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    <title>Farmer News: Government Schemes for Farmers, Successful Farmer Stories &#45; : Rural Dialogue</title>
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    <description>Farmer News: Government Schemes for Farmers, Successful Farmer Stories &amp;#45; : Rural Dialogue</description>
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        <title><![CDATA[अग्रसरी नीति समीक्षा में पंचायतों की भूमिका पर चर्चा, विशेषज्ञों ने कहा जनभागीदारी से ही मजबूत होंगे पंचायत सुधार]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/people-participation-key-to-strengthening-panchayat-raj-says-agrasri-policy-review.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 23 Mar 2026 14:28:30 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
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        <description><![CDATA[ <p>जमीनी स्तर पर प्रभावी शासन सुनिश्चित करने के लिए पंचायत राज सुधार केवल सक्रिय जनभागीदारी और संस्थाओं के सुदृढ़ीकरण के माध्यम से ही संभव हैं। हालांकि पंचायती राज संस्थाओं को अधिकार देने वाला 73वां संविधान संशोधन अधिनियम लागू हुए 30 वर्ष से अधिक का समय बीत चुका है, फिर भी कई राज्यों में पंचायतों को निधियों, कार्यों और शक्तियों का पूर्ण हस्तांतरण अभी तक नहीं हो पाया है। तिरुपति स्थित अकादमी ऑफ ग्रासरूट्स स्टडीज एंड रिसर्च ऑफ इंडिया (AGRASRI) की तरफ से आयोजित एक नीति समीक्षा में ये बातें कही गईं।</p>
<p>ऑनलाइन आयोजित इस नीति समीक्षा बैठक को संबोधित करते हुए चित्तूर जिला प्रजा परिषद के उप मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. जी. वेंकट नारायण ने कहा कि ग्रामीण भारत में पंचायतों की भूमिका बहुआयामी है और वे कल्याणकारी तथा विकास योजनाओं को लोगों तक पहुंचाने का प्रमुख माध्यम हैं। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद से पंचायत राज व्यवस्था को मजबूत करने के लिए कई सुधार किए गए हैं, जिनमें 73वां संवैधानिक संशोधन अधिनियम देश की छह लाख से अधिक पंचायतों के लिए एक मील का पत्थर साबित हुआ है।</p>
<p>आंध्र प्रदेश में हालिया प्रशासनिक सुधारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि सचिवालय (Sachivalayam) प्रणाली ने ग्रामीण क्षेत्रों में कल्याणकारी योजनाओं की समयबद्ध डिलीवरी को बेहतर बनाया है। पंचायत राज ढांचे में कर्तव्यों का स्पष्ट बंटवारा और लंबे समय से लंबित पदोन्नतियों जैसे कदमों ने भी जमीनी स्तर पर बेहतर प्रशासन का मार्ग प्रशस्त किया है।</p>
<p><strong>पंचायत को अभी तक पूर्ण अधिकार हस्तांतरित नहीं</strong></p>
<p>अग्रसरी (AGRASRI) के संस्थापक और निदेशक डॉ. डी. सुंदर राम ने कहा कि 73वें संवैधानिक संशोधन को लागू हुए तीन दशक से अधिक समय बीत जाने के बावजूद कई राज्यों में पंचायतों को निधियों, कार्यों और शक्तियों का पूर्ण हस्तांतरण अभी तक नहीं हो पाया है। उन्होंने कहा कि यह स्थिति समग्र ग्रामीण विकास में बाधा बनी हुई है। उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा भारतीय ग्रामीण विकास सेवा (IRDS) शुरू करने के फैसले का स्वागत किया और इसे ग्रामीण शासन को सशक्त बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।</p>
<p>उन्होंने आगे तत्काल सुधारों की आवश्यकता पर जोर देते हुए निर्वाचित प्रतिनिधियों के लिए क्षमता निर्माण कार्यक्रम, ग्राम स्तर पर प्लानिंग, भ्रष्टाचार और जन-शिकायतों के समाधान के लिए लोकपाल जैसी व्यवस्था और पंचायतों को निधि, कार्य एवं शक्तियों का शीघ्र हस्तांतरण सुनिश्चित करने की वकालत की। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि पंचायत स्तर पर अनुभव रखने वाले प्रतिनिधियों के लिए संसद और राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण दिया जाना चाहिए, ताकि जमीनी लोकतंत्र को और मजबूती मिल सके।</p>
<p>बैठक में विशेषज्ञों ने कहा कि बेहतर सेवा वितरण, बुनियादी ढांचे के विकास और प्रशासनिक समन्वय के लिए विकेंद्रीकरण और वित्तीय स्वायत्तता अत्यंत आवश्यक हैं। उन्होंने वित्त आयोगों की सिफारिशों के प्रभावी क्रियान्वयन और पंचायतों को सीधे धन हस्तांतरण पर भी जोर दिया।</p>
<p><strong>विकेंद्रीकरण और वित्तीय स्वायत्तता अहम</strong></p>
<p>बैठक में शिक्षाविदों और विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि 73वें संशोधन के प्रावधानों के क्रियान्वयन में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्य दक्षिण भारत के अन्य राज्यों से पीछे हैं। उन्होंने ग्राम स्तर पर संस्थागत ढांचे को मजबूत करने और जन प्रतिनिधियों के लिए नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने की आवश्यकता बताई।</p>
<p>चर्चा के दौरान ग्राम सभाओं की बढ़ती भूमिका पर भी विशेष जोर दिया गया। वक्ताओं ने कहा कि ग्राम सभाएं पारदर्शिता, जवाबदेही और नागरिकों की भागीदारी सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इन संस्थाओं को मजबूत करना &ldquo;ग्राम स्वराज&rdquo; के लक्ष्य और 2047 तक विकसित भारत के विजन को साकार करने के लिए अत्यंत आवश्यक है।</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ अग्रसरी नीति समीक्षा में पंचायतों की भूमिका पर चर्चा, विशेषज्ञों ने कहा जनभागीदारी से ही मजबूत होंगे पंचायत सुधार ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कोऑपरेटिव की पहुंच हर गांव, हर व्यक्ति तक होः डॉ. चंद्रपाल सिंह]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/cooperatives-should-reach-every-village-every-person-dr.-chandrapal-singh.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 26 Oct 2025 14:13:04 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/cooperatives-should-reach-every-village-every-person-dr.-chandrapal-singh.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">देश की दूसरी सबसे बड़ी सहकारी उर्वरक उत्पादक और विपणन संस्था कृभको के चेयरमैन और इंटरनेशनल कोऑपरेटिव अलायंस (आईसीए) के एशिया-पैसिफिक प्रेसिडेंट <strong>डॉ. चंद्रपाल सिंह</strong> का कहना है कि कोऑपरेटिव की पहुंच हर व्यक्ति तक होनी चाहिए। बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मुकाबला करने के लिए भी सहकारी संस्थाओं को मजबूत करना जरूरी है। डॉ. यादव ने रूरल वर्ल्ड के एडिटर-इन-चीफ <strong>हरवीर सिंह</strong> के साथ नई सहकारिता नीति 2025, अंतरराष्ट्रीय सहकारिता वर्ष और कृभको के डायवर्सिफिकेशन के बारे में लंबी बातचीत की। मुख्य अंश:</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">यह इंटरव्यू पहले हमारे प्रिंट पब्लिकेशन<strong> रूरल वर्ल्ड</strong> के अगस्त से अक्तूबर, 2025 के संस्करण मेंं प्रकाशित हो चुका है।&nbsp;</span></p>
<p><strong>-आप इंटरनेशनल कोऑपरेटिव एलायंस (आईसीए) में एशिया पैसिफिक के प्रेसिडेंट हैं। पहली बार कोई भारतीय इस पद पर है। आईसीए में आप भारतीय सहकारिता क्षेत्र को किस तरह का एक्सपोजर दे पाए? खासतौर से आईसीए के विश्व की कोऑपरेटिव क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण संस्था होने के नाते।&nbsp;</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">सिर्फ हिंदुस्तान में नहीं, बल्कि पूरे एशिया क्षेत्र में हमने इंटरनेशनल ईयर ऑफ कोऑपरेटिव्स, 2025 (आईवाईसी, 2025) के कार्यक्रम आयोजित किए और उनके प्रभाव की समय-समय पर समीक्षा की। हाल ही हमारे बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की मीटिंग चीन के ग्वांग्झाउ में हुई। वहां हमने विस्तार से इस बात पर चर्चा की कि किस देश में क्या कार्यक्रम हुए, वहां की सरकार के सपोर्ट से क्या हासिल हुआ और आम लोगों पर उसका क्या प्रभाव रहा? इस आधार पर हमने पूरे क्षेत्र की समीक्षा की है।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">यह तो बात हुई एशिया क्षेत्र की। हमारा सौभाग्य था कि आईवाईसी, 2025 की शुरुआत हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत में की। हिंदुस्तान से उनका संदेश लेकर पूरी दुनिया के लोगों ने साल भर कार्यक्रम आयोजित किए। विभिन्न देशों की सरकारों ने यह प्रयास किया कि सहकारिता आंदोलन को बेहतर बनाया जाए, उसे समृद्ध बनाया जाए। इन सब के लिए हमारे यहां से संदेश लेकर के पूरी दुनिया में लोग गए। दुनिया भर के लोगों ने इस पर काम किया है और इसके परिणाम आने वाले समय में निश्चित रूप से हमारे सामने आएंगे।</span></p>
<p><strong>-जैसा कि आपने जिक्र किया, कि संयुक्त राष्ट्र के इंटरनेशनल ईयर ऑफ कोऑपरेटिव्स 2025 की शुरुआत हमारे देश से हुई। यह हमारे लिए भी महत्वपूर्ण है। इसका पूरे देश में जो मैसेज गया, क्या उससे कोऑपरेटिव सेक्टर ज्यादा समृद्ध होगा और इससे लोगों के बीच जागरूकता और सहकारिता में गतिविधियां बढ़ेंगी?</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">हां। हमारा मुख्य मिशन ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का है। पिछले दिनों नेफेड ने एक कार्यक्रम आयोजित किया था मुंबई में। वहां केंद्रीय गृहमंत्री, कृषि मंत्री, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री तथा अन्य मंत्री थे। सबके विचार सामने आए। कार्यक्रम में शिरकत करने वाले भी कोऑपरेटिव से जुड़े बड़े लोग और बड़े किसान थे। वहां मंत्री जी ने बताया कि सरकार की तरफ से किसानों के लिए क्या काम किए जा रहे हैं। लोगों की समस्याओं पर सवाल-जवाब भी हुए।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">हमारा मुख्य उद्देश्य है ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करना, किसान को खुशहाल बनाना, किसान के खेत का उत्पादन बढ़ाना, बैंकों के माध्यम से कम ब्याज दरों पर ऋण उपलब्ध कराना, इफको-कृभको के माध्यम से सही मात्रा में, सही कीमत पर और सही समय पर खाद-बीज उपलब्ध कराना। क्वालिटी के मामले में आजकल भरोसा सहकारी संस्थाओं पर है। इन सब बातों पर विस्तार से विचार विमर्श किया गया।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">ऐसे ही इफको ने कार्यक्रम किया। कृभको ने भी इंदौर में कार्यक्रम आयोजित किया था। बैंकिंग फेडरेशन ने अलग कार्यक्रम आयोजित किया। ये संस्थाएं जिस उद्देश्य के लिए बनी हैं, उस उद्देश्य को पूरा करने के लिए उन्होंने लोगों के समक्ष अपना रोडमैप प्रस्तुत किया और लोगों से सहभागिता की अपील की।</span></p>
<p><strong>-सहकारिता आंदोलन के लिए वर्ष 2025 की अपनी अहमियत है। वर्ष 2002 के बाद 2025 में नई सहकारिता नीति आई। नई नीति को आप किस तरीके से देखते हैं? देश में सहकारिता आंदोलन के उद्देश्यों को हासिल करने में नई नीति के प्रावधानों को आप किस तरह से देखते हैं?&nbsp;</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">देखिए, यह हमारे लिए बहुत खुशी की बात है कि 23 साल बाद राष्ट्रीय स्तर पर नई कोऑपरेटिव पॉलिसी तैयार की गई है। वैसे तो कोऑपरेटिव स्टेट का सब्जेक्ट होता है, राज्य सरकारें अपना कार्यक्रम तय करती हैं। लेकिन हम लंबे समय से यह देख रहे हैं कि राज्यों में भी सहकारी विभाग उपेक्षित रहा है। जिस तरीके से काम होना चाहिए, वह नहीं हो पाता।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">जीडीपी में बड़ा योगदान कोऑपरेटिव मूवमेंट से जुड़े हुए लोगों का ही है। आज ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए, किसान को आर्थिक रूप से खुशहाल बनाने के लिए कोऑपरेटिव मूवमेंट के माध्यम से पूरे देश में प्रयास हो रहे हैं। हमारा हमेशा प्रयास रहा है कि कोऑपरेटिव की पहुंच एक-एक गांव में हो। देश में आठ लाख कोऑपरेटिव सोसाइटी हैं, और उनके माध्यम से हमारी पहुंच 90-95% गांवों तक है। लेकिन, हमें इतनी जागरूकता पैदा करनी है कि उसकी पहुंच एक-एक व्यक्ति तक हो जाए। कोऑपरेटिव की अच्छाइयों के बारे में सब लोगों को जानकारी हो।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">पॉलिसी के माध्यम से प्राइमरी कोऑपरेटिव सोसाइटी को बहुद्देशीय बना दिया गया है। जैसे, किसान को अपनी उपज मार्केट में बेचने के लिए सहकारी संस्थाएं अहम भूमिका निभा सकती हैं। इनके लिए प्रोफेशनल लोगों की जरूरत है। प्रोफेशनल नहीं होगा तो विश्वसनीयता नहीं होगी। सहकारी संस्थाओं की विश्वसनीयता गांव-गांव तक, एक-एक व्यक्ति तक होनी चाहिए। कामकाज के पुराने तरीके से विश्वसनीयता का ह्रास हुआ है। जब कोई प्रोफेशनल आदमी बैठेगा, वह संस्था के सदस्यों द्वारा लगाई गई शेयर पूंजी के व्यवसाय से उसका घाटा और मुनाफा जुड़ा होगा, तो निश्चित रूप से वह बेहतर ढंग से काम करेगा।</span></p>
<p><strong>-यह सहकारिता का सिद्धांत ही है कि आप सामूहिक रूप से क्रिएट करते हैं और सामूहिक रूप से मुनाफे को साझा करते हैं। सहकारिता का मंत्र सहकार से समृद्धि है। आप नई पॉलिसी के और कौन से महत्वपूर्ण प्वाइंट हाईलाइट करना चाहेंगे?</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">हमारे देश की महिलाएं कोऑपरेटिव मूवमेंट से कम जुड़ी हैं। उनके छोटे-छोटे ग्रुप बनाकर, आगे चलकर उनको कोऑपरेटिव सोसाइटी का रूप देकर, उन्हें कोऑपरेटिव मूवमेंट के बारे में जागरूक करके मूवमेंट से जोड़ना है। उनकी ऊर्जा का सदुपयोग करना है। अभी उनकी ऊर्जा का पूरा सदुपयोग देश के निर्माण में हो नहीं पा रहा है।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">दूसरा, कोऑपरेटिव मूवमेंट जवान रहे, इसके लिए आने वाली नई पीढ़ी को हमें जोड़ना है। युवाओं को जोड़ने के लिए त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय बनाने का बहुत अच्छा काम हुआ है। वहां से पढ़-लिखकर जो युवा आएंगे तो कोऑपरेटिव के प्रति उनमें ज्ञान होगा, जागरूकता होगी तो निश्चित रूप से उसका लाभ मिलेगा।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">आज पढ़ लिखकर नौजवान केवल रोजगार के लिए घूमता है। लेकिन वह इस बात को भी महसूस कर सकता है कि पढ़-लिखकर अगर 50 लोगों को जोड़कर एक कोऑपरेटिव सोसाइटी बनाएंगे तो बेहतर काम कर सकते हैं। उत्पादक को लाभ पहुंचा सकते हैं और उपभोक्ता को सही कीमत में सही सामान भी उपलब्ध करा सकते हैं। आज इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी का जमाना है, उसे नए लोग ही आगे बढ़ा सकते हैं। हमने मांग की है कि हाई स्कूल और इंटरमीडिएट के पाठ्यक्रम में भी एक चैप्टर कोऑपरेटिव पर रखा जाए। पॉलिसी में यह बात रखी गई है। कोऑपरेटिव का एक विषय रखने पर लोगों में जागरूकता पैदा होगी। युवा खुद समृद्ध होने के साथ गांव के दूसरे लोगों और किसानों को भी समृद्ध बनाने में अपनी ऊर्जा का सदुपयोग करेंगे।</span></p>
<p><strong>-स्वायत्तता और पारदर्शिता के साथ लोगों में प्रोफेशनलिज्म लाने में यह नीति कितनी कारगर होगी?&nbsp;</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">मैं कह सकता हूं कि इसमें जो चमत्कारिक बात है उससे इसके परिणाम आएंगे।</span></p>
<p><strong>-नई नीति में कोऑपरेटिव इलेक्टोरल सिस्टम को भी बदलने की बात की गई है, जिससे पारदर्शिता रहे।</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">ट्रांसपेरेंसी के लिए इलेक्शन अथॉरिटी और इलेक्टोरल रोल बनाने की बात कही गई है। लोग ही शेयरहोल्डर हैं, उन्हीं में से किसी को आना चाहिए, लोकतांत्रिक व्यवस्था मजबूत रहनी चाहिए। यह सारी बातें पॉलिसी में हैं। पॉलिसी में और भी कई बेहतर चीजें हैं, लेकिन उनका क्रियान्वयन किस तरीके से होता है वह महत्वपूर्ण है।</span></p>
<p><strong>-सहकारी संस्था लोगों की अपनी संस्था है। जिन लोगों की शेयर होल्डिंग है उनकी स्वायत्तता का इस पॉलिसी में कितना ख्याल रखा गया है?&nbsp;</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">बिल्कुल होना चाहिए। पॉलिसी में कहा भी गया है कि स्वायत्तता का ध्यान रखा जाए। लेकिन देखना है कि इस पर कितना अमल होगा। देखिए, मल्टीनेशनल कंपनियों का मुकाबला प्राइवेट लोग तो नहीं कर पाएंगे। मैं विश्वास के साथ कह सकता हूं, कि अगर सहकारी संस्थाएं मजबूत होंगी तो इन मल्टीनेशनल कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा में मजबूती के साथ खड़ी दिखाई देंगी।&nbsp;</span></p>
<p><strong>-सहकारिता राज्यों का विषय है। मल्टी स्टेट कोऑपरटिव सोसाइटी तो केंद्रीय रजिस्ट्रार के तहत चलती हैं, लेकिन प्राइमरी कोऑपरटिव सोसाइटी राज्यों के एक्ट के तहत चलती हैं। क्या आपको लगता है कि जो अंब्रेला पॉलिसी बनी है, उसे राज्यों को उसी तरीके से एडॉप्ट करना चाहिए?</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">राज्यों को इस पॉलिसी को अपने यहां लागू करना चाहिए। अगर वे इस पॉलिसी को बेहतर कर सकते हैं तो उसमें कोई दिक्कत भी नहीं है। लेकिन अगर आप इस पॉलिसी के तहत काम करेंगे तो केंद्र सरकार आर्थिक रूप से भी मदद करेगी। मूवमेंट को चलाने में ट्रेनिंग, एजुकेशन, रिसर्च इन सब कार्यक्रमों के लिए केंद्र सरकार मदद दे रही है। चाहे किसी भी पार्टी की सरकार हो वह क्रियान्वयन करे और बेहतर चीजों को एडॉप्ट करके अपने यहां लागू करे।</span></p>
<p><strong>-दोनों के तालमेल से अच्छे परिणाम मिलेंगे...।</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">हम यही कह रहे हैं कि कोऑपरेटिव राजनीति से ऊपर उठ कर है। इसमें जाति, धर्म, संप्रदाय, पार्टी कुछ नहीं, सब बराबर के शेयर होल्डर हैं। प्रॉफिट हो या नुकसान, सबके हिस्से में जाएगा।&nbsp;</span></p>
<p><strong>-सरकार ने अलग सहकारिता मंत्रालय बनाया और उसकी जिम्मेदारी पावरफुल कैबिनेट मिनिस्टर अमित शाह को दी। इसका सहकारिता आंदोलन पर कितना असर देखते हैं?</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">नया मंत्रालय बनने के बाद उसके कामकाज पर जोर देना ही पड़ा। क्योंकि एक तो यह राज्यों का विषय है, और दूसरा, यह काफी उपेक्षित विषय रहा है। यह दो तरीके से उपेक्षित है। एक तो बहुत से लोगों को कोऑपरेटिव सोसाइटी के लाभ-हानि का पता नहीं लगता क्योंकि उनमें जागरूकता नहीं है। जागरूकता नहीं होगी उसका लाभ नीचे तक पहुंच ही नहीं पाएगा। (त्रिभुवन) यूनिवर्सिटी बनने के बाद नौजवान कोऑपरेटिव की तरफ आकर्षित हुआ है। यूनिवर्सिटी से वह एक अच्छा पेशेवर बनकर निकलेगा। उसे अच्छा रोजगार मिलेगा, वह अच्छा व्यवसाय भी कर सकता है।&nbsp;</span></p>
<p><strong>-सहकारी संस्थाएं चलाने का आपका लंबा अनुभव है। सहकारिता की बाकी बड़ी संस्थाओं के बोर्ड में भी आप रहे हैं। आप नेशनल कोऑपरेटिव यूनियन ऑफ इंडिया (एनसीयूआई) के अध्यक्ष रहे, कृभको का नेतृत्व लंबे समय से कर रहे हैं। यह देश की दूसरी सबसे बड़ी उर्वरक सहकारी संस्था है और लगातार ग्रोथ भी कर रही है। आपके नेतृत्व में किस तरह से कृभको को देखें?&nbsp;</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">हमने संस्था को मजबूत करने का काम किया है। जब मैं 1999 में कृभको का चेयरमैन था, तब इसका उत्पादन 16 से 18 लाख टन के बीच में था। हमने उत्पादन बढ़ाया। आज उसी प्लांट में 24-25 लाख टन उत्पादन होता है। हमने 11 लाख उत्पादन क्षमता वाली इकाई ओसवाल से खरीदी। उस समय पीएसयू का विनिवेश हो रहा था, लेकिन हमने प्राइवेट कंपनी को खरीदा। फिर, ओमान में कृभको, आरसीएफ और ओमान ने साझा प्लांट लगाने की शुरुआत की। हम कोऑपरेटिव की संस्थाएं हैं और कोऑपरेटिव में काम करने में ज्यादा सहूलियत है। पीएसयू के काम करने का तरीका अलग होता है। आरसीएफ के पीछे हटने के बाद उस प्लांट में इफको को शामिल किया। इफको और कृभको ने मिलकर ओमान में प्लांट लगा दिया।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">हमने एथनॉल के तीन प्लांट लगाए। हमने निर्यात के लिए कृभको एग्री बिजनेस शुरू किया। हमने कहा कि किसानों को कैसे फायदा मिले, इसके लिए हमें काम करना है। हमने कई तरीके से किसानों को लाभ पहुंचाने के लिए काम किया।</span></p>
<p><strong>-कृभको का लगातार विस्तार हुआ। यह मुनाफे में भी है। इसके शेयर होल्डर को कितना लाभ देते हैं?</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">एक्ट में प्रोविजन है कि अधिकतम 20% डिविडेंड दे सकते हैं, और जब से मैं चेयरमैन हूं हम 20% डिविडेंड दे रहे हैं।&nbsp;</span></p>
<p><strong>-कृभको को डायवर्सिफाई करने के लिए क्या कर रहे हैं?</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">जैसा मैंने बताया, हमने एथनॉल के प्लांट लगाए। ये ग्रेन बेस्ड एथनॉल प्लांट नेल्लोर, हजीरा और करीमनगर (तेलंगाना) में हैं। ये सब एग्री बेस्ड प्लांट हैं। यहां हम किसानों का मक्का, ब्रोकन राइस इस्तेमाल करेंगे और उससे एथनॉल बनाएंगे।&nbsp;</span></p>
<p><strong>-आपकी और भी कोई विस्तार योजना है?</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">शाहजहांपुर में पोटैटो प्रोसेसिंग प्लांट लगा रहे हैं। वह यूरोप की मल्टीनेशनल कंपनी फार्म फ्राई को सप्लाई के लिए है। वह पूरी दुनिया में फ्रेंच फ्राई सप्लाई करती है। हमने उसके साथ एक एग्रीमेंट किया है कि भारत में भी वे जहां किसानों को सीड उपलब्ध करा के आलू उत्पादन कराएंगे और उनका आलू खरीदेंगे और प्रोसेस करके हम पूरी दुनिया में बेचेंगे।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">देश में उर्वरकों की कमी को देखते हुए हमने शाहजहांपुर फर्टिलाइजर प्लांट में नई यूनिट लगाने का प्रस्ताव दिया है। हमने शाहजहांपुर में रेल लाइन भी बनाई। हमने क्रिल (कृभको इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड) बनाया जिसमें चार कंटेनर डिपो थे। लेकिन उसमें हमारी विशेषज्ञता नहीं थी, इसलिए हम उसमें बेहतर नहीं कर पा रहे थे। इसलिए डीपी वर्ल्ड को उसमें ज्यादा शेयर दे दिया। वे वहां बेहतर काम कर रहे हैं।&nbsp;</span></p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ कोऑपरेटिव की पहुंच हर गांव, हर व्यक्ति तक होः डॉ. चंद्रपाल सिंह ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[IBET 2025: खेत&amp;#45;से&amp;#45;ईंधन तक संगोष्ठी में किसान केंद्रित जैव ऊर्जा इकोसिस्टम का आह्वान]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/ibet-2025-farm-to-fuel-seminar-calls-for-farmer-centric-bioenergy-ecosystem.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 28 Sep 2025 23:11:32 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/ibet-2025-farm-to-fuel-seminar-calls-for-farmer-centric-bioenergy-ecosystem.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत जैव-ऊर्जा एवं प्रौद्योगिकी एक्सपो 2025 में &lsquo;खेत से ईंधन तक: जैव-ऊर्जा पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण&rsquo; विषय पर एक उच्चस्तरीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। रूरल वॉयस और इंडियन फेडरेशन ऑफ ग्रीन एनर्जी (IFGE) ने संयुक्त रूप से यह आयोजन नई दिल्ली स्थित यशोभूमि केंद्र में किया। संगोष्ठी में किसानों, उद्योग जगत के प्रतिनिधियों, वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं ने एक ऐसी &lsquo;खेत से ईंधन तक&rsquo; वैल्यू चेन के निर्माण पर विचार-विमर्श किया जो किसानों को सशक्त बनाए और भारत की जैव-ऊर्जा क्रांति को गति प्रदान करे।</p>
<p><strong>पैनल 1: ऊर्जा सुरक्षा के लिए कृषि उपज का इस्तेमाल</strong><br />आईसीएआर-भारतीय बाजरा अनुसंधान संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक <strong>डॉ. ए.वी. उमाकांत</strong> ने 1जी और 2जी इथेनॉल और कंप्रेस्ड बायोगैस (सीबीजी) के लिए फीडस्टॉक के रूप में ज्वार की क्षमता पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि ज्वार की नई विकसित किस्में अनाज, चारा और बायोमास की बेहतर पैदावार देने वाली हैं।</p>
<p>आईसीएआर-भारतीय मक्का अनुसंधान संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक <strong>डॉ. शंकर लाल जाट</strong> ने भारत के इथेनॉल कार्यक्रम में मक्का को सफलता की कहानी बताया। उन्होंने कहा कि किसानों को बेहतर मूल्य प्राप्ति का लाभ मिला है। बढ़ते उत्पादन के साथ मक्का एक लाभदायक फीडस्टॉक बना रहेगा।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/09/image_750x_68d7d1d6b734b.jpg" alt="" /></p>
<p>डीसीएम श्रीराम लिमिटेड के चीनी प्रभाग के सीईओ एवं कार्यकारी निदेशक <strong>रोशन लाल टमक</strong> ने किसानों की आय में सुधार और एक बेहतर फीडस्टॉक सप्लाई चेन बनाने के लिए इंडस्ट्री लिंकेज को मजबूत करने के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने उत्पादकता में अंतर के प्रति आगाह किया और औसत तथा सर्वोत्तम उपज के बीच बड़े अंतर का जिक्र किया।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/09/image_750x_68d7eedf9bc7c.jpg" alt="" /></p>
<p>प्राज इंडस्ट्रीज के एवीपी-कॉर्पोरेट स्ट्रैटजी, <strong>डॉ. तुषार पाटिल</strong> ने जैव ऊर्जा पारिस्थितिकी तंत्र में किसान समूहों के लिए अवसरों पर चर्चा की। उन्होंने भविष्य के विकास मार्गों, बाजार विकास और ग्रामीण समृद्धि बढ़ाने के मॉडलों पर जोर दिया।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/09/image_750x_68d7ceb27f4ac.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>पैनल 2: बायो एनर्जी एवं सर्कुलर इकोनॉमी के आर्थिक लाभ</strong></p>
<p>फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया (FAI) के महानिदेशक <strong>डॉ. सुरेश कुमार चौधरी</strong> ने मृदा स्वास्थ्य और कार्बन संतुलन बनाए रखने में जैविक खाद की भूमिका पर जोर दिया। नकली उर्वरकों पर चिंता जताते हुए उन्होंने फर्मेंटेड जैविक खाद (एफओएम) और तरल फर्मेंटेड जैविक खाद (एलएफओएम) जैसे नए उत्पादों के लिए कठोर परीक्षण और मानकों को जरूरी बताया।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/09/image_750x_68d7ef262dc84.jpg" alt="" /></p>
<p>फार्मवाट इनोवेशन्स प्राइवेट लिमिटेड के संस्थापक और सीईओ <strong>कुमार नीलेन्दु झा</strong> ने किसान समूहों और इकोसिस्टम इनेबलर्स द्वारा संचालित एक स्थायी कृषि-अपशिष्ट मूल्य श्रृंखला बनाने के बारे में बात की।</p>
<p>ट्रेड प्रमोशन काउंसिल ऑफ इंडिया के संयुक्त निदेशक <strong>अनिक रॉय</strong> ने जैव ऊर्जा क्षेत्र में नए व्यापार और व्यवसाय के अवसरों पर प्रकाश डाला। उन्होंने किसानों को लाभ पहुंचाने वाली उन्नत तकनीकों को बढ़ावा देने पर जोर दिया।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/09/image_750x_68d820fd68fed.jpg" alt="" /></p>
<p>नॉर्दर्न फार्मर्स मेगा एफपीओ के संस्थापक एवं निदेशक <strong>पुनीत सिंह थिंड</strong> ने अपने वैश्विक अनुभवों का जिक्र किया। उन्होंने जोखिम उठाने और सौदेबाजी की क्षमता विकसित करने में किसान सहकारी समितियों के महत्व पर जोर दिया। कनाडा उच्चायोग के सस्केचेवान इंडिया ऑफिस के प्रबंध निदेशक <strong>स्कॉट मैथिस</strong> भी इस संगोष्ठी में शामिल हुए और अपने विचार साझा किए।</p>
<p>सत्रों का संचालन रूरल वॉयस और रूरल वर्ल्ड के एडिटर-इन-चीफ <strong>हरवीर सिंह</strong> ने किया। उन्होंने &lsquo;कृषि से ईंधन&rsquo; तक की श्रृंखला को और अधिक समावेशी और किसान-केंद्रित बनाने की बात कही।</p>
<p>विभिन्न राज्यों के प्रगतिशील किसानों ने भी अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने जैव ऊर्जा विकास को किसानों की आय बढ़ाने के लक्ष्य के साथ जोड़ने के अवसरों और चुनौतियों पर प्रकाश डाला। <strong>धर्मेंद्र मलिक</strong> के नेतृत्व में भारतीय किसान संघ (अराजनैतिक) के एक किसान समूह ने संगोष्ठी में भाग लिया। किसानों का एक अन्य समूह उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले से आया था।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/09/image_750x_68d7ceee2093c.jpg" alt="" /></p>
<p>किसानों ने इस बात पर जोर दिया कि उभरते जैव ऊर्जा पारिस्थितिकी तंत्र में अधिक उपज देने वाली बीज किस्मों तक पहुंच, मजबूत मार्केट लिंकेज और फसलों का बेहतर मूल्य सुनिश्चित करके किसान हितों की रक्षा करना अत्यंत आवश्यक है। किसानों ने एफओएम और एलएफओएम के उपयोग पर भी चिंता व्यक्त की और अधिक जागरूकता और व्यावहारिक प्रदर्शनों की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/09/image_750x_68d7d11db4f0a.jpg" alt="" /></p>
<p>संगोष्ठी का निष्कर्ष था कि एक मजबूत जैव-ऊर्जा पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण न केवल भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि ग्रामीण विकास और किसान सशक्तीकरण का एक मजबूत वाहक भी है। विशेषज्ञों ने इस बात पर सहमति व्यक्त की कि एक स्थायी &lsquo;कृषि-से-ईंधन&rsquo; इकोनॉमी के लिए स्थिर नीतियों, किसान हितों की सुरक्षा और एक विश्वसनीय फीडस्टॉक आपूर्ति श्रृंखला की आवश्यकता होगी। संगोष्ठी में भारत के जैव-ऊर्जा लक्ष्यों को कृषि आय में वृद्धि और ग्रामीण समृद्धि के दृष्टिकोण के साथ मिलाने की आवश्यकता पर बल दिया गया।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/09/image_750x_68d7ef1091355.jpg" alt="" /></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/09/image_750x500_68d7eeb5b344b.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ IBET 2025: खेत-से-ईंधन तक संगोष्ठी में किसान केंद्रित जैव ऊर्जा इकोसिस्टम का आह्वान ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/09/image_750x500_68d7eeb5b344b.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[अब खेत&amp;#45;खलिहानों से चलेगी सरकार: शिवराज सिंह चौहान]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/now-the-government-will-run-from-the-fields-says-shivraj-singh-chouhan.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 20 Sep 2025 14:57:12 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/now-the-government-will-run-from-the-fields-says-shivraj-singh-chouhan.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><!--StartFragment --></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री </span><strong><span class="cf1">शिवराज</span><span class="cf1"> सिंह </span><span class="cf1">चौहान</span></strong><span class="cf1"> लगातार </span><span class="cf1">फील्ड</span><span class="cf1"> में किसानों के बीच जाकर उनके साथ संवाद कर रहे हैं। इसके लिए &lsquo;विकसित कृषि संकल्प अभियान&rsquo; जैसी अभूतपूर्व पहल की गई। नकली खाद-बीज और </span><span class="cf1">कीटनाशकों</span><span class="cf1"> की बिक्री के खिलाफ उन्होंने कड़ा रुख अपनाया है। साथ ही, खेती की बुनियादी चुनौतियों का हल निकालने के प्रयास किए जा रहे हैं। कृषि और किसानों से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर </span><span class="cf1">रूरल</span><span class="cf1"> </span><span class="cf1">वर्ल्ड</span><span class="cf1"> तथा रूरल वॉयस के </span><span class="cf1">एडिटर</span><span class="cf1">-इन-चीफ </span><strong><span class="cf1">हरवीर</span></strong><span class="cf1"><strong> सिंह</strong> ने केंद्रीय मंत्री </span><span class="cf1">शिवराज</span><span class="cf1"> सिंह </span><span class="cf1">चौहान</span><span class="cf1"> से खास बातचीत की। प्रस्तुत हैं मुख्य अंश:</span></p>
<p class="pf0"><strong><span class="cf0">-</span><span class="cf1">विकसित कृषि संकल्प अभियान&rsquo; के तहत आप देश भर में किसानों के बीच गये। कैसा अनुभव रहा और आगे का क्या रास्ता है?</span></strong></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के </span><span class="cf1">विजन</span><span class="cf1"> और नेतृत्व में पिछले वर्षों में कृषि क्षेत्र में अद्भुत काम हुआ है। खाद्यान्न उत्पादन में आश्चर्यजनक वृद्धि हुई। देश में अन्न भंडार भरे हुए हैं। लेकिन कुछ चुनौतियां भी हैं। दलहन, तिलहन, कपास के उत्पादन को बढ़ाना है। प्राकृतिक खेती की दिशा में हमें मजबूती से कदम बढ़ाना है। उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ लागत घटाना भी उतना ही जरूरी है, ताकि खेती लाभकारी बन सके। इसलिए वैज्ञानिक शोध और अनुसंधान, जो </span><span class="cf1">लैब</span><span class="cf1"> में होता है, उसको </span><span class="cf1">लैंड</span><span class="cf1"> तक पहुँचाने का निर्णय लिया।</span></p>
<p class="pf0"><span class="cf0">'</span><span class="cf1">विकसित कृषि संकल्प अभियान' के माध्यम से हमने वैज्ञानिकों को किसानों के बीच भेजा और </span><span class="cf1">लैब</span><span class="cf1"> को </span><span class="cf1">लैंड</span><span class="cf1"> से जोड़ने का काम किया। यह एक ऐतिहासिक पहल है। वैज्ञानिकों की 2100 से अधिक टीमों ने देश भर में गांव-गांव तक पहुंचकर 1.35 करोड़ से ज्यादा किसानों से सीधा संवाद किया। प्रधानमंत्री के &lsquo;</span><span class="cf1">लैब</span><span class="cf1"> </span><span class="cf1">टू</span><span class="cf1"> </span><span class="cf1">लैंड</span><span class="cf1">&rsquo; से प्रेरणा लेकर 60 हजार से ज्यादा गांवों तक वैज्ञानिकों की टीमें पहुंचीं।</span></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">इस अभियान के जरिए हमें 500 ऐसे विषय मिले हैं जिन पर आज शोध की जरूरत है। अब वैज्ञानिक </span><span class="cf1">लैब</span><span class="cf1"> में, किसानों की जो समस्याएं हैं, उसके आधार पर शोध करेंगे। 300 </span><span class="cf1">नवाचार</span><span class="cf1"> किसानों ने भी किए हैं। उन </span><span class="cf1">नवाचारों</span><span class="cf1"> को भी वैज्ञानिक रूप दिया जाएगा। इस अभियान का उद्देश्य बहुत उपयोगी और व्यापक है। अभियान के जरिए प्राप्त जानकारी से किसानों की जिंदगी बदलेगी, साथ ही देश में अन्न, फल और सब्जियों के भंडार भी भरेंगे।</span></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">अभियान के दौरान कई महत्वपूर्ण बातें हमें पता चलीं, जो अब आगे का मार्ग प्रशस्त कर रही हैं। यह अभियान थमेगा नहीं। हम लगातार किसानों के बीच जाकर खेती को उन्नत और किसानों को समृद्ध बनाने का प्रयत्न करते रहेंगे। महत्वपूर्ण बात यह है कि कृषि अनुसंधान की दिशा अब किसानों की आवश्यकता के आधार पर तय होगी। खेती की वर्तमान जरूरत के अनुसार ही वैज्ञानिकों को अनुसंधान करने के निर्देश दिए गए हैं। साथ ही </span><span class="cf1">फसलवार</span><span class="cf1"> और </span><span class="cf1">क्षेत्रवार</span><span class="cf1"> सम्मेलन आयोजित किए जा रहे हैं।</span></p>
<p class="pf0"><strong><span class="cf0">-</span><span class="cf1">रबी सीजन के लिए विकसित कृषि संकल्प अभियान की क्या तैयारियां हैं?</span></strong></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">रबी की फसल के लिए भी &lsquo;विकसित कृषि संकल्प अभियान&rsquo; के तहत वैज्ञानिकों की टीम किसानों के गांव-गांव जाएगी और उन्हें खेती व शोध की सही जानकारी देगी। किसान भाइयों से संवाद का क्रम लगातार जारी है।</span></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">प्रधानमंत्री ने कहा है कि सरकार फाइल में नहीं, लोगों की </span><span class="cf1">लाइफ</span><span class="cf1"> में दिखनी चाहिए। इसके लिए हम फिर से </span><span class="cf1">ग्राउंड</span><span class="cf1"> पर निकलने वाले हैं। रबी फसल के लिए &lsquo;विकसित कृषि संकल्प अभियान&rsquo; की दो दिवसीय </span><span class="cf1">कॉन्फ्रेंस</span><span class="cf1"> नई दिल्ली में 15 और 16 सितंबर को आयोजित होगी और अभियान की औपचारिक शुरुआत 3 </span><span class="cf1">अक्टूबर</span><span class="cf1">, 2025 को विजय पर्व के साथ होगी। अभियान 3 </span><span class="cf1">अक्टूबर</span><span class="cf1"> से 18 </span><span class="cf1">अक्टूबर</span><span class="cf1"> </span><span class="cf1">धनतेरस</span><span class="cf1"> के दिन तक चलेगा। इस संबंध में हम राज्यों के मुख्यमंत्रियों को भी औपचारिक रूप से पत्र लिखेंगे और यह सुनिश्चित करने के लिए कहेंगे कि इस </span><span class="cf1">कॉन्फ्रेंस</span><span class="cf1"> में राज्यों के कृषि मंत्रियों सहित कृषि विभाग के उच्च वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहें।</span></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">अभियान के दौरान किसानों को नए बीज, नई कृषि पद्धतियां, </span><span class="cf1">मैकेनाइजेशन</span><span class="cf1"> के नए </span><span class="cf1">सिस्टम</span><span class="cf1">, जलवायु के अनुरूप वहां कौन-सी फसल ठीक होगी, मिट्टी में जो पोषक तत्व हैं, उसके हिसाब से कौन-सी फसल, फसल की कौन-सी किस्म वहां पैदा होगी, उसके बारे में </span><span class="cf1">एजुकेट</span><span class="cf1"> करने का प्रयास किया जाएगा।</span></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">हमारे हजारों वैज्ञानिक, </span><span class="cf1">एग्रीकल्चर</span><span class="cf1"> डिपार्टमेंट के कर्मचारी, अधिकारी, हमारे प्रगतिशील किसान और खुद कृषि </span><span class="cf1">मंत्रीगण</span><span class="cf1"> फिर किसानों के बीच जाएंगे, ताकि रबी की फसल में हम लोग बेहतर तकनीक अपना सकें। यह सरकार खेतों से चलेगी, खलिहानों से चलेगी और किसानों के साथ बात करके चलेगी।</span></p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/09/image_750x_68ce734c262aa.jpg" alt="" /></p>
<p class="pf0"><strong><span class="cf0">-</span><span class="cf1">नकली खाद, बीज और </span><span class="cf1">पेस्टीसाइड</span><span class="cf1"> एक बड़ा मुद्दा है। इस पर कैसे अंकुश लगेगा?</span></strong></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">सरकार किसानों को नकली खाद और </span><span class="cf1">कीटनाशकों</span><span class="cf1"> से बचाने के लिए सख्त कदम उठा रही है। जिन कंपनियों के उत्पाद से फसल को नुकसान हुआ है, उनके लाइसेंस रद्द किए जा रहे हैं और </span><span class="cf1">दोषियों</span><span class="cf1"> पर कड़ी कार्रवाई होगी। नकली खाद-बीज व </span><span class="cf1">कीटनाशक</span><span class="cf1"> के नाम पर किसान लुटते रहे और हम देखते रहे, अब ऐसा बिल्कुल नहीं होगा! किसानों को धोखा देने </span><span class="cf1">वालों</span><span class="cf1"> को छोड़ेंगे नहीं, पूरे देश में इसके विरुद्ध अभियान चलाएंगे।</span></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">नकली खाद और उर्वरक बनाने </span><span class="cf1">वालों</span><span class="cf1"> के खिलाफ सरकार जल्द ही नया कानून लाकर सख्त कार्रवाई करेगी। राज्यों के साथ मिलकर हम अपने </span><span class="cf1">सिस्टम</span><span class="cf1"> को इतना मजबूत बनाएंगे कि नकली उत्पाद बेचने </span><span class="cf1">वालों</span><span class="cf1"> के खिलाफ </span><span class="cf1">कठोरतम</span><span class="cf1"> कार्रवाई हो। अगर कहीं कुछ गलत हो रहा हो तो किसानों के हित में कड़ी कार्रवाई करना हमारा धर्म है। राज्य सरकारों से इस संबंध में सख्त कार्रवाई करने के लिए कहा गया है। साथ ही किसानों के बीच भी जागरूकता फैलाने के प्रयास किए जा रहे हैं।</span></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">नकली खाद, बीज और </span><span class="cf1">पेस्टीसाइड</span><span class="cf1"> पर अंकुश लगाने के लिए कड़ा कानून बनाने की प्रक्रिया पर तेजी से काम चल रहा है। जल्द ही ठोस कानून बनाकर ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी और </span><span class="cf1">दोषियों</span><span class="cf1"> को जेल भेजा जाएगा।</span></p>
<p class="pf0"><strong><span class="cf0">-</span><span class="cf1">मध्य प्रदेश में घटिया </span><span class="cf1">हर्बिसाइड</span><span class="cf1"> से </span><span class="cf1">सोयाबीन</span><span class="cf1"> की फसल खराब होने की शिकायतें आई थीं। इसमें क्या कार्रवाई हुई?</span></strong></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">मध्य प्रदेश में </span><span class="cf1">विदिशा</span><span class="cf1">, </span><span class="cf1">देवास</span><span class="cf1"> और धार से </span><span class="cf1">सोयाबीन</span><span class="cf1"> की फसल को एक खरपतवार नाशक से नुकसान होने की शिकायतें प्राप्त हुई थीं। मैंने खुद किसानों के खेतों में जाकर नुकसान का जायजा लिया और अधिकारियों को जांच कर सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए। जांच में 20 में से 6 नमूने घटिया पाए गए। </span><span class="cf1">डिफॉल्टर</span><span class="cf1"> कंपनी </span><span class="cf1">एचपीएम</span><span class="cf1"> </span><span class="cf1">कैमिकल</span><span class="cf1"> एंड </span><span class="cf1">फर्टिलाइजर्स</span><span class="cf1"> </span><span class="cf1">लि</span><span class="cf1">. के विरुद्ध तीन जिलों में एफआईआर दर्ज की गई। </span><span class="cf1">विदिशा</span><span class="cf1"> और </span><span class="cf1">देवास</span><span class="cf1"> जिले के 9 डीलरों के लाइसेंस रद्द किए गए। साथ ही </span><span class="cf1">देवास</span><span class="cf1"> में कंपनी के गोदाम का लाइसेंस भी रद्द किया गया। कृषि मंत्रालय की सिफारिश पर, राजस्थान के </span><span class="cf1">लाइसेंसिंग</span><span class="cf1"> प्राधिकरण ने भी उक्त कंपनी का विनिर्माण लाइसेंस निलंबित कर दिया है।</span></p>
<p class="pf0"><strong><span class="cf0">-</span><span class="cf1">आपने </span><span class="cf1">बायोस्टिमुलेंट</span><span class="cf1"> को लेकर भी कड़ा रुख अख्तियार किया है। इन्हें लेकर क्या कदम उठाए गये हैं?</span></strong></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">बायोस्टिमुलेंट</span><span class="cf1"> के नाम पर, 30 हजार उत्पाद बिक रहे थे। किसान को पता ही नहीं कि इसका फायदा है या नहीं! इनकी गुणवत्ता क्या है। कई बार ये भी कह दिया कि एक-दो बोरी </span><span class="cf1">डीएपी</span><span class="cf1"> चाहिए तो दो बोतल ये भी लो। </span></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">अब यह सुनिश्चित किया जाएगा कि प्रमाणित </span><span class="cf1">बायोस्टिमुलेंट</span><span class="cf1"> ही किसानों तक पहुंचे। यदि कोई खाद के साथ कुछ और दवाई </span><span class="cf1">जबर्दस्ती</span><span class="cf1"> बेचता है, तो यह भी गलत है। जिसके खिलाफ भी सख्त कार्रवाई होगी। राज्यों से भी इस संबंध में कठोर कदम उठाने के लिए कहा गया है। </span></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">किसानों के व्यापक हित में </span><span class="cf1">बायोस्टिमुलेंट</span><span class="cf1"> का पंजीकरण 16 जून 2025 के बाद आगे नहीं बढ़ाने का निर्णय लिया है। 17 जून 2025 से सभी </span><span class="cf1">अनंतिम</span><span class="cf1"> पंजीकरण अमान्य हो गए हैं। अब केवल 146 </span><span class="cf1">जैव</span><span class="cf1">-उत्तेजक उत्पाद ही </span><span class="cf1">अनुसूची</span><span class="cf1">-</span><span class="cf0">VI </span><span class="cf1">एफसीओ</span><span class="cf1">, 1985 में अधिसूचित किए गए हैं और शेष निर्माताओं/</span><span class="cf1">आयातकों</span><span class="cf1"> को पूरी तरह से गुणवत्ता मानकों का पालन करना होगा। अन्यथा, कोई </span><span class="cf1">जैव</span><span class="cf1">-उत्तेजक उत्पाद बिक नहीं सकेंगे। इस संबंध में सभी सूचनाएं एवं अधिसूचनाएं कृषि विभाग की वेबसाइट पर &ldquo;</span><span class="cf0">Biostimulants</span><span class="cf0">&rdquo; </span><span class="cf1">सेक्शन</span><span class="cf1"> में पूरी पारदर्शिता के साथ उपलब्ध कराई गई हैं।</span></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">हम किसी भी हालत में ऐसी चीजें बिकने नहीं देंगे, जिससे किसानों को कोई फायदा नहीं हो। जब तक </span><span class="cf1">आईसीएआर</span><span class="cf1"> के संस्थान या कृषि विश्वविद्यालय तीन जगह परीक्षण करके यह सिद्ध नहीं कर देते कि उस उत्पाद से किसानों को वास्तविक लाभ होगा, तब तक ऐसे किसी भी उत्पाद की बिक्री की अनुमति नहीं दी जाएगी। तीन स्तर पर </span><span class="cf1">आईसीएआर</span><span class="cf1"> से प्रमाणित हुए बिना, कोई भी </span><span class="cf1">बायोस्टिमुलेंट</span><span class="cf1"> ना बिक पाए इसका प्रावधान किया गया है।</span></p>
<p class="pf0"><strong><span class="cf0">-</span><span class="cf1">किसानों के साथ संवाद बढ़ने के साथ-साथ उनकी शिकायतें भी आ रही हैं। उनका समाधान कैसे किया जाएगा?</span></strong></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए किसान </span><span class="cf1">कॉल</span><span class="cf1"> सेंटर </span><span class="cf1">टोल-फ्री</span><span class="cf1"> नंबर 1800-180-1551 जारी किया है। किसान से अनुरोध है कि नकली खाद, बीज या </span><span class="cf1">कीटनाशक</span><span class="cf1"> की तुरंत शिकायत करें। सभी शिकायतों को तत्काल संबंधित राज्यों और विभागों को भेजकर कार्रवाई की जाती है। सरकार किसानों की हर समस्या पर त्वरित और प्रभावी कार्यवाही हेतु पूरी तरह से प्रतिबद्ध है।</span></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">वैज्ञानिक, कृषि विभाग के अधिकारी, किसान एक टीम के रूप में कार्य करें और लगातार खेतों में जाकर किसानों से संपर्क करें।</span></p>
<p class="pf0"><strong><span class="cf0">-</span><span class="cf1">कृषि क्षेत्र के लिए आप मुख्य तौर पर किन लक्ष्यों को लेकर चल रहे हैं?</span></strong></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">हमारा लक्ष्य किसानों की आय बढ़ाना, देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना और हिंदुस्तान को विश्व का </span><span class="cf1">फूड</span><span class="cf1"> </span><span class="cf1">बास्केट</span><span class="cf1"> बनाना है। साथ ही </span><span class="cf1">पोषणयुक्त</span><span class="cf1"> अनाज, फल-सब्जियां, पर्याप्त मात्रा में लोगों के लिए उपलब्ध कराना है। धरती को आने वाली पीढ़ियों के लिए भी उपजाऊ बनाए रखना है।</span></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">प्रधानमंत्री जी ने लाल किले से कहा कि सरकार फाइल में नहीं, </span><span class="cf1">लाइफ</span><span class="cf1"> में दिखनी चाहिए। हम इसी दिशा में आगे बढ़ने के लिए संकल्पित हैं। प्रगतिशील किसानों, विशेषज्ञों एवं अन्य उपयोगी सुझावों को जोड़ते हुए राज्य सरकारों के साथ मिलकर अगले 5 साल की कृषि का </span><span class="cf1">रोडमैप</span><span class="cf1"> तैयार किया जा रहा है। आशा है कि साझा प्रयासों से कृषि और अधिक उन्नति की ओर अग्रसर होगी।</span></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">बीते 10-11 वर्षों में गेहूं का उत्पादन 86.5 मिलियन टन से बढ़कर 117.5 मिलियन टन हो गया है, जो लगभग 44 </span><span class="cf1">प्रतिशत</span><span class="cf1"> की वृद्धि है। यह उपलब्धि उल्लेखनीय है, लेकिन अभी भी हमें प्रति </span><span class="cf1">हेक्टेयर</span><span class="cf1"> उत्पादन को वैश्विक औसत के बराबर लाने की दिशा में काम करना होगा। अब दलहन और तिलहन की उत्पादकता बढ़ाना समय की मांग है ताकि आयात पर निर्भरता घटे।</span></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">छोटे और सीमांत किसानों के लिए एकीकृत खेती ही लाभकारी रास्ता है, जिसमें खेती के साथ पशुपालन, मधुमक्खी पालन, </span><span class="cf1">मत्स्य</span><span class="cf1"> पालन और </span><span class="cf1">बागवानी</span><span class="cf1"> को जोड़ना होगा।</span></p>
<p class="pf0"><strong><span class="cf0">-</span><span class="cf1">किसानों की शिकायतों के समाधान के लिए क्या व्यवस्था बनाई जा रही है?</span></strong></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">किसानों की जो भी समस्याएं विभिन्न माध्यम से प्राप्त हो रही हैं, उनका उचित निराकरण समय पर करने की व्यवस्था होनी चाहिए। व्यवस्था इतनी मजबूत होनी चाहिए कि जब किसान भाई-बहन हमसे संपर्क करें, तब उन्हें भरोसा हो कि उनकी समस्याओं का निराकरण जरूर हो जाएगा।</span></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">पी.एम</span><span class="cf1">. किसान </span><span class="cf1">पोर्टल</span><span class="cf1">, किसान ई-मित्र, किसान </span><span class="cf1">कॉल</span><span class="cf1"> सेंटर सहित विभिन्न </span><span class="cf1">प्लेटफार्म</span><span class="cf1"> के जरिए मिल रही किसानों की समस्याओं और निवारण की क्या व्यवस्था है, उसकी समीक्षा की जा रही है। समय-समय पर किसानों से भी बात करके जानेंगे कि उनकी समस्याओं का समाधान हुआ है या नहीं, ताकि वे पूरी तरह से संतुष्ट हो।</span></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">फसलों पर </span><span class="cf1">वायरस</span><span class="cf1"> </span><span class="cf1">अटैक</span><span class="cf1"> की स्थिति में यदि किसानों द्वारा जानकारी साझा की जाएगी या मात्र एक फोटो के जरिए भी सूचना दी जाएगी, तो मदद के लिए वैज्ञानिकों की टीम तुरंत किसानों के पास गांव पहुंचेगी।</span></p>
<p class="pf0"><strong><span class="cf0">-</span><span class="cf1">उर्वरकों की उपलब्धता और </span><span class="cf1">यूरिया</span><span class="cf1"> की अतिरिक्त मांग को कैसे सुनिश्चित किया जा रहा है?</span></strong></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">यूरिया</span><span class="cf1"> की अतिरिक्त मांग की दो मुख्य वजह हो सकती हैं, पहला </span><span class="cf2">&ndash;</span><span class="cf0"> </span><span class="cf1">अच्छी बारिश के कारण चावल और मक्के सहित बुआई में बढ़ोतरी और दूसरा कारण हो सकता है </span><span class="cf1">यूरिया</span><span class="cf1"> का गैर खेती के कामों में अनुचित इस्तेमाल। यदि खेती की आवश्यकता के लिए </span><span class="cf1">यूरिया</span><span class="cf1"> की मांग है तो निश्चित रूप से </span><span class="cf1">यूरिया</span><span class="cf1"> उपलब्ध करवाया जाएगा, जिसके लिए तत्परता से मंत्रालय में काम चल रहा है। लेकिन यदि </span><span class="cf1">यूरिया</span><span class="cf1"> के गलत इस्तेमाल की आशंका है तो यह एक गंभीर विषय है, जिस संबंध में सख्त कदम उठाए जाएंगे। राज्य के कृषि मंत्रियों से भी आग्रह किया है कि वह यह सुनिश्चित करें कि </span><span class="cf1">यूरिया</span><span class="cf1"> का सही इस्तेमाल ही हो। इस संबंध में निगरानी समितियों का गठन करते हुए तंत्र मजबूत करें।</span></p>
<p class="pf0"><strong><span class="cf0">-</span><span class="cf1">अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक समझौतों में किसानों के हितों की रक्षा को लेकर सरकार की क्या रणनीति है?</span></strong></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">राष्ट्र को सर्वोपरि रखते हुए प्रधानमंत्री ने साफ कर दिया है कि देश के किसानों के हितों से समझौता नहीं किया जाएगा। इस फैसले ने दुनिया के सामने भारत की मजबूत छवि स्थापित की है। किसान भाई-बहनों के साथ </span><span class="cf1">पशुपालकों</span><span class="cf1"> और मछुआरों के हित भी सुरक्षित रखे जाएंगे। साथ ही प्रधानमंत्री ने स्वदेशी का आह्वान भी किया है।</span></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">यूके से हमने समझौता किया है। बिना </span><span class="cf1">ड्यूटी</span><span class="cf1"> के हमारे कृषि उत्पाद अब </span><span class="cf1">इंग्लैंड</span><span class="cf1"> जाएंगे। यह बराबरी का समझौता है। लेकिन कोई यह कहे कि समझौता ऐसा हो जाए जिससे उनके देश का सामान हमारे यहां भर जाए। मक्का आ जाए, </span><span class="cf1">सोयाबीन</span><span class="cf1"> आ जाए, गेहूं आ जाए तो हमारा और उनका कोई मुकाबला नहीं है। ऐसा कोई समझौता हो जाता तो भारत का किसान मर जाता, सस्ती चीजों की बाढ़ लग जाती। कृषि विभाग ने ताकत के साथ अपनी बात रखी कि कोई ऐसा समझौता नहीं हो जो हमारे किसान के हितों को प्रभावित </span><span class="cf1">करे</span><span class="cf1">। हमारे किसान, हमारे </span><span class="cf1">पशुपालक</span><span class="cf1">, भैंस, गाय पालने वाले, हमारे मछुआरे उनके हित सुरक्षित रखे जाएंगे।</span></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है। हमारा देश 144 करोड़ की आबादी वाला बड़ा बाज़ार है। स्वदेशी ही भारत की असली शक्ति है। प्रधानमंत्री ने स्वदेशी अपनाओ का आह्वान किया है। अगर हम ठान लें कि अपने ही प्रदेश-देश में बनी चीज खरीदेंगे तो हमारे लाखों लोगों को रोजगार मिलेगा। उनकी आमदनी बढ़ेगी तो हमारी अर्थव्यवस्था मजबूत होगी।</span></p>
<p class="pf0"><strong><span class="cf0">-</span><span class="cf1">किसानों को उनकी उपज का बेहतर दाम दिलाने के लिए सरकार क्या उपाय कर रही है?</span></strong></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">सरकार द्वारा </span><span class="cf1">एमएसपी</span><span class="cf1"> बढ़ाने का काम किया गया है। किसानों की लागत में 50 </span><span class="cf1">प्रतिशत</span><span class="cf1"> लाभ जोड़कर ही </span><span class="cf1">एमएसपी</span><span class="cf1"> तय करने का निर्णय लिया गया। अब-तक गेहूं और धान की खरीद के जरिये किसानों के खातों में 43 लाख 87 हजार करोड़ रुपये डाले गए हैं। </span><span class="cf1">पीएम</span><span class="cf1">-आशा और बाजार हस्तक्षेप योजना (</span><span class="cf0">MIP) </span><span class="cf1">के तहत भी किसानों की उपज की खरीद हो रही और बेहतर दाम दिलाने के प्रयास किए जा रहे हैं।</span></p>
<p class="pf0"><strong><span class="cf0">-</span><span class="cf1">किसानों को मौसम की मार से बचाने के लिए फसल बीमा योजना शुरू की गई थी। इसे बेहतर और प्रभावी बनाने के लिए क्या प्रयास किए जा रहे हैं?</span></strong></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">पहले की सरकार द्वारा फसल बीमा की राशि पूरी तहसील या </span><span class="cf1">ब्लॉक</span><span class="cf1"> की फसल बर्बाद होने के बाद ही दी जाती थी लेकिन प्रधानमंत्री ने पुरानी सारी योजनाओं को निरस्त करते हुए ऐसी बीमा योजना बनाई जिसके अंतर्गत एक गांव क्या एक किसान की भी अगर फसल बर्बाद हुई तो बीमा की राशि दी जाएगी।</span></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">केंद्र सरकार ने किसानों के हित में एक नया, आसान </span><span class="cf1">क्लेम</span><span class="cf1"> </span><span class="cf1">सेटलमेंट</span><span class="cf1"> </span><span class="cf1">सिस्टम</span><span class="cf1"> लागू किया है। इसके तहत राज्य के </span><span class="cf1">प्रीमियम</span><span class="cf1"> अंशदान की प्रतीक्षा किए बिना, केवल केंद्रीय अंशदान के आधार पर दावों का आनुपातिक भुगतान किया जाएगा। यदि बीमा कंपनियां निर्धारित समय में </span><span class="cf1">क्लेम</span><span class="cf1"> का भुगतान नहीं करतीं, तो उन्हें 12% ब्याज सहित राशि जमा करनी होगी। इसी तरह, यदि राज्य </span><span class="cf1">सरकारें</span><span class="cf1"> अपना अंश समय पर जमा नहीं करतीं, तो उन्हें भी 12% ब्याज देना होगा, जो सीधे किसानों के खातों में जाएगा।</span></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">सरकार इस योजना को पूरी पारदर्शिता के साथ संचालित करने में जुटी है। </span><span class="cf1">डिजिटल</span><span class="cf1"> भुगतान के माध्यम से किसानों तक बीमा की राशि पहुंचे, यह सुनिश्चित हो रहा है। गत 11 अगस्त को 30 लाख से अधिक किसानों को 3,200 करोड़ रुपए से अधिक की फसल बीमा दावा राशि </span><span class="cf1">डिजिटल</span><span class="cf1"> रूप से सीधे उनके बैंक खातों में भेजी गई।</span></p>
<p class="pf0"><span class="cf1">प्राकृतिक आपदा में फसल नष्ट होने से न केवल फसल बर्बाद होती है, बल्कि किसान का जीवन भी प्रभावित होता है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना ऐसी परिस्थितियों में किसानों के लिए वरदान साबित हुई है। मात्र एक योजना ही नहीं बल्कि विभिन्न योजनाओं के माध्यम से सरकार किसानों की जिंदगी सुखद बनाने का कार्य कर रही है। पौने चार लाख करोड़ रुपये की धनराशि प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के तहत सीधे किसानों के खातों में वितरित की जा चुकी है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की 2016 में शुरुआत से अब-तक 2 लाख 12 हजार करोड़ रुपये किसानों को दिए जा चुके हैं। यह सरकार की किसान-हितैषी नीति का प्रतीक है। </span></p>
<p><!--EndFragment --></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ अब खेत-खलिहानों से चलेगी सरकार: शिवराज सिंह चौहान ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[जलवायु संकट का बोझ किसानों पर मत डालिएः प्रो. ग्लेन डेनिंग]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/dont-make-farmer-shoulder-climate-burden-prof-glenn-denning.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 22 Jan 2025 08:16:36 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/dont-make-farmer-shoulder-climate-burden-prof-glenn-denning.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>वैश्विक खाद्य सुरक्षा और सतत विकास पर अपने कार्यों के लिए प्रसिद्ध अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी के <strong>प्रो. ग्लेन डेनिंग</strong> का मानना है कि कृषि में कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए सिर्फ किसानों से यह नहीं कह सकते कि ऐसा मत करो। इसके लिए उन्हें उचित मुआवजा भी मिलना चाहिए। किसान मुख्य रूप से अपनी आय से प्रेरित होकर कार्य करते हैं। यही उनकी प्रेरणा शक्ति है। &lsquo;यूनिवर्सल फूड सिक्योरिटी: हाउ टू एंड हंगर वाइल प्रोटेक्टिंग द प्लैनेट&rsquo; पुस्तक के लेखक प्रो. डेनिंग का कहना है कि दुनिया का आधा खाद्य उत्पादन उर्वरकों पर निर्भर है, इसलिए इनका इस्तेमाल अचानक बंद नहीं किया जा सकता। <strong>रूरल वॉयस</strong> के एडिटर-इन-चीफ <strong>हरवीर सिंह</strong> के साथ बातचीत में उन्होंने कहा कि जैविक खेती, प्राकृतिक खेती और पुनर्योजी (रीजेनरेटिव) खेती की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है। इन्हें वे संगठन परिभाषित करते हैं जो अपने विचारों को बढ़ावा देकर इससे लाभ प्राप्त करना चाहते हैं। बातचीत के मुख्य अंशः-</p>
<p><strong>डॉ. ग्लेन, आप वैश्विक खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और कृषि में सतत विकास की चुनौतियों को कैसे देखते हैं? वर्तमान जलवायु परिस्थितियों, छोटी होती जोत और भू-राजनीतिक समस्याओं को ध्यान में रखते हुए, आप इन समस्याओं को प्रभावी ढंग से हल करने के लिए कौन सी रणनीति को उपयुक्त मानते हैं?</strong><br />सबसे पहले इसे एक व्यापक दृष्टिकोण से देखते हैं। कृषि का उद्देश्य क्या है? कृषि का उद्देश्य 10,000 वर्षों से मुख्य रूप से खाद्य सुरक्षा रहा है। हम खाद्य सुरक्षा के लिए भोजन का उत्पादन कर रहे हैं। समय के साथ किसान कॉमर्शियल होते गए। उन्होंने बाजारों में भाग लेना शुरू किया। वे सरप्लस उत्पादन करने लगे जिससे शहरों का विकास संभव हुआ। इसने हमें मैन्युफैक्चरिंग और अन्य चीजों में विशेषज्ञता हासिल करने में सक्षम बनाया। इसलिए आप और मैं अब किसान नहीं हैं।<br />दुनिया की जनसंख्या अब 8 अरब से अधिक हो गई है। भारत की जनसंख्या 1.45 अरब है। तो चुनौती यह है कि हम इतने लोगों को बिना पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए कैसे पोषण प्रदान करें। क्योंकि अगर हम उन्हें अभी पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हुए पोषण देंगे तो हम भविष्य में पोषण प्रदान नहीं कर पाएंगे।&nbsp;<br />दूसरी तरफ जनसंख्या बढ़ रही है। दुनिया की आबादी 2050 तक लगभग 10 अरब हो जाएगी। हमारी खान-पान की शैली भी बदल रही है। हम अब अधिक पशुधन उत्पाद, बागवानी उत्पाद और समुद्री खाद्य पदार्थ उपभोग कर रहे हैं। इन सबका बोझ अंततः किसानों पर आता है।&nbsp;<br />करीब 30 वर्षों में हमारी कृषि प्रणाली जलवायु से प्रभावित हुई है। जलवायु गर्म होगी तो प्रतिकूल मौसम की घटनाएं होंगी। तटीय क्षेत्र अधिक खारा हो सकता है, सूखे और बाढ़ की आशंका बढ़ सकती है। हम अब भी हर किसी के लिए टिकाऊ और स्वस्थ आहार प्राप्त नहीं कर रहे हैं, भविष्य की तो बात ही छोड़ दीजिए। इसलिए निश्चित रूप से हमारे सामने संकट है। वैश्विक स्तर पर मैंने अनुमान लगाया है कि दुनिया की आधी आबादी को स्वस्थ आहार नहीं मिलता है।<br />भारत में हमने हरित क्रांति की सफलता को देखा है। इसने 1960 के दशक में आयात पर निर्भर भारत को अब दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक बना दिया। इस अवधि में भारत की जनसंख्या 50 करोड़ से बढ़कर 145 करोड़ हो गई। इतनी आबादी के बाद भी सबसे बड़ा चावल निर्यातक बनना एक असाधारण उपलब्धि है। पिछले साल जब सरकार ने गैर-बासमती चावल निर्यात पर प्रतिबंध लगाया, तो इसे अफ्रीका, फिलीपींस और इंडोनेशिया समेत दुनिया भर में महसूस किया गया। इस तरह भारत विशेष रूप से अनाज के संदर्भ में न केवल राष्ट्रीय स्तर पर, बल्कि क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण स्थिति में आ गया है।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/01/image_750x_67824a69ae36f.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>-एक खाद्य आयातक देश से दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक बनने का श्रेय किसे देंगे, हरित क्रांति को?</strong><br />बिल्कुल। लेकिन यह स्पष्ट होना चाहिए कि यह उन्नत तकनीकों का एक संयोजन है, जिसमें मुख्य रूप से तीन चीजें शामिल हैं। एक तो उन्नत किस्में और नई प्रजातियां, दूसरा आईसीएआर (ICAR) और आईएआरआई (IARI) जैसी संस्थाओं का योगदान और तीसरा, उर्वरकों का उपयोग और सिंचित क्षेत्रों का विस्तार। इन तीनों को मिलाकर तकनीकी क्षमता तैयार होती है। लेकिन जो चीज हरित क्रांति के लिए बहुत महत्वपूर्ण थी, वह यह कि सरकार ने भी इनपुट, क्रेडिट, बाजार और समर्थन मूल्य के माध्यम से इसमें भूमिका निभाई। हालांकि इस संदर्भ में भारत अनोखा नहीं था। यही स्थिति इंडोनेशिया, फिलीपींस, वियतनाम और यहां तक कि चीन में भी थी।&nbsp;<br />कभी-कभी इसे इसलिए आलोचना का सामना करना पड़ता है कि इसे सरकार का बहुत अधिक समर्थन था। लेकिन ऐसा क्यों था? बुनियादी खाद्य पदार्थों की सुरक्षा समाज की स्थिरता निर्धारित करती है। अगर खाद्य कीमतें अचानक दोगुनी हो जाएं तो अराजकता फैल सकती है, और कोई भी समाज ऐसा नहीं चाहता। यही कारण है कि विशेष रूप से एशियाई देशों में खाद्य सुरक्षा पर नेतृत्व का बहुत मजबूत फोकस रहा है। दिसंबर 2022 में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कृषि को खाद्य सुरक्षा के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा घोषित किया। यही कारण है कि यह उनकी प्राथमिकता सूची में ऊंचे स्थान पर है।<br />हरित क्रांति के सबसे बड़े प्रभावों में एक था खाद्य कीमतों की स्थिरता। मैन्युफैक्चरिंग और सेवा क्षेत्रों से जुड़े शहरी श्रमिकों के लिए अपेक्षाकृत कम और स्थिर खाद्य कीमतें बनाए रखने के कारण एशिया अन्य क्षेत्रों की तुलना में प्रतिस्पर्धी बना हुआ है। हरित क्रांति के जनक प्रो. एमएस स्वामीनाथन मेरे मार्गदर्शक भी रहे हैं। 1982 से 1988 तक मुझे अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (IRRI) में उनके साथ काम करने का मौका मिला। भारत में जन्मे कई विचारों को हम दुनिया के अन्य हिस्सों में भी ले गए। मुझे लगता है कि जब नेतृत्व, संस्थान, तकनीक और नीतियां एक साथ आती हैं तो बड़े बदलाव हो सकते हैं।</p>
<p><strong>-बड़ी मात्रा में अनाज उत्पादन और मुफ्त अनाज वितरण के बावजूद भारत हंगर इंडेक्स में निचले स्थान पर क्यों है? सबके लिए पोषक और स्वस्थ भोजन सुनिश्चित करने में हम क्यों संघर्ष कर रहे हैं?</strong><br />अनाज मुख्य रूप से हमें कैलोरी प्रदान करते हैं। भारत ने इसमें बड़ी सफलता हासिल की है। लेकिन हंगर इंडेक्स में मुख्य फोकस पोषण पर है। कैलोरी हमारे पोषण का सिर्फ एक हिस्सा है। संतुलित आहार में प्रोटीन, सूक्ष्म पोषक तत्व और खनिजों की आवश्यकता होती है। केवल कैलोरी पर जीवित रहना पर्याप्त नहीं है। अन्य तत्वों की कमी से स्टंटिंग की समस्या हो सकती है।<br />कुछ मुद्दे हैं। पहली बात जिसे दक्षिण एशिया या भारत का रहस्य भी कहा जाता है, वह यह है कि समग्र आर्थिक विकास भारत में बहुत अच्छा चल रहा है, देश अनाज का निर्यातक बन गया है, फिर भी स्टंटिंग का स्तर इतना अधिक क्यों है? पांच साल से कम उम्र के बच्चे अपनी आयु के हिसाब से छोटे कद के रह जाते हैं। स्टंटिंग से जुड़े कुपोषण से शरीर में प्रतिरक्षा कम होती है। ऐसे बच्चे शिक्षा समेत किसी भी मामले में कभी अपनी पूरी क्षमता हासिल नहीं कर पाते। इनकी कमी से बच्चों की मौत नहीं होगी, लेकिन उनकी क्षमता कम हो जाएगी। भारत में स्टंटिंग का वर्तमान स्तर लगभग 36% है, जो दुनिया में सबसे उच्च स्तरों में से एक है। यह हंगर इंडेक्स का एक प्रमुख घटक है।</p>
<p><strong>-क्या आपको लगता है कि भारत दो अलग देशों की तरह बढ़ रहा है? एक ऐसा भारत जो गांवों में बसता है, कृषि पर निर्भर है, और जहां आय 10,000 रुपये प्रति माह से भी कम है। दूसरा, एक उभरता हुआ मध्य वर्ग और संपन्न पेशेवर, जो वैश्विक लक्जरी ब्रांडों को आकर्षित कर रहा है। एक भारत फल-फूल रहा है तो दूसरा पीछे छूट रहा है। यहां आप कौन सी नीतिगत विफलता देखते हैं? क्या हमारे नीति निर्माता अब भी इसे नकार रहे हैं?</strong><br />प्रो. स्वामीनाथन मुझसे कहते थे, विशेषज्ञ आपको भारत के बारे में जो भी बताते हैं, उसका विपरीत भी सच है। यही बात आप कह रहे हैं। मैं कहूंगा कि यहां दो नहीं, बल्कि कई भारत हैं। यहां अत्यधिक गरीबी भी है और अत्यधिक धन भी, लेकिन इनके बीच में भी बहुत कुछ मौजूद है।<br />यहां मैं फिर स्टंटिंग की बात कहूंगा, जिसमें भारत ने वास्तव में कुछ प्रगति की है। पिछले 20 वर्षों में यह 48% से घटकर लगभग 36% पर आ गया है। लेकिन 36% को भी राष्ट्रीय त्रासदी के रूप में देखा जाना चाहिए, क्योंकि एक-तिहाई बच्चे जीवन की शुरुआत में ही पिछड़ रहे हैं। इस मुद्दे को राष्ट्रीय नीति में उच्चतम स्तर पर उठाया जाना चाहिए।<br />कुपोषण कम करना वास्तव में रॉकेट साइंस जैसा है। इसके लिए विशेषज्ञता और प्रयास दोनों की आवश्यकता होती है। हमें पता है कि कुपोषण को कैसे कम किया जा सकता है। दुनिया के कई देशों ने इसे कम करने में सफलता प्राप्त की है। ब्राजील इसका शानदार उदाहरण है। यहां तक कि भारत के पड़ोसी देश बांग्लादेश और नेपाल इसमें काफी सफल रहे हैं। इंडोनेशिया, वियतनाम और अफ्रीका के कई देशों ने कुपोषण स्तर को आधा कर दिया है। इसके लिए कई कारकों का संयोजन जरूरी है। इसका कोई एकमात्र समाधान नहीं है।<br />इसके लिए आहार में विविधता, स्तनपान और पोषण में अनुपूरण (सप्लीमेंटेशन) भी महत्वपूर्ण हैं। परिवारों के बीच असमानता के साथ यह भी अहम है कि अनेक घरों में महिलाएं और बच्चे पोषक भोजन से वंचित रहते हैं। इन सबके पीछे सबसे बड़ा कारण गरीबी है। यदि लोग गरीब हैं, तो वे केवल गेहूं-चावल जैसे बुनियादी अनाज ही खरीद सकते हैं। दालें हमेशा अनाज से महंगी होती हैं। दूध और अंडे जैसे पशु उत्पाद महंगे होते हैं। फल तो सभी महंगे होते ही हैं।<br />यदि आपके पास पैसा नहीं है, तो यह मायने नहीं रखता कि मैं आपको कितना समझाऊं कि यह आपके और बच्चों के आहार के लिए बेहतर है। आपकी अधिकांश आय चावल या गेहूं पर ही खर्च हो जाती है। इसलिए मुझे लगता है कि गरीबी दूर करने के लिए गंभीर प्रयास करना बहुत जरूरी है। सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम इस अंतर को कम करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। कुछ अच्छे कार्यक्रम चल रहे हैं, जैसे लक्षित खाद्य वितरण। आप कह सकते हैं कि यह अक्षम है, पर्याप्त रूप से लक्षित नहीं है, लेकिन मैं आपको बताना चाहूंगा कि दुनिया के अनेक हिस्सों में यह भी नहीं है। इसलिए सवाल है कि हम इन कार्यक्रमों को बेहतर कैसे बना सकते हैं, मध्याह्न भोजन कार्यक्रम को अधिक प्रभावी और पोषक कैसे बना सकते हैं, स्कूल प्रणाली में पोषण को कैसे शामिल कर सकते हैं।<br />यह काफी जटिल है। इसलिए हमें कई मोर्चों पर काम करना होगा। यह केवल ICAR और कृषि मंत्रालय का काम नहीं है। सभी संबंधित मंत्रालयों को एक साथ काम करना होगा। इसका मतलब है कि उच्चतम स्तर पर, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री को यह कहना होगा कि यह हमारे भविष्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2025/01/image_750x_67824a69675be.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>-अब वैज्ञानिक हरित क्रांति 2.0 या 3.0 की आवश्यकता पर चर्चा कर रहे हैं। आज की कृषि चुनौतियों के बारे में दस साल पहले किसी ने अनुमान भी नहीं लगाया था। अचानक सूखा, बाढ़, बढ़ता तापमान और इस साल की गेहूं की खराब फसल इन समस्याओं को उजागर करती है। ये सस्टेनेबिलिटी की प्रमुख चुनौतियां हैं। आगे कैसे बढ़ा जाए?</strong><br />मेरा मानना है कि हम अनुसंधान और विकास में कम निवेश कर रहे हैं। आपको लग सकता है कि भारत में बहुत सारे पीएचडी हैं। लेकिन हमें अनुसंधान और विकास, खासकर लचीलापन (रेजिलियंस) निर्माण पर अधिक निवेश करने की जरूरत है। हम सूखा और बाढ़ दोनों झेलते हैं। हमें बेहतर तकनीक विकसित करनी होगी जो इन परिस्थितियों का पूर्वानुमान लगा सके। हमें विविधता लाने की जरूरत है। हमें दलहन और कुछ अन्य अनाजों की उत्पादकता में सुधार के लिए अधिक धन खर्च करने की आवश्यकता है। वे कभी चावल और गेहूं की जगह नहीं ले सकते, लेकिन वे देश के कुछ क्षेत्रों में अब भी महत्वपूर्ण हैं। हमने इन फसलों में इतना निवेश करने की कभी नहीं सोची।<br />मेरा मानना है कि पहली हरित क्रांति मुख्य रूप से सार्वजनिक क्षेत्र द्वारा संचालित थी। अब हमें निजी क्षेत्र के साथ साझेदारी के साथ अधिक अवसरों की तलाश करनी होगी, उन्हें इस राष्ट्रीय मिशन का हिस्सा बनने के लिए प्रोत्साहित करना होगा। मुझे लगता है कि परिवहन, विद्युतीकरण जैसा बुनियादी ढांचा महत्वपूर्ण होने वाला है। हमारे पास जानकारी है। हम निश्चित रूप से सुधार कर सकते हैं।<br />जैसा डॉ. स्वामीनाथन कहते थे, आपको ज्ञान (know-how) और क्रियान्वयन (do-how) का संयोजन चाहिए। मुझे लगता है कि क्रियान्वयन थोड़ा पीछे रह गया है। मैंने अपनी किताब लिखते समय इस पर बहुत समय बिताया। मैंने सिर्फ यह नहीं कहा कि यह करो या वह करो, बल्कि यह कि आप वास्तव में इसे कैसे करते हैं? आप कैसे इस तरह के कार्यक्रम तैयार करें जो किसानों को अलग तरीके से कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करें और उत्पादकों और उपभोक्ताओं के बीच मजबूत संबंध बनाएं?<br />हम एक और समस्या का सामना कर रहे हैं। इसे पोषण की दोहरी समस्या कहा जाता है। मैंने ज्यादातर समय कुपोषण के बारे में बात की है। कुपोषण का एक और रूप है पोषक तत्वों का अत्यधिक सेवन। यह मोटापा और अधिक वजन की महामारी पैदा कर रहा है। यह हमें मधुमेह, हृदय रोग, कैंसर और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं की ओर ले जा रहा है। इसलिए यह भी चर्चा का हिस्सा होना चाहिए। आपको केवल पोषक तत्वों की कमी दूर करने की आवश्यकता नहीं, बल्कि शुगर, नमक, वसा की अधिकता को भी कम करना होगा।&nbsp;<br />सस्टेनेबिलिटी एक और कारक है जिसे प्राथमिकता देने की आवश्यकता है। भारत के कई हिस्सों में पानी का अत्यधिक दोहन हो रहा है और जल स्तर नीचे जा रहा है। इन बातों को उजागर करने की जरूरत है।<br />आप केवल किसान से यह नहीं कह सकते कि इसे मत करो। आपको ऐसा प्रोत्साहन तंत्र बनाना होगा जिससे वे ऐसा न करें। लोगों और किसानों को अधिक टिकाऊ प्रणालियों की ओर बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना होगा।<br />भारत, ऑस्ट्रेलिया या कोई अन्य देश, मैं जहां भी गया हूं एक बात सही है कि किसान मुख्य रूप से अपनी आय से प्रेरित होकर कार्य करते हैं। कोई भी किसान यह सोचकर व्यवहार नहीं बदलेगा कि आने वाली पीढ़ियों का क्या होगा या जलवायु परिवर्तन का क्या प्रभाव पड़ेगा। इसलिए सरकारों को कदम उठाने की जरूरत है, इन पर्यावरणीय मुद्दों को देखना चाहिए और क्षरण को कम करना चाहिए।</p>
<p><strong>-हाल में भारत सरकार ने प्राकृतिक खेती पर काफी जोर दिया है। दो साल का नेचुरल फार्मिंग मिशन भी शुरू किया गया। आप प्राकृतिक खेती की इस पहल को कैसे देखते हैं? क्या आपको लगता है कि यह व्यावहारिक और वास्तव में संभव है?</strong><br />यदि कोई मुझसे प्राकृतिक खेती करने की बात कहेगा तो मैं पूछूंगा कि प्राकृतिक खेती से आपका मतलब क्या है। अगर उसका जवाब पुनर्योजी (रिजेनरेटिव) खेती है तो मैं फिर पूछूंगा कि पुनर्योजी खेती से आपका क्या मतलब है। उसका जवाब मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार, फसलों के पोषण में सुधार और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करना हो सकता है। मुझे लगता है कि यह अच्छी कृषि है। हमें वह सब करना चाहिए। लेकिन अगर उसका जवाब है कि कोई बाहरी इनपुट का इस्तेमाल नहीं करना या बहुत कम इस्तेमाल करना, तो मैं कहूंगा कि इससे आपका क्या मतलब है? उसका जवाब हो सकता है- कोई आनुवंशिक संशोधन नहीं, कोई जीएमओ नहीं, कोई जीनोम संपादित फसलें नहीं क्योंकि यह प्राकृतिक नहीं है।<br />उर्वरकों को अनेक संगठन प्राकृतिक नहीं मानते, लेकिन दुनिया का आधा खाद्य उत्पादन उर्वरकों की मदद से ही होता है। अगर हम प्राकृतिक खेती की ओर बड़े पैमाने पर चले गए तो परिणाम शायद बुरे होंगे। हमने देखा कि श्रीलंका में क्या हुआ। उन्होंने उर्वरकों का आयात बिल्कुल बंद कर दिया था। तत्काल उत्पादन इतना कम हो गया कि सड़कों पर दंगे हो गए। लोग भूखे मर रहे थे। जल्दी ही सरकार को अपना फैसला बदलना पड़ा।&nbsp;<br />दरअसल यह तरीका काम नहीं करेगा। यह वास्तव में बकवास है। आप इसे स्थानीय स्तर पर कर सकते हैं और कह सकते हैं, &ldquo;मेरे पास एक ऑर्गेनिक फार्म है, और मैं इसके प्रोडक्ट ताज पैलेस रेस्तरां को बेच रहा हूं।&rdquo; आप इससे पैसे भी कमा लेंगे क्योंकि अमीर लोग इसे पसंद करते हैं। इस पर उन्हें आय का ज्यादा हिस्सा खर्च नहीं करना पड़ता है। वे इसे खुशी-खुशी करेंगे। लेकिन यह तरीका काम नहीं करेगा। इसलिए हमें उर्वरकों की जरूरत है।</p>
<p><strong>-हम जैविक खेती, प्राकृतिक खेती और पुनर्योजी खेती पर चर्चा कर रहे हैं। क्या आप इन तीनों के बीच अंतर को स्पष्ट कर सकते हैं?</strong><br />सबसे पहले, इनमें से किसी की भी स्पष्ट परिभाषा नहीं है। इन्हें वे संगठन परिभाषित करते हैं जो खास तरह के विचारों को बढ़ावा दे रहे हैं। जब आप इस तरह विचारों को बढ़ावा देते हैं, तो इसके पीछे लाभ होता है। मैं किसी राष्ट्रीय संगठन का नाम नहीं लूंगा, लेकिन ग्रीनपीस का नाम लूंगा। ग्रीनपीस ने लंबे समय से किसी भी प्रकार के आनुवंशिक संशोधन को खारिज किया है। व्हेल और बाघों को बचाने जैसे काम ग्रीनपीस अद्भुत करता है।&nbsp;<br />लेकिन जब वे जीएमओ के खिलाफ बोलते हैं तो वहां समस्या है। एक जीएमओ है गोल्डन राइस। यह ऐसा चावल है जिसमें विटामिन ए उच्च मात्रा में होता है। इसे पर्याप्त मात्रा में खाया जाए तो विटामिन ए की कमी दूर हो सकती है, बच्चों में अंधापन और मौत की आशंका कम कर सकता है। इसे खारिज करने का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। कुछ लोग कह सकते हैं कि इससे बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लाभ होगा। लेकिन नहीं, यह पूरी तरह से सार्वजनिक क्षेत्र में है। लेकिन अधिकांश देशों को यह मानने पर मजबूर किया गया है कि यह जोखिम भरा है। जो लोग ये फैसले ले रहे हैं उनके बच्चे विटामिन ए की कमी के कारण अंधे नहीं हो रहे हैं।&nbsp;<br />इसलिए मेरी राय है कि हमें नीति निर्माताओं को ये बातें समझाने के लिए कड़ी मेहनत करनी चाहिए ताकि उन्हें इसके संभावित लाभों की जानकारी मिल सके। साथ ही यह भी समझा जा सके कि निष्क्रियता के जोखिम और नुकसान क्या हैं।</p>
<p><strong>-डॉ. गुरदेव खुश इससे जुड़े हुए थे...।</strong><br />हां, वे सुधारों के अगुवा रहे हैं। भारत के पास दुनिया के सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक हैं। जैसे कि आईआरआरआई (IRRI) में पौधों के प्रजनन विभाग को भारतीय वैज्ञानिकों ने चलाया है। यह एक त्रासदी है कि वे अपने देश में वापस आकर आनुवंशिक संशोधन जैसा काम नहीं कर सकते हैं। हमें प्रौद्योगिकी का लोकतंत्रीकरण करना होगा।<br />अमेरिकी और ऑस्ट्रेलियाई किसानों की मशीनरी, डिजिटल तकनीक, मौसम के पूर्वानुमान, अपने क्षेत्रों में पोषक तत्वों और पानी आदि से संबंधित जानकारी तक अच्छी पहुंच है। उन्हें फसलों की ऐसी किस्में मिलती हैं जो अच्छी तरह से अनुकूलित हैं। लेकिन यह सब केवल उच्च आय वाले देशों में अपेक्षाकृत बड़े किसानों के लिए उपलब्ध क्यों है? हमें इसका लोकतंत्रीकरण करना होगा। यह एक नैतिक मुद्दा भी है। हमें यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि छोटे किसानों भी इनका इस्तेमाल कर सकें। छोटे किसानों का भविष्य ऐसी टेक्नोलॉजी से ही बेहतर होगा।</p>
<p><strong>-जलवायु परिवर्तन सस्टेनेबल कृषि और खाद्य सुरक्षा किस प्रकार का खतरा उत्पन्न करता है?</strong><br />जलवायु परिवर्तन से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के कारण तापमान बढ़ता है। यह सूखा, बाढ़, समुद्र का जलस्तर बढ़ने और ग्लेशियरों के पिघलने का कारण है। वैज्ञानिकों ने दिखाया है कि इनसे कृषि उत्पादकता और उत्पादन प्रभावित होगी।&nbsp;<br />हमारी कृषि प्रणाली बहुत संवेदनशील है। भारत में वर्षा पर निर्भर किसानों सिंचाई संपन्न किसानों की तुलना में अधिक संघर्ष करना पड़ेगा। मुझे लगता है कि सिंचाई वाले किसानों के पास अधिक विकल्प होते हैं, और वे अधिक समृद्ध भी होते हैं। इसलिए वे अपनी उत्पादन विधि को बदलने का खर्च उठा सकते हैं। वर्षा पर आश्रित किसान, विशेष रूप से पूर्वी भारत में, इस प्रकार के झटकों से अधिक प्रभावित होंगे।<br />इसलिए एक आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता है। इसका एक और पहलू यह है कि कृषि भी जलवायु परिवर्तन में योगदान करती है। संपूर्ण खाद्य प्रणाली वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का एक-तिहाई योगदान करती है। इसलिए कृषि क्षेत्र को समाधान भी तलाशना होगा। लेकिन मैं फिर वही कहूंगा, हम किसानों से यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वे बिना किसी क्षतिपूर्ति के विश्व की समस्या को हल करने में मदद करें। हमें किसानों की मदद करने की जरूरत है। यदि किसान कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए खेती का तरीका बदलते हैं, तो उन्हें उन सभी से क्षतिपूर्ति भी मिलनी चाहिए, जो इससे लाभान्वित होने वाले हैं।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ जलवायु संकट का बोझ किसानों पर मत डालिएः प्रो. ग्लेन डेनिंग ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[आईएंडबी सीड्स के अधिग्रहण से क्रिस्टल क्रॉप प्रोटेक्शन सब्जियों के बीज बिजनेस में होगी मजबूतः  सत्येंद्र सिंह]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/crsytal-crop-forays-into-vegetable-business-with-the-acquisition-of-i-and-b-seeds-says-ceo-satyendra-singh.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 20 Jan 2025 11:27:29 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/crsytal-crop-forays-into-vegetable-business-with-the-acquisition-of-i-and-b-seeds-says-ceo-satyendra-singh.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>एग्रो केमिकल बिजनेस की प्रमुख कंपनी&nbsp; क्रिस्टल क्रॉप प्रोटेक्शन लिमिटेड ने हाल ही बीज कंपनी आईएंडबी सीड्स (I&amp;B Seeds) का अधिग्रहण किया है। इस अधिग्रहण से क्रिस्टल सब्जियों के बीज के बिजनेस में भी आ गई है। क्रिस्टल क्रॉप प्रोटेक्शन लिमिटेड के सीईओ-सीड्स <strong>सत्येंद्र सिंह</strong> का कहना है कि अभी कंपनी के बीज कारोबार में सब्जियों के अलावा नौ फील्ड क्रॉप शामिल हैं। उनका दावा है कि क्रिस्टल क्रॉप चारा (फॉडर) समेत कई बीज सेगमेंट में मार्केट लीडर हैं। क्रिस्टल द्वारा पिछले दिनों अधिग्रहित की गई कंपनी आईएंडबी सीड्स मेरीगोल्ड बीज के मार्केट में लीडर है। पिछले साल कंपनी का बीज बिजनेस 351 करोड़ रुपए का था, इस साल हमने 430 करोड़ रुपए के सीड बिजनेस का लक्ष्य रखा है। सत्येंद्र सिंह से कंपनी के बीज बिजनेस और भावी योजनाओं के बारे में <strong>रू</strong><strong>रल</strong><em><strong> वॉयस</strong></em> के एडिटर इन चीफ <strong>हरवीर सिंह</strong> ने लंबी बीतचीत की। बातचीत के मुख्य अंश-&nbsp;</p>
<p><strong>-&nbsp; क्रिस्टल क्रॉप प्रोटेक्शन लिमिटेड को एक एग्रोकेमिकल कंपनी के रूप में जाना जाता है। कंपनी का बीज बिजनेस कितना बड़ा है और यह किस तरह से बढ़ रहा है।&nbsp;</strong><br />क्रिस्टल क्रॉप प्रोटेक्शन लिमिटेड ने 2012 में सीड बिजनेस की शुरुआत की थी। उस समय उसने हैदराबाद की रोहिणी सीड्स का अधिग्रहण किया गया था। उससे पहले क्रिस्टल प्लांट प्रोटक्शन बिजनेस में थी। इसने 2018 में सिंजेंटा कंपनी के ज्वार और फॉडर बिजनेस का अधिग्रहण किया था। फिर, 2021 में बायर कंपनी से बाजरा, सरसों और कपास बिजनेस का अधिग्रहण किया। पिछले साल कोहिनूर सीड्स से सदानंद ब्रांड (कॉटन) को खरीदा। हाल ही इसने आईएंडबी सीड्स (I&amp;B Seeds) कंपनी का अधिग्रहण किया है।&nbsp;</p>
<p><strong>-इस समय कंपनी का सीड बिजनेस किस तरह की फसलों में हैं? आपके बीज की किस्मों की खासियत क्या है?</strong><br />हमारे पास सब्जियों के अलावा 9 फील्ड क्रॉप हैं। आईएंडबी के अधिग्रहण से हम सब्जियों के बिजनेस में आ जाएंगे। हमारी ताकत रिसर्च है। हमारा फोकस रिसर्च और डेवलपमेंट आधारित प्रोडक्ट पर है। बाजरा, सरसों और कपास में हमारी वैरायटी की उत्पादकता और रोग प्रतिरोधी क्षमता बहुत अच्छी है। बाजरा में हमारी हाइब्रिड वैरायटी 9001 सबसे अधिक बिकने वाला हाइब्रिड बाजरा बीज है। इसकी औसत उत्पादकता 45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है और यह रोग प्रतिरोधी भी है। कपास में हम कुछ इलाकों में अच्छा बिजनेस कर रहे हैं। दक्षिणी राजस्थान के जोधपुर और आसपास के इलाकों में हम मार्केट लीडर हैं। वहां हमारी हाइब्रिड वैरायटी 7007 काफी लोकप्रिय है। इसकी खासियत यह है कि इसमें जिनिंग प्रतिशत ज्यादा है। इससे किसान को अच्छी कीमत मिलती है। दक्षिण में हमने सदानंद को खरीदा है, उस वैरायटी की पिकिंग बहुत अच्छी है। कपास की हाइब्रिड वैरायटी में किसान यह देखते हैं कि उसकी पिकिंग कितनी मुश्किल या आसान है।</p>
<p><strong>-राजस्थान और कई अन्य राज्यों में पिछले दो साल में कॉटन में काफी पेस्ट अटैक हुआ है। आपकी वैरायटी की परफॉर्मेंस कैसी थी?</strong><br />कॉटन में पिंक बॉलवर्म की समस्या रही है। अभी कोई भी वैरायटी पिंक बॉलवर्म रेजिस्टेंट नहीं है। कीटों के लिए प्रतिरोधी क्षमता बीटी ट्रेट से आती है। अभी जो बीटी ट्रेड उपलब्ध हैं उनमें यह क्षमता नहीं है। इसमें कोई नई रिसर्च भी नहीं हो रही है।</p>
<p><strong>-आपके कितने बीज रिसर्च सेंटर हैं?</strong><br />अलग-अलग जगहों पर हमारे आठ रिसर्च सेंटर हैं और 20 जगहों पर ट्रायल किया जाता है। कपास का रिसर्च सेंटर तीन जगहों पर है, एक ज्वार का, एक बाजरे का और दो रिसर्च सेंटर सरसों के हैं। एक मुख्य रिसर्च सेंटर हैदराबाद में है। सरसों और गेहूं का रिसर्च सेंटर जयपुर में है।&nbsp;<br />&nbsp;<br /><strong>-आपकी कंपनी के सीड बिजनेस की वृद्धि दर कैसी है। किस क्षेत्र में आपकी वैरायटी को किसान तेजी से अपना रहे हैं?</strong><br />इंडस्ट्री की ग्रोथ की बात करें तो पिछले 5 साल में सालाना औसत ग्रोथ 8% से 9% है। यह कभी दहाई में नहीं गई है। लेकिन पिछले तीन साल से हमारी ग्रोथ दो अंकों में रही है। मौजूदा साल में मेरा अनुमान है कि हमारा बीज बिजनेस 425 करोड़ रुपए के आसपास रहेगा। पिछले साल यह 351 करोड़ और उसे दो साल पहले 301 करोड़ रुपए था। हमें सबसे अच्छी ग्रोथ फॉडर, बाजरा और कॉटन में मिली है। हमारी वैरायटी से किसानों को डेढ़ गुना ज्यादा बायोमास मिल रहा है। हमारी बाजरे की वैरायटी की मांग राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा, गुजरात और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में रहती है।&nbsp;</p>
<p><strong>-आगे कंपनी किन फसलों पर फोकस कर रही है?</strong><br />हम चावल और मक्का पर फोकस कर रहे हैं। इसमें हमारी कुछ अच्छी वैरायटी हैं और आगे भी तैयारी कर रहे हैं। मक्के में हमने देरी से काम शुरू किया, पर जल्दी ही नई वैरायटी लॉन्च करने वाले हैं। हमें लगता है कि इसमें आगे अच्छी ग्रोथ देखने को मिलेगी।</p>
<p><strong>-अभी आपने सब्जियों के बीज के बाजार में प्रवेश किया है। उससे क्या उम्मीद है?</strong><br />हमने जिस आईएंडबी सीड्स (I&amp;B Seeds)) का अधिग्रहण किया है वह एक भारतीय और अमेरिकी संयुक्त उपक्रम कंपनी थी। वह मेरीगोल्ड (गेंदा) के बीज मार्केट में मार्केट लीडर रही है। एक समय मेरीगोल्ड बीज के 50% मार्केट पर इसका नियंत्रण था। मेरीगोल्ड पर रिसर्च करने वाली यह एकमात्र भारतीय कंपनी है। बाकी कंपनियां थाईलैंड से बीज आयात करती हैं। इस कंपनी का मेरीगोल्ड में ब्रीडिंग प्रोग्राम काफी मजबूत है। इसके अलावा सब्जियों में टमाटर, मिर्च, स्वीट कॉर्न, खीरा, खरबूजा और तरबूज में भी इसकी रिसर्च है।</p>
<p><strong>-सब्जियों के बीज के बिजनेस में आपने क्या टारगेट रखा है?</strong><br />अभी हमने इस सेगमेंट में टार्गेट कम ही रखा है। भारत में सब्जियों पर बहुत कम काम हुआ है। इसमें आगे काफी गुंजाइश दिखती है। हमने जिस कंपनी का अधिग्रहण किया, उसने रिसर्च में काफी निवेश किया है। हमारा मानना है कि इस कंपनी में हम निवेश करें तो इसमें 15% से 20% तक की ग्रोथ हो सकती है। हमें इससे फील्ड क्रॉप और सब्जियां, दोनों के आरएंडडी में फायदा मिलेगा।</p>
<p><strong>-सब्जियों के बीज काफी महंगे हैं। इसमें लगभग सारा बिजनेस प्राइवेट कंपनियों के हाथों में है। इसमें आप किसे अपना प्रतिद्वंद्वी मानते हैं?</strong><br />बीज बिजनेस में कोई एक प्रतिद्वंद्वी नहीं हो सकता है। इसमें 25 से 30 से प्रतिशत बाजार सिंजेंटा, बीएसएफ, बायर जैसी तीन-चार कंपनियों के पास है। उसके बाद भारत, थाईलैंड और यूरोप की सैकड़ों कंपनियां हैं। इस बिजनेस में प्रतिस्पर्धा क्रॉप आधारित होगी।&nbsp;</p>
<p><strong>-आपके पास बहुराष्ट्रीय और भारतीय दोनों तरह की कंपनियों का अनुभव है। सीड बिजनेस पर एक तरह से बहुराष्ट्रीय कंपनियों का नियंत्रण है। रासी और&nbsp; म्हाइको जैसी भारतीय कंपनियां भी सीड बिजनेस में अच्छा कर रही हैं। लेकिन जिस स्तर पर बहुराष्ट्रीय कंपनियां हैं उस स्केल पर कोई भारतीय कंपनी अभी तक क्यों नहीं पहुंच पाई है?</strong><br />इसका प्रमुख कारण यह है कि रिसर्च का काम बहुत खर्चीला होता है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां वह खर्च उठाने की स्थिति में हैं। विदेशी कंपनियों को भी देखें तो किसी भी कंपनी का भारत स्पेसिफिक रिसर्च नहीं है। भारत में ग्लोबल रिसर्च के बाय प्रोडक्ट आ रहे हैं। भारतीय कंपनियों के लिए रिसर्च में उस स्तर पर निवेश करना संभव नहीं है।</p>
<p><strong>-भारत में आईसीएआर और कृषि विश्वविद्यालयों का सार्वजनिक क्षेत्र का रिसर्च सिस्टम है&nbsp; क्या उनकी तरफ से बड़ा प्रयास नहीं हो रहा है?</strong><br />पिछले कुछ सालों में इस दिशा में काफी चर्चा हो रही है। हमने भी इन संस्थाओं के साथ बातचीत शुरू की है, लेकिन अभी किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंचे हैं क्योंकि वहां अलग तरह की चुनौतियां हैं। आईएआरआई पूसा के साथ जरूर हमने चावल के लिए समझौता किया है। हम उनसे चावल की वैरायटी लेंगे।</p>
<p><strong>-किसानों में जागरूकता बढ़ाने, उन्हें साथ लेकर चलने के लिए आप क्या कर रहे हैं?</strong><br />सीड बिजनेस में हमारे करीब 500 लोग फील्ड में काम कर रहे हैं। हमारी टीम किसानों को बताती है कि हमारे बीज क्यों अच्छे हैं और उनका इस्तेमाल करने पर क्या तौर-तरीके अपनाने की जरूरत है। पिछले दो साल में किसानों को शिक्षित करने पर हमने काफी काम किया है। बीजों के मामले में किसान जब तक अपनी आंखों से नहीं देखता तब तक वह उसे अपनाता नहीं है।</p>
<p><strong>-सब्जियों में कीटनाशकों का बहुत ज्यादा इस्तेमाल होता है। हमारे यहां ट्रेसेबिलिटी बहुत आसान नहीं है। आपका क्या कहना है?</strong><br />मैं भी एक कंज्यूमर हूं। जब मैं सब्जियों के खेतों में जाता हूं तो लगता है कि हमें सब्जी नहीं खरीदनी चाहिए, क्योंकि किसान वहां बड़ी मात्रा में कीटनाशकों का इस्तेमाल कर रहा होता है। इसके लिए हमें सिर्फ किसानों को जानकारी देना पर्याप्त नहीं है, हमें उन्हें उसका समाधान भी बताना पड़ेगा। हमारा रेगुलेटरी सिस्टम बहुत प्रभावी नहीं है। इसके लिए पेस्टिसाइड इंडस्ट्री, सीड इंडस्ट्री, किसान और उपभोक्ता सबको मिलकर काम करने की जरूरत है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ आईएंडबी सीड्स के अधिग्रहण से क्रिस्टल क्रॉप प्रोटेक्शन सब्जियों के बीज बिजनेस में होगी मजबूतः  सत्येंद्र सिंह ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[रूरल वॉयस एग्रीकल्चर कॉन्क्लेव एंड अवार्ड्स 2024 में किसानों के लिए संस्था निर्माण पर मंथन, अवार्ड वितरण  ]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/discussion-on-building-an-institution-for-farmers-and-award-distribution-at-rural-voice-agriculture-conference.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 24 Dec 2024 20:41:23 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
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        <description><![CDATA[ <p>रूरल वॉयस की चौथी वर्षगांठ तथा किसान दिवस के अवसर पर 23 दिसंबर को नई दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर में &ldquo;<span>रूरल वॉयस एग्रीकल्चर कॉन्क्लेव एंड नैकॉफ अवार्ड 2024</span>&rdquo; <span>का आयोजन किया गया जिसकी थीम </span>जिसकी थीम &lsquo;किसानों के लिए संस्था निर्माण&rsquo; थी।&nbsp;इस अवसर पर कृषि क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों, नीति निर्माताओं, उद्योग तथा किसान प्रतिनिधियों ने देश में कृषि के विकास और किसानों की तरक्की के लिए संस्थाओं के निर्माण और सशक्तिकरण पर जोर दिया। साथ ही कृषि के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले किसान, सहकारी संस्था, सामाजिक संस्था और सार्वजनिक संस्था को सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार उत्तराखंड के शिक्षा, स्वास्थ्य और सहकारिता मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने प्रदान किये।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/12/image_750x_676ac992359c4.jpg" alt="" style="display: block; margin-left: auto; margin-right: auto;" /></p>
<p>सम्मेलन को संबोधित करते डॉ. धन सिंह रावत ने कहा कि सहकारिता के क्षेत्र में उत्तराखंड में हुई कई पहल को दूसरे राज्य अपना रहे हैं। उत्तराखंड अगले दो साल में पूरी तरह ऑर्गेनिक हो जाएगा। अभी तक राज्य के 95 में से 62 ब्लॉक ऑर्गेनिक हो चुके हैं। राज्य में 12 लाख किसानों को बिना ब्याज के पांच लाख रुपये तक का कर्ज दिया गया जिसमें कोई एनपीए नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि विकास तभी होगा जब किसान आगे आएगा। एक तरफ कृषि भूमि घटती जा रही है, मिट्टी की उपजाऊ क्षमता कम हो रही है और दूसरी तरफ देश की आबादी बढ़ रही है। हमें इस बात का ध्यान रखना जरूरी है।</p>
<p>रूरल वॉयस के एडिटर-इन-चीफ हरवीर सिंह ने अपने स्वागत संबोधन में रूरल वॉयस की चार वर्षों की यात्रा और किसानों के लिए संस्था निर्माण के महत्व के बारे में बताया। उन्होंने कृषि क्षेत्र की चुनौतियों और किसानों की समस्याओं को दूर करने में सक्षम संस्थाओं के निर्माण और विकास पर जोर दिया। इस अवसर पर रूरल वर्ल्ड पत्रिका के नवीनतम अंक तथा डिजिटल संस्करण का विमोचन भी किया गया।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/12/image_750x_676aca30781a8.jpg" alt="" style="display: block; margin-left: auto; margin-right: auto;" /></p>
<p>सम्मेलन के पहले सत्र में &lsquo;अगली पीढ़ी की कृषि के लिए<span>, </span>अगली पीढ़ी की सहकारी संस्था&rsquo; विषय पर बोलते हुए कोऑपरेटिव इलेक्शन अथॉरिटी के चेयरमैन देवेंद्र कुमार सिंह ने कहा कि सहकारिता मंत्रालय के गठन के चार साल में सहकारिता के प्रति लोगों का भरोसा बढ़ा। उन्होंने सहकारिता के क्षेत्र में पारदर्शिता लाने और महिलाओं को बराबरी बढ़ाने पर जोर दिया। एनएफसीएसएफ के प्रबंध निदेशक प्रकाश नाइकनवरे ने गन्ना किसानों और चीनी उद्योग के विकास में सहकारी संस्थाओं के महत्व के बारे में बताया। नेशनल कोऑपरेटिव एक्सपोर्ट लिमिटेड (एनसीईएल) के प्रबंध निदेशक अनुपम कौशिक ने नई सहकारी संस्थाओं के बारे में बताते हुए अमूल जैसी कामयाबी कृषि से जुड़े अन्य क्षेत्रों में दोहराने की जरूरत पर जोर दिया।&nbsp;&nbsp;</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/12/image_750x_676aca6aaf2e9.jpg" alt="" style="display: block; margin-left: auto; margin-right: auto;" /></p>
<p>सम्मेलन के दूसरे सत्र में &ldquo;निजी क्षेत्र: किसानों की भागीदारी&rdquo; &nbsp;विषय पर परिचर्चा में भाग लेते हुए सवन्ना सीड प्राइवेट लिमिटेड के सीईओ व एमडी अजय राणा ने कृषि उत्पादन और किसानों की आय बढ़ाने में उन्नत बीजों के महत्व और निजी क्षेत्र की भूमिका पर प्रकाश डाला। सिंगापुर स्थित एमएनसी एग्रोकॉर्प इंडिया ट्रेड सर्विसेस प्राइवेट लिमिटेड के सीओओ राजीव यादव ने रिसर्च, ग्लोबल लिंकेज और उत्पादकता बढ़ाने में निजी के योगदान पर अपने विचार रखे। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज ऑफ इंडिया लिमिटेड (एमएसीएक्स) के वाइस प्रेसिडेंड (बिजनेस डेवलपमेंट) संजय गाखर ने कहा, किसानों के लिए सबसे जरूरी है कि उपज कब और किस भाव पर बेचना है। धानुका एग्रीटेक के चीफ साइंटिफिक एडवाइजर डॉ. पीके चक्रवर्ती ने कहा कि सरकार और निजी क्षेत्र को साथ मिल कर काम करने की जरूरत है। इंडियन एक्सप्रेस के एडिटर, रूरल अफेयर्स, हरीश दामोदरन ने इस सत्र का संचालन किया।&nbsp;</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/12/image_750x_676ace58498c3.jpg" alt="" style="display: block; margin-left: auto; margin-right: auto;" /></p>
<p>सम्मेलन का तीसरा सत्र &ldquo;<span>किसानों के लिए सार्वजनिक संस्थानों</span>&rdquo;<span> पर केंद्रित था। इसमें </span>पूर्व कृषि सचिव सिराज हुसैन ने कहा कि बजट में इन्फ्रास्ट्रक्चर पर 11 लाख करोड़ रुपये खर्च करने की घोषणा की गई<span>, </span>लेकिन कृषि इन्फा का इसमें जिक्र नहीं। उन्होंने आरएंडडी में निवेश बढ़ाने की जरूरत पर भी जोर दिया। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) के पूर्व निदेशक डॉ. ए.के. सिंह ने हरित क्रांति और उसके बाद देश में कृषि के विकास में सार्वजनिक संस्थानों के योगदान को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने विस्तार से बताया कि सार्वजनिक क्षेत्र के शोध संस्थानों आईसीएआर और आईएआरआई ने देश के किसानों के हित में किस तरह से काम किया। आईएआरआई द्वारा विकसित बासमती चावल की किस्मों का सालाना करीब 50 हजार करोड़ रुपये का निर्यात होता है। हालांकि उन्होंने कहा कि किसानों को इस साल बासमती धान का बेहतर दाम नहीं मिला।</p>
<p>भारत कृषक समाज के चेयरमैन अजयवीर जाखड़ ने किसानों के लिए बने संस्थानों की जवाबदेही पर जोर दिया। साथ ही हर स्कीम का आकलन उसके लाभार्थी से कराने का सुझाव दिया। जाखड़ ने कहा कि किसानों को अपने आसपास के संस्थानों से जुड़े मुद्दों को उठाना होगा, तभी संस्थान सही तरीके से काम करेंगे। इस सत्र का संचालन पीटीआई के पूर्व कार्यकारी संपादक जयंत राय चौधुरी ने किया।&nbsp;&nbsp;</p>
<p>चौथा सत्र &ldquo;किसानों के लिए संस्थानों के विकास में सहायक नीतिगत माहौल&rdquo; पर केंद्रित था। इस परिचर्चा में भाग लेते हुए सहकार भारती के मुख्य संरक्षक डॉ. डीएन ठाकुर ने कहा कि नीति बनाने से पहले यह सोचना है कि क्या उस पर अमल संभव है। इंडियन डेयरी एसोसिएशन के प्रेसिडेंट डॉ. आरएस सोढ़ी ने कोऑपरेटिव को सामाजिक के साथ कॉमर्शियल संस्थान बनाने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा असली भारत का विकास सहकारिता से ही संभव है। सोढ़ी ने कहा कि कृषि उपज के दाम बढ़ने को खाद्य महंगाई कहा जाता है। हमें सोच से बाहर निकलना होगा।&nbsp;</p>
<p></p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/12/image_750x_676acdb3da048.jpg" alt="" style="display: block; margin-left: auto; margin-right: auto;" /></p>
<p>पूर्व कृषि एवं खाद्य सचिव टी. नंदकुमार ने कहा कि किसानों को शेयरधारक की तरह मालिकाना का महत्व समझना होगा। संस्था को ठीक से चलाना, किसानों की जिम्मेदारी है। उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि ज्यादातर एफपीओ की स्थिति ठीक नहीं है। दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. मुनेश ने किसानों की समृद्धि के चार सूत्र दिए - मुनाफे की खेती, पर्यावरण का ख्याल, महिलाओं की भागीदारी व सम्मान और शिक्षा तथा खेती का समन्वय। इन चारों को नीति में लाने पर काफी बदलाव आ जाएंगे। इस सत्र का संचालन करते हुए नेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया (एनएफआई) के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर बिराज पटनायक ने किसान विरोधी माहौल बनाए जाने पर चिंता व्यक्त की।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/12/image_750x_676ace80927bb.jpg" alt="" style="display: block; margin-left: auto; margin-right: auto;" /></p>
<p>सम्मेलन को संबोधित करते हुए पूर्व सांसद और बिहार के मुख्यमंत्री के राजनीतिक सलाहकार केसी त्यागी ने कहा कि किसानों ने उत्पादन बढ़ाने और देश को आत्मनिर्भर बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। किसानों को उपज का सही दाम मिलना ही चाहिए। उन्होंने किसान की एमएसपी गारंटी की मांग का भी समर्थन किया। साथ ही किसान हित में भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के योगदान को भी याद दिलाया।</p>
<p>इस मौके पर कृषि के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले प्रगतिशील किसान किसान की श्रेणी में उत्तर प्रदेश के शामली जिले के उमेश कुमार<span>, </span>कोऑपरेटिव श्रेणी में उत्तराखंड कोऑपरेटिव रेशम फेडरेशन लिमिटेड<span>, </span>सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थान की श्रेणी में एनसीडीसी और सामाजिक क्षेत्र के संस्थान की श्रेणी में सुलभ इंटरनेशनल स्कूल ऑफ एक्शन सोशियोलॉजी एंड सोशियोलॉजी ऑफ सैनिटेशन (<span>SISASSS) </span>को रूरल वॉयस नेकॉफ अवार्ड से सम्मानित किया गया।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/12/image_750x_676ad3dc020d4.jpg" alt="" /></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/12/image_750x500_676ac7f99f84d.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ रूरल वॉयस एग्रीकल्चर कॉन्क्लेव एंड अवार्ड्स 2024 में किसानों के लिए संस्था निर्माण पर मंथन, अवार्ड वितरण   ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Ajeet Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[रूरल वॉयस एग्रीकल्चर कॉन्क्लेव में किसान और सस्थाएं अवार्ड से सम्मानित]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/awards-in-four-categories-distributed-at-rural-voice-agriculture-conclave.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 24 Dec 2024 09:10:20 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/awards-in-four-categories-distributed-at-rural-voice-agriculture-conclave.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>रूरल वॉयस की चौथी वर्षगांठ और किसान दिवस के अवसर पर 23 दिसंबर को नई दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर में "रूरल वॉयस एग्रीकल्चर कॉन्क्लेव एंड नेकॉफ अवार्ड्स 2024" का आयोजन किया गयाए जिसकी थीम &lsquo;किसानों के लिए संस्था निर्माण&rsquo; थी। इस मौके पर कृषि और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले एक किसान, सहकारी संस्था, सामाजिक संस्था और सार्वजनिक संस्थान को सम्मानित किया गया। उत्तराखंड के शिक्षा, स्वास्थ्य और सहकारिता मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने अवार्ड प्रदान किये।&nbsp;</p>
<p>किसान श्रेणी में उत्तर प्रदेश के शामली जिले के प्रगतिशील किसान <strong>उमेश कुमार</strong>,&nbsp;सहकारिता क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए <strong>उत्तराखंड को-ऑपरेटिव रेशम फेडरेशन लिमिटेड</strong>, सार्वजनिक संस्थान श्रेणी में <strong>नेशनल कोऑपरेटिव डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (एनसीडीसी)</strong> तथा सामाजिक संस्था श्रेणी में <strong>सुलभ इंटरनेशनल स्कूल ऑफ एक्शन सोशियोलॉजी एंड सोशियोलॉजी ऑफ सैनिटेशन</strong> को सम्मानित किया गया।&nbsp;</p>
<p>इस अवसर पर पूर्व सांसद केसी त्यागी, सहकार भारती के मुख्य संरक्षक डॉ. डीएन ठाकुर, इफको के निदेशक (मार्केटिंग) योगेंद्र कुमार, नैकॉफ के चेयरमैन राम इकबाल सिह तथा रूरल वॉयस के एडिटर-इन-चीफ हरवीर सिंह सिंह मौजूद रहे।&nbsp;</p>
<p><strong>किसान श्रेणी में उमेश कुमार को पुरस्कार</strong><br />आधुनिक खेती करने वाले शामली जिले के भैंसवाल गांव के किसान उमेश कुमार ने अपने इलाके में खेती के विकास में महत्वपूर्ण योगदान किया है। उन्होंने केमिकल फर्टिलाइजर मुक्त ऑर्गेनिक खेती शुरू की और उत्पादन को फर्टिलाइजर वाली खेती के बराबर लेकर गए। उत्तर प्रदेश सरकार की मदद से उन्होंने महाराष्ट्र जाकर गन्ने की ट्रेंच फार्मिंग का तरीका सीखा और शामली जिले में इसका प्रयोग करने वाले पहले किसान बने। यही नहीं, उन्होंने जिले के किसानों को ट्रेंच फार्मिंग के लिए तैयार भी किया।&nbsp;</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/12/image_750x_676a9f0f0d2be.jpg" alt="" style="display: block; margin-left: auto; margin-right: auto;" /></p>
<p>शामली जिला पंचायत के सदस्य उमेश कुमार गन्ना, धान, गेहूं, सरसों और चना के साथ फल-सब्जियों की भी ऑर्गेनिक खेती करते हैं। ऐसे समय जब पराली जलाने की समस्या गंभीर होती जा रही है, वे गन्ना और धान की पराली की खेत में ही मल्चिंग करते हैं। केमिकल फर्टिलाइजर की जगह उन्होंने वर्मीकंपोस्ट और पानी बचाने के लिए ड्रिप सिंचाई को अपनाया है।</p>
<p><strong>कोऑपरेटिव श्रेणी में उत्तराखंड कोऑपरेटिव रेशम फेडरेशन लिमिटेड सम्मानित</strong></p>
<p>रूरल वॉयस की ओर से उत्तराखंड कोऑपरेटिव रेशम फेडरेशन लिमिटेड को सहकारिता के क्षेत्र में किए जा रहे नवाचार, पूर्ण मूल्य श्रृंखला और सफल व्यवसायिक मॉडल के लिए सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार रेशम फेडरेशन के मैनेजिंग डायरेक्टर आनंद शुक्ला ने ग्रहण किया।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/12/image_750x_676a9f58907fd.jpg" alt="" style="display: block; margin-left: auto; margin-right: auto;" /></p>
<p>उत्तराखंड राज्य बनने के बाद रेशम विभाग के सामने सबसे बड़ी चुनौती प्रदेश के कच्चा रेशम उत्पादकों को मार्केटिंग की सुविधा उपलब्ध कराना और मूल्य भुगतान करना था। इन चुनौतियों के समाधान के लिए वर्ष 2002 में उत्तराखंड कोऑपरेटिव रेशम फेडरेशन का गठन किया गया।&nbsp;फेडरेशन ने भारत सरकार के केंद्रीय रेशम बोर्ड और राज्य सरकार के सहयोग से दो करोड़ रुपये की धनराशि से रिवॉल्विंग फंड बनाया, जिसका मुख्य उद्देश्य रेशम कीटपालकों को जल्दी भुगतान की व्यवस्था करना था। फेडरेशन की समिति हर साल रेशम का न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करने के लिए अपनी सिफारिशें भी देती है।&nbsp;पूरी रेशम मूल्य शृंखला पर काम करने के साथ फेडरेशन फार्म-टू-फैशन कांसेप्ट और उच्च क्वालिटी वाले रेशम धागे का उत्पादन आरंभ किया। साथ ही, एक ही जगह पर सभी पोस्ट-ककून गतिविधियां शुरू कीं। इस समय लगभग 6000 रेशम कीटपालक और 210 संबद्ध बुनकर फेडरेशन से जुड़े हैं।</p>
<p><strong>सार्वजनिक संस्थान श्रेणी में एनसीडीसी सम्मानित</strong></p>
<p>रूरल वॉयस एग्रीकल्चर कॉन्क्लेव में सार्वजनिक संस्थान श्रेणी का अवार्ड नेशनल कोऑपरेटिव डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (एनसीडीसी) को प्रदान किया गया। एनसीडीसी की ओर से डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर रोहित गुप्ता और चीफ डायरेक्टर (कम्युनिकेशंस) कर्नल हिमांशु ने अवार्ड प्राप्त किया।&nbsp;</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/12/image_750x_676a9f6ce9075.jpg" alt="" style="display: block; margin-left: auto; margin-right: auto;" /></p>
<p>देश में कोऑपरेटिव सेक्टर को मजबूत बनाने में एनसीडीसी का बड़ा योगदान रहा है। वर्ष 1963 में स्थापित यह संस्था कृषि उत्पादों के उत्पादन, प्रोसेसिंग, मार्केटिंग, स्टोरेज और आयात-निर्यात जैसे क्षेत्र में प्रोजेक्ट फाइनेंसिंग करती है। प्राइमरी और सेकंडरी स्तर की कोऑपरेटिव सोसायटी की फाइनेंसिंग के लिए यह राज्य सरकारों को लोन और ग्रांट देती है। एनसीडीसी ने ग्रामीण, औद्योगक, सहकारिता क्षेत्रों में भी प्रोजेक्ट फाइनेंसिंग की शुरुआत की है। यह संस्था देश में फैले 18 क्षेत्रीय और राज्य स्तरीय डायरेक्टरेट के माध्यम से कार्य करती है।</p>
<p><strong>सामाजिक संस्था श्रेणी में सुलभ इंटरनेशनल स्कूल ऑफ एक्शन सोशियोलॉजी एंड सोशियोलॉजी ऑफ सैनिटेशन (SISASSS) को सम्मान</strong></p>
<p>सामाजिक संस्था की श्रेणी में उल्लेखीयन योगदान के लिए सुलभ इंटरनेशनल स्कूल ऑफ एक्शन सोशियोलॉजी एंड सोशियोलॉजी ऑफ सैनिटेशन (SISASSS) को सम्मानित किया गया। सुलभ इंटरनेशनल के प्रेसीडेंट कुमार दिलीप ने पुरस्कार प्राप्त किया।&nbsp;</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/12/image_750x_676a9f7f0d74c.jpg" alt="" style="display: block; margin-left: auto; margin-right: auto;" /></p>
<p>सुलभ इंटरनेशनल स्कूल ऑफ एक्शन सोशियोलॉजी एंड सोशियोलॉजी ऑफ सैनिटेशन (SISASSS) की स्थापना 1993 में मशहूर समाजसेवी डॉ. बिंदेश्वर पाठक ने की थी। डॉ. पाठक ने समाजशास्त्र की परिकल्पना सामाजिक परिवर्तन के एक माध्यम के तौर पर की। सुलभ इंटरनेशनल स्कूल शुरुआत से हाशिए पर खड़े समुदायों को सशक्त बनाने के लिए प्रतिबद्ध है।&nbsp;इस संस्थान ने कृषि के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण पहल की शुरुआत की है। यह खाद्य असुरक्षा से लड़ने, क्लाइमेट रेजिलेंस और महिला किसानों के जीवन में बदलाव लाने के लिए खाद्य सार्वभौमिकता और सस्टेनेबल खेती को बढ़ावा दे रहा है। इसके प्रयासों ने महाराष्ट्र में 2500 से अधिक महिलाओं को अपनी खाद्य प्रणाली पर नियंत्रण रखने के लिए सशक्त बनाया है। इन महिलाओं ने देसी बीज तैयार किए, बीज बैंक स्थापित किया और वैल्यू एडेड मिलेट प्रोडक्ट भी बनाए। इस सफलता को सुलभ ने बिहार के दरभंगा और मधुबनी जिलों में भी दोहराया है जहां महिला किसान अपने दम पर परिवर्तन ला रही हैं।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/12/image_750x500_676a9eed1f0fb.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ रूरल वॉयस एग्रीकल्चर कॉन्क्लेव में किसान और सस्थाएं अवार्ड से सम्मानित ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/12/image_750x500_676a9eed1f0fb.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[रूरल वॉयस कॉन्क्लेवः सहकारिता को आगे बढ़ाने के लिए उसे कॉमर्शियल बनाने की जरूरत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/rural-voice-conclave-need-to-commercialise-cooperatives-for-their-advancement.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 23 Dec 2024 19:10:17 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/rural-voice-conclave-need-to-commercialise-cooperatives-for-their-advancement.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>नीति बनाने से पहले यह सोचना है कि क्या उस पर अमल संभव है। सहकारिता को आगे चलना है तो उसका कॉमर्शियल होना जरूरी है। एग्रीगेशन का फायदा आज ईकॉमर्स कंपनियां ले रही हैं। अगर लोग खुद ऐसा करें तो उन्हें इसका लाभ मिलेगा। रूरल वॉयस एग्रीकल्चर कॉन्क्लेव के चौथे सत्र 'किसानों के लिए संस्थाओं के विकास में सहायक नीतिगत वातावरण' विषय चर्चा में वक्ताओं ने ये बातें कही। उन्होंने कहा कि संस्था को ठीक से चलाना और आवाज उठाना भी किसानों की जिम्मेदारी है। वक्ताओं ने किसानों की समृद्धि के चार सूत्र दिए - मुनाफे की खेती, पर्यावरण का ख्याल, खेती में महिलाओं को शामिल करना और शिक्षा तथा खेती का समन्वय।&nbsp;</p>
<p>सहकार भारती के चीफ पैट्रन डॉ. डीएन ठाकुर ने कहा कि कृषि से जुड़ी नीतियों को लेकर कहा कि क्या किसानों के लिए इतनी नीतियों की जरूरत है? उन्होंने यह भी कहा कि जिस तरह से तीन किसान कानून लाए गए, उसकी क्या जरूरत थी? उन्होंने कहा, न्यूनतम समर्थन मूल्य में न्यूनतम शब्द ही अपने आप में गारंटी है। इसलिए हमने एमएसपी की गारंटी का सुझाव दिया लेकिन नहीं हुआ। नीति बनाने से पहले यह सोचना है कि क्या उस पर अमल संभव है।&nbsp;</p>
<p>इंडियन डेयरी एसोसिएशन के प्रेसिडेंट डॉ. आरएस सोढ़ी ने कोऑपरेटिव को सामाजिक के साथ कॉमर्शियल संस्थान बनाने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा, सहकारिता को आगे चलना है तो उसका कॉमर्शियल होना जरूरी है। इंडिया विकसित हो रहा है, लेकिन जहां 68 प्रतिशत भारतीय रहते हैं उस भारत को विकसित होने की जरूरत है। सबका विकास सहकारिता से ही संभव है।</p>
<p>उन्होंने कहा कि एग्रीगेशन का फायदा आज ईकॉमर्स कंपनियां ले रही हैं। अगर लोग खुद ऐसा करें तो उन्हें इसका लाभ मिलेगा। खपत पर शहर में औसत खर्च 6500 रुपये और गांव में 3900 रुपये है। शहर में करीब 40 प्रतिशत खर्च खाने पर होता है। किसान को देखना है कि वह वही उपजाए जिसकी खपत वास्तव में हो रही है। शहर में 85 रुपये की थाली में सबसे ज्यादा 19 प्रतिशत खर्च फल-सब्जियों पर होता है, उसके बाद दूध, पोल्ट्री और मीट, उसके बाद अनाज का स्थान आता है।</p>
<p>उन्होंने कहा कि भारत में सबसे ज्यादा दूध सब्सिडी कर्नाटक में, करीब 2000 करोड़ रुपये की दी जाती है। डॉ. वर्गीज कुरियन का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि इस तरह की सब्सिडी बैसाखी हैं, ये कोऑपरेटिव को अपने पैरों पर खड़ा नहीं होने देंगी। लेकिन इसके साथ यह भी जरूरी है कि जो लाभ इंडस्ट्री को मिलता है, वह कोऑपरेटिव को भी मिले।</p>
<p>पूर्व कृषि एवं खाद्य सचिव टी. नंद कुमार ने कहा कि वैल्यू चेन में सबसे ज्यादा लाभ उसे होता है जो उपभोक्ता के करीब होता है। यह अमूल की सफलता का भी कारण है। ऐसा क्यों हुआ कि कोऑपरेटिव शुरू में सफल, बाद में विफल होने लगे। किसानों को शेयरधारक की तरह मालिकाना समझना होगा। संस्था को ठीक से चलाना, आवाज उठाना भी किसानों की जिम्मेदारी है। कुछ जिम्मेदारी किसानों को भी लेनी पड़ेगी। पूर्व सचिव ने स्वीकार किया कि हर नीति में सरकार का झुकाव उपभोक्ता की तरफ होता है। उन्होंने यह भी बताया कि ज्यादातर एफपीओ की स्थिति ठीक नहीं, वे जल्दी ही बंद हो सकते हैं।</p>
<p>दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. मुनेश ने किसानों की समृद्धि के चार सूत्र दिए - मुनाफे की खेती, पर्यावरण का ख्याल, खेती में महिलाओं को शामिल करना और शिक्षा तथा खेती का समन्वय। इन चारों को नीति में लाने पर काफी बदलाव आ जाएंगे।</p>
<p>उन्होंने कहा कि महंगाई के अनुसार टीए-डीए बढ़ता है, लेकिन एमएसपी नहीं बढ़ता। इसके तरीके तलाशने होंगे। पर्यावरण का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि 1964 में मिट्टी में नौ में से सिर्फ एक पोषक तत्व की कमी थी, आज इसका उल्टा है। पोषण के लिए मिट्टी की गुणवत्ता जरूरी है। आखिरी जनगणना में महिलाएं 49 प्रतिशत थीं, यानी आधी आबादी। लेकिन खेती में महिलाएं आधी नहीं हैं। महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना जरूरी है। अभी महिलाएं श्रमिक के रूप में हैं, फैसले लेने की हैसियत में नहीं। उन्होंने कहा कि पढ़े लिखे लोग खेती की ओर नहीं जाते क्योंकि वहां मुनाफा नहीं होता। उन्होंने हर जिले में कृषि विश्वविद्यालय खोलने का सुझाव दिया।</p>
<p>इस सत्र को मॉडरेट करने वाले नेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर बिराज पटनायक ने कहा कि आज एक तरह का किसान विरोधी माहौल पैदा किया जा रहा है। पराली के लिए लोग किसानों को दोषी ठहराते हैं। इससे कैसे निपटा जाए। इसके जवाब में डीएन ठाकुर ने कहा कि किसान के द्वारा संस्था का निर्माण जरूरी है। उनकी मौलिक संस्था कोऑपरेटिव है। सोढ़ी ने कहा कि कृषि उपज के दाम बढ़ने को खाद्य महंगाई कहा जाता है। हमें सोच से बाहर निकलना होगा। नंद कुमार ने कहा, यह देखना जरूरी है कि नैरेटिव को कौन नियंत्रित करता है। हमें उन बातों पर ध्यान देना होगा जो बड़ी आबादी को प्रभावित करती है। हमें काउंटर तर्क देने की जरूरत है। डॉ. मुनेश की राय में काउंटर व्यू किसानों से और ग्राहकों दोनों से आएगा।&nbsp;</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/12/image_750x500_676967ef81acf.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ रूरल वॉयस कॉन्क्लेवः सहकारिता को आगे बढ़ाने के लिए उसे कॉमर्शियल बनाने की जरूरत ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[रूरल वॉयस कॉन्क्लेव में बोले धन सिंह रावत&amp;#45; दो साल में पूरी तरह ऑर्गेनिक राज्य हो जाएगा उत्तराखंड]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/uttarakhand-to-become-organic-state-in-two-years-says-cooperative-minister-dhan-singh-rawat.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 23 Dec 2024 18:38:12 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/uttarakhand-to-become-organic-state-in-two-years-says-cooperative-minister-dhan-singh-rawat.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>उत्तराखंड राज्य दो साल में पूरी तरह ऑर्गेनिक हो जाएगा। अभी तक राज्य के 95 में से 62 ब्लॉक ऑर्गेनिक हो चुके हैं। इनमें से 47 ब्लॉक को इसके लिए सर्टिफाई किया जा चुका है। रूरल वॉयस एग्रीकल्चर कॉन्क्लेव एंड नेकॉफ अवार्ड्स 2024 में मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल उत्तराखंड के सहकारिता और शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत ने अपने संबोधन में यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि कोऑपरेटिव के क्षेत्र में राज्य में कई पहल हुई हैं जिन्हें दूसरे राज्य अपना रहे हैं।</p>
<p>रावत ने बताया कि उत्तराखंड में 12 लाख किसानों को बिना ब्याज के एक लाख से पांच लाख रुपये तक का कर्ज दिया गया है। लेकिन किसानों का एक भी कर्ज एनपीए नहीं बना है। राज्य में लागू अन्य पहल के बारे में उन्होंने बताया कि उत्तराखंड ने मॉडल साधन सहकारी समिति बनाई थी, अब हर राज्य में इसे लागू किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि विकास तभी होगा जब किसान आगे आएगा। एक तरफ कृषि भूमि घटती जा रही है, मिट्टी की उपजाऊ क्षमता कम हो रही है और दूसरी तरफ देश की आबादी बढ़ रही है। हमें इस बात का ध्यान रखना जरूरी है।&nbsp;</p>
<p>कॉन्क्लेव में परिचर्चा के चार सत्र आयोजित किए गए। इनके विषय थे &lsquo;अगली पीढ़ी की कृषि के लिए, अगली पीढ़ी की सहकारी संस्था&rsquo;, &lsquo;निजी क्षेत्र- किसानों की भागीदारी&rsquo;, &lsquo;किसानों के लिए सार्वजनिक संस्थान, सहकारिता को आगे बढ़ाने के लिए उसका कॉमर्शियल बनाने की जरूरत&rsquo;।&nbsp;</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/12/image_750x_6769624463e1c.jpg" alt="" /></p>
<p>पूर्व कृषि एवं खाद्य सचिव टी. नंद कुमार ने कहा कि वैल्यू चेन में सबसे ज्यादा लाभ उसे होता है जो उपभोक्ता के करीब होता है। यह अमूल की सफलता का भी कारण है। ऐसा क्यों हुआ कि कोऑपरेटिव शुरू में सफल, बाद में विफल होने लगे। किसानों को शेयरधारक की तरह मालिकाना समझना होगा। संस्था को ठीक से चलाना, आवाज उठाना भी किसानों की जिम्मेदारी है। कुछ जिम्मेदारी किसानों को भी लेनी पड़ेगी। पूर्व सचिव ने स्वीकार किया कि हर नीति में सरकार का झुकाव उपभोक्ता की तरफ होता है।&nbsp;</p>
<p>पूर्व कृषि सचिव सिराज हुसैन ने कहा कि बजट में इन्फ्रास्ट्रक्चर पर पर 11 लाख करोड़ रुपये खर्च करने की घोषणा की गई, लेकिन कृषि इन्फा का इसमें जिक्र नहीं। कोई एपीएमसी नहीं जिसमें सरकार ने बड़ा निवेश किया हो। वह निजी क्षेत्र पर निर्भर है। कोशिश थी कि एपीएमसी से बाहर सिर्फ पैन से कारोबार हो सके। लेकिन वह नहीं हो सका। जरूरी है कि आने वाले समय में सरकार भी निवेश करे। आरएंडडी में निवेश बढ़ाने की जरूरत है।&nbsp;</p>
<p>पूर्व आईएएस और नेशनल प्रोडक्टिविटी काउंसिल के पूर्व डायरेक्टर जनरल संदीप कुमार नायक ने कहा कि कोऑपरेटिव सेक्टर देश की जीडीपी में 30 से 32 प्रतिशत योगदान करता है। उन्होंने कहा कि शोध पर कोऑपरेटिव सेक्टर की भूमिका को भी हाइलाइट नहीं किया जाता है। प्रोटीन इनटेक बढ़ाने के सवाल पर उन्होंने कहा कि इसका समाधान काफी जटिल है। इसके लिए किसानों को पशुपालन, मत्स्य पालन जैसे क्षेत्रों में प्रेरित करना होगा।&nbsp;</p>
<p>भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) के पूर्व निदेशक डॉ. ए.के. सिंह ने बताया कि पिछले 10 वर्षों में अलग-अलग फसलों की 2900 किस्में विकसित हुई हैं। इनमें 2600 से ज्यादा जलवायु सहिष्णु हैं। अनाज उत्पादन 33-35 करोड़ टन तक पहुंचा है जिसमें चावल 13 करोड़ टन और गेहूं 11 करोड़ टन से अधिक है। इसमें सरकारी संस्थानों का योगदान है। उन्होंने कहा कि निजी क्षेत्र को दलहन, तिलहन में नई किस्में विकसित करनी चाहिए।&nbsp;</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/12/image_750x_6769293f5a1be.jpg" alt="" /></p>
<p>कोऑपरेटिव इलेक्शन अथॉरिटी के चेयरमैन देवेंद्र कुमार सिंह ने बताया कि सहकारिता मंत्रालय के गठन के चार साल में इसके प्रति लोगों का भरोसा बढ़ा, उन्हें लगा कि इसकी सचमुच जरूरत थी। उन्होंने कहा कि किसान एमएसपी से बाहर निकलें और फसलों का विविधीकरण करें, अनाज से हट कर बागवानी की तरफ जाएं, पास के बजाय दूर की मंडी में जाने की सोचें। किसानों को सोचना चाहिए कि वे कैसे देश और विदेश के बड़े बाजारों में अपनी उपज कैसे बेच सकें। इसके लिए सुधारों की जरूरत है।&nbsp;</p>
<p>नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज लिमिटेड (एनएफसीएसएफ) के प्रबंध निदेशक प्रकाश नाइकनवरे ने बताया कि हर साल कोऑपरेटिव के जरिए किसानों को 36,000 करोड़ के आसपास दिया जाता है। कोऑपरेटिव मिलिंग और प्रोडक्ट में इनोवेशन कर रहे हैं। इनका मकसद यही है कि किसान के हाथ में ज्यादा पैसा कैसे जाए। उन्होंने कहा कि देश में 13 करोड़ किसान पैक्स से जुड़े हैं। पैक्स को मल्टीपर्पस बनाने की कोशिश की जा रही है। उन्हें एलपीजी वितरण, जन औषधि केंद्र, पीएम किसान समृद्धि केंद्र जैसी जिम्मेदारियां दी गई हैं।&nbsp;</p>
<p>एनसीईएल के प्रबंध निदेशक अनुपम कौशिक ने संस्थागत आवश्यकता के बारे में कहा कि 14.1 करोड़ हेक्टेयर शुद्ध खेती की जमीन है, जिन पर 14.7 करोड़ कृषक परिवार खेती करते हैं। कुल कृषि उत्पादन करीब 430 अरब डॉलर का है और संबद्ध को मिलाकर कुल उत्पादन 600 अरब डॉलर है। चीन से तुलना करते हुए उन्होंने कहा कि वहां खेती की जमीन कम है, इसके बावजूद उनका कृषि उत्पादन 1.4 ट्रिलियन डॉलर का है। उन्होंने कहा कि जहां भी संगठनात्मक प्रयास हुए हैं, वहां प्रति हेक्टेयर उत्पादकता बढ़ी है। इसी परिप्रेक्ष्य में संस्थाओं को देखा जाना चाहिए।&nbsp;</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/12/image_750x_6769293e3d0eb.jpg" alt="" /></p>
<p>सवन्ना सीड प्राइवेट लिमिटेड के सीईओ व एमडी अजय राणा ने कहा कि भारत में करीब 40-42 हजार करोड़ का बीज बिकता है। इसमें गन्ना शामिल नहीं है। विश्व में 5 लाख करोड़ रुपये का बीज कारोबार होता है। भारत का हिस्सा 10 प्रतिशत से भी कम है। चीन के पास क्षेत्रफल कम होने के बावजूद हमसे ढाई गुना आमदनी खेती से करता है, क्योंकि वह बेहतर बीज का प्रयोग करता है।</p>
<p>एमएनसी एग्रोकॉर्प इंडिया ट्रेड सर्विसेस प्राइवेट लिमिटेड के सीओओ राजीव यादव ने कहा कि निजी क्षेत्र हमेशा किसानों के साथ काम करता रहा है। इस साल 14 करोड़ टन चावल उत्पादन का अनुमान है। इसमें से 5.2 करोड़ टन एफसीआई खरीदेगा। 2.1 से 2.2 करोड़ टन निर्यात की संभावना जो निजी क्षेत्र करेगा। निजी कंपनियां वेयरहाउस खड़ी कर रही हैं, किसानों को क्रेडिट सुविधा दे रही हैं ताकि किसानों को यह आजादी मिले कि कब उपज बेचना है। बीज में भी निजी क्षेत्र बड़ी भूमिका निभा रहा है। आरएंडडी, ग्लोबल लिंकेज और उत्पादकता बढ़ाने में भी निजी क्षेत्र बड़े स्तर पर योगदान कर रहा है।</p>
<p>मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज ऑफ इंडिया लिमिटेड (एमएसीएक्स) के वाइस प्रेसिडेंड (बिजनेस डेवलपमेंट) संजय गाखर ने कहा, किसानों के लिए सबसे जरूरी है कि उपज कब और किस भाव पर बेचना है। 2003 में एमसीएक्स के आने से पहले किसानों के पास स्पॉट मार्केट का ही विकल्प होता था। कमोडिटी एक्सचेंज में तीन महीने बाद के भाव भी एक्सचेंज पर दिखते हैं। वे भाव देश भर के खरीदार की तरफ से होते हैं। हालांकि अभी ट्रेडिंग के लिए कमोडिटी की संख्या सीमित है। अभी 104 एग्री और नॉन एग्री कमोडिटी में ट्रेडिंग की अनुमति सेबी ने दे रखी है।&nbsp;</p>
<p>भारत कृषक समाज के चेयरमैन अजयवीर जाखड़ ने कहा, सरकारी संस्थानों का सबसे बड़ा काम निजी संस्थानों से डिलीवर करवाना है। इस काम में सार्वजनिक संस्थान पूरी तरह विफल रहे हैं। एक्सटेंशन सर्विसेज में नाकामी के कारण किसान गलत मात्रा में उर्वरक और कीटनाशकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। केवीके के पास अपना काम चलाने का पैसा नहीं होता, वे किसानों की क्या मदद करेंगे। आईसीएआर और कृषि विश्वविद्यालय 30-40 साल से नई किस्में ला रहे हैं, लेकिन उनमें से कितने प्रतिशत किस्में सफल हो रही हैं।&nbsp;</p>
<p>सहकार भारती के चीफ पैट्रन डॉ. डीएन ठाकुर ने कहा कि कृषि से जुड़ी नीतियों को लेकर कहा कि क्या किसानों के लिए इतनी नीतियों की जरूरत है? उन्होंने यह भी कहा कि जिस तरह से तीन किसान कानून लाए गए, उसकी क्या जरूरत थी? उन्होंने कहा, न्यूनतम समर्थन मूल्य में न्यूनतम शब्द ही अपने आप में गारंटी है। इसलिए हमने एमएसपी की गारंटी का सुझाव दिया लेकिन नहीं हुआ। नीति बनाने से पहले यह सोचना है कि क्या उस पर अमल संभव है।&nbsp;</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/12/image_750x_6769293d646a4.jpg" alt="" /></p>
<p>इंडियन डेयरी एसोसिएशन के प्रेसिडेंट डॉ. आरएस सोढ़ी ने कोऑपरेटिव को सामाजिक के साथ कॉमर्शियल संस्थान बनाने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा, सहकारिता को आगे चलना है तो उसका कॉमर्शियल होना जरूरी है। इंडिया विकसित हो रहा है, लेकिन जहां 68 प्रतिशत भारतीय रहते हैं उस भारत को विकसित होने की जरूरत है। सबका विकास सहकारिता से ही संभव है।</p>
<p>कॉन्क्लेव को पूर्व सांसद और बिहार के मुख्यमंत्री के राजनीतिक सलाहकार केसी त्यागी ने भी संबोधित किया। उन्होंने कहा कि जिस तरह भारत अंग्रेजों का उपनिवेश था, आज किसान शहरों का उपनिवेश बन कर रह गया है। वह शहरों के लिए उत्पादन करता है। देश के 16 करोड़ किसानों पर 21 लाख करोड़ रुपये का कर्ज है। यानी प्रति किसान 1.3 लाख का कर्ज है। उन्होंने कहा कि किसान कानूनों पर किसानों और वैज्ञानिकों से चर्चा की जानी चाहिए थी।&nbsp;</p>
<p>इस मौके पर कृषि के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले एक किसान, सहकारी संस्था, सामाजिक संस्था और सार्वजनिक संस्था को सम्मानित किया गया। उत्तराखंड के शिक्षा और सहकारिता मंत्री धन सिंह रावत ने अपने कर कमलों से इन्हें पुरस्कृत किया। किसान श्रेणी में उत्तर प्रदेश के शामली जिले के उमेश कुमार, कोऑपरेटिव श्रेणी में उत्तराखंड कोऑपरेटिव रेशम फेडरेशन लिमिटेड, सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थान श्रेणी में एनसीडीसी और सामाजिक क्षेत्र के संस्थान श्रेणी में सुलभ इंटरनेशनल स्कूल ऑफ एक्शन सोशियोलॉजी एंड सोशियोलॉजी ऑफ सैनिटेशन (SISASSS) को सम्मानित किया गया।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/12/image_750x500_6769606859889.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ रूरल वॉयस कॉन्क्लेव में बोले धन सिंह रावत- दो साल में पूरी तरह ऑर्गेनिक राज्य हो जाएगा उत्तराखंड ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[एग्री कॉन्क्लेवः किसानों की आय बढ़ाने के लिए शोध पर खर्च बढ़ाना जरूरी, किसान भी टेक्नोलॉजी को अपनाएं]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/agri-conclave-india-needs-to-increase-expenditure-on-r-and-d-farmers-also-need-to-adopt-technology.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 23 Dec 2024 14:42:51 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/agri-conclave-india-needs-to-increase-expenditure-on-r-and-d-farmers-also-need-to-adopt-technology.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>रूरल वॉयस के चौथे एग्रीकल्चर कॉन्क्लेव में वक्ताओं ने किसानों की अनेक समस्याएं सामने रखीं और उनके समाधान भी बताए। वक्ताओं ने रिसर्च पर खर्च बढ़ाने की जरूरत बताई और कहा कि निजी क्षेत्र को दलहन, तिलहन में नई किस्में विकसित करनी चाहिए। लागत कम करने के लिए किसानों को स्मार्ट खेती के लिए भी तैयार होना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि सहकारिता के क्षेत्र में पारदर्शिता को जरूरी बताया, क्योंकि कुछ लोग ही बार-बार चुन कर आना चाहते हैं। आय बढ़ाने के लिए किसानों को एमएसपी से बाहर निकलना होगा और फसलों का विविधीकरण करना पड़ेगा। उन्हें अनाज से हट कर बागवानी की तरफ जाना होगा, पास के बजाय दूर की मंडियों में जाना होगा। चीन से तुलना करते हुए वक्ताओं ने कहा कि वहां खेती की जमीन कम है, इसके बावजूद उनका कृषि उत्पादन 1.4 ट्रिलियन डॉलर का है। जबकि भारत में यह 450 अरब डॉलर के आसपास ही है। उत्पादकता बढ़ाने के लिए चीन के किसानों ने नई किस्मों और टेक्नोलॉजी को अपनाया है।&nbsp;</p>
<p><strong>पहला सत्रः अगली पीढ़ी की कृषि के लिए, अगली पीढ़ी की सहकारी संस्था</strong><br />कोऑपरेटिव इलेक्शन अथॉरिटी के चेयरमैन देवेंद्र कुमार सिंह ने बताया कि सहकारिता मंत्रालय के गठन के चार साल में इसके प्रति लोगों का भरोसा बढ़ा, उन्हें लगा कि इसकी सचमुच जरूरत थी। उन्होंने सहकारिता के क्षेत्र में पारदर्शिता को जरूरी बताया, क्योंकि कुछ लोग ही बार-बार चुन कर आना चाहते हैं। बोर्ड में महिलाओं को बराबरी का हिस्सा देना भी जरूरी है। ऐसा नहीं करने का मतलब है कि हम 2047 में विकसित भारत की बात नहीं कर रहे हैं। महिलाओं की भागीदारी सिर्फ नाम के लिए नहीं, उनके विचारों को भी स्थान देना जरूरी है।</p>
<p>मार्केटिंग के महत्व पर उन्होंने कहा कि किसान एमएसपी से बाहर निकलें और फसलों का विविधीकरण करें, अनाज से हट कर बागवानी की तरफ जाएं, पास के बजाय दूर की मंडी में जाने की सोचें। किसानों को सोचना चाहिए कि वे कैसे देश और विदेश के बड़े बाजारों में अपनी उपज कैसे बेच सकें। इसके लिए सुधारों की जरूरत है। निर्यात के लिए गुणवत्ता के मानदंड को पूरा करना पड़ेगा।&nbsp;</p>
<p>नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज लिमिटेड (एनएफसीएसएफ) के प्रबंध निदेशक प्रकाश नाइकनवरे ने कहा कि कोऑपरेटिव कृषि के हर क्षेत्र में किसानों की मदद के लिए काम कर रहे हैं। देश के 52 लाख गन्ना किसानों का खेत एक से डेढ़ एकड़ का है। हर चीनी मिल में 15 से 20 हजार किसान साथ आते हैं। वही बोर्ड में होते हैं। इस मॉडल पर बाकी दुनिया के लोगों को आश्चर्य होता है। कोऑपरेटिव किसानों का होता है, इसलिए जो दाम मिलता है उसे किसानों में ही बांटते हैं।&nbsp;</p>
<p>उन्होंने बताया कि हर साल कोऑपरेटिव के जरिए किसानों को 36,000 करोड़ के आसपास दिया जाता है। कोऑपरेटिव मिलिंग और प्रोडक्ट में इनोवेशन कर रहे हैं। इनका मकसद यही है कि किसान के हाथ में ज्यादा पैसा कैसे जाए। उदाहरण के लिए गन्ने के खेती में भी कोऑपरेटिव के जरिए एआई का इस्तेमाल हो रहा है। आने वाले समय में गन्ना काटने में मशीन का इस्तेमाल बड़े पैमाने होने जा रहा है। इस दिशा में काम हो रहा है। मशीन से क्वालिटी और रिकवरी अच्छी होती है।&nbsp;</p>
<p>उन्होंने कहा कि सहकारिता मंत्रालय मिशन मोड में काम कर रहा है। इसने अब तक 54 पहल की शुरुआत की है। वर्ष 2018 में नेशनल बायोफ्यूल पॉलिसी आई थी। आज पेट्रोल में 14 प्रतिशत इथेनॉल का प्रयोग होता है, जिसमें चीनी मिलों का बड़ा योगदान है। नई नीति में सबसे पहले कोऑपरेटिव शुगर मिल का इथेनॉल खरीदा जाएगा।</p>
<p>उन्होंने कहा कि देश में 13 करोड़ किसान पैक्स से जुड़े हैं। पैक्स को मल्टीपर्पस बनाने की कोशिश की जा रही है। उन्हें एलपीजी वितरण, जन औषधि केंद्र, पीएम किसान समृद्धि केंद्र जैसी जिम्मेदारियां दी गई हैं। अब हम वास्तव में सहकार से समृद्धि को हासिल करने जा रहे हैं। दुनिया का सबसे अनाज भंडारण कोऑपरेटिव में होने जा रहा है।&nbsp;</p>
<p>एनसीईएल के प्रबंध निदेशक अनुपम कौशिक ने संस्थागत आवश्यकता के बारे में कहा कि 14.1 करोड़ हेक्टेयर शुद्ध खेती की जमीन है, जिन पर 14.7 करोड़ कृषक परिवार खेती करते हैं। कुल कृषि उत्पादन करीब 430 अरब डॉलर का है और संबद्ध को मिलाकर कुल उत्पादन 600 अरब डॉलर है। चीन से तुलना करते हुए उन्होंने कहा कि वहां खेती की जमीन कम है, इसके बावजूद उनका कृषि उत्पादन 1.4 ट्रिलियन डॉलर का है।&nbsp;</p>
<p>उन्होंने कहा कि जहां भी संगठनात्मक प्रयास हुए हैं, वहां प्रति हेक्टेयर उत्पादकता बढ़ी है। इसी परिप्रेक्ष्य में संस्थाओं को देखा जाना चाहिए। उदाहरण के लिए दूध में आत्मनिर्भरता सहकारिता के कारण हासिल हुई, जहां रिटेल कीमत का 85 प्रतिशत किसानों को मिलता है। ऐसा दूसरे उत्पादों में भी करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि भारत की 55 प्रतिशत जनसंख्या 17 प्रतिशत जीडीपी में भागीदार। इसे 30-40 प्रतिशत तक ले जाना होगा, वरना समाज में असमानता होगी।&nbsp;</p>
<p><strong>दूसरा सत्रः निजी क्षेत्र- किसानों की भागीदारी</strong><br />सवन्ना सीड प्राइवेट लिमिटेड के सीईओ व एमडी अजय राणा ने कहा कि भारत में करीब 40-42 हजार करोड़ का बीज बिकता है। इसमें गन्ना शामिल नहीं है। विश्व में 5 लाख करोड़ रुपये का बीज कारोबार होता है। भारत का हिस्सा 10 प्रतिशत से भी कम है। चीन के पास क्षेत्रफल कम होने के बावजूद हमसे ढाई गुना आमदनी खेती से करता है, क्योंकि वह बेहतर बीज का प्रयोग करता है।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/12/image_750x_6769293e3d0eb.jpg" alt="" /></p>
<p>भारत में धान की उत्पादकता 4.5 टन प्रति हेक्टेयर है जबिक चीन में 70 टन। अन्य फसलों में भी यही स्थिति। वहां किसान नई टेक्नोलॉजी का उपयोग करते हैं। धान में 50 प्रतिशत किसान संकर बीज का प्रयोग करते हैं जबकि भारत में ऐसे किसान सिर्फ 10 प्रतिशत हैं। सिंचाई के साधन में भी बड़ा अंतर है।<br />&nbsp;<br />उन्होंने कहा कि कंपनियां रिसर्च पर 10 से 12 प्रतिशत खर्च करती हैं। पहले क्रांति धान और गेहूं की हुई थी। उसके बाद 20-25 साल में मक्का में बड़ी क्रांति हुई है। इसका उत्पादन तीन गुना हो गया है। कपास में भी 2003 के बाद क्रांति हुई, लेकिन पांच साल से कपास उत्पादन कम हो रहा है। हम कपास के फिर से आयातक बनते जा रहे हैं।</p>
<p>उन्होंने बताया कि कॉन्ट्रैक्ट खेती के लिए सवन्ना के साथ 10 हजार किसान जुड़े हैं, 10 लाख किसान हमसे बीज खरीदते हैं। उन्होंने कहा कि धान की उत्पादकता 4.5 से 6 टन भी कर लें तो हम पूरी दुनिया को खिला सकते हैं।</p>
<p>सिंगापुर स्थित एमएनसी एग्रोकॉर्प इंडिया ट्रेड सर्विसेस प्राइवेट लिमिटेड के सीओओ राजीव यादव ने कहा कि निजी क्षेत्र हमेशा किसानों के साथ काम करता रहा है। इस साल 14 करोड़ टन चावल उत्पादन का अनुमान है। इसमें से 5.2 करोड़ टन एफसीआई खरीदेगा। 2.1 से 2.2 करोड़ टन निर्यात की संभावना जो निजी क्षेत्र करेगा। निजी कंपनियां वेयरहाउस खड़ी कर रही हैं, किसानों को क्रेडिट सुविधा दे रही हैं ताकि किसानों को यह आजादी मिले कि कब उपज बेचना है। बीज में भी निजी क्षेत्र बड़ी भूमिका निभा रहा है। आरएंडडी, ग्लोबल लिंकेज और उत्पादकता बढ़ाने में भी निजी क्षेत्र बड़े स्तर पर योगदान कर रहा है।</p>
<p>मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज ऑफ इंडिया लिमिटेड (एमएसीएक्स) के वाइस प्रेसिडेंड (बिजनेस डेवलपमेंट) संजय गाखर ने कहा, किसानों के लिए सबसे जरूरी है कि उपज कब और किस भाव पर बेचना है। 2003 में एमसीएक्स के आने से पहले किसानों के पास स्पॉट मार्केट का ही विकल्प होता था। कमोडिटी एक्सचेंज में तीन महीने बाद के भाव भी एक्सचेंज पर दिखते हैं। वे भाव देश भर के खरीदार की तरफ से होते हैं। उन्होंने कहा कि 2004 से पहले 10 साल तक मेंथा ऑयल 450 रुपये किलो के आसपास बिकता था। अब इसके दाम काफी बढ़ गए हैं। बिक्री मूल्य में किसान को मिलने वाला हिस्सा भी बढ़ा है। किसान को लगने लगा है कि अच्छी क्वालिटी की उपज होगी तो अच्छे दाम मिलेंगे। हालांकि अभी ट्रेडिंग के लिए कमोडिटी की संख्या सीमित है। अभी 104 एग्री और नॉन एग्री कमोडिटी में ट्रेडिंग की अनुमति सेबी ने दे रखी है।&nbsp;</p>
<p>धानुका एग्रीटेक के चीफ साइंटिफिक एडवाइजर डॉ. पीके चक्रवर्ती ने कहा कि सरकार और निजी क्षेत्र को साथ मिल कर काम करने की जरूरत है। फसलों में 20 से 40 प्रतिशत पैदावार का नुकसान होता है। कम से कम 70 लाख टन बागवानी उत्पादन नुकसान और 60 लाख टन खाद्यान्न का नुकसान होता है। कपास में पिंक बॉलवर्म से 70 से 80 प्रतिशत तक नुकसान हो जाता है। करीब 40 प्रतिशत नुकसान खर-पतवार के कारण होता है। उन्हें बचाने के लिए रिसर्च हो रही हैं।</p>
<p><strong>तीसरा सत्रः किसानों के लिए सार्वजनिक संस्थान&nbsp;</strong><br />पूर्व कृषि सचिव सिराज हुसैन ने कहा कि बजट में इन्फ्रास्ट्रक्चर पर पर 11 लाख करोड़ रुपये खर्च करने की घोषणा की गई, लेकिन कृषि इन्फा का इसमें जिक्र नहीं। कोई एपीएमसी नहीं जिसमें सरकार ने बड़ा निवेश किया हो। वह निजी क्षेत्र पर निर्भर है। कोशिश थी कि एपीएमसी से बाहर सिर्फ पैन से कारोबार हो सके। लेकिन वह नहीं हो सका। जरूरी है कि आने वाले समय में सरकार भी निवेश करे। आरएंडडी में निवेश बढ़ाने की जरूरत है। मक्का में कामयाबी निजी क्षेत्र के आरएंडडी से आई। वित्त मंत्री ने कहा था कि प्रतिस्पर्धा मोड में रिसर्च करवाई जाएगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/12/image_750x_6769293d646a4.jpg" alt="" /></p>
<p>भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) के पूर्व निदेशक डॉ. ए.के. सिंह ने बताया कि पिछले 10 वर्षों में अलग-अलग फसलों की 2900 किस्में विकसित हुई हैं। इनमें 2600 से ज्यादा जलवायु सहिष्णु हैं। अनाज उत्पादन 33-35 करोड़ टन तक पहुंचा है जिसमें चावल 13 करोड़ टन और गेहूं 11 करोड़ टन से अधिक है। इसमें सरकारी संस्थानों का योगदान है।&nbsp;</p>
<p>उन्होंने कहा कि निजी क्षेत्र को दलहन, तिलहन में नई किस्में विकसित करनी चाहिए। विकसित देश कृषि जीडीपी का 3 प्रतिशत तक कृषि शोध पर खर्च करते हैं, जबकि भारत अभी 0.5 प्रतिशत भी नहीं होता। इसके बजट में बढ़ोतरी 0.5 प्रतिशत हुई जबकि महंगाई 5.5 प्रतिशत बढ़ी है। रासायनिक खेती करने वाले किसानों को लगभग 5000 रुपये प्रति एकड़ की सब्सिडी मिलती है, जैविक खेती करने वालों को नहीं। उन्हें मदद की जरूरत।&nbsp;</p>
<p>उन्होंने कहा कि किसानों को स्मार्ट खेती के लिए भी तैयार होना पड़ेगा। उदाहरण के लिए ड्रोन से जरूरी जगह पर ही दवा का छिड़काव किया जा सकता है। इससे लागत कम होगी और उपज का अच्छा मूल्य मिलेगा। इसके अलावा सॉयल हेल्थ कार्ड में डिजिटल मैपिंग का प्रयास कर रहे हैं। उसके आधार पर फर्टिलाइजर उपलब्ध कराया जा सकता है। उन्होंने कहा कि पराली न जलाने पर किसानों को कार्बन क्रेडिट के तौर पर एक हेक्टेयर के 30-35 हजार रुपये मिल सकते हैं।</p>
<p>पूर्व आईएएस को नेशनल प्रोडक्टिविटी काउंसिल के पूर्व डायरेक्टर जनरल संदीप कुमार नायक ने कहा कि कोऑपरेटिव सेक्टर देश की जीडीपी में 30 से 32 प्रतिशत योगदान करता है। सार्वजनिक संस्थान बनाने में एनसीडीसी का बड़ा योगदान रहा है। आज इसका टर्नओवर एक लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है, जो कई साल पहले सिर्फ 8000 करोड़ के आसपास था। उन्होंने कहा कि शोध पर कोऑपरेटिव सेक्टर की भूमिका को भी हाइलाइट नहीं किया जाता है। प्रोटीन इनटेक बढ़ाने के सवाल पर उन्होंने कहा कि इसका समाधान काफी जटिल है। इसके लिए किसानों को पशुपालन, मत्स्य पालन जैसे क्षेत्रों में प्रेरित करना होगा।&nbsp;</p>
<p>भारत कृषक समाज के चेयरमैन अजयवीर जाखड़ ने कहा, सरकारी संस्थानों का सबसे बड़ा काम निजी संस्थानों से डिलीवर करवाना है। इस काम में सार्वजनिक संस्थान पूरी तरह विफल रहे हैं। एक्सटेंशन सर्विसेज में नाकामी के कारण किसान गलत मात्रा में उर्वरक और कीटनाशकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। केवीके के पास अपना काम चलाने का पैसा नहीं होता, वे किसानों की क्या मदद करेंगे। आईसीएआर और कृषि विश्वविद्यालय 30-40 साल से नई किस्में ला रहे हैं, लेकिन उनमें से कितने प्रतिशत किस्में सफल हो रही हैं। समस्या गवर्नेंस की है।</p>
<p>उन्होंने कहा कि समस्या किसानों के साथ भी है। मंडी बोर्ड में चुनाव ही नहीं हो रहे और किसान उसमें वोट तक नहीं देते। किसानों को स्थानीय मुद्दों के लिए आवाज उठाना होगा, तभी सार्वजनिक संस्थान सही तरीके से काम करेंगे। कृषि के लिए जीएसटी की तरह काउंसिल बनाने की चर्चा है, लेकिन क्या वह कामयाब होगी। संस्थान जरूरी हैं, लेकिन कौन से संस्थान की जरूरत है यह देखना जरूरी है। हर स्कीम को उसके लाभार्थी से आकलन से कराने की जरूरत है, तभी असलियत सामने आएगी। राज्य सरकारों को भी अपने यहां कोऑपरेटिव को मदद करने की जरूरत है। गुजरात सरकार की मदद से ही अमूल सफल हुआ।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/12/image_750x500_6769293f26cd9.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ एग्री कॉन्क्लेवः किसानों की आय बढ़ाने के लिए शोध पर खर्च बढ़ाना जरूरी, किसान भी टेक्नोलॉजी को अपनाएं ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[रूरल वॉयस का चौथा एग्रीकल्चर कॉन्क्लेव शुरू, विशेषज्ञ कर रहे हैं ‘किसानों के लिए संस्था निर्माण’ पर चर्चा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/fourth-rural-voice-agriculture-conclave-2024-begins-experts-discuss-building-institutions-for-farmers.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 23 Dec 2024 10:56:36 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/fourth-rural-voice-agriculture-conclave-2024-begins-experts-discuss-building-institutions-for-farmers.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">रूरल वॉयस के चौथे एग्रीकल्चर कॉन्क्लेव की शुरुआत हो चुकी है। आज किसान दिवस के अवसर पर नई दिल्ली स्थित इंडिया हैबिटेट सेंटर में चल रहे &lsquo;रूरल वॉयस एग्रीकल्चर कॉन्क्लेव एंड नैकॉफ अवॉर्ड्स 2024&rsquo; की थीम &lsquo;किसानों के लिए संस्था निर्माण&rsquo; है। इस मौके पर &lsquo;रूरल वर्ल्ड&rsquo; पत्रिका के नवीनतम अंक और इसकी वेबसाइट का विमोचन भी किया गया। इस अवसर पर कृषि क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले किसान, सहकारी संस्था, निजी क्षेत्र की संस्था और सार्वजनिक संस्थान को सम्मानित भी किया जाएगा। इसके साथ ही रूरल वॉयस आज अपनी स्थापना के पांचवें साल में प्रवेश कर चुका है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कार्यक्रम में सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए रूरल वॉयस के एडिटर-इन-चीफ हरवीर सिंह ने किसानों के लिए संस्था निर्माण विषय के महत्व के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि देश में कृषि क्षेत्र में आज जो संस्थान हैं, अगर वे संस्थान नहीं होते तो हमारे लिए इस मुकाम पर पहुंचना संभव नहीं होता। लेकिन समय बदला है और आगे की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए हमें क्या बदलाव करने चाहिए, इस पर चर्चा के लिए इस सम्मेलन का आयोजन किया गया है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कॉन्क्लेव में कृषि विशेषज्ञ, नीति निर्माता, बिजनेस लीडर और किसान प्रतिनिधि &lsquo;किसानों के लिए संस्था निर्माण&rsquo; विषय से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार रख रहे हैं। कॉन्क्लेव में चर्चा के चार सत्र और एक समापन सत्र रखा गया है। पहला सत्र &lsquo;अगली पीढ़ी की कृषि के लिए, अगली पीढ़ी की सहकारी संस्था&rsquo; पर केंद्रित है। दूसरे सत्र में &lsquo;निजी क्षेत्र: किसानों की भागीदारी&rsquo; पर चर्चा होगी। तीसरे सत्र में विशेषज्ञ &lsquo;किसानों के लिए सार्वजनिक संस्थान&rsquo; के विषय पर अपने अनुभव साझा करेंगे। सम्मेलन का चौथा सत्र &lsquo;किसानों के लिए संस्थाओं के विकास में सहायक नीतिगत वातावरण&rsquo;&nbsp; पर केंद्रित रहेगा। इन सत्रों में किसानों की आय बढ़ाने, उन्हें बाजार मुहैया कराने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने में सहायक संस्थाओं के निर्माण और उन्हें सशक्त बनाने पर मंथन होगा।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इस कार्यक्रम में उत्तराखंड के कैबिनेट मंत्री धन सिंह रावत, केंद्रीय कृषि सचिव देवेश चतुर्वेदी, केंद्रीय पशुपालन, डेयरी एवं मत्स्यपालन विभाग की सचिव अलका उपाध्याय, इफको के प्रबंध निदेश डॉ. यूएस अवस्थी, कृभको चेयरमैन डॉ. चंद्रपाल सिंह, इंडियन डेयरी एसोसिएशन के प्रेसिडेंट डॉ. आरएस सोढ़ी, पूर्व सांसद एवं बिहार के मुख्यमंत्री के मुख्य सलाहकार केसी त्यागी के अलावा देश भर से किसान भाग ले रहे हैं।</span></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/12/image_750x500_6768fbef9bc3d.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ रूरल वॉयस का चौथा एग्रीकल्चर कॉन्क्लेव शुरू, विशेषज्ञ कर रहे हैं ‘किसानों के लिए संस्था निर्माण’ पर चर्चा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[चौथे रूरल वॉयस एग्रीकल्चर कॉन्क्लेव का आयोजन आज, विशेषज्ञ करेंगे ‘किसानों के लिए संस्था निर्माण’ पर चर्चा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/fourth-rural-voice-agriculture-conclave-2024-to-be-held-today-experts-to-discuss-building-institutions-for-farmers.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 23 Dec 2024 07:16:18 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/fourth-rural-voice-agriculture-conclave-2024-to-be-held-today-experts-to-discuss-building-institutions-for-farmers.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>आज 23 दिसंबर को किसान दिवस के अवसर पर नई दिल्ली स्थिति इंडिया हैबिटेट सेंटर में चौथे &lsquo;रूरल वॉयस एग्रीकल्चर कॉन्क्लेव एंड नैकॉफ अवॉर्ड्स 2024&rsquo; का आयोजन किया जा रहा है। इस साल के समारोह की थीम &lsquo;किसानों के लिए संस्था निर्माण&rsquo; है। इस कार्यक्रम में उत्तराखंड के स्वास्थ्य, शिक्षा और सहकारिता मंत्री धन सिंह रावत, केंद्रीय कृषि सचिव देवेश चतुर्वेदी, केंद्रीय पशुपालन, डेयरी एवं मत्स्यपालन मंत्रालय की सचिव अलका उपाध्याय, कृभको के चेयरमैन डॉ. चंद्रपाल सिंह, इंडियन डेयरी एसोसिएशन के प्रेसिडेंट डॉ. आरएस सोढ़ी, पूर्व सांसद एवं बिहार के मुख्यमंत्री के मुख्य सलाहकार केसी त्यागी के अलावा देश भर से किसान शामिल होंगे। इसके साथ ही रूरल वॉयस अपनी स्थापना के पांचवें साल में प्रवेश कर रहा है।</p>
<p>सम्मेलन में कृषि विशेषज्ञ, नीति निर्माता, बिजनेस लीडर और किसान प्रतिनिधि &ldquo;किसानों के लिए संस्था निर्माण&rdquo; विषय से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार रखेंगे। इस अवसर पर कृषि क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले किसान, सहकारी संस्था, निजी क्षेत्र की संस्था और सार्वजनिक संस्थान को सम्मानित भी किया जाएगा। साथ ही &lsquo;रूरल वर्ल्ड&rsquo; पत्रिका की वेबसाइट और नवीनतम अंक का विमोचन भी होगा। &nbsp;</p>
<p>रूरल वॉयस एग्रीकल्चर कॉन्क्लेव में चर्चा के चार सत्र और एक समापन सत्र होगा। पहला सत्र &ldquo;अगली पीढ़ी की कृषि के लिए, अगली पीढ़ी की सहकारी संस्थाओं&rdquo; पर केंद्रित होगा। दूसरे सत्र में &ldquo;निजी क्षेत्र: किसानों की भागीदारी&rdquo; पर चर्चा होगी। तीसरे सत्र में विशेषज्ञ &ldquo;किसानों के लिए सार्वजनिक संस्थानों&rdquo; के विषय पर अपने अनुभव साझा करेंगे। सम्मेलन का चौथा सत्र &ldquo;किसानों के लिए संस्थाओं के विकास में सहायक नीतिगत वातावरण&rdquo; पर केंद्रित रहेगा। इन सत्रों में किसानों की आय बढ़ाने, उन्हें बाजार मुहैया कराने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने में सहायक संस्थाओं के निर्माण और उन्हें सशक्त बनाने पर मंथन होगा।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/12/image_750x500_6766cc83cc315.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ चौथे रूरल वॉयस एग्रीकल्चर कॉन्क्लेव का आयोजन आज, विशेषज्ञ करेंगे ‘किसानों के लिए संस्था निर्माण’ पर चर्चा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[पीएयू में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन में सस्टेनेबल कृषि के लिए फसल विविधीकरण पर जोर]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/national-conference-at-pau-highlights-crop-diversification-as-key-to-sustainable-agriculture-amid-climate-change.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 10 Nov 2024 12:13:27 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/national-conference-at-pau-highlights-crop-diversification-as-key-to-sustainable-agriculture-amid-climate-change.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>पंजाब कृषि विश्वविद्यालय <strong>(पीएयू)</strong> ने मीडिया हाउस <strong>रूरल वॉयस</strong> और गैर-सरकारी संगठन <strong>विलेजनामा</strong> के सहयोग से &lsquo;फसल विविधीकरण और जलवायु परिवर्तन&rsquo; विषय पर राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया। इसमें भाग लेने वाले विशेषज्ञों ने फसल विविधीकरण को सस्टेनेबल कृषि के लिए महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि यह पर्यावरण को होने वाले नुकसान को रोकने के लिए जरूरी है, और यह पंजाब के किसानों के लिए आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित कर सकता है। इस सम्मेलन में बड़ी संख्या में किसान, नीति निर्माता, सरकारी अधिकारी, वैज्ञानिक और विशेषज्ञ शामिल हुए।</p>
<p>पंजाब के मुख्यमंत्री के विशेष मुख्य सचिव <strong>वी.के. सिंह</strong> ने सम्मेलन का उद्घाटन किया। उन्होंने पंजाब की गेहूं-धान की सघन कृषि प्रणाली के पर्यावरणीय प्रभाव को रेखांकित करते हुए फसल विविधीकरण को आवश्यक बताया। श्री सिंह ने सरकारी निकायों, अनुसंधान संस्थानों और किसानों के बीच सहयोग की अपील की, ताकि जल प्रबंधन, बाजार पहुंच और किसान शिक्षा से जुड़े मुद्दों का समाधान किया जा सके। उन्होंने पंजाब के सहकारी ढांचे को मजबूत करने और फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने के लिए एक समर्पित एजेंसी के गठन की भी वकालत की।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/11/image_750x_67305572132be.jpg" alt="" style="display: block; margin-left: auto; margin-right: auto;" /></p>
<p style="text-align: center;"><em>कृषि प्रदर्शनी में जानकारी लेते पंजाब के मुख्यमंत्री के विशेष मुख्य सचिव वी.के. सिंह।</em></p>
<p>पीएयू के कुलपति <strong>डॉ. सतबीर सिंह गोसल</strong> ने जलवायु परिवर्तन के जोखिमों पर प्रकाश डाला, जिनमें चरम मौसम घटनाएं शामिल हैं। डॉ. गोसल ने बताया कि PAU ने 950 से अधिक वैकल्पिक फसल किस्मों का विकास किया है। मिट्टी को समृद्ध करने के लिए मल्च के उपयोग और पानी बचाने के लिए कम अवधि वाले धान की किस्मों को बढ़ावा देने जैसे तरीकों पर शोध जारी है। उन्होंने किसानों को गेहूं-धान फसल चक्र के विकल्प के रूप में कपास, मक्का और सब्जियों जैसी फसलों के साथ विविधता लाने का सुझाव दिया, जो पारिस्थितिकी को समृद्ध करने के साथ आर्थिक लाभ भी प्रदान करती हैं।</p>
<p>भारत कृषक समाज के चेयरमैन<strong>&nbsp;अजय वीर जाखड़</strong> ने पंजाब के किसानों की चुनौतियों के समाधान के लिए उचित नीतियों की आवश्यकता बताई, गुड गवर्नेंस और पारदर्शिता पर बल दिया। उन्होंने गुणवत्ता पूर्ण कृषि शिक्षा और ग्राम सभा प्रशासन में जवाबदेही बढ़ाने की बात भी कही। उन्होंने कहा कि किसानों की समस्याओं के हल के लिए नए कानूनों की आवश्यकता नहीं है। यदि प्रशासन में सुधार किया जाए, तो मौजूदा कानूनों से भी सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है।</p>
<p>अपने स्वागत भाषण में विलेजनामा की सह-संस्थापक <strong>डॉ. रश्मि सिन्हा</strong> ने भावी पीढ़ियों पर जलवायु संकट के प्रभाव को लेकर चेतावनी दी और भारत में जलवायु संबंधी आपदाओं में वृद्धि के चिंताजनक आंकड़ों का हवाला दिया। उन्होंने देश के युवाओं के लिए एक सस्टेनेबल धरती बनाने के मकसद से सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पर भी जोर दिया।</p>
<p>रूरल वॉयस के एडिटर-इन-चीफ<strong>&nbsp;हरवीर सिंह</strong> ने इस सम्मेलन की चर्चाओं के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि इस तरह के सम्मेलन का उद्देश्य सभी हितधारकों को एक मंच पर लाना है, ताकि जलवायु परिवर्तन और कृषि संकट से निपटने का व्यावहारिक समाधान खोजा जा सके। उन्होंने कहा कि रूरल वॉयस और विलेजनामा की तरफ से आयोजित इस सम्मेलन का उद्देश्य ऐसे संवाद को आगे बढ़ाना है।</p>
<p>सम्मेलन में तीन तकनीकी सत्र थे। पहला सत्र &lsquo;फसल विविधीकरण की आवश्यकता&rsquo; पर आधारित था, जिसमें फसल विविधीकरण के आर्थिक और पारिस्थितिकी से जुड़े पहलुओं पर चर्चा की गई। दूसरे सत्र में &lsquo;वैकल्पिक फसलों के माध्यम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाना&rsquo; विषय पर विचार-विमर्श हुआ। अंतिम सत्र में टेक्नोलॉजी में इनोवेशन पर चर्चा की गई। इसमें कृषि प्लानिंग और डेयरी सेक्टर में उन्नत प्रजनन तकनीक पर प्रजेंटेशन भी दिया गया।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/11/image_750x_67305572e8525.jpg" alt="" style="display: block; margin-left: auto; margin-right: auto;" /></p>
<p style="text-align: center;"><em>सम्मेलन में कृषि जगत की अनेक मशहूर हस्तियों ने भाग लिया।</em></p>
<p>पहले तकनीकी सत्र में विलेजनामा की अर्थशास्त्री और विजिटिंग फेलो <strong>डॉ. श्वेता सैनी</strong> ने सम्मेलन की थीम पर चर्चा की।<strong> डॉ. नवतेज सिंह बैंस</strong> ने &lsquo;पंजाब में फसल विविधीकरण: अर्थशास्त्र बनाम पारिस्थितिकी&rsquo; पर अपने विचार साझा किए। नेशनल रेनफेड एरिया अथॉरिटी के पूर्व अध्यक्ष <strong>डॉ. जे.एस. सामरा</strong> ने विशेषज्ञ टिप्पणी की।</p>
<p>दूसरे सत्र में ग्रीन वैली स्टेविया के अध्यक्ष <strong>आर.पी.एस.</strong> <strong>गांधी</strong> ने फसल विविधीकरण के लिए नए अवसरों पर केस स्टडी प्रस्तुत की। <strong>अवतार सिंह ढींडसा</strong> ने फूलों की खेती को एक संभावित कृषि उद्योग के रूप में बताया। <strong>डॉ. स्वामी पेंटयाला</strong> ने रूरल मार्केटिंग में कृषि डिजिटल प्लेटफार्मों की भूमिका पर चर्चा की। पीएयू के शोध निदेशक <strong>डॉ. ए.एस. ढट</strong> ने पंजाब में विविधीकरण के लिए वैकल्पिक फसलों पर बात की।</p>
<p>तीसरे सत्र में, एग्री मैट्रिक्स प्राइवेट लिमिटेड के सह-संस्थापक <strong>श्रीधर कोत्रा</strong> ने विविधीकृत कृषि के लिए सैटेलाइट इमेजरी के उपयोग पर चर्चा की। <strong>डॉ. दलजीत सिंह गिल</strong> ने आधुनिक प्रजनन तकनीकों के माध्यम से डेयरी उद्योग में प्रगति के बारे में बताया। पीएयू के निदेशक (एक्सटेंशन एजुकेशन)<strong> डॉ. एम.एस. भुल्लर</strong> ने सम्मेलन के प्रमुख बिंदुओं का सारांश प्रस्तुत किया, और कार्यक्रम का समन्वयन एसोसिएट डायरेक्टर (इंस्टीट्यूशन रिलेशंस) <strong>डॉ. विशाल बेक्टर</strong> ने किया। अपने समापन वक्तव्य में डॉ. एम.एस. भुल्लर ने पंजाब में एक स्थायी और लचीली कृषि अर्थव्यवस्था के लिए फसल विविधीकरण को आवश्यक बताया।</p>
<p>विलेजनामा के संस्थापक और भारतीय खाद्य निगम (FCI) के पूर्व सीएमडी <strong>आलोक सिन्हा</strong> ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया, जिसमें उन्होंने नीतिगत प्रक्रिया में किसानों को केंद्र में रखने के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि यह सम्मेलन कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर संवाद शुरू करने की दिशा में पहला कदम है।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/11/image_750x500_6731ee4216e61.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ पीएयू में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन में सस्टेनेबल कृषि के लिए फसल विविधीकरण पर जोर ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[वर्ल्ड मिल्क डेः भारत पूरी कर सकता है बढ़ते ग्लोबल डेयरी मार्केट की मांग&amp;#45; पियरक्रिस्टियानो ब्रेजले]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/world-milk-day-india-can-meet-the-demand-of-the-growing-global-dairy-market-says-idf-president-piercristiano-brazzale.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 01 Jun 2024 16:04:37 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/world-milk-day-india-can-meet-the-demand-of-the-growing-global-dairy-market-says-idf-president-piercristiano-brazzale.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>विश्व के डेयरी मार्केट में बेहतर ग्रोथ की संभावनाएं हैं क्योंकि आने वाले समय में पशु प्रोटीन के साथ दूध की मांग दुनिया भर में तेजी से बढ़ने का अनुमान है। लेकिन यूरोप के डेयरी किसान इसका फायदा उठा सकेंगे या नही यह जून में यूरोपीय संसद के लिए होने जा रहे चुनावों में साफ हो जाएगा। इसकी वजह यूरोपियन यूनियन द्वारा लागू की जा रही ग्रीन डील है। किसानों के विरोध के बाद इस पर अमल चुनावों तक टाल दिया गया है। इस चुनाव के नतीजे तय करेंगे कि भविष्य में यूरोप में दूध उत्पादन की क्या स्थिति रहेगी। यूरोप, अमेरिका या न्यूजीलैंड इस वैश्विक मांग को पूरा करने की स्थिति में नहीं लग रहे हैं। वहीं भारत में दूध उत्पादन बढ़ने की संभावनाओं के चलते भारत इसका फायदा उठा सकता है। <strong>इंटरनेशनल डेयरी फेडरेशन (आईडीएफ) के प्रेसिडेंट</strong> <strong>पियरक्रिस्टियानो ब्रेजले</strong> का कहना है कि भारत एकमात्र देश है जो इस बढ़ती मांग को पूरा कर सकता है। लेकिन इसके लिए प्रति मवेशी दूध का उत्पादन बढ़ाने के साथ अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरा उतरना जरूरी है। विश्व में डेयरी कारोबार, भावी संभावनाओं और डेयरी क्षेत्र से जुड़े तमाम मुद्दों पर <strong>आईडीएफ के प्रेसिडेंट ब्रेजले</strong> ने रूरल वर्ल्ड के <strong>एडिटर-इन-चीफ हरवीर सिंह</strong> के साथ बात की। बातचीत के मुख्य अंशः</p>
<p><strong>-विश्व स्तर पर डेयरी सेक्टर का भविष्य कैसा लगता है, खासकर मध्यम अवधि और दीर्घ अवधि के लिहाज से?</strong><br />विश्व स्तर पर मुझे तो डेयरी सेक्टर का भविष्य काफी उज्जवल लगता है। अगले 20 वर्षों के दौरान पशु प्रोटीन की मांग में हर साल लगभग एक प्रतिशत वृद्धि होने की संभावना है। अगर इस बढ़ती हुई मांग का 30% भी डेयरी सेक्टर पूरा करे तो यह अपने आप में ग्रोथ का बहुत बड़ा अवसर है। रैबो बैंक ने वर्ष 2030 तक वैश्विक डेयरी आयात में 3.3 करोड़ टन वृद्धि का अनुमान लगाया है। यह बहुत बड़ा आंकड़ा है। यह केन्या के उत्पादन का छह गुना और इटली के उत्पादन का दो गुना है। इतनी मांग को कौन पूरा कर सकता है? निश्चित रूप से यूरोपियन यूनियन या न्यूजीलैंड इस मांग को पूरा नहीं कर सकेगा।</p>
<p><strong>-यूरोपियन यूनियन क्यों इस मांग को पूरा करने की स्थिति में नहीं है?</strong><br />यूरोपियन यूनियन अभी 14.5 करोड़ टन के साथ दुनिया में गाय के दूध का सबसे बड़ा उत्पादक है। आगे वहां दूध के उत्पादन में गिरावट आएगी। आयरलैंड जैसे देशों में हम इस गिरावट को देख भी रहे हैं। इसका एक कारण उत्पादन की बढ़ती लागत है। यूरोप में किसानों को जो कीमत मिलती है वह उनकी लागत को पूरा करने के लिए काफी नहीं है। लेकिन बात सिर्फ लागत की नहीं है। पर्यावरण कानून को लागू करने का मसला भी समान रूप से महत्वपूर्ण है, खासकर जो नाइट्रोजन और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन से जुड़ा है।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/06/image_750x_665af74165107.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>-पर्यावरण कानून दूध उत्पादन को किस तरह प्रभावित करेंगे?</strong><br />यूरोपियन यूनियन की ग्रीन डील के तहत ऑर्गेनिक नाइट्रोजन के स्तर की एक सीमा तय की गई है। यह 170 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से अधिक नहीं हो सकता है। इसका दूसरा मतलब यह है कि आप जमीन के तय आकार पर एक निश्चित संख्या से अधिक मवेशी नहीं रख सकते हैं। इस नियम के कारण दूध उत्पादन में भी गिरावट आएगी। आयरलैंड में किसानों ने बड़ी संख्या में मवेशियों को मारना शुरू कर दिया है। स्पेन और नीदरलैंड में भी इस कानून को सख्ती से लागू किया जा रहा है, जहां किसान सड़कों पर उतर आए हैं।</p>
<p><strong>-आपको यूरोपियन ग्रीन डील का भविष्य क्या लगता है?</strong><br />यूरोपियन ग्रीन डील में वर्ष 2030 तक ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम से कम 55% घटाने का लक्ष्य रखा गया है। साथ ही वर्ष 2050 तक नेट उत्सर्जन शून्य पर लाने का लक्ष्य है। इसके साथ ही उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग में भारी कटौती इस डील का हिस्सा है। वहीं आर्गेनिक खेती के लिए भी लक्ष्य तय किया गया है। इस तरह के कदम यूरोप में कृषि उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं और वहां की खाद्य सुरक्षा इसके चलते प्रभावित हो सकती है। इस डील का भविष्य आगामी जून माह में तय होगा जब यूरोपियन यूनियन में अगले नेतृत्व के लिए चुनाव होंगे।</p>
<p><strong>-इन सबका नतीजा क्या होगा?</strong><br />जैसा मैंने कहा, जून में यूरोपियन पार्लियामेंट के लिए चुनाव होंगे। पूरे यूरोप में तब तक ग्रीन डील पर अमल रोक दिया गया है। कुछ देशों ने अपने स्तर पर भी कदम उठाए हैं। दक्षिणपंथी पार्टियां इस नियम के खिलाफ हैं जबकि वामपंथी पार्टियां इसका समर्थन कर रही हैं। इन नियमों का विरोध करने वाली पार्टियां किसान समर्थक बताई जाती हैं तो दूसरी तरफ वामपंथी पार्टियों को शायद वनस्पति आधारित प्रोटीन लॉबी का समर्थन प्राप्त है। वे पशु अधिकारों की भी बात कर रही हैं।</p>
<p><strong>-इन सबका भारत की डेयरी इंडस्ट्री पर क्या असर होगा?</strong><br />यूरोप में दूध के उत्पादन में गिरावट आती है और न्यूजीलैंड में उत्पादन बढ़ाने की ज्यादा गुंजाइश नहीं है, क्योंकि वहां भी पर्यावरण की समस्या का मुद्दा है और गायों की संख्या भी बहुत अधिक है। ऐसी स्थिति में आने वाले समय में वैश्विक मांग को कौन पूरा करेगा? मैं जो देख रहा हूं, सिर्फ भारत इस अंतर को पूरा करने की स्थिति में लगता है। यहां उत्पादन बढ़ाने और प्रति मवेशी उत्पादकता में वृद्धि की काफी गुंजाइश है। मुझे पूरा भरोसा है कि भविष्य में अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत एक बड़ा खिलाड़ी बनकर उभरेगा।</p>
<p><strong>-भारत क्यों बेहतर स्थिति में है और यहां क्या कदम उठाने की जरूरत है?</strong><br />भारत इसलिए बेहतर स्थिति में है क्योंकि यहां दूध उत्पादन की संस्कृति और इसकी परंपरा है। यहां प्रति पशु उत्पादकता भी इस समय बहुत कम है। अमेरिका और न्यूजीलैंड में उत्पादकता पहले ही अधिकतम स्तर पर पहुंच गई है। अफ्रीका में लोगों को इसकी जानकारी नहीं है, ना ही ऐसे पशु हैं जो वहां रह सकते हैं। लेकिन भारत को इस दिशा में बढ़ने के लिए ब्रीडिंग, पशु पोषण, उनकी सेहत आदि पर काम करने की जरूरत है। इसके साथ ही यहां के उत्पादों का स्वास्थ्य सुरक्षा तथा गुणवत्ता के वैश्विक मानकों पर खरा उतरना भी जरूरी है।</p>
<p><strong>-आप खुद एक किसान हैं और इटली के साथ ब्राजील, चीन व यूरोप के दूसरे देशों में आपकी कंपनी के प्लांट हैं। एक आंत्रप्रेन्योर और किसान के नाते मौजूदा स्थिति को कैसे देखते हैं?</strong><br />हमारी कंपनी इटली की सबसे बड़ी दूध प्रोसेसिंग कंपनी है। हमारी कंपनी ब्राजील में भी बिजनेस करती है। गायों और डेयरी कारोबार के अलावा हम पिग फार्मिंग करते हैं। ब्राजील में हम मीट के लिए गाय पालते हैं। लेकिन जिस तरह की शर्तें लगाई गई हैं, 600 गायों के डेयरी फार्म की सीमा कारोबार विस्तार को प्रभावित करने वाली है। यह हमारे साथ दूसरे किसानों को भी प्रभावित करेगा। मैंने खुद यूरोपियन यूनियन के पदाधिकारियों के साथ बातचीत में ग्रीन डील पर सवाल उठाये और प्रति हेक्टेयर उत्सर्जन की सीमा तय करने का आधार जानने की कोशिश की। लेकिन उनके पास इसका कोई संतोषजनक उत्तर नहीं है। असल में यूरोप के देशों में किसानों की संख्या कुल आबादी का बहुत छोटा हिस्सा है और हम राजनीतिक नतीजों को प्रभावित करने में बहुत सक्षम नहीं है। इसी के चलते यूरोप के किसानों को अव्यावहारिक पर्यावरण कानूनों का सामना करना पड़ रहा है।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/06/image_750x500_665af8e032f31.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ वर्ल्ड मिल्क डेः भारत पूरी कर सकता है बढ़ते ग्लोबल डेयरी मार्केट की मांग- पियरक्रिस्टियानो ब्रेजले ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कृषि इन्फ्रास्ट्रक्चर और वितरण में बड़े निवेश की जरूरतः अनुपम कौशिक]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/huge-investments-needed-in-agri-infrastructure-and-distribution-says-unupom-kausik.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 26 May 2024 10:16:31 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/huge-investments-needed-in-agri-infrastructure-and-distribution-says-unupom-kausik.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">कृषि क्षेत्र में होने वाले निवेश में कम वृद्धि, विशेषकर मूल्य-संवर्धन और प्रसंस्करण में, इस सेक्टर की प्रमुख चुनौतियों में से एक है। यह कहना है ओलम इंडिया के वरिष्ठ उपाध्यक्ष अनुपम कौशिक का। भारतीय कृषि की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह एक तरह से भगवान, सरकार और किसान यानी अन्नदाता की त्रिमूर्ति के बीच एक त्रिपक्षीय समझौता है। उन्होंने कहा, कृषि सबसे बड़ा नियोक्ता है जिसमें लगभग 50% आबादी शामिल हैं। लेकिन सिर्फ गुजारे से वाणिज्यिक स्तर की ओर बढ़ने के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर और वितरण के मामले में भारी निवेश की आवश्यकता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">हाल ही नई दिल्ली स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में रूरल वॉयस और भारत कृषक समाज द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित &lsquo;अमृत काल में कृषि&rsquo; पर एक दिवसीय सम्मेलन में कौशिक ने यह बात कही। &lsquo;मार्केट एंड मार्केट प्लेस&rsquo; विषय पर बोलते हुए उन्होंने भारतीय कृषि की परिस्थिति पर प्रकाश डाला। उन्होंने जमीनी स्तर पर किसानों को परेशान करने वाले मुद्दों का भी जिक्र किया।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">1960 और 1970 के दशक की हरित क्रांति का उल्लेख करते हुए कौशिक ने कहा, कृषि क्षेत्र कमी की स्थिति से सरप्लस की स्थिति में पहुंच गया है। 1970 के दशक में ऑपरेशन फ्लड/श्वेत क्रांति ने दूध की कमी वाले भारत को दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश बना दिया। 1986-87 में लांच की गई पीली क्रांति/ऑपरेशन गोल्डन फ्लो से सरसों और तिल जैसे खाद्य तेलों का उत्पादन बढ़ा। उसके बाद 1991 से 2003 तक स्वर्णिम क्रांति हुई जिसमें बागवानी और शहद आदि का उत्पादन बढ़ा।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">उन्होंने कृषि क्षेत्र की कुछ प्रमुख चुनौतियों की भी पहचान की। इनमें छोटी होती जोत, बड़े पैमाने पर कृषि मशीनीकरण की बाधाएं, मानसूनी बारिश पर निर्भरता (खेती का लगभग 50% क्षेत्र वर्षा पर आधारित) और अत्यधिक पूंजी-गहन सिंचाई परियोजनाएं शामिल हैं। दस लाख हेक्टेयर में सिंचाई के लिए लगभग चार अरब डॉलर का खर्च आता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">उन्होंने यह भी कहा कि मूल्य संवर्धन और प्रसंस्करण उद्योगों में निवेश धीमी गति से हो रहा है। इसके अलावा, भूमि एक राष्ट्रीय संसाधन है जबकि कृषि राज्य का विषय है। बेहतर विकास के लिए केंद्र और राज्यों के बीच मजबूत समन्वय की आवश्यकता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कम मूल्यवर्धन का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, यहां से निर्यात प्रमुख रूप से कच्चे रूप में होता है। केवल 2-5% निर्यात मूल्यवर्धित रूप में किया जाता है। उन्होंने कहा कि फसल कटाई के बाद भारी नुकसान 5% से 30% तक होने वाला नुकसान कृषि क्षेत्र पर भारी पड़ रहा है। कौशिक ने कहा कि कृषि क्षेत्र की स्थिति पूरे विश्व स्तर पर समस्याग्रस्त है, लेकिन भारत में स्थिति अधिक गंभीर है क्योंकि आबादी का एक बड़ा भाग इसमें लगा हुआ है। इस वजह से अर्थनीति राजनीति बन जाती है। उन्होंने कहा कि कृषि संबंधी मुद्दों पर केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय की कमी, असंतुलित निवेश और कम या नकारात्मक रिटर्न इस क्षेत्र के विकास में बाधक हैं।</span></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/05/image_750x500_6651f188a1a7e.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ कृषि इन्फ्रास्ट्रक्चर और वितरण में बड़े निवेश की जरूरतः अनुपम कौशिक ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/05/image_750x500_6651f188a1a7e.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[रूरल वॉयस विशेषः कृषि क्षेत्र बनेगा इकोनॉमी का ग्रोथ इंजन]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/making-agriculture-indias-growth-engine.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 21 Apr 2024 11:19:11 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/making-agriculture-indias-growth-engine.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत की अर्थव्यवस्था को विकसित बनाने और प्रति व्यक्ति आय को 12 हजार डॉलर तक ले जाने का रास्ता खेत-खलिहानों से होकर ही जाएगा। देश की अर्थव्यवस्था के प्रमुख हिस्सेदार कृषि क्षेत्र की लगातार 4.5 फीसदी की सालाना वृद्धि दर के बिना यह संभव नहीं है। किसान कल्याण के तमाम दावों, नीतियों और आर्थिक उदारीकरण के कदमों के बावजूद देश की 45 फीसदी आबादी को आज भी कृषि क्षेत्र ही रोजगार दे रहा है। कृषि क्षेत्र आर्थिक और रणनीतिक दृष्टि से देश की रीढ़ है और देश का सामाजिक विकास कृषि और किसानों की खुशहाली के बिना संभव नहीं है। इसके लिए कृषि क्षेत्र का मजबूत होना जरूरी है। लेकिन यह रास्ता इतना आसान नहीं है। इसके लिए एक समग्र नीति और उसी के अनुरूप योजनाओं की जरूरत है जो अभी मौजूद नहीं हैं।<br />यह बहुत ही अफसोस की बात है कि देश की अर्थव्यवस्था में सबसे बड़े भागीदार और देश की आबादी के आधे से अधिक हिस्से की आजीविका का आधार कृषि क्षेत्र के लिए अभी कोई नीति ही नहीं है। साल 1998 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए की सरकार के समय एक छोटा दस्तावेज कृषि नीति के रूप में आया था। उसे एक सिनॉप्सिस के रूप में देखा जा सकता है लेकिन वह कोई समग्र नीति नहीं थी। लेकिन यह शुरुआत भी वहीं रुक गई। इसके बाद टुकड़ों-टुकड़ों में कृषि से संबंधित नीतियां बनती गईं और फैसले होते रहे। अमेरिका जैसी दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में जहां 2022 के आंकड़ों के मुताबिक केवल 20 लाख जोत हैं, वहां एक निश्चित अंतराल पर कृषि नीति में बदलाव कर उसे नया रूप दिया जाता है। यूरोपीय यूनियन भी एक निश्चित अंतराल पर अपनी कृषि नीति की समीक्षा करता है। लेकिन भारत में इस पर कोई बात ही नहीं करता, यह कोई मुद्दा ही नहीं है। यहां सबसे अधिक फोकस मार्केटिंग पर रहता है। अगर हम जून, 2020 में लाये गये तीन कृषि कानूनों को देखें तो इनका केंद्र बिंदु केवल कृषि उत्पादों की मार्केंटिंग से जुड़े मुद्दे थे।<br />हमें कृषि में उच्च वृद्धि दर हासिल करने और वाकई कृषि क्षेत्र में मौजूद संभावनाओं का फायदा उठाते हुए उसे देश की इकोनॉमी का ग्रोथ इंजन बनाना है तो हमें मौजूदा किसानों के लिए कृषि नीति नहीं बनानी है, बल्कि किसानों के बच्चों और उनकी अगली पीढ़ी को ध्यान में रखकर कृषि नीति बनानी होगी। इसका उद्देश्य यह हो कि कृषि से दूर हो रहे किसानों को कैसे कृषि क्षेत्र में बनाये रखा जा सके। यह फिलहाल नहीं दिखता है क्योंकि अधिकांश युवा आबादी कृषि के अलावा दूसरे क्षेत्रों में काम करना चाहती है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के पूर्व महानिदेशक डॉ. आर.एस. परोदा लगातार इस बात पर जोर देते हैं कि हमें युवाओं की कृषि में वापसी के लिए नयी सोच तैयार करनी होगी और उनके मुताबिक नीतियां बनाकर लागू करनी होंगी।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/04/image_750x_6624a8a50ca80.jpg" alt="" /></p>
<p><br />पिछले महीने रूरल वॉयस के तीसरे स्थापना दिवस पर आयोजित रूरल वॉयस एग्रीकल्चर कॉन्क्लेव में कृषि को आर्थिक विकास का संवाहक बनाने से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर कृषि क्षेत्र के विशेषज्ञों, नीति-निर्माताओं और किसान प्रतिनिधियों के साथ संवाद हुआ। इस मौके पर अमूल के पूर्व एमडी और इंडियन डेयरी एसोसिएशन के प्रेसीडेंट डॉ. आरएस सोढ़ी ने बड़ी महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने कहा कि जब भी किसान और शहरी उपभोक्ताओं के बीच एक को चुनने की बारी आती है तो नीति-निर्माताओं का झुकाव अक्सर उपभोक्ता की तरफ होता है। शेयर बाजार का सेंसेक्स बढ़ता है तो उसे तरक्की के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है, लेकिन जब सब्जियों या खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ते हैं तो उसे खाद्य महंगाई करार दिया जाता है। वास्तव में, इस सोच और ढर्रे को बदलने की जरूरत है। &nbsp; &nbsp;<br />डॉ. सोढ़ी का कहना है कि अकेले डेयरी सेक्टर में अगले 7-8 साल में एक लाख करोड़ रुपये का निवेश होगा। करीब 12 करोड़ लीटर दूध की प्रोसेसिंग बढ़ेगी तो इससे 72 लाख नए रोजगार के अवसर पैदा होंगे। वर्ष 2023 तक फूड मार्केट तीन गुना से ज्यादा बढ़कर 170 लाख करोड़ रुपये का हो जाएगा। आज उपभोक्ता भी अच्छा खाना चाहते हैं। अच्छी क्वालिटी और पोषण के लिए अधिक दाम चुकाने को भी तैयार हैं। इसलिए किसानों को ऐसी चीजों का उत्पादन बढ़ाना चाहिए जिसकी बाजार में मांग है। हमें किसानों को बाजार की इन संभावनाओं को समझने और इन्हें भुनाने में सक्षम बनाना होगा।<br />असल में कृषि उत्पादन के चार आधार हैं जमीन, पानी, ऊर्जा और श्रम। इनका उपयोग कर बेहतर उत्पादन और उत्पादकता हासिल करने के चार टेक्नोलॉजीकल फैक्टर हैं- जेनेटिक्स, क्रॉप न्यूट्रीशन, क्रॉप प्रोटेक्शन और एग्रोनॉमिक इंटरवेंशन। जमीन के लिए जहां भूमि उपलब्धता अहम है, उतना ही अहम है इसका स्वास्थ्य यानी इसमें उर्वर तत्वों की उपस्थिति और उनका लगातर बेहतर स्तर पर बने रहना। वहीं देश में ठेके पर खेती के बढ़ते चलन को बहुत से एक्सपर्ट मिट्टी के स्वास्थ्य के खराब होने से जोड़ रहे हैं।<br />नाबार्ड के पूर्व चेयरमैन तथा एमसीएक्स के चेयरमैन डॉ. हर्ष कुमार भनवाला के अनुसार अभी 30 फीसदी किसान ऐसे हैं जिनका खेत उनका अपना नहीं है। वे बटाई पर जमीन लेकर खेती करते हैं। कम समय के लिए ठेके पर जमीन लेने वाले बटाईदार जमीन के स्वास्थ को लेकर बहुत संजीदा नहीं रहते क्योंकि उनको लगता है कि इस पर उनका निवेश उनके लिए फायदेमंद नहीं है। ऐसे में लैंड लीज एक्ट को नीतिगत प्राथमिकता में रखने का सुझाव दिया जा रहा है। ऐसा एक्ट जो जमीन के मालिक को यह भरोसा दे सके कि उसके मालिकाना हक पर कोई आंच नहीं आने वाली है और बटाईदार को लंबे समय तक खेती से जमीन उपलब्ध हो सके। नीति आयोग ने एक मॉडल लैंड लीज एक्ट तैयार किया है जो कई साल से ग्रामीण विकास मंत्रालय के पास है, लेकिन राजनीतिक जोखिम के चलते इस पर कोई अमल नहीं हो रहा है।<br />दूसरा बड़ा कारक है पानी। देश के अनेक इलाके अधिक भू जल दोहन के चलते डार्क जोन में तब्दील हो चुके हैं। यह स्थिति हरित क्रांति की कामयाबी वाले क्षेत्रों में अधिक है। इसका उपाय भी नीतिगत स्तर ही मिल सकेगा लेकिन वह एक समग्र नीति के जरिये ही संभव है, जिसमें फसल विविधीकरण से लेकर किसानों को इंसेंटिव और मार्केटिंक का भरोसा निहित हो। जलवायु परिवर्तन के संकट को देखते हुए भी फसल विविधीकरण की तरफ बढ़ना जरूरी है, लेकिन इसमें व्यावहारिक पक्ष को ध्यान में रखना भी जरूरी है।<br />श्रम की बात लगातार हो रही है। देश में युवा बेरोजगारों की फौज खड़ी होती जा रही है लेकिन वह कृषि से दूर भाग रहे हैं। ऐसे में युवाओं को कृषि में रोकने के लिए भविष्य के नीतिगत प्रावधान जरूरी हैं। कृभको के चेयरमैन डॉ. चंद्रपाल सिंह यादव कहते हैं कि आज खेती के प्रति नौजवानों में आकर्षण नहीं है। यह आकर्षण तब बढ़ेगा जब खेती में फायदा दिखेगा। उनका सुझाव है कि युवा कोऑपरेटिव से जुड़कर नई तकनीक से खेती करें, उपज में वैल्यू एडिशन करें तो खुद को रोजगार देने के साथ दूसरों को भी रोजगार दे सकते हैं। इसके लिए सरकार को कोऑपरेटिव का इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने में मदद करनी चाहिए।<br />इसके साथ ही महिलाओं को भी कृषि क्षेत्र में बनाये रखने की संभावनाएं तलाशनी होंगी। अब भी देश के कृषि क्षेत्र में महिला किसानों की बड़ी हिस्सेदारी है। ताजा लेबर फोर्स सर्वे के मुताबिक देश की कामकाजी आबादी का लगभग 45 प्रतिशत कृषि क्षेत्र में काम करता है। एक समय यह स्तर घटकर 42 फीसदी तक आ गया था लेकिन मैन्युफैक्चरिंग में रोजगार के अवसर घटने के चलते यह फिर बढ़ गया है। असल में 1991 में नई औद्योगिक नीति के जरिये आर्थिक उदारीकरण आया तो यह धारणा बहुत मजबूत थी कि देश में औद्योगिक विकास तेज होगा और आबादी का एक बड़ा हिस्सा कृषि को छोड़कर उद्योगों का रुख करेगा, जिसके चलते कृषि पर बोझ कम हो जाएगा और ग्रामीण भारत में लोगों की संख्या घटने से वहां लोगों की आर्थिक स्थिति भी बेहतर होगी।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2024/04/image_750x_6624a8a434335.jpg" alt="" /></p>
<p><br />यह बात सही है कि इस बीच देश में शहरीकरण बढ़ा है और शहरी आबादी का प्रतिशत भी बढ़ा है लेकिन बड़ी संख्या में खेती पर निर्भर लोग कम होंगे, यह सही साबित नहीं हुआ। दूसरी ओर भारत को मैन्यूफैक्चरिंग हब बनाने का सपना पूरा नहीं हुआ है। सरकार मैन्यूक्चरिंग को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 25 फीसदी हिस्सेदारी तक ले जाने के लिए तमाम योजनाएं लागू करती रही है और हर साल लाखों करोड़ रुपये के इंसेंटिव देती रही है। लेकिन यह अब भी 12 से 13 फीसदी पर ही अटकी है। दूसरी ओर कुल कामकाजी लोगों की संख्या की हिस्सेदारी करीब 14 फीसदी तक पहुंचने के बाद लेबर फोर्स सर्वे के मुताबिक अब 11 फीसदी के आसपास है। इकोनॉमिस्ट्स का आकलन है कि छह फीसदी औद्योगिक वृद्धि दर रोजगार अवसरों में केवल एक फीसदी का इजाफा करती। मैन्यूफैक्चरिंग में ऑटोमेशन और तकनीक का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में कृषि क्षेत्र अगर तेजी से बढ़ता है तो यहां रोजगार की अधिक संभावनाएं पैदा होंगी और यह अधिक उत्पादकता वाला रोजगार हो सकता है। साथ ही तकनीक का इस्तेमाल बढ़ने से रोजगार की गुणवत्ता में भी सुधार की बड़ी संभावनाएं कृषि क्षेत्र में हैं।<br />अगला कारक है इनर्जी। इसके लिए जहां किसान बैलों से होने वाली परंपरागत खेती से दूर जा रहा है और ट्रैक्टर समेत तमाम आधुनिक मशीनों का इस्तेमाल करने लगा है। यह बात अलग है कि सभी किसान आधुनिकतम उपकरण नहीं खरीद सकते हैं। ट्रैक्टर, डीजल पंप और पावर ट्यूबवैल अब हर जगह हैं। यही नहीं सोलर पावर का इस्तेमाल कर सिंचाई सुविधाओं का तेजी से विकास हो रहा है। इनर्जी के मामले में किसानों को इसकी दरों में निश्चितता की दरकार है कयोंकि इसकी लागत में बढ़ोतरी का सीधा अर्थ है किसान की उत्पादन लागत में बढ़ोतरी। ऐसे में अगर उसी अनुपात में फसल के दाम नहीं बढ़ते हैं तो किसान घाटे में जाता है।<br />जहां तक टेक्नोलॉजी की बात है तो कृषि उत्पादन और कृषि वृद्धि दर में तकनीक की दृष्टि से जेनेटिक्स की अहमियत सबसे अधिक है। जेनेटिक्स ही तय करते हैं कि बीज की क्या गुणवत्ता है, कैसी उत्पादकता है और वह किस तरह की बीमारियों और कीट से लड़ने की क्षमता रखता है। ऐसे में बीज और प्लांट मैटीरियल को विकसित और परिष्कृत करने के लिए जेनेटिक्स में उपलब्ध पारंपरिक और आधुनिकतम तकनीक का इस्तेमाल करना चाहिए। इसमें अगर जेनेटिक्स मोडिफिकेशन और जीन एडिटिंग जैसी तकनीक का इस्तेमाल बेहतर उत्पादकता और क्रॉप प्रोटेक्शन को सुनिश्चित करता है तो उसे अपनाने में देरी नहीं होनी चाहिए। रूरल वॉयस के साथ एक इंटरव्यू में नीति आयोग के सदस्य प्रोफेसर रमेश चंद ने कहा कि जहां पारंपरिक तकनीक कामयाब नहीं हो रही है उन फसलों में हमें जीएम टेक्नोलॉजी को अपनाना चाहिए।<br />दूसरा अहम फैक्टर है क्रॉप न्यूट्रीशन। इसमें सबसे पहले तो मिट्टी में उर्वर तत्वों को संरक्षित करने और उसकी उर्वरता बढ़ाने के लिए जरूरी उर्वरक, मिनरल्स और फसल पद्धतियों पर फोकस करना होगा। वहीं न्यूट्रीशन के चुनिंदा उत्पादों से आगे जाकर केमिकल और बॉयो फर्टिलाइजर में जो भी उत्पाद और विकल्प उपलब्ध हैं उनका उपयोग करना जरूरी है। इसके लिए नये उत्पादों की मंजूरी और उनकी किफायती उपलब्धता के लिए सब्सिडी नीति में बदलाव की जरूरत पड़ेगी। साथ ही सार्वजनिक या निजी क्षेत्र में जो भी इस दिशा में बेहतर उत्पाद उपलब्ध कराता है उसे मौका दिया जाना चाहिए। वहीं क्रॉप न्यूट्रीशन से आर्थिक फायदे का आकलन किया जाना जरूरी है। अधिक न्यूट्रिशन अगर उत्पादकता और आर्थिक फायदे पर कारगर नहीं है तो उसे हतोत्साहित किया जाना चाहिए। लेकिन यहां नीति को पारदर्शी बनाना होगा।<br />इसके बाद है क्रॉप प्रोटेक्शन। पिछले कई दशकों में फसलों में कीटनाशकों का उपयोग काफी बढ़ा है। साथ ही फसलों की किस्में बीमारियों से प्रभावित होने की दर भी बढ़ी है। इसके लिए इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट को केंद्र में रखकर केमिकल और बॉयो केमिकल दोनों तरह के उत्पादों का उपयोग जरूरी है। लेकिन यह बात भी सही है कि एग्रोकेमिकल मे मॉलिक्यूल विकसित करने में हमारे देश की कंपनियों का रिकॉर्ड बहुत औसत है। अधिकांश निर्भरता विदेशों में विकसित मॉलिक्यूल और वहां से आयातिक मैटीरियल पर है। साथ ही नकली पेस्टीसाइड की एक पैरेलल इंडस्ट्री देश में चल रही है। जिसका खामियाजा किसानों को आर्थिक रूप से और फसल नुकसान दोनों रूप में भुगतना पड़ता है। इस मसले पर भी सरकार को ध्यान देने की जरूरत है। साथ में अगर जीएम किस्मों के जरिये क्रॉप प्रोटेक्शन में कामयाबी मिलती है तो जहां संभव है वहां इसका फायदा लिया जा सकता है।<br />अगला और अहम फैक्टर है एग्रोनॉमिक इंटरवेंशन। इसका दायरा वृहद है। इसमें फसल की लागत के आकलन से लेकर मार्केटिंग के पक्ष को को भी जोड़ा जा सकता है। इस मोर्चे पर हमारे देश में रिसर्च और अध्ययन की कमी को नकारा नहीं जा सकता है। अगर इस पर सही तरीके से अमल होता है तो यह किसानों और कृषि के लिए फायदेमंद होगा। शोध संस्थानों के ट्रॉयल फील्ड की उत्पादन लागत के आंकड़े सामने आने चाहिए और उन किस्मों का किसानों के खेतों में उत्पादन, उत्पादकता और लागत के साथ तुलनात्मक अध्ययन की जरूरत है।<br />कृषि क्षेत्र के विकास और यहां निवेश की संभावनाओं पर भी बात करना जरूरी है। नीति आयोग के सदस्य प्रोफेसर रमेश चंद का कहना है कि 4.5 फीसदी की कृषि विकास दर के जरिये ही 2047 तक भारत विकसित राष्ट्र का सपना पूरा कर सकता है। ऐसे में सरकार के सामने एक बेहतर मौका है कि वह कृषि को केंद्र में रखकर अपनी आर्थिक नीतियां तय करे। हालांकि अभी ऐसा नहीं हो रहा है लेकिन ऐसा करना जरूरी है क्योंकि कृषि क्षेत्र में बड़ी संभावनाएं मौजूद हैं जो देश के विकास की गति को तेज कर सकती हैं। लेकिन उसके लिए कृषि क्षेत्र से जुड़ी नीतियों में बदलाव करना होगा और निवेश के लिए बेहत मौके पैदा करने होंगे।<br />चिंताजनक बात यह है कि कृषि क्षेत्र में निवेश करने में निजी कारपोरेट क्षेत्र की दिलचस्पी बहुत कम है और यह तीन फीसदी से भी कम है। कृषि क्षेत्र में अधिकांश निवेश या तो सार्वजनिक निवेश है फिर किसानों का खुद का निवेश है। यह स्थिति कृषि के विकास के पहिये को तेज नहीं कर सकती है। केंद्र और राज्य सरकारें अपने बजट में कृषि क्षेत्र के लिए आवंटित राशि का बड़ा हिस्सा इनकम सपोर्ट या सब्सिडी के रूप में दे रही हैं, वहीं कैपिटल एक्सपेंडिचर इनका खर्च नगण्य है। चालू साल के केंद्रीय बजट में कृषि के लिए कैपिटल एक्सपेंडिचर 100 करोड़ रुपये से भी कम है जबकि सरकार ने 11.11 लाख करोड़ रुपये के कैपिटल एक्सपेंडिचर का प्रावधान किया है। इसका सबसे बड़ा हिस्सा ढांचागत सुविधाओं के विकास पर जा रहा है। यही नहीं एग्रीकल्चर रिसर्च और एजुकेशन पर सरकार का खर्च या तो स्थिर है या कम हो रहा है।<br />सहकार भारती के राष्ट्रीय अध्यक्ष डीएन ठाकुर किसानों की पूंजी की समस्या को दूर करने के लिए सॉवरिन फंड बनाने की वकालत करते हैं। इस फंड के जरिए बैंकों को गारंटी दी जाए ताकि वे किसानों को आसानी से कर्ज दे सकें। उनका कहना है कि गांव के स्तर पर सहकारी संस्थाओं को इतना समर्थ बना दिया जाए कि वह अपने सदस्य - हर किसान के एक-एक दाने की खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कर सकें और किसानों को उपज बेचने में परेशानी न हो। इतने बड़े देश में कोऑपरेटिव के अलग-अलग मॉडल अपनाने की जरूरत है। &nbsp;<br />यहां जिन मुद्दों को केंद्र में रखा गया है वह सब एक समग्र कृषि नीति का हिस्सा होंगे तो कृषि क्षेत्र की आर्थिक संभावनाओं का फायदा उठाया जा सकेगा। उत्पादन के बराबर ही अहमियत कृषि उत्पादों के मूल्य और मार्केटिंग ढांचे की है। इसके लिए किसान की आय को केंद्र में रखने की जरूत है। घरेलू उत्पादन, बाजार में उपलब्धता, कीमतें और आयात-निर्यात के फैसलों के केंद्र में उपभोक्ता को रखने की नीति को बदलने की जरूरत है। यहां सबसे चर्चित मुद्दे न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के मामले में यह सोच अपनानी होगी कि किसानों को यह दाम कैसे दिया जाए।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ रूरल वॉयस विशेषः कृषि क्षेत्र बनेगा इकोनॉमी का ग्रोथ इंजन ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[किसानों के लिए सॉवरिन फंड बनाने की वकालत, मिले बैंक लोन की गारंटी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/advocacy-of-creating-sovereign-fund-for-farmers-guarantee-of-bank-loan.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 30 Dec 2023 15:45:43 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/advocacy-of-creating-sovereign-fund-for-farmers-guarantee-of-bank-loan.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>सहकार भारती के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. डीएन ठाकुर ने किसानों की पूंजी की समस्या को दूर करने के लिए सॉवरिन फंड बनाने की वकालत की है। इस फंड के जरिये बैंकों को गारंटी दी जाए ताकि वे किसानों को आसानी से कर्ज दे सकें। रूरल वॉयस एग्रीकल्चर कॉन्क्लेव एवं नेकॉफ अवार्ड 2023 कार्यक्रम में उन्होंने इसकी वकालत की। &nbsp;&nbsp;&nbsp;</p>
<p>नई दिल्ली में आयोजित इस कार्यक्रम के &ldquo;फार्मर्स कलेक्टिव एंड न्यू राइजिंग सेक्टर्स इन एग्रीकल्चर&rdquo; सत्र को संबोधित करते हुए डॉ. डीएन ठाकुर ने कहा, &ldquo;किसानों की पूंजी की समस्या को दूर करने के लिए सरकार बैंकों को सॉवरिन गारंटी दे और उससे कहे कि किसानों को आसानी से लोन दो। इस फंड के जरिये सरकार बैंकों को यह भरोसा दे कि उसका एक-एक पैसा सुरक्षित रहेगा। अगर डिफॉल्ट होता है तो सरकार इसकी गारंटी लेती है। कर्ज लेने की जो प्रक्रियात्मक बाधाएं हैं उसको खत्म करने की जरूरत है।&rdquo;</p>
<p>उन्होंने कहा कि खाद्य सुरक्षा, फर्टिलाइजर सब्सिडी सहित किसानों की अन्य योजनाओं के लिए केंद्र सरकार सालाना करीब 15-16 लाख करोड़ रुपये खर्च करती है। इसमें अगर राज्यों की योजनाओं का भी पैसा जोड़ दिया जाए तो यह करीब 30-40 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच जाएगा। उन्होंने सुझाव दिया कि इन सब योजनाओं को एक में ही समाहित कर किसानों के लिए एक सॉवरिन फंड बना दिया जाए और इस पर जो रिटर्न मिलेगा उससे किसानों के एक-एक लोन की गारंटी हो जाएगी।</p>
<p>उन्होंने कहा कि हर गांव में किसानों की कोऑपरेटिव बननी चाहिए। इसके जरिये किसानों को फसल उत्पादन से लेकर फसल की बिक्री करने तक में मदद मिलेगी। उन्होंने कहा कि कॉरपोरेट को गांव में सीधे निवेश नहीं करना चाहिए, बल्कि गांव को कोऑपरेटिव के जरिये निवेश को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। साथ ही कोऑपरेटिव को इतना समर्थ बना दिया जाए कि वह अपने प्रत्येक सदस्य के एक-एक दाने की खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर कर सके और उन्हें अपनी उपज बेचने में परेशानी न हो। यह तभी सुनिश्चित होगा जब &nbsp;हर गांव में कोऑपरेटिव बन जाएगा।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/12/image_750x_6587e88f776dd.jpg" alt="" /></p>
<p>उन्होंने कहा कि कोऑपरेटिव तब तक सफल नहीं होंगे जब तक लोगों में सामूहिकता की भावना नहीं आएगी। प्राइमरी लेवल पर किसानों की इस संस्था को किसानों का ही रहने दिया जाए और उसके हाथ में पैसा दिया जाए, क्योंकि बिना पैसे के तो कुछ नहीं हो सकता। वह पैसा बैंक दे। इससे बैंकों का कारोबार भी बढ़ेगा और कोऑपरेटिव भी मजबूत होंगे।</p>
<p>उन्होंने कृषि और ग्रामीण क्षेत्र की भविष्य की समस्याओं पर चिंता जताते हुए कहा कि खाद्य सुरक्षा सबसे बड़ी चिंताओं में से एक है। उन्होंने सवाल उठाया कि आज भारत खाद्य सुरक्षा में आत्मनिर्भर है लेकिन क्या भविष्य में भी यह सुरक्षा बनी रहेगी। इसी तरह, विकास के लिए जरूरी ऊर्जा सुरक्षा क्या हमेशा मिलती रहेगी। उन्होंने कहा कि भविष्य के लिए पानी और बेरोजगारी की समस्या भी एक बड़ी चुनौती है। इन समस्याओं का समाधान सिर्फ सरकार नहीं कर सकती है, बल्कि सामूहिकता के जरिये इनका हल निकाला जा सकता है। इसके लिए कोऑपरेटिव को समर्थन देने की जरूरत है।</p>
<p>डॉ. ठाकुर के मुताबिक, इतने बड़े देश में एक मॉडल नहीं, बल्कि अलग-अलग मॉडल अपनाने की जरूरत है। ऐसे मॉडल की जरूरत है जिसके जरिये किसानों को आसानी से लोन मिल सके, बैंक गारंटी मिल सके और हर गांव में कोऑपरेटिव के जरिये किसानों की उपज खरीदने की व्यवस्था हो सके।&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ किसानों के लिए सॉवरिन फंड बनाने की वकालत, मिले बैंक लोन की गारंटी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[गांवों में अच्छी कनेक्टिविटी से ही बढ़ेगी कृषि क्षेत्र की ग्रोथः डॉ. हर्ष भानवाला]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/growth-of-agriculture-sector-will-increase-only-with-good-connectivity-in-villages-said-harsh-bhanwala.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 27 Dec 2023 06:50:05 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/growth-of-agriculture-sector-will-increase-only-with-good-connectivity-in-villages-said-harsh-bhanwala.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>एमसीएक्स के चेयरमैन और नाबार्ड के पूर्व चेयरमैन डॉ. हर्ष कुमार भानवाला ने कहा है कि 2047 तक विकसित भारत बनाने के लिए कृषि का ग्रोथ बढ़ाना जरूरी है। कृषि को बढ़ाने के लिए गांवों में अच्छी कनेक्टिविटी की जरूरत है। रूरल वॉयस के तीसरे स्थापना दिवस पर आयोजित रूरल वॉयस एग्रीकल्चर कॉन्क्लेव एंड नेकॉफ अवार्ड, 2023 के &ldquo;इन्वेस्टमेंट एंड जॉब ऑपर्च्युनिटीज इन रूरल एरियाज&rdquo; सत्र को संबोधित करते हुए उन्होंने ये बातें कही हैं।</p>
<p>डॉ. भानवाला ने कहा कि आज हम कृषि को सिर्फ कृषि के तौर पर नहीं देख सकते। अगर कृषि को विकसित बनाना है तो और कई चीजों का विकास करना पड़ेगा। 2047 तक विकसित भारत बनाने के लिए कृषि का ग्रोथ बढ़ाना जरूरी है। इसके लिए गांवों में अच्छी सड़कें, पानी, बिजली, मार्केट (मंडी), डिजिटल प्लेटफॉर्म और इंटरनेट की बेहतर कनेक्टिविटी की जरूरत है। उन्होंने कहा कि आज का युवा इंटरनेट पर हर चीज का आर्डर देता है, चाहे वह ग्रामीण क्षेत्र का ही क्यों न हो। इंटरनेट के माध्यम से फूड कंजप्शन बढ़ रहा है। इस क्षेत्र में बहुत अवसर हैं। यह ऐसा क्षेत्र है जो रोजगार दे सकता है।</p>
<p>उन्होंने कहा कि कई राज्यों के ग्रामीण इलाकों में कनेक्टिविटी की समस्या है। जब तक गांव में इंटरनेट की अच्छी कनेक्टिविटी नहीं होगी 2047 तक कृषि के विकास की योजना अधूरी रहेगी। बंटाईदारी का मसला उठाते हुए उन्होंने कहा कि सभी राज्यों को मिलकर इस पर निर्णय करना पड़ेगा। अभी करीब 30% किसान ऐसे हैं जिनके पास अपना खेत नहीं है और वे बंटाई या लीज पर खेती करते हैं। ऐसे किसान कृषि में निवेश क्यों करेंगे। उन्हें मालूम है कि साल-दो साल या तीन साल बाद जमीन मालिक किसी और को अपना खेत बंटाई पर दे देगा। इस स्थिति को बदलने के लिए उन्होंने राज्यों को कानून बनाने का सुझाव दिया ताकि खेत के मालिक का हक बना रहे और बंटाईदार को भी फायदा हो।</p>
<p>उन्होंने कहा कि कृषि में मशीनरी का प्रयोग बढ़ा है। कृषि के सभी कार्यकलापों के लिए नई-नई मशीनें आ गई हैं जो महंगी हैं। किसान हर तरह की मशीनें खरीद नहीं सकता। ऐसे में &nbsp;मैकेनाइज्ड सर्विस में रोजगार के बड़े अवसर हैं। इसमें कॉरपोरेट को निवेश करना चाहिए। आने वाले दिनों में कृषि में श्रमिकों की कमी होगी, इसलिए मैकेनाइज्ड सर्विस में मांग बढ़ने की पूरी संभावना है।</p>
<p>उन्होंने यह भी कहा कि हमें पर्यावरण को बचाना भी जरूरी है। आज शहरों को तो छोड़िए गांव में भी सांस लेना मुश्किल हो गया है, खासकर शहरों के आस-पास के गावों में। कृषि से जुड़े पर्यावरण में निवेश करना जरूरी है। जब निवेश होगा तो अवसर भी मिलेंगे। इसके अलावा स्किल डेवलपमेंट में भी निवेश की जरूरत है।</p>
<p>डॉ. भानवाला ने कहा कि कोऑपरेटिव और पंचायती राज की संस्थाओं में बदलाव लाने और उनमें प्रत्येक किसान की भागीदारी बढ़ाने की जरूरत है। जब तक किसानों की भागीदारी सुनिश्चित नहीं होगी, कोई भी तकनीक आ जाए, कोई भी योजना बन जाए, व्यवस्था बदलेगी नहीं। पर्यावरण और निवेश के साथ-साथ हमें नजरिये, नीतियों और अपनी संस्थाओं में लोगों की भागीदारी के साथ बदलाव लाने की जरूरत है। &nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ गांवों में अच्छी कनेक्टिविटी से ही बढ़ेगी कृषि क्षेत्र की ग्रोथः डॉ. हर्ष भानवाला ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[डेयरी में 7 साल में होगा एक लाख करोड़ का निवेश, 72 लाख नए रोजगार मिलेंगे, 170 लाख करोड़ का होगा फूड मार्केटः आरएस सोढ़ी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/farmers-should-produce-those-products-whose-demand-is-going-to-increase-said-amul-ex-md-rs-sodhi.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 26 Dec 2023 07:24:01 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/farmers-should-produce-those-products-whose-demand-is-going-to-increase-said-amul-ex-md-rs-sodhi.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>इंडियन डेयरी एसोसिएशन (आईडीए) के प्रेसीडेंट और अमूल के पूर्व मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. आरएस सोढ़ी ने कहा है कि अकेले डेयरी सेक्टर में अगले 7-8 साल में 1 लाख करोड़ रुपये का निवेश होगा। इससे इस सेक्टर में 72 लाख नए रोजगार के अवसर पैदा होंगे। इसके अलावा, फिशरीज, पॉल्ट्री और लाइवस्टॉक के क्षेत्र में भी निवेश बढ़ेगा। ये क्षेत्र तेजी से बढ़ रहे हैं। वर्ष 2030 तक खाने के सामान का बाजार तीन गुना से ज्यादा बढ़कर 170 लाख करोड़ रुपये का हो जाएगा। अभी यह बाजार 50 लाख करोड़ रुपये का है। इसलिए किसानों को उन्हीं के उत्पादन पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जिनकी मांग भविष्य में बढ़ने वाली है।&nbsp;</p>
<p>नई दिल्ली में रूरल वॉयस एग्रीकल्चर कॉन्क्लेव को संबोधित करते हुए अमूल के पूर्व एमडी ने कहा कि <span>अगले </span>7-8 <span>वर्षों के दौरान डेयरी सेक्टर में एक लाख करोड़ रुपये का निवेश होगा। इससे संगठित क्षेत्र में दूध की रोजाना प्रोसेसिंग बढ़कर 24 करोड़ लीटर हो जाएगी। अभी संगठित क्षेत्र में रोजाना 12 करोड़ लीटर दूध की प्रोसेसिंग होती है। </span><span>जहां तक नौकरियों की बात है तो संगठित क्षेत्र में जब एक लाख लीटर दूध की प्रोसेसिंग होती है, तो उससे </span>6000 <span>लोगों को रोजगार मिलता है। ऐसे में </span>12 <span>करोड़ लीटर दूध की प्रोसेसिंग बढ़ेगी तो </span>72 <span>लाख नौकरियां निकलेंगी।</span></p>
<p><span>उन्होंने कहा कि आज दूध का उत्पादन 10 गुना, पॉल्ट्री का 23 गुना, फिशरीज का 12 गुना और फल-सब्जी का 5.5 गुना उत्पादन बढ़ चुका है। 50 साल पहले देश में 2.4 करोड़ टन दूध का उत्पादन होता था, आज यह 23.1 करोड़ टन पर पहुंच गया है। 2047 तक इसके 62.8 करोड़ टन तक पहुंच जाने का अनुमान है। अभी प्रति व्यक्ति दूध की खपत 460 ग्राम है। इसके 2047 में 850 ग्राम तक पहुंचने का अनुमान है।</span></p>
<p>उन्होंने बताया कि कृषि बाजार अभी लगभग 50 <span>लाख करोड़ रुपये का है। इसमें संगठित क्षेत्र </span>7 <span>लाख करोड़ रुपये का है। इसमें भी आधा करीब</span> 3.5 <span>लाख करोड़ रुपये का संगठित बाजार दूध का है। वर्ष </span>2030 <span>तक खाने के समान का बाजार </span>170 <span>लाख करोड़ रुपए का हो जाएगा। उन्होंने कहा कि दुग्ध क्षेत्र का विकास इसलिए हुआ क्योंकि इसमें किसान और उपभोक्ता दोनों फायदे की स्थिति में थे। आज ब्रांडेड फूड मार्केट महानगरों में ही नहीं</span>, <span>बल्कि टियर </span>2 <span>और टियर </span>3 <span>शहरों में भी फैल रहा है</span>, <span>खासकर छोटे पैक में। यहां यह देखने की बात है कि उपभोक्ता अच्छी क्वालिटी के लिए </span>10 <span>से </span>20% <span>प्रीमियम तो दे देता है</span>, <span>लेकिन उससे अधिक प्रीमियम होने पर प्रॉडक्ट में वैल्यू तलाशता है।</span></p>
<p>उन्होंने कहा कि आज ग्राहकों में ज्यादा से ज्यादा प्रोटीन, <span>फैट और एनीमल सोर्स वाले उत्पादों की मांग बढ़ रही है। इसलिए किसानों को उसका उत्पादन बढ़ाना चाहिए जिसकी बाजार में मांग हो। उन्होंने कहा कि अगर आपके उत्पाद में टेस्ट एवं न्यूट्रिशन होगा और वह बजट में रहेगा, तो उनकी मांग हमेशा बनी रहेगी। यह बाजार की सालों पुरानी परंपरा है जो आज भी कायम है और आने वाले समय में भी रहेगी।</span></p>
<p>सोढ़ी ने किसानों तथा कृषि के सामने आने वाली चुनौतियों के बारे में भी बताया। उन्होंने कहा कि क्रॉस ब्रीड की गायें 8.5 <span>लीटर दूध देती हैं</span>, <span>जबकि स्थानीय नस्ल की गाय </span>3.5 <span>से </span>4 <span>लीटर दूध देती है। किसान को सोचना होगा कि वह कौन सी नस्ल की गाय रखें।</span>&nbsp;</p>
<p>उन्होंने कहा कि एक और चुनौती सस्टेनेबिलिटी की है। इन दिनों कृषि क्षेत्र में सस्टेनेबिलिटी को लेकर काफी बातें की जा रही हैं। हकीकत यह है कि जलवायु परिवर्तन का इस्तेमाल विकसित देश विकासशील देशों को रोकने के लिए कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि सस्टेनेबिलिटी तभी सफल होगी जब व्यक्ति का पेट भरा होगा।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/12/image_750x500_65896d228f6f3.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ डेयरी में 7 साल में होगा एक लाख करोड़ का निवेश, 72 लाख नए रोजगार मिलेंगे, 170 लाख करोड़ का होगा फूड मार्केटः आरएस सोढ़ी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/12/image_750x500_65896d228f6f3.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कृषि क्षेत्र के तीन महत्वपूर्ण स्तंभों को दुरुस्त करने की दरकार, एमएसपी की मांगों से आगे बढ़ें किसान संगठन]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/need-to-repair-three-important-pillars-of-the-agriculture-sector-farmer-organizations-should-move-ahead-with-the-demands-of-msp.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 25 Dec 2023 14:52:17 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/need-to-repair-three-important-pillars-of-the-agriculture-sector-farmer-organizations-should-move-ahead-with-the-demands-of-msp.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>कृषि क्षेत्र की विकास दर को बढ़ावा देने के लिए इसके तीन महत्वपूर्ण स्तंभों को दुरुस्त करने की दरकार है जो दरक गए हैं। किसान संगठनों को एमएसपी की मांग से आगे बढ़ने की जरूरत है। साथ ही खेती में युवाओं को बनाए रखने के लिए स्मार्ट फार्मिंग की जरूरत है। जब तक कृषि में समावेशी विकास नहीं होगा तब तक टोटल ग्रोथ नहीं बढ़ेगा। इसके लिए तकनीक आधारित खेती को बढ़ावा देने की जरूरत है। रूरल वॉयस एग्रीकल्चर कॉन्क्लेव में पैनलिस्टों द्वारा ये विचार रखे गए।</p>
<p>रूरल वॉयस के स्थापना दिवस पर 23 दिसंबर को नई दिल्ली में आयोजित इस कॉन्क्लेव के तीसरे और अंतिम सत्र का विषय &ldquo;गवर्नेंस एजेंडा फॉर एग्रीकल्चर एंड फार्मिंग फॉर 2024-29&rdquo; था। इस सत्र को संबोधित करते हुए एग्री स्टार्टअप समुन्नति एग्रो के डायरेक्टर प्रवेश शर्मा ने कहा कि आजादी के बाद हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि खाद्य सुरक्षा को हासिल करना है। आज की पीढ़ी इस महत्वपूर्ण उपलब्धि को समझ नहीं पा रही है। हमने बिना किसी विदेशी सहायता के अपने संसाधनों पर यह उपलब्धि हासिल की है। 1950 में देश में 5 करोड़ टन अनाज पैदा होता था जो आज बढ़कर 33 करोड़ टन से भी ज्यादा हो गया है।</p>
<p>उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि कृषि क्षेत्र के तीन महत्वपूर्ण स्तंभ आज हिल गए हैं। इसे दुरुस्त करने की जरूरत है। इन स्तंभों में खाद्य सुरक्षा को राष्ट्रीय स्तर पर प्राथमिकता देना, इकोसिस्टम अप्रोच (रिसर्च सिस्टम, बीज वितरण, एमएसपी पर फसलों की खरीद, पीडीएस के जरिये उनका वितरण) को बढ़ावा देना और केंद्र एवं राज्यों के बीच सामंजस्य स्थापित करना शामिल है। उन्होंने कहा कि जब तक इन तीनों स्तंभों को &nbsp;ठीक नहीं किया जाएगा, कृषि क्षेत्र में इन्क्लूसिव ग्रोथ को पाना मुश्किल होगा।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/12/image_750x_65894910f0482.jpg" alt="" /></p>
<p>भारत कृषक समाज के अध्यक्ष अजय वीर जाखड़ ने सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि सिर्फ फसलों का एमएसपी ही किसानों की समस्याओं का हल नहीं है। किसान नेताओं को सी2 लागत + 50 फीसदी मुनाफे पर एमएसपी की मांग से आगे बढ़ना चाहिए। उन्हें सिर्फ दाम नहीं मांगना चाहिए, बल्कि मुनाफे पर भी ध्यान देना चाहिए। साथ ही जीवन की बेहतरी के अन्य मुद्दों जैसे सस्ती शिक्षा और सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं के लिए भी आंदोलन करना चाहिए। उन्होंने पंजाब का उदाहरण देते हुए कहा कि पंजाब में किसानों से धान और गेहूं की पूरी फसल की खरीद एमएसपी पर होती है और भुगतान भी 15 दिन के भीतर हो जता है। इसके बावजूद पंजाब में सबसे ज्यादा किसान आंदोलन होते हैं।</p>
<p>उन्होंने सवाल उठाया कि किसान संगठन अपनी मांगों को लेकर राज्य सरकारों के खिलाफ आंदोलन क्यों नहीं करते हैं? कृषि राज्य का विषय है, तो सबसे पहले उन्हें अपनी मांगें राज्य सरकारों के पास रखनी चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि भावांतर जैसी योजनाओं की खामियों को दूर कर किसानों को समर्थन दिए जाने की जरूरत है। &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/12/image_750x_658949218ffd2.jpg" alt="" />&nbsp;&nbsp;&nbsp;</p>
<p>राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के राष्ट्रीय संयोजक सरदार वीएम सिंह ने कहा कि किसानों को जात बिरादरी छोड़कर पहले किसान बनना चाहिए। आज किसान देश का पेट पालता है लेकिन खुद कर्ज में डूबा हुआ है और खुदकुशी करता है। किसानों को सरकार से लागत का डेढ़ गुना दाम की गारंटी के साथ-साथ आवारा पशुओं से भी निजात की गारंटी चाहिए। अगर खेती को उन्नत बनाना है तो सबको मिलकर किसान को ऊपर उठाना पड़ेगा।</p>
<p>आईपीएल सेंटर फॉर रूरल आउटरीच (इकरो) के परियोजना प्रमुख और वरिष्ठ आईएएस अधिकारी डॉ. राजीव रंजन ने कहा कि खेती में युवाओं को बनाए रखने के लिए स्मार्ट फार्मिंग को अपनाने की जरूरत है। पिछले 10 साल में फिशरीज की ग्रोथ 12-13 फीसदी, पॉल्ट्री की 9-10 फीसदी रही है, लेकिन एग्रीकल्चर ग्रोथ 3-4 फीसदी ही रही है। जब तक कृषि में इन्क्लूसिव ग्रोथ नहीं होगा टोटल ग्रोथ नहीं बढ़ेगा। इसके लिए तकनीक आधारित खेती को बढ़ावा देने और तकनीक को किसानों तक पहुंचाने की जरूरत है।</p>
<p>इस सत्र का संचालन इंडियन एक्सप्रेस के रूरल अफेयर्स एडिटर हरीश दामोदरन ने किया।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/12/image_750x500_65894901a6100.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ कृषि क्षेत्र के तीन महत्वपूर्ण स्तंभों को दुरुस्त करने की दरकार, एमएसपी की मांगों से आगे बढ़ें किसान संगठन ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कृषि में कोऑपरेटिव को बढ़ावा देना जरूरी,  कलेक्टिव खेती से होगा फायदा]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/it-is-necessary-to-promote-cooperative-in-agriculture-collective-farming-will-be-beneficial.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 24 Dec 2023 13:46:00 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/it-is-necessary-to-promote-cooperative-in-agriculture-collective-farming-will-be-beneficial.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर को तेज करने और किसानों की आर्थिक उन्नति के लिए कोऑपरेटिव को बढ़ावा देना जरूरी हो गया है। कलेक्टिव खेती के जरिये इस लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है। रूरल वॉयस एग्रीकल्चर कॉन्क्लेव एवं नेकॉफ अवार्ड्स 2023 कार्यक्रम में शामिल पैनलिस्टों ने अपने विचार रखते हुए यह बात कही।&nbsp;&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कार्यक्रम के दूसरे सत्र जिसका विषय &ldquo;फार्मर्स कलेक्टिव एंड न्यू राइजिंग सेक्टर्स इन एग्रीकल्चर&rdquo; था, में कृभको के चेयरमैन डॉ. चंद्रपाल सिंह यादव ने कहा, "आज खेती के प्रति नौजवानों में आकर्षण नहीं है। आज किसान का बेटा चपरासी बनना तो पसंद करता है लेकिन वह खेती नहीं करना चाहता। खेती के प्रति के आकर्षण तभी बढ़ेगा जब इसमें फायदा दिखेगा। हम किसी भी व्यवसाय में देखें तो व्यवसायी पूरे साल की बैलेंस शीट बनाता है, लेकिन अगर किसान अपनी बैलेंस शीट बनाए तो हमेशा घाटे की बैलेंस शीट बनेगी।"&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">उन्होंने सुझाव दिया कि किसान अगर कलेक्टिव खेती करे तो उससे फायदा हो सकता है। सरकार ने इस दिशा में एफपीओ बनाकर कदम उठाए हैं। इससे किसानों को फायदा हो रहा है। उन्होंने कहा कि कृषि को संगठित रूप देने के लिए कोऑपरेटिव बड़ी भूमिका निभा सकता है। आज किसानों को अच्छे बीज, फर्टिलाइजर, कीटनाशक तथा अन्य अनेक चीजों की आवश्यकता है। कोऑपरेटिव से खरीदने पर किसान को क्वालिटी या कीमत की चिंता नहीं करनी पड़ती है। कोऑपरेटिव के माध्यम से कर्ज भी दिया जा रहा है। उपज को एमएसपी पर सबसे ज्यादा कोऑपरेटिव के माध्यम से ही खरीदा जा रहा है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">उन्होंने कहा कि युवा कोऑपरेटिव से जुड़कर नई तकनीक से खेती करें। कृषि में वैल्यू एडिशन से युवा खुद को रोजगार देने के साथ दूसरों को भी रोजगार दे सकेंगे। इसके लिए हमें कोऑपरेटिव का इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने में मदद करनी चाहिए। देश में 8 लाख कोऑपरेटिव सोसाइटी हैं जिनसे लाखों किसान जुड़े हुए हैं। सहकारिता मंत्रालय के गठन से इसे प्राथमिकता मिली है। हर पंचायत में कोऑपरेटिव सोसाइटी बनाने का फैसला किया गया है। नौजवान उनके साथ आगे बढ़ सकते हैं। कोऑपरेटिव सोसाइटी में 40 प्रकार के काम होंगे। यह युवाओं के लिए भी सुनहरा अवसर है। उन्होंने कहा कि अच्छे बीज उपलब्ध कराने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर कोऑपरेटिव बनाया गया है। इसी तरह निर्यात के लिए भी अलग कोऑपरेटिव का गठन किया गया है। उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में इसका कृषि क्षेत्र को बड़ा फायदा मिलेगा।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">सत्र को संबोधित करते हुए नेशनल शुगर फेडरेशन एनएफसीएसएफ लि. के मैनेजिंग डायरेक्टर प्रकाश नायकनवरे ने कहा कि अगर किसी क्षेत्र में कोऑपरेटिव शुगर मिल लगता है, तो उस क्षेत्र के 20 हजार किसान इसके सदस्य होते हैं। ये किसान न सिर्फ उस मिल को अपना गन्ना बेचते हैं, बल्कि वे इसके मालिक भी होते हैं। चीनी सहित अन्य उत्पाद बनाने से मिल को जो मुनाफा होता है उसे इन किसानों में बांटा जाता है। इससे उन्हें दोहरी कमाई होती है। उन्होंने कहा कि आज शुगर मिलें न सिर्फ चीनी उत्पादन करती हैं, बल्कि एथेनॉल, सीएनजी, सीबीजी भी बनाती हैं जिससे उनकी कमाई में इजाफा हुआ है और इसका फायदा किसानों को भी मिल रहा है। इससे किसानों को गन्ने का भुगतान समय पर करने में आसानी हुई है।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">नेशनल प्रोडक्टिवटी काउंसिल के पूर्व डायरेक्टर जनरल और राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (एनसीडीसी) के पूर्व मैनेजिंग डायरेक्टर संदीप नायक ने कहा कि जलवायु परिवर्तन आज कृषि एवं संबंधित क्षेत्र के लिए बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। इस चुनौती से निपटने के लिए फार्मर्स कलेक्टिव को मजबूत बनाने की जरूरत है। यह उभरता हुआ क्षेत्र है और इसमें काफी अवसर हैं। चाहे एफपीओ हों, कोऑपरेटिव हो या फिर स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) हों, इनके जरिये प्रोडक्टिविटी और एफिशिएंसी बढ़ाने की काफी गुंजाइश है। बढ़ती आबादी को देखते हुए प्रोडक्टिविटी बढ़ाना बड़ी चुनौती है जिसका समाधान कलेक्टिव फार्मिंग के जरिये किया जा सकता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">सहकार भारती के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. डी.एन. ठाकुर ने कृषि और ग्रामीण क्षेत्र की भविष्य की समस्याओं पर चिंता जताते हुए कहा कि खाद्य सुरक्षा सबसे बड़ी चिंताओं में से एक है। उन्होंने सवाल उठाया कि आज भारत खाद्य सुरक्षा में आत्मनिर्भर है लेकिन क्या भविष्य में भी यह सुरक्षा बनी रहेगी। इसी तरह, विकास के लिए जरूरी ऊर्जा सुरक्षा क्या हमेशा मिलती रहेगी। उन्होंने कहा कि भविष्य के लिए पानी और बेरोजगारी की समस्या भी एक बड़ी चुनौती है। इन समस्याओं का समाधान सिर्फ सरकार नहीं कर सकती है, बल्कि सामूहिकता के जरिये इनका हल निकाला जा सकता है। उन्होंने कहा कि इसके लिए कोऑपरेटिव को समर्थन देने की जरूरत है। साथ ही, इतने बड़े देश में एक मॉडल नहीं, बल्कि अलग-अलग मॉडल अपनाने की जरूरत है। ऐसे मॉडल की जरूरत है जिसके जरिये किसानों को आसानी से लोन मिल सके, बैंक गारंटी मिल सके और हर गांव में कोऑपरेटिव के जरिये किसानों की उपज खरीदने की व्यवस्था हो सके।&nbsp; &nbsp;</span><span style="font-weight: 400;"></span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">दूसरे सत्र के अंत में एमसीएक्स के एग्रीकल्चर डिवीजन के हेड अभिषेक गोविलकर ने कहा कि कृषि क्षेत्र में ग्रोथ के लिए फार्मर्स कलेक्टिव जरूरी है। यह मार्केट में सकारात्मक भूमिका निभा सकता है। यह किसानों एवं कृषि क्षेत्र के लिए जरूरी है। इससे न सिर्फ बाजार में किसानों की मोलभाव की क्षमता बढ़ जाती है, बल्कि उन्हें उनकी उपज की अच्छी कीमत भी मिलती है। यह उत्पादन बढ़ाने के अलावा किसानों की आर्थिक उन्नति में भी मददगार है। साथ ही किसानों के कौशल विकास, उन्नत तकनीक के इस्तेमाल और मार्केट में उनके योगदान को भी इससे बढ़ावा मिलेगा।</span><span style="font-weight: 400;"></span><span style="font-weight: 400;"></span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">पैनल चर्चा का संचालन सीनियर जर्नलिस्ट और समाचार एजेंसी पीटीआई के पूर्व एडिटर (ईस्ट) जयंता रायचौधुरी ने किया।</span></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/12/image_750x500_6587e88f25a2a.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ कृषि में कोऑपरेटिव को बढ़ावा देना जरूरी,  कलेक्टिव खेती से होगा फायदा ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/12/image_750x500_6587e88f25a2a.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[रूरल वॉयस कॉन्कलेवः कॉरपोरेट सेक्टर कृषि क्षेत्र में निवेश करे तो नतीजे बेहतर आएंगेः प्रो. रमेश चंद]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/corporate-sector-needs-to-invest-in-agriculture-says-prof-ramesh-chand.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 23 Dec 2023 15:04:46 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/corporate-sector-needs-to-invest-in-agriculture-says-prof-ramesh-chand.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">नीति आयोग के सदस्य प्रोफेसर रमेश चंद ने कहा है कि भारत में कृषि में तीन तरह के निवेश होते हैं। पहला निवेश किसान करता है। कृषि में 80 से 82% निवेश किसान खुद या कर्ज लेकर करता है। उसके बाद 15 से 16% निवेश सरकार करती है। यह नहरों के रूप में, गांव में बिजली उपलब्ध कराने के तौर पर, वेयरहाउस बनवाकर आदि के रूप में होता है। तीसरा निवेश कॉरपोरेट सेक्टर का है। अपेक्षा तो की जाती है कि कॉरपोरेट सेक्टर कृषि क्षेत्र में निवेश करेगा लेकिन अभी यह ज्यादा मार्केटिंग तक सीमित है। उत्पादन के क्षेत्र में उनका निवेश सिर्फ 0.5% है। जहां भी कॉरपोरेट सेक्टर ने अच्छा निवेश किया है उसके नतीजे भी बेहतर आए हैं। उसका एक उदाहरण महाराष्ट्र का जलगांव है जहां जैन इरिगेशन कंपनी के क्रियाकलापों की वजह से जलगांव दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा केला उत्पादक क्षेत्र बन गया है। यह कॉरपोरेट सेक्टर के निवेश का बेहतरीन उदाहरण है।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">प्रो. रमेश चंद रूरल वॉयस के तीन साल पूरे होने पर आयोजित कार्यक्रम में बोल रहे थे। इस कार्यक्रम के पहले सत्र का विषय था ग्रामीण क्षेत्र में निवेश और जॉब के अवसर। उन्होंने कहा कि निवेश करना और उसमें एफिशिएंसी ना देखना पैसे को बर्बाद करने के समान है। सिंचाई पर बीते वर्षों में हजारों करोड़ रुपए खर्च हुए, लेकिन इसका फायदा नहीं हुआ। एक हेक्टेयर क्षेत्रफल भी नहीं बढ़ा। पिछले कई वर्षों में देखें तो सिंचित भूमि का क्षेत्रफल 47 प्रतिशत से बढ़कर 55 प्रतिशत हुआ है।</span></p>
<p><strong>खाद्य महंगाई की जगह फूड प्रॉस्पेरिटी इंडेक्स की जरूरतः आर.एस. सोढ़ी</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इंडियन डेयरी एसोसिएशन के प्रेसीडेंट डॉ. आर. एस सोढ़ी ने कहा कि जब भी किसान और शहरी उपभोक्ता के बीच किसी एक को चुनने की बारी आती है तो नीति निर्माता अक्सर उपभोक्ता की ओर झुक जाते हैं। शेयर बाजार का सेंसेक्स बढ़ता है तो उसे खुशहाली के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है, लेकिन जब सब्जियों के या खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ते हैं तो उसे खाद्य महंगाई करार दे दिया जाता है। मेरे विचार से इसकी जगह फूड प्रॉस्पेरिटी इंडेक्स आए। इसके लिए माइंडसेट बदलने की जरूरत है।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">उन्होंने बताया कि कृषि बाजार अभी लगभग 50 लाख करोड़ रुपए का है। इसमें संगठित क्षेत्र 7 लाख करोड़ रुपए का है। इसमें भी आधा, 3.5 लाख करोड़ रुपए का संगठित बाजार दूध का है। वर्ष 2030 तक खाने के समान का बाजार 170 लाख करोड़ रुपए का हो जाएगा।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">दूध के बारे में उन्होंने कहा कि 50 साल पहले देश में 24 मिलियन टन दूध उत्पादन होता था, आज 231 मिलियन टन पहुंच गया है। 2047 तक इसके 628 मिलियन टन तक पहुंच जाने का अनुमान है। अभी प्रति व्यक्ति दूध की की खपत 460 ग्राम है इसके 2047 में 850 ग्राम तक पहुंचाने का अनुमान है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">उन्होंने कहा कि दुग्ध क्षेत्र का विकास इसलिए हुआ क्योंकि इसमें किसान और उपभोक्ता दोनों फायदे की स्थिति में थे। किसान उत्पादन बढ़ाता रहा उसे इस बात की चिंता नहीं थी कि उसका प्रोडक्ट कहां बिकेगा। उपभोक्ता भी खुश था क्योंकि उसे अच्छा ब्रांडेड प्रोडक्ट मिल रहा था। ब्रांडेड फूड मार्केट महानगरों में ही नहीं, बल्कि टियर 2 और टियर 3 शहरों में भी फैल रहा है, खासकर छोटे पैक में। लेकिन यहां यह देखने की बात है कि उपभोक्ता अच्छी क्वालिटी के लिए 10 से 20% प्रीमियम तो दे देता है, लेकिन उससे अधिक प्रीमियम होने पर प्रोडक्ट में वैल्यू तलाशता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">उन्होंने बताया कि अभी संगठित क्षेत्र में रोजाना 12 करोड़ लीटर दूध का उत्पादन होता है। अगले 7 वर्षों में यह 24 करोड़ लीटर हो जाएगा। इस तरह देखें तो अगले 7 से 8 वर्षों के दौरान दूध क्षेत्र में एक लाख करोड़ रुपए का निवेश होगा। जहां तक नौकरियों की बात है तो संगठित क्षेत्र में जब एक लाख लीटर दूध का उत्पादन होता है तो उससे 6000 लोगों को काम मिलता है। इस तरह देखें तो 12 करोड़ लीटर दूध उत्पादन बढ़ेगा तो साथ-साथ में 72 लाख नौकरियां निकलेंगी। सोढ़ी ने किसानों तथा कृषि के सामने आने वाली चुनौतियों के बारे में भी बताया। उन्होंने कहा कि क्रॉस ब्रीड की गायें 8.5 लीटर दूध देती हैं, जबकि स्थानीय नस्ल की गाय 3.5 से 4 लीटर दूध देती है। किसान को सोचना होगा कि कौन सी ब्रीड की गाय रखें।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">उन्होंने कहा, एक और चुनौती सस्टेनेबिलिटी की है। उन्होंने कहा कि इन दिनों कृषि क्षेत्र में सस्टेनेबिलिटी को लेकर काफी बातें कहे जा रही हैं। हकीकत तो यह है कि जलवायु परिवर्तन का इस्तेमाल विकसित देश विकासशील देशों को रोकने के लिए कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि सस्टेनेबिलिटी तभी सफल होगी जब व्यक्ति का पेट भरा होगा।</span></p>
<p><strong>गांवों तक अच्छी कनेक्टिविटी की जरूरतः हर्ष भनवाला</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">एमसीएक्स के चेयरमैन तथा नाबार्ड के पूर्व चेयरमैन डॉ. हर्ष कुमार भनवाला ने कहा कि आज हम कृषि को सिर्फ कृषि के तौर पर नहीं देख सकते। कृषि को विकसित करने के लिए कई तरह कार्य करने पड़ेंगे। 2047 तक कृषि को अच्छी सड़कें, बिजली, मार्केट, डिजिटल प्लेटफॉर्म और इंटरनेट की जरूरत है। आज युवा इंटरनेट पर हर चीज का आर्डर देते हैं। इंटरनेट के माध्यम से फूड कंजप्शन बढ़ रहा है। यह ऐसा क्षेत्र है जो रोजगार दे सकता है। अनेक ग्रामीण इलाकों में कनेक्टिविटी की समस्या है। गांव तक अच्छी कनेक्टिविटी हो गांव तक इंटरव्यू 2047 तक विकसित भारत का सपना पूरा होगा।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">जमीन के कंसोलिडेशन का मसला उठाते हुए उन्होंने कहा कि अभी 30% किसान ऐसे हैं जिनका खेत अपना नहीं है, वे क्यों निवेश करेंगे। इस स्थिति को बदलने के लिए उन्होंने राज्यों को कानून बनाने का सुझाव दिया ताकि खेत के मालिक का हक बना रहे और किसान को भी फायदा हो। उन्होंने कहा कि कृषि में मशीनरी का प्रयोग बढ़ा है। किसान छोटा है जबकि नई मशीनरी महंगी है। मैकेनाइज्ड सर्विस में रोजगार के अवसर हैं। इसमें कॉरपोरेट को निवेश करना चाहिए। आने वाले दिनों में श्रमिकों की कमी पड़ेगी इसलिए मैकेनाइज्ड सर्विस में मांग बढ़ने की पूरी संभावना है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">उन्होंने यह भी कहा कि हमें पर्यावरण को बचाना भी जरूरी है। आज शहरों को तो छोड़िए गांव में भी सांस लेना मुश्किल हो जाता है। कृषि से जुड़े पर्यावरण में निवेश करना जरूरी है। जब निवेश होगा तो अवसर भी मिलेंगे। उन्होंने कहा कि कृषि के बारे में एटीट्यूड, ओरिएंटेशन और संस्थानों में बदलाव लाने की जरूरत है।</span></p>
<p><strong>एग्रीकल्चर टेक्नोलॉजी को बढ़ावा देने की जरूरतः रोशन लाल टमक</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">डीसीएम श्रीराम लिमिटेड में शुगर बिजनेस के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर एवं सीईओ रोशन लाल टामक ने कहा कि बिना मार्केट लिंकेज के विकास नहीं हो सकता है। इसका उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि डेयरी क्षेत्र ऐसा है जिसमें बिना बिचौलिए के प्रभावी विकास हुआ है। उन्होंने कृषि के पूरे इकोसिस्टम के समर्थन की बात कही। उन्होंने कहा कि इसमें पॉलिसी का भी बड़ा योगदान है। जैसे अभी एथेनॉल ब्लेंडिंग 12% तक पहुंची है तो यह नीतिगत समर्थन से ही संभव हो सका है।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">निवेश के बारे में उन्होंने कहा कि कंप्रेस्ड बायो सीएनजी में चीनी उद्योग बड़ी भूमिका निभा सकता है। उन्होंने कहा कि सतत कार्यक्रम सरकार का बहुत ही प्रोग्रेसिव कार्यक्रम है। अगर सरकार की तरफ से ऑफटेक की गारंटी हो तो बायोमास आधारित सीबीजी प्लांट चीनी उद्योग लगा सकता है। उन्होंने मॉडल लैंड सीलिंग एक्ट को देश की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि अगर आज युवाओं को हम कृषि से नहीं जोड़ेंगे तो आने वाले दिनों में कौन खेती करेगा। उन्होंने कृषि से जुड़े स्टार्टअप इकोसिस्टम का समर्थन किया और कहा कि इससे अनेक संभावनाएं हैं। एगटेक यानी एग्रीकल्चरल टेक्नोलॉजी तथा एग्रीगेशन जैसे क्षेत्रों में काफी संभावना है। उन्होंने कहा कि एगटेक को कैसे मदद दी जाए हमें यह देखना होगा।</span></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/12/image_750x500_6586a990d47ea.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ रूरल वॉयस कॉन्कलेवः कॉरपोरेट सेक्टर कृषि क्षेत्र में निवेश करे तो नतीजे बेहतर आएंगेः प्रो. रमेश चंद ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/12/image_750x500_6586a990d47ea.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[एजेंडा फॉर रूरल इंडियाः पानी की किल्लत से जूझते ग्रामीण]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/agenda-for-rural-india-villagers-struggling-with-water-crisis.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 04 Dec 2023 09:00:43 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/agenda-for-rural-india-villagers-struggling-with-water-crisis.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>पानी की सुविधा न केवल कृषि, बल्कि मानव समृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। फिर भी ग्रामीण क्षेत्रों को पीने, घरेलू उपयोग और खेती में पानी के लिए कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। &ldquo;ग्रामीण भारत का एजेंडा&rdquo; विषय पर <strong>रूरल वॉयस</strong> और <strong>सॉक्रेटस</strong> द्वारा देश भर में आयोजित कार्यक्रमों में स्वच्छ पानी जैसी बुनियादी जरूरत देश भर के ग्रामीण समुदायों की एक प्रमुख आकांक्षा थी।</p>
<p>जोधपुर सम्मेलन में दो महिलाओं ने बताया कि पानी लेने के लिए वे प्रतिदिन लगभग 10 किलोमीटर पैदल जाती हैं। वे राजस्थान के अर्ध-शुष्क जिले नागौर से आई थीं और ट्यूबवेल या नल तक उनकी पहुंच नहीं थी। बाड़मेर, बालोतरा, फलोदी, सीकर, जोधपुर, पाली और उदयपुर सहित राजस्थान के अन्य जिलों से आए प्रतिभागियों ने पीने और सिंचाई के लिए पानी की कमी का मुद्दा उठाया। इन क्षेत्रों के किसानों ने भूजल स्तर में गिरावट और खेती में इस्तेमाल होने वाले केमिकल के कारण इसके प्रदूषित होने पर भी अफसोस जताया।</p>
<p>ओडिशा और मेघालय जैसे ज्यादा वर्षा वाले राज्यों में भी पानी तक पहुंच की समस्याएं थीं। मेघालय के तीन मुख्य पहाड़ी क्षेत्रों- गारो, खासी और जैंतिया के प्रतिभागियों को सर्दियों में पानी की कमी का सामना करना पड़ता है। उन्हें पीने का पानी आसानी से उपलब्ध नहीं होता। सिंचाई के लिए पानी की कमी के कारण वे खेती के लिए वर्षा पर निर्भर हैं। इसलिए साल में केवल एक या दो फसलें ही उगा पाते हैं। ओडिशा के 30 में से 21 जिलों से प्रतिभागी आए थे। उन्होंने पीने के पानी और सिंचाई सुविधाओं की कमी को प्रमुखता से उठाया।&nbsp;</p>
<p>किसानों के अलावा अन्य ग्रामीण नागरिकों ने भी स्थानीय जल स्रोतों के क्षरण पर चिंता जताई। मेघालय के प्रतिभागियों ने कहा कि मैकेनिकल तरीके से मछली पकड़ने से नदियां उथली हो रही हैं और मछलियों की संख्या कम हो रही है। तमिलनाडु के प्रतिभागी पश्चिमी घाट की नदियों, झीलों और जलधाराओं के प्रदूषण और प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा जैसी आक्रामक प्रजातियों के पानी से संबंधित मुद्दों के बारे में अत्यधिक जागरूक थे।</p>
<p><em><strong>&nbsp;(लेखिका सॉक्रेटस में पर कार्यरत हैं।)</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ एजेंडा फॉर रूरल इंडियाः पानी की किल्लत से जूझते ग्रामीण ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[एजेंडा फॉर रूरल इंडियाः उत्तर&amp;#45;पूर्वी ग्रामीण भारत की हकीकत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/agenda-for-rural-india-reality-of-north-eastern-rural-india.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 01 Dec 2023 12:19:09 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/agenda-for-rural-india-reality-of-north-eastern-rural-india.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>'एजेंडा फॉर रूरल इंडिया- मेघालय' सम्मेलन में राज्य के सात जिलों के प्रतिभागियों के विविध समूहों ने अपने अनुभवों और दृष्टिकोणों के आधार पर ग्रामीण विकास और स्थायित्व पर विस्तृत और सार्थक चर्चा की। दुनिया के सबसे अधिक बारिश वाले क्षेत्रों में से एक के रूप में अपनी पहचान के बावजूद मेघालय सर्दियों में पानी की कमी की समस्या से जूझता है। पीने के लिए साफ पानी की कमी तो होती ही है, खेती में सिंचाई के लिए भी पानी कम मिलता है।</p>
<p><strong>कुछ प्रमुख निष्कर्ष</strong></p>
<p><strong>आजीविकाः</strong> पूर्वी जैंतिया हिल्स से आए एक प्रतिभागी ने कहा, 'हमें अपनी आजीविका के लिए महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।' उन्होंने राज्य में बेरोजगारी की व्यापक स्थिति पर अपने विचार साझा करते हुए युवाओं को श्रम बल में समाहित करने के लिए नौकरी के अवसरों और कौशल विकास कार्यक्रमों की आवश्यकता पर जोर दिया। प्रतिभागियों के मुताबिक, उद्यमिता और ग्रामीण उद्यम को प्रोत्साहित करने के नए तरीके खोजना आजीविका की संभावनाएं बढ़ाने में महत्वपूर्ण हो सकता है।&nbsp;</p>
<p><strong>ग्रामीण विकासः</strong> प्रतिभागियों ने रोड नेटवर्क के मुद्दे पर चिंता जताते हुए कहा कि इसकी कमी न सिर्फ पहुंच को बाधित करती है, बल्कि व्यापार और परिवहन के अवसरों को भी सीमित करती है। उन्होंने बुनियादी स्वास्थ्य ढांचे की अपर्याप्तता के साथ-साथ अनियमित शिक्षकों और बीच में ही स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की दर ज्यादा होने के कारण शिक्षा सुविधाओं की कमी को भी सामने रखा।&nbsp;</p>
<p><strong>जलवायु परिवर्तनः</strong> ज्यादातर प्रतिभागियों ने कहा कि जलवायु परिवर्तन की वजह से कीटों का संक्रमण बढ़ गया है जिससे पैदावार पर खतरा पैदा हो गया है। किसानों ने फसलों का उचित मूल्य पाने के लिए संघर्ष और भुगतान में देरी का अनुभव साझा करते हुए चिंता जताई। पूर्वी पश्चिमी खासी हिल्स के एक किसान ने कहा कि मौसम में अचानक बदलाव और चरम घटनाओं में वृद्धि ने पैदावार और किसानों की आजीविका को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।</p>
<p><strong>कृषिः</strong> किसानों ने सरकार से नियामकीय भूमिका की भी मांग की, ताकि कृषि बाजार में उनके हितों की रक्षा की जा सके, निष्पक्षता बढ़े और यह सुनिश्चित किया जा सके कि कृषि क्षेत्र स्थिर और आर्थिक रूप से व्यवहार्य बना रहे।&nbsp;</p>
<p><strong>नशीले पदार्थों का सेवनः</strong> युवाओं में बढ़ती नशाखोरी एक प्रमुख सामाजिक मुद्दे के रूप में उभरी, जो दीर्घकालिक स्वास्थ्य और सामाजिक चुनौतियां पैदा करती है। एक ग्रामीण कार्यकारी सदस्य ने कहा कि कम उम्र में विवाह की प्रथा बच्चों के समग्र कल्याण और शिक्षा एवं अवसरों तक पहुंच पर सवाल उठाती है।&nbsp;&nbsp;</p>
<p><strong>युवाओं से संवादः</strong> मेघालय के युवाओं ने सड़कों, स्वास्थ्य देखभाल और शिक्षा जैसे बुनियादी ग्रामीण ढांचे पर ध्यान न देने जैसी अपनी चिंताओं को व्यक्त किया। साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों की विशाल क्षमता का इस्तेमाल करने, पर्यटन को बढ़ावा देने, खेल के अवसरों और कला को बढ़ावा देने के लिए सरकारी समर्थन की आवश्यकता पर जोर दिया। इसके अलावा, सम्मेलन में उन तरीकों की खोज पर चर्चा हुई जिसके माध्यम से युवा उद्यमशीलता की मानसिकता को बढ़ावा दे सकते हैं और अपने समुदायों के विकास और समृद्धि में योगदान दे सकते हैं।</p>
<p><strong>मतदान की प्राथमिकताः</strong> प्रतिभागियों ने बताया कि समग्र ग्रामीण विकास का समर्थन करने वाले उम्मीदवारों को ही वे आगामी विधानसभा चुनाव में वोट देंगे। उनकी शीर्ष प्राथमिकताओं में व्यापक सड़क संपर्क, किफायती स्वास्थ्य सेवा, भ्रष्टाचार मुक्त सरकार, उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा और रोजगार सृजन के साथ 2025 तक जीरो लोड शेडिंग के साथ नियमित और निर्बाध बिजली का आश्वासन शामिल है।</p>
<p><em><strong>&nbsp;(लेखक सॉक्रेटस में सीनियर प्रोग्राम मैनेजर हैं।)</strong></em></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/11/image_750x500_65659473c9948.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ एजेंडा फॉर रूरल इंडियाः उत्तर-पूर्वी ग्रामीण भारत की हकीकत ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[ग्रामीण भारत का एजेंडाः कृषि क्षेत्र की बढ़ती मुश्किलें]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/agenda-for-rural-india-growing-difficulties-in-the-agricultural-sector.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 30 Nov 2023 07:19:18 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/agenda-for-rural-india-growing-difficulties-in-the-agricultural-sector.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>ग्रामीण भारत पर कोई भी चर्चा कृषि पर बातचीत के बिना पूरी नहीं हो सकती। &ldquo;ग्रामीण भारत का एजेंडा&rdquo; विषय पर <strong>रूरल वॉयस</strong> और <strong>सॉक्रेटस</strong> द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में ग्रामीणों के साथ हमारी बैठकों में प्रतिभागियों में से लगभग 60 फीसदी किसान थे। पिछले दो दशकों से ग्रामीण समुदायों को परेशान करने वाले कृषि संकट की वास्तविकता प्रतिभागियों की चिंताओं, आशाओं और सपनों में स्पष्ट रूप से दिख रही थी। हालांकि, उनके द्वारा उठाए गए अधिकांश मुद्दे नए नहीं थे, फिर भी यह किसानों की धारणाओं और प्राथमिकताओं को समझने के लिए काफी हैं।&nbsp;&nbsp;</p>
<p>किसानों ने बताया कि केवल कृषि आय से गुजारा करना लगभग असंभव होता जा रहा है। फसलों की कीमतें लागत के अनुपात में कम हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक युवा किसान ने हमें बताया, "उर्वरक और कीटनाशक सहित हर चीज महंगी होती जा रही है, हम हर तरफ से दबाव में हैं।" उत्तर भारत की "गन्ना बेल्ट" का हिस्सा कहे जाने वाले मुजफ्फरनगर में प्रतिभागियों ने गन्ने का राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) न बढ़ने और चीनी मिलों से भुगतान में देरी को एक बड़ी समस्या के रूप में उठाया। यहां के किसानों ने कीटनाशकों, उर्वरकों, बीज और मजदूरी की लागत सहित कृषि इनपुट की बढ़ती लागत की भी शिकायत की। इस अपेक्षाकृत समृद्ध कृषि क्षेत्र में भी किसानों को खेती जारी रखने के लिए कर्ज लेने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। अधिकांश किसान नहीं चाहते कि उनके बच्चे किसान बनें।</p>
<p><a href="https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/agriculture-needs-hand-holding-as-existential-crisis-for-rural-india-increases.html" title="ग्रामीण भारत का एजेंडा" target="_blank" rel="noopener"><strong>यह भी पढ़ेंः&nbsp;कृषि का हाथ थामने की दरकारः ग्रामीण भारत के लिए अस्तित्व का संकट</strong></a></p>
<p>ओडिशा के किसानों का मानना था कि फसल की कीमतें लाभकारी नहीं हैं। केंद्रपाड़ा जिले के एक किसान ने कहा, "किसानों&nbsp; को मिलने वाली कम कीमत का मुख्य कारण गोदामों और कोल्ड स्टोरेज जैसी भंडारण सुविधाओं की कमी है।" अधिकांश किसानों को अपनी उपज सीधे अपने खेतों-खलिहानों पर ही स्थानीय व्यापारियों और बिचौलियों को बेचने के लिए मजबूर होना पड़ता है। राजस्थान के प्रतिनिधियों ने बताया कि कैसे फसल की कीमतें बीज, उर्वरक और कीटनाशकों जैसे कृषि इनपुट की बढ़ती लागत के साथ तालमेल बिठाने में वे असमर्थ हैं। शिलांग में भी हमने यही कहानी सुनी- खराब सड़क संपर्क, भंडारण सुविधाओं की कमी और देरी से भुगतान। कोयंबटूर के किसानों ने कहा कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) बहुत कम है और इसे किसानों को खुद तय करना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि तमिलनाडु में आमतौर पर उगाई जाने वाली फसलों, जैसे चाय, कॉफी, सब्जियां और मसालों का भी एमएसपी तय किया जाना चाहिए।</p>
<p>हमारे कई सम्मेलनों में प्रतिभागियों की धारणा थी कि अकेले एमएसपी और अच्छी कीमतें कृषि की घटती व्यवहार्यता के मुद्दे का समाधान नहीं कर सकतीं। कई जगह किसानों ने कहा कि सरकारें पीएम-किसान जैसी योजनाओं के तहत सहायता बढ़ाकर उनकी आय सुरक्षित करें। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि किसानों का मुनाफा बढ़ाने के लिए कृषि में मूल्यवर्धित उत्पादों और स्थानीय उद्योगों को सरकारों द्वारा प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। किसानों ने महसूस किया कि इस जिम्मेदारी को उठाने के लिए किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) और सहकारी समितियों की क्षमता बढ़ाई जानी चाहिए।&nbsp;</p>
<p><a href="https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/growing-crisis-of-pollution-and-climate-change-on-agriculture.html" title="जलवायु संकट" target="_blank" rel="noopener"><strong>यह भी पढ़ेंः&nbsp;ग्रामीण भारत पर प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन का संकट</strong></a></p>
<p>यह बात हर जगह सामने आई कि कृषि संबंधी सरकारी योजनाओं के बारे में जागरूकता की कमी जरूरतमंदों तक इनकी पहुंच में बाधक है। राजस्थान के प्रतिभागियों ने सुझाव दिया कि सरकारी योजनाओं के बारे में सभी सरकारी कार्यालयों के बाहर जानकारी प्रदर्शित की जानी चाहिए। मेघालय के किसानों ने महसूस किया कि उन्हें सरकारी योजनाओं के बारे में बेहतर जानकारी होनी चाहिए। ओडिशा के प्रतिभागी मनरेगा जैसी सरकारी योजनाओं के कार्यान्वयन में देरी या कमी से निराश थे। उनका मानना था कि सरकारी नीतियों के बारे में सही जानकारी प्रसारित करने के लिए प्रत्येक गांव में जागरूकता समूह बनाए जाने चाहिए। तमिलनाडु में प्रतिभागियों ने सुझाव दिया कि प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में विधायकों, नीति निर्माताओं और किसान संघों की मासिक बैठक होनी चाहिए।</p>
<p>एक और मुद्दा लगातार सामने आया वह था रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का अत्यधिक इस्तेमाल। इस बारे में किसानों के बीच जागरूकता का स्तर भी काफी अधिक था। राजस्थान के एक किसान ने बताया, &ldquo;केमिकल का अत्यधिक इस्तेमाल गांव की बर्बादी का सबसे बड़ा कारण है।&rdquo; यूपी के किसानों ने बताया कि कैसे केमिकल के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की उर्वरता और लोगों की सेहत प्रभावित हुई है। ओडिशा के किसानों ने कहा कि हानिकारक रसायन सभी जल स्रोतों को प्रदूषित कर रहे हैं। राजस्थान में यह चिंता जताई गई कि कैसे केमिकल के ज्यादा उपयोग से ग्रामीण क्षेत्रों में कैंसर और अन्य बीमारियां हो रही हैं। इस अहसास से किसानों में प्राकृतिक खेती और टिकाऊ कृषि के महत्व की समझ पैदा हुई है। अधिकांश किसानों का मानना था कि यह आगे बढ़ने का सही रास्ता। किसानों ने सरकारों से अपने गांवों में मासिक जागरूकता बैठकें आयोजित करने, प्रमाणन योजनाओं को सरल बनाने और रियायती कीमतों पर जैविक इनपुट की आपूर्ति करने का आह्वान किया।</p>
<p><a href="https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/rural-india-still-awaits-basic-infrastructure-and-services.html" title="गांवों में बुनियादी ढांचा" target="_blank" rel="noopener"><strong>यह भी पढ़ेंः ग्रामीण भारत को बुनियादी ढांचे और सेवाओं का अभी भी इंतजार</strong></a></p>
<p>किसानों ने&nbsp; मानव-पशु संघर्ष की चिंता को भी प्राथमिकता दी। यूपी में आवारा पशुओं के आतंक के कारण किसान कई तरह की फसल बोने से भी डरते हैं। यह मुद्दा मुजफ्फरनगर में हमारे प्रतिभागियों के बीच सबसे अधिक गूंजा। किसानों ने इसके लिए कई समाधान सुझाए। इनमें हर गांव में पशु आश्रय स्थल बनाने के लिए सरकारी धन का उपयोग करने से लेकर किसानों को बूढ़े मवेशियों की देखभाल के लिए मासिक भुगतान, पशु व्यापार को वैध बनाना शामिल हैं। ओडिशा, तमिलनाडु और मेघालय में आसपास के जंगलों से जंगली जानवर खेतों में घुस जाते हैं। तमिलनाडु में कोयंबटूर जिले के एक किसान ने बताया, &ldquo;पश्चिमी घाट से सटे इलाके में तेनकासी से सत्यमंगलम वन प्रभाग तक हिरणों, सूअरों और मोरों के उपद्रव के कारण बाजरा की फसलें नहीं उगाई जा सकती हैं।&rdquo; नीलगिरि के एक किसान अपने क्षेत्र में हुए नुकसान का एक फोटो एलबम भी लेकर आए थे। इससे एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकला- बढ़ते मानव-पशु संघर्ष को मवेशी और पशु संरक्षण पर सरकारी नीतियों के साथ-साथ शहरीकरण के कारण वन क्षेत्रों के विस्तार पर दबाव से जोड़ा जा सकता है।&nbsp;</p>
<p><a href="https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/unemployment-in-rural-india-choice-or-compulsion.html" title="गांव में बेरोजगारी" target="_blank" rel="noopener"><strong>यह भी पढ़ेंः ग्रामीण भारत में बेरोजगारीः सामान्य या मजबूरी?</strong></a></p>
<p>सिंचाई के लिए पानी हर जगह चिंता का एक विषय था, विशेष रूप से ओडिशा और राजस्थान में जो विपरीत कृषि-पारिस्थितिकी क्षेत्र हैं। ओडिशा में बढ़ती अनियमित वर्षा का प्रभाव खराब सिंचाई सुविधाओं के कारण अधिक महसूस किया गया। राजस्थान में भूजल के घटते स्तर ने खेती के भविष्य के लिए अच्छी सिंचाई सुविधाओं को जरूरी बना दिया है। मेघालय में किसानों को सर्दियों के मौसम में पानी की कमी झेलनी पड़ती है।&nbsp;</p>
<p><em><strong>&nbsp;(लेखिका सॉक्रेटस में पर कार्यरत हैं।)</strong></em></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/11/image_750x500_65659b5df3d52.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ ग्रामीण भारत का एजेंडाः कृषि क्षेत्र की बढ़ती मुश्किलें ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/11/image_750x500_65659b5df3d52.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[ग्रामीण भारत में बेरोजगारी: सामान्य या मजबूरी?]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/unemployment-in-rural-india-choice-or-compulsion.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 29 Nov 2023 09:02:41 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/unemployment-in-rural-india-choice-or-compulsion.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>&ldquo;ग्रामीण भारत का एजेंडा&rdquo; विषय पर <strong>रूरल वॉयस</strong> और <strong>सॉक्रेटस</strong> द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में ग्रामीणों के साथ बातचीत में बेरोजगारी एक बड़ी भयावह समस्या के रूप में सामने आई जो देश के सभी हिस्सों में एक जैसी है। देश के पांचों क्षेत्रों में हमने देखा कि युवाओं में बेरोजगारी एक विशेष मुद्दा बनकर उभरी। कुछ स्थानों पर शिक्षितों के लिए पार्ट टाइम रोजगार था, तो अन्य स्थानों पर उद्योगों की कमी की वजह से लोगों में निराशा थी।</p>
<p><a href="https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/agriculture-needs-hand-holding-as-existential-crisis-for-rural-india-increases.html" title="ग्रामीण भारत का एजेंडा" target="_blank" rel="noopener"><strong>यह भी पढ़ेंः&nbsp;कृषि का हाथ थामने की दरकारः ग्रामीण भारत के लिए अस्तित्व का संकट</strong></a></p>
<p>आजीविका और सरकारी नीति के मुद्दों पर विभिन्न समूहों के बीच बहस हुई। कई लोग, विशेष रूप से कृषि में लगे लोग नहीं चाहते थे कि उनके बच्चे उनके पेशे को अपनाएं। मुजफ्फरनगर में यह बात निकल कर सामने आई कि विकल्पों की कमी की वजह से कई युवा बेहतर अवसरों और अच्छी जीवन शैली की तलाश में बड़े शहरों की ओर पलायन करने लगे हैं। किसान माता-पिता को कर्ज में डूबते देखना और खेती को अपनाने से हतोत्साहित होने के बाद कई युवा खेती में नहीं जाना चाहते हैं।</p>
<p><a href="https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/growing-crisis-of-pollution-and-climate-change-on-agriculture.html" title="जलवायु संकट" target="_blank" rel="noopener"><strong>यह भी पढ़ेंः&nbsp;ग्रामीण भारत पर प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन का संकट</strong></a></p>
<p>गांव से होने वाले इस पलायन को कैसे रोका जा सकता है, इसका एक संभावित समाधान युवाओं को खेती के लिए तकनीकी शिक्षा से लैस करना है। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। शैक्षिक पाठ्यक्रम काफी हद तक कृषि आवश्यकताओं से अलग हैं।&nbsp;</p>
<p><a href="https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/agenda-for-rural-india-growing-difficulties-in-the-agricultural-sector.html" title="कृषि क्षेत्र की मुश्किलें" target="_blank" rel="noopener"><strong>यह भी पढ़ेंः&nbsp;ग्रामीण भारत का एजेंडाः कृषि क्षेत्र की बढ़ती मुश्किलें</strong></a></p>
<p>राजस्थान के जोधपुर में भी युवाओं की बेरोजगारी एक प्रमुख मुद्दा रही। यदि जनप्रतिनिधि छोटे व्यवसायों और मैन्युफैक्चरिंग सेटअप का समर्थन करने वाली नीतियों को प्राथमिकता देते हैं, तो उन्हें वोट मिलने की अधिक संभावना होगी। मेघालय में बेरोजगारी की वजह से युवाओं में नशीली दवाओं और शराब की लत बढ़ी रही है।&nbsp;</p>
<p><a href="https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/rural-india-still-awaits-basic-infrastructure-and-services.html" title="गांवों में बुनियादी ढांचा" target="_blank" rel="noopener"><strong>यह भी पढ़ेंः&nbsp;ग्रामीण भारत को बुनियादी ढांचे और सेवाओं का अभी भी इंतजार</strong></a></p>
<p>ओडिशा और तमिलनाडु, दोनों सम्मेलनों में राजनीतिक भ्रष्टाचार को उनके क्षेत्रों में बेरोजगारी से जोड़ा गया। ओडिशा में अप्रभावी शासन एक विशेष निराशा का कारण थी जिसका अक्सर हवाला दिया जाता रहा। इसके कारण सरकार द्वारा प्रस्तावित कई योजनाएं लागू नहीं हो पाईं। यहां यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि इन सभी मामलों में पार्ट टाइम रोजगार और विकल्प की कमी को बेरोजगारी के समान महत्व वाली समस्याओं के रूप में पहचाना गया।&nbsp;</p>
<p><em><strong>(लेखिका सॉक्रेटस में&nbsp; प्रोग्राम एसोसिएट पद पर कार्यरत हैं।)</strong></em></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/11/image_750x500_656597d31ae07.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ ग्रामीण भारत में बेरोजगारी: सामान्य या मजबूरी? ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/11/image_750x500_656597d31ae07.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[ग्रामीण भारत को बुनियादी ढांचे और सेवाओं का अभी भी इंतजार]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/rural-india-still-awaits-basic-infrastructure-and-services.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 28 Nov 2023 12:53:55 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/rural-india-still-awaits-basic-infrastructure-and-services.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>&ldquo;ग्रामीण भारत का एजेंडा&rdquo; विषय पर <strong>रूरल वॉयस</strong> और <strong>सॉक्रेटस</strong> द्वारा आयोजित पांच क्षेत्रीय सम्मेलनों में हुई व्यापक चर्चा और उनसे मिली अंतर्दृष्टि ने सामूहिक रूप से ग्रामीण भारत के लिए एजेंडा तैयार करने की नींव रखी। इसमें ग्रामीण बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और क्षमता को बढ़ाने की आवश्यकता प्रमुखता से उजागर हुई। यह अनिवार्यता स्वास्थ्य और शिक्षा, परिवहन और ऊर्जा पहुंच सहित विभिन्न क्षेत्रों के लिए है। ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे की कमी की चुनौतियों से संबंधित निष्कर्ष निम्नलिखित हैं।</p>
<p><strong>ग्रामीण रोड नेटवर्कः</strong> सम्मेलन में इस मुद्दे पर कराए गए मतदान के दौरान एक चौथाई से अधिक प्रतिभागियों ने मेघालय के ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क नेटवर्क, फुटपाथ, स्ट्रीट लाइट और जल निकासी व्यवस्था में सुधार के महत्व पर जोर दिया। मेघालय और उत्तर प्रदेश दोनों जगहों पर मतदान के परिणाम में सर्वसम्मति से खेतों और कृषि मंडियों को परिवहन सुविधाओं से जोड़ने की व्यवस्था करने के लिए उच्च गुणवत्ता वाली सड़कों का बुनियादी ढांचा बढ़ाने की साझा मांग पर प्रकाश डाला गया।</p>
<p><a href="https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/agriculture-needs-hand-holding-as-existential-crisis-for-rural-india-increases.html" title="ग्रामीण भारत का एजेंडा" target="_blank" rel="noopener"><strong>यह भी पढ़ेंः&nbsp;कृषि का हाथ थामने की दरकारः ग्रामीण भारत के लिए अस्तित्व का संकट</strong></a></p>
<p><strong>स्वास्थ्य अवसंरचनाः</strong> ग्रामीण भारत में स्वास्थ्य सेवा की स्थिति का लाखों ग्रामीणों के जीवन और आजीविका पर सीधा प्रभाव पड़ता है। उत्तर प्रदेश और मेघालय दोनों जगहों पर प्रतिभागियों ने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों सहित बुनियादी स्वास्थ्य ढांचे की अपर्याप्तता और उनके ठीक से काम नहीं करने पर भी चिंता जताई। उत्तर प्रदेश, ओडिशा और मेघालय में बड़ी संख्या में प्रतिभागियों ने कहा कि वे अपना नेता चुनते समय देखेंगे कि अच्छी सुविधाओं से सुसज्जित, सस्ती और आसानी से सुलभ स्वास्थ्य सुविधाओं को पूरा करने के वादे उन्होंने पूरे किए हैं या नहीं।</p>
<p><a href="https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/growing-crisis-of-pollution-and-climate-change-on-agriculture.html" title="जलवायु संकट" target="_blank" rel="noopener"><strong>यह भी पढ़ेंः&nbsp;ग्रामीण भारत पर प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन का संकट</strong></a></p>
<p><strong>शिक्षा अवसंरचनाः</strong> ग्रामीण भारत में बुनियादी शैक्षिक ढांचे की स्थिति सीधे तौर पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच और विस्तार देश के सामाजिक-आर्थिक विकास को प्रभावित करती है। मुजफ्फरनगर के एक सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा कि उत्तर प्रदेश में ग्रामीण युवाओं को पर्याप्त कौशल और तकनीकी शिक्षा नहीं मिलती है। ओडिशा, राजस्थान, मेघालय और उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक और उच्च शिक्षा की गुणवत्ता बिगड़ रही है।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/11/image_750x_65648a3576d7d.jpg" alt="" /></p>
<p>मेघालय में पूर्वी खासी हिल्स के एक प्रतिभागी ने कहा कि प्राथमिक से माध्यमिक विद्यालय तक बीच में ही पढ़ाई छोड़ने वाले बच्चों की दर अधिक है। इसके अलावा, कृषि से संबंधित व्यावहारिक कौशल प्रदान करने पर अपर्याप्त ध्यान दिया गया है। ओडिशा में मौजूद लोगों के चुनावी वादे मुख्य रूप से प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से किसानों की शिक्षा को बढ़ावा देने पर केंद्रित थे। मेघालय में ज्यादातर प्रतिभागियों ने शिक्षा के बुनियादी ढांचे से संबंधित चुनावी वादों और कॉलेज स्तर तक उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा में एकरूपता प्रदान करने की अपनी प्राथमिकता जताई।</p>
<p><a href="https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/unemployment-in-rural-india-choice-or-compulsion.html" title="गांवों में बेरोजगारी" target="_blank" rel="noopener"><strong>यह भी पढ़ेंः&nbsp;ग्रामीण भारत में बेरोजगारीः सामान्य या मजबूरी?</strong></a></p>
<p><strong>ऊर्जा अवसंरचनाः</strong> मेघालय, तमिलनाडु और ओडिशा के ग्रामीण निवासियों ने बताया कि बिजली कटौती और लोड शेडिंग का उनके दैनिक जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। उन्होंने 24 घंटे लगातार बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने के उपाय लागू करने पर बल दिया। उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के एक किसान ने बिजली की बढ़ती दरों को चिंता का कारण बताया।</p>
<p>ओडिशा में प्रतिभागियों ने कहा कि वे ऐसे नेताओं को वोट देंगे जो जीवाश्म ईंधन पर उनकी निर्भरता को कम करने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों, विशेष रूप से सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने में मदद करेंगे। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में ऊर्जा बुनियादी ढांचे का संतुलित, समावेशी और सतत विकास प्राप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।</p>
<p><a href="https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/agenda-for-rural-india-growing-difficulties-in-the-agricultural-sector.html" title="कृषि क्षेत्र की मुश्किलें" target="_blank" rel="noopener"><strong>यह भी पढ़ेंः&nbsp;ग्रामीण भारत का एजेंडाः कृषि क्षेत्र की बढ़ती मुश्किलें</strong></a></p>
<p><strong>निष्कर्षः</strong> स्थानीय समुदायों, किसानों, शिक्षकों, कारीगरों और अन्य लोगों द्वारा साझा की गई अंतर्दृष्टि ने ग्रामीण भारत के बुनियादी ढांचे के एजेंडे को आकार देने में अमूल्य योगदान दिया है। स्वास्थ्य, शिक्षा, परिवहन, ऊर्जा जैसे आवश्यक क्षेत्रों में निवेश करके हम न केवल तत्काल जरूरतों को पूरा करते हैं बल्कि परिवर्तनकारी कदमों की एक श्रृंखला भी शुरू करते हैं जो ग्रामीण समुदायों के कल्याण पर गहरा प्रभाव डालते हैं।</p>
<p><em><strong>(लेखक सॉक्रेटस में सीनियर प्रोग्राम मैनेजर हैं।)</strong></em></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/11/image_750x500_65659482c2d47.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ ग्रामीण भारत को बुनियादी ढांचे और सेवाओं का अभी भी इंतजार ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/11/image_750x500_65659482c2d47.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[ग्रामीण भारत पर प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन का संकट]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/growing-crisis-of-pollution-and-climate-change-on-agriculture.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 28 Nov 2023 07:13:13 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/growing-crisis-of-pollution-and-climate-change-on-agriculture.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><em>&ldquo;</em><em>आजकल हम दिन में चार अलग मौसम का अनुभव करते हैं। मौसम में इस बदलाव ने फसल चक्र और उत्पादकता को गंभीर रूप से प्रभावित किया है&rdquo;</em> - पूर्वी पश्चिम खासी हिल्स, मेघालय का एक किसान।</p>
<p>&ldquo;ग्रामीण भारत का एजेंडा&rdquo; विषय पर <strong>रूरल वॉयस</strong> और <strong>सॉक्रेटस</strong> द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में देश के विभिन्न पारिस्थितिक क्षेत्रों के ग्रामीणों के साथ बातचीत ने हमारे सबसे भयावह डर की पुष्टि की कि जलवायु परिवर्तन का असर वहां दिखने लगा है। अधिकांश प्रतिभागी कृषि और संबद्ध क्षेत्रों से जुड़े थे, इसलिए उन्होंने जलवायु परिवर्तन से फसलों को होने वाले नुकसान के बारे में विस्तार से बात की। उत्तर प्रदेश के किसानों ने बताया कि कैसे असामान्य रूप से ज्यादा तापमान ने गेहूं, आम और गन्ने की फसल को प्रभावित किया है। मार्च में बेमौसम बारिश के कारण गेहूं की पकी हुई फसल भी बर्बाद हो गई।</p>
<p>राजस्थान में अनियमित बारिश के कारण किसानों को नुकसान हुआ। ओडिशा के प्रतिभागियों के मुताबिक, असामान्य रूप से भारी वर्षा ने उनकी फसलों को नष्ट कर दिया और मिट्टी की उपजाऊ सतह का क्षरण हुआ। ग्लोबल वार्मिंग के कारण समुद्र के जल स्तर में वृद्धि से ओडिशा के तटीय इलाके के लोग प्रभावित हुए। मेघालय में सीढ़ीदार खेतों, खेतों की मेड़बंदी और खेतों के चारों तरफ पेड़ लगाने जैसे उपायों के बावजूद किसान भारी वर्षा के कारण मिट्टी के कटाव से प्रभावित हुए हैं। चूना पत्थर खनन और वनों की कटाई जैसी गतिविधियों ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है।</p>
<p><a href="https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/agriculture-needs-hand-holding-as-existential-crisis-for-rural-india-increases.html" title="ग्रामीण भारत का एजेंडा" target="_blank" rel="noopener"><strong>यह भी पढ़ेंः कृषि का हाथ थामने की दरकारः ग्रामीण भारत के लिए अस्तित्व का संकट</strong></a></p>
<p>अनियमित बारिश और असामान्य मौसम अप्रत्याशित समय पर कीटों के प्रकोप का कारण भी बन रहे हैं। उत्तर प्रदेश और राजस्थान में गेहूं, आम,&nbsp; मूंग और गन्ना जैसी फसलें साल के अलग-अलग समय में कीटों से प्रभावित रहीं। मेघालय में महिला किसान विभिन्न प्रकार के कीटों के प्रकोप से फसलों के नुकसान से परेशान थीं जो उनकी मक्का, सब्जी और फलों को प्रभावित कर रहे हैं। जो फसलें पहले कीटों से अप्रभावित थीं, जैसे अदरक, केला और रागी, वे कटवर्म जैसे नए कीटों से प्रभावित हो रही थीं।&nbsp;</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/11/image_750x_65648036ceff1.jpg" alt="" /></p>
<p>कई प्रतिभागियों ने प्राकृतिक खेती को इस संकट के समाधान के रूप में देखा और आशा जताई कि सरकार टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने में अधिक सक्रिय भूमिका निभाएगी। उन्होंने यह भी उम्मीद जताई कि प्राकृतिक आपदाओं और कीटों के हमलों के दौरान प्रभावी फसल बीमा जोखिम को कम करने में मदद मिलेगी।</p>
<p><a href="https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/agenda-for-rural-india-growing-difficulties-in-the-agricultural-sector.html" title="कृषि क्षेत्र की मुश्किलें" target="_blank" rel="noopener"><strong>यह भी पढ़ेंः&nbsp;ग्रामीण भारत का एजेंडाः कृषि क्षेत्र की बढ़ती मुश्किलें</strong></a></p>
<p>प्रतिभागियों के साथ बातचीत में यह आम धारणा भी गलत साबित हो गई कि पर्यावरण प्रदूषण मुख्य रूप से एक शहरी समस्या है। मुजफ्फरनगर में ग्रामीणों ने आसपास की चीनी मिलों और दूसरे उद्योगों से नहरों और अन्य जल स्रोतों में प्रदूषण की शिकायत की। ऐसा माना जाता है कि भोजन पर रासायनिक अवशेषों के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में कैंसर और दिल की बीमारियां बढ़ रही हैं। इसकी गूंज जोधपुर में भी सुनाई दी। वहां प्रतिभागियों ने ग्रामीण क्षेत्रों में कैंसर के बढ़ते मामलों को कृषि में रसायनों के अत्यधिक उपयोग से जोड़ा। तमिलनाडु में ग्रामीणों ने बताया कि कैसे उद्योग जल स्रोतों में अपशिष्ट और सीवेज डंप कर रहे हैं और लीचिंग से भूजल दूषित हो रहा है।</p>
<p><a href="https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/rural-india-still-awaits-basic-infrastructure-and-services.html" title="गांवों में बुनियादी ढांचा" target="_blank" rel="noopener"><strong>यह भी पढ़ेंः&nbsp;ग्रामीण भारत को बुनियादी ढांचे और सेवाओं का अभी भी इंतजार</strong></a></p>
<p>हमारे प्रतिभागियों को न केवल पर्यावरणीय मुद्दों का पता था, वे यह भी जानते थे कि वे जनप्रतिनिधियों से क्या चाहते हैं। कोयम्बटूर में प्रतिभागियों ने एक अधिक प्रभावी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, वर्षा जल संचयन और जल संरक्षण संयंत्र और हर गांव में बेहतर खाद्य उत्पाद क्षेत्र बनाये जाने का आह्वान किया। भुवनेश्वर के प्रतिभागियों ने कहा कि जागरूकता बढ़ाना, प्लास्टिक कचरे को कम करना और सौर ऊर्जा को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण हैं। मुजफ्फरनगर में ग्रामीणों ने पंचायत भूमि पर पेड़ लगाने और गांव के तालाबों, जंगलों के संरक्षण का प्रस्ताव रखा।</p>
<p><a href="https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/unemployment-in-rural-india-choice-or-compulsion.html" title="गांवों में बेरोजगारी" target="_blank" rel="noopener">यह भी पढ़ेंः&nbsp;ग्रामीण भारत में बेरोजगारीः सामान्य या मजबूरी?</a></p>
<p>हर जगह के ग्रामीण शहरी लोगों की तरह ही जागरूक युक्त थे। उनका रोजमर्रा का जीवन पर्यावरण पर अधिक निर्भर है, इसलिए उन्होंने पर्यावरण प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को अधिक तीव्रता से महसूस किया। वे सीमित संसाधनों से अपने परिवेश की सुरक्षा और संरक्षण के उपायों को लागू करने के इच्छुक थे।</p>
<p><em><strong>(लेखिका सॉक्रेटस में एसोसिएट पद पर कार्यरत हैं )</strong></em></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/11/image_750x500_6565951308cb9.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ ग्रामीण भारत पर प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन का संकट ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/11/image_750x500_6565951308cb9.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कृषि का हाथ थामने की दरकार: ग्रामीण भारत के लिए अस्तित्व का संकट]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/agriculture-needs-hand-holding-as-existential-crisis-for-rural-india-increases.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 27 Nov 2023 12:37:44 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/agriculture-needs-hand-holding-as-existential-crisis-for-rural-india-increases.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">भारतीय कृषि अस्तित्व के संकट से गुजर रही है। पूरा ग्रामीण क्षेत्र सामाजिक और पर्यावरण की चुनौतियों से घिरा है। हालांकि सड़क और स्वच्छता जैसे इन्फ्रास्ट्रक्चर और मोबाइल फोन के क्षेत्र में स्पष्ट सुधार भी हुए हैं। आप पूछ सकते हैं, तो क्या यह विरोधाभास है? जवाब है, &lsquo;हां&rsquo;। इस जवाब का आधार है किसान संगठनों, सिविल सोसायटी, नीति निर्माताओं और मार्केट इंटरमीडियरी जैसे स्टेकहोल्डर के साथ छह महीने तक हुई चर्चा। यह चर्चा नई दिल्ली या अन्य महानगरों में नहीं, बल्कि विविध कृषि-जलवायु, आर्थिक शक्ति और फसल पैटर्न वाले पांच राज्यों के छोटे शहरों में हुई। हमारे निष्कर्ष आपको कृषि की हकीकत से अवगत कराएंगे। यह नई दिल्ली अथवा किसी प्रदेश की राजधानी में बैठे ब्यूरोक्रेट के आकलन के विपरीत हो सकता है, लेकिन यह ग्रामीण क्षेत्र के समग्र विचार को प्रदर्शित करता है, जिसे एक प्रभावी नीतिगत हस्तक्षेप और राजनीतिक मदद की दरकार है।</span></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">अगर आप नई दिल्ली में किसी वरिष्ठ सरकारी अधिकारी से बात कीजिए तो वे आपको बताएंगे कि नई सड़कों के निर्माण, बिजली कनेक्शन, घर और टॉयलेट बनाने जैसे क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। वे आपको यह भी बता सकते हैं कि ग्रामीण इलाकों में मोबाइल फोन अब आम हो गए हैं तथा वहां हर तरह के सामान और सेवाओं का बाजार बढ़ रहा है।</span></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><a href="https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/growing-crisis-of-pollution-and-climate-change-on-agriculture.html" title="एजेंडा फॉर रूरल इंडिया" target="_blank" rel="noopener"><strong><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">यह भी पढ़ेंः&nbsp;</span>ग्रामीण भारत पर प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन का संकट</strong></a></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">वास्तव में ग्रामीण भारत ने अनेक बदलाव देखे हैं। सड़क, बिजली जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर तथा विभिन्न सेवाओं तक पहुंच निश्चित रूप से बेहतर हुई है। इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों की योजनाओं को श्रेय दिया जाना चाहिए। लेकिन ये भौतिक इंफ्रास्ट्रक्चर सुविधाएं गांव और छोटे शहरों में रहने वालों की बढ़ती आकांक्षाओं की ओर भी इशारा करती हैं। उनकी आकांक्षाएं शहर वासियों के समान हैं, भले ही ग्रामीण क्षेत्र के केंद्र &lsquo;कृषि&rsquo; के सामने अपने हाल पर छोड़ दिए जाने का जोखिम है। हालांकि ग्रामीण भारत की आकांक्षाएं सही और अमल में लाने योग्य हैं। बशर्ते इसके लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति हो तथा भ्रष्टाचार की समस्या के साथ प्रभावी तरीके से निपटा जाए।</span></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">देशभर में हमारी चर्चा में कृषि क्षेत्र के लिए जो जोखिम उभर कर सामने आए, उनमें कर्ज का बढ़ता स्तर, श्रमिकों की मजदूरी समेत बढ़ती इनपुट लागत, नकली कीटनाशकों की बेरोकटोक बिक्री, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव, उपज की उचित कीमत न मिलना और राजनीतिक उदासीनता शामिल हैं।</span></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">राजस्थान के जोधपुर में बालोतरा, बाड़मेर, जैसलमेर, सीकर, नागौर तथा अन्य जिलों से आए लोगों से जब हमने सवाल किया कि &ldquo;2030 में आपका गांव का सपना क्या है,&rdquo; तो उनका जवाब था, &ldquo;प्लास्टिक मुक्त, पर्यावरण युक्त, नशा मुक्त, वाई-फाई युक्त। परिवहन सुविधा सहित, प्रदूषण रहित, 24 घंटे बिजली और एक स्टेडियम हो जिसमें लड़के, लड़कियां, महिलाएं रोज दौड़ें। आधुनिक शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं हों और कृषि संबंधी जानकारी विज्ञान के आधार पर मिले।&rdquo;</span></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">एक अन्य प्रतिभागी ने कहा, &ldquo;हमारे गांव हरे-भरे हों, जल स्रोत पर्याप्त और शुद्ध हो। साफ-सुथरे गांव हों, प्लास्टिक मुक्त हो, विद्यालयों में लड़के-लड़कियों की संख्या खूब बड़ी हो, खास कर सरकारी संस्थानों में।&rdquo;</span></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">गांवों में रहने वालों का एक सपना है। वे अपने गांव में शहरों के समान सुविधाएं चाहते हैं। वे भी बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली आदि की उम्मीद रखते हैं जिनसे जीवन आसान हो। लेकिन शांतिपूर्ण और प्रदूषण मुक्त ऐसा गांव जहां सबके पास काम हो, हकीकत से काफी दूर है। ग्राम्य जीवन काफी बदल गया है। अनेक ग्रामीण क्षेत्र अब भी निरंतर बिजली, अच्छी सड़कें, साफ पानी, क्वालिटी शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सेवाओं से महरूम हैं। लोग संघर्ष कर रहे हैं तथा अधिकतर के लिए खेती मुनाफे का काम नहीं रह गया है। ना आमदनी के लिहाज से, ना सामाजिक स्टेटस के लिहाज से। यही नहीं, ग्राम वासी जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, जीवन शैली से पनपने वाली बीमारियों, बेरोजगारी, ड्रग्स जैसी नई समस्याओं का सामना कर रहे हैं। एक समय यह समस्याएं शहरों की हुआ करती थीं, गांवों की नहीं।</span></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><a href="https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/agenda-for-rural-india-growing-difficulties-in-the-agricultural-sector.html" title="एजेंडा फॉर रूरल इंडिया" target="_blank" rel="noopener"><strong><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">यह भी पढ़ेंः&nbsp;</span>ग्रामीण भारत का एजेंडाः कृषि क्षेत्र की बढ़ती मुश्किलें</strong></a></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">मीडिया संस्थान रूरल वॉयस, जो रूरल वर्ल्ड का साझा पब्लिकेशन भी है, और गैर-लाभकारी संस्था सॉक्रेटस ने ग्रामीण भारत के नागरिकों की चुनौतियों और आकांक्षाओं को सुनने-समझने के लिए उनके साथ अपनी तरह की पहली अखिल भारतीय सम्मेलन श्रृंखला शुरू करने का फैसला किया। इसके पीछे दो मुख्य कारण थे। पहला, ग्रामीण क्षेत्रों को अक्सर मुख्यधारा के विमर्श में हाशिए पर रखा जाता है। खबरों में किसान आत्महत्या, मिलावटी शराब या मध्याह्न भोजन योजना पर बहस को छोड़ दें तो ग्रामीण क्षेत्र की बातों को शायद ही जगह मिलती है। ऐसे देश में जहां आधी से अधिक आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में बसी है, यह बेमेल बड़ा अविश्वसनीय लगता है। दूसरा कारण इंटरनेट और बेहतर बुनियादी ढांचे के साथ ग्रामीण परिदृश्य में पिछले 15 वर्षों में हुए बड़े बदलावों से संबंधित है।</span></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">इन सम्मेलनों के माध्यम से, सॉक्रेटस और रूरल वॉयस का उद्देश्य ग्रामीण भारत की वर्तमान मनःस्थिति को समझना और वहां उठाए गए मुद्दों पर चर्चा शुरू करना था। इस लेख का उद्देश्य उन लोगों के विचारों और भावनाओं को ईमानदारी से प्रतिबिंबित करना है जिनसे हमने उनके जीवन, उनकी समस्याओं, आशाओं और उज्जवल भविष्य के सपनों के बारे में बात की।</span></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">हमारे इस कार्य में देश के 5 राज्यों के लोगों का प्रतिनिधित्व है। यह 5 क्षेत्रों में विविधता को दिखाने का प्रयास है- उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम और उत्तर-पूर्व। हमने उत्तर-पूर्व पर विशेष ध्यान दिया है। यहां की कम आबादी, विशिष्ट सांस्कृतिक विविधता और दूरी को देखते हुए, इसे अक्सर राष्ट्रीय संवाद से बाहर रखा जाता है। हालांकि, हमें ध्यान रखना चाहिए कि भारत विशाल और विविधतापूर्ण देश है। परंतु हम हर क्षेत्र या व्यक्ति के दृष्टिकोण को शामिल नहीं कर सकते थे। इसलिए हमने भारत के हर क्षेत्र से पांच राज्यों को चुना। प्रत्येक राज्य में हमने एक स्थानीय संगठन के साथ साझेदारी की, जिसने वहां की आबादी का व्यापक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने में हमारी मदद की।</span></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><a href="https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/rural-india-still-awaits-basic-infrastructure-and-services.html" title="गांवों में बुनियादी ढांचा" target="_blank" rel="noopener"><strong><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">यह भी पढ़ेंः&nbsp;</span>ग्रामीण भारत को बुनियादी ढांचे और सेवाओं का अभी भी इंतजार</strong></a></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">हमारे सम्मेलन पांच जगहों पर थे। प्रत्येक स्थान पर हमने आसपास के 10-12 जिलों के लोगों के साथ बैठक की। ये स्थान थे भुवनेश्वर (ओडिशा), कोयंबटूर (तमिलनाडु), जोधपुर (राजस्थान), मुजफ्फरनगर (उत्तर प्रदेश) और शिलांग (मेघालय)। ये राज्य सांस्कृतिक, आर्थिक, कृषि-जलवायु और राजनीतिक रूप से भिन्न हैं।</span></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">हमारे स्थानीय साझेदार थे- ओडिशा में लाइवलीहुड ऑस्टरनेटिव्स इन ओडिशा, तमिलनाडु में टीएनएफपीए (तमिलनाडु फार्मर्स प्रोटेक्शन एसोसिएशन) और एफएमआईएफ (फार्मर्स मर्चेंट्स इंडस्ट्रियलिस्ट्स फेडरेशन), राजस्थान में साउथ एशिया बायोटेक्नोलॉजी सेंटर, उत्तर प्रदेश में किसान प्रतिनिधि उमेश पंवार, नरेंद्र पाल वर्मा व धर्मेंद्र मलिक और मेघालय में नेसफास (नॉर्थ ईस्ट सोसायटी फॉर एग्रोइकोलॉजी सपोर्ट)। उनकी मदद से हम 60 जिलों से 300 से अधिक प्रतिभागियों को साथ लाने में सफल रहे।</span></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">सम्मेलन में विभिन्न पेशे के लोगों ने भाग लिया। उनमें किसान, स्थानीय व्यापारी और व्यवसायी, स्वयं सहायता समूहों के सदस्य, स्थानीय निर्वाचित प्रतिनिधि, स्थानीय सरकारी अधिकारी, मजदूर और प्रवासी, कॉलेज छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता और सेवा क्षेत्र के पेशेवर शामिल थे। सम्मेलन में यह सुनिश्चित भी किया गया कि सभी लिंग और सामाजिक समूहों के लोग उपस्थित हों।</span></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;"><strong>कृषि के सामने आर्थिक सामाजिक और पर्यावरण संबंधी अस्तित्व का संकट</strong></span></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><em><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">&ldquo;किसान तो खुशहाल है ही नहीं, 100% किसान कर्जदार हुआ बैठा है।&rdquo; - मुजफ्फरनगर का एक प्रतिभागी।</span></em></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">बीज से लेकर मजदूरी और ईंधन से लेकर कीटनाशक तक सभी इनपुट महंगे हो गए हैं। इन्हें बाजार से ही खरीदना पड़ता है। उर्वरकों और कीटनाशकों का प्रयोग साल दर साल बढ़ रहा है। किसानों को उनकी उपज की सही और समय पर कीमत नहीं मिल रही है। शामली के गन्ना किसानों की शिकायत है कि वर्षों से उनका भुगतान लंबित है। ओडिशा के एक सब्जी किसान का कहना है कि दूर बाजार तक पहुंचने के लिए उसके पास परिवहन और कोल्ड स्टोरेज की सुविधा नहीं है। यही शिकायत मेघालय के किसानों की है। तमिलनाडु के किसानों ने सभी फसलों के लिए समर्थन मूल्य की बात कही।</span></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">एक तरफ खेती की लागत बढ़ी है तो दूसरी तरफ इसमें जोखिम भी बढ़ा है। जलवायु परिवर्तन से मौसम असमान हो गया है जिसकी वजह से हीट वेव, असमय बारिश और कीटों के हमले होते हैं। जलवायु परिवर्तन पर चर्चा अब अभिजात वर्ग से निकलकर सबके बीच आ गई है। हर जगह इस विषय पर विस्तार से चर्चा हुई। चाहे गेहूं या धान हो, आम या गन्ना हो या फिर टमाटर हो, हर फसल पर जलवायु परिवर्तन का असर है और लोग असहाय दिख रहे हैं। मानव और पशु का संघर्ष देश के अलग-अलग हिस्से में अलग रूप में सामने आया। उत्तर प्रदेश में आवारा पशुओं की समस्या गंभीर नजर आई जिनकी वजह से किसान खेतों में ही सोने के लिए मजबूर हैं। ओडिशा और राजस्थान में भी पशु फसलों को बर्बाद कर रहे हैं। कोयंबटूर के आसपास हाथी जैसे जानवरों का अक्सर किसानों से सामना होता है।</span></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><a href="https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/unemployment-in-rural-india-choice-or-compulsion.html" title="गांवों में बेरोजगारी" target="_blank" rel="noopener"><strong><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">यह भी पढ़ेंः&nbsp;</span>ग्रामीण भारत में बेरोजगारीः सामान्य या मजबूरी?</strong></a></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">एक प्रतिभागी के अनुसार, &ldquo;केमिकल का अत्यधिक प्रयोग गांव में सबसे ज्यादा बर्बादी का कारण है। केमिकल बहुत ज्यादा है, चाहे वह जमीन में हो, जानवरों में हो, इंसानों में हो, हर जगह केमिकल ही केमिकल है।&rdquo;</span></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">हम लोग पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शहर मुजफ्फरनगर में थे। पंजाब के साथ यह क्षेत्र भी भारत में हरित क्रांति के केंद्र में रहा है। लेकिन यहां भी किसान स्वयं उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक इस्तेमाल का मुद्दा सामने लेकर आए। इससे पता चलता है कि इनका प्रयोग कितना असंतुलित तरीके से हो रहा है। किसानों का कहना था-</span></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><em><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">&ldquo;नकली पेस्टिसाइड आ गई है कोई चेकिंग नहीं है।&rdquo;</span></em></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><em><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">&ldquo;डीलर ट्रेड में लाला लोग बैठे हैं जिनको एग्रीकल्चर का एबीसीडी भी नहीं पता। वे हमें दवाइयां दे रहे हैं।&rdquo;</span></em></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">अत्यधिक रसायनों के इस्तेमाल को लेकर आलोचना हर जगह दिखाई दी। आश्चर्यजनक रूप से प्राकृतिक खेती का नैरेटिव लोकप्रिय दिखा। लोगों का कहना था कि रसायनों से मिट्टी की उर्वरता कम हो गई है, पानी प्रदूषित हो गया है, खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता गिर गई है, फसलों में गंभीर बीमारियां लगने लगी हैं और खर्च भी बढ़ गया है। किसान प्राकृतिक और नियमित खेती के नैरेटिव में फस गए हैं। हर साल होने वाले और कई बार अप्रत्याशित रूप से कीटों के हमले पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है। खेती को सस्टेनेबल और खाद्य पदार्थों को सेहतमंद बनाने का विचार लगभग हर जगह दिखा, खासकर राजस्थान और ओडिशा में। मुजफ्फरनगर और कोयंबटूर में किसान ज्यादा प्राकृतिक की ओर जाना चाहते हैं, लेकिन वे पसोपेश में हैं कि यह सफल होगा या नहीं। अनेक लोगों के लिए यह जोखिम बहुत बड़ा है। कुल मिलाकर समाधान के लिए जो सुझाव आए उनमें नकली कीटनाशकों पर रोक, डीलरों का नियमन, किसानों को कृत्रिम इनपुट के संतुलित इस्तेमाल की जानकारी देना, ऑर्गेनिक खेती अपनाना और प्राकृतिक सॉयल सप्लीमेंट को अपनाना शामिल हैं। मेघालय के पश्चिमी खासी हिल्स के एक किसान का कहना था कि किसान होने के नाते उन्हें प्रकृति का ध्यान रखने की जरूरत है, और बदले में प्रकृति उनका ख्याल रखेगी।</span></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><strong><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">आकांक्षाओं और वास्तविकता में अंतर से मजदूरों की कमी, बेरोजगारी और ड्रग्स की समस्या</span></strong></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">जैसा एक प्रतिभागी का कहना था, &ldquo;अगर बिहार के मजदूर न आएं तो आप खेती नहीं कर सकते। हमने खुद खेती करनी छोड़ दी है।&rdquo; चाहे मुजफ्फरनगर हो या कोयंबटूर हर जगह किसानों की शिकायत है कि खेतों में काम करने के लिए मजदूर तलाशना बड़ा संघर्ष हो गया है। मजदूरी काफी बढ़ गई है। गांव के युवा भले ही खाली बैठे हों लेकिन वे खेतों में नहीं जाएंगे। इसलिए खेत मालिक अनेक मौकों पर प्रवासी मजदूरों पर ही निर्भर होते हैं।</span></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">&ldquo;नरेगा को खेती में जोड़कर न्यूनतम मजदूरी सुनिश्चित की जाए। हमारे राजनीतिक तंत्र की सबसे बड़ी समस्या है मुफ्त में चीजें देना।&rdquo; मजदूरों की समस्या से परेशान बागपत के एक किसान का कहना था कि कृषि मजदूरी को महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत शामिल किया जाना चाहिए। इस तरह इस स्कीम से मजदूरी का एक हिस्सा भुगतान हो जाएगा। विभिन्न क्षेत्र के भू-स्वामी किसानों की राय थी कि तथाकथित मुफ्त वितरण बंद होना चाहिए। यह लोगों के काम करने की प्रवृत्ति को प्रभावित करता है।</span></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><em><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">एक किसान के अनुसार, &ldquo;किसान से आजकल कोई शादी नहीं करता। बच्चे एसी में बैठना पसंद करते हैं।&rdquo;</span></em></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">भारत में कृषि का भविष्य दुविधापूर्ण लगता है तो इसका कारण सिर्फ आर्थिक या पर्यावरण संबंधी चुनौतियां नहीं, बल्कि इससे गंभीर सामाजिक चुनौती भी जुड़ी हुई है। युवा खेती करना नहीं चाहते। खेती करने वालों को दुल्हन नहीं मिलती। समाज खेती को चुका हुआ मानने लगा है। उसे लगता है कि खेती में भविष्य अनिश्चित है, इसमें कोई कमाई नहीं। फसल खराब होने पर किसान के कर्ज में डूबने की आशंका बहुत अधिक है।</span></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">इसका परिणाम यह है कि परिवार की मदद से युवा उच्च शिक्षा हासिल कर रहे हैं। हालांकि गिने-चुने सरकारी पदों को छोड़ दें तो गांवों में अच्छी नौकरी कहीं नहीं है। खेती से इतर मैन्युफैक्चरिंग, सर्विसेज या लघु उद्योगों में रोजगार के अवसर भी बहुत कम हैं। इसके कई कारण हैं- ग्रामीण क्षेत्रों में सीमित क्वालिटी शिक्षा, व्यावसायिक शिक्षा का अभाव तथा ग्रामीण उद्योगों को आगे बढ़ाने के लिए कर्ज और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी। नतीजा- आकांक्षाओं और क्षमताओं से लबरेज युवक-युवतियां बेरोजगार हैं।</span></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><em><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">&ldquo;गांव नशा मुक्त होना चाहिए, यह सब की प्राथमिकता है। नशा नहीं होना चाहिए और इसके प्रति युवाओं में जागरूकता बहुत जरूरी है।&rdquo; - एक प्रतिभागी।</span></em></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">2016 में हिंदी फिल्म &lsquo;उड़ता पंजाब&rsquo; ने पंजाब में ड्रग्स की समस्या पर फोकस किया था। 2023 में ऐसा लगता है कि ड्रग्स का इस्तेमाल शहरी अभिजात वर्ग और पंजाब तक ही सीमित नहीं है। भुवनेश्वर हो या जोधपुर, हर जगह हमें यह सुनने को मिला कि समाज के हर वर्ग में बड़ी संख्या में युवा ड्रग्स ले रहे हैं।</span></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">शराब ग्रामीण इलाकों में लंबे समय से प्रमुख समस्या रही है। मेघालय, तमिलनाडु और ओडिशा में यह समस्या हमें अब भी सुनने को मिली। हालांकि ड्रग्स का पूरे देश में बढ़ता इस्तेमाल देख लगता है मुख्यधारा की मीडिया की नजरों में यह नहीं आया। गहरी समझ के अभाव में कोई इसके अलग-अलग कारण सोच सकता है। जैसे, क्या यह बेरोजगारी के कारण है, क्या यह इस वजह से है कि लोकप्रिय गाने और मीडिया इसे &lsquo;कूल&rsquo; और स्वीकार्य बताने लगा है, या फिर ड्रग्स आसानी से मिलने लगे हैं? बेरोजगारी, सामाजिक संस्थाओं की कमी, लोगों की बढ़ती चाहत और उस हिसाब से ड्रग्स की उपलब्धता के कारण यह पूरे देश में महामारी की तरह फैल गई है।&nbsp;</span></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><strong><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर अब भी बुनियादी सेवाएं उपलब्ध कराने में असमर्थ</span></strong></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">लोग अब भी अच्छी क्वालिटी के बुनियादी इन्फ्रास्ट्रक्चर का इंतजार कर रहे हैं। मेघालय के गारो, खासी और जैंतिया समुदाय के लोगों को अभी तक आने-जाने अथवा सामान ले जाने के लिए अच्छी सड़कें नहीं मिली हैं। रोड कनेक्टिविटी बढ़ी तो है, लेकिन वह अपर्याप्त है। जहां सड़क है वहां सार्वजनिक ट्रांसपोर्ट नहीं है। यही स्थिति बिजली की है। ग्रामीण भारत में पूरे दिन बिजली की सप्लाई आज भी सपना है। आज के युग में इंटरनेट का लगातार कनेक्शन मिलना भी आवश्यक है।</span></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">राजस्थान के बालोतरा के एक किसान को अभी तक पीने के लिए साफ पानी का इंतजार है। देश के दूसरे छोर पर स्थित मेघालय के लोगों की भी यही स्थिति है, जो नल का कनेक्शन चाहते हैं। मुजफ्फरनगर में किसानों के पास पानी तो है, लेकिन उनकी चिंता भूजल में मिल चुके रसायनों और धातुओं के जहरीले प्रभाव को लेकर है।</span></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">गांव में शिक्षा की बात आती है तो अक्सर लोगों को लगता है कि वे पीछे छूट गए हैं। सरकारी और निजी स्कूलों के बीच अंतर बढ़ता जा रहा है। लोग अच्छी सार्वजनिक शिक्षा चाहते हैं, लेकिन जहां स्कूल है वहां शिक्षकों की संख्या पर्याप्त नहीं। सरकारी स्कूलों के बारे में धारणा है कि वे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं दे सकते।</span></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">अच्छी सेहत और स्वास्थ्य सेवाओं की जरूरत भी हर जगह लोगों में बढ़ती दिखाई दी। जीवन शैली से जुड़ी बीमारियां बढ़ने के साथ लोग बेहतर इलाज की मांग करने लगे हैं, लेकिन मल्टी स्पेशलिटी अस्पताल गांव से काफी दूर हैं। स्थानीय स्वास्थ्य इन्फ्रास्ट्रक्चर में अनेक खामियां हैं। सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्र पर्याप्त नहीं और वहां दवाई और उपकरण भी नहीं मिलते। एक प्रतिभागी के अनुसार, &ldquo;हम अपने गांव में स्वच्छ वातावरण चाहते हैं, वहां आराम करने की जगह हो, खेल का मैदान हो, व्यायाम करने की सुविधा हो।&rdquo;</span></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">गांव में रहने वाली पुरानी पीढ़ी समाज में बदलाव को देख रही है। उन्हें लगता है कि लोगों में भाईचारा कम होता जा रहा है। युवा पीढ़ी हमेशा अपने फोन में लगी रहती है और वह गांव-परिवार से दूर हो गई है। खानपान और जीवन शैली बदलने के साथ युवाओं में मोटापे की बीमारी बढ़ रही है।</span></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">अक्सर अनियोजित तरीके से सड़कों और इन्फ्रास्ट्रक्चर का निर्माण होने से पेड़ काटे जा रहे हैं। वाहनों की संख्या और कचरा बढ़ता जा रहा है। लोगों के बैठने के लिए पहले जो खुली जगह हुआ करती थी, अब वह कहीं नहीं दिखती। अब लोग पेड़ के नीचे बैठकर जीवन और राजनीति की चर्चा नहीं करते। ऐसे स्थान की जरूरत है जहां लोग एकत्र हो सकें, आराम से बैठ सकें, बातें कर सकें तथा जहां युवा खेलकूद-व्यायाम कर सकें। एक स्थान सबके मनोरंजन का भी हो। गांव को पुनर्जीवित करने के लिए इस तरह के स्थान का निर्माण करना सबसे आसान और महत्वपूर्ण तरीका हो सकता है।</span></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><strong><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">चुनावी राजनीति और प्रशासन में भ्रष्टाचार</span></strong></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><em><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">&ldquo;सबसे पहले वादा यह हो कि वादा करने वाला वादा नहीं निभाए तो उसे कानूनन अपराध माना जाए और इसके लिए सजा का प्रावधान हो। क्योंकि वे वादा करते हैं, आप वोट देते हैं, वे चले जाते हैं फिर अगले 5 साल बाद आए ही नहीं तो बात ही खत्म हो गई।&rdquo;</span></em></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">कोयंबटूर सम्मेलन में विभिन्न जिलों से आए ग्रामीण लोगों ने चुनावी राजनीति में धनबल और बाहुबल का मुद्दा उठाया। वहां एक व्यक्ति का कहना था कि कानून अभी सिर्फ किसानों को निशाना बनाता है। अगर कहीं भ्रष्टाचार सामने आता है तो सरकारी अधिकारी पर भी कार्रवाई होनी चाहिए।</span></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">भ्रष्टाचार के खिलाफ राजस्थान में भी तगड़ा माहौल दिखा। सम्मेलन में आए लोगों ने पैसे देकर और &lsquo;मुफ्त&rsquo; का वादा करके मतदाताओं को लुभाने पर रोक लगाने की मांग की। वे चाहते हैं कि भ्रष्टाचारी नेताओं और आपराधिक रिकॉर्ड वाले लोगों के चुनाव लड़ने पर रोक लगे। लोग जुमले सुनकर थक गए हैं। वे चाहते हैं कि उनका प्रतिनिधि जो वादे करके चुनाव जीता है, उन वादों को वह पूरा करे।</span></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">ऐसा लगता है कि भ्रष्टाचार मुक्त भारत अभी दूर का सपना है। प्रशासनिक कार्यों में भ्रष्टाचार भी एक बड़ा मुद्दा उभर कर सामने आया। ज्यादातर लोगों का कहना था कि स्थानीय प्रशासन में भ्रष्टाचार उनके गांव की प्रगति में बाधा है। पंचायत और कोऑपरेटिव में भ्रष्टाचार मुजफ्फरनगर और जोधपुर में कई गरमा-गरम बहस का मुद्दा रहा। स्थानीय स्तर पर जवाबदेही बढ़ाने के एक समाधान के रूप में ग्राम सभाओं को मजबूत बनाने का सुझाव आया। भुवनेश्वर में प्रतिभागियों ने मनरेगा जैसी सरकारी स्कीम समेत हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार को लेकर चिंता जताई। शिलांग में भी लोगों की मांग थी कि भ्रष्टाचार मुक्त सरकार बने और वह वादों पर खरी उतरे।भ्रष्टाचार पर बातचीत हाल के वर्षों में भले ही कम हुई जान पड़ती हो, लेकिन लोगों को लगता है कि यह लगातार गंभीर मुद्दा बना हुआ है।&nbsp;</span></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><strong><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">वोट देने से पहले काफी सोच-विचार&nbsp;</span></strong></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">जब लोगों से पूछा गया कि राज्य और राष्ट्रीय चुनाव में उनके लिए सबसे बड़ा मुद्दा क्या रहेगा, तो कागज पर अपनी बात लिखने से पहले उन्होंने काफी देर तक सोच विचार किया। लोग राजनीतिक रूप से जागरूक हैं। केंद्र और राज्य सरकार के लिए कौन से मुद्दे प्राथमिकता में है, यह अंतर स्पष्ट है। मेघालय में लोकसभा प्रत्याशी से ज्यादातर लोगों की मांग थी कि वह राष्ट्रीय स्तर पर राज्य और वहां की संस्कृति का प्रतिनिधित्व करे, जनजातीय भाषाओं को आठवीं अनुसूची में स्थान दिलाए, शांति कायम करने में भूमिका निभाए और राष्ट्रीय योजनाओं को राज्य में अमल करवाए। राज्य चुनाव के प्रतिनिधियों से उनकी उम्मीद थी कि वह सामुदायिक विकास, जलापूर्ति और रोजगार के लिए कम करे। इसी तरह राजस्थान में विधानसभा चुनाव के प्रत्याशियों से लोगों की उम्मीदें नौकरियां, कानून व्यवस्था, शिक्षा, बिजली आदि को लेकर थी, तो राष्ट्रीय प्रतिनिधियों से नदियों को जोड़ने पर फोकस करने की अपेक्षा थी।</span></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">पानी भी हर क्षेत्र में लोगों की चर्चा का विषय रहा। भारत दुनिया के सबसे अधिक जल संकट वाले क्षेत्रों में है। चाहे पीने के पानी की बात हो अथवा सिंचाई के पानी की, इसकी कमी हम सबको प्रभावित करती है। दुर्भाग्यवश ग्रामीण क्षेत्रों में लोग औरों से ज्यादा इस समस्या को भुगत रहे हैं। यह जरूरी है कि हमारी राजनीतिक और नीतिगत बातचीत में इन दोनों महत्वपूर्ण मुद्दों को शामिल किया जाए।</span></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><strong><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">ग्रामीण भारत अपना उचित स्थान मांग रहा है</span></strong></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">&ldquo;राजनीतिक दल ग्रामीण विकास की योजनाओं के मुद्दों को अपने घोषणा पत्र में शामिल कर घोषणा पत्र समिति में ग्रामीणों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करें।&rdquo; एक प्रतिभागी का यह कहना गांव की आकांक्षा को बताता है। देश के 60 जिलों के 300 से ज्यादा लोगों की दबी हुई आकांक्षा यही है कि राष्ट्रीय परिकल्पना में ग्रामीण भारत को भी स्थान मिले। हमारा मीडिया, सिनेमा, हमारी आकांक्षाएं और राजनीति सब 65% भारतीयों के जीवन की हकीकत से दूर जाती दिख रही हैं। इन ज्वलंत मुद्दों का समाधान न करना गवर्नेंस की नाकामी है। सड़क और स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव जैसी समस्याएं तो दशकों से हैं, जलवायु परिवर्तन और ड्रग्स की समस्याएं हालिया हैं।</span></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">लोगों में कृषि गतिविधियों के प्रति आकर्षण फिर से जगाने की जरूरत है। किसानों के बच्चे और युवा खेती नहीं करते हैं तो कोई भविष्य नहीं है। इसलिए एक किसान का कहना था, &ldquo;क्या स्वाभिमान नहीं है हमारे अंदर&hellip; हम मेहनत वाले लोग हैं, अन्नदाता कहलाए जाते हैं किसान&hellip; खुद नहीं कमा सकते क्या&hellip; आप हमें व्यवस्थाएं दीजिए, साधन दीजिए, बाकी का हम कर लेंगे।&rdquo;</span></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">लोगों को अब भी अपने गांव पर और खुद पर गर्व है। वे विकास चाहते हैं, लेकिन जानते हैं कि शहर जाने का मतलब जरूरी नहीं कि उनका जीवन बेहतर हो जाएगा। वे ऐसे अनेक लोगों को जानते हैं जो शहरों में झुग्गी बस्तियों में रहते हैं, गिग इकोनॉमी में काम करते हैं। इसके बजाय वे गांव में ही अपना बेहतर भविष्य बना सकते हैं। अनकहा सवाल है- &lsquo;फ्री बी&rsquo; देने के बदले क्या यह संभव नहीं कि गांव में निवेश किया जाए और स्थानीय स्तर पर उद्यमी तथा बिजनेस खड़े किए जाएं, जिससे वहां के लोगों का जीवन सुधर सके? क्या अच्छी एक्सटेंशन सेवा और मार्केटिंग से खेती की मदद नहीं की जा सकती है?</span></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">ग्रामीण भारत की आकांक्षा एक बेहतर जीवन की है, और यह आकांक्षा पूरे देश में है। गांव के लोग काम करने और इस सपने को हकीकत में बदलने के लिए तैयार हैं। कोयंबटूर में किसानों का एक समूह किसान परिवारों को डिस्काउंट पर चिकित्सा सुविधा मुहैया कराता है। लोग एकजुट हों तो उनकी ताकत बढ़ जाती है। सरकार सही कदम उठाए और बाजार की मदद मिले, तो इनकी आकांक्षाएं हकीकत बन सकती हैं।</span></p>
<p dir="ltr" style="color: #222222; font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; font-size: small; font-style: normal; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; font-weight: 400; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; white-space: normal; background-color: #ffffff; text-decoration-thickness: initial; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial; line-height: 1.8; margin-top: 0pt; margin-bottom: 0pt;"><em><strong><span style="font-size: 11pt; font-family: Arial, sans-serif; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; font-variant-alternates: normal; vertical-align: baseline;">(प्रचुर गोयल सॉक्रेटस के डायरेक्टर हैं।)</span></strong></em></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/11/image_750x500_65643e1e90365.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ कृषि का हाथ थामने की दरकार: ग्रामीण भारत के लिए अस्तित्व का संकट ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[ग्रामीण भारत का एजेंडाः कृषि की चिंता सभी को, किसानों की सुध लेने वाला कोई नहीं]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/agenda-of-rural-india-everyone-is-concerned-about-agriculture-no-one-takes-care-of-the-farmers.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 13 Nov 2023 17:33:51 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/agenda-of-rural-india-everyone-is-concerned-about-agriculture-no-one-takes-care-of-the-farmers.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कृषि उत्पादन बढ़ाना, कृषि में तकनीक को बढ़ावा देना, जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए लचीली कृषि प्रणाली को अपनाने जैसे तमाम मुद्दों पर हाल के वर्षों में चर्चा तेज हो गई है। कृषि को लेकर सभी चिंता कर रहे हैं लेकिन किसानों, गांवों और ग्रामीण नागरिकों के कल्याण की सुध लेने वाला कोई नहीं है। मीडिया संस्थान <strong>रूरल वॉयस</strong> और गैर-सरकारी संगठन <strong>सॉक्रेटस</strong> द्वारा इस महीने की शुरुआत में दिल्ली में आयोजित &lsquo;ग्रामीण भारत का एजेंडा&rsquo; कार्यक्रम की पैनल चर्चा में यह बात उभर कर सामने आई। इस पैनल चर्चा का विषय था &lsquo;ग्रामीण भारत चुने हुए प्रतिनिधियों से क्या चाहता है&rsquo;। इस पैनल चर्चा का संचालन वरिष्ठ पत्रकार और समाचार एजेंसी पीटीआई के पूर्व संपादक राजेश महापात्रा ने किया।&nbsp;</p>
<p><strong>किसानों के लिए होना चाहिए बदलावः ईसन</strong></p>
<p>तमिलनाडु फार्मर्स प्रोटेक्शन एसोसिएशन के संस्थापक ईसन ने पैनल चर्चा के शुरुआती सवाल के जवाब में कहा, &ldquo;100 साल पहले सहकारी समिति की व्यवस्था बनाई गई थी। सहकारी समितियां किसानों के लिए हैं, लेकिन पूरी व्यवस्था पर नेताओं का कब्जा हो गया है। अब वे किसानों को मजबूर कर रहे हैं। इसी तरह, एफपीओ (किसान उत्पादक संघ) निश्चित रूप से किसानों के हित में हैं, धीरे-धीरे उन पर भी नेताओं का कब्जा हो जाएगा।&rdquo; &nbsp;उन्होंने कहा कि देश में कृषि नीति तो है, लेकिन किसान कल्याण नीति नहीं है। किसानों के संरक्षण की बात आती है, तो कोई किसान संरक्षण अधिनियम भी नहीं है। हर जगह किसानों के अधिकारों को छीना गया है। केंद्र सरकार, राज्य सरकार, अधिकारी कोई भी किसानों की बात सुनने को तैयार नहीं है। उनके मुताबिक, ज्यादातर सांसद, विधायक, मंत्री भी किसान समुदाय से हैं, यहां तक ​​कि आईएएस और आईपीएस अधिकारी भी किसान समुदाय के लोग हैं, लेकिन किसी ने भी किसानों के हित के लिए काम नहीं किया है। बार-बार यह कहा जाता है कि किसान देश की रीढ़ हैं, लेकिन बिना रीढ़ के देश कैसे चल रहा है। खाद्य सुरक्षा के लिए सभी की उम्मीदें किसानों और गांवों पर टिकी होती हैं, लेकिन जिस तरह से लागत बढ़ रही है और उपज की वाजिब कीमत नहीं मिलती है, ऐसे में एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) की गारंटी से ही किसानों का भला हो सकता है। ये कृषि प्रधान देश है। इस देश में किसानों के लिए बदलाव होना चाहिए।</p>
<p><strong>कृषि और किसान कल्याण की गति बढ़ाने की जरूरतः डॉ. अमर पटनायक</strong></p>
<p>उनकी बात से थोड़ी असहमति जताते हुए बीजू जनता दल (बीजद) के सांसद डॉ. अमर पटनायक ने कहा, &ldquo;मुझे नहीं लगता है कि कृषि और किसान कल्याण को अलग-अलग करके देखा जा सकता है क्योंकि कृषि के बारे में विचार किए बिना किसानों के कल्याण बारे में नहीं सोचा जा सकता है। हां, मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूं कि किसी भी सरकार ने एमएसपी को लेकर स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को सही मायनों में लागू नहीं किया है। चूंकि ऐसा नहीं हुआ इसलिए किसानों की हालत जस की तस बनी हुई है। हालांकि, यह भी नहीं कहा जा सकता है कि उनकी हालत में सुधार नहीं हुआ है। सुधार हुआ है, लेकिन उस स्तर का नहीं हुआ है।&rdquo; &nbsp;</p>
<p>उन्होंने कहा कि यह भी समझना होगा कि एमएसपी की बढ़ी हुई कीमत का असर उस कीमत पर भी पड़ता है जो उपभोक्ता को अनाज के लिए चुकानी पड़ती है। उस स्थिति में सब्सिडी का बोझ बहुत अधिक होगा। हमें यह तय करना होगा कि क्या देश के पास उस सब्सिडी का भुगतान करने के लिए संसाधन होंगे क्योंकि और भी जरूरी मुद्दे हैं जिसके लिए आर्थिक संसाधनोंं की जरूरत पड़ती है। यथार्थवादी होने के नाते मेरा मानना है कि हम सही दिशा में जा रहे हैं। जरूरत इस बात की है कि हमें अपनी उत्पादकता बढ़ानी होगी। बेहतर फसल प्रबंधन, बेहतर सिंचाई, बेहतर जल प्रबंधन, बेहतर मिट्टी प्रबंधन और बेहतर उर्वरक प्रबंधन के जरिये उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है। देश में ऐसा नहीं हुआ है। दूसरा, हम जो कर रहे हैं वह टुकड़ों में है। कृषि में बहु-फसल के साथ-साथ बहु-उत्पादों से संबंधित जिस नवाचार की आवश्यकता है, वह बहु-फसल के साथ-साथ मछली पालन भी हो सकता है। इन सभी संयोजनों पर काम नहीं किया गया है। कृषि और किसान कल्याण क्षेत्र में चीजें उस गति से नहीं चल रही हैं जिस गति से आगे बढ़ना जरूरी है। लेकिन यह निश्चित रूप से हुआ है कि किसानों ने कृषि को 1.4 अरब लोगों को खाद्य सुरक्षा प्रदान करने में भारत को आत्मनिर्भर बनाया है।</p>
<p><strong>गांव की स्थिति जस की तसः के सी त्यागी</strong></p>
<p>लोकसभा एवं राज्यसभा के पूर्व सांसद एवं जनता दल (यू) के वरिष्ठ नेता केसी त्यागी ने पैनल चर्चा में अपने विचार रखते हुए कहा, &ldquo;अगर हम समृद्धि के टापुओं जिसे हम आर्थिक उन्नति कहते हैं, को छोड़ दें, तो गांवों की स्थिति में बहुत ज्यादा बदलाव नहीं हुआ है। गांव आज भी सरकारों की उपेक्षा के शिकार हैं। ब्रिटिश काल और आजादी के बाद सरकारों के बदलते रहने के बावजूद गांव की स्थिति में ज्यादा फर्क नहीं आया। गांव की असली समस्या क्या है। खेती के अलावा गांव के जो अन्य काश्तकार थे वो कहां चले गए। गांव का लोहार, कुम्हार, बुनकर, सुनार, तेली, धोबी, मोची ये सब कहां चले गए। गांव की स्वायत्ता की जो सोच थी वो खत्म हो गए। गांव में इनके धंधे खत्म हो गए। ये लोग रोजगार की तलाश में गांव से शहर तो गए लेकिन उनमें से ज्यादातर वहां या तो मजदूरी कर रहे हैं या फिर कोई छोटा-मोटा काम कर रहे हैं। आज हम गेहूं, चावल, चीनी और कई सब्जियों और फलों के उत्पादन में दुनिया में नंबर एक हैं। इसके बावजूद गांवों की उपेक्षा हो रही है। जो प्राथमिकता है वह आज भी जस की तस है। पहली पंचवर्षीय योजना में 35 फीसदी फंड ग्रामीण क्षेत्र के लिए आवंटित हुआ था और 15 फीसदी औद्योगिक क्षेत्र के लिए। इसके बाद की पंचवर्षीय योजनाओं में ग्रामीण क्षेत्र का आवंटन घटता गया और औद्योगिक क्षेत्र का बढ़ता गया। गांव की उपेक्षा वहीं से शुरू हो गई। नीति आयोग और इन जैसी जितनी भी संस्थाएं हैं उसका गांव के विकास से, खेती से, किसान से कोई वास्ता नहीं है।&rdquo;</p>
<p><strong>एमएसपी गारंटी से ही किसानों का होगा भलाः वी एम सिंह</strong></p>
<p>राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के राष्ट्रीय संयोजक वी एम सिंह ने कहा, &ldquo;आज की जो व्यवस्था है वह व्यवस्था ही गलत है। भारत एक कृषि प्रधान देश है लेकिन हमारी व्यवस्था में भारतीय कृषि सेवा की व्यवस्था ही नहीं है। खेती की स्थिति को देखते हुए किसान के बच्चे अब खेती नहीं करना चाहते हैं। किसान के बच्चों को आज आजीविका चाहिए। आज भी हम अंग्रेजों की नीतियां ही अपना रहे हैं। हम खेती को खड़ा करना नहीं चाहते। आज जमीन की जोत कम हो रही है। किसानों के पास औसतन दो-ढाई एकड़ जमीन है। इतनी कम जमीन में खेती कर कोई किसान पूरे साल खा नहीं सकता है। अपना घर चलाने के लिए उन्हें खेती के साथ-साथ मजदूरी भी करना पड़ता है। ऐसे में एमएसपी गारंटी के जरिये ही उन्हें फायदा पहुंचाया जा सकता है।&rdquo;</p>
<p>उन्होंने कहा कि पहले जहां किसान गाय-भैंस के दूध बेचकर अपनी अन्य जरूरतें पूरी कर लेता था, अब उसमें भी परेशानी हो गई है क्योंकि चारा महंगा हो गया है जिससे गाय-भैंस पालना मुश्किल हो गया है। अगर यह तय हो जाए कि किसानों से 50 रुपये लीटर से कम पर दूध की खरीद नहीं होगी तो गायों को पालने में किसानों की रूचि बनी रहेगी। इसी तरह, गन्ना किसानों की बात करें तो उन्हें अपना भुगतान कभी समय पर नहीं मिलता है। सभी सरकारें चीनी मिल मालिकों पर दयालु हैं। उनके लिए चीनी की एमएसपी (मिनिमम सेल प्राइस) की व्यवस्था कर दी गई है, लेकिन किसानों के लिए नहीं की जा रही है। हम सिर्फ यही चाहते हैं कि किसानों को एमएसपी की गारंटी मिल जाए।</p>
<p><strong>बाजार समर्थक नीतियों से किसानों की हालत खराबः युद्धवीर सिंह</strong></p>
<p>भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) के राष्ट्रीय महासचिव युद्धवीर सिंह ने चर्चा में हिस्सा लेते हुए कहा कि चौधरी चरण सिंह कहते थे कि अगर पंडित नेहरू ने ग्रामीण विकास पर अपना फोकस कर लिया होता, औद्योगिक विकास भी जरूरी था, कृषि और गांव को अगर प्राथमिकता दी जाती आज गांव विकसित हो जाते। चौधरी चरण सिंह का यह भी कहना था कि अगर हम देश का विकास और मजबूत राष्ट्र का निर्माण करना चाहते हैं तो पलायन को रोकना होगा। पिछले 15-20 सालों से जिस तरह से गांवों से पलायन हुआ है वह भयावह है। उन्होंने कहा कि हरित क्रांति की वजह से कृषि उत्पादन तो बढ़ा लेकिन उत्पादन सरप्लस होते ही बाजार किसानों पर हावी होने लगा और इसमें सरकारें भी सहायक बनीं। बाजार के हावी होते ही किसानों के लिए मुश्किलें बढ़ने लगी। सरकार की किसान विरोधी और बाजार समर्थक नीतियों की वजह से किसान मर रहे हैं। जब फसल की कटाई होती है तो सरकार बाजार के समर्थन में फैसले ले लेती है और देर से फसलों की सरकारी खरीद करती है। एक तरफ सरकार किसानों की आय दोगुनी करने की बात करती है, दूसरी तरफ किसान विरोधी फैसले लेती है। &nbsp;&nbsp;&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ ग्रामीण भारत का एजेंडाः कृषि की चिंता सभी को, किसानों की सुध लेने वाला कोई नहीं ]]></media:description>
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        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[ग्रामीण भारत का एजेंडाः गांव के असल मुद्दों की मीडिया में चर्चा नहीं, नीतियां बनाने वाले भी हकीकत से दूर]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/agenda-of-rural-india-real-issues-of-villages-are-not-discussed-in-media-policy-makers-are-also-away-from-reality.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 08 Nov 2023 17:34:17 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/agenda-of-rural-india-real-issues-of-villages-are-not-discussed-in-media-policy-makers-are-also-away-from-reality.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>सिंचाई सुविधाओं का अभाव, उपज की उचित कीमत न मिलना, जंगल, जमीन, बेरोजगारी आदि गांवों के लिए अहम मुद्दे हैं, लेकिन इन पर मीडिया में ज्यादा चर्चा नहीं होती है। यही नहीं, जीडीपी में कृषि की हिस्सेदारी कम हो रही है लेकिन कृषि पर निर्भर आबादी का अनुपात अब भी काफी बड़ा है। इन सबका कारण यह है कि कृषि के लिए नीतियां बनाने वाले जमीनी हकीकत से दूर हैं। आज ग्रामीण क्षेत्र में बड़े पैमाने पर सिंचाई सुविधाएं विकसित करने की जरूरत है। किसानों को उनकी उपज की उचित कीमत मिले, इसके लिए तकनीक और ज्ञान दोनों को किसानों तक पहुंचाना जरूरी है। मीडिया संस्थान <strong>रूरल वॉयस</strong> और गैर-सरकारी संगठन <strong>सॉक्रेटस</strong> द्वारा पिछले सप्ताह दिल्ली में आयोजित &lsquo;ग्रामीण भारत का एजेंडा&rsquo; कार्यक्रम की पैनल चर्चा में ये बातें सामने उभर कर आईं। इस पैनल चर्चा का विषय था &lsquo;ग्रामीण भारत में मीडिया और सिविल सोसायटी की भूमिका&rsquo;। इस पैनल चर्चा का संचालन वरिष्ठ पत्रकार और इंडियन एक्सप्रेस के डिप्टी एडिटर हरीश दामोदरन ने किया।&nbsp;</p>
<p><strong>कृषि को आवंटन बढ़े</strong><strong>, </strong><strong>सब्सिडी घटाना ठीक नहींः भगीरथ चौधरी</strong></p>
<p>जोधपुर स्थित साउथ एशिया बायोटेक्नोलॉजी सेंटर के संस्थापक निदेशक और एपीडा बोर्ड के सदस्य भगीरथ चौधरी ने चर्चा में कहा कि हमें हर साल बताया जाता है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कृषि क्षेत्र का योगदान काम हो रहा है। आज जीडीपी में कृषि का योगदान सिर्फ 17% है लेकिन आज भी 60% आबादी कृषि पर निर्भर है। उन्होंने कहा, &ldquo;मुझे एक नई बात सुनने को मिली कि ग्रामीण क्षेत्र में भी कृषि आय का योगदान सिर्फ 35% है। मुझे लगता है सबसे बड़ा खेल इन्हीं आंकड़ों में है जिसकी वजह से कृषि क्षेत्र को आवंटन काम होता जा रहा है। जब तक पैसे का आवंटन नहीं होगा तब तक विकास नहीं हो सकता। कृषि में रिसर्च हो या कोई अन्य काम, आवंटन कम होता जा रहा है। किसान नेताओं और कृषि क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों को सोचना चाहिए कि आवंटन कैसे बढ़ाया जा सकता है।&rdquo;</p>
<p>राजस्थान का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि वहां किसान खुद देखते हैं कि उन्हें कौन सी फसल उगानी चाहिए जिसकी उन्हें अच्छी कीमत मिले, लेकिन सरकार उन्हें भ्रमित करती है। वह हर साल नई स्कीम लेकर आती है। कभी कमर्शियल खेती को, कभी परंपरागत खेती को, कभी प्राकृतिक खेती को, तो कभी ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा देने की बात कहती है। दरअसल, सरकार कृषि क्षेत्र में सब्सिडी कम करना चाहती है। यह ठीक नहीं है।&nbsp;</p>
<p>उन्होंने कहा कि किसानों के लिए उत्पादन लागत काफी बढ़ रही है। किसान हर उस नई टेक्नोलॉजी को अपनाने और हर उस कंपनी के साथ काम करने के लिए तैयार है जो उसे अतिरिक्त कमाई दे सके। किसान पूरी कोशिश करता है कि जलवायु परिवर्तन तथा अन्य बातों का उसकी खेती पर जो प्रभाव पड़ रहा है, कीटों का असर हो रहा है उसको कैसे कम किया जाए। उन्होंने कहा कि आज भी किसान पानी की समस्या से जूझता है। अगर पानी है तो बिजली नहीं आती। वह अपने सिंचाई पंप को 6 घंटे से ज्यादा चल ही नहीं सकता। इस समस्या से निपटने के लिए पश्चिमी राजस्थान में जीरा किसान जनरेटर खरीद रहे हैं, क्योंकि जीरा के अच्छे दाम मिल रहे हैं।&nbsp;</p>
<p><strong>मुद्दे अनेक</strong><strong>, </strong><strong>उन पर बात करने की जरूरतः कविता बुंदेलखंडी</strong><strong>&nbsp;</strong></p>
<p>खबर लहरिया की सह संस्थापक और ग्रामीण इलाकों में लंबे समय से काम करने वाली कविता बुंदेलखंडी ने कहा कि जल, जंगल, जमीन, बेरोजगारी हमारे लिए महत्वपूर्ण मुद्दे हैं, लेकिन ये बातें एजेंडा में नहीं होती हैं। पर्यावरण का सबसे बड़ा प्रभाव पड़ रहा है और इसका असर हर चीज पर होता है। गांव में जमीन के छोटे-छोटे टुकड़े होते जा रहे हैं, वह हमारे लिए मुद्दा है। गांव के भीतर जो राजनीति होती है वह हमारे लिए बड़ा मुद्दा है। गांव में महिलाओं, जातियों और धर्म के मुद्दे हैं। इन मुद्दों पर बात करने की जरूरत है।</p>
<p>उन्होंने कहा कि गांव में जो बाजारीकरण आ गया है उस पर भी बहुत कम बात होती है। मोटे अनाज का उत्पादन कम हो रहा है, विदेशी बीज आ गए हैं और हर साल बीजों को बदला जाता है, यह भी बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा है। हम किसानी की तो बात करते हैं लेकिन किसानी करने वालों में महिलाएं भी होती हैं। वे हल नहीं चलातीं, लेकिन इसके अलावा बहुत सारे काम करती हैं। यह भी हमारे लिए मुद्दा है।&nbsp;</p>
<p>उन्होंने कहा कि केन-बेतवा अभी तक मेनस्ट्रीम मीडिया में मुद्दा नहीं बना है। मध्य प्रदेश के आदिवासी गांवों से लोगों को हटाकर वहां बांध बनाने की बात चल रही है। उन गांवों में आज तक बिजली, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा की व्यवस्था नहीं है। वहां से 10 साल से लोगों के विस्थापन की बात हो रही है और लोग तरह-तरह की समस्याओं से जूझ रहे हैं। विस्थापन की चर्चा के कारण वहां कोई विकास कार्य नहीं हो रहा है। वहां स्वास्थ्य, खासकर महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य का मुद्दा बड़ा है। कोविड के बाद महिलाओं और युवा पीढ़ी में यह समस्या काफी देखने को मिली है।</p>
<p><strong>पर्यावरण बिगाड़ने में उत्तर-पूर्व का योगदान कम</strong><strong>, </strong><strong>लेकिन प्रभावित ज्यादाः एलीथिया कोरडोर लिंगदोह&nbsp;</strong></p>
<p>मेघालय के गैर-सरकारी संगठन नेसफास की डिप्टी एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर एलीथिया&nbsp; कोरडोर लिंगदोह ने चर्चा में उत्तर-पूर्व की समस्याओं को सामने रखा। उन्होंने कहा कि उत्तर-पूर्वी राज्यों के मूल निवासियों को सीमांत और कमजोर कहा जाता है, लेकिन मैं आपको बताना चाहती हूं कि हम लोग कमजोर नहीं हैं, बल्कि हमें ऐसी स्थिति में डाल दिया जाता है। अगर आप आंकड़ों को देखें तो उत्तर-पूर्व में रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल बहुत कम होता है। मेघालय इनका सबसे कम इस्तेमाल करने वाले राज्यों में है। इसके बावजूद जलवायु परिवर्तन का पहला असर स्थानीय लोगों और किसानों पर होता है।&nbsp;</p>
<p>हम मानसून की बारिश के पैटर्न में बदलाव का सामना कर रहे हैं। इसका खाद्य उत्पादन प्रणाली के साथ किसानों के जीवन पर भी प्रभाव पड़ा है। हमारी कृषि पूरी तरह बारिश पर निर्भर करती है। ऐसे में बारिश के पैटर्न में बदलाव ने लोगों के जीवन को काफी प्रभावित किया है। कीटों के हमले बढ़ गए हैं। हम लोग प्राकृतिक खेती और ऑर्गेनिक खेती की बहुत बातें सुनते हैं। हमें इस तरह अलग-अलग शब्दों के जाल में न फंसकर जरूरत आधारित अप्रोच पर काम करना चाहिए।</p>
<p><strong>एफपीओ की सफलता के लिए बाजार नजदीक होना जरूरीः संबित त्रिपाठी</strong></p>
<p>ओडिशा स्थित लाइवलीहुड अल्टरनेटिव्स के चेयरमैन और राजस्व सेवा के पूर्व अधिकारी संबित त्रिपाठी ने एफपीओ या कोऑपरेटिव की सफलता के लिए बाजार को जरूरी बताया। उन्होंने कहा कि ये बाजार से जितनी दूर होंगे उन्हें उतनी अधिक दिक्कतें आएंगी क्योंकि आज ट्रांसपोर्टेशन एक बड़ा खर्च है। इसका उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि ओडिशा के गजपति जिले में नगालैंड की तरह अच्छी क्वालिटी के अनानास की पैदावार होती है। नेफेड और मदर डेयरी को उसकी सप्लाई होती है। दिल्ली तथा अन्य शहरों में वह अनानास 80 रुपये किलो बिका जबकि गजपति के किसानों को सिर्फ 14 रुपये मिले। किसानों को पहले 7 रुपये मिलते थे। इस हिसाब से देखें तो उनकी आय दोगुनी हुई, लेकिन ग्राहक के लिए इतनी कीमत परिवहन लागत के कारण आई। उन्होंने यह भी कहा कि जल्दी खराब होने वाले (पेरिशेबल) कमोडिटी से एफपीओ ठीक से नहीं निपट सकते हैं।</p>
<p>त्रिपाठी ने इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि जहां सिंचाई की सुविधा है वहां किसान साल में तीन फसल ले सकते हैं। अगर सिंचाई सुविधा नहीं है तो कोल्ड स्टोरेज या अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर का लाभ नहीं मिलेगा।&nbsp;</p>
<p>सेल्फ हेल्प ग्रुप के बारे में उन्होंने कहा कि ओडिशा में सफल सेल्फ हेल्प ग्रुप बहुत कम हैं। अब एक नई जमात खड़ी हुई है सेल्फ हेल्प ग्रुप कॉन्ट्रैक्टर की। नाम तो सेल्फ हेल्प ग्रुप का होता है लेकिन ये ठेकेदार आउटसोर्स करते हैं। कोल्ड स्टोरेज, मछली के तालाब यह सब काम सेल्फ हेल्प ग्रुप को मिलते हैं, लेकिन उनका सिर्फ नाम होता है। इसका फायदा ठेकेदार को मिलता है। सेल्फ हेल्प ग्रुप के राजनीतिकरण का भी मुद्दा है जिसकी हम चर्चा नहीं करते हैं।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ ग्रामीण भारत का एजेंडाः गांव के असल मुद्दों की मीडिया में चर्चा नहीं, नीतियां बनाने वाले भी हकीकत से दूर ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[बदलते गांवों में हो रही बेहतर स्वास्थ्य, स्वच्छता और नौकरियों की मांग]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/changing-villages-cry-for-better-health-sanitation-jobs-said-experts-at-rural-world-launch.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 04 Nov 2023 17:10:51 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/changing-villages-cry-for-better-health-sanitation-jobs-said-experts-at-rural-world-launch.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत का ग्रामीण परिदृश्य किसानों द्वारा खेत जोतने और अपनी आजीविका के लिए कड़ी मेहनत करने से कहीं आगे कमोबेश शहरी लोगों की समस्याओं और आकांक्षाओं के समान है। 2023 के गांव पिछली सदी के 80 या 90 के दशक जैसे नहीं हैं। गांवों में भी अब कई सारी सुविधाएं हैं, ग्रामीणों के पास भी मोबाइल फोन हैं जिस पर वे अपनी मनपसंद चीजें देखने के लिए डाटा का भरपूर इस्तेमाल करते हैं और गांव से पास के शहर जाने के लिए सड़क की बेहतर सुविधा है। मगर पानी की आपूर्ति में सुधार ने गांवों में गंदे पानी (इस्तेमाल किया हुआ) की निकासी की समस्या पैदा कर दी है। प्लास्टिक की थैलियां कीचड़ और गंदगी में इधर-उधर बिखरी रहती हैं जिसकी वजह से स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ गई हैं।</p>
<p>नई दिल्ली में 'ग्रामीण भारत का एजेंडा' विषय पर इसी हफ्ते आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन में इस तरह के मुद्दे विचार-मंथन सत्र में उभर कर सामने आए। इस मौके पर रूरल वॉयस मीडिया प्रा. लिमिटेड की त्रैमासिक पत्रिका 'रूरल वर्ल्ड' की लॉन्चिंग भी की गई।</p>
<p>ग्रामीण परिदृश्य में बदलाव लाने की हमेशा वकालत करने वाले पूर्व केंद्रीय कृषि सचिव टी. नंद कुमार ने कार्यक्रम के पहले सत्र में कहा, &ldquo;जब विभिन्न सरकारी योजनाओं की बात आती है, तो जमीनी स्तर पर वह ठीक से लागू नहीं हो पाती हैं।&rdquo; युवा आईएएस के रूप में वे &nbsp;बिहार के कई जिलों में जिला कलेक्टर रह चुके हैं। योजनाओं को ठीक से लागू नहीं कर पाने के लिए सरकारी संस्थानों की जवाबदेही नहीं होने पर उन्होंने चिंता जताई। उन्होंने कहा कि जिला कलेक्टर 100-150 समितयों का अध्यक्ष होता है। उस पर इतना बोझ होता है कि उसे खुद ही पता नहीं होता है कि वह किन-किन समितियों का अध्यक्ष है। इसके अलावा, बीडीओ (प्रखंड विकास अधिकारी) जिस पर योजनाओं को गांव के स्तर तक पहुंचाने की जिम्मेदारी होती है, वह ''सबसे अधिक परेशान'' अधिकारी होता है। तो फिर इस समस्या का हल क्या है? उन्होंने कहा कि पंचायतों की अधिक स्वायत्तता और भागीदारी तथा सिविल सोसायटी की &nbsp;भागीदारी बढ़ाने से ही जमीनी स्तर तक योजनाओं का अच्छे से क्रियान्वयन किया जा सकता है।</p>
<p>नाबार्ड के पूर्व चेयरमैन हर्ष कुमार भानवाला ने उन गांवों में स्वच्छता की दयनीय स्थिति पर &nbsp;चिंता जताई जहां के लोग शहरी लोगों की तरह पैकेज्ड फूड इस्तेमाल करने के आदि हो गए हैं, लेकिन वहां ठोस कचरा या तरल कचरा प्रबंधन के बुनियादी ढांचे की कमी है। उन्होंने सुझाव दिया कि किसानों को अनियमित बिजली आपूर्ति की समस्या को दूर करने के लिए सूक्ष्म स्तर पर या क्लस्टर स्तर पर सौर प्लांट लगाए जाने चाहिए। नाबार्ड का उनका अनुभव बताता है कि इस पहल के लिए धन की कोई समस्या आड़े नहीं आएगी। उन्होंने कहा कि ज्यादातर गांवों में 400-500 बेरोजगार युवा हैं। उनके लिए गांव में ही रोजगार के अवसर पैदा करने की जरूरत है।</p>
<p>राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (एनसीडीसी) के पूर्व मैनेजिंग डायरेक्टर संदीप कुमार नायक ने सहकारी समितियों को आधुनिक बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव साझा किए जिससे किसानों को मार्केटिंग और खरीद जैसे लिंकेज उपलब्ध कराए जा सकते हैं। सत्र के दौरान उनका जोर ''शासन की पारदर्शिता और सहकारी समितियों के आधुनिकीकरण'' पर था। उन्होंने कहा कि मल्टी-स्टेट कोऑपरेटिव सोसायटी जैसे विचार दूरदर्शी हैं।</p>
<p>सहकार भारती के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. डीएन ठाकुर ने कहा, ''ग्रामीण भारत बदल गया है लेकिन स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार और बढ़ गया है। उन्होंने स्थानीय नेतृत्व के स्वार्थी हो जाने और सामुदायिक सेवा के लिए प्रतिबद्ध लोगों की कमी पर चिंता जताई। हालांकि, सभी पैनलिस्ट ने इस बात पर सहमति जताई कि बेईमानों और भ्रष्टाचारियों की वजह से पंचायतों की शक्तियों को कम नहीं करना चाहिए। इसकी बजाय, उन्हें अधिक स्वायत्तता और बजट दिया जाना चाहिए।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ बदलते गांवों में हो रही बेहतर स्वास्थ्य, स्वच्छता और नौकरियों की मांग ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[एजेंडा फॉर रूरल इंडियाः तमिलनाडु में प्रतिभागियों ने जल प्रदूषण, किसानों&amp;#45;जंगली जानवरों में संघर्ष, सिंचाई की समस्या, फसलों के दामों में उतार चढ़ाव के मुद्दों को उठाया]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/agenda-for-rural-india-coimbatore-farmer-animal-conflict-and-irrigation-are-key-challenges-for-farmers.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 09 Oct 2023 08:16:35 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/agenda-for-rural-india-coimbatore-farmer-animal-conflict-and-irrigation-are-key-challenges-for-farmers.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">रूरल वॉयस, सोक्रेटस, तमिलनाडु फार्मर्स प्रोटक्शन एसोसिएशन और फार्मर्स मर्चेंट्स इंडस्ट्रियलिस्ट्स फेडरेशन ने रविवार को कोयंबटूर में एजेंडा फॉर रूरल इंडिया का सफल आयोजन किया। इसमें इस बात पर चर्चा हुई कि ग्रामीण भारत के विकास का एजेंडा किस तरह तैयार किया जाना चाहिए। इसमें तमिलनाडु के आठ जिलों- कोयंबटूर, नमक्कल, इरोड, सेलम, धर्मपुरी, तिरुपुर, डिंडीगुल, नीलगिरि और तिरुनेलवेली से आए लोगों ने शिरकत की। ग्रामीण होने के नाते उन्हें जिन समस्याओं का सामना करना पड़ता है, उन सभी पर उन्होंने चर्चा की और अपने-अपने गांव के लिए विकास के लिए विचार रखे। उन्होंने यह भी बताया कि वे किस तरह की नीतियों को लागू होते देखना चाहेंगे।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">एजेंडा फॉर रूरल इंडिया, कोयंबटूर देशभर में आयोजित किए जा रहे ग्रामीण लोगों के सम्मेलन की श्रृंखला का हिस्सा है। इसका आयोजन डिजिटल मीडिया संस्थान <strong>रूरल वॉयस</strong> और सामाजिक तथा ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले गैर सरकारी संगठन <strong>सोक्रेटस</strong> कर रहा है। कोयंबटूर में आयोजित इस सम्मेलन में तमिलनाडु फार्मर्स प्रोटक्शन एसोसिएशन (टीएनएफपीए) और फार्मर्स मर्चेंट्स इंडस्ट्रियलिस्ट्स फेडरेशन (एफएमआईएफ) स्थानीय पार्टनर के तौर पर जुड़े थे। इस तरह का सम्मेलन कई राज्यों में आयोजित किया गया है और तमिलनाडु के कोयंबटूर में आयोजित यह पांचवा सम्मेलन था। इससे पहले उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर, ओडिशा के भुवनेश्वर, राजस्थान के जोधपुर और मेघालय के शिलांग में यह सम्मेलन आयोजित किया गया।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कोयंबटूर सम्मेलन की शुरुआत करते हुए <strong>रूरल वॉयस</strong> के एडिटर इन चीफ <strong>हरवीर सिंह</strong> ने कहा, &ldquo;बाकी भारत की तरह तमिलनाडु में भी शहरी और ग्रामीण इलाकों में काफी असमानताएं हैं। तमिलनाडु का कृषि क्षेत्र काफी महत्वपूर्ण है और यह कई महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना कर रहा है। इन सम्मेलनों का मकसद ग्रामीण नागरिकों की आवाज सुनना तथा उन्हें नीति निर्माताओं, ब्यूरोक्रेट्स, राजनेताओं, विशेषज्ञों और मीडिया तक पहुंचाना है। इस संवाद के जरिए हम ग्रामीण विकास के लिए उनके द्वारा सुझाए समाधान लेकर आना चाहते हैं।&rdquo;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">सम्मेलन में भाग लेने वालों ने कई मुद्दे उठाए। सबसे बड़ा मुद्दा मानव और पशुओं के बीच संघर्ष का है जिसकी वजह से पर्वतीय जिलों और चाय बागानों में बड़े पैमाने पर फसलों को नुकसान होता है। उन्होंने कहा कि किसानों को व्यक्तिगत फसल बीमा की जरूरत है, यहां तक की पशुओं के हमले के मामलों में भी। जलवायु परिवर्तन के बढ़ते मामलों को देखते हुए इसकी जरूरत काफी बढ़ गई है। किसानों ने अपनी उपज, खासकर सब्जियों की अच्छी कीमत ना मिलने की शिकायत की। उन्होंने दूध के लिए भी समर्थन मूल्य लागू करने की मांग की।</span></p>
<p><a href="https://eng.ruralvoice.in/rural-dialogue/agenda-for-rural-india-coimbatore-farmer-animal-conflict-and-irrigation-are-key-challenges-for-farmers.html" title="Agenda for Rural India-Coimbatore" target="_blank" rel="noopener"><span style="font-weight: 400;">अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करेंः Agenda for Rural India-Coimbatore: Farmer-Animal conflict, Irrigation are key challenges for farmers</span></a></p>
<p><span style="font-weight: 400;">खेती के लिए पानी के उपलब्धता दूसरा बड़ा मुद्दा है। वाटर बॉडी और भूजल, सीवेज तथा औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले पानी से दूषित हो गए हैं। वाटर बॉडी को सुरक्षित रखना और उन्हें पुनर्जीवित करना तथा सक्रिय रूप से नदी प्रबंधन की मांग भी लोगों ने की। इसके अलावा चाय बागानों में काम करने वालों के लिए मदद तथा कृषि शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने की मांग भी की गई।</span></p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/10/image_750x_6522b28ba93b5.jpg" alt="" /></p>
<p><span style="font-weight: 400;"><strong>सोक्रेट्स</strong> के डायरेक्टर <strong>प्रचुर गोयल</strong> ने कहा, हाल के वर्षों में हमने देखा है कि ग्रामीण इलाकों में लोगों को अनेक तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इसके साथ ही डिजिटाइजेशन से ग्रामीण भारत के निवासियों की आकांक्षाएं और सामाजिक ताना-बाना भी बदला है। नीतियों को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है कि ग्रामीण नागरिकों के साथ निरंतर संवाद बनाए रखा जाए। यह संवाद सशक्तीकरण का भी टूल है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;"><strong>तमिलनाडु फार्मर्स प्रोटक्शन एसोसिएशन</strong> के संस्थापक<strong> ईसन मुरुगासामी</strong> ने कहा कि किसानों, श्रमिकों (कृषि, उद्योग एवं कंस्ट्रक्शन) तथा ग्रामीण क्षेत्र से जुड़े सभी लोगों की इस बैठक में गांवों के विकास के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव सामने आए। इन वैकल्पिक विचारों को संबंधित सरकारी अधिकारियों तक पहुंचाया जाना चाहिए और समस्याओं का समाधान होने तक इस तरह के कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;"><strong>फार्मर्स मर्चेंट्स इंडस्ट्रियलिस्ट्स फेडरेशन</strong> के प्रेसिडेंट <strong>सेंथिल कुमार</strong> ने कहा, इस तरह की परिचर्चा तमिलनाडु के हर जिले तथा तालुका मुख्यालय में आयोजित की जानी चाहिए ताकि ग्रामीण लोगों की शिकायतें सुनी जा सके। ऐसी परिचर्चाएं स्थानीय समस्याओं तथा उनके प्रायोगिक समाधानों को सामने लाएंगी।</span></p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/10/image_750x_6522b28c8858b.jpg" alt="" /></p>
<p><span style="font-weight: 400;">यह कार्यक्रम रूरल वॉयस और सोक्रेटस की तरफ से पूरे देश में आयोजित किए जाने वाले सम्मेलनों का हिस्सा था। इसका मकसद भारत के ग्रामीण समुदायों की चुनौतियां की पहचान करना है। इन कार्यक्रमों में ग्रामीण भारत में हो रहे बदलावों की भी पहचान की गई। शहर और गांव के बीच बढ़ते अंतर को सामने लाने के साथ ग्रामीण क्षेत्र से जुड़े सभी पक्षों को अपनी बात रखने का मौका दिया गया। इसका लक्ष्य एक व्यापक ग्रामीण एजेंडा तैयार करना है जो ग्रामीण समुदायों की जरूरतों का समाधान लेकर आ सके। इन परिचर्चाओं से निकलने वाले प्रमुख बिंदुओं को दिल्ली में 1 नवंबर को आयोजित किए जाने वाले विषद कार्यक्रम में नीति निर्माताओं तथा विशेषज्ञों के साथ साझा किया जाएगा तथा उनके साथ उन बिंदुओं पर चर्चा भी होगी।</span></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/10/image_750x500_6522b27fb32f6.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ एजेंडा फॉर रूरल इंडियाः तमिलनाडु में प्रतिभागियों ने जल प्रदूषण, किसानों-जंगली जानवरों में संघर्ष, सिंचाई की समस्या, फसलों के दामों में उतार चढ़ाव के मुद्दों को उठाया ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[फसलों की उत्पादकता बढ़ाने की सरकार की पहल सराहनीयः जीएस1 इंडिया सीईओ]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/govt-efforts-to-augment-indian-crops-laudable-says-ceo-gs1-india.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 19 Sep 2023 11:02:01 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/govt-efforts-to-augment-indian-crops-laudable-says-ceo-gs1-india.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत के कृषि क्षेत्र ने बीते 6 वर्षों के दौरान सालाना 4.6% की दर से वृद्धि हासिल की है। इससे कृषि और संबद्ध क्षेत्रों को देश के सतत विकास और खाद्य सुरक्षा में योगदान करने में मदद मिली है। जीएस1 इंडिया के सीईओ एस. स्वामीनाथन ने <strong>रूरल वॉयस</strong> के साथ एक ईमेल इंटरव्यू में कहा, हाल के वर्षों में भारत कृषि उत्पादों का शुद्ध निर्यातक बनकर उभरा है। वर्ष 2021-22 में निर्यात 50.2 अरब डॉलर तक पहुंच गया। यह सकारात्मक ट्रेंड फसलों तथा मवेशियों की उत्पादकता बढ़ाने के सरकार के निरंतर प्रयासों और खाद्य सुरक्षा की समस्या को ज्यादा सक्षम तरीके से निपटाने के कारण आया है।<br />स्वामीनाथन के अनुसार किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य देने की पहल ने भी इस ट्रेंड में योगदान किया है। उनका कहना है, हमें विश्वास है कि किसानों को कर्ज और सब्सिडी की पहुंच बढ़ाकर तथा ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा देकर भारत में कृषि उत्पादन की क्वालिटी यानी गुणवत्ता और क्वांटिटी यानी मात्रा दोनों को बेहतर किया जा सकता है। जलवायु परिवर्तन के विपरीत प्रभावों के बावजूद भारत फसलों की उत्पादकता बढ़ाने में कामयाब रहा है।<br />उनका कहना है कि नकली कीटनाशकों और कमतर क्वालिटी के कृषि इनपुट उपज की क्वालिटी और कृषि क्षेत्र को बड़े पैमाने पर प्रभावित करते हैं। स्वामीनाथन के अनुसार जरूरी कदम उठाकर इन समस्याओं को जमीनी स्तर पर दूर किया जा सकता है और देश के विकास में कृषि क्षेत्र के योगदान को बढ़ाया जा सकता है।<br />स्वामीनाथन ने इंटरव्यू में कहा कि फसलों की उत्पादकता सुधारने और भारतीय कृषि क्षेत्र की प्रोडक्टिविटी बढ़ाने के लिए उच्च क्वालिटी के इनपुट, जिनमें बीज, उर्वरक, कीटनाशक और सक्षम सिंचाई प्रणाली शामिल हैं, जरूरी है। बीज, पानी, मिट्टी, कीटनाशक जैसे जैसे बार-बार इस्तेमाल होने वाले इनपुट के साथ ट्रैक्टर और हल जैसे पूंजीगत इनपुट कृषि क्षेत्र की उत्पादकता सुधार सकते हैं। इसके अलावा इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट जैसे इको फ्रेंडली इनपुट हानिकारक कीटनाशकों का इस्तेमाल घटाने और सस्टेनेबल खेती के तरीके को बढ़ावा देने में मददगार हो सकते हैं।<br />जीएस1 इंडिया के सीईओ ने कहा, यह देखना सुखद है कि भारत सरकार किस तरह उच्च क्वालिटी के कृषि इनपुट अपनाने में नीतियों और सब्सिडी के जरिए मदद कर रही है। इस तरह की पहल में निवेश सस्टेनेबल खेती के तरीके को बढ़ावा दे सकता है और हमारे देश को दीर्घावधि में आगे बढ़ाने में मदद कर सकता है।<br />एग्री इनपुट को बढ़ावा देने की सरकार समर्थित पहल उन बाधाओं को भी दूर कर सकती है जो भारत को उसकी वास्तविक ग्रोथ हासिल करने से रोकती हैं। यहां तक कि कृषि इनपुट इंडस्ट्री अफोर्डेबल तथा अच्छी क्वालिटी के कृषि इनपुट तक किसानों की पहुंच बढ़ाने और बड़े पैमाने पर कृषि उत्पादकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।<br />स्वामीनाथन के अनुसार वे अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी और बेहतरीन तौर-तरीके अपना कर अपने उत्पादों की क्वालिटी सुरक्षित कर सकते हैं और साथ ही अपनी सप्लाई चेन मैनेजमेंट में पारदर्शिता और जवाबदेही ला सकते हैं। उनके अनुसार, मेरा अनुभव कहता है कि इंडस्ट्री के खिलाड़ी इको फ्रेंडली खेती और पूंजीगत इनपुट को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।<br />स्वामीनाथन ने इस बात का भी जिक्र किया कि केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने नकली और गैर स्वीकृत उत्पादों को बाजार तक पहुंचने से रोकने के लिए एक क्यूआर कोड एप्लीकेशन लॉन्च किया है। इससे किसानों को अच्छी क्वालिटी के कृषि इनपुट प्राप्त करने में मदद मिलेगी।<br />उन्होंने कहा, कृषि मंत्रालय की तरफ से शुरू की गई क्यूआर कोड एप्लीकेशन की पहल एक निहायत जरूरी कदम है। हमें लगता है कि यह अच्छा डिजाइन किया हुआ सिस्टम है जो नकली और खराब क्वालिटी के कृषि उत्पादों को बाजार में पहुंचने से रोक सकता है। इससे किसान खराब क्वालिटी के कृषि इनपुट से बच सकते हैं और उनकी गुणवत्ता सुनिश्चित कर सकते हैं।<br />जीएस1 के सीईओ ने कहा कि क्यूआर कोड की मदद से कृषि रसायनों के वितरण में पारदर्शिता लाई जा सकती है। इससे किसानों को अच्छी क्वालिटी के बीज, उर्वरक तथा अन्य महत्वपूर्ण कृषि इनपुट मिल सकेंगे। इससे किसानों को कृषि इनपुट प्रोडक्ट के बारे में जानकारी मिल सकेगी। वह यह जान सकेंगे कि उनके स्रोत क्या है, रियल टाइम में उनकी उपलब्धता देख सकेंगे और इससे उन्हें अपना स्टॉक बनाए रखने में मदद मिलेगी।<br />उन्होंने कहा कि क्यूआर कोड सिस्टम को बेहतर और आसान बनाने के लिए हम डिजिटाइजेशन बढ़ाने के पक्ष में हैं। हालांकि इस पहल की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि पूरे देश में उसे कितनी तेजी से और कितने व्यापक स्तर पर अपनाया जाता है। जब अधिक से अधिक कंपनियां अपने प्रोडक्ट के लिए जवाबदेह होंगी तो भविष्य में पूरी सप्लाई चेन में पारदर्शिता का स्तर भी बढ़ेगा।<br />जीएस1 इंडिया एक स्टैंडर्ड संगठन है, जिसे वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने अन्य शीर्ष ट्रेड बॉडी के साथ मिलकर स्थापित किया है। यह भारत में जीएस मानकों को लागू करने तथा बढ़ावा देने के लिए जिम्मेदार है। इसने हाल ही दिल्ली में कृषि क्षेत्र में क्यूआर कोड लागू करने पर राष्ट्रीय कांफ्रेंस का आयोजन किया। उस कॉन्फ्रेंस में इसने लीवरेजिंग क्यूआर कोड टू ट्रांसफॉर्म द एंग्री इनपुट सप्लाई चेन शीर्षक से एक श्वेत पत्र भी जारी किया।&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ फसलों की उत्पादकता बढ़ाने की सरकार की पहल सराहनीयः जीएस1 इंडिया सीईओ ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[‘फिनहाट बीमा पॉलिसी बेचने से क्लेम सेटलमेंट तक, सबका डिजिटल समाधान लाएगी’]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/from-selling-insurance-policies-online-to-settling-claims-finhaat-to-solve-everything-digitally.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 18 Sep 2023 12:11:04 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/from-selling-insurance-policies-online-to-settling-claims-finhaat-to-solve-everything-digitally.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">भारत जैसे बाजार में अनेक विविधताएं हैं। यह विविधता आमदनी के स्तर में, भौगोलिक क्षेत्र में, शिक्षा के स्तर में, टेक्नोलॉजी तक पहुंच तथा अन्य अनेक क्षेत्रों में दिखाई देती है। लेकिन यहां डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाने और नागरिकों के डिजिटल सशक्तीकरण पर काफी जोर दिया जा रहा है। यह मानना है <strong>फिनहाट के सह संस्थापक और ग्रुप बिजनेस ऑफिसर नवनीत श्रीवास्तव</strong> का। <strong>रूरल वॉयस</strong> के साथ ईमेल इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि कोविड-19 महामारी से लेकर अब तक बीमा उद्योग ने न सिर्फ बीमा प्रोडक्ट की मांग में वृद्धि देखी है, बल्कि इस सेगमेंट में टेक्नोलॉजी का इंटीग्रेशन और डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल भी बढ़ा है। यह इस्तेमाल पॉलिसी ऑनलाइन बेचने से लेकर ऑनलाइन क्लेम सेटलमेंट तक में हो रहा है। इंटरव्यू के मुख्य अंशः-</span></p>
<p><strong>-भारत जैसे विविधतापूर्ण बाजार में ग्राहक जुटाने और डिजिटल इंश्योरेंस सॉल्यूशन की तैयारी को लेकर आपकी क्या राय है?</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">यह सही है कि भारत का बाजार काफी विविधतापूर्ण है। यह विविधता आमदनी के स्तर, भौगोलिक क्षेत्र, शिक्षा के स्तर, टेक्नोलॉजी तक पहुंच तथा अन्य अनेक क्षेत्रों में देखने को मिलती है। एक प्रोडक्ट के रूप में बीमा को स्वीकार करने में अधिकतर लोगों को थोड़ा समय लगता है। हमारा मानना है कि अब लोगों में बीमा और इसके फायदे के प्रति जागरूकता बढ़ी है। अब ज्यादा लोगों तक डिजिटल की पहुंच बढ़ने से आबादी का एक हिस्सा इंश्योरेंस प्रोडक्ट खरीदने में डिजिटल तरीकों का इस्तेमाल करने लगा है। महानगरों और टियर-1 तथा टियर-2 शहरों से बड़ी आबादी ऐसी है जो उभरते मध्य वर्ग में आती है। ये लोग ई-कॉमर्स का इस्तेमाल तो करते हैं लेकिन अभी तक अन्य वित्तीय सेवाओं के डिजिटल प्रयोग से दूर है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">हमारा मानना है कि आबादी के इस हिस्से के लिए डिजिटल तौर-तरीके अपनाने के लिहाज से हम शुरुआती चरण में हैं। उनके लिए अलग-अलग प्लेटफॉर्म तैयार करने के लिए अभी बहुत काम करने की जरूरत है ताकि उनका भरोसा कायम हो सके और उनके लिए सिस्टम और प्रक्रिया आसान की जा सके। तभी वे लोग बीमा को अपने लिए एक लाभदायक प्रोडक्ट के रूप में स्वीकार करेंगे। इससे जरूरत के समय जब वह क्लेम करेंगे तब उनकी डिलीवरी भी सुनिश्चित हो सकेगी।</span></p>
<p><strong>-भारतीय बीमा सेक्टर में आप नया उभरता ट्रेंड क्या देख रहे हैं और इस ट्रेंड को भुनाने के लिए फिनहाट क्या कर रहा है?</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">आमतौर पर बीमा की खरीदारी लोग एजेंसियों अथवा थर्ड पार्टी डिस्ट्रीब्यूशन के जरिए करते हैं। भारत की सबसे बड़ी बीमा कंपनी एलआईसी के 13 लाख से अधिक एजेंट हैं जो जमीनी स्तर पर बीमा प्रोडक्ट बेचते हैं। लेकिन अब बीमा कंपनियों के साथ ग्राहकों में भी डिजिटल चैनल की स्वीकार्यता बढ़ने लगी है। डिजिटल इंडिया पर सरकार का फोकस बढ़ने से डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने और आम लोगों में डिजिटल सशक्तीकरण बढ़ाने पर काफी जोर दिया जा रहा है।</span></p>
<p><strong>-दुनियाभर में बीमा उद्योग को बदलने में टेक्नोलॉजी का बड़ा योगदान रहा है। बीमा के वैल्यू चेन में शामिल विभिन्न पहलुओं को टेक्नोलॉजी ने किस तरीके से बदला है, खासकर फिनहाट के कामकाज के संदर्भ में?</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">महामारी के बाद बीमा उद्योग के अलग-अलग क्षेत्रों में हालत काफी बदले हैं। न सिर्फ बीमा प्रोडक्ट की मांग में वृद्धि हुई है बल्कि टेक्नोलॉजी का इंटीग्रेशन और डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल बढ़ा है। प्रोडक्ट पोर्टफोलियो बढ़ाने, पॉलिसी ऑनलाइन बेचने तथा ऑनलाइन क्लेम सेटलमेंट में इनका प्रयोग बढ़ा है। इससे बीमा कंपनियों को न सिर्फ अपनी क्षमता बेहतर करने में मदद मिली है बल्कि प्रोसेसिंग समय भी घटा है। इसके अलावा बीमा सेवाओं की लागत भी कम हुई है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">फिनहाट में हमारा एक असिस्टेड डिजिटल मॉडल है जो हमें टेक्नोलॉजी लीवरेज तथा जमीनी स्तर पर पार्टनर संस्थाओं की मौजूदगी के जरिए कई सेवाएं मुहैया करने में मदद करता है। यह स्टार्टअप भारत के 60% पिन कोड क्षेत्र में पहुंच गया है। फिनहाट का मुख्य फोकस टेक्नोलॉजी के प्रयोग से प्रोडक्ट को बेहतर बनाना है। क्यूरेटेड प्रोडक्ट और उसकी पूरी अवधि में सर्विसेज को डिजिटाइज करने करने के क्षेत्र में हम गहन तरीके से काम कर रहे हैं। एक बार पार्टनर संस्थान और सेगमेंट के लिए खास प्रोडक्ट तैयार करने के बाद हम निम्न बिंदुओं पर फोकस करते हैं-</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;"><strong>प्रोडक्ट डिजिटाइजेशनः</strong> फिनहाट अपने ग्राहकों के लिए प्रोडक्ट को पूरी तरह से डिजिटाइज करता है। इसका मकसद यह है कि ग्राहकों को पॉलिसी के रियल टाइम एक्सेस की समस्या का समाधान हो। यह विशिष्ट संस्थानों की खातिर तैयार किए जाने वाले खास प्रोडक्ट के लिए भी है। फिनहाट ने अपने सिस्टम को इतना लचीला बनाया है कि यह खुद को ऑर्गनाइजेशन के ढांचे के मुताबिक डाल सकता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;"><strong>बिक्री के बाद सर्विस और क्लेमः</strong> हमारा मानना है कि किसी भी पॉलिसी की बिक्री के बाद उसे आदत में शुमार करने के लिए सेल्स के बाद की सेवाएं और क्लेम आसान होनी चाहिए। फिनहाट अपने क्यूरेटेड खास प्रोडक्ट के लिए क्लेम की पूरी प्रक्रिया को डिजिटाइज करता है ताकि हमारे संस्थागत पार्टनर के लिए उन सेवाओं का लाभ उठाना आसान और झंझट मुक्त हो।</span></p>
<p><strong>-भारत में जीवन बीमा के विस्तार की काफी गुंजाइश है। जीवन बीमा के विस्तार में फिनहाट को किस तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ा और उन चुनौतियों से निपटने के लिए किस तरह की रणनीति अपना रहे हैं?</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">हम जिस तरह के टारगेट सेगमेंट में काम कर रहे हैं, उन सेगमेंट में एक प्रोडक्ट के तौर पर बीमा की पहुंच बहुत कम है। हमारे सभी योजनाएं और रणनीतियां इस दिशा में कार्य करती हैं कि बीमा को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़े। फिनहाट प्लेटफार्म को हमारी चुनौतियों को ध्यान में रखकर ही तैयार किया गया है।</span></p>
<p><strong>-उभरते मध्य वर्ग और निम्न आय वर्ग की मदद करने में फिनहाट क्या भूमिका निभा रहा है, इस वर्ग में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है और उनके समाधान के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">फाइनेंशियल प्रोडक्ट और खासकर बीमा के डिस्ट्रीब्यूशन में तीन मुख्य चुनौतियां सामने आती हैं। पहली चुनौती है शहरी क्षेत्र के लिए तैयार किए गए प्रोडक्ट को आमतौर पर कम फायदे और कम कीमत के साथ ग्रामीण इलाकों में भी बेचने की कोशिश की जाती है। दूसरी, पॉलिसी बिक्री के बाद सेवाओं की कमी और तीसरी चुनौती है ग्रामीण आबादी के लिए भरोसेमंद समाधान की कमी।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">फिनहाट में समस्याओं के समाधान के लिए ये कदम उठाए गए हैंः</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">-इसने जो प्रोडक्ट प्लेटफॉर्म तैयार किया है वह ऐसा है जो टारगेट सेगमेंट की विशिष्ट जरूरतों को पूरा करता है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">-पॉलिसी की बिक्री तथा बिक्री बाद की सेवाओं को डिजिटाइज किया जाता है ताकि प्रोडक्ट के पूरे जीवन चक्र के दौरान पेपरलेस सर्विसेज मुहैया कराई जा सके।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">-इन इलाकों में मौजूद संस्थाओं के साथ गठजोड़ करके प्रोडक्ट का वितरण करना, सही प्रोडक्ट और डिजिटल प्लेटफॉर्म मुहैया कराना ताकि प्रोडक्ट की पूरी अवधि में हर स्तर पर मदद मुहैया करा सके।</span></p>
<p><strong>-फिनहट की भावी योजनाएं क्या हैं?</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इस समय फिनहाट 40 से अधिक संस्थाओं को सेवाएं दे रही है। इनके जरिए 15 लाख लोगों और देश के 60% पिन कोड तक हमारी पहुंच है। वित्त वर्ष 2023-24 में फिनहाट का फोकस तीन क्षेत्रों पर रहेगा। उचित प्रोडक्ट के जरिए क्यूरेटेड प्रोडक्ट की प्रोफाइल बढ़ाना, विभिन्न पार्टनर के साथ साझेदारी करके पहुंच बढ़ाना ताकि उनके क्लाइंट को अच्छे प्रोडक्ट और बेहतर अनुभव मिल सके, तथा 35 लाख से अधिक लोगों तक पहुंच बनाना।</span></p>
<p><strong>-फिनहाट अपने प्रतिद्वंद्वियों से अलग किस तरह है?</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">हम अर्ध शहरी और ग्रामीण इलाकों में फाइनेंशियल सर्विसेज डिस्ट्रीब्यूशन का काम करते हैं जहां इन सेवाओं की पहुंच कम है। इस काम में दूसरे संस्थान भी मौजूद हैं, लेकिन हमारे ज्यादातर प्रतिद्वंद्वी शहरी क्षेत्र में अथवा टियर-1 और टियर-2 शहरों में मौजूद हैं, जबकि फिनहाट मुख्य रूप से ग्रामीण इलाकों में और टियर-3 तथा टियर-4 शहरों में काम कर रहा है। फिनहाट एक और मामले में अलग है कि यह खासकर क्लेम के मामले में भी टेक्नोलॉजी इनेबल्ड प्लेटफॉर्म मुहैया कराता है।</span></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ ‘फिनहाट बीमा पॉलिसी बेचने से क्लेम सेटलमेंट तक, सबका डिजिटल समाधान लाएगी’ ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Rajasree Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[एजेंडा फॉर रूरल इंडियाः मेघालय में  प्रतिभागियों ने रूरल कनेक्टिविटी, एग्री मार्केटिंग, जल, स्वास्थ्य और जलवायु परिवर्तन से जुड़े मुुद्दे उठाये]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/agenda-for-rural-india-people-in-meghalaya-flag-rural-connectivity-agri-marketing-water-health-and-climate-change.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 15 Sep 2023 18:35:27 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/agenda-for-rural-india-people-in-meghalaya-flag-rural-connectivity-agri-marketing-water-health-and-climate-change.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>'ग्रामीण भारत के लिए विकास का एजेंडा कैसे तैयार किया जाना चाहिए' इस सवाल पर मेघालय की राजधानी शिलांग में आयोजित 'एजेंडा फॉर रूरल इंडिया' कार्यक्रम में बारीकी से चर्चा की गई। इस कार्यक्रम का आयोजन रूरल वॉयस, सॉक्रेटस और नेसफास (North East Slow Food &amp; Agrobiodiversity Society) द्वारा किया गया।</p>
<p>दिन भर चले इस कार्यक्रम में मेघालय के सात जिलों के विविध ग्रामीण हितधारकों ने भाग लिया। इनमें किसान, महिला स्वयं सहायता समूह की सदस्य, ग्रामीण उद्यमी, मधुमक्खी पालक, कारीगर, शिक्षक, ग्राम रोजगार परिषद के सदस्य, ग्राम परिषद के सदस्य और बुनकर शामिल थे। गारो, खासी, जैंतिया और कार्बी जनजातियों के 60 प्रतिभागियों का यह विविध समूह था जिसमें पुरुष और महिला दोनों शामिल थे।</p>
<p>कार्यक्रम में शामिल प्रतिभागियों ने ग्रामीण नागरिक के रूप में उनके सामने आने वाले अनेक मुद्दों पर चर्चा की और विचार-विमर्श किया। उन्होंने अपने-अपने गांवों के लिए अपनी आकांक्षाओं और उन नीतियों को भी स्पष्ट रूप से रखा जिन्हें वे लागू होते देखना चाहते हैं। एजेंडा फॉर रूरल इंडिया- शिलांग डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म <strong>रूरल वॉयस</strong> और सामाजिक और ग्रामीण क्षेत्र में काम करने वाले गैर सरकारी संगठन <strong>सॉक्रेटस</strong> द्वारा देश भर में आयोजित किए जा रहे ग्रामीण लोगों के विचार जानने की श्रृंखला का हिस्सा है। इससे पहले जून में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में सम्मेलन आयोजित किया गया था। उसके बाद अगस्त में ओडिशा के भुवनेश्वर तथा सितंबर के पहले हफ्ते में राजस्थान के जोधपुर में सम्मेलन का आयोजन किया गया। ग्रामीण क्षेत्र के लिए काम करने वाला गैर सरकारी संगठन नेसफास शिलांग में आयोजित कार्यक्रम का स्थानीय भागीदार था।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/09/image_750x_65045602b2228.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>रूरल वॉयस</strong> के एडिटर इन चीफ हरवीर सिंह ने <strong>एजेंडा फॉर रूरल इंडिया</strong> सम्मेलन की शुरुआत करते हुए कहा, "इन सम्मेलनों का फोकस जमीनी स्तर पर ग्रामीण नागरिकों को आकर्षित करना है। हमारा लक्ष्य नीचे से ऊपर तक दृष्टिकोण प्रदान करना है। ग्रामीण समुदायों और नीति निर्माताओं, नौकरशाहों, राजनेताओं, विशेषज्ञों और मीडिया के बीच अंतर को अधिक समावेशी बनाने और निर्णय लेने की प्रक्रिया के लिए यह महत्वपूर्ण है। ग्रामीणों की आवाज उठा कर हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि उनकी जरूरतों और चिंताओं को सुना और संबोधित किया जाए। साथ मिलकर हम एक अधिक न्यायसंगत और समावेशी समाज के लिए प्रयास कर सकते हैं।"</p>
<p>प्रतिभागियों ने उन मुद्दों और समस्याओं को उठाया जिनका वे ग्रामीण नागरिकों और किसानों के रूप में सामना कर रहे हैं। प्रतिभागियों द्वारा कृषि, ग्रामीण बुनियादी ढांचे और सामाजिक क्षेत्र से संबंधित महत्वपूर्ण मुद्दों पर प्रकाश डाला गया। कृषि क्षेत्र के मुद्दों में मिट्टी का खराब स्वास्थ्य, मिट्टी का कटाव, गुणवत्ता वाले बीजों और जैव-इनपुट की अनुपलब्धता, कीटों के बढ़ते हमले, खराब सिंचाई सुविधाएं और खराब ग्रामीण कनेक्टिविटी की पहचान बाधाओं के रूप में की गई।</p>
<p>अन्य समस्याओं में कृषि उपज के लिए खराब विपणन बुनियादी ढांचा, उपज की कम कीमत मिलना और उचित भंडारण सुविधाओं और कोल्ड स्टोरेज की कमी जैसे अहम मुद्दे शामिल थे। जलवायु परिवर्तन कृषि क्षेत्र के लिए एक बड़ी समस्या है क्योंकि मौसम में अचानक परिवर्तन की घटनाएं बढ़ रही हैं। सामाजिक क्षेत्र के बारे में प्रतिभागियों ने खराब स्वास्थ्य और शैक्षिक बुनियादी ढांचे का मुद्दा उठाया। गांव के स्कूलों में शिक्षकों की अनुपस्थिति और स्कूली भवनों की कमी और खराब स्थिति का मुद्दा भी प्रतिभागियों ने उठाया। बेरोजगारी, नशाखोरी, कम उम्र में शादी और बच्चों की देखभाल की उचित सुविधा न होना बड़ी सामाजिक समस्या के रूप में सामने आए।</p>
<p>ग्रामीण इलाकों में कनेक्टिविटी अच्छी नहीं होने और बिजली की बेहतर आपूर्ति के अभाव का भी मुद्दा उठाया गया। प्रतिभागियों ने कहा कि पेयजल सुविधाओं में बड़े पैमाने पर सुधार की जरूरत है क्योंकि गांव वाले पीने के पानी की समस्या से जूझ रहे हैं। उनकी राय थी कि सरकारों और राजनीतिक तंत्र को उनके द्वारा उठाई गई समस्याओं के समाधान के लिए तेजी से कार्य करना चाहिए। उन्होंने यह भी मांग की कि सरकार को रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग कम करने के लिए किसानों को पारंपरिक खेती अपनाने, जैव उर्वरक और जैव कीटनाशक उपलब्ध कराने में मदद करनी चाहिए।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/09/image_750x_650455fb1942d.jpg" alt="" /></p>
<p>सरकार को बेहतर सिंचाई सुविधाओं के लिए योजनाएं शुरू करनी चाहिए और चेक डैम प्रणाली के माध्यम से कृषि के लिए सिंचाई कवरेज बढ़ाना चाहिए। सरकार को कृषि उपज से बेहतर मूल्य प्राप्ति के लिए कृषि विपणन से बिचौलियों को हटाने के लिए भी कार्य करना चाहिए।</p>
<p>गारो पर्वतीय क्षेत्र के प्रतिभागियों द्वारा उठाया गया एक महत्वपूर्ण मुद्दा बढ़ता मानव-वन्यजीव संघर्ष था जो किसानों के लिए एक बड़ी समस्या बनता जा रहा है। प्रतिभागियों द्वारा खराब प्रशासन और सरकारी योजना और विभागों में भ्रष्टाचार के मुद्दे को एक प्रमुख मुद्दे के रूप में उठाया गया।</p>
<p><strong>सॉक्रेटस</strong> के डायरेक्टर प्रचुर गोयल ने कार्यक्रम के समापन के मौके पर कहा, "नीतियां बनाने के लिए ग्रामीण नागरिकों के साथ संवाद आयोजित करने का प्रयास काफी महत्व रखता है। इन संवादों के माध्यम से हम ग्रामीण समुदायों की अनूठी चुनौतियों, जरूरतों और आकांक्षाओं के बारे में मूल्यवान अंतर्दृष्टि प्राप्त करके शहरी और ग्रामीण दृष्टिकोणों के बीच अंतर को पाटते हैं। इन संवादों को हम न केवल नीति निर्धारकों तक पहुंचाते हैं, बल्कि ग्रामीण नागरिकों के बीच समावेशिता और स्वामित्व की भावना को भी बढ़ावा देते हैं। उन्हें नीतियों को सक्रिय रूप से आकार देने के लिए सशक्त बनाया जाता है जिससे उनके जीवन और आजीविका पर सीधे असर पड़ेगा।"</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/09/image_750x_6504560a0cc7f.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>नेसफास</strong> के कार्यकारी निदेशक पीयूष रानी ने कहा कि इस सम्मेलन ने महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि सामने ला दी है। हमें उम्मीद है कि नई दिल्ली में आयोजित होने वाले राष्ट्रीय सेमिनार के लिए यह उपयोगी होगी। हमें विश्वास है कि यह सहयोगात्मक प्रयास हमारी सामूहिक समझ को बढ़ाएगा और अधिक प्रभावशाली और सफल ग्रामीण सम्मेलन को जन्म देगा। &nbsp;</p>
<p>यह कार्यक्रम देश में ग्रामीण समुदायों के सामने आने वाली अनूठी चुनौतियों का समाधान करने के लिए <strong>रूरल वॉयस</strong> और <strong>सॉक्रेटस</strong> द्वारा आयोजित किए जा रहे सम्मेलनों की श्रृंखला का हिस्सा है। इन आयोजनों का उद्देश्य शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच आर्थिक और सामाजिक असमानता के मुद्दे को संबोधित करना और ग्रामीण हितधारकों को अपनी राय व्यक्त करने में सक्षम बनाना, ग्रामीण विकास में तेजी और समावेशिता को बढ़ावा देना है।&nbsp;</p>
<p>इन कार्यक्रमों में संवाद और सहयोग के माध्यम से ग्रामीण भारत का एजेंडा विकसित करने की उम्मीद है, जो इन समुदायों की जरूरतों को पूरा करने के लिए जरूरी नीतिगत प्रक्रिया को बेहतर करने में मदद करेगा। राज्यों के स्तर पर आयोजित कार्यक्रमों में मिलने वाले इनपुट के आधार पर नवंबर में राष्ट्रीय स्तर पर नीति निर्माताओं और विशेषज्ञों के साथ एक सम्मेलन आयोजित किया जाएगा, जिसमें राज्य स्तरीय सम्मेलनों से संकलित अंतर्दृष्टि साझा की जाएगी। </p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/09/image_750x500_650455f306f04.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ एजेंडा फॉर रूरल इंडियाः मेघालय में  प्रतिभागियों ने रूरल कनेक्टिविटी, एग्री मार्केटिंग, जल, स्वास्थ्य और जलवायु परिवर्तन से जुड़े मुुद्दे उठाये ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[ट्रैक्टर बिक्री पर मानसून के असर के बावजूद कोटक महिंद्रा बैंक की क्रेडिट ग्रोथ अच्छीः श्रीपद जाधव]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/kotak-mahindra-bank-credit-growth-good-despite-impact-of-monsoon-on-tractor-sales-said-shripad-jadhav.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 11 Sep 2023 10:58:32 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/kotak-mahindra-bank-credit-growth-good-despite-impact-of-monsoon-on-tractor-sales-said-shripad-jadhav.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>कोटक महिंद्रा बैंक के ट्रैक्टर फाइनेंस एवं गोल्ड लोन डिवीजन के प्रेसिडेंट <strong>श्रीपद जाधव&nbsp;</strong>का कहना है कि उनका बैंक ट्रैक्टर की डोर-स्टेप फाइनेंसिंग को कामयाबी से अंजाम दे रहा है। इसके लिए बैंक का मोबाइल ऐप आधारित प्रॉडक्ट काफी कामयाब रहा है। देश के 570 से अधिक जिलों में उपस्थिति के साथ कोटक महेंद्रा बैंक की देश में ट्रैक्टर फाइनेंस में 11 फीसदी हिस्सेदारी है।&nbsp; चालू वित्त वर्ष में भी उसकी ग्रोथ बेहतर है। चालू साल में अल-नीनो के मजबूत होने से मानसून कमजोर है और उसका ट्रैक्टर की बिक्री पर प्रतिकूल असर पड़ा है। कृषि क्षेत्र के लिए ऋण कारोबार, टर्म लोन और फसल ऋण सहित तमाम मुद्दों पर एक एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में उन्होंने यह बातें कहीं। <strong>रूरल वॉयस</strong> के एडिटर इन चीफ <strong>हरवीर सिंह</strong> के साथ <strong>श्रीपद जाधव</strong> के इंटरव्यू के मुख्य अंशः&nbsp;&nbsp;</p>
<p><strong>मौजूदा समय में ट्रैक्टर या फार्म मशीनरी लोन की मांग और ग्रोथ की स्थिति क्या है</strong><strong>?</strong><strong> आगे किस तरह की संभावना </strong><strong>है</strong><strong>?</strong></p>
<p>ट्रैक्टर फाइनेंस में पिछले 8-10 वर्षों में टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल काफी बढ़ा है। 20 साल पहले जब हमने ट्रैक्टर लोन देना शुरू किया था तो एक ट्रैक्टर लोन डिस्बर्स करने में 15 दिन लगते थे, आज हम एक दिन में ट्रैक्टर लोन डिस्बर्स कर देते हैं। एक दिन में ग्राहक का लोन मंजूर हो जाता है और डीलर को पेमेंट हो जाता है। यह सब टेक्नोलॉजी की वजह से हुआ है। कोटक महिंद्रा बैंक ने देश में पहली बार मोबाइल ऐप के जरिये ट्रैक्टर लोन का डिस्बर्समेंट के साथ-साथ कलेक्शन की शुरुआत की थी। पिछले 8 साल से हर कस्टमर के लिए यह प्लेटफार्म चल रहा है। देश में फाइनेंस के जरिये होने वाली ट्रैक्टरों की कुल बिक्री में हमारे बैंक की हिस्सेदारी 11 फीसदी है। फाइनेंस के जरिये ट्रैक्टरों की कुल 10 में से एक की बिक्री के लिए कोटक महिंद्रा बैंक फाइनेंस करता है। ट्रैक्टरों की कुल बिक्री में 98 फीसदी बिक्री लोन के माध्यम से होती है। देश के 570 से ज्यादा जिलों में हमारी मौजूदगी है। ट्रैक्टर लोन की पूरी इंडस्ट्री को हम कवर करते हैं और बैंक के 5,000 लोगों की टीम इसे रिप्रेजेंट करती है। पिछले 20 वर्षों का हमारा जो तजुर्बा है उसके आधार पर हमने अलग-अलग मॉडल बनाए हैं। मैं बहुत भाग्यशाली हूं कि कोटक महिंद्रा बैंक के इस प्रॉडक्ट को मैंने ही चालू किया और आज भी मैं इसे चला रहा हूं। ऐसा बहुत कम होता है कि पिछले 20 साल से आपको एक ही प्रॉडक्ट पर काम करने का मौका मिले।</p>
<p>जहां तक ग्राहकों की चुनौतियों की बात है तो पहले ग्राहकों की सबसे बड़ी समस्या सूचनाओं और डीलर की उपलब्धता की थी। पहले ट्रैक्टर फाइनेंस सिर्फ बैंक की शाखा के जरिये ही होता था। आज हम ग्राहक के घर जाकर फाइनेंस करते हैं। कोई ग्राहक अगर डीलर के पास ट्रैक्टर लेने जाता है तो डीलर उसकी जानकारी फाइनेंसर को फोन से देता है और फाइनेंसर का रिप्रेजेंटेटिव उसके घर पर जाकर ही लोन की सारी प्रक्रिया पूरी कर लेता है। हमारा बैंक यह प्रक्रिया मोबाइल ऐप पर करता है जो पूरी तरह से पेपर लेस है। जनधन खाता खुलने की वजह से और आसानी हो गई है। आज हम न्यूनतम 5 घंटे में लोन डिस्बर्स कर सकते हैं लेकिन हमारा औसत समय एक या दो दिन का है। बैंकों के अलावा दूसरे फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन हैं जिनमें एनबीएफसी भी हैं वे भी इन टेक्नोलॉजी को अपना रहे हैं।</p>
<p><strong>पिछले वित्त वर्ष (2022-23) में आपके ट्रैक्टर फाइनेंस का आकार क्या रहा है</strong><strong>?</strong></p>
<p>पिछले वित वर्ष में कोटक महिंद्रा बैंक ने एक लाख से ज्यादा ट्रैक्टर फाइनेंस किए हैं।</p>
<p><strong>चालू वित्त वर्ष में अभी तक आपकी ग्रोथ क्या रही है</strong><strong>? किस क्षेत्र से ट्रैक्टर लोन की अधिक मांग है।</strong></p>
<p>अभी हमारी ग्रोथ रेट पिछले साल के मुकाबले 15 फीसदी से ज्यादा है। मानसून के असर के कारण पिछले दो-तीन महीने से ट्रैक्टर फाइनेंस इंडस्ट्री की ग्रोथ थोड़ी धीमी हुई है। पिछले साल के मुकाबले ट्रैक्टर फाइनेंस इंडस्ट्री की ग्रोथ एक फीसदी कम है। ट्रैक्टर की सबसे बड़ी इंडस्ट्री उत्तर प्रदेश है। उसके बाद मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात और बाकी के राज्य आते हैं। दक्षिण में आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु का बाजार भी काफी बड़ा है। महाराष्ट्र और कर्नाटक में बारिश की कमी का असर ज्यादा है इसलिए इस साल यहां ग्रोथ नहीं है। जो ग्रोथ हो रही है वह गुजरात, तमिलनाडु और बिहार के कुछ इलाकों में थोड़ी ग्रोथ हो रही है। छत्तीसगढ़ में औसत ग्रोथ चल रहा है। उत्तर प्रदेश की स्थिति पिछले साल के जैसी ही है। उत्तर प्रदेश में करीब 1.20 लाख और मध्य प्रदेश में करीब 1 लाख ट्रैक्टरों की सालाना बिक्री होती है।</p>
<p><strong>इंडस्ट्री की ग्रोथ कम होने के बावजूद आपकी ग्रोथ रेट में तेजी की क्या वजह है</strong><strong>?</strong></p>
<p>पिछले 20 साल के तजुर्बे के आधार पर मैं कह सकता हूं कि हमने अपने ग्राहकों को जो सेवाएं दी है उसके आधार पर ग्राहक हमें चुनते हैं। हमारे बहुत से ग्राहक ऐसे हैं जिन्होंने पिछले 20 साल में हमसे दो या ट्रैक्टर फाइनेंस करवाया है। वही हमारे ब्रांड एंबेसडर हैं। ग्रमीण इलाकों में एक किसान दूसरे किसान को बहुत इन्फ्लुएंस करता है। इसकी वजह से बहुत से किसानों की तरफ से इन्क्वायरी हमें मिलती है। इसलिए भी अभी हम ग्रोथ कर पा रहे हैं। मानसून की स्थिति अनुकूल नहीं होने से इस साल निश्चित तौर पर ट्रैक्टर की बिक्री पर असर पड़ेगा। बहुत से किसानों ने ट्रैक्टरों की खरीदारी टाल दी है। अगर सितंबर-अक्टूबर की बारिश मानसून को कवर कर लेती है तो ट्रैक्टर की डिमांड फिर से बढ़ेगी।</p>
<p><strong>लोन रीपेमेंट का ट्रेंड किस तरह का है</strong><strong>?</strong><strong> क्या किसान आपके पेमेंट शेड्यूल के हिसाब से ठीक से रीपेमेंट कर पा रहे हैं</strong><strong>?</strong></p>
<p>जबसे हमने ट्रैक्टर फाइनेंस चालू किया है हमारी यूएसपी रही है कि हमने रीपेमेंट प्लान को फसलों की कटाई से जोड़ रखा है। कौन सा किसान किस फसल की खेती करता है उसके हिसाब से हम उसका रीपेमेंट प्लान तय करते हैं। हमारा भी पेमेंट प्लान मंथली (मासिक) से लेकर क्वार्टरली (तीन महीने में) और हाफ इयरली (छमाही) तक है। कोई किसान अगर सब्जियां उगा रहा है तो वह क्वार्टरली प्लान चुनता है। जिनके अन्य दूसरे फसल हैं वह छमाही प्लान चुनता है। करीब 80 फीसदी किसान छमाही भुगतान का विकल्प चुनते हैं। इसकी ज्यादा डिमांड है। कुछ इलाके हैं जैसे दक्षिण भारत के या बिहार के वहां मंथली और क्वार्टरली पेमेंट प्लान चलता है क्योंकि वहां फसलों की कटाई लगातार होती रहती है। इसलिए वे शॉर्ट टर्म पेमेंट प्लान चुनते हैं। कोविड-19 का असर छोटे बाजारों पर ज्यादा पड़ा लेकिन अभी रीपेमेंट पैटर्न कोविड की तुलना में काफी बेहतर है।</p>
<p><strong>ट्रैक्टर के अलावा जो बाकी फार्म मशीनरी हैं उनके लिए ऋण ग्रोथ कैसी है और इस क्षेत्र में किस तरह की संभावनाएं है</strong><strong>?</strong></p>
<p>ट्रैक्टर के अलावा हम हार्वेस्टर या अन्य दूसरी मशीनरी के लिए भी फाइनेंस करते हैं। उसमें हमारा मार्केट शेयर काफी ज्यादा है। इस क्षेत्र में हम पिछले 10 साल से फाइनेंस कर रहे हैं। रही बात डिमांड की तो पिछले तीन साल से जब से मजदूरों की कमी हुई है बहुत से किसान हार्वेस्टर खरीद रहे हैं और उसका एक बिजनेस मॉडल बना रहे हैं। हार्वेस्टर के लिए ज्यादा जमीन की जरूरत पड़ती है। किसानों के पास अब ज्यादा जमीन रही नहीं। तीन-चार किसान मिलकर हार्वेस्टर खरीदते हैं और एक बिजनेस विकसित कर लेते हैं। यह ट्रेंड पहले सिर्फ दक्षिण भारत में, खासतौर से आंध्र प्रदेश में देखा जाता था। अब यह ट्रेंड उत्तर और पश्चिम भारत में भी आ गया है। इसके अलावा भारत में भी कई कंपनियां हार्वेस्टर बनाने लगी हैं जिनसे हमारा टाईअप है। पूरे देश में हर लोकेशन पर हम हार्वेस्टर फाइनेंस कर रहे हैं।</p>
<p><strong>किसान क्रेडिट कार्ड के माध्यम से दिए जाने वाले छोटी अवधि के कर्ज की क्या संभावनाएं है</strong><strong>?</strong><strong> आपका बैंक कितना कर्ज देता है</strong><strong>?</strong></p>
<p>मौजूदा समय में हम पंजाब, हरियाणा, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में किसान क्रेडिट कार्ड के माध्यम से छोटी अवधि का कर्ज दे रहे हैं। वहां कोविड का असर शुरुआत में काफी ज्यादा था, खासकर कोविड की दूसरी लहर में बहुत से किसानों को परेशानी हुई लेकिन उसका असर अब बहुत कम हुआ है। मैं यह नहीं कहूंगा कि इस क्षेत्र में बहुत जबरदस्त मांग है। मांग में जो सबसे बड़ी समस्या आ रही है वह यह कि कोविड के असर से नया कर्ज लेने के लिए किसान पुराने फाइनेंसर को ही चुन रहे हैं।</p>
<p><strong>ट्रैक्टर फाइनेंस में आप मोबाइल ऐप के जरिये फाइनेंस करते हैं, क्या छोटी अवधि के कर्ज के लिए भी आपका इस तरह का कोई प्रॉडक्ट है</strong><strong>?</strong></p>
<p>जी हां, है लेकिन केसीसी रीपेमेंट के लिए ब्रांच जरूरी होता है क्योंकि बहुत सारे ट्रांजैक्शन होते हैं और उसके लिए डोर टू डोर कलेक्शन नहीं होता है। अभी हम इसमें एक नया प्रयोग कर रहे हैं जिसमें सैटेलाइट इमेजिंग के जरिये असेसमेंट और मॉनिटरिंग का एक ऐप विकसित किया जा रहा है। दो-तीन महीने में इसके शुरू होने की उम्मीद है। अभी हम इस पर अंतिम रूप से काम कर रहे हैं। हम महाराष्ट्र और गुजरात में इसे पर पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर चला रहे हैं।</p>
<p><strong>एग्री-ड्रोन के लिए भी आप फाइनेंस करते हैं क्या</strong><strong>?</strong></p>
<p>अभी तक हमने ड्रोन को फाइनेंस नहीं किया है क्योंकि मौजूदा समय में ड्रोन का इस्तेमाल प्रयोग के स्तर पर ही हो रहा है। जो कंपनियां सेवाएं देती हैं वह ड्रोन का इस्तेमाल कर रही हैं और इसके लिए उनके पास वर्किंग कैपिटल होता है। किसान अभी ड्रोन नहीं खरीद रहे हैं।</p>
<p><strong>क्या कोटक बैंक एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर फंड के तहत आने वाले प्रोजेक्ट के लिए भी फाइनेंस करता है</strong><strong>?</strong></p>
<p>हम लोग उसके प्रोजेक्ट पर भी फाइनेंस करते हैं। हमारा एक डिवीजन है जो वेयरहाउसिंग और कृषि आधारित इन्फ्रास्ट्रक्टर प्रोजेक्ट को फाइनेंस करता है। इसमें हम अग्रणी हैं।</p>
<p><strong>देश के बहुत सारे किसान अभी भी असंगठित क्षेत्र से कर्ज लेते हैं जो बहुत महंगा होता है। संगठित क्षेत्र तक उनकी पहुंच बहुत कम है। एनबीएफसी भी कई बार काफी महंगा कर्ज देते हैं। आपको क्या लगता है कि किसान अब संगठित क्षेत्र की तरफ कर्ज के लिए ज्यादा जा रहा है और निकट भविष्य में उनके लिए संगठित क्षेत्र में संभावनाएं बढ़ रही हैं</strong><strong>?</strong></p>
<p>संगठित क्षेत्र की क्रेडिट ग्रोथ में निश्चित तौर पर वृद्धि हुई है। बैंकों के लिए आरबीआई की जो एक शर्त है कि कुल कर्ज में से 25 फीसदी कर्ज का वितरण अर्द्ध शहरी और ग्रामीण इलाकों खासकर टीयर-3 और टीयर-4 से नीचे में करना अनिवार्य होगा उसकी वजह से उन क्षेत्रों तक हर बैंक की मौजूदगी बढ़ी है। इसकी वजह से असंगठित क्षेत्र से कर्ज लेने का ट्रेंड काफी घट गया है और किसान संगठित क्षेत्र की तरफ आए हैं। सरकार की भी कई सारी योजनाएं हैं जिसमें ब्याज अनुदान मिलता है। इसके अलावा 1.60 लाख रुपये तक के कर्ज के लिए किसी कोलेटरल की जरूरत नहीं होती है। इससे संगठित क्षेत्र को फायदा हो रहा है। आने वाले समय में किसानों के लिए मोबाइल पर कई सारे प्रॉडक्ट उपलब्ध होंगे। अब ज्यादातर किसानों के पास स्मार्टफोन है। किसान बहुत सारे नए प्रयोग करते हैं, पैदावार भी बढ़ाते हैं और कई सारी फैसले उगाते हैं। ऐसा नहीं है कि कोई किसान एक ही फसल उगाएगा। इसी तरह उसके लिए मार्केट की उपलब्धता भी स्मार्टफोन की वजह से बढ़ी है। उसे आसानी से पता चल जाता है कि आसपास की किस मंडी में उसकी फसल का ज्यादा दाम मिल रहा है जिससे वह वहां अपनी फसल बेच सकता है। साथ ही जो अंतरराष्ट्रीय स्थिति है जिसमें हमारा कृषि निर्यात ज्यादा नहीं होता था, आने वाले समय में हमारे किसानों को ऐसे बहुत सारे मौके मिलेंगे जहां उसे निर्यात का मौका मिलेगा। यूक्रेन यूरोप और अन्य देशों का बहुत बड़ा सप्लायर है। उसकी कमी को पूरा करने के लिए इतनी बड़ी जमीन बाकी किसी देश के पास नहीं है। देश के किसानों का भविष्य काफी अच्छा है। सरकार भी नेटवर्क और इंफ्रास्ट्रक्चर पर ध्यान दे रही है। कोल्ड स्टोरेज यूनिट्स, वेयरहाउस आदि जैसे इन्फ्रास्ट्रक्चर से किसानों को मदद मिलेगी। आने वाले समय में खेती एक व्यापार का रूप लेगा।</p>
<p><strong>आपके लिए ज्यादा प्रतिस्पर्धा कहां से आ रही है, कोऑपरेटिव बैंक, सरकारी बैंक, निजी क्षेत्र के बैंक या एनबीएफसी से</strong><strong>?</strong></p>
<p>मौजूदा समय में बैंक काफी आक्रामक हो गए हैं। बैंकों से ही प्रतिस्पर्धा ज्यादा है।</p> ]]></description>
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        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://img.youtube.com/vi/q6nCzotPkIU/maxresdefault.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[जोधपुर में ‘एजेंडा फॉर रूरल इंडिया’ का आयोजन, जलवायु परिवर्तन, बेरोजगारी, कृषि संकट और उसके समाधान पर हुआ मंथन ]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/agenda-for-rural-india-participants-flag-climate-change-unemployment-and-drugs-as-major-concerns-at-jodhpur-session.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 02 Sep 2023 19:29:19 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/agenda-for-rural-india-participants-flag-climate-change-unemployment-and-drugs-as-major-concerns-at-jodhpur-session.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span>&nbsp;</span><strong>जोधपुर।</strong> ग्रामीण भारत के विकास के एजेंडा पर मंथन के लिए जोधपुर में एक और दो सितंबर को दो दिवसीय &lsquo;एजेंडा फॉर रूरल इंडिया&rsquo; कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में राजस्थान के करीब डेढ़ दर्जन जिलों से आए 70 प्रतिभागी शामिल हुए। इनमें किसान, महिलाएं, किसान उत्पादक संगठनों के प्रतिनिधि, गैर-सरकारी संस्थाओं, माइग्रेंट्स, शिक्षक, दस्तकार, कृषि वैज्ञानिक और ग्रामीण विकास से जुड़े विशेषज्ञों ने भाग लिया। कार्यक्रम का आयोजन डिजिटल मीडिया प्लेटफार्म रूरल वॉयस, गैर सरकारी संस्था सॉक्रेट्स और जोधपुर स्थित दक्षिण एशिया बॉयोटेक्नोलॉजी केंद्र ने संयुक्त रूप से किया।</p>
<p>जोधपुर में आयोजित कार्यक्रम रूरल वॉयस और सॉक्रेट्स द्वारा आयोजित की जा रही राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम श्रृंखला में तीसरा कार्यक्रम था। इससे पहले उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में जून में इस श्रृंखला का पहला कार्यक्रम आयोजित किया गया और उसके बाद अगस्त में ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में दूसरा कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इस श्रृंखला का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले लोगों से उनकी समस्याओं, चुनौतियों और उनके समाधान के लिए सरकार द्वारा उठाए जाने वाले जरूरी नीतिगत कदमों के बारे में जानकारी हासिल करना है।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/09/image_750x_64f33e533bf60.jpg" alt="" /></p>
<p>कार्यक्रम में शामिल प्रतिभागियों ने पहले सत्र में गांव में जीवन संबंधी मुश्किलों, परिस्थितियों, कृषि क्षेत्र की मुश्किलों, जलवायु परिवर्तन से पैदा हो रहे संकट और उसके किसानों व कृषि पर पड़ रहे प्रतिकूल असर समेत तमाम मुद्दों को समस्याओं के रूप में सामने रखा। इनमें प्रमुख समस्याएं इस प्रकार हैं-</p>
<ul>
<li>फसलों में उर्वरकों और कीटनाशकों जैसे रसायनों के बढ़ते उपयोग से कैंसर, डायबटीज जैसी गंभीर बीमारियां बढ़ रही हैं। ऐसे में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना जरूरी हो गया है।</li>
<li>पीने के स्वच्छ पानी और सिंचाई के लिए पानी की समस्या बढ़ रही है और भूमि का जलस्तर लगातार नीचे जा रहा है।</li>
<li>गावों में चिकित्सा सुविधाओं की खराब हालत और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में जरूरी स्टाफ की भारी कमी।</li>
<li>सरकारी योजनाओं और कृषि से जुड़ी योजनाओं के बारे में जानकारी का भारी अभाव। जानकारी के अभाव में लाभार्थियों का योजनाओं के लाभ से वंचित रहना।</li>
<li>ग्रामीण क्षेत्र से युवाओं का शहरों में पलायन और बेरोजगारी।</li>
<li>कृषि उत्पादों के लिए मार्केटिंग ढांचे की कमी और किसानों को उपज का वाजिब दाम नहीं मिलना।</li>
<li>पंचायती राज व्यवस्था में पंचायत स्तर पर भारी भ्रष्टाचार और क्रियान्वयन संबंधी खामियां।</li>
<li>आदिवासी समुदाय के हितों का संरक्षण न होना।</li>
<li>किसानों को फसल बीमा सुविधा का पूरा लाभ नहीं मिलना।</li>
<li>ग्रामीण युवाओं में नशाखोरी का बढ़ता चलन।</li>
</ul>
<p>कार्यक्रम के दूसरे चरण में प्रतिभागियों ने ऊपर बताई गई समस्याओं को हल करने के लिए उठाए जाने वाले जरूरी कदमों के बारे में बताया। इसके साथ ही गांव में जीवन और जीवनयापन को कैसे बेहतर बनाया जा सकता है, इस पर अपनी राय रखी। समाधान वाले इस हिस्से में एक चौंकाने वाली बात यह रही कि प्रतिभागियों ने सरकार द्वारा मुफ्त में दी जाने वाली सुविधाओं को समाप्त करने की वकालत की। उन्होंने कहा कि प्रभावी और नीतिगत बदलावों के जरिये किसानों और ग्रमीण भारत को स्वावलंबी बनाया जाना चाहिए। इसके लिए जरूरी कदमों के रूप में जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए तुरंत प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है। साथ ही खेती पर इसके प्रभाव को कम करने के लिए प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/09/image_750x_64f33e6924e66.jpg" alt="" /></p>
<p>प्रतिभागियों ने कहा कि खेती में रसायनों के उपयोग में कमी लाने के लिए जरूरी कदम उठाए जाने चाहिए ताकि मिट्टी और वायु में प्रदूषण को कम किया जा सके। हर गांव में पीने के शुद्ध पानी की व्यवस्था के साथ सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता बढ़ाई जानी चाहिए। इसके लिए तकनीक के साथ जल स्रोतों के संरक्षण में तेजी लाई जानी चाहिए। ग्रामीण स्तर पर रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के लिए गांव में दस्तकारी के जरिये रोजगार बढ़ाने के साथ ही औद्योगिक इकाइयों को गांवों के नजदीक लगाया जाना चाहिए ताकि वहां रोजगार मिलने से युवाओं का शहरों में पलायन कम किया जा सके। कृषि उत्पादों के प्रसंस्करण की इकाइयों को गांवों के कलस्टर में लगाया जाना चाहिए।</p>
<p>उन्होंने कहा कि गांव में शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की गुणवत्ता में गुणात्मक सुधार की तुरंत जरूरत है। इसके लिए अगर जरूरी हो तो शिक्षकों और स्वास्थ्य कर्मियों के लिए नियम व शर्तों में बदलाव किया जाना चाहिए। इसके केंद्र में महिलाओं को रखा जाए। पंचायतों में भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए ग्राम सभा की बैठकें अनिवार्य करने के साथ ही गांव के विकास की योजनाओं को पंचायत स्तर पर ही मंजूरी दी जानी चाहिए।&nbsp;साथ ही गावों में बढ़ती नशाखोरी पर रोक के लिए तुरंत कदम उठाने की जरूरत है।</p>
<p>प्रतिभागियों के मुताबिक, सरकारी योजनाओं का लाभार्थियों तक सही फायदा पहुंचाने के लिए जागरूकता अभियान तेज किया जाना चाहिए। महिलाओं की सुरक्षा को सर्वोपरि रखते हुए उन्हें अधिक सक्षम और अधिकार संपन्न बनाने के कार्यक्रम शुरू किए जाने चाहिए।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/09/image_750x_64f33e5b169ba.jpg" alt="" /></p>
<p>एजेंडा फॉर रूरल इंडिया के आयोजन का उद्देश्य शहरी और ग्रामीण नागरिकों के बीच सामाजिक और आर्थिक स्तर पर बढ़ रहे अंतर को कम करने के लिए किस तरह के कदमों की जरूरत है, उनको सामने लाना है। इसके साथ ही ऊपर से थोपी गई योजनाओं और फैसलों की बजाय ग्रामीण आबादी की सोच और जरूरत के आधार पर ही उनके विकास के एजेंडा को तय करने की दिशा में चर्चा करना है।</p>
<p>आयोजनों की इस श्रृंखला में देश के विभिन्न राज्यों में हितधारकों के साथ छह कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे ताकि एक राष्ट्रव्यापी एजेंडा तैयार किया जा सके। इसे राष्ट्रीय स्तर पर एक कार्यक्रम के माध्यम से नीति निर्धारकों, थिंक टैंक, विशेषज्ञों और राजनेताओं के सामने रखा जाएगा।</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/09/image_750x500_64f33e4b35745.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ जोधपुर में ‘एजेंडा फॉर रूरल इंडिया’ का आयोजन, जलवायु परिवर्तन, बेरोजगारी, कृषि संकट और उसके समाधान पर हुआ मंथन  ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/09/image_750x500_64f33e4b35745.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[जीसीएमएमएफ के 50 साल: ब्रांडिंग, मार्केटिंग और सप्लाई चेन एफिशिएंसी से अमूल बनी मार्केट लीडरः डॉ. आर.एस. सोढ़ी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/50-years-of-gcmmf-branding-marketing-and-supply-chain-efficiency-made-amul-a-market-leader-said-dr-r-s-sodhi.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 31 Jul 2023 14:44:45 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/50-years-of-gcmmf-branding-marketing-and-supply-chain-efficiency-made-amul-a-market-leader-said-dr-r-s-sodhi.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>किसानों के मालिकाना हक वाले देश के सबसे बड़े एफएमसीजी ब्रांड अमूल की मार्केटिंग कंपनी गुजरात कोऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन (जीसीएमएमएफ) ने 9 जुलाई को 50 वर्ष पूरे कर लिए। अमूल ब्रांड के टर्नओवर को 2 अरब डॉलर के पार पहुंचाने में इसकी अहम भूमिका रही है। वित्त वर्ष 2022-23 में जीसीएमएमएफ का टर्नओवर करीब 55,000 करोड़ रुपये रहा है। यह सिर्फ सहकारिता आंदोलन के लिए नहीं, बल्कि देश और किसानों के लिए बड़ी उपलब्धि है। किसानों के मालिकाना हक वाला यह दुनिया का पहला ऐसा संगठन है जिसके उत्पादों की जो कीमत उपभोक्ता चुकाते हैं उसका 80 फीसदी और कभी-कभी उससे भी ज्यादा हिस्सा किसानों की जेब में जाता है। अमूल में 40 साल से ज्यादा समय तक काम कर चुके जीसीएमएमएफ के पूर्व मैनेजिंग डायरेक्टर और इंडियन डेयरी एसोसिएशन के प्रेसीडेंट <strong>डॉ</strong><strong>. </strong><strong>आर</strong><strong>.</strong><strong>एस</strong><strong>. </strong><strong>सोढ़ी</strong> से हमने यह समझने की कोशिश की कि यह संस्था कैसे खड़ी हुई है, किस तरीके से यहां तक पहुंची, इसका भविष्य और इसकी चुनौतियां क्या हैं और कौन लोग इसके पीछे रहे हैं जिन्होंने अमूल और जीसीएमएमएफ को इस मुकाम तक पहुंचाया है।&nbsp;</p>
<p><strong>किसानों के आंदोलन को एक बिजनेस ऑर्गेनाइजेशन में बदल कर अमूल और जीसीएमएमएफ यहां तक पहुंची है</strong><strong>, </strong><strong>उसकी ताकत क्या है</strong><strong>?</strong></p>
<p>सबसे पहले मैं स्पष्ट कर दूं कि गुजरात कोऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन (जीसीएमएमएफ) अमूल का मार्केटिंग विभाग है जिसका मालिकाना हक किसानों के पास है। डॉ. वर्गीज कुरियन ने त्रिभुवन दास पटेल के नेतृत्व में 1948 में अमूल ज्वाइन किया था। अमूल 1946 में बनी थी। अमूल ब्रांड के प्रोडक्ट की मार्केटिंग के लिए पूरे भारत में डिस्ट्रीब्यूटर बनाए गए थे जिनमें टाटा समूह की वोल्टास लिमिटेड भी थी। डॉ. कुरियन ने सोचा कि किसानों की इस कोऑपरेटिव का मुख्य काम होगा किसानों से दूध लेना, उसे इकट्ठा और प्रोसेस कर अमूल ब्रांड के तहत बेचना। 1960-70 के दशक में जब खैरा यूनियन प्रगति कर रहा था उसी मॉडल पर गुजरात के मेहसाणा जिले में कोऑपरेटिव यूनियन बन गई। उसने भी दूध इकट्ठा किया, प्रोडक्ट बनाए और अपने ब्रांड सागर के तहत प्रोडक्ट लॉन्च किए। उसके बाद सूरत, बड़ौदा, हिम्मतनगर और बनासकांठा में भी डिस्ट्रिक्ट यूनियन बन गईं। अगर ये सभी अपने ब्रांड लेकर आतीं, तो पहली बात तो यह कि वे एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा करतीं और उनके पास इतने संसाधन नहीं थे कि वे खुद की मार्केटिंग कर पातीं। उस वक्त त्रिभुवन दास पटेल, डॉ. वर्गीज कुरियन, मेहसाणा डिस्ट्रिक्ट यूनियन के चेयरमैन मोती भाई चौधरी और उस समय के बाकी डेयरी यूनियन के चेयरमैन ने तय किया कि मार्केटिंग के लिए एक अलग संस्था बनानी चाहिए जिसका मालिकाना हक तो किसानों का रहेगा लेकिन उसका काम मार्केटिंग करने, ब्रांड बिल्डिंग और सेल्स एवं डिस्ट्रीब्यूशन का होगा।&nbsp;</p>
<p>9 जुलाई, 1972 को जीसीएमएमएफ का रजिस्ट्रेशन हुआ लेकिन व्यावसायिक रूप से उसे काम करने में 6-7 महीने लग गए। जीसीएमएमएफ में उस वक्त अच्छे से अच्छे प्रोफेशनल रखे गए। मैंने जब 1982 में जीसीएमएमएफ ज्वाइन किया तो हमारा मुख्य काम यही था कि सेल्स और डिस्ट्रीब्यूशन का जो काम वोल्टास और दूसरी एजेंसियां करती थीं, उनसे टेकओवर करना था। डॉ. वर्गीज कुरियन ने उस समय बेहतरीन के प्रोफेशनल्स को अपने साथ जोड़ा जिनमें जेजे बख्शी भी थे जो वोल्टास लिमिटेड में अमूल का काम देखते थे। उन्होंने वोल्टास से अनुरोध किया कि आप उन्हें हमें दे दें, हम उन्हें दो-तीन साल अपने यहां रखेंगे फिर आपका टेकओवर करेंगे और उन्हें वापस भेज देंगे। जेजे बख्शी अपने साथ अपनी टीम को लेकर आए, आईआईएम (भारतीय प्रबंधन संस्थान) से निकले लोगों को रखा गया और पूरी मार्केटिंग की टीम बनाई गई जिसने पूरा मार्केटिंग टेकओवर किया। किसानों की कोऑपरेटिव अमूल ही है जिसकी अपनी इतनी बड़ी मार्केटिंग संस्था है, इसका कोई मुकाबला नहीं है। भारत में एफएमसीजी और फूड ब्रांड की मार्केटिंग करने वाली इतनी बड़ी संस्था एक ही है जिसका मालिकाना हक किसानों के पास है।</p>
<p><strong>इसका मतलब डॉ</strong><strong>. </strong><strong>कुरियन ने इस बात को </strong><strong>50 </strong><strong>साल पहले ही समझ लिया था कि क्या भविष्य होगा</strong><strong>, </strong><strong>कैसे आगे बढ़ना है और कैसे हमें खुद को मजबूत करना है क्योंकि मौजूदा समय में दुनिया की जो बड़ी कंपनियां हैं वह मार्केटिंग कंपनिया हैं</strong><strong>?</strong></p>
<p>उसके पीछे तर्क यह था कि किसानों के उत्पाद की कंपनी जो स्थानीय स्तर पर दूध की खरीद कर स्थानीय स्तर पर ही उसकी प्रोसेसिंग कर रही है, उसकी मार्केटिंग राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर करने के लिए बेहतर प्रोफेशनल और टेक्नोक्रेट चाहिए क्योंकि उस वक्त जिस ब्रांड से प्रतिस्पर्द्धा करनी थी वह विश्व का नंबर एक फूड ब्रांड था। इसलिए डॉ. कुरियन ने क्वालिफाइड लोग रखे। चाहे वह मिल्क प्रोक्योरमेंट में हो, एनिमल हसबेंडरी में हो या मिल्क प्रोसेसिंग में। मुझे याद है कि नवंबर 1982 में जब मैंने अमूल ज्वाइन किया था तो वोल्टास ने टेकओवर का 2 साल का प्री प्लान बनाकर दिया था और जीसीएमएमएफ से कहा था कि हम आपको टेकओवर देंगे, आप अपना आदमी रखिए, हम उसे ट्रेंड करेंगे। आज के समय में ऐसा कोई कंपनी नहीं करेगी लेकिन उस वक्त टाटा ने किया। वोल्टास का एक डिवीजन था पीसीपी (फार्मा कंज्यूमर प्रोडक्ट डिवीजन), मैं उसी के दफ्तर में स्थायी रूप से बैठता था। मैंने जिस वक्त अमूल ज्वाइन किया था उस वक्त भी अमूल जाना-माना ब्रांड था। तब 121 करोड़ रुपये का टर्नओवर था और 12 लाख लीटर दूध किसानों से खरीदा जाता था। पिछले साल अमूल ब्रांड का टर्नओवर 71 हजार करोड़ रुपये पर पहुंच गया और आज तकरीबन 280 लाख लीटर दूध प्रोक्योर किया जाता है। मैंने भी उस वक्त सोचा नहीं था कि अमूल इतना बड़ा बनेगा।&nbsp;</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/07/image_750x_62e53b598c68f.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>आप इतने लंबे समय तक अमूल और जीसीएमएमएफ में रहे। आपने डेयरी और कोऑपरेटिव सेक्टर में क्या बड़े बदलाव देखे</strong><strong>, </strong><strong>खासकर जीसीएमएमएफ और अमूल में</strong><strong>? </strong><strong>दुनिया के बड़े ब्रांडों से प्रतिस्पर्द्धा करते हुए कैसे आगे बढ़े</strong><strong>?&nbsp;</strong></p>
<p>पिछले 50 साल का अमूल या जीसीएमएमएफ का सफर देखें तो इसका जो तीन स्तरीय स्ट्रक्चर है, उन तीनों पर काम किया गया। पहला, मिल्क प्रोक्योरमेंट। अगर आपको दूध के प्रोडक्ट बेचना है तो भारत की आबादी बढ़ने के कारण जो मांग बढ़ती जा रही है उसको पूरा करना होगा। 1972 में 6 डिस्ट्रिक्ट यूनियन थी और गुजरात का कुछ हिस्सा ही कवर होता था। आज 18 डिस्ट्रिक्ट यूनियन हैं और सभी 33 जिले कवर होते हैं। किसानों की सदस्यता बढ़ाई गई, भौगोलिक क्षेत्र बढ़ाया गया, गुजरात ही नहीं गुजरात से बाहर भी। 2010 से फेडरेशन ने गुजरात के बाहर भी दूध खरीदना शुरू किया। आज अगर देखा जाए तो अमूल का 20 फीसदी दूध गुजरात से बाहर के 15-16 राज्यों से आता है। वहां के किसानों को भी अमूल का फायदा मिल रहा है। पहली बात तो यह कि मिल्क प्रोक्योरमेंट का विस्तार किया गया। दूसरा, मिल्क प्रोसेसिंग के लिए क्षमता बढ़ाना और दुनिया की उन्नत से उन्नत तकनीक लाना। 1950 में अमूल ने पहली बार भैंस के दूध से मिल्क पाउडर बनाया। उसके बाद अगर हम 1990 के दशक की बात करें तो पहली बार धारा के खाद्य तेल का डिस्ट्रीब्यूशन भी जीसीएमएमएफ ने किया। 1990 के दशक में जब बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत आईं तो उनके सामने अमूल ने आइसक्रीम लॉन्च की। वर्ष 2000 में हमने अमूल दूध को गुजरात से बाहर भी बेचना शुरू कर दिया। उससे पहले तक अमूल दूध सिर्फ गुजरात में बेचा जाता था। आज अमूल का 50 फीसदी टर्नओवर सिर्फ दूध से आता है। उसके बाद तो वैल्यू एडेड प्रोडक्ट की लाइन लग गई। चाहे वह बेवरेजेज हो, चीज हो, आईसक्रीम हो नई-नई वैरायटी आई। दही बेचा, लस्सी बेची, उसके अलावा नॉन मिल्क प्रोडक्ट में चाहे आलू के प्रोडक्ट हों, शहद हो, बेकरी हो, अनेक तरह के फूड प्रोडक्ट जीसीएमएमएफ ने बेचना शुरू किया। इसका मुख्य श्रेय जाता है तीनों क्षेत्रों मिल्क प्रोक्योरमेंट, मिल्क प्रोसेसिंग और सेल्स एवं डिस्ट्रीब्यूशन को। जब मैंने अमूल ज्वाइन किया था तो हमारे पास सिर्फ 5 डिस्ट्रीब्यूशन ब्रांच थी। आज हमारे पास 82-83 ब्रांच हैं। चाहे आप लेह लद्दाख चले जाइए, वहां भी अमूल का ऑफिस है। चाहे आप उत्तर-पूर्व में जोरहाट चले जाइए, पश्चिम में जोधपुर या फिर दक्षिण में कोयंबटूर, केरल कहीं पर भी चले जाइए, सभी जगह आपको अमूल का डिस्ट्रीब्यूशन हब मिलेगा।</p>
<p><strong>अमूल कुछ प्रीमियम प्रोडक्ट भी काफी मजबूती से लेकर आया। शायद आपके सामने यह भी चुनौती थी कि</strong><strong>&nbsp;</strong><strong>ग्लोबल ब्रांड से कैसे प्रतिस्पर्द्धा करें और उनके सामने किस तरह के प्रोडक्ट लेकर आएं</strong><strong>?</strong></p>
<p>अमूल ही एक ऐसा ब्रांड है जो आम आदमी का भी है और प्रीमियम का भी है। सभी उम्र, सभी आय वर्ग और सभी क्षेत्र के लोगों के लिए अमूल के प्रोडक्ट हैं। घर में दादा-दादी, मां-बाप, बच्चे सभी होते हैं और उन सभी के लिए अमूल के प्रोडक्ट हैं। चाहे दूध हो, चीज हो, आईसक्रीम हो या फिर दूसरे प्रोडक्ट सभी अमूल को अपना प्रीमियम मानते हैं। आप भारत के किसी भी हिस्से में चले जाइए, यह ब्रांड सभी को प्रीमियम लगता है। प्रीमियम प्रोडक्ट उपभोक्ता के दिमाग में होती है। उपभोक्ताओं जिस तरह की उम्मीद आपसे करते हैं उस स्तर पर प्रोडक्ट बनाने पड़ेंगे, उनकी पैकेजिंग और ब्रांडिंग करनी पड़ेगी। अमूल इमेज के मामले में किसी भी बहुराष्ट्रीय कंपनी से कम नहीं है।&nbsp;</p>
<p><strong>आपने सही कहा कि प्रीमियम तो उपभोक्ता के दिमाग में होता है। अमूल दुनिया के बड़े ब्रांडों से न सिर्फ प्रतिस्पर्द्धा कर रहा है बल्कि प्रतिस्पर्द्धा करते हुए दिखता भी है। ग्लोबल स्पोर्ट्स इवेंट या दूसरे ग्लोबल इवेंट में अमूल की मौजूदगी दिखती है</strong><strong>, </strong><strong>इसके पीछे क्या रणनीति है</strong><strong>?</strong></p>
<p>मैं आपको स्पष्ट बताऊं कि उपभोक्ता जब अमूल बटर, अमूल चीज या फिर अमूल आईसक्रीम खरीदता है तो वह यह नहीं सोचता कि यह पीएसयू का ब्रांड है या कोऑपरेटिव का ब्रांड है। उसको सिर्फ यही लगता है कि यह प्रोडक्ट उसके लिए बना है। इसकी गुणवत्ता अच्छी है, स्वाद अच्छा है, यह आधुनिक तकनीक से बना है और इसके लिए मैं जो कीमत चुका रहा हूं उससे ज्यादा मुझे मिल रहा है। आप अगर कोऑपरेटिव या पीएसयू के ब्रांड हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि आपको मल्टीनेशनल या कॉरपोरेट की तरह आधुनिक तकनीक अपनानी नहीं पड़ेगी। हम किसी भी चीज में, चाहे उत्पादन प्रक्रिया हो, उपलब्धता हो, डिजिटल इंटीग्रेशन हो, ब्रांड बिल्डिंग हो, पैकेजिंग हो किसी भी मामले में किसी से कम नहीं हैं। डॉ. वर्गीज कुरियन ने कहते थे कि आप किसानों की संस्था हैं तो आपको सबसे ऊपर होने पर ध्यान देना है। आपके प्रोडक्ट दूसरों से बेहतर होने चाहिए।&nbsp;</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/04/image_750x_642ab20232ffc.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>हमने दूध उत्पादन और डेयरी उद्योग में बहुत तरक्की की है। मूल्य के मामले में डेयरी उद्योग खाद्यान्न से ज्यादा बड़ा हो गया है। किसानों को इतना बड़ा लाभ इस क्षेत्र के जरिये मिल रहा है लेकिन हमारे सामने हमेशा एक चुनौती रही है कि जो चीजें अमूल ने सफलतापूर्वक कीं</strong><strong>, </strong><strong>उस तरीके से दूसरे राज्य या कोऑपरेटिव संगठन खुद को मजबूत नहीं कर पाए। उनका प्रदर्शन उस तरीके से नहीं रहा</strong><strong>, </strong><strong>इसके पीछे आपको क्या लगता है</strong><strong>?</strong></p>
<p>आपकी बात सही है कि अमूल जिसा स्तर पर पहुंचा है उस स्तर पर दूसरे नहीं पहुंच पाए। इसमें कोई समस्या नहीं है। आज कोऑपरेटिव सेक्टर तकरीबन 6.5 करोड़ लीटर दूध खरीदता है। अमूल का हिस्सा उसमें एक तिहाई या करीब 40 फीसदी ही है। 60 फीसदी तो दूसरे हैं। आज अमूल भारत में नंबर वन है लेकिन आप कर्नाटक चले जाएं तो वहां नंदिनी नंबर वन है, पंजाब में वेरका नंबर वन है, बिहार में सुधा नंबर वन है। अमूल 77 साल पुरानी संस्था है। यह सही है कि अमूल को पहले आने का फायदा मिला। अमूल को जो नेतृत्व और प्रोफेशनल्स मिले हो सकता है बाकियों को वैसा न मिला हो। अब भी अगर आप देखें तो डेयरी उद्योग में नंबर 1, नंबर 2, नंबर 3 कोऑपरेटिव संगठन ही हैं।&nbsp;</p>
<p><strong>निजी डेयरी क्षेत्र</strong><strong>, </strong><strong>यहां तक कि जो मल्टीनेशनल ब्रांड भी हैं</strong><strong>, </strong><strong>वह उस तरीके से कोऑपरेटिव को चुनौती नहीं दे पाए</strong><strong>, </strong><strong>इसके पीछे आप क्या वजह देखते हैं</strong><strong>? </strong><strong>कोऑपरेटिव को दूध देने वालों में ज्यादातर छोटे किसान हैं</strong><strong>, </strong><strong>तो क्या उनके साथ जुड़ना बाकियों के मुकाबले कोऑपरेटिव के लिए ज्यादा सहज है</strong><strong>?&nbsp;</strong></p>
<p>डेयरी उद्योग जिस स्तर पर आज पहुंचा है उसमें निजी क्षेत्र का भी योगदान बहुत बड़ा है। आज कोऑपरेटिव सेक्टर जितना दूध लेता है उतना ही या उससे थोड़ा कम निजी क्षेत्र लेता है। कोऑपरेटिव सेक्टर 50-55 फीसदी दूध लेता है तो निजी क्षेत्र 45-50 फीसदी लेता है। पिछले दो-तीन दशकों में निजी क्षेत्र का शेयर लगातार बढ़ा है। अगर आप पूरे भारत में देखें तो कुछ जगहों पर कोऑपरेटिव अच्छा कर रहे हैं और निजी क्षेत्र उनसे प्रतिस्पर्द्धा कर रहे हैं तो कुछ जगहों पर निजी क्षेत्र अच्छा कर रहे हैं और कोऑपरेटिव उनसे प्रतिस्पर्द्धा कर रहे हैं। कोऑपरेटिव और निजी क्षेत्र दोनों का एक ही क्षेत्र में किसानों के उत्पाद के लिए प्रतिस्पर्द्धा करना किसानों और उपभोक्ताओं के हित में होता है। दोनों को किसानों को अच्छी कीमत देनी होती है और उपभोक्ताओं के लिए अपने प्रोडक्ट की वाजिब कीमत रखनी होती है। यह एक हेल्दी कंपटीशन है।</p>
<p><strong>आपके नेतृत्व में जीसीएमएमएफ की वृद्धि शानदार रही है। आपको देश में डेयरी सेक्टर का भविष्य क्या दिखता है और दुनिया में भारत के डेयरी सेक्टर की क्या भूमिका होने वाली है</strong><strong>?</strong></p>
<p>दुनिया में जो भारत का भविष्य है वही डेयरी क्षेत्र का भविष्य है। आज अगर भारत की इकोनॉमी 3 ट्रिलियन डॉलर से थोड़ी ज्यादा है और हम बोल रहे हैं कि अगले 5 साल में यह बढ़कर 3 गुना हो जाएगी तो डेयरी सेक्टर में भी वही होगा। 50 साल में जहां खाद्यान्नों का उत्पादन 3 गुना बढ़ा है, वहीं डेयरी उत्पादन 10 गुना बढ़ा है। 210 लाख टन से बढ़कर 2,220 लाख टन तक पहुंच गए हैं। बाकी कृषि उत्पादों की तुलना में डेयरी क्षेत्र की वृद्धि दर ढाई गुना है। अगले 25 सालों में भारत का दूध उत्पादन 3 गुना बढ़कर 6,280 लाख टन के करीब हो जाएगा। प्रति व्यक्ति खपत भी 440 ग्राम से बढ़कर 850 ग्राम हो जाएगी। आज पूरे विश्व में दूध का जितना भी उत्पादन होता है उसका करीब एक चौथाई भारत में होता है। अगले 25 सालों में पूरे विश्व के दूध उत्पादन का 45 फीसदी भारत में होगा। दुनिया के जो बड़े डेयरी देश हैं वहां उत्पादन लागत बढ़ रही है। मुझे लगता है कि अगले 25 साल में विश्व डेयरी व्यापार में 60-70 फीसदी हिस्सेदारी भारत की होगी।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/04/image_750x_64283ae8bb015.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>आपको नहीं लगता कि भारत को ग्लोबल मार्केट में अपनी मौजूदगी मजबूत करने के लिए एक लंबी रणनीति की जरूरत है और वह रणनीति आपके हिसाब से क्या होनी चाहिए</strong><strong>?</strong></p>
<p>इसके लिए हमें तीन-चार क्षेत्र में काम करना है। सबसे पहले तो हमें प्रति पशु उत्पादन बढ़ाना होगा। भले ही हम दुनिया के बड़े डेयरी देशों के उत्पादन के बराबर नहीं पहुंच सकते हैं लेकिन उनके आधे या एक तिहाई स्तर पर तो पहुंचें। दूसरा है, गुणवत्ता वाले दूध का उत्पादन जिसमें मिलावट न हो और एंटी बायोटिक रहित हो। हमें किसानों को प्रोत्साहित करना है तो दूध का 15-16 फीसदी निर्यात करते रहना पड़ेगा। अगर हमें निर्यात करना है तो भारत में दूध उद्योग की क्या-क्या चुनौतियां हैं, उसे देखना होगा। सबसे बड़ी चुनौती उत्पादन की है। हमारा प्रति पशु उत्पादन विश्व के बड़े डेयरी देशों से बहुत कम है क्योंकि हमारा लो इनपुट लो आउटपुट का मॉडल है। हमें यह देखना है कि कैसे ब्रीडिंग और फीडिंग में सुधार कर प्रति पशु उत्पादन बढ़ाएं। दूसरा यह है कि अगर हमें विश्व के बाजार में प्रतिस्पर्द्धा करनी है तो हमारे दूध के प्रोडक्ट की और दूध की गुणवत्ता सुधारनी होगी। मैं जब गुणवत्ता सुधारने की बात कर रहा हूं तो केवल हमें यह नहीं देखना है कि&nbsp; प्रोडक्ट बढ़िया होना चाहिए। किसानों द्वारा किए जाने वाले दूध उत्पादन से लेकर फाइनल प्रोडक्ट तक विश्व के मानक के बराबर होना चाहिए। तीसरा यह है कि अगर विश्व बाजार में प्रतिस्पर्धा करनी है, तो उत्पादन लागत को देखना पड़ेगा। भारत में दूध पर सब्सिडी नहीं है। हमारी जो दूध की सप्लाई चेन है उसको कैसे ज्यादा से ज्यादा उन्नत बनाया जाए ताकि हम विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकें। इसके अलावा अगर आपको दूध का उत्पादन 3 गुना करना है तो आपको 3 गुना फीड और कैटल फीड भी उत्पादन करना पड़ेगा। हमको यह देखना है कि भारत के किसानों को कैसे हरे चारे और फीड इनग्रेडिएंट के उत्पादन के लिए प्रोत्साहित किया जाए और उन्हें अच्छी कीमत मिले। सबसे अंत में जो बहुत जरूरी है, अगर भारत को डेयरी निर्यात में नंबर एक बनना है तो मेड इन इंडिया डेयरी ब्रांड को इस तरह स्थापित करना है कि पूरे विश्व में जब डेयरी की बात आए तो लोग बोलें- भारत। ठीक उसी तरह जैसे आप स्विस चॉकलेट की बात करते हैं या केनोला ऑयल या फिर इटली के ऑलिव ऑयल की बात करते हैं। विश्व स्तर पर भारत के डेयरी उद्योग के लिए मेड इन इंडिया ब्रांड को आगे लेकर जाना पड़ेगा। इसके लिए आपको प्रोडक्ट भी चुनना होगा। अगर ऑलिव ऑयल या केनोला ऑयल है तो भारत का घी क्यों नहीं। मेड इन इंडिया घी से कोई प्रतिस्पर्द्धा नहीं कर सकता।</p>
<p><strong>यह बहुत सुहानी तस्वीर है लेकिन कभी</strong><strong>-</strong><strong>कभी ऐसा होता है कि सूखा पड़ जाए या कोई और समस्या आ जाए</strong><strong>, </strong><strong>जैसे पिछले साल लंपी की समस्या आई थी</strong><strong>, </strong><strong>ऐसे में दूध की उपलब्धता की भी चुनौती आ जाती है</strong><strong>?</strong></p>
<p>यह कृषि उत्पाद है जिसमें उत्पादन बहुत से कारणों पर निर्भर करता है। जैसे मौसम है, कीमत है, चारा है, तापमान है और क्या मौके उपलब्ध हैं। दूध ही है जिसकी कीमत अचानक बहुत ज्यादा नहीं बढ़ती है। आप टमाटर को देख लीजिए 5 रुपये से 200 रुपये पर पहुंच गया। दूध में ऐसा नहीं हो सकता। 20 गुना नहीं बढ़ सकता। 10-15 फीसदी ऊपर-नीचे होगा क्योंकि इसमें संगठित मार्केटिंग ज्यादा है। जितने भी कृषि उत्पाद हैं उनमें सबसे ज्यादा संगठित मार्केटिंग दूध में ही है।</p>
<p><strong>पूरे देश में अमूल जैसी किसानों की और जो दूसरी संस्थाएं हैं</strong><strong>, </strong><strong>उनके भविष्य को आप कैसे देखते हैं</strong><strong>?</strong></p>
<p>भारत में ज्यादातर छोटे किसान हैं। भारत में अमूल का या किसानों का उज्जवल भविष्य तभी संभव है अगर वह प्रोडक्टिविटी में अपनी एफिशिएंसी बढ़ाएं। दूसरा, मार्केटिंग और ब्रांडिंग चाहे वह कोऑपरेटिव के जरिये करें या एफपीओ के जरिये करें, उनको एक स्ट्रक्चर बनाना पड़ेगा। अगर दूध को ही देखें, तो करीब 9 करोड़ परिवार दूध पर निर्भर हैं। भारत सरकार भी कोऑपरेटिव की ताकत को जान गई है। कोऑपरेटिव को बढ़ाने के लिए सरकार ने कई कदम उठाए हैं और कई योजनाएं बना रखी है।</p> ]]></description>
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        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[मॉडर्न साइलोज, एग्रीटेक और कंसल्टेंसी पर है हमारा फोकसः संजय गुप्ता, एमडी एवं सीईओ, एनसीएमएल]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/our-focus-is-on-modern-silos-agritech-and-consultancy-said-ncml-md-and-ceo-sanjay-gupta.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 19 Jun 2023 18:31:36 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/our-focus-is-on-modern-silos-agritech-and-consultancy-said-ncml-md-and-ceo-sanjay-gupta.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>नेशनल कमोडिटीज मैनेजमेंट सर्विसेज लिमिटेड (एनसीएमएल) खाद्यान्नों के भंडारण के मॉडर्न सिस्टम साइलो के जरिये अनाजों के भंडारण के साथ ही पारंपरिक भंडारण सुविधाएं प्रदान करती है। इस समय कंपनी की कुल स्थापित भंडारण क्षमता 25 लाख टन से ज्यादा है और इस क्षेत्र की सबसे बड़ी निजी कंपनी है। भंडारण क्षेत्र में एनसीएमल सरकार की नोडल एजेंसी भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के साथ भी मिलकर काम कर रही है। भंडारण के अलावा एनसीएमल फूड टेस्टिंग बिजनेस, मौसम पूर्वानुमान, पैदावार के अनुमान लगाने सहित एग्रीटेक और फसल बीमा कंपनियों को कंसल्टेंसी देने के क्षेत्र में भी काम करती है। एनसीएमएल कमोडिटीज तक ही सीमित नहीं है बल्कि कृषि क्षेत्र और फूड चेन के जितने आयाम हैं उन सब में कंपनी का कामकाज है। पेश हैं एनसीएमल के मैनेजिंग डायरेक्टर और सीईओ <strong>संजय गुप्ता</strong> से <strong>रूरल वॉयस</strong> के एडिटर इन चीफ <strong>हरवीर सिंह</strong> से हुई खास बातचीत के प्रमुख अंशः</p>
<p><strong>एनसीएमएल का मुख्य कारोबार क्या है और कंपनी किस तरह से काम करती है</strong><strong>?</strong></p>
<p>एनसीएमएल की शुरुआत 20 साल पहले 2004 में हुई थी। फसल कटाई के बाद फसलों का जो नुकसान होता है उसे कम करने के लिए हमने वैज्ञानिक तरीके से भंडारण सेवाएं प्रदान करने के मकसद से इसकी शुरुआत की थी। जैसे-जैसे समय बीतता गया और बाजार में बदलाव आते गए हम भी बिजनेस के नए-नए आयाम जोड़ते चले गए। भंडारण हमारा मुख्य कारोबार है। आज हम पारंपरिक गोदामों में भंडारण की व्यवस्था के अलावा आधुनिक भंडारण व्यवस्था साइलो के जरिये ग्राहकों को सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे चार प्रमुख राज्यों में सात जगहों पर साइलो बनाए गए हैं। साइलो में अनाज रखने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें हैंडलिंग (लॉजिस्टिक) खर्च कम होता है और कीड़े लगने का खतरा कम रहता है। इसके अलावा हम फूड टेस्टिंग लैब के कारोबार में हैं। हमारे पास एनएबीएल से एक्रीडेटेड और एफएसएसएआई व एपीडा से प्रमाणित 9 फूड टेस्टिंग लैब्स हैं जो विभिन्न राज्यों में हैं। इन लैब्स में एंटीबायोटिक रेसिड्यूज, पेस्टिसाइड रेसिड्यूज और आयात-निर्यात किए जाने वाले कृषि एवं खाद्य उत्पादों की जांच होती है।</p>
<p><strong>एनसीएमएल की शुरुआत कमोडिटी एक्सचेंज एनसीडीईएक्स की सब्सिडियरी कंपनी नेशनल कोलेटरल मैनेजमेंट सर्विसेड लिमिटेड के रूप में हुई थी। अब कंपनी का ऑनरशिप स्ट्रक्चर किस तरह का है</strong><strong>?</strong></p>
<p>एनसीडीईएक्स के कमोडिटी स्टोरेज सर्विस प्रोवाइडर के रूप में कंपनी की शुरुआत हुई थी। उसमें बहुत बड़ी हिस्सेदारी आईसीआईसीआई बैंक और राबो बैंक की थी। 2015 में फेयर फैक्स समूह ने उस हिस्सेदारी को खरीद लिया। 2019 में हमने कंपनी का नाम बदलकर नेशनल कमोडिटी मैनेजमेंट सर्विसेज लिमिटेड रखा। आज की तारीख में देशभर के अलग-अलग जगहों पर हमारे 800 वेयरहाउस हैं और बहुत सारे कारोबार हैं।</p>
<p><strong>सरकार ने निजी कंपनियों के साथ मिलकर मॉडर्न साइलोज सिस्टम की शुरुआत की है। इस क्षेत्र में आपके अलावा और कई सारी कंपनियां काम रही हैं। इसके भविष्य को आप किस तरह से देखते हैं</strong><strong>?</strong></p>
<p>भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के जो पारंपरिक गोदाम हैं उनकी क्षमता कम है। इस वजह से एफसीआई को खुले में अनाज रखना पड़ता है। उसमें सबसे नुकसान होता है। उसका समाधान यह था कि साइंटिफिक वेयरहाउस बने। साइलो की सबसे बड़ी सुविधा यह है कि लॉजिस्टिक कॉस्ट की बचत होती है। किसान जब मंडी में गेहूं बेच कर जाता है तो उसके बाद उसका प्रबंधन करना होता है, जैसे उसे बोरियों में भरना, उसे गोदामों में रखना और भंडारण के बाद खाद्यान्नों को कीड़ों से बचाने के लिए छिड़काव करना आदि। उसमें काफी दिक्कत होती है। साइलो में यह सब चीजें बहुत आसानी से प्रबंधित की जाती हैं। साइलो में एक निश्चित तापमान पर खाद्यान्नों को रखा जाता है जिससे कीड़ों का हमला नहीं होता है। एफसीआई का लक्ष्य है कि ज्यादातर भंडारण को हॉरिजेंटल से वर्टिकल में कन्वर्ट किया जाए। जैसे-जैसे उनकी योजना आगे बढ़ती जाएगी और नए-नए राज्य कवर होते जाएंगे हम भी उनके साथ इसके भागीदार रहेंगे। जहां भी मौका मिलेगा हम उनके लिए साइलो बनाकर उन्हें यह सेवा प्रदान करेंगे।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/06/image_750x_649051108a5e1.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>साइलो में अभी चावल का भंडारण नहीं होता है, जबकि देश में बड़ी मात्रा में चावल का उत्पादन होता है। बिहार के बक्सर और कैमूर में एनसीएमएल चावल के भंडारण के लिए पायलट प्रोजेक्ट के रूप में साइलो बना रही है। &nbsp;उसके बारे में भी थोड़ा बताइए</strong><strong>?</strong></p>
<p>अभी तक यही मान्यता रही है कि साइलोज मक्का, बाजरा, गेहूं जैसे अनाजों के भंडारण के लिए ही अनुकूल है। चावल के लिए इसे अनुकूल नहीं माना जाता है। चावल भंडारण की दो-तीन दिक्कतें हैं। एक तो चावल में कीड़ों का हमला ज्यादा होता है। दूसरा दाना टूटने की समस्या है। नीचे वाले दाने के टूटने का खतरा ऊपर के दानों के वजन की वजह से ज्यादा रहता है। बिहार के बक्सर और कैमूर में दो नए साइलो बनाए जा रहे हैं जिसमें चावल रखा जाएगा। इसे पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर शुरू किया जा रहा है। एक-दो साल चावल रखकर देखा जाएगा कि क्या होता है। चावल के भंडारण में हमेशा नमी का नुकसान होता है जो एक-दो फीसदी तक का होता है। अगर मान लें कि 100 लाख टन चावल का उत्पादन हुआ तो नमी की वजह से 2 लाख टन तक नुकसान होने का खतरा रहता है। हमें उम्मीद है कि चावल को साइलो में रखने से यह नुकसान कम हो जाएगा। अगर यह पायलट प्रोजेक्ट सफल रहा तो फिर साइलो को काफी बढ़ावा मिलेगा क्योंकि अभी तक जितने भी प्लान बने हैं वह गेहूं के हिसाब से बने हैं। चावल के साइलो सफल होने से भारत में इस कारोबार के लिए बहुत बड़ी संभावना पैदा होगी। खाद्यान्न भंडारण के लिए देश में ज्यादा साइलो चाहिए होंगे।</p>
<p><strong>आपका जो फूड टेस्टिंग बिजनेस है उसमें कहां-कहां पर क्या-क्या काम कर रहे हैं</strong><strong>?</strong></p>
<p>आज हमारे पास देश के विभिन्न हिस्सों में 9 लैब्स हैं। हमारी सबसे बड़ी लैब गुड़गांव, मुंबई, हैदराबाद, चेन्नई और विशाखापट्टनम में हैं। इसके अलावा गुजरात के ऊंझा, कोलकाता, इंदौर और बेंगलुरु में लैब्स है। चेन्नई की लैब एफएसएसएआई के साथ मिलकर बनाई गई है। वहां पर इंपोर्ट-एक्सपोर्ट वाले सैंपल की जांच होती है और उन्हें प्रमाणित किया जाता है। सभी लैब्स में फूड टेस्टिंग नार्म्स के हिसाब से सभी टेस्ट की सुविधाएं उपलब्ध हैं। इनमें जो सबसे ज्यादा सॉफिस्टिकेटेड टेस्टिंग होती है वह एंटीबायोटिक और पेस्टिसाइड रेसिड्यूज की होती है। जैसे-जैसे लोगों में खाद्य सुरक्षा को लेकर जागरूकता बढ़ रही है यह कारोबार बढ़ता जा रहा है। सरकार भी बहुत जागरूक है कि कंपनियां अपने उत्पादों को लेकर जो दावा करती हैं वही ग्राहकों को मिले।</p>
<p><strong>क्या कंपनियों में फूड टेस्टिंग कराने का ट्रेंड बढ़ रहा है</strong><strong>?</strong><strong> खाद्य सुरक्षा के मानकों का पालन करने को लेकर क्या कंपनियां ज्यादा गंभीर हो रही हैं</strong><strong>?</strong><strong> आपका क्या अनुभव है</strong><strong>?</strong></p>
<p>इसमें दो चीजें हो रही हैं। एक तो यह कि ग्राहक बहुत ज्यादा जागरूक हो रहे हैं। उनको मानक गुणवत्ता चाहिए। भारत में असंगठित क्षेत्र में जो फूड प्रोसेसिंग हुआ करती थी पिछले चार-पांच साल से वह अब संगठित क्षेत्र में तब्दील हो रहा है। जो बड़ी कंपनियां होती हैं उनको गुणवत्ता का सर्टिफिकेशन चाहिए होता है। उनके पास अपनी लैब्स भी होती हैं मगर वह चाहते हैं कि बाहर की प्रतिष्ठित एजेंसी भी उनकी लैब रिपोर्ट को सर्टिफाइड करें और बताएं कि उनका प्रोसेस ठीक है या नहीं। मेरा मानना है कि टेस्टिंग की जरूरत बढ़ती जा रही है और बढ़ती रहेगी। इससे यह बिजनेस भी बढ़ रहा है।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/06/image_750x_64905148b0249.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>आपकी लैब्स की सेवाएं कौन सी बड़ी फूड कंपनियां ले रही हैं</strong><strong>?</strong></p>
<p>आप कोई भी बड़ा नाम ले लीजिए, चाहे पिज्जा-बर्गर बनाने वाली कंपनी हो या एफएमसीजी कंपनियां वह हमारे साथ किसी न किसी तरह से जुड़ी हुई हैं। यहां तक कि ई-कॉमर्स कंपनी अमेजन और निंजाकार्ट की सप्लाई चेन में जो टेस्टिंग होती है वह भी हमारे पास आती रहती है।</p>
<p><strong>क्रॉप रिस्क मैनेजमेंट के तहत आपकी कंपनी आईओटी, ड्रोन या सेंसर्स के इस्तेमाल जरिये फसल बीमा कंपिनयों को सेवाएं मुहैया कराती हैं। यह कितना व्यावहारिक है</strong><strong>?</strong><strong> दूसरा, किसानों को जब बड़ा नुकसान होता है तो अक्सर यह सवाल उठता है कि नुकसान की तुलना में बीमा कंपनियों से उन्हें कम क्लेम मिला। आप बताइए कि यह कितना साइंटिफिक है और नुकसान के आकलन को कितना संतुलित व उचित बनाया जा सकता है</strong><strong>?</strong><strong> आप इसे कैसे देखते हैं</strong><strong>?</strong></p>
<p>वेदर सेंसर्स का डाटा सीधे फसल बीमा कंपनियों के पास पहुंचता है। वह एक फ्रीक्वेंसी पर जाता है। जो बीमा कंपनी हमारा डाटा लेती है उसके पास यह अधिकार होता है कि वह कभी भी उस डाटा का इस्तेमाल कर सकती हैं। उसमें छेड़छाड़ होना बहुत मुश्किल है। मगर यह बात सही है कि पहले जो इंश्योरेंस हुआ करता था उसमें यह होता था कि नुकसान ज्यादा हो गया तो सबको इंश्योरेंस मिल जाएगा। अब यह हो सकता है कि आपके खेत में नुकसान हुआ लेकिन अगर सेंसर के हिसाब से जो बारिश का जो आंकड़ा है उसके आधार पर ही क्लेम का फैसला होता है। आज की तारीख में जब भी कोई आपदा आती है तो सरकार या इंश्योरेंस कंपनी नुकसान का आकलन करवाती है। नुकसान वाले इलाके में किसानों के खेतों में जाकर सरकार या बीमा कंपनी के लोग जाकर नुकसान का आकलन करते हैं। उसी आकलन के हिसाब से बीमा कंपनियां किसानों के नुकसान की भरपाई करती हैं। सेंसर्स से जो डाटा आता है उसका वेरिफिकेशन जमीनी स्तर पर भी किया जाता है ताकि नुकसान के आकलन में कोई गलती या कमी न रह जाए। हम इंश्योरेंस कंपनियों को क्रॉप कटिंग एक्सपेरिमेंट की सेवा भी देते हैं। यह सिर्फ इंश्योरेंस के लिए ही नहीं बल्कि पैदावार के अनुमान के लिए भी जरूरी है।</p>
<p><strong>क्रॉप कटिंग एक्सपेरिमेंट को तो राज्य सरकारें करवाती हैं</strong><strong>?</strong></p>
<p>उनके पास इंप्लीमेंटेशन एजेंसी होती है। हम उनके साथ मिलकर काम करते हैं। जब भी कोई क्रॉप कटिंग एक्सपेरिमेंट होता है उसकी पूरी जियो टैगिंग की जाती है, उसका पूरा वीडियो बनाया जाता है। वह हमारे सेंट्रल सर्वर पर अपलोड है। अगर 3 महीने या 6 महीने बाद भी उस पर कोई विवाद होगा तो हमारे पास विजुअल प्रूफ रहता है कि यह एक्सपेरिमेंट ऐसे किया गया था और यहां किया गया था। जियो टैगिंग है तो यह भी नहीं हो सकता है कि खेत किसी का है और ट्रायल कहीं और हो जाए।</p>
<p><strong>कृषि क्षेत्र में काफी टेक्नोलॉजी आ गई है। आप लोग भी टेक्नोलॉजी का काफी इस्तेमाल कर रहे हैं। यह बताइए कि मॉडर्न टेक्नोलॉजी कंपनियों या सरकारी संस्थाओं तक ही सीमित हैं या व्यावहारिक रूप से किसान भी इन्हें अपनाने की दिशा में जा रहा है</strong><strong>?</strong></p>
<p>हमारे यहां सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि जोत छोटी हो गई है और किसानों की संख्या करोड़ों में हैं। किसी भी कंपनी के लिए टेक्नोलॉजी को इतने लोगों तक पहुंचाना बहुत मुश्किल है। भारत सरकार ने एफपीओ (किसान उत्पादक संगठन) की जो नई स्कीम बनाई है मुझे बहुत आशा है कि एफपीओ कामयाब होंगे। इससे वर्चुअल कंसोलिडेशन हो जाएगा और लैंड होल्डिंग बड़ी हो जाएगी। किसानों का ग्रुप बन जाएगा तो उन तक पहुंचना आसान हो जाएगा। व्यक्तिगत स्तर पर किसानों तक इसे पहुंचाना बहुत बड़ी चुनौती है। एफपीओ के जरिये किसी भी कंपनी के लिए उन्हें सेवाएं देना आसान होगा और एफपीओ उन सेवाओं को खरीद सकते हैं। मुझे एफपीओ से बहुत उम्मीद है।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/06/image_750x_6490516617067.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>मौसम पूर्वानुमान में भी आप काम करते हैं। आईएमडी के अलावा कई निजी कंपनियां इस क्षेत्र में काम कर रही हैं। आपका कामकाज उनसे कैसे अलग है और मानसून को लेकर आपका क्या आकलन है</strong><strong>?</strong></p>
<p>मानसून का अनुमान लगाना बहुत मुश्किल काम है। कई सारे सॉफिस्टिकेटेड मॉडल हैं जिसका इस्तेमाल किया जाता है। आप ऐतिहासिक डाटा देखेंगे तो 1970 से लेकर 2019 तक 25 अल-नीनो आए हैं। इनमें 20 बार ऐसा हुआ है कि बारिश कम हुई और 5 बार बारिश ज्यादा हुई है। यह साल भी अल-नीनो का साल है। हम तो यही उम्मीद करेंगे कि यह ज्यादा वर्षा वाला अल-नीनो हो। मानसून में थोड़ी देरी हो गई है। इस कारण अनिश्चितता बढ़ रही है। यह मानसून शायद थोड़ा कम रह सकता है। इसकी जो वास्तविक स्थिति है वह 25 जून के आसपास निकलकर आएगी कि यह अल-नीनो कम बारिश वाला है या ज्यादा बारिश वाला। &nbsp;</p>
<p><strong>एनसीएमएल की बिजनेस ग्रोथ कैसी है</strong><strong>?</strong><strong> आपकी कंपनी लिस्टेड नहीं है। क्या आप कुछ आंकड़ों की जानकारी दे सकते हैं</strong><strong>?</strong></p>
<p>कारोबारी आंकड़ों की जानकारी मैं नहीं दे पाऊंगा लेकिन आज की तारीख में हमारे पास करीब 800 गोदाम हैं जिनकी भंड़ारण क्षमता 22 लाख टन है। इसके अलावा 7 साइलोज हैं जिनकी क्षमता 3.5 लाख टन है। हमारे समूह में 1100 कर्मचारी काम करते हैं। हमारा बिजनेस ग्रोथ अच्छा है और यह कृषि उत्पादन पर निर्भर करता है क्योंकि कृषि उत्पादन और खपत के बाद का जो हिस्सा बचता है वही भंडारण में आता है। दो साल से सरप्लस थोड़ा कम है इसलिए भंडारण कम है। पिछले साल की तुलना में इस साल अच्छी ग्रोथ है। दूसरी बात यह है कि किसानों को बैंकों या प्राइवेट सेक्टर से जो कर्ज दिया जाता है वह आज की तारीख में बढ़ रहा है। कर्ज के बदले जो खाद्यान्न कोलेटरल की तरह रखा जाता है उसका प्रबंधन भी हम करते हैं। इस कारोबार में भी भारी तरक्की हो रही है।</p>
<p><strong>कृषि क्षेत्र में कॉरपोरेट्स की भूमिका काफी तेजी से बढ़ रही है, खासकर एग्रीटेक और फिनटेक में। इसका भविष्य आप कैसे देख रहे हैं</strong><strong>?</strong></p>
<p>कृषि में किसान की लागत उसी दिन से शुरू हो जाती है जिस दिन वह खेत की जुताई शुरू करता है। इसका रिटर्न तब आता है जब उसकी फसल कटकर बिक जाती है। उसके बीच में एक बहुत बड़ा अंतर है। उस अंतर को कम करने के लिए क्रेडिट इन्वेस्टमेंट बहुत जरूरी है। यह बिजनेस पिछले दो सालों से काफी तेजी से बढ़ रहा है। पिछले दो सालों में कमोडिटीज की कीमत काफी अच्छी रही है। किसान भी इनपुट्स पर बहुत ज्यादा इन्वेस्ट करना चाहता है। बढ़िया बीज, बढ़िया दवाई, बढ़िया उर्वरक ले रहा है। इन पर इन्वेस्टमेंट के लिए फंडिंग चाहिए। पहले माइक्रो-फाइनेंस कंपनियां जो कर्ज बांटती थीं वह ज्यादातर खपत आधारित होता था। अब धीरे-धीरे कृषि में इन्वेस्टमेंट क्रेडिट की बात होने लगी है। इसे व्यापार में पूंजी लगाने के हिसाब से देखा जा रहा है। मेरे हिसाब से यह बहुत बड़ा मौका है। यह बिजनेस बहुत तेजी से बढ़ेगा।</p>
<p><strong>कृषि में निवेश, किसानों के कल्याण और आमदनी बढ़ाने को लेकर </strong><strong>सरकार की जो नीतियां हैं उसे आप कैसे देखते हैं</strong><strong>?</strong></p>
<p>सरकार की नीति रही है कि किसानों का नुकसान न हो। पिछले साल आपने देखा कि कुछ चीजों की कीमतें जब लगातार बढ़ने लगी तो सरकार ने कमोडिटी एक्सचेंज में बहुत सारी कमोडिटीज पर प्रतिबंध लगा दिया। कुछ चीजों के निर्यात को प्रतिबंधित कर दिया। सरकार का काम बहुत मुश्किल है। उसे किसानों और उपभोक्ताओं दोनों का ख्याल रखकर संतुलन बनाना होता है।</p>
<p><strong>सरकार के अचानक फैसलों से आप जैसी कंपनियां सीधे प्रभावित होती हैं। इस बारे में क्या कहेंगे</strong><strong>?</strong></p>
<p>हर कोई यह चाहता है कि सरकार की जो नीति है वह स्थायी हो, उसमें अचानक बदलाव न हो जब तक कि कोई आपातकालीन स्थिति न हो। अचानक निर्यात पर प्रतिबंध का फैसला हो जाता है या स्टॉक लिमिट लगाने का फैसला हो जाता है या कमोडिटी एक्सचेंज पर कुछ कमोडिटीज को बैन कर दिया जाता है। मगर सरकार की मुश्किलें हमारी तुलना में बहुत ज्यादा हैं। उसकी दुविधा ज्यादा है। हालांकि कारोबारी नजरिये से देखें तो पॉलिसी फ्रेमवर्क स्थायी होना चाहिए तभी निवेशक उसमें निवेश करता है।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/06/image_750x_649051834e135.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>एनएसीएमल का भविष्य का रोडमैप क्या है</strong><strong>?</strong></p>
<p>भविष्य में हम एग्रीटेक पर ज्यादा फोकस करना चाहते हैं। नई-नई टेक्नोलॉजी आ रही है। हमारा किसानों से सीधा संबंध बहुत ज्यादा है। हम चाहते हैं कि कोई ऐसी टेक्नोलॉजी हो जिसे किसानों तक पहुंचाना हो तो हम उसे तेजी से पहुंचा सकते हैं। हमारा फोकस रहेगा कि कंसल्टेंसी और एग्रीटेक पर ज्यादा ध्यान दिया जाए और किसानों तक इसको बहुत जल्दी उपलब्ध कराया जाए। फसल आने से लेकर किसानों को दाम मिलने तक का जो समय है उसे कम किया जाए। दिनों से उसे घंटों में लाया जाए। एग्रीटेक का भविष्य अच्छा है और कंपनी इस पर बहुत फोकस करना चाहती है।</p> ]]></description>
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        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://img.youtube.com/vi/XQkTXkXlky8/maxresdefault.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[रूरल वॉयस&amp;#45;सॉक्रेटस बजट चर्चा में किसानों ने रखी राय, ग्रामीण विकास में अपनी प्राथमिकताएं भी बताईं]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/farmers-put-their-views-in-rural-voice-socratus-budget-charcha-and-priorities-for-rural-development.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 16 Apr 2023 10:41:33 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/farmers-put-their-views-in-rural-voice-socratus-budget-charcha-and-priorities-for-rural-development.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">एक भारतीय मध्यवर्गीय परिवार की कल्पना कीजिए। परिवार के सदस्य एक टेबल के चारों तरफ बैठे हैं और घर के बजट पर चर्चा कर रहे हैं। इस बीच यह बताना उचित होगा कि अंग्रेजी का इकोनॉमी (economy) शब्द ग्रीक शब्द ओइकोनोमिया oikonomia से बना है, जिसका अर्थ होता है घर का मैनेजमेंट। यह परिवार हर महीने इस बात पर चर्चा करता है कि पैसा किस तरह खर्च किया जाए। उनकी अपनी मुश्किलें हैं, साथ में इच्छाएं भी हैं। हर परिवार किसी न किसी स्तर पर इस तरह के दबाव को महसूस करता है और उसे खर्च की प्राथमिकता तय करने की जरूरत पड़ती है। अगर देश को एक बड़े परिवार की तरह माना जाए तो केंद्रीय बजट पूरे देश के परिवार के बजट जैसा है। यह हर एक व्यक्ति को इस तरह प्रभावित करता है जिसे देखना-समझना हमेशा आसान नहीं होता, खासकर किसान जैसे नागरिकों के लिए जो उतने प्रबुद्ध नहीं माने जाते।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अगर हम इस धारणा को बदलना चाहते हैं तो हमें किसानों के लिए ऐसे अवसर पैदा करने होंगे ताकि उन्हें प्रबुद्ध नागरिक के रूप में देखा जाए, जिन्हें केंद्रीय बजट की पूरी समझ हो। ठीक उसी तरह जैसे कृषि के अलावा अन्य क्षेत्र में बजट से प्रभावित होने वाले लोग अपनी धारणा रखते हैं। कृषि तथा इससे संबंधित क्षेत्र के प्रावधानों पर उनकी बातें कुछ हद तक बजट पर उनके समग्र विचार को प्रदर्शित करती हैं। बजट चर्चा 2023-24 हमें किसानों के नजरिए से बजट की बारीकियों का आत्मनिरीक्षण करने तथा उन पर एक स्वस्थ चर्चा करने का अवसर है।</span></p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/04/image_750x_643520bb58544.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>साझेदारी</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">वित्त वर्ष 2023-24 के बजट पर संसद में हाल ही चर्चा संपन्न हुई। इस बजट ने किसानों की बात सुनने तथा आत्मनिरीक्षण करने के मकसद से रूरल वॉयस तथा सॉक्रेटस फाउंडेशन को किसानों, विशेषज्ञों तथा सांसदों के विविध समूहों को आमंत्रित करने का अवसर दिया। इस परिचर्चा का आयोजन 14 मार्च 2023 को किया गया। इसमें उत्तर तथा पूर्वी 7 राज्यों के 20 से ज्यादा कृषि तथा संबंधित क्षेत्र के किसानों ने हिस्सा लिया। बजट चर्चा का संचालन किसानों के मुद्दे उठाने वाले डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म रूरल वॉयस के मुख्य संपादक हरवीर सिंह ने किया। सॉक्रेटस ने इस चर्चा के लिए बाकी व्यवस्था की।</span></p>
<p><strong>मुद्दे</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">जैसी कि आप कल्पना कर सकते हैं, इस आयोजन में कई तरह की कठिनाइयां भी पेश आईं। हम चाहते थे कि हमारी जूरी के सामने भारत की विविधता परिलक्षित हो तथा केंद्रीय बजट में कृषि तथा संबंधित क्षेत्रों के प्रावधानों का प्रतिनिधित्व हो, लेकिन हमें चिंता इस बात की थी कि पर्याप्त संख्या में किसान आएंगे या नहीं। आयोजन के लिए लॉजिस्टिक्स भी एक चिंता थी जिसमें काफी वक्त लगा। आयोजन स्थल पर बैठने की फिक्स्ड व्यवस्था होने के कारण भी शुरू में चुनौतियां आईं, लेकिन हमारी टीम ने इसे अपनी डिजाइन में शामिल करते हुए जगह का अधिक से अधिक इस्तेमाल किया। संभावित जूरी के तीन सदस्यों ने आखिरी क्षणों में ना आने की सूचना दी जिससे हम काफी परेशान हो उठे, लेकिन चार नए किसान अंततः इस चर्चा में शामिल हुए।</span></p>
<p><strong>आयोजन स्थल</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इस परिचर्चा का आयोजन इंडिया इंटरनेशनल सेंटर की एनेक्सी बिल्डिंग में किया गया। मशहूर लोधी गार्डन के पास स्थित यह केंद्र भारत के प्रमुख सांस्कृतिक संस्थानों में गिना जाता है। सिंदूरी रंग के फूलों से सजे पलाश के पेड़ और पक्षियों की चहचहाहट ने किसानों को उत्साह से लबरेज कर दिया। जिस हाल में आयोजन हुआ वह काफी आरामदायक था। टेबल पर माइक लगे थे। बैठने की व्यवस्था कुछ इस तरह थी कि किसान खुद बोलने के लिए प्रेरित हो रहे थे। खिड़की से इंडिया इंटरनेशनल सेंटर का बागीचा दिख रहा था। पूरा माहौल एक गहन चर्चा के अनुकूल था।</span></p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/04/image_750x_6435205c32fa8.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>बजट चर्चा संचालन का डिजाइन</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">संचालन का नजरिया किसानों को एक नागरिक के रूप में समझने का था ताकि वह पूरे बजट पर अपनी बात रख सकें, किसी विशेष हित समूह की तरह नहीं जो अपने सेक्टर की ही बात करता है। योजना कुछ इस प्रकार थी-</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">1.किसान और विशेषज्ञ सबसे पहले एक व्यापक नजरिए से बजट तथा आम लोगों के जीवन पर इसके प्रभावों की चर्चा करेंगे।</span></p>
<ol start="2">
<li><span style="font-weight: 400;"> उसके बाद चर्चा ग्रामीण भारत के लिए बजट प्रावधानों पर सीमित होगी।</span></li>
<li><span style="font-weight: 400;"> अंत में हम यह देखेंगे कि यह प्रावधान एक व्यक्ति के रूप में किसानों को किस तरह प्रभावित करते हैं।</span></li>
</ol>
<p><span style="font-weight: 400;">इस परिचर्चा के मुख्य निष्कर्ष को सांसदों के सामने रखा जाएगा ताकि एक ऐसा प्लेटफॉर्म बन सके जहां नागरिक, विशेषज्ञ और सांसद एक साथ बात कर सकें। इस प्रक्रिया का एक तरीका वह यात्रा है जिसमें एक नागरिक किसान हम से हम लोग, और फिर मैं तक की यात्रा करता है।</span></p>
<p><strong>केंद्रीय बजट 2023 24 का पूर्व अनुकूलन</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">इस आयोजन से एक सप्ताह पहले बजट तथा ग्रामीण विकास से संबंधित विभिन्न स्कीमों के लिए आवंटन के बारे में किसानों को जानकारी दी गई। उनमें से जो लोग जूरी सदस्य बने उन्हें हमने अपनी बनाई माइक्रोसाइट तथा अन्य संसाधन मुहैया कराए ताकि इस आयोजन के लिए वे तैयार हो सकें। ज्यादातर किसान बजट के बारे में पहले नहीं जानते थे लेकिन उनमें इसे समझने की प्रबल इच्छा थी ताकि वे इस आयोजन को सफल बनाने में मदद कर सकें, कृषि समुदाय की विशेष जरूरतों तथा वरीयता के बारे में बहुमूल्य इनसाइट भी उपलब्ध कराएं।</span></p>
<p><strong>ग्रामीण विशेषज्ञों की परिचर्चा</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">ग्रामीण विकास के हालात पर एक संवादमूलक परिचर्चा को डॉ. महिपाल ने आगे बढ़ाया। डॉ. महिपाल, इंडियन इकोनॉमिक सर्विस के पूर्व अधिकारी हैं। इस सत्र का समापन &lsquo;बजट बनाए मंत्रालय&rsquo; गतिविधि के साथ हुआ जिसमें किसानों ने सघन रूप से हिस्सा लिया। बजट आवंटन में उन्होंने अपनी प्राथमिकताएं बताईं। इस गतिविधि में एक अतिरिक्त बॉक्स भी शामिल था, जिसमें किसानों को ऐसी सेक्टोरल मंत्रालय की कल्पना करने को कहा गया जिसके बारे में उन्हें लगता है कि बजट में फोकस नहीं किया गया है।</span></p>
<p><strong>ग्रामीण बजट मंत्रालय गतिविधि के नतीजे</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">बजट आवंटन गतिविधि ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े मंत्रालयों के बारे में किसानों की जागरूकता के स्तर को बताया। इस तथ्य को बैठक में मौजूद सांसदों के साथ साझा किया गया। ऊपर जो अतिरिक्त बॉक्स का जिक्र किया गया है, उसमें स्वास्थ्य और शिक्षा प्रमुख थीम के रूप में उभरे। बैलट बॉक्स में शामिल 10 मंत्रालयों में कृषि और किसान कल्याण के बाद स्वास्थ्य एवं शिक्षा को किसानों ने प्राथमिकता दी। संचार, रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के आवंटन में भी थोड़ी रुचि किसानों ने दिखाई। इससे संकेत मिलता है कि किसान रासायनिक उर्वरक से दूर होना चाहते हैं। सरकार के बजट के विपरीत किसानों ने स्वास्थ्य, शिक्षा और कृषि विकास को वरीयता दी।</span></p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/04/image_750x_64352095d4663.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>किसान कृषि बजट के नतीजे</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">किसानों ने बजट पर अपने विचारों को रंगीन शीट पर अंकित किया। ओडिशा की एक आदिवासी महिला किसान अनीमा मिंज ने मोटे अनाज की मार्केटिंग और प्रोसेसिंग बेहतर करने पर जोर दिया, खासकर मिलेट के लिए। उनका कहना था कि इससे आय के बेहतर अवसर मिलेंगे। इस चर्चा में भाग लेने वाले अन्य किसानों ने कृषि क्षेत्र के विकास में फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गेनाइजेशन (एफपीओ) की भूमिका को भी बताया। जैविक खेती की प्रशंसा करते हुए कुछ किसानों ने जैविक खाद की भूमिका को रेखांकित किया। यह खाद खेतों में मौजूद गाय के गोबर, गोमूत्र, नीम के पत्ते, गुड जैसी चीजों से बनती है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े सवालों पर हई चर्चा पर किसानों ने संतुष्टि जताई। भविष्य में बजट तैयार करने के दौरान किसानों की आकांक्षाओं को शामिल करने की जरूरत भी महसूस की गई। किसानों ने प्राकृतिक खेती, कृषि से संबंधित क्षेत्र जैसे मछली पालन, डेरी, बागवानी, पशुपालन, कोऑपरेटिव को प्रमोशन तथा एनआरएलएम के लिए जेंडर बजटिंग के प्रावधानों पर भी संतुष्टि जताई। किसानों के साथ कमेंट बोर्ड एक्टिविटी के कुछ महत्वपूर्ण परिणाम इस प्रकार रहे-</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">-बीमा और सब्सिडी स्कीमों के लिए आवंटन में कमी।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">-किसानों की आय दोगुनी करने के मामले में किसानों का नजरिया यह रहा कि बजट ऐसा करने के बजाय किसानों की लागत को दोगुना कर रहा है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">-बजट में ऑर्गेनिक खेती के लिए तैयार मॉडल मार्केट का अभाव है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">-शिक्षा और स्वास्थ्य को कृषि के साथ जोड़ा जाना चाहिए और इसमें आदिवासी किसानों पर विशेष फोकस किया जाना चाहिए।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">-सभी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) घोषित किया जाए।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">-उर्वरक, बीज तथा कृषि मशीनरी पर दी जाने वाली सब्सिडी के बारे में किसानों को जानकारी दी जाए।</span></p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/04/image_750x_643520e4a3294.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>कृषि बजट पर सांसदों के विचार</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">सांसदों ने किसानों के लिए इनपुट के मसले पर संसद में चर्चा की बात कही। भारतीय जनता पार्टी किसान मोर्चा के पूर्व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नरेश सिरोही ने सुझाव दिया कि सरकार की मूल्य नीति की नियमित समीक्षा की जानी चाहिए, ताकि कृषि फायदे का सौदा बन सके। बहुजन समाज पार्टी के सांसद दानिश अली और बीआरएस के लोकसभा सांसद नागेश्वर राव ने कृषि क्षेत्र के लिए ज्यादा आवंटन की बात कही। जनता दल यूनाइटेड के राष्ट्रीय महासचिव केसी त्यागी ने एमएसपी की गारंटी तथा मनरेगा में मजदूरी बढ़ाने की किसानों की मांग का समर्थन किया।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">अनेक किसानों ने स्वीकार किया कि बजट प्रस्तुति से उन्हें एक स्वस्थ भागीदारी चर्चा में मदद मिली। इस आयोजन से हमें (रूरल वॉयस और सॉक्रेटस) तथा वहां मौजूद सांसदों को सप्लाई चेन और मार्केटिंग में किसानों के सामने आने वाली दिक्कतों को समझने का मौका मिला। उदाहरण के लिए, प्राकृतिक खेती करने वाले किसान सिर्फ कृषि से संबंधित क्षेत्र नहीं, बल्कि रेल, रक्षा और संचार के क्षेत्र में बजट आवंटन को लेकर भी चिंतित नजर आए।</span><span style="font-weight: 400;"></span></p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/03/image_750x_641315c9b2f25.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>निष्कर्ष</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">बजट चर्चा ने जूरी में शामिल किसानों तथा श्रोताओं को बजट की बारीकियों को समझने का एक अलग अवसर दिया, खासकर ग्रामीण और कृषि क्षेत्र के लिए। हमने उनके लिए एक ऐसा प्लेटफॉर्म तैयार किया जहां वे विशेषज्ञों से सवाल कर सकते हैं, संसद के सदस्यों के साथ विमर्श कर सकते हैं तथा सरकार के बारे में अपना फीडबैक दे सकते हैं। सांसदों को ग्रामीण भारत के सोचने के तरीके तथा उनकी चिंताओं के अलावा ग्रामीण भारत पर बजट के असर के बारे में जानने का अवसर मिला। रूरल वॉयस और सॉक्रेटस को इस आयोजन से भविष्य में ऐसे और कार्यक्रम आयोजित करने के लिए एक तरह की दिशा मिली।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;"><strong><i>( इस आलेख को सॉक्रेटस फाउंडेशन की टीम ने तैयार किया है जिनमें आलोक श्रीवास्तव, जोनाथन डेविड सईमलिएह, नितिन वेमुला, प्रचुर गोयल, राजेश कस्तुरीरंगन और शिविका भान शामिल हैं। लेख में उपयोग किये गये इलस्ट्रेशन टीम की सदस्य नित्या जडेजा ने बनाये हैं) </i></strong></span><span style="font-weight: 400;"></span></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/04/image_750x500_64351ff1c370d.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ रूरल वॉयस-सॉक्रेटस बजट चर्चा में किसानों ने रखी राय, ग्रामीण विकास में अपनी प्राथमिकताएं भी बताईं ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[मालधारी समुदाय की आजीविका बचाना जलवायु समेत कई संकटों का समाधान]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/pastoralism-a-clarion-call-to-save-the-maldhari-livelihood.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Mon, 27 Mar 2023 08:52:36 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/pastoralism-a-clarion-call-to-save-the-maldhari-livelihood.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span style="font-weight: 400;">मालधारी भारत के उन देसी समुदायों में शामिल हैं जिन्होंने कच्छ में जलवायु परिवर्तन की समस्या में सबसे कम योगदान किया है, फिर भी उन्हें इसके विपरीत प्रभावों का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि भारत का पशुधन क्षेत्र फल-फूल रहा है, लेकिन महत्वपूर्ण यह भी है कि इसमें समावेशिता होनी चाहिए। भारत में लगभग 14.89 करोड़ बकरियां और 7.43 करोड़ भेड़ें हैं। मालधारी ऐसे भूमिहीन चरवाहे किसान हैं जो गुजरात में मौसमी पशुधन पालन पर आश्रित रहते हैं। भारत की आबादी का 8 से 9 फ़ीसदी मालधारी हैं। देश के विभिन्न राज्यों में इनके 15 से अधिक समुदाय हैं। पारंपरिक रूप से ये दूध का व्यवसाय करते आए हैं और एक जमाने में रजवाड़ा परिवारों को दूध और पनीर आदि की सप्लाई किया करते थे। उच्च क्वालिटी का घी, दूध, ऊन, मवेशी और हस्तशिल्प इनकी आय का प्रमुख साधन हैं। गुजरात, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में मालधारियों का जीवन पशुधन, खासकर छोटे मवेशियों और ऊंट के साथ जुड़ा रहा है।</span></p>
<p><strong>कच्छ में मालधारी चरवाहों की समस्याएं</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">20वीं पशुधन गणना के अनुसार गुजरात में 17.87 लाख भेड़ें हैं। 70% से अधिक भेड़-बकरियां छोटे और सीमांत किसान तथा भूमिहीन मजदूर पालते हैं। मालधारी गुजरात के सीमाई इलाकों में स्थित गांवों में रहते हैं। उन इलाकों में पानी तथा हरे चारे की कमी की वजह से ये भेड़-बकरी जैसे छोटे मवेशी और ऊंट पालते हैं। उन इलाकों में मवेशियों के लिए चरागाह नहीं है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">बकरी के दूध को गरीब आदमी का दूध भी कहा जाता है। भेड़ और बकरी के दूध को करीबी दुग्ध कोआपरेटिव में स्वीकार नहीं किया जाता इसलिए निजी डेयरियां मालधारियों का शोषण करती हैं। दूध, दुग्ध उत्पाद, बाल तथा ऊनी प्रोडक्ट के लिए मार्केट वैल्यू चेन, लॉजिस्टिक्स की कमी के कारण मालधारी अपने प्रोडक्ट अच्छी कीमत पर नहीं बेच सकते हैं। गांव में उच्च शिक्षा की सुविधाएं उपलब्ध ना होने के कारण राबरी और जट मालधारियों का कौशल विकास नहीं हो पाता है। इसलिए पीढ़ियों से वे जीविकोपार्जन के लिए मवेशी चराने का काम करते आए हैं। मौसम के हिसाब से वे एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते रहते हैं। इसलिए सरकार के अधिकारी भी उन्हें कोई दीर्घकालिक ग्रांट देने से कतराते हैं।</span></p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/03/image_750x_641e83638036c.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>मालधारियों के लिए क्या किया जा सकता है?</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">1.हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि मालधारी एक अलग दुग्ध संग्रह प्रणाली व्यवस्था के तहत पास की कोऑपरेटिव में भेड़ और बकरियों का दूध जमा करें।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">2.नाबार्ड की मदद से छोटे पशुधन और ऊंट के दूध के लिए प्रोड्यूसर कंपनियां बनाने की जरूरत है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">3.मालधारियों को आम सार्वजनिक संपत्ति तक पहुंच और उनका नियंत्रण दिया जाना चाहिए।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">4.मालधारियों के लिए चरागाह की सीमा निर्धारित की जानी चाहिए।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">5.मौसम के हिसाब से मालधारी जब एक इलाके से दूसरे इलाके में जाते हैं तब जमीन और चरागाहों पर उनके अधिकारों की रक्षा की जानी चाहिए।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">6.दूरदराज के सीमाई इलाकों में मालधारियों के लिए एक सस्टेनेबल मार्केट लिंकेज स्थापित किया जाना चाहिए।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">7.अकादमीशियन और शोधार्थियों द्वारा मालधारियों के पारंपरिक ज्ञान को स्वीकार करने के साथ उन्हें पहचान दी जानी चाहिए।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">वर्गीज कुरियन सेंटर ऑफ एक्सीलेंस का स्किल डेवलपमेंट और ट्रेनिंग वर्कशॉप</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">वर्गीज कुरियन सेंटर ऑफ एक्सीलेंस आईआरएमए ने मालधारी रूरल एक्शन ग्रुप (MARAG) नाम के गैर सरकारी संगठन की मदद से कच्छ क्षेत्र में मालधारियों का एक सर्वेक्षण किया था। इस समुदाय के लिए एक प्रशिक्षण कार्यक्रम तैयार करने तथा स्मार्ट डेरी प्रैक्टिस के माध्यम से कौशल विकास एवं आय बढ़ाने के मकसद से सेंटर ऑफ एक्सीलेंस ने &lsquo;रूरल हॉट बाय मालधारी&rsquo; का आयोजन किया। यह आयोजन 23 सितंबर 2022 को इंस्टीट्यूट आफ रूरल मैनेजमेंट आणंद (आईआरएमए) में किया गया था। इस आयोजन में मालधारी महिला संगठन और MARAG ने सहयोग किया।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">गुजरात के कच्छ और पाटन जिलों के दूरदराज सीमाई गांवों की मालधारी महिलाओं ने नवरात्रि और दिवाली के आसपास अपनी खूबसूरत हस्तकला का प्रदर्शन किया। वर्गीज कुरियन सेंटर ऑफ एक्सीलेंस ने 24 फरवरी 2023 को एक वर्कशॉप का भी आयोजन किया जिसका विषय था जलवायु परिवर्तन और डेयरी के माध्यम से मालधारियों के लिए सस्टेनेबल आजीविका सुनिश्चित करना। इस आयोजन से मालधारी महिलाओं को वैकल्पिक आजीविका की ओर बढ़ने का प्रोत्साहन मिला। अंजार ब्लॉक की लक्ष्मी रबारी हस्तकला उनमें से एक है।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">वर्कशॉप में &lsquo;कैमल क्रेजी&rsquo; की लेखिका क्रिस्टीना एडम्स कैलिफोर्निया से ऑनलाइन जुड़ी थीं। उन्होंने ऑटिज्म से ग्रस्त अपने बेटे का अनुभव बताया कि कैसे मध्य पूर्व से बेडुइन कैमल दूध से उनके बेटे की सेहत में सुधार आया। इस आयोजन को बीकानेर स्थित नेशनल रिसर्च सेंटर ऑन कैमल के डायरेक्टर डॉ. अर्तबंधु साहू ने भी संबोधित किया। उन्होंने ऊंट के दूध से एसिडिटी की गलत धारणा के बारे में बात की। अंजर तालुका की खारा पसवारिया ग्राम पंचायत की सरपंच धानी बेन ने कच्छ जिले में मालधारी समुदाय के संघर्षों की बात की।</span></p>
<p><strong>निष्कर्ष</strong></p>
<p><span style="font-weight: 400;">जैविक विविधता के संरक्षण और वन तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा में मालधारी जैसे देसी समुदाय महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पर्यावरण के बारे में उनका पारंपरिक ज्ञान वैज्ञानिक आधार को समृद्ध बना सकता है। वर्गीज कुरियन सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के रिसर्च प्रोजेक्ट और उसके बाद आयोजित वर्कशॉप से यह एहसास हुआ कि पशुचारणता दुनिया की 5 संकटों का समाधान है- जलवायु, खाद्य, जॉब, उर्जा और शांति।&nbsp;</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">गांवों में छोटे मवेशियों का दूध भी महत्वपूर्ण है। राज्य के कुल मवेशियों में 8.47% भेड़ें हैं। इनके विस्तार की प्रचुर संभावनाएं भी हैं। रिसर्च से यह भी पता चला है कि गाय के दूध में भेड़ का थोड़ा सा दूध मिलाया जाए तो उससे सर्वोत्तम क्वालिटी का पनीर बनता है। भारत डेयरी एक्सपोर्ट का पावर हाउस है, इसलिए यहां छोटे पशुधन के दूध से लस्सी, श्रीखंड, योगर्ट, मिल्क पाउडर और मिठाइयां आदि बनाने की संभावनाओं पर विचार किया जाना चाहिए। साथ ही एक सस्टेनेबल वैल्यू चेन का निर्माण किया जाना चाहिए।</span></p>
<p><em><strong>(डॉ. जे.बी. प्रजापति वर्गीज कुरियन सेंटर ऑफ एक्सीलेंस, इरमा के चेयरपर्सन हैं, डॉ. स्मृति स्मिता महापात्र इसी सेंटर में रिसर्च फेलो हैं)</strong></em></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ मालधारी समुदाय की आजीविका बचाना जलवायु समेत कई संकटों का समाधान ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[तेलंगाना मॉडल से दूर होंगी कृषि क्षेत्र और किसानों की समस्याएंः नागेश्वर राव]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/brs-mp-namma-nageshwar-rao-said-telangana-model-will-solve-the-problems-of-agriculture-sector-and-farmers.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 15 Mar 2023 18:43:19 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/brs-mp-namma-nageshwar-rao-said-telangana-model-will-solve-the-problems-of-agriculture-sector-and-farmers.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>कृषि क्षेत्र की स्थिति सुधारने और किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार को तेलंगाना मॉडल पर फोकस करना चाहिए। तेलंगाना ने न केवल बजट में कृषि क्षेत्र के लिए प्रावधान को बढ़ाकर 22 फीसदी कर दिया है, बल्कि किसानों को 24 घंटे बिजली देने, 80 फीसदी खेतों में सिंचाई की सुविधा उपलब्ध कराने और किसानों की पूंजी की समस्या दूर करने के लिए रायथु बंधु योजना के तहत आर्थिक मदद देने जैसे कदम उठाए हैं। भारतीय राष्ट्र समिति (बीआरएस) के लोकसभा में नेता नम्मा नागेश्वर राव ने बजट पर आयोजित एक चर्चा कार्यक्रम में यह बात कही है।</p>
<p>रूरल वॉयस और सॉक्रेटस फाउंडेशन द्वारा नई दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में मंगलवार को आयोजित &lsquo;बजट चर्चा&rsquo; कार्यक्रम में नागेश्वर राव ने कहा कि तेलंगाना की केसीआर सरकार ने वन भूमि को छोड़कर 80 फीसदी खेतिहर जमीन को सिंचाई की सुविधा मुहैया करा दी है। इसके लिए सरकार ने अब तक 1 लाख करोड़ रुपये खर्च किए हैं और गोदावरी नदी के जल स्तर को बढ़ाकर हर खेत को पानी उपलब्ध कराया है। इसके अलावा सिंचाई के लिए किसानों को 24 घंटे बिजली दी जा रही है। साथ ही रायथु योजना के तहत प्रति एकड़ सालाना 10 हजार रुपये की आर्थिक सहायता किसानों को दी जाती है। यह सहायता रबी और खरीफ सीजन में दो किस्तों में दी जाती है।</p>
<p>नागेश्वर राव ने कहा कि राज्य सरकार ने कृषि के बजट को बढ़ाकर 22 फीसदी कर दिया है, जबकि केंद्रीय बजट में कृषि के लिए सिर्फ 6 फीसदी ही प्रावधान किया जाता है। राज्य का कृषि बजट करीब 60 हजार करोड़ रुपये का है जिसमें से 26,885 करोड़ रुपये सिंचाई का बजट है। सिंचाई की सुविधा बढ़ने से तेलंगाना ने धान उत्पादन में पंजाब को पीछे छोड़ दिया है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार पाम की खेती को बढ़ावा दे रही है। अभी 5 लाख हेक्टेयर में पाम की खेती हो रही है जिसे बढ़ाकर 20 लाख हेक्टेयर करने का लक्ष्य रखा गया है। इससे न सिर्फ घरेलू स्तर पर पाम ऑयल का उत्पादन बढ़ेगा बल्कि पाम ऑयल के आयात पर होने वाले विदेशी मुद्रा के भारी भरकम खर्च में भी बचत होगी।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/03/image_750x_6411c38434747.jpg" alt="" /></p>
<p>जदयू के राष्ट्रीय महासचिव केसी त्यागी ने बजट चर्चा कार्यक्रम में हिस्सा ले रहे देशभर के किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि 2023-24 के केंद्रीय बजट में कृषि और ग्रामीण क्षेत्र के लिए किए गए प्रावधानों में कटौती किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए सही नहीं है। ग्रामीण बजट में 13 फीसदी की कटौती की गई है। मनरेगा के बजट में की गई भारी भरकम कटौती ग्रामीण इलाकों में रोजगार की दिक्कत पैदा करेगी। उन्होंने आंकड़ों के हवाले से बताया कि मनरेगा लागू होने से पहले देश के करीब 110 जिले नक्सलवाद प्रभावित थे। मनरेगा लागू होने के बाद 58 जिलों में नक्सलवाद खत्म हो गया क्योंकि वहां के लोगों को निश्चित रोजगार मिलने लगा। इसी तरह, कृषि के बजट में की गई कटौती से किसानों की मुश्किलें और बढ़ेंगी। यह सिलसिला लगातार जारी है। उन्होंने बताया कि 1952 में बजट में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी 35 फीसदी और उद्योगों की 15 फीसदी थी। यह अब घटकर करीब 6.5 फीसदी पर आ गई है।</p>
<p>उन्होंने याद दिलाया कि प्रधानमंत्री ने 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने का वादा किया था जो उनके अन्य जुमलों की तरह ही एक और जुमला साबित हुआ। जबकि हकीकत यह है कि 2018-19 के आकंड़ों के मुताबिक, प्रति किसान परिवार औसत आमदनी सिर्फ 10 हजार रुपये है। जबकि प्रति किसान परिवार औसत कर्ज 7,400 रुपये का है। देश के 52 फीसदी किसान परिवार कर्ज में डूबे हुए हैं। उन्होंने मांग की कि जिस तरह उद्योगपतियों के लाखों-करोड़ रुपये के कर्ज माफ कर दिए जाते हैं उसी तरह किसानों के कर्ज भी माफ किए जाने चाहिए ताकि उन्हें कर्ज से मुक्ति मिले और थोड़ी राहत मिले।</p>
<p>बसपा सांसद दानिश अली ने इस दौरान प्याज और आलू किसानों की बदहाली का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि अन्य सामानों के दाम उसे बेचने वाला तय करता है, जबकि कृषि उपज ही एकमात्र ऐसी चीज है जिसकी कीमत उसे खरीदने वाला तय करता है। उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि जब फसल की कटाई शुरू हो जाती है और चीनी मिलों को गन्ने की आपूर्ति होने लगती है तब तक किसानों को पता ही नहीं होता है कि उनकी फसल का भाव क्या मिलेगा। इसके अलावा उनका भुगतान भी काफी देर से होता है। मौजूदा सरकार ने छह साल में अब तक गन्ने की कीमत दो बार में सिर्फ 35 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ाई है जबकि इसकी तुलना में लागत में काफी बढ़ोतरी हो गई है। यही हाल इस बार आलू किसानों का हो रहा है। किसान तो देश को बंपर पैदावार दे रहे हैं लेकिन उन्हें उनकी उपज की सही कीमत नहीं मिल पा रही है। उन्होंने आवारा पशुओं की समस्या भी उठाते हुए कहा कि किसानों को इनसे छुटकारा दिलाने के सरकार को उपाय करने चाहिए। &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;</p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/03/image_750x500_6411c3b27cd86.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ तेलंगाना मॉडल से दूर होंगी कृषि क्षेत्र और किसानों की समस्याएंः नागेश्वर राव ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/03/image_750x500_6411c3b27cd86.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कृषि और ग्रामीण विकास के बजट में कटौती ठीक नहीं, रूरल वॉयस&amp;#45;सॉक्रेटस के ‘बजट चर्चा’ में किसानों और राजनेताओं ने जताई नाराजगी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/budget-cuts-for-agriculture-and-rural-development-are-not-good-farmers-and-politicians-expressed-displeasure-in-budget-discussion.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 15 Mar 2023 11:35:29 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/budget-cuts-for-agriculture-and-rural-development-are-not-good-farmers-and-politicians-expressed-displeasure-in-budget-discussion.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>वित्त वर्ष 2023-24 के आम बजट में कृषि क्षेत्र और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए किए गए प्रावधानों पर आयोजित एकदिवसीय चर्चा में देश भर के किसानों ने फसलों को प्रभावित करने वाले पर्यावरणीय मुद्दों को उठाया और खेती को सुविधाजनक बनाने के लिए सरकार से कृषि क्षेत्र को और अधिक समर्थन देने की मांग की। किसानों से सीधे संवाद, कृषि क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए किए जाने वाले उपायों को लेकर उनकी आपसी चर्चा और बजट को लेकर उनकी समझ और जरूरतों पर केंद्रित &ldquo;बजट चर्चा&rdquo; कार्यक्रम का आयोजन रूरल वॉयस और सॉक्रेटस फाउंडेशन ने संयुक्त रूप से किया था।</p>
<p>एक महीने से ज्यादा समय के लंबे अवकाश के बाद संसद के बजट सत्र के दूसरे हिस्से की शुरुआत सोमवार से हो चुकी है। यह सत्र 6 अप्रैल तक चलेगा। इस दौरान 2023-24 के प्रस्तावित बजट पर चर्चा होगी और संसद के दोनों सदन इसे पारित करेंगे। इसे देखते हुए ही इस कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। नई दिल्ली स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित 'बजट चर्चा' में देश भर से आए किसानों के अलावा राजनीति से जुड़े लोगों और सांसदों ने भी हिस्सा लिया। इस चर्चा में ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कृषि के डिजिटलीकरण और प्राकृतिक खेती जैसे विषयों पर सभी ने अपने-अपने विचार रखे। कार्यक्रम का संचालन सॉक्रेटस के अध्यक्ष प्रचुर गोयल ने किया।</p>
<p>बसपा के लोकसभा सांसद दानिश अली, लोकसभा में बीआरएस (भारतीय राष्ट्र समिति- पूर्व में टीआरएस) के नेता नम्मा नागेश्वर राव और जदयू के राष्ट्रीय महासचिव केसी त्यागी ने कहा कि 2023-24 के बजट में किसानों के लिए और ज्यादा प्रावधान किए जाने चाहिए थे। जो प्रावधान किए गए हैं वे कम हैं। दानिश अली ने उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों की दुर्दशा के मुद्दे को उठाया और सरकार पर किसानों से ज्यादा बिचौलियों की मदद करने का आरोप लगाया।</p>
<p>नागेश्वर राव ने कृषि क्षेत्र के लिए और अधिक आवंटन की मांग की, जबकि केसी त्यागी ने लंबे समय से किसानों द्वारा की जा रही मांगों का जिक्र करते हुए कहा कि फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी गारंटी होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि मनरेगा के बजट में की गई कटौती से ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी और रोजगार घटेंगे।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2023/03/image_750x_64115f763fa49.jpg" alt="" /></p>
<p>भाजपा किसान मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नरेश सिरोही ने कहा कि कृषि को अधिक लाभकारी बनाने के लिए सरकार की मूल्य नीति की समय-समय पर समीक्षा की जानी चाहिए। भारतीय आर्थिक सेवा के पूर्व अधिकारी, ग्रामीण विकास मंत्रालय के पूर्व डायरेक्टर, कृषि क्षेत्र से संबंधित किताबों के जानेमाने लेखक और करपा फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ. माहिपाल ने कार्यक्रम की शुरुआत में कृषि और ग्रामीण भारत के लिए बजट में किए गए प्रावधानों के प्रमुख पहलुओं पर अपने विचार रखें। सरकारी आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि कृषि और ग्रामीण विकास के बजटीय आवंटन को लगातार कम किया जा रहा है और इसे दूसरे क्षेत्रों में डायवर्ट किया जा रहा है। उन्होंने किसानों से इसके खिलाफ आवाज उठाने का आह्वान करते हुए कहा कि ऐसा नहीं किया गया तो एक दिन आएगा जब ग्रामीण विकास मंत्रालय या पंचायती राज मंत्रालय बंद हो जाएगा या फिर एक छोटा सा विभाग बन कर रह जाएगा।</p>
<p>ओडिशा की आदिवासी महिला किसान अनीमा मिंज ने चर्चा के दौरान कहा कि मोटे अनाज, जिसे सरकार 'श्री अन्न' के रूप में बढ़ावा दे रही है, के मार्केटिंग और प्रसंस्करण में सुधार की आवश्यकता है। &nbsp;मिंज रागी की खेती करती हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि रागी की खेती से उनकी आमदनी परंपरागत फसलों की खेती की तुलना में बढ़ी है। राज्य सरकार के मिलेट मिशन से उन्हें फायदा हो रहा है।</p>
<p>रूरल वॉयस के एडिटर इन-चीफ हरवीर सिंह ने उर्वरक पर सब्सिडी में कटौती और फसल बीमा योजना के लिए बजट में किए गए कम आवंटन पर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक अनिश्चितताओं के खिलाफ किसानों के लिए बीमा योजना ही एकमात्र ढाल है। वर्तमान में इसका प्रीमियम बढ़ गया है। गुजरात और मध्य प्रदेश जैसे कुछ राज्य यह कहते हुए योजना से बाहर हो गए हैं कि वे अपनी खुद की योजना तैयार कर रहे हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार को सभी किसानों के लिए इसे लागू करना चाहिए और इसके पूरे प्रीमियम का भुगतान करना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों की कीमत काफी कम हो गई है जिससे विदेशी मुद्रा के रूप में सरकार को काफी बचत हो रही है। इस राशि का इस्तेमाल प्रीमियम भुगतान में किया जा सकता है।</p>
<p>हरियाणा के किसान श्याम सिंह मान ने बेहतर गुणवत्ता वाले उर्वरक की आपूर्ति करने की मांग करते हुए दावा किया कि एनएफएल के उत्पाद गुणवत्ता के मुताबिक नहीं हैं। विदिशा (मध्य प्रदेश) के किसान दीपक पांडे ने भी इसका समर्थन करते हुए कहा कि सरकार की ओर से जो उर्वरक दिए जा रहे हैं वो खराब गुणवत्ता के हैं। एक अन्य किसान ने अफसोस जताते हुए कहा कि सरकार जैविक खेती को बढ़ावा देने के प्रति गंभीर नहीं है। उन्होंने मांग की कि जैविक खेती को और अधिक प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। वहीं एक अन्य किसान ने इस बात पर आश्चर्य जताया कि जब सरकार प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की बात कर रही है तो जीएम (आनुवंशिक रूप से संशोधित) बीजों को बढ़ावा क्यों दिया जा रहा है।</p>
<p>हिमाचल प्रदेश की सेब किसान त्वारको देवी जैविक रूप से मटर और अन्य बागवानी फसलों की भी खेती करती हैं। उनकी शिकायत थी की कि जैविक खेती को सरकार का समर्थन नहीं मिलने से किसानों को जैविक और गैर-जैविक फसलों की समान कीमत बाजार में मिलती है। मटर की जैविक खेती से उन्हें पर्याप्त मुनाफा नहीं मिल रहा है। कार्यक्रम में हिस्सा ले रहे कई किसानों ने जैविक उर्वरकों के महत्व का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि गाय के गोबर, गोमूत्र, गुड़, बेसन, नीम की पत्ती और दही का उपयोग जैविक खाद बनाने के लिए किया जा सकता है।</p>
<p>इस एकदिवसीय कार्यक्रम में बागवानी, डेयरी और मत्स्य पालन क्षेत्र के लिए किए गए बजटीय प्रावधानों पर भी गहन चर्चा हुई। प्रतिभागियों ने कृषि क्षेत्र को बढ़ावा देने में एफपीओ की भूमिका पर भी प्रकाश डाला।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ कृषि और ग्रामीण विकास के बजट में कटौती ठीक नहीं, रूरल वॉयस-सॉक्रेटस के ‘बजट चर्चा’ में किसानों और राजनेताओं ने जताई नाराजगी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[रूरल वॉयस&amp;#45;सोक्रेटस फाउंडेशन का  “बजट चर्चा” सम्मेलन आज, कृषि क्षेत्र और ग्रामीण अर्थव्यस्था पर फोकस]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/rural-voice-budget-charcha-conference-today-focus-on-agriculture-sector-and-rural-economy.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 14 Mar 2023 07:43:19 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/rural-voice-budget-charcha-conference-today-focus-on-agriculture-sector-and-rural-economy.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>एक महीने से ज्यादा समय के लंबे अवकाश के बाद संसद का बजट सत्र सोमवार से फिर से शुरू हो गया है। यह सत्र 6 अप्रैल तक चलेगा। इस दौरान वित्त वर्ष 2023-24 के प्रस्तावित बजट को पारित किया जाएगा। इस बजट में कृषि क्षेत्र और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए जो प्रावधान किए गए हैं या फिर उनमें क्या कमियां रह गई हैं, क्या और किया जाना चाहिए था, इन विषयों पर <strong>रूरल वॉयस</strong> और <strong>सोक्रेटस फाउंडेशन </strong>संयुक्त रूप से मंगलवार को चर्चा का आयोजन कर रहा है।</p>
<p>नई दिल्ली स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में मंगलवार को आयोजित इस एक दिवसीय &ldquo;बजट चर्चा&rdquo; में लोकसभा सांसद, पूर्व सांसद, कृषि क्षेत्र के विशेषज्ञ और विभिन्न राज्यों के किसान हिस्सा ले रहे हैं। ग्रामीण और कृषक भारत के नजरिये से बजट का आत्मनिरीक्षण करना समय की आवश्यकता है। ग्रामीण भारत के नजरिये से देखने का एक अच्छा तरीका यह है कि किसानों, नीति निर्माताओं और जनप्रतिनिधियों को एक साथ बजट पर चर्चा करने के लिए प्रेरित किया जाए। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए बजट चर्चा आयोजित की गई है। ग्रामीण भारत के लिए बजट में किए गए प्रावधानों पर खुली चर्चा करने और लोगों की चिंताओं को सरकार तक पहुंचाने में यह सम्मेलन सक्षम होगा। इस एक दिवसीय सम्मेलन में ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कृषि एवं प्राकृतिक खेती में स्थायित्व और कृषि क्षेत्र में स्टार्टअप्स एवं डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर चर्चा के प्रमुख विषय हैं।</p>
<p>रूरल वॉयस एक डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म है जो कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को समर्पित है। यह अपनी वेबसाइटों www.RuralVoice.in (हिंदी) और Eng.ruralvoice.in (अंग्रेज़ी) पर इन क्षेत्रों से संबंधित समाचार और विश्लेषणात्मक सामग्री प्रकाशित करता है। इसका अपना यूट्यूब चैनल भी है। जबकि सोक्रेटस फाउंडेशन सामूहिक ज्ञान को बढ़ावा देने के लिए समर्पित है। यह ऐसे मंच तैयार करता है जहां विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों को एक साथ लाया जाता है ताकि नीति निर्माताओं के लिए समाधान लाया जा सके। यह नागरिकों की भागीदारी को सक्षम बनाता है, सामूहिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है और व्यक्तिगत ज्ञान को समूहों तक लाने में मदद करता है।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ रूरल वॉयस-सोक्रेटस फाउंडेशन का  “बजट चर्चा” सम्मेलन आज, कृषि क्षेत्र और ग्रामीण अर्थव्यस्था पर फोकस ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Avishek Raja (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[जेनेटिक्स एक्सपर्ट प्रोफेसर के.सी. बंसल से जानिये जीएम सरसों की मंजूरी के क्या है मायने]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/professor-k-c-bansal-explains-environmental-release-of-gm-mustard.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 09 Nov 2022 08:32:15 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/professor-k-c-bansal-explains-environmental-release-of-gm-mustard.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>पिछले दिनों जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेजल कमेटी (जीईएसी) ने जेनेटिकली मॉडिफाइड सरसों की किस्म डीएमएच-11 के इनवायरनमेंटल रिलीज की मंजूरी दी है। इसे सरसों की भारतीय किस्म वरूणा के साथ पूर्वी यूरोपीय किस्म अर्ली हीरा-2 को क्रॉस करके तैयार किया गया है। दावा किया जा रहा है कि इसकी उपज सामान्य सरसों से लगभग 30 प्रतिशत ज्यादा है। हालांकि, अब इसे मिली मंजूरी को लेकर&nbsp; समर्थन और&nbsp; विरोध भी शुरू हो गया है। जीएम सरसों के बारे में विस्तार से जानकारी के लिए जेनेटिक साइंस के प्रमुख वैज्ञानिक और नेशनल एकेडमी<span>&nbsp;ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (नास) के सेक्रेटरी <strong>प्रोफेसर </strong></span><span><strong>के.सी. बंसल</strong> से <strong>रूरल वॉयस</strong> के एडीटर इन चीफ हरवीर सिंह ने बात की। <strong>रूरल वॉयस डायलाग</strong> के इस शो को आप ऊपर दिए गए वीडियो लिंक पर क्लिक करके देख सकते हैं। इस इंटरव्यू के कुछ अंश यहां दिये जा रहे हैं।</span></p>
<p><span style="font-weight: 400;">प्रोफेसर के.सी. बंसल ने जीएम सरसों को पर्यावरण रिलीज की मंजूरी मिलने पर कहा कि जीएम सरसों को मसला 20 साल से लटका हुआ था। सरकार ने ट्रायल के लिए जो मंजूरी दी वह किसानों के हित में है। उन्होंने कहा कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) की देखरेख में नए हाइब्रिड तैयार करने के लिए ट्रांसजेनिक सरसों हाइब्रिड डीएमएच -11 और बार्नेज, बारस्टार और बार जीन युक्त पैरेंटल लाइन्स के 'पर्यावरण रिलीज' को मंजूरी दी गई है। अब इसका उपयोग फसलों के हाइब्रिड किस्म विकसित करने के लिए किया जा सकता है।</span></p>
<p><b>डीएमएच-11 सरसों की उत्पादकता 30 फीसदी ज्यादा</b></p>
<p><span style="font-weight: 400;">प्रोफेसर बंसल ने बताया&nbsp; कि दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर दीपक पेंटल की टीम ने डीएमएच -11 को विकसित किया है। उन्होंने कहा कि फसलों की उत्पादकता में अंतर को पाटने के लिए जेनेटिकली मोडिफाइड (जीएम) टेक्नोलाजी आज की&nbsp; जरूरत&nbsp; है। सरसों की वैश्विक उत्पादकता हमारे देश की तुलना में दोगुना है। उन्होंने कहा, जहां सरसों की वैश्विक उत्पादकता&nbsp; 20 क्विंटल से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है, वहीं भारत में&nbsp; सरसों की उत्पादकता 13 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। अगर जीएम सरसों की खेती की मंजूरी मिल जाती है, तो हम देश में उत्पादकता बढ़ा सकते हैं। प्रोफेसर बंसल ने कहा कि हम अपने देश की खाद्य तेल जरूरत की पूर्ति के लिए हर साल एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का खाद्य तेल का आयात करते हैं। इस अंतर को सरसों की उत्पादकता बढ़ा कर हम कम कर सकते हैं।&nbsp;</span></p>
<p><b>डीएमएच-11 सरसों की तकनीक&nbsp;</b></p>
<p><span style="font-weight: 400;">प्रोफेसर बंसल ने बताया कि दो अलग-अलग किस्मों के पौधों को क्रास करके एक हाइब्रिड किस्म का&nbsp; बीज बनाया जाता है। ऐसी क्रासिंग से प्राप्त पहली पीढ़ी की संकर किस्म की उपज मूल किस्मों की तुलना में अधिक होने की संभावना रहती है। लेकिन सरसों की फसल के साथ ऐसा करना आसान नहीं है। सरसों स्व-परागित पौधा है&nbsp; इसके फूलों में नर और मादा दोनों प्रजनन अंग होते हैं। स्वपरागण वाले पौधे के फूल में&nbsp; मेल और फीमेल दोनों एक ही फूल में रहते हैं। सेंटर फॉर जेनेटिक मैनिपुलेशन इन क्राप प्लांट्स, दिल्ली विश्वविद्यालय ने ऐसी प्रणाली विकसित की है, जिसमें तीन ट्रांस जीन - बार्नेज, बारस्टार और बार का उपयोग किया गया है। । उन्होंने कहा कि सरसों की हाइब्रिड किस्म विकसित करने के लिए बारनेस-बारस्टार एक सफल जीएम टेक्नोलॉजी है। इस तकनीक से तैयार हाइब्रिड पौधे की उपज 30 प्रतिशत ज्यादा होती है।</span></p>
<p><b>जीएम टेक्नोलॉजी का दूसरे देशों में इस्तेमाल&nbsp;</b></p>
<p><span style="font-weight: 400;">प्रोफेसर बंसल ने बताया कि जीएम सरसों की किस्म डीएमएच-11 का परीक्षण भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के रेपसीड और सरसों निदेशालय भरतपुर ने अलग-अलग लोकेशन औऱ जलवायु में कराया था। उन्होंने बताया कि सरसों की वरूणा किस्म की तुलना में जीएम-डीएमएच-11 से प्रति हेक्टयर&nbsp; 30 फीसदी ज्यादा उत्पादन मिला था। उन्होंने कहा कि इसी तकनीक से कनाडा में कैनोला का हाइब्रिड कैनोला बीज 25 साल पहले तैयार किया गया था। आज के समय में वहां 90 फीसदी एरिया में कैनोला की खेती जीएम किस्म से की जाती है। इस तकनीक का उपयोग अमेरिका और आस्ट्रेलिया में किया जा रहा है।</span></p>
<p><b>दो साल में किसानों को जीएम सरसों उपलब्ध होगी</b></p>
<p><span style="font-weight: 400;">प्रोफेसर बंसल ने बताया कि इस समय जो बीज उपलब्ध है उससे&nbsp; 100 जगह ट्रायल किए जा सकते हैं। अगर सब कुछ ठीक रहा तो दो साल में किसानों को जीएम सरसों का बीज उपलब्ध हो जाएगा। उन्होंने कहा कि जीएम सरसों से मधुमक्खियों को कोई नुकसान नहीं होता है। पंजाब और पूसा में इसका परीक्षण किया गया है। कनाडा में इसका परीक्षण किया गया है और यह पूरी तरह से सुरक्षित है।&nbsp;</span></p> ]]></description>
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        <author>jpagrimedia73@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[कृषि उपकरणों पर पहले टैक्स लगाने, फिर सब्सिडी देने की नीति गलतः सोमपाल शास्त्री]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/imposing-tax-and-then-giving-subsidy-on-agri-equipments-is-not-a-good-policy-says-sompal-shashtri.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 07 Jul 2022 19:20:23 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/imposing-tax-and-then-giving-subsidy-on-agri-equipments-is-not-a-good-policy-says-sompal-shashtri.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>सरकार पहले कृषि उपकरणों पर टैक्स लगाती है और फिर उन्हें खरीदने वाले किसानों को सब्सिडी देती है। इससे टैक्स लेते और सब्सिडी देते दोनों समय भ्रष्टाचार होता है। अगर सरकार कृषि उपकरणों पर टैक्स हटा दे तो उनके दाम कम हो जाएंगे और सब्सिडी देने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी। जाने-माने कृषि अर्थशास्त्री और पूर्व केंद्रीय कृषि मंत्री सोमपाल शास्त्री ने यह सुझाव दिया है। वे बुधवार को नई दिल्ली में आयोजित किसान चैंबर ऑफ कॉमर्स की चौथी सालाना कांफ्रेंस में बोल रहे थे।</p>
<p>उन्होंने कहा कि देश के 70 फ़ीसदी नेता किसान पृष्ठभूमि के हैं। फिर भी वे किसानों के हित में काम नहीं करते। उन्हें खेती किसानी की समस्याओं के बारे में जानकारी ही नहीं होती है। अधिकारी जो फाइल लेकर आ जाते हैं, वे उस पर हस्ताक्षर कर देते हैं। वे यह नहीं सोचते कि उस पर अमल हो सकता है या नहीं। उन्होंने कहा कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कृषि का योगदान 15 से 16 फ़ीसदी बताया जाता है लेकिन यह अनुपात कृषि उपज की कम कीमतों के कारण है। अगर उपज की सही कीमत हो तो जीडीपी में कृषि का योगदान 30 फ़ीसदी से कम नहीं होगा।</p>
<p>उन्होंने कहा कि हमारे किसानों के पास उपज को अपने पास रखने की क्षमता नहीं होती है। जब उनकी फसल आती है तभी उसे बेचने के लिए मजबूर होना पड़ता है। वे अपनी उपज के बदले अधिक कीमत मांगने की स्थिति में नहीं होते। उन्होंने कहा कि सभी देशों में सरकारें किसानों को प्रश्रय देती हैं। स्विट्जरलैंड का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि वहां हर किसान को प्रति हेक्टेयर लगभग ढाई लाख रुपए की मदद हर साल मिलती है। लेकिन भारत में किसानों को मदद पर सवाल उठाए जाते हैं। सरकार 23 फसलों की एमएसपी घोषित करती है लेकिन किसानों को वास्तव में दो या तीन फसलों का एमएसपी ही मिलता है।</p>
<p>पूर्व कृषि मंत्री ने किसानों को मिलने वाली कीमत और उपभोक्ताओं से ली जाने वाली कीमत में अंतर पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि केन्या, कनाडा जैसे देशों से दालों का आयात कंपनियां जिस कीमत पर करती हैं उपभोक्ताओं को उससे कई गुना अधिक कीमत पर बेचती हैं। इसलिए उन्होंने कृषि संबंधी नीतियां बनाने में किसानों को आगे आने का सुझाव दिया। नीतिगत खामियों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि मंडी समिति की त्रुटियां दूर की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार किसानों को सॉइल कार्ड तो दे देती है लेकिन उस से क्या होगा, किसानों को तो समाधान चाहिए।</p>
<p>उन्होंने कहा कि आज श्रीलंका और यूक्रेन में पैदा हुए संकट से हमें यह सीख लेनी चाहिए कि हमें पूरा खाद्यान्न खुद उगाना है। आज देश में 14.4 करोड़ हेक्टेयर में खेती होती है। बहुत हुआ तो 3.5 करोड़ हेक्टेयर में और खेती की जा सकती है। दूसरी तरफ आबादी का बढ़ता दबाव है इसलिए हमें उत्पादकता बढ़ाने के उपाय करने होंगे।</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/07/image_750x500_62c5e85648920.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ कृषि उपकरणों पर पहले टैक्स लगाने, फिर सब्सिडी देने की नीति गलतः सोमपाल शास्त्री ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[किसानों की आय बढ़ाने के लिए कृषि क्षेत्र में सुधार जरूरीः प्रो. रमेश चंद]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/reforms-in-agriculture-sector-is-necessary-to-increase-income-of-farmers-says-prof-ramesh-chand.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 07 Jul 2022 15:47:12 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/reforms-in-agriculture-sector-is-necessary-to-increase-income-of-farmers-says-prof-ramesh-chand.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>नीति आयोग के सदस्य प्रो. रमेश चंद ने कहा है कि किसी भी अर्थव्यवस्था में मांग सबसे महत्वपूर्ण निर्धारक तत्व होता है। उपभोक्ता क्या चाहता है इसी से समूचा परिदृश्य तय होता है। आज उपभोक्ताओं की प्रेफरेंस बदल रही है इसलिए किसान उस दिशा में जाएं जहां मांग ज्यादा तेजी से बढ़ रही है। इससे उन्हें अच्छी कीमत मिलने की संभावना बढ़ेगी। उन्होंने कहा कि कुछ किसान इस बात को अपना रहे हैं लेकिन ऐसा चुनिंदा क्षेत्रों में ही हो रहा है। हरित क्रांति की तरह बड़े पैमाने पर किसानों ने अभी तक इसे नहीं अपनाया है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि अधिक कीमत वाले क्षेत्र में जोखिम भी अधिक होगा, लेकिन ग्रोथ की संभावना भी वही अधिक होगी। उन्होंने सुझाव दिया कि किसान अपनी जोत के कुछ हिस्से में जोखिम ले सकते हैं। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि अगर किसानों की आय बढ़ानी है तो उसके लिए सुधार जरूरी है। प्रोफेसर रमेश चंद ने किसान चेंबर ऑफ कॉमर्स के चौथे वार्षिक सम्मेलन को संबोधित करते हुए यह बातें कहीं।</p>
<p>उन्होंने बताया कि बीते 10 साल में फिशरीज क्षेत्र में सालाना 8 से 10 फ़ीसदी वृद्धि दर्ज हुई है। मवेशी क्षेत्र में यह 5 से 6 फ़ीसदी, बागवानी में 3.5 से 4 फ़ीसदी है। अनाज के क्षेत्र में सिर्फ 2 फ़ीसदी की सालाना वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा, अनुमान है कि 4 साल में फिशरीज और मवेशी क्षेत्र में उत्पादन की कीमत अनाज उत्पादन से अधिक हो जाएगी।</p>
<p>उन्होंने कहा कि नीति आयोग का आकलन है कि 12 से 15 वर्षों में जनसंख्या वृद्धि की दर घटकर एक फ़ीसदी रह जाएगी। इसलिए खाद्य पदार्थों की मांग पर बढ़ती आबादी का दबाव आने वाले वर्षों में अधिक नहीं होगा। लेकिन प्रति व्यक्ति खपत बढ़ रही है। फिर भी अगले 15 वर्षों में औसत कृषि उत्पादन 3 फ़ीसदी की दर से बढ़ेगी जबकि मांग बढ़ने की दर अधिकतम 2 फ़ीसदी रहने की संभावना है। इसलिए आने वाले समय में एक तिहाई कृषि उत्पादन निर्यात करने की नौबत आएगी।</p>
<p>मार्केट इंटेलिजेंस की जरूरत पर जोर देते हुए प्रो रमेश चंद ने सुझाव दिया कि अगर किसानों को फसल की बिजाई के समय यह बताया जाए कि उनकी उपज की संभावित कीमत क्या मिलेगी, तो उन्हें यह अंदाजा होगा कि कौन सी फसल कितने क्षेत्र में बोनी है। इसी तरह अगर उन्हें फसल की कटाई के समय यह पता चले कि आने वाले समय में क्या कीमत रहने वाली है तो वे यह तय कर सकते हैं कि उपज को कब बेचना है। इसी तरह मार्केट इंटेलिजेंस के आधार पर किसानों को यह भी बताया जाना चाहिए कि अगले सीजन में किसी फसल की क्या कीमत रह सकती है।</p>
<p>ग्रामीण रोजगार की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि पहले इंडस्ट्री श्रम सघन हुआ करती थी लेकिन अब वह पूंजी सघन हो गई है। इसलिए ग्रामीण क्षेत्र में निवेश हाल के वर्षों में 14 फ़ीसदी बढ़ा लेकिन वहां रोजगार में सिर्फ 0.7 फ़ीसदी वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा कि कृषि को अगर 'फार्म एज ए फैक्ट्री' के तौर पर विचार किया जाए तो इससे रोजगार मिलेगा।</p>
<p>कृषि क्षेत्र की चुनौतियों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि आज दुनिया के सामने सबसे बड़ी समस्या सस्टेनेबिलिटी की है। उन्होंने कहा कि भारत हर साल दो करोड़ टन चावल का निर्यात करता है। दुनिया में चावल का जितना व्यापार होता है उसका 40 फ़ीसदी भारत निर्यात करता है। लेकिन एक किलो चावल उत्पादन करने में 4000 लीटर पानी की जरूरत होती है। इस तरह अधिक चावल निर्यात करके हम अपने प्राकृतिक संसाधनों का भी निर्यात कर रहे हैं। इन चुनौतियों से निपटने के लिए हमें नई टेक्नालॉजी को अपनाना जरूरी है।</p>
<p>एमएसपी व्यवस्था में सुधार की जरूरत बताते हुए उन्होंने कहा कि बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि एमएसपी का भुगतान कैसे दिया जाता है। यह खरीद के जरिए होता है या कीमत में कमी को पूरा करके। उन्होंने बताया कि सरकार को किसी फसल की एमएसपी के तौर पर रुपए 2000 देने में 700 रुपए का खर्च आता है, लेकिन अगर सरकार घोषित एमएसपी और किसान के बिक्री मूल्य के अंतर का भुगतान करती है तो उसमें खर्च बहुत कम आता है। उन्होंने कहा कि खेती को एग्री-बिजनेस के रूप में बदला जाना चाहिए ताकि किसान पैसेज के बजाय एक्टिव पार्टनर बन सके।</p>
<p></p> ]]></description>

	<media:content url='http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/07/image_750x500_62c5e8e761f5b.jpg' type='image/jpg' expression='full' width='538' height='190'>
	<media:description type='plain'><![CDATA[ किसानों की आय बढ़ाने के लिए कृषि क्षेत्र में सुधार जरूरीः प्रो. रमेश चंद ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
        <media:thumbnail url="http://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/07/image_750x500_62c5e8e761f5b.jpg" width="220"/>
    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[&amp;apos;किसान नीति निर्धारण प्रक्रिया में दखल दें, तभी बनेगी बात&amp;apos;]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/farmers-should-intervene-in-agriculture-policy-making.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Thu, 07 Jul 2022 01:29:04 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/farmers-should-intervene-in-agriculture-policy-making.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>किसान हितैषी नीतियों के लिए किसानों को नीति निर्धारण प्रक्रिया में दखल देना पड़ेगा। अभी कृषि से जुड़ी नीतियों में कई खामियां हैं। अगर सरकार कृषि उपकरणों पर टैक्स हटा दे तो उनके दाम कम हो जाएंगे और सब्सिडी देने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी। किसानों के पास अपनी फसल को अधिक समय तक भंडारण कर रखने की क्षमता नहीं होती, इसलिए उपज को तत्काल बेचने के लिए मजबूर होना पड़ता है। ज्यादा कमाई के लिए किसान उस दिशा में जाएं जहां मांग ज्यादा तेजी से बढ़ रही है। इससे उन्हें अच्छी कीमत मिलने की संभावना बढ़ेगी। युवाओं की कृषि में रुचि बढ़ाने के लिए 12वीं तक की पढ़ाई में कृषि को भी एक विषय के तौर पर शामिल किया जाना चाहिए। वहीं किसानों को बिजनेस की तरफ जाना चाहिए और खुद को इंडस्ट्री के रूप में देखकर संबंधित नीतियों में बदलाव के लिए काम करना चाहिए। बुधवार को नई दिल्ली में आयोजित किसान चैंबर ऑफ कॉमर्स की चौथी सालाना कॉन्फ्रेंस में वक्ताओं ने ये सुझाव दिए। सम्मेलन को पूर्व केंद्रीय कृषि मंत्री सोमपाल शास्त्री, पूर्व केंद्रीय स्टील मंत्री चौधरी बीरेंद्र सिंह, नीति आयोग के सदस्य&nbsp; प्रो. रमेश चांद और नाबार्ड के पूर्व चेयरमैन हर्ष भानवाला समेत कई जाने-माने लोगों ने संबोधित किया।</p>
<p><strong>सभी देशों में किसानों को है सरकार का प्रश्रयः सोमपाल शास्त्री&nbsp;</strong></p>
<p>सोमपाल शास्त्री ने कहा कि हमारे किसानों के पास उपज को अपने पास रखने की क्षमता नहीं होती है। जब उनकी फसल आती है तभी उसे बेचने के लिए मजबूर होना पड़ता है। वे अपनी उपज के बदले अधिक कीमत मांगने की स्थिति में नहीं होते। उन्होंने कहा कि सभी देशों में सरकारें किसानों को प्रश्रय देती हैं। स्विट्जरलैंड का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि वहां हर किसान को प्रति हेक्टेयर लगभग ढाई लाख रुपए की मदद हर साल मिलती है। लेकिन भारत में किसानों को मदद पर सवाल उठाए जाते हैं। सरकार 23 फसलों की एमएसपी घोषित करती है लेकिन किसानों को वास्तव में दो या तीन फसलों का एमएसपी ही मिलता है। इके साथ ही उन्होंने कहा कि जिन फसलों का एमएसपी नहीं है उनके लिए सरकार को न्यूनतम बिक्री मूल्य तय करना चाहिए। लगातार टर्म्स ऑफ ट्रेड कृषि के लिए प्रतिकूल बनी हुई है। इस ट्रेंड को बदलना होगा। करों के मोर्चे पर भी बदलाव की जरूरत है। कृषि से जुड़े उत्पादों और उपकरणों पर कर हटा दिये जाएं तो कम सब्सिडी देने की जरूत पड़ेगी। राजनीतिक नेतृत्व ही नीति निर्धारण करता है इसलिए किसानों को सोचना होगा कि इस तरह के नेतृत्व को कैसे मजबूत किया जाए।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/07/image_750x_62c5e6e6f40b7.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>देश की संपदा में किसानों का भी हिस्साः चौ. बीरेंद्र सिंह</strong></p>
<p>पूर्व केंद्रीय मंत्री चौधरी बीरेंद्र सिंह ने कहा कि किसानों की लड़ाई एमएसपी, उर्वरकों पर नहीं बल्कि इस बात के लिए होनी चाहिए कि इस देश की संपदा में उनका हिस्सा है या नहीं। इसका उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि पांच सितारा होटलों में एक कॉफी के अगर 200 रुपए लिए जाते हैं तो किसान को उस में इस्तेमाल की गई कॉफी के सिर्फ 2.37 रुपए मिलते हैं। उन्होंने दुख प्रकट करते हुए कहा कि आईएएस बनने के बाद किसान का बेटा भी बदल जाता है। वह किसानों की जरूरतों से अपना नाता तोड़ लेता है।</p>
<p>उन्होंने कहा कि बीते कुछ दशकों के दौरान अगर कीमतों की तुलना की जाए तो सभी तरह के उत्पादों की कीमत कई गुना बढ़ी है लेकिन तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो किसानों की पैदावार की कीमत बहुत कम बढ़ी है। उन्होंने कहा कि यह किसानों के हक की लड़ाई है। किसानों को बताना पड़ेगा कि आर्थिक व्यवस्था में हमारा हिस्सा भी होना चाहिए।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/07/image_750x_62c5e72215e67.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>मार्केट इंटेलिजेंस से पहले होगा कीमत का अनुमानः रमेश चंद</strong></p>
<p>मार्केट इंटेलिजेंस की जरूरत पर जोर देते हुए प्रोफेसर रमेश चंद ने सुझाव दिया कि अगर किसानों को फसल की बिजाई के समय यह बताया जाए कि उनकी उपज की संभावित कीमत क्या मिलेगी, तो उन्हें यह अंदाजा होगा कि कौन सी फसल कितने क्षेत्र में बोनी है। इसी तरह अगर उन्हें फसल की कटाई के समय यह पता चले कि आने वाले समय में क्या कीमत रहने वाली है तो वे यह तय कर सकते हैं कि उपज को कब बेचना है। इसी तरह मार्केट इंटेलिजेंस के आधार पर किसानों को यह भी बताया जाना चाहिए कि अगले सीजन में किसी फसल की क्या कीमत रह सकती है।</p>
<p></p>
<p><strong>कृषि विश्वविद्यालयों में स्किल आधारित पाठ्यक्रम की जरूरतः हर्ष भनवाला</strong></p>
<p>नाबार्ड के पूर्व चेयरमैन हर्ष भनवाला ने कृषि विश्वविद्यालयों में स्किल आधारित पाठ्यक्रम की जरूरत बताई। उन्होंने सुझाव दिया कि 12वीं तक की पढ़ाई में कृषि को भी एक विषय के तौर पर शामिल किया जाना चाहिए। इससे युवाओं में रुचि पैदा होगी और जागरूकता बढ़ेगी। उन्होंने कहा कि किसानों को भी उद्योगों की तर्ज पर चैंबर में बिठाना पड़ेगा क्योंकि नीतियां वहीं बनती हैं। उन्होंने कहा कि कृषि क्षेत्र का मतलब सिर्फ खेती नहीं बल्कि इसे ग्रामीण विकास से जोड़कर भी देखना जरूरी है। उन्होंने नाबार्ड के एक पुराने सर्वेक्षण का हवाला देते हुए कहा कि किसानों की सिर्फ 35 फ़ीसदी आमदनी खेती से होती है। बाकी आमदनी दूसरे तरह के रोजगार से होती है। इससे पता चलता है कि ग्रामीण क्षेत्र में लोगों को रोजगार देना आवश्यक है। स्थायी रोजगार के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में इंफ्रास्ट्रक्चर विकास के प्रोजेक्ट शुरू किए जा सकते हैं।</p>
<p>उन्होंने कहा कि ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर किसानों के हित में भी है क्योंकि सड़क जैसी सुविधाएं खेती के लिए भी जरूरी हैं। उन्होंने कहा कि किसानों के लिए पारंपरिक आय के साधन कम हो रहे हैं। देश में दूध का उत्पादन भले ही बढ़ रहा हो लेकिन अनेक गांव में किसान दूध का पैसा छोड़ रहे हैं। भनवाला ने इंटीग्रेटेड खेती पर भी जोर दिया। उन्होंने बताया कि खेती में सबसे अधिक विविधता आंध्र प्रदेश में है और सबसे कम पश्चिमी उत्तर प्रदेश में। देश के कई हिस्सों में मिश्रित खेती से अनेक किसानों ने अपनी आमदनी बढ़ाई है।</p>
<p>उन्होंने इस बात पर खुशी जताई कि आज आईटी जैसे प्रोफेशनल क्षेत्र के युवा ग्रामीण क्षेत्रों में आकर कार्य कर रहे हैं। उन्होंने दो स्टार्टअप का भी जिक्र किया। एग नेक्स्ट नाम का स्टार्टअप स्पेक्ट्रोस्कॉपी के जरिए दूर बैठे व्यक्ति को बता सकता है कि फल या सब्जी की क्वालिटी कैसी है। इसी तरह एनिमॉल नाम का स्टार्टअप मवेशी क्षेत्र में कार्य कर रहा है। उन्होंने कहा कि खेती को उन्नत बनाने के लिए इस तरह के नए प्रयासों की जरूरत है।</p>
<p><strong>किसान हर जगह हर फसल न बोएः डॉ. भीम सेन दहिया</strong></p>
<p>कृषि वैज्ञानिक डॉ भीम सेन दहिया ने कृषि नीति की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि देश में आज तक कोई कृषि नीति नहीं बन पाई। कहां कौन सी और कितने क्षेत्र में फसल बोई जाए इसकी कोई नीति नहीं है। उन्होंने सुझाव दिया कि किसानों को हर फसल हर जगह नहीं बोनी चाहिए क्योंकि पैदावार पर जलवायु का भी असर होता है। उन्हें जलवायु के हिसाब से ही फसलों का चयन करना चाहिए। उन्होंने कृषि अनुसंधान में सरकारी हस्तक्षेप की जरूरत बताते हुए कहा कि अभी अनुसंधान पर बहुत कम खर्च होता है। अनेक संस्थानों में तो शिक्षक तक का अभाव है।</p>
<p>डॉ दहिया ने बीज, उर्वरक आदि की गुणवत्ता और उपलब्धता सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया उन्होंने कहा कि डाई अमोनियम फास्फेट (डीएपी) की जरूरत बुवाई के समय होती है। अगर यह किसानों को बाद में मिले तो उसका कोई फायदा नहीं। बल्कि इससे किसानों की लागत बिना मतलब बढ़ जाती है। उन्होंने कहा कि अनेक जगहों पर किसान प्रयोग कर अच्छा उत्पादन कर रहे हैं। उनके प्रयोग को देश के दूसरे इलाकों में भी आजमाया जा सकता है। दहिया ने आरोप लगाया कि बहुत कम एफपीओ हैं जो वास्तव में किसानों के लिए काम कर रहे हैं। एसपीओ सरकार से पैसा लेने की स्कीम बन गई है। उन्होंने कहा कि आजकल ऑर्गेनिक फूड की बड़ी चर्चा है लेकिन देश में कोई ऐसी प्रयोगशाला नहीं जो यह साबित कर सके कि कोई खाद्य पदार्थ ऑर्गेनिक है या नहीं। इसी तरह अनेक जगहों पर मिट्टी की जांच के लिए कोई प्रयोगशाला नहीं फिर भी किसानों को सॉयल हेल्थ कार्ड दिए जा रहे हैं।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/07/image_750x_62c5e78e659d2.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>एमएसपी किसानों के साथ धोखाः कप्तान सिंह</strong></p>
<p>ग्रामीण कल्याण संस्थान से जुड़े कप्तान सिंह ने कहा कि नीति निर्धारण में किसानों की भूमिका लगभग शून्य है। उन्होंने एमएसपी तय करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि इसे तय करने में किसानों की वास्तविक लागत को ध्यान में नहीं रखा जाता। पहले यह तय किया जाता है कि इस वर्ष कितना एमएसपी देना है। उसके बाद लागत की बैक कैलकुलेशन की जाती है। बिचौलियों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि यहां वे किसानों और खरीदार दोनों से पैसे लेते हैं। कुछ देशों में बिचौलियों के लिए अधिकतम 20 फ़ीसदी कमीशन का नियम है। भारत में भी ऐसा नियम होना चाहिए।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/07/image_750x_62c5e7bd74707.jpg" alt="" /></p>
<p><strong>किसान संगठन तथ्यों के आधार पर अपनी बात रखेः हरवीर सिंह</strong></p>
<p>इस मौके पर रूरल वॉयस के एडिटर-इन-चीफ&nbsp; हरवीर सिंह ने कहा कि किसानों की स्थिति तभी बदलेगी जब नीतियां उनके अनुकूल बनें। किसान हितैषी नीतियों के लिए किसानों को नीति निर्धारण प्रक्रिया में दखल देना पड़ेगा। लेकिन इसके लिए किसान संगठनों को तथ्यों और आंकड़ों के आधार पर अपनी बातें रखनी पड़ेगी। उद्योग चैंबरों का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि सभी चैंबर छोटे-छोटे बदलावों पर बोलते हैं लेकिन किसान संगठन सिर्फ एमएसपी उर्वरक जैसे बड़े विषयों पर ही बात करते हैं। इसका उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि डेढ़ साल से देश में उर्वरकों की समस्या बनी हुई है लेकिन किसानों की तरफ से अभी तक कोई संगठित आवाज नहीं उठाई गई है। इसी तरह इस वर्ष अचानक तापमान बढ़ने से गेहूं किसानों को जो नुकसान हुआ उसका उन्हें मुआवजा नहीं मिला लेकिन किसान संगठनों की तरफ से कोई आवाज नहीं उठाई गई। उन्होंने कहा कि बजट से पहले चर्चा में इंडस्ट्री के लोग तो जाते हैं लेकिन किसानों के प्रतिनिधि नहीं जाते।</p>
<p>उन्होंने कृषि से जुड़े फैसलों में समय-समय पर समीक्षा की जरूरत भी बताई। इसका भी उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि जब कृषि उत्पादों में फ्यूचर ट्रेडिंग की शुरुआत हुई तो उसके कुछ दिनों बाद ही बड़ा घोटाला सामने आया। इसलिए फ्यूचर ट्रेडिंग नीति की भी समीक्षा होनी चाहिए। कृषि और ग्रामीण क्षेत्र को तवज्जो ना देने के कारण उन्होंने मीडिया की भी आलोचना की और कहा कि इन्हें से जुड़े मुद्दे सामने नहीं आते। इनकी कवरेज कम होने के कारण नई सूचनाएं भी किसानों तक ठीक से नहीं पहुंच पाती हैं।</p>
<p>तीन सत्रों में चले इस कार्यक्रम का संचालन किसान चेंबर ऑफ कॉमर्स के जनरल सेक्रेटरी सुरेश देशवाल ने किया। साथ ही उन्होंने चेंबर के उद्देश्यों और उसके कामकाज पर एक प्रजेंटेशन भी दिया। चेंबर के अध्यक्ष वीरेंद्र सिवाच ने&nbsp; चेंबर की आने वाले साल की गतिविधियों के बारे में जानकारी दी।</p>
<p></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ 'किसान नीति निर्धारण प्रक्रिया में दखल दें, तभी बनेगी बात' ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
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        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[सहकारिता पर रूरल वॉयस की परिचर्चा आज, जानी&amp;#45;मानी हस्तियां करेंगी शिरकत]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/renowned-personalities-to-participate-in-dialogue-on-cooperative-by-rural-voice.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 15 Jun 2022 07:04:54 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
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        <description><![CDATA[ <p>कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर फोकस करने वाले मीडिया संस्थान रूरल वॉयस और सहकार भारती ने बुधवार, 15 जून को सहकारिता पर एक परिचर्चा का आयोजन किया है। इसका उद्देश्य उन संभावनाओं को तलाशना है जिनसे सहकारिता को एक जन आंदोलन में बदला जा सके। इस परिचर्चा में सहकारिता क्षेत्र की देश की जानी-मानी हस्तियां शिरकत करेंगी।</p>
<p>भारत में सहकारिता की औपचारिक शुरुआत तो 1904 में हुई थी, लेकिन सौ साल से ज्यादा बीत जाने के बावजूद देश की सिर्फ 20 फीसदी आबादी सहकारिता से जुड़ी है। इसलिए सहकारिता में विकास की प्रचुर संभावनाएं हैं। पिछले साल नए सहकारिता मंत्रालय के गठन से भी इस बात की पुष्टि होती है।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/06/image_750x_62a8ce6ab7732.jpg" alt="" /></p>
<p>इस परिचर्चा का विषय है &lsquo;सहकार से समृद्धिः मेनी पाथवेज&rsquo;। परिचर्चा तीन सत्रों में होगी। पहले सत्र का विषय &lsquo;बेहतर आय के लिए कोऑपरेटिव को मजबूत करना&rsquo; है। इस सत्र की चर्चा में पूर्व कृषि सचिव सिराज हुसैन, अमूल के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर जयेन मेहता, भारत कृषक समाज के चेयरमैन अजय वीर जाखड़ और सहकार भारती के राष्ट्रीय महासचिव डॉ. उदय जोशी हिस्सा लेंगे।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/06/image_750x_62a8ce6c4c743.jpg" alt="" /></p>
<p>दूसरे सत्र का विषय है &lsquo;सहकारिता में वैश्विक अनुभवः भारत कैसे फायदा उठाए&rsquo;। इसमें इंटरनेशनल कोऑपरेटिव एलायंस, एशिया-पैसिफिक के प्रेसिडेंट और कृभको के चेयरमैन डॉ. चंद्रपाल सिंह, खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के कोंडा रेड्डी चावा, इंटरनेशनल कोऑपरेटिव एलायंस, एशिया-पैसिफिक के सीईओ बालू अय्यर और भारतीय रिजर्व बैंक के डायरेक्टर सतीश मराठे शिरकत करेंगे।</p>
<p><img src="https://www.ruralvoice.in/uploads/images/2022/06/image_750x_62a8ce6b87294.jpg" alt="" /></p>
<p>तीसरे और अंतिम सत्र में सहकारिता आंदोलन को आगे बढ़ाने पर चर्चा होगी। इस सत्र का विषय है &lsquo;कोऑपरेटिव को प्रासंगिक कैसे बनाया जाए&rsquo;। इस सत्र में एनएफसीएसएफ लिमिटेड के एमडी प्रकाश नायकनवरे और सहकार भारती के प्रेसिडेंट डॉ. डीएन ठाकुर समेत कई वक्ता हिस्सा लेंगे।</p>
<p>रूरल वॉयस और सहकार भारती की तरफ से आयोजित यह परिचर्चा सहकारिता को आगे ले जाने की दिशा में पहला कदम है। रूरल वॉयस आगे भी सहारी जगत के घटनाक्रम, नीतिगत बदलावों और जमीनी हकीकत की कवरेज और विश्लेषण को प्रमुखता से लोगों को बीच रखेगा।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ सहकारिता पर रूरल वॉयस की परिचर्चा आज, जानी-मानी हस्तियां करेंगी शिरकत ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[किसान नेता एग्रीकल्चर जोनल प्लानिंग के पक्ष में, इससे कम होगी उर्वरकों पर निर्भरता]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/farmer-leaders-suggest-adoption-of-organic-in-phases-to-meet-the-challenges-of-chemical-fertilisers.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 01 Jun 2022 12:27:28 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/farmer-leaders-suggest-adoption-of-organic-in-phases-to-meet-the-challenges-of-chemical-fertilisers.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>रूस और यूक्रेन युद्ध के चलते पैदा आपूर्ति के संकट और अंतरराष्ट्रीय बाजार में लगातार बढ़ती कीमतों के मद्देनजर देश में फसलों के आधार पर एग्रीकल्चर जोनल प्लानिंग की जरूरत है। इसके जरिये उर्वरकों की खपत कम करने के साथ ही फसल विविधिकरण को बढ़ावा दिया जा सकेगा। वहीं आयातित रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने के लिए देश में खेती के कुछ रकबे को धीरे-धीरे ऑर्गेनिक की तरफ ले जाना पड़ेगा। सरकार अभी जो उर्वरक सब्सिडी देती है वह कंपनियों को ना देकर सीधे किसानों को देना चाहिए। इससे किसानों को यह तय करने की आजादी मिलेगी कि उन्हें खेतों में किस उर्वरक का इस्तेमाल करना है। <strong>रूरल वॉयस</strong> और <strong>सॉक्रेटस फाउंडेशन</strong> द्वारा रूस और यूक्रेन युद्ध के बाद पैदा उर्वरकों के मौजूदा संकट पर मंगलवार को नई दिल्ली में आयोजित एक राउंड टेबल कांफ्रेंस में देश भर के सबसे किसान संगठनों के पदाधिकारियों ने यह सुझाव दिए। किसान संगठनों खेती के लिए अलग योजना आयोग बनाने और जिला स्तर पर एग्री जोन बनाने जैसे सुझाव भी दिए। यह पहला मौका है जब विभिन्न मत वाले संगठनों के नेता किसानों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर एक मंच पर मौजूद रहे।</p>
<p>कांफ्रेंस में सॉकरेटस द्वारा एक दी गये एक प्रजेंटेशन के जरिये पिछले एक साल से अभी तक उर्वरकों से संबंधित घटनाक्रम और कीमतों व उपलब्धता समेत अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति और घरेलू आयात की स्थिति की जानकारी और आंकड़े पेश किये गये। बीते एक साल में अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों के नाम 70 <span>फ़ीसदी तक बढ़े हैं। भारत बने बनाए उर्वरकों के साथ उनके कच्चे माल का भी आयात करता है। उनके दाम में भी बढ़ोतरी हुई है। रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण उर्वरक उपलब्धता का भी संकट हुआ है। देश में अभी उर्वरकों का स्टॉक कम है और इंडस्ट्री आयात भी नहीं कर रही है। आसन्न खरीफ सीजन में किसानों को इस समस्या का सामना करना पड़ सकता है। युद्ध खत्म होने की फिलहाल कोई संभावना ना देखते हुए आने वाले दिनों में उर्वरकों तथा उनके कच्चे माल के दाम में गिरावट के आसार कम ही हैं। इससे सरकार को सब्सिडी भी बढ़ानी पड़ी है। बजट में सरकार ने </span>1.05 <span>लाख करोड़ रुपए उर्वरक सब्सिडी का प्रावधान किया था</span>, <span>जबकि वास्तविक सब्सिडी इसके दो से ढाई गुना होने की उम्मीद की जा रही है।</span></p>
<p>इस मौके पर भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय महामंत्री युद्धवीर सिंह ने कहा कि सस्टेनेबिलिटी के लिए रासायनिक खेती पर निर्भरता कम करनी होगी, देश में उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल बढ़ाने के उपाय तलाशने होंगे। उन्होंने कहा कि देश में 37 <span>फ़ीसदी जमीन सिंचित है और सिंचित जमीन पर खेती करने वाले </span>90 <span>फ़ीसदी किसान रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल करते हैं। इस तरह&nbsp; </span>63 <span>फ़ीसदी किसानों के लिए सरकार कुछ नहीं सोचती है। उन्होंने कहा कि उर्वरक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता जरूरी है तभी समस्या का समाधान निकलेगा। उन्होंने कहा, यह गलत धारणा है कि हाइब्रिड बीजों और उर्वरकों की वजह से हरित क्रांति आई। सच तो यह है कि पारंपरिक वैरायटी से ही हरित क्रांति आई। उन्होंने खेती के लिए रिजर्व जोन बनाने का सुझाव दिया और कहा कि उस जमीन का कोई दूसरा इस्तेमाल ना हो।</span></p>
<p>भारतीय किसान संघ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य और भारतीय एग्रो इकोनॉमिक रिसर्च सेंटर (बीएआरसी) के ऑल इंडिया जनरल सेक्रेटरी प्रमोद चौधरी ने कहा कि अभी जो उर्वरक सब्सिडी दी जाती है वह होती तो किसानों के नाम पर है लेकिन वह सब्सिडी इंडस्ट्री को मिलती है। उन्होंने सुझाव दिया कि हर किसान को प्रति एकड़ 6000 <span>रुपए के हिसाब से सब्सिडी की रकम दे दी जाए फिर किसान खुद तय करे कि उसे कौन सा उर्वरक इस्तेमाल करना है। उन्होंने बताया कि मध्य प्रदेश में सीधे किसानों को पैसे देने का ब्यूरोक्रेट्स ने यह कहकर विरोध किया कि अनेक किसान लीज पर जमीन लेकर खेती करते हैं ऐसे में सब्सिडी की रकम उन्हें कैसे मिलेगी। इसके अलावा अफसरों ने यह तर्क भी दिया कि एकमुश्त पैसे मिलने पर किसान उसे कहीं और खर्च कर देंगे।</span></p>
<p>स्वाभिमानी शेतकरी संगठन के अध्यक्ष राजू शेट्टी ने कहा, ऑर्गेनिक खेती के नाम पर बहुत सी कंपनियां फर्जीवाड़ा कर रही हैं और किसान उसमें फंस रहे हैं। ऑर्गेनिक खेती से खाद्य संकट आ सकता है। अपना उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि उन्होंने 5 <span>साल तक ऑर्गेनिक तरीके से गन्ने की खेती की लेकिन इससे उत्पादकता </span>30 <span>से </span>35 <span>टन प्रति एकड़ से अधिक नहीं हो सकी जो रासायनिक उर्वरकों के इस्तेमाल से </span>70 <span>टन थी। ऑर्गेनिक गन्ने से निकलने वाली चीनी के लिए पहले </span>70<span> रुपए प्रति किलो का दाम आश्वस्त किया गया था, लेकिन बाद में पता चला कि उसे खरीदने वाला ही कोई नहीं है। किसानों को डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर के जरिए सब्सिडी देने का उन्होंने यह कहकर विरोध किया कि इस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। सरकार ने पहले रसोई गैस की सब्सिडी खाते में देने की बात कही थी लेकिन अब वह बंद हो गई है। उन्होंने बताया कि डीजल और उर्वरकों के दाम बढ़ने से गन्ने की प्रति टन लागत </span>214 <span>रुपए बढ़ गई, जबकि गन्ने का उचित एवं पारिश्रमिक मूल्य (एफआरपी) सिर्फ </span>20 <span>रुपए बढ़ा।</span></p>
<p>राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के राष्ट्रीय संयोजक वीएम सिंह ने कृषि के लिए योजना आयोग जैसी अलग संस्था बनाने की जरूरत बताई और कहा कि अभी जो लोग नीतियां बनाते हैं उन्हें खेती के बारे में कुछ नहीं मालूम। सरकार की नीतियों में ऑर्गेनिक को प्राथमिकता नहीं मिलती है। हम कब तक आयातित उर्वरकों के मोहताज रहेंगे। अब भी दो तिहाई जमीन में जहां सिंचाई की सुविधा नहीं है, वहां गोबर खाद ही इस्तेमाल होता है। उन्होंने किसानों से प्रयोग करने का आह्वान किया और कहा हमें सिंचित इलाकों में धीरे-धीरे उर्वरकों का इस्तेमाल कम करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) किसानों की जीवन रेखा है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार उर्वरकों के दाम बढ़ाए लेकिन उसे किसान की लागत में जोड़कर एमएसपी तय करें। उनका एक सुझाव था कि अगर यूरिया सीधे खेतों में डालने के बजाय उसका घोल बनाकर स्प्रे किया जाए तो सिर्फ 20 <span>फ़ीसदी यूरिया की खपत होगी और उत्पादकता उतनी ही रहेगी।</span></p>
<p>जय किसान आंदोलन के नेता योगेंद्र यादव ने कई अल्पकालिक और दीर्घकालिक सुझाव दिए। उन्होंने कहा, आने वाले खरीफ सीजन के लिए तो ज्यादा कुछ करने का समय नहीं है। सरकार को फौरी उपाय ही करने पड़ेंगे। अंतरराष्ट्रीय बाजार में विभिन्न स्रोतों से उपलब्ध उर्वरक खरीदना पड़ेगा। मध्यम अवधि उपाय के तौर पर उन्होंने कहा कि सरकार उद्योगों को सब्सिडी न दे, किसानों को प्रति एकड़ के हिसाब से सब्सिडी दे। एमएसपी तय करने की व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि इसमें तीन साल पहले के दाम को आधार बनाया जाता है। उन्होंने हर साल नई कीमतों के आधार पर एमएसपी तय करने की बात कही। कृषि में विविधीकरण के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि इसके लिए किसानों को इंसेंटिव देना पड़ेगा। दीर्घकालिक सुझाव के तौर पर उन्होंने कहा कि एमएसपी को जिला स्तरीय कृषि आर्थिकी से जोड़ना चाहिए। खास जिले या क्षेत्र में खास फसलों के लिए ही एमएसपी दी जानी चाहिए, सबके लिए नहीं।</p>
<p>भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने सुझाव दिया कि पर्वतीय राज्य सबसे पहले ऑर्गेनिक खेती की तरफ जा सकते हैं। उन्होंने बताया कि उनके संगठन ने मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश सरकार से बुंदेलखंड ऑर्गेनिक बोर्ड बनाने का सुझाव दिया था, लेकिन इस दिशा में कोई काम नहीं हो रहा है। उन्होंने कहा कि कृषि कचरा प्रबंधन से बहुत खाद मिल सकती है जिन्हें अभी हम जला देते हैं। हमें ऐसी खेती की तरफ जाना पड़ेगा जिसमें उर्वरकों और पानी का इस्तेमाल कम हो।</p>
<p>अखिल भारतीय किसान सभा के महासचिव और वरिष्ठ सीपीआई नेता अतुल अंजान ने कहा, रासायनिक उर्वरक भले ही शरीर के लिए नुकसानदायक हो लेकिन फिलहाल इनका विकल्प नहीं है। ऑर्गेनिक खेती को सरकार को ही बढ़ावा देना पड़ेगा। अभी पूरे देश के लिए इसमें सिर्फ 750 <span>करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं। कोई भी सरकार उर्वरकों पर गंभीर चर्चा नहीं करना चाहती क्योंकि इसमें उद्योगों का हित है। युवा पीढ़ी को आकर्षित करने के लिए कृषि को बदलना जरूरी है। उन्होंने भी कृषि आयोग जैसी संस्था गठित करने का समर्थन किया और कहा कि इसकी राज्यवार बैठक होनी चाहिए।</span></p>
<p>एलायंस ऑफ इंडियन फार्मर्स एसोसिएशन के राष्ट्रीय संयोजक डॉ. राजाराम त्रिपाठी ने कहा कि भारतीय किसान अपने तरीके से ऑर्गेनिक खेती कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि यहां कुछ इलाकों में 25 <span>साल से ऑर्गेनिक खेती की जा रही है, उन पर रूस यूक्रेन युद्ध का कोई असर नहीं पड़ा है। उन्होंने कहा कि सरकार जीरो बजट खेती की बात करती है जबकि हमें खेती में इंफ्रास्ट्रक्चर और अन्य चीजों पर खर्च करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि अभी जो आंकड़े बताए जाते हैं उनमें ज्यादातर गलत होते हैं</span>, <span>सरकार झूठे आंकड़ों के पिरामिड पर बैठी है।</span></p>
<p>एलायंस फॉरसस्टेनेबल एंड हॉलिस्टिक एग्रीकल्चर (आशा) के नचिकेत ने बताया कि भारत तैयार उर्वरकों के साथ कच्चे माल का भी आयात करता है। इस तरह देखा जाए तो यूरिया के मामले में 70 <span>फ़ीसदी, फास्फेट में </span>95 <span>फ़ीसदी और एमओपी में </span>100 <span>फ़ीसदी निर्भरता आयात पर है। उन्होंने कहा कि जब प्राकृतिक गैस (जिससे यूरिया बनती है) और फास्फेट (जिससे डीएपी बनता है) एक दिन खत्म हो जाएंगे, इसलिए हमें विकल्प देखना पड़ेगा।</span></p>
<p>जम्मू-कश्मीर पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के पूर्व विधायक यावर मीर भी इस कांफ्रेंस में मौजूद थे। उन्होंने बताया, कश्मीर में बागवानी की खेती ही अधिक होती है। वहां सरकारी स्कीम और जमीनी समस्याओं में बहुत फर्क है। अधिकारी अपने हिसाब से फैसले करते हैं। कई बार तो उन फैसलों की वजह से समस्या आ जाती है। उन्होंने कहा कि सरकार की नीतियां किसानों के लिए नहीं बल्कि व्यापारियों के लिए हैं। स्थिति यह है कि आज किसानों के पास किसान क्रेडिट कार्ड से लिए गए कर्ज लौटाने तक के पैसे नहीं हैं।</p>
<p>किसान महापंचायत के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामपाल जाट ने कहा कि सरकार की नीतियों के कारण सबसे अधिक दलहन किसानों को नुकसान होता है। उदाहरण के तौर पर सरकार ने दालें खरीदने की घोषणा तो की लेकिन साथ में तय कर दिया कि 25 <span>फ़ीसदी से ज्यादा उपज नहीं खरीदी जाएगी। उन्होंने कहा कि फसल विविधीकरण और फसल चक्र भारतीय किसानों के स्वभाव में था। सरकारी नीतियों के कारण </span>1960 <span>के दशक के बाद वह बिगड़ा है। उन्होंने कहा कि सरकार अगर हस्तक्षेप बंद कर दे तो किसानों की अनेक समस्याएं स्वतः दूर हो जाएंगी। उन्होंने भी कृषि जोन बनाकर उसके मुताबिक नीतियां बनाए जाने की बात कही।</span></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ किसान नेता एग्रीकल्चर जोनल प्लानिंग के पक्ष में, इससे कम होगी उर्वरकों पर निर्भरता ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[हमने शुरू किया दुनिया का पहला फीड ईकॉमर्स पोर्टलः अमित सरावगी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/amit-saraogi-says-we-started-first-feed-ecommerce-portal-of-the-world.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 17 May 2022 08:00:18 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/amit-saraogi-says-we-started-first-feed-ecommerce-portal-of-the-world.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>एनिमल फीड क्षेत्र की अग्रणी कंपनी अनमोल फीड्स के मैनेजिंग डायरेक्टर <strong>अमित सरावगी</strong> का मानना है कि कृषि क्षेत्र में फीड आधारित मछली पालन आज सबसे अधिक मुनाफे का धंधा है। इसमें निवेश पर छह महीने में 60 फीसदी तक रिटर्न मिलता है। उनका मानना है कि राज्य सरकारों को सब्सिडी देकर या अन्य तरीके से किसानों के बीच इसे प्रमोट करना चाहिए। उन्होंने बताया कि उनकी कंपनी ने जनवरी में दुनिया का पहला फीड ईकॉमर्स पोर्टल शुरू किया है। इसमें किसानों को मैटेरियल के साथ टेक्निकल सेवा भी मुहैया कराई जाती है। सरावगी ने <strong>रूरल वॉयस</strong> के संपादक <strong>हरवीर सिंह</strong> से बातचीत में फीड इंडस्ट्री की चुनौतियों और संभावनाओं के बारे में भी बताया। बातचीत के मुख्य अंशः</p>
<p><strong>-आप एनिमल फीड सेगमेंट में मार्केट लीडर हैं। अभी आपका टर्नओवर कितना है? आप कौन-कौन सा फीड बनाते हैं?</strong></p>
<p>वित्त वर्ष 2021-22 में हमारा टर्नओवर 600 करोड़ रुपए था। हम मुख्य रूप से ब्रॉयलर का फीड बनाते हैं, जिसे चिकन फीड भी कहते हैं। इसके अलावा फ्लोटिंग फिश फीड, श्रिंप (झींगा) फीड, लेयर फीड और कैटल (मवेशी) फीड बनाते हैं। हाल में पिग फार्मिंग का चलन बढ़ा है, तो हमने पिग फीड बनाने का काम शुरू किया है। श्रिंप फीड की घरेलू बाजार में खपत नहीं है, इसका निर्यात किया जाता है।</p>
<p><strong>-आपके कुल उत्पादन में किस फीड का कितना हिस्सा है?</strong></p>
<p>हमारे कुल बिजनेस में ब्रॉयलर फीड का हिस्सा करीब 65 फीसदी है। बाकी में दूसरी फीड हैं। बिहार के मुजफ्फरपुर में वर्ष 2000 में एनिमल फीड बनाने का बिजनेस शुरू किया। वर्ष 2006 तक हम सिर्फ ब्रॉयलर फीड बनाते रहे। करीब एक दर्जन राज्यों में बेचते थे। 2006 में कैटल फीड लांच किया। फिर, 2017 में कोलकाता में फ्लोटिंग फिश फीड का प्लांट लगाया। अभी बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, जम्मू-कश्मीर, झारखंड और हरियाणा में कंपनी के फीड बनाने के आठ प्लांट हैं। सभी प्लांट की कुल उत्पादन क्षमता 1,300 टन प्रतिदिन है जिनकी 20 राज्यों में सप्लाई की जाती है। हमारा फिश फीड या पोल्ट्री फीड रेडी टू यूज होता है। कैटल फीड में हरा चारा या भूसा आदि मिलाना पड़ता है।</p>
<p><strong>-इस सेक्टर में ग्रोथ की कैसी संभावना दिख रही है?</strong></p>
<p>फिश फीड में ग्रोथ की बहुत संभावना है, लेकिन वास्तव में ग्रोथ हो नहीं रही। चार साल से बिहार का मार्केट 20 हजार टन का, उत्तर प्रदेश का 30 से 35 हजार टन का, पश्चिम बंगाल का 70 से 80 हजार टन का है। यह बढ़ नहीं रहा। मछली पालन के लिए पैसा चाहिए और किसान के पास पैसा नहीं है।</p>
<p><strong>-आगे ग्रोथ के लिए आपकी क्या रणनीति है?</strong></p>
<p>हमने दुनिया का पहला फीड ईकॉमर्स पोर्टल शुरू किया है। अभी हर महीने लगभग 100 ट्रांजैक्शन हो रहे हैं। हम किसान को मैटेरियल के साथ टेक्निकल सर्विस भी देते हैं। प्लांट या कंपनी के डिपो से 100 किमी की दूरी तक हम सप्लाई करते हैं। यह किसानों को भी सस्ता पड़ता है।</p>
<p><strong>-इस बिजनेस में मुनाफा कैसा है?</strong></p>
<p>मेरे विचार से आज फीड आधारित मछली पालन सबसे अधिक मुनाफे का धंधा है। इसमें निवेश पर रिटर्न छह महीने में 60 फीसदी है। राज्य सरकारों को सब्सिडी देकर या अन्य तरीके से किसानों के बीच इसे प्रमोट करना चाहिए।</p>
<p><strong>-प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना में 60 फीसदी तक सब्सिडी मिलती तो है।</strong></p>
<p>यह सेक्टर जितना बड़ा है, उसे देखते हुए योजना बहुत छोटी है। जो सब्सिडी मिलती भी है वह तालाब और बाजार विकसित करने जैसे कामों के लिए है। फीड प्लांट के लिए सिर्फ छह करोड़ रुपए का प्रावधान है, जबकि आज फ्लोटिंग फिश फीड प्लांट लगाने का खर्च कम से कम 30 करोड़ रुपए है।</p>
<p><strong>-अभी इंडस्ट्री के सामने क्या चुनौतियां हैं?</strong></p>
<p>कॉन्ट्रैक्ट ब्रॉयलर फार्मिंग बढ़ने से स्वतंत्र रूप से फीड बनाने वालों के लिए समस्या आ रही है। दूसरी समस्या कच्चे माल की है जिससे पूरी इंडस्ट्री जूझ रही है। दो प्रमुख कमोडिटी मक्का और सोयाबीन की कीमत बहुत ज्यादा है। निर्यात नहीं होने के कारण सोयाबीन घरेलू बाजार में उपलब्ध है। एक महीने पहले तक पिछली फसल का आधा ही बाजार में आया था। नई फसल अक्टूबर में आ जाएगी। फिर भी अभी दाम बहुत ज्यादा हैं। इसी तरह, मक्के की नई फसल आए एक महीना हो गया है। ऐसा पहली बार हुआ कि नई फसल आने के बाद भी दाम कम नहीं हुए हैं। फैक्टरी तक पहुंच कीमत लगभग 24 रुपए किलो है। मार्च में भी यही कीमत थी। यह हमारे लिए चिंता की बात है।</p>
<p><strong>-कीमतों में कितना अंतर है? इस बार तो सोयाबीन एमएसपी से काफी ऊपर बिका।</strong></p>
<p>हमने अक्टूबर 2020 तक 28 से 35 रुपए किलो के औसत भाव पर सोयामील खरीदा। आज औसत कीमत 65 रुपए है। आयातित सोयामील ड्यूटी चुकाने के बाद भी सस्ता पड़ता है।</p>
<p><strong>-कच्चा माल महंगा होने पर आपने फीड के दाम कितने बढ़ाए?</strong></p>
<p>पूरी लागत वृद्धि का पूरा बोझ किसानों पर नहीं डाल सकते। हमें अपना मार्जिन कम करना पड़ता है। मान लीजिए कच्चा माल 50 फीसदी महंगा हुआ तो हमने प्रोडक्ट के दाम 40-45 फीसदी ही बढ़ाए।</p>
<p>-<strong>दाम बढ़ने से क्या बिक्री पर भी असर पड़ा है?</strong></p>
<p>बिल्कुल पड़ा है। पहले जितने काम के लिए किसानों को 100 रुपए खर्च करने पड़ते थे अब उसके लिए 170 रुपए देने पड़ते हैं। दाम बढ़ने से हमारा टर्नओवर तो बढ़ा लेकिन मात्रा के लिहाज से बिक्री उतनी ही है।</p>
<p><strong>-2022-23 में कैसी संभावना देखते हैं?</strong></p>
<p>हम एक्वा फीड पर फोकस कर रहे हैं। हमें फिश और श्रिंप फीड में अच्छे नतीजे मिल रहे हैं। हम बांग्लादेश, नेपाल और भूटान को इनका निर्यात भी कर रहे हैं। दो साल तक महामारी के कारण बिजनेस में कोई ग्रोथ नहीं थी। मौजूदा वित्त वर्ष में अच्छी ग्रोथ मिलने की उम्मीद है। इस साल और लॉकडाउन नहीं हुआ तो हम महामारी से पहले की तुलना में काफी बेहतर स्थिति में होंगे।</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ हमने शुरू किया दुनिया का पहला फीड ईकॉमर्स पोर्टलः अमित सरावगी ]]></media:description>
	<media:credit role='author' scheme='urn:ebu'>Rural Voice</media:credit>
	</media:content>
	
        
        <author>Sunil Kumar Singh (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[डॉ. वर्गीज कुरियन  भारत रत्न के सही हकदार, उनके काम ने करोड़ों किसानों का जीवन बदला: आर एस सोढ़ी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/dr-kurien-deserves-bharat-ratna-r-s-sodhi.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Fri, 26 Nov 2021 16:39:11 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/dr-kurien-deserves-bharat-ratna-r-s-sodhi.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>भारत में श्वेत क्रांति के जनक कहे जाने वाले डॉ. वर्गीज कुरियन का आज <span>100</span> वां जन्मदिन है। <span>'</span>मिल्क मैन ऑफ इंडिया<span>' </span>के नाम से मशहूर डॉ. कुरियन ने भारत को विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। डॉ. वर्गीज कुरियन की जन्मशती पर <strong>रूरल वॉयस</strong> ने अमूल के मैनेजिंग डायरेक्टर <strong>डॉ. आर.एस. सोढ़ी</strong> के साथ अपने खास विडियो इंटरव्यू कार्यक्रम <strong>&ldquo;रूरल डायलॉग&rdquo;</strong> में डॉ. वर्गीज कुरियन द्वारा अमूल को देश की सबसे बड़ी एफएमसीजी और डेयरी कंपनी के रूप में स्थापित करने जैसी उपलब्धियों और उनके द्वारा स्थापित मूल्यों और देश व डेयरी क्षेत्र को लेकर उनके विजन जैसे तमाम मुद्दों पर बातें की। इस पूरी बातचीत को आप इस स्टोरी के साथ दिये विडियो पर क्लिक कर देख सकते हैं। &nbsp;</p>
<p>डॉ. कुरियन को भारत रत्न से जुड़े सवाल पर आर. एस. सोढ़ी ने कहा कि डॉ. कुरियन का देश के लिए जो योगदान है उसे देखते हुए उन्हें भारत रत्न मिलता ही चाहिए। अगर उन्हें भारत रत्न मिलता है तो डॉ. कुरियन को भारत नहीं मिलेगा बल्कि भारत रत्न को डॉ. कुरियन मिलेंगे।</p>
<p>इस बातचीत में डॉ. सोढ़ी ने कहा कि उनका विजन भारत को आत्मनिर्भर बनाने का था। उन्होंने लोकल फॉर वोकल के विजन पर काम किया और अमूल जैसा मॉडल बनाया। उन्होंने कहा कि साल 1950 में जहां भारत पूरी तरह आयात पर निर्भर &nbsp;था। उनके काम ने दस करोड़ पशुपालक परिवार अपने जीवन स्तर को उपर उठा पाए। डेयरी से जुड़े बड़े संस्थान बनाने में अहम भूमिका निभाई जो आज भी लागातार विकास कर रहे हैँ। आज उनके विजन वजह से 135 करोड़ भारतीय डेयरी उत्पादों के मामले में फूड सिक्योर हैं।</p>
<p>डॉ सोढ़ी ने कहा कि वर्गीज कुरियन का मानना था किसानों के मामले में किसी तरह के फंड और तकनीकी मामले में समझौता नही करना है इसलिए उन्होंने डेयरी क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर की अच्छी से अच्छी तकनीक मिल्क परक्यूमेंट मशीनें ,डेयरी मशीनें, आर्किटेक्चर हो या बिल्डिंग निर्माण इसके क्वालिटी के साथ समझौता नही किया जाना चाहिए। डॉ. सोढ़ी ने कहा कुरियन का कहते थे अच्छी क्वालिटी के सारी चीजें रहती है तो प्रोडक्ट भी अच्छी क्वालिटी होता है जिससे कस्टमर खुश रहते हैं। डॉ कुरियन कहना था कि इस दूध सहाकरिता में अधिकतर छोटे किसान जुड़े है इसलिए उनके साथ किसी भी तरह का धोखा नही होना चाहिए। दूसरी तरफ जो अमूल का उत्पाद को कस्टमर खरीद रहे है उस उत्पाद की क्वालिटी के साथ समझौता नही होना चाहिए। उनका मुख्य ध्येय था कि भारत के किसानों का फायदा होना चाहिए और ग्राहकों को उचित मूल्य पर उनको अच्छी क्वालिटी का मिल्क उत्पाद मिलना चाहिए। इसी के अनुसार उन्होंने इसका बिजनेस स्ट्रक्चर बनाया और इस पर उन्होंने फोकस किया। डॉ सोढ़ी ने अपना अनुभव शेयर करते कहा कि डॉ कुरियन कहते थे अगर कितनी भी परेशानी आए कितनी समस्या आए आप किसान के हितों की अनदेखी न करे आप हमेशा सफल रहेगें और आज भी उसी दिशा में हम काम कर रहे है।</p>
<p>इन तमाम बातों के अलावा आर. सोढ़ी के साथ पूरी बातचीत को यहां दिये गये विडियो पर क्लिक कर देख सकते हैं।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>&nbsp;</p> ]]></description>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[फार्मर फर्स्ट पर केंद्रित रणनीति की जरूरत, एमएसपी  नीति समेत कृषि में बड़े पॉलिसी सुधारों की दरकार : डॉ. आर.एस. परोदा , चेयरमैन TAAS , पूर्व डीजी ICAR, एक्सक्लूसिव विडियो इंटरव्यू   ]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/Farmer-First-Strategy-and-Big-Policy-reform-in-Agricultural-is-needed-Exclusive-interview-with-DR-R-S-Paroda-Chairman-TAAS-and-former-DG-ICAR.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Wed, 23 Jun 2021 06:23:33 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/Farmer-First-Strategy-and-Big-Policy-reform-in-Agricultural-is-needed-Exclusive-interview-with-DR-R-S-Paroda-Chairman-TAAS-and-former-DG-ICAR.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>अपने&nbsp; पाठकों और दर्शकों के उत्साहवर्धन के चलते <strong>रूरल वॉयस</strong> ने आज अपना छह माह का सफर पूरा कर लिया है।अब आगे का सफर और अधिक विस्तार और कंटेट में विविधिकरण लेकर आ रहा है। इस महत्वपूर्ण पड़ाव पर <strong>रूरल वॉयस</strong> ने ट्रस्ट फॉर एडवांसमेंट ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेस के चेयरमैन <strong>डॉ. आर.एस. परोदा </strong>और इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च (आईसीएआर) के पूर्व डायेरक्टर जनरल (डीजी) और सेक्रेटरी डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च एंड एजुकेशन (डेअर), भारत सरकार के साथ अपने कार्यक्रम <strong>रूरल डायलॉग</strong> में विडियो इंटरव्यू के जरिए लंबी बातचीत की। <strong>रूरल वॉयस</strong> के एडीटर -इन-चीफ <strong>हरवीर सिंह</strong> के साथ <strong>डॉ. परोदा</strong> ने अमेरिका के बॉस्टन से बातचीत की।</p>
<p>भारतीय कृषि क्षेत्र में हरित क्रांति के शुरुआती दिनों से इसके विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले डॉ. परोदा ने पिछले दिनों सरकार को इंडियन एग्रीकल्चर सिक्योर एंड सस्टेनेबल शीर्षक से एक रिपोर्ट सौंपी। इस रिपोर्ट को तैयार करने वाले साइंटिस्ट, पॉलिसी मेकर और दूसरे विशेषज्ञों की टीम को डॉ. परोदा ने नेतृत्व दिया। डॉ. परोदा ने इस लंबे इंटरव्यू में भारतीय कृषि क्षेत्र और किसानों की उपलब्धियों को बताया और साथ ही दूसरी पीढ़ी की मुश्किलों पर भी बात की। किस तरह से किसान की लागत बढ़ रही है और उसकी आमदनी घट रही है। किसानों को फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर स्पष्ट नीति की क्यों जरूरत है और इसका निर्धारण करने के लिए सी-2 लागत से डेढ़ गुना क्यों होना चाहिए, इसका भी तर्क दिया है। साथ केवल फसलों पर नीतियों को केंद्रित करने की बजाय डेयरी, मछली पालन और बागवानी फसलों को किसानों की आय बढ़ाने में किस तरह से बढ़ावा देने की जरूरत है, इस पर भी बात की। वहीं फसल विविधिकरण के साथ ही किसानों को मिलने वाली सब्सिडी के लिए नया फार्मूला भी वह सुझाते हैं।</p>
<p>इसके साथ ही उनका सबसे अधिक जोर है एक नई कृषि नीति बनाने और दूसरे संस्थागत सुधारों को लागू करने पर। उनका मानना है कि अब&nbsp;एग्रीकल्चर फर्स्ट की जगह फारमर फर्स्ट की रणनीति की जरूरत है । नेशनल एग्रीकल्चरल डवलपमेंट एंड फार्मर्स वेलफेयर काउंसिल के गठन और कृषि एवं किसान कल्याण की नई नीति बनाने की जरूरत भी वह बताते हैं।</p>
<p>इन तमाम मुद्दों और कृषि के भावी स्वरूप और विकास की नीतियों पर <strong>डॉ. परोदा</strong> के जवाब जानने के लिए <strong>रूरल डायलॉग</strong> में उनका एक्सक्लूसिव विडियो इंटरव्यू देखें।</p>
<p><strong>&nbsp;</strong></p> ]]></description>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    </item>

    <item>
        <title><![CDATA[पेटा विवाद बेवजह,  कोविड की दूसरी लहर में दूध  किसानों और डेयरी उद्योग की बढ़ी मुश्किल : आर.एस. सोढ़ी , एक्सक्लूसिव विडियो इंटरव्यू]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/PETA-Controversy-Needless-Covid-is-affecting-both-Dairy-Farmers-and-Industry-R-S-Sodhi.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 05 Jun 2021 12:11:13 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/PETA-Controversy-Needless-Covid-is-affecting-both-Dairy-Farmers-and-Industry-R-S-Sodhi.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>गुजरात कोआपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन (जीसीएमएमएफ) अमूल के मैनेजिंग डायरेक्टर आर. एस. सोढ़ी ने रुरल वॉयस के साथ एक विडियो इंटरव्यू में लंबी बातचीत की। इसमें उन्होंने कोविड की दूसरी लहर का दूध किसानों पर प्रतिकूल असर पड़ने की बात कही। साथ ही कहा कि मांग घटने से डेयरी उद्योग के पास भी लगातार स्टॉक बढ़ रहा है और इसके चलते कंपनियों की लागत बढ़ रही है। देश के कई हिस्सों में किसानों के लिए दूध के दाम घट गये हैं लेकिन अमूल जैसी सहकारी संस्था जो देश में चालीस लाख से अधिक किसानों से दूध खरीदता है वह अभी भी किसानों को अधिक दाम दे रही है। इस प्रतिकूल दौर में डेयरी उद्योग, किसानों की स्थिति के साथ ही तमाम मसलों पर अमूल के मैनेजिंग डायरेक्टर आर. एस. सोढ़ी ने रुरल वॉयस के साथ बातचीत की। साथ ही यह भी बताया कि पेटा द्वारा उठाये गये विवाद पर उनका क्या रुख रहा है।</p>
<p>आर. एस. सोढ़ी अमू्ल के मैनेजिंग डायरेक्टर होने के साथ ही देश के डेयरी उद्योग के सबसे अधिक अनुभवी और बड़े नामों में शुमार होते हैं। गुजरात कोआपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन (जीसीएमएमएफ) का पिछले वित्त वर्ष 2020-21 का टर्नओवर 39,250 करोड़ रुपये रहा है जबकि अमूल ब्रांड का टर्नओवर इस दौरान 53 हजार करोड़ रुपये रहा है। रुरल वॉयस के साथ रुरल डायलॉग में सोढ़ी बताते हैं कि गुजरात के किसानों को हर रोज दूध की बिक्री से 150 करोड़ रुपये मिलते हैं। यानी यह राशि हर रोज गुजरात के गांवों की आय के रूप में जाती है। कोविड महामारी की पहली लहर में किसानों को सही कीमत देने के साथ ही अमूल की दुध खरीद की वृद्धि दर 15 फीसदी रही थी। जबकि इस साल कोविड की दूसरी लहर के बावजूद अमूल की दूध खरीद पिछले साल से 13 फीसदी ज्यादा है। लेकिन इस साल दूध का उत्पादन अधिक नहीं बढ़ने के बावजूद अधिक दूध बिक्री के लिए आ रहा है जबकि दूध उत्पादों की मांग गिरी है। अगर हालात जल्दी नहीं सुधरे तो दूध किसानोें के लिए दाम घट सकते हैं, वहीं उसका असर दूध उत्पादन पर पड़ सकता है क्योंकि किसानों की दूध उत्पादन लागत बढ़ रही है। उस स्थिति में अगले लीन सीजन में दूध उपभोक्ताओं के लिए भी कीमतों में इजाफा हो सकता है। इस पूरे इंटरव्यू को देखिये, आपको मिलेंगे उन सवालों के जवाब जो दूध किसानों, डेयरी उद्योग, उपभोक्ताओं के लिए और अर्थव्यवस्था के लिए आने वाले दिनों की स्थिति को साफ करेंगे।&nbsp;</p> ]]></description>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    <item>
        <title><![CDATA[अगधी ने आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस टेक्नोलॉजी के जरिये बीज की गुणवत्ता के सटीक आकलन को संभव किया है: निखिल दास]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/We-tried-to-bring-in-a-system-where-seed-quality-percentage-can-be-easily-assessed.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sun, 30 May 2021 10:49:03 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
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        <description><![CDATA[ <p>बंगलुरू में स्थित&nbsp; कृषि-तकनीक पर&nbsp; आधारित एक&nbsp; स्टार्टअप&nbsp; <strong>&ldquo;अगधी&rdquo;</strong> ने&nbsp; बीज परीक्षण, बीजों की सैंपलिंग के जरिये उनकी गुणवत्ता के स्तर को परखने के लिए मशीन लर्निंग और कंप्यूटर विज़न टेक्नोलॉजी का उपयोग किया है। यह तकनीक के जरिये बीजों की कीमत तय करने में किसान और बीज खरीदने वाली कंपनियों की प्रक्रिया को सरल करने के साथ ही उसमें लगने वाले समय में भारी कमी लाएगी। जिसका फायदा किसानों और कंपनियों दोनों को मिलेगा। <strong>&nbsp;निखिल दास</strong> (पूर्व सीटीओ हैवेल्स, प्रॉम्पटेक एलईडी लाइट्स के संस्थापक) औऱ <strong>अंशाद&nbsp;अमीन्जा</strong> (अध्यक्ष इनोवेशन इनक्यूबेटर एडवाइजरी, मल्टीपल स्टार्ट-अप्स के लिए सलाहकार है) का ड्रीम प्रोजेक्ट है &ldquo;अगधि&rdquo; । रूरल वाइस ने <strong>निखिल दास</strong> से बातचीत के दौरान उनके स्टार्ट अप में प्रयोग की जाने वाली तकनीक और कृषि क्षेत्र के लिए उसकी उपयोगिता &nbsp;और उनके स्टार्ट-अप की भविष्य की योजनाओं जैसे विषयों पर निखिल दास से बात की। <strong>निखिल दास&nbsp;</strong> के साथ रूरल वाइस के एडिटर इन चीफ <strong>&nbsp;हरवीर सिंह</strong> की बातचीत के अंश:</p>
<p>सवाल: आपकी विशेषज्ञता क्या है? इससे पहले आप हनीवेल में रहे हैं और&nbsp; हैवेल्स और एक एलईडी कंपनी मे भी कार्यरत रहे है । फिर कृषि से जुड़े स्टार्टअप में&nbsp; आने के पीछे आपकी&nbsp; सोच क्या थी ? और इस स्टार्टअप का क्या&nbsp; विजन है ?</p>
<p>जबाब :&nbsp; एक उद्यमी के रूप में मेरी यात्रा 2006-07 के आसपास शुरू हुई थी , जब मैंने प्रोम्पटेक एलईडी कंपनी के साथ&nbsp; काम की शुरुआत की । यह कंपनी भारत की&nbsp; पहली एलईडी लाइटिंग कंपनी थी । यह कंपनी साल 2014&nbsp; में&nbsp; भारत की सबसे बड़ी एलईडी लाइटिंग मैन्युफैक्चरिंग कंपनी बन गई जिसमें मेरा बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान रहा । इस कंपनी के साथ सफर यूं ही जारी रहा और साल&nbsp; 2015 मे हमें हैवेल्स कंपनी से रणनीतिक निवेश मिला । मैंने हैवेल्स में ग्रूप चीफ टेक्नोलॉजी ऑफिसर (सीटीओ) के रूप में अपना काम करना जारी रखा । जब मैंने साल 2018 में इस कंपनी को छोड़ दिया, तो इसके बाद मैं एक ऐसे क्षेत्र की तलाश में था जहां पर टेक्नोलॉजी के उपयोगी की संभावनाएं तो लेकिन अभी वहां इसकी पहुंच नहीं बन पाई है। &nbsp;इसलिए, इस बात को ध्यान में रखते हुए, मैंने नए -नए स्टार्ट-अप का सहयोग&nbsp; करना शुरू किया और उसी&nbsp; दौरान&nbsp; मुझे एक बीज कंपनी में दौरा करने का मौका मिला । जनवरी 2020 के दौरान मुझे कृषि में ऐसी तकनीक लाने का विचार आया । जबकि मैं जानता था कि कृषि में बहुत सी नई तकनीकें आ रही हैं। लेकिन आप अगर कृषि में मुख्य तकनीकों पर नजर डाले&nbsp; तो आप पाएंगे कि जितना मेडिकल और अन्य क्षेत्रो में टेक्नोलॉजी विकसित हुई है, उसके तुलना में कृषि में बहुत कम टेक्नोलॉजी&nbsp; विकसित हुई है ।</p>
<p>सवाल&nbsp; :&nbsp; आप तो मूल रूप से, एलईडी और लाइटिंग कम्पनी में&nbsp; काम करते थे&nbsp; जिसमें&nbsp; आपने एग्रीमेन्ट किया था आप उस क्षेत्र&nbsp; से संबधित&nbsp; खुद&nbsp; की कम्पनी नहीं खोल सकते हैं और&nbsp; यही कारण है कि&nbsp; आप उस क्षेत्र में आगे नही बढ़े । इसीलिए आपका रूझान कृषि की तरफ हुआ।&nbsp; वैसे कृषि में पहले से ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एनालिटिक्स संबधी तकनीक पर कई कंपनियां काम कर रही हैं। कृषि क्षेत्र के लिए &nbsp;आपके&nbsp; स्टार्ट-अप में क्या विशिष्टता है?</p>
<p>जवाब: हमने बहुत सारी कृषि तकनीकों का संज्ञान लिया और पाया कि आज के जमाने में कृषि में कई तकनीक हैं&nbsp; जिन्हें लोग अपना रहे हैं लेकिन कृषि में जरूरी कामों के लिए इस्तेमाल होने वाली तकनीक का अभाव है ।&nbsp; कुछ लोग जरूर&nbsp; इस तरह की तकनीक को विकसित करने की दिशा में कदम बढ़ा रहें हैं।&nbsp; लेकिन अधिकतर वह तकनीक मोबाइल एप्लीकेशन और सॉफ्टवेयर पर आधारित है । अगर&nbsp;&nbsp; वास्तविक मशीन और हार्डवेयर प्रक्रिया के दृष्टिकोण से देखा जाय तो अभी इस एरिया में&nbsp; ज्यादा काम नहीं हुए हैं।&nbsp; इसलिए हमने&nbsp; इस&nbsp; क्षेत्र मे प्रवेश करने की कोशिश की है। और हमने जो तकनीक बनाई है, वह केवल सॉफ्टवेयर नहीं बल्कि एक हार्डवेयर यूनिट है जिसके पास मशीन जैसे काम करने की क्षमता है औऱ&nbsp; सेल्फ लर्निग की क्षमता है।&nbsp;&nbsp; हमने कोशिश की कि इसका इस्तेमाल वहां हो सके जहां कृषि मे इसकी आवश्यकता है ।&nbsp; इस तकनीक का सबसे ज्यादा फायदा किसान को मिलता है। अगर मौजूदा परिस्थिति की बात करें तो उद्योग किसानों को उत्पादक की तरह देखती हैं जहां किसान बीज कंपनियों के लिए बीज का उत्पादन करते हैं। इस तरह से किसान बीज उपजाकर बीज कंपनियों को बीज की आपूर्ति करते हैं। &nbsp;&nbsp;मगर यहां जो गंभीर समस्या है वह है भुगतान की जो समूची प्रणाली में सुचारू रूप से&nbsp; काम नहीं कर रही है जिसमे कई कमियां है। इस एरिया में ज्यादा असंतोष है । जहां किसानों को लगता है की उन्हें उनके बीज का सही दाम नही मिल रहा है&nbsp; वहीं कंपनियों के मन में यह डर&nbsp; बना रहता है कि उपजाए गये बीजों की क्वालिटी उम्मीद के अनुसार नहीं रहती&nbsp; है । ज्यादतर बीज कम्पनियां अंकुरण के समय कुछ तौर -तरीको का पालन करती हैं ।&nbsp; उदाहरण के तौर पर लिया जाय तो बीज अंकुरण&nbsp; परीक्षण में&nbsp; दो से तीन सप्ताह का समय लगता है ।&nbsp; कई बार पौध के उगने के बाद कंपनी उसका परिणाम देखती है । बीज परीक्षण के लिए अपनाया गया यह एक पारंपरिक तरीका है जिसे कंपनियों द्वारा अपनाया जाता है। किसानों को बीज का भुगतान परीक्षण प्रक्रिया के बाद ही मिलता है। लेकिन कभी- कभी बीज परीक्षण में 4-5 महीने का लंबा समय लग जाता है। किसानों के लिए एक और चुनौती यह है कि परीक्षण का&nbsp; डेटा सार्वजनिक नहीं किया जाता&nbsp; है ।&nbsp; बीजों की विभिन्न गुणवत्ता होती है । जैसे&nbsp; अगर&nbsp;&nbsp; कुछ बीज&nbsp; 80 प्रतिशत गुणवत्ता वाले हैं तो इसके तुलना में&nbsp; 90 प्रतिशत गुणवत्ता वाले&nbsp; बीज&nbsp; का दाम लगभग दोगुना हो जाएगा और 95 प्रतिशत गुणवत्ता वाले&nbsp; बीज&nbsp; के दाम&nbsp; और&nbsp; अधिक होंगे। वहीं, कभी-कभी ऐसा होता है कि भले ही किसानों को लगता है कि उन्होंने 95 प्रतिशत गुणवत्ता वाले बीजो का उत्पादन किया है, लेकिन उन्हे केवल 85 प्रतिशत गुणवत्ता वाले&nbsp; बीजों का भुगतान किया जा रहा है ।दूसरी ओर, बीज कंपनियों को लगता है कि 95 प्रतिशत गुणवत्ता बीज का उत्पादन संभव नहीं है। इसलिए केवल 85 प्रतिशत गुणवत्ता बीज के लिए भुगतान करते हैं ।&nbsp; यहां भले ही दोनों की मंशा एक- दूसरे को धोखा देने ने की न हो , लेकिन दुर्भाग्य से सिस्टम इस तरह से बनाया गया है। इसलिए हमने सोचा क्यों न इसका मानकीकरण किया जाए ? हमने ऐसी प्रणाली लाने की कोशिश की जहां बीज की गुणवत्ता के प्रतिशत का आसानी से आकलन किया जा सके।</p>
<p>सवाल: &nbsp;तो सीधे तौर पर कहा जाय तो आपने&nbsp; स़ॉफ्टवेयर का उपयोग कर &nbsp;हॉर्डवेयर यूनिट विकसित की जो बीजों की गुणवत्ता का सही आकलन कर सके और आर्टिफिसियल इन्टेलिजेंस की मदद से&nbsp; किसान और बीज कंपनियां उचित मूल्य निर्धारण कर&nbsp; सकेंगी।&nbsp; यह तकनीक कैसे काम करती है ?</p>
<p>जवाब : बीज परीक्षण में नमूना का एक आकार है जिसे लिया जाता है जिसका निर्धारण&nbsp; बहुत पहले से ही सरकारी विभाग औऱ अधिकारियों द्वारा ही तय किया जाता है। यह बीज परीक्षण नमूना आकार,आमतौर पर उपज का दसवां हिस्सा होता है।&nbsp; इसे परीक्षण के लिए भेजा जाता है। इसके लिए कुछ मानक निर्धारित हैं। इस लाट के बीज को परीक्षण के लिए मशीन में ऱखा जाता है। मशीन में कन्वेयर सिस्टम होता है जो बीज को इमेजिंग सेक्शन से लेकर जाता है । यह सबसे जटिल सेक्शन है क्योंकि यह मल्टी स्पेक्ट्रम एलीमीनेशन तकनीक पर आधारित है । मैं यहां अपने ही एक आईपी का इस्तेमाल करता हूं ।&nbsp; मेरे पास इस क्षेत्र में अनुभव&nbsp; है क्योंकि मैंने एलईडी के क्षेत्र में 12 साल तक काम किया है । इसलिए मुझे पता है कि प्रकाश और उसके विभिन्न स्पेक्ट्रा कैसे व्यवहार करते हैं। एक बार जब कन्वेयर सिस्टम बीज को प्रकाश कक्ष के माध्यम से ले जाता है, तो इमेजिंग केंद्र बीज के विभिन्न मापदंडों को पकड़ते हैं और वितरित करते हैं। इस प्रकार बीज की आनुवांशिक विविधता की पहचान की जाती है। हजारों बीजों के आकलन के लिए, लगभग 10 घंटे का समय लगता है । इस तरह हम कह सकते हैं कि तीन महीने की समयावधि में&nbsp; बड़ी कटौती कर इस कार्य को&nbsp; कुछ घंटों मे पूरा किया जा सकता है ।</p>
<p>सवाल : ऐसी कौन- कौन&nbsp; सी फसलें हैं जिनके बीज की गुणवत्ता का आकलन अगधी कर रही है?</p>
<p>जवाब: भारत कपास बीज का सबसे बड़ा उत्पादक है। इस बीज का आकलन हमारी टेक्नोलॉजी कर रही है । इसके अलावा धान,&nbsp; मिर्च&nbsp; और अन्य करीब दर्जन भर फसलों के बीज का आंकलन हम कर सकते हैं । तरबूज के बीज का आकलन करने वाले मशीन को हम जल्द ही लांच करेंगे इनके अलावा और तीन प्रकार के बीजों के लिए हम अपना प्रॉडक्ट जल्द ही बाजार में लाएंगे। हम&nbsp; कोशिश कर रहे&nbsp; हैं कि ,जिन बीजों की अधिक माँग है&nbsp; उनका मूल्यांकन हमारी मशीनों द्वारा हो सके ।</p>
<p>सवाल : आपने अपना पहला प्रॉडक्ट&nbsp; किस बीज के लिए और कब लॉन्च किया था ? आपके कस्टमर किस तरह के हैं?</p>
<p>जवाब : हमारा पहला प्रॉडक्ट इस&nbsp; साल मार्च में लॉन्च हुआ था, जो तीन तरह के बीजों का आंकलन करने में सक्षम है। इसी साल के दिसंबर तक 12 किस्मों के बीजों का आकलन कर सकने वाले हमारे प्रॉडक्ट पाइपलाइन में हैं। बीज उत्पादन करने वाली कंपनियां हमारे मुख्य ग्राहक हैं और फिर सरकारी एजेंसियां ​​हैं जो किसानों को बीज उपल्बध करवाती हैं। इसके अलावा, डीलर&nbsp; और डिस्ट्रीब्यूटर द्वारा संचालित ग्रोहाउस भी हमारे ग्राहक&nbsp; हैं ।</p>
<p>सवाल : क्या आप उन कंपनियों और सरकारी एजेंसियों के नामों के बारे में बताएंगे&nbsp; जिनके साथ आपकी कम्पनी का टाईअप्स हैं।</p>
<p>जवाब: मैं आपको सरकारी एजेंसियों के नाम बता सकता हूं। मगर प्राइवेट कंपनियां अपना नाम सार्वजिक नही करना चाहती है। हम कर्नाटक में &nbsp;गांधी कृषि विज्ञान केंद्र (जीकेवीके) कृषि महाविद्यालय के साथ काम करते हैं और हमारा केंद्रीय कपास अनुसंधान संस्थान नागपुर (CICR) &nbsp;के साथ भी काम चल रहा है। तिरुवनंतपुरम स्थित केरल कृषि विश्वविद्यालय के साथ भी हम काम कर रहे हैं।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>सवाल : क्या आपका&nbsp; इस क्षेत्र में कोई प्रतियोगी है जिसके पास आपके समान तकनीक है?</p>
<p>जवाब: अगर आप विश्व स्तर पर देखें, तो इस तकनीक पर दो कंपनियां काम कर रही हैं ,सीड-एक्स और वीडियोमीटर । लेकिन भारत में ऐसी कोई कंपनी नहीं है।</p>
<p>सवाल : आप अब से एक साल बाद अपनी कंपनी को कहां देखते हैं?</p>
<p>जवाब: बीज के गुणवत्ता विश्लेषण के लिए हम कुछ मल्टीनेशनल कंपनियों&nbsp; के&nbsp; साथ दुनिया के 22 अलग-अलग क्षेत्रों मे काम कर रहे हैं । उनमें से एक &ldquo;बेयर&rdquo; भी है । इसके साथ ही हम&nbsp; कुछ भारतीय कंपनियों के साथ भी काम कर रहे हैं और इनमे से दो कंपनियों पर हमने अपनी मशीन स्थापित भी कर दी है । अगले साल तक हम 10-12 प्रतिष्ठानों मे मशीन&nbsp; स्थापित करने का लक्ष्य&nbsp; बना रहे हैं ।हमारी कोशिश है कि हम अधिक से अधिक&nbsp; डेटा इकट्ठा करे&nbsp; ताकि हमें सुधार करने में मदद मिल सके । अगले साल से हम वैश्विक बाजार में अपने संस्थान का विस्तार करने की कोशिश करेंगे । अभी, हम मुख्य तौर पर भारतीय बीज की किस्मों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं ।</p>
<p>सवाल : क्या आपको किसी फंड या वेंचर कैपिटलिस्ट (वीसी) से कोई निवेश मिला है?</p>
<p>जवाब: फिलहाल यह एक बूटस्ट्रैप हैं लेकिन हम कुछ वेंचर कैपिटलिस्ट&nbsp; के साथ संपर्क मे हैं।</p>
<p>सवाल : आपने "फार्मर कनेक्ट" &nbsp;के बारे में उल्लेख किया है। यह क्या है?</p>
<p>जवाब: हम एक ऐसा ऐप बनाने&nbsp; की कोशिश कर रहे हैं जिसकी मदद से&nbsp; किसान को पूरी फसल उत्पादन प्रक्रिया की सही जानकारी मिल सके जैसे बीज की खरीद । वह इससे जुड़े खर्चों पर नजर रख सकेगा&nbsp; । इसी प्रकार, वह ऐप फसल के विकास की पूरी प्रक्रिया पर भी नजर रख सकेगा । अगर उसे&nbsp; कुछ बीमारी या फसल में असामान्य दिखता है वह इस ऐप के माध्यम से सही समय पर कंपनी&nbsp; से संपर्क कर सकेगा।</p>
<p>सवाल: फसलों मे विभिन्न रोगो और&nbsp; कीटों&nbsp; की पहचान करने के लिए, आपको एक पादप रोग विशेषज्ञ या पौध सुऱक्षा वैज्ञानिक की आवश्यकता होगी । क्या आपकी टीम में&nbsp; ऐसे विशेषज्ञ हैं?</p>
<p>जबाव : हां, हमारे पास एक टीम है ऐसे सहयोगी भी है । हमने हाल ही में "फार्मर कनेक्ट" में "एक्सपर्ट सेक्शन" बनाया है। हमारे इस ऐप के माध्यम से किसान कृषि विशेषज्ञ से सम्पर्क कर सलाह ले&nbsp; सकते जिस तरह एक रोगी अपने डॉक्टर से&nbsp; संपर्क करता है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p><span>&nbsp;</span></p>
<p><span>&nbsp;</span></p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ अगधी ने आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस टेक्नोलॉजी के जरिये बीज की गुणवत्ता के सटीक आकलन को संभव किया है: निखिल दास ]]></media:description>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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    <item>
        <title><![CDATA[सरकार जितनी सख्ती करेगी, किसान आंदोलन उतना मजबूत होगा: जयंत चौधरी]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/RLD-Jayant-Chaudhary-Interview.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Sat, 06 Feb 2021 13:53:54 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/RLD-Jayant-Chaudhary-Interview.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p><span>किसान आंदोलन में राष्ट्रीय लोक दल ने सक्रिय भागीदारी शुरू कर दी है। लोक दल पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान पंचायत कर रहा है। इसी कड़ी में सर्वाधिक किसान भागीदारी वाली पंचायत पांच फरवरी को शामली जिले के भैंसवाल गांव में हुई</span>,<span> जिसमें करीब 20 हजार किसान शामिल हुए। इस पंचायत को <strong>राष्ट्रीय लोक दल</strong> उपाध्यक्ष <strong>जयंत चौधरी</strong> ने संबोधित किया। पंचायत के तुरंत बाद किसान आंदोलन को लेकर <strong>जयंत चौधरी</strong> ने रुरल वॉयस के एडिटर-इन-चीफ <strong>हरवीर सिंह</strong> के साथ यह बातचीत की</span></p>
<p><strong>सवाल - आपको क्या लगता है कि आंदोलन किस दिशा में जा रहा है</strong><strong>?</strong> <strong>क्या सरकार तीन कृषि कानूनों को वापस लेगी</strong><strong>?</strong></p>
<p>सरकार का माइंडसेट तो नहीं लगता है कि वह इन कानूनों को वापस लेगी।&nbsp;</p>
<p><strong>सवाल - आंदोलन कर रहे किसानों के साथ ही कुछ दूसरे लोगों पर भी कई तरह के केस दर्ज किये जा रहे हैं</strong><strong>?</strong><strong> उनका क्या असर होगा</strong><strong>?<span> यह सरकार की सोची समझी रणनीति है या सरकार अति आत्मविश्वास की शिकार है</span>?</strong></p>
<p>मेरा मानना है कि सरकार जो कदम उठा रही है वह देश की छवि पर प्रतिकूल असर डालेंगे। दुनिया भर में लोग जो लोग इंडिया स्टोरी से प्रभावित हैं,<span> उनको इससे सकारात्मक संदेश नहीं मिल रहा है। न ही निवेशकों में इस तरह के कदमों से सही संदेश जा रहा है। भारत की छवि एक साफ्ट पॉवर की रही है। कल्चरल पावर की रही है। दुनिया भर में लोग इस वजह से हमें प्यार करते हैं और हमारे लोगों को चाहते हैं। लेकिन सरकार के कदमों से निगेटिव मैसेज जा रहा है।</span></p>
<p><span> सरकार इसके लिए किसानों को दोषी ठहरा रही है। लेकिन यह सही नहीं है, क्योंकि बदनामी आप खुद कर रहे हैं। इससे इंडिया की सॉफ्ट पावर की छवि को नुकसान हो रहा है। असल में भाजपा और उसके नेता एक इलेक्शन विनिंग मशीन बन चुके हैं। वह किसी की नहीं सुनते हैं और सरकार को किसी की परवाह नहीं है। इससे निवेशकों पर भी प्रतिकूल असर हो रहा है। सरकार विरोध और आंदोलनों को दबाने के लिए चीन और रूस की तरह लोगों पर सख्ती बरत रही है</span>,<span> जो लोकतांत्रिक मूल्यों के हित में नहीं है। </span></p>
<p><strong>सवाल - लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार के फैसले लोगों की मांग पर वापिस भी होते रहे हैं</strong><strong>? </strong><strong>सांसद रहने के नाते आपका अनुभव क्या कहता है</strong><strong>? </strong><strong>&nbsp;</strong></p>
<p>देखिये सरकार ने ऐसा पहले भी किया है। मैं इसका एक मजबूत उदाहरण देना चाहूंगा। यूपीए सरकार 2009 में गन्ने के एफआरपी पर इसी तरह कानून लेकर आई थी। शरद पवार जी कृषि मंत्री थे। हमने इसका विरोध किया। हमने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया,<span> जिसमें करीब 25 से 30 हजार गन्ना किसान शामिल हुए थे। इस प्रदर्शन में हमने बीजेपी को भी बुलाया था और आडवाणी जी उस मंच पर आये थे। यह हाल के बिलों की कृषि बिलों की तरह का ही मामला था। सरकार ने अध्यादेश जारी कर संसद में बिल पेश कर दिया था। उसमें भी राज्यों के गन्ना मूल्य तय करने के अधिकार को समाप्त कर दिया गया था। सरकार ने बिल में संशोधन किया और बाद में इसे वापिस ले लिया था। सिर्फ तीन घंटे की इस रैली से सरकार को अहसास हो गया था और बिल वापिस हो गया था क्योंकि समझ आ गया कि लोग इसके खिलाफ हैं। ऐसे में आप बताइये कि वह सरकार मजबूत थी या यह सरकार मजबूत है।</span></p>
<p><strong>सवाल- आपको लगता है कि यूपीए की सरकार मजबूत थी</strong><strong>? </strong></p>
<p>क्योंकि वह अपनी जवाबदेही समझती थी और उसने मुद्दे को समझकर तुरंत उस पर कदम उठाया। डेमोक्रेसी में वही सरकार मजबूत होती है जो लोगों की सुनें। यह इग्नोरेंट सरकार है जिसे किसी की परवाह नहीं है। यह सरकार कूकून में रह रही है जो केवल खुद में सिमट गई है। लेकिन लोकतंत्र में इस तरह रवैया ठीक नहीं होता है। आप देखिये, अजय हुड्डा ( इस इंटरव्यू के दौरान साथ में बैठे गायक अजय हुड्डा का एक गाना किसानों में बहुत लोकप्रिय हो रहा है) जैसे लोगों को लोग क्यों सुनते हैं? क्योंकि यह लोगों के मन की बात कर रहे हैं। इसने लोगों के साथ भावनात्मक रिश्ता जोड़ लिया है। सरकार को देखना चाहिए कि लोग क्या चाहते हैं। सरकार को भी समझना चाहिए कि अंडरकरंट क्या है।</p>
<p><strong>सवाल- यह विवाद कैसे खत्म होगा</strong><strong>?</strong> <strong>किसान आंदोलन को 70 दिनों से ज्यादा हो चुके हैं।</strong></p>
<p>सरकार लोगों को थका देना चाहती है। वह सख्ती कर रही है और सोचती है कि लोग वापस चले जाएंगे। सरकार इन लोगों की भावनाओं को नहीं समझ रही है। जो लोग आंदोलन स्थलों पर बैठे हैं,<span> सरकार उनके और जिन क्षेत्रों से वह आते हैं</span>,<span> उनके स्वभाव को नहीं समझती है। आप जितना इन लोगों पर सख्ती करेंगे, जितने केस लगाएंगे वह उतना ही नाराज होंगे। वह वापस नहीं आएंगे बल्कि और ज्यादा संख्या में पहुंचेंगे।</span></p>
<p><strong>सवाल - 26 जनवरी को आंदोलन में एक नया मोड़ आया। उस दिन जो हिंसक घटनाएं हुई, उससे किसान आंदोलन की बदनामी हुई। इसके चलते 28 जनवरी को लग रहा था कि आंदोलन खत्म हो जाएगा। लेकिन 28 जनवरी को चार बजे से 10 बजे के बीच छह घंटों में गाजीपुर बॉर्डर पर जो कुछ हुआ</strong><strong>,<span> उससे सब कुछ बदल गया। राष्ट्रीय लोक दल अध्यक्ष अजित सिंह ने राकेश टिकैत को फोन किया और आपने उसे ट्विट किया। क्या इससे साफ नहीं होता कि आंदोलन को सीधे राजनीतिक समर्थन शुरू हो गया</span></strong><strong>?</strong></p>
<p>किसानों का मुद्दा &nbsp;जायज है और ग्रासरुट से जुड़ा मुद्दा है। अगर लोग उम्मीद खो देंगे तो आंदोलन नहीं चलेगा। उम्मीद में ही यह टिकेगा। राजनीतिक दल होने के नाते हमारी जवाबदेही है। राजनीतिक दल के नाते हम यह बताना चाहता हैं कि दूसरा रास्ता भी है। वह आज नहीं सुन रहे हैं। उन्हें लोगों के सामाजिक और राजनीतिक समर्थन को देखना चाहिए। राजनीतिक कदम लोगों की उम्मीदों को बरकरार रखने और नाराजगी को सुलझाने का तरीका है। पहले भी मैं आंदोलन स्थल पर गया था और लंगर में हिस्सा लिया। पहले हम उसमें शामिल नहीं हो सकते थे क्योंकि आंदोलन की भावना यही थी। लेकिन अब स्थिति बदल गई है। यह समाधान ढ़ूंढ़ने की राजनीतिक पहल है।</p>
<p><strong>सवाल- इसका मतलब है कि अब राजनीतिक दल इस आंदोलन को सीधा सपोर्ट कर रहे हैं</strong><strong>?</strong></p>
<p>हां, मैं मुजफ्फरनगर पंचायत में गया था। उसके बाद हमने किसान पंचायत बुलाना शुरू कर दिया। हमने बड़ौत में पंचायत की,<span> मथुरा में की। हमने आज भैंसवाल की इस किसान पंचायत का आयोजन किया। हम कह रहे हैं कि अगर आप आना चाहतें हैं, खाप प्रमुख आना चाहते हैं तो आपके लिए मंच है। हम इनका आयोजन कर रहे हैं और यह हमारा राजनीतिक अभियान है। हम लगातार 18 फरवरी तक पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान में करीब एक दर्जन किसान पंचायत कर रहे हैं। बाकी दलों के लिए शायद यह व्यवहारिक न हो। एक वजह भी है कि हरियाणा में किसान आंदोलन में कांग्रेस और अकाली दल दोनों के समर्थक आये हुए हैं। वहां कुछ अलग स्थिति है जो यूपी में नहीं है। आंदोलन करने वालों को समझना चाहिए कि राजनीतिक दलों को नहीं बुलाकर वह गलती कर रहे हैं। उन्हें यह नहीं सोचना चाहिए कि राजनेता उनके आंदोलन पर नियंत्रण कर लेंगे। लोकतंत्र में समस्या का हल राजनीतिक प्रक्रिया में ही होता है।</span></p>
<p><strong>सवाल- लेकिन क्या आरएलडी सरकार विरोधी लहर के सहारे अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत कर रही है</strong><strong>?</strong></p>
<p>हमने एक पूरा शेड्यूल बनाया है अपनी बैठकों का। भाजपा को समझना चाहिये कि इसका उसे नुकसान होगा। जाहिर है हमें इसका फायदा होगा। हम आंदोलन को मजबूत करने में मदद कर रहे हैं।</p>
<p><strong>सवाल- राकेश टिकैत कहते हैं कि राजनीतिक दलों को आंदोलन का फायदा वोट बटोरने के लिए नहीं उठाना चाहिए</strong><strong>?</strong></p>
<p>वह अपनी जगह ठीक हैं। उनकी तरफ से कहना ठीक है। इसलिए हम अपने प्लेटफार्म पर किसान पंचायतें कर रहे हैं।</p>
<p><strong>सवाल-अगले साल यूपी में चुनाव हैं। आप सपा के साथ मिलकर जाट- मुस्लिम वोट बैंक का फायदा उठायेंगे</strong><strong>?</strong><strong> कहा जा रहा है कि जाटों का आंदोलन है।</strong></p>
<p>यह लीडरशिप की बात है। हर आंदोलन की लीडरशिप होती है यहां वह लीड कर रहे हैं। लेकिन ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि यह केवल जाटों का आंदोलन है। यह किसानों का आंदोलन है। इस बेल्ट में गन्ना मुख्य फसल है इसलिए मैंने आज गन्ना मूल्य और बकाया का मुद्दा उठाया। सरकार ने दाम नहीं तय किया गया। बकाया भुगतान 14 हजार करोड़ रुपये पर पहुंच गया है। यह सभी किसानों का मुद्दा है। आंदोलन में कोई एक जाति नहीं,<span> बल्कि सभी किसान शामिल हैं।</span></p>
<p>&nbsp;</p>
<p>&nbsp;</p> ]]></description>

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	<media:description type='plain'><![CDATA[ सरकार जितनी सख्ती करेगी, किसान आंदोलन उतना मजबूत होगा: जयंत चौधरी ]]></media:description>
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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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        <title><![CDATA[कृषि  के ट्रांसफोर्मेशन के लिए लाये गये  नये कानून:  प्रोफेसर रमेश चंद]]></title>
        <link><![CDATA[https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/interview-of-niti-aayog-member-ramesh-chand-on-new-agri-laws.html]]></link>
		<pubDate><![CDATA[ Tue, 22 Dec 2020 10:21:09 GMT]]></pubDate>
		<category>rural-dialogue</category>		
        <guid>https://www.ruralvoice.in/rural-dialogue/interview-of-niti-aayog-member-ramesh-chand-on-new-agri-laws.html</guid>
        <description><![CDATA[ <p>देश में कृषि क्षेत्र की नीतियों और उसके आर्थिक पहलुओं पर पकड़ रखने वाले देश और वैश्विक स्तर पर बड़े विशेषज्ञों में <strong>प्रोफेसर रमेश चंद</strong> शुमार होते हैं। केंद्र की मौजूदा एनडीए सरकार की कृषि नीतियों को तैयार करने और इस क्षेत्र से जुड़े फैसलों में उनकी अहम भूमिका रही है। सरकार की नीतिगत मामलों पर काम करने वाली संस्था नीति आयोग के सदस्य (कृषि) होने के साथ ही वह 15वें वित्त आयोग के सदस्य भी हैं। आजकल देश में चर्चा और विमर्श के केंद्र में &nbsp;कृषि और उससे जुड़े सरकार द्वारा लाये गये तीन नये कानून हैं। कृषि क्षेत्र के भावी रोडमैप, नये कृषि कानूनों और तमाम दूसरे मुद्दों पर रुरल वॉयस ने प्रोफेसर रमेश चंद के साथ उनके नीति आयोग के कार्यालय में लंबी बातचीत की।<strong> रुरल वॉयस </strong>के लांचिंग संस्करण के लिए संपादक<strong> हरवीर सिंह </strong>के साथ <strong>प्रोफेसर रमेश चंद </strong>की &nbsp;बातचीत के मुख्य अंश।</p>
<p><strong>सवाल- देश के मौजूदा आर्थिक परिदृष्य में एक नये तरीके के नीतिगत बदलाव की जरूरत है। 23 दिसंबर को पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह का जन्मदिन है जिसे किसान दिवस के रूप में मनाया जाता है। रुरल वॉयस की शुरुआत के लिए उनके जन्मदिन&nbsp; को चुना गया है। इस मौके पर मैं आपसे जानना चाहता हूं कि खेती किसानी और किसान को केंद्र में रखकर देश की आर्थिक नीतियां बनाने की &nbsp;चौधरी चरण सिंह की आर्थिक सोच और विचार आज के संदर्भ में कितने प्रासंगिक हैं। जिसमें नीतियां और कानूनी दोनों तरह के बदलाव शामिल हैं।</strong></p>
<p>उत्तर- हरवीर जी मुझे इस बात की खुशी है कि हम यह बातचीत चौधरी चरण सिंह के जन्मदिन के मौके पर कर रहे हैं। मुझे उनको सुनने का दो बार मौका मिला। जब मैं इंडियन एग्रीकल्चर इंस्टीट्यूट में पोस्ट ग्रेजुएट स्टूडेंट यूनियन का पदाधिकारी था तो उनको हमने अपने इंस्टीट्यूट में बुलाया था। मैं उनकी एक बात से बहुत प्रभावित हुआ जो अभी तक मेरे दिल में बैठी हुई है। जिसमें उन्होंने शहरी और ग्रामीण क्षेत्र के अंतर को समझाया। जिसे आजकल के अर्थशास्त्री इकोनामिक डिस्पेरिटी कहते हैं। उस पर उन्होंने एस शहरी स्टूडेंट के सवाल का जवाब देते हु कहा था कि फर्क यह है कि आपकी दादियां भी पढ़ी लिखी हैं और हमारी पोतियां भी अपनढ़ हैं। इकोनामिक डिस्पेरिटी की गूढ़ बात को उन्होंने इतने सरल तरीके से समझाया। यह मुश्किल आर्थिक मसलों पर उनकी पकड़ रखने की क्षमता और ग्रास रूट की समझ को साबित करता है। मैंने लोगों से यह भी सुना है कि वह कहते थे कि किसान तेरी एक आंख हल पर और एक आंख दिल्ली पर रहनी चाहिए। दिल्ली का उनका यह मतलब नहीं था कि दिल्ली शहर पर या यहां की चकाचौंध पर, मैं इसे ऐसे देखता हूं कि दिल्ली से उनका &nbsp;मतलब था दिल्ली में कृषि से जुड़ी जो नीतियां बनती हैं उन पर किसान की नजर रहनी चाहिए। आज के संदर्भ में उनके विचार की जो प्रासंगिकता है उसे में उस मामले में बहुत अहम मानता हूं जब कुछ लोग कृषि को सोशलिस्ट मॉडल की ओर ले जाने की कोशिश करते हैं। यह रोमांटिसिज्म देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को भी था। उस समय चौधरी साहब ने ज्वाइंट फार्मिंग एक्स-रे बुक लिखी थी उसमें उन्होंने कहा था कि जिस तरह का कलेक्टिव फार्मिंग सिस्टम, कम्यून सिस्टम रूस और चीन में चल सकता है वह भारत में नहीं चल सकता। सबसे बड़ा उनका संदेश तो मैं आज के संदर्भ में यही कहूंगा कि उनका यह कहना कि सोशलिस्ट माडल को भारतीयता का जो माडल है जिसें किसान का जमीन से प्यार है उसमें उसे न लाएं और यहां की परिस्थिति को देखकर ही नीतियां बनाएं। हमारा वेस्टर्न माडल से एशिया का माडल अलग है। यहां बड़े फार्म को छोटे फार्म ने हजम नहीं किया है। &nbsp;भारतीय मॉडल में किसानों की छोटी जोत है लेकिन उसका जमीन से बहुत लगाव है इसलिए यहां पर नीतियां इन किसानों की परिस्थिति को ही ध्यान में रखकर खुले मन से फैसला लेकर बनें। इसे मैं एशियन मॉडल भी कहता हूं। &nbsp;हमारे यहां &nbsp;वेस्टर्न माडल नहीं चलता है क्योंकि यहां किसान खुद खेती करना चाहता है। <span style="text-decoration: line-through;">&nbsp;</span><span style="text-decoration: line-through;"></span></p>
<p><strong>सवाल- इस समय देश की अर्थव्यवस्था रिसेसन में है। आरबीआई समेत अधिकांश एजेंसियां इस साल देश की जीडीपी के 7.5 &nbsp;से 10 फीसदी तक कांट्रैक्ट होने के अनुमान लगा रही है। लेकिन कृषि और सहयोगी क्षेत्रों की विकास दर पाजिटिव बनी हुई है । कृषि को ब्राइट स्पॉट कहा जा रहा है। आपके हिसाब से यह कितना ब्राइट है।</strong></p>
<p>जवाब- यदि मैं आंकड़ों में बताऊं तो चालू साल में इकोनॉमी को 7.5&nbsp; &nbsp;से दस फीसदी गिरावट रहने की बात है। अगर कृषि का भी दूसरे क्षेत्रों जैसा हाल हो जाता तो गिरावट में करीब एक फीसदी की अतिरिक्त बढ़ोतरी हो जाती। लेकिन उसमें यह भी नहीं कहना चाहिए कि कृषि पर कोविड असर नहीं डालता ऐसा भी नहीं है। सरकार ने कृषि के कामकाज को जारी रखने की अनुमति दी और मैंने इस मसले पर सरकार को राय दी कि कृषि को लॉकडाउन के प्रतिबंधों से बाहर रखना है क्योंकि व्यवहारिक रूप से कृषि में यह संभव नहीं है। इसलिए तीन दिन के अंदर ही राज्यों को निर्देश जारी हो गये थे कि कृषि क्षेत्र के कामकाज को नहीं रोका जाए। साथ ही कृषि के काम की प्रकृति है कि वहां लोगों के बीच कामकाज के दौरान दूरी रखी जा सकती है। सरकारी खरीद के दौरान मंडियों में भी यह संभव हो सका। इसलिए कृषि के बेहतर प्रदर्शन से इकोनामी को बड़ा सहारा मिला।</p>
<p><strong>&nbsp;</strong><strong>सवाल- ग्रीन रिवोल्यूशन के समय में हम डिफिसिट से जूझ रहे थे। लेकिन अब कुछ खाद्य तेल जैसे उत्पादों को छोड़ दें तो हम सरप्लस की स्थिति में आ गये हैं। अब तो दालों में भी आत्मनिर्भर हो गये हैं। ऐसे में क्या समय आ गया है कि सरकार का कृषि नीति का फोकस प्राइस सपोर्ट की बजाय इनकम सपोर्ट होना चाहिए।</strong></p>
<p>जवाब- मैं इसको दो तरीके से लेता हूं। दोनों के अपने-अपने फायदे हैं अपनी सीमाएं हैं। प्राइस पालिसी से आप फसल को टारगेट कर सकते हो। अगर आप फसल पैटर्न बदलने की जरूरत मानते हैं तो यह इकोलाजिकल, नेचुरल और इकोनामिक दोनों फैक्टर हो सकते हैं। अगर चावल को मानते हैं ज्यादा पानी वाली फसल है तो इसे आप प्राइस पालिसी से चेंज कर सकते हो। इनकम सपोर्ट से नहीं।प्राइस पालिसी को आप व्यक्तिगत आत्रप्न्योरशिप या एक्टिविटी पर टारगेट कर सकते हैं। जो इन्कम सपोर्ट है वह क्राप न्यूट्रल होता है। इकोनामिक एक्टिविटी न्यूट्रल होता है। जैसे अभी किसानों को छह हजार रुपये दे रहे हैं। यह क्राप न्यूट्रल होता है। इससे आप किसी फसल को कंट्रोल नहीं कर सकते जिसकी जरूरत कम है और उत्पादन ज्यादा हो रहा है जैसे चीनी के मामले में। इनकम सपोर्ट उसी को मिलती है जिसे आप देते हो यह यूनिवर्सल नहीं है। प्राइस पालिसी से आप समाज के दूसरे वर्ग का फायदा भी देख सकते हैं। उपभोक्ता का भी ध्यान रख सकते हो। यह ताकत प्राइस पालिसी में है। इसके सकारात्मक फायदा हो सकते हैं। &nbsp;रियायती कीमत पर लोगों को खाद्यान्न दे सकते हैं। मेरा मानना है कि किसी देश का शार्टेज से सरप्लस हो जाना इसे जस्टिफाई नहीं करता है कि प्राइस पालिसी को छोड़कर इनकम पालिसी पर चले जाएं। बेहतर यही होगा आप दोनों के मिक्स को लेकर चलें। &nbsp;&nbsp;&nbsp;</p>
<p><strong>सवाल -&nbsp; एमएसपी को लेकर बहुत डिबेट हो रही है। केवल 23 फसलों का एमएसपी तय होता है जबकि खरीद आधा दर्जन फसलों की हो पाती है। वहीं अब तो दूध और पॉल्ट्री जैसे उत्पादों की भी बाजार का संकट पैदा होने की स्थिति आ गई है। ऐसे में एमएसपी को लेकर क्या नीति होनी चाहिए।</strong></p>
<p>जवाब- एमएसपी की नीति पर सबसे पहले हमें इसके आरिजिन में जाना चाहिए कि हमें एमएसपी की सरकार से लेने की जरूरत क्यों पड़ती है। इसकी वजह यह है कि किसान को बाजार में वाजिब दाम नहीं मिलती तब उसका ध्यान सरकार की ओर जाता है की हमें स<span style="text-decoration: line-through;">र</span>ही दाम मिलना चाहिए। इसका उपाय प्रतिस्पर्धा है। जिसमें सरकार, सहकारी, निजी और किसानों के संगठन सब मिलकर आपरेट करें। प्रतिस्पर्धा ही दीर्घकालिक टिकाऊ माडल है। लेकिन फिर भी ओपन मार्केट प्राइस से किसान बेहतर आय नहीं मिलती तो उस स्थिति में मार्केट इंटरवेंशन और एमएसपी की तरफ जाना पड़ता है। हमें इसके तरीके खोजने हैं जिसमें राज्यों की भी भूमिका हो। नेशनल इंपोर्टेंस की कौन सी फसलें हैं यह करना होगा। अमेरिका और दूसरे देशों में चार से पांच फसलों को नेशनल इंपोर्टेंस की फसलें माना जाता है। जिसमें केंद्र की जिम्मेदारी होनी चाहिए। इसे लागू करने का जिम्मा राज्यों को निभाना चाहिए। राज्यों के स्तर पर क्या जरूरी है इस मामले में केंद्र और राज्य को मिलकर काम करना चाहिए। साथ ही पीडीएस सिस्सटम और और गैर पीडीएस सिस्टम की जरूरत के मामले में नये तरीके खोजने होंगे। उसमें किसान को मदद दी जा सके। ऐसे में जहां जरूरत हो वहां सरकार को किसानों की मांग को समझकर मदद करनी चाहिए क्योंकि सभी मामलों में अगर खरीद&nbsp; होगी तो उसके फिस्कल लागत बहुत ज्यादा हो जाती है तो व्यवहारिक नहीं है।</p>
<p><strong>सवाल- फसलों के एमएसपी को लागत के 50 फीसदी मुनाफे के साथ तय करने का वादा सरकार ने किया था।&nbsp; उसे ए-2 प्लस एफएल के आधार पर 50 फीसदी मुनाफे के साथ तय किया जा रहा है। लेकिन किसान संगठनों का कहना है कि इसे सी-2 पर 50 फीसदी मुनाफा के साथ तय करने की सिफारिश एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता वाले किसान आयोग ने की थी। क्या यह संभव है। अगर नहीं तो इसके व्यवहारिक कारण क्या हैं।</strong></p>
<p>जवाब- हमें एमएसपी को किसी सिंगल फैक्टर से नहीं बांधना चाहिए। इसे ए2प्लस एफएल या सी2&nbsp; से नहीं बांधना चाहिए।&nbsp; &nbsp;यह एक फैक्टर हो सकता है लेकिन केवल इसी से तय नहीं कर सकते हैं। एमएसपी&nbsp; लिये यह जरूरी है कि &nbsp;किसी फसल की ओपन मार्केट और इंटरनेशनल प्राइस क्या है । इसको &nbsp;ध्यान रखकर दाम तय होना चाहिए। अब में सी2 पर आता हूं। सी2 को हम ए2प्लस एफएल में हम जमीन का रेंट और कैपिटल इंटरेस्ट जोड़ देते हैं तो वह सी2 बन जाता है।</p>
<p>आपकी जमीन की आपर्चूनिटी कोस्ट है उस का रेंट आपको मिलना चाहिए। लेकिन इसके उपर 50 फीसदी मार्जिन का कोई तर्क नहीं है। ए2प्लस एफएल में50 फीसदी जोड़ने से लैंड रैंट कवर हो जाता है। यह कवर जरूर होना चाहिए लेकिन प्रोफिट के ऊपर प्रोफिट का कोई जस्टिफिकेशन नहीं बनता है मैं इस पर किसान भाइयों से बात करने को भी तैयार हूं। एमएसपी सी2 से कम नहीं होनी चाहिए। अपनी जमीन के रेंट पर 50 फीसदी बढ़ाने का तर्क जायज नहीं है।</p>
<p><strong>सवाल- सरकार ने किसानों की आय 2022 तक दोगुनी करने का लक्ष्य रखा है अब इस लक्ष्य को पाने में केवल दो साल रह गये हैं। इस मोर्चे पर अभी तक कहां पहुंचे हैं। क्या ये लक्ष्य 2022 तक हासिल करना संभव है। इसका आधार क्या होगा क्या कोई कट आफ&nbsp; साल तय किया गया है। &nbsp;</strong></p>
<p>जवाब- हमारी केलकुलेशन में इसका आधार 2016 है। उस साल माडल एपीएमसी एक्ट लाया गया और उसके एक साल बाद माडल कांट्रेक्ट फार्मिंग एक्ट लाया गया था। मैंने नीति आयोग से किसानों की आय दो गुना करने पर एक पेपर भी पब्लिश किया था उसमें पूरा रोडमैप दिया था। जिसमें दो फैक्टर थे। इसमें एक था हायर प्राइस रियलाइजेशन अगर पांच साल में आठ फीसदी यह बढ़ती है तो उसे 13 फीसदी आय बढ़ेगी। दस फीसदी बढ़ने पर यह 16 फीसदी बढ़ती है। लेकिन यह तभी संभव है जब किसानों के उत्पादनों का वैल्यू एडिशन हो और उसे उत्पाद बेचने की फ्रीडम मिले। दूसरा फैक्टर था लोगों का खेती से बाहर निकलना। दुनियाभर में यही हुआ है कि लोग गैर कृषि क्षेत्र में गये हैं। 2001 से 2011&nbsp; के बीच वर्क फोर्स&nbsp; किसानों की हिस्सेदारी 35 से 25 फीसदी&nbsp; रह गयी। अगर यह ट्रेंड जारी रहता है और हर साल एक फीसदी किसान खेती से बाहर निकलता है। ऐसे में लोगों के बाहर जाने से वहां रह जाने वाले लोगों की आय बढ़ जाती है। मेरा मानना है कि कुछ राज्यों में तो हम यह लक्ष्य हासिल कर पाएंगे। कुछ इस पर निर्भर करेगा कि किस गति से आप इन राज्यों ने नीति आयोग के सुझावों पर अमल किया है। उन्होंने कितने सुधार लागू किये हैं। &nbsp;</p>
<p><strong>&nbsp;सवाल- एग्रीकल्चर डायवर्सिफिकेशन को लेकर बहुत जोर दिया जा रहा है और डिबेट हो रही है। लेकिन क्या डायवर्सिफिकेशन के फसलों कीपहचान कैसे होगी। किस फसल पर फोकस किया जाना चाहिए क्योंकि हम अधिकांश फसलों में तो सरप्सल की स्थिति में है। क्या हम यूरोप और अमेरिका जैसी स्थिति में पहुंच गये हैं जहां हमें बाजार बहुत आसानी से उपलब्ध नहीं है और हमें बाजार तलाशने हैं।</strong></p>
<p>जवाब- हम वास्तव में यूरोप जैसी स्थिति में जा रहें हैं मैने आपको गन्ना और चीनी का उदाहरण दिया जहां हर साल 30 फीसदी सरप्लस हो रहा है। मेरी केलकुलेशन है कि भारत को अपनी उत्पादन ग्रोथ का पांचवां हिस्सा हर साल निर्यात करना पड़ेगा। या स्टोर में रखना पड़ेगा। लेकिन इसके लिए मार्केट प्राइस और प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति को देखना पड़ेगा। अगर इसे मार्केट में छोड़ दिया तो दाम गिर जाएंगे। डायवर्सिफिकेशन के लिए हमें उपभोक्ता के ट्रेंड को भी देखना चाहिए कि वह कहां खर्च कर रहा है। साथ ही &nbsp;मार्केट के सिग्नल पर भी ध्यान रखना होगा। अगर डायवर्सिफिकेशन नहीं करेंगे तो नेचुवरल ग्रोथ प्रोसेस की विपरीत दिशा में चले जाएंगे।</p>
<p><strong>सवाल- बात&nbsp;सुधारों के लिए लागू किये गये तीन कृषि कानूनों अध्यादेशों की करते हैं। क्या देश में कृषि और किसानों की स्थिति में बदलाव के लिए यह कानून जरूरी हैं। इन कानूनों के बनाने में आपकी अहम भूमिका रही है। इसके पीछे क्या सोच रही है कि इतने बड़े बदलाव वाले कानून लागू किये जाएं।</strong></p>
<p>&nbsp;जवाब- मैने इस पर एक पेपर लिखा है। मैं आपके माध्यम का इस्तेमाल कर रहा हूं इसमें मैने इन कानूनों को लाने के दस कारण बताये हैं। &nbsp;किसान की आय और गैर किसान की आय के बीच की खाई बढ़ रही है। उसे बदलना जरूरी है। दूसरे 1991 के सुधारों इंडस्ट्री और फाइनेंशियल सेक्टर को देखा लेकिन इस में हमने कृषि को छोड़ दिया। तीसरे पिछले कुछ बरसों में किसानों के कितने आंदोलन हुए हैं जो मौजूदा व्यवस्था में किसान को आगे नहीं जाने देने के प्रति नाराजगी मुख्य वजह रही है। &nbsp;ऐसे में हमें कृषि को विकास के नये स्तर पर ले ले जाना है तो व्यवस्था को बदले बिना यह संभव नहीं है। व्यवस्था को बदले बिना आप ट्रांसफोर्मेशन नहीं कर सकते हैं। आप इंक्रीमेंटल चेंज तो कर सकते हैं लेकिन परिवर्तन संभव नहीं है। मैं इन कानूनों नये प्रसंग के संदर्भ में व्यवस्था को नया रूप देने के लिए देखता हूं। &nbsp;</p>
<p><strong>सवाल- अगर ये किसानों के हक में हैं, तो फिर देश के सबसे बेहतर खेती वाले क्षेत्रों के किसान इनकी मुखालफत क्यों कर रहे हैं। इन कानूनों के खिलाफ किसानों का आंदोलन अभी तक के सबसे बड़े किसान आंदोलन का रूप ले रहा है। इसकी वजह क्या है। कानूनों का विरोध राजनीतिक दल और किसान दोनों कर रहे हैं उनका कहना है कि अध्यादेशों को महामारी के बीचों बीच लाने के साथ ही जिस जल्दबाजी में इनको लाया गया यह ठीक नहीं था। किसानों का यह भी आरोप है इनके तैयार करने की प्रक्रिया में उनके साथ कोई राय मश्विरा भी नहीं किया गया। जबकि अब सरकार संशोधन के लिए तैयार है।</strong></p>
<p>जवाब- इसको यदि हम थोड़ा पीछे जाएं तो कोई मुश्किल फैसला संकट दौर में ही हुआ। कोविड को एक आपर्च्यूनिटी की तरह देखने की बात सभी कर रहे थे। अगर आप 1991 के सुधारों को देखें या 1965 की ग्रीन रिवोल्यूशन को देखें तो कोई भी बड़ा फैसला क्राइसिस के समय में ही हमारे देश में हो पाए हैं। ग्रीन रिवोल्यूशुन का भी बहुत लोगों ने विरोध किया था। उस समय बहुत भूख थी उस क्राइसिस में ही इसे लाना संभव हो पाया। 1991 में बैलेंस आफ पेमेंट खराब हो गया था सोना गिरवी रखना पड़ा था। &nbsp;2003 -04 में जब काटन का उत्पादन इतना कम हो गया था कि हमें अपनी मिल चलाने के लिए आयात करना पड़ रथा था तब हम बीटी काटन का फैसला ले पाए। कृषि क्षेत्र में क्या करना चाहिए यह पिछले 15-20 &nbsp;साल में लगातार लिखा गया कि हमें कृषि में सुधार करने चाहिए। जो लोग विरोध कर रहे हैं वह इन अध्यादेशों के आने के बाद&nbsp; ही विरोध कर रहे हैं। इसके पहले किसी ने सुधारों का विरोध नहीं किया। मैं 2002 से प्री बजट की बैठकों में देख रहा हूं कृषि क्षेत्र के प्रतिनिधि सुधारों की वकालत कर रहे थे। इसलिए सरकार को लगा कि इसे तो तुरंत कर देना चाहिए। लोकतंत्र सिस्टम किसी भी मसले पर एक राय बनाना संभव नहीं है। बीटी काटन पर हम अभी तक राय नहीं बना पाये है। सरकार का काम है कि वह एक्सपर्ट की राय लेकर दूसरे देशों के अनुभवो के आधार पर फैसले ले। मेरा कहना है कि समय ही बताएगा कि यह फैसला सही था या नहीं है।</p>
<p>जहां तक राज्यों&nbsp; के विरोध की बात है अगर राज्यों ने एपीएमसी एक्ट संशोधन के साथ लागू किया होता चार बदलावों के साथ,&nbsp; तो नया कानून लाने की &nbsp;जरूरत ही नहीं पड़ती। जहां तक इन कानूनों की बात है तो केंद्र ने ट्रेड के लिए यह कानून बनाया है। जो केंद्र की सूची में है और एंट्री 33 में आता है। &nbsp;वैसे राज्य सरकारें प्राइवेट ट्रेड पर भी सेस लगा सकते हैं लेकिन उसके लिए केंद्र से मजूरी लेनी होगी क्योंकि यह केंद्रीय कानून हैं। ट्रेड फेसिलिटेशन के नाम पर वह सेस लगाकर मंडियों को किसी गैर जरूरी प्रतिसपर्धा&nbsp; से संरक्षण दे सकते हैं।</p>
<p><strong>सवाल- एग्रीकल्चर इकोनामिस्ट के रूप में आपका व्यापक अनुभव है देश की कृषि आने वाले बरसों में किस दिशा में जा रही है। इसके ट्रांसफोर्मेशन पर जोर दिया जा रहा है। जाहिर सी बात है कि उसके लिए बड़े सुधार और बदलाव जरूरी हैं। वह बदलाव किस तरह के होने चाहिए और उन पर आम राय कैसे बन सकती है।</strong></p>
<p>जवाब- हमें नई तरह की औद्योगिक क्रांति में पश्चिमी माडल को छोड़कर एग्रीकल्चर को केंद्र में रखकर रुरल डेवलपमेंट म़ाडल की जरूरत है। एग्री प्रोसेसिंग और इंडस्ट्री स्थापित करके रोजगार पैदा करना होगा। कृषि को उसके पैरों पर खड़ा करके किसानों को मजबूत करे। यहां सरकार की भूमिका आती है वह एक इनवायरमेंट बनाए। &nbsp;साथ ही इंस्टीट्यूशन भी खड़े करे। एफपीओ जैसे संस्थान बनाकर। किसान को आंत्रप्रैन्योर बनाना होगा। तभी हमारा विकास का माडल कामयाब हो सकता है नहीं तो हम संकट में फंस जाएंगे।</p>
<p><strong>सवाल- 2006 में बिहार में एपीएमसी को समाप्त कर दिया था लेकिन वहां अभी तक भी कोई बड़ा निजी प्लेयर नहीं आया। उसे उदाहरण के रूप में रखा जा रहा है। वहां किसानों को अपनी अधिकांश फसलें एमएसपी से नीचे बेचनी पड़ रही है। इसे इन कानूनों के खिलाफ बड़े तर्क के रूप में उपयोग किया जा रहा है।</strong></p>
<p>जवाब- बिहार में एपीएमसी तो है नहीं और नया कानून एपीएमसी को खत्म नहीं करता है। हमें प्राइवेट प्लेयर और एपीएमसी दोनों को रखना चाहिए। पंजाब में मजबूत मंडी है लेकिन चावल की ग्रोथ एक फीसदी से कम है। बिहार में मंडी और एमएसपी के बिना सात फीसदी ग्रोथ है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मंडी नहीं होने से यह ग्रोथ हुआ है। असल में &nbsp;हर राज्य की अपनी परिस्थिति होती है। बिहार के उदाहरण को बीच में नहीं लाना चाहिए। नये कानून में एपीएमसी को रखा गया है। बिहार में तो खत्म कर दिया गया। मैं एपीएमसी को खत्म करने के फेवर में नहीं हूं जो बिहार ने किया।</p>
<p><strong>सवाल- सरकार चाहती है कि बड़ी कंपनियां कृषि क्षेत्र में आयें और वैल्यू एडिशन करें लेकिन उपभोक्ता से ली जाने वाली कीमत में क्या किसान की हिस्सेदारी का स्तर तय नहीं होनी चाहिए। विकसित देशों में किसानों उपभोक्ता के एक डॉलर की खरीद कीमत में से 30 से 35 सेंट ही मिलते हैं। देश में अमूल जैसी संस्था इसका 70 फीसदी तक दे रही है। इसमें आदर्श स्थिति क्या है।</strong></p>
<p>जवाब- इसका कोई फार्मूला नहीं है इसे मैकेनिकली फिक्स नहीं कर सकती है अमूल के उदाहरण में भी कुछ दूसरे कारक हैं। असल बात है कि किसान के लिए नेट प्राइस क्या मिलती है यह मैटर करता है। मैं कल्पना करता हूं फार्म एज ए फैक्टरी ऑफ द फार्मर्स। इसमें किसान को सबसे ज्यादा फायदा है।</p>
<p><strong>सवाल- कृषि में बड़ा सार्वजनिक निवेश नहीं हो रहा है। ग्रास कैपिटल फार्मेशन भी कम है। वहीं सरकार ने हाल में एक लाख करोड़ का एग्री इंफ्रा फंड घोषित किया है लेकिन यह तो कर्ज है जबकि से पैकेज के रूप में पेश किया जा रहा है।</strong></p>
<p>जवाब- इसमें जिसे हम पब्लिक सेक्टर इनवेस्टमेंट कहते हैं वह केवल केंद्र से नहीं राज्यों से भी आता है। &nbsp;80 फीसदी से ज्यादा पब्लिक इनवेस्टमेंट राज्यों से आता है। यदि राज्य लोन माफी और सब्सिडी में जाएंगे तो उससे पब्लिक इनवेस्टमेंट पर दीर्घकालिक रूप में प्रतिकूल असर पड़ता है। अगर हम प्राइवेट इनवेस्टमेंट में से किसान को हटा दें तो कारपोरेट इनवेस्टमेंट ढाई फीसदी से भी कम है। हमें कारपोरेट को एनीमी सेक्टर की तरह नहीं देखना चाहिए। इसके निवेश को कृषि में&nbsp; लाना बहुत जरूरी है।</p>
<p><strong>सवाल- कृषि में नई टेक्नोलॉजी और रिसर्च को लेकर हम काफी पीछे हैं और अधिकांश नये ब्रेकथ्रू बाहर से ही आ रहे हैं। जीएम टेक्नोलॉजी को लेकर सरकार की क्या नीति है इस पर सरकार ही बंटी हुई दिखती है।</strong></p>
<p>जवाब- एग्रीकल्चर का माडर्नाइजेन होना चाहिए। निवेश, ज्ञान और माडर्नाइजेशन मिलकर ही एग्रीकल्चर का ट्रांसफोर्मेशन हो सकता है। लेटरल फ्लो आफ टेक्ननोलाजी होना चाहिए। होर्टिकल्चर में हम पीछे चले गये हैं तो एप्पल जैसे फ्रूट भी बाहर से आने लगे हैं। पब्लिक में बासमती और प्राइवेट में &nbsp;काटन को छोड़ दें तो कोई बड़ी टेक्ननोलाजी नहीं आई है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि गेहूं और चावल में भी ग्रीन रिवोल्यूशन बाहर&nbsp; से आये जर्मप्लाज्म से ही संभव हो पाया है। हमें बाहर की टेक्ननोलाजी लेनी चाहिए। लेकिन इसके साथ ही हमें टेस्टिंग और रेगूलेशन का उपयोग करते हुए नई टेक्ननोलाजी लानी चाहिए। लेकिन हमें पूरी तरह विदेशों पर ही निर्भर नहीं रहना चाहिए। &nbsp;</p>
<p><strong>सवाल- आपको क्या लगता है कि मौजूदा आंदोलन का हल जल्दी संभव हो सकेगा। आपको लगता है कि कानूनों में कुछ बदलाव हो सकेगा।</strong></p>
<p>जवाब-किसी भी आंदोलन का लंबा चलना सरकार या किसान किसी के हित में नहीं है। मेरी तो प्रार्थना और उम्मीद है कि बीच का रास्ता निकलना चाहिए और इस संकट का हल निकलना चाहिए। सरकार ने आठ सुधारों पर बात की है जिसमें चार तो इन कानूनों से ही जुड़े मुद्दे हैं। सरकार ने लचीला रुख अपनाया है किसानों को भी लचीला रुख अपनाना चाहिए।</p>
<p><strong>सवाल- सरकार का एफपीओ बनाने पर काफी फोकस है क्या यह काम सहकारी समितियों को अधिक स्वायत्ता देकर संभव नहीं था। जबकि दोनों का मूल सिद्धांत एक ही है जिसमें किसान साथ आकर अपनी मोलभाव की क्षमता बढ़ा सकें और लागत कम कर सकें। एफपीओ के विस्तार की सीमा है जबकि सहकारिता के कामयाब संस्थान को राष्ट्रीय स्तर तक ले जाया जा सकता है।</strong></p>
<p>जवाब- भारत जैसे विविधता वाले देश&nbsp; में कई तरह के विकल्प् होने चाहिए। एफपीओ के कई जगह अच्छे परिणाम आये हैं। कोआपरेटिव में कई तरह के दखल भी हैं। हमें एक सिंगल माडल की बजाय एफपीए, कोआपरेटिव को मिलाकर दोनों को साथ लेकर चलना चाहिए। राज्य कोआपरेटिव को बढ़ाए और एफपीओ को केंद्र बढ़ाए। जहां&nbsp; स्माल लैंड होल्डर हैं वहां एफपीओ को बढ़ाना चाहिए।</p> ]]></description>

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        <author>harvirpanwar@gmail.com (Rural Voice)</author>
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