3.85 लाख करोड़ रुपये का सवालः आखिर ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में 80% विशेषज्ञ डॉक्टरों के पद खाली क्यों हैं?

सरकार का स्वास्थ्य व्यय बढ़कर 3.85 लाख करोड़ रुपये होने और लोगों की जेब से होने वाला स्वास्थ्य खर्च (आउट-ऑफ-पॉकेट एक्सपेंडिचर) घटने के बावजूद भारत की ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था 80% विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी, अपर्याप्त बुनियादी ढांचे और निजी अस्पतालों पर बढ़ती निर्भरता से जूझ रही है। स्वास्थ्य क्षेत्र के प्रभावशाली आंकड़ों और जमीनी हकीकत के बीच का यह अंतर अनेक सवाल खड़े करता है।

एआई इमेज।

स्नेहिल चौबे

भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था प्रशासनिक और वित्तीय दृष्टि से एक गहरे विरोधाभास का उदाहरण प्रस्तुत करती है। व्यापक आर्थिक और सांख्यिकीय स्तर पर देश ने ऐसी उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं, जो तेजी से विकसित और वित्तीय रूप से मजबूत होते स्वास्थ्य तंत्र का संकेत देती हैं। लेकिन यदि जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता, मानव संसाधनों की तैनाती और मरीजों पर पड़ने वाले वास्तविक आर्थिक बोझ का सूक्ष्म विश्लेषण किया जाए, तो तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आती है।

भौतिक स्वास्थ्य अवसंरचना के विस्तार और भारी-भरकम बजटीय आवंटन के बावजूद गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सेवाएं सुनिश्चित नहीं हो सकी हैं और न ही ग्रामीण आबादी की स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां कम हुई हैं। परिणामस्वरूप एक ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था उभरकर सामने आई है, जो कागजों पर तो मजबूत दिखाई देती है, लेकिन जमीनी स्तर पर अपेक्षित परिणाम देने में असफल है।

व्यापक आर्थिक उपलब्धियां बनाम जमीनी हकीकत

राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा (नेशनल हेल्थ अकाउंट्स) 2022-23 के अनुमान के अनुसार, भारत का सरकारी स्वास्थ्य व्यय (GHE) पिछले एक दशक में लगभग तीन गुना बढ़कर 3.85 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। इसके साथ ही सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में सरकारी स्वास्थ्य व्यय की हिस्सेदारी बढ़कर 1.43 प्रतिशत हो गई है।

सार्वजनिक स्वास्थ्य निवेश में इस वृद्धि का सबसे उल्लेखनीय परिणाम लोगों द्वारा अपनी जेब से किए जाने वाले स्वास्थ्य खर्च (Out-of-Pocket Expenditure-OOPE) में आई कमी है। यह खर्च वर्ष 2013-14 में कुल स्वास्थ्य व्यय का 64.2 प्रतिशत था, जो घटकर 2022-23 में 43.4 प्रतिशत रह गया। इसी अवधि में देश में अस्पतालों में प्रसव की दर भी बढ़कर 90.6 प्रतिशत तक पहुंच गई।

हालांकि, आंकड़ों की गहराई से जांच करने पर एक अलग तस्वीर सामने आती है। अस्पतालों में प्रसवों की कुल संख्या बढ़ने के बावजूद सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में होने वाले प्रसवों का अनुपात 61.9 प्रतिशत से घटकर 58.6 प्रतिशत रह गया है। यह एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करता है कि आखिर ग्रामीण परिवार मुफ्त सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं को छोड़कर निजी अस्पतालों का रुख क्यों कर रहे हैं?

अनुसंधान ट्रस्ट के एक्शन सेंटर साथी (सपोर्ट फॉर एडवोकेसी एंड ट्रेनिंग इन हेल्थ इनिशिएटिव्स) से जुड़े स्वास्थ्य अधिकार कार्यकर्ता विनोद शेंडे जमीनी स्तर की एक महत्वपूर्ण तस्वीर पेश करते हैं। उनका कहना है कि स्वास्थ्य के प्रति लोगों में जागरूकता तो बढ़ रही है, लेकिन सरकारी निवेश अभी मुख्य रूप से मेडिकल कॉलेजों, बड़े शहरी अस्पतालों और पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) परियोजनाओं पर केंद्रित है। प्राथमिक और प्रिवेंटिव स्वास्थ्य सेवाओं की लगातार उपेक्षा की जा रही है।

इसका परिणाम है कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में जांच सुविधाओं की कमी, डॉक्टरों एवं अन्य कर्मचारियों के बड़ी संख्या में रिक्त पद तथा दवाओं की उपलब्धता में कमी के कारण लोगों को मजबूरन निजी स्वास्थ्य सेवाओं का सहारा लेना पड़ता है। इससे इलाज का वास्तविक आर्थिक बोझ सीधे आम नागरिकों पर पड़ रहा है।

संरचनात्मक कमी और क्षेत्रीय असमानताएं

ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं का भौतिक ढांचा इस समय मानव संसाधनों की भारी कमी के कारण लगभग पंगु हो चुका है। हेल्थ डायनेमिक्स ऑफ इंडिया 2023-24 रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) में विशेषज्ञ डॉक्टरों के 79.9 प्रतिशत पद रिक्त हैं। इसके अलावा, स्वास्थ्य अवसंरचना के विस्तार पर सरकार का जोर कई बार वास्तविक स्थिति को छिपा देता है। ग्रामीण क्षेत्रों के 31 प्रतिशत से अधिक उप-स्वास्थ्य केंद्रों के पास आज भी अपना स्थायी भवन नहीं है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या सरकार बुनियादी स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने के बजाय केवल नए नामकरण और विस्तार पर अधिक ध्यान दे रही है।

इस संकट का सबसे अधिक असर हिंदीभाषी राज्यों में दिखाई देता है। मध्य प्रदेश में विशेषज्ञ डॉक्टरों के 94 प्रतिशत, बिहार में 80.9 प्रतिशत, राजस्थान में 80.3 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश में 74.4 प्रतिशत पद रिक्त हैं। मध्य प्रदेश में स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि राज्य सरकार ने हाल ही रीवा, गुना और देवास जिलों के 18 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) के संचालन का जिम्मा निजी संस्थाओं को सौंपने के लिए एक पायलट परियोजना को मंजूरी दी है। यह निर्णय विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी के कारण लिया गया। राज्य के संचालित सीएचसी में विशेषज्ञ डॉक्टरों के 1,320 स्वीकृत पदों में से केवल 113 पद भरे हुए हैं।

उत्तर और दक्षिण का अंतर

तमिलनाडु की ट्राइबल हेल्थ इनिशिएटिव से जुड़े डॉ. रेगी जॉर्ज का कहना है कि दक्षिण भारत के राज्यों में ऐसी गंभीर स्थिति इसलिए नहीं बनती क्योंकि वहां सरकारें स्वास्थ्य इन्फ्रास्ट्रक्चर पर अधिक निवेश करती हैं। इसमें डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों के लिए आवास जैसी आवश्यक सुविधाएं भी शामिल हैं। इसके अलावा, ग्रामीण क्षेत्रों में सेवाएं देने वाले मेडिकल छात्रों को शैक्षणिक अंकों के रूप में प्रोत्साहन दिया जाता है, जिससे वहां डॉक्टरों की उपलब्धता बेहतर बनी रहती है।

हालांकि, डॉ. जॉर्ज का कहना है कि अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों में भी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सीमित दवाओं की उपलब्धता के कारण सामान्य बीमारियों का ही उपचार कर पाते हैं। उनका मानना है कि सेकंडरी स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने और सामान्य प्रसव जैसी आवश्यक सेवाओं में सुधार की तत्काल आवश्यकता है।

चिकित्सा के लिए दूर जाने की नौबत

जब प्राइमरी और सेकंडरी स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा केवल प्रशासनिक औपचारिकता बनकर रह जाता है, तो इसका सबसे पहला और प्रत्यक्ष परिणाम चिकित्सा सेवाओं के लिए लोगों को दूर जाना होता है। स्टेट ऑफ हेल्थ इन रूरल इंडिया सर्वे के अनुसार, ग्रामीण भारत के 58 प्रतिशत परिवारों ने बताया कि उनके आसपास के लोगों को गंभीर उपचार के लिए दूसरे क्षेत्रों में जाना पड़ता है। उत्तर-पूर्व और उत्तर भारत में यह स्थिति और भी गंभीर है, जहां क्रमशः 73 प्रतिशत और 60 प्रतिशत मरीजों को इलाज के लिए अपने राज्य से बाहर जाना पड़ता है। इस पर 51 प्रतिशत से अधिक परिवारों का प्रति बार 25,000 रुपये तक खर्च हो जाता है, जबकि लगभग 6 प्रतिशत निम्न-आय वाले परिवार एक लाख रुपये से अधिक के कर्ज में फंस जाते हैं।

इस कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था को किसी तरह संभाले रखने वाला सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता (आशा) हैं। लेकिन यह कार्यबल भी भारी दबाव में है। डॉ. जॉर्ज के अनुसार, आशा कार्यकर्ता अत्यधिक कार्यभार और कम पारिश्रमिक के बावजूद उल्लेखनीय काम कर रही हैं। आधिकारिक तौर पर उन्हें अंशकालिक स्वयंसेवक माना जाता है, जबकि व्यवहार में वे पूर्णकालिक कर्मचारी की तरह काम करती हैं। कम वेतन पाने वाली महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं पर अत्यधिक निर्भरता न केवल उनके मानसिक और शारीरिक थकान का कारण बन रही है, बल्कि इससे हाशिए पर रहने वाले समुदायों और स्वास्थ्य व्यवस्था के बीच विश्वास का संकट भी गहरा रहा है।

अनियंत्रित निजीकरण और जरूरत से ज्यादा सी-सेक्शन

ग्रामीण सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की कमजोर होती भूमिका ने स्वास्थ्य सेवाओं में शोषण की एक समानांतर अर्थव्यवस्था को जन्म दिया है। इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण सीजेरियन (सी-सेक्शन) प्रसव में तेजी से हुई वृद्धि है। देश में सी-सेक्शन प्रसव की दर बढ़कर 27.2 प्रतिशत हो गई है। निजी अस्पतालों में 54.1 प्रतिशत प्रसव सी-सेक्शन के माध्यम से होते हैं, जबकि सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में यह आंकड़ा केवल 16.9 प्रतिशत है।

जन स्वास्थ्य अभियान (जेएसए) के इंद्रनील मुखोपाध्याय ने बताया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार आदर्श सी-सेक्शन दर अधिकतम 15 प्रतिशत होनी चाहिए। लेकिन वैश्विक स्तर पर और विशेष रूप से भारत के निजी स्वास्थ्य क्षेत्र में यह दर चिंताजनक रूप से अधिक है। इससे संकेत मिलता है कि पर्याप्त सुविधाओं के अभाव में सरकारी अस्पतालों से निजी अस्पतालों की ओर जाने वाली गर्भवती महिलाओं को आर्थिक लाभ के उद्देश्य से अनावश्यक सर्जरी कराई जा रही है।

सिर्फ सी-सेक्शन ही नहीं, बल्कि पंजाब के आंकड़े महिलाओं में हिस्टेरेक्टॉमी (गर्भाशय निकालने की सर्जरी) के मामलों में भी चिंताजनक वृद्धि दर्शाते हैं। 15 से 49 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं में इसकी दर 2.6 प्रतिशत तक पहुंच गई है और इनमें से लगभग दो-तिहाई ऑपरेशन निजी अस्पतालों में किए गए, जहां पहले वैकल्पिक उपचारों पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया। मुखोपाध्याय ने कहा कि आयुष्मान भारत हेल्थ एंड वेलनेस सेंटरों के माध्यम से इन बुनियादी ढांचागत समस्याओं को दूर किया जाना था, लेकिन निजी स्वास्थ्य क्षेत्र में चिकित्सकीय शोषण जारी है।

पोषण संकट और आंकड़ों का अभाव

किसी भी स्वास्थ्य व्यवस्था की वास्तविक सफलता का आकलन उसके नागरिकों के स्वास्थ्य परिणामों से होता है। स्वास्थ्य क्षेत्र में सरकारी खर्च बढ़ने के बावजूद भारत अब भी गंभीर पोषण संकट से जूझ रहा है। एनएफएचएस-6 के आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर अर्थशास्त्री संतोष मेहरोत्रा बताते हैं कि बच्चों में कुपोषण की स्थिति लगभग स्थिर बनी हुई है। पांच वर्ष से कम आयु के 29.3 प्रतिशत बच्चे अवरुद्ध वृद्धि (स्टंटिंग) के शिकार हैं, 31.8 प्रतिशत बच्चे कम वजन के हैं और 19 प्रतिशत बच्चे गंभीर दुबलापन (वेस्टिंग) से प्रभावित हैं।

वयस्कों में भी कुपोषण बढ़ा है। जिन भारतीय महिलाओं का बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) 18.5 से कम है, उनका अनुपात कुछ वर्षों में 18.7 प्रतिशत से बढ़कर 19.7 प्रतिशत हो गया है। यह समस्या विशेष रूप से हिंदी भाषी राज्यों में अधिक गंभीर है। उदाहरण के लिए, बिहार में कम वजन वाले लोगों का अनुपात राष्ट्रीय औसत से लगभग 8 प्रतिशत अंक अधिक है।

हालांकि, इन जमीनी स्थितियों का सही आकलन करना अब कठिन होता जा रहा है क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर आंकड़े जुटाने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं। एनएफएचएस-6 से 43 प्रमुख इंडिकेटर्स को हटा दिया गया है, जिनमें जन्म के समय लिंगानुपात, स्वच्छता संबंधी आंकड़े, स्वच्छ ईंधन के उपयोग की जानकारी और एनीमिया से जुड़े सात महत्वपूर्ण संकेतक शामिल हैं।

मुखोपाध्याय का कहना है कि एनएफएचएस जैसे व्यापक सर्वेक्षण से एनीमिया जैसे बुनियादी स्वास्थ्य संकेतकों को हटाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। सरकार भले ही इन इंडिकेटर्स के लिए अलग छोटे सर्वेक्षण कराने की बात कर रही हो, लेकिन एनएफएचएस जैसा विशाल सैंपल दोबारा तैयार करना आसान नहीं है। ऐसे महत्वपूर्ण इंडिकेटर्स को हटाने से शोधकर्ताओं के लिए जमीनी स्वास्थ्य स्थिति का वास्तविक आकलन करना कठिन हो जाएगा और इससे सकारात्मक व्यापक आर्थिक आंकड़ों के पीछे छिपे वास्तविक स्वास्थ्य संकट पर पर्दा पड़ सकता है।

निष्कर्ष

यदि स्वास्थ्य व्यवस्था का मूल्यांकन केवल बजटीय आवंटन, संस्थानों की संख्या या अन्य व्यापक आर्थिक इंडिकेटर्स के आधार पर किया जाएगा, तो कागजों पर सफलता हासिल करना आसान होगा। लेकिन बिना डॉक्टर वाला अस्पताल केवल एक इमारत है, और अनावश्यक सर्जरी के जरिए कराया गया प्रसव स्वास्थ्य व्यवस्था की नियामकीय विफलता को दर्शाता है। यदि भारत को वास्तव में सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज) हासिल करना है, तो नीति निर्माताओं को राष्ट्रीय आंकड़ों में दिखाई देने वाली उपलब्धियों और ग्रामीण क्षेत्रों में मरीजों तथा अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्य कर्मियों के रोजमर्रा के संघर्ष के बीच मौजूद गहरी खाई को पाटना होगा।

(स्नेहिल चौबे डॉ. बी.आर. आंबेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली में पब्लिक पॉलिसी एंड गवर्नेंस में द्वितीय वर्ष की स्नातकोत्तर छात्रा हैं। उन्होंने हाल ही रूरल वॉयस में इंटर्नशिप पूरी की है)