मध्य-पूर्व में बढ़ते संघर्ष के कारण आपूर्ति बाधित होने की आशंकाओं के चलते सोमवार को ब्रेंट कच्चे तेल की कीमतें बढ़कर 119.50 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं। हालांकि बाद में कीमतों में नरमी आई क्योंकि ऐसी खबरें आईं कि जी-7 देशों के वित्त मंत्री रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार से आपातकालीन क्रूड रिलीज पर विचार कर रहे हैं। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने तेल आपूर्ति और शिपिंग मार्गों को प्रभावित किया है। इसी बीच भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने सोमवार को संसद को बताया कि पश्चिम एशिया की बिगड़ती स्थिति के बीच भारत शांति और कूटनीति के प्रति प्रतिबद्ध है।
फाइनेंशियल टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार जी-7 के अधिकारी और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के प्रमुख फतीह बिरोल (Fatih Birol) न्यूयॉर्क में सोमवार एक आपातकालीन कॉल करने वाले हैं। इस बैठक में तेल बाजारों में आई भारी अस्थिरता को शांत करने के लिए रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार से कच्चा तेल रिलीज की संभावना पर चर्चा होगी।
रिपोर्टों के अनुसार अमेरिका समेत कम से कम तीन G7 देश इस कदम के समर्थन में हैं। अमेरिकी अधिकारी कथित तौर पर 30-40 करोड़ बैरल कच्चा तेल जारी करने पर विचार कर रहे हैं, जो IEA प्रणाली के 1.2 अरब बैरल के आपात भंडार का लगभग 25-30 प्रतिशत हो सकता है। इन भंडारों का निर्माण मूल रूप से 1973-74 के तेल संकट के बाद गंभीर आपूर्ति बाधाओं के दौरान वैश्विक बाजारों को स्थिर रखने के लिए किया गया था।
आईईए के सदस्य देशों के पास सामूहिक रूप से 1.24 अरब बैरल से अधिक सरकारी भंडार मौजूद हैं। इसके अलावा उद्योग के पास लगभग 60 करोड़ बैरल अतिरिक्त भंडार भी है जिन्हें आपात स्थिति में उपयोग किया जा सकता है। IEA की स्थापना के बाद से रणनीतिक भंडारों का सामूहिक उपयोग केवल पांच बार किया गया है, जिनमें सबसे हालिया 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद हुआ था।
कीमतों में आंशिक गिरावट के बावजूद कच्चे तेल में तेजी बरकरार है। यह 2020 के बाद सबसे बड़ी एक-दिवसीय बढ़त मानी जा रही है। ब्रेंट क्रूड दिन में 15.65 प्रतिशत की बढ़त के साथ 107.20 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था। अमेरिकी बेंचमार्क WTI कच्चा तेल 103.18 डॉलर पर था, जो 14.26 प्रतिशत ऊपर है।
1970 के दशक के संकट की याद
मौजूदा स्थिति ने 1970 के दशक के तेल संकट की याद ताजा कर दी है, जब ओपेक (OPEC) के अरब सदस्य देशों ने 1973 के अरब-इजरायल युद्ध के दौरान तेल निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था। इसके बाद कच्चे तेल की कीमतें लगभग 300 प्रतिशत तक उछल गई थीं। उस समय वैश्विक तेल कीमतें लगभग 3 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 12 डॉलर तक पहुंच गई थीं क्योंकि अचानक वैश्विक आपूर्ति का लगभग 7-9 प्रतिशत बाजार से गायब हो गया था।
मौजूदा स्थिति ने भी उत्पादन को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। इराक के दक्षिणी तेल क्षेत्रों से उत्पादन लगभग 70 प्रतिशत गिर गया है और दैनिक उत्पादन युद्ध से पहले के करीब 43 लाख बैरल से घटकर 13 लाख बैरल रह गया है। इराक का तेल निर्यात भी 33.3 लाख बैरल प्रतिदिन से गिरकर केवल 800,000 बैरल रह गया है।
इराक पहला बड़ा तेल उत्पादक देश है जिसने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में टैंकर यातायात बाधित होने के कारण उत्पादन घटाया। इसके बाद कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात ने भी उत्पादन में कटौती की घोषणा की क्योंकि इस जलडमरूमध्य से समुद्री यातायात लगभग ठप हो गया है।
पिछले सप्ताह होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों की संख्या नाटकीय रूप से घट गई। सामान्यतः प्रतिदिन 138 जहाज गुजरते थे, लेकिन 24 घंटे की अवधि में यह संख्या घटकर केवल दो रह गई, जिनमें से कोई भी तेल टैंकर नहीं था।
ऊर्जा झटके का असर भारतीय मुद्रा पर
ऊर्जा बाजारों में आए इस झटके का असर भारत जैसे बड़े आयातक देशों पर दिखने लगा है। बढ़ती तेल कीमतों के कारण सोमवार को भारतीय रुपया गिरकर 92.347 रुपये प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। रिजर्व बैंक ने रुपये में गिरावट को रोकने के लिए हस्तक्षेप किया, फिर भी इसमें इतनी गिरावट आई।
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत आयात करता है। इसलिए वैश्विक ऊर्जा कीमतों में तेज उछाल के प्रति उसकी अर्थव्यवस्था काफी संवेदनशील हो जाती है। इससे चालू खाते का घाटा बढ़ सकता है और महंगाई पर दबाव भी बढ़ सकता है।
कार्तिक गणेसन, फैलो और डायरेक्ट - स्टैटेजिक पार्टनरशिप, काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW), ने कहा, "कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और आपूर्ति की बाधाओं ने एक बार फिर आयातित कच्चे तेल के साथ भारत के नाजुक संबंध को सामने ला दिया है। निश्चित तौर पर यह हमें आयातित तेल पर अपनी निर्भरता घटाने वाले उपायों को खोजने के लिए प्रेरित करने वाला होना चाहिए। निजी वाहनों से जुड़ी तेल उत्पादों की मांग को उचित मूल्य निर्धारण के जरिए कम करना और शहरों में कुकिंग के लिए एलपीजी (LPG) की जगह पर इलेक्ट्रिक कुकिंग की दिशा में एक धीमी गति के बदलाव को प्रोत्साहित करना, अल्प से मध्यम अवधि में स्थितियों को सुधारने में मदद कर सकता है।"
संसद में विदेश मंत्री का बयान
इस बीच विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने सोमवार को संसद में कहा कि पश्चिम एशिया की बिगड़ती स्थिति के बीच भारत शांति और कूटनीति के प्रति प्रतिबद्ध है। संसद के दोनों सदनों में स्वतः बयान देते हुए उन्होंने कहा कि क्षेत्र में हो रहे घटनाक्रम “गंभीर चिंता का विषय” हैं। उन्होंने कहा कि भारत का मानना है कि संवाद, तनाव कम करने, संयम बरतने और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के माध्यम से ही इस संकट का समाधान संभव है।