कीटनाशक बाजार में हितों की जंग, पांच साल की डेटा सुरक्षा पर पेस्टिसाइड कंपनियां आमने-सामने

नए कीटनाशक प्रबंधन विधेयक से पहले पांच साल की डेटा सुरक्षा को लेकर कीटनाशक उद्योग बंटा हुआ है। क्रॉपलाइफ इंडिया इसे इनोवेशन और निवेश के लिए जरूरी मानता है, जबकि अन्य संगठन कीमतें बढ़ने और घरेलू निर्माताओं की प्रतिस्पर्धा घटने की आशंका जताते हैं। कंपनियां सजा, जुर्माने और नियामकीय प्रक्रिया में बदलाव भी चाहती हैं।

ऐसे समय जब सरकार नया कीटनाशक प्रबंधन विधेयक लाने की तैयारी कर रही है, कीटनाशक कंपनियों के बीच डेटा सुरक्षा का विवाद तेज हो गया है। एक धड़ा पांच साल के लिए डेटा सुरक्षा मांग रहा है, तो दूसरे धड़े की दलील है कि इससे जेनरिक उत्पादों के बीच प्रतिस्पर्धा सीमित होगी तथा कीटनाशक महंगे होंगे। कंपनियां कीटनाशक कानून 1968 की जगह लेने वाले नए कानून के विधेयक में भी कुछ बदलाव चाहती हैं, खास कर अपराध और सजा के प्रावधानों में। विधेयक के ड्राफ्ट में 50 लाख रुपये तक जुर्माना और पांच साल तक कैद का प्रावधान है। जनवरी 2026 में जारी संशोधित ड्राफ्ट में डेटा सुरक्षा का जिक्र नहीं है।
विवाद को इस तथ्य को ध्यान में रखकर भी देखा जाना चाहिए कि भारत का कीटनाशक बाजार हर साल करीब 5.5% की दर से बढ़ रहा है। आई-मार्क के अनुसार भारत का पेस्टिसाइड बाजार 2025 में 27,487 करोड़ रुपये का था जो 2024 में 46,427 करोड़ रुपये का हो जाएगा।

डेटा सुरक्षा क्या है?

जो कंपनी किसी उत्पाद की रेगुलेटरी मंजूरी या रिन्यूअल के लिए जरूरी आंकड़े, परीक्षण और अध्ययन में निवेश करती है, वह उन आंकड़ों के इस्तेमाल पर एक निश्चित अवधि तक विशेषाधिकार चाहती है। यही उसकी डेटा एक्सक्लूसिविटी या डेटा सुरक्षा है। इस अवधि में कोई अन्य कंपनी उसकी अनुमति के बिना उन आंकड़ों का इस्तेमाल नहीं कर सकती। अर्थात उस फॉर्मूलेशन पर आधारित कीटनाशक बनाने के लिए दूसरी कंपनियों को लिखित अनुमति लेनी पड़ेगी। 

क्रॉपलाइफ चाहता है पांच साल की डेटा सुरक्षा

कीटनाशक कंपनियों का एक धड़ा है क्रॉपलाइफ इंडिया। इसने भारत में नए उत्पादों के पंजीकरण के लिए तैयार किए गए रेगुलेटरी आंकड़ों को पांच साल तक सुरक्षा देने की मांग की है। संगठन के अनुसार, चीन, इंडोनेशिया और मलेशिया में रेगुलेटरी डेटा को छह साल, जबकि अमेरिका, यूरोपीय संघ, कनाडा, थाईलैंड, ब्राजील और कोलंबिया में 10 साल तक सुरक्षा दी जाती है।
इसकी दलील है कि भारत में फिलहाल लगभग 380 सक्रिय एक्टिव इंग्रेडिएंट्स उपलब्ध हैं, जबकि दुनिया में ऐसे करीब 1,200 इंग्रेडिएंट्स हैं। डेटा सुरक्षा से इनोवेशन को बढ़ावा मिलेगा, निवेश आकर्षित होगा और किसानों को नए कीटनाशक मिलेंगे। क्रॉपलाइफ का कहना है कि नए मॉलिक्यूल से कीटनाशकों की जरूरत और पर्यावरण को नुकसान कम हो सकते हैं। यूरोपीय संघ जैसे बाजारों में कीटनाशक अवशेषों की सख्त होती सीमाओं के मद्देनजर कृषि निर्यात के लिए इस बात को ध्यान में रखना जरूरी है।

डेटा सुरक्षा का विरोध भी

कीटनाशक कंपनियों के अन्य कई धड़े, जिनमें क्रॉप केयर फेडरेशन ऑफ इंडिया (सीसीएफआई) और पेस्टिसाइड्स मैन्युफैक्चरर्स एंड फॉर्म्युलेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (पीएमएफएआई) भी शामिल हैं, 20 साल की पेटेंट अवधि खत्म होने के बाद डेटा सुरक्षा के खिलाफ हैं। इनका कहना है कि इससे सस्ते कीटनाशक भारतीय बाजारों में देर से आएंगे और घरेलू मैन्युफैक्चरिंग कमजोर पड़ सकती है।
सीसीएफआई के चेयरमैन दीपक शाह ने रूरल वॉयस से कहा कि पेटेंट वाले उत्पाद अक्सर भारत में देर से पेश किए जाते हैं। ऐसे में यदि पेटेंट अवधि के बाद अतिरिक्त डेटा सुरक्षा दी जाती है, तो भारतीय निर्माताओं के पास उसके जेनरिक विकल्प बाजार में उतारने के लिए बहुत कम समय बचेगा। शाह ने कहा कि भारतीय कंपनियां बेहतर क्वालिटी के प्रोडक्ट कम लागत पर बना सकती हैं। यह एक-तिहाई या एक-चौथाई रह सकती है।
सीसीएफआई के उपाध्यक्ष राजेश अग्रवाल के अनुसार, पिछले दो वर्षों में भारत में 36 नए कीटनाशक मॉलिक्यूल का रजिस्ट्रेशन हुआ है। यह इस दलील पर सवाल उठाता है कि डेटा सुरक्षा के अभाव में नए उत्पाद भारतीय बाजार में नहीं आ रहे हैं। अग्रवाल ने चेताया कि अतिरिक्त एक्सक्लूसिविटी से जेनरिक उत्पादों की प्रतिस्पर्धा में देरी हो सकती है और किसानों के पास उपलब्ध विकल्प सीमित हो सकते हैं। 
पीएमएफएआई ने डेटा सुरक्षा का विरोध करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा है। इसमें नए मॉलिक्यूल भारत में लाने के लिए डेटा सुरक्षा को जरूरी बताने पर सवाल उठाए गए हैं। इसका कहना है कि पिछले 16 वर्षों में कई मंत्रालय मुद्दे की समीक्षा कर चुके हैं। दिसंबर 2021 में संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट का हवाला देते हुए इसने कहा कि नए मॉलिक्यूल बनाने में निवेश की भरपाई के लिए 20 साल की पेटेंट अवधि पर्याप्त है। संगठन का अनुमान है कि जेनेरिक उत्पादों के बीच प्रतिस्पर्धा सीमित होने पर कीटनाशकों की कीमतें 35-50 प्रतिशत तक बढ़ सकती हैं।
उत्तर भारत कीटनाशक निर्माता संघ (एनआईपीएमए) के प्रेसिडेंट एस.के. गुप्ता डेटा के मुताबिक बहुराष्ट्रीय कंपनियां डेटा प्रोटेक्शन चाहती हैं। इससे किसानों को प्रोडक्ट की ऊंची कीमत चुकानी पड़ेगी। डेटा प्रोटेक्शन के तहत 3000 रुपये लीटर बिकने वाला प्रोडक्ट प्रोटेक्शन हटते ही 600-700 रुपये लीटर पर आ जाता है। डेटा प्रोटेक्शन से किसानों को नुकसान तो होगा ही, छोटे उद्योग खत्म हो जाएंगे। पारंपरिक मॉलिक्यूल के सिवाय और कुछ बनाने के लिए उनके पास बचेगा ही नहीं।
हरियाणा पेस्टिसाइड मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के प्रेसिडेंट अतुल मोर जेनरिक पेटेंट का मुद्दा भी उठाते हैं। वे कहते हैं, अनेक जेनरिक प्रोडक्ट दशकों से बिक रहे हैं। कई बार किसान प्रयोग के तौर पर दो अलग प्रोडक्ट को मिलाकर भी इस्तेमाल करते हैं, यह सोचकर कि शायद बेहतर नतीजे मिल जाएं। कई बार ऐसा होता भी है। अब कुछ कंपनियां भी ऐसा करने लगी हैं। वे दो अलग प्रोडक्ट मिलाकर एक प्रोडक्ट बनाती हैं और उसका पेटेंट लेकर बेचती हैं। जेनरिक की तुलना में उसका दाम चार से पांच गुना होता है। कंपनी अपने नाम से पेटेंट आवेदन नहीं करती, बल्कि कोई अन्य आवेदन करता है। पेटेंट मिलने के बाद कंपनी उसका अपने में विलय कर लेती है। इस तरह बिना किसी इनोवेशन के कंपनियां नया पेटेंट ले रही हैं।

कीटनाशक विधेयक के कुछ प्रावधानों पर ऐतराज

नए कीटनाशक प्रबंधन विधेयक में नकली या खराब क्वालिटी के उत्पादों के मामले में अधिकतम पांच साल की कैद और 50 लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है। इसमें कहा गया है कि कंपनी के किसी निदेशक, प्रबंधक या अधिकारी की जानकारी अथवा लापरवाही के कारण अपराध होता है, तो उसे भी उस अपराध के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकेगा।

सीसीएफआई के दीपक शाह ने कहा, कुछ लोग घटिया माल बना सकते हैं। लेकिन सबको एक लाठी से नहीं हांक सकते। अच्छी कंपनी का प्रबंधन अगर जांच अधिकारी को ‘मैनेज’ न कर पाए तो उसे जेल हो जाएगी, जबकि घटिया माल बनाने वाला छूट जाएगा। 
उन्होंने कहा, कई बार तो नकली सामान बनाने वाले हमारे जैसी पैकिंग करते हैं। कई बार उनकी पैकिंग इतनी अच्छी होती है कि बिल्कुल असली मालूम पड़ती है। लेकिन पैकेट खोलने पर असलियत सामने आ जाती है।
एनआईपीएमए के गुप्ता ड्राफ्ट में दिए गए सजा और जुर्माने के प्रावधान को अतार्किक बताते हैं। उनका कहना है कि गलत काम करने वाले के खिलाफ पूरी सख्ती बरती जाए, लेकिन जहां गलती गैर-इरादतन है, उस पर अलग तरीके से विचार किया जाना चाहिए। ड्राफ्ट के प्रावधान एकतरफा हैं। पहले ही यह मान लिया जाता है कि मैन्युफैक्चर चोर है। जो करोड़ों रुपये निवेश करके बिजनेस करने आया है, वह गलत काम क्यों करेगा? लेकिन सिस्टम ऐसा है कि सारा दोष मैन्युफैक्चरर पर मढ़ दिया जाता है। 
यहां नकली और कमतर (सब-स्टैंडर्ड) प्रोडक्ट के बीच अंतर को समझना भी जरूरी है। गुप्ता के अनुसार, “नकली का मतलब है कि कोई दूसरा व्यक्ति किसी कंपनी के प्रोडक्ट की नकल बनाकर बेच रहा है। मैन्युफैक्चरर ऐसा नहीं करते। पार्ट टाइम बिजनेसमैन या डीलर-डिस्ट्रीब्यूटर यह काम करते हैं। ऐसा नहीं कि सरकारी विभागों को इसकी जानकारी नहीं होती, लेकिन मिलीभगत से सब चल रहा है। कई बार तो वे बड़ी कंपनियों का एक्सपायर्ड माल लेकर उनके लेवल बदल कर बेच देते हैं।”
कई बार छोटी कंपनियां बड़ी कंपनियों के प्रोडक्ट की मार्केटिंग का लाइसेंस ले लेती हैं। गुप्ता के मुताबिक, “99% नकली मामले उनके स्तर पर ही आते हैं, जबकि इन्सेक्टिसाइड एक्ट में ‘मार्केटेड बाइ’ का प्रावधान ही नहीं है। हमने सेंट्रल इन्सेक्टिसाइड बोर्ड एंड रजिस्ट्रेशन कमेटी (सीआईबीआरसी) से इस बारे में दिशानिर्देश जारी करने का आग्रह किया है। जो मैन्युफैक्चरर नहीं है, उसको मार्केटेड बाइ की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए।”
हरियाणा पेस्टिसाइड मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के प्रेसिडेंट अतुल मोर का कहना है, नकली की परिभाषा स्पष्ट नहीं है। किसी कंपनी के प्रोडक्ट की नकल करके बेचना नकली है, जबकि कंपनी के अपने प्रोडक्ट में कोई तत्व कम पाया गया तो वह सब-स्टैंडर्ड है। अभी दोनों को एक नजरिए से देखा जाता है। सब-स्टैंडर्ड को भी नकली मान लिया जाता है। 
कुछ प्रोडक्ट ऐसे होतें हैं जिनकी एफिसिएंसी समय के साथ कम हो जाती है। अगर एफिसिएंसी 0.5% भी कम हो गई तो लैब में उसे खारिज कर दिया जाता है। हम नकली के खिलाफ हैं, लेकिन सब-स्टैंडर्ड की एक सीमा होनी चाहिए। 
मोर बताते हैं, “मैंने 100% एफिसिएंसी का कोई प्रोडक्ट बनाया। अब अगर लैब ने उसे 99% बताकर फेल कर दिया, तो मेरे ऊपर वही केस चलेगा जो 20% कम वाले पर चलेगा। दोनों को एक श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए।”
अतुल मोर का भी कहना है कि ज्यादातर नकली माल ‘मार्केटेड बाइ’ प्रोडक्ट में ही निकलता है, जबकि झेलना मैन्युफैक्चरर को पड़ता है। ऐसे लोग जीएसटी की चोरी भी करते हैं। हमने सरकार से आग्रह किया है कि मार्केटेड बाइ प्रावधान को बंद करे। इससे नकली माल की बिक्री काफी हद तक कम हो जाएगी, सरकार को जीएसटी और इनकम टैक्स का भी फायदा होगा।
फरीदाबाद स्थित केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड एवं रजिस्ट्रेशन समिति (सीआईबीआरसी) के एक पूर्व अधिकारी सैंपलिंग प्रक्रिया में खामी को नकली कीटनाशकों की बिक्री बढ़ने के पीछे एक बड़ी वजह मानते हैं। वे बताते हैं, “अभी इंस्पेक्टर सैंपल उठाते हैं, लेकिन अधिकांश सैंपल जांच में सही साबित होते हैं, क्योंकि इंस्पेक्टर मिलीभगत से काम करते हैं।”
उनका कहना है कि सैंपलिंग के लिए अलग इनफोर्समेंट डिवीजन का होना जरूरी है और यह कृषि मंत्रालय के तहत होना चाहिए। इसका जिम्मा केवल सैंपल उठाना होना चाहिए। जांच और आगे की कार्रवाई संबंधित नियामक कार्यालय स्तर पर होनी चाहिए। ऐसा करने पर सैंपलिंग और जांच की प्रक्रिया मजबूत होगी तथा एनफोर्समेंट विंग इसे प्रभावी तरीके से अंजाम दे सकेगा। अधिकारी के अनुसार, कई बार इंस्पेक्टर लंबी कानूनी प्रक्रिया से बचने के लिए लापरवाही बरतते हैं। इसका खामियाजा किसानों को नकली कीटनाशकों के रूप में भुगतना पड़ता है। 
एक आरटीआई में पता चला कि अधिकांश सैंपल बड़ी कंपनियों के उठाए जाते हैं जबकि छोटी कंपनियों और स्थानीय स्तर पर उत्पाद बनाने वाली कंपनियों की सैंपल संख्या काफी कम होती है। उक्त अधिकारी का कहना है कि सरकार नया कानून लेकर आ रही है तो उसके पास नियमन प्रक्रिया में ढांचागत बदलाव करने का मौका है, जिसका फायदा किसानों को होगा और नकली उत्पाद बनाने व बेचने वालों पर नकेल कसेगी।
इंडस्ट्री के मतभेदों के बीच सवाल है कि नई तकनीक और अनुसंधान को प्रोत्साहन देते हुए किसानों के लिए सस्ते विकल्पों की उपलब्धता तथा घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को कैसे बढ़ाया जाए। इसके साथ घटिया उत्पादों पर प्रभावी कार्रवाई, निष्पक्ष सैंपलिंग और रेगुलेटरी जवाबदेही सुनिश्चित करना भी जरूरी है। नए कानून की कसौटी यह होगी कि वह उद्योग के हितों के साथ किसानों को सुरक्षित, प्रभावी और किफायती फसल सुरक्षा उत्पाद उपलब्ध कराने में कितना सफल होता है।