भुवनेश्वर में ‘एजेंडा फॉर रूरल इंडिया’ का आयोजन, किसानों और ग्रामीण क्षेत्र के मुद्दों और उनके समाधान पर हुआ मंथन

ग्रामीण भारत के विकास का एजेंडा कैसा होना चाहिए, इस विषय पर ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में दो दिवसीय सेमिनार का आयोजन किया गया। इसमें भाग लेने वाले किसानों तथा ग्रामीणों ने सिंचाई की सुविधाओं की कमी, खेती में रसायनों के बढ़ते प्रयोग, उपज की कम कीमत, क्वालिटी स्कूलों के अभाव, बाल और बंधुआ मजदूरी, नरेगा जैसी सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे उठाए। विशेषज्ञों ने कृषि और भ्रष्टाचार जैसे विषयों पर अपने विचार रखने के साथ कृषि कानूनों पर भी चर्चा की।

भुवनेश्वर में 18 और 19 अगस्त को आयोजित 'एजेंडा फॉर रूरल इंडिया' के प्रतिभागी

भुवनेश्वर।

ग्रामीण भारत के विकास का एजेंडा कैसा होना चाहिए, इस विषय पर ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में दो दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इसमें भाग लेने वाले किसानों तथा ग्रामीणों ने सिंचाई की सुविधाओं की कमी, खेती में रसायनों के बढ़ते प्रयोग, उपज की कम कीमत, क्वालिटी स्कूलों के अभाव, बाल और बंधुआ मजदूरी, नरेगा जैसी सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे उठाए। विशेषज्ञों ने कृषि और भ्रष्टाचार जैसे विषयों पर अपने विचार रखने के साथ कृषि कानूनों पर भी चर्चा की।

इस ‘एजेंडा फॉर रूरल इंडिया’ का आयोजन रूरल वॉयस, सॉक्रेटस फाउंडेशन और लाइवलीहुड अल्टरनेटिव्स ने मिलकर किया। इस सेमिनार में उड़ीसा के 20 जिलों के किसानों, छात्रों, महिला स्वयं सहायता समूहों, छोटे उद्यमियों,दस्तकारों,  ग्रामीण पत्रकारों, शिक्षकों, एफपीओ सदस्यों और प्रवासियों ने हिस्सा लिया।

सेमिनार के पहले दिन शुक्रवार, 18 अगस्त को प्रतिभागियों ने खुद ग्रामीण होने के नाते इस क्षेत्र के लोगों की विभिन्न समस्याओं को सामने रखा। उन्होंने अपने-अपने गांव की आकांक्षाओं के बारे में बताया। साथ ही यह भी कहा कि वे किस तरह की नीतियों पर अमल देखना चाहेंगे। उन्होंने जिन विषयों पर बात की उनमें पेयजल और सिंचाई की सुविधाओं की कमी, खेती में रसायनों के ज्यादा इस्तेमाल, उपज की उचित कीमत ना मिलना (इंटरमीडियरी किसानों को मिलने वाली कीमत कम कर देते हैं), उपज रखने के लिए वेयर हाउस तथा अन्य स्टोरेज सुविधाओं की कमी, देसी नस्ल के मवेशियों की कमी, फसलों को जंगली जानवरों से नुकसान शामिल हैं। 

इसके अलावा जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र के जलस्तर में वृद्धि, जलवायु परिवर्तन का खेती पर प्रभाव, मिट्टी का क्षरण, बाल मजदूरी, बंधुआ मजदूरी, ड्रग और शराब की समस्या, आदिवासियों का शोषण, महिलाओं की सुरक्षा, शिक्षा की खराब क्वालिटी, स्किलिंग तथा व्यावसायिक प्रशिक्षण का अभाव, नरेगा जैसी सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार, योजनाओं पर अमल ना होना, माइक्रो फाइनेंस की सुविधा ना मिलना और इसकी वजह से महाजनी व्यवस्था नए सिरे से खड़ी होने पर भी उन्होंने अपनी बात रखी।

सोमिनार के दूसरे दिन शनिवार, 19 अगस्त को एक पैनल डिस्कशन का आयोजन हुआ। पैनल चर्चा में हिस्सा लेने वालों में नाबार्ड फाइनेंशियल सर्विसेज के चेयरमैन, रिटायर्ड आईएएस और ओडिशा के पूर्व मुख्य सचिव जुगल महापात्र, उत्कल यूनिवर्सिटी में इकोनॉमिक्स की प्रोफेसर और ओडिशा ओबीसी कमिशन की सदस्य डॉ. मिताली चिनारा, रूरल वॉयस के एडिटर इन चीफ हरवीर सिंह और लाइवलीहुड अल्टरनेटिव्स के संस्थापक संबित त्रिपाठी शामिल थे। इसमें पहले दिन की चर्चा में हिस्सा लेने वाले प्रतिभागियों ने भी सुना। इस पैनल चर्चा का उद्देश्य नीति निर्माताओं और ग्रामीण लोगों के बीच एक संवाद स्थापित करना था।

पैनल चर्चा में कृषि कानूनों और उनके प्रभाव, सरकार की तरफ से उठाए जाने वाले कदमों, भ्रष्टाचार और प्रशासन की खामी जैसे विषयों पर चर्चा हुई। ओडिशा के ग्रामीण क्षेत्र से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर भी चर्चा हुई। जुगल महापात्र ने बीते चार दशकों में विकास, कृषि और भ्रष्टाचार जैसे विषयों पर उठाए गए कदमों के बारे में अपने विचार रखे। डॉ. चिनारा ने बताया कि विकास के लिए कौन से मुद्दे जरूरी हैं तथा उन्होंने समावेशिता के मुद्दे को भी उठाया। हरवीर सिंह ने प्रस्तावित कृषि कानूनों की बारीकियों के बारे में बताया तथा एक तुलनात्मक राष्ट्रीय नजरिया प्रस्तुत किया।

यह कार्यक्रम रूरल वॉयस तथा सॉक्रेटस फाउंडेशन  द्वारा संयुक्त रूप से देश के ग्रामीण इलाकों में आयोजित किए जा रहे सेमिनार का हिस्सा था। इसके पहले संस्करण का आयोजन उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में किया गया था। इन कार्यक्रमों में ग्रामीण समुदाय की चुनौतियों पर चर्चा की जाती है। इसका मकसद शहर और गांव के अंतर को खत्म करना तथा ग्रामीण इलाके के लोगों को अपने विचारों को आवाज देने के लिए एक मंच उपलब्ध कराना है। इस तरीके से संवाद और सहयोग के जरिए राष्ट्रीय स्तर पर एक व्यापक ग्रामीण एजेंडा तैयार किए जाने की उम्मीद है, जो इन समुदायों की आवश्यकताओं की पूर्ति करेगा। इन कार्यक्रमों से मिलने वाले इनपुट को राष्ट्रीय स्तर पर नीति निर्माताओं तथा विशेषज्ञों के साथ साझा किया जाएगा।