अमेरिका के वर्मोंट राज्य ने पैराक्वाट खरपतवार नाशक पर लगाया प्रतिबंध, स्वास्थ्य संकट के बीच भारत में समीक्षा

अमेरिका का वर्मोंट पैराक्वाट पर प्रतिबंध लगाने वाला वहां का पहला राज्य बन गया है। यह फैसला उस वैज्ञानिक शोध के आधार पर लिया गया है, जिसमें कहा गया है कि इस खरपतवारनाशक से पार्किंसन रोग का खतरा है। वहीं तेलंगाना में प्रतिबंध के बाद भारत में पैराक्वाट डाइक्लोराइड और कार्बोसल्फान की समीक्षा की जा रही है।

अमेरिका के वर्मोंट राज्य ने पैराक्वाट कीटनाशक पर प्रतिबंध लगा दिया है। ऐसा करने वाला वह अमेरिका का पहला राज्य बन गया है। वर्मोंट सरकार ने प्रतिबंध के पीछे बढ़ते वैज्ञानिक प्रमाणों का हवाला दिया है, जिनमें इस खरपतवारनाशक से पार्किंसन रोग होने की बात कही गई है। भारत में भी तेलंगाना में प्रतिबंध के बाद सरकार पैराक्वाट डाइक्लोराइड और कार्बोसल्फान की बिक्री और प्रयोग की समीक्षा कर रही है।

वर्मोंट के गवर्नर फिल स्कॉट ने पैराक्वाट पर प्रतिबंध संबंधित कानून पर हस्ताक्षर किए। यह प्रतिबंध 1 नवंबर 2026 से लागू होगा। हालांकि, कानून में 2030 के अंत तक कुछ फलों के लिए सीमित छूट का प्रावधान रखा गया है। साथ ही राज्य में पैराक्वाट के उपयोग की वार्षिक रिपोर्टिंग और किसानों के लिए सुरक्षित विकल्पों पर सरकारी अध्ययन का भी प्रावधान किया गया है।

यह कदम ऐसे समय आया है जब दुनिया भर में पैराक्वाट की सुरक्षा को लेकर जांच और बहस तेज हो गई है। पैराक्वाट दुनिया में सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाले खरपतवारनाशी रसायनों में से एक है। अमेरिका में इसका उपयोग सोयाबीन, कपास, मक्का, अंगूर और मूंगफली जैसी फसलों में लंबे समय से किया जाता रहा है। भारत में इसका इस्तेमाल चाय, कपास, आलू, मक्का, कॉफी, रबर और बागान फसलों में व्यापक रूप से होता है।

वर्मोंट में प्रतिबंध के समर्थकों ने कई वैज्ञानिक अध्ययनों का हवाला दिया, जिनमें अमेरिकी नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ (NIH) का शोध भी शामिल है। इन अध्ययनों के अनुसार, पैराक्वाट के संपर्क में आने से पार्किंसन रोग का खतरा काफी बढ़ जाता है। यह एक न्यूरोलॉजिकल बीमारी है, जिसमें मस्तिष्क की डोपामिन बनाने वाली कोशिकाएं धीरे-धीरे नष्ट होने लगती हैं।

इस मुद्दे ने कृषि रसायन कंपनी सिंजेंटा एजी पर कानूनी और नियामकीय दबाव भी बढ़ा दिया है। सिंजेंटा कई दशकों से पैराक्वाट की प्रमुख निर्माता है। अमेरिका की अदालतों में वर्तमान में 8,000 से अधिक मुकदमे लंबित हैं, जिनमें आरोप लगाया गया है कि लंबे समय तक पैराक्वाट के संपर्क में रहने से पार्किंसन रोग हुआ और कंपनियों ने इसके जोखिमों के बारे में पर्याप्त चेतावनी नहीं दी।

द गार्जियन और द न्यू लेडे द्वारा प्रकाशित खोजी रिपोर्टों में आंतरिक कॉर्पोरेट दस्तावेजों के आधार पर आरोप लगाया गया कि सिंजेंटा और पूर्ववर्ती कंपनियां लंबे समय से पैराक्वाट और न्यूरोलॉजिकल बीमारियों के संभावित संबंधों को लेकर चिंतित थीं। रिपोर्टों में दावा किया गया कि कंपनी ने वैज्ञानिक निष्कर्षों को कमतर दिखाने और नियामकीय फैसलों को प्रभावित करने की कोशिश की ताकि इस रसायन की बिक्री जारी रह सके।

हालांकि, सिंजेंटा ने लगातार पैराक्वाट और पार्किंसन रोग के बीच किसी भी संबंध से इनकार किया है। कंपनी का कहना है कि ऐसा कोई विश्वसनीय वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है जो उसके उत्पाद और इस बीमारी के बीच प्रत्यक्ष कारण संबंध स्थापित करता हो। इस वर्ष अप्रैल में सिंजेंटा ने घोषणा की थी कि वह अमेरिका और कुछ अन्य बाजारों में पैराक्वाट का उत्पादन और बिक्री बंद कर देगी। हालांकि, अन्य कंपनियों द्वारा बनाए गए जेनेरिक संस्करण अब भी बाजार में उपलब्ध हैं।

भारत में भी पैराक्वाट को लेकर बहस तेज हो गई है, क्योंकि सरकार तेलंगाना में कुछ घटनाओं और प्रतिबंधों के बाद पैराक्वाट डाइक्लोराइड और कार्बोसल्फान के उपयोग की समीक्षा कर रही है। उद्योग संगठन क्रॉपलाइफ इंडिया ने किसी भी अचानक प्रतिबंध का कड़ा विरोध किया है। संगठन का कहना है कि इन उत्पादों पर रोक लगाने से किसान आत्महत्याओं के मूल कारण समाप्त नहीं होंगे, बल्कि किसानों की आर्थिक परेशानियां और बढ़ सकती हैं।

क्रॉपलाइफ इंडिया के अनुसार, विभिन्न अध्ययनों से यह स्पष्ट है कि किसानों की आत्महत्या के प्रमुख कारण कर्ज, फसल खराब होना, वैकल्पिक आय के अवसरों की कमी और जलवायु संबंधी नुकसान हैं, न कि कीटनाशकों की उपलब्धता। 

संगठन ने इंडियन जर्नल ऑफ कम्युनिटी मेडिसिन में प्रकाशित 2024 के एक अध्ययन का हवाला देते हुए कहा कि तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में किसान आत्महत्याओं के पीछे मुख्य कारण आर्थिक संकट और कर्ज का जाल पाया गया। क्रॉपलाइफ इंडिया ने इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एनवायरनमेंट एंड डेवलपमेंट के शोध का भी उल्लेख किया, जिसमें वर्षा की कमी और किसान आत्महत्याओं में वृद्धि के बीच मजबूत संबंध पाया गया।

क्रॉपलाइफ इंडिया के चेयरमैन और क्रिस्टल क्रॉप प्रोटेक्शन लिमिटेड के एग्जीक्यूटिव चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक अंकुर अग्रवाल ने कहा, “उत्पाद पर बहस करते समय हम किसान आत्महत्या के वास्तविक मुद्दे से भटक रहे हैं।” उन्होंने कहा, “उत्पाद हटाने से किसान का कर्ज, फसल खराब होने का डर और भविष्य की अनिश्चितता खत्म नहीं होती। यदि उद्देश्य जान बचाना है, तो समाधान ऐसे होने चाहिए जो किसानों को ऋण सुविधा, उचित फसल मूल्य, फसल बीमा और प्रशिक्षण उपलब्ध कराएं।”

उद्योग संगठन ने चेतावनी दी कि मौजूदा खरीफ बुआई सीजन के दौरान पैराक्वाट पर प्रतिबंध लगाने से किसानों की उत्पादन लागत तेजी से बढ़ सकती है, जबकि वे पहले से ही श्रमिकों की कमी और बढ़ती इनपुट लागत से जूझ रहे हैं।

डायरेक्टरेट ऑफ वीड रिसर्च के एक अध्ययन के अनुसार, खरपतवारों के कारण भारत में हर साल लगभग 92,000 करोड़ रुपये की फसल उत्पादकता का नुकसान होता है। क्रॉपलाइफ इंडिया का कहना है कि पैराक्वाट का उपयोग वर्तमान में लगभग 80 लाख एकड़ क्षेत्र में किया जाता है और यह विशेष रूप से छोटे एवं सीमांत किसानों के लिए किफायती खरपतवार नियंत्रण समाधान बना हुआ है।

वहीं दूसरी ओर, स्वास्थ्य और पर्यावरण समूह पैराक्वाट पर सख्त नियंत्रण या पूर्ण प्रतिबंध की मांग कर रहे हैं। उनका तर्क है कि बढ़ते वैज्ञानिक प्रमाण और वैश्विक नियामकीय रुझान एहतियाती कदम उठाने को उचित ठहराते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, पिछले 25 वर्षों में दुनिया भर में पार्किंसन रोग के मामलों की संख्या दोगुनी से अधिक हो चुकी है और आने वाले दशकों में इसके और बढ़ने की आशंका है।