प्रीमियम उत्पादों के निर्यात से बढ़ेगी किसानों की आयः अभिषेक देव

रूरल वर्ल्ड के एडिटर-इन-चीफ हरवीर सिंह से विशेष बातचीत में एपीडा चेयरमैन अभिषेक देव ने बताया कि यह संस्था किस प्रकार भारत को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने की दिशा में काम कर रही है।

वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बावजूद भारत का कृषि निर्यात मजबूत बना हुआ है, लेकिन अगले चरण की वृद्धि वैल्यू एडिशन समेत कई बातों पर निर्भर करेगी। नए एफटीए से खुलते बाजार, प्रसंस्कृत एवं जीआई-टैग वाले उत्पादों की बढ़ती मांग और खाद्य सुरक्षा के कड़े अंतरराष्ट्रीय मानकों के बीच भारत की कृषि निर्यात रणनीति तेजी से बदल रही है। रूरल वर्ल्ड के एडिटर-इन-चीफ हरवीर सिंह से विशेष बातचीत में एपीडा चेयरमैन अभिषेक देव ने बताया कि यह संस्था किस प्रकार भारत को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने की दिशा में काम कर रही है।

वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद भारत का कृषि निर्यात मजबूत बना हुआ है। दीर्घकालिक कृषि निर्यात लक्ष्यों को हासिल करने के लिए एपीडा की क्या रणनीति है?

अनिश्चितताओं के बावजूद निर्यात में मजबूती का प्रमुख कारण हमारे कृषि क्षेत्र की मजबूत बुनियाद और भारतीय उत्पादों के प्रति दुनिया का लगातार बढ़ता भरोसा है। एपीडा में हमारा उद्देश्य इस गति को बनाए रखने के साथ ऐसा कृषि निर्यात तंत्र विकसित करना है जो किसानों, निर्यातकों और देश की अर्थव्यवस्था के लिए अधिक मूल्य सृजित करे। हमारी रणनीति तीन प्रमुख स्तंभों पर आधारित है - बाजार विविधीकरण, उत्पाद विविधीकरण और निर्यात इकोसिस्टम का विकास।

बाजार विविधीकरण के तहत हम अफ्रीका, मध्य एशिया, आसियान और पूर्वी एशिया में नए अवसर तलाश रहे हैं। खाड़ी देशों, यूरोप और अमेरिका जैसे स्थापित बाजारों में भी उपस्थिति मजबूत कर रहे हैं। मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) से मिले अवसरों का लाभ उठाकर भारतीय उत्पादों की पहुंच बढ़ाई जा रही है। विशेष रूप से चावल के क्षेत्र में एपीडा चीन, जापान, सिंगापुर, फिलीपींस, वियतनाम और सीआईएस जैसे नए बाजारों में निर्यात को बढ़ावा दे रहा है।

दूसरा महत्वपूर्ण लक्ष्य निर्यात मात्रा के साथ निर्यात आय को भी बढ़ाना है। एपीडा प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ, ताजे फल एवं सब्जियां, जैविक उत्पाद, जीआई टैग वाले उत्पाद, रेडी-टू-ईट और रेडी-टू-कुक खाद्य, मिलेट, न्यूट्रास्यूटिकल्स तथा प्रीमियम चावल जैसे उच्च मूल्य वाले उत्पादों को बढ़ावा दे रहा है। इससे किसानों को बेहतर कीमत और अधिक आय प्राप्त होगी।

गुणवत्ता और अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन निर्यात रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। एपीडा हॉर्टिनेट, ग्रेपनेट, पीनट.नेट और वेटनेट जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से ट्रेसबिलिटी और सैनिटरी एवं फाइटो-सैनिटरी मानकों का अनुपालन मजबूत कर रहा है।

एपीडा अब तक 1,400 से अधिक एफपीओ को कृषि निर्यात मूल्य श्रृंखला से जोड़ चुका है। नियमित क्षमता निर्माण कार्यक्रमों के माध्यम से किसानों, एफपीओ, निर्यातकों और अन्य हितधारकों को गुड एग्रीकल्चरल प्रैक्टिसेज, फसल प्रबंधन, पैकेजिंग, खाद्य सुरक्षा, गुणवत्ता मानकों और निर्यात प्रक्रियाओं का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

हमारी दीर्घकालिक रणनीति में नवाचार भी है। भारत हब फॉर एग्रीटेक, रेजिलिएंस, एडवांसमेंट एंड इनक्यूबेशन फॉर एक्सपोर्ट इनोवेशन (BHARATI) पहल के माध्यम से एपीडा निर्यातक एग्री-फूड स्टार्टअप को रेगुलेटरी सहायता, बाजार पहुंच और निवेशकों से संपर्क उपलब्ध करा रहा है। एपीडा अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेलों, बायर-सेलर मीट और वैश्विक प्रचार अभियानों के माध्यम से 'ब्रांड इंडिया' को भी मजबूत कर रहा है। प्रीमियम चावल, जीआई टैग वाले उत्पाद और मिलेट आधारित खाद्य पदार्थों को गल्फूड, सियाल पेरिस, अनुगा, फाइनफूड ऑस्ट्रेलिया, वर्ल्ड फूड मॉस्को, बायोफैक जैसे प्रमुख अंतरराष्ट्रीय आयोजनों तथा वर्ल्ड फूड इंडिया, इंडस फूड, बायोफैक इंडिया और आहार जैसे घरेलू मंचों पर प्रदर्शित किया जा रहा है।

अगले पांच वर्षों में कौन से कृषि उत्पाद और अंतरराष्ट्रीय बाजार सबसे अधिक विकास के अवसर प्रदान करेंगे?

आने वाले पांच वर्ष भारत के लिए कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों के क्षेत्र में प्रमुख वैश्विक आपूर्तिकर्ता के रूप में अपनी स्थिति मजबूत करने का सुनहरा अवसर होंगे। यह नए बाजारों में विस्तार और मूल्य संवर्धन से हासिल किया जा सकता है। हाल ही ब्रिटेन, यूएई, ऑस्ट्रेलिया और ओमान के साथ हुए एफटीए तथा यूरोपीय संघ और न्यूजीलैंड के साथ प्रस्तावित एफटीए भारतीय कृषि उत्पादों को व्यापक बाजार उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

चावल, अंगूर, प्याज, आम, केला, मांस, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ, बेकरी उत्पाद, मीठे बिस्कुट, संरक्षित फल एवं सब्जियां तथा माल्ट एक्सट्रैक्ट जैसे उत्पादों में निर्यात वृद्धि की बड़ी संभावनाएं हैं। अनाज, ताजे फल व सब्जियों और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ जैसे पारंपरिक निर्यात उत्पादों के अलावा जीआई-टैग वाले उत्पादों, जैविक खाद्य पदार्थों, रेडी-टू-ईट उत्पादों, मिलेट आधारित खाद्य पदार्थों तथा अन्य प्रीमियम उत्पादों की वैश्विक मांग लगातार बढ़ रही है।

निर्यात में विविधता लाने के लिए एपीडा क्या कर रहा है?

हालांकि चावल, मसाले और समुद्री उत्पाद आज भी भारत के प्रमुख कृषि निर्यात हैं, लेकिन एपीडा अधिक मूल्य और मूल्य संवर्धित कृषि उत्पादों को बढ़ावा देकर निर्यात बास्केट का विस्तार कर रहा है। ताजी फल-सब्जियां सबसे तेजी से उभरते निर्यात क्षेत्रों में शामिल हैं। इनका निर्यात वर्ष 2021-22 के 152.76 करोड़ डॉलर से 25.78 प्रतिशत बढ़कर 2025-26 में 192.14 करोड़ डॉलर हो गया। इस अवधि में इन उत्पादों के निर्यात गंतव्यों की संख्या भी 127 देशों से बढ़कर 137 हो गई। बागवानी उत्पादों के लिए भी नए बाजार खुल रहे हैं। अनानास का निर्यात 22 देशों से बढ़कर 31 देशों तक पहुंच गया है, जबकि केले का निर्यात 39 देशों की जगह 44 देशों को होने लगा है। इस वर्ष भारत ने वियतनाम को ताजे अंगूर का निर्यात भी शुरू किया है।

एपीडा प्रीमियम और क्षेत्र-विशिष्ट उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देकर किसानों के लिए नए अवसर तैयार कर रहा है। इसमें जम्मू-कश्मीर की अरेको चेरी और सेंट्रोज प्लम, मेघालय की ऑर्गेनिक लाकाडोंग हल्दी, मध्य प्रदेश का सुंदर्जा आम, असम की तेजपुर लीची, सिक्किम की डल्ले मिर्च, लद्दाख की हलमान खुबानी और गुजरात का ड्रैगन फ्रूट सहित अनेक विशिष्ट उत्पाद शामिल हैं।

हमारा एक अन्य फोकस मूल्यवर्धित और उभरते उत्पाद हैं। एपीडा इस दिशा में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फूड टेक्नोलॉजी आंत्रप्रेन्योरशिप एंड मैनेजमेंट, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मिलेट्स रिसर्च जैसे संस्थानों के साथ मिलकर प्रोडक्ट इनोवेशन, प्रसंस्करण तकनीकों में सुधार और निर्यात-योग्य उत्पादों के विकास पर काम कर रहा है।

हाल में गैर-बासमती चावल के दाम 15-20% बढ़े हैं। इसका चावल निर्यात पर क्या असर पड़ सकता है?

विश्व बैंक पिंक शीट के अनुसार, जुलाई 2025 से जून 2026 के बीच थाईलैंड के 5% टूटे चावल की कीमतों में 26%, थाई 25% टूटे चावल में 25.4% तथा थाई ए.1 ग्रेड चावल में 24.8% की वृद्धि हुई है। स्पष्ट है कि कीमतों में तेजी के पीछे वैश्विक बाजार की परिस्थितियां भी हैं। इस वर्ष भारत के चावल निर्यात पर इसका प्रभाव सीमित रहने की संभावना है। 2025-26 में भारत ने 11.54 अरब डॉलर का चावल निर्यात किया। वहीं, 2026-27 के अप्रैल-मई के दौरान 2.03 अरब डॉलर का चावल निर्यात हुआ। संकेत हैं कि यदि निर्यात मात्रा में कुछ कमी आती है, तो प्रति इकाई निर्यात मूल्य में वृद्धि उसकी भरपाई कर सकती है। इससे कुल निर्यात आय पर विशेष प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं है।

छोटे किसानों और एफपीओ को वैश्विक वैल्यू चेन से जोड़ने के लिए एपीडा क्या कर रहा है?

प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण कार्यक्रमों में छोटे किसानों और एफपीओ को प्राथमिकता दी जा रही है। पिछले तीन वर्षों में ऐसे कार्यक्रमों का विस्तार हुआ है और एफपीओ की भागीदारी के साथ 1,500 से अधिक कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। नाबार्ड, नेफेड, ट्राइफेड, एसएफएसी तथा अन्य संस्थाओं के सहयोग से भी एपीडा एफपीओ के लिए विशेष कार्यक्रम चला रहा है। भारत कृषि निर्यात योजना के तहत एफपीओ को अतिरिक्त लाभ भी दिए जा रहे हैं। इसके अंतर्गत एफपीओ को ग्लोबल जीएपी सर्टिफिकेशन दिलाने में सहायता दी गई है, जिससे विकसित देशों के बाजारों में उनके उत्पादों की स्वीकार्यता बढ़ी है।

एपीडा ने एफपीओ के उत्पादों का सीधे तथा थर्ड पार्टी के माध्यम से नए अंतरराष्ट्रीय बाजारों में पहली बार निर्यात भी सुनिश्चित कराया है। पिछले दो वर्षों में 14 राज्यों के एफपीओ से 11 देशों के लिए 15 से अधिक निर्यात खेपों को सुविधा प्रदान की गई। चालू वित्त वर्ष में कम से कम 10 खेप भेजी जा चुकी हैं। इनमें कर्नाटक से मिलेट, झारखंड से आम्रपाली आम, मध्य प्रदेश से सुंदरजा आम, मेघालय से अनानास, अदरक, शहद और लाकाडोंग हल्दी, पंजाब से ताजा लीची तथा उत्तर प्रदेश से हरी मिर्च, भिंडी और लौकी जैसी ताजी सब्जियां शामिल हैं। भारती पहल के तहत चार एफपीओ का चयन कर सभी निर्यात पहलुओं पर 120 घंटे का गहन प्रशिक्षण दिया गया। इस आधार पर एपीडा जल्द ही एफपीओ के लिए एक्सपोर्ट एक्सेलरेशन प्रोग्राम शुरू करेगा।

मूल्य वर्धित खाद्य पदार्थों का निर्यात कैसे बढ़ सकता है?

एपीडा ऐसा मजबूत इकोसिस्टम विकसित करने का प्रयास कर रहा है, जो उत्पादन और प्रसंस्करण से लेकर गुणवत्ता, ब्रांडिंग और वैश्विक बाजार तक पहुंच के पूरे तंत्र को सुदृढ़ बनाए। इसके लिए हम खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय, राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड, एकीकृत बागवानी विकास मिशन, राज्य सरकारों तथा अन्य संबंधित संस्थाओं के साथ मिलकर निर्यात इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने और उद्योग को प्रतिस्पर्धी बनाने पर काम कर रहे हैं।

हमारी प्राथमिकताओं में प्रोसेसिंग इकाइयों, कोल्ड चेन और इरैडिएशन सुविधाओं का विस्तार शामिल है। इससे निर्यातक अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता एवं फाइटोसैनिटरी मानकों का पालन कर सकेंगे और उत्पादों की शेल्फ लाइफ भी बढ़ेगी। हम बेहतर पैकेजिंग, ब्रांडिंग और प्रभावी पोजिशनिंग को बढ़ावा देकर भारतीय उत्पादों को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने में निर्यातकों की सहायता कर रहे हैं। मार्केट इंटेलिजेंस भी हमारी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। एपीडा निर्यातकों को वैश्विक उपभोक्ताओं की बदलती पसंद और मांग से जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराता है, जिससे वे अंतरराष्ट्रीय बाजार की मांग के अनुरूप उत्पाद विकसित कर सकें।

हाल के एफटीए से क्या नए अवसर पैदा हुए और किन उत्पादों को सबसे अधिक लाभ मिलने की संभावना है?

एफटीए ने भारतीय कृषि निर्यात के लिए कई प्रमुख बाजारों में नए अवसर खोले हैं। 15 जुलाई 2026 से लागू भारत-यूके व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौते के तहत भारत को ब्रिटेन के लगभग 95 प्रतिशत कृषि आयात (जिसका मूल्य 85-88 अरब डॉलर है) में शुल्क मुक्त पहुंच मिल गई है। इससे भारतीय निर्यातकों को प्रतिस्पर्धा में यूरोपीय संघ, दक्षिण अफ्रीका और वियतनाम जैसे देशों के बराबर लाभ मिला है। भारत का यूके को कृषि निर्यात 2020 के 80.1 करोड़ डॉलर से बढ़कर 2024 में 112.1 करोड़ डॉलर हो चुका है।

इसी प्रकार, भारत-ओमान एफटीए के तहत 98.08 प्रतिशत टैरिफ लाइन पर 100 प्रतिशत शुल्क-मुक्त पहुंच मिली है। भारत-न्यूजीलैंड एफटीए 100 प्रतिशत टैरिफ लाइन पर शुल्क-मुक्त पहुंच प्रदान करता है। भारत-ईएफटीए व्यापार एवं आर्थिक भागीदारी समझौता, जिसमें स्विट्जरलैंड, नॉर्वे, आइसलैंड और लीचेंस्टीन शामिल हैं, के तहत मेवे, मीठे बिस्किट और ताजे अंगूर जैसी कई श्रेणियों पर आयात शुल्क समाप्त कर दिया गया है। इसका सबसे अधिक लाभ स्विट्जरलैंड और नॉर्वे को होने वाले निर्यात को मिलेगा। ईएफटीए देशों के साथ भारत के कृषि व्यापार में 99 प्रतिशत से अधिक हिस्सा इन्हीं का है।

प्रसंस्कृत एवं मूल्य वर्धित खाद्य उत्पाद जैसे मीठे बिस्किट, बेकरी उत्पाद, चॉकलेट एवं कोको उत्पाद, शुगर कन्फेक्शनरी और सॉस को लगभग सभी एफटीए के तहत बेहतर बाजार पहुंच मिलेगी। ताजे कृषि उत्पादों जैसे अंगूर, प्याज, केला तथा मेवे एवं बीजों पर भी महत्वपूर्ण शुल्क रियायतें मिली हैं। विशेष रूप से स्विट्जरलैंड में मेवों और सब्जियों पर शून्य शुल्क तथा यूरोपीय संघ में खीरा, सूखे प्याज, ताजे अंगूर और फ्रोजन स्वीट कॉर्न जैसे उत्पादों को बेहतर बाजार पहुंच मिलेगी।

इसके अलावा, दार्जिलिंग चाय, विभिन्न प्रकार के बासमती चावल, हल्दी एवं करक्यूमिन, मनुका शहद, जैविक उत्पाद, मोटे अनाज आधारित खाद्य पदार्थ तथा जीआई टैग वाले उच्च मूल्य उत्पादों के लिए भी ब्रिटेन, यूरोपीय संघ, ओमान, यूएई और ऑस्ट्रेलिया जैसे बाजारों में नई संभावनाएं उभर रही हैं। इसी तरह, फ्रोजन मीट, घी/मक्खन और अंडे जैसे उत्पादों को भी ओमान और ईएफटीए समझौतों के तहत महत्वपूर्ण लाभ मिलने की संभावना है।

आयातक देश लगातार खाद्य सुरक्षा और ट्रेसबिलिटी से जुड़े कड़े मानक लागू कर रहे हैं। एपीडा भारतीय निर्यातकों और किसानों को इनके लिए किस प्रकार तैयार कर रहा है?

एपीडा ने एक मजबूत तंत्र विकसित किया है, जो भारतीय निर्यातकों को बदलते अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन करने और वैश्विक बाजारों तक उनकी पहुंच बनाए रखने में मदद करता है। आयातक देशों की आवश्यकताओं, विशेष रूप से मैक्सिमम रेजिड्यू लिमिट के अनुरूप उत्पाद परीक्षण के लिए एपीडा ने 21 राज्यों में एनएबीएल से मान्यता प्राप्त 130 से अधिक प्रयोगशालाओं को स्वीकृति दी है। उत्पाद विशिष्ट प्रयोगशालाओं की यह व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मानकों के अनुपालन में मदद करती है।

ट्रेसबिलिटी को मजबूत बनाने के लिए एपीडा ने अंगूर, मूंगफली, जैविक उत्पादों और सब्जियों जैसी कृषि उपज के लिए एंड-टू-एंड डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित किए हैं, जिनसे खेत से लेकर निर्यात तक प्रत्येक चरण की निगरानी संभव हुई है। इन प्लेटफॉर्मों के तहत किसानों का पंजीकरण और निगरानी राज्य सरकारें करती हैं, जबकि प्रसंस्करण एपीडा से मान्यता प्राप्त पैकहाउस और प्रोसेसिंग इकाइयों में किया जाता है।

एपीडा विभिन्न कृषि उत्पादों और देशों की आवश्यकताओं के अनुरूप निर्यात प्रोटोकॉल तथा स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर भी तैयार करता है, जो सैनिटरी एवं फाइटोसैनिटरी मानकों के अनुरूप होते हैं। इसके अलावा एपीडा कोडेक्स के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय खाद्य मानकों के विकास में भी योगदान देता है।

अनुपालन को मजबूत बनाने के लिए एपीडा ने फूड सेफ्टी मैनेजमेंट सिस्टम के सर्टिफिकेशन निकायों तथा कार्यान्वयन एजेंसियों को मान्यता दी है। इससे निर्यातकों और प्रसंस्करण इकाइयों को खाद्य सुरक्षा प्रबंधन प्रणाली अपनाने तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य प्रमाणपत्र प्राप्त करने में सहायता मिलती है। इसके साथ ही एपीडा जीएपी, आईएसओ 22000, रेनफॉरेस्ट अलायंस और स्मेटा (SMETA) जैसे अंतरराष्ट्रीय प्रमाणपत्र प्राप्त करने में भी सहयोग प्रदान करता है।

अमेरिका ने सेक्शन 301 के तहत भारत सहित कई देशों से आयात पर 10% फोर्स्ड लेबर टैरिफ लगाया है। इसका भारत के कृषि निर्यात पर क्या प्रभाव पड़ सकता है?

अमेरिका पिछले दस वर्षों से भारतीय कृषि उत्पादों का सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य है। 2015-16 में अमेरिका को भारत का कृषि निर्यात 3.27 अरब डॉलर था, जो 2025-26 में 5.03 अरब डॉलर हो गया। पिछले वर्ष भारत के कुल कृषि निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी लगभग 9 प्रतिशत रही। अमेरिका को एपीडा के अधिसूचित उत्पादों का निर्यात भी 2015-16 के 1.15 अरब डॉलर से बढ़कर 2025-26 में 1.49 अरब डॉलर हो गया।

2025 में रेसिप्रोकल टैरिफ की घोषणा के बावजूद जनवरी से जुलाई के बीच एपीडा के अधिसूचित उत्पादों का निर्यात अपेक्षाकृत स्थिर बना रहा। सितंबर 2025 में अतिरिक्त 25 प्रतिशत शुल्क लगाए जाने के बाद अस्थायी गिरावट आई, लेकिन कुछ उत्पादों को छूट मिलने के बाद नवंबर से सुधार होने लगा। फरवरी 2026 के बाद अतिरिक्त शुल्क हटने पर मई 2026 तक निर्यात में उल्लेखनीय तेजी देखने को मिली।

हाल ही अमेरिका ने सेक्शन 301 के तहत भारत पर जो 10 प्रतिशत टैरिफ लगाया गया है, वह शुरुआती प्रस्तावित टैरिफ 12.5 प्रतिशत से कम है। यह भारत सरकार और अमेरिकी अधिकारियों के बीच सकारात्मक संवाद तथा दोनों देशों के मजबूत द्विपक्षीय संबंधों का परिणाम है। यह शुल्क अमेरिका में भारतीय उत्पादों की लागत कुछ हद तक बढ़ा सकता है। हालांकि, भारत के कृषि निर्यात की मजबूत बुनियाद को देखते हुए इसका समग्र प्रभाव सीमित रहने की संभावना है। अलग-अलग कृषि उत्पादों पर इसका असर उनकी अमेरिकी बाजार पर निर्भरता, प्रतिस्पर्धी देशों की उपलब्धता और मांग के आधार पर अलग हो सकता है। भारत के कई उच्च मूल्य वाले उत्पादों ने पहले से ही अमेरिकी बाजार में मजबूत पहचान बना रखी है। वहां रहने वाला बड़ा भारतीय प्रवासी समुदाय भी इन उत्पादों की मांग बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इससे अतिरिक्त टैरिफ के प्रभाव को काफी हद तक संतुलित करने में मदद मिलेगी। साथ ही, भारतीय निर्यातकों ने बाजार में विविधता, वैल्यू एडिशन और प्रतिस्पर्धी क्षमता मजबूत करके बदलती वैश्विक व्यापार परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढालने की क्षमता भी दिखाई है।