नगालैंड यूनिवर्सिटी और फजल अली कॉलेज के शोधकर्ताओं ने राज्य की सबसे समस्याग्रस्त आक्रामक खरपतवारों में से एक को स्वास्थ्य सेवाओं और सस्टेनेबल मैन्युफैक्चरिंग के लिए एक शक्तिशाली साधन में बदल दिया है। इस इनोवेशन से दवा उद्योग, चिकित्सा और हरित उद्योगों में बड़े पैमाने पर उपयोग की संभावनाएं खुली हैं।
शोध दल ने एक पर्यावरण-अनुकूल विधि विकसित की है, जिसके जरिए मिकानिया मिक्रांथा (Mikania micrantha) नामक खरपतवार को सिल्वर नैनोपार्टिकल्स में परिवर्तित किया जाता है। ये नैनोकण दवा उत्पादन को तेज करने, हानिकारक बैक्टीरिया से लड़ने और कैंसर-रोधी प्रभाव दिखाने में सक्षम हैं। खास बात यह है कि इस प्रक्रिया में पारंपरिक नैनोमैटेरियल निर्माण में इस्तेमाल होने वाले विषैले रसायनों का उपयोग नहीं किया जाता।
शोधकर्ताओं ने “ग्रीन केमिस्ट्री” दृष्टिकोण अपनाया, जो खतरनाक औद्योगिक प्रक्रियाओं की जगह पौधों पर आधारित विज्ञान का उपयोग करता है। पत्तियों के अर्क से तैयार किए गए ये अत्यधिक स्थिर सिल्वर नैनोपार्टिकल अल्ट्रा-फास्ट उत्प्रेरक (कैटेलिस्ट) की तरह काम करते हैं और 30 से 180 सेकंड में ‘इमिडाजोल्स’ नामक आवश्यक दवा घटकों का निर्माण कर सकते हैं। ये यौगिक विभिन्न चिकित्सा क्षेत्रों में उपयोग होने वाली कई दवाओं का आधार हैं।
इस शोध को अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (ANRF) और नेशनल फेलोशिप फॉर शेड्यूल्ड ट्राइब स्टूडेंट्स का समर्थन प्राप्त हुआ। इसके निष्कर्ष बायोकेमिलकल एंड बायोफिजिकल रिसर्च कम्युनिकेशंस में प्रकाशित किए गए। इस शोध पत्र के सह-लेखकों में मंथाए सी. फोम, फितोविली सुमी, बेटोकली के. झिमोमी, खोंजानी यंथन, टोंगे डब्ल्यू.डब्ल्यू., शोकिप तुमटिन और तोविशे फुचो शामिल हैं।
पर्यावरणीय चुनौती का समाधान
मिकानिया मिक्रांथा लंबे समय से नगालैंड में समस्याओं का कारण रही है। यह शोध इस आक्रामक खरपतवार को उन्नत चिकित्सा और औद्योगिक उपयोगों के लिए उच्च मूल्य वाले कच्चे माल में बदलने का मार्ग दिखाता है। पूर्वी हिमालय का हिस्सा होने के कारण नगालैंड की अनूठी जैव-विविधता का उपयोग करते हुए यह अध्ययन दर्शाता है कि स्थानीय पौधों की प्रजातियां वैश्विक स्तर पर उपयोगी वैज्ञानिक नवाचार प्रदान कर सकती हैं। इस क्षेत्र के पौधों के विशेष रासायनिक गुणों ने नैनोपार्टिकल की दक्षता और स्थिरता बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया, जो इस तरह की पहली उपलब्धि है।
नगालैंड यूनिवर्सिटी के कुलपति जगदीश के. पटनायक ने कहा, “यह अभिनव अध्ययन दवा संश्लेषण के लिए एक तेज और पर्यावरण-अनुकूल तरीका प्रस्तुत करता है, साथ ही इसमें मजबूत जीवाणुरोधी और कैंसर-रोधी क्षमता भी दिखाई देती है। इस तरह का शोध वैश्विक स्वास्थ्य चुनौतियों के समाधान में विश्वविद्यालय की वैज्ञानिक उत्कृष्टता और टिकाऊ दृष्टिकोण की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।”
इस अध्ययन का सबसे त्वरित प्रभाव औषधि निर्माण के क्षेत्र में देखने को मिलता है। ये नैनोपार्टिकल पुन: उपयोग किए जा सकने वाले उत्प्रेरक (कैटेलिटिक) इंजन की तरह काम करते हैं, जिससे दवाओं के प्रमुख घटकों का उत्पादन अधिक तेज, स्वच्छ और कम लागत में संभव होता है। महंगे और विषैले रसायनों पर निर्भर पारंपरिक तरीकों के विपरीत यह विधि उद्योग के लिए एक स्केलेबल और टिकाऊ विकल्प प्रदान करती है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि इन नैनोपार्टिकल का कम से कम छह बार उपयोग किया जा सकता है, और इस दौरान उनकी दक्षता में ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है। इससे उत्पादन लागत और रासायनिक अपशिष्ट दोनों में उल्लेखनीय कमी आती है, जो बड़े पैमाने पर दवा निर्माण के लिए बेहद लाभकारी है।
उत्पादन के अलावा, इन नैनोकणों ने खतरनाक रोगजनकों, जैसे स्टेफाइलोकॉकस ऑरियस (Staphylococcus aureus, अस्पताल संक्रमण का प्रमुख कारण) और यर्सिनिया पेस्टिस (Yersinia pestis) के खिलाफ मजबूत जीवाणुरोधी प्रभाव दिखाया। इससे एंटीमाइक्रोबियल कोटिंग, घाव के उपचार वाले उत्पादों और संक्रमण नियंत्रण प्रणालियों में इनके उपयोग की संभावनाएँ खुलती हैं। साथ ही, मानव कोलन कैंसर कोशिकाओं पर किए गए प्रयोगशाला परीक्षणों में पाया गया कि ये नैनोपार्टिकल कैंसर कोशिकाओं की जीवित रहने की क्षमता को काफी कम कर देते हैं।