कांगड़ा की ग्रामीण महिलाएं घर में अपनी बात रखने में आगे, लेकिन वित्तीय फैसलों, कहीं आने-जाने और डिजिटल भागीदारी में बड़ी खाई

कांगड़ा के 21 गांवों की 402 महिलाओं के सर्वे में घर में अपनी बात रखने और बेटियों को समान अवसर देने की बात आई। हालांकि वित्तीय निर्णय, स्वतंत्र रूप से आवाजाही, सुरक्षा और डिजिटल भागीदारी में बड़ी खाई है। इसका उदाहरण है कि 70 फीसदी महिलाओं के पास स्मार्टफोन तो है, लेकिन 86 फीसदी ने कभी डिजिटल भुगतान नहीं किया।

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले की ग्रामीण महिलाएं घर में अपनी बात मजबूती से रखती हैं और उनमें अपनी बेटियों के लिए बेहतर अवसरों की आकांक्षा भी है, लेकिन वित्तीय निर्णय लेने, स्वतंत्र रूप से आवाजाही, सुरक्षा और डिजिटल भागीदारी के मोर्चे पर उनमें और पुरुषों में अब भी बड़ा अंतर है। यह निष्कर्ष एनलाइटेंड इंडिया फाउंडेशन (EIF) की एक सर्वे रिपोर्ट में सामने आया है।

यह निष्कर्ष कांगड़ा की 21 गांवों, 376 परिवारों और 402 महिलाओं के सर्वे पर आधारित है। इसमें शिक्षा और विवाह, घरेलू निर्णयों में भागीदारी, आवाजाही एवं सुरक्षा, डिजिटल समावेशन, आकांक्षाओं और पीढ़ीगत बदलाव तथा भौगोलिक एवं पारिवारिक परिस्थितियों समेत छह आयामों का अध्ययन किया गया। सर्वे के लिए महिलाओं से स्थानीय भाषा में आमने-सामने बात की गई।

शिक्षा की स्थिति बेहतर, लेकिन कम उम्र में विवाह की चुनौती बरकरार

सर्वे में 79 फीसदी महिलाओं ने बताया कि बड़े होते समय उन्हें पर्याप्त शैक्षिक अवसर मिले थे। हालांकि, अलग-अलग आयु वर्गों में यह अनुभव अलग रहा। 26-35 वर्ष की महिलाओं में 69 फीसदी ने पर्याप्त शैक्षिक अवसर मिलने की बात कही, जबकि 56 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं में यह आंकड़ा 90 फीसदी था।

विवाह की उम्र में पीढ़ीगत बदलाव भी स्पष्ट दिखाई देता है। कुल 55 फीसदी महिलाओं की शादी 21 वर्ष या उससे कम उम्र में हुई थी। इनमें 12 फीसदी का विवाह 18 वर्ष से पहले हुआ। 56 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं में 35 फीसदी ने 18 वर्ष से पहले शादी की थी, जबकि 46-55 वर्ष के वर्ग में यह आंकड़ा 8 फीसदी और 36-45 तथा 26-35 वर्ष के वर्ग में क्रमशः 3 और 6 फीसदी था।

घर में मजबूत आवाज, लेकिन वित्तीय फैसलों में सीमित अधिकार

घरेलू स्तर पर महिलाओं की स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत नजर आती है। 96 फीसदी महिलाओं ने कहा कि वे घर में अपनी राय रख सकती हैं, जबकि 95 फीसदी ने बताया कि बच्चों से जुड़े फैसलों में उनसे सलाह ली जाती है। हालांकि, केवल 73 फीसदी महिलाओं ने कहा कि उन्हें अपनी निजी जरूरतों के लिए पर्याप्त समय मिलता है।

वित्तीय फैसलों में तस्वीर अलग है। 41 फीसदी परिवारों में पुरुष और 17 फीसदी में बुजुर्ग वित्तीय फैसले लेते हैं। केवल 13 फीसदी परिवारों में महिलाएं प्रमुख वित्तीय निर्णय वाली पाई गईं, जबकि 29 फीसदी में फैसले संयुक्त रूप से लिए जाते थे। 

आवाजाही और सुरक्षा बड़ी बाधा

स्वतंत्र रूप से आने-जाने के मामले में भी महिलाओं की स्थिति चुनौतीपूर्ण है। किसी भी गंतव्य के लिए अकेले यात्रा करने में सहज महसूस करने वाली महिलाओं का अनुपात 50 फीसदी तक नहीं पहुंचा है। स्थानीय बाजार जाने में 47 फीसदी, पंचायत कार्यालय में 46 फीसदी, स्वास्थ्य केंद्र में 45 फीसदी और दूसरे गांव जाने में केवल 31 फीसदी महिलाएं सहज थीं। इसके अलावा, 87 फीसदी महिलाओं ने बताया कि शाम से सुबह तक बाहर निकलने में उन्हें डर लगता है, जबकि 34 फीसदी ने कहा कि सुरक्षा संबंधी चिंताएं उनकी सामुदायिक भागीदारी को सीमित करती हैं।

स्मार्टफोन तो हैं, लेकिन डिजिटल भुगतान से दूरी

डिजिटल पहुंच के मामले में भी पहुंच और इस्तेमाल के बीच बड़ा अंतर सामने आया। 70 फीसदी महिलाओं के पास स्मार्टफोन है, लेकिन 86 फीसदी ने कभी यूपीआई या किसी डिजिटल भुगतान प्रणाली का इस्तेमाल नहीं किया। स्मार्टफोन रखने वाली महिलाओं में केवल 20 फीसदी स्वतंत्र रूप से यूपीआई का इस्तेमाल करती हैं। वहीं, 21 फीसदी महिलाओं ने कहा कि कोई अजनबी ओटीपी या बैंक संबंधी जानकारी मांगे तो वे उसे साझा कर सकती हैं, जो डिजिटल सुरक्षा जागरूकता में कमी को दर्शाता है।

बेटियों को समान अवसर देने पर शत-प्रतिशत सहमति

सर्वे का सबसे सकारात्मक निष्कर्ष यह रहा कि सभी 402 महिलाओं ने माना कि लड़कियों को लड़कों के समान अवसर मिलने चाहिए। इनमें 77 फीसदी महिलाएं चाहती हैं कि लड़कियों को शिक्षा, रोजगार और विवाह - तीनों में निर्णय का अवसर मिले। यह आकांक्षा महिलाओं के अपने अनुभवों से आगे की सोच को दर्शाती है।

रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि महिलाओं के अनुभवों पर भौगोलिक स्थिति और परिवार का माहौल प्रभाव डालते हैं। जिन परिवारों में पुरुष सदस्यों शराब का सेवन करते हैं, वहां महिलाओं की भागीदारी, आवाजाही, निजी समय और वित्तीय निर्णयों में भागीदारी का स्तर अपेक्षाकृत कम था। हालांकि, रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि ये संबंध कारण साबित नहीं करते।

रिपोर्ट के अनुसार, आगे की नीतियों और कार्यक्रमों तक केवल महिलाओं की पहुंच बढ़ाने के बजाय वास्तविक भागीदारी पर ध्यान देना होगा। इसके लिए वित्तीय समावेशन, सुरक्षित आवाजाही, डिजिटल साक्षरता, आजीविका के अवसर और महिलाओं की आकांक्षाओं को वास्तविक अवसरों में बदलने के रास्ते तैयार करने की जरूरत है। साथ ही, भौगोलिक स्थिति और पारिवारिक परिस्थितियों के आधार पर अलग-अलग रणनीति अपनाने पर जोर दिया गया है।