पराली प्रबंधन के लिए 3.5 लाख से ज्यादा मशीनें वितरित, 4 हजार करोड़ से ज्यादा खर्च, 14 जिलों में सक्रिय होगा पराली सुरक्षा बल

केंद्र सरकार ने वर्ष 2026 की धान कटाई से पहले पराली प्रबंधन की तैयारियां तेज कर दी हैं। शिवराज सिंह चौहान और भूपेंद्र यादव की अध्यक्षता में हुई समीक्षा बैठक में राज्यों को अगस्त तक मशीन वितरण पूरा करने, पराली के औद्योगिक उपयोग को बढ़ाने और एनसीआर की 70 तहसीलों में ‘पराली सुरक्षा बल’ सक्रिय करने के निर्देश दिए गए।

पराली जलाने की समस्या का स्थायी हल निकालना केंद्र और राज्य सरकारों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। केंद्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान और केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्री भूपेंद्र यादव ने मंगलवार को नई दिल्ली में एक उच्च स्तरीय बैठक में फसल अवशेष प्रबंधन (सीआरएम) योजना की प्रगति और आगामी धान कटाई सीजन की तैयारियों की समीक्षा की।

केंद्रीय कृषि मंत्री ने बताया कि पराली जलाने की समस्या से निपटने के लिए वर्ष 2018-19 में फसल अवशेष प्रबंधन योजना शुरू की गई थी। तब से पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश तथा आईसीएआर को कुल 4,266.47 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता प्रदान की गई है। इस सहायता से राज्यों में 3.54 लाख से अधिक फसल अवशेष प्रबंधन मशीनों का वितरण तथा 43,500 से अधिक कस्टम हायरिंग केंद्रों की स्थापना संभव हुई है।

वर्ष 2026-27 के लिए सीआरएम योजना के अंतर्गत 544.15 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जिसमें से पहली किस्त के रूप में 272.07 करोड़ रुपये जारी किए जा चुके हैं। राज्यों ने इस वर्ष 46,000 से अधिक मशीनों के वितरण, 910 नए कस्टम हायरिंग केंद्रों की स्थापना तथा 141 पराली आपूर्ति श्रृंखला परियोजनाओं के विकास का लक्ष्य रखा है।

बैठक में वर्ष 2026 की धान कटाई के दौरान अनुमानित 2.762 करोड़ टन पराली के प्रबंधन हेतु राज्यों द्वारा तैयार कार्ययोजनाओं की भी समीक्षा की गई। केंद्रीय कृषि मंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार, राज्य सरकारों, आईसीएआर संस्थानों, कृषि विज्ञान केंद्रों, स्थानीय निकायों तथा किसानों के निरंतर प्रयासों से पिछले वर्षों में पराली जलाने की घटनाओं में उल्लेखनीय कमी आई है।

पराली के आद्योगिक उपयोग पर जोर 

बैठक में पराली के औद्योगिक उपयोग को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दिया गया। दोनों मंत्रियों ने बायोमास आधारित विद्युत संयंत्रों, संपीड़ित बायोगैस (सीबीजी) इकाइयों, एथेनॉल उत्पादन संयंत्रों और पेलेट निर्माण इकाइयों के माध्यम से पराली के उपयोग को और मजबूत बनाने की आवश्यकता बताई। इससे पराली के लिए स्थायी बाजार तैयार होगा और कृषि अवशेष किसानों के लिए आय का अतिरिक्त स्रोत बन सकेंगे।

बैठक में फसल अवशेष प्रबंधन कार्यक्रम की निगरानी व्यवस्था की भी समीक्षा की गई। राज्यों को अगस्त 2026 से पहले मशीनों के वितरण का कार्य पूरा करने, कस्टम हायरिंग केंद्रों को मजबूत बनाने, उपलब्ध मशीनरी का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करने तथा व्यापक जन-जागरूकता अभियान चलाने की सलाह दी गई।

कम अवधि में पकने वाली और कम पानी की आवश्यकता वाली धान की किस्मों को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया गया ताकि धान कटाई और गेहूं बुवाई के बीच उपलब्ध समय बढ़ाया जा सके। कृषि मंत्री ने बताया कि सरकार पहले ही लंबी अवधि वाली धान किस्मों को हतोत्साहित करने और वैकल्पिक किस्मों को प्रोत्साहित करने के लिए आईसीएआर तथा राज्य कृषि संस्थानों के माध्यम से कदम उठा चुकी है।

14 जिलों में पराली सुरक्षा बल

शिवराज सिंह चौहान ने धान की बुवाई से लेकर कटाई तक फसल की निरंतर निगरानी पर बल देते हुए कहा कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) के 14 जिलों की कम से कम 70 तहसीलों में ‘पराली सुरक्षा बल’ को सक्रिय किया जाएगा। इसके माध्यम से निगरानी बढ़ाकर पराली जलाने की घटनाओं में और कमी लाने का प्रयास किया जाएगा।

दोनों केंद्रीय मंत्रियों ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) को पेलेट और ब्रिकेट निर्माण इकाइयों, सीबीजी संयंत्रों तथा ताप विद्युत संयंत्रों में सह-दहन (को-फायरिंग) के लिए उपलब्ध पराली भंडार और उनकी उपयोग क्षमता की समीक्षा करने का सुझाव दिया। 

कृषि मंत्री ने सफल पराली प्रबंधन मॉडलों और प्रेरक अनुभवों के व्यापक प्रचार-प्रसार पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि जिन खेतों में पराली को जलाने के बजाय मिट्टी में मिलाया गया, वहां धान की उत्पादकता में वृद्धि देखी गई है। साथ ही राज्यों में डायरेक्ट सीडेड राइस (डीएसआर) तकनीक को प्रभावी ढंग से बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई।

बैठक में कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय,आईसीएआर तथा संबंधित एजेंसियों के वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया।