स्वामित्व योजना से गांवों में बुनियादी बदलाव संभव, लेकिन चुनौतियां भी बहुत

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने 2021-22 के बजट में इस योजना को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू करने की घोषणा की। इस योजना से ग्रामीणों को उनकी संपत्ति का रिकॉर्ड दुरुस्त करने और गांवों से जुड़ी योजनाएं तैयार करने में मदद मिलेगी। योजना के गुण-दोष पर विचार करने से पहले इस लेख में योजना के लक्ष्यों और उनके फायदों के बारे में बताया गया है

स्वामित्व योजना से गांवों में बुनियादी बदलाव संभव, लेकिन चुनौतियां भी बहुत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 24 अप्रैल 2020 को राष्ट्रीय पंचायत दिवस के मौके पर ग्राम पंचायत प्रमुखों के साथ वार्ता के दौरान स्वामित्व योजना की घोषणा की थी। इस योजना को 6 राज्यों हरियाणा, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर शुरू किया गया था। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन  ने 2021-22 के बजट में इस योजना को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू करने की घोषणा की। इस योजना से ग्रामीणों को उनकी संपत्ति का रिकॉर्ड दुरुस्त करने और गांवों से जुड़ी योजनाएं तैयार करने में मदद मिलेगी। योजना के गुण-दोष पर विचार करने से पहले इस लेख में योजना के लक्ष्यों और उनके फायदों के बारे में बताया गया है। स्वामित्व योजना के तय लक्ष्य हैं- 1) गांवों में रहने वालों की आवासीय संपत्ति का दस्तावेजी सबूत तैयार करना, 2) लोगों के संपत्ति के अधिकार को स्पष्ट करना, 3) योजनाएं बनाने और राजस्व संग्रह को आसान बनाना, 4) संपत्ति से जुड़े विवादों का समाधान करना, 5) इस योजना के तहत तैयार किए गए नक्शे के जरिए बेहतर ग्राम पंचायत विकास योजनाएं बनाना, 6) ग्रामीण इलाकों की आबादी को चिन्हित करने के लिए ड्रोन से सर्वे और ग्रामीण इलाकों की संपत्ति का एकीकृत प्रमाण और 7) सर्वेक्षण के नए तरीकों और ड्रोन के इस्तेमाल से ग्रामीण इलाकों में आवासीय जमीन की मैपिंग करना। स्वामित्व योजना में पंचायती राज मंत्रालय, राज्यों के पंचायती राज विभाग, राज्यों के राजस्व विभाग और भारतीय सर्वेक्षण विभाग मिलकर काम करेंगे।

दरअसल स्वामित्व योजना हरियाणा के करनाल जिले के सिरसी गांव में जमीन और इमारतों की मैपिंग के अनुभव का नतीजा है। यहां मार्च 2019 में यह काम शुरू किया गया था। इसमें ड्रोन जैसी नई टेक्नोलॉजी की मदद से आवासीय तथा खेती योग्य जमीन की पहचान की गई। इस तरीके से संग्रह किए गए डाटा पर ग्राम पंचायत में चर्चा हुई। उस बैठक में वार्ड और ग्राम सभा के सदस्य भी मौजूद थे। इनके अलावा मतदाता भी उन बैठकों में अनिवार्य संख्या में उपस्थित थे।

 

योजना की समीक्षा

विकेंद्रीकृत योजना, जिसे माइक्रो प्लानिंग या स्थानीय स्तर की प्लानिंग भी कहते हैं, को ग्रामीण इलाकों में अंजाम नहीं दिया गया है। योजना की तो बात छोड़िए, अनेक राज्यों में पंचायतों के चुनाव तक समय पर नहीं होते हैं। जब किसी राज्य में विधानसभा चुनाव होते हैं, तब नई सरकार लोगों को अधिकार देने के नाम पर पंचायत के चुनाव करवाती है। लेकिन जमीनी स्तर पर विकेंद्रीकरण करने और उसे नियमित व्यवहार में लाने की दिशा में कोई खास कदम नहीं उठाया गया है। संविधान के 73वें संशोधन से विकेंद्रीकरण में क्रांति आई, खासकर राजनीतिक विकेंद्रीकरण में। इसके तहत पूरे देश में 30 लाख से अधिक प्रतिनिधि चुनकर आए। इनमें महिलाएं, अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग के सदस्य भी शामिल हैं। पंचायतों और नगर निकायों का गठन 74वें संशोधन अधिनियम के तहत किया जाता है। उम्मीद की जाती है कि ये पंचायत और निकाय आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय की योजना तैयार करेंगे। इनके कार्य क्षेत्र में 29 विषय शामिल हैं जो संविधान की ग्यारहवीं अनुसूची में बताए गए हैं। इसके अलावा बारहवीं अनुसूची में बताए गए 18 विषय भी शामिल हैं। संविधान के 243 जेडडी अनुच्छेद में कहा गया है कि पंचायतों और निकायों की तरफ से योजना तैयार करने के बाद जिला विकास योजना तैयार की जाएगी। लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि ग्राम और नगर पंचायत स्तर पर योजना बनाए बगैर जिला स्तर की योजना कैसे बनाई जा सकेगी। स्वामित्व योजना संविधान संशोधन के लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में एक कदम हो सकता है। स्थानीय स्तर पर योजना बनाने के लिए जरूरी है कि संपत्ति, इन्वेंटरी, भूमि रिकॉर्ड जैसे आंकड़े हों। 

इस तरह जुटाए गए आंकड़े कई तरह से ग्रामीणों के लिए फायदेमंद होंगे। कुछ प्रमुख फायदे इस प्रकार हैं- 1) अभी अनेक लोग अपनी संपत्ति गिरवी रखकर बैंक या दूसरे वित्तीय संस्थानों से कर्ज नहीं ले सकते हैं। जिनके पास खेती की जमीन है सिर्फ वही ऐसा कर सकते हैं। जमीन का स्पष्ट रिकॉर्ड होने पर ये ग्रामीण या किसान भी बैंकों से कर्ज ले सकेंगे। यह उनके लिए एंपावरमेंट बढ़ाने जैसा होगा। लेकिन वास्तविक एंपावरमेंट उन भूमिहीन लोगों का होगा जिनके पास संपत्ति के नाम पर सिर्फ उनका घर है और वे अभी उसे गिरवी रख कर कर्ज या आर्थिक मदद नहीं ले सकते हैं। 2) संपत्ति का विवाद होने पर अभी उसके समाधान में बड़ी मुश्किल आती है क्योंकि संपत्ति का कोई रिकॉर्ड ही नहीं होता। ऐसे मामलों में स्थानीय दबंग लोगों की ही चलती है और फैसले जाति और संपन्नता के आधार पर किए जाते हैं। हरियाणा जैसे कुछ राज्यों में लंबरदार और ग्राम पंचायत प्रमुख जमीन को वेरीफाई करते हैं। जमीन का पुख्ता दस्तावेज होने पर भूमि विवाद में ऐसे लोगों के हस्तक्षेप की जरूरत नहीं पड़ेगी। 3) संपत्ति की बिक्री होने पर पंचायत को अतिरिक्त राजस्व मिलेगा। ग्राम पंचायत को इस तरह से जो धनराशि मिलेगी उसका इस्तेमाल सामुदायिक संपत्ति के निर्माण और उसके रखरखाव में किया जा सकता है। इसके अलावा ग्रामीण समुदाय के हित में इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने में भी उस राशि का इस्तेमाल हो सकता है। 4) इन कदमों से संपत्ति की कीमत बढ़ेगी जिससे ग्रामीण इलाकों में विकास का नया रास्ता खुलेगा। इन इलाकों में उद्योग धंधे स्थापित हो सकेंगे। सड़क के किनारे स्थित संपत्ति की कीमत और ज्यादा मिल सकेगी। जमीन को लेकर विवाद खत्म होने से ग्रामीण समाज में शांति और सद्भाव बनाए रखने में मदद मिलेगी।

लेकिन इस योजना को जमीनी स्तर पर लागू करने में कई चुनौतियां हैं। ग्रामीणों के कब्जे में जो संपत्ति है उसे बनाए रखने के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं। अगर किसी व्यक्ति या परिवार ने गलत तरीके से खेती की किसी जमीन पर कब्जा कर रखा है तो उसकी पहचान करना काफी चुनौतीपूर्ण है। अनेक जगहों पर गांव के पास स्थित जमीन या तालाब पर लोगों ने कब्जा कर लिया और उस पर घर बना लिए हैं। प्रशासन ऐसी जमीनों को कैसे मुक्त कराएगा। पंचायतों की अनदेखी के कारण इस तरह की अनेक शामलात जमीन और तालाब का अवैध कब्जा किया जा चुका है। ग्राम पंचायत प्रमुखों और इलाके के प्रभावशाली लोगों की राजनीति के चलते भी इस योजना को लागू करने में चुनौती आएगी। एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इस योजना से किसानों पर कर्ज और बढ़ सकता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के करीब 90 फ़ीसदी किसानों ने किसान क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल इसके लिए तय उद्देश्य के लिए नहीं किया है। इसके अलावा किसानों में एक समूह में उभरा है जो किसान क्रेडिट कार्ड पर मिलने वाले सस्ते कर्ज को कमाई का जरिया बना रहा है । ये लोग किसान क्रेडिट कार्ड के जरिए बैंकों से बहुत ही कम ब्याज पर कर्ज लेते हैं और जरूरतमंदों को ऊंची ब्याज दर पर कर्ज देते हैं। कई बार ऐसे कर्ज पर ब्याज की दर 60 फ़ीसदी तक होती है। स्वामित्व योजना से उन्हें बैंकों और वित्तीय संस्थानों से पैसे जुटाने का एक अतिरिक्त माध्यम मिल जाएगा और इस तरह वे ग्रामीण लोगों का और ज्यादा शोषण करेंगे। 

इस स्कीम का एक राजनीतिक प्रभाव भी देखने को मिल सकता है। जिन लोगों ने शामलात या दूसरी जमीन पर कब्जा कर रखा है वे लोग सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ जा सकते हैं। दरअसल ये लोग प्रभावशाली होते हैं और ग्रामीण समाज और वहां की अर्थव्यवस्था में इनका दबदबा रहता है। इसलिए दिशानिर्देशों के लागू होने की एक आखिरी तारीख होनी चाहिए जिसके बाद अवैध कब्जा करने वालों के खिलाफ कार्रवाई हो। 

(डॉ. महिपाल इंडियन इकोनॉमिक सर्विस के रिटायर्ड अधिकारी और कृपा फाउंडेशन के अध्यक्ष हैं। उनसे mpal1661@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है। लेख में विचार उनके निजी विचार हैं )