वैश्विक स्तर पर लगातार बिगड़ रहा मृदा प्रबंधन, बढ़ रहे हैं क्षरण और अन्य खतरेः एफएओ रिपोर्ट

एफएओ ने Status of World’s Soil Resources 2026 रिपोर्ट जारी की है। इसमें चेतावनी दी गई है कि मिट्टी का क्षरण, जैविक कार्बन की कमी, पोषक तत्वों का खराब प्रबंधन, जैव विविधता में गिरावट, लवणता, प्रदूषण और शहरीकरण वैश्विक स्तर पर बढ़ रहे हैं। टिकाऊ मृदा प्रबंधन के उपाय उपलब्ध होने के बावजूद उनका सीमित इस्तेमाल हो रहा है। रिपोर्ट में बेहतर शासन, प्रोत्साहन, निगरानी और किसानों को समर्थन देने पर जोर दिया गया है।

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) ने ‘स्टेटस ऑफ द वर्ल्ड्स सॉयल रिसोर्सेज 2026’ रिपोर्ट जारी की है। इसमें चेतावनी दी गई है कि दुनिया की मिट्टी पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। मृदा क्षरण, मिट्टी में जैविक कार्बन की कमी, पोषक तत्वों का कुप्रबंधन, जैव विविधता का नुकसान, लवणता, प्रदूषण और शहरी विस्तार वैश्विक खाद्य उत्पादन तथा सतत विकास की बुनियाद के लिए गंभीर खतरा बने हुए हैं। 

ग्लोबल सॉयल पार्टनरशिप के इंटरगवर्नमेंटल टेक्निकल पैनल ऑन सॉयल्स (ITPS) द्वारा तैयार इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 2015 में पहली वैश्विक आकलन रिपोर्ट के बाद से मृदा स्वास्थ्य को लेकर वैज्ञानिक ज्ञान और जागरूकता में काफी वृद्धि हुई है। इसके बावजूद टिकाऊ मृदा प्रबंधन (SSM) के उपायों को अपनाने की स्थिति बेहद सीमित है।

लगभग आधे क्षेत्रीय आकलनों में टिकाऊ मृदा प्रबंधन उपायों को अपनाने का स्तर कम या बहुत कम पाया गया है और इसी के साथ मृदा कार्यों को प्रभावित करने वाले खतरे बढ़ रहे हैं। इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि केवल 10 प्रतिशत क्षेत्रीय आकलनों में टिकाऊ मृदा प्रबंधन उपायों को अपनाने की स्थिति में सुधार की प्रवृत्ति दर्ज की गई।

यह चेतावनी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मिट्टी दुनिया के 95 प्रतिशत खाद्य उत्पादन का आधार है, वैश्विक जैव विविधता का लगभग 59 प्रतिशत इस पर आश्रित है और महासागरों के बाद ग्रह का दूसरा सबसे बड़ा कार्बन सिंक है। इसके बावजूद मृदा का क्षरण चिंताजनक गति से जारी है। वर्ष 2015 के बाद से दुनिया की आबादी में करीब 80 करोड़ की वृद्धि हुई है। इसके परिणामस्वरूप प्रमुख फसलों के क्षेत्र में लगभग 24 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जिससे मिट्टी पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है।

मृदा क्षरण सबसे बड़ा खतरा

एफएओ के आकलन किए गए विभिन्न खतरों में मृदा क्षरण अधिकांश क्षेत्रों में सबसे गंभीर और आपस में जुड़ा हुआ खतरा बनकर सामने आया है। रिपोर्ट के अनुसार क्षरण रोकने के मौजूदा प्रयास काफी हद तक अपर्याप्त हैं। अधिकांश आकलनों में क्षरण से संबंधित मृदा प्रबंधन की स्थिति को खराब या बहुत खराब बताया गया है। पिछले वैश्विक आकलन की तुलना में स्थिति और बिगड़ी है। वर्ष 2015 के बाद से 65 प्रतिशत क्षेत्रीय आकलनों में मृदा क्षरण से निपटने के प्रयासों में गिरावट दर्ज की गई।

मृदा क्षरण का असर केवल मिट्टी के भौतिक नुकसान तक सीमित नहीं है। इससे उपजाऊ ऊपरी मिट्टी हट जाती है, जड़ों के विकास के लिए उपलब्ध गहराई कम होती है, पोषक तत्व और मृदा कार्बन नष्ट होते हैं, पानी के जमीन में प्रवेश की क्षमता घटती है और सतही बहाव बढ़ता है। इससे बाढ़ और सूखा, दोनों का जोखिम बढ़ सकता है।

कृषि भूमि पर जल-जनित मृदा क्षरण अक्सर इस्तेमाल की जाने वाली स्वीकार्य सीमा 6 टन प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष से अधिक हो चुका है। एक अनुमान के अनुसार 2012 में औसत वार्षिक मृदा नुकसान लगभग 13 टन प्रति हेक्टेयर था। मक्का और गेहूं की खेती वाली भूमि में यह क्रमशः करीब 11 और 6 टन प्रति हेक्टेयर था। कुछ परिस्थितियों में जुताई से होने वाला कटाव इससे भी गंभीर हो सकता है। क्षेत्रीय अध्ययनों में औसत वार्षिक कटाव लगभग 30.1 टन प्रति हेक्टेयर तक पाया गया है।

एफएओ के अनुसार वनस्पति आवरण - चाहे जीवित पौधों के रूप में हो या फसल अवशेषों के रूप में - जल और हवा दोनों से होने वाले मृदा क्षरण को नियंत्रित करने के सबसे प्रभावी उपायों में शामिल है।

मृदा कार्बन और जैव विविधता पर बढ़ता दबाव

रिपोर्ट में मृदा जैविक कार्बन (SOC) की कमी को भी एक प्रमुख खतरा बताया गया है। कई क्षेत्रों में कार्बन के नुकसान को रोकने वाली कृषि पद्धतियों को अपनाने का स्तर खराब है और कुछ क्षेत्रों में सुधार के बावजूद वैश्विक रुझान लगातार बिगड़ रहा है।

मृदा कार्बन की कमी का असर केवल मिट्टी की उर्वरता तक सीमित नहीं है। इसका संबंध जलवायु परिवर्तन से भी है। मिट्टी एक महत्वपूर्ण कार्बन भंडार है और इसका क्षरण कार्बन को संग्रहित करने तथा अन्य पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएं प्रदान करने की क्षमता को कम कर सकता है। 

रिपोर्ट में मिट्टी में घटती जैव विविधता को वैश्विक स्तर पर सबसे तेजी से बिगड़ने वाले खतरों में शामिल किया गया है। गहन कृषि, बार-बार या गहरी जुताई, अपर्याप्त मृदा आवरण, अनुचित सिंचाई और जल निकासी, कृषि रसायनों का अत्यधिक इस्तेमाल, अत्यधिक चराई और गीली मिट्टी पर भारी मशीनों की आवाजाही मृदा के जैविक समुदायों को नुकसान पहुंचा सकती है।

पोषक तत्वों का गलत इस्तेमाल बना रहा क्षरण का नया चक्र

पोषक तत्वों का प्रबंधन भी एक बड़ी चिंता है। समस्या केवल अत्यधिक उर्वरक इस्तेमाल की नहीं है। एफएओ ने पोषक तत्वों की अधिकता और पोषक तत्वों के खनन, दोनों को समस्या बताया है। अतिरिक्त पोषक तत्व पर्यावरण में चले जाते हैं, जिससे जल प्रदूषण और अन्य पर्यावरणीय समस्याएं पैदा होती हैं। वहीं, मिट्टी में निकाले गए पोषक तत्वों की पर्याप्त भरपाई नहीं होने पर धीरे-धीरे उसकी उर्वरता समाप्त होने लगती है। आकलन में अम्लीकरण को भी पोषक तत्वों के कुप्रबंधन के तहत शामिल किया गया है।

रिपोर्ट पोषक तत्व प्रबंधन के लिए 4R दृष्टिकोण के महत्व पर जोर देती है - सही स्रोत, सही मात्रा, सही समय और सही स्थान पर इस्तेमाल। सही स्रोत और सही मात्रा से पोषक तत्वों की संतुलित आपूर्ति सुनिश्चित करने में मदद मिलती है, जबकि सही समय और स्थान पर उपयोग से पौधों द्वारा पोषक तत्वों का अवशोषण बढ़ता है और नुकसान कम होता है।

लवणता, प्रदूषण और शहरीकरण से बढ़ा दबाव

मिट्टी में नमक का जमाव या लवणता भी गंभीर समस्या बन रही है। टिकाऊ प्रबंधन के लिहाज से कई क्षेत्रों में इसकी स्थिति सामान्य से खराब के बीच है और अनेक क्षेत्रों में स्थिति बिगड़ रही है। खराब सिंचाई एवं जल निकासी, पानी की कमी, अनुचित गुणवत्ता वाले पानी और बदलती जलवायु परिस्थितियां इस समस्या को और गंभीर बना सकती हैं।

मृदा प्रदूषण भी बढ़ती चिंता है। हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों में स्थिति अलग है, एफएओ ने भारी धातुओं, कीटनाशकों और उभरते प्रदूषकों को महत्वपूर्ण खतरे के रूप में चिन्हित किया है। मिट्टी में माइक्रोप्लास्टिक और अन्य नए प्रकार के कार्बनिक यौगिक भी तेजी से पाए जा रहे हैं। मिट्टी में प्रदूषण से मानव, पशु तथा पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य पर भी खतरा पैदा हो सकता है।

दूसरी ओर, तेजी से बढ़ते शहर कृषि भूमि को निगल रहे हैं। शहरीकरण और मृदा सीलिंग (मिट्टी को कंक्रीट, डामर या इमारतों से स्थायी रूप से ढंक देना) यूरोप, एशिया और प्रशांत क्षेत्र के कुछ हिस्सों में विशेष रूप से गंभीर समस्या है। रिपोर्ट के अनुसार भविष्य में भी कृषि भूमि नए शहरी क्षेत्रों के लिए एक प्रमुख स्रोत बनी रह सकती है। इससे खाद्य उत्पादन और शहरी विकास के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी।

समस्या ज्ञान की कमी नहीं, पर अमल का अभाव

एफएओ रिपोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्षों में से एक यह है कि दुनिया को अब काफी हद तक पता है कि क्या किया जाना चाहिए, लेकिन उसे पर्याप्त स्तर पर लागू नहीं किया जा रहा है। सैकड़ों अध्ययनों ने कम या बिना जुताई, कवर क्रॉप, फसल अवशेषों को खेत में बनाए रखना, बायोचार, बेहतर दक्षता वाले उर्वरक, टेरेस फार्मिंग, कृषि वानिकी और एकीकृत मृदा उर्वरता प्रबंधन जैसी पद्धतियों की प्रभावशीलता साबित की है। हालांकि, कोई एक समाधान सभी क्षेत्रों के लिए उपयुक्त नहीं है। प्रत्येक पद्धति की प्रभावशीलता स्थानीय मिट्टी, जलवायु, कृषि प्रणाली और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भर करती है।

रिपोर्ट में इसे ‘जानने और करने’ के बीच की खाई बताया गया है। किसान टिकाऊ मृदा प्रबंधन के लाभों को समझ सकते हैं, लेकिन स्थापित कृषि पद्धतियों में बदलाव करने के लिए उन्हें आर्थिक, संस्थागत और व्यावहारिक बाधाओं का सामना करना पड़ता है।

किसानों द्वारा टिकाऊ मृदा प्रबंधन उपायों को अपनाने की संभावना तब अधिक होती है, जब उनसे कम समय में दिखाई देने वाले लाभ मिलें - जैसे अधिक उपज, बेहतर उर्वरता, कम लागत या सूखे के प्रति अधिक लचीलापन। इसके विपरीत, जिन उपायों का मुख्य लाभ पूरे समाज को मिलता है - जैसे बेहतर जल गुणवत्ता, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी, कार्बन का भंडारण और जैव विविधता का संरक्षण - वे किसानों के लिए कम आकर्षक हो सकते हैं, खासकर जब उनके आर्थिक लाभ देर से मिलते हों।

प्रोत्साहन, बेहतर शासन और किसानों के मजबूत समर्थन की जरूरत

एफएओ का निष्कर्ष है कि केवल तकनीकी सलाह के आधार पर टिकाऊ मृदा प्रबंधन हासिल नहीं किया जा सकता। शुरुआती लागत की भरपाई, बदलाव से जुड़े जोखिमों को कम करने और टिकाऊ उपायों से किसानों को दीर्घकालिक लाभ दिलाने के लिए नीतियों, वित्तीय प्रोत्साहनों और बाजार आधारित उपायों की जरूरत है।

एफएओ समय पर और आसानी से उपलब्ध मृदा संबंधी जानकारी, मजबूत कृषि विस्तार एवं तकनीकी सलाह सेवाओं तथा ऐसे उपकरण विकसित करने की भी सिफारिश करता है, जो वैज्ञानिक जानकारी को किसानों के लिए व्यावहारिक सलाह में बदल सकें।

मृदा प्रबंधन कार्यक्रमों में पारंपरिक और पुराने ज्ञान को भी शामिल किया जाना चाहिए। रिपोर्ट के अनुसार स्थानीय ज्ञान और समुदायों की अनदेखी करने वाले कार्यक्रमों के असफल होने की संभावना अधिक रहती है। इसलिए टिकाऊ मृदा प्रबंधन कार्यक्रमों को बनाने और उनके क्रियान्वयन में किसानों और स्थानीय समुदायों को शामिल किया जाना चाहिए। वैज्ञानिक ज्ञान को स्थानीय स्तर पर विकसित कृषि पद्धतियों के साथ जोड़ना जरूरी है। महिला किसानों के बीच भूमि अधिकार या निर्णय लेने की सीमित क्षमता जैसी लैंगिक असमानताओं पर भी ध्यान देने की जरूरत है।

मृदा क्षरण रोकने के लिए एकीकृत कार्रवाई जरूरी

एफएओ इस बात पर जोर देता है कि मृदा से जुड़े खतरे एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इसलिए इनके समाधान भी अलग-अलग नहीं, बल्कि एकीकृत होने चाहिए। उदाहरण के लिए, मृदा क्षरण को रोकने से एक साथ मृदा कार्बन का संरक्षण, पोषक तत्वों की साइक्लिंग, जैव विविधता और जलवायु संबंधी दबावों के प्रति मिट्टी की सहनशीलता बेहतर हो सकती है। एकीकृत मृदा उर्वरता प्रबंधन में खनिज उर्वरकों और दलहनी फसलों का संयोजन किया जा सकता है। इसी तरह कृषि वानिकी स्थायी मृदा आवरण, विविध जड़ प्रणालियां और अतिरिक्त जैविक पदार्थ उपलब्ध करा सकती है।

रिपोर्ट का केंद्रीय संदेश स्पष्ट है कि मृदा क्षरण अपरिहार्य नहीं है। लेकिन इसे उलटने के लिए बेहतर मृदा शासन, लक्षित प्रोत्साहन, अनुसंधान और कृषि विस्तार में अधिक निवेश, बेहतर मृदा निगरानी तथा सरकारों, किसानों, वैज्ञानिकों, निजी क्षेत्र और स्थानीय समुदायों के बीच मजबूत सहयोग जरूरी है।

एफएओ ने टिकाऊ मृदा प्रबंधन के लिए वैश्विक स्तर पर नए सिरे से प्रतिबद्धता की जरूरत बताई है। इसमें मृदा शासन को मजबूत करना, मृदा संबंधी ज्ञान और जागरूकता बढ़ाना, शिक्षा एवं कृषि विस्तार सेवाओं का विस्तार, मृदा आकलन और निगरानी की सामंजस्यपूर्ण प्रणालियां विकसित करना, पारंपरिक और आदिवासी ज्ञान का सम्मान एवं समावेश, लक्षित वित्तीय और बाजार प्रोत्साहन उपलब्ध कराना, क्षरित मिट्टी का पुनरुद्धार तथा तकनीकी सहयोग और निवेश बढ़ाना शामिल है।

रिपोर्ट के अनुसार प्रभावी शासन और प्रोत्साहन विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि टिकाऊ मृदा प्रबंधन को बड़े पैमाने पर अपनाने में मुख्य बाधा समाधान का अभाव नहीं, बल्कि ऐसा सक्षम वातावरण न होना है जिसमें इन समाधानों को व्यवहार में लागू किया जा सके।