भारत-ब्रिटेन CETA लागू: कृषि और श्रम-प्रधान निर्यात क्षेत्रों के लिए अवसर, लेकिन बाजार तक पहुंच आसान नहीं

भारत-ब्रिटेन CETA 15 जुलाई से लागू हो गया है। इससे कृषि, प्रसंस्कृत खाद्य, वस्त्र और समुद्री उत्पादों के निर्यात के अवसर मिलेंगे, लेकिन वास्तविक लाभ ब्रिटेन के क्वालिटी स्टैंडर्ड और रूल्स ऑफ ओरिजिन के अनुपालन पर निर्भर करेगा। वस्तुओं के व्यापार में ब्रिटेन को अपेक्षाकृत अधिक व्यावसायिक लाभ मिलने की संभावना है।

एआई इमेज।

भारत और ब्रिटेन के बीच व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौता (CETA) 15 जुलाई से लागू हो गया है। यह समझौता कृषि, प्रसंस्कृत खाद्य, वस्त्र और समुद्री उत्पादों सहित कई भारतीय निर्यात क्षेत्रों के लिए नए अवसर लेकर आया है। हालांकि, इन अवसरों का वास्तविक लाभ केवल शुल्क में कमी से नहीं, बल्कि ब्रिटेन के कड़े गुणवत्ता, खाद्य सुरक्षा और रूल्स ऑफ ओरिजिन का पालन करने की क्षमता पर निर्भर करेगा।

कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य क्षेत्र के लिए नए अवसर

सीईटीए से कृषि एवं खाद्य उत्पादों के निर्यात में वृद्धि की संभावना है, हालांकि इसके लिए ब्रिटेन के सख्त सैनिटरी एवं फाइटोसैनिटरी (एसपीएस) मानकों का पालन अनिवार्य होगा। प्रसंस्कृत खाद्य क्षेत्र सबसे बड़े अवसरों में से एक माना जा रहा है। ब्रिटेन हर वर्ष 33.4 अरब डॉलर का प्रसंस्कृत खाद्य आयात करता है, लेकिन इसमें भारत की हिस्सेदारी केवल 35.4 करोड़ डॉलर (1.1 प्रतिशत) है। तैयार खाद्य (रेडी-टू-ईट), बेकरी उत्पाद, कन्फेक्शनरी, सॉस और एथनिक फूड जैसे उत्पादों के लिए शुल्क में कमी दूसरे देशों से प्रतिस्पर्धा में बढ़त दे सकती है। हालांकि खाद्य सुरक्षा, लेबलिंग और ट्रेसबिलिटी के कड़े मानकों का पालन करना होगा।

इसी तरह अनाज, फल, सब्जियां और मसालों के निर्यात में भी संभावनाएं हैं। वैश्विक स्तर पर भारत इन उत्पादों का 25.6 अरब डॉलर का निर्यात करता है, जबकि ब्रिटेन के 23.2 अरब डॉलर के आयात बाजार में भारत की हिस्सेदारी केवल 3.1 प्रतिशत है। सीईटीए से कुछ उत्पादों की प्रतिस्पर्धा स्थिति बेहतर हो सकती है, लेकिन एसपीएस नियम और संवेदनशील वस्तुओं पर संरक्षण लाभ को सीमित कर सकते हैं।

समुद्री उत्पादों में भी बड़ा अवसर दिखाई देता है। ब्रिटेन के 17.2 अरब डॉलर के मछली और मांस आयात बाजार में भारत की हिस्सेदारी केवल 12.6 करोड़ डॉलर (0.7 प्रतिशत) है। शुल्क में कमी से भारत की प्रतिस्पर्धा की क्षमता बढ़ सकती है, लेकिन अवशेष (रेजिड्यू) मानक, स्वच्छता और ट्रेसबिलिटी संबंधी नियमों का पालन अनिवार्य रहेगा।

भारत ने डेयरी उत्पाद, सेब, पनीर, ओट्स और कुछ खाद्य तेलों जैसे संवेदनशील कृषि उत्पादों को शुल्क रियायतों से बाहर रखा है, जिससे इन क्षेत्रों में घरेलू उत्पादकों को संरक्षण मिलने की उम्मीद है।

श्रम-प्रधान उद्योगों को मिलेगा सबसे अधिक लाभ

CETA के तहत ब्रिटेन लगभग सभी भारतीय निर्यात पर आयात शुल्क समाप्त करेगा। हालांकि ‘99 प्रतिशत भारतीय निर्यात को शुल्क-मुक्त पहुंच’ का दावा पूरी तस्वीर नहीं बताता। पेट्रोलियम उत्पाद, दवाइयां, कट एवं पॉलिश किए गए हीरे और विमान कलपुर्जे जैसे भारत के आधे से अधिक निर्यात पहले से ही ब्रिटेन में बिना शुल्क के प्रवेश कर रहे थे। वास्तविक लाभ लगभग 6 अरब डॉलर के उन उत्पादों तक सीमित है, जिन पर पहले 4 से 16 प्रतिशत तक शुल्क लगता था।

सबसे अधिक फायदा परिधान उद्योग को मिलने की संभावना है। पहले जिन उत्पादों पर 12 प्रतिशत तक शुल्क लगता था, वे अब पहले दिन से ही शुल्क-मुक्त हो जाएंगे। भारत पहले से ही ब्रिटेन को 1.3 अरब डॉलर से अधिक के परिधान निर्यात करता है और वहां के कुल परिधान आयात में उसकी हिस्सेदारी 6 प्रतिशत से अधिक है।

इसी प्रकार वस्त्र, चमड़ा, फुटवियर और कालीन उद्योगों को भी महत्वपूर्ण लाभ मिल सकता है। इन उत्पादों पर पहले 16 प्रतिशत तक शुल्क लगता था, इसलिए शुल्क समाप्त होने से इनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ेगी।

भारत के बाजार तक ब्रिटेन की पहुंच अधिक महत्वपूर्ण

भारत को ब्रिटेन के बाजार में बेहतर पहुंच मिलने के साथ-साथ ब्रिटेन को भी भारत के अपेक्षाकृत उच्च शुल्क वाले बाजार तक व्यापक पहुंच मिलेगी। वर्तमान में ब्रिटेन के लगभग 93 प्रतिशत उत्पादों पर भारत में मध्यम या ऊंचा आयात शुल्क लगता है। सीईटीए के तहत भारत पहले दिन से लगभग 64 प्रतिशत ब्रिटिश उत्पादों पर शुल्क समाप्त करेगा। इनमें मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, विमान कलपुर्जे, सैल्मन और भेड़ का मांस शामिल हैं। इसके अतिरिक्त चॉकलेट, कॉस्मेटिक्स, पेय पदार्थ, ऑटो पार्ट्स और सॉफ्ट ड्रिंक जैसे 26 प्रतिशत उत्पादों पर शुल्क चरणबद्ध तरीके से कम किया जाएगा।

समझौते में वित्तीय सेवाओं, डिजिटल व्यापार, बौद्धिक संपदा और नियामकीय पारदर्शिता से जुड़े प्रावधान भी शामिल हैं। इससे ब्रिटिश निवेशकों को अधिक कानूनी स्पष्टता मिलेगी, हालांकि भविष्य में भारत ने नीतिगत लचीलेपन का विकल्प खुला रखा है, जिस पर इसका प्रभाव पड़ सकता है।

केवल शुल्क में कमी से नहीं बढ़ेगा निर्यात

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल शुल्क घटने से निर्यात नहीं बढ़ेगा। भारतीय निर्यातकों को रूल्स ऑफ ओरिजिन, तकनीकी मानकों, प्रमाणन और खाद्य सुरक्षा संबंधी सभी आवश्यकताओं का पालन करना होगा। यदि ये शर्तें पूरी नहीं होतीं, तो शुल्क रियायतों का लाभ नहीं मिल पाएगा। साथ ही, जिन देशों को पहले से ब्रिटेन के साथ वरीयता प्राप्त व्यापार समझौतों का लाभ मिल रहा है, उनसे प्रतिस्पर्धा भी भारतीय निर्यातकों के लिए चुनौती बनी रहेगी।

मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, धातु उत्पाद और ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्रों में भी निर्यात वृद्धि केवल शुल्क कटौती पर नहीं, बल्कि तकनीकी क्षमता, प्रमाणन और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में बेहतर इंटीग्रेशन पर निर्भर करेगी।

सेवा क्षेत्र में भारत की बढ़त बरकरार

भारत वस्तुओं और सेवाओं दोनों में ब्रिटेन के साथ ट्रेड सरप्लस की स्थिति में है, हालांकि सबसे बड़ा लाभ सेवा क्षेत्र में है। दोनों देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं का कुल सालाना व्यापार लगभग 66 अरब डॉलर का है, जिसमें लगभग दो-तिहाई हिस्सा (41.3 अरब डॉलर) सेवाओं का है। सूचना प्रौद्योगिकी, व्यावसायिक सेवाओं और पेशेवर सेवाओं में भारत की मजबूत स्थिति बनी हुई है।

पिछले वर्ष भारत ने ब्रिटेन के 13.4 अरब डॉलर और ब्रिटेन ने भार को 11.6 अरब डॉलर का निर्यात किया था। सर्विसेज के मामले में भारत का निर्यात 23.5 अरब डॉलर और ब्रिटेन का 17.8 अरब डॉलर का था।

प्रस्तावित डबल कंट्रीब्यूशन कन्वेंशन लागू होने के बाद ब्रिटेन में अस्थायी रूप से कार्यरत भारतीय पेशेवरों को दोनों देशों में सामाजिक सुरक्षा अंशदान नहीं देना होगा, जिससे उनके लिए रोजगार की लागत कम होगी। गौरतलब है कि ब्रिटेन भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का छठा सबसे बड़ा स्रोत है। वहीं एक हजार से अधिक भारतीय कंपनियां ब्रिटेन में और लगभग 800 ब्रिटिश कंपनियां भारत में काम कर रही हैं।

डिजिटल अनुपालन की व्यवस्था लागू

CETA के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) और केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीआईसी) ने नई डिजिटल प्रक्रियाएं लागू की हैं। भारतीय निर्यातकों को डीजीएफटी के ट्रेड कनेक्ट पोर्टल के माध्यम से इलेक्ट्रॉनिक सर्टिफिकेट ऑफ ओरिजिन (ई-सीओओ) प्राप्त करना होगा। इसके लिए सेल्फ सर्टिफिकेशन या अधिकृत एजेंसी दोनों विकल्प उपलब्ध होंगे।

वहीं ब्रिटेन से आयात करने वाले भारतीय आयातकों को रियायती शुल्क का लाभ लेने के लिए सीबीआईसी द्वारा प्रमाणित ओरिजिन डिक्लेरेशन और यूनिक रेफरेंस नंबर (यूआरएन) प्राप्त करना होगा। निर्यातकों और आयातकों दोनों को उत्पाद की उत्पत्ति से जुड़े दस्तावेज और अन्य रिकॉर्ड सुरक्षित रखने होंगे, ताकि आवश्यकता पड़ने पर सीमा शुल्क अधिकारी उनका सत्यापन कर सकें।

थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनीशिएटिव (GTRI) के अजय श्रीवास्तव का कहना है कि भारत-ब्रिटेन सीईटीए से कृषि, प्रसंस्कृत खाद्य, वस्त्र और अन्य श्रम-प्रधान उद्योगों के लिए नए अवसर पैदा होते हैं। लेकिन वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि भारतीय कंपनियां ब्रिटेन के गुणवत्ता मानकों, खाद्य सुरक्षा नियमों और रूल्स ऑफ ओरिजिन का कितनी प्रभावी ढंग से पालन करती हैं। समझौता द्विपक्षीय व्यापार को नई दिशा दे सकता है, लेकिन मौजूदा व्यापार ढांचे और शुल्क व्यवस्था को देखते हुए वस्तुओं के व्यापार में ब्रिटेन को अपेक्षाकृत अधिक व्यावसायिक लाभ मिलने की संभावना दिखाई देती है।

ब्रिटेन से भारत पहुंचा विशेष पैकेज

इस अवसर पर चुनिंदा ब्रिटिश उत्पादों का एक विशेष पैकेज आज सुबह (15 जुलाई) ब्रिटिश एयरवेज की एक उड़ान से मुंबई स्थित ब्रिटिश उप उच्चायोग पहुंचा। इस पैकेज में ब्रिटेन के ऐसे उत्पाद शामिल थे, जिन पर टैरिफ में कमी का लाभ मिलेगा। इनमें कॉस्मेटिक्स, खाद्य उत्पाद और अल्कोहलिक बेवरेजेज शामिल हैं।

इस विशेष पैकेज का अनावरण करते हुए दक्षिण एशिया के लिए ब्रिटेन के व्यापार आयुक्त तथा पश्चिमी भारत में ब्रिटिश उप उच्चायुक्त हरजिंदर कंग ने कहा, “यह ब्रिटेन-भारत साझेदारी के लिए एक ऐतिहासिक क्षण है। इस महत्वपूर्ण व्यापार समझौते के लागू होने के साथ ही इससे बेहतर क्या हो सकता है कि आज सुबह चुनिंदा ब्रिटिश उत्पाद भी यहां पहुंचे हों। हमारा यह ऐतिहासिक व्यापार समझौता पहले ही दिन से कारोबारियों और उपभोक्ताओं को सस्ता, तेज और अधिक सुगम व्यापार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। हम सभी इसका पूरा लाभ उठाने को लेकर उत्साहित हैं।”