यूरोपियन यूनियन और मर्कोसुर के बीच व्यापार समझौते की राह साफ, विरोध में सड़कों पर उतरे यूरोप के किसान

यूरोपियन यूनियन ने EU–मर्कोसुर मुक्त व्यापार समझौते को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है, जिससे अब तक के सबसे बड़े व्यापार समझौते का रास्ता साफ हुआ है। यूरोपियन कमीशन इसे निर्यात बढ़ाने और चीन पर निर्भरता घटाने का माध्यम बता रहा है, लेकिन पूरे यूरोप में किसान सस्ते दक्षिण अमेरिकी कृषि आयात के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं।

ईयू-मर्कोसुर एफटीए के खिलाफ फ्रांस की सड़कों पर प्रदर्शन करते किसान।

यूरोपियन यूनियन ने अब तक के अपने सबसे बड़े मुक्त व्यापार समझौते की दिशा में एक निर्णायक कदम बढ़ा दिया है। सदस्य देशों ने 25 वर्षों से लंबित EU–मर्कोसुर व्यापार समझौते को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है। हालांकि, इस फैसले के साथ ही यूरोप भर में किसानों के समन्वित विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं, जिससे इस समझौते को लेकर गहरे राजनीतिक और आर्थिक मतभेद नजर आ रहे हैं।

9 जनवरी को यूरोपियन यूनियन की सरकारों ने ब्राजील, अर्जेंटीना, उरुग्वे और पैराग्वे को शामिल करने वाले मर्कोसुर ब्लॉक के साथ व्यापक साझेदारी और व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर के लिए हरी झंडी दे दी। यह समझौता लगभग दो दशकों से बातचीत के दौर से गुजर रहा था। लागू होने पर यह दुनिया के सबसे बड़े मुक्त व्यापार क्षेत्रों में से एक का निर्माण करेगा, जिसमें 70 करोड़ से अधिक की आबादी वाला बाजार शामिल होगा।

टैरिफ में की जाएगी कटौती
इस समझौते के तहत दोनों पक्षों के बीच टैरिफ में व्यापक कटौती की जाएगी। मर्कोसुर देश 15 वर्षों की अवधि में यूरोपियन यूनियन के 91 प्रतिशत निर्यात पर शुल्क समाप्त करेंगे, जिसमें कारों पर लगने वाला 35 प्रतिशत तक का ऊंचा शुल्क भी शामिल है। इसके बदले में यूरोपियन यूनियन 10 वर्षों तक की अवधि में मर्कोसुर के 92 प्रतिशत निर्यात पर टैरिफ हटाएगा। कृषि क्षेत्र में भी बाजार खोले जाएंगे। मर्कोसुर यूरोपीय वाइन और स्पिरिट्स पर ऊंचे शुल्क समाप्त करेगा, जबकि यूरोपियन यूनियन बीफ, पोल्ट्री, चीनी, एथनॉल, चावल और शहद जैसे संवेदनशील कृषि उत्पादों के लिए आयात कोटा बढ़ाएगा।

यूरोपियन कमीशन के लिए यह समझौता भू-राजनीतिक तनाव के दौर में व्यापार संबंधों में विविधता लाने की रणनीति का अहम हिस्सा है। कमीशन का तर्क है कि दक्षिण अमेरिका के साथ आर्थिक जुड़ाव से चीन पर निर्भरता कम होगी, खासकर इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरियों में इस्तेमाल होने वाले लिथियम जैसे महत्वपूर्ण खनिजों के मामले में। आयोग का अनुमान है कि यह समझौता यूरोपियन यूनियन के निर्यातकों को हर साल 4 अरब यूरो से अधिक के टैरिफ से राहत देगा और यूरोपीय कंपनियों को मर्कोसुर देशों में सार्वजनिक खरीद निविदाओं में स्थानीय कंपनियों के समान शर्तों पर भाग लेने का अवसर मिलेगा - जो अब तक इस ब्लॉक ने किसी भी व्यापार समझौते में नहीं दिया था।

जर्मनी और स्पेन जैसे समर्थक देशों का मानना है कि यह समझौता अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ सहित वैश्विक व्यापार अनिश्चितताओं के बीच यूरोपीय अर्थव्यवस्था के लिए सुरक्षा कवच का काम करेगा। वे यह भी कहते हैं कि मर्कोसुर पहले से ही बड़ी मात्रा में कृषि उत्पाद यूरोपीय संघ को निर्यात करता है और मौजूदा आयात इस बात का प्रमाण हैं कि ये उत्पाद यूरोपीय मानकों को पूरा करते हैं।

समझौते का विरोध करते पोलैंड के किसान।

यूरोप के किसान कर रहे हैं विरोध
इस समझौते ने यूरोप भर में किसानों, पर्यावरण समूहों और कई राष्ट्रीय सरकारों के बीच तीखा विरोध भी खड़ा कर दिया है। अनुमोदन प्रक्रिया आगे बढ़ने के साथ ही विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं। फ्रांस में किसानों ने इस सप्ताह ट्रैक्टरों के साथ पेरिस में प्रवेश किया, प्रमुख सड़कों को जाम किया और सरकारी इमारतों के पास प्रदर्शन किए। बेल्जियम, इटली और पूर्वी यूरोप के कई हिस्सों में भी किसान संगठनों के नेतृत्व में आंदोलन देखने को मिले हैं।

किसानों के विरोध का कारण
किसानों का कहना है कि दक्षिण अमेरिका से सस्ता बीफ और पोल्ट्री आयात बढ़ने से यूरोपीय उत्पादक बुरी तरह प्रभावित होंगे, जो पहले से ही ऊंची लागत, जलवायु दबाव और कड़े पर्यावरणीय नियमों से जूझ रहे हैं। हालांकि अतिरिक्त आयात यूरोपीय खपत का अपेक्षाकृत छोटा हिस्सा होंगे - बीफ के लिए लगभग 1.6 प्रतिशत और पोल्ट्री के लिए 1.4 प्रतिशत। लेकिन किसान संगठनों का तर्क है कि इतनी मात्रा भी पहले से कमजोर बाजार में कीमतों को गिराने के लिए पर्याप्त है।

पर्यावरण संगठनों ने भी इस समझौते पर कड़ी आपत्ति जताई है और यूरोपीय संघ पर जलवायु प्रतिबद्धताओं की अनदेखी करने का आरोप लगाया है। हालांकि समझौते में 2030 के बाद वनों की कटाई रोकने की प्रतिबद्धता शामिल है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि इसमें ठोस और लागू करने योग्य प्रावधानों की कमी है। फ्रेंड्स ऑफ द अर्थ जैसे संगठनों ने इसे “जलवायु के लिए विनाशकारी” करार देते हुए चेतावनी दी है कि इससे अमेजन जैसे वनों से जुड़े क्षेत्रों में कृषि क्षेत्र के विस्तार के लिए वनों की कटाई बढ़ सकती है।

यूरोपियन यूनियन में राजनीतिक विरोध
यूरोपियन यूनियन के भीतर राजनीतिक विरोध भी कम नहीं रहा है। फ्रांस, जो यूरोप का सबसे बड़ा बीफ उत्पादक है, इस समझौते को सिरे से खारिज कर चुका है और इसे किसानों के हितों के खिलाफ बता रहा है। इटली, हंगरी और पोलैंड ने भी विरोध जताया था, जिससे समझौते के अटकने की आशंका बढ़ गई थी। हालांकि अंतिम दौर की बातचीत में इटली के रुख में नरमी आई, जिससे समझौते को सैद्धांतिक मंजूरी मिल सकी।

समझौते में सुरक्षात्मक उपाय
यूरोपीय कमीशन ने समझौते में कई सुरक्षा उपाय भी शामिल किए हैं। यदि किसी एक या अधिक यूरोपीय देशों में संवेदनशील कृषि उत्पादों का आयात तेजी से बढ़ता है या कीमतें गिरती हैं, तो मर्कोसुर को दी गई तरजीही पहुंच को निलंबित किया जा सकता है। हस्तक्षेप के लिए निर्धारित सीमा को 8 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया गया है। इसके अलावा आयोग ने आयात नियंत्रण कड़े करने, निर्यातक देशों में ऑडिट बढ़ाने और कीटनाशकों व पशु कल्याण जैसे मुद्दों पर उत्पादन मानकों के बेहतर तालमेल का अध्ययन करने का वादा किया है।

किसानों को आश्वस्त करने के लिए वित्तीय सुरक्षा उपाय भी प्रस्तावित किए गए हैं। अगले यूरोपियन यूनियन बजट में 6.3 अरब यूरो का संकट कोष रखा गया है, जिसे कृषि बाजारों में गड़बड़ी की स्थिति में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके अलावा 45 अरब यूरो की किसान सहायता राशि पहले जारी की जाएगी। आयोग ने कुछ उर्वरकों पर आयात शुल्क घटाने की भी घोषणा की है, जिनकी कीमतें हाल के वर्षों में 60 प्रतिशत तक बढ़ चुकी हैं।

इन तमाम उपायों के बावजूद विरोध कम होने के आसार नहीं हैं। समझौते को अब यूरोपीय संसद और संभवतः राष्ट्रीय संसदों की मंजूरी भी लेनी होगी, जिससे इसके अनुमोदन की प्रक्रिया राजनीतिक रूप से और जटिल होने की संभावना है।