रबी 2026 फसलों की योजना पानी की उपलब्धता और जलवायु जोखिमों के आधार पर बनाने की जरूरत: शिवराज चौहान

कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राज्यों से रबी 2026 की फसल योजना पानी की उपलब्धता, मिट्टी की नमी और जलवायु जोखिमों को ध्यान में रखकर बनाने को कहा है। रबी अभियान 2026 में कृषि सचिव अतीश चंद्र और आईसीएआर महानिदेशक डॉ. मंगल लाल जाट ने फसल विविधीकरण, टिकाऊ खेती, डिजिटल कृषि और जोखिम प्रबंधन पर जोर दिया।

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने रबी 2026 के लिए डेटा आधारित और जलवायु अनुकूल रणनीति अपनाने का आह्वान किया है। उन्होंने राज्यों से पानी की उपलब्धता, मिट्टी की नमी और स्थानीय कृषि-जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप फसल योजना तैयार करने को कहा है।

नई दिल्ली में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय कृषि सम्मेलन-रबी अभियान 2026 को संबोधित करते हुए चौहान ने कहा कि बदलते मौसम, अनियमित बारिश और पानी की कमी को देखते हुए पारंपरिक फसल योजना से आगे बढ़कर वैज्ञानिक आकलन, समयबद्ध तैयारी और केंद्र-राज्य के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है।

पानी की उपलब्धता के आधार पर तय हो फसल योजना

चौहान ने रबी की योजना में वाटर बजट को सबसे महत्वपूर्ण मानकों में से एक बताया और राज्यों तथा जिलों से फसल योजना को अंतिम रूप देने से पहले सिंचाई के लिए उपलब्ध पानी का आकलन करने को कहा। कम पानी वाले क्षेत्रों में दलहन और तिलहन जैसी अपेक्षाकृत कम पानी की जरूरत वाली फसलों को प्राथमिकता देने की बात कही। पर्याप्त सिंचाई वाले क्षेत्रों में उपलब्ध संसाधनों के अनुरूप दूसरी फसलों की योजना बनाई जा सकती है। उन्होंने वर्षा आधारित और सिंचित क्षेत्रों के लिए अलग-अलग रणनीति तैयार करने पर भी जोर दिया।

कृषि मंत्री ने महाराष्ट्र और कर्नाटक में सूखे की स्थिति पर चिंता जताई। कृषि मंत्रालय के अनुसार, कर्नाटक में 3 अक्टूबर को केंद्रीय टीम जमीनी स्थिति का आकलन करेगी, जबकि महाराष्ट्र के लिए भी एक केंद्रीय टीम भेजी जाएगी। चौहान ने कहा कि महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश को पानी की उपलब्धता और मिट्टी की नमी के आधार पर फसल योजना बनानी होगी।

दलहन और तिलहन पर जोर

चौहान ने राज्यों से दलहन और तिलहन को बढ़ावा देने को कहा, खासकर उन क्षेत्रों में जहां धान की खेती के बाद जमीन खाली रह जाती है। उन्होंने राज्यों को 29 सितंबर तक अपनी रबी योजनाओं को अंतिम रूप देने का निर्देश दिया, जिसमें दलहन के तहत लाए जाने वाले क्षेत्र और चना, मसूर तथा सरसों जैसी फसलों का विवरण शामिल हो।

उन्होंने कहा कि उत्पादन बढ़ाने की योजना के साथ किसानों के लिए सुनिश्चित बाजार और खरीद की व्यवस्था भी जरूरी है। यदि राज्य समय पर खरीद नहीं कर पाते हैं तो केंद्रीय एजेंसियां नाफेड और एनसीसीएफ किसानों से सीधे खरीद करेंगी। इसके लिए राज्यों को मंडियों और अन्य जरूरी व्यवस्थाओं में सहयोग देना होगा। केंद्र ने मूल्य समर्थन योजना (PSS) के तहत दलहन और तिलहन की बड़े पैमाने पर खरीद के प्रस्तावों को भी मंजूरी दी है।

समय पर बीज और उर्वरक की उपलब्धता जरूरी

चौहान ने गुणवत्तापूर्ण बीज को रबी की तैयारी की महत्वपूर्ण कड़ी बताते हुए राज्यों से विभिन्न क्षेत्रों और कृषि-जलवायु परिस्थितियों के अनुकूल किस्मों की पहचान करने को कहा। उन्होंने बीज की मांग, खरीद, उठाव और वितरण की ऐसी अग्रिम योजना बनाने पर जोर दिया, जिससे उन्नत किस्मों के बीज किसानों तक बुवाई की अवधि खत्म होने से पहले पहुंच सकें।

उन्होंने संतुलित उर्वरक उपयोग पर भी जोर दिया और ‘खेत बचाओ अभियान’ को रबी सीजन में भी विस्तार देने की अपील की। उन्होंने कहा कि उर्वरकों के अत्यधिक इस्तेमाल से खेती की लागत बढ़ती है और मिट्टी की सेहत प्रभावित हो सकती है। कृषि मंत्री ने बताया कि केंद्र सरकार फिलहाल उर्वरक सब्सिडी पर करीब दो लाख करोड़ रुपये खर्च कर रही है। किसानों को यूरिया 266 रुपये प्रति बोरी और डीएपी 1,350 रुपये प्रति बोरी की दर पर उपलब्ध कराया जा रहा है।

जलवायु जोखिमों के अनुरूप कृषि रणनीति जरूरी

इस मौके पर कृषि सचिव अतीश चंद्र ने कहा कि बदलते मौसम, असमान बारिश और वर्षा आधारित क्षेत्रों में नमी से जुड़ी चुनौतियों को देखते हुए कृषि विविधीकरण, टिकाऊ खेती और शोध आधारित कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना जरूरी है। उन्होंने किसानों की आय बढ़ाने के लिए मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन, आधुनिक कृषि बुनियादी ढांचे, मजबूत बाजार व्यवस्था और डिजिटल कृषि समाधानों को अंतिम छोर तक पहुंचाने के साथ ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ जैसी पहलों को प्रभावी ढंग से लागू करने पर जोर दिया।

आईसीएआर के महानिदेशक और कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के सचिव डॉ. मांगी लाल जाट ने रबी अभियान के लिए आत्मनिर्भरता, फसल विविधीकरण, जलवायु अनुकूल और टिकाऊ कृषि, डिजिटल कृषि तथा जोखिम प्रबंधन को प्रमुख प्राथमिकताएं बताया। 

उन्होंने विशेष रूप से दलहन और तिलहन उत्पादन बढ़ाने तथा धान के बाद खाली रहने वाले क्षेत्रों में लक्षित फसल विविधीकरण पर जोर दिया। उनके अनुसार इसके लिए फसल और उपयुक्त किस्म के चयन से लेकर गुणवत्तापूर्ण बीज, मशीनीकरण, जैविक समाधान और बीज उपचार तक एक व्यापक तकनीकी पैकेज की जरूरत होगी। डॉ. जाट ने बताया कि आगामी सीजन में छह राज्यों के 37 जिलों में 10,000 एकड़ क्षेत्र में ग्रीन अमोनिया के बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किए जाने की योजना है।

साप्ताहिक निगरानी और डिजिटल किसान डेटाबेस

कृषि मंत्री चौहान ने राज्यों से बुवाई की प्रगति, अंकुरण, फसल की स्थिति, कीट एवं रोग प्रकोप तथा बाजार कीमतों की साप्ताहिक निगरानी करने को कहा। उनके अनुसार, रियल-टाइम जानकारी से उभरती समस्याओं की जल्द पहचान कर समय पर सुधारात्मक कदम उठाए जा सकेंगे।

उन्होंने विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों के बीच किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) की पहुंच बढ़ाने और किसान आईडी तथा एग्रीस्टैक का काम तेजी से पूरा करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि बटाईदार किसानों और अलग-अलग स्थानों पर जमीन की खेती करने वाले किसानों को भी किसान आईडी के दायरे से बाहर नहीं रखा जाना चाहिए।

दो दिवसीय सम्मेलन का समापन 29 सितंबर को राज्यों के कृषि मंत्रियों के साथ चर्चा के बाद होगा। इसमें रबी मौसम का पूर्वानुमान, उर्वरक उपलब्धता, डिजिटल कृषि मिशन, किसान रजिस्ट्री, दलहन और खाद्य तेल मिशन, पीएम धन-धान्य कृषि योजना तथा कृषि विपणन सुधार सहित रबी की तैयारियों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होगी। इन चर्चाओं से रबी 2026 के लिए समन्वित कार्ययोजना तैयार करने में मदद मिलने की उम्मीद है।