उत्तर प्रदेश सरकार ने पांच वर्षों (पेराई सत्र 2021-22 से 2025-26) की अवधि के लिए खांडसारी लाइसेंसिंग नीति घोषित की थी। सरकार का कहना है कि यह नीति राज्य में खांडसारी उद्योग को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से लाई गई है। लेकिन अहम बात यह है कि पिछले वर्ष इस नीति में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए। इन बदलावों से खांडसारी उद्योग पर नियमन का शिकंजा कस गया है और राज्य के अधिकांश हिस्सों में नई खांडसारी इकाइयों की स्थापना की राह काफी मुश्किल हो गई है।
21 जनवरी, 2025 को जारी शासनादेश के जरिए खांडसारी नीति में किए गए बदलाव नई इकाइयों को प्रोत्साहित करने के बजाय उनकी स्थापना को और कठिन बनाते हैं। नीति में सबसे अहम संशोधन चीनी मिलों और खांडसारी इकाइयों के बीच दूरी को लेकर किया गया है। पावर क्रशर और खांडसारी इकाइयों के नए लाइसेंस के लिए चीनी मिल से त्रिज्यात्मक दूरी को 7.5 किलोमीटर से बढ़ाकर 15 किलोमीटर कर दिया गया है। यानी अब पहले से स्थापित चीनी मिल से 15 किलोमीटर से कम दायरे में किसी पावर क्रशर या नई खांडसारी इकाई को लाइसेंस नहीं मिलेगा।
दिलचस्प है कि केंद्र सरकार की नीति के अनुसार दो चीनी मिलों के बीच भी न्यूनतम 15 किलोमीटर की दूरी होनी चाहिए। इस तरह दूरी के मामले में उत्तर प्रदेश सरकार ने खांडसारी इकाइयों को चीनी मिलों के बराबर खड़ा कर दिया है।
करीब एक दशक पहले जब उत्तर प्रदेश सरकार ने चीनी के लिए प्रोत्साहन नीति लागू की थी, तब 15 किलोमीटर की दूरी को लेकर कई चीनी उद्योग समूहों के बीच मुकदमों की स्थिति आ गई थी और राज्य में जहां गन्ने की उपलब्धता थी वह अधिकांश इलाके चीनी मिलों से कवर हो गये थे। ऐसे में अब खांडसारी इकाइयों के लिए चीनी मिलों के बराबर दूरी के प्रावधान से नए गन्ना क्षेत्र मिलना मुश्किल हो जाएगा।
साथ ही, खांडसारी इकाइयों को लाइसेंस देने के लिए पिछले तीन वर्षों में गन्ने की उपलब्धता को भी आधार बनाया गया है, जबकि 21 जनवरी, 2025 से पहले की नीति में ऐसा कोई प्रावधान नहीं था।
कई नए प्रावधानों के जरिए खांडसारी इकाइयों और पावर क्रशर पर नियम-कायदों का बोझ बढ़ा दिया गया है। पहले नीति में यह कहा गया था कि 33×46 सेंटीमीटर तक के आकार वाले पावर क्रशर के लाइसेंस के लिए क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से अनापत्ति प्रमाण-पत्र सहित आवश्यक दस्तावेजों के साथ विभाग की वेबसाइट पर ऑनलाइन आवेदन करने के 50 घंटे के भीतर सहायक चीनी आयुक्त तथा इतनी ही अवधि में चीनी आयुक्त के स्तर पर निर्णय लिया जाएगा।
वहीं 33×46 सेंटीमीटर से अधिक आकार वाले पावर क्रशर के मामलों में पिछले तीन पेराई सत्रों में गन्ने की उपलब्धता को आधार बनाने का प्रावधान था। लेकिन अब यह शर्त 33×46 सेंटीमीटर तक और उससे अधिक क्षमता वाले सभी पावर क्रशरों पर लागू कर दी गई है। इसके साथ ही दोनों ही स्थितियों में चीनी मिल से 15 किलोमीटर की परिधि में पहले से स्थापित खांडसारी इकाइयों की मौजूदगी को भी नए लाइसेंस के लिए आधार बनाया गया है।
एक अन्य शर्त के तहत लाइसेंस प्राप्त खांडसारी और पावर क्रशर इकाइयों के लिए अनिवार्य कर दिया गया है कि वे किसानों को गन्ना मूल्य का नकद नहीं बल्कि ऑनलाइन भुगतान करेंगी। इसके अलावा आवेदन के समय क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनापत्ति प्रमाण पत्र के साथ-साथ आबकारी आयुक्त द्वारा जारी पंजीयन प्रमाण-पत्र भी आवश्यक दस्तावेजों के रूप में अपलोड करना होगा। यह शर्त भी 21 जनवरी, 2025 से पहले लागू नहीं थी।
जहां तक लाइसेंस आवेदन पर निर्णय की समय-सीमा का सवाल है, पहले की 50 घंटे की व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया है। नए आदेश में कहा गया है कि ऑनलाइन प्राप्त आवेदनों पर निर्णय चीनी आयुक्त, उत्तर प्रदेश के स्तर पर लिया जाएगा। यानी अब कोई समय-सीमा नहीं है।
वैसे तो इस खांडसारी नीति की अवधि केवल चालू पेराई सत्र (अक्तूबर 2025 से सितंबर 2026) तक के लिए है, लेकिन अंतिम वर्ष में किए गए बदलाव काफी अहम हैं। करीब एक वर्ष पहले किए गए इन बदलावों का असर चालू सत्र से दिखने लगेगा। क्योंकि नया पेराई सत्र अक्तूबर 2025 से शुरू हुआ है और यदि कोई नई इकाई स्थापित होती है तो उसका यह पहला पेराई सत्र होगा।
उद्योग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि इस वर्ष बड़ी संख्या में खांडसारी और पावर क्रशर आधारित गुड़ इकाइयां बंद हुई हैं। पिछले वर्ष गन्ने की कम उपलब्धता के कारण राज्य में चीनी उत्पादन घटा था और चालू सत्र में भी कमजोर फसल के चलते गुड़ और खांडसारी इकाइयां राज्य सरकार द्वारा तय 400 रुपये प्रति क्विंटल के राज्य परामर्श मूल्य (SAP) के बराबर या उससे अधिक दाम पर गन्ना खरीद रही हैं। इससे गन्ना मूल्य को लेकर प्रतिस्पर्धा और प्राइस वार जैसी स्थिति बन रही है।
इसी बीच, केंद्र सरकार ने भी कुछ माह पहले शुगर कंट्रोल ऑर्डर में संशोधन कर गुड़, खांडसारी, शक्कर और बूरा को चीनी की परिभाषा में शामिल कर लिया है। साथ ही 500 टन प्रतिदिन क्रशिंग क्षमता वाली इकाइयों पर चीनी मिलों की तरह फेयर एंड रिम्यूनरेटिव प्राइस (एफआरपी) के भुगतान समेत कई अन्य शर्तें भी लागू कर दी गई हैं।
ऐसे प्रावधान पावर क्रशर और खांडसारी इकाइयों पर नियमन का बोझ बढ़ाएंगे और इन उद्योगों को हतोत्साहित कर सकते हैं। इससे इन इकाइयों के लिए चीनी मिलों के सामने प्रतिस्पर्धा में टिकना मुश्किला हो जाएगा। इससे गन्ना किसानों के लिए बेहतर दाम पाने का विकल्प कमजोर पड़ सकता हैं।
आश्चर्यजनक है कि करीब एक वर्ष पहले उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा खांडसारी इकाइयों की लाइसेंस नीति में किए गए ये अहम बदलाव लगभग अनदेखे रह गए और इस पर सार्वजनिक चर्चा भी बहुत कम हुई है। जबकि यह उत्तर प्रदेश के एक अहम उद्योग और गन्ना किसानों के हितों से जुड़ा मुद्दा है।