बजट 2023: कृषि क्षेत्र को अपने अमृतकाल का इंतजार

वित्त मंत्री द्वारा कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए किये गये बजटीय प्रावधानों को देखने से लगता है कि किसानों और कृषि क्षेत्र को अपने अमृत काल लिए अभी इंतजार करना होगा। कृषि क्षेत्र से जुड़ी अधिकांश योजनाओं और मदों के लिए नये बजट आवंटन घटा दिया गया है। यही नहीं दस लाख करोड़ रुपये के पूंजीगत निवेश में भी आधी से अधिक आबादी को जीवन-यापन का विकल्प दे रहे कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी नहीं दिखती है। बजटीय प्रावधानों के आकार को लगभग चालू वित्त वर्ष (2022-23) के स्तर पर ही समेट दिया गया है। अब हो सकता है कि कृषि क्षेत्र के लिए उठाये जाने वाले कुछ कदम इस साल के अंत में होने वाले कई महत्वपूर्ण राज्य विधान सभा चुनावों के पहले घोषित किये जाएं या फिर अगले लोक सभा चुनावों के पहले आने वाले अंतरिम बजट में इनको जगह मिले

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बुधवार को संसद में अमृत काल का बजट 2023-24 पेश किया है। ढांचागात सुविधाओं  में भारी पूंजीगत निवेश, युवाओं को नये भारत की ओर ले जाने के लिए डिजिटलाइजेशन, डिजिटल इकोनॉमी, आय कर का नया टैक्स विकल्प, ग्रीन हाइड्रोजन, डिजिटल लाइब्रेरी, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स को बढ़ावा देने से लेकर पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए तमाम घोषणाएं इस बजट में की है। लेकिन वित्त मंत्री द्वारा कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए किये गये बजटीय प्रावधानों को देखने से लगता है कि किसानों और कृषि क्षेत्र को अपने अमृत काल लिए अभी इंतजार करना होगा। कृषि क्षेत्र से जुड़ी अधिकांश योजनाओं और मदों के लिए नये बजट आवंटन घटा दिया गया है। यही नहीं दस लाख करोड़ रुपये के पूंजीगत निवेश में भी आधी से अधिक आबादी को जीवन-यापन का विकल्प दे रहे कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी नहीं दिखती है। बजटीय प्रावधानों के आकार को लगभग चालू वित्त वर्ष (2022-23) के स्तर पर ही समेट दिया गया है। अब हो सकता है कि कृषि क्षेत्र के लिए उठाये जाने वाले कुछ कदम इस साल के अंत में होने वाले कई महत्वपूर्ण राज्य विधान सभा चुनावों के पहले घोषित किये जाएं या फिर अगले लोक सभा चुनावों के पहले आने वाले अंतरिम बजट में इनको जगह मिले।

बात ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार की गारंटी देने वाली योजना महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना से शुरू करते हैं। चालू साल के संशोधित अनुमानों में इस पर खर्च होने वाली राशि 89400 करोड़ रुपये रहने की बात कही गई है लेकिन आगामी वित्त वर्ष (2023-24) के लिए बजट में इसके लिए केवल 60 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है जो चालू साल के संशोधित अनुमानों से 29 हजार 400 करोड़ रुपये कम है। कृषि क्षेत्र की ढांचागत सुविधाओं में सबसे अहम सिंचाई सुविधा की योजना प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के लिए चालू साल के बजट में 12954 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया था लेकिन इस पर खर्च 8085 करोड़ रुपये रहने का संशोधित अनुमान है। वहीं अगले साल के लिए आवंटन 10,787 करोड़ रुपये कर दिया गया है। यानी सिंचाई योजना पर बहुत बड़ा खर्च करने की जरूरत नहीं है। प्रधानमंत्री सुक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण औद्योगिकीकरण स्कीम के लिए पिछले साल 900 करोड़ रुपये का बजटीय प्रावधान था लेकिन खर्च केवल 290 करोड़ रुपये हुए और अब इसके लिए नये साल में प्रावधान 639 करोड़ रुपये कर दिया गया है।

राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के लिए चालू साल के बजट में 10443 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था लेकिन इसमें खर्च हुए 7000 करोड़ रुपये। वहीं आगामी साल के लिए बजटीय आवंटन को ही 7500 करोड़ रुपये कर दिया गया है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि को लेकर किसानों को उम्मीद थी कि इस बार योजना में शायद अधिक पैसा देने की घोषणा होगी। चालू साल के बजट में इसके लिए 68 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था लेकिन खर्च 60 हजार करोड़ रुपये रहने का संशोधित अनुमान है इसलिए अगले साल के बजट में भी प्रावधान घटाकर 60 हजार करोड़ रुपये कर दिया गया है। किसान उत्पादक संगठनों के लिए चालू साल के बजट में 500 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था लेकिन इस पर खर्च 955 करोड़ रुपये होने का संशोधित अनुमान लगाया गया है और अगले साल के भी 955 करोड़ रुपये का बजटीय प्रावधान कर दिया गया है।

फसल बीमा योजना के लिए चालू साल के बजट में 15500 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया था लेकिन इस पर खर्च आया 12376 करोड़ रुपये। इसीलिए अगले साल के लिए इस योजना का आवंटन पिछले साल के बजट से घटाकर 13625 करोड़ रुपये कर दिया गया है। सस्ता कर्ज देने के लिए लागू संशोधित ब्याज सबवेंशन योजना के लिए चालू साल के लिए 19500 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था लेकिन खर्च 22 हजार करोड़ रुपये होने का अनुमान है। इसके लिए आवंटन बढ़ाकर 23 हजार करोड़ रुपये किया गया है। बजट में कृषि कर्ज के चालू साल के 18.5 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 20 लाख करोड़ रुपये का लक्ष्य  रखा गया है। यूरिया सब्सिडी में चालू साल के खर्च के मुकाबले 22998 करोड़ रूपये कम खर्च होने की संभावना के तहत इसके लिए 1,31,100 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। वैश्विक बाजार में यूरिया की कीमतों में गिरावट के चलते सरकार को सब्सिडी की बचत होगी। इसी तरह न्यूट्रिएंट आधारित सब्सिडी योजना में भी सबसे 27122 करोड़ रुपये खर्च होने के अनुमान के तहत इसके लिए आगामी साल का बजटीय प्रावधान 44 हजार करोड़ रुपये किया गया है।

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत खाद्यान्नों की विकेंद्रित खरीद के लिए बजट में 59793 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है जिस पर चालू साल में 72283 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। वहीं राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत भारतीय खाद्य निगम को दी जाने वाली सब्सिडी के लिए 1,37,207 करोड़ रुपये का प्रावधान नये बजट में किया गया है जबकि चालू साल में इस पर 2,14,696 करोड़ रुपये का खर्च आने का अनुमान  है। इन आंकड़ों से लगता है कि इन खाद्य सब्सिडी के मोर्चे पर सरकार को अधिक बचत होगी और उसे कम खाद्यान्न खरीद का जरूरत पड़ेगी।

उपर दिये गये आंकड़े कृषि क्षेत्र को लेकर सरकार की प्राथमिकता और गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है और साबित करता है कि जिस तरह से ढांचागत सुविधाओं और उद्योग में निवेश को बढ़ावा देने के कदम बजट में उठाये गये हैं इस तरह की प्राथमिकता कृषि और ग्रामीण क्षेत्र के लिए नहीं दिखती है।

हालांकि सरकार द्वारा बजट घोषणाओं की जानकारी देने के लिए बनाये गये ग्राफिक काफी आकर्षक हैं और इनमें कृषि से जुड़े प्रावधानों की बेहतर प्रस्तुति की गई है। मसलन 20 लाख करोड़ रुपये का कृषि कर्ज का लक्ष्य, मत्स्य संपदा योजना की एक उपयोजना के लिए छह हजार करोड़ रुपये का प्रावधान, हार्टिककल्चर प्लांट मैटीरियल के लए 2200 करोड़ रुपये योजना, एग्रीकल्चर एक्सीलरेटर फंड जो ग्रामीण क्षेत्र में स्टार्ट-अप के लिए बनेगा और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए जरिये कृषि में इंफोर्मेशन सर्विसेज के जरिये समाधान देने की घोषणा की गई है।

इसके अलावा मिलेट्स को श्री अन्न कहकर काम चला लिया गया है हालांकि इनको बढ़ावा के लिए कोई ठोस योजना बजट में नहीं दिखी है। मिलेट किसानों की आय में इजाफा करने वाला कोई कदम साफ तौर से नहीं दिखता है। हां एक करोड़ किसानों को प्राकृतिक खेती के तहत लाने की बात तो कही गई है लेकिन अभी तो देश के कृषि वैज्ञानिक ही प्राकृतिक खेती के फायदों और खेती की इस पद्यति पर भी बहुत बेहतर राय नहीं बना सके हैं।

हां कृषि के साथ सहकारिता क्षेत्र को लेकर जरूरत कुछ कारगर कदम इस बजट में हैं जो प्राथमिक सहकारी समितियों को अधिक प्रभावी बनाने के लेकर बहुउद्देश्यीय समितियों को कार्य क्षेत्र को बढ़ावा देने वाले हैं। वहीं विकेंद्रिकृत भंडारण सुविधाओं के विकास में इनका योगदान हो सकता है। साथ ही सहकारी क्षेत्र के लिए टीडीएस, नकद जमा, नकद निकासी और सहाकारी समितियों द्वारा उत्पादन शुरू करने के समय कंपनियों की तर्ज पर कर की कम दरों जैसे प्रावधान  इस क्षेत्र के लिए बेहतरी लाने वाले साबित हो सकते हैं।