—सीवनी (मध्यप्रदेश) से लौटकर
मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के गंगेरुवा गांव के किसान महतलाल बिसेन के लिए धान की खेती करना हमेशा मुश्किल काम रहा है। पानी की कमी और उसके बाद धान की फसल में सादा लांबा (जंगली धान) का प्रकोप उनके लिए उत्पादन में 30 से 40 फीसदी तक की कमी का कारण बनता था। इसके अलावा, फसल पकने के करीब पहुंचने पर सादा लांबा की पहचान होने के बाद मजदूरों के जरिए इसे खरपतवार की तरह खेत से निकालना लगभग असंभव हो जाता था। इस अवस्था तक पहुंचने से पहले ही यह मुख्य फसल को काफी नुकसान पहुंचा चुका होता था।
लेकिन अब महतलाल को इस समस्या का समाधान मिल गया है। इतना ही नहीं, उन्हें फसल की उत्पादकता में बढ़ोतरी, पानी की बचत और मजदूरी की लागत में कमी का फायदा भी मिल रहा है। यह संभव हुआ है धान की सीधी बुवाई (डायरेक्ट सीडेड राइस-डीएसआर) पद्धति और इसके लिए डीएसआर की अगली पीढ़ी के रूप में विकसित सवाना सीड्स की फुलपेज तकनीक अपनाने से। यही वजह है कि तीन साल पहले दो एकड़ में फुलपेज तकनीक के साथ डीएसआर की खेती शुरू करने वाले महतलाल आज 11 एकड़ में इसकी खेती कर रहे हैं।
महतलाल की तरह ही सिवनी जिले के पिपरिया गांव के खेलेंद्र बिशेन की कहानी है। उन्होंने तीन साल पहले दो एकड़ में सवाना 134 फुलपेज डीएसआर का ट्रायल शुरू किया था और इस साल वे 20 एकड़ में इसकी खेती कर रहे हैं। अजय बिशेन और जितेंद्र कुमार गौतम भी ऐसे ही किसानों में शामिल हैं। उनका कहना है कि पारंपरिक रोपाई वाले धान की फसल से सामान्य परिस्थितियों में करीब 16 क्विंटल प्रति एकड़ उत्पादन मिलता है, जबकि खराब मौसम या प्रतिकूल परिस्थितियों में यह घटकर 12 से 14 क्विंटल रह जाता है। इसके मुकाबले फुलपेज डीएसआर से उन्हें 20 से 26 क्विंटल प्रति एकड़ तक उत्पादन मिल रहा है।
किसान अधिक उत्पादकता, खरपतवार पर बेहतर नियंत्रण, सीधी बुवाई से पानी, मजदूरी और डीजल की बचत तथा अगली फसल के लिए मिट्टी की बेहतर सेहत जैसे कई फायदे गिनाते हैं। यही वजह है कि डीएसआर अपनाने वाले किसानों की संख्या साल-दर-साल बढ़ रही है।
सिवनी में फुलपेज के बढ़ते रकबे की कहानी
गंगेरुवा से करीब 30 किलोमीटर दूर सिवनी जिले के ही धतुरिया गांव के बैद्यनाथ बघेल बड़े किसान हैं। उन्होंने दो साल पहले डीएसआर के तहत फुलपेज तकनीक वाले बीज का इस्तेमाल शुरू किया था। इस साल उन्होंने इसका रकबा बढ़ाकर 120 एकड़ कर लिया है। जिले के इस हिस्से में किसानों की जोत बड़ी है। यहां जमीन समतल नहीं होने के कारण पडलिंग (Puddling) के जरिए धान की रोपाई करना संभव नहीं है। इसलिए यहां डीएसआर खेती की स्वाभाविक पद्धति बन गई है।
विशेष जेनेटिक्स वाली धान की सवाना 134 फुलपेज किस्म इस क्षेत्र के किसानों के लिए बड़ी संभावनाएं लेकर आई है और इसका रकबा लगातार बढ़ रहा है। बैद्यनाथ बघेल कहते हैं कि पहले डीएसआर में खरपतवार की समस्या के चलते उपज बहुत कम मिलती थी, जबकि फुलपेज की उत्पादकता बेहतर है। पहले से ट्रीटेड बीज से पौधों का फुटाव बेहतर होता है और इसमें पानी की जरूरत भी कम पड़ती है। यह धान की पारंपरिक किस्मों के मुकाबले दो सिंचाई की बचत करता है। साथ ही, इसकी बुवाई में बीज की मात्रा भी कम लगती है।
बघेल कहते हैं कि यह मजबूत किस्म है और इसमें खरपतवारनाशक दवा भी पूरी तरह असर करती है, जबकि धान की दूसरी किस्मों में ऐसा नहीं होता। पहले डीएसआर की 1010 किस्म से 16 से 17 क्विंटल प्रति एकड़ उत्पादन मिलता था और उसका बीज भी करीब 40 किलो प्रति एकड़ लगता था। इसके मुकाबले फुलपेज का 7 से 10 किलो बीज ही एक एकड़ के लिए पर्याप्त है। इससे उत्पादन में भी करीब पांच क्विंटल प्रति एकड़ का फायदा मिलता है। ऐसे में महंगा बीज होने के बावजूद फुलपेज किसानों को बड़ा लाभ देता है।

पास के गांव किशनपुर के किसान शानू भी उनकी बात का समर्थन करते हैं। वह बताते हैं कि उन्होंने इस साल 30 एकड़ में फुलपेज धान लगाया है। कुदवारी के चंद्रभान सिंह ने भी 35 एकड़ में सवाना के फुलपेज बीज का इस्तेमाल किया है। उनका कहना है कि इस बीज से पौधों का फुटाव अच्छा होता है और दूसरी किस्मों के मुकाबले सिंचाई की जरूरत भी कम पड़ती है। इस इलाके में बारिश कम होती है, इसलिए हम स्प्रिंकलर के जरिए दो सिंचाई में भी धान की फसल तैयार कर लेते हैं।
जबलपुर से करीब 180 किलोमीटर दूर महाराष्ट्र की सीमा के पास स्थित सिवनी जिले का यह इलाका खेती के लिए काफी हद तक बारिश पर निर्भर है। यहां मक्का और सोयाबीन की खेती भी होती है, लेकिन सोयाबीन का रकबा तेजी से घटा है, क्योंकि अब यह किसानों के लिए फायदेमंद नहीं रह गया है। इस साल कम बारिश के चलते मक्का उत्पादन में भी भारी गिरावट आई है। ऐसे में यहां किसानों का भरोसा डीएसआर धान पर बढ़ रहा है।
हालांकि, पारंपरिक डीएसआर में अब तक दो बड़ी समस्याएं रही हैं। पहली, खरपतवार पर पूरी तरह नियंत्रण नहीं हो पाना, क्योंकि धान की सामान्य किस्में हर्बीसाइड टॉलरेंट (HT) नहीं होती हैं। इसलिए खरपतवार को मजदूरों के जरिए ही साफ करना पड़ता था। इससे लागत बढ़ती थी और मजदूरों की कमी भी एक बड़ी समस्या बन गई थी। दूसरी समस्या इन किस्मों की कम उत्पादकता थी।
डीएसआर की दिक्कतों का समाधान
सवाना 134 फुलपेज इन किसानों की मुश्किलों का समाधान लेकर आई है। इसकी उपयोगिता ने किसानों का भरोसा बढ़ाया है। विशेष जेनेटिक्स के इस्तेमाल से तैयार इस किस्म का बीज पहले से ट्रीटेड होता है और इसमें प्रतिकूल परिस्थितियों को सहने की क्षमता अधिक है। इसलिए बीज का अंकुरण और शुरुआती अवस्था में पौधों की स्थापना बेहतर होती है। एचटी राइस होने के कारण इसमें निर्धारित समय पर सवाना द्वारा उपलब्ध कराया जाने वाला हर्बीसाइड ‘वजीर’ खरपतवार को नियंत्रित करने में सक्षम है। इससे मजदूरी की लागत सीधे कम होती है।
जंगली धान 'सादा लांबा' से छुटकारा
खास बात यह है कि एक ही जिले के दो अलग-अलग हिस्सों में फुलपेज किसानों के लिए अलग-अलग तरह से कारगर साबित हो रहा है। धतुरिया के आसपास के गांवों में पहले धान की खेती नहीं होती थी, इसलिए वहां सादा लांबा (जंगली धान) की समस्या फिलहाल नहीं है। लेकिन यहां फुलपेज अपनी बेहतर उत्पादकता, बीज की बचत, खरपतवार पर प्रभावी नियंत्रण और कम सिंचाई की जरूरत के चलते लोकप्रिय हो रहा है। फसल की बुवाई के 12 से 15 दिन बाद हर्बीसाइड वजीर का छिड़काव किया जाता है, जबकि दूसरा छिड़काव 20 दिन बाद किया जाता है। किसानों के मुताबिक, इससे खरपतवार नियंत्रित होते हैं और धान की फसल स्वस्थ रहती है।
वहीं, बरघाट क्षेत्र में सादा लांबा किसानों के लिए ऐसी समस्या है, जिसका पारंपरिक रोपाई पद्धति में कोई प्रभावी समाधान नहीं है। फसल के काफी विकसित हो जाने के बाद इसकी पहचान होती है, क्योंकि इसका पौधा धान के पौधे जैसा ही दिखाई देता है। जब तक इसकी पहचान होती है, तब तक यह मुख्य फसल को काफी नुकसान पहुंचा चुका होता है। एक अवस्था के बाद मजदूर भी इसे खेत से निकालने से मना कर देते हैं। ऐसे में सवाना 134 फुलपेज इस समस्या के समाधान में प्रभावी साबित हो रही है।
किसानों के लिए इस तकनीक की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यही है कि अब वे अपने खेतों में जंगली धान के प्रकोप से मुक्त फसल देख पा रहे हैं। उन्होंने सवाना के फुलपेज धान को नया नाम दिया है—‘सादा लांबा मुक्त धान’।
पानी की बचत और मिट्टी की सेहत
धान की पारंपरिक रोपाई में पानी की अधिक जरूरत होती है, जबकि डीएसआर में इसकी काफी बचत होती है। पडलिंग के लिए ट्रैक्टर पर होने वाले करीब 1,200 रुपये प्रति एकड़ के अतिरिक्त खर्च की भी बचत होती है। पारंपरिक रोपाई वाले धान के खेतों में कटाई के बाद मिट्टी के बड़े-बड़े ढेले बन जाते हैं, क्योंकि यहां की मिट्टी सख्त है। इसके विपरीत, फुलपेज की खेती के बाद अगली फसल की बुवाई के लिए मिट्टी बेहतर स्थिति में रहती है। बारिश का पानी भी जमीन में बेहतर तरीके से संरक्षित होता है।
किसानों ने बताया कि डीएसआर अपनाने से गेहूं की फसल में भी सुधार देखने को मिला है। पारंपरिक धान की रोपाई में पडलिंग के कारण मिट्टी में एक कठोर परत बन जाती है, जिसे हार्ड पैन (Hard Pan) कहते हैं। डीएसआर में पडलिंग नहीं होने से मिट्टी की संरचना बेहतर बनी रहती है और अगली गेहूं की फसल की जड़ों के विकास तथा बढ़वार के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनती हैं। इस तरह डीएसआर धान के साथ अगली फसल के लिए भी फायदेमंद साबित हो रहा है।
संपूर्ण क्रॉपिंग सॉल्यूशन पर जोर

सवाना सीड्स के मैनेजिंग डायरेक्टर और सीईओ अजय राणा ने रूरल वॉयस को बताया, “हम इन किसानों के लिए एक कारगर समाधान लेकर आए हैं। यही वजह है कि साल-दर-साल फुलपेज अपनाने वाले किसानों की संख्या बढ़ रही है। हमने धान की किस्म सवाना 134 फुलपेज में विशेष जेनेटिक्स का इस्तेमाल किया है। साथ ही, हमारा बीज ट्रीटेड होता है। ये दोनों खूबियां इसे बेहतर जर्मिनेशन और स्ट्रेस सहने की अधिक क्षमता प्रदान करती हैं। वहीं, अडामा कंपनी के साथ मिलकर हमने ‘वजीर’ हर्बीसाइड तैयार किया है, जिसे हम बीज के साथ ही बेचते हैं। इसकी अलग से बिक्री नहीं करते, ताकि इसका सही उपयोग हो। इस तरह फुलपेज एक पूरा पैकेज है, जो हम किसानों को देते हैं और इसके उपयोग के लिए पूरे दिशानिर्देश भी दिए जाते हैं। इसके नतीजे बेहतर आ रहे हैं और किसानों के बीच फुलपेज को अपनाने की रफ्तार काफी अच्छी है।”
अनुमानों के मुताबिक, मध्य भारत (मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़) के किसानों ने लगभग 100,000 एकड़ में फुलपेज डीएसआर को अपनाया और हर साल इसके रकबे में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। कंपनी का दावा है कि 2024 में इस टेक्नोलॉजी के कमर्शियल लॉन्च के बाद से हर सीज़न में इसका एरिया दोगुने से ज़्यादा हो रहा है।
राणा के मुताबिक, फुलपेज की खासियत केवल एक नई धान किस्म होना नहीं है, बल्कि यह बीज, सीड ट्रीटमेंट, विशेष जेनेटिक्स और खरपतवारनाशक को मिलाकर तैयार किया गया एक संपूर्ण राइस क्रॉपिंग सॉल्यूशन है। इसमें स्मार्ट राइस (SmartRice) जेनेटिक्स, स्क्वाड (SQUAD) सीड ट्रीटमेंट, फुलपेज का विशेष हर्बीसाइड टॉलरेंस गुण और अडामा (ADAMA) का हर्बीसाइड शामिल हैं।
डीएसआर में अगला कदम
धान की सीधी बुवाई भारत में धान की सबसे पुरानी कृषि पद्धतियों में से एक है। देश के कई हिस्सों में धान की सीधी बुवाई लंबे समय से होती रही है। इस पद्धति में खेत में सीधे बीजों का छिड़काव कर धान की खेती की जाती थी। हालांकि, पारंपरिक सीधी बुवाई में कई चुनौतियां थीं। इनमें पौधों का सही तरीके से स्थापित न हो पाना, खरपतवारों का अधिक प्रकोप और जंगली धान (Weedy Rice) की समस्या प्रमुख थीं।
इन्हीं चुनौतियों के चलते सिंचित क्षेत्रों में किसानों ने धीरे-धीरे धान की रोपाई पद्धति को अपनाना शुरू किया। इसमें पहले नर्सरी में पौध तैयार की जाती है और फिर खेत में पानी भरकर पडलिंग के बाद पौधों की रोपाई की जाती है। इससे शुरुआती अवस्था में फसल की स्थापना और खरपतवार प्रबंधन बेहतर होता है। लेकिन इस पद्धति में पानी का अधिक इस्तेमाल होता है और मजदूरी व खेत की तैयारी पर अधिक खर्च आता है। सवाना सीड्स की फुलपेज तकनीक ने इन समस्याओं का समाधान उपलब्ध कराया है।
बदलते समय में मजदूरों की उपलब्धता भी बड़ी चुनौती बन गई है। ऐसे में डीएसआर की पुरानी पद्धति को नई तकनीक के साथ अपनाने का विकल्प किसानों के सामने आ रहा है। फुलपेज तकनीक का उद्देश्य भी यही है कि डीएसआर की उन प्रमुख समस्याओं का समाधान किया जाए, जिनके चलते किसान इससे दूर हो गए थे। बेहतर जेनेटिक्स, सीड ट्रीटमेंट, खरपतवार नियंत्रण और जंगली धान के प्रबंधन को एक साथ जोड़कर इस तकनीक के जरिए किसानों के लिए डीएसआर को फिर से व्यावहारिक बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
फुलपेज अपनाने वाले किसानों ने बताया कि इससे खेतों में पानी कम या नहीं होने पर भी फसल का शुरुआती आधार मजबूत रहता है। इसके विपरीत, पारंपरिक रोपाई पद्धति में खेतों में पानी भरना आवश्यक होता है। सवाना की टीम ने बताया कि इसका कारण स्मार्टराइस (SmartRice) जेनेटिक्स है, जिसे धान की सीधी बुवाई के अनुकूल विकसित किया गया है। स्मार्टराइस हाइब्रिड संसाधनों का कुशल उपयोग करने वाले बीज हैं, जो अधिक उपज देते हैं और आनुवंशिक रूप से डीएसआर के अनुकूल हैं। ये बीज प्रतिकूल परिस्थितियों और रोगों के प्रति बेहतर सहनशीलता तथा फसल के गिरने से बचाव करते हैं। इनसे चावल का मिलिंग प्रतिशत भी अधिक होता है। इससे धान की टिकाऊ खेती को बढ़ावा मिलता है।
महतलाल अपने खेत में रखी एक सीडर मशीन की ओर इशारा करते हुए बताते हैं, “यह मशीन डीएसआर को बढ़ावा देने के लिए एक दूसरी कंपनी ने दी थी, लेकिन उस कंपनी के बीज हर्बीसाइड टॉलरेंट (HT) नहीं थे। ऐसे में हमारे लिए इस मशीन का इस्तेमाल उपयोगी नहीं रहा, क्योंकि सिर्फ डीएसआर अपनाने से खरपतवार और सादा लांबा की समस्या का समाधान नहीं हुआ। फुलपेज इस समस्या का निदान है। हमने पहले थोड़े से रकबे में इसका प्रयोग किया, लेकिन जिस तरह के फायदे मिले, उससे हमारा भरोसा बढ़ा है। अब इलाके के करीब 70 फीसदी किसान फुलपेज अपनाने की ओर बढ़ रहे हैं।”
सिवनी के किसानों के अनुभव बताते हैं कि डीएसआर को अपनाने के लिए खरपतवार, जंगली धान, बीज की गुणवत्ता और शुरुआती फसल प्रबंधन जैसी समस्याओं का समाधान भी जरूरी है। फुलपेज इसी दिशा में एक नया विकल्प बनकर उभरा है। यह केवल पारंपरिक रोपाई से डीएसआर की ओर वापसी नहीं है, बल्कि उन चुनौतियों का हल निकालने की कोशिश है, जिन्होंने किसानों को पहले धान की सीधी बुवाई से दूर कर दिया था।