ता अनुसंधान संगठन, यूएस पब्लिक इंटरेस्ट रिसर्च ग्रुप ने जब अमेजन पर फेस मास्क जैसी 750 आवश्यक वस्तुओं की बिक्री का महामारी से पहले और उसके बाद का अध्ययन किया। इसने उन्होंने पाया कि 750 में से &nbsp;409 वस्तुओं की कीमतों में 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी और 136 वस्तुओं की कीमतें &nbsp;दोगुना हो गयी थी ।</p>
<p>&nbsp;कई लोग असंगठित तौर पर हो रहे व्यापार को अव्यवस्थित जबकि &nbsp;ई-कॉमर्स को कुशल बताते हैं। लेकिन आखिर इस दक्षता &nbsp;के मायने क्या हैं? यह निर्भर करता है कि हम क्या माप रहे हैं। ज्यादातर लोग एक ऐसा माप मैट्रिक्स तैयार करेंगे जिसका आधार सिर्फ व्यापार से जुडे उद्देश्य हैं । लेकिन, दक्षता का माप इससे कई ज्यादा पेचीदा है। उदाहरण के लिए, मोनोकल्चर को एक कुशल कृषि पद्धति माना जा सकता है अगर बात सिर्फ प्रति यूनिट उपज और आसानी से होने वाली फसल की कटाई के संचालन की हो । लेकिन अगर मानव स्वास्थ्य, जैव विविधता हानि और जलवायु परिवर्तन के नजरिये से देखा जाए तो इससे बुरी पद्धति और कोई नहीं हो सकती है।</p>
<p>&nbsp;जब कोई भी प्रकिया होती है तो एक पक्ष की हार होती है इस हार में हुए नुकसानों की समाजिक लागत को पहचाना जाना चाहिए। इस लागत के नुकसान होने के बहुत से कारण है। अपने स्वाभाविक प्रारूप के कारण असंगठित सेक्टर में नौकरियां पंजीकृत नहीं की जाती है इसलिए इस सेक्टर मे जब असंख्य लोग अपनी नौकरियां खो देते है &nbsp;तो&nbsp; पंजीकृत नहीं होने के कारण इस नुकसान का कोई ब्यौरा नहीं मिलता है। हालांकि, ई-रिटेल में हर एक नौकरी का दस्तावेजीकरण किया जाता है और राजनेता इसका श्रेय भी ले लेते हैं । यह किसी भी देश के लिए एक बुरी परिस्थिति का संकेत है, खासकर जब बेरोजगारी स्तर अपने चरम पर&nbsp; है और यह देश के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। इस व्यवसाय के छोटे व्यापारियों को बाहर करने के लिए अधिक सम्पन्न ई&ndash;रिटेल व्यवसाय के पास उपभोक्तओं को सस्ता कर्ज देने की क्षमता होती है । इसलिए ई-रिटेल ही क्रेडिट कार्ड कंम्पनियां के लिए शर्तें तय करेंगी। वहीं ई&ndash;पेमेंट और ई-प्लेटफार्म द्वारा ग्राहकों द्वारा खरीदारी के समय वसूले जाने वाले शुल्क भी ई-रिटेल कंपनियां ही तय करेंगी। इसके चलते देर-सबेर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का आकर्षक रिटेल लोन बिजनेस खत्म हो जायगा । इसके बाद ई-रिटेल कंपनियां अपना सस्ता सामान बेचेंगी और बड़े ब्रांडों को भी समर्पण के लिए मजबूर करेंगी। वह खुद के ब्रांड जैसे अमेजन 'बेसिक्स' मेकिंग बेचना शुरू करेंगी। अमेज़ॅन ने पिछले हफ्ते 8.5 अरब डॉलर में हॉलीवुल का स्टूडियो एमजीएम खरीदा है। इस तरह औऱ भी चीजें और सेवाएं इन बड़े ई-रिटेलर प्लेयर के साथ जुड़ती जाएंगी । &nbsp;ई-रिटेल और ई-कॉमर्स के बीच की रेखाएं पहले से ही धुंधली होने लगी हैं।</p>
<p>ई-रिटेल की दिलचस्प बात यह नहीं है कि वह &nbsp;सिर्फ मर्चेंडाइज बेच रहे है, बल्कि इस करोबार में ग्राहकों से जुड़ी हुई व्यक्तिगत जानकारी के डाटा का भी व्यापार और विज्ञापन का भी व्यापार कर रही हैं। इस तरह के डाटा की मदद से&nbsp; कॉरपोरेट्स उपभोक्तओं के व्यवहार&nbsp; को भी&nbsp; प्रभावित कर रही हैं । यह बाजार को भी अपने हिसाब से मोड़ कर हेर फेर कर रही हैं। यह डेटा उन लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण है जो ई-रिटेल के प्लेटफॉर्म पर नहीं बेच रहे हैं, जैसे वित्त, बीमा,दवा और स्वास्थ्य उद्योग । &nbsp;इसलिए यूरोप एक ऐसे कानून को लाने &nbsp;पर विचार कर रहा है जो बड़ी&ndash;बड़ी कंपनियों के एकाधिकारवादी व्यवहार पर अंकुश लगा सके। &nbsp;जिससे कि इस तरह&nbsp; के डाटा को गुप्त ऱखा जा सके।</p>
<p>पहले आधुनिक रिटेल स्टोर अपनी दुकान में ब्रांडो को प्रमुखता से बेचने के लिए ब्रांड कंपनियों से अधिक कमीशन के लिए कहती थी ठीक वैसै ही अब ई- रिटेल कंपनियां भी इसी तरह का दबाव बनाएंगी । अब ब्रांड अपने उत्पादों को लोगों की नजर में लाने के लिए (विजिबिलिटी) के लिए विज्ञापन पर अधिक से अधिक खर्च करने के लिए मजबूर होंगे। जब 1998 में गूगल की स्थापना हुई थी उस समय एडवर्टिजमेंट रेवेन्यू का 50 फीसदी से ज्यादा हिस्सा प्रिन्ट मीडिया को मिलता था जो अब घटकर 10 फीसदी हो गया है। इस साल कुल विज्ञापन रिवन्यू का 30 फीसदी, 23 फीसदी &nbsp;फेसबुक और 10 फीसदी अमेजन ने अर्जित किया । स्वतंत्र मीडिया लोकतंत्र का एक स्तंभ है लेकिन विज्ञापन न मिलने के काऱण अब उसके अस्तित्व पर संकट गहरा रहा है। अमेऱिकी निजी कंपनी फेसबुक ने अमेरिकी राष्ट्रपति को कम्यूनिकेशन प्लेटफार्म देने से इंकार कर दिया जो डिजीटल सम्राज्य की अपार शक्ति की गवाही देता है। हाल ही में गूगल ने आस्ट्रेलिया को अपने सर्च इंजन की जानकारी देने से इंकार कर दिया। आज भारतीय नेतृत्व ट्विवटर पर नाराजगी जताते हुए सरकार की अलोचना करने वाली किसानों के आंदोलन से जुड़ी पोस्ट को हटाने की मांग करता हैं । यह बस कुछ समय की बात है जब ऐसे कार्पोरेशन चुनाव के नतीजे और लोगों&nbsp; के विचार तय करने में निर्णायक साबित होगें, इसलिए यह मुद्दा सीधे लोकतंत्र के अस्तिव से भी जुड़ा है ।</p>
<p>हमें ऐसे प्रावधानों की जरूरत है जो हमारे डाटा को हमारे देश मे ही सुरक्षित&nbsp; रख सके । हमें ऐसे प्रावधानो की जरूरत है जिसके चलते&nbsp; ऐसी डाटा कंपनियों को तब-तब मूल्य चुकाना पड़े जब भी वह अपने उपभोक्ताओं से उनकी जानकारी लें। साथ ही ई-कॉमर्स लेनदेन पर भी विशेष टैक्स लगाने की जरूरत है । इस टैक्स का उपयोग कौशल निर्माण, मानव संसाधनों को बढावा देने और इन सब वजहों से आने वाले समय में होने वाले दर्द भरे बदलाव के लिए लोगों को तैयार करने में &nbsp;किया जा सकता है ।</p>
<p>ऐसा नही है कि भारत सरकार इस तरह की बड़ी कंपनियों को विकसित नहीं कर सकती थी ,लेकिन बीएसएनएल, एमटीएनएल जैसी कंपनियां जिन पर सरकार का एकाधिपत्य था, उन्हें जानबूझ कर उन्हें घाटे में धकेल दिया गया ताकि महत्वकांक्षी निजी कंपनियों को बढ़ावा मिल सके। हमने मौका गंवाया है लेकिन अभी भी देर नहीं हुई है। भारतीय डाक विभाग को यूपीआई बैंकिंग लाइसेंस देकर और होम डिलिवरी सेवा करने वाले उद्योग के साथ &nbsp;भागीदारी में एक लॉजिस्टिक हब के रूप में तब्दील कर एक 100 अरब डॉलर के वैल्यूवेशन वाली कंपनी में तब्दील करने की संभावना मौजूद है। लेकिन भारत के नीति निर्धारक और नेता तो सोशल मीडिया से झगड़ने मे लगे हुए है, न कि अपने नागरिकों के लिए वैल्यूएशन बढ़ाने में ।</p>
<p>वैल्यूएशन ही सबसे महत्वपूर्ण कुंजी है। उदाहरण के लिए जियो मार्ट की बिक्री लगभग 25,000 करोड़ रुपये की है लेकिन बाजार में उसका पूंजीकरण लगभग 1.50 लाख करोड़ रुपये का है । पश्चिमी&nbsp; देशों के मुकाबले 15 प्रतिशत के मुकाबले&nbsp; भारत में खाद्य रिटेल में पूंजीकरण इससे मिलने वाले राजस्व के मुकाबले 5-6 गुना ज्यादा है। विदेशी कंपनियों के लिए यह फायदेमंद होगा कि वह यहां कमाए अपने मुनाफे को वापस भारत में ही व्यापार में निवेश करे जो अमेरिका में इन कंपनियों के स्टॉक्स की कीमतों को बढ़ाने में मदद करे। विदेशी पूंजी से प्रतिस्पर्धा बढ़ती है और यह एक बेहतर बात है। हमें इस बात से चिंतित होना चाहिए कि कंपनियां कैसे संचालित हो रही हैं और इनका विनियमन कैसे किया जा रहा है। साथ ही हमें चुनिंदा कंपनियों के बाजार पर एकाधिकार (ओलिगोपोली) की स्थिति के बारे में सोचना चाहिए जो इससे असामनता को कम करने की बजाय बढ़ाती है और उसके जरिये कीमतों को बढ़ाने की प्रवृत्ति पैदा होती है।&nbsp;</p>
<p>क्या भारत यह सुनिश्चित करने मे सफल हो पाएगा कि व्यवस्था (सिस्टम) &nbsp;बिजनेसेज के लिए काम न करे, बल्कि बिजनेसेज लोगों के लिए काम करे ? व्यक्तिगत रूप से मुझे इस पर संदेह है। विनियमन, प्रवर्तन और एंटी ट्रेस्ट जैसे कानून कमजोर हैं । संस्थाओं को चरणबद्ध रूप से कमजोर किया जा रहा है। नौकरशाही और &nbsp;सभी दलों से ताल्लुक रखने वाले राजनीतिक वर्ग की अदूरदर्शिता ने कुछ लोगों को मनचाहा करने की छूट दे रखी है। अब केवल आम लोगों की सक्रियता से ही इस कुलीनतंत्र को&nbsp; देश पर अपनी पकड़ बनाने से रोका जा सकता हैं।</p>
<p>आप सोचेंगे कि आखिर एक किसान संगठन इससे क्यों चिंतित होगा और वह ई-रिटेल और डेटा अर्थव्यवस्था&nbsp; के बारे में क्यों &nbsp;लिख रहा है? &nbsp;उत्तर को दो भागो में बांटा जा सकता है। यह कहने की जरूरत है क्योंकि कोई और इससे जुड़ी बड़ी तस्वीर की बात नहीं कर रहा है। अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि किसान की आजीविका के लिए खेत पर होने वाली गतिविधियों से ज्यादा खेत के बाहर होने वाली गतिविधियां अधिक मायने रखती हैं । भले ही किसी को पसंद हो या नहीं, जब निजी क्षेत्र अच्छा करता है, तभी अर्थव्यवस्था फलती-फूलती है और हर माह लाखों रोजगार पैदा होते हैं। उपभोक्ताओं के पास भुगतान करने के लिए अधिक पैसा होता है, तभी वह पौष्टिक भोजन के लिए पैसे खर्च कर सकते हैं और तभी किसान को अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिल सकता है।</p>
<p>&nbsp;<em><strong>(अजय वीर जाखड़, भारत कृषक समाज के चेयरमैन हैं, लेख में व्यक्त विचार उनके निजी विचार हैं।)</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ ई-रिटेल और एकाधिकार की सामाजिक कीमत को समझने की जरूरत ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[अनुकूल परिस्थितियों से ही सुगम  होगी  सहकार से समृद्धि  की राह]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/For-Sahkar-se-samriddhi-an-enabling-environment-is-must.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 14 Jul 2021 07:30:34 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/For-Sahkar-se-samriddhi-an-enabling-environment-is-must.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>&nbsp;</p>
<p>सहकारिता क्षेत्र के लिए एक अलग मंत्रालय बनाने की चिर प्रतीक्षित मांग पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 6 जुलाई, 2021 को अपनी स्वीकृति की मुहर लगा दी । सहकारिता क्षेत्र से संबंध रखने वाले सभी लोग प्रधानमंत्री के इस फैसले की जमकर तारीफ कर रहे हैं, क्योंकि यह फैसला सरकार की &nbsp;सहकारिता क्षेत्र के विकास और उन्नति के प्रति प्रतिबद्धता को &nbsp;दर्शाता है ।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>जो लोग सहकारिता क्षेत्र में चल रही गतिविधियों और घटनाक्रमों से वाकिफ थे , उन्हें इस फैसले से कोई ताज्जुब नहीं हुआ । इससे पहले भी प्रधानमंत्री ने कई&nbsp;अवसरों पर सहकारिता क्षेत्र को मजबूत और आत्मनिर्भर बनाने के लिए आवश्यक कदम उठाने की मंशा जाहिर की थी ।&nbsp; वह सहकारिता क्षेत्र से जुड़े लोगों को अपने अंदर &lsquo;सहकारिता भावना&rsquo; को जिंदा रखने और उसे और मजबूत करने के लिए हमेशा प्रेरित करते रहे हैं ।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>इस अवसर पर अपनी घोषणा में सरकार द्वारा &lsquo;समुदायिक भागीदारी आधारित विकास &nbsp;मॉडल&rsquo; की महत्ता पर जोर दिया गया है । इस घोषणा में सहकारिता मंत्रालय के लिए रोड मैप और एजेंडा की व्यापक रूपरेखा भी समाहित है । यह मंत्रालय देश में सहकारिता से समृद्धि का द्वार खोलेगा । नव गठित मंत्रालय सहकारी समितियों के लिए ' ईज ऑफ डूइंग बिजनेस ' की प्रक्रियाओं को कारगर बनाने और बहु राज्यीय सहकारिताओं &nbsp;के विकास के लिए काम करेगा । यह मंत्रालय देश में सहकारी आंदोलन को मजबूती देगा और इस आंदोलन को &nbsp;सही मायने में जमीनी स्तर तक पहुंचने में भी मदद करेगा । सहकारी मंत्रालय सहकारी आंदोलन को मजबूत करने के लिए वांछित संस्थागत, कानूनी और नीतिगत ढांचा भी तैयार करेगा । साथ ही सहकारी समितियों को अपनी पूर्ण क्षमता के साथ कार्य करने हेतु प्रेरित करने के लिए अनुकूल वातावरण का निर्माण करेगा । &nbsp;</p>
<p>इस बात को स्वीकार करना होगा कि सहकारी समितियां सदस्यों के स्वामित्व और नियंत्रण वाली आर्थिक उद्यम हैं । यह अपने सदस्यों के हितसाधन हेतु बाजार की विफलताओं के नकारात्मक प्रभाव को सही या कम करने के लिए स्वेच्छा से स्थापित की जाती हैं । सहकारी उद्यमों द्वारा लोग एक समूह बनाकर&nbsp; और आवश्यक संसाधनों को एकत्र करके अपने आर्थिक उद्देश्यो की पूर्ति कर सकते है, जो एक अकेले व्यक्ति के लिए शायद संभव नही है । सहकारी उद्यम &nbsp;बाजार तक&nbsp; असानी से पहुंचकर अच्छे पैमाने पर एक सुदृढ़ अर्थ व्यवस्था का निर्माण कर &nbsp;सकते हैं । इस तरह से स्वत्रंत बाजार की स्थिति बनाकर, सहकारी उद्यम देश की अर्थव्यवस्था&nbsp; और समाजिक संरचना के लिए एक सकारात्मक छाप छोड़ सकते है। हालांकि, समाज में उनका मूल्य तभी हो सकता है जब वह आर्थिक रूप से सक्षम और &nbsp;टिकाऊ हों । सहकारी समितियों को मजबूत बनाने के लिए उनके &nbsp;मौलिक स्वरूप और विशेषताओं का विशेष रूप से &nbsp;ध्यान&nbsp; रखना आवश्यक है । &nbsp;ऐसी &nbsp;सहकारी संस्थायें अपनी अहमियत खो देती हैं जिन्हें &nbsp;सामाजिक या राजनीतिक कारण से सरकार द्वारा आर्थिक औऱ बाजार की ताकतों का&nbsp; मुकाबला करने हेतु संरक्षण दिया जाता है ।&nbsp;</p>
<p>आर्थिक रूप से मजबूत और विकास सक्षम सहकारी संस्थाएं सरकार के मुख्य प्राथमिकता वाले क्षेत्रों जैसे खाद्य सुरक्षा, रोजगार, गरीबी उन्मूलन , वित्तीय समावेशन में प्रभावी ढंग से योगदान दे सकती है। । कृषि उत्पादन में वृद्धि और ग्रामीण आबादी के बीच गरीबी को कम करने के लिए सहकारी समितियां सर्वोत्तम &nbsp;विकल्प हो सकती हैं।</p>
<p>सहकारी समितियां तभी टिकाऊ हो सकती हैं जब उन्हें मजबूत बनाने के लिए उचित वातावरण मिले। भारत में सहकारी समितियों का इतिहास एक सदी से भी अधिक का है मगर आज इनके अस्तित्व पर ही खतरा मंडरा रहा है। &nbsp;इनको मजबूत करने के प्रयास की शुरुआत प्राथमिक स्तर की संस्थाओं के विकास से होनी चाहिए। मजबूत प्राथमिक संस्थाएं ऊपरी स्तर की सहकारी प्रणाली को स्वतः &nbsp;मजबूत कर देगी । सरकार&nbsp; को ऐसा करने के लिए उचित वातवारण बनाकर एक स्पष्ट नीति तैयार &nbsp;करनी होगी।</p>
<p>सहकारी समितियों को &nbsp;लाभ&nbsp; कमाना भी जरूरी है ताकि वे टिकाऊ बने रहें और उनका विकास हो सके । &nbsp;इनको किसी भी आने वाले जोखिम से निपटने के लिए अपने &nbsp;सदस्यों को पूंजी निर्माण के लिए&nbsp; प्रोत्साहित करना चाहिए ।</p>
<p>ज्यादातर मामलों में, यह देखा गया है कि समर्पित सदस्यों के बावजूद सहकारी संस्थाएं अपनी पूंजीगत जरूरतों को पूरा नहीं कर पाती हैं। मगर प्रर्याप्त वित्तीय संसाधनों के बिना सहकारी समितियां अच्छे से काम भी नहीं कर सकती और यह भविष्य में उनके अस्तित्व के लिए भी संकट का कारण बन सकता है। इस बाधा को दूर करने और सहकारी संस्थाओं को आवश्यक कार्यशील और निवेश पूंजी की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए सरकार को उचित वित्तीय और &nbsp;ऋण नीति का निर्माण करना चाहिए ।</p>
<p>सरकार को ऐसे प्रासंगिक और ठोस &nbsp;&nbsp;समाजिक,आर्थिक,राजनीतिक वातावरण का निर्माण करना होगा ,जिसमें &nbsp;सहकारी समितियां स्वतंत्र रूप से कार्य कर सकें और &nbsp;अच्छी तरह से उन्नति कर सके। अकर्मण्य लोगों के लिए सहकारिता में कोई जगह नहीं होनी चाहिए|</p>
<p>सरकार को सशक्त कानून और नीतिगत माहौल बनाने के लिए काम करना होगा । तभी सहकारी समिति की तरफ उसके सदस्यों की प्रतिबद्धता और उससे संबंधित कौशल, उत्पादन विधि की जानकारी और दूसरे जरूरी काम में निवेश करने की क्षमता और प्रतिबद्धता को सुनिश्चित किया जा सकता है । वहीं सहकारी समितियों को भी समझना होगा कि यह उनके ही हित में है ,क्योंकि सशक्त एवं कुशल सहकारी संस्थाएं ही व्यापार की शर्तों को अपने अनुकूल बना कर सदस्यों की समृद्धि सुनिश्चित कर सकती हैं । सहकारी व्यापार सिद्धांतो के पूर्ण अनुपालन से ही &nbsp;सहकारी समितियों का विकास संभव &nbsp;हो सकता है ।</p>
<p>अगर सहकारी समिति एक टिकाऊ और उन्नतिशील उद्योग नहीं बनता है तो आगे चलकर&nbsp; वह अपना वास्तविक प्रारूप भी खो देगा । क्योंकि इससे वह सहकारी विरूपण की एक अपरिवर्तनीय प्रक्रिया के जाल में फंसकर रह जाएगा ।सहकारी समितियों के व्यवसायिक और आर्थिक स्वरूप से इनकार बाजार में सुव्यवस्थित सहकारी समितियों के विकास में अड़चने लाती हैं |अपने &nbsp;सदस्यों के लिए सहकारी समितियां बहुत फायदेमंद हो सकती हैं । इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि सहकारी समितियां गरीबों और वंचित समुदाय का भला कैसे कर सकती हैं बल्कि सवाल तो यह होना चाहिए कि सहकारी समितियों से जुडकर गरीब और वंचित समुदाय अपना भला कैसे कर सकते हैं &nbsp;।&nbsp;</p>
<p>गतिशील एवं बदलती बाजार संरचनाएं और स्थितियां संगठनात्मक ढांचा निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। &nbsp;सहकारी समितियों को अपनी संगठनात्मक संरचना और व्यवसाय को बाजार की परिस्थितियों के अनुकूल ढालना होगा । सहकारी समितियों को लगातार बदलते बाजारी ढांचे के लिए सही परिस्थितियां बनाने के लिए एक टिकाऊ मॉडल खोजने की जरूरत है&nbsp; ताकी वह सुदृढ़ एवं टिकाऊ बन सकें । बेकार, कमजोर और खराब प्रबंधन वाली सहकारी समितियां सदस्योंके साथ-साथ समाज के लिए भी नुकसानदेह हैं।</p>
<p>छोटी प्राथमिक सहकारी समितियां भी अपना अस्तित्व बरकरार रख सकती हैं बशर्ते कि वह जल्द से जल्द संगठित होकर क्षेत्रीय व्यापार नेटवर्क को स्थापित करें।इस तरह की व्यवस्था से वह अपने कम संसाधनों को बेहतर ढंग से आवंटित करने में सक्षम होंगी और यह व्यवसाय के जरूरी स्तर को प्राप्त करने के लिए भी जरूरी है ।रोजमर्रा के व्यवसाय प्रबंधन का जिम्मा कुशल व्यावसायिक प्रबंधकों के हाथ में होना चाहिए और &nbsp;सहकारी समिति के बोर्ड के सदस्यों को सहकारी संस्था की संरचना, सदस्यों के अधिकार, पूंजी&nbsp; और जिम्मेदारी जैसे कामों तक ही खुद को सीमित रखना चाहिए।</p>
<p>सहकारिता एक सामुहिक &nbsp;उद्यम है और इसकी की मजबूती उसके सदस्यों पर निर्भर&nbsp; करती &nbsp;&nbsp;है| इसलिए, सदस्यों को सहयोग और अंतर्निहित तर्क के साथ इसके मूल सिद्धांतों को समझने की जरूरत है | &nbsp;उन्हें काम करने के लिए प्रेरित और प्रतिबद्ध होना होगा । सदस्यों को अपने दायित्वों, उनकी सहकारी समितियों को नियंत्रित करने वाले नियमों (कानून, विनियमों, उपनियमों) &nbsp;औऱ अपने अधिकारों समझना होगा। उन्हें आवश्यक वित्तीय योगदान करने और जोखिम साझा करने के लिए हमेशा &nbsp;तैयार रहने की जरूरत है। व्यवहार्यता सुनिश्चित करने के लिए उचित विनियमन और शासन संरचनाएं जरूरी &nbsp;हैं।</p>
<p>सदस्य आवश्य़क अनुशासन तभी मानेंगे जब उन्हें बाजार की स्थितियों और करोबारी माहौल की पर्याप्त जानकारी होगी जिससे उनकी संस्था संचालित होती है। इसलिए सरकार को मौजूदा शिक्षा औऱ ट्रेनिग में&nbsp; सुधार करना चाहिए। इसके लिए राष्ट्रीय, राज्य , क्षेत्रीय और जिला स्तर पर &nbsp;सहकारिता की &nbsp;कुशल शिक्षा के लिए प्रोफेशनल ट्रेनिंग सेंटर बनाने चाहिए।&nbsp; इन संस्थाओं को &nbsp;आवश्यकता के अनुसार प्रत्येक स्तर पर केन्द्र स्थापित करने की छूट होनी चाहिए। संस्था को बोर्ड स्तर और सामान्य &nbsp;सदस्यों के लिए शिक्षा और प्रशिक्षण कार्यक्रम तैयार करना&nbsp; चाहिए। इसके साथ ही सदस्यों के साथ लगातार सूचना सेवा स्थापित करनी चाहिए। यह संस्थान केन्द्र सरकार के पूरी तरह नियंत्रण में होना चाहिए । सरकारी मदद औऱ सरकारी&nbsp; अनुदान&nbsp; सहायता से देश में कार्यरत मौजूदा सहकारी शिक्षण एवं प्रशिक्षण संस्थाओं का &nbsp;नव गठित&nbsp; संस्थान में विलय किया जा सकता है। नई उत्पादन तकनीकों और उत्पादों के बारे में जानकारी,&nbsp; शिक्षण और प्रशिक्षण के लिए पाठ्यक्रम तैयार करना चाहिए। यह किसी भी सहकारिता की व्यवहार्यता के लिए महत्वपूर्ण कारक है ।</p>
<p>मौजूदा सहकारिता कानून में भी व्यापक संशोधन की तत्काल जरूरत है । मौजूदा कानून इस विचार पर आधारित है कि सहकारी संस्थाओं की स्थापना सामाजिक-और आर्थिक उद्देश्योंके लिए की गई है। जबकि सहकारी समितियों का गठन एक उद्यम के रूप में होना चाहिए जो बेहतर कानूनी प्रावधानों के तहत संचालित होता है। देश में एक समान सहकारी कानून बनाने की तत्काल जरूरत है। केंद्र सरकार कोइससे होने वाले लाभ के बारे में राज्यों को समझाने के लिए उनके साथ संवाद शुरू करना चाहिए।</p>
<p>सरकार को 'कोआपरेटिव- कारपोरेट रणनीतिक कार्यशील साझेदारी' को बढ़ावा देने के लिए कानूनी प्रावधानों को तैयार करने पर विचार करना चाहिए। इससे&nbsp; सहकारी समितियों की प्रबंधकीय, विपणन, बुनियादी ढांचे, तकनीकी और वित्तीय जरूरतें पूरी हो सकती हैं। कारपोरेट इकाई को उन कोआपरेटिव में पूंजी निवेश की अनुमति दी जा सकती है जहाँ दोनों के बीच एक कार्यशील गठबंधन बनता है। सहकारी समितियों के प्रबंधन और बुनियादी ढांचे की क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में किए गये कारपोरेट के आर्थिक योगदान को कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) की पूर्ति की तरह माना जा सकता है।</p>
<p>देश में सहकारिता के भविष्य की संभावनाएं आशाजनक हैं क्योंकि यह कृषि विकास,आर्थिक विकास और गरीबी उन्मूलन के लिए एक मूलभूत गतिविधि के रूप में कार्य करता है। किसानों की आय में सुधार, बेरोजगारों को नौकरी उपलब्ध कराना, समाज के वंचित समुदाय के लोगों की सामाजिक-आर्थिक स्थितियों में सुधार जैसे सरकार के मुख्य उद्देश्यों को पूरा करने के लिए सहकारी समितियों का गठन और प्रशिक्षण पर काम करना होगा। इसके साथ ही सहकारी समितियों की वित्तीय जरूरतों के लिए समाधान तलाशने के साथ जरूरी कानूनी, नीतिगत और कारोबारी माहौल में सुधार लाना होगा।</p>
<p>केवल कुशलता से कार्य करने वाली सहकारी संस्थाएं ही आत्मनिर्भर ग्रामीण भारत के उद्देश्य को हकीकत में तब्दील करने की क्षमता रखतीहैं। सदस्यों के बीच इमानदार प्रतिबद्धता से ही सहकारी समितियों का बेहतर प्रबंधन करना संभव है। &ldquo; सबका विकास&rdquo; की परिकल्पना पर भी जोर देना चाहिए। इससे न केवल आर्थिक मजबूती और वित्तीय पूंजी का निर्माण हो सकेगा बल्कि एक सामाजिक और भावनात्मक पूंजी का भी निर्माण होगा,जो एक बेहतर और सामंजस्यपूर्ण सामाजिक जीवन केलिए बेहद जरूरी है ।&nbsp; इस दिशा मे सरकार द्वारा सहकारिता मंत्रालय का गठन का एक सराहनीय निर्णय है। अब आगे &nbsp;सरकार को ऐसे उत्प्रेरक तत्वों पर गंभीरता पूर्वक ध्यान देना चाहिए &nbsp;होगा जो सामूहिक कार्यकलापों में आने वाले अवरोधों को दूर करने में सक्षम हैं । &nbsp;</p>
<p><em><strong>(</strong><strong> डॉ. डी. एन. ठाकुर, नेशनल कोआपरेटिव डेवलपमेंट कारपोरेशन (एनसीडीसी) के पूर्व डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर हैं, वह कोआपरेटिव सेक्टर और एग्रीकल्चर फाइनेंसिंग के एक्सपर्ट हैं। लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं )</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ अनुकूल परिस्थितियों से ही सुगम  होगी  सहकार से समृद्धि  की राह ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[नीतिगत व्यवस्था में ताकत का असंतुलन]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/Power-imbalances-in-food-systems.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 09 Jul 2021 12:29:48 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/Power-imbalances-in-food-systems.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>पर्यावरण के मुद्दों का अध्ययन करने वाले विद्वान अक्सर जलवायु परिवर्तन और ग्रीनहाउस उत्सर्जन के लिए किसानों को ही दोषी ठहराते हैं। जबकि किसान पूरी इमानदारी से प्राकृतिक संसाधनों और मिट्टी का सही प्रंबधन करते हैं ताकि प्राकृति का ज्यादा नुकसान ना हो। असल में किसान कोई ऐसी पद्धति अपनाता है जो टिकाऊ नहीं उसके लिए नई तकनीक और अनुसंधान है जो एक खास रिसर्च सिस्टम के जरिये आए हैं और इनमें निजी क्षेत्र की भी भूमिका है। लेकिन यह बात कोई भी आपको नहीं बताता है।</p>
<p>वहीं अब, हम किसानों से &nbsp;यह उम्मीद की&nbsp; जा रही है कि हम परंपरागत तरीके से पीढ़ी दर पीढ़ी चली रही आ रही खेती कि विधियों और तकनीक को भूल जाएं और जलवायु के अनुकूल&nbsp; खेती करें, भले ही यह बदलाव हमारे लिए आर्थिक रूप से नुकसानदायक हो । यह बदलाव निश्चित रूप से जरूरी है । लेकिन यह बदलाव तब तक नहीं लाया जा सकता जब तक खेती एक सम्मानजनक व्यवसाय न बन जाय जिसमें किसानों को उनकी उपज का सही मूल्य प्रदान किया जाय।</p>
<p>कृषि जलवायु परिवर्तन के सामाधान हिस्सा अवश्य बन सकती है लेकिन उसके लिए सरकारों को भी फार्म इको-सिस्टम से जुड़ी सेवाओं पर खर्च करना होगा। स्वास्थ्य के लिए हानिकारक खाद्य उत्पादों पर अधिक कर लगाना होगा। पर्यावरण औऱ आर्थिक स्थिरता के लिए सब्सिडी को पुनर्व्यवस्थित करना होगा। नीति निर्धारकों और व्याहारिकता विज्ञान की मदद से ऐसे कई कदम उठाए जा सकते हैं जिससे उपभोक्ता स्वास्थय से परिपूर्ण खाद्य पदार्थों को अपानाएं।</p>
<p>निम्न और मध्यम आय वाले देशो में खराब गवर्नेंस और कमजोर संस्थाएं टिकाऊ विकास के लिए सबसे बड़ी अड़चन बने हुए हैं। इन अड़चनों को पार&nbsp; करने के लिए किसी बड़े आर्थिक निवेश की नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर एक अच्छे नेतृत्व की जरूरत है जो अक्सर देखने को नहीं मिलता है।</p>
<p>दुनिया में हर नौ में से एक इंसान भूखा सोता है और इसका कारण अपर्याप्त खाद्य आपूर्ति नहीं है बल्कि इसका कारण प्राथमिक पोषक तत्व वाले खाद्य उत्पादों को सिस्टम के जरिये महंगा और सामान्य लोगों की पहुंच से दूर कर दिया गया है। &nbsp;एक तिहाई खाद्य पदार्थों की बरबादी होने के बाद भी नीति निर्धारकों का ध्यान सिर्फ उत्पादन बढ़ाने पर ही रहता है। &nbsp;इसके चलते सब्सिडी का अधिकतर हिस्सा किसानों के पास पहुंचने की बजाय कुछ कंपनियों के पास पहुंच जाता है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>कृषि उत्पादकता में बढ़ोतरी की एकतरफा सोच के चलते बड़े पैमाने पर खाली पड़ी भूमि को खेती के काम में लाया गया। इस वजह से सघन खेती की गतिविधियों से पानी, रसायन और एंटीबायोटिक्स का जरूरत से इस्तेमाल किया गया । इसके साथ ही जैविक बदलाव और आनुवंशिकीय संशोधन (जेनेटिकली मोडिफाइड) जैसे विकल्पों को भी बढ़ावा दिया गया।</p>
<p>1970 के बाद से इन प्रक्रियाओं&nbsp; के चलते &nbsp;जंगली स्तनधारी पशु, पक्षियों, उभयचरों और सर्पेंटाइल्स की आबादी में औसतन 68 फीसदी की कमी देखने को मिली है । इस तरह के खतरनाक जैव विविधता के नुकसान के साथ, जीवन का चक्र धीरे-धीरे थम रहा है।</p>
<p>अफसोस की बात है कि कोराना महामारी के आने के बाद से खाद्य, खुदरा, कृषि और प्रौद्योगिकी (FRAT) के क्षेत्रों में ताकत और पैसे का केंद्रीकरण तेजी से बढ़ा है। लगताहै कि आने वाले समय में खाद्य उत्पादन, वितरण और उपभोग के क्षेत्र में कुछ ताकतवर&nbsp; कंपनियों ही दबदबा रहेगा और वही तय करेंगी की बाजार में क्या विकल्प उपलब्ध होंगे। फ्रैट (FRAT) के इन ताकतवर खिलाड़ियों के पास ही वह सब कुछ निर्धारण करने की ताकत होगी जो तय करेगी कि हम &nbsp;क्या खाएं और किसान क्या उत्पादन करे।&nbsp;</p>
<p>यह बात सच है कि कारपोरेट वालंटियरिज्म ने कभी खुद बेहतर काम नहीं किया है इसलिए हमें FRAT उद्योग को जवाबदेह बनाने के लिए एक मजबूत व्यवस्था स्थापित करने की जरूरत है। अगर हम हाल के अनुभवों को देखें तो अधिकांश सरकारों के एंटी ट्र्स्ट नियम और विनियमन संस्थाओं का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है। इस के चलते छोटे और मध्यम आकार के उद्यमों और उत्पादकों को तेजी से बाजार बाहर किया जा रहा है।</p>
<p>आज की खाद्य प्रणालियों में नजर आ रही इन कमजोरियों के पीछे सालों &nbsp;से चल रहा सत्ता का खेल भी है। खाद्य और कृषि व्यापार पर विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) की संधियों के अनुमोदन के दो दशक बाद भी आज दुनिया के सबसे अधिक गरीब शुमार होने वाले वर्गों में ग्रामीण खेतिहर समुदाय की 80 फीसदी की भागीदारी हैं । यह कैसी विडंबना है कि जिन लोगों का काम दुनिया का पेट भरना है, वह खुद इस दुनिया मे सबसे लंबे समय तक भूखे रहने वाले लोगों में से हैं। अब ग्रामीण खेतिहर समुदाय पोषण के लिए बाजारों पर ज्यादा निर्भर होते जा रहे हैं। जहां वह आपूर्ति करने के व्यवधानों और महंगी कीमतों की मार की चपेट में आ रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के चलते उचित खाद्य प्रणालियों को अपनाने के लिए व्यापार संधियों को और भी ज्यादा न्यायपूर्ण बनाने की जरूरत है।</p>
<p>इन बुनियादी मुद्दों को हल करने के लिए किफायती तरीके भी हैं। उदाहरण के तौर पर कुछ विकल्म&nbsp; देखे जा सकते हैं। यह समझते हुए कि बाजार और व्यापार महत्वपूर्ण हैं, हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि किचन गार्डन और बैकयार्ड पोल्ट्री पोषण में सुधार के लिए और ग्रामीण जीवन को बाजार के उतार-चढ़ाव के खिलाफ अधिक लचीला बनाने के लिए&nbsp; सटीक और विश्वसनीय तरीके हैं। घर में ही &nbsp;बगीचा लगाने से खाद्य जरूरतों की आपूर्ति हो सकती है । इसके अलावा इससे घरेलू बचत भी होगी और भोजन की बर्बादी को कम करने में भी मदद मिलेगी ।</p>
<p>इन प्रत्यक्ष फायदों के बावजूद घरेलू खपत के लिए घरेलू बागवानी और उत्पादन के अन्य फायदों के बारे में लोगों के बीच जानकारी की कमी है। इसकी वजह इन इन प्रथाओं पर बहुत कम शोध किया जाना है । खाद्य मुद्दों पर काम करने वाली संस्थाएं ऐसे &nbsp;सस्ते और किफायती उपायों में अधिक निवेश क्यों नहीं करतीं, जो बिना मुश्किल बढ़ाने वाले समझौतों के अच्छा रिटर्न दे सकते हैं।</p>
<p>इसका एक कारण यह है कि ज्यादातर ऐसी संस्थाए पूंजी-प्रधान व्यवसायों का समर्थन करने में व्यस्त हैं । दूसरा कारण यह है कि अधिकतर शिक्षाविद और नीति विशेषज्ञ छोटे किसानों के जीवन के अनुभवों से अनजान हैं, इसलिए वह ऐसे प्रस्तावों के प्रभाव को समझ नहीं पाते हैं। असल में इल तरह की रणनीति के लाभार्थियों के साथ धैर्य के साथ चर्चा करने के लिए कोई भी समय निकालने और विचार करने के लिए तैयार नहीं है।</p>
<p>&nbsp;प्रतिनिधित्व का न होना और समानता की कमी ने दुनिया में एक व्यापक समस्या का रूप ले लिया है। जैसा कि अर्थशास्त्री अरविंद सुब्रमण्यम और देवेश कपूर ने हाल ही में उल्लेख किया है। विकास अर्थशास्त्र (डवलपमेंट इकोनामिक्स) &nbsp;पर विश्व बैंक के प्रतिष्ठित वार्षिक बैंक सम्मेलन के लिए पेपर लिखने वालों में से केवल 7 फीसदी ही विकासशील देशों से हैं। जब बहुत सारे अकादमिक शोध खाद्य मूल्यवर्धिन श्रृंखलाओं के पक्ष में हैं और जो हमेशा बड़े समूहों द्वारा नियंत्रित होते हैं तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि खाद्य प्रणालियां अधिक न्यायपूर्ण नहीं बन पाई हैं। हर हफ्ते खाद्य पदीर्थों और खाद्य प्रणालियों को लेकर सम्मेलन आयोजित किए जाते हैं लेकिन शायद ही पैनल या स्पीकर सूचियों में कोई किसान शामिल होता है।</p>
<p>&nbsp;दानदाताओं और जनहितैषियों द्वारा विकासशील देशों को धन दिया जाता है लेकिन यह राष्ट्रीय खाद्य नीतियों को प्रभावित करते हैं। शायद ही कोई इन देशों में कोई इन जनहितैषियों के वास्तविक उद्देश्यों पर विचार करने को तैयार होता कि क्या इन दानदाताओं का उद्देश्य देश के छोटे किसानों के हितों से मेल खाता है ?</p>
<p>यह ताकतें और मौजूदा परिस्थितियां दुनिया को यह समझाने के हमारे उस काम को और मुश्किल बना देती&nbsp; हैं जिसका मकसद है कि अब वक्त आ गया है कि कहानी को नए सिरे से लिखा जाए। यदि हम वास्तव में ऐसा चाहते हैं कि जो लोग हमारे भोजन का उत्पादन करते हैं, वह अधिक टिकाऊ व स्थायी कृषि पद्धतियों को अपनाएं तो सबसे पहले हमें उन्हें बेहतर जीवन स्तर, बेहतर फसल कीमतें और सम्मान देकर &nbsp;सशक्त बनाना होगा।</p>
<p>&nbsp; <strong><em>(अजय वीर जाखड़ , भारत कृषक समाज के चेयरमैन हैं, वह पंजाब स्टेट फार्मर्स एंड फार्म वर्कर्स कमीशन के चेयरमैन हैं। वह यूएन फूड सिस्ट्स समिट&nbsp; के सस्टेनेबल कंजप्शन के&nbsp; को-चेयर हैं। लेख में व्यक्त&nbsp; विचार उनके निजी&nbsp; विचार हैं )</em></strong></p>
<p>&nbsp;</p>
<p>&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ नीतिगत व्यवस्था में ताकत का असंतुलन ]]></media:description>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कृषि अनुसंधान के स्लो मैजिक  की  गति बढ़ाने की जरूरत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/the-slow-magic-of-agricultural-research-must-accelerate.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 06 Jul 2021 09:27:11 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/the-slow-magic-of-agricultural-research-must-accelerate.html</guid>
        <description><![CDATA[ <div style="display: none;"></div>
<p>इस साल रबी फसलों के रिकॉर्ड उत्पादन अनुमान से भारतीय कृषि क्षेत्र ने महामारी के कारण आए आर्थिक संकट के बीच देश को एक नए भरोसे का संचार किया है। &nbsp;यह बात तो तय है कि सरकार द्वारा कृषि मंत्रालय और किसान कल्याण के लिए बजट में आवंटित किये गये वित्तीय संसाधानों से कहीं अधिक राशि के प्रावधान की जरूरत है। आजकल के दिनों में जहां देश के नागरिकों को बेहतर प्रतिरोधी शारीरिक क्षमता के लिए ज्यादा पौष्टिक और संतुलित आहार का महत्व बहुत बढ़ गया है ऐसे में कृषि क्षेत्र के लिए संसाधनों&nbsp; में वृद्धि ज्यादा अहम हो गई है। पिछले साल के 1,42,763 करोड रुपये के बजटीय आवंटन के मुकाबले &nbsp;मुकाबले चालू वित्त वर्ष (2021-22) का आवंटन 1,31,531 करोड़ रुपये किया गया है। जो पिछले साल से कम है। वहीं पिछले साल के संशोधित बजट अनुमान में यह राशि 1,24,820 करोड़ रुपये रही। दरअसल, कृषि अनुसंधान और शिक्षा, आधुनिक कृषि विकास का आधार है। अनुसंधान के लिए मात्र &nbsp;8,514 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जो पिछले वित्त वर्ष (2020-21) के आवंटन 8,363 करोड़ रुपये &nbsp;की तुलना में एक मामूली वृद्धि है।&nbsp; इसका लगभग 85 फीसदी तो स्टेबलिशमेंट पर ही खर्च किया जाता है जिसके चलते अनुसंधान के लिए बहुत कम राशि बचती है।</p>
<p>असल में "स्लो मैजिक" के रूप में कृषि शोध और अनुसंधान को परिभाषित किया जाता है। इस पर किया गया सार्वजनिक निवेश <span>10 </span><span>से </span><span>15 </span><span>गुना ज्यादा </span><span>रिटर्न देता है। जो </span><span>इनपुट सब्सिडी, बुनियादी ढांचे,सड़कों</span> <span>और</span><span> शिक्षा </span><span>जैसे विकास कार्यों किये गये खर्च के मुकाबले बहुत अधिक है। </span><span>विज्ञान आधारित हरित क्रांति की मदद से</span><span> 1960 </span><span>के दशक के मध्य से न केवल भारत खाद्य उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर बन सका बल्कि</span> <span>इससे भारत का आत्मविश्वास और हौसला भी ब</span><span>ढ़ा</span><span> । इतना ही नहीं इससे राष्ट्र का गौरव भी ब</span><span>ढ़ा</span><span> । कृषि में वैज्ञानिक नवाचारों ने पशु</span><span>पालन</span><span>, </span><span>मत्स्य पालन और बागवानी के क्षेत्रों में</span> <span>व्हाइट</span><span>, </span><span>ब्ल्यू और रेनबो </span><span>क्रांति</span><span>यां आयी </span><span>। इन सराहनीय उपलब्धियों के बावजूद भारत में</span> <span>कृषि अनुसंधान पर सार्वजनिक निवेश पिछले दो दशकों से अधिक समय से जरूरत के </span><span>&nbsp;</span><span>अनुरूप नहीं रहा है।</span> <span>भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद </span><span>(</span><span>आईसीएआर</span><span>) </span><span>की &nbsp;समीक्ष</span><span>ओं</span> <span>में</span><span> लगातार अनुसंधान पर खर्च बढ़ाने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया है। </span><span>कृषि शोध और अनुसंधान के लिए अधिक संसाधनों को लेकर </span><span>गजेंद्रग</span><span>ड़</span><span>कर समिति</span><span> (1972)</span><span>, </span><span>जी</span><span>.</span><span>वी</span><span>.</span><span>के</span><span>. </span><span>राव समिति </span><span>(1988)</span><span>, </span><span>आर</span><span>.</span><span>ए</span><span>. </span><span>माशेलकर समिति </span><span>(2001)</span><span>, </span><span>एमएस स्वामीनाथन समिति </span><span>(2006) </span><span>और टी</span><span>. </span><span>रामासामी समिति </span><span>(2017)</span><span> की रिपोर्ट में कृषि अनुसंधान और विकास पर कृषि जीडीपी का कम से कम </span><span>एक फीसदी </span><span>आवंटन </span><span>करने </span><span>की </span><span>सिफारिश की </span><span>है।</span> <span>लेकिन इन समितियों की सिफारिशों के उलट </span><span>भारत </span><span>में कृषि जीडीपी का </span><span>केवल </span><span>0.39</span><span> फीसदी का आवंटन </span><span>स्तर ब</span><span>हुत कम है। </span><span>जो </span><span>अमेरिका</span><span>, </span><span>ऑस्ट्रेलिया और</span> <span>जापान जैसे देशों द्वारा इस मद के लिए दी जाने वाली की तुलना में </span><span>मात्र </span><span>दस</span><span>वां हिस्सा है और </span><span>चीन की तुलना </span><span>में</span><span> लगभग आधा है। वहीं ब्राजील</span><span>, </span><span>मैक्सिको और मल</span><span>ये</span><span>शिया जैसी भारत के समकक्ष माने जाने वाले देश</span> <span>क्रमश </span><span>लगभग </span><span>1.80</span><span> फीसदी</span><span>, </span><span>1.05</span><span> फीसदी और </span><span>0.99%</span><span> फीसदी राशि इस मद पर खर्च करते</span> <span>हैं</span><span>।</span><span>जब हमारी राष्ट्रीय सीमाओं को सुरक्षित रखने के महत्व को अच्छी तरह से समझा जा रहा है, तब भूख और गरीबी के खिलाफ देश की इस लड़ाई</span> <span>में </span><span>सतत विकास लक्ष्यों </span><span>(</span><span>एसडीजी</span><span>) </span><span>की जो नींव है</span><span>,</span><span> उसमें किसानों के योगदान के महत्व को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। जय जवान</span><span>, </span><span>जय किसान</span><span>, </span><span>जय विज्ञान का नारा ह</span><span>में</span><span> याद दिलाता रहता है कि अगर देश को वैश्विक प्रतिस्पर्धा मे निरंतर बने रहना है और आत्मनिर्भर भारत </span><span>के</span><span> लक्ष्य को हासिल करना है तो कृषि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के लिए </span><span>संसाधन </span><span>ब</span><span>ढ़ा</span><span>ने की ज़रूरत है। &nbsp;किसान कल्याण को सही मायनों </span><span>में</span><span> आकार देने के लिए</span> <span>'</span><span>फार्मर फर्स्ट</span><span>' </span><span>के दृष्टिकोण वाली</span> <span>उपयुक्त नीतियों</span><span>, </span><span>प्रोत्साहनों</span><span>, </span><span>संस्थानों और अप</span><span>-</span><span>स्केलिंग</span> <span>नवाचारों द्वारा समर्थित रणनीति को तैयार किया जाना चाहिए</span><span>। </span><span>&nbsp;</span><span>सरकार को सौंपी ग</span><span>ई</span> <span>परोदा समिति की रिपोर्ट </span><span>(2019) </span><span>में </span><span>इस बात पर जोर दिया गया है। यह रिपोर्ट</span><span> किसानों की आय दोगुनी करने </span><span>की बहुआयामिता वाली सोच </span><span>कृषि को बीसवीं सदी की उत्पादन केंद्रित खेती से</span><span> 21</span><span>वीं सदी की समग्र कृषि</span><span>-</span><span>खाद्य प्रणाली में बदलने की</span> <span>ज</span><span>रूरत को </span><span>पर जोर देती है। </span><span>अनुसंधान को लेकर बदलती सोच की मांग है कि ज्ञान और प्रौद्योगिकी के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए नवाचार पर अधिक जोर देना बहुत महत्वपूर्ण है</span> <span>क्योंकि तभी </span><span>'</span><span>प्लो टू प्लेट </span><span>' </span><span>पर आधारित मूल्यवर्धित मजबूत श्रृंखला </span><span>के लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है।</span><span>आज</span> <span>भारतीय कृषि के सामने उभरती चुनौति</span><span>यों</span><span> से निपटना</span> <span>काफी</span> <span>मुश्किल है। इसलिए हमें एक समावेशी </span><span>एवरग्रीन रिवोल्यूशन (</span><span>सदाबहार क्रांति)</span> <span>की आवश्यक</span><span>ता</span> <span>है। हरित क्रांति की स</span><span>फलता वाले देश के</span> <span>उत्तर</span><span>-</span><span>पश्चिमी इलाकों </span><span>में</span> <span>इसके </span><span>फैलने के कुछ समय बाद ही पता चल गया </span><span>था </span><span>कि हरित क्रांति</span> <span>की प्रौद्योगिकियां प्रभाव में चयनात्मक रही हैं। वर्षा सिंचित क्षेत्र</span><span>, </span><span>संसाध</span><span>नों</span><span> के आभाव </span><span>में</span> <span>गरीब किसानों और भूमिहीन मजदूरों को </span><span>इसमें अनदेखा कर </span><span>दिया गया था। अनुसंधान प्राथमिकता</span><span>ओं</span><span> में नई दिशा की जरूरत और उसमें </span><span>जिसमें </span><span>वर्षा </span><span>आधारित </span><span>क्षे</span><span>त्रों</span><span> को </span><span>पर ध्यान केंद्रित करना जरूरी है इसके लिए ग्रीनिंग द ग्रे एरियाज यानी वर्षा आधारित कृषि क्षेत्रों को अधिक उत्पादन के लिए तैयार करने की जरूरत है। </span><span>आज संसाधनों के आभाव वाले गरीब किसानों की आय </span><span>दो</span><span>गुना करने के लिए ऐसी</span> <span>प्रौद्योगिकी की आवश्यकता है जो लागत में किफायती हों और खेती में </span><span>को लचीला बनाये यानी उसको नुकसान न होने दे। </span><span>वाटरशेड </span><span>मैनेजमेंट, </span><span>कृषि वानिकी</span><span>, </span><span>सिल्वी</span><span>-</span><span>चारागाह प्रणाली</span><span>, </span><span>माध्यमिक और विशेषता आधारित</span> <span>कृषि का महत्व बढ़ गया है। बागवानी</span><span>, </span><span>दलहन</span><span>, </span><span>तिलहन</span><span>, </span><span>मसाले</span><span>, </span><span>औषधीय पौधे</span><span>, </span><span>चारा फसलें</span><span>, </span><span>डेयरी</span><span>, </span><span>पशुपालन</span><span>, </span><span>अंतर्देशीय</span> <span>जलीय कृषि और अन्य गतिविधि</span><span>यां</span><span> जैसे मधुमक्खी पालन</span><span>, </span><span>मशरूम की खेती</span><span>, </span><span>वर्मी</span><span>- </span><span>कंपोस्ट</span><span>, </span><span>मुर्गी पालन</span><span>, </span><span>सुअर पालन को </span><span>शोधकर्ताओं के बीच </span><span>प्राथमिकता मिल रही है।</span></p>
<p>हरित क्रांति के &nbsp;कारण दूसरी पीढ़ी (सेकेंड जेनरेशन) की समस्याएं पैदा हुई हैं। इनमें मृदा क्षरण, मिट्टी की घटती उर्वरता, घटते भूजल स्तर, इनपुट के मुकाबले उत्पादकता में गिरावट और जैव विविधता को नुकसान के चलते पर्यावरण पर प्रतिकूल असर हुआ है। इनके कारण होने वाले पर्यावरणीय दुष्प्रभावों का मुकाबला करने के लिए संरक्षित कृषि, जैविक खेती, सूक्ष्म सिंचाई और पोषक तत्वों की उपयोग दक्षता के माध्यम से सतत खेती की ओर जाने के लिए मूलभूत &nbsp;बदलाव की आवश्यकता है। 'प्रति बूंद अधिक फसल' किसानों के लिए अब नया मंत्र बन गया है। संसाधनों के संरक्षण और क्लाइमेट स्मार्ट प्रौद्योगिकी जैसे जीरो टिलेज, ड्रिप सिंचाई,सूखे, बाढ़, गर्मी, ठंड और कीट-कीटों के लिए प्रतिरोधी फसल किस्में जैसी प्रौद्योगिकियां वैज्ञानिकों का ध्यान अधिक आकर्षित कर रही हैं। एकीकृत कीट और पोषक तत्व प्रबंधन, जैविक पदार्थों का पुनर्चक्रण, जैव उर्वरकों और जैव कीटनाशकों के उपयोग पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है। हाइब्रिड टेक्नोलॉजी, बोयो टेक्नोलॉजी (जीएम फसलें और जीनोम एडिटिंग का उपयोग),संरक्षित खेती, पर्सीजन फार्मिंग, बॉयो इनर्जी,&nbsp; क्रॉप बायोफोर्टिफिकेशन,रिमोट सेंसिंग, सूचना और संचार प्रौद्योगिकी पर केंद्रित इनोवेशन को बढ़ावा देने की जरूरत है। ड्रोन,सेंसर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और इंटरनेट ऑफ थिंग्स में कृषि और खाद्य उत्पादन,पोस्ट-प्रोडक्शन प्रबंधन में दक्षता और कृषि प्रसंस्करण को बेहतर करने की क्षमता है।</p>
<p>कृषि अनुसंधान पर सार्वजनिक व्यय का पहिया पिछले कई दशकों से रुक सा गया है और बरसों से कृषि जीडीपी के 0.3 फीसदी से 0.4 फीसदी के बीच झूल रहा है। इस घिसे-पिटे पारंपरिक दृष्टिकोण से उत्पादन में लंबी छलांग और हमारी उत्पादन प्रणालियों की दक्षता बेहतर होने की संभावना नहीं है। व्यावहारिक नीतियों और माहौल की कमी के चलते कृषि में निजी का निवेश भी अपेक्षा से काफी कम रहा है। नीतियों को कारगर बनाने की कमी, &nbsp;नवाचारों का विस्तार, सार्वजनिक-निजी भागीदारी और आईपीआर सुरक्षा जैसे मुद्दे इसकी वजह रहे हैं। वैसे भी&nbsp; कृषि शोध और अनुसंधान में निजी निवेश एक अचछा पूरक तो हो सकता है लेकिन सार्वजनिक निवेश का विकल्प नहीं हो सकता है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि नये कृषि कानून किसानों को बाजारों से बेहतर ढंग से जोड़ने और निजी निवेश बढ़ाने का अवसर देते हैं। लेकिन इनकी व्यापक स्वीकार्यता के लिए हितधारकों के साथ संवाद और समझ बढ़ाने वाले कदमों की बहुत जरूरत है ।&nbsp;</p>
<p>प्रधान मंत्री ने वर्ष 2024-25 तक भारत को पांच ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने की कल्पना की है। कृषि क्षेत्र को इसमें कम से कम एक ट्रिलियन अमरीकी डॉलर का योगदान करने का लक्ष्य रखना चाहिए। कृषि अनुसंधान में निवेश में बढ़ोतरी से पैदा होने वाली प्रौद्योगिकियों में इसके लिए जरूरी गति प्रदान करने की क्षमता है। इसलिए कृषि अनुसंधान के&nbsp; "स्लो मैजिक" कैरेक्टर की गति तेज करना समय की जरूरत है।</p>
<p style="margin: 0cm; margin-bottom: .0001pt;"><em><strong><span style="font-size: 11.0pt;">( डॉ. आर.एस. परोदा, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के पूर्व डायरेक्टर जनरल और डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च एंड एजुकेशन (डेअर) के पूर्व सचिव हैं। </span></strong></em></p>
<p style="margin: 0cm; margin-bottom: .0001pt;"><span style="font-size: 11.0pt;"><em><strong>रीता शर्मा ,भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय की पूर्व सचिव हैं और उत्तर प्रदेश सरकार के कृषि विभाग की पूर्व प्रमुख सचिव हैं )</strong></em><o:p></o:p></span></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2021/07/image_750x500_60e421e0d7508.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ कृषि अनुसंधान के स्लो मैजिक  की  गति बढ़ाने की जरूरत ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कोविड वैक्सीन और दवाइयों पर ट्रिप्स छूट के भारत के प्रस्ताव पर अनिश्चितता बरकरार]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/Uncertainty-In-Getting-TRIPS-Waiver-Sought-By-India-and-South-Africa-for-Covid-19-Vaccine-and-Medicines.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 17 Jun 2021 12:08:03 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/Uncertainty-In-Getting-TRIPS-Waiver-Sought-By-India-and-South-Africa-for-Covid-19-Vaccine-and-Medicines.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p style="text-align: justify;">&nbsp;जब से विश्व व्यापार संगठन के (डब्ल्यूटीओ) अंतर्गत बौद्धिक संपदा के व्यापार संबंधी पहलुओं (ट्रिप्स) पर समझौते को अपनाया गया है, तब से विश्व भर&nbsp; मे लोगों को दवाइयां सस्ती कीमतों पर न मिल पाना पूरी दुनिया के लिए एक चिंता का सबब बना हुआ है । ट्रिप्स समझौता वह चार्टर है जो बौद्धिक संपदा अधिकारों (आईपीआर) को और मजबूती प्रदान करता है। पिछले 25 सालों में ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे जहां बौद्धिक संपदा धारकों ने अपने पेटेंट या ट्रेड मार्क अधिकार वाले <span>औषधीय</span> <span>उत्पादों</span> के लिए उपयोगकर्ताओं से अधिक मुनाफा लेकर अपने अधिकारों का अनुचित प्रयोग किया। एचआईवी / एड्स महामारी के दौरान बड़ी-बड़ी दवा कंपनियों ने काफी&nbsp; ज्यादा दाम वसूले थे । यह उदाहरण यह स्पष्ट करता है कि कैसे दवा कंपनियों ने दामों के मामले में मनमानी की है। दवा कंपनियों की इस मनमानी पर रोक लगाने के लिए भारत, दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील के नेतृत्व में अन्य विकासशील देशों ने एक प्रस्ताव रखते हुए कहा है कि ट्रिप्स समझौते में अतिरिक्त लचीलापन लाया जाना चाहिए ताकि विश्व व्यापार संगठन के&nbsp; सदस्य देशों को सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को दूर करने में सक्षम बनाया जा सके। डब्ल्यूटीओ के 2001 में दोहा मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में अपनाए जाने से पहले, ट्रिप्स समझौते और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रस्ताव को 60 विकासशील देशों द्वारा समर्थित किया गया था, जिनमें 41 अफ्रीकी देश शामिल थे।</p>
<p style="text-align: justify;">कोविड -19 महामारी के दौरान भी भारत और दक्षिण अफ्रीका से कुछ ऐसी ही प्रतिक्रिया मिली। दोनों देशों ने अक्टूबर 2020 में एक संयुक्त प्रस्ताव पेश किया, जिसे बाद में 61 सदस्यों द्वारा सह-प्रायोजित किया गया। इनमें अफ्रीकी समूह और अल्प विकसित देश (लीस्ट डवलप्ड कंट्रीज यानी एलडीसी) समूह शामिल हैं और इसे विश्व व्यापार संगठन के दो-तिहाई&nbsp; से अधिक सदस्यों का समर्थन प्राप्त है। ट्रिप्स काउंसिल के समक्ष पेश किए गए इस प्रस्ताव में निदान, चिकित्सा विज्ञान, टीका, चिकित्सा उपकरण, व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण और अन्य स्वास्थ्य संबंधित उत्पादों , उपकरणों और उनके काम करने के तरीके और उपकरणों के निर्माण के साधन, संबंधित &nbsp;ट्रिप्स समझौते के कुछ नियमो मे छूट(वेवर) की मांग की गई है ताकि कोरोना महामारी से प्रभावी ढंग से निपटा जा सके ।&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">विश्व व्यापार संगठन को स्थापित करने वाले मरक्काश समझौते के अनुच्छेद नौ के प्रावधानों का इस्तेमाल कर प्रस्ताव में विश्व व्यापार संगठन की जनरल काउंसिल से यह अनुरोध किया है कि अगले तीन साल तक आईपीआर के चारों प्रारूपों को लागू करने और उपयोग करने पर रोक लगा दी जाए। प्रस्तावों में जिन चार प्रारूपों का जिक्र किया गया है, वह चारों कोरोना की रोकथाम या उपचार के लिए कॉपीराइट और उनसे&nbsp; संबंधित अधिकार, औद्योगिक डिजाइन, पेटेंट, और ट्रेड सीक्रेट हैं। विश्व व्यापार संगठन समझौते के नियमों मे छूट दिया जाना कोई नई बात नहीं है। 1995 से लेकर अब तक कुल 9 बार छूट दी जा चुकी है जिनमें से तीन छूट ट्रिप्स समझौते में निर्धारित बाध्यताओं से संबंधित थी।<strong>&nbsp;</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>आईपीआर छूट &nbsp;प्रस्ताव का महत्व </strong></p>
<p style="text-align: justify;">यहां एक महत्वपूर्ण और स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि आखिर ट्रिप्स समझौते में छूट की मांग करते हुए इस प्रस्ताव से क्या अतिरिक्त लाभ हैं जब सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकताएं पूरा करने के लिए पहले से ही ट्रिप्स समझौते में लचीलापन मौजूद है? पहला बड़ा लाभ यह है कि जहां मौजूदा लचीलापन दवाओं पर पेटेंट अधिकारों के प्रयोग से उत्पन्न होने वाली सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं को संबोधित करता है वहीं इस छूट प्रस्ताव में निदान, टीके, सहित सभी चिकित्सा उत्पाद शामिल हैं जिनकी मदद से वायरस को फैलने से रोका जा सकता है और लोगों को इस वायरस से मुक्ति मिल सकती है।</p>
<p style="text-align: justify;">दूसरे शब्दों में कहा जाए तो यह प्रस्ताव विश्व व्यापार संगठन के सदस्यों के आईपीआर संबंधी नियमों में छूट की मांग नहीं करता है। कोरना महामारी का प्रभावी ढंग से मुकाबला करने के लिए कई चिकित्सा उत्पाद अत्यंत आवश्यक हो गए हैं। इनमें से कई उत्पाद, ऐसे हैं &nbsp;जिनके पार्ट्स और कंपोनेंट प्रोप्राइटरी उत्पाद हैं यानी यह पेटेंट या ट्रेड मार्क अधिकारों के तहत आते हैं जो आईपीआर के विभिन्न पारूपों जैसे , कॉपीराइट, ट्रेडमार्क, औद्योगिक डिजाइन और पेटेंट,आदि &nbsp;के माध्यम से सुरक्षित हैं। आईपीआर के यह प्रारूप इन उत्पादों के बड़े पैमाने पर उत्पादन मे रुकावट पैदा करते हैं। उदाहरण के लिए, डायग्नोस्टिक प्लेटफॉर्म के सॉफ्टवेयर सोर्स कोड पर कॉपीराइट उनके बड़े पैमाने पर उत्पादन में प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं जिससे मरीजो को अत्यधिक दाम देने पडेंगे । अगर औद्योगिक डिजाइनों का उपयोग कर चिकित्सा उत्पादों या उनके कंपोनेंट को सुरक्षित किया जाता है तब भी कुछ ऐसी ही परेशानियां खडी &nbsp;हो सकती हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">विश्व की बड़ी दवा कंपनियों के जोर देने के बाद ट्रेड सीक्रेट कानून प्रमुखता से लागू हुए। दवा कंपनियों का कहना था कि इस कानून की मदद से वह मार्केटिंग अधिकार मिलने के पहले पहले होने वाले क्लीनीकल ट्रायल परीक्षण के डेटा को सुरक्षित कर सकेंगे। कंपनियों ने ऐसे कानूनों को विश्व व्यापार संगठन के सभी सदस्य देशों में लागू कराने की मांग इसलिए की गई है ताकि नियामक एजेंसियां उनके डेटा का उपयोग करके उनकी&nbsp; दवाओं के जेनरिक वर्जन की मंजूरी न दे सके। ट्रिप्स समझौता ऐसा करने के लिए सदस्य देश को बाध्य नहीं करता है बल्कि &nbsp;यह समझौता केवल नियामक एजेंसियों द्वारा अनुचित व्यावसायिक उपयोग से क्लिनीकल ट्रायल के डेटा ​​की सुरक्षा को अनिवार्य करता है। ट्रेड सीक्रेट नियमों में अगर छूट मिलती है तो नियामक एजेंसियां इस डेटा का प्रयोग कर जनहित में कर सकती हैं और कम कीमत वाली जेनरिक दवाइयां जल्द से जल्द मार्केट में लाई जा सकती हैं ।</p>
<p style="text-align: justify;">कोरोना के टीकों के उत्पादन की प्रक्रिया ने ऐसे कई उदाहरण सामने लाए हैं जहां कंपनियों ने अपने टीके की सुरक्षा और प्रभावकारिता के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी जनता के सामने सार्वजनिक करने की इजाजत नही दी। नेचर पत्रिका के हाल ही के एक संस्करण में एक संपादकीय ने खुलासा किया है कि दुनिया में बहुत बडी संख्या में लोगों ने कहा है कि वह अपना टीकाकरण नहीं कराएंगे जो काफी चिंताजनक है । इसका अर्थ यह है कि इन लोगों पर कोरोना का खतरा लगातार बना रहेगा जिससे इस महामारी से हमें जल्द छुटकारा मिल पाना काफी मुश्किल होगा लोगों द्वारा टीके को न लगाने के पीछे उनकी कई चिंताए हैं जिनका कारण है टीकों को दी गई वैधानिक मंजूरी में तेजी, दवा उद्योग पर संदेह और वैक्सीन पर फैलाए जा रहे अनेक भ्रम। (https://www.nature.com/articles/d41586-020-02738-y)। अगर कोरोना संबंधी उपकरण और उत्पादों के प्रभाविकता की जानकारी&nbsp; को ट्रेड सीक्रेट में शामिल करने से इंकार कर दिया जाए तो लोगों की चिंताएं दूर की जा सकती हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">कोरोना महामारी में मेडिकल उत्पादों की मांग बहुत तेजी से बढी है जो आने वाले समय मे भी कम होती नही दिख रही है। लेकिन कई देशों में मांग के मुकाबले में आपूर्ति काफी कम रही है। इसलिए इन मेडिकल उपकरणों को ग्लोबल पब्लिक गुड्स की तरह देखा जाना जरूरी है जिनके उत्पादन के लिए नीजी और सार्वजनिक उपक्रम दोनों को साधन दिये जाने चाहिए। हालांकि कई विकासशील देशो में पर्याप्त सरकारी संसाधन और मेडिकल उत्पादों के उत्पादन को सुविधाजनक बनाने और उनकी उप्लब्धता सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त प्रौद्योगिकी दोनों ही मौजूद नही हैं। हमेशा की तरह आईपीआर नियम टेक्नोलॉजी और आवश्यक जानकारी के हस्तांतरण में बाधा बनी हुई है।</p>
<p style="text-align: justify;">भारत जैसे देशों को कोरोना के लिए रेमेडिसविर और टोसीलिज़ुमैब जैसी दवाइयां और वैक्सीन के उत्पादन के लिए आवश्यक तकनीक तक पहुंचने मे बहुत सारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। कुछ कंपनियों को रेमेडिसविर और टोसीलिज़ुमैब का उत्पादन करने के लिए प्रवर्तक कंपनी गिलियड साइंसेज द्वारा स्वैच्छिक लाइसेंस दिया गया लेकिन यहां दो बडी परेशानियां है। पहला यह कि जिन दामों पर यह दवाइयां भारत में उप्लब्ध हैं &nbsp;व काफी महंगे दाम हैं। दूसरा यह कि इन दवाइयों का निर्यात दूसरे देशों में नही किया जा सकता है। ट्रिप्स के पेटेंट प्रावधानों मे छूट मिलने से करोना की दवाइयां सस्ती कीमतों पर उप्लब्ध हो सकेंगी क्योंकि पेटेंट एकाधिकार खत्म होने से बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ जाएगी।&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>ट्रिप्स छूट</strong>&nbsp;<strong>प्रस्ताव</strong> <strong>का</strong> <strong>भविष्य</strong></p>
<p style="text-align: justify;">जैसा कि उपर बताया गया है कि अभी तक इस छूट प्रस्ताव को विश्व व्यापार संगठन के 61 सदस्यों का समर्थन मिला है। हालांकि &nbsp;कुछ प्रभावशाली देशों ने उनकी दवा कंपनियों के हितों को ध्यान में रखते हुए इस प्रस्ताव का विरोध किया है। इस छूट प्रस्ताव का विरोध करने वाले देशों में &nbsp;आस्ट्रेलिया, ब्राजील, कनाडा, यूरोपीय संघ, जापान, नॉर्वे, कोरिया , सिंगापुर, स्विट्जरलैंड, बिट्रेन और अमेरिका शामिल हैं। मई की शुरुआत में अमेरिका ने छूट के प्रस्ताव को अपना समर्थन दिया है और " समाधान खोजने के लिए सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए मसौदे पर आधारित वार्ता " के लिए भी तैयार हो गया। लेकिन बाइडेन-हैरिस प्रशासन का समर्थन केवल को केवल वैक्सीन के लिए आईपीआर में छूट देने के लिए है। प्रस्ताव रखने वाले देशों द्वारा दवाओं और अन्य चिकित्सा उत्पादों के लिए उसका समर्थन नहीं है।</p>
<p style="text-align: justify;">हालांकि कोरोना टीकों पर आईपीआर में छूट को लेकर अमेरिका से समर्थन मिलने के बाद छूट प्रस्ताव के भविष्य को लेकर आशावादी माहौल जरूर बना है लेकिन इसके बावजूद परिस्थिति में ज्यादा बदलाव नहीं आया है। विरोध कर रहे देशों में से आस्ट्रेलिया को छोड़कर किसी भी अन्य देश ने &nbsp;इस प्रस्ताव पर अपना मन नहीं बदला है। वहीं कोरोना वैक्सीन के मुख्य उत्पादक देशों में शामिल चीन और रूस ने इस छूट प्रस्ताव का समर्थन किया है। चीन ने <span>विश्व</span> <span>व्यापार</span> <span>संगठन</span> <span>के</span> सभी पक्षों से विचार- विमर्श में भाग लेने की इच्छा जताते हुए इस प्रस्ताव का समर्थन किया है। चीन का कहना है कि वह दृढ़ता से कोरोना वैक्सीन को एक &ldquo;पब्लिक गुड&rdquo; बनाने के दिशा में प्रयास करता रहेगा और लोगों तक कम दाम मे वैक्सीन उप्लब्ध कराने के लिए अपना योगदान देता रहेगा ।&nbsp; (https://www.fmprc.gov.cn/ce/cgmb/eng/fyrth/t1873782.htm)। राष्ट्रपति पुतिन का कहना है, &ldquo; कोरोना वैक्सीन से पेटेंट सुरक्षा को पूरी तरह से हटाने का जो विचार है वह वाकई में ध्यान देने योग्य है और रूस निश्चित रूप से इस तरह के दृष्टिकोण का समर्थन करेगा"। (https://newsaf.cgtn.com/news/2021-05-07/Putin-backs-russia-waiving-patents-on-its-COVID-वैक्सीन-103m35Qy98s/index.html)</p>
<p style="text-align: justify;">पिछले हफ्ते छूट प्रस्ताव को लेकर विश्व व्यापार संगठन सदस्यों से कुछ सकारात्मक संकेत मिले हैं। ट्रिप्स काउंसिल की औपचारिक बैठक में आठ- नौ सदस्यों ने निर्णय लिया कि वह छूट प्रस्ताव को लेकर मसौदा आधारित बातचीत की शुरुआत करेंगे। इस प्रस्ताव पर अंतिम निर्णय जनरल काउंसिल की बैठक में 21-22 जुलाई को लिया जा सकता है।इस प्रस्ताव को चीन, अमेरिका और रूस जैसे देशों का समर्थन जरूर मिला है लेकिन इससे यह नहीं कहा जा सकता है कि इस प्रस्ताव पर फैसला कितना जल्दी आ सकता है। मसौदा आधारित बातचीत की प्रक्रिया फैसले में होने वाले देरी का एक मुख्य कारण बन सकती है। पहले भी इस तरह की बातचीत में काफी लंबा वक्त लगा था जैसे कि एच.आई.वी / एड्स महामारी के दौरान हुई दोहा डिक्लरेशन को लेकर ट्रिप्स और लोक सवास्थय पर हुई चर्चा।हालांकि, मौजूदा परिस्थिति कुछ अलग है क्योंकि अभी हमारे पास बर्बाद करने के लिए बिल्कुल वक्त नहीं है। पूरे विश्व समुदाय को इस वक्त उचित दामों पर वैक्सीन और दवाईयों की सख्त जरूरत है क्योंकि तभी हम कोरोना महामारी से हकीकत में निजात पा सकते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">अब तक तो विश्व स्वास्थ्य संगठन को भी यह बात समझ आ चुकी है कि जब तक सब सुरक्षित नहीं हो जाते तब तक असलियत में कोई भी सुरक्षित नहीं है । इस प्रस्ताव पर जल्द से जल्द निर्णय तभी लिया जा सकता है जब इस परिस्थिति में समय की नाजुकता हो समझा जाए । सदस्यों द्वारा संचालित किसी भी बहुपक्षीय प्रणाली में विभिन्न मानदंडो की स्थापना के लिए प्रभावी गठबंधन अत्यंत आवश्यक है। विकसशील देश इसे बखूबी समझते हैं क्योंकि पहले भी इन्हें इससे फायदा हुआ है। यह भी एक बड़ा सत्य है कि ऐसे गठबंधनों को एक मजबूत नेतृत्व की आवश्यक्ता होती है, जैसा नेतृत्व भारत और दक्षिण अफ्रीका से विकसशील देशों को मिला। इसलिए इन दोनों देशों को यह सुनिश्चित करना होगा कि इस नाजुक वक्त में उनके उद्देश्य को जल्द से जल्द मंजिल मिले ताकि मानवता का कल्याण हो सके।</p>
<p style="text-align: justify;"><em><strong>( डॉ. बिस्वजीत धर, जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर इकोनॉमिक स्टडीज एंड प्लानिंग के स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज में&nbsp; प्रोफेसर हैं। लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं) </strong></em>&nbsp; &nbsp;&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ कोविड वैक्सीन और दवाइयों पर ट्रिप्स छूट के भारत के प्रस्ताव पर अनिश्चितता बरकरार ]]></media:description>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[सभी को कोविड वैक्सीन मिलने में पेटेंट और ट्रिप्स की  बाधाएं]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/Hurdles-in-Covid-Vaccine-for-All.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 16 Jun 2021 08:35:47 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/Hurdles-in-Covid-Vaccine-for-All.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span>आज पूरी दुनिया जिस महामारी से बार-बार जूझ रही है, उसने पूरी मानवता को झकझोर कर रख दिया है। बीमारी का प्रमाण इतना अधिक हो जाता है कि बड़े-बड़े अमीर मुल्क भी अपनी अपार आर्थिक शक्ति और सुदृढ़ स्वास्थ्य सुविधाओं की व्यवस्था के बावजूद अत्यंत असहाय दिखाई देते हैं। भारत ने स्वयं अप्रैल-मई के माह में ऐसी स्थिति का सामना किया, जब हमें ऑक्सीजन, अस्पताल बेड और यहां तक कि दवाइयों की भारी किल्लत से जूझना पड़ा।</span><br /><span>आज दुनिया में वैक्सीन इस समस्या के समाधान का रामबाण बताया जा रहा है। गौरतलब है कि अमेरिका और इजरायल सहित 6 मुल्कों ने अपनी अधिकांश वयस्क जनसंख्या को वैक्सीनयुक्त करते हुए अपनी जनता को मास्क लगाने की अनिवार्यता से मुक्त कर दिया है। इसलिए माना जाता है कि यदि हम अपनी समस्त जनसंख्या को टीकाकृत कर देंगे तो हम भी इस महामारी से होने वाले स्वास्थ्य और आर्थिक नुकसान को न्यूनतम कर सकेंगे।</span><br /><br /><strong>वैक्सीन का असमान वितरण</strong><br /><br /><span>अगर दुनिया में वैक्सीन की उपलब्धता और वितरण पर नजर डालें तो पता चलता है कि वैक्सीन की अलग-अलग मुल्कों में अत्याधिक असमानता है। ऐसे में यदि दुनिया से इस महामारी को समाप्त करना उद्देश्य हो तो सारे विश्व का टीकाकरण करना जरूरी है। पोलियो उन्मूलन अभियान में ध्येय वाक्य रखा गया कि &lsquo;यदि एक भी बच्चा छूट गया - सुरक्षा चक्र टूट गया&rsquo;। कोरोना महामारी में भी वही बात लागू होती है। समझना होगा कि दुनिया के सभी देश किसी न किसी प्रकार से दूसरों से जुड़े हुए हैं। यदि कोई भी देश पूरी तरह या आंशिक रूप से छूट गया तो यह महामारी फिर से सिर उठा सकती है।</span><br /><span>गौरतलब है कि जब यह महामारी का प्रकोप दुनिया में हुआ और यह लगा कि टीकाकरण इसकी रोकथाम का उपाय हो सकता है, तभी से भारत में स्वदेशी और विदेशी दोनों प्रकार के प्रयासों से वैक्सीन विकास हेतु काम शुरू हो गया था। भारत में दो स्वदेशी प्रयास फलीभूत हो चुके हैं, जिसमें से एक भारत बायोटेक कंपनी द्वारा कोवैक्सीन के निर्माण को लेकर है, जिसके द्वारा अगस्त से दिसंबर के बीच 35 करोड़ वैक्सीन निर्माण का लक्ष्य रखा गया है। और दूसरा स्वदेशी प्रयास हैदराबाद की बायलॉजिकल ई नाम की कम्पनी की वैक्सीन का थी, इसके द्वारा भी इस वर्ष अगस्त और दिसंबर के बीच 30 करोड़ वैक्सीन भारत सरकार को उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है। इसके अतिरिक्त सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया द्वारा ऑक्स्फर्ड यूनिवर्सिटी के सहयोग से भारत में वैक्सीन विकास का एक बड़ा प्रयास हुआ। भारत सरकार के अनुमान के अनुसार अगस्त और दिसंबर के बीच सीरम इंस्टीट्यूट 75 करोड़ वैक्सीन डोज निर्माण करके उपलब्ध करवा देगी। भारत सरकार ने घोषणा की है कि मौजूदा वर्ष के अंत तक संपूर्ण जनसंख्या को टीकाकृत कर दिया जाएगा।</span><br /><br /><strong>लेकिन विश्व में है चिंता व्याप्त</strong><br /><br /><span>भारत में वैक्सीन निर्माण की भरपूर क्षमता और सरकार के प्रारंभ से ही किए गए प्रयासों के कारण भारत में टीकाकरण की गति अन्य देशों की तुलना में अधिक रही है, लेकिन देश की जनसंख्या अधिक होने के कारण संपूर्ण जनसंख्या का टीकाकरण का लक्ष्य थोड़ा दूर है। लेकिन यह सही भी हो कि इस वर्ष के अंत तक हम अपना लक्ष्य पूर्ण कर लेंगे, लेकिन यदि शेष दुनिया की बात करें तो ध्यान में आता है कि भारत समेत दुनिया के कुछ देशों को छोड़कर उनमें वैक्सीन निर्माण की क्षमता ही नहीं है। भारत तो दुनिया भर के लिए वैक्सीन का प्रमुख स्रोत रहा है। लेकिन दूसरे मुल्कों में चिंता व्याप्त होना स्वभाविक ही है, क्योंकि वैक्सीन निर्माण तो कर नहीं सकते लेकिन वैक्सीन खरीदने के लिए दुनिया की चुनिंदा कंपनियों पर उन्हें आश्रित होना पड़ेगा। दुनिया में चल रही पेटेंट व्यवस्था और अन्य प्रकार के बौद्धिक संपदा अधिकारों के चलते कंपनियां अत्यंत महंगी कीमत पर वैक्सीन बेच रही है। गौरतलब है कि जहां भारत में प्रारंभिक दौर में सरकार द्वारा अधिकांशतः मुफ्त और प्राइवेट सेक्टर में 250 रुपये की दर से वैक्सीन की डोज लगाई गई। अभी भी वैक्सीन सरकार द्वारा रुपए 150 रुपये प्रति डोज की दर से ख़रीदी जा रही है फाइजर और मोडरेना सरीखी कंपनियां 20 से 50 डॉलर (यानी 1500 से 3750 रुपये) प्रति डोज की दर से वैक्सीन बेच रही हैं। गरीब देशों की सरकारें अथवा लोग इतनी महंगी वैक्सीन खरीदने में सक्षम नहीं है। सर्व सुलभ वैक्सीन के लिए कीमत सबसे बड़ी बाधा है। समझ सकते हैं कि वैक्सीन की ऊंची कीमत के पीछे पेटेंट और बौद्धिक संपदा अधिकार सबसे बड़ी बाधा है। इस बाधा को पार करने के लिए भारत और साउथ अफ्रीका ने विश्व व्यापार संगठन में यह गुहार लगाई है कि इस महामारी के दौरान इस पेटेंट व्यवस्था से मुक्ति दी जाए। इस गुहार का नाम है &rsquo;ट्रिप्स वेवर&rsquo; यानी ट्रिप्स से मुक्ति।</span><br /><br /><strong>क्या है ट्रिप्स वेवर ?</strong><br /><br /><span>अक्टूबर 2020 में भारत और साउथ अफ्रीका ने संयुक्त रूप से विश्व व्यापार संगठन में प्रस्ताव रखा कि कोरोना महामारी के मद्देनजर इसके लिए वैक्सीन और आवश्यक दवाओं पर एक निश्चित समय (जिसका निर्धारण किया जाए) के लिए ट्रिप्स के प्रावधानों से छूट दी जाए ताकि इन वैक्सीन और दवाइयों का पर्याप्त उत्पादन और उसकी उचित कीमत पर उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके। इस हेतु इस प्रयास को 120 से अधिक सदस्य देशों का समर्थन पहले से ही मिल चुका है। मई माह के अंत में इस हेतु प्रस्तावक देशों की एक बैठक आयोजित हुई जिसमें इन देशों ने एक प्रस्ताव को अंतिम रूप दिया और इस प्रस्ताव में मांग की गई कि कम से कम 3 वर्षों के लिए वैक्सीन और कोविड की दवाइयों हेतु ट्रिप्स के प्रावधानों से छूट दी जाए और इसके साथ ही वैक्सीन और दवाओं के उत्पादन हेतु आवश्यक कच्चे माल प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और व्यापार रहस्य यानी ट्रेड सीक्रेट से मुक्ति भी सुनिश्चित हो।</span><br /><span>समझना होगा कि ट्रिप्स समझौता जहां बौद्धिक संपदा अधिकारों के संरक्षण का प्रावधान देता है वही उसमें यह प्रावधान भी रखा गया था कि स्वास्थ्य संकट, महामारी आदि की स्थिति में ट्रिप्स के प्रावधानों में ढील देकर मानवता के उद्देश से काम किया जा सकता है। साथ ही विश्व व्यापार संगठन के दोहा मंत्रीस्तरीय सम्मेलन में ट्रिप्स और जन स्वास्थ्य संबंधी घोषणा पत्र में इस विषय पर और अधिक स्पष्टीकरण दिया गया था। दोहा घोषणा में यह स्पष्ट किया गया है कि जन स्वास्थ्य संकट, महामारी, भीषण बीमारियों की स्थिति में सदस्य देशों की संप्रभु सरकारों के पास यह अधिकार होगा कि दवाइयों के लिए अनिवार्य लाइसेंस जारी कर सस्ती दरों पर दवाइयां अधिकाधिक मात्रा में उपलब्ध करवाएं।</span><br /><span>यानी कहा जा सकता है कि पेटेंट और अन्य बौद्धिक संपदा अधिकार, प्रौद्योगिकी और कच्चे माल पर एकाधिकार, ट्रेड सीक्रेट जैसे विषयों के कारण गरीब मुल्कों के लिए वैक्सीन और दवाओं की सुलभता में बाधाएं आ रही है। दुर्भाग्य का विषय यह है कि भारत और साउथ अफ्रीका के मानवता हेतु ट्रिप्स वेवर के इन प्रयासों के मार्ग में कुछ यूरोपीय देश और कुछ अन्य विकसित देश बाधाएं खड़ी कर रहे हैं।</span><br /><span>लेकिन संतोष का विषय यह है कि अमरीकी प्रशासन ने अपना पहले का रुख बदला है और अब उन्होंने वैक्सीन के लिए भारत और साउथ अफ्रीका के ट्रिप्स वेवर के प्रस्ताव को समर्थन दे दिया है। आगे आने वाले कुछ महीनों में स्पष्ट हो जाएगा कि क्या कंपनियों के लाभों के सामने मानवता जीतेगी या नहीं। क्या पेटेंट मुक्त वैक्सीन और दवाएं वास्तव में बनाई जा सकेंगी या गरीब मुल्कों को इन कंपनियों से महंगी दवाएं ही खरीदनी पड़ेगी। समय की मांग है कि समाज की सज्जन शक्तियां पेटेंट मुक्त वैक्सीन और दवाइयों को सुनिश्चित करने हेतु जन दबाव बनाकर मानवता की जीत सुनिश्चित करें।</span><br /><em><strong></strong></em></p>
<p><em><strong>(डाॅ. अश्विनी महाजन&nbsp; पीजीडीएवी कालेज, </strong></em><em><strong>दिल्ली विश्वविद्यालय&nbsp; में प्रोफेसर हैं&nbsp; और&nbsp; स्वदेशी जागरण मंच के सह-संयोजक हैं। लेख में व्यक्त विचार उनके निजी&nbsp; हैं )</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ सभी को कोविड वैक्सीन मिलने में पेटेंट और ट्रिप्स की  बाधाएं ]]></media:description>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[राष्ट्रीय ग्रामीण समृद्धि कोष  की स्थापना की जरूरत इससे  कृषि और ग्रामीण क्षेत्र में निजी पूंजी निर्माण बढ़ेगा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/national-rural-prosperity-fund-is-needed-for-improving-private-capital-formation-and-asset-creation-in-rural-areas.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 12 Jun 2021 10:13:47 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/national-rural-prosperity-fund-is-needed-for-improving-private-capital-formation-and-asset-creation-in-rural-areas.html</guid>
        <description><![CDATA[ <div style="display: none;"></div>
<p>ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले&nbsp; हर किसान की आय और उसके समूचे जीवन मे सुधार लाना ही सरकार का सबसे प्रमुख एजेंडा और मुद्दा होना चाहिए भले ही उस किसान के पास जमीन हो या ना हो । अगर ग्रामीण क्षेत्रों की बात की जाए तो कृषि न सिर्फ ग्रामीण क्षेत्रों की सभी प्रमुख गतिविधियों पर प्रभाव डालती है बल्कि उन&nbsp; गतिविधियों से प्रभावित भी होती है। गैर कृषि क्षेत्रों की उन्नति भी कृषि क्षेत्र के विकास पर सीधे तौर पर निर्भर करती है। इसलिए यह कहना पूरी तरह लाज़मी होगा कि किसान और उसके साथ पूरे देश का विकास तभी मुमकिन है जब कृषि क्षेत्र में निर्णायक बदलाव किए जाएं और आधुनिकता लायी जाए । कृषि का भारतीय अर्थव्यवस्था में&nbsp; सबसे अहम योगदान तो है ही<span>&nbsp; साथ ही कृषि क्षेत्र देश के अधिकांश लोगों को रोज़गार भी देता है। भारत में कृषि योग्य प्रचुर मात्रा मे भूमि</span>,<span>कृषि के लिए उपयुक्त जलवायु</span>,<span> बदलते खपत पैटर्न</span>, <span>आय स्तर में हो रही वृद्धि आदि उचित परिस्थितियां मौजद हैं। इसलिए भारत में तेजी से कृषि विकास हो सकता है क्योंकि कृषि उपयुक्त परिस्थितियां भारत को इसके लिए सक्षम बनाती हैं।</span></p>
<p>कृषि विकास का किसान पर स्पष्ट तौर पर सकरात्मक प्रभाव होता है। इसके साथ ही किसान अतिरिक्त आय भी कमा सकते हैं जिस से उनका आत्मविश्वास बढ़ता है और&nbsp; एक खरीदार के तौर पर उन्हें सक्षम भी बनाता है । भारत में विविध और उपयुक्त जलवायु परिस्तिथियां होने के कारण भारत के पास ग्लोबल मार्केट में अन्य प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले में कृषि उत्पादन के नज़रिए से&nbsp; एक अतिरिक्त लाभ है। कुल मिलाकर देखा जाए तो &nbsp;इन परिस्थितियों के चलते भारत दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य आपूर्तिकर्ता बन सकता है।</p>
<p>इसलिए मेऱा मानना है कि इसलिए मेऱा मानना है कि सरकार को ग्रामीण क्षेत्रों में निजी पूंजी निर्माण और संपत्ति निर्माण में सुधार के लिए "राष्ट्रीय ग्रामीण समृद्धि कोष" स्थापित करना चाहिए। यह फंड ग्रामीण और कृषि क्षेत्र में ग्रामीण शौचालयों के निर्माण, ग्रामीण आवास, किसान सम्मान निधि, और विभिन्न सब्सिडी और हस्तांतरण भुगतान योजनाओं जैसे रियायती ब्याज योजना, इनपुट के लिए सब्सिडी जैसी मदों के लिए आवंटित धन को इकट्ठा&nbsp; करके बनाया जा सकता है। इस फंड द्वारा किए गए निवेश से होने वाली आय का उपयोग ग्रामीण कृषि और गैर-कृषि क्षेत्र के ऋणों के लिए सार्वभौमिक ऋण डिफ़ॉल्ट गारंटी प्रदान करने के लिए किया जा सकता है। बिना किसी चूक&nbsp; या जोखिम के गाँव में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति ऋण के लिए योग्य हो जाएगा और बैंक उन्हें आवश्यक ऋण सुविधाएं देने में संकोच भी नहीं करेंगे। इसके अलावा, डिफ़ॉल्ट गारंटी के साथ ग्रामीण ऋण पोर्टफोलियो के लिए किसी जोखिम लागत की आवश्यकता नहीं होगी और बैंक अपने ग्रामीण उधारकर्ताओं को ब्याज दर कम करके लाभ भी दे सकेंगे । यह व्यवस्था ग्रामीण कृषि और गैर-कृषि क्षेत्र में निजी पूंजी निर्माण और संपत्ति निर्माण के उच्च स्तर की सुविधा प्रदान करेगी जिससे बेहतर रोजगार और कमाई के अवसर पैदा हों सकेंगे । ऋण सुविधाओं तक आसान और परेशानी मुक्त पहुंच के साथ किसानों के पास बाजार दरों पर इनपुट खरीदने , स्वच्छता और अपने आवास सहित अपने रहने की स्थिति में सुधार करने की क्षमता होगी।कृषि विकास के प्रति दृष्टिकोण हमेशा भागीदारी और समावेश पर केंद्रित होना चाहिए। इसलिए समूह आधाऱित दृष्टिकोण सबसे अच्छा माध्यम है&nbsp; जैसे कि सहकारी समितियां। इस तरह की सोच औऱ रणनीति के बल पर ही कृषि विकास&nbsp; के आंदोलन ने लंबी यात्रा तय की है । इसलिए कृषि विकास के लिए नए मॉडल बनाने में समूह आधारित संगठन&nbsp; एक&nbsp; मुख्य रूप में भूमिका निभा सकते हैं।</p>
<p>कृषि में निवेश को बढ़ाकर कृषि स्तर पर समूह संपत्ति का निर्माण करके किसानों की भूमि को अगर पूल किया जाए तो कृषि में निवेश में लगातार हो रही गिरावट की प्रवृत्ति को उल्टा किया जा सकता है। इसके लिए किसानों के ऋण भार को एक व्यक्ति से एक पूरे समूह में स्थानांतरित करना सबसे उपयुक्त उपाय होगा</p>
<p>मौजूदा वक़्त मे कृषि एक बड़ी चुनौती का सामना कर रही है। जहां पहले खेती&nbsp; निर्वाह के लिए की जाती थी वहीं अब खेती करने का मकसद ज्यादतर लाभ कमाना ही होता है।&nbsp; इसलिए अगर ऐसे हालात बने रहे तो करीब आधे किसान खेती के व्यवसाय से मुंह मोड लेंगे । पहले, व्यावसायिक पदानुक्रम में खेती को शीर्ष दर्जा दिया गया था पर आज इसका स्थान सबसे नीचे है। इसका मुख्य कारण यह है कि कृषि में पूंजी पर बहुत कम या फिर ज्यादातर मामलों में नकारात्मक रिटर्न मिलता है।</p>
<p>इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, इस स्थिति पर हमें जल्द से जल्द ध्यान देना होगा।&nbsp; इन समस्याओं से निजात पाने के लिए कई किसान आंदोलन पर बैठ जाते है जबकि कई किसान इन मुसीबतों से जूझते- जूझते आत्महत्या कर लेते हैं, जो बहुत ही दुखद है। कृषि और ग्रामीण क्षेत्र की समस्याओं के समाधान के लिए सभी हितधारकों यानी सरकार, उद्योग और नागरिक समाज संगठनों को एक साथ आना ही होगा। यहां कृषि क्षेत्र से लाभान्वित होने वाले उद्योग की भूमिका (फसल उगने से पहले और कटाई के बाद , इन दोनों चरणों में) बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण है ।</p>
<p>लगातार बढ़ रही जनसंख्या, लोगों की बढ़ती आय और बदलते आहार पैटर्न से भोजन और अन्य कृषि उत्पादों की मांग काफी&nbsp; बढ़ गई है। लेकिन इसके साथ ही, आनुवंशिक विविधता पर खतरा लगातार बढ़ रहा है । वहीं भूमि और जल संसाधनों के क्षरण के साथ प्राकृतिक-संसाधनों का आधार भी खतरे में है। जैविक और सूचना विज्ञान में लगातार हो रही&nbsp; प्रगति इन सभी संसाधनों की कमी को दूर करने के लिए काफी संभावनाएं प्रदान करती है। हालांकि, इससे होने वाले लाभ को छोटे पैमाने के किसानों को उपलब्ध कराना एक बड़ी चुनौती है।</p>
<p>घरेलू और अंतरराष्ट्रीय शहरी उपभोक्ता, विविध, उच्च गुणवत्ता और सुरक्षित खाद्य पदार्थों की मांग करके खेती में चल रही बदलाव की लहर को और तेज कर हैं। वहीं इन मांगों के जवाब में अंतरराष्ट्रीय व्यापार काफी तेजी से बढ़ रहा है। बढ़ता अंतरराष्ट्रीय व्यापार अपने साथ कई&nbsp; वैश्विक शासन संधियों और नियामक ढांचे का एक सेट भी ला रहा है जिसके&nbsp; कार्यान्वयन के लिए स्थानीय क्षमता की आवश्यकता होती है। लेकिन यहाँ सबसे बड़ी चुनौती यह है कि आखिर इन पारियों का लाभ कैसे&nbsp; उठाया जाए ताकि छोटे और गरीब किसानों को लाभ मिले।</p>
<p>हमारे देश के अधिकांश उच्च क्षमता वाले कृषि क्षेत्र अब भूमि और जल संसाधनों के प्रयोग की उस सीमा तक पहुंच गए हैं जहां से इन संसाधनों का&nbsp; दोहन इसके आगे नही किया जा सकता है। ऐसे भूमि के उपयोग को बंद करना , कई क्षेत्रों में&nbsp; हो रही पानी की कमी, कम रिटर्न और बाहरी इनपुट के कारण होने वाले नकारात्मक पर्यावरणीय प्रभावों का उल्लेख नहीं करना ,आदि चुनौतियों का मतलब है कि इन क्षेत्रों में भविष्य का विकास काफी हद तक ज्ञान के साथ इनपुट के प्रतिस्थापन पर निर्भर करेगा। यानी कि इन क्षेत्रों में भविष्य में कृषि विकास तेजी से ज्ञान आधारित होगा और आने वाले दशकों में कुल कारक उत्पादकता में वृद्धि को अब विकास का प्रमुख स्रोत बनाने की आवश्यकता होगी। सरकार को कृषि उन्नति को विकास के एजेंडे में शीर्ष पर रखना होगा। लेकिन केवल व्यापार' विकास के लिए पर्याप्त नहीं होगा। कृषि उत्पादन, विविधीकरण और प्रतिस्पर्धात्मकता को प्रभावित करने वाले गतिशील परिवर्तनों के लिए मौजूदा कार्यक्रमों और योजनाओं के गहन, ईमानदार और निष्पक्ष विश्लेषण की आवश्यकता है ताकि भविष्य के कृषि का समर्थन करने के लिए बेहतर मार्ग विकसित किया जा सके।</p>
<p>कृषि क्षेत्र के पास भारत को विश्व की अग्रणी कृषि अर्थव्यवस्था में बदलने की क्षमता है। हालांकि, इस क्षेत्र में सतत विकास को प्राप्त करने के लिए एक समग्र और एकीकृत दृष्टिकोण की ज़रूरत है। साथ ही कृषि के प्रति दृष्टिकोण में भी&nbsp; एक आदर्श बदलाव की आवश्यकता है। कृषि के प्रति एक वैज्ञानिक और अभिनव दृष्टिकोण से ही हम वैश्विक स्तर पर लागत और गुणवत्ता के मामलों मे मुख्य प्रतिस्पर्धी के तौर पर उभर सकते हैं।</p>
<p>इस फंड का&nbsp; निवेश आय़ अर्जित करने के सभी प्रकार के ग्रामीण कृषि और गैर-कृषि क्षेत्र के ऋणों के लिए सार्वभौमिक ऋण डिफ़ॉल्ट गारंटी प्रदान करने के लिए उपयोग किया जा सकता है। &nbsp;इस तरह बिना किसी चूक और जोखिम के, गाँव में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति ऋण के योग्य हो जाएगा और बैंक भी उन्हें आवश्यक ऋण सुविधाएं देने में संकोच नहीं करेंगे। इसके अलावा, डिफ़ॉल्ट गारंटी के साथ ग्रामीण ऋण पोर्टफोलियो के लिए कोई जोखिम लागत नहीं होगी और बैंक अपने ग्रामीण उधारकर्ताओं को कम ब्याज दर लोन देकर लाभ &nbsp;दे सकते हैं। यह व्यवस्था ग्रामीण कृषि और गैर-कृषि क्षेत्र में निजी पूंजी निर्माण और संपत्ति निर्माण के उच्च स्तर की सुविधा प्रदान करेगी जिससे बेहतर रोजगार और कमाई के अवसर पैदा होंगे। इस तरह ऋण सुविधाओं में आसानी औऱ परेशानी मुक्त होगी साथ ही किसानों को खेती में लगने वाले &nbsp;लागत सामग्री को &nbsp;बाजार दरों पर खरीदने की क्षमता होगी,जीवन स्तर में सुधार होगा, उनके घर साफ सुथरे स्वच्छ होगे ।</p>
<p><em><strong>( डॉ. डी.एन. ठाकुर एनसीडीसी के पूर्व डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर हैं। सहकारी क्षेत्र और एग्रीकल्चर फाइनेंसिंग के एक्सपर्ट हैं, लेख में व्यक्त विचार उनके निजी&nbsp; विचार हैं )</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ राष्ट्रीय ग्रामीण समृद्धि कोष  की स्थापना की जरूरत इससे  कृषि और ग्रामीण क्षेत्र में निजी पूंजी निर्माण बढ़ेगा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[विश्व पर्यावरण दिवस: आर्थिक विकास के लिए ईकोसाइड &amp;#45; मानव जीवन भी खतरे में]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/World-Environment-Day-Imbalance-Economic-Development-has-its-own-Cost.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 05 Jun 2021 07:32:44 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/World-Environment-Day-Imbalance-Economic-Development-has-its-own-Cost.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><strong>&nbsp;</strong></p>
<p>जिस तरह से धरती की हालत इंसानों की वजह से खराब हो रही है, उससे लगता है, कि इंसान ज्यादा दिन धरती पर रह नहीं पाएंगे| कुछ सदियों में धरती की हालत इतनी खराब हो जाएगी, कि लोगों को स्पेस में जाकर रहना पड़ेगा | सबसे बड़ा खतरा तकनीकी आपदा का है| ये तकनीकी आपदा जलवायु परिवर्तन से जुड़ी होगी | इसके अलावा दो बड़े खतरे हैं, इंसानों द्वारा विकसित महामारी और देशों के बीच युद्ध| इन सबको लेकर सकारात्मक रूप से काम नहीं किया गया तो इंसानों को धरती खुद खत्म कर देगी या फिर वह अपने आप को नष्ट कर देगी | यह भी हो सकता है कि इंसानी गतिविधियों की वजह से धरती पर इतना अत्याचार हो कि वह खुद ही नष्ट होने लगे|</p>
<p>आर्थिक विकास की तुलना में अर्थशास्त्रियों ने समृद्धि को पूरी तरह से परिभाषित नहीं किया | आजकल एक शब्द, सतत विकास, नीति निर्माताओं के शब्दकोष में मुख्य रूप से सम्मलित है। अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों के सतत विकास के लेखा जोखा में कहीं न कहीं ऐसे शब्द उपयोग में लाये जाते है, जिसमें पेड़ पौधों, जानवरों एवं मानवीय जीवन को बिकाऊ बना दिया है। जो व्यवस्था दुनिया को स्थायी समृद्धि देती है, उसको नकार कर,अर्थशास्त्री, नीति निर्माता, विश्व के शीर्ष स्तर के नेता&nbsp; पूरी तरह विनाश पर आधारित अर्थव्यवस्था पर ध्यान देते हैं। यही कारण है, कि मौजूदा महामारी के दौरान दिए गए आर्थिक प्रोत्साहनों ने बड़े अमीरों को और ज्यादा अमीर किया है&nbsp; क्योंकि अधिकतर धन वित्तीय मंडियों में जाता है, जहां से यह अत्यंत धनाढ्य वर्ग के खजाने में पहुंच जाता है। अनुमान है कि इस अवधि में विश्व के चोटी के अमीरों की कुल धन-दौलत में हज़ारों करोड़ डॉलर का इजाफा हुआ है। यानी इस अर्थव्यवस्था के विकास मॉडल में गरीबों के स्तर में कोई सुधार हुआ हो इसका कोई प्रमाण नहीं दिखता है | इसका कारण औद्योगिक घरानो की आय पूरी तरह से उन प्राकृतिक संसाधनों के दोहन पर निर्भर है जिनसे गरीब आदमी इन प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के साथ अपनी रोज़ी रोटी को जुटा पाता है। आज पूरे विश्व में धरती को लूटने की होड़ लगी हुई है। बिल गेट्स से लेकर अडानी, अंबानी सबकी निगाह देश की जैवविविधता को लूट कर कैसे अपना साम्राज्य स्थापित किया जाय इस पर है। इसीलिए कृषि से लेकर खनिज, पानी यहां तक की बिल गेट्स ने तो सूर्य धरती पर आने वाली सूर्य की रोशनी तक के रोकने का प्लान बना कर रखा है। किसानों की आमदनी बढ़ाने के नाम पर औद्योगिक कृषि के माध्यम से आनुवंशिक रूप से संशोधित बीज, रसायन आदि के कारण किसान आत्महत्या करने पर मजबूर है। 2005 से 10 साल की अवधि में भारत में किसान की आत्महत्या दर 1.4 &nbsp;और 1.8 प्रति 100,000 कुल जनसंख्या के बीच थी। 2017 और 2018 के आंकड़ों में प्रतिदिन औसतन १० से अधिक आत्महत्याएं दिखाई गईं। जबकि जो किसान प्रकृति पर आधारित खेती कर रहे है, उनकी संख्या नगण्य है। आज बिल गेट्स अमेरिका में सबसे ज्यादा कृषि भूमि के मालिक है। यह सब क्या दर्शाता है, कि आने वाले समय में आम जनता को बिल गेट्स से खाने के लिए अनाज उनके मनमाने मूल्य पर खरीदना होगा। कुल मिलाकर आम जन का पूरा पैसा ऐसे ही उद्योगपतियों की जेब में जाएगा |&nbsp;</p>
<p>कुछ इसी तरह का हाल बड़े उद्योगों सीमेंट, स्टील, एल्युमीनियम, पेट्रोलियम आदि&nbsp; का है | भारत में 89 तरह के खनिज पदार्थों का उत्पादन होता है, जिसमे 4 खनिज ईंधन, 11 धातु, 52 गैर धातु, 22 लघु खनिज है। इसमें 30 से 40 फीसदी आयरन, 20 से 30 फीसदी एलुमिना, इसी तरह लाइम स्टोन, क्रोमाइट, कोयला आदि का भी कुछ हिस्सा निर्यात किया जाता है। इसका मतलब देश के खनिज के साथ साथ जल, जंगल और जमीन को भी बेचा जाता है।</p>
<p>2014 में, कॉन्स्टैंज़ा और वैज्ञानिकों के एक अलग समूह ने पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के वैश्विक मूल्य का अनुमान 125 ट्रिलियन&nbsp; डॉलर और 145 ट्रिलियन डॉलर प्रति वर्ष के बीच लगाया था। उन्होंने यह भी पाया कि पारिस्थितिक तंत्र सेवाएं "वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद के रूप में मानव कल्याण के लिए दोगुने से अधिक" का योगदान करती हैं। इसके अलावा 1997 से 2011 तक पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के नुकसान का अनुमान लगभग 20 ट्रिलियन डॉलर प्रति वर्ष आँका गया था । इन आकड़ों से स्पष्ट है कि उद्योगपतियों ने जीवन का मूल्य कागजी मुद्रा के लिए कितना और किस तरह से निर्धारित किया है।</p>
<p>प्रकृति के द्वारा प्रदत्त संसाधनों पर सबका सामान हक़ होना चाहिए।&nbsp; लेकिन ऐसा न होकर कुछ चुनिंदा लोगों को ही लाइसेंस प्रक्रिया के अंतर्गत अधिकार प्राप्त है। पारिस्थितिक सम्पदा की लूट के कारण ही विश्व में गरीबी और अमीरी के बीच अंतर बढ़ता जा रहा है। ऑक्सफैम की &lsquo;इन्क्युवैलिटी वायरस रिपोर्ट<span>&rsquo; </span>का खुलासा है, कि महामारी के दौरान भारत के खरबपतियों की दौलत में 35 फीसदी का इजाफा हुआ है। यानी आबादी के शीर्ष एक फीकदी भाग के पास निचले स्तर पर आने वाले 95.3 करोड़ लोगों के धन के बराबर है। यह धन उन गरीब व आदिवासियों के जीवन का मूल्य हैं | जिसको उद्योगपतियों ने सरकारों की नीतियों के कारण इकठ्ठा कर लिया है। स्पष्ट है कि वर्तमान आर्थिक विकास का मॉडल सिर्फ प्रकृति का दोहन करके गरीबो की रोटी उनके मुंह से छीनकर उनको मौत के मुंह में धकलने के लिए बना है |</p>
<p>पृथ्वी पर जीवन को संरक्षित करने के लिए इस वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस 2021 का विषय "पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली" है। इस थीम के अंतर्गत पेड़ उगाना, शहर को हरा-भरा करना, नदियों की सफाई करना&nbsp; शामिल है। इस अवसर पर संयुक्त राष्ट्र पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली 2021- 2030 दशक के औपचारिक शुभारंभ भी करेगा। पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली तभी संभव है जब तक हम पूरी तरह से अपनी जरूरतों के लिए प्रकृति द्वारा दिए गए संसाधनों पर निर्भर नहीं होते क्योंकि कार चाहे पेट्रोल या बिजली से चले पर्यावरण को नुकसान दोनों से होना है। अगर देखा जाय तो बिजली उत्पादन में पर्यावरण को नुकसान कहीं ज्यादा है। इसलिए बिजली या बैटरी से चलने वाले वाहन पर्यावरण हितैषी हो ही नहीं सकते। यही कारण है कि केवल खाद्य उत्पादक/खाद्य की खोज करने वाले समाज ही पृथ्वी पर पर्यावरण हितैषी व टिकाऊ थे। इस तरह का समाज केवल शारीरिक कार्य पर निर्भर था।</p>
<p>आज आर्थिक विकास के कारण, प्रकृति के संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ (इंटरनेशनल यूनियन फॉर कन्जर्वेशन<span> &nbsp;</span>ऑफ़ नेचर) के अनुसार दुनिया भर में 37,400 प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर हैं। इसमें स्तनधारी 26 फीसदी, उभयचर 41 फीसदी, पछी 14 फीसदी, कोनिफर 34 फीसदी शामिल हैं। इसका मात्र एक कारण मानवीय जीवन के लिए इनके महत्व को अनदेखा कर देना है। अतः हमको अब धरती पर रहने वाले प्रत्येक जीव की रक्षा के लिए कार्य करने होंगे इसके लिए सहअस्तिव्त के विचारों को अर्थ यानी कागज़ की मुद्रा से ज्यादा महत्व देना होगा ।&nbsp; हर एक प्रजाति धरती की कुल प्रजातियों के जीवन व भाग्य का परोक्ष व अपरोक्ष रूप से निर्धारण करती है। इसके लिए जंगलों और जैवविविधता को बचाने के लिए संरक्षित क्षेत्र घोषित करना ही काफी&nbsp; नहीं होगा | बल्कि मानवीय आधार पर इनको मानव जीवन के बराबर का दर्ज़ा देना होगा।</p>
<p>इस आर्थिक दौड़ के समय कुछ लोग ऐसे भी है | जो धरती पर जीवन को सर्वश्रेष्ठ मानते है। उन्ही में एक, जादव पेयांग, जिनको फारेस्ट मेन ऑफ़ इंडिया के नाम से जाना जाता है, उन्होंने अकेले 1360 एकड़ में वन्य जीवों को बचाने के लिए जंगल लगाया | जिसमे हाथी, टाइगर, हिरन व अन्य तरह के तमाम पंछी रहते हैं। लेकिन देश में इनको कोई नहीं जानता, जबकि जिन लोगों ने देश में धरती की कोख पाताल तक खाली कर दी , उनको हर कोई जानता है। यह आज की अर्थव्यवस्था का मॉडल ही है, जिसने धरती लूटने वालों को विश्व का परोपकारी माना है।</p>
<p>जंगली जानवरों और पौधों की प्रजातियों ही नहीं है , जिनका जीवन बाजार में है। मानव जीवन भी एक आर्थिक समीकरण का हिस्सा है। जीवमंडल में रहने वाली सभी प्रजातियों एक आर्थिक संसाधन नहीं हैं जिसे मौद्रिक मूल्य दिया जाए। जीवन कोई वस्तु नहीं है। एक आर्थिक संसाधन के रूप में जीवमंडल की बात करना भी अतार्किक है। हम पृथ्वी पर एक जीवमंडल के भीतर रहते हैं जिसने हमें बनाया है और हमारी जीवन समर्थन प्रणाली प्रदान करता है, जिसके बिना मनुष्य जीवधारियों में प्रथम स्थान पर नहीं होता |</p>
<p>यदि वर्तमान विकास की प्रक्रिया के अंतर्गत हम जैवविविधता को ऐसे ही नष्ट करते रहे, तब मानव प्रजाति भी&nbsp; विलुप्त हो जाएगी। वैसे भी हमको यह ध्यान रखना चाहिए कि प्रकृति को मानव की आवश्यकता नहीं होती है। हमारा अस्तित्व प्रकृति पर निर्भर करता है, इसलिए हमको इसकी आवश्यकता है। अतः विकास ऐसा हो, जिससे जीवमंडल सुरक्षित बना रहे |</p>
<p><em><strong>(गुंजन मिश्रा, पर्यावरणविद हैं , भारत में ईकोसाइड के मेंबर हैं और बुंदेलखंड उनका कार्यक्षेत्र है। लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं )</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ विश्व पर्यावरण दिवस: आर्थिक विकास के लिए ईकोसाइड - मानव जीवन भी खतरे में ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[पेटा विवाद निराधार : भारत में दूध उत्पादन और पशु कल्याण  हैं एक दूसरे के पर्याय]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/PETA-Controversy-MILK-PRODUCTION-AND-ANIMAL-WELFARE-ARE-SYNONYMOUS-IN-INDIA.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 02 Jun 2021 09:32:12 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/PETA-Controversy-MILK-PRODUCTION-AND-ANIMAL-WELFARE-ARE-SYNONYMOUS-IN-INDIA.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>&nbsp;पीपुल फॉर एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स (पेटा) ने सुझाव दिया है कि गुजरात कोऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन (जीसीएमएमएफ) यानी अमूल को प्लांट बेस्ड डेयरी (पौधों से तैयार होने वाला दूध) डेयरी चलानी चाहिए । पेटा के इस सुझाव के बाद पेटा और अमूल के बीच एक विवाद छिड़ गया। जाहिर सी बात है पेटा का जो सुझाव है उसका भारतीय संदर्भ में कोई अर्थ नहीं है और यह बेतुका है।&nbsp; प्रश्न उठता है कि पेटा ने प्लांट बेस्ड 'डेयरी' चालू करने के&nbsp; लिए आखिर कहा क्यों ? प्लांट बेस्ड प्रोडक्ट क्यों नहीं ? जाहिर है कि डेयरी शब्द उत्पाद की तुलना में अधिक प्रभावी है।</p>
<p><strong>स्विच ओवर की अवधारणा</strong></p>
<p>इस पूरे मसले की तह में जाने के लिए हमें 'स्विच ओवर' अवधारणा की उत्पत्ति को समझने की जरूरत हैं । साल 2017 में स्वीडन की एक ओट मिल्क कम्पनी ओटली ने एक डेयरी किसान को प्लांट बेस्ड डेयरी शुरू करने मे उसकी सहायता की । किसान ने प्लांट आधारित डेयरी शुरू की और उसने देखा कि उसका मुनाफा काफी बढ़ गया । यह जानकर उसे काफी आश्चर्य हुआ । &nbsp;धीरे &ndash;धीरे अन्य डेयरी किसानों भी प्लांट आधारित की ओर बढने लगे। इसके बाद प्लांट बेस्ड डेयरी को बढ़ावा देने के लिए &nbsp;अमेरिका &nbsp;के लॉग, काशी और मियोको की क्रीमरी द्वारा भी कुछ&nbsp; इसी तरह की पहल की गई थी। यहां गौर करने वाली बात यह है कि उन्होंने डेयरी उत्पादों की प्रतिस्पर्धा में अपने गैर डेयरी उत्पाद को लांच किया । लेकिन ध्यान देने योग्य बात यह है कि&nbsp; प्लांट आधारित डेयरी की शुरूआत किसानों और कम्पनियों ने शाकाहार (वेगन) के प्रति लगाव के लिए नहीं बल्कि मुनाफा कमाने के लिए की । वहीं कई डेयरी कंपनियों ने गैर डेयरी&nbsp; उत्पाद पर दूध शब्द का उपयोग कर उपभोक्ताओं को कथित रूप से भ्रमित करने के लिए ऐसे ब्रांडों के खिलाफ मुकदमा दायर किया ।</p>
<p>इस प्रकरण से दो मुद्दे उभर कर सामने आते हैं । पहला यह कि जिस किसान का ऊपर उल्लेख किया गया है, वह बड़े जोत वाला किसान था और उसने बड़ी संख्या में गाय पाल रखी थी । जाहिर है कि कंपनियां ऐसे ही किसानों का समर्थन करके अपने उत्पाद लांच कर सकती हैं। हो सकता है कि किसान ने अपनी गायों की स्लाटरिंग के बाद हासिल पूंजी का उपयोग कर प्लांट बेस्ड डेयरी और उसके लिए जरूरी खेती शुरू कर की।</p>
<p><strong>भारतीय डेयरी क्षेत्र</strong></p>
<p>भारत में स्थिति बहुत अलग है भारत में दूध उत्पादन अभी भी घरेलू गतिविधि है। अगर आंकड़ों की बात करें तो&nbsp; जहां तक मेरी जानकारी है उसके मुताबिक भारत में&nbsp; ऐसे&nbsp; 7.5 करोड़ डेयरी किसान हैं। उनके पास 10 या उससे भी कम मवेशी है और परिवार के लोग ही इस काम को खुद करते हैं। अमेरिका, यूरोप, इज़राइल, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड जैसे देशों के डेयरी फार्म की तुलना में यह किसान बहुत छोटे हैं। देश के इन किसानों के पास कुल &nbsp;19.29 करोड़ पशु हैं। जिसमें 10.98 करोड़ भैंस हैं। देश का दूध उत्पादन वित्त वर्ष 2020 में 19.88 करोड़ टन रहा जो 2019 के 18.77 करोड़न टन की तुलना में 5.91 फीसदी अधिक था। भारत में उत्पादित दूध की वैल्यू करीब नौ लाख करोड़ रुपये सालाना है जो देश के सकल घरेलू उत्पाद की 4.2 फीसदी है। यह आंकड़े इस बात को स्पष्ट करते हैं कि भारत में दूध उत्पादन उन छोटे दूध उत्पादकों के लिए कितनी महत्वपूर्ण आर्थिक गतिविधि है जो वित्तीय सुरक्षा प्राप्त करना चाहते हैं । इसमें कोई दो राय नही है कि केवल फसल उत्पादन पर पूरी तरह से निर्भर रहना वित्तीय तौर से एक अच्छा विकल्प नहीं है। मौसम की बेरुखी जैसी गंभीर समस्याओं ने कुछ किसानों को आत्महत्या के लिए मजबूर कर दिया। इसलिए कुछ गायों या भैंसों को लेकर मिश्रित खेती करने वाले किसान सुरक्षित रहे हैं क्योंकि दूध से उन्हें दैनिक आय मिलती है।</p>
<p>तो इन हालात में कोई यह कैसे उम्मीद कर सकता है कि इतनी बड़ी संख्या में छोटे किसान प्लांट बेस्ड पदार्थों की ओर रुख करेंगे? इसके अलावा, दुनिया के कई देशों में मवेशियों को मांस के लिए मार दिया जाता है। ऐसी जगहों पर किसानों द्वारा पशुओं की स्लॉरिंग कर उससे हासिल पूंजी के जरिेये स्विच करना संभव बना सकता &nbsp;है । लेकिन भारत में यह सोचना भी असंभव है कि इतनी बड़ी संख्या में मवेशियों को मारा जा सकता है। क्या पेटा को यह पसंद होगा !</p>
<p>दूसरा मुद्दा यह है कि पौधे आधारित उत्पादों को दूध क्यों कहा जाता था ? आखिर दूध के अलावा कोई और नाम या ब्रांड क्यों नहीं खोज पाए और क्यों दूध और दूध उत्पादों के साथ ही प्रतिस्पर्धा की ? ऐसा इसलिए है क्योंकि उन सभी कंपनियों को यह अच्छे से पता है कि दूध अकेले ही सभी पोषक तत्वों का स्रोत है और पूरी दुनिया में इसका उपभोग किया जाता है। इसको सभी उपभोक्ताओं द्वारा अपनाया भी गया है। इसलिए उन्होंने पाया कि प्लांट बेस्ड उत्पादों को दूध का नाम देकर न सिर्फ ग्राहक को भ्रमित किया जा सकता है साथ ही दूध और दूध उत्पादों द्वारा प्राप्त ब्रांड लोकप्रियता का लाभ भी उठाया जा सकता है। इसका नजीजा यह भी हुआ कि प्लांड बेस्ड डेयरी उत्पादकों और प्रसंस्करण कंपनियों के खिलाफ गैर डेयरी उत्पादों पर दूध का टैग लगातार बेचने पर उपभोक्ताओं को भ्रमित करने के आरोप के तहत मुकदमें भी दर्ज किये गये।</p>
<p><strong>वेगन बनाम डेयरी उत्पाद</strong></p>
<p>यूरोपीय संघ ने ओटली और फ्लोरा जैसी वेगन (शाहाकारी खाद्य पदार्थों का उत्पादन करने वाली) कंपनियों द्वारा खाद्य पदार्थों की पैकेजिंग के लिए दूध के डिब्बों और दही की पैकेजिंग के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है। इसका मकसद है कि गाय के दूध को एक सम्मानजनक दर्जा मिल सके । खाद्य मानकों और नामकरण के अधिनियम के संशोधन 171 के तहत बादाम दूध, सोया दूध, जई का दूध जैसे शब्दों का प्रयोग, शाहाकारी खाद्य पदार्थों के लिए प्रतिबंधित है। डेयरी जैसे पदार्थों का उत्पादन दाल, मटर, बीन्स और नट्स से होता हैं। शाकाहारी खाद्य निर्माता इस दिशा में एक और कदम बढ़ाते हुए आइस क्रीम, फ्लेवर्ड मिल्क, योगर्ट, मक्खन और अन्य डेयरी उत्पादों आदि जैसे उत्पाद बनाने के लिए प्लांट मिल्क का उपयोग करने लगे हैं ।</p>
<p>भारत में डेयरी उत्पादों की स्पष्ट तौर पर अलग पहचान के लिए लड़ाई लंबे समय से लड़ी जा रही है। अमूल, एनडीडीबी, एनडीआरआई और आईडीए जैसी बड़ी संस्थाएं उन आइसक्रीम जैसे उत्पादों का विरोध कर रही हैं जिनमें गैर-डेयरी पदार्थों का उपयोग होता है । इसका नतीजा यह हुआ कि आइसक्रीम की तरह दिखने वाले गैर- डेयरी खाद्य पदार्थ जिनमें&nbsp; खाद्य तेल जैसे गैर- डेयरी उत्पाद होते हैं उन्हें फ्रोजन डेसर्ट &nbsp;के रूप में एक अलग नाम दे दिया गया।</p>
<p>भारत में खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण ने स्पष्ट रूप से डेयरी खाद्य पदार्थ, मांसाहारी खाद्य पदार्थ और शाकाहारी गैर डेयरी खाद्य उत्पादों की परिभाषा तय की है। खाद्य सुरक्षा और मानक विनियन ( पैकेजिंग और लेबलिंग) , 2011 के सेक्शन 1.2.1 (7) में मांसाहारी खाद्य पदार्थों की परिभाषा विस्तार से दी गई है। उसमें डेयरी उत्पाद, मांसाहारी उत्पाद, और गैर डेयरी वेगन उत्पाद को साफ-साफ परिषाभित किया गया है। इसमें स्पष्ट है कि पशुओं से मिलने के बावजूद दूध और दूध के ऐसे उत्पाद जिनमें केवल दूध है, एक शाकाहारी उत्पाद है।</p>
<p><strong>पेटा </strong><strong>&ndash; </strong><strong>एनजीओ </strong></p>
<p>पेटा वर्जीनिया स्थित एक अंतरराष्ट्रीय एनजीओ है जिसकी स्थापना मार्च 1980 &nbsp;में एक अमेरिकी पशु अधिकार संगठन के रूप में की गई थी। इंग्रिड न्यूकिर्क इस संगठन के संस्थापक और अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। भारत में पेटा शाखा की स्थापना 2000 में हुई थी। इसका नारा है कि पशु हमारे लिए खाने, पहनने, मनोरंजन और उपयोग करने, या किसी अन्य तरीके से दुर्व्यवहार करने के लिए नहीं हैं। पेटा चार मुख्य मुद्दों पर काम करता है-&nbsp; फैक्टरी फार्मिंग, फर फार्मिंग, पशु परीक्षण और मनोरंजन के लिए&nbsp; जानवरों के उपयोग का विरोध करना । यह संगठन लोगों को एक शाकाहारी जीवन शैली के लिए को प्रोत्साहित करता है। और मांस खाने, मछली पकड़ने, कीटों के रूप में माने जाने वाले जानवरों की हत्या के सख्त खिलाफ है।&nbsp;यह संस्था कोशिश करती है कि फैक्ट्री फार्मिंग और बूचड़खानों में प्रथाओं में सुधार हो। यह उन कंपनियों के खिलाफ मुकदमा शुरू करता है जो&nbsp; जानवरों को कष्ट देने वाली प्रथाओं को बदलने से इनकार करते हैं।</p>
<p><strong>पेटा और अमूल विवाद</strong></p>
<p><span>शाकाहार को बढ़ावा देने के अपने&nbsp; सिद्धांत की वजह से&nbsp; पेटा इंडिया अमूल के साथ लड़ने के लिए मजबूर हुआ और अमूल के खिलाफ मैदान मे खडा हुआ । अमूल ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर एक कलाकृति पोस्ट की</span> <span>&nbsp;</span><span>जिसमें अमूल की लड़की द्वारा जोकिन फीनिक्स को अमूल मक्खन खिलाते हुए दिखाया गया । जोकिन फीनिक्स इस कार्टून मे एक जोकर की वेष</span><span>-</span><span>भूषा मे थे</span><span>। फीनिक्स को</span><span> 92</span><span>वें वार्षिक अकादमी पुरस्कारों में फिल्म </span><span>'</span><span>जोकर</span><span>' </span><span>में सर्वश्रेष्ठ अभिनय के लिए ऑस्कर पुरस्कार </span><span>&nbsp;</span><span>मिला था। अपने भाषण के दौरान</span><span>, </span><span>फीनिक्स ने नस्लवाद से लेकर लैंगिक असमानता और रद्द संस्कृति तक कई मुद्दों को संबोधित किया था। अपने संबोधन के दौरान उन्होंने &nbsp;कहा&nbsp; </span><span>&ldquo;</span><span>हम कृत्रिम रूप से एक गाय का गर्भाधान करने और उसके बच्चे को चुराने का&nbsp; खुद को हकदार मानते&nbsp; हैं</span><span>&nbsp;</span><span>भले ही</span> <span>वह</span><span> गाय अत्यंत पीड़ा में</span> <span>लगातार रोती रहे । पेटा के कई उत्साही लोगों ने गायों में कृत्रिम गर्भाधान को गायों के </span><span>'</span><span>बलात्कार</span><span>' </span><span>के रूप में दिखाया है। यह&nbsp; कार्य कितना </span><span>असंवेदनशील है</span><span>! </span><span>क्या वह&nbsp; उन महिलाओं</span> <span>पर भी हमला करेंगे जो आईवीएफ के लिए जाती हैं और सरोगेसी के लिए&nbsp; कोख किराए पर लेती हैं। </span><span>"</span><span>पेटा इंडिया ने अमूल के कार्टून को टोन डेफ आर्टवर्क कहा। </span><span>"</span><span>द जोक ऑन यू</span><span>," </span><span>ट्वीट पढ़ें। </span><span>फीनिक्स एक वेगन (शाकाहारी) है। सख्त शाकाहारी (वेगन) वे लोग हैं जो जानवरों से प्राप्त भोजन नहीं खाते हैं। शाकाहारी भोजन के पीछे विचार यह है कि यह पशु मूल के खाद्य पदार्थों को वस्तु का दर्जा देने से इनकार करता है। जाहिर है</span><span>, </span><span>एक शाकाहारी अंडे</span><span>, </span><span>मांस</span><span>, </span><span>दूध और दूध उत्पादों</span><span>, </span><span>पनीर और यहां तक </span><span>​​</span><span>कि</span> <span>शहद</span> <span>जैसे</span> <span>उत्पादों</span> <span>को</span> <span>खाने</span> <span>से</span> <span>मना</span> <span>कर</span> <span>देगा। इसके तुरंत बाद</span><span>, </span><span>पेटा इंडिया ने अमूल के विज्ञापनों का विरोध किया, </span><span>जो डेयरी उत्पादों को बढ़ावा देने वाले हैं। पेटा ने </span><span>सेल्फ रेगुलेटिग एड इंडट्रीज&nbsp; की यूनिट &nbsp;एडवरटाइजिंग स्टैंडर्ड काउंसिल ऑफ इंडिया (एएससीआई) में एक याचिका दायर की थी। </span><span>एएससीआई </span><span>ने पेटा की याचिका खारिज कर दी। याचिका खारिज &nbsp;होने के बाद</span> <span>पेटा ने अमूल को डेयरी उत्पादों के उत्पादन को वेगन उत्पादों में बदलने का सुझाव दिया है। प्रतिक्रिया में</span><span>, </span><span>भारत के सबसे बड़े डेयरी ब्रांड</span><span> अमूल </span><span>ने पेटा के </span><span>'</span><span>प्लांट बेस्ड डेयरी पर बदलाव करने</span><span>' </span><span>के सुझाव का विरोध किया है। साथ ही सवाल भी किया है कि अगर ऐसा होता है तो डेयरी क्षेत्र में काम करने वाले करोड़ों लोगों को रोजगार कैसे प्रदान किया जा सकता है। अमूल ने कहा है कि </span><span>"</span><span>विदेशी वित्तपोषित एनजीओ जो अभियान चला रहा है वह भारतीय डेयरी उद्योग को कलंकित करने के लिए है</span><span>"</span><span>।</span><span>&nbsp;</span></p>
<p><strong>भारत का<span> दुग्ध उत्पादन क्षेत्र पेटा के उद्देश्यों को पूरा करता है</span></strong></p>
<p>इसके लिए संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोप, इज़राइल, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के डेयरी दिग्गजों द्वारा उत्पादित दूध के विपरीत भारत में दूध उत्पादन की प्रक्रिया को समझने की आवश्यकता है।</p>
<p>-भारत में दुग्ध उत्पादन पश्चिमी देशों की तरह फैक्ट्री पर आधारित नहीं है।</p>
<p>-दूध का उत्पादन बड़ी संख्या में छोटे किसान करते हैं। उनके पास भोजन, प्रबंधन, रोग नियंत्रण, प्रजनन आदि की कोई स्वचालित या रोबोटिक प्रक्रिया नहीं है। पशुओं का प्रबंधन व्यक्तिगत देखभाल, सुरक्षा और सेवा पर आधारित है।</p>
<p>-भारत में दूध उत्पादन एक घरेलू गतिविधि है। जबकि पश्चिम देशों में&nbsp; दूध देने वाली 300 गायों के झुंड का प्रबंधन करने के लिए दो व्यक्तियों की जरूरत होती है । जबकि इसकी तुलना में, भारत में एक पूरा परिवार 10 से कम गायों और भैंसों की देखभाल करता है।</p>
<p>-पेटा के कहने&nbsp; के अनुसार ही भारत में पशुओं को परिवार के सदस्यों की तरह देखभाल और चिंता, प्यार और स्नेह के साथ रखा जाता है । उन्हें सुरक्षित आश्रयों में रखा जाता है, &nbsp;जिससे उनको कोई नुकसान ना हो । यह &nbsp;सुनिश्चित किया जाता है कि पशु का कल्याण हो।</p>
<p>-पशुओं को जो &nbsp;चारा दिया जाता है वो &nbsp;घर का बना होता है या जंगल से इकट्ठा किया जाता है। &nbsp;उनके आहार में हार्मोन इनपुट नगण्य होते हैं।</p>
<p>-यहां दूध उत्पादन में वृद्धि पशुधन की संख्या में वृद्धि और प्रति पशु उत्पादकता में सीमित वृद्धि पर आधारित है।</p>
<p>-दुग्ध उत्पादन कृषि की तरह लाभप्रद और स्थिरता लाता है। सभी भूमि मालिक किसान केवल फसल उत्पादन की तुलना में मिश्रित खेती पसंद करते हैं।</p>
<p>-महिलाएं डेयरी फार्मिंग में बहुत सक्रिय हैं। वे इसे गरीबी उन्मूलन, महिला सशक्तिकरण, बाल पोषण, और पोषण सुरक्षा के लिए एक अच्छे अवसर के रूप में देखते हैं।</p>
<p>-डेयरी फार्मिंग भूमिहीन और सीमांत किसानों के लिए एक अच्छा अवसर है।</p>
<p>यदि ऊपर दी गई बातों पर ध्यान से विचार किया जाए &nbsp;तो भारत में डेयरी किसान पशु कल्याण मानकों को पूरा करते प्रतीत होते हैं।</p>
<p><strong>क्या होगा अगर अमूल शाकाहारी हो जाए ?</strong></p>
<p>अमूल गुजरात में 18 जिला स्तरीय सहकारी संघों का एक संघीय समूह है। 2018-19 तक इन संघों में 18600 गांवों में इनके 38 लाख दूध उत्पादक सदस्य शामिल थे। अमूल की कुल हैंडलिंग क्षमता 3.5 करोड़ लीटर दूध प्रति दिन&nbsp; की है और 2018-19 के दौरान दैनिक औसत दूध संग्रह 230 लाख लीटर था। 2018-19 के दौरान अमूल का बिक्री कारोबार 38,550 करोड़ रुपये ( 5.1 अरब अमेरिकी डॉलर) था। जिला दुग्ध संघ दूध की उपभोक्ता कीमत का 75-80 फीसदी दुग्ध उत्पादक किसानों को भुगतान करते हैं।&nbsp;</p>
<p>यदि अमूल को शाकाहारी डेयरी अवधारणा पर बदलाव करना है , तो उसे अपनी सभी प्रसंस्करण संपत्तियों को संशोधित करने की आवश्यकता होगी, जो शायद 2 लाख करोड़ रुपये से अधिक है।</p>
<p>अगर बदलाव करना है तो इतनी बड़ी संख्या में गायो और भैंसों से छुटकारा पाना होगा । तो आखिर वे जायेंगे &nbsp;कहाँ? एक बात तो पक्की है कि शांतिप्रिय गुजराती किसानों द्वारा पशु हत्या करने पर विचार नहीं किया जा सकता।</p>
<p>दूध के समान शाकाहारी उत्पादन करने के लिए अमूल के पास पर्याप्त &nbsp;भूमि संपत्ति नहीं होगी क्योंकि इसका 70% दूध भूमिहीन और सीमांत दूध उत्पादकों से प्राप्त होता है।</p>
<p>अगर ऐसा होता है &nbsp;तो 70% दुग्ध उत्पादक सदस्य &nbsp;बेरोजगार हो जाएंगे , जिससे असहनीय सामाजिक अशांति पैदा&nbsp; होगी ।</p>
<p>&nbsp;<strong>दूध अमृत है</strong></p>
<p>भारतीय सभ्यता लगभग 8000 &nbsp;सालो से, दूध उत्पादन और गायों पर आधारित अनूठी कृषि पद्धतियों के लिए गाय पालन करने वाली पहली &nbsp;&nbsp;सभ्यता है । भारत &nbsp;मे गायों को मां के रूप में पूजा जाता था । जब स्वामी विवेकानंद से एक बार यह सवाल पूछा गया कि किस पशु का दूध सबसे अच्छा है, तब उन्होने कहा भैंस का &nbsp;दूध &nbsp;सबसे अच्छा है । इस उत्तर पर प्रश्नकर्ता ने चुटकी लेते हुए कहा &ldquo;लेकिन आप लोग तो&nbsp; गाय को माता कहते हो। स्वामी विवेकानंद ने उत्तर दिया कि गायें तो अमृत देती हैं ।</p>
<p>तो आइए हम सब मिल कर एक नई शुरुआत करें और शाकाहारी अमृत की तलाश करें ।</p>
<p><em><strong><span lang="EN-US">( आर.एस. खन्ना इंटरनेशनल डेयरी कंसल्टेंट हैं । लेख में&nbsp; व्यक्त विचार उनके निजी हैं।&nbsp; उनसे&nbsp; <a href="mailto:dr.rskrsk@gmail.com">dr.rskrsk@gmail.com</a> पर संपर्क किया जा&nbsp; सकता है)</span></strong></em></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2021/06/image_750x500_60b74fc687c7d.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ पेटा विवाद निराधार : भारत में दूध उत्पादन और पशु कल्याण  हैं एक दूसरे के पर्याय ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[डब्ल्यूटीओ के नियमों और फैसलों में अमीर देशों का दबदबा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/Wealthy-nations-call-the-shots-at-WTO.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 31 May 2021 13:07:22 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/Wealthy-nations-call-the-shots-at-WTO.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत की सुनीता और &nbsp;नाइजीरिया की अबीके&nbsp; मक्का &nbsp;और गेहूं &nbsp;उगाने वाले &nbsp;छोटे किसान हैं । दुनिया में बढ़ती खाद्यान्न की मांग और बढ़ती उपभोक्ता कीमतों के बावजूद, दोनों ने शायद ही कभी अधिक आय अर्जित की है। यह हकीकत केवल इन देशों की नही है बल्कि इंडोनेशिया, पाकिस्तान, नाइजीरिया ,बंग्लादेश, मेक्सिको &nbsp;जैसे 10 देशों में जहां अधिकतर परिवारों&nbsp; की आजीविका कृषि पर निर्भर है, वहां उत्पादन लागत&nbsp; बढ़ने&nbsp; के कारण किसानों के मुनाफे का दायरा सिकुड़ता जा रहा है।&nbsp; इस चरमराती हुई खाद्य व्यवस्था के कारण इन परिवारों के खर्च ज्यादा बढ़ गये जिसके कारण यह परिवार अधिक गरीबी में जीने के लिए मजबूर हैं । इसका सबसे बडा प्रभाव यह है कि आज बडी संख्या मे लोग अपने खेत- खलिहानों को छोडकर गांव से शहरों और विदेशों की ओर पलायन कर रहे हैं।</p>
<p>हाल ही में <span>संयुक्त राष्ट्र संघ के</span> <span>16</span><span> राजदूतों ने संयुक्त राष्ट्र खाद्य प्रणाली शिखर सम्मेलन को लिखा</span><span>,</span> <span>"</span><span> वैश्विक खाद्य सुरक्षा और गरीबी उन्मूलन जै</span><span>से</span> <span>लक्ष्यों </span><span>&nbsp;को प्राप्त करने&nbsp; के लिए अंत</span><span>रराष्ट्री</span><span>य कृषि व्यापार एक</span> <span>&nbsp;महत्वपूर्ण कड़ी है ।</span> <span>लेकिन दुख की बात है कि विश्व व्यापार संगठन </span><span>(</span><span>डब्ल्यूटीओ</span><span>) </span><span>के निय</span><span>मों</span><span> के कारण सुनीता और अबीके जैसे किसा</span><span>नों</span><span> को उनके देश में &nbsp;सस्ते खाद्य आयात के कारण होने वाले</span> <span>दुष्प्रभाव झेलने पड़ रहे हैं । इन निय</span><span>मों </span><span>&nbsp;का प्रारूप ही इस प्रकार है कि खाद्य पदार्थ आयात करने वाले देशो में</span> <span>&nbsp;किसान &nbsp;के उत्पा</span><span>दों</span><span> की कीमत कम होती जाती है</span> <span>&nbsp;</span><span>वहीं य</span><span>ह</span><span> नियम&nbsp; निर्यात करने वाले दे</span><span>शों</span><span> के खाद्य उद्योग और ब</span><span>ड़े</span><span> पैमाने पर कृषि उत्पादन को प्रोत्साहन देते </span><span>हैं</span><span>।&nbsp; इसके कारण तेजी से जलवायु परिवर्तन&nbsp; भी हो रहा है।</span></p>
<p>डब्ल्यूटीओ के खाद्य और कृषि व्यापार समझौते की मंजूरी के &nbsp;25 साल बाद भी&nbsp; दुनिया का प्रत्येक नौवां व्यक्ति भूखा सोता है जबकि उत्पादित भोजन का एक तिहाई भाग बर्बाद हो जाता है। हमने नये आविष्कारों और तकनीक के क्षेत्र में अपार उपलब्धियां हासिल की हैं। यह सब इसलिए हासिल किया गया ताकि हर इंसान को पोषण युक्त भोजन का उसका अधिकार सुनिश्चित किया जा सके और कोई भी &nbsp;बच्चा भूखे पेट नहीं &nbsp;सोए इसे किसी चमत्कारी काम की तरह नहीं देखना चाहिए। लेकिन विडंबना यह है कि आज भी दुनिया में अधिकतर भुखमरी और गरीबी के शिकार वह लोग हैं जो स्वयं पूरी दुनिया के लिए भोजन पैदा करते हैं । दुनिया में अधिकतर मोटापे के शिकार लोग और कोई नही बल्कि उपभोक्ता हैं ।&nbsp; क्या आप इससे सहमत हैं कि डब्ल्यूटीओ के मौजूदा नियमों औऱ छोटे किसानों की तबाह होती आजीवीका में सीधा सबंध हैं , असल में यह एक तथ्यात्मक हकीकत है। &nbsp;राजनीतिक सीमाओं की बाध्यता के कारण &nbsp;<span>कृषि पर </span>डब्ल्यूटीओ <span>की संधि पूर्णतया खाद्य प्रणाली दृष्टिकोण </span><span>के प्रतिकूल है और इस हकीकत पर </span><span>सभी चुप</span><span> हैं</span><span> ।</span><span>&nbsp; </span></p>
<p>संयुक्त राष्ट्र संघ के राजदूतों का यह&nbsp; कहना सही है कि अंतरराष्ट्रीय कृषि व्यापार महत्पूर्ण है लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं है कि कृषि व्यापार के नियम पवित्र हैं । इन्हें सुधारने की जरूरत है &nbsp;क्योंकि तभी दुनिया के किसान और ग्रामीण अबादी का भला हो सकता है। मगर क्या यह जरूरी बदलाव &nbsp;लाना मुमकिन है जबकि पहले से ही सब कुछ सेट है ?&nbsp; हाल ही में यूएन के राइट टू फूड के विशेष दूत माइकल फाखरी के कथन से यही ध्वनित होता है उन्होंने कहा &nbsp;कि &ldquo;अगर पहले से ही टेबल सेट हो और सीटिंग प्लान पर कोई चर्चा नहीं हो सकती है, मैन्यू भी सीमित हो, ऊपर से असली बातचीत वास्तव में एक दूसरी टेबल पर हो रही है तो हम क्या कर सकते हैं?&rdquo;</p>
<p>आम लोगों की अपेक्षाओं को पूरा करने के प्रयास और पोषण, जैव विविधता, स्वास्थ्य देखभाल, वित्तीय समावेशन या आजीविका पर दुनिया द्वारा&nbsp; बार-बार &nbsp;निर्धारित किए गए लक्ष्य अभी भी हासिल नहीं हुए हैं । इसके साथ पिछले संयुक्त राष्ट्र खाद्य शिखर सम्मेलन में निर्धारित लक्ष्य भी&nbsp; पूरे नहीं हो सके । एक तरफ जहां कई &nbsp;पीढ़ियों को किए गए वादे अभी भी पूरे नही हुए हैं वहीं दूसरी तरफ सरकारें&nbsp; लगातार बदल&nbsp; रही हैं और खरबों &nbsp;डॉलर खर्च हो रहे हैं । लेकिन इसके बावजूद हम सब सामूहिक तौर &nbsp;से एक मानव जाति के रूप में अपनी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति &nbsp;को बदलने में असमर्थ रहे हैं ।बदलाव के इरादे और प्रक्रियाओं के बारे में संदेह बहुत अधिक हैं। यह एक दुख की बात &nbsp;है कि खाद्य उत्पादकों और नागरिक समाज के कुछ वर्ग संयुक्त राष्ट्र संघ के फूड सिस्टम्स समिट 2021 के साथ जुड़ने से इनकार कर रहे हैं क्योंकि&nbsp; उन्हें &nbsp;संदेह है कि इससे मौजूदा दृष्टिकोण को और मजबूती मिलेगी।</p>
<p>हम इस भूल भूलैया में जितना ज्यादा घुसने की कोशिश करेंगे हमारा यह विश्वास उतना ही मजबूत होता जाएगा कि मौजूदा प्रणाली की नींव समझे जाने वाले डब्ल्यूटीओ के नियमों का स्वरूप पहले से ही तैयार था वह अमीर देशों द्वारा इसमें बाद में शामिल होने वाले आर्थिक तौर पर कमजोर देशों पर थोपा गया है। इसलिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में विश्व के दक्षिण छोर से भी समान प्रतिनिधित्व की जरूरत है । अगर माइकल फाखरी &nbsp;में भाषा कहा जाय तो टेबल अन्य तरीकों से भी सेट किया जाता है। विकासशील देशों में बड़ी कंसल्टिंग फर्म, बड़े व्यवसाय के साथ अनुसंधान संस्थान है उनके संपर्क बहुपक्षीय एजेंसियों के साथ हैं और विदेशी अनुदान ले &nbsp;रहे हैं ।&nbsp; इनका &nbsp;प्रभाव स्थानीय खाद्य नीतियों पर किसानों की तुलना में कहीं अधिक &nbsp;रहता &nbsp;है। गरीबी को परिभाषित करने वाले दुनिया में जो जीडीपी जैसे मापदण्ड&nbsp; हैं वह दुनिया में फैली असमनताओं की सही&nbsp; तस्वीर नहीं दिखा रहे हैं । जीडीपी को प्रगति के संकेतक के रूप में उपयोग करना एक धोखा है जो असमानताओं के बारे में कड़वी सच्चाई को छिपा रहा है। संयुक्त राष्ट्र खाद्य प्रणाली शिखर सम्मेलन प्रस्ताव सदस्य देशों पर बाध्यता नहीं है वह इसे &nbsp;स्वेच्छा से अपना सकते हैं । इस परिस्थिति में हम आखिर किस प्रकार से यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि सारे देश अल्प अवधि वाली घरेलू रुचियों को अनदेखा कर विश्व कल्य़ाण के लिए &nbsp;संयुक्त राष्ट्र संघ की &nbsp;खाद्य प्रणालियों के उन प्रस्तावों के पीछे जो वैज्ञानिक पहलू हैं, उसे समझ कर उनका हिस्सा&nbsp; बन &nbsp;सके जो मौजूदा परिस्थितियों को बदल सकते हैं ? मुझे लगता है कि अधिकतर &nbsp;सरकारों को इसका ज्ञान भी है उनकी इच्छा भी है लेकिन घरेलू स्तर राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और घरेलू स्तर पर नीतियों में बदलाव की झिझक इसकी वजह है।</p>
<p>तो क्या हमें इन विषम परिस्थितियों के बीच हार मान लेनी चाहिए ? बिल्कुल नहीं, बल्कि हमें इन परिस्थितियों की पहचान कर इन्हें सुधारने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए। यही कारण है कि संयुक्त राष्ट्र संघ&nbsp; खाद्य प्रणाली शिखर सम्मेलन की भूमिका इतनी महत्वपूर्ण है ,न सिर्फ हमारे लिए बल्कि आने वाले पीढ़ियों के लिए&nbsp; भी । तो आइए हम इस कार्य में&nbsp; इस तरह जुट जाएं,&nbsp; जैसे &nbsp;किसान अनेक बाधाओं के बावजूद फसल उगाता है। इस विश्वास के साथ कि अच्छी नीयत से किए गए कार्यों के परिणाम सुखद ही होते हैं।</p>
<p><strong><em>(अजय वीर जाखड़ , भारत कृषक समाज के चेयरमैन हैं, वह पंजाब स्टेट फार्मर्स एंड फार्म वर्कर्स कमीशन के चेयरमैन हैं। वह यूएन फूड सिस्ट्स समिट&nbsp; के सस्टेनेबल कंजप्शन के&nbsp; को-चेयर हैं। लेख में व्यक्त&nbsp; विचार उनके निजी&nbsp; विचार हैं )</em></strong></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ डब्ल्यूटीओ के नियमों और फैसलों में अमीर देशों का दबदबा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[बढ़ती मंहगाई के बीच लगातार घाटा सहता किसान]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/farmers-reaping-losses-in-midst-of-runaway-inflation-cost-of-production-is-going-up.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 27 May 2021 07:12:22 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/farmers-reaping-losses-in-midst-of-runaway-inflation-cost-of-production-is-going-up.html</guid>
        <description><![CDATA[ <div style="display: none;"></div>
<p>अगर आप एक ऐसे व्यवसाय से जुडे हैं, जिसमे लागत खर्च लगातार बढ़ता रहता है, लेकिन आपके उत्पाद की कीमतों मे या तो बहुत ही मामूली उछाल देखने को मिलता है या फिर अधिकतर वह &nbsp;कीमतें घट जाती हैं तो क्या आप उस व्यवसाय में रहना चाहेंगे? ज्यादातर लोगों का जवाब होगा 'नहीं' । लेकिन अगर कहा जाए कि आपके पास कोई विकल्प नहीं है और भले ही आपको यह व्यवसाय पसंद हो या न हो, मजूबरन आपको इसमें साथ रहना&nbsp; ही है। तो ! ऐसा ही एक व्यवसाय है खेती &nbsp;जिसको करने वाला किसान कहलाता है।</p>
<p>आज के वक्त में ऐसे ऐप संचालित आनलाइन स्टोर जिनका व्यवसाय अरबों में चल रहा है, आपको किराने के बिल आपके मेल पर भेज देते हैं। इन &nbsp;बिल पर समानों की कीमतें हर दूसरे दिन बढ़ते ही रहती हैं । बढ़ते हुए मूल्यों के प्रति आपकी नाराजगी के बावजूद यह मूल्य लगातार बढ़ते ही रहते हैं। टेलीविजन पर कॉरपोरेट विश्लेषकों और शेयर बाजार के जानकारों द्वारा बताया जाता है कि इन बढ़ती कीमतों का &nbsp;कारण है, ''आपूर्ति मे आ रही अड़चन''।</p>
<p>मगर इसके पीछे असली कहनी क्या है ? अगर हम आधिकारिक आंकड़ों या किसी अन्य स्रोत से हटकर अप्रैल, 2021 के थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) पर एक नज़र डालें तो तस्वीर कुछ और ही दिखाई देती है । इस साल लॉकडाउन के दौरान उपभोक्ता सब्जियों, अनाज, चावल या गेहूं के आटे जैसे उत्पादों के लिए ऑनलाइन स्टोर पर अधिक &nbsp;भुगतान कर रहे हैं, लेकिन डब्ल्यूपीआई के आंकड़े कुछ और ही दर्शाते हैं। कुछ उत्पादों को छोड़कर, बाकि कृषि उत्पादों के थोक मूल्य अप्रैल माह के दौरान या तो स्थिर रहे हैं या अप्रैल, 2020 की तुलना में गिर गए हैं। इसके विपरीत किसान कच्चे माल और खुद के उपयोग के लिए खरीदने वाले सामानों के लिए अधिक कीमत चुका रहे हैं।</p>
<p>आप इसको इन दिये गये ऑकड़ों के जरिए बड़ी आसानी से समझ सकते हैं कि किसानों के उत्पादो के मूल्यों में कितनी गिरावट आई है। अप्रैल में अनाज की महंगाई दर (-) 3.32 फीसदी, धान की (-) 0.92 फीसदी , गेहूं के लिए (-)3.29 फीसदी, सब्जियों की (-) 9.03 फीसदी, आलू के लिए वर्ष-दर-वर्ष मूल्य, थोक मूल्य सूचकांक के मुताबिक बड़ी गिरावट दिखा रहा है और यह पर मापा जाता है। (- ) 30.44 फीसदी पर था। जबकि प्याज के लिए (-) 19.72 फीसदी । फल और दालें इस प्रवृत्ति के अपवाद थे जिनमें पूर्व में 27.43 फीसदी गिरावट के बाद इनकी कीमतों में 10.74 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है ।</p>
<p>तो इसी प्रकार प्राथमिक खाद्य पदार्थों की कीमतों में तेजी से गिरावट आई है&nbsp; लेकिन&nbsp; थोक मंडियों में 10.49&nbsp; फीसदी की भारी&nbsp; वृद्धि आई है जो &nbsp;इस बात से बिल्कुल मेल नही खाती है और अगर यह वृद्धि &nbsp;है भी तो इसका लाभ किसानों को बमुश्किल मिलता है। जबकि इसके विपरीत किसान के खेती में लगने वाली लागत के रूप में उपयोग होने वाले डीजल की कीमतो में साल-दर-साल 33.82 फीसदी, वहीं रसायन और रासायनिक उत्पादों में 10.24 फीसदी की बढ़ोतरी हुई।</p>
<p>यह आकड़े इस बात को दर्शाते हैं कि मूल्य निर्धारण की पावर औद्योगिक मालिकों के पास है क्योंकि जब वस्तुएं खुदरा विक्रेता के दवारा उपभोक्ताओं तक पहुंचती हैं तो इस स्तर तक पहुंचने में मूल्य में भारी वृद्धि हो जाती है। 'प्राथमिक श्रेणी' के खाद्य पदार्थों और 'निर्मित 'खाद्य वस्तुओं' उत्पादों' के बीच लगभग आठ फीसदी की वृद्धि का अंतर स्पष्ट होता है। जबकि यह लाभ किसानों को नही मिल पाता है ।</p>
<p>प्राथमिक स्तर पर खाद्य वस्तुओं के लिए थोक मूल्य सूचकांक मुद्रास्फीति अप्रैल में 4.92 फीसदी बढ़ी है। मगर साल दर साल विनिर्मित उत्पादों में खाद्य में 12.62 फीसदी का उछाल देखा गया है। मिलने वाला लाभ का दायरा कहां जा रहा है, इसका अंदाजा लगाना ज्यादा मुश्किल नहीं है!</p>
<p>इस कहानी के दो पहलू हैं । पहला यह कि कृषि उपज की कीमतों में बढ़ोतरी नहीं हो रही है। बल्कि इसके &nbsp;विपरीत, कुछ उपवादों को छोड़कर, ज्यादातर कृषि उपज के मूल्य &nbsp;घट रहे हैं। इससे जुड़ा एक औऱ पहलू है कि कृषि में लगने वाली लागत और वस्तुओं के मूल्य आसमान छू रहे हैं। वही इस कहानी का दूसरा पहलू यह है कि, भले ही थोक मंडियों में कृषि उपज के मूल्यो में लगातार गिरावट वाली प्रवृत्ति दिख रही हो, लेकिन आपके दरवाजे पर पहुंचाई जाने वाली सब्जियों की टोकरी के लिए आपको बहुत अधिक कीमत देनी पड रही है।</p>
<p>इस साल अप्रैल के महीने में थोक मंडियों में कृषि उपज की कीमतों का कुछ ऐसा ही हाल रहा है जिसको हर किसान भूलना चाहेगा । कोरोना महामारी ने तो ग्रामीण आबादी को गहरी चोट पहुँचाई ही है परंतु ग्रामीण लोगों के दुखों के प्रति सिस्टम की उदासीनता भी काफी दुखद है क्योंकि लोगों को समझना चाहिए यह वर्ग सालों तक भारतीय अर्थव्यवस्था का रीढ़ रहा है । दुर्भाग्य है कि इस ग्रामीण दुख का संज्ञान नहीं लिया जा रहा है । इस खरीफ मौसम में होने वाली बेमौसम बारिश के कारण खेतों की जुताई करने की ज़रूरत होगी । वहीं धान की रोपाई के लिए महिला श्रमिकों की ज़रूरत होगी । लेकिन गांव में फैलती कोराना माहामारी के बीच&nbsp; खेतों में काम करने वाले किसान और महिलाएं खरीफ में किए जाने वाले कृषि कार्य कर पाएंगें &nbsp;जिससे कि हम लोगों को भोजन मिल सके ?</p>
<p><span style="font-size: large;"><i><b><span>&nbsp;(प्रकाश चावला आर्थिक मामलों पर काम करने वाले वरिष्ठ पत्रकार हैं और दिल्ली में रहते हैं </span></b>)</i></span></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2021/05/image_750x500_60af474288956.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ बढ़ती मंहगाई के बीच लगातार घाटा सहता किसान ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[पर्यावरण संतुलन और पेड़ पौधों को  ग्रीन गोल्ड के रूप में अपनाने की जरूरत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/For-breath-humans-need-green-cover.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 18 May 2021 10:33:43 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/For-breath-humans-need-green-cover.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>विकास के नाम पर अभी तक हमारी अपनी जो स्थायी पूँजी या समृद्धि थी, उसको सतही या कृत्रिम सुख पाने के लिए बेचने व नष्ट करने का काम किया है। सोने की चिड़िया देश को इसलिए कहा जाता था क्योंकि देश में मिटटी, पानी, हवा यानी जंगल जीवंत हुआ करते थे। हमारे पूर्वज इनको ही स्थायी संपत्ति मानते थे, न कि कागज़ के छोटे व बड़े&nbsp; टुकड़ो को। इस बात के कई उदाहरण मौजूद है कि प्रकृति की रक्षा के लिए लोगो ने कितने&nbsp; और किस किस तरह के प्रत्यन नहीं किये । भारत में जहा पेड़ों, नदियों एवं पशुओं की पूजा कि जाती है वहां पर विश्व के 30 सबसे ज्यादा वायु प्रदूषित शहरो में 22 शहर भारत के हैं। शायद यही कारण है कि गोवा, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र आदि राज्यों में कोरोना से पीड़ित तमाम मरीज़ ऑक्सीजन के न होने के कारण काल के ग्रास में चले गए।&nbsp;&nbsp;</p>
<p>आज अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी का एक कारण यह भी है, कि अस्पतालों की परिधि में पेड़ पौधे मरीज़ो की संख्या से हिसाब से ना के बराबर है। यानी प्राकृतिक ऑक्सीजन मरीज़ो व कर्मचारियों के हिसाब से उपलब्ध नहीं है। एक मानव एक वर्ष में लगभग 9.5&nbsp; टन हवा में सांस लेता है | लेकिन ऑक्सीजन केवल द्रव्यमान से उस वायु का लगभग 23 प्रतिशत होता है, और हम प्रत्येक सांस से ऑक्सीजन का एक तिहाई से थोड़ा अधिक ही निकालते हैं। अतः यह प्रति वर्ष कुल 740 <span>&nbsp;</span>किलो ऑक्सीजन होती है । इतनी ऑक्सीजन मोटे तौर पर सात या आठ पेड़ों से प्राप्त हो सकती है। इससे हम अनुमान लगा सकते है, कि किस जगह कितने पेड़ पौधों की जरूरत होगी। अस्पतालों में ऑक्सीजन की आवश्यकता इसलिए भी अधिक होती है क्योंकि वाणिज्यिक स्थानों व कार्यालयों&nbsp; की तुलना में अस्पताल में अधिक बार वायु परिवर्तन की आवश्यकता होती है। कारण अस्पतालों में सफाई के लिए बहुत ज्यादा रासायनिक उत्पादों का इस्तेमाल होता है।</p>
<p>अस्पतालों में पेड़ पोधो का होना इसीलिए भी जरूरी है क्योंकि पेड़ पौधों से फाइटोनाइड्स रोगाणुरोधी एलेलोकेमिक वाष्पशील कार्बनिक यौगिक निकलते हैं। फाइटोनसाइड्स में एंटीबैक्टीरियल और एंटीफंगल गुण होते हैं। जब लोग इन रसायनों में सांस लेते हैं, तो हमारे शरीर एक प्रकार की श्वेत रक्त कोशिका की संख्या और गतिविधि को बढ़ाकर प्रतिक्रिया करते हैं जिसे प्राकृतिक कोशिका हत्यारा या एनके कहा जाता है। ये कोशिकाएं हमारे शरीर में ट्यूमर और वायरस से संक्रमित कोशिकाओं को मार देती हैं। एनके सेल गतिविधि बढ़ने के कारण प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया भी मजबूत होती है। पेड़ पौधों द्वारा हज़ारों तरह के दिखाई न देने वाले फाइटोनसाइड्स निकलते है यह तक की सब्जियों के पौधों से भी ये कार्बनिक यौगिकों का उत्सर्जन होता है। ये तनाव, तंत्रिका तंत्र, अवसादरोधी, नींद, रक्त शर्करा आदि में भी फायदा पहुंचते है।&nbsp; वैसे भी भारत में हर एलोपैथिक डॉक्टर कम से कम 1,511 लोगों की सेवा करता है, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन के हर 1,000 लोगों पर एक डॉक्टर के मानदंड से बहुत अधिक है। प्रशिक्षित नर्सों की कमी और भी विकट है, जिसमें नर्स-से-जनसंख्या अनुपात 1:670 है, जो डब्ल्यूएचओ के 1:300 के मानदंड के विपरीत है। मानव विकास रिपोर्ट 2020 से पता चला है कि अस्पतालों में बेड की उपलब्धता के हिसाब से 167 देशो में से भारत का स्थान 155 पर है। यानी 5 बेड 10 हजार <span>&nbsp;</span>लोगो पर। इससे देश के नीति निर्माताओं के बारे में पता चलता है कि किस तरह उन्होंने देश को विकास के पथ पर ले जाने का खाका खींच रखा है। यही कारण है कि आज देश में सिर्फ 28 पेड़ प्रति व्यक्ति है।&nbsp; जबकि चीन में 102 , ब्राज़ील में 1414 कनाडा में 8943 अमेरिका में 716 &nbsp;व ऑस्ट्रेलिया में 3266 &nbsp;पेड़&nbsp; प्रति व्यक्ति हैं। यानी देश को विकास के पथ पर ले जाने वाले लोगों ने विकसित देशों की नक़ल भी सही तरह से नहीं की। विकास के लिए निर्धारित नीतियों का ही परिणाम है कि आज हम ऑक्सीजन के लिए परेशान हैं। जिस देश की राजधानी में प्रति व्यक्ति एक पेड़ भी न हो, जो दुनिया के सबसे अधिक वायु प्रदूषित शहरो में एक हो, जिस शहर के बच्चे भी अस्थमा से पीड़ित हों वहाँ पर नई इमारतों के लिए हज़ारों पेड़ों की बलि दी जा रही हो | ऐसा विकास का मॉडल मैंने नहीं देखा। अब तो डॉक्टर भी मरीज़ों को फारेस्ट बाथिंग की सलाह देते है। अभी सांसो के लिए ऑक्सीजन के लिए परेशान है, कल पानी के लिए और यही हाल रहा तो भविष्य में अनाज के लिए मारामारी होगी। अतः जिस तरह वर्षा जल संरक्षण के लिए नियम बनाये गए उसी को ध्यान में रखते हुए अस्पतालों में 33 प्रतिशत से ज्यादा जगह पेड़ पौधों के लिए निर्धारित की जाय। देश में ग्रीन बिल्डिंग कानून के तहत किस तरह ग्रीन हॉस्पिटल बनाये जाते है और &nbsp;किस तरह आई एस ओ सर्टिफिकेट लिए जाते है, यह सबको मालूम है।</p>
<p>आज जिस अदृश्य वायरस के कारण कोरोना मरीज़ों के शरीर में ऑक्सीजन की कमी के कारण जो मौतें हो रही है उनको लेकर न्यायालयों का सरकारों के लिए सख्त शब्दों का प्रयोग उचित है या अनुचित यह नीति निर्माताओं के विचार करने का प्रश्न है। आज पूरी दुनिया में जब मानवता की रक्षा के लिए ईकोसाइड जैसे कानूनों की मांग होने लगी है तब नदियों के गठजोड़, सड़कों, बांधों, खदानों आदि के नाम पर लाखो हेक्टेअर जंगलों को नष्ट करते जा रहे है। आज जरूरत है ईकोसाइड का आकलन करने की&nbsp; एवं प्राकृतिक संसाधनों के साथ स्थाई विकास की राह पर चलने की। यानी बड़ी बड़ी परियोजनाओं में पैसा न लगाकर छोटी छोटी विकास की वह योजनाएं लागू हों जिनसे प्रकृति का सहअस्तित्व का सिद्धांत न बाधित हो, तभी मानव सुख पूर्वक इस धरती पर जीवन यापन कर सकेगा।</p>
<p><em><strong>(गुंजन मिश्रा पर्यावरणविद हैं और उनका कार्यक्षेत्र बुंदेलखंड है। लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं)&nbsp;</strong></em>&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ पर्यावरण संतुलन और पेड़ पौधों को  ग्रीन गोल्ड के रूप में अपनाने की जरूरत ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[जैव विविधता में कमी और प्रकृति के सहअस्तित्व के सिद्धांत को नकारने से पैदा हो रहा संकट]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/degradation-of-boi-diversity-and-doing-away-of-principle-of-co-existence-is-creating-crisis.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 22 Apr 2021 13:34:22 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/degradation-of-boi-diversity-and-doing-away-of-principle-of-co-existence-is-creating-crisis.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p></p>
<p>वही लोग कोरोना से ज्यादा प्रभावित हो रहे है जो कृत्रिम संसाधनों के माध्यम से जीवन यापन कर रहे है यानी&nbsp; पेड़ पोधों व प्रकृति से दूर हैं। जो भी व्यक्ति खेती किसानी का कार्य अपने हाथ से करता है उसको कोरोना जैसी बीमारी होने की सम्भावना नगण्य है। इसके अलावा जो आदिवासी जंगलों में निवास करते है उनको भी कोरोना किसी भी प्रक्रार से प्रभावित नहीं कर सकता है। कारण पेड़ पोधों से फाइटोनाइड्स रोगाणुरोधी एलेलोकेमिक वाष्पशील कार्बनिक यौगिक निकलते हैं। इन फाइटोनसाइड्स में एंटीबैक्टीरियल और एंटीफंगल गुण होते हैं। जब लोग इन रसायनों से युक्त हवा की सांस लेते हैं, तो यह हमारे शरीर में एक प्रकार की श्वेत रक्त कोशिका की संख्या और गतिविधि को बढ़ाकर प्रतिक्रिया करते हैं जिसे प्राकृतिक कोशिका हत्यारा या एनके कहा जाता है। ये कोशिकाएं हमारे शरीर में ट्यूमर और वायरस से संक्रमित कोशिकाओं को मार देती हैं और शरीर की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया भी मजबूत रखती है। पेड़ पोधों द्वारा हज़ारों तरह के दिखाई न देने वाले फाइटोनसाइड्स निकलते हैं।&nbsp; यहां तक कि सब्जियों के पोधों से भी इन कार्बनिक यौगिकों का उत्सर्जन होता है। इसीलिए घर पर किचिन गार्डन के माध्यम से सब्जी पैदा करना हमको न सिर्फ पौष्टिक खाना देता है बल्कि ये तनाव, तंत्रिका तंत्र, अवसादरोधी, नींद, रक्त शर्करा आदि में भी फायदा पहुंचाता है।</p>
<p>पेड़ पोधों से हजारों तरह के फाइटोनसाइड्स निकलते हैं, लेकिन सबसे आम वन-संबंधी फाइटोनसाइड्स - अल्फ़ा पिनेने, डी लिमनेने, बीटा पिनेने, सबीनेने, मीरन, कम्फेने आदि वे रसायन हैं जो मानव शरीर में प्राकृतिक हत्यारे (एनके) सेल गतिविधि को प्रोत्साहित करते हैं। एनके कोशिकाएं कैंसर से लड़ने वाले प्रोटीन हैं जो सचमुच ट्यूमर और वायरस से ग्रस्त कोशिकाओं की तलाश करते हैं और नष्ट करते हैं।</p>
<p>एक &nbsp;मूल्यांकन में कहा गया है कि दुनिया भर में वातावरण में बायोजेनिक वीओसी (बीवीओसी) उत्सर्जन लगभग एक बिलियन टन प्रति वर्ष हो सकता है। शहरो में सजावटी व जल्दी बढ़ने वाले पोधो को लगवाए जाने एवं पौधों की संख्या कम होने के कारण शहरों की हवा में फाइटोनसाइड्स की मात्रा नहीं पायी जाती है यही कारण है कि शहर के लोग शारीरिक व मानसिक दोनों रूप में कमजोर होने के कारण कोरोना वायरस ही नहीं बल्कि अन्य बीमारियों के कारण भी हज़ारो लोग हर रोज़ मौत के गाल में समा रहे हैं। &nbsp;&nbsp;</p>
<p>इसके अलावा अनाजों और सब्जियों में रासायनिक खाद व कीटनाशकों का होना भी कोरोना जैसी बीमारियों का एक कारण है। क्योंकि इनके कारण मानव शरीर को उचित मात्रा में ऑक्सीजन नहीं मिल पाती है खाद्य सुरक्षा के नाम पर जिस तरह खेतो में जहर का प्रयोग किया गया ये उसी का परिणाम है कि आज धरती पर न केवल मानव वरन प्रत्येक जीव प्रजाति अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। दुनिया में 37400 से अधिक प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर है। एकल फसल के नाम पर जैवविविधता को नष्ट कर देना व प्रकृति के सहअस्तित्व के सिद्धांत को नकार देना ही आज मानव के लिए परेशानी का सबब है। केवल 30 फसलें ही मानव खाद्य ऊर्जा की 95 फीसदी जरूरतें प्रदान करती हैं।&nbsp; वास्तव में, हमारी खाद्य जरूरतों का 60 फीसदी चार फसलों, विशेष रूप से आलू, मक्का, चावल और गेहूं के मोनोकल्चर के माध्यम से पूरा किया जाता है। आगामी यूएन फ़ूड समिट का धनी निगमों और उनके खाद्य एजेंडे द्वारा अपहरण कर लिया गया है।&nbsp;</p>
<p>"वर्तमान में, खाद्य उत्पादन मृदा अपरदन, जैव विविधता का ह्रास, जल प्रदुषण व् कमी, जंगल आग के साथ मानव स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक है। मेरा मानना है कि ऊर्जा युक्त पानी की एक बूंद, एक मिलीग्राम स्वस्थ मिटटी, एक मिलीलीटर स्वच्छ हवा, दुनिया के सभी औद्योगिक घरानो की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि उसमे जीवन है। अगर सहअस्तिव्त के सिद्धांत पर कृषि की जाय तो विश्व का 5-10% कृषि क्षेत्र (4 बिलियन एकड़), और वनभूमि (10 बिलियन एकड़) मौजूदा CO2 को बाहर निकालने और रद्द करने के लिए पर्याप्त से&nbsp;&nbsp; विश्व की पारिस्थितिकी प्रणालियों द्वारा मनुष्यों को प्रदान की जाने वाली सेवाओं की कीमत 1997 में 33 ट्रिलियन डॉलर प्रति वर्ष आंकी गई थी । साल 2011 में 125 ट्रिलियन डॉलर प्रति वर्ष आंकी गई। इसमें स्वच्छ जल और कृषि उत्पादों की कीमत सबसे ज्यादा है। इसी से हम अनुमान लगा सकते है क्यों राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय कम्पनिया जल और कृषि में निवेश करने को तैयार रहती है। भारतीय संस्कृति में धरती को माँ का दर्जा दिया गया है लेकिन जिस तरह से विकास और व्यापार के लिए खनन हो रहा है उससे तय है कि आने वाले समय में कोरोना जैसी भयानक बीमारियां धरती पर जन्म लेती रहेगी। अतः धरती को सजाने के लिए नहीं बल्कि व्यवस्थित करने के लिए कुछ प्रयास इस तरफ भी होने चाहिए।</p>
<p><em><strong>(गुंजन मिश्रा, पर्यावरवणविद हैं और बुंदेलखंड में काम करते हैं, लेख में विचार उनके निजी हैं)</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ जैव विविधता में कमी और प्रकृति के सहअस्तित्व के सिद्धांत को नकारने से पैदा हो रहा संकट ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[किसानों को एमएसपी की कानूनी गारंटी मिले]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/Make-MSP-a-legal-guarantee.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 17 Apr 2021 07:01:53 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/Make-MSP-a-legal-guarantee.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><strong><span style="font-family: arial, helvetica, sans-serif;">&nbsp;</span></strong><span style="font-family: arial, helvetica, sans-serif;">केंद्र सरकार के तीन नये कृषि कानूनों के विरोध में दिल्ली की सीमाओं पर चल रहा किसान आंदोलन कई माह बीत जाने के बाद भी विवादों और जटिलताओं में उलझा हुआ है। कई दौर की बातचीत के बावजूद इसका ऐसा कोई हल नहीं निकल सका है जो आंदोलन के गतिरोध को तोड़ सके। इसको देखकर लगता है कि किसान संगठन और सरकार दोनों में से किसी भी पक्ष को आंदोलन को समाप्त करने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा है।</span></p>
<p><span style="font-family: arial, helvetica, sans-serif;">मेरा विचार है कि जिन मुद्दों को लेकर आंदोलन चल रहा है उसका हल अर्थपूर्ण और सार्थक बातचीत के जरिये ही संभव है। दोनों पक्षों तो लचीला रुख अपनाते हुए देश के कृषि क्षेत्र के व्यापक हितों को ध्यान में रखते हुए बातचीत पर आपसी समझ से आगे बढ़ना चाहिए। इसके साथ ही देश के किसानों के मुश्किल हालात और उनकी चिंताओं&nbsp; को स्वीकारते हुए एक ऐसा सर्व स्वीकार्य हल खोजना होगा जिसमें किसी तरह की राजनीति शामिल न हो। महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार इस बात को समझे कि किसानों को बिचौलियों और व्यापारियों के शोषण से बचाने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की किसानों की मांग को स्वीकार करे, ताकि उनको कृषि उत्पादों के वाजिब दाम मिल सके। इसे विडंबना ही कहा जा सकता है कि जब ब्रैड की कीमत 80 रुपये किलो और आटा की कीमत 35 से 40 रुपये किलो है, वहीं किसान को गेहं की कीमत केवल 19.25 रुपये किलो ही मिलती है। अधिकाश फसलों के मामले में यही कहानी दोहराई जाती है। जबकि जरूरत इस बात की है कि किसान को हर उत्पाद के लिए लाभकारी दाम और सही हिस्सेदारी मिलनी चाहिए। न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को कानूनी अधिकार बनाने से जहां मौजूदा विवाद का हल निकालने का रास्ता बन सकता है वहीं दीर्घकालिक रूप से यह देश के किसानों और भारत के कृषि क्षेत्र के लिए भी हितकारी होगा।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="font-family: arial, helvetica, sans-serif;">इस तरह का कदम किसानों की अगली पीढ़ी के कृषि क्षेत्र में बने रहने की इच्छा को मजबूत करेगा जो अभी भी देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। जहां किसान तीन नये कृषि कानूनों को पूरी तरह खारिज कर चुके हैं, वहीं मेरा मानना है कि इन कानूनों के विवादास्पद प्रावधानों की समीक्षा की जरूरत है। उदाहरण के लिए किसी भी कृषि उत्पाद के असीमित भंडारण का कानूनी प्रावधान पहली नजर में ही अतार्किक है और यह किसानों के हितों के लिए हानिकारक है। एमएसपी की कानूनी गारंटी की स्थिति में भी इस विवादास्पद प्रावधान का प्रतिकूल असर होगा। इसके अतिरिक्त यह भी सच है कि जब तक सरकारी और निजी क्षेत्र में मंडियों और मार्केट कि संख्या नहीं बढ़ेगी तब तक एमएसपी की कानूनी गारंटी का वादा भी अधूरा ही साबित होगा क्योंकि इसके फायदे के लिए किसानों के नजदीक मंडियां होना जरूरी है। इसके साथ ही दीर्घकालिक उद्देश्यों को हासिल करने के लिए बड़े पैमाने पर वेयरहाउस और सड़कों जैसी ढांचागत सुविधाओं की भी जरूरत है।&nbsp;</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="font-family: arial, helvetica, sans-serif;">आंदोलन की समाप्ति एक ऐसे आपसी सहमति वाले समाधान के जरिये होनी चाहिए जिससे यह संदेश जाए कि भारत में किसी भी बड़े मसले को सुलझाने के लिए आपसी समझ और परिपक्कता है जो बड़े मकसद के लिए जरूरी है। अगली पीढ़ी को ऐसा अहसास होना चाहिए ताकि वह&nbsp; कृषि&nbsp; में अपना बेहतर भविष्य देख सके। जनवरी, 2021 में जब सरकार और किसानों के बीच अंतिम दौर की बातचीत हुई थी, उसके बाद से सरकार ने आंदोलन को लेकर जो रवैया अपनाया है वह संकेत देता है कि सरकार किसानों और उनकी मांगों को लेकर संवेदनशील नहीं है। इस रवैये में बदलाव की जरूरत है।</span><br /><span style="font-family: arial, helvetica, sans-serif;">असल में जरूरत इस बात की है जहां देश का कारपोरेट जगत आगे आकर सहयोग करते हुए किसानों के उत्पादों को एमएसपी पर खरीदने की प्रतिबद्धता दिखाए। उसे यह यह तय करना चाहिए कि कच्चे माल और अंतिम उत्पाद के बीच की कीमतों को न्यूनतम स्तर पर लाया जाए। ऐसा करने से बिचौलियों के कई स्तरों को समाप्त करने के साथ ही सप्लाई चेन की कुशलता बढ़ाई जा सकेगी और टेक्नोलॉजी के उपयोग से बेहतर इनवेंटरी प्रबंधन को बढ़ावा मिलेगा।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="font-family: arial, helvetica, sans-serif;">किसान संगठनों और सरकार को खुले मन से बातचीत का नया दौर शुरू करना चाहिए। जिसके केंद्र में ऐसा दीर्घकालिक परिप्रेक्ष्य हो जहां युवा पीढ़ी कृषि के प्रति उत्साही, समर्पित और प्रेरित किसान के रूप में हों। यह सकारात्मक माहौल भविष्य में भी जारी रहे। यही वह रास्ता है जिसके जरिये हम आने वाले दशकों में देश के करीब डेढ़ अरब लोगों के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित कर सकेंगे।</span></p>
<p style="text-align: left;"><span style="font-family: arial, helvetica, sans-serif;"><strong>(<em>राहुल कुमार, लेक्टलिस इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर हैं। दुनिया के सबसे बड़े डेयरी ग्रुप लेक्टलिस की 150 देशों में उपस्थिति है और इसका सालाना टर्नओवर 22 अरब डॉलर है। भारत में ग्रुप की तीन कंपनियां तिरुमला, अनिक और प्रभात हैं, इनमें प्रभात दूध और डेयरी उत्पाद बेचती है। लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं )</em></strong></span></p>
<p style="text-align: left;"><em><span style="font-family: arial, helvetica, sans-serif;"><strong>&nbsp;</strong></span></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ किसानों को एमएसपी की कानूनी गारंटी मिले ]]></media:description>
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	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[पंचायत चुनाव में बहुत कुछ दांव पर है, उम्मीदवारों से सवाल जरूर पूछिए]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/panchayat-elections-in-uttar-pradesh-Voters-needs-to-ask-question-from-Candidates.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 16 Apr 2021 04:30:48 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/panchayat-elections-in-uttar-pradesh-Voters-needs-to-ask-question-from-Candidates.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव हो रहे हैं। ये चुनाव कई चरणों में होंगे। पहले चरण का मतदान 15 अप्रैल को संपन्न हुआ है। हालांकि ये चुनाव किसी पार्टी के चुनाव चिन्ह पर नहीं हो रहे हैं फिर भी राजनीतिक दलों की इसमें काफी सक्रिय भूमिका है। पहले पंचायत चुनावों में राजनीतिक दलों की इतनी रुचि नहीं होती थी, लेकिन पैसे को देखते हुए वे काफी ज्यादा रुचि लेने लगे हैं।</p>
<p>राज्य वित्त आयोग तथा केंद्र और राज्य सरकारों की प्रायोजित योजनाओं को छोड़ भी दें, तो उत्तर प्रदेश की पंचायतों को 2021-22 से 2025-26 तक 5 वर्षों में केंद्र सरकार से 15वें वित्त आयोग&nbsp; के तहत 38,012 करोड़ रुपए मिलेंगे। यह रकम 14वें वित्त आयोग की सिफारिशों से अधिक है। लोग उम्मीदवारों के नाम घोषित होने के साथ ही &nbsp;&nbsp;यह जानना चाहते हैं कि उम्मीदवार उनकी जाति या विचारधारा के हैं या नहीं। सच कहा जाए तो विचारधारा पीछे चली गई है क्योंकि अनेक उम्मीदवार चुनाव जीतने की उम्मीद में सीमा लांघ कर दूसरी पार्टियों में चले गए हैं। अलग अलग राजनीतिक शक्तियां हाथ भी मिला रही हैं ताकि विपक्षी शक्तियों को कड़ी टक्कर दी जा सके। इन परिस्थितियों में पंचायती राज व्यवस्था के तीनों स्तर के प्रतिनिधियों का चुना जाना बड़ी रोचक घटना हो सकती है। प्रदेश की 75 जिला पंचायतों, 822 क्षेत्र पंचायतों और 58791 ग्राम पंचायतों में 8,26,458 प्रतिनिधियों को चुना जाना है।</p>
<p>विडंबना है कि चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों को नहीं मालूम कि अगर वे जीत गए तो उनका एजेंडा क्या होगा। ना ही मतदाताओं को इस बात की जानकारी है कि उन्हें प्रत्याशियों से क्या सवाल पूछना चाहिए, सिवाय अपने इलाके में खड़ंजा और पड़ंजा बिछाने के। देश में होने वाले अन्य चुनावों की तरह प्रत्याशी यहां भी दावा कर रहे हैं कि चुने जाने के बाद वे गांव का विकास करेंगे और ग्रामीणों की सभी समस्याएं दूर करेंगे। इसलिए जाते-जाते वे लोगों से कहते हैं, &ldquo;जब वोट डालने जाएं तो मुझे जरूर याद रखिएगा।&rdquo; प्रचार में जाति की भी अहम भूमिका होती है। इस आलेख में यह बताने की कोशिश की गई है कि अलग-अलग स्तर के प्रतिनिधियों से मतदाताओं को किस तरह के सवाल पूछने चाहिए।</p>
<p>क्या उन्होंने उत्तर प्रदेश पंचायती राज कानून को देखा और पढ़ा है? अगर पढ़ा है तो उसकी मुख्य बातें क्या है? पंचायत से जुड़ा एक ही कानून है या ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत के लिए अलग-अलग कानून हैं? ग्राम पंचायत विकास योजना (जीपीडीपी) में वार्ड के सदस्य की क्या भूमिका होती है? जीपीडीपी तैयार करने में फ्रंटलाइन वर्करों की भूमिका क्या रहती है? ग्राम पंचायत की कितनी बैठकें एक महीने में होनी चाहिए? इसी तरह क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायतों में कितनी बैठक होनी चाहिए? पंचायतों के ठीक तरह से काम करने के लिए क्या समितियां बनाई जाएंगी? अगर वे हां कहते हैं तो उनसे यह भी पूछिए कि पंचायत के अलग-अलग स्तर पर कौन-कौन सी समितियां बनाई जाएंगी? ऑडिट किस तरह किया जाता है? 15वें वित्त आयोग ने पंचायत को फंड जारी करने के लिए ऑडिट से संबंधित क्या शर्ते रखी हैं? क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत के सदस्यों के कार्य क्या हैं? ऐसा देखा गया है कि क्षेत्र पंचायत स्तर पर उनकी भूमिका प्रमुख चुनने और जिला स्तर पर अध्यक्ष चुनने तक सीमित होती है, और वह भी पैसे के बिना नहीं होती। एसडीजी क्या है? अलग-अलग स्तर के पंचायतों की गतिविधियों के साथ ये किस तरह जुड़े हैं? यह सवाल तब अधिक प्रासंगिक होगा जब चुनाव लड़ने वाला प्रत्याशी यह कहे कि वह गांव में विकास के कार्य करेगा। उनसे यह पूछा जाना चाहिए कि स्थानीय संदर्भ में विकास का मतलब क्या है?</p>
<p>73वें संविधान संशोधन के मुताबिक पंचायतों पर आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय की योजना बनाने की जिम्मेदारी है। इनमें संविधान की 11वीं अनुसूची में शामिल 29 विषय भी शामिल हैं। यहां योजना बनाने का मतलब सिर्फ गांव की औसत आमदनी और समृद्धि बढ़ाना नहीं, बल्कि समानता भी है। दूसरे शब्दों में कहें तो कमजोर परिवारों को भी योजना का लाभ मिलना चाहिए। इस संदर्भ में मतदाताओं को यह सवाल भी करना चाहिए कि आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए योजना बनाने का अर्थ क्या है। यह विषय इसलिए प्रासंगिक हो जाता है क्योंकि आजकल स्थानीय स्तर पर गवर्नेंस लोगों की साझेदारी के आधार पर नहीं होता, बल्कि विभिन्न पक्षों के बीच सेटिंग के आधार पर होता है। आमतौर पर पंचायत प्रतिनिधि पहले तो लोगों को बैठकों और गतिविधियों के बारे में जानकारी देते हैं। लेकिन एक बार अधिकारियों और दूसरे पक्षों के साथ उनकी सेटिंग हो जाती है तब उन्हें लोगों की चिंता नहीं रहती और वे पंचायत को नियमों के मुताबिक नहीं चलाते हैं।</p>
<p>यह बात बड़ी खेदजनक है कि पंचायत चुनाव 3 पक्षों के बीच बिजनेस डील बन गए हैं। ये पक्ष हैं अपना दबदबा रखने वाले जातिगत नेता, प्रॉक्सी उम्मीदवार और मतदाता। आरक्षित सीटों पर प्रभुत्व रखने वाली जाति अपने प्रॉक्सी उम्मीदवार का सीधा समर्थन करती है। सिद्धार्थ मुखर्जी ने 2018 में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले की 3 आरक्षित ग्राम पंचायतों का अध्ययन किया था। उन्होंने खुलासा किया कि एक ग्राम पंचायत में चुनाव प्रचार और मतदाताओं को लुभाने में औसतन 5 से 6 लाख रुपए खर्च होते हैं। ग्राम पंचायत प्रमुख राजनीति में तभी बना रह सकता है अगर वह कड़ी में हर स्तर पर कमीशन का भुगतान करें। इस कड़ी में ग्राम विकास सचिव, जूनियर इंजीनियर, ब्लॉक स्तर का कर्मचारी और जिला पंचायत सभी शामिल होते हैं। यह सेटिंग का एक उदाहरण है। इसलिए मतदाताओं को अलग-अलग स्तर पर काम कर रहे इस सेटिंग को तोड़ना चाहिए।</p>
<p>मैं मतदाताओं को जवाबदेही के बारे में भी बताना चाहूंगा जो प्रभावी ग्रामीण गवर्नेंस में एक महत्वपूर्ण तत्व होता है। योगदान और जवाबदेही के बीच प्रत्यक्ष संबंध होता है। मतदाताओं को पंचायतों में योगदान करने के लिए आगे आना चाहिए। यह योगदान टैक्स, फीस आदि के रूप में होता है। इस तरह का योगदान मतदाताओं को एक तरह से पंचायत का मालिकाना हक देता है। यहां बेसले और पर्सन का उद्धरण देना उचित होगा, जिनका कहना है कि नागरिकों और राज्य के बीच एक सामाजिक अनुबंध होता है। राज्य की भूमिका सबके लिए बेहतर परिस्थितियां बनाने की होती है। राज्य सबके लिए बुनियादी सेवाएं मुहैया कराता है और पुनर्वितरण के जरिए कमजोर वर्गों की रक्षा करता है। अगर राज्य इस अनुबंध का पालन नहीं करता है तो नागरिक उसे जिम्मेदार ठहरा सकता है। यहां राज्य की जगह हम पंचायत को रख सकते हैं। राज्य जो सेवाएं मुहैया कराने का वादा करता है उसके लिए अगर नागरिक प्रत्यक्ष रूप से भुगतान नहीं करता है तो राज्य को जिम्मेदार ठहराने का भी उसे कोई हक नहीं होता है। अगर नागरिक भुगतान नहीं करता है तो वह मुफ्त में सेवाओं सेवाएं लेता है। जब वह सेवाओं के बदले भुगतान करेगा तभी वह राज्य को जवाबदेह ठहरा सकता है। यही बात पंचायती राज पर भी लागू होती है। इसलिए पंचायत के कोष में अंशदान करने की जिम्मेदारी मतदाताओं की होती है। तभी वे चुने हुए प्रतिनिधियों को जिम्मेदार ठहरा सकते हैं और सेटिंग की व्यवस्था को दूर कर सकते हैं।</p>
<p><strong>(डॉ. महिपाल इंडियन इकोनॉमिक सर्विस के रिटायर्ड अधिकारी और कृपा फाउंडेशन के प्रेसिडेंट हैं। उनसे <a href="mailto:mpal1661@gmail.com">mpal1661@gmail.com</a> पर संपर्क किया जा सकता है, लेख में विचार उनके निजी हैं )</strong></p>
<p>&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ पंचायत चुनाव में बहुत कुछ दांव पर है, उम्मीदवारों से सवाल जरूर पूछिए ]]></media:description>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कितनी कारगर है केन &amp;#45; बेतवा  लिंक परियोजना]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/Ken-Betwa-link-project-has-some-unanswered-questions.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 28 Mar 2021 11:27:40 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/Ken-Betwa-link-project-has-some-unanswered-questions.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p></p>
<p>पिछले दिनों विश्व जल दिवस पर माननीय प्रधान मंत्री की अध्यक्षता में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्रियों के बीच केन बेतवा लिंक प्रोजेक्ट को लेकर समझौता हुआ।&nbsp; केन बेतवा लिंक प्रोजेक्ट के तहत केन नदी पर पन्ना नेशनल टाइगर पार्क के बीच 73.4 मीटर ऊँचा और 1468 मीटर लम्बा बांध बनाकर और उससे 231.45 &nbsp;किलोमीटर लम्बी नहर निकालकर 1020 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी बेतवा नदी में ट्रांसफर किया जाएगा। जिसकी परियोजना लागत 2004 में 1188.75 करोड़ रुपये थी, जो अब बढ़कर लगभग 45 हजार &nbsp;करोड़ रुपये हो गयी है। इतना पैसा खर्च करने पर भी अगर 10 गाँवो के स्थानीय लोगो को विस्थापित करने और &nbsp;कृषि भूमि का अधिग्रहण करने के पश्चात भी स्थायी रोज़गार न मिल सके तब इतना पैसा विकास के नाम पर खर्च करने का&nbsp; कोई महत्व नहीं रह जाता है। नहर के रास्ते में कई राष्ट्रीय और राज्य राजमार्ग, रेलवे लाइन, पुल, घाटिया, पड़ेगे। उसके लिए हो सकता है कि केन के जल को बेतवा तक ले जाने के लिए पंप भी करना पड़ सकता है। ऐसे में जितनी बिजली ( 72 मेगावाट)&nbsp; केन बेतवा लिंक परियोजना में बनेगी उससे कही ज्यादा पानी को पंप करने में खर्च हो जायेगी।</p>
<p>केन नदी में इतना पानी उपलब्ध ही नहीं है जितना कि बेतवा नदी में ट्रांसफर किया जाना है | रेत और पत्थर &nbsp;खनन व जलवायु&nbsp; परिवर्तन के कारण नदिया सूख रही है और भूमिगत जल का स्तर नीचे जा रहा है | यही कारण है कि गर्मियों में केन नदी बाँदा जिले में सूख जाती है। बुंदेलखंड में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के कारण पहले लगभग 52 दिन बारिश होती थी, लेकिन अब बारिश की अवधि घटकर मात्र 25 दिन रह गयी है। इस परियोजना पर जो अध्धयन राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी द्वारा किया गया अगर उसको भी ध्यान से देखा जाय तो स्पष्ट है कि केन में बेतवा नदी से कम पानी है | यानी इस परियोजना में छोटी नदी का पानी बड़ी नदी में&nbsp; ट्रांसफर किया जाना है। जो की नदी लिंक परियोजना के सिद्धांत के विरूद्ध है |</p>
<p>पन्ना नेशनल टाइगर पार्क की लगभग 50 वर्ग किलोमीटर जमीन डूब क्षेत्र में आएगी जिससे पार्क में जंगली जानवरो की 10 ऐसी प्रजातियां है जो वन्य जीवन संरक्षण अधिनियम 1972 की अनुसूची एक के अंतर्गत आती है। 23 प्रकार की मछलिया, 153 प्रजाति के पंछी, 229 प्रजाति के पेड़ पौधे आदि&nbsp; डूब क्षेत्र में आकर नष्ट हो जायेगे। इसके अलावा सरकार की तरफ से इस प्रोजेक्ट में किसानो की आमदनी बढ़ाने के लिए संपर्क नहर के किनारे नकदी फसलों को भी बढ़ावा दिया जाएगा जिनमे सिंचाई की आवश्यकता ज्यादा होती है | कुल मिलाकर किसानो को जितना फायदा होगा उसका बड़ा हिस्सा रासायनिक खाद, कीटनाशकों और सिंचाई पर किसान को खर्च करना पड़ेगा | कोदो, कुटकी, जौ, बाजरा, इत्यादि की बात करे, ये वह अनाज है, जो पिछले सैकड़ों साल से बुंदेलखंड के लोगो की जरूरतों को पूरा कर रहे है|&nbsp; ये अनाज स्वास्थ की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण होते हैं, क्योकि इन अनाजों में सबसे पहला गुण यह है कि ये क्षारीय होते है| यह बात वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो चुकी है की क्षारीय वातावरण में कोई भी बीमारी पैदा नहीं हो सकती । दूसरा, वैज्ञानिकों द्वारा की गयी रिसर्च से ये साबित हो चुका है कि इनअनाजों में हृदय से सम्बंधित बीमारियां को रोकने की क्षमता होती है और यह &nbsp;एंटीऑक्सीडेंट की तरह कार्य करते है । महिलाओं के लिए स्वास्थ की दृष्टि से ये छोटे अनाज तो एक तरह से वरदान होते है| आने वाले समय में बुंदेलखंड के किसानों का खेत उनको व्यापार करने का&nbsp; व पैसा कमाने का मौका दे सकता है सिर्फ जरुरत है अपने पारम्परिक खेती के ज्ञान व तरीको को समृद्ध करने की ।</p>
<p>केन नदी पर पन्ना नेशनल टाइगर पार्क के बीच जो दौधन बांध बनाया जाएगा उसकी डिज़ाइन में अवसादन दर 357 क्यूबिक मीटर प्रति वर्ग किलोमीटर प्रति वर्ष मानी गयी है लेकिन जंगल की कटाई होने के कारण अवसादन दर स्वभाभिक है ज्यादा होगी। राष्ट्रीय केंद्र मृदा सर्वेक्षण और भूमि उपयोग योजना के अनुसार मिटटी की अपरदित दर माध्यम से लेकर अपने उच्चतम दर पर आंकी गयी है। जिससे बांध की उपयोगिता 100 वर्ष जो अनुमानित है, वह नहीं होगी। दो पहाड़ियों के बीच बनाने वाले बांध में अवसादन दर बहुत ज्यादा होगी।</p>
<p>बुंदेलखंड में केन बेतवा लिंक प्रोजेक्ट का विकल्प तालाब हैं। इसका उत्तर तो चंदेल और बुंदेली राजाओं ने आज से 500 साल पहले बुंदेलखंड में तालाब बनवाकर दिया था| उनके बनवाये तालाब आज भी बुंदेलखंड के हर जिले में उपयोगी है | इसके अलावा बुंदेलखंड की कृषि भूमि में कार्बनिक मैटीरियल की मात्रा कम होने के कारण कृषि भूमि की नमी बनाये रखने के लिए तालाब का किसान के पास होना बहुत जरुरी है। अगर बांधों के माध्यम से बुंदेलखंड की प्यास पूरी होती या बुझती तो ललितपुर में एशिया में सबसे ज्यादा बांध है इसके बाबजूद वहां की 30 से 40 फीसदी &nbsp;कृषि भूमि असिंचित है | अगर बांध और तालाब की तुलना की जाय तो बांध से विस्थापन होता है, जंगल नष्ट होते है, किसान को सिंचाई के लिए कभी भी समय से पानी नहीं मिलता, बांध के सिर्फ 30 से 40 फीसदी जल का उपयोग हो पाता है। बांध से जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा मिलता है, लेकिन तालाब से ऐसा कुछ नुकसान नहीं होता है |</p>
<p>महात्मा गाँधी, विनोबा, नाना जी देशमुख और तालाबों के जानकार अनुपम मिश्रा जैसे लोगो के विचार अगली पीढ़ी में स्थान्तरित करके उनको सच्ची श्रद्धांजलि दे पाते है। अगर हम आज की तारीख में केन बेतवा लिंक परियोजना की आधी कीमत यानी 22 हजार करोड़ रुपये से तालाबों का निर्माण कराते है तो दो लाख रुपये की औसत लागत से 1200 क्यूबिक मीटर क्षमता वाले करीब 14 लाख तालाब बन जाएंगे |</p>
<p>अगर वैश्विक स्तर देखा जाय तो भारत सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के द्वारा जो कम कार्बन जीवन शैली के दिशा निर्देशों व आकड़ों के माध्यम से कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन की बोरवेल कारक के हिसाब से गणना की जाय तो पूरे बुंदेलखंड में तालाबों के माध्यम से लगभग 51 लाख टन कार्बन डाई ऑक्साइड का ह्रास प्रतिबर्ष तालाबों के माध्यम से होता है जो की एक बहुत बड़ी मात्रा है | अतः यह कहा जा सकता है कि बुंदेलखंड की कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन की समस्या तालाबों के माध्यम से हल हो जायेगी और बुंदेलखंड वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन में पेरिस समझौता में अपना सहयोग भी देता है या बड़े पैमाने पर दे सकता है |</p>
<p>यही वजह थी, कि तालाबों के उपरोक्त लाभ के कारण चित्रकूट से लौटकर 30 मार्च 2003 को नई दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में एक रैली में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने कहा था कि " नानाजी से सीखें, कैसे बदला जा सकता है देश "। चित्रकूट के उस इलाके में जहा डाकुओ का बड़ा जोर था, आतंक था, लोगो का जीना मुहाल था।&nbsp; लेकिन जब बारिश का पानी तालाबों के माध्यम से रोका गया तो खेतो में गेहूं की हरी हरी बालिया खड़ी हो गई और जिंदगी का रूप बदलने लगा। नानाजी ने भी एक बूढ़े किसान से सीख लेकर जल संरक्षण पर कार्य शुरू किया था और जल प्रबंधन योजनाओ के सुखद परिणाम को देखकर यही कहा था, कि पता नहीं क्यों राजनेता और नौकर शाह इसे सफल बनाने में रूचि नहीं रखते है। इसलिए बुंदेलखंड में केन बेतवा लिंक प्रोजेक्ट की नहीं बल्कि किसान को ऐसी कृषि से जोड़ने की जरूरत है जिसमें स्थानीय और वैश्विक पर्यावरणीय, सामाजिक और आर्थिक समस्याओं का समाधान हो।</p>
<p><strong>( गुंजन मिश्रा, पर्यावरणविद हैं और बुंदेलखंड उनका कार्यक्षेत्र है। लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं।)</strong></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ कितनी कारगर है केन - बेतवा  लिंक परियोजना ]]></media:description>
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	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[नए कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन क्यों कर रहे हैं किसान, क्या हो आगे का रास्ता]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/WHY-DO-THE-NEW-FARM-LAWS-AGITATE-FARMERS.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 26 Mar 2021 11:25:22 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/WHY-DO-THE-NEW-FARM-LAWS-AGITATE-FARMERS.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p></p>
<p>ऐसा लगता है, यह बात किसी की भी कल्पना से परे थी कि केंद्र सरकार के तीन कृषि कानून भारत के हाल के इतिहास में किसानों का अभूतपूर्व आंदोलन खड़ा कर देंगे। हजारों की तादाद में किसान 4 महीने से दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं पर आंदोलन कर रहे हैं। उनकी मांग तीनों कृषि कानूनों को खत्म करने की है। ये कानून हैं,&nbsp; 1) फार्मर्स प्रोड्यूस ट्रेड एंड कॉमर्स (प्रमोशन एंड फैसिलिटेशन) एक्ट 2020, 2) फार्मर्स (एंपावरमेंट एंड प्रोटेक्शन) एग्रीमेंट ऑन प्राइस एश्योरेंस एंड फार्म सर्विसेज एक्ट 2020 और 3) एसेंशियल कमोडिटीज अमेंडमेंट एक्ट 2020. इन कृषि कानूनों के खिलाफ देश के अन्य हिस्सों में भी छोटे पैमाने पर आंदोलन हुए।</p>
<p>सरकार का दावा है कि नए कृषि कानून किसानों को एपीएमसी मंडी में व्यापारियों और कमीशन एजेंट के शोषण से बचाने के मकसद से लाए गए हैं। लेकिन किसानों को आशंका है कि इन कानूनों से अंततः एपीएमसी मंडी और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की व्यवस्था खत्म हो जाएगी और कृषि के कॉरपोरेटाइजेशन का रास्ता खुल जाएगा। इससे किसानों की जमीन, उनकी आजीविका और आमदनी की सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी। हालांकि इन तीनों कृषि कानूनों से होने वाले फायदे और उनसे खतरों को लेकर संभावनाएं या आशंकाएं काफी बढ़ा चढ़ाकर व्यक्त की जा रही हैं।</p>
<p><strong>राज्यों के सुधारों के अनुभव</strong></p>
<p>बीते डेढ़ दशक में देश के अनेक राज्यों ने मॉडल कृषि उपज विपणन समिति (एपीएमसी) कानून 2003 को कुछ बदलाव के साथ अपनाया और अपने कृषि मार्केटिंग व्यवस्था में आंशिक या पूरी तरह से सुधार किया। आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, असम, गोवा, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, महाराष्ट्र, राजस्थान, सिक्किम, तमिलनाडु, पंजाब और त्रिपुरा जैसे राज्यों ने निजी कंपनियों के बाजार स्थापित&nbsp; करने अथवा किसान बाजार खोलने की कानूनी अड़चनों को समाप्त किया और ऐसी व्यवस्था की ताकि प्रोसेसर, निर्यातक और अन्य बड़े खरीदार सीधे किसानों से उनकी उपज खरीद सकें। राज्यों ने कांट्रैक्ट फार्मिंग यानी ठेके पर खेती की व्यवस्था भी लागू की। आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, सिक्किम, तमिलनाडु ने प्रदेश के भीतर ई-ट्रेडिंग की कानूनी अनुमति दी है। इसके अलावा ई-नाम के तहत 585 थोक मंडियों को इलेक्ट्रॉनिक तरीके से जोड़ा गया है। कुछ राज्यों ने या तो फल और सब्जियों की खरीद-बिक्री को विनियमित कर दिया है या फिर उन पर मार्केट फीस खत्म कर दी है।</p>
<p>यह सच है कि उपरोक्त सुधारों में कई जगहों पर खामियां हैं जिन्हें दूर करने की जरूरत है। लेकिन अभी तक सुधार के जो कदम लागू किए गए हैं उनसे किसान हितों पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ा है। यह बात भी गौर करने लायक है कि इन सुधारों के विरोध में देश में कहीं भी किसानों ने आंदोलन नहीं किया। दूसरी तरफ यह बात भी सच है कि इन तथाकथित सुधारों से ना तो किसान बिचौलियों के चंगुल से निकल सके और ना ही किसानों की आशंका के मुताबिक कृषि पर कॉर्पोरेट का कब्जा हुआ।</p>
<p><strong>नए कानूनों के संभावित असर</strong></p>
<p>नए कृषि कानून यदि लागू किए जाते हैं तो इनसे कई फायदे हो सकते हैं- एपीएमसी मंडियों के बाहर, प्रदेश के भीतर और दो राज्यों के बीच व्यापारिक बाधाएं खत्म हो सकती हैं, फूड प्रोसेसर, निर्यातक और अन्य बड़े खरीदारों के लिए आवश्यक वस्तुओं की स्टॉक होल्डिंग की सीमा खत्म हो जाएगी, देश में कहीं भी कांट्रैक्ट फार्मिंग के लिए एक कानूनी ढांचा उपलब्ध होगा। इनसे एक तरफ तो प्रोसेसर, निर्यातक और थोक कारोबारियों के लिए बिजनेस में आसानी होगी तो दूसरी तरफ बाजार तक किसानों की पहुंच बढ़ेगी।</p>
<p>लेकिन इसके साथ हमें यह भी नहीं मान लेना चाहिए कि एपीएमसी मंडियों के बाहर निजी कारोबारी किसानों का शोषण कम करेंगे और उन्हें उनकी उपज की उचित कीमत देंगे। एक ऐसे गैर नियमन वाले (अनरेगुलेटेड) बाजार में जहां कुछ चुने हुए लोगों का नियंत्रण होगा, वहीं व्यापारियों के बीच कार्टेलाइजेशन अधिक और प्रतिस्पर्धा कम हो सकती है। इससे किसानों को उनकी उपज की कम कीमत मिलेगी। ई-ट्रेडिंग में अभी तक बिचौलियों की भूमिका को खत्म नहीं किया जा सका है। दूर बैठे बड़े खरीदार कृषि उपज की गुणवत्ता देखने के लिए स्थानीय व्यापारियों पर ही निर्भर करते हैं। देश के जो इलाके अल्पविकसित हैं वहां कोई संगठित निजी व्यापार नहीं होता है। इन अल्पविकसित इलाकों में किसानों को पर्याप्त संख्या में बाजार, जो उचित दूरी पर हों, पक्की सड़कें, ट्रांसपोर्टेशन की सुविधाएं, बैंक, वेयरहाउस और कोल्ड स्टोरेज की सुविधाएं चाहिए। इसके अलावा मौजूदा 22000 ग्रामीण हाटों को अपग्रेड करने और उन्हें नियमित थोक बाजारों से जोड़ने की भी जरूरत है। जब तक ये कदम नहीं उठाए जाते तब तक उपभोक्ता द्वारा चुकाई गई कीमत में किसानों को मिलने वाला हिस्सा बढ़ाना मुमकिन नहीं है। उदाहरण के लिए, बिहार में 2006 में एपीएमसी कानून खत्म किए जाने के बावजूद अभी तक फसल कटाई के बाद इंफ्रास्ट्रक्चर और मार्केटिंग की उचित व्यवस्था नहीं हो पाई है। नतीजा यह कि किसान अपनी उपज की कम कीमत लेने के लिए मजबूर हैं।</p>
<p>कृषि में अगर निजी कॉरपोरेट का निवेश बढ़ता है तो यह वेयरहाउस, कोल्ड स्टोरेज, बाजार और ट्रांसपोर्टेशन सुविधा जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास के लिए महत्वपूर्ण होगा। एग्रो प्रोसेसिंग और निर्यात में भी निवेश बढ़ेगा। इससे बाजार तक किसानों की पहुंच बढ़ेगी। उन्हें अपनी उपज की बेहतर कीमत मिलेगी और ग्रामीण इलाकों में रोजगार का सृजन होगा। महत्वपूर्ण यह है कि बिजनेस के साथ किसानों, किसान कोऑपरेटिव और उत्पादक संगठनों की साझेदारी हो। अभी कृषि में जो पूरा निवेश होता है उसमें निजी कॉरपोरेट का हिस्सा सिर्फ 2.3% है। इसकी मुख्य वजह उचित नीतिगत वातावरण और बेहतर गवर्नेंस की कमी है।</p>
<p>जहां तक कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की बात है तो अक्सर इससे गलती से कॉरपोरेट फार्मिंग मान लिया जाता है। कांट्रैक्ट फार्मिंग में जमीन पर किसान का मालिकाना हक और खेती का अधिकार पूरी तरह सुरक्षित रहता है, जैसा कि नए कानून में भी कहा गया है। जब उपज को खरीदने में प्रतिस्पर्धा होगी तो कांट्रैक्ट फार्मिंग में किसानों को अधिक कीमत भी मिलेगी। खासकर तब जब किसान कोऑपरेटिव, स्वयं सहायता समूह अथवा एफपीओ (फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गेनाइजेशन) के माध्यम से संगठित हों और उनके पास बाजार से जुड़ी भरोसेमंद सूचनाएं हों। हालांकि यहां कॉन्ट्रैक्ट पर अमल के लिए उचित कानूनी और संस्थागत फ्रेमवर्क भी महत्वपूर्ण है। यह फ्रेमवर्क पंजाब में बासमती चावल और टमाटर तथा उत्तर प्रदेश में गन्ना के कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग जैसा ना हो।</p>
<p>कुछ अर्थशास्त्री गलत तर्क देते हैं कि एपीएमसी ने किसानों को नुकसान पहुंचाया और उन्हें अपनी उपज को कम कीमत पर एपीएमसी मंडियों में बेचने के लिए मजबूर किया है। एनएसएसओ के आंकड़े बताते हैं कि खरीफ की धान जैसी प्रमुख फसल के मामले में भी कुल उपज का सिर्फ 29% मंडियों के जरिए बेचा गया। स्थानीय व्यापारियों और इनपुट डीलर्स के जरिए 49% धान कम कीमत पर बेचा गया। कुल धान खरीदी में कोआपरेटिव और सरकारी एजेंसियों का हिस्सा 17% रहा।</p>
<p><strong>आंदोलन की मुख्य वजह</strong></p>
<p>यहां इस बात को समझा जाना चाहिए कि जरूरी नहीं कि किसानों का मौजूदा आंदोलन कृषि के कॉरपोरेटाइजेशन की उनकी गलत धारणा की वजह से हो रहा है। राजनीति के अलावा इसकी एक और वजह है कृषि में निरंतर गिरती लाभप्रदता और केंद्र सरकार की तरफ से जगाई गई यह उम्मीद है कि 2015-16 आधार वर्ष की तुलना में किसानों की आमदनी 2022-23 तक दोगुनी हो जाएगी। यह भी सच है कि ए2+एफएल लागत के ऊपर 50% मार्जिन के आधार पर नए एमएसपी का लाभ हर इलाके के किसानों को सभी फसलों के लिए नहीं मिल पाता है। केंद्र सरकार ने 2018-19 के बजट में एमएसपी से कीमत में अंतर के भुगतान का वादा किया था लेकिन उसे अभी तक पूरी तरह लागू नहीं किया गया है। आंदोलन कर रहे किसानों की एक प्रमुख मांग सभी फसलों के लिए एमएसपी की कानूनी गारंटी देना है। हालांकि बिक्री योग्य सभी फसलों को समर्थन मूल्य पर खरीदने के लिए ना तो सरकार के पास पैसे हैं ना ही भौतिक और प्रशासनिक इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध है। इसके अलावा इतने बड़े पैमाने पर फसल खरीदने की नीति को विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में चुनौती भी मिल सकती है। इसीलिए कृषि विपणन में निजी क्षेत्र की साझेदारी बढ़ाने की आवश्यकता है।</p>
<p>इसी से जुड़ा मुद्दा है गन्ना मिलों की तरफ से किसानों को गन्ने की वैधानिक कीमत का भुगतान ना करना। बार-बार बाजार के विफल होने के कारण अनेक जगहों पर बागवानी फसलों में विविधीकरण से भी किसानों को कोई खास लाभ नहीं हुआ है। जब तक ये चिंताएं दूर नहीं की जाती हैं तब तक किसानों का आंदोलन जारी रह सकता है।</p>
<p><strong>आगे क्या</strong></p>
<p>कहा जा सकता है कि तीनों कृषि कानून किसान हितों पर विपरीत प्रभाव नहीं डालेंगे। इसलिए किसानों को एक ऐसे शत्रु के खिलाफ लड़ाई नहीं करनी चाहिए जिसका अस्तित्व ही नहीं है। लेकिन इसके साथ यह भी महत्वपूर्ण है कि सुधार के अन्य कदमों को उठाए बगैर हमें नए कानूनों से किसी चमत्कार या क्रांतिकारी नतीजे की उम्मीद भी नहीं करनी चाहिए। अन्य सुधारों के रूप में लीज पर जमीन देने को कानूनी मान्यता, ग्रामीण हाट को अपग्रेड करना और थोक बाजारों से उन्हें जोड़ना, संस्थागत कर्ज बढ़ाना, साहूकारी कर्ज को नियंत्रित करना शामिल हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य का एक नया फ्रेमवर्क भी तैयार किया जाना चाहिए जिसमें कीमत में अंतर के भुगतान या&nbsp; कृषि आय बीमा की व्यवस्था हो। इससे बाजार कम विकृत होगा और किसान को भी फायदा मिलेगा। किसानों का आंदोलन लंबा चलना सबके लिए नुकसानदायक है। इसलिए सरकार को इसे खत्म करने का रास्ता तलाशना चाहिए। अगर इसके लिए कानूनों में संशोधन की जरूरत पड़े तो सरकार को वह भी करना चाहिए।</p>
<p>प्रमुख संशोधन इस प्रकार होने चाहिए- 1) एपीएमसी मंडी के भीतर और बाहर व्यापार के नियम एक हो, 2) उपज की औसत क्वालिटी का एमएसपी ही आधार या संदर्भ मूल्य हो जो एपीएमसी के बाहर और भीतर दोनों जगहों पर लागू हो, यह कीमत कांट्रैक्ट फार्मिंग पर भी लागू हो, अगर कहीं किसान को कीमत कम मिलती है तो अंतर का भुगतान सरकार करे, 3) ऐसे कदम उठाए जाएं जिनसे व्यापारियों और कॉरपोरेट के कार्टलाइजेशन ना हो, 4) कानून लागू करने और विवाद निपटाने की बेहतर व्यवस्था हो और 5) कीमत और बाजार से जुड़ी सूचनाओं की भरोसेमंद व्यवस्था हो। दुर्भाग्यवश इस मुद्दे का इतना राजनीतिकरण कर दिया गया है कि अब सरकार को कृषि में सुधार के अच्छे कदम उठाने में भी डर लगेगा।</p>
<p><strong>(लेखक कृषि लागत एवं मूल्य आयोग के पूर्व चेयरमैन हैं। वे नीति आयोग में भू-नीति सेल के भी चेयरमैन रह चुके हैं। अभी वे नई दिल्ली स्थित काउंसिल फॉर सोशल डेवलपमेंट में विशिष्ट प्रोफ़ेसर और सेंटर फॉर एग्रीकल्चरल पॉलिसी डायलॉग के चेयरमैन हैं)</strong></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ नए कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन क्यों कर रहे हैं किसान, क्या हो आगे का रास्ता ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[बड़े आंदोलनों ने दिये हैं राजनीतिक विकल्प, क्या किसान आंदोलन भी इसे दोहराएगा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/Will-there-be-an-emergence-of-political-alternative-from-farmers-movement.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 17 Mar 2021 11:23:18 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/Will-there-be-an-emergence-of-political-alternative-from-farmers-movement.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>देश में जब जब बड़े आंदोलन हुए उनसे कोई न कोई एक नया चेहरा राष्ट्रीय नेता के रूप में उभर कर सामने आया। उदाहरण के लिए जे पी आंदोलन से राष्ट्रीय जनता दल के लालू प्रसाद यादव, जनता दल यूनाइटेड के नीतीश कुमार और भारतीय जनता पार्टी के सुशील मोदी इन तीनों नेताओं का करियर एक ही सियासी अखाड़े से और लगभग एक ही समय शुरू हुआ। इसी तरह अन्ना आंदोलन से अरविन्द केजरीवाल जैसे नेता अपनी पार्टी की पहचान देश में बनाने के लिए संघर्ष कर रहे है। अगर इतिहास उठा कर देखा जाय तो कांग्रेस जैसी देश की पहली व सबसे पुरानी पार्टी भी आंदोलनों की उपज है।&nbsp; भारत के प्रमुख राजनीतिक दलों में शुमार कांग्रेस का गठन 28 दिसंबर 1885 को हुआ था। इसकी स्थापना अंग्रेज एओ ह्यूम (थियिसोफिकल सोसाइटी के प्रमुख सदस्य) ने की थी। दादा भाई नौरोजी और दिनशा वाचा भी संस्थापकों में शामिल थे। संगठन का पहला अध्यक्ष व्योमेशचंद्र बनर्जी को बनाया गया था। उस समय कांग्रेस के गठन का मुख्&zwj;य उद्देश्य भारत की आजादी था, लेकिन स्वतंत्रता के पश्चात यह भारत की प्रमुख राजनीतिक पार्टी बन गई।&nbsp;</p>
<p>क्या किसान आंदोलन भी इस दिशा की ओर जा रहा है जिससे कोई नेता या पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर उभर कर सामने आएगी। क्योंकि किसान आंदोलन में सम्मलित कई जाने पहचाने चेहरे किसी न किसी पार्टी से परोक्ष व् अपरोक्ष रूप से किसी न किसी पार्टी से जुड़े हुए थे या है। जैसे राकेश टिकैत ही कांग्रेस ओर लोकदल के प्रत्याशी के रूप में दो बार चुनाव लड़ चुके है | हालाँकि उनको हार का मुँह देखना पड़ा। इसी तरह दर्शन पाल , जगमोहन पटियाला , हन्नान मोल्ला सीपीआई से जुड़े है। योगेंद्र यादव भी अन्ना आंदोलन से निकल कर आये हुए है, आप पहले आम आदमी पार्टी से जुड़े रहे, जब वह २०१५ में आम आदमी पार्टी से बाहर हुए तब उन्होंने प्रशांत भूषण के साथ मिलकर स्वराज अभियान संगठन की स्थापना की|</p>
<p>किसान आंदोलन से जुड़े नेता लोग अब इस बात का संकेत दे रहे है कि अब वो अपना अस्तित्व राष्ट्रीय स्तर पर लाना चाहते है।&nbsp; क्योंकि जिस तरह से पांच राज्यों में जो विधान सभा चुनाव होने है उनमे किसान आंदोलन के नेताओं ने अपनी भूमिका निभानी शुरू की है उससे इस संभावना को नहीं नकारा जा सकता है कि ने वाले समय में इस आंदोलन से कोई नया राष्ट्रीय नेता निकल कर सामने आने वाला है। इसका एक कारण यह भी है कि किसान आंदोलन को कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस व अन्य पार्टियों का समर्थन भी मिल रहा है। पश्चिम बंगाल में किसान रैलियों के लिए गये राकेश टिकैत की हवाई अड्डे पर अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस की सांसद डोला सेन द्वारा आगवानी करना एवं राकेश टिकैत का बंगाल में चुनाव प्रचार करना इस बात को और &nbsp;पुख्ता करता है।&nbsp;</p>
<p>हो सकता है कि आने वाले दिनों में कॉर्पोरेट जगत भी किसान आंदोलन के पक्ष में खुलकर सामने आ जाए। ये भी कोई बड़ी बात नहीं होगी कि आने वाले समय में परोक्ष रूप में&nbsp; इन आंदोलन के चेहरों में से कोई राष्ट्रीय राजनीति में विकल्प के रूप में देश की जनता को दिखाई देने लगे। क्योंकि चुनाव किसी भी तरह का हो, ग्राम प्रधानी से लेकर लोकसभा तक, पूँजी की जरूरत प्रत्येक पार्टी को होती है | यही वजह है कि औद्योगिक घरानो को चुनाव से दूर नहीं रखा जा सकता है। क्योंकि सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज ने अपने रिसर्च में खुलासा किया था&nbsp; कि 2014 के लोकसभा चुनाव में 30 हजार करोड़ रुपए खर्च हुए थे। जो 2019 में बढ़कर दोगुना हो गया था।&nbsp; यह दुनिया का सबसे महंगा चुनाव साबित हुआ था।&nbsp;</p>
<p>ये अलग बात है कि उभरने वाला नया चेहरा अथवा पार्टी अगर ज्यादा महत्वाकांक्षी नहीं हुयी, तो हो सकता है कि वो किसी राष्ट्रीय पार्टी में शामिल हो जाए। इसलिए किसान आंदोलन को हल्के में नहीं लेना चाहिए क्योंकि आम जनता, अब देश और प्रदेश में, व्यक्तिवादी या पार्टीवादी शासन का जल्दी ही बदलाव का मन बनाती है |&nbsp; इस किसान आंदोलन को गंगा व हाल ही हुए अन्य आंदोलनों की नज़र से देखने की भूल नहीं करनी चाहिए | क्योंकि इन आंदोलनों से किसी राजनैतिक पार्टियों व औद्योगिक घरानो का ज्यादा सम्बन्ध नहीं था | वजह इनमे वोट बैंक और व्यापार को मजबूत करने जैसी कोई सम्भावना नहीं दिखी। हालाँकि यह भी कहा जा रहा है कि मौजूदा परिदृष्य और भविष्य वक्ताओं की घोषणाओं को माने तो केंद्र की सरकार को फिलहाल डरने की जरूरत नहीं है।</p>
<p>&nbsp;<strong>( गुंजन मिश्रा पर्यावरणविद हैं और उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड उनका कार्यक्षेत्र है, लेख में विचार उनके निजी हैं )</strong></p>
<p><strong>&nbsp;</strong></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ बड़े आंदोलनों ने दिये हैं राजनीतिक विकल्प, क्या किसान आंदोलन भी इसे दोहराएगा ]]></media:description>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[अभी तक हाशिए पर क्यों हैं महिलाएं]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/Place-of-Women-in-Indian-Society.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 06 Mar 2021 15:23:05 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/Place-of-Women-in-Indian-Society.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अगर इतिहास पर नज़र डाली जाय तो महिलाओं की भूमिका मानवीय जीवन के साथ अन्य क्षेत्रों में भी बहुत महत्वपूर्ण रही है। क्योंकि महिलाओं का खाद्य प्रणाली से लेकर अंतरिक्ष और अंटार्कटिका तक, कई बहुत महत्वपूर्ण आविष्कारों में योगदान रहा। महिलाएं ही जैव विविधता,जल,जंगल एवं जमीन की मुख्य संरक्षक मानी जाती हैं। इसके बावजूद महिलाओं पर बहुत कम लिखा गया। &nbsp;लेकिन महिलाओं को लेकर उपदेश दिए गए हैं या दिए जाते रहे हैं। इसलिए किसी महिला शख्सियत का बखान थोड़ा बहुत किया जा सकता है। मैं भी शायद यही करने का प्रयास कर रहा हूँ।</p>
<p>इसी के अंतर्गत मैं अपने एक मित्र श्री अमित शुक्ल के इस अवलोकन का जिक्र करना उचित समझता हूँ।&nbsp; श्री शुक्ल जी कहते हैं कि आम बोलचाल की भाषा में समाज में जो दो शब्द महिलाओं या लड़कियों के लिए प्रयोग में लाये जाते हैं, जिनसे पता चलता है कि महिलाओं को आज भी पुरुषों के बराबर अधिकार प्राप्त नहीं है या लड़कियां, लड़कों की बराबरी नहीं कर सकती है। &nbsp;पहला मर्दानी, किसी औरत को मजबूत बताने के लिए पुरुष के विश्लेषण की क्या जरूरत है। दूसरा "ये मेरी बेटी नहीं, बेटा है" इसमें कहीं न कहीं बेटा न होने का भाव छिपा होता है, मतलब मुझे बेटी की नहीं, बेटे की जरूरत है। ये बिलकुल सच है, क्योंकि हर पुरुष में कहीं न कहीं महिलाओं को कमतर आंकने का भाव होता है। वर्ष 2000 के पहले तक मैं भी इस गलत धारणा का शिकार था। लेकिन जब मुझे डॉ वंदना शिवा के साथ काम करने का मौका मिला, तब मुझे पुरुष और स्त्री को उनकी क्षमताओं के अनुरूप &nbsp;समझने का मौका मिला । फिर शादी होने के काफी समय के बाद, ये समझ विकसित हुई कि किसी भी पुरुष को स्त्री का प्रेम ही मनुष्य बना सकता है। तब मुझे पुरुष और स्त्री के रिश्ते को जानने की समझ आयी। लेकिन राजस्थान, ओडिशा, उत्तर पूर्व, झारखण्ड, गुजरात, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, हिमाचल, उत्तराखण्ड और उत्तर प्रदेश के आदिवासी स्थानों पर घूमने के बाद ये भी समझ आया कि सभ्य और पढ़े - लिखे समाज में महिलाओं को उतने अधिकार नहीं हैं, जितने आदिवासी महिलाओं के पास हैं।</p>
<p>महिलाओं और लड़कियों पर बढ़ते अत्याचार भी पढ़े लिखे समाज की देन है।&nbsp; क्योंकि मैंने असभ्य या आदिवासी या जंगली लोगों के बीच लड़कियों और महिलाओं के साथ बलात्कार जैसे घिनौने अपराध कभी नहीं सुने। जंगली समाज में मैंने महिलाओं की स्थिति बहुत ही सम्मानजनक पायी। जैसे कि, उत्तर पूर्व में घर की सबसे छोटी बेटी ही घर की मालकिन होती है। यानी घर की पूरी जायजाद पर छोटी बेटी का अधिकार होता है। उत्तर पूर्व में लड़कियां ससुराल नहीं जातीं बल्कि लड़कों को अपनी पत्नी के घर आना पड़ता है यानी रहना पड़ता है। इसी तरह हिमाचल के बर्फीले स्थानों पर बेटी को वही अधिकार प्राप्त हैं जो लड़को को मिलते हैं। लड़कियां अकेले कहीं भी आ जा सकती हैं। इसका सबसे बड़ा कारण महिलाओं पर घर की पूरी जिम्मेदारी होती है। इसको ऐसे भी कह सकते हैं कि जो स्थान साम्राज्यवाद से दूर रहे, वहाँ महिलाओं की स्थिति पुरुषों की तुलना में बेहतर पायी गयी।</p>
<p>इसको कुछ इस तरह भी समझा जा सकता है, कि तुलसी दास को महाकवि गोस्वामी तुलसीदास बनाने का काम भी उनकी पत्नी द्वारा इस दोहे के माध्यम से किया था। अस्थि चर्म मय देह यह, ता सों ऐसी प्रीति ! नेकु जो होती राम से, तो काहे भव-भीत ? यही वह दोहा है जिसके कारण तुलसी ने महाकाव्य श्रीरामचरितमानस लिखा जिसको विश्व के 100 सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय काव्यों में 46वाँ स्थान दिया गया। लेकिन तुलसी की तुलना में रत्नावली को कोई नहीं जानता। इतिहास गवाह है कि भारत में पुरुषों के लिए महिलाओं को अपनी इच्छाओं और अधिकारों का बलिदान देना पड़ा। बुंदेलखंड में मैंने यहाँ तक देखा है, कि सिर्फ लड़कों को ही अच्छे खाने-पीने और पहनने का हक है। महिलाएं आज भी घर के पुरुषों के भोजन कर लेने के बाद जो बचता है वही खाकर संतोष करती हैं। यही कारण है कि देश में लड़कियां दहेज़,बलात्कार,आर्थिक व सामाजिक शोषण की शिकार हैं। कारण लड़कियों की क्षमताओं को बेहतर न मानना। जबकि देश में गाय, गंगा, गायत्री की रक्षा करने की बात आज प्राथमिकता के साथ की जाती है। और हो भी क्यों नहीं क्योंकि महिला को शक्ति का दूसरा रूप माना जाता है।</p>
<p>इसके अलावा महिलाओं के प्रबंधन का इससे बेहतर और कोई उदाहरण नहीं हो सकता है, कि जब विश्व कोविड-19 जैसी महामारी से बहुत ज्यादा परेशान था, तब इसके स्वास्थ्य, सामाजिक, एवं आर्थिक प्रभावों को कम करने के लिए उन देशों ने बहुत अधिक सफलता प्राप्त की जिनका&nbsp; नेतृत्व महिलाओं द्वारा किया जाता है। उदाहरण के लिए, डेनमार्क, इथियोपिया, फिनलैंड, जर्मनी, आइसलैंड, न्यूजीलैंड और स्लोवाकिया में सरकार के प्रमुखों को कोविड ​​-19 के लिए उनकी राष्ट्रीय प्रतिक्रिया की दृढ़ता, निर्णायकता और प्रभावशीलता के लिए व्यापक रूप से सराहा गया। यही वजह है कि इस बर्ष संयुक्त राष्ट्र महिला संगठन ने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस, 8 मार्च 2021 के लिए थीम , "नेतृत्व में महिला:&nbsp; कोविड-19 के समय दुनिया में एक समान भविष्य की प्राप्ति," की घोषणा की है। हालाँकि अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की आधिकारिक वेबसाइट पर इस बर्ष की थीम "चुनौती चुनें" (चूज़ टू चेलेंज)के साथ छवियों को साझा कर रही है।</p>
<p>महिलाएं सिर्फ इस धरती पर मानवीय जीवन का सृजन ही नहीं करतीं, बल्कि धरती पर जीवन का संरक्षण भी करती हैं। वांगारी मथाई, पोली हिगिंस, डॉ वंदना शिवा, जो जो मेहता आदि महिलाओं से लेकर एक बिना पढ़ी लिखी, खेत पर काम करने वाली मजदूर स्त्री भी जैव विविधता के साथ प्रकृति के मूल सिंद्धांत सहअस्तिव्त को उसके द्वारा किये गए कार्यो में प्राथमिकता देती है। इसमें उन स्थानों की महिलाएं भी शामिल हैं जो जंगल से लकड़ियां बीनकर शहहों में बेचती हैं। जिनपर ये आरोप वन विभाग की तरफ से लगाए जाते हैं, कि ये महिलाये वनों को नुकसान पहुँचाती हैं।&nbsp; यही सब कारण हैं कि डॉ वंदना शिवा इस वर्ष अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस को &ldquo;पृथ्वी का उदय, महिलाओं का उदय&rdquo;<span>उत्सव</span> के रूप में मना रही हैं।</p>
<p>हमारे घरों में कई ऐसी बेटियाँ व बहुएं हैं जिन्होंने पढ़े लिखे होने के बाबजूद अपना कॅरियर अपने परिवार की खातिर दांव पर लगा दिया। इसका कारण आज भी महिलाओं के द्वारा किये गए घरेलू कार्य को उनका कर्तव्य माना जाता है।&nbsp; इसीलिए श्री भूपेंद्र सिंह, जो जिला परियोजना समन्वयक के पद पर कार्यरत हैं, कहते हैं कि महिला व बाल विकास तभी संभव है, जबकि परिवार का विकास होगा। इसलिए जितनी भी योजनाएं भारत व् राज्य सरकारों द्वारा महिला विकास व् समानता के नाम पर चलाई जा रही हैं, वो सब परिवार विकास के लिए होनी चाहिए। क्योंकि महिला के नाम पर हर कार्य में पुरुष ही उसकी पैरवी करते है। जो भी संसाधन महिला के नाम पर होते हैं उनके मालिक पुरुष ही हैं, महिला तो सिर्फ एक मजदूर के तरह कार्य करती है। अतः महिलाओं का विकास तो हो रहा है, लेकिन सिर्फ कागज़ो पर। इसका कारण अभी तक पुरुष समाज ने अपनी मानसिकता में महिलाओं को बराबर का दर्जा नहीं दिया है। इसलिए परिवार का विकास होने पर ही महिलायें पुरुष के साथ कदम मिला कर चल सकती हैं। नहीं तो जैसा होता है कि महिला सम्मान के नाम पर आयोजित कार्यक्रमों में पुरुष कुर्सी पर बैठे नज़र आते हैं और गावं की महिलाये नीचे जमीन पर। इतना ही नहीं महिलाये तो खाने, पीने, बोलने की आज़ादी से भी आज वंचित हैं। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 1977 से संयुक्त राष्ट्र द्वारा मनाया जा रहा है, परिणाम हमारे सामने है। अभी विश्व बैंक के सर्वे के अनुसार दुनिया में 190 देशों में भारत का 123 वां स्थान है जहां महिलाओं को सबसे निचले पायदान पर रखा जाता है। अब इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि हमारे देश में महिलाओं की क्या स्थिति है। शायद इसीलिए मजाज लखनवी ने कहा है कि&ldquo;तिरे माथे पे ये आँचल बहुत ही खूब है लेकिन, तू इस आँचल से एक परचम बना लेती तो अच्छा था।&rdquo;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ अभी तक हाशिए पर क्यों हैं महिलाएं ]]></media:description>
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	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कृषि मार्केटिंग का जिम्मा कोऑपरेटिव और किसान समूहों को दें]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/hand-over-agricultural-marketing-to-farm-cooperatives-and-collectives.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 24 Feb 2021 21:05:39 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/hand-over-agricultural-marketing-to-farm-cooperatives-and-collectives.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p></p>
<p>देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कृषि की हिस्सेदारी साल दर साल काफी घटी है। इसके बावजूद कृषि क्षेत्र पर निर्भर आबादी का प्रतिशत कुल मिलाकर वही बना हुआ है। इस परिदृश्य में व्यवहार्य और मुनाफे वाली कृषि का महत्व बढ़ जाता है, ताकि ग्रामीण इलाकों में रहने वाली विशाल आबादी को फायदा मिल सके।</p>
<p>सरकार ने पिछले दिनों तीन कृषि कानून लागू किए। इनके जरिए सरकार की कोशिश खेती को फायदेमंद बनाने के लिए कृषि बाजारों में बड़े सुधार करना है। इन कानूनों के तीन घोषित उद्देश्य हैं। पहला, छोटी जोत वाली जमीन को इकट्ठा करना ताकि बड़ी जमीन पर खेती करके उसका फायदा लिया जा सके। दूसरा, अपनी उपज बेचने के लिए किसानों को ज्यादा विकल्प और आजादी मुहैया कराना। तीसरा, कृषि उपज के लिए सीमा मुक्त व्यापार की सुविधा तैयार करना। इन घोषित उद्देश्यों पर कोई विवाद नहीं है और ना हो सकता है। फिर भी किसान इन कानूनों को खत्म करने के लिए आंदोलन कर रहे हैं। आंदोलन का कारण इन कानूनों के नतीजों को लेकर डर और इन उद्देश्यों को हासिल करने के लिए अपनाए जा रहे तौर-तरीके हैं। अगर पुराने अनुभवों को देखा जाए किसानों का यह डर पूरी तरह बेबुनियाद भी नहीं है।</p>
<p>कृषि में कार्य क्षमता बढ़ाने के लिए यह तय करना जरूरी है कि उपभोक्ता किसी भी उत्पाद की जो कीमत देता है, उसका अधिकांश हिस्सा किसान को मिले। इसके बिना कृषि गतिविधियों में किसानों की रुचि दिनों-दिन घटती जाएगी। यह अरुचि भारत की अर्थव्यवस्था को बड़ा नुकसान पहुंचाएगी। आत्मनिर्भर और सुदृढ़ कृषि अर्थव्यवस्था के लिए मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर का होना अनिवार्य है। किसानों को सक्षम बनाने की जरूरत है ताकि वे अपने उद्यम पर नियंत्रण रख सकें, और उपज की कीमत तय करने में उनकी भी चले।</p>
<p>बदलते समय के साथ मानव विकास के इतिहास में भी बदलाव आया है। पहले खेती अस्तित्व बचाए रखने के लिए थी। धीरे-धीरे इसका व्यापारीकरण हुआ और पैसे के बदले कृषि उपजों को खरीदा-बेचा जाने लगा। कृषि मार्केटिंग भले ही सदियों पुरानी हो, लेकिन एक विचार के रूप में यह अभी तक विकसित हो रही है, खासकर भारत जैसे ग्रामीण और कृषि बहुल समाज में। कृषि और ग्रामीण उत्पादों की मार्केटिंग के लिए नए-नए तरीके आजमाए जा रहे हैं। एक तरीका डिजिटल का भी है जिसका मकसद बिचौलिया प्रधान सिस्टम से निजात दिलाना है। इस सिस्टम ने भारत में कृषि मार्केटिंग को बुरी तरह जकड़ रखा है। कृषि क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन के लिए मार्केटिंग उतना ही महत्वपूर्ण है जितना खेती करना। इसलिए कृषि सुधार की किसी भी नीति में प्रभावी और सक्षम बाजार को बढ़ावा देना जरूरी है जिससे किसानों और उपभोक्ता दोनों को फायदा मिल सके।</p>
<p>कृषि बाजार खास तरह के होते हैं। इनकी कुछ विशेषताएं होती हैं जो इन्हें दूसरे बाजारों से अलग करती हैं। ये विशेषताएं किसी भी उपज के उत्पादन और आपूर्ति को प्रभावित करने वाले कारकों और बाजार में किसानों की स्थिति पर निर्भर करती हैं। मौजूदा परिदृश्य में किसानों का अपनी उपज की कीमत पर कोई नियंत्रण नहीं होता है। उन्हें जो कीमत दी जाती है वही लेने के लिए मजबूर होते हैं। ऐसा सिर्फ कृषि में होता है, किसी अन्य सेक्टर में नहीं।</p>
<p>ग्रामीण इलाकों में साप्ताहिक बाजार यानी हाट और मेले लगते हैं। छोटे और सीमांत किसानों के लिए ये हाट मार्केटिंग का पहला और महत्वपूर्ण जरिया होते हैं। देश में इस समय ऐसे करीब 50,000 बाजार लगते हैं। इन बाजारों में किसानों को अपनी उपज बेचकर जो रकम मिलती है वह उनकी नकद कमाई होती है। अनुमान है कि दूरदराज के इलाकों में कृषि और इससे जुड़े क्षेत्रों की 90 फ़ीसदी सरप्लस उपज इन्हीं बाजारों के माध्यम से बेची जाती है। तकनीकी रूप से देखा जाए तो ज्यादातर किसानों के पास बेचने लायक सरप्लस उपज नहीं होती, क्योंकि उन्हें अपने और परिवार के लिए इनकी जरूरत पड़ती है। फिर भी वे इसे बेचते हैं ताकि जरूरत की दूसरी महत्वपूर्ण चीजें खरीद सकें। उनके लिए गांव से दूर थोक बाजार में उपज ले जाकर बेचना फायदेमंद नहीं होता। ऐसे ज्यादातर किसानों के लिए बड़े बाजारों तक जाने का खर्च ही काफी बैठता है। इन किसानों के लिए ग्रामीण इलाकों में लगने वाले हाट बाजार ही महत्वपूर्ण होते हैं। ये प्राथमिक बाजार बड़े और सेकेंडरी बाजार के लिए संग्रह केंद्र का भी काम करते हैं।</p>
<p>सुधार के लिए चाहे जो कदम उठाए जाएं, ये प्राथमिक बाजार कभी अप्रासंगिक नहीं होंगे। इसके साथ यह बात भी सच है कि बड़ी कंपनियों या बड़े थोक खरीदारों के लिए इन बाजारों में सीधे ऑपरेट करना फायदेमंद नहीं होगा। इसलिए मार्केटिंग चेन की कड़ी के रूप में इन प्राथमिक बाजारों की क्षमता विकसित करना काफी फायदेमंद होगा। इससे उपज की उचित कीमत तय होगी, मार्केटिंग का खर्च कम होगा और उत्पादकता सुधारने में मदद मिलेगी। तकनीकी और वित्तीय मदद से इन बाजारों का इस्तेमाल कर्ज देने, खेती में इस्तेमाल होने वाली चीजों की बिक्री, खरीद करने, भंडारण और सामाजिक समूह को बढ़ावा देने में किया जा सकता है। ऐसा देखा गया है कि समूह के रूप में काम करने वाले समाज में सामुदायिक मदद की अनौपचारिक या अर्ध-औपचारिक प्रणाली ज्यादा मजबूत होती है। यह व्यवस्था लचीलापन जैसे गुणों को विकसित करने के लिए महत्वपूर्ण है। समय आ गया है कि हम &lsquo;लचीलापन&rsquo; के मूल्यों और उसकी प्रासंगिकता को समझें ताकि संकट का समाधान निकाला जा सके। व्यक्तिगत और सामुदायिक लचीलापन को भी एक बिंदु पर लाने की जरूरत है, जो ये ग्रामीण बाजार बेहतर कर सकते हैं।</p>
<p>इसी संदर्भ में यहां यह बताना उचित होगा कि प्रधानमंत्री ने 2016 में एक नए तरह के इलेक्ट्रॉनिक कृषि मार्केटिंग प्लेटफॉर्म &lsquo;ई-नाम&rsquo; को लांच किया था। ई-नाम कोई समानांतर मार्केटिंग ढांचा नहीं है, यह एक ऐसा प्लेटफॉर्म है जो देशभर की मंडियों का एक राष्ट्रीय नेटवर्क तैयार करता है। इन मंडियों तक ऑनलाइन पहुंचा जा सकता है। इस प्लेटफॉर्म के जरिए दूसरे राज्यों के खरीदार भी ट्रेडिंग में हिस्सा ले सकते हैं। इस प्लेटफॉर्म ने निश्चित रूप से पारदर्शिता बढ़ाई है। व्यापारियों और कमीशन एजेंट के बीच गठजोड़ को तोड़कर इससे कृषि मार्केटिंग में एक नए युग का सूत्रपात होगा। यही नहीं, किसानों को भी उनकी उपज की बेहतर कीमत मिल सकेगी। ऑनलाइन सिस्टम से किसान बिचौलियों और सूदखोरों के चंगुल से निकल सकेंगे जो भारत में कृषि संकट का एक प्रमुख कारण है।</p>
<p>लेकिन ई-मार्केटिंग के लिए उपज की अधिक मात्रा और डिजिटल तौर-तरीकों की जानकारी होना जरूरी है। दुर्भाग्यवश देश के 90 फ़ीसदी किसानों में इसका अभाव है। इसलिए वे विकास के इन कदमों का लाभ उठाने की स्थिति में नहीं हैं। इस साल के केंद्रीय बजट में ई-नाम को सुधारने की बात कही गई है। इससे बेहतर मार्केटिंग के जरिए किसानों की आमदनी बढ़ाने को लेकर सरकार की प्रतिबद्धता जाहिर होती है। हालांकि इन कदमों और प्रतिबद्धताओं की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि जमीनी स्तर पर काम करने वाली अथॉरिटी या एजेंसी कितनी ईमानदारी से अपने कार्यों को अंजाम देती है।</p>
<p>कृषि मार्केटिंग में सरकार का हस्तक्षेप सिद्धांत रूप से बाजार की विफलता को सुधारने के लिए होता है। लेकिन हकीकत इसके विपरीत है। अतीत के अनुभव बताते हैं कि नीतियां और घोषणाएं फाइलों से खेतों तक आते-आते दम तोड़ देती हैं। अगर बजट आवंटन, रेगुलेशन और नीतियां बनाना ही किसी संकट का हल होता तो अब तक इन समस्याओं का समाधान हो चुका होता। योजनाओं की भीड़, भारी-भरकम बजट आवंटन और विभिन्न सरकारों की तरफ से खेती और ग्रामीण क्षेत्र को प्राथमिकता दिए जाने के बावजूद किसानों की समस्याएं अब भी उतनी ही विकट हैं, जितनी कई दशक पहले हुआ करती थीं।</p>
<p>प्राथमिक ग्रामीण बाजारों का उन्नयन और विकास, ई-नाम के साथ उनको जोड़ना और सामूहिक खेती पर फोकस करना गेमचेंजर हो सकता है। इससे ग्रामीण और कृषि क्षेत्र आत्मनिर्भर और व्यवहार्य आर्थिक पद्धति में बदल सकता है। लेकिन इसके लिए किसानों को लचीले और विकेंद्रीकृत नीतियों, प्रौद्योगिकी और ऐसे ढांचे की जरूरत है जो फलदायी हो।</p>
<p>कृषि और इससे संबद्ध ग्रामीण आर्थिक गतिविधियों की पूरी क्षमता का इस्तेमाल तभी संभव है जब प्रचुर मात्रा में उपलब्ध प्राकृतिक, सामाजिक और भावनात्मक पूंजी को एक किया जाए, संसाधनों के इस्तेमाल की क्षमता बढ़ाई जाए और इकोनॉमी ऑफ स्केल यानी व्यापकता का फायदा उठाया जाए। संसाधनों के इस्तेमाल की क्षमता बढ़ाने में बाजार का महत्व बहुत अधिक है। यह जरूरी है कि बाजार किसी उपज की जो कीमत तय करता है उसका बड़ा हिस्सा छोटे किसानों को मिले, जिनकी संख्या अधिक है। साथ ही, बाजार के काम में पारदर्शिता भी जरूरी है। बाजार की क्षमता बढ़ाने के लिए नियमों को साधारण और तार्किक बनाना महत्वपूर्ण है। कानून और नियम किसान और उद्योग दोनों के हित में होने चाहिए। ये इस तरह बनाए जाएं जिनसे महत्वपूर्ण और रणनीतिक मुद्दों का समाधान हो सके। नियम थोपने वाली व्यवस्था के बजाय सेल्फ कंप्लायंस की व्यवस्था बेहतर होगी।</p>
<p>खेती और अन्य ग्रामीण उत्पादों के प्रबंधन में संभव है कि सरकारी या कॉरपोरेट सेक्टर के संस्थान बेहतर साबित न हों। इसलिए सरकार को सिर्फ फैसिलिटेटर की भूमिका निभानी चाहिए और समूह तथा कॉरपोरेट साझेदारी को बढ़ावा देना चाहिए। यह मॉडल ज्यादा काम कर सकता है। कोऑपरेटिव, फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गेनाइजेशन (एफपीओ) सेल्फ हेल्प ग्रुप (एसएचजी) जैसे संगठनों को प्राइमरी और सेकेंडरी कृषि बाजारों के प्रबंधन का जिम्मा दिया जा सकता है। वे गांव के स्तर पर ज्यादा संख्या में यार्ड स्थापित कर सकते हैं जहां सफाई, छंटाई, ग्रेडिंग और पैकेजिंग जैसी सुविधाएं हों। कॉरपोरेट या निजी क्षेत्र का दखल सेकेंडरी मार्केट के स्तर पर या उसके बाद ही होना चाहिए, उससे पहले नहीं। इंफ्रास्ट्रक्चर और अन्य सुविधाएं विकसित करने के लिए इन समूहों को तकनीकी और वित्तीय मदद भी दी जानी चाहिए।</p>
<p>किसानों को इस तरह विकसित और विनियमित बाजारों से ही फायदा मिल सकता है। किसानों के लिए संगठित होकर समूह बनाना और मार्केटिंग के गुर सीखना भी उतना ही जरूरी है। गुणवत्ता मानकों और कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों को समझना, बाजार के लिए उपज को चुनना तथा उन्हें तैयार करना किसानों के लिए आवश्यक दक्षताएं होंगी।</p>
<p>हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रकृति के अपने नियम और अपनी सीमाएं हैं। ये नियम और सीमाएं कहीं ज्यादा ताकतवर हैं। मानव निर्मित नियमों को प्रकृति के बनाए नियमों के अनुसार ही चलना चाहिए। इसके विपरीत जाना विनाशकारी होगा। प्रकृति के नियमों को हम ना तो बदल सकते हैं और ना ही उन्हें सरकारी नियमों के दायरे में बांधा जा सकता है। इसलिए कृषि उपजों का उत्पादन, उनकी ढुलाई और मार्केटिंग में व्यापारिक नियमों की सीमाएं कम से कम रखी जानी चाहिए। ऐसा करना दूरदर्शी तो होगा ही, इसके फायदे भी अनेक होंगे।</p>
<p><strong>(डॉ. डी.एन. ठाकुर राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (एनसीडीसी) के पूर्व डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर हैं। यहां व्यक्त विचार उनके निजी हैं)</strong></p>
<p><span>&nbsp;</span></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ कृषि मार्केटिंग का जिम्मा कोऑपरेटिव और किसान समूहों को दें ]]></media:description>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कृषि कानूनों पर संसदीय परामर्श जरूरी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/Parliamentary-consultation-on-agricultural-laws-necessary.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 10 Feb 2021 07:44:07 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/Parliamentary-consultation-on-agricultural-laws-necessary.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>पिछले दिनों हुई एक सर्वदलीय बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कथित तौर पर तीन कृषि कानूनों को 18 महीने के लिए स्थगित रखने का प्रस्ताव दिया है। इस सुझाव पर अमल तभी करना चाहिए जब इस अवधि के दौरान कृषि कानूनों पर विचार-विमर्श करने का जिम्मा किसी संसदीय समिति को सौंपा जाए। सरकार ने इन कानूनों को लाने से पहले जो विधायी परामर्श नहीं किया था, उसके लिए पश्चाताप तो करना ही पड़ेगा। कृषि कानूनों पर पूर्णतः नए सिरे से विचार करने की जरुरत है, और ये काम केवल संसद ही कर सकती है।&nbsp;</p>
<p>इस बात से कोई इंकार नहीं है कि कृषि क्षेत्र में सुधारों की जरूरत है। लेकिन किस तरह के सुधार से किसानों को फायदा होगा? यह बड़ा सवाल है। ये कानून महामारी के दौरान जल्दबाजी में पर्याप्त चर्चा और व्यापक स्वीकृति के बगैर लागू किये गये थे। जिसके परिणामस्वरूप किसानों को 75 दिनों से हाड़ कंपा देने वाली ठंड में दिल्ली की सीमाओं पर कंटीले तारों, कीलों, किले जैसी नाकेबंदी का सामना करना पड़ रहा है। किसानों की बिजली, पानी, इंटरनेट और शौचालय की सुविधाएं भी सरकार ने बंद कर दी। इस दौरान लगभग 150 को जान गंवानी पड़ी। किसी भी आंदोलन के लिए यह बहुत बड़ा बलिदान है। अब केंद्र सरकार ने इन कानूनों को 18 महीने के लिए स्थगित करने का प्रस्ताव दिया (जो किसानों को मंजूर नहीं) है, <span>तो इन</span> कृषि सुधारों पर नए सिरे से सोचने की आवश्यकता है। हमें भारत के कृषि क्षेत्र को नई क्षमता प्रदान करने की आवश्यकता है। इसके लिए तीन पहलू महत्वपूर्ण हैं।</p>
<p><strong>पहला</strong><strong>,</strong> कृषि राज्य का विषय है इसलिए राज्यों को कानून बनाने का पहला अधिकार होना चाहिए। अलग-अलग राज्यों को अलग-अलग से तरह प्रभावित करने वाले कानूनों को पूरे देश पर लागू करना केंद्र सरकार की हड़बड़ी और गलत अनुमान का नतीजा है। केंद्र सरकार को मॉडल एग्रीकल्चर लैंड लीजिंग एक्ट, 2016 के कार्यान्वयन से सबक लेना चाहिए था, जिसे सत्तारूढ़ पार्टी शासित राज्यों ने भी लागू नहीं किया। कृषि मंत्रियों, वित्त मंत्रियों और सभी राज्यों के विशेषज्ञ प्रतिनिधियों से युक्त जीएसटी परिषद की तर्ज पर एक 'कृषि सुधार परिषद' का गठन करने की आवश्यकता है। यह राज्यों और केंद्र के बीच कई मुद्दों को भी हल करेगी। 'कृषि सुधार परिषद&rsquo; के प्रस्ताव को कृषि कानूनों में शामिल किया जा सकता है और राज्यों को अपने हिसाब से बदलाव लाने के लिए पर्याप्त स्वतंत्रता दी जानी चाहिए। यही संघीय ढांचे और "टीम इंडिया" के अनुरुप होगा। &nbsp;&nbsp;</p>
<p><strong>दूसरा</strong> <strong>पहलू</strong> <strong>है</strong> - संसदीय प्रणाली की उपयोगिता। संसद में एक विधायिका के रूप में कानूनों में संशोधन करने की सर्वोच्च शक्ति है। कानूनों के पारित होने के बाद भी ऐसा करना संभव है। एक स्थायी समिति या संसद की एक प्रवर समिति तीनों कृषि कानूनों की जांच कर सकती है और किसान संगठनों को भी सदन में अपना पक्ष रखने का मौका मिल सकता है। संसदीय स्थायी समिति महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा के लिए एक महत्वपूर्ण मंच है। ये विचार-विमर्श संसद के फर्श पर नारेबाजी और शोरगुल में नहीं हो सकता है, जहां नेता राजनीतिक बढ़त बनाने के लिए बहस में हिस्सा लेते हैं । केवल संसदीय समिति द्वारा कानूनों की सावधानीपूर्वक जांच-पड़ताल कर उपयुक्त संशोधनों के सुझाव दिए जा सकते हैं और सभी पक्षों की चिंताओं को दूर किया जा सकता है।&nbsp;</p>
<p>कृषि कानूनों को संसद को पंगु बनाकर, हंगामे के बीच राज्यसभा में ध्वनि मत से पारित किया गया। आलोचकों का तर्क हो सकता है कि ध्वनि मत से किसी कानून को पारित करना संसदीय&nbsp; प्रणाली का उल्लंघन नहीं है। यह बात अपनी जगह सही है। संविधान में भी ध्वनि मत पर कोई पाबंदी नहीं है। हालांकि, 17 वीं लोकसभा में बहुत अधिक विधेयकों को ध्वनि मत से पारित किया गया है। वोट का विभाजन संसद के रिकॉर्ड का हिस्सा बनाता है। क्या हमारे निर्वाचित प्रतिनिधियों को भी ईवीएम की बजाय किसी सार्वजनिक रैली में 'ध्वनि मत' के माध्यम से चुना जा सकता है?&nbsp;</p>
<p><strong>तीसरा</strong><strong>,</strong> प्राइवेट सेक्टर को कृषि बाजार में प्रवेश करने के लिए 'खेत से प्लेट तक' पूरी सप्लाई चेन इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत व्यवस्था की जरूरत है। भारतीय खाद्य निगम की सीमित भंडारण क्षमता और खाद्यान्न की बर्बादी को देखते हुए, सरकार को पहले हजारों छोटी मंडियों के लिए बुनियादी सुविधाओं को दुरुस्त करने की आवश्यकता थी। अकेले सरकार द्वारा मंडियों का निर्माण नहीं किया जा सकता है। इसमें निजी भागीदारी और निवेश की जरूरत है। इसे एक संस्थागत रूप दिए जाने की जरूरत है,<span> जिसमें किसानों को न्यूनतम</span> समर्थन मूल्य (MSP) की गारंटी मिले। भले ही कई नीति विशेषज्ञ एमएसपी को हटाने का समर्थन करते हैं, <span>लेकिन खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कह चुके हैं कि एमएसपी है और आगे भी रहेगा। </span></p>
<p>एमएसपी के क्रियान्वयन में जो कमियां हैं, उन्हें दूर किया जा सकता है। वर्ष 2012 में तत्कालीन केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 'दि फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स (रेगुलेशन) अमेंडमेंट बिल, 2010' को मंजूरी देते हुए इस तरह के एक समाधान को अपनाने का प्रयास किया था। इसमें खरीदारों और विक्रेताओं को जोखिम संभालने की सहूलियत दी गई थी और इसे रेगुलेट करने का प्रावधान भी था। कमोडिटी बाजार में ऑप्शंस के लिए रास्ता खोलने का प्रयास किया गया था,<span> लेकिन तब एमएसपी खत्म</span> की कोई भी कोशिश नहीं थी। जैसी इस बार दिख रही है।</p>
<p>ड्राफ्ट एपीएमसी रेगुलेशन, 2007 के जरिये भी कृषि व्यापार में सुधारों को लेकर कई सुझाव दिए गए थे। इसमें राज्यों को किसी भी बाजार को 'स्पेशल कमोडिटी मार्केट&rsquo; घोषित करने का अधिकार दिया गया था। नए कृषि कानून राज्य सरकारों और मंडी समितियों (APMC) को प्राइवेट मंडियों से शुल्क वसूलने से रोकते हैं। इसलिए इन कानूनों में सुधार करना बेहद जरूरी है।</p>
<p>सभी पक्षों के साथ व्यापक विचार-विमर्श के माध्यम से संसदीय स्थायी समिति कृषि कानूनों पर एक सही नजरिया पेश कर सकती है। इससे सरकार और किसानों के बीच गतिरोध को दूर करने में मदद मिलेगी।&nbsp;</p>
<p><em><strong>(लेखक बैंगलोर के तक्षशिला संस्थान में सार्वजनिक नीति का अध्ययन कर रहे हैं। विचार उनके&nbsp;व्यक्तिगत हैं।)</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ कृषि कानूनों पर संसदीय परामर्श जरूरी ]]></media:description>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कृषि विविधीकरण को बढ़ावा देने वाला बजट]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/Budget-to-promote-agricultural-diversification.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 05 Feb 2021 14:58:48 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/Budget-to-promote-agricultural-diversification.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>जब देश कोविड-19 महामारी से उबरने का प्रयास कर रहा है, तब एक असाधारण परिस्थिति में यह बजट पेश किया गया है। इसका उद्देश्य अर्थव्यवस्था की स्थिति को सुधारना और जन कल्याण को बढ़ावा देना है। इस बजट का व्यापक उद्देश्य निवेश, बुनियादी ढांचे, संस्थानों और नवाचारों के माध्यम से भारत को बेहतर बनाना है। इसमें अर्थव्यवस्था को उबारने, आर्थिक विकास में तेजी लाने, रोजगार पैदा करने और पर्यावरण में सुधार की नीयत है। कोविड-19 ने अर्थव्यवस्था को तबाह कर दिया, निवेश पर प्रतिकूल प्रभाव डाला और क्रय शक्ति को घटा दिया था। कृषि को छोड़कर सभी क्षेत्रों पर प्रतिकूल असर पड़ा है। वास्तव में, कृषि आर्थिक विकास को बढ़ावा देने वाला प्रमुख क्षेत्र बनकर उभरा है।&nbsp;</p>
<p>सरकार ने नोटबंदी के दौरान और उसके बाद आत्मनिर्भर भारत पैकेज के माध्यम से अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए कई उपायों की घोषणा की। किसानों की आय बढ़ाने, लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करने और आवश्यक खाद्य वस्तुओं की आपूर्ति में सुधार के लिए कृषि क्षेत्र में कई कदम उठाये गये हैं। प्रस्तावित बजट के प्रावधान महामारी के दौरान की गई घोषणाओं की निरंतरता में हैं। यह बजट कृषि विविधिकरण के लिए बागवानी, डेयरी और मत्स्य पालन क्षेत्र को बढ़ावा देता है। ये न्यूनतम समर्थन मूल्य और सरकारी खरीद से अछूते रहे हैं।</p>
<p>बागवानी को बढ़ावा देने के लिए 'ऑपरेशन ग्रीन' योजना में TOP (टमाटर, प्याज और आलू) से बढ़ाकर 22 वस्तुओं को शामिल किया गया है। यह लॉकडाउन के दौरान पहले की गई घोषणा की निरंतरता में है, जब सभी फलों और सब्जियों को छह महीने के लिए इस योजना में शामिल किया गया था। योजना का मुख्य उद्देश्य फल और सब्जियों के उत्पादकों को लॉकडाउन के कारण मजबूरन बिक्री से बचाना और कीमतों को कम करना है।</p>
<p>बजट में फल और सब्जी उत्पादकों के मूल्य जोखिम को कम करने के लिए इस योजना का विस्तार किया गया है। इस योजना के तहत सरकार कुल लागत पर 50 फीसदी सब्सिडी अधिकता से अभाव वाले क्षेत्रों में ढुलाई और योग्य फसलों के लिए उचित भंडारण की सुविधा लेने के लिए प्रदान की जाती है। यह योजना ट्रांसपोर्ट सब्सिडी के जरिये फलों और सब्जियों की मूल्य श्रृंखलाओं को मजबूत करेगी और अत्यधिक आपूर्ति के कारण कीमतों में गिरावट की स्थिति में भंडारण सुविधा के माध्यम से कीमतों को स्थिरता प्रदान करेगी। बजट में 1000 एपीएमसी मंडियों को मजबूत करने और उन्हें e-NAM से जोड़ने का भी प्रावधान है। इससे ई-ट्रेडिंग का दायरा बढ़ेगा और कृषि वस्तुओं के बेहतर दाम मिल सकेंगे।</p>
<p>मछली पालन क्षेत्र को आधुनिक बंदरगाहों और फिश लैंडिंग केंद्रों के विकास के लिए निवेश प्राप्त होगा। इस तरह के निवेश से मत्स्य पालन क्षेत्र के लिए आधुनिक बाजार विकसित होंगे। इसके अलावा<span> सीवीड</span>&nbsp;की खेती को बढ़ावा देने से भारतीय तटरेखा के किनारे आय और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। भारत की 8,100 किलोमीटर लंबी तटरेखा की लगभग 30% आबादी तटीय और समुद्री संसाधनों पर निर्भर है। भारतीय तटीय क्षेत्र में विभिन्न उद्देश्यों के लिए समुद्री शैवालों की खूब पैदावार की क्षमता है। इस बजट में बहुउद्देशीय सीवीड पार्क स्थापित करने के लिए प्रावधान किया गया है। सीवीड के उत्पादन, प्रसंस्करण और विपणन को बढ़ावा देने से तटीय इलाकों में रहने वाले निर्धन लोगों के लिए आय और रोजगार के नए अवसर खुलेंगे।&nbsp;</p>
<p>मनुष्य, पशु और पौधों की बीमारियों के बीच अंतरसंबंधों को ध्यान में रखते हुए &lsquo;वन हेल्थ&rsquo; हेतु एक राष्ट्रीय संस्थान की स्थापना का भी प्रावधान भी बजट में किया गया है जो स्वागतयोग्य है। यह देखा गया है कि कई बीमारियां पौधों और जानवरों से लेकर मनुष्य में हस्तांतरित होती हैं। इसलिए, एक समन्वित स्वास्थ्य प्रबंधन प्रणाली पौधों और पशुओं से फैलने वाली बीमारियों की रोकथाम में मददगार होगी।&nbsp;</p>
<p>किसी भी तरह की आधारभूत संरचना (सड़क, बंदरगाह, शिपिंग, जलमार्ग और बिजली) का विकास निश्चित रूप से कृषि क्षेत्र खासकर जल्द खराब होने वाली वस्तुओं के लिए सहायक है। इससे उत्पादक क्षेत्र बेहतर तरीके से उपभोग केंद्रों से जुड़ते हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास बाजारों को बेहतर ढ़ग से एकीकृत करने और कृषि वस्तुओं की कीमतों को स्थिर रखने में भी योगदान करेगा।&nbsp;</p>
<p>कुल मिलाकर, बजट प्रावधानों से कृषि में निवेश और विविधीकरण को बढ़ावा मिलेगा। किसानों की आय बढ़ेगी और पर्यावरण में सुधार होगा।</p>
<p>------------------------------------------</p>
<p><strong><em>लेखक अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान के पूर्व निदेशक (दक्षिण एशिया) हैं</em></strong></p>
<p>&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ कृषि विविधीकरण को बढ़ावा देने वाला बजट ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कृषि कानून:  एक अनदेखे डर से लड़ाई]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/what-is-the-solution-of-farm-crisis.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 25 Jan 2021 15:55:09 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/what-is-the-solution-of-farm-crisis.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>हाल ही में लागू किए गए तीन विवादास्पद कृषि कानूनों का विरोध करने वाले किसान संगठनों ने इन सभी कानूनों को 18 महीने के लिए निलंबित रखने के लिए केंद्र सरकार के नवीनतम प्रस्ताव को खारिज कर दिया है । केंद्र सरकार ने इस प्रस्ताव के तहत, किसानों को सभी विवादास्पद मुद्दों पर जांच के लिए एक संयुक्त समिति का गठन का भी प्रस्ताव दिया था। उसे भी किसान संगठनों ने खारिज कर दिया। किसान संगठनों का यह रुख अप्रत्याशित नहीं था। ऐसा इसलिए है कि आंदोलन के पहले दिन से ही इन कानूनों को निरस्त करने की मांग पर किसान संगठन स्पष्ट थे। सरकार के कदम और प्रस्ताव को आंदोलनकारी किसान "भटकाने और देर" की रणनीति के रूप में देख रहे थे। और इन परिस्थितियों ने अविश्वास, हताशा और भ्रम के काले बादल को और गहरा कर दिया है।</p>
<p>इन कानूनों का घोषित उद्देश्य कृषि व्यापार में प्रतिबंधों को कम करना है, व्यापारियों को भविष्य के व्यापार के लिए बड़ी मात्रा में खाद्य स्टॉक की अनुमति देना है और अनुबंध वाली खेती के लिए एक राष्ट्रीय रूपरेखा तैयार करना है। सरकार किसानों को इन कानूनों के दूरगामी लाभों के बारे में समझाने के लिए हर संभव तरीके को अपना रही है। और यह समझाने की कोशिश कर रही है कि ये कानून कैसे उनके भाग्य और भविष्य को कैसे बदलेंगे। दूसरी ओर, आंदोलनकारी किसान यह कहते हुए इस तरह के आडंबरपूर्ण स्वप्नों का खंडन करते रहे हैं कि ये कानून उनकी सौदेबाजी की शक्ति को नष्ट कर देंगे और उन्हें बड़े कारपोरेटों की दया पर छोड़ देंगे। इसलिए, वे इन कानूनों को निरस्त करने और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के लिए एक कानूनी गारंटी की मांग कर रहे हैं।</p>
<p>सरकार ने आंदोलनकारी किसानों को समझाने के लिए एक आक्रामक जवाबी अभियान भी चलाया जो पहले से ही इन कानूनों के पक्ष में हैं। इस तरह के कदमों और काउंटर अभियानों ने आंदोलनकारी किसानों और सरकार के बीच असंतोष और अविश्वास के स्तर को और बढ़ा दिया। मुद्दों को हल करने के लिए किए गए सभी प्रयासों में "जोश, भावना और जुड़ाव" का तत्व स्पष्ट रूप से अनुपस्थित था। 10 वें दौर की वार्ता में केंद्र सरकार ने जो पेशकश की और 12 जनवरी, 2021 को माननीय उच्चतम न्यायालय ने जो निर्णय दिया, वह आंदोलन के शुरुआत में किया जाना चाहिए था। इस पहल ने भरोसे और सौहार्द्र को बनाने की दिशा में कदम उठाया है। हालांकि अगर यह पहल, पहले हो गई होती तो 60 से अधिक किसानों की दुखद मौत, लाखों आंदोलनकारी किसानों की पीड़ा और 50,000 करोड़ रुपये से अधिक के व्यापार और व्यवसाय को नुकसान नहीं होता था ।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p><strong>क्या कोई विकल्प नहीं है?</strong></p>
<p>आंदोलनकारी किसानों की एकता, सहनशक्ति, साहस, प्रतिबद्धता और विश्वास सलामी के लायक है, लेकिन किसान और राष्ट्र जो इसकी कीमत चुका रहे हैं, उसका कोई मूल्य चुकाया जा सकता है ?</p>
<p>मेरे विचार में इस प्रश्न का उत्तर बहुत बड़ा "नहीं" है। दोनों पक्षों यानी सरकार और आंदोलनकारी किसानों द्वारा अपनाए गए रुख में कठोरता वास्तविक जमीनी स्थितियों की तुलना में आशंकाओं और उथल-पुथल से अधिक उभर रही है। इन कानूनों के विवादित प्रावधानों यानी कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग (अनुबंध खेती), कॉरपोरेट द्वारा सीधी खरीद और समानांतर मंडियों को धरातल पर खड़ा करना बहुत कठिन होगा। देश में भूमि के छोटे-छोटे आकार को देखते हुए और गांवों के साथ 100 करोड़ से अधिक आबादी के कारण, किसी भी कॉरपोरेट को अनुबंधित खेती के लिए प्रोत्साहित होना अव्यवहारिक होगा। कंपनियों के लिए ऐसा करने की ऑपरेशन लागत खेती से मिलने वाले लाभ से अधिक होगी और साथ ही उसमें जोखिम होगा ।</p>
<p>&nbsp;यह मानते हुए कि कोई&nbsp; एक अति उत्साही कॉरपोरेटस, सरकारी मशीनरी के जरिए भूमि को एकत्र करने में सक्षम हो और किसानों से फसल खरीदने लगेगा और उन्हें बड़े पैमाने पर विस्थापित कर देगा। अगर वह ऐसा करने में सफल हो जाएगा तो अनुबंध खेती की वजह से बड़ी संख्या में विस्थापित किसान चुप नहीं बैठेंगे और देश में एक अराजकता पैदा हो जाएगी।</p>
<p>विवाद का एक अन्य प्रमुख बिंदु कॉरपोरेट द्वारा सीधी खरीद है। यह भारतीय संदर्भ में भी अव्यवहारिक और गैर लाभकारी है। देश में बहुसंख्यक किसान परिवारों के लिए ज्यादतर अतिरिक्त उत्पादन बहुत कम होता है (ज्यादातर मामलों में एक क्विंटल से अधिक नहीं)। क्योंकि भूमि के छोटे आकार और सीमांत किसानों की ज्यादा संख्या होने की वजह से अब भी ज्यादातर किसान अपनी उपज सीधे मंडियों में नहीं बेचते हैं। हमारे देश के बड़े हिस्सों में 3 से 4 स्तर वाली फसल खरीद वाली प्रणाली है। और एक कॉरपोरेट के लिए इन प्रणालियों के जरिए फसलों की खरीद करना अधिक आसान और लाभदायक लगेगा। क्यों कोई खाना पकाने में व्यस्त होगा जब उसके पास बिना किसी झंझट के कम लागत में बेहतर भोजन पाने का विकल्प होगा?</p>
<p><strong>&nbsp;फिर क्या किया जाना चाहिए? </strong></p>
<p>मेरे विचार में इस स्तर पर कार्रवाई का सबसे अच्छा तरीका यह होगा कि सरकार राष्ट्र के संरक्षक होने के नाते इन विवादास्पद कृषि कानूनों को निरस्त करके एक बड़े दिल और दयालु नजरिए का प्रदर्शन करे। और एक संयुक्त समिति का गठन करे जिसमें संबंधित क्षेत्रों के सदस्य शामिल हों। जिसके जरिए कृषि सुधारों के एक व्यापक रूपरेखा तैयार की जा सकती है, जो सभी हितधारकों को स्वीकार्य हो और भविष्य की आवश्यकता को पूरी करती हो। इस कदम के साथ, सरकार आशंकाओं को स्वीकार कर सकती है और अपने नागरिकों और किसानों के दिल पर जीत हासिल कर सकती है, जिनकी सामूहिक प्रतिष्ठा सरकार की प्रतिष्ठा है। भारत को साहसिक कृषि सुधारों की आवश्यकता है, लेकिन इसे अपने किसानों की जरूरतों और आकांक्षाओं के साथ संवाद, विश्वास और पूर्ण संपर्क की प्रक्रिया के माध्यम से आना होगा। &nbsp;18 महीने की समय सीमा के भीतर, कृषि सुधार उपायों के नए और साहसिक कदम की शुरुआत कर, सरकार निश्चित रूप से आम सहमति पर पहुंच सकती है जो कृषि को विकास और उसके उच्च स्तर तक ले जा सकती है।</p>
<p><strong>विधायिका की अक्षमता</strong></p>
<p>विकासात्मक मुद्दों के समाधान के लिए विधायिका का रास्ता चुनना कुशल और पसंदीदा रास्ता नहीं है। और इसका तब तक सहारा नहीं लेना चाहिए जब तक कि यह पूरी तरह से आवश्यक न हो और कोई दूसरा विकल्प नहीं हो। विकास और खुशी,&nbsp; दिल का मामला है, जिसके लिए सभी संबंधित पक्षों के बीच लचीला दृष्टिकोण और पूर्ण (शारीरिक, भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक) भरोसे और जुड़ाव की आवश्यकता होती है। विकासात्मक नीतियों और उपायों को आदर्श रूप से उन्मुख होना चाहिए। विधायिका का दृष्टिकोण मूल रूप से प्रक्रिया आधारित है और इसका क्रियान्वन ज्यादातर कठोर और कम लचीला होता है।</p>
<p>विधानों के कार्यान्वयन की जिम्मेदारी उन लोगों के हाथ में है जो इसके परिणाम के प्रत्यक्ष लाभार्थी नहीं हैं। लाभार्थी केवल मूकदर्शक होते हैं जो स्वामी की दया पर होते हैं। यह न केवल लाभार्थियों की स्वैच्छिक और सक्रिय भागीदारी में बाधा डालता है, बल्कि उन्हें अलग-थलग और विस्थापित भी करता है। भारत में सहकारी संस्थाओं की विफलता इस दृष्टिकोण की सराहना करने के लिए एक उदाहरण है।</p>
<p>&nbsp;यह एक निर्विवाद तथ्य है कि सहकारी संस्थाएं विफल नहीं हो सकती हैं। बशर्ते वह वास्तविक सहकारी सिद्धांतों पर चलती हो। भारत में लाखों सहकारी समितियां या तो असफल रही हैं या बाहरी कारणों और बाहरी नियंत्रण और प्रभाव के कारण निष्क्रिय अवस्था में हैं। सरकार ने इन सहकारी समितियों को बेहतर करने के लिए बेहतर कानूनी संशोधन किए हैं। ऐसे में सरकार को उन उद्देश्यों को प्राप्त करने में मदद मिल सकती है जो वह विवादास्पद कृषि कानूनों के माध्यम से प्राप्त करना चाहती है।</p>
<p>&nbsp;इस तथ्य से कोई इंकार नहीं है कि हमारे देश में अधिकतर किसानों के लिए खेती करना मुश्किल हो गया है। समाधान भूमि जोत के एकीकरण में निहित है, लेकिन इसके लिए किसानों का स्वैच्छिक रूप से भूमि एकीकरण करने की जरूरत है। हमारे देश में प्रति गाँव कम से कम एक कृषि समूह की आवश्यकता है। यह तत्काल किया जाना चाहिए और दो साल की समय सीमा में इसे हासिल करना संभव है। सरकार ने कृषि एकीकरण को बढ़ावा देने के लिए जिस वित्तीय प्रोत्साहन आधारित मॉडल का पेश किया है और यह बहुत सफल नहीं होने जा रहा है क्योंकि इससे बाहरी संस्थाएं योजना को नियंत्रित करने के लिए प्रोत्साहित होंगी।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>सरकार को इच्छुक और संबंधित पक्ष जैसे किसान, कॉरपोरेट, कृषि विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों, केवीके, बैंकों और विकास वित्त संस्थानों, ग्रामीण विकास संस्थानों, ट्रस्ट आदि को प्रोत्साहित करना चाहिए। इसके लिए सरकार को बैक सीट पर बैठे व्यक्ति वाली भूमिका निभानी चाहिए। दो साल के समय में पूरे देश में कृषि समूह के एक ऐसे विशाल नेटवर्क का निर्माण हो जाएगा। इस पहल को जन आंदोलन का रूप दिया जाना चाहिए और यह किसानों के लिए स्वतंत्रता आंदोलन जैसा हो सकता है। सरकार कर रियायतों के रूप में राजकोषीय प्रोत्साहन देकर इस आंदोलन को प्रोत्साहित कर सकती है और कॉरपोरेट द्वारा किए गए खर्च को सीएसआर की तरह देखा जा सकता है। इससे किसानों को समान और लाभकारी शर्तों पर बाजार की शक्तियों के साथ जुड़ने का अधिकार मिलेगा।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>इस तथ्य से कोई इंकार नहीं है कि हमारा कृषि क्षेत्र संकट में है और संकटों को कम करने के लिए समाधान खोजने की नितांत आवश्यकता है। एक अस्थिर और संकटपूर्ण स्थिति में जहां अमीर भी अपनी कमाई और अपनी संपत्ति की सुरक्षा पर भरोसा नहीं कर सकते हैं। ऐसे में मौजूदा किसान आंदोलन से सीख लेकर और कृषि और ग्रामीण क्षेत्र के संपूर्ण मुद्दों ​​को संबोधित करने वाली नीति और कार्यक्रमों की जरूरत है। जिसमें सर्वसम्मति सबसे अहम गुण होना चाहिए। जिससे लक्ष्य को हासिल किया जा सके।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p><strong>(लेखक राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम के पूर्व डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर हैं)</strong></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ कृषि कानून:  एक अनदेखे डर से लड़ाई ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कृषि क्षेत्र की  समस्या आधे&amp;#45;अधूरे  कदमों से  दूर नहीं होगी,  इसके लिए समग्र राष्ट्रीय कृषि नीति की दरकार]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/Indian-agriculture-need-comprehensive-policy.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 12 Jan 2021 16:29:11 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/Indian-agriculture-need-comprehensive-policy.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>तीन नए कृषि कानूनों और न्यूनतम समर्थन मूल्य को जारी रखने की किसानों की मांग पर चारों ओर चल रही बहसों में, अक्सर यह सवाल उठ रहे हैं कि क्या सरकार को किसानों को सब्सिडी प्रदान करने के लिए करदाताओं के पैसे का उपयोग करना चाहिए? हालांकि, तार्किक रूप से, दो और प्रश्न पूछे जाने चाहिए, लेकिन उनमें से कोई भी सवाल कभी भी मजबूत तरीके से नहीं पूछे गए हैं। पहला, पूर्ववर्ती सरकारों ने कृषि सब्सिडी प्रदान करने के लिए सरकारी खजाने का उपयोग क्यों किया है, और दूसरी बात यह है कि कृषि में पर्याप्त हित रखने वाले अन्य देशों की तुलना में भारत की कृषि सब्सिडी पर खर्च कितना बड़ा है?</p>
<p>भारतीय अर्थव्यवस्था को समझने वाले किसी भी विश्लेषक के लिए यह अबूझ नहीं है , कि कैसे कृषि क्षेत्र ग्रामीण भारत के उस बड़े वर्ग को रोजगार के अवसर देता है, जो कि हमेशा से जीवनयापन के लिए उस पर पूरी तरह से निर्भर हैं। 1950-51 में, देश की जीडीपी में कृषि की हिस्सेदारी 45 फीसदी थी, इस क्षेत्र पर निर्भर कार्यबल की हिस्सेदारी 70 फीसदी&nbsp; के करीब थी। सात दशक बाद, सकल घरेलू उत्पाद में कृषि की हिस्सेदारी 16 फीसदी&nbsp; से नीचे है, लेकिन देश का लगभग 50 फीसदी कार्यबल इस क्षेत्र पर निर्भर करता है। कृषि क्षेत्र पर दबाव, व्यापार की दृष्टि से गैर-कृषि क्षेत्रों की तुलना में और भी अधिक स्पष्ट हो जाता है। कृषि क्षेत्र 1980 के बाद से लगातार व्यापार की प्रतिकूल शर्तों का सामना कर रहा है। यही नहीं 1990 के दशक में और फिर से 2012-13 के बाद से कोई अलग बदलाव नहीं दिख रहा है। परेशानी की बात यह है कि 2000 के बाद से कृषि क्षेत्र लगातार गैर कृषि क्षेत्रों की तुलना में प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना कर रहा है।</p>
<p>बढ़ती हुई अक्षमताओं के कारण कृषि आय में लगातार कमी आई है। जिसकी वजह से कृषि क्षेत्र में निवेश भी लगातार घटता गया है। देश में किए गए कुल निवेश में कृषि क्षेत्र को मिलने वाली 1950 के दशक में लगभग 18 फीसदी थी। जो कि 1980 के दशक में गिरकर 11 फीसदी से पर पहुंच गई। बाद के दशकों में, यह हिस्सेदारी दोहरे अंकों तक भी नहीं पहुंच पाई। जिस कारण स्थिति बहुत ज्यादा खराब हो चुकी है। सबसे हाल के जो आंकड़े उपलब्ध हैं (2014-15 से 2018-19) के दौरान&nbsp; कुल निवेश में कृषि क्षेत्र की&nbsp; हिस्सेदारी गिरकर 7.6 फीसदी पर आ गई। हालांकि, इस अस्वीकार्य स्थिति के बावजूद, आजाद भारत में प्रत्येक सरकार ने व्यवस्थित रूप से कृषि में निवेश को बढ़ाने की आवश्यकता को नजरअंदाज कर दिया, जिसने कृषि संसाधनों का अधिक कुशल उपयोग नहीं हो पाया। बल्कि निवेश बढ़ाने से न केवल कृषि क्षेत्र में सुधार होता बल्कि आय में सुधार की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम होगा।</p>
<p>भारत की प्रमुख फसलों की उत्पादकता (यील्ड)&nbsp; के स्तर की तुलना अगर दूसरे देशों के साथ की जाय, तो यह देश में कृषि की निराशाजनक स्थिति को प्रकट करती है। भारत की दो प्रमुख फसलों गेहूं और चावल की उत्पादकता के आधार पर 2019 में रैंकिंग क्रमशः 45 वें और 59 वें स्थान पर थी। यह रैंकिंग और गिर जाएगी यदि इसमें पंजाब और हरियाणा जैसे उच्च पैदावार वाले राज्यों को बाहर रख दिया जाय। दूसरे शब्दों में, देश के दूसरे राज्यों में किसानों के लिए, यह कम पैदावार के बीच अस्तित्व की लड़ाई है।</p>
<p>बाजार हमेशा किसानों का सबसे बड़ा विरोधी रहा है, जिससे उनके लिए अपनी उपज के लिए लाभप्रद&nbsp; कीमतों का मिलना&nbsp; असंभव हो गया है। एपीएमसी के वर्चस्व वाली मौजूदा विपणन प्रणाली लंबे समय से छोटे किसानों के हितों के खिलाफ साबित हुई है, लेकिन सरकार ने अपनी समझदारी से अब और भी बड़े बिचौलियों को पेश करने का फैसला किया है जो इस दुष्चक्र को बढ़ावा देने के अलावा कुछ नहीं करेंगे।</p>
<p>यह कोई दिमाग लगाने की बात नही है कि भारतीय कृषि के सामने आने वाली ऐसी जटिल समस्याओं को छोटे-मोटे फैसले लेने के माध्यम से हल नहीं किया जा सकता है। &nbsp;देश को इस समय एक कृषि नीति की आवश्यकता है जो इस क्षेत्र के सामने आने वाली चुनौतियों का व्यापक तरीके से समाधान करे। हैरानी की बात है कि इस तरह की नीति की मांग शायद ही कभी देश के कृषक समुदाय द्वारा की गई हो। आजादी के बाद से भारत में कृषि की समग्र नीति की कमी को निश्चित रूप से सरकारों की सबसे बड़ी विफलताओं में से एक माना जाना चाहिए। इस विफलता की भयावहता को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है अगर कोई इस तथ्य पर विचार करता है कि संयुक्त राज्य अमेरिका (अमेरिका), कृषि में लगे अपने कामगारों की संख्या के दो फीसदी से कम के होने के बावजूद साल 1933 से राष्ट्रपति रूजवेल्ट की नई डील के पहले कानून के बाद से हर चौथे वर्ष जरूरत के अनुसार कृषि कानून बना रहा है। इसी तरह का कदम अपनी स्थापना के कुछ समय बाद यूरोपीय कॉमन मार्केट के सदस्यों ने 1962 में आम कृषि नीति को अपनाया। ये नीतियां व्यापक रूप से संबंधित सरकारों के समर्थन के माध्यम से कृषि क्षेत्र की जरूरतों को पूरा करती आ रही हैं।<br /><br /></p>
<p>उपरोक्त चर्चा भारत की कृषि सब्सिडी के संदर्भ में बेहद उपयोगी है। मौजूदा संकट इस समय अभी तक के नीति निर्माताओं की विफलता का खामियाजा है। यह समय किसानों के साथ उलझने के बजाय उनके साथ मिलकर एक किसान-हितैषी नीति बनाने के साथ, संस्थाओं की स्थापना करने का है। लेकिन अब तक सरकारों ने ऐसा नहीं किया, बल्कि सब्सिडी के जरिए समस्याओं को टालने की कोशिश की है। इसके लिए खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दुहाई दी गई है। यह कहा जाना चाहिए कि सरकारों ने सब्सिडी देना जारी रखा है क्योंकि दोनों में से किसी भी उद्देश्य को पूरा करने में विफलता देश के लिए विनाशकारी परिणाम हो सकती है। एक ही समय में, हालांकि, एक उचित नीतिगत ढांचे के बिना सब्सिडी के वितरण ने उत्पादन की संरचना को विकृत कर दिया है और अत्यधिक खाद्य भंडार के रूप में अवांछनीय परिणाम प्राप्त हुए हैं।</p>
<p>जब सब्सिडी को वास्तव में भारतीय किसानों के लिए अस्तित्व की मुद्दा बना दिया गया है, तो भारत की सब्सिडी की तुलना अन्य देशों द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी से करनी चाहिए। विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के सदस्यों से कृषि पर समझौते (एओए) पर&nbsp; के तहत उनकी कृषि सब्सिडी को अधिसूचित करने की उम्मीद है; सब्सिडी सूचनाएं यह समझने के लिए एक अच्छा आधार प्रदान करती हैं कि भारत इस संबंध में अन्य देशों के साथ कहां खड़ा है।</p>
<p>साल 2018-19 के लिए भारत की उपलब्ध ताजा अधिसूचना से पता चलता है कि भारत द्वारा करीब 56 अरब डॉलर से थोड़ी अधिक ही सब्सिडी दी जा रही है। हाल के वर्षों में, भारत की सब्सिडी का सबसे बड़ा हिस्सा (24.2 अरब डॉलर, या कुल का 43 फीसदी) "कम आय या संसाधन हीन गरीब किसानों" को प्रदान किया जाता है, जो एओए के मुताबिक उपयोग फार्मूले के तहत आता है। हालांकि, किसानों की इस श्रेणी को तय करने का काम&nbsp; सदस्य देशों पर छोड़ दिया गया है। भारत ने सूचित किया है कि उसके 99.43 फीसदी किसान निम्न आय या कम संसाधन वाले गरीब हैं। 2015-16 में आयोजित कृषि जनगणना के अनुसार, ये ऐसे किसान हैं जिनके पास 10 हेक्टेयर या उससे कम जमीन है। इस प्रकार, भारत सरकार के अनुसार, लगभग पूरे कृषि क्षेत्र में आर्थिक रूप से कमजोर किसान शामिल हैं।</p>
<p>फार्म सब्सिडी के दो प्रमुख प्रदाताओं, अमेरिका और यूरोपीय संघ (ईयू) के सदस्यों ने भारत की तुलना में सब्सीडी की बहुत अधिक राशि खर्च की है। अमेरिका ने 2017 में 131 अरब डॉलर और यूरोप ने 2017-18 में लगभग 80 अरब यूरो (या 93 अरब डॉलर) की सब्सिडी किसानों को दी है। कृषि सब्सिडी की तुलना करने के लिए निरपेक्ष संख्या एक अच्छा संकेत नहीं देती है, तीन देशों के लिए कृषि में मूल्यवर्धन के लिए सब्सिडी के अनुपात के जरिये बेहतर तस्वीर दिखती&nbsp; हैं। इस प्रकार, 2017 के लिए, भारत की कृषि सब्सिडी 12.4 फीसदी कृषि मूल्यवर्धन थी, जबकि अमेरिका और यूरोपीय संघ के लिए, आंकड़े क्रमशः 90.8 फीसदी और 45.3 फीसदी&nbsp; थे। भारत द्वारा दी जाने वाली कृषि सब्सिडी की यही हकीकत&nbsp; है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p><strong>(लेखक जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर इकोनॉमिक स्टडीज एंड प्लानिंग में प्रोफेसर हैं।)</strong></p>
<p>&nbsp;</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ कृषि क्षेत्र की  समस्या आधे-अधूरे  कदमों से  दूर नहीं होगी,  इसके लिए समग्र राष्ट्रीय कृषि नीति की दरकार ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[अर्थव्यवस्था में एतिहासिक गिरावट लेकिन कृषि में  3.4 फीसदी बढ़ोतरी, फिर भी किसान सड़क पर]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/Agriculture-is-the-only-hope-in-the-era-of-slowdown.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 08 Jan 2021 09:20:28 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/Agriculture-is-the-only-hope-in-the-era-of-slowdown.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>चालू वित्त वर्ष (2020-21) में देश के आर्थिक मोर्चे पर इतिहास बन रहा है। आजादी के बाद पहली बार सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में&nbsp; 7.7 फीसदी की सबसे अधिक गिरावट आई है। जो अभी तक की पांच बार की गिरावट में सबसे अधिक है। अर्थव्यवस्था में गिरावट के इन मौकों में पहली बार कृषि क्षेत्र के उत्पादन में वृद्धि दर्ज की गई है। आजादी के बाद अभी तक पांच बार अर्थव्यवस्था में गिरावट आई है और इसमें चार बार गिरावट की मुख्य वजह देश के अधिकांश हिस्सों में सूखा पड़ने की वजह से&nbsp; कृषि क्षेत्र के उत्पादन में आई भारी गिरावट रही है लेकिन इस बार ऐसा नहीं है। अर्थव्यवस्था के सही आकलन के लिए ग्रॉस वैल्यू एडेड (जीवीए) का पैमाना ज्यादा सटीक है। इसके आकलन में उत्पादन पर लगने वाले टैक्स और सब्सिडी को घटा दिया जाता है। सरकार द्वारा 7 जनवरी को चालू साल के लिए अर्थव्यवस्था की विकास दर के पहले एडवांस एस्टीमेट के मुताबिक चालू वित्त वर्ष में जीवीए में 7.2 फीसदी की गिरावट रहेगी। यानी भारतीय अर्थव्यवस्था का उत्पादन पिछले वित्त वर्ष के मुकाबले 7.2 फीसदी घट जाएगा।&nbsp; लेकिन चालू वित्त वर्ष में कृषि और सहयोगी क्षेत्र के जीवीए में 3.4 फीसदी की वृद्धि होगी।</p>
<p><span style="font-weight: 400;">&nbsp;ऐसे में जब कृषि क्षेत्र अर्थव्यवस्था की फिसलन को कम करने वाला रहा है और सही मायने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत के आह्वान को सच साबित करता दिख रहा है तो इसे विडंबना ही कहा जा सकता है कि ठीक उसी समय देश के लाखों किसान सड़कों पर धऱना देकर आंदोलन कर रहे हैं। यह आंदोलन केंद्र सरकार द्वारा बनाये गये तीन नये कृषि कानूनों और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) समेत दूसरे मुद्दों को लेकर चल रहा है । दिल्ली की सीमाओं पर इनके खिलाफ चालीस दिन से अधिक समय से धरना दे रहे हैं। देश के अन्य हिस्सों में किसान आंदोलन कर रहे हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">सरकार के उच्च अधिकारियों ने </span><b>रुरल वॉयस</b><span style="font-weight: 400;"> के साथ बातचीत में स्वीकारा है कि कृषि क्षेत्र की 3.4 फीसदी की वृद्धि दर के चलते देश की जीडीपी में एक फीसदी से अधिक की गिरावट कम रही है। यानी कृषि क्षेत्र के कमजोर प्रदर्शन की स्थिति में जीडीपी में गिरावट करीब नौ फीसदी रहती। यह पहला मौका है जब गिरती अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र वजह नहीं रहा है।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">सरकार द्वारा जारी 2019-20 के आर्थिक सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक 1951-52 से अभी तक पांच बार देश की अर्थव्यवस्था में गिरावट दर्ज की गई है। यानी जीडीपी निगेटिव रही है। वित्त वर्ष 1957-58 में जीडीपी में 1.2 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई थी और उस साल कृषि क्षेत्र में 4.1 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई थी। उसके बाद 1965-66 में जीडीपी में 3.7 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई थी, इसकी बड़ी वजह कृषि क्षेत्र की जीडीपी में आई&nbsp; 9.9 फीसदी की भारी गिरावट रही थी। वहीं 1972-73 में जीडीपी में 0.3 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई थी और उस कृषि क्षेत्र में 4.4 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई थी। वहीं 1979-80 में चालू वित्त वर्ष के पहले की अवधि की सबसे अधिक 5.2 फीसदी की गिरावट जीडीपी में दर्ज की गई थी। उस साल कृषि क्षेत्र की जीडीपी में 11.9 फीसदी की भारी गिरावट दर्ज की गई थी। इस साल अंतराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमतों में आई भारी तेजी का भी अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ा था।&nbsp; इन गिरावटों के दौर में जब कृषि क्षेत्र की जीडीपी में गिरावट दर्ज की गई थी तो उन बरसों में देश को सूखे जूझना पड़ा था। जीडीपी के यह आंकड़े फैक्टर कॉस्ट पर हैं जो मौजूदा समय के जीवीए के समकक्ष हैं।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">चालू वित्त वर्ष&nbsp; में जीवीए की गिरावट की वजह लॉकडाउन और उसके चलते अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों के उत्पादन और गतिविधियों में आई भारी गिरावट रही है।&nbsp; इस संकट से उबरने के लिए सरकार ने जो स्टिमुलस पैकेज घोषित किये उनके साथ ही आत्मनिर्भर भारत का नारा जोड़ा है। यहां खास बात यह है कि कषि क्षेत्र में अधिकांश उत्पादों के मामले में देश आत्मनिर्भर है। खाद्य तेलों और एक आध अन्य अपवाद को छोड़ दें तो इस समय देश कृषि उत्पादों के सरप्लस की स्थिति से जूझ रहा है। जिसके चलते किसानों को बेहतर दाम मिलने में दिक्कत आ रही है। किसानों के मौजूदा आंदोलन की एक सबसे बड़ी वजह फसलों की बेहतर कीमतें न मिलना है। उसके लिए किसान&nbsp; न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी गारंटी की मांग कर रहे हैं। लेकिन सरकार ने इस दौरान कृषि मार्केटिंग सुधारों का पैकेज घोषित कर दिया। सुधारों के समर्थकों का तर्क है कि कि हमेशा संकट के दौर में ही सुधारों को लागू करना संभव हुआ है। लेकिन कृषि और सहयोगी क्षेत्र के मामले में तो हकीकत कुछ और है। अर्थव्यवस्था के बाकी क्षेत्रों में तो ताजा संकट है लेकिन कृषि क्षेत्र में तो कोई ताजा संकट पैदा नहीं हुआ, बल्कि जब अर्थव्यवस्था का जीवीए 7.2 फीसदी गिर रहा है तब कृषि व सहयोगी क्षेत्र के जीवीए में 3.4 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है। यह बात भी सच है कि कृषि और गैर-कृषि क्षेत्र के बीच बढ़ते आय के अंतर और कृषि के लिए निगेटिव टर्म्स ऑफ ट्रेड के चलते कृषि क्षेत्र की स्थिति खराब होती जा रही है और किसानों की आय कम हो रही है। इसलिए मुद्दा काफी पेचीदा बन गया है। यहां आत्मनिर्भर भारत के मायने दूसरे निकालने होंगे। इसके लिए इंडिया और </span><span style="font-weight: 400;">&lsquo;</span><b>भारत</b><span style="font-weight: 400;">&rsquo;</span><span style="font-weight: 400;"> यानी ग्रामीण अर्थव्यवस्था के बीच के बढ़ते अंतर को रोकने के लिए सरकार को पुख्ता कदम उठाने की जरूरत है।</span></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2020/12/image_750x500_5feb2de409d76.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ अर्थव्यवस्था में एतिहासिक गिरावट लेकिन कृषि में  3.4 फीसदी बढ़ोतरी, फिर भी किसान सड़क पर ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[किसान दिवस विशेष: चौधरी चरण सिंह के संकल्पों को दोहराने की जरूरत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/birthday-of-chowdhery-charan-singh.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 22 Dec 2020 12:16:53 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/birthday-of-chowdhery-charan-singh.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p></p>
<p>समूचा देश आज &ldquo;किसान दिवस&rdquo; मना रहा है। आजाद भारत के सर्वाधिक स्वीकार्य एवं लोकप्रिय किसान नेता चौधरी चरण सिंह का आज 118वां जन्मदिन है। केंद्र सरकार द्वारा पारित तीन कृषि बिलों को लेकर देशभर के किसान संघर्षरत हैं। उनके संगठनों द्वारा भी सार्वजनिक तौर पर घोषणा की गई थी कि वह 23 दिसंबर को &ldquo;किसान दिवस&rdquo; मनाएंगे और अपनी मांगों के समर्थन में उपवास भी रखेंगे।</p>
<p>ग्रामीण भारत आज उदास है। अन्नदाता ने विगत 50 वर्षों में रिकॉर्ड उत्पादन कर भारत को न सिर्फ खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बनाया है, बल्कि आज भारत गेहूं, चावल, शक्कर आदि क्षेत्रों में बड़े निर्यातक के रूप में उभर रहा है। 50, 60, 70 के दशक के वे दिन भी अभी स्मृतियों से लुप्त नहीं हुए हैं, जब खाद्य पदार्थ की घरेलू जरूरत पूरी करने हेतु अमेरिका से गेहूं (पीएल 480) से लेकर कनाडा और अन्य देशों से आयात करना पड़ता था। वहीं आज कोरोना संक्रमण के दौर में भी विगत 6 महीने से 80 करोड़ जरूरतमंद भारतीयों को मुफ्त भोजन की व्यवस्था की गई है, जबकि एफएओ द्वारा संक्रमण काल में दक्षिण एशिया में भुखमरी के संकेत बताए गए हैं। सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सशक्त बनाकर दो तिहाई आबादी को न्यूनतम मूल्य पर गेहूं, चावल और दाल उपलब्ध कराई जा रही है, लेकिन पिछले 28 दिन से अन्नदाता 4.5 डिग्री तापमान में घरबार छोड़कर दिल्ली के सभी प्रवेश द्वारों पर धरनारत हैं। <strong><u>असली</u></strong> भारत की आर्थिक स्थिति चिंताजनक बनती जा रही है। प्रतिदिन कई किसान आत्महत्या कर रहे हैं। चूंकि कृषि लाभ का उपक्रम नहीं बन पा रही है। बैंकों और साहूकारों के कर्ज से मुक्ति मिलने की सभी संभावनाएं लगभग समाप्त हैं। लगभग हर किसान पर औसतन एक लाख रुपये का कर्ज मापा गया है। 70% किसानों के पास 1 हेक्टेयर से कम जोत है, जो कृषि भाषा के अनुसार अलाभकारी माना जाता है। एनएसएसओ के विगत दिनों प्रमाणित आंकड़ों के मुताबिक कृषक परिवार की औसत आय 6428 रुपये आंकी गई है, जो चतुर्थ श्रेणी के सरकारी कर्मचारी से भी कम है। सरकार द्वारा प्राप्त सरकारी सब्सिडी मदद जहां भारत में 20000 रुपये सालाना दी जा रही है। वहीं अमेरिका में प्रतिदिन 6000 करोड़ की सब्सिडी उपलब्ध कराई जा रही है। सन् 1967, 68 से शुरू किए गए न्यूनतम समर्थन मूल्य की प्रक्रिया दिन प्रतिदिन कमजोर होती जा रही है। यह सही है कि एमएसपी प्रक्रिया जारी है और सरकार इसे समाप्त करने का इरादा भी नहीं रखती है। वहीं दूसरी ओर 80 प्रतिशत किसान एमएसपी प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं। गेहूं, चावल, मक्का, बाजरा जैसे किसान उत्पाद के लूट के समाचार अखबारों की सुर्खियां बटोर रहे हैं। सभी सरकारों का रवैया उनके साथ पक्षपात पूर्ण रहा है। कृषक उपज व्यापार एवं वाणिज्य विधेयक 2020 न्यूनतम समर्थन मूल्य को कोई कानूनी अधिकार नहीं बनाता है।</p>
<p>संसद के दोनों सदनों में पारित विधेयक में एमएसपी या खरीद का कोई उल्लेख नहीं है। इसका मकसद किसानों, व्यापारियों को एमएसपी मंडियों के बाहर उपज के क्रय-विक्रय को स्वतंत्रता देना है। एमएसपी और खरीद दो अलग-अलग मुद्दे हैं। एमएसपी ना तो पहले कभी कानून का हिस्सा थी और ना ही आगे किसी कानून का हिस्सा होगी। कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार में बना प्रसिद्ध खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 सिर्फ सार्वजनिक वितरण प्रणाली को एक कानूनी अधिकार प्रदान करता है। इसमें एमएसपी संबंधी ना कोई कानून है और ना कोई सिफारिश की गई है। अफसोस है कि एमएसपी केवल एक नीति है, जो प्रशासनिक फैसले लेने का हिस्सा मात्र है। उसके क्रियान्वय को अनिवार्य बनाने वाला कोई कानून नहीं है। आश्चर्यजनक है कि एमएसपी की सिफारिश करने वाली सी.ए.सी.पी. को भी वैधानिक दर्जा प्राप्त नहीं है। सी.ए.सी.पी. खुद संसद के अधिनियम के जरिए बना कोई वैधानिक निकाय नहीं है। इसके द्वारा की गई सिफारिश सरकार माने ऐसा भी कोई कानून नहीं है। यह मूल्य वृद्धि की सिफारिश मात्र करता है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>मुगल काल, ब्रिटिश प्रशासन और स्वतंत्र भारत में इस क्षेत्र को लेकर कोई बड़े बदलाव नहीं हो पाए हैं। गांधी जी के नेतृत्व में चंपारण का किसान आंदोलन भारतीय किसानों को अवश्य यकीन दिलाता था कि स्वतंत्र भारत में उनकी अनदेखी संभव नहीं होगी। स्वामी सहजानंद सरस्वती और सरदार पटेल के नेतृत्व में कई बार किसानों के संगठित आंदोलन भी स्वतंत्र भारत में किसानों को नए सपने दिखा रहे थे। सरदार पटेल की असमय मृत्यु ने देश की बड़ी आबादी को निराश कर दिया। गांव, खेत, खलिहान और उद्योग जगत के विकास की प्राथमिकताओं को लेकर पंडित नेहरू से उनके मतभेद जगजाहिर थे। प्रथम पंचवर्षीय योजना के प्रारूप में कृषि क्षेत्र को लगभग 35% राशि का आवंटन किया गया था, जो दूसरी और तीसरी योजना में घटकर मात्र 10 से 12% ही रह गया।</p>
<p>आजाद भारत में चौधरी चरण सिंह इस विरासत के साथ अपनी सरकारों को घेरते रहे हैं। उनका उद्देश्य छुटपुट राहत दिलाने तक सीमित नहीं था। बल्कि वे ग्रामीण पृष्ठभूमि के लोगों की सत्ता के स्वामित्व को लेकर कार्यरत रहे। पहला विरोध उनका भूमि सुधारों के असरदार क्रियान्वयन को लेकर था। उत्तर प्रदेश के राजस्व मंत्री रहते हुए अपने राज्य में असरदार भूमि सुधारों के नायक बने। दूसरा मुकाबला उनका पंडित नेहरू से सहकारी कृषि को लेकर था। पंडित नेहरू कांग्रेस के पर्याय और स्वतंत्र भारत के सबसे लोकप्रिय नेताओं में शुमार थे।</p>
<p>उनके द्वारा प्रस्तुत आधिकारिक प्रस्ताव का विरोध चौधरी चरण सिंह ने किया तो प्रतिनिधि करतल ध्वनि से उनका समर्थन कर रहे थे। पंडित नेहरू के आधिकारिक प्रस्ताव को पराजित किया गया. लेकिन चौधरी चरण सिंह हाईकमान की आंखों की किरकिरी बन गए। पहली बार पंडित गोविंद बल्लभ पंत उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तब उन्होंने तीन नेताओं को अपना संसदीय सचिव नियुक्त किया। जिसमें लाल बहादुर शास्त्री चौधरी, चौ. चरण सिंह और सी.पी. गुप्ता शामिल रहे। चौधरी चरण सिंह को उत्तर प्रदेश सरकार में निरंतर अवहेलना एवं अपमान झेलना पड़ा। अंततः दुखी होकर उन्होंने 1967 में कांग्रेस छोड़कर भारतीय क्रांति दल का निर्माण किया और उत्तर प्रदेश के पहले गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने। आज भी कुशल मुख्यमंत्री के प्रशासनिक क्षमता से पूर्ण पारदर्शी कार्यकाल की सराहना की जाती है।</p>
<p>आज दिल्ली के प्रवेश द्वारों पर किसानों के बड़े जमावड़े आयोजित हैं, जो 23 दिसंबर 1978 को चौधरी साहब के जन्मदिन पर आयोजित किसान रैली की याद दिलाते हैं। आजाद भारत में संपन्न हुई यह अब तक की संख्या बल के आधार पर सबसे सफल रैली रही। यह रैली चौधरी चरण सिंह एवं राजनारायण के मंत्री परिषद से निष्कासन के विरोध में आयोजित की गई थी। जानकारों के अनुसार इसमें 25 लाख से अधिक लोगों की हिस्सेदारी रही। इतिहास गवाह है कि जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने किसान आक्रोश के सामने घुटने टेककर उन्हें उप प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री पद पर नवाजा। बाद में वे पहले किसान प्रधानमंत्री बने। यद्यपि उस समय के कांग्रेस के विश्वासघाती नेतृत्व के चलते उनका कार्यकाल की अवधि अधिक नहीं रही। चौधरी चरण सिंह की राजनीति का मूल मंत्र राज्य सत्ता पर आधिपत्य कायम करने पर रहा। इसके लिए वे निरंतर कभी सरकार में रहकर तो कभी बाहर रहकर जीवन पर्यंत कार्यरत रहे। आज उन्हीं संकल्पों को दोहराने का दिन है।</p>
<p>(<strong>लेखक&nbsp; ज.द.(यू) के प्रधान महासचिव और पूर्व राज्य सभा सांसद हैं</strong>)</p>
<p>&nbsp;</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ किसान दिवस विशेष: चौधरी चरण सिंह के संकल्पों को दोहराने की जरूरत ]]></media:description>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[किसानों के संघर्ष में डॉ. कूरियन की याद...]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/how-dr-kurian-is-relevent-in-recent-farm-crisis.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 22 Dec 2020 08:23:24 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/how-dr-kurian-is-relevent-in-recent-farm-crisis.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p></p>
<p style="text-align: right;">&nbsp;36 लाख किसानों के स्वामित्व वाली पांच अरब डॉलर की कंपनी, यह आपको अविश्वसनीय लग सकता है? असल में यह गुजरात कोआपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन&nbsp; (जीसीएमएमएफ) है जिसे हम इसके लोकप्रिय ब्रांड नाम अमूल के रूप में जानते हैं। यह अपने किसानों से हर दिन 250 लाख लीटर दूध एकत्र करता है और यह सुनिश्चित करता है कि उन्हें बाजार में सर्वोत्तम संभव मूल्य मिले। डॉ कुरियन की प्रतिभा के लिए धन्यवाद।</p>
<p>डॉ. वर्गीज कुरियन को उनकी 100 वीं जयंती वर्ष पर याद करना उनके दर्शन और उनके मूल्यों को याद करना है। उन्होंने अमूल को एक विश्वस्तरीय ब्रांड बनाने के लिए कैसे, नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड (एनडीडीबी)&nbsp; को एक स्वायत्त संस्थान बनाया, उन्होंने कैसे इंस्टीट्यूट ऑफ रूरल मैनेजमेंट आणंद (इरमा) की स्थापना की या उन्होंने श्वेत क्रांति &rsquo;कैसे की, इसकी कहानियां जगजाहिर हैं। यदि भारत में प्रति वर्ष 18.8<span>8 </span>करोड़ टन (जो वैश्विक उत्पादन का 22 फीसदी है) दूध उत्पादन होने से यह विश्व का सबसे बड़ा दूध उत्पादक बन गया है, यदि भारत में प्रति व्यक्ति दूध की उपलब्धता वैश्विक औसत से अधिक है, यदि भारत में उत्पादित दूध का कुल मूल्य चावल और गेहूं के संयुक्त मूल्य से अधिक है। इसके लिए &nbsp;डॉ. कुरियन को धन्यवाद! लेकिन, उसके लिए, संख्याओं के बारे में नहीं, बल्कि किसानों और उनकी समृद्धि के बारे में बताया गया था। उन्होंने ग्रामीण समृद्धि के साधन के रूप में एक अच्छी तरह से डिजाइन की गई सहकारी दूध मूल्यवर्धन श्रृंखला की परिकल्पना की। भारत में कोई अन्य कृषि उत्पाद नहीं है जो उपभोक्ता मूल्य का कम से कम 75 फीसदी राशि वापस किसान को लौटाता है। अमूल के तहत कुछ सहकारी समितियां 83 फीसदी तक रिटर्न देती हैं। कोई निजी क्षेत्र और निश्चित रूप से कोई सार्वजनिक क्षेत्र नहीं है (यहां तक ​​कि जो करदाताओं के पैसे से पर्याप्त लेकिन अवांछनीय अनुदान प्राप्त करते हैं) जिसने ऐसा किया है। व्यावसायिक, बाजार की अगुवाई वाली संस्थाएं बनाना जो कृषि उपज का मूल्य जोड़ते हैं और किसान को उच्चतम मूल्य हस्तांतरित करते हैं, यह अपने आप में एक उल्लेखनीय कहानी है।</p>
<p>यह सफलता उनके इस मजबूत विश्वास से आई &nbsp;कि किसान खुद सरकार से बेहतर अपने मामलों का प्रबंधन कर सकते हैं। उन्होंने न केवल भरोसा किया और बल्कि उसे कर के दिखाया। संस्थान विश्वास, पारदर्शिता और प्रौद्योगिकी पर बनाए गए हैं और बाजार उनकी&nbsp; प्रेरक शक्ति है। वह हमेशा कहते थे कि &lsquo;अगर बंबई नहीं होता तो आणंद नहीं होता&rsquo;।</p>
<p>अमूल और ऑपरेशन फ्लड की सफलता से हम क्या सीखते हैं?</p>
<p>किसान स्वामित्व वाले संगठन किसानों के लिए आय का साधन पैदा करते हैं। डॉ कुरियन के लिए राष्ट्रीय&nbsp; डेयरी विकास निगम या एनडीडीबी को भारत की सबसे बड़ी सार्वजनिक क्षेत्र की डेयरी कंपनी बनाना आसान होता। इसके बजाय उन्होंने 1,90,000 डेयरी सहकारी समितियों के माध्यम से 1.<span>7 </span>करोड़ डेयरी किसानों को जोड़ने का चुनाव किया। सभी संपत्तियां डेयरी सहकारी समितियों की हैं। NDDB अपने मूल कोष के साथ काम करना जारी रखता है और सहकारी समितियों से कोई लाभ नहीं लेता है। अगर उन्होंने 'ऑपरेशन फ्लड' के लिए किसी सार्वजनिक कंपनी को माध्यम बनाया तो परिणाम पूरी तरह से अलग होते। सहकारिता की उनकी दृष्टि किसानों के स्वामित्व वाली एक कंपनी थी जहां वे सभी व्यवसाय और कार्मिक मामलों को तय करते हैं। यह और बात है कि कई सहकारी समितियां आज अर्ध सरकारी संस्थाएँ जैसी बन गई हैं। सहकारिता विभाग सहकारी उद्यमों को चलाने वाले लोगो से अभी अधिक हस्तक्षेप के साधन बन गए हैं। महाराष्ट्र के दुग्ध आयुक्त के साथ डॉ, कुरियन की बातचीत का यहां हवाला देना ठीक होगा जिसमें उन्होंने कहा था, "मैं मानता हूं कि गुजरात में कोई भी दुग्ध विभाग नहीं है, लेकिन गुजरात में दूध है"।</p>
<p>&nbsp;अमूल का मॉडल विश्वास और पारदर्शिता पर बनाया गया था। दूध देने वाले किसानों को आश्वस्त हुए कि उन्हें वजन, वसा की मात्रा और एसएनएफ आधार पर सही भुगतान मिलता है। संपूर्ण ऑपरेशन माप और सही राशि के भुगतान को सुनिश्चित करने के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग करने से था। यह विश्वास की नींव थी।</p>
<p>बाजार में सफल होने के लिए और अतिरिक्त दूध खरीदने और संग्रहीत करने के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग करना आवश्यक था। अतिरिक्त दूध को पाउडर में परिवर्तित करने की योजना इस सोच से आती है कि किसान जो भी दूध लाता है, अगर कोई मांग नहीं&nbsp; भी है, तो भी उसे खरीदा जाना चाहिए। जिससे किसान को किसी भी बाजार जोखिम से बचाना चाहिए। इसके लिए उन्होंने एक मौलिक सिद्धांत अपनाया। उन्होंने किसानों पर ध्यान केंद्रित करते हुए उत्पादों को यथासंभव आकर्षक बनाने और बाजार में गुणवत्ता और कीमत के लिए प्रतिस्पर्धा करने की आवश्यकता को समझा। उन्होंने महसूस किया कि भारतीय गायों की उत्पादकता इतनी कम थी कि किसान ऐसे जानवरों के जरिए अपना गुजारा नहीं कर सकते थे। अंतरराष्ट्रीय नस्लों के उच्च आनुवंशिक योग्यता वाली ब्रीड का उपयोग करके कृत्रिम गर्भाधान के माध्यम से क्रॉस-ब्रीडिंग पर ध्यान केंद्रित करना क्षेत्र में सबसे प्रभावी प्रौद्योगिकी हस्तक्षेप था। अमूल द्वारा अपने सदस्यों को अपनी पशु चिकित्सा सेवाएं प्रदान करने का निर्णय इसकी सफलता के लिए एक और महत्वपूर्ण कदम था।</p>
<p>वह यह भी जानते थे कि सहकारिता का मॉडल बिना पेशवेर रवैये के निजी क्षेत्र से प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकता। इसी के तहत उन्होंने इंस्टीट्यूट ऑफ रुरल मैनेजमेंट आणंद (इरमा) &nbsp;स्थापित करने की जिद आज की है। जिससे निकलने वाले&nbsp; मैनेजर्स की आज भी जरूरत है। अमूल की रीढ़ पेशेवरों की भर्ती है। अमूल के वर्तमान मैनेजिंग डायरेक्टर आर. एस. सोढ़ी इरमा के पहले बैच से हैं।ऑपरेशन फ्लड की सफलता यह थी कि विश्व बैंक से मिले&nbsp; 200 करोड़ रुपये के कर्ज से उन्होंने दस साल तक भारत के डेयरी किसानों को हर साल 24000 करोड़ का रिटर्न देने को संभव बनाया । देश में ऐसा कोई प्रोजेक्ट नहीं है जिसने उस बड़े पैमाने पर असर डाला है।</p>
<p>&nbsp;आज जब हम किसानों की बात करते हैं, तो हम सब्सिडी, न्यूनतम समर्थन मूल्य, सरकारी निगमों और नौकरशाही हस्तक्षेपों की बात करते हैं। हम भारतीय खाद्य निगम के बारे में बात करते हैं, हम बड़े पैमाने पर खरीद, लीकेज, अक्षमता और सार्वजनिक धन की बर्बादी की सभी परिचित समस्याओं लेकर सहज हो हए हैं। हम 1 लाख 50 हजार करोड़ रुपये के सालाना सब्सिडी को ठीक मानते हैं, इसका अधिकांश हिस्सा उपभोक्ताओं के लिए होता है, जबकि इसका कुछ हिस्सा किसानों को मिलता है। हम किसानों के स्वामित्व वाले संस्थानों का निर्माण करने और उनके द्वारा प्रबंधित संस्थान स्थापित करने&nbsp; से कतराते हैं, हम उन्हें स्वायत्तता और स्वतंत्रता देने में असहज हो जाते हैं, हम इस विचार को गलत तरीके से समझ रहे हैं कि किसान उद्यमों का प्रबंधन&nbsp; कर सकते हैं जबकि हम बड़े कारपोरेट कर्ज के डिफॉल्ट को हेयर कट के नाम पर नजरअंदाज कर देते हैं।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>दुर्भाग्य से हमारे बीच में एक और कुरियन नहीं है जो समय और ऊर्जा को संस्थानों के निर्माण पर खर्च कर सके। वास्तव में, हम उन्हें भीतर से नष्ट करने की कोशिश में लगे हुए हैं। जब भी हम कृषि विकास की बात करते हैं तो हम अमूल की सफलता की कहानी का हवाला देते हैं। लेकिन हम ऐसे संस्थानों को बनाने के लिए कुछ भी करने का प्रयास नहीं करते हैं। हम अपने बीच में एक और डॉ कुरियन तैयार करने में सक्षम नहीं हैं, लेकिन कई ऐसे लोग हैं जो उनके आदर्शों को आगे बढ़ा सकते हैं।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>अब किसान अक्षम सरकारी हाथों से मुक्ति की मांग कर रहे हैं। और वह किसान स्वामित्व वाले संस्थानों की मांग कर रहे हैं। यह विचार कि किसानों को आसानी से गुमराह किया जा सकता है वह अब पुरानी बातें हो चुकी हैं। आज किसान जागरूक हैं और नह अपना&nbsp; ध्यान खुद रख सकता है। बेशक, सरकार को उन्हें समान अवसर का मौका दे।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>(<strong>लेखक&nbsp; केंद्रीय कृषि और खाद्य मंत्रालय के&nbsp; पूर्व सचिव और एनडीडीबी के पूर्व चेयरमैन हैं</strong> )</p>
<p>&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ किसानों के संघर्ष में डॉ. कूरियन की याद... ]]></media:description>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[गांव देहात के हालात सुधारने की दरकार,  अलग है मौजूदा कृषि संकट]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/need-to-improve--the-condition-of-rural-areas.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 22 Dec 2020 08:14:51 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/opinion/need-to-improve--the-condition-of-rural-areas.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p></p>
<p>नए कृषि कानूनों को लागू करने के बाद कुछ समय से चल रहे किसान आंदोलन के चलते देश में कृषि संकट फिर से चर्चा में आ गया है। पिछले लंबे समय से किसानों की बदहाली के चलते पूरे देश में चिंता व्याप्त है। पूर्व में कृषि संकट उस समय समझा जाता था, जब किसी प्राकृतिक आपदा (सूखा, बाढ़, ओलावृष्टि इत्यादि) के कारण कृषि उत्पादन घट जाता था। पूर्व में देश ऐसे कई संकट देखे हैं। ऐसे में देश की खाद्य सुरक्षा भी प्रभावित होती रही है। लेकिन हाल का कृषि संकट अलग प्रकार का है। कृषि उत्पादन लगातार बढ़ रहा है, लेकिन साथ ही संकट भी बढ़ता जा रहा है।</p>
<p>एक समय था जब हमारा देश खाद्यान्नों में आत्मनिर्भर नहीं था। 1960 के दशक के प्रारंभ में तो हमें&nbsp; अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए अमेरिका से घटिया गेहूं का आयात भी करना पड़ा था, जिसका खामियाजा &lsquo;कांग्रेस ग्रास&rsquo; के नाम से खरपतवार के रूप में अभी तक देश भुगत रहा है। ऐसी परिस्थितियों में हमारे देश में आवश्यक वस्तु अधिनियम के माध्यम से कृषि जिंसों के की एक सीमा से अधिक भंडारण पर रोक लगाकर व्यापारियों को कालाबाजारी पर अंकुश लगाया जाता रहा है। लेकिन समय बदला और आज हमारा कृषि उत्पादन जरूरत से ज्यादा होने के कारण देश कमी की बजाय अधिकता यानि सरप्लस का सामना कर रहा है। भंडारण और कोल्ड स्टोरेज की कमी के कारण एक ओर हमारे कृषि उत्पाद नष्ट होते रहते हैं,&nbsp; तो दूसरी ओर किसान को उसकी उपज का सही मूल्य भी नहीं मिल पाता। किसानों को लाभकारी मूल्य न मिलने और विदेशों से सस्ते खाद्य तेल आयात होने के कारण हमारा किसान भी गरीब बना रहता है और देश को विदेशी मुद्रा का के बहिर्गमन का सामना भी करना पड़ता है।</p>
<p><strong>बढ़ता उत्पादन फिर भी कृषि संकट</strong></p>
<p>हम देखते हैं कि पिछले पांच सालों 2014-15 और 2019-20 के बीच गेहूं का उत्पादन कुल 16.6 प्रतिशत बढ़ा, जबकि चावल के उत्पादन में 12.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई। दालों के उत्पादन में 35 प्रतिशत और 9 तिलहनों के उत्पादन में 21.5 प्रतिशत वृद्धि पिछले पांच वर्षों में दर्ज की गई।</p>
<p>यानि कहा जा सकता है कि वर्तमान का कृषि संकट उत्पादन में कमी या प्राकृतिक आपदा के कारण नहीं है। साथ ही यह कृषि संकट हाल ही में उत्पन्न संकट भी नहीं है। यह संकट गहरा है और इसका निदान भी गहराई से करना जरूरी है।</p>
<p>भूमंडलीकरण के पिछले 30 सालों में राष्ट्रीय आय में कृषि का योगदान 38 प्रतिशत से घटकर मात्र 15 प्रतिशत ही रह गया है। स्थिति यह है कि 2011 की जनगणना के आर्थिक-सामाजिक आंकड़ों के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में 92 प्रतिशत गृहस्थ ऐसे हैं, जिनमें अधिकतम आय वाले सदस्य की आय 10000 रूपए से भी कम थी। 95 प्रतिशत गृहस्थों में तो यह 5000 रूपए से भी कम थी।</p>
<p>ग्रामीण क्षेत्रों की बदहाली का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि नबार्ड द्वारा किए गए सर्वेक्षण के अनुसार संलग्न ग्रामीण गृहस्थों की मासिक आय 8931 रूपए प्रतिमाह थी। कृषक गृहस्थों के भी मात्र 3340 रूपए कृषि कार्यों से, 771 रूपए पशुपालन से और अन्य आय मजदूरी, नौकरी या उद्यम से प्राप्त होती थी। यानि समझ सकते हैं कि न केवल ग्रामीण क्षेत्रों की आय अत्यंत कम है, उसमें से भी आधे ही ग्रामीण कृषक परिवार हैं और उनकी भी आधे से भी कम आमदनी कृषि और पशुपालन से प्राप्त होती है।</p>
<p>कहा जा सकता है कि ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले लोगों के जीवन में सुधार की विशेष आवश्यकता है। आज किसान धीरे-धीरे कृषि से विमुख हो रहे हैं। एक ओर बढ़ती जनसंख्या के कारण पहले ही जोत का आकार छोटा होता जा रहा है, किसान की कृषि की विमुखता के कारण कृषि भूमि का उपयोग भी घट सकता है। शहरों और कस्बों में वैकल्पिक रोजगार के अभाव के कारण ग्रामीण जनसंख्या की आर्थिक हालत कमजोर होती जा रही है।</p>
<p>आजादी के बाद आती जाती सरकारों ने अपने-अपने ढंग से कृषि की समस्याओं को सुलझाने का प्रयास किया है। 1960 के दषक के अन्न संकट को नई कृषि नीति के अंतर्गत हाईब्रिड बीजों, रसायनिक खाद और कीटनाषकों के पैकेज द्वारा निपटाया गया। अन्न का उत्पादन तो बढ़ा, लेकिन आगे चलकर कृषि उत्पादन असंतुलित होने लगा और अंतोत्गत्वा एक कृषि प्रधान देष भारत शेष दुनिया से 94000 करोड़ रूपये की दालों और खाद्य तेलों का अयातक देष बन गया।</p>
<p><strong>कृषि नीति बनाम कर्जमाफी</strong></p>
<p>सरकार आयात निर्यात नीति, औद्योगिक नीति आदि सभी प्रकार की आर्थिक नीतियां बनाती है। लेकिन कुछ अनजान कारणों से कृषि नीति नहीं बनाई जाती। बिना सुविचारित मत के &lsquo;जीएम&rsquo; बीजों की वकालत (नीति आयोग समेत कई संस्थाओं द्वारा) होने लगती है, लेकिन स्वास्थ्य, सामाजिक, पर्यावरणीय और जैव विविधता पर उनके असर हो हल्के से निपटा दिया जाता है। जिस जोषोखरोष से बीटी कपास का गुणगान गाया जाता था, उसके फेल हो जाने के बाद, उसका दोष स्वीकार भी नहीं किया जाता। यानि सही कृषि नीति पर कोई सोच नहीं। विज्ञान प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने के नाम पर &lsquo;जीएम&rsquo; परोस दिया जाता है। कृषि संकट के प्रति अपनी संवेदना का प्रदर्षन अभी तक सरकारों ने कृषि ऋण माफी द्वारा ही किया है। पहले यूपीए सरकार ने किसानों के 70,000 करोड़ रूपये के कृषि ऋण माफ कर दिये। उसके बाद अब उत्तर प्रदेष, मध्य प्रदेष, राजस्थान, महाराष्ट्र आदि में भी ऋण माफी की मांग को लेकर आंदोलन तेज होने लगे और कुछ राज्यों ने ऋण माफी की घोषणाएं की तो तेलंगाना जैसे कुछ राज्यों ने किसानों को भारी मदद भी करनी शुरू कर दी।</p>
<p>बढ़ती लागतों, उपज का लाभकारी मूल्य न मिलना, फसलों के नष्ट होने, बीमारियों पर बढ़ते खर्च आदि के कारण किसान बदहाल और गरीब एवं अपनी भूमि से वंचित हो रहा है। ऐेसे में बैंकों एवं सहकारी संस्थाओं आदि से लिये गये ऋण तो माफ हो जायेंगे लेकिन साहूकारों, व्यापारियों, रिष्तेदारों से लिये ऋण तो उसे चुकाने ही पड़ेंगे। दूसरी ओर जिन कारणों से किसान ऋणी होता है, वे तो ज्यों के त्यों बने हुए हैं।</p>
<p><strong>असंतुलित उत्पादन- विपणन की कठिनाईयां</strong></p>
<p>अर्थशास्त्र के विद्यार्थी जानते हैं कि कृषि उत्पादों का बाजार में निर्मित यानी औद्योगिक वस्तुओं के बाजार से एकदम अलग होता है। कृषि वस्तुओं की मांग और पूर्ति दोनों की कीमत लोच बहुत कम होती है यानी कृषि उत्पादों की मांग और पूर्ति दोनों ही कीमत के संदर्भ में बेलोच होती हैं। इसलिए जब भी फसल की पैदावार आती है बाजार में आपूर्ति बहुत बढ़ जाती है। उपभोक्ता तो उसकी मांग धीरे-धीरे कर पूरे वर्ष करते हैं, लेकिन ऐसे में मंडी के व्यापारी ही पहले उसकी खरीद करते हैं। इसीलिए देखा जाता है कि फसल की कटाई के बाद जब किसान फसल को मंडी में लाते हैं, तो उन्हें कम कीमत मिलती है, लेकिन बाद में उन्हीं कृषि जिंसों को उपभोक्ता कहीं अधिक कीमत पर खरीदते हैं। इसके अलावा मंडी में व्यापारी या आढ़ती किसान से खरीद कर दूसरे व्यापारियों अथवा कंपनियों को बेचते हुए कमीशन भी वसूलते हैं और इस खरीद-फरोख्त पर मंडी टैक्स भी लगता है, जिसमें से एक हिस्सा मंडी के रखरखाव सड़क निर्माण आदि पर भी खर्च होता है। सरकार द्वारा किसान को अपनी फसल बेचने के लिए अन्य विकल्पों को उपलब्ध कराने हेतु सरकार ने एक नया कानून बनाया है। जिसके अनुसार किसान को अपनी फसल मंडी के माध्यम से बेचना अनिवार्य नहीं होगा। अब उसकी फसल मंडी के बाहर भी सीधे खरीदारों व्यापारी कंपनी द्वारा निजी मंडियों में अथवा सीधे किसान के खेत से की जा सकेगी। यह भी कहा जा रहा है कि किसान की फसल को बेहतर दाम मिल पाएगा, क्योंकि अब उस खरीद-फरोख्त पर निशुल्क और कमीशन भी नहीं देना पड़ेगा। इसके लिए दो अन्य कानून भी बनाए गए हैं। कई किसान संगठन इन सभी कानूनों का विरोध कर रहे हैं और इसे वापस लेने की मांग भी कर रहे हैं। समझना होगा कि समय की मांग और परिस्थितियों के अनुसार कानूनों और व्यवस्थाओं में परिवर्तन होना जरूरी होता है। गौरतलब है कि भारत में तरह-तरह की फसलें उगाई जाती हैं और उनका देश में तो उपयोग होता ही है। कई कृषि उत्पादों का निर्यात भी होता है, जिससे खासी मात्रा में विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है। लेकिन दूसरी और बड़ी मात्रा में कृषि उत्पादों का आयात भी होता है, क्योंकि देश में उन उत्पादों की कमी है, दाल और खाद्य तेल उस वर्ग में आते हैं। हाल ही में दालों के आयात में कमी आई है, क्योंकि देश में दालों का उत्पादन काफी बढ़ गया है। दालों के उत्पादन के बढ़ने के पीछे सरकार द्वारा उसके उत्पादन को बढ़ाने हेतु सघन प्रयास है। एक ओर दालों के उत्पादन हेतु आवश्यक बीज उपलब्ध करवाए गए, तो दूसरी ओर दालों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि कर किसानों को प्रोत्साहन दिया गया, इन प्रयासों से जहां किसानों की आमदनी बढ़ी। दूसरी ओर बहुमूल्य विदेशी मुद्रा की बचत हुई। पिछले लगभग दो दशकों से देश में खाद्य तेलों का आयात बढ़ता गया। इसके पीछे कारण विदेशों से घटिया खाद्य तेलों का आया था। पाॅम आॅयल के आयात की इस संबंध में महती भूमिका रही देश के सरसों, मूंगफली, तिल आदि तेल का उत्पादन पर्याप्त न होने के कारण देश में भारी मात्रा में खाद्य तेलों का आयात होता रहा। सरकारों की उदासीनता ने इस प्रवृत्ति को बढ़ाने का अवसर दिया। एक तरफ देश में तिलहन उत्पादन की कमी है, तो दूसरी और गेहूं और चावल का इतना अधिक उत्पादन है कि न केवल उसके भंडारण की समस्या है, बल्कि उसके कारण सरकार पर उसकी खरीदी के लिए दबाव भी बना रहता है। खाद्यान्नों के सरप्लस के चलते यह खाद्यान्न समुचित भंडारण के अभाव में नष्ट भी होते हैं। इसके लिए देश में समुचित प्रोत्साहन देते हुए फसलों को के चक्र को बदलने की भी आवश्यकता महसूस होती है।</p>
<p><strong>कृषि उपज का सही मूल्य ही है समाधान</strong></p>
<p>यदि देखा जाए तो किसान को उसकी उपज का सही मूल्य ही नहीं मिल पाता। कृषि वस्तुओं के समर्थन मूल्य महंगाई के अनुपात में भी नहीं बढ़ते। खाद्य मुद्रा स्फीति, जिसका हवाला देकर समर्थन मूल्य नहीं बढ़ाने का तर्क दिया जाता है, समर्थन मूल्य के कारण नहीं सट्टेबाजी के कारण बढ़ी है। दूसरी ओर कृषि लागतें बढ़ती जा रही है। महंगे उपकरण महंगी खाद और कीटनाषक रूपी कृषि को मंहगा सौदा बनाते जा रहे हैं। इसलिए लागतों में कमी और कृषि उपज का लाभकारी मूल्य कृषि संकट का एकमात्र समाधान है। नरेन्द्र मोदी सरकार की प्रथम पारी में भारतीय जनता पार्टी के चुनाव घोषणा-पत्र के अनुरूप सरकार ने कृषि वस्तुओं की लागत में 50 प्रतिशत जोड़कर न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया। बड़ी मात्रा में पूर्व से अधिक कृषि जिंसों की सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद भी हुई। लेकिन यह भी सत्य है कि सरकार अधिकांशतः सार्वजनिक वितरण प्रणाली और खाद्य सुरक्षा हेतु भंडारण के लिए जरूरी कृषि वस्तुओं की ही खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य पर करती है। एक सरकारी समिति की रिपोर्ट के अनुसार कुल कृषि उत्पादन का मात्र 6 प्रतिशत ही सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदा जाता है। शेष 94 प्रतिशत कृषि उत्पादों की बिक्री के लिए किसान को बाजार पर निर्भर रहना पड़ता है।</p>
<p>सरकार द्वारा कृषि विपणन से संबंधित कानून के माध्यम से हालांकि यह प्रयास किया गया है कि किसान को अपनी फसल बेचने हेतु अधिक विकल्प मिल सकें, लेकिन अभी तक का अनुभव यह है कि निजी व्यापारियों के माध्यम से किसान को अपनी उपज का लाभकारी मूल्य नहीं मिल पाता। नई व्यवस्था में भी इस बात की कोई गारंटी नहीं कि किसान को उसकी उपज का लाभकारी मूल्य मिल सकेगा। इसलिए यह जरूरी है कि किसान को लाभकारी मूल्य की कानूनी गारंटी हो। तभी किसान खेती के कार्य को आगे बढ़ा पाएगा और उसके माध्यम से ग्रामीण क्षेत्र में और अधिक रोजगार के अवसर भी सृजित हो पाएंगे।</p>
<p><strong>असंतुलन को दूर करने की दरकार</strong></p>
<p>एक तरफ सरप्लस उत्पादन तो दूसरी तरफ कुछ खाद्य पदार्थों की कमी और उसके कारण आयात पर निर्भरता, हमारे देश की कृषि में असंतुलन की ओर इंगित करते हैं। बाजार में कृषि पदार्थों की उपयुक्त कीमत नीति के द्वारा हम इस असंतुलन को दूर कर सकते हैं। यही नहीं आज लोगों की बदलती खानपान की जरूरतों के अनुसार भी हमें कृषि उत्पादन चक्र में व्यापक बदलावों की जरूरत है। पिछले 30-40 वर्षों में खाद्य पदार्थों के उत्पादन में कुछ बदलाव हुए भी हैं। देश में प्रति व्याक्ति दूध की उपलब्धता के साथ-साथ प्रोटीन के अन्य स्रोतों जैसे अंडों, मशरूम समेत कई गैर कृषि उत्पादों का भी उत्पादन बढ़ा है। भारत के परंपरागत निर्यातों जैसे चाय, काफी के अलावा अनेकानेक उत्पादों खासतौर पर जैविक उत्पादों, मसालों, चावल, औषधीय उत्पादो आदि की विश्व में बड़ी मांग है।</p>
<p>अभी तक गेहूं, चावल, कपास, दालें, तिलहन, गन्ना इत्यादि के उत्पादन को ही सामान्यतौर पर कृषि माना जाता रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में विविध प्रकार की गतिविधियां कहीं पिछड़ती गई। गांवों के कारीगर लघु कुटीर उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण (चक्की, तेल के कोल्हू आदि) अब बीते जमाने की बात माने जा रहे हैं। ऐसे में गांवों में रोजगार के अवसर भी समाप्त हुए और इसके चलते ग्रामीण क्षेत्रों की आमदनी भी शहरों की तुलना में बहुत कम रह गई। नबार्ड के सर्वेक्षण के अनुसार वर्ष 2016-17 में जहां कृषक गृहस्थों की आय 8931 रूपए प्रतिमाह थी, तो गैर कृषि गृहस्थों की आमदनी तो मात्र 7269 रूपए प्रतिमाह ही थी। गौरतलब है कि गांवों में लगभग आधी जनसंख्या गैर कृषक परिवारों की है। इसलिए जरूरी है कि ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि की सहायक गतिविधियों और व्यवसायों को भी बढ़ावा दिया जाए।</p>
<p>गुजरात का &lsquo;अमूल माॅडल&rsquo; इंगित कर रहा है कि किसानों की आमदनी को बढ़ाने में डेयरी का बड़ा योगदान हो सकता है। इसके अलावा मुर्गी पालन, मषरूम, बागवानी जैसी अनेकों सहायक गतिविधियां किसानों की हालत सुधारने के लिए नितांत जरूरी है। गांवों में फूड प्रोसेसिंग अन्य छोटे और कुटीर उद्योग, किसान को वैकल्पिक रोजगार दे सकते हैं पूर्व के योजना आयोग के सदस्य स्व. एस.पी. गुप्ता की अध्यक्षता में गठित कमेटी की अनुषंसाओं को लागू करना होगा, ताकि ग्रामीण रोजगार का भी निर्माण हो और उत्पादन एवं आमदनियां भी बढ़े।</p>
<p>प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि इस कोरोना संकट में देश ने जो सबसे बड़ा सबक सीखा है वह यह है कि हमें आत्मनिर्भर बनना होगा। प्रधान मंत्री की वोकल फॉर लोकल यानि &lsquo;स्थानीय के लिए मुखर&rsquo; (स्वदेशी) का आह्वाहन अब लोगों का आह्वाहन बन गया है। हमारे देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए, हमें अपेक्षित प्रयास करने होंगे।</p>
<p>इसके लिए, जनप्रतिनिधि, टेक्नोक्रेट, उद्योग और व्यापार के प्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ताय सभी को मिलकर प्रयास करने होंगे। हम जानते हैं कि भारत विविधताओं का देश रहा है। हमारे देश के हर प्रांत, हर जिले और यहां तक कि हर गांव की अपनी खासियत है। हम जानते हैं कि प्रत्येक जिला एक या अधिक प्रकार के कौशल, कृषि उत्पादों या एक या अधिक औद्योगिक समूहों के लिए जाना जाता है। आमतौर पर, एक ही जिले में एक से अधिक प्रकार की विशेषताएं मौजूद होती हैं। वर्षों से प्रोत्साहन और प्रेरणा के अभाव में, जिले अपने उद्योगों, कौशल और कृषि उपज के संबंध में अपनी विशिष्ट पहचान खोते जा रहे हैं। हमारे देश का प्रत्येक जिला विभिन्न प्रकार के उत्कृष्ट कृषि उत्पादों का उत्पादन करता है, लेकिन मूल्य प्रोत्साहन, प्रचार, भंडारण और विपणन की उचित प्रणाली की कमी के कारण, इनमें से कई उत्पाद विलुप्त होने के खतरे का सामना कर रहे हैं। आत्मनिर्भर भारत के निर्माण हेतु ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और उद्यम के नवीन अवसर जुटाने की आवश्यकता है, ताकि हमारे गांव भी आत्मनिर्भर हो सके। गांवों में लाभकारी रोजगार प्रदान कर हम ग्रामीण जनसंख्या का शहरों की तरफ पलायन भी रोक सकते हैं।</p>
<p>(<strong>लेखक स्वदेशी जागरण मंच के सहसंयोजक और दिल्ली विश्वविद्यालय के पीजीडीएवी कालेज में एसोसिएट प्रोफेसर हैं)</strong></p> ]]></description>

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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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        <title><![CDATA[सुधारों में किसान कहां]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/opinion/agri-farmer-situtation-in-lockdown.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 15 Dec 2020 07:07:55 GMT]]></pubDate>
		<category>opinion</category>		
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        <description><![CDATA[ <p>इस समय देश की इकोनॉमी संकट में फंसी है। लॉकडाउन में जब सब कुछ बंद रहा तब भी किसान पूरे जोर-शोर से अपने खेतों में काम में लगा हुआ था। इस दौरान किसानों को बाजार में बंदी और फसलों की सही खरीद नहीं होने से हजारों करोड़ रुपये का घाटा हुआ। सरकार को इस घाटे को कम करने और किसानों की मदद के लिए कदम उठाने चाहिए थे। लेकिन सरकार ने सुधारों पर आगे बढ़ने का रुख कर लिया।</p>
<p>कृषि उत्पाद विपणन समिति (एपीएमसी) एक्ट में सुधार को लेकर नीति-निर्धारकों में एक राय बन गई है और उसे लागू करने के लिए राज्यों से कहा गया है। जाहिर है<span>, </span>सबसे पहले भाजपाशासित राज्यों से इसकी शुरुआत हो रही है। गुजरात ने एपीएमसी कानून में संशोधन के लिए अध्यादेश जारी कर दिया है<span>, </span>जिसमें एक ही लाइसेंस पर राज्य के सभी एग्रीकल्चर मार्केट में कृषि उत्पाद खरीदने की छूट होगी। जाहिर है<span>, </span>इसका फायदा मंडी में बैठा आढ़ती नहीं ले पाएगा और यह बड़े कॉरपोरेट के &zwnj;लिए कृषि उत्पाद खरीदने का रास्ता खोलने का बड़ा कदम है। इसमें कहा गया है कि इससे किसानों को उत्पाद बेचने के ज्यादा विकल्प मिलेंगे और अच्छा भाव मिलेगा। देखने में यह आदर्श लगता है। लेकिन क्या किसान को राज्य की सभी मंडियों की कीमतों की जानकारी होती है या होगी<span>? </span>उसके लिए क्या व्यवस्था है<span>? </span>कई बार किसान अपनी उपज केंद्र के तय न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बेचने के लिए अपने राज्य में सुविधा नहीं मिलती तो बगल के राज्य में जाता है। लेकिन विडंबना यह है कि दूसरे राज्य का मार्केट उसके लिए पराया हो जाता है।</p>
<p>बेहतर होगा कि केंद्र सरकार राज्यों से कहे कि किसान के लिए पूरा देश एक मार्केट है। बड़े कॉरपोरेट पूरे राज्य में खरीद की व्यवस्था कर कीमतों को नियंत्रित नहीं करेंगे<span>, </span>इसकी क्या गारंटी है। इस पर निगरानी का तंत्र पहले तय होना चाहिए। वैसे तमाम एक्सपर्ट जानते हैं कि बिहार में एपीएमसी है ही नहीं<span>, </span>अगर उदारीकृत कानूनों से किसानों का भला होता तो बिहार का किसान सबसे समृद्ध और सुखी होता।</p>
<p>&nbsp;राज्य की एजेंसियां भी किसानों को संकट के समय सही दाम नहीं दिला पा रही हैं। यहां तीन उदाहरण उत्तर प्रदेश से हैं। अमूल दिल्ली में दूध बेचने के लिए गुजरात के किसानों को करीब 45 रुपये प्रति लीटर कीमत देता है लेकिन दिल्ली के करीब उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले की दुग्ध उत्पादक सहकारी समिति किसान से केवल 31 रुपये लीटर में दूध खरीद रही है<span>, </span>जो 9 मार्च के पहले 46 रुपये प्रति लीटर था। यानी किसानों को सीधे 30 फीसदी कम दाम मिल रहा है। वह भी तब जब राज्य के डेयरी मंत्री लक्ष्मी नारायण चौधरी मथुरा जिले से ही विधायक हैं।</p>
<p>बात केवल दूध की ही नहीं है। उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा चीनी उत्पादक राज्य है लेकिन यहां चीनी मिलों की कॉरपोरेट लॉबी किसानों को कैसे संकट में डालती है<span>, </span>वह 11 मई तक गन्ना किसानों के 14,457 करोड़ रुपये के बकाए से जाहिर है। राज्य सरकार ने भी दो साल से गन्ने के राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) में कोई इजाफा नहीं किया है जबकि खाद<span>, </span>बीज<span>, </span>एग्रोकेमिकल्स<span>, </span>डीजल और मजदूरी में बढ़ोतरी से लागत बढ़ी है।</p>
<p>यही मामला गेहूं का है। चालू साल में उत्तर प्रदेश में 363 लाख टन गेहूं उत्पादन का अनुमान है जबकि सरकारी खरीद का लक्ष्य 55 लाख टन ही है। इसके विपरीत पंजाब में 185 लाख टन गेहूं उत्पादन में 135 लाख टन<span>, </span>हरियाणा में 115 लाख टन उत्पादन में 95 लाख टन<span>, </span>मध्य प्रदेश में 190 लाख टन उत्पादन में 100 लाख टन की खरीद का लक्ष्य है। 11 मई तक पंजाब 114.90 लाख टन<span>, </span>हरियाणा 57.64 लाख टन<span>, </span>मध्य प्रदेश 63.67 लाख टन लेकिन उत्तर प्रदेश केवल 11.85 लाख टन गेहूं की सरकारी खरीद ही हुई। इस साल हरियाणा सरकार <span>&lsquo;</span>मेरी फसल मेरा ब्योरा<span>&rsquo; </span>के तहत पंजीकरण कर रही है। उत्तर प्रदेश और राजस्थान के किसानों को हरियाणा में गेहूं बेचना मुश्किल हो रहा है। हालांकि इस लेखक के साथ बातचीत में हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने कहा कि हमारे किसानों का गेहूं बिकने के बाद हम उत्तर प्रदेश और राजस्थान के किसानों का गेहूं खरीदने की अनुमति दे सकते हैं।</p>
<p>उम्मीद है कि गुजरात के बाद दूसरे राज्य भी एपीएमसी सुधारों पर फैसले कर सकते हैं। लेकिन जिन किसानों के लिए सुधार की बात की जा रही है, उनकी कोई राय नहीं ली जा रही है। लॉकडाउन में इस तरह का एकतरफा फैसला लेने के पहले संबंधित पक्षों की राय ली जाए तो बेहतर रहेगा। लेकिन यह तो तभी हो सकता है, जब किसान के हक इन सुधारों के केंद्र में हों, अगर बाजारवाद केंद्र में है तो फिर किसान की राय की जरूरत ही कहां है।</p> ]]></description>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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