गोवंश में लंपी का कहर, LSD वैक्सीन के बावजूद अधिकांश राज्यों में गोटपॉक्स से टीकाकरण

देश में लंपी स्किन डिजीज (LSD) का प्रकोप फिर बढ़ रहा है, लेकिन स्वदेशी होमोलॉगस लंपी वैक्सीन उपलब्ध होने के बावजूद अधिकांश राज्य अब भी गोटपॉक्स वैक्सीन पर निर्भर हैं। बीमारी के रोकथाम की रणनीति पर कई सवाल।

लंपी त्वचा रोग (LSD) गोवंश के लिए इस साल फिर बड़ा खतरा बन गया है, जिससे पशुपालकों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। कई राज्यों में लंपी के संदिग्ध या पुष्ट मामले सामने आ रहे हैं। चार साल बाद बड़े पैमाने पर लंपी के प्रकोप को देखते हुए टीकाकरण और बीमारी की रोकथाम के उपायों पर भी सवाल उठने लगे हैं।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के वैज्ञानिकों ने वर्ष 2022 में ही लंपी त्वचा रोग की होमोलॉगस वैक्सीन Lumpi-ProVacInd विकसित कर ली थी। वैक्सीन के कमर्शियल उत्पादन के लिए बेंगलुरु की बायोवेट प्राइवेट लिमिटेड, अहमदाबाद की हेस्टर बायोसाइंसेज और हैदराबाद की इंडियन इम्यूनोलॉजिकल्स लिमिटेड समेत छह फर्मों को टेक्नोलॉजी लाइसेंस मिल चुका है। लेकिन देश के अधिकांश राज्यों में अब भी हेटेरोलॉगस गोटपॉक्स वैक्सीन (उत्तरकाशी स्ट्रेन) का इस्तेमाल लंपी की रोकथाम के लिए किया जा रहा है।

उच्च पदस्थ सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, अभी तक केवल दो राज्यों, उत्तर प्रदेश और राजस्थान, ने लंपी वैक्सीन की खरीद के लिए बायोवेट प्राइवेट लिमिटेड को ऑर्डर दिया है। फिलहाल केवल एक ही कंपनी द्वारा लंपी वैक्सीन का उत्पादन किए जाने के कारण इसकी कीमत अधिक है। संभवतः यही कारण है कि दोनों राज्यों ने गोवंश की कुल आबादी के मुकाबले अपेक्षाकृत कम संख्या में लंपी वैक्सीन का ऑर्डर दिया है। वहीं, देश के बाकी राज्य लंपी की रोकथाम के लिए गोटपॉक्स वैक्सीन पर ही निर्भर हैं।

यह स्थिति तब है, जब पशुओं में लंपी रोग का प्रकोप बढ़ता जा रहा है। भारत सरकार के पशुपालन एवं डेयरी विभाग (DAHD) ने 2 मार्च 2026 को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को मवेशियों में लंपी वैक्सीन के इस्तेमाल की सलाह दी थी। विभाग की ओर से जारी पत्र के अनुसार, गोटपॉक्स वैक्सीन से टीकाकरण के एक साल बाद मवेशियों को होमोलॉगस लाइव-अटेन्यूएटेड LSD वैक्सीन दी जा सकती है। लेकिन देश के अधिकतर राज्यों ने इस सलाह पर शायद गौर नहीं किया और अब लंपी रोग का प्रकोप बढ़ता जा रहा है।

भारत में लंपी स्किन डिजीज (LSD) का पहला मामला वर्ष 2019 में ओडिशा में सामने आया था। इसके बाद वर्ष 2021-22 में जब गोवंश पर लंपी बीमारी का कहर टूटा, तब देश में इसकी वैक्सीन उपलब्ध नहीं थी। तब भारत सरकार ने मवेशियों में लंपी की रोकथाम के लिए गोटपॉक्स (हेटेरोलॉगस) वैक्सीन के इस्तेमाल की मंजूरी दी थी। हालांकि, हेटेरोलॉगस वैक्सीन केवल आंशिक सुरक्षा प्रदान करती है और होमोलॉगस वैक्सीन की तुलना में इसकी प्रभावशीलता कम होती है।

वर्ष 2022 में ICAR के राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र (ICAR-NRCE), हिसार ने भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (ICAR-IVRI), बरेली के सहयोग से मवेशियों में लंपी स्किन डिजीज (LSD) से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए एक स्वदेशी, होमोलॉगस (समरूप), लाइव-अटेन्यूएटेड (जीवित-क्षीणित) वैक्सीन विकसित की। ICAR के अनुसार, यह वैक्सीन मवेशियों के लिए सुरक्षित पाई गई और मजबूत एवं प्रभावी सेल-मीडिएटेड इम्यून प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है। इसके अलावा, यह घातक LSDV के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करने में भी सक्षम पाई गई।

केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने अगस्त 2022 में लंपी से बचाव के लिए इस स्वदेशी वैक्सीन को लॉन्च कर दिया था, लेकिन इसके कमर्शियल उत्पादन के लिए जरूरी मंजूरी मिलने में काफी समय लगा। लंपी वैक्सीन के व्यावसायिक उत्पादन के लिए बायोवेट को केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) से वर्ष 2024 में मंजूरी मिली और कंपनी ने देश में विकसित पहली लंपी वैक्सीन BIOLUMPIVAXIN® को मई 2025 में लॉन्च किया। इस तरह वैक्सीन के विकसित होने और बाजार में उपलब्ध होने में करीब तीन साल का समय लग गया।

इस बीच, तमाम राज्य लंपी की रोकथाम के लिए गोटपॉक्स वैक्सीन से ही टीकाकरण करते रहे। वर्ष 2022 में व्यापक प्रकोप के बाद 2023–2024 में लंपी के मामलों में काफी कमी आ गई थी। कुछ वैज्ञानिकों ने इसे गोटपॉक्स वैक्सीन की प्रभावशीलता से जोड़कर देखा, तो कुछ ने 2022 के प्रकोप के बाद विकसित प्राकृतिक प्रतिरक्षा को इसकी वजह माना।

लेकिन इस साल फिर से कई राज्यों में लंपी का प्रकोप भयावह रूप धारण कर चुका है। जबकि वर्ष 2021–22 से भारत में LSD की रोकथाम के लिए गोटपॉक्स वैक्सीन से बड़े पैमाने पर टीकाकरण किया जा रहा है। व्यापक टीकाकरण के बावजूद LSD के बढ़ते मामलों ने टीकाकरण की रणनीति पर पुनर्विचार और इसकी प्रभावशीलता के मूल्यांकन की आवश्यकता को बढ़ा दिया है।

अक्टूबर 2025 में राजस्थान के पांच जिलों में किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि उत्तरकाशी स्ट्रेन आधारित गोटपॉक्स वैक्सीन की क्षेत्रीय प्रभावशीलता केवल 21.7 प्रतिशत थी। टीकाकृत मवेशियों में LSD की घटना 11.2 प्रतिशत और गैर-टीकाकृत मवेशियों में 14.3 प्रतिशत रही। इससे निष्कर्ष निकाला गया कि गोटपॉक्स वैक्सीन मवेशियों में लंपी रोग से केवल सीमित सुरक्षा प्रदान करती है। इसलिए लंपी की रोकथाम के लिए गोटपॉक्स वैक्सीन के इस्तेमाल को चरणबद्ध तरीके से समाप्त कर होमोलॉगस, LSD-विशिष्ट वैक्सीन के साथ बड़े पैमाने पर टीकाकरण रणनीति अपनाने की आवश्यकता है।

लेकिन सवाल यह है कि देश में लंपी वैक्सीन उपलब्ध होने के बावजूद अब भी अधिकतर राज्य गोटपॉक्स वैक्सीन का इस्तेमाल क्यों कर रहे हैं। इसके पीछे एक बड़ी वजह लंपी वैक्सीन की अधिक कीमत भी है। गोटपॉक्स वैक्सीन की कीमत जहां करीब 5 रुपये है, वहीं लंपी वैक्सीन की कीमत करीब 23 रुपये है। कीमत में इस बड़े अंतर के कारण कई राज्य लंपी वैक्सीन खरीदने से बच रहे हैं। हालांकि, वैक्सीन शोध और उत्पादन से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे बाकी कंपनियों की लंपी वैक्सीन भी बाजार में आएंगी, इनकी कीमतें कम होंगी और इनका इस्तेमाल बढ़ने लगेगा।