वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 4 अगस्त को लोकसभा में पेमेंट एंड सेटलमेंट्स एक्ट, 2007 की धारा 10ए में संशोधन के लिए विधेयक पेश किया। UPI को नियंत्रित करने वाले इस कानून में संशोधन का सरकार का कदम ऐसे समय सामने आया है, जब अमेरिका ने भारत की UPI और RuPay नीतियों की आलोचना करते हुए आरोप लगाया है कि वे अमेरिकी भुगतान कंपनियों के साथ भेदभाव करती हैं। हालांकि विधेयक में तत्काल मर्चेंट चार्ज लागू करने की बात नहीं है, लेकिन यह भविष्य में ऐसा करने का अधिकार केंद्र सरकार को प्रदान करता है।
वर्तमान में बैंक और पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर यूपीआई तथा रुपे डेबिट कार्ड सहित अधिसूचित भुगतान माध्यमों पर उपयोगकर्ताओं से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कोई शुल्क नहीं ले सकते। विधेयक केंद्र सरकार को अधिसूचना के माध्यम से यह तय करने का अधिकार देगा कि किन इलेक्ट्रॉनिक भुगतान माध्यमों या लेनदेन पर शुल्क नहीं लगाया जाएगा। हालांकि विधेयक में न तो मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू करने का प्रावधान है और न ही किसी शुल्क का उल्लेख किया गया है। लेकिन यह सरकार को भविष्य में Zero-MDR व्यवस्था में बदलाव करने का कानूनी अधिकार प्रदान करता है।
USTR ने की यूपीआई और रुपे की आलोचना
यह विधायी बदलाव ऐसे समय आया है, जब अमेरिका ने भारत की डिजिटल भुगतान प्रणालियों की आलोचना की है। यूएस ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव (USTR) की 2026 की नेशनल ट्रेड एस्टिमेट रिपोर्ट ऑन फॉरेन ट्रेड बैरियर्स में ब्राजील के Pix और भारत के UPI तथा RuPay ढांचे की आलोचना की गई है।
रिपोर्ट में कहा गया कि ब्राजील के केंद्रीय बैंक ने Pix को बनाया, वह उसका संचालन और नियमन स्वयं करता है, जिससे अमेरिकी भुगतान कंपनियों के मुकाबले उसे अनुचित बढ़त मिलती है। इसके बाद अमेरिका ने सेक्शन 301 जांच के तहत जुलाई 2026 में अधिकांश ब्राजीली उत्पादों पर अतिरिक्त 25% शुल्क लगा दिया। इलेक्ट्रॉनिक भुगतान प्रणाली भी उन कारणों में शामिल थी, जिनका हवाला अमेरिका ने दिया।
हालांकि ब्राजील ने Pix में कोई बदलाव करने से इनकार कर दिया। वहां की सरकार ने व्यक्तिगत लेनदेन पर शून्य शुल्क, कम मर्चेंट लागत, केंद्रीय बैंक द्वारा संचालन और बड़े वित्तीय संस्थानों की अनिवार्य भागीदारी का बचाव किया। राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा ने भी Pix का खुलकर समर्थन किया। ब्राजील के अधिकारियों का कहना था कि अमेरिका की आपत्तियों का उद्देश्य अमेरिकी कार्ड कंपनियों की फीस और बाजार हिस्सेदारी की रक्षा करना है।
भारत के मामले में USTR का आरोप है कि भारत की भुगतान नीतियां घरेलू प्रदाताओं, विशेषकर RuPay को बढ़ावा देती हैं। UPI शुरू होने के बाद उपभोक्ताओं ने मुफ्त UPI भुगतान को प्राथमिकता दी, जिससे Visa और Mastercard के संभावित कारोबार पर असर पड़ा। इन कंपनियों ने UPI और RuPay पर शून्य लेनदेन शुल्क, RuPay को सरकारी समर्थन और UPI के माध्यम से RuPay क्रेडिट कार्ड को पहले उपलब्ध कराए जाने पर भी आपत्ति जताई है। इससे RuPay मजबूत हुआ है और अमेरिकी कार्ड कंपनियों की शुल्क से होने वाली आय प्रभावित हुई है।
वीसा और मास्टरकार्ड का कारोबारी मॉडल मर्चेंट लेनदेन से मिलने वाली फीस पर आधारित है। UPI जैसी व्यापक, इंटरऑपरेबल और Zero-MDR प्रणाली इस आय के स्रोत को सीमित करती है। वहीं RuPay एक घरेलू कार्ड नेटवर्क होने के कारण भारत की नीतिगत प्राथमिकताओं के अनुरूप विकसित किया जा सकता है, जिससे विदेशी नेटवर्क को और चुनौती मिली है।
अमेरिका ने नेशनल पेमेंट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) के उस प्रस्तावित नियम का भी विरोध किया है, जिसके तहत किसी भी थर्ड पार्टी पेमेंट ऐप की हिस्सेदारी 30% तक सीमित करने का प्रस्ताव है। वर्तमान में गूगल पे (Google Pay) और वॉलमार्ट के फोनपे (PhonePe) की UPI पेमेंट में 80% से अधिक हिस्सेदारी है। एनपीसीआई का कहना है कि 30% की सीमा बाजार में चुनिंदा कंपनियों का आधिपत्य और प्रणालीगत जोखिम को कम करने के लिए है। हालांकि इसका क्रियान्वयन दिसंबर 2026 तक टाल दिया गया है। अमेरिकी कंपनियों ने भारत के डेटा लोकलाइजेशन नियमों का भी विरोध किया है, जिनके तहत भुगतान संबंधी डेटा देश के भीतर ही संग्रह करना अनिवार्य है।
मर्चेंट चार्ज के दो मॉडल पर विचार
नीतिनिर्माता फिलहाल दो संभावित मॉडलों पर विचार कर रहे हैं। पहले मॉडल के तहत 2,000 रुपये से अधिक के UPI मर्चेंट भुगतान पर 0.25% से 0.5% तक MDR लगाया जा सकता है, जबकि छोटे लेनदेन और व्यक्ति-से-व्यक्ति (P2P) भुगतान मुफ्त रहेंगे। दूसरे मॉडल में केवल उन व्यापारियों पर शुल्क लगाया जाएगा, जिनका वार्षिक कारोबार Rs 1.5 करोड़ से अधिक है। औपचारिक रूप से शुल्क व्यापारी पर लगेगा, लेकिन वे कीमतें बढ़ाकर, सुविधा शुल्क (Convenience Fee) लगाकर या नकद भुगतान को प्रोत्साहित कर इसकी भरपाई कर सकते हैं।
बुधवार को मौद्रिक नीति की घोषणा के बाद मीडिया से बातचीत में भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भी कहा कि UPI लेनदेन की लागत किसी न किसी को वहन करनी होगी। फिलहाल यह खर्च बैंक और नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) उठा रहे हैं।
यूपीआई भारत के लिए एक महत्वपूर्ण डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर बन चुका है। जुलाई 2026 में इसके माध्यम से 23.6 अरब लेनदेन हुए, जिनका कुल मूल्य रिकॉर्ड 29.9 लाख करोड़ रुपये रहा। वित्त वर्ष 2025-26 में कुल लगभग 241 अरब यूपीआई लेनदेन दर्ज किए गए। अनौपचारिक अनुमानों के अनुसार UPI के संचालन और रखरखाव की लागत प्रति लेनदेन लगभग 40 पैसे से एक रुपये तक आती है। यदि प्रति लेनदेन लागत एक रुपया भी मानी जाए, तो कुल वार्षिक खर्च लगभग 24,000 करोड़ रुपये होगा, जो आरबीआई द्वारा 2025-26 के लिए केंद्र सरकार को हस्तांतरित Rs 2.9 लाख करोड़ के सरप्लस का केवल 8% है।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को केवल अमेरिकी शिकायतों का समाधान करने या वीसा, मास्टरकार्ड जैसी विदेशी भुगतान कंपनियों के मुनाफे की रक्षा करने के लिए MDR लागू नहीं करना चाहिए। शुल्क संबंधी कोई भी निर्णय UPI के संचालन की वास्तविक लागत और उसकी दीर्घकालिक जरूरत को ध्यान में रखकर लिया जाना चाहिए।
थिंक टैंक GTRI के अजय श्रीवास्तव ने कहा, "ब्राजील का उदाहरण स्पष्ट चेतावनी है। अमेरिका ने सेक्शन 301 के तहत ब्राजील पर 25% अतिरिक्त शुल्क लगाया, जिसमें यह आरोप भी शामिल था कि उसकी सार्वजनिक डिजिटल भुगतान प्रणाली Pix अमेरिकी भुगतान कंपनियों के साथ भेदभाव करती है।"
उनका कहना है कि वॉशिंगटन की मांगों का कोई अंत नहीं है। हर रियायत के बाद एक नई मांग सामने आती है। भारत को अमेरिकी दबाव में अपनी UPI नीतियों में बदलाव नहीं करना चाहिए। उसे प्रतिस्पर्धा, नीतिगत स्वायत्तता और अपने भुगतान तंत्र की दीर्घकालिक स्थिरता की रक्षा करनी चाहिए।