साल 2026-27 देश के कृषि क्षेत्र के लिए असामान्य साबित होने जा रहा है। भारतीय कृषि क्षेत्र की विकास दर काफी हद तक मानसून पर निर्भर करती है और इस साल दक्षिण-पश्चिम मानसून की बारिश सामान्य से 13 फीसदी कम रही है। लेकिन चिंता की बात है कि देश के कई हिस्सों में बारिश सामान्य से 40 से 60 फीसदी तक कम रही है। इसका असर खरीफ सीजन के उत्पादन पर पड़ा है और आगामी रबी सीजन पर भी इसका असर दिखेगा। नतीजा यह होगा कि पिछले साल (2025-26) की पहली तिमाही में 4.4 फीसदी की वृद्धि के मुकाबले इस साल (2026-27) की पहली तिमाही में 3.6 फीसदी रही है लेकिन इस शुरुआती आंकड़े के स्थिति स्पष्ट नहीं होती है और चालू साल में कृषि और सहयोगी क्षेत्र के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में गिरावट होना लगभग तय है।
हालांकि कुछ आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था पर अब सूखे का असर नहीं पड़ता, यानी वह ‘ड्राउट प्रूफ’ हो गई है। रिजर्व बैंक ने चालू साल में भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर के अनुमान को 6.7 फीसदी से बढ़ाकर 7.1 फीसदी कर दिया है। असल में यही वह धारणा है जो कृषि और सहयोगी क्षेत्र और उस पर जीवन बसर करने वाले लोगों तथा अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्रों के बीच खाई को बढ़ा रही है।
किसानों की आय पर असर
महंगाई दर भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के सहनीय स्तर चार फीसदी (+/- 2%) से अधिक होने पर रिजर्व बैंक ने कई साल बाद नीतिगत ब्याज दरों में बढ़ोतरी की है। आने वाली मौद्रिक नीति समीक्षाओं में भी ब्याज दरों में बढ़ोतरी होने के आसार हैं। इसलिए जीडीपी ग्रोथ के कृषि से डि-कप्लिंग जैसी धारणा अभी उतना पुख्ता नहीं है जैसा कुछ एक्सपर्ट मान रहे हैं। टैक्टरों की बिक्री मेंं मासिक आधार पर अगस्त में 25.03 फीसदी और सितंबर में 12.58 फीसदी की गिरावट (स्रोतः फाडा) इस बात का संकेत है कि किसानों की खर्च करने की क्षमता प्रभावित हुई है। इसी तरह का असर ग्रामीण क्षेत्र से आने वाली दूसरे उत्पादों की मांग पर पड़ेगा।
कमजोर मानसून और कमजोर फसल उत्पादन से सबसे अधिक प्रभावित होने वाला वर्ग किसानों का है क्योंकि इससे उनकी आय में सीधे गिरावट हो रही है। सरकार ने चालू साल के लिए खाद्यान्न उत्पादन के अनुमानों में कमी कर दी है। चावल का उत्पादन कम होगा। दालों और तिलहन का उत्पाद भी गिर रहा है क्योंकि देश में दालों के सबसे बड़े उत्पादक क्षेत्रों में शुमार महाराष्ट्र, कर्नाटक और मध्य प्रदेश व राजस्थान में बारिश कम हुई है। इसका असर रबी में भी इन फसलों पर पड़ने वाला है क्योंकि पानी की कमी के कारण महाराष्ट्र और कर्नाटक समेत कई राज्यों में किसान रबी फसलों की बुवाई से भी बच रहे हैं।
रबी फसलों पर प्रभाव
जिस तरह अल-नीनो का प्रभाव फरवरी, 2027 तक रहने के आसार हैं, उसके चलते सर्दियों में बारिश में कमी आएगी और उसका गेहूं उत्पादन पर भी असर पड़ना तय है। दो मुख्य नकदी फसलों, कपास और गन्ने का उत्पादन पिछले साल कम रहने के बाद चालू साल में भी इनका उत्पादन गिर रहा है। कपास के घटते उत्पादन के चलते हम शुद्ध आयातक देश बन गये हैं, वहीं कम चीनी उत्पादन के चलते सरकार को घरेलू बाजार के लिए चीनी आयात की अनुमति देनी पड़ी है।
गन्ने के मामले में सरकार ने रिकॉर्ड उत्पादन के अपने आंकड़े को काफी देर से दुरुस्त किया और तब तक देश में चीनी आयात की नौबत आ गई थी। चालू पेराई सीजन (2026-27) में दोनों बड़े गन्ना उत्पादक राज्यों उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में गन्ने का क्षेत्रफल गिरा है। अमेरिकी कृषि विभाग (यूएसडीए) के ताजा आकलन के मुताबिक इस साल गन्ने का उत्पादन 425 मिलियन टन से भी कम रहेगा। साथ ही करीब 285 लाख टन चीनी की घरेलू खपत के लिए इस साल उत्पादन होगा, इसको लेकर भी संदेह है। मराठवाड़ा और पश्चिम महाराष्ट्र में गन्ने की नई फसल की प्लांटिंग धीमी रही है। जिसका असर पेराई सीजन 2027-28 में भी पड़ेगा। वहीं उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र में बाढ़ से गन्ने की फसल प्रभावित हुई है, इसलिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश में फसल सामान्य होने के बावजूद राज्य स्तर पर उत्पादन पिछले साल से कम रहने के आसार हैं।
महाराष्ट्र ने 265 तालुका में सूखे की घोषणा भी कर दी है वहीं कर्नाटक और आंध्र में भी इस तरह की कवायद चल रही है। ऐसे में राज्य सरकारों पर प्रभावित किसानों की मदद करने का दबाव है। लेकिन यहां एक बड़ा पहलू केंद्र सरकार का है। उसने देश में कमजोर बारिश से प्रभावित किसानों के लिए अभी तक किसी राहत पैकेज की घोषणा नहीं की है। इस तरह की परिस्थिति में सरकारें किसानों के लिए पैकेज घोषित करती रही हैं, जिनमें एक बड़ा कदम कृषि ऋणों की रिस्ट्रक्चरिंग का रहा है। किसानों को बिना किसी जुर्माने के कर्ज चुकाने के लिए अतिरिक्त समय इस तरह की राहत के तहत दिया जाता रहा है। लेकिन इस मोर्चे पर केंद्र सरकार ने अभी तक कोई पहल नहीं की है।
सरकार के लिए राहत की बात यह है कि खाद्यान्न भंडार बेहतर स्थिति में हैं और उनकी कीमतों को नियंत्रित करने की क्षमता सरकार के पास है। लेकिन सवाल यह है के जिन किसानों की बदौलत यह भंडार हैं उनकी मुश्किल के समय मदद के कदम में देरी क्यों हो रही है।
दाम बढ़े, लेकिन किसान मायूस
कृषि उत्पादन में गिरावट का असर दिखने लगा है। चना की कीमतों में लगातर बढ़ोतरी हो रही है और इसकी खुदरा कीमत 90 रुपये किलो हो गई है। अगले एक माह में इसके 100 रुपये किलो को पार कर जाने के कयास कमोडिटी एक्सपर्ट्स लगा रहे हैं। दूसरी दालों के दाम भी बढ़ रहे हैं। जरूरत से ज्यादा सख्ती के जरिये सरकार ने चीनी की कीमतों में आई तेजी पर अंकुश लगाया है, लेकिन बेहतर कीमतों की स्थिति में आगामी पेराई सीजन में राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) में बढ़ोतरी की संभावना को सरकार की इस सख्ती ने कमजोर कर दिया है। गन्ने का एसएपी तय करने वाले राज्यों में उत्तर प्रदेश सबसे बड़ा है और वहां पिछले सीजन में एसएपी 400 रुपये प्रति क्विंटल था। अगले छह माह के भीतर उत्तर प्रदेश में विधान सभा के चुनाव होने हैं। ऐसे में किसानों को बेहतर कीमत वृद्धि की उम्मीद थी लेकिन जिस तरह से सरकार की सख्ती के बाद चीनी की एक्स-फैक्टरी कीमतें गिरकर 4300-4400 रुपये प्रति क्विंटल पर आ गई है, उसे देखते हुए एसएपी में बड़ी बढ़ोतरी की गुंजाइश कम हो गई है।
मक्का और सोयाबीन का उत्पादन कम होने के चलते पशु चारे और पोल्ट्री फीड की कीमतें बढ़ी हैं। मक्का और सोयाबीन के दाम बढ़ने से अंडे व दूसरे पोल्ट्री उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी की यह एक बड़ी वजह है। सरकार ने रबी सीजन की फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की घोषणा कर दी है और गेहूं के एमएसपी में बढ़ोतरी की दर करीब 20 साल में सबसे कम रही है। सरकार ने इसमें केवल 25 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की है। चने का एमएसपी भी कम बढ़ा है, हालांकि दालों और तिलहन के एमएसपी में बढ़ोतरी की गई है। लेकिन यह फैसला भी साबित करता है कि जब किसानों को बेहतर बढ़ोतरी की जरूरत थी तो उस समय सरकार ने महंगाई को नियंत्रित करने पर अधिक जोर दिया है और उसे रिजर्व बैंक की महंगाई को काबू में रखने की नीति के नतीजे के रूप में देखा जा सकता है। तिलहन और दालों का उत्पादन बढ़ाने के मिशन के बावजूद खाद्य तेलों में आयात निर्भरता 60 फीसदी बनी हुई है और दालों का आयात भी बढ़ रहा है। यह इस बात का संकेत है कि इन उत्पादों से संबंधित सरकार के नीतिगत कदम कामयाब नहीं हो रहे हैं।
भारत ही नहीं, दुनिया भर में इस साल कृषि उत्पादन कमजोर रहेगा और यही वजह है कि हर माह एफएओ का फूड इंडेक्स ऊपर की ओर जा रहा है। ऐसा भी कहा जा रहा है कि कृषि और सहयोगी क्षेत्र की वृद्धि दर अब फसलों के अलावा दूसरे उत्पादों जैसे डेयरी व पशुपालन, मछली पालन और बागवानी फसलों से आ रही है। लेकिन यह अधूरे सच की तरह है क्योंकि इन क्षेत्रों के उत्पादन के आंकड़ों में बहुत पारदर्शिता नहीं है।
देश की कुल कामकाजी आबादी का 46 फीसदी से अधिक अब भी कृषि क्षेत्र में है जबकि जीडीपी में कृषि की हिस्सेदारी के करीब 18 फीसदी है। ऐसे में कृषि और अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों के बीच अंतर बढ़ रहा है। बेहतर होगा कि सरकार कमजोर वृद्धि दर से जूझ रहे कृषि क्षेत्र लिए समय रहते राहत पैकेज घोषित करे ताकि किसानों को हुए नुकसान की भरपाई की जा सके।