उत्पादन में बढ़ोतरी के बावजूद कृषि क्षेत्र में धीमी ग्रोथ, किसानों की आय न बढ़ने का संकेत

देश में कृषि उत्पादन तो बढ़ा है लेकिन कृषि उपजों के दाम गिरने से किसानों को इसका फायदा नहीं मिल पा रहा है। केंद्र सरकार और आरबीआई ने खाद्य कीमतों को नियंत्रित करने की जो नीति अपनाई गई, उसके चलते कृषि क्षेत्र दबाव में आ गया है। अर्थव्यवस्था के ताजा आंकड़े इसे उजागर करते हैं।

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बेहतर मानसून और उत्पादन में बढ़ोतरी के बावजूद देश में किसानों की आर्थिक स्थिति कमजोर होती जा रही है। इस पर सरकार द्वारा चालू वित्त वर्ष (2025–26) के लिए जारी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आंकड़ों ने मुहर लगा दी है। केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) द्वारा 7 जनवरी को जारी जीडीपी के पहले अग्रिम अनुमानों के मुताबिक, चालू वर्ष में जीडीपी 7.4 फीसदी की दर से बढ़ेगी और ग्रॉस वैल्यू एडेड (जीवीए) की दर 7.3 फीसदी रहेगी। जीवीए का आकलन जीडीपी में से टैक्स और सब्सिडी घटाने के बाद किया जाता है। इस प्रकार जीवीए कुल उत्पादन का द्योतक है। 

चालू वित्त वर्ष में कृषि एवं सहयोगी क्षेत्र के लिए जीवीए की वृद्धि दर (2011-12 की स्थिर कीमतों पर) केवल 3.1 फीसदी रहने का अनुमान लगाया गया है, जो पिछले वर्ष (2024–25) के दौरान 4.6 फीसदी थी। इससे भी अधिक चिंता की बात है कि मौजूदा कीमतों (करंट प्राइसेस) पर कृषि एवं सहयोगी क्षेत्र के जीवीए में मात्र 0.8 फीसदी की बढ़ोतरी का अनुमान है। गत वर्ष मौजूदा कीमतों पर कृषि व संबंधित क्षेत्र के जीवीए में 10.4 फीसदी की ग्रोथ थी।

स्थिर कीमतों तथा मौजूदा कीमतों पर जीवीए में अंतर महंगाई का परिणाम है। कृषि एवं सहयोगी क्षेत्रों के लिए यह अंतर -2.3 फीसदी हो गया है। मतलब, कृषि उत्पादों की महंगाई बढ़ने की बजाय घट रही है। जब उपजों की कीमतें ही नहीं बढ़ रही है तो फिर किसानों की आय कैसे बढ़ेगी?

इस तरह भारतीय कृषि एक ऐसी स्थिति में आ गई जब कृषि उत्पादन बढ़ रहा है, लेकिन उपज की कीमतों में बढ़ोतरी न होने के कारण मौजूदा कीमतों पर कृषि एवं सहयोगी क्षेत्र के ग्रॉस वैल्यू एडेड (जीवीए) में वृद्धि दर एक फीसदी से भी कम रह गई है। यह कृषि क्षेत्र में सुस्ती और ठहराव का संकेत है जो अर्थव्यवस्था के लिए चिंताजनक संकेत है।

सरकारी आंकड़े लगातार इस स्थिति की पुष्टि भी करते हैं। खाद्य महंगाई दर काफी कम है और देश की कृषि मंडियों में उत्पादों के दाम पिछले साल की तुलना में नीचे रहे हैं। खरीफ सीजन के दौरान किसानों को अधिकांश फसलें न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से भी कम दामों पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसी का असर कृषि और सहयोगी क्षेत्र की जीडीपी के आंकड़ों पर दिख रहा है।

महंगाई को काबू में रखने के लिए सरकार ने खाद्य उत्पादों की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए कई कदम उठाए। इनमें घरेलू खपत से कम उत्पादन वाली वस्तुओं जैसे खाद्य तेल और दालों का बड़े पैमाने पर सस्ता आयात भी शामिल है। इसका नतीजा यह हुआ कि खरीफ सीजन की अधिकांश फसलों के लिए किसानों को एमएसपी मिलना भी मुश्किल हो गया।

किसानों की आय में वृद्धि के लिए उत्पादन के अलावा उपजों की कीमतों में बढ़ोतरी भी आवश्यक है। देश में कृषि उत्पादन तो बढ़ा है लेकिन कृषि उपजों के दाम गिरने से किसानों को इसका फायदा नहीं मिल पा रहा है। केंद्र सरकार और आरबीआई ने खाद्य कीमतों को नियंत्रित करने की जो नीति अपनाई गई, उसके चलते कृषि क्षेत्र दबाव में आ गया है। अर्थव्यवस्था के ताजा आंकड़े इसे उजागर करते हैं।

जब पूरी अर्थव्यवस्था 7.3 फीसदी की दर से बढ़ रही है, तब कृषि और सहयोगी क्षेत्र का केवल 3.1 फीसदी की दर से बढ़ना किसी भी सरकार के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। खासकर जबकि देश की लगभग 46 फीसदी कामकाजी आबादी आज भी कृषि और सहयोगी क्षेत्र पर निर्भर है।

चालू वर्ष में जीडीपी में कृषि की हिस्सेदारी लगभग 17 फीसदी रहने का अनुमान है, जबकि मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की हिस्सेदारी 14 फीसदी रहेगी। इसके बावजूद मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में 12 फीसदी से भी कम लोगों को रोजगार मिलता है। इसके अलावा फाइनेंशियल सर्विसेज, अन्य तृतीयक क्षेत्र, कंस्ट्रक्शन और सरकारी सेवाएं अर्थव्यवस्था के बाकी अहम हिस्से हैं।

इस वर्ष मैन्युफैक्चरिंग की जीवीए ग्रोथ 7 फीसदी रहने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष 4.5 फीसदी थी। वहीं तृतीयक क्षेत्र (व्यापर व सेवाएं) का जीवीए पिछले वर्ष के 7.2 फीसदी से बढ़कर इस वर्ष 9 फीसदी तक पहुंचने का अनुमान है। इससे स्पष्ट होता है कि अर्थव्यवस्था की कुल वृद्धि का बड़ा हिस्सा गैर-कृषि क्षेत्रों से आ रहा है।

हालांकि, कृषि के मुकाबले अन्य क्षेत्रों का तेज गति से बढ़ना स्वाभाविक और आवश्यक है, लेकिन यह देखना भी उतना ही जरूरी है कि क्या कृषि पर निर्भर लोग इन तेजी से बढ़ते क्षेत्रों में रोजगार पा रहे हैं। फिलहाल ऐसा होता नजर नहीं आ रहा है। आज भी लगभग 46 फीसदी कामकाजी लोग कृषि और सहयोगी क्षेत्र में ही कार्यरत हैं।

असल में ये आंकड़े ग्रामीण और गैर-ग्रामीण अर्थव्यवस्था के बीच बढ़ती खाई को भी उजागर करते हैं और यह साबित करते हैं कि कृषि पर निर्भर लोगों की आमदनी नहीं बढ़ पा रही है। ये आंकड़े केवल किसानों की परेशानियों तक सीमित नहीं हैं। इसी स्थिति के चलते ग्रामीण अर्थव्यवस्था में उपभोक्ता मांग कमजोर बनी हुई है, जो इस संकट का एक और संकेत है।

ऐसे में जब सरकार आगामी 1 फरवरी को वित्त वर्ष 2026–27 का बजट पेश करेगी, तब यह देखना बेहद अहम होगा कि क्या कृषि क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए कोई ठोस कदम उठाए जाते हैं या नहीं। हालांकि हर बजट में वित्त मंत्री कृषि और ग्रामीण क्षेत्र को प्राथमिकता देने का दावा करते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग नजर आती है।