भारत में आगामी खरीफ सीजन (जून–सितंबर) पर इस बार कई गंभीर चुनौतियां मंडरा रही हैं। इस साल अल नीनो के प्रभाव के कारण मानसून की बारिश सामान्य से कम रहने का अनुमान है, जबकि पश्चिम एशिया में जारी तनाव के चलते उर्वरक और ईंधन आपूर्ति के मोर्चे पर दिक्कतें बढ़ सकती हैं। ईरान युद्ध के कारण देश के कृषि निर्यात को भी बड़ा झटका लगा है, जिसका असर किसानों की आमदनी पर पड़ रहा है। इस बीच बढ़ती महंगाई से किसानों की लागत भी बढ़ रही है। इन सभी चुनौतियों का असर खरीफ फसलों की बुवाई, खाद्यान्न उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने इस साल दक्षिण-पश्चिम मानसून सीजन के दौरान बारिश ‘सामान्य से कम’ रहने का अनुमान जताया है, जो दीर्घावधि औसत (LPA) का 92 फीसदी रह सकती है। इसमें ±5% मॉडल त्रुटि संभव है। यह स्थिति मुख्य रूप से अल नीनो के विकसित होने की आशंका से जुड़ी है, जो आमतौर पर भारत में वर्षा को कमजोर करता है। तीन साल के अच्छे मानसून के बाद यह पहला मौका है जब कम वर्षा का अनुमान लगाया गया है। पूरे देश में मानसून सीजन के दौरान दीर्घावधि औसत वर्षा 87 सेंटीमीटर मानी जाती है।
आईएमडी के महानिदेशक मृत्युंजय महापात्रा के अनुसार, दक्षिण-पश्चिम मानसून सीजन के दौरान अल नीनो जैसी परिस्थितियां विकसित होने की संभावना है, जो अगस्त–सितंबर में बारिश को और कमजोर कर सकती हैं। आईएमडी के मुताबिक, आगामी मानसून के दौरान सामान्य से कम (एलपीए का 90–95%) बारिश की संभावना 31 फीसदी है, जबकि 90 फीसदी से कम वर्षा की संभावना 35 फीसदी है। वहीं, सामान्य मानसून (96–104%) की संभावना 27 फीसदी आंकी गई है।
बुवाई और उत्पादन
रेटिंग एजेंसी ICRA की रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल आईएमडी ने मानसून के सामान्य से कम (LPA का 92%) रहने का अनुमान जताया है, जो पिछले 25 वर्षों में प्रथम चरण का सबसे कम पूर्वानुमान है। सामान्य से कम मानसून का असर खरीफ की बुवाई, पैदावार, किसानों की आय और खाद्य कीमतों पर पड़ने की संभावना है।
रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच आगामी खरीफ सीजन में उर्वरकों की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती हो सकती है। ऐसे में खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में उचित बढ़ोतरी कृषि क्षेत्र के मनोबल को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण होगी।
ICRA ने वित्त वर्ष 2026–27 के लिए कृषि GVA में 3 फीसदी वृद्धि के अपने पूर्वानुमान में गिरावट की आशंका जताई है, जो सामान्य मानसून की उम्मीद पर आधारित था।
जलाशयों का स्तर
सामान्य से कम मानसून का पूर्वानुमान जलाशयों के जलस्तर के लिए अच्छा संकेत नहीं है। केंद्रीय जल आयोग के अनुसार, 9 अप्रैल तक देश के 166 बड़े जलाशयों में पानी का स्तर तेजी से गिर रहा है। इन जलाशयों में कुल स्टोरेज घटकर कुल क्षमता का केवल 44.71% बचा है। दो महीने में जलस्तर में 22 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है जिससे गर्मियों में जल संकट की आशंका बढ़ गई है। सबसे अधिक गिरावट पंजाब और राजस्थान के जलाशयों में दर्ज की गई है।
हालांकि, प्रमुख जलाशयों का जलस्तर पिछले 10 साल के औसत से बेहतर है, लेकिन गिरावट की रफ्तार चिंता का विषय है।
उर्वरक और ईंधन आपूर्ति पर असर
पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण उर्वरकों की उपलब्धता कृषि क्षेत्र के सामने एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। हालांकि केंद्र सरकार खेती के लिए पर्याप्त उर्वरक उपलब्ध होने का दावा कर रही है, लेकिन वैश्विक स्तर पर आपूर्ति बाधित होने और कीमतों में उछाल के बीच किसानों तक उर्वरकों की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती है।
कतर, कुवैत और सऊदी अरब में पेट्रोलियम रिफाइनरियों को नुकसान होने से सल्फर की आपूर्ति प्रभावित हुई है। इसके चलते वैश्विक स्तर पर डीएपी की उपलब्धता एक बड़ी समस्या बन गई है। उर्वरकों की कीमतों में भी तेजी से बढ़ोतरी हुई है। भारत के लिए यह स्थिति अधिक चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि देश अपनी उर्वरक जरूरतों को पूरा करने के लिए आयात पर निर्भर है।
हालांकि सरकार का कहना है कि फिलहाल देश में पिछले साल से बेहतर स्टॉक मौजूद है। एक अप्रैल को देश में यूरिया का स्टॉक लगभग 62 लाख टन और डीएपी का स्टॉक करीब 23 लाख टन था। ईरान युद्ध की शुरुआत के बाद से खाड़ी देशों से भारत में न तो यूरिया का आयात हुआ है और न ही एलएनजी का, जिसका असर देश में यूरिया उत्पादन पर पड़ा है, क्योंकि नाइट्रोजन उर्वरकों के उत्पादन में प्राकृतिक गैस एक प्रमुख कच्चा माल है।
खरीफ सीजन में लगभग 200 लाख टन यूरिया की खपत होती है। ऐसे में आयात में देरी से उपलब्धता की समस्या पैदा हो सकती है। इन परिस्थितियों को देखते हुए सरकार सब्सिडी वाले उर्वरकों के बेहतर प्रबंधन और लक्षित वितरण के लिए नेशनल फ्रेमवर्क लागू करने की दिशा में कदम बढ़ा रही है।
खाद्य महंगाई और ग्रामीण अर्थव्यवस्था
मौसम और भू-राजनीतिक दोनों कारकों के संयुक्त प्रभाव से खाद्य महंगाई बढ़ने का खतरा है। ICRA का अनुमान है कि चालू वित्त वर्ष में खुदरा महंगाई (CPI) 4.5% से अधिक रह सकती है। कम उत्पादन और महंगे इनपुट के कारण बाजार में कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे ग्रामीण मांग और समग्र अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मानसून कमजोर रहता है और खाड़ी संकट लंबा खिंचता है, तो इसका असर कृषि निर्यात, खाद्य सुरक्षा और आर्थिक विकास दर पर भी पड़ सकता है।