भारत में इस वर्ष दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से कम रहने की संभावना है, जिससे कृषि उत्पादन, खाद्य महंगाई और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ गई है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार जून से सितंबर के दौरान होने वाली बारिश दीर्घकालिक औसत (LPA) के लगभग 92% रहने का अनुमान है, जो ‘सामान्य से कम’ श्रेणी में आता है।
आईएमडी के मुताबिक, मानसून की बारिश दीर्घकालिक औसत 87 सेमी से करीब 8% कम रहने की संभावना है। इसमें ±5% की त्रुटि हो सकती है। यह पूर्वानुमान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मानसून भारत की कृषि के लिए बेहद अहम है, खासकर खरीफ फसलों के लिए। देश के कुल खाद्यान्न उत्पादन का आधे से अधिक हिस्सा इसी सीजन में होता है।
एक सप्ताह पहले निजी मौसम पूर्वानुमान एजेंसी स्काईमेट ने भी दक्षिण-पश्चिम मानसून के सामान्य से कम रहने का अनुमान जताया था। एजेंसी के अनुसार, मानसून दीर्घकालिक औसत (868.6 मिमी) के 94% रहने की संभावना है। जून में वर्षा 101% के साथ सामान्य के करीब रह सकती है, लेकिन जुलाई में 95%, अगस्त में 92% और सितंबर में 89% तक कमजोर पड़ने का अनुमान है।
भारतीय मौसम विभाग के पूर्वानुमान के अनुसार, सामान्य से कम वर्षा की 31% और सामान्य से काफी कम वर्षा की 35% संभावना है। इसका प्रभाव मानसून कोर जोन में अधिक देखने को मिल सकता है, जिसमें मध्य और पश्चिम भारत के वे बड़े हिस्से शामिल हैं जो कृषि के लिए वर्षा पर अत्यधिक निर्भर हैं।
औसत से कम बारिश का एक प्रमुख कारण जून के बाद अलनीनो परिस्थितियां विकसित होने की आशंका है। अलनीनो प्रशांत महासागर की सतह के तापमान में वृद्धि से जुड़ी जलवायु घटना है। यह ऐतिहासिक रूप से भारत में कमजोर मानसून से जुड़ी रही है। वर्ष 1980 के बाद के लगभग 70% अलनीनो वर्षों में देश में कम वर्षा दर्ज की गई है।
मौसम विभाग ने चेतावनी दी है कि अलनीनो का प्रभाव विशेष रूप से मानसून के दूसरे हिस्से, यानी अगस्त और सितंबर में पड़ सकता है। इससे पहले भी अलनीनो के कारण अनियमित वर्षा पैटर्न से 2023-24 फसल वर्ष में खाद्यान्न उत्पादन 6.1% तक घट गया था।
हालांकि, कुछ राहत देने वाले कारक भी हो सकते हैं। मौसम विज्ञान विभाग ने कहा है कि मानसून के उत्तरार्ध में विकसित होने वाली इंडियन ओशन डाइपोल (IOD) की सकारात्मक स्थिति, अलनीनो के प्रतिकूल प्रभाव को आंशिक रूप से कम कर सकती है। आमतौर पर सकारात्मक IOD से भारत में बेहतर वर्षा होती है, हालांकि इसके व्यवहार का सटीक अनुमान लगाना कठिन होता है।
औसत से कम मानसून के इस पूर्वानुमान ने अर्थशास्त्रियों और नीति-निर्माताओं के बीच चिंता बढ़ा दी है, खासकर पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के संदर्भ में। ईरान युद्ध ने वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को बाधित किया है, जिससे उर्वरक और ऊर्जा जैसे कृषि के लिए महत्वपूर्ण इनपुट की लागत में वृद्धि हुई है।
किसानों के लिए कम वर्षा और बढ़ती लागत का दोहरा संकट बुवाई के फैसले, फसल उत्पादन और कुल कृषि आय को प्रभावित कर सकता है। दलहन और तिलहन जैसी फसलें वर्षा की अनिश्चितता के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील होती हैं, और उत्पादन में किसी भी कमी से घरेलू बाजार में कीमतें बढ़ सकती हैं। हालांकि पर्याप्त बफर स्टॉक के कारण सरकार को धान उत्पादन को लेकर ज्यादा चिंता नहीं होगी, लेकिन अन्य फसलों के उत्पादन में गिरावट खाद्य महंगाई पर दबाव बढ़ा सकती है।