यूरोप और कनाडा में विस्तार की तैयारी में खेतीबडी, एआई आधारित कृषि डेटा सॉल्यूशन पर जोर

खेतीबडी (KhetiBuddy) के संस्थापक विनय नायर ने बताया कि कंपनी कृषि डेटा को डिजिटाइज कर उत्पादकता बढ़ाने और ट्रेसेबिलिटी सुधारने पर काम कर रही है। अब कंपनी यूरोप और कनाडा में विस्तार की तैयारी कर रही है। एआई आधारित प्लेटफॉर्म ‘Verdnt’ के जरिए खेती से जुड़े डेटा समाधान को वैश्विक स्तर पर ले जाने का लक्ष्य है।

यूरोप और कनाडा में विस्तार की तैयारी में खेतीबडी, एआई आधारित कृषि डेटा सॉल्यूशन पर जोर

पुणे स्थित एग्रीटेक कंपनी खेतीबडी (KhetiBuddy) के संस्थापक विनय नायर का कहना है कि कृषि क्षेत्र में तकनीकी सॉल्यूशन उपलब्ध कराने वाली ज्यादातर कंपनियों के पास खेती का अनुभव नहीं होता है, और जिन्हें खेती का अनुभव है, उन्हें टेक्नोलॉजी के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं होती। इसी अंतर को दूर करने के लिए उन्होंने 2021 में खेतीबडी एग्रीटेक प्राइवेट लिमिटेड की शुरुआत की। रूरल वॉयस के साथ बातचीत में उन्होंने बताया कि खेतीबडी कृषि से जुड़े आंकड़ों को बड़े पैमाने पर डिजिटाइज कर रही है। इससे उत्पादकता बढ़ाने और लागत कम करने में मदद मिली है। डेटा से ट्रेसेबिलिटी समस्या का समाधान भी संभव है। हालांकि डेटा एडॉप्शन की समस्या इसमें सबसे बड़ी अड़चन है। इसे दूर करने के लिए खेतीबडी किसानों को प्रशिक्षण दे रही है। सही और नियमित डेटा एंट्री करने वाले किसानों को इन्सेंटिव के तौर पर प्रीमियम भुगतान किया जाता है।

नायर ने बताया कि उन्होंने 2019 में ही इस दिशा में काम करना शुरू कर दिया था, लेकिन औपचारिक तौर पर कंपनी की स्थापना 2021 में की। अभी कंपनी करीब 35 मझोले-बड़े ग्राहकों को सेवाएं दे रही है। फिलहाल नायर यूरोप और कनाडा में अपने बिजनेस को विस्तार देने की कोशिश कर रहे हैं।

खेतीबडी का दूसरे देशों में विस्तार करने के लिए नायर ने वर्डेन्ट (Verdnt) प्लेटफॉर्म लांच किया है। इसमें टेक्नोलॉजी भी काफी अपग्रेड की गई है। पुरानी टेक्नोलॉजी सैस (SaaS) पर आधारित थी, जबकि वर्डेन्ट में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का इस्तेमाल किया गया है। पुरानी टेक्नोलॉजी में डेटा एंट्री के बाद उसकी प्रोसेसिंग होती थी, वर्क फ्लो बनता था और उसके बाद रिपोर्ट बनती थी। वर्डेन्ट एआई आधारित है। एआई का डेवलपमेंट खेतीबडी अपने स्तर पर ही करती है। इसके लिए उसके पास अलग टीम है।

विनय नायर, संस्थापक, खेतीबडी।

दो लाख एकड़ जमीन की जानकारी को डिजिटाइज किया

खेतीबडी के क्लायंट की संख्या अभी करीब 35 है, लेकिन इसने लगभग दो लाख एकड़ भूमि को डिजिटाइज किया है। नायर ने बताया- मान लीजिए हम एक वाइनरी के साथ काम करते हैं, तो उससे जुड़े जितने अंगूर किसान होंगे, उनको हम डिजिटाइज करते हैं। अगर हम दवा कंपनी के साथ काम करते हैं तो उनके जितने मेडिसिनल प्लांटेशन हैं, उनको डिजिटाइज करते हैं। इस तरह हमारे कस्टमर तो 30 से 35 ही होंगे, लेकिन हर कस्टमर की एकरेज काफी अधिक होती है।

नायर ने बताया कि उनकी कंपनी कई स्रोतों से डेटा जुटाती है। इसमें प्रमुख है मोबाइल ऐप। इसके अलावा जगह-जगह लगाए गए सेंसर और सैटेलाइट इमेजरी से भी डेटा जुटाया जाता है। मौसम से संबंधित आंकड़े भी होते हैं।

नायर का कहना है कि फार्म डेटा का उद्देश्य अलग-अलग हो सकता है। एग्री-इनपुट कंपनी को फार्म डेटा चाहिए ताकि वह खाद बेच सके। फूड एंड बेवरेज कंपनी को डेटा चाहिए ताकि उनके समय पर जानकारी उपलब्ध हो सके। सरकार को भी नीति बनाने में इन आंकड़ों की जरूरत पड़ती है।

उन्होंने बताया कि बहुत से एग्री बिजनेस के मोबाइल एप के बैकग्राउंड में खेतीबडी चलता है, लेकिन सामने नहीं दिखता। नायर के मुताबिक इसका कारण है कि ज्यादातर कंपनियां नहीं चाहतीं कि उनके प्रतिस्पर्धी को पता चले कि वे खेतीबड़ी का इस्तेमाल कर रहे हैं। 

सरकार के ‘भारत विस्तार’ प्रोजेक्ट के बारे में नायर ने कहा कि जैसे-जैसे भारत विस्तार पहल में अधिक से अधिक डेटा मिलेगा, उसका उतना लाभ मिलेगा। उन्होंने कहा, ऐसा नहीं कि डेटा नहीं है, लेकिन वह अलग-अलग है। जितना अधिक डेटा उबलब्ध होगा, सॉल्यूशन उतने बेहतर बनेंगे। 

डेटा से ट्रेसेबिलिटी समस्या का समाधान

कृषि निर्यात में ट्रेसेबिलिटी और कंप्लायंस की समस्या का क्या समाधान है, यह पूछने पर नायर ने कहा कि हम बुवाई से लेकर हार्वेस्टिंग तक सब कुछ डिजिटाइज करते हैं। हार्वेस्टिंग से लेकर रिटेलर तक पूरी चेन को डिजिटाइज करके ट्रेसबिलिटी का समाधान हो सकता है। इसके लिए हम बारकोड सॉल्यूशन देते हैं। यह बताता है कि किस किसान से उपज आई है, उसकी क्वालिटी क्या है, उसने कौन सा उर्वरक इस्तेमाल किया है। इस तरह हम हर कस्टमर की कंप्लायंस की जरूरत पूरी कर सकते हैं क्योंकि बुनियादी फार्म डेटा हमारे पास होता है। 

डेटा एडॉप्शन की समस्या

डेटा को लेकर क्या समस्या आ रही है, यह पूछने पर नायर ने बताया कि सबसे ज्यादा समस्या डेटा अपनाने को लेकर है। नायर के अनुसार टेक्नोलॉजी इतनी बड़ी समस्या नहीं जितनी टेक्नोलॉजी एडॉप्शन की है। ज्यादातर एग्री बिजनेस किसान से डेटा एंट्री करवाने को लेकर आश्वस्त नहीं होते। उनके अपने एक्सटेंशन ऑफिसर होते हैं जो 500-600 किसानों के डेटा की एंट्री करते हैं। हालांकि किसानों के स्तर पर डेटा एंट्री में भी सुधार हो रहा है, लेकिन अभी पूरी तरह उन पर नहीं छोड़ सकते। इसके लिए हम किसानों को नियमित प्रशिक्षण भी देते हैं। हम हर क्षेत्र में टेक्नोलॉजी को समझने वाले ‘चैंपियन किसान’ भी चुनते हैं। उन्हें गांव के दूसरे किसानों को प्रशिक्षित करने की जिम्मेदारी दी जाती है।

उन्होंने बताया, आम तौर पर हर किसान के पास कम से कम चार-पांच मोबाइल ऐप होते हैं। लेकिन सबसे सफल ऐप भी देखेंगे तो एक्टिव किसान 15 से 20% ही होंगे। उनमें भी रोजाना एक्टिव रहने वाले तो 10% भी नहीं होते। हमने भी शुरू में देखा कि किसान सिर्फ मौसम की जानकारी लेता या फिर मंडी भाव देखता है। वह ऐप की सारी चीजें नहीं देखता। हमने इसका समाधान निकाला और किसानों से कहा कि अगर आप नियमित रूप से डेटा एंट्री करेंगे तो आपको इंसेंटिव मिलेगा। उन्हें उनकी उपज का प्रीमियम दाम दिया जाता है। इससे किसान भी सीखने के लिए आकर्षित होते हैं। 

बिजनेस विस्तार का लक्ष्य

भारत में खेतीबडी के ज्यादातर कस्टमर महाराष्ट्र समेत दक्षिणी राज्यों में हैं। कुछ गुजरात और उत्तर प्रदेश में भी हैं। खेतीबडी अभी तक बूटस्ट्रैप कंपनी है, अर्थात इसने बाहर से निवेश नहीं लिया है। नायर ने बताया कि दूसरे देशों में विस्तार में निवेश की जरूरत पड़ेगी। लेकिन हमें सिर्फ पूंजी नहीं चाहिए, हमें ऐसे लोग चाहिए जो हमारे प्लेटफॉर्म का विस्तार करने में मदद कर सकें। नायर का कहना है कि वेंचर कैपिटल निवेशकों को एग्रीटेक सेक्टर बहुत लुभावना नहीं लगता है, क्योंकि उनको बहुत जल्द रिटर्न चाहिए। हमारा कंज्यूमर बिजनेस नहीं है। इसमें मुनाफा कमाने में समय लगता है। 

आगे की रणनीति के बारे में नायर ने बताया कि अभी हर कैटेगरी में दो से तीन ग्राहक हैं। फिलहाल लक्ष्य इसको विस्तार देने का है। इसके अलावा हम दूसरे देशों में भी विस्तार कर रहे हैं। हमने कनाडा, अमेरिका और फ्रांस में काम शुरू किया है।

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