गेहूं में ऐसे प्राकृतिक जीन म्यूटेशन की पहचान जिससे उपज 10% तक बढ़ने की संभावना

यूनिवर्सिटी ऑफ इडाहो के वैज्ञानिकों ने गेहूं में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले एक जीन म्यूटेशन की पहचान की है, जिससे उपज में 5% से 10% तक वृद्धि हो सकती है। देर से फूल आने और अधिक स्पाइकलेट बनने से जुड़े इस म्यूटेशन की पहचान मॉलेक्यूलर मार्कर से की जा सकती है।

यूनिवर्सिटी ऑफ इडाहो की गेहूं ब्रीडर जियानली चेन, रिसर्च वैज्ञानिक गुरइकबाल ढिल्लों के साथ विश्वविद्यालय के एबरडीन रिसर्च एंड एक्सटेंशन सेंटर में। (सौजन्य: यूनिवर्सिटी ऑफ इडाहो)

गेहूं में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले एक आनुवंशिक म्यूटेशन से अधिक उपज देने वाली किस्मों के विकास का नया रास्ता खुल सकता है। यूनिवर्सिटी ऑफ इडाहो के वैज्ञानिकों के अनुसार, यह म्यूटेशन गेहूं की उपज में 5% से 10% तक वृद्धि कर सकता है और मॉलेक्यूलर मार्कर की मदद से इसकी पहचान की जा सकती है।

यह शोध यूनिवर्सिटी ऑफ इडाहो के कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चरल एंड लाइफ साइंसेज की गेहूं ब्रीडर जियानली चेन के नेतृत्व में किया गया। चेन विश्वविद्यालय के एबरडीन रिसर्च एंड एक्सटेंशन सेंटर में काम करती हैं। शोधकर्ताओं ने गेहूं के जर्मप्लाज्म यानी आनुवंशिक सामग्री के संग्रहों की जांच की। इसमें प्रशांत उत्तर-पश्चिम क्षेत्र के ब्रीडर द्वारा विकसित स्प्रिंग गेहूं की कई किस्में भी शामिल थीं।

शोधकर्ताओं ने इस म्यूटेशन की पुष्टि कई अधिक उपज देने वाली गेहूं लाइनों में की। इनमें UI Gold भी शामिल है, जो हार्ड व्हाइट स्प्रिंग गेहूं की एक किस्म है और जिसे चेन ने 2022 में जारी किया था। इसके अलावा कई नई प्रायोगिक लाइनों में भी यह म्यूटेशन पाया गया।

यह आनुवंशिक बदलाव एक न्यूक्लियोटाइड डिलीशन है, यानी डीएनए का एक छोटा हिस्सा गायब होता है। यूनिवर्सिटी के अनुसार, यह बदलाव गेहूं में देर से फूल आने और अधिक स्पाइकलेट बनने से जुड़ा है। स्पाइकलेट गेहूं की बालियों पर बनने वाले फूलों के समूह होते हैं, जिनसे आगे चलकर दाने विकसित होते हैं। दोनों विशेषताएं अधिक उपज में योगदान दे सकती हैं।

चेन और उनकी टीम ने इस लाभकारी आनुवंशिक बदलाव से जुड़े लोकस की भी पहचान की है। लोकस गुणसूत्र पर वह विशिष्ट स्थान होता है, जहां कोई जीन या आनुवंशिक मार्कर स्थित होता है। इस खोज के आधार पर शोधकर्ताओं ने ऐसे मॉलेक्यूलर मार्कर विकसित किए हैं, जिनकी मदद से गेहूं की प्रजनन सामग्री में इस म्यूटेशन की पहचान की जा सकती है।

यूनिवर्सिटी की तरफ से जारी विज्ञप्ति में चेन ने कहा, “हमें यह जीन म्यूटेशन मिला और हमने मॉलेक्यूलर मार्कर विकसित किए हैं, इसलिए हम गेहूं की लाइनों की इसकी मौजूदगी के लिए जांच कर सकते हैं।” उनका मानना है कि भविष्य में कई गेहूं प्रजनन कार्यक्रम इस मार्कर को अपना सकते हैं।

इस शोध को अमेरिकी कृषि विभाग के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फूड एंड एग्रीकल्चर (USDA-NIFA) से मिले पांच वर्ष के 1.5 करोड़ डॉलर के अनुदान से वित्तपोषित किया गया। म्यूटेशन की पहचान के साथ-साथ शोधकर्ताओं ने जीनोमिक चयन (Genomic Selection) को अधिक तेज और कम खर्चीला बनाने पर भी काम किया। यह एक आधुनिक ब्रीडिंग तकनीक है, जिसमें बड़ी संख्या में डीएनए मार्करों का इस्तेमाल करके यह अनुमान लगाया जाता है कि कौन-सी पौध लाइन वांछित गुणों के लिए बेहतर प्रदर्शन कर सकती है।

उपज के लिए पारंपरिक जीनोमिक चयन में गेहूं की लाइनों की जांच के लिए करीब 90,000 सिंगल न्यूक्लियोटाइड पॉलीमॉर्फिज्म (SNPs) वाले प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया जा सकता है। SNP डीएनए अनुक्रम में किसी एक स्थान पर पाया जाने वाला आनुवंशिक अंतर है।

यूनिवर्सिटी ऑफ इडाहो की टीम ने पाया कि केवल 4,000 SNP वाला प्लेटफॉर्म भी उपज और उससे जुड़े गुणों का अनुमान लगाने में 90,000 SNP वाले बड़े प्लेटफॉर्म जितना ही प्रभावी था। इस सरल और कम मार्कर वाले तरीके से चेन के कार्यक्रम में परीक्षण की लागत प्रति सैंपर करीब 60 डॉलर कम हुई है।

यूनिवर्सिटी के अनुसार, यह तरीका गेहूं की नई किस्मों की पहचान और विकास में लगने वाला समय भी कम कर सकता है। पारंपरिक तरीके में खेतों में कई वर्षों तक परीक्षण कर उपज का आंकलन करना पड़ता है। इसके बजाय जीनोमिक चयन मॉडल से पहले ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि कौन-सी लाइन अधिक उपज देने की क्षमता रखती है।

चेन ने कहा, “कई वर्षों तक खेतों में अनाज की उपज मापने का इंतजार करने के बजाय गेहूं ब्रीडर जीनोमिक चयन मॉडल का इस्तेमाल करके यह अनुमान लगा सकते हैं कि कौन-सी लाइन अधिक उपज देने वाली हो सकती है।” अब चेन का कार्यक्रम 4,000-SNP प्लेटफॉर्म की उपयोगिता को सूखे के प्रति सहनशीलता और बेकिंग गुणवत्ता जैसे अन्य गुणों के लिए भी परखने की योजना बना रहा है।