56,500 करोड़ रुपये का सवालः ट्रैक्टर के ईंधन पर लग्जरी कार ईंधन की तरह टैक्स क्यों?
भारत के किसान संगठनों ने कृषि ट्रैक्टरों में इस्तेमाल होने वाले डीजल पर कर समाप्त करने की मांग तेज कर दी है। उनका कहना है कि किसान हर साल लगभग 56,500 करोड़ रुपये का डीजल कर चुकाते हैं, जबकि दुनिया के कई देशों में कृषि डीजल कर-मुक्त या रियायती है। बढ़ता ईंधन बोझ कृषि संकट को गहरा रहा है।
भारत के एक करोड़ ट्रैक्टर मालिक किसान परिवार हर साल डीजल पर लगभग 56,500 करोड़ रुपये का कर चुकाते हैं। इसमें रोड सेस भी शामिल है, जबकि ट्रैक्टरों को राजमार्गों पर चलाने से प्रतिबंधित किया गया है। दुनिया के 9 प्रमुख कृषि राष्ट्रों में कृषि में इस्तेमाल होने वाला डीजल कर-मुक्त है या उस पर छूट है; भारत में नहीं। किसानों की मांग स्पष्ट है: कृषि ट्रैक्टरों में उपयोग होने वाले डीजल पर सभी कर समाप्त किए जाएं।
ट्रैक्टर लक्जरी वाहन नहीं
भारत की डीजल कराधान व्यवस्था में एक बुनियादी दोष है- ट्रैक्टरों को उसी वित्तीय ढांचे में रखा गया जो लग्जरी कारों और एसयूवी के लिए बनाया गया था। ट्रैक्टर व्यक्तिगत विलासिता का साधन नहीं, बल्कि उत्पादन का उपकरण है जो मिट्टी जोतता है, फसल बोता है, 140 करोड़ लोगों के लिए अनाज उगाता है। लक्जरी कारें उपभोग और विलासिता की वस्तुएं हैं जबकि ट्रैक्टर राष्ट्रीय आय में योगदान देता है — दोनों को एक ही राजकोषीय लेंस से देखना आर्थिक रूप से असंगत है।
एटीएफ बनाम डीजल
सरकार विमानन ईंधन (एटीएफ) और कृषि डीजल के प्रति पूरी तरह भिन्न दृष्टिकोण रखती है। उत्तर प्रदेश एटीएफ पर केवल 1% वैट लेता है, बिहार ने इसे 29% से 4% किया। केंद्रीय मंत्री एटीएफ पर वैट घटाने के लिए राज्यों को पत्र लिखते हैं। दूसरी ओर, महाराष्ट्र डीजल पर 21%, गुजरात 14.90% और गोवा 18.09% वैट लगाता है लेकिन किसी भी मंत्री ने इसे घटाने के लिए पत्र नहीं लिखा। यह उपेक्षा नहीं, जानबूझकर किया गया निरंतर वर्ग पूर्वाग्रह है।
डीजल के खुदरा मूल्य का 50-55% हिस्सा करों का होता है। डीजल पर केंद्र सरकार के कर और उपकर लगभग 64 रुपये प्रति लीटर हैं, जिसमें शामिल हैं:
- सड़क एवं अवसंरचना उपकर (आरआईसी): 36 रुपये प्रति लीटर।
- विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क (एसएईडी): 24 रुपये प्रति लीटर।
- राज्यों का वैटः महाराष्ट्र में 21%, गुजरात में 14.9% और गोवा में 18.09%।
इसका परिणाम यह हुआ कि किसान कृषि उपयोग के डीजल पर प्रति वर्ष अनुमानित 56,500 करोड़ रुपये का कर अदा करते हैं, जिसमें वह सड़क उपकर भी शामिल है जिसका उन्हें कोई लाभ नहीं मिलता। ऐसे समय जब ट्रैक्टरों की बिक्री वार्षिक 10 लाख यूनिट को पार कर चुकी है और कृषि मशीनीकरण भारत की डीजल-चालित मशीनरी पर निर्भरता को गहरा रहा है, यह कर बोझ अस्तित्व का संकट बनता जा रहा है।
56,500 करोड़ रुपये का अंकगणित
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घटक |
आंकड़ा |
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कुल डीजल खपत (2025-26) |
~94 लाख मीट्रिक टन (110 अरब लीटर) |
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ट्रैक्टरों का हिस्सा |
~7.4% (7.86 अरब लीटर) |
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केंद्रीय कर राजस्व |
~₹47,000 करोड़ |
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राज्य कर राजस्व |
~₹9,500 करोड़ |
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कुल वार्षिक कर बोझ |
₹56,500 करोड़ |
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प्रति ट्रैक्टर वार्षिक बोझ |
~₹56,500 (परिवार की आय का 15-20%) |
डीजल कर और ट्रैक्टर ऋण
एक करोड़ से अधिक ट्रैक्टर मालिक किसानों ने अपने ट्रैक्टर बैंक या वित्त कंपनियों से ऋण लेकर खरीदे हैं। राष्ट्रीयकृत बैंक 9.50-11.50%, निजी बैंक 10-28% ब्याज लेते हैं जबकि कुछ वित्त कंपनियां 30.50% तक ब्याज लेती हैं। ट्रैक्टर ऋण ऋण माफी से बाहर रखे जाते हैं। पंजाब में 82%, महाराष्ट्र में 78%, उत्तर प्रदेश में 71% और तेलंगाना में 69% ट्रैक्टर मालिक किसान कर्जदार हैं।
जीएसटी कटौती का स्वागत, लेकिन अपर्याप्त
सितंबर 2025 में 56वीं जीएसटी परिषद ने ट्रैक्टर पर जीएसटी 12% से घटाकर 5% किया, ट्रैक्टर टायर, ट्यूब और स्पेयर पार्ट्स पर भी जीएसटी 18% से 5% किया गया। इससे वित्त वर्ष 2025-26 में ट्रैक्टर बिक्री 10.50 लाख यूनिट के रिकॉर्ड पर पहुंची। किंतु ट्रैक्टर खरीदना एक बार की घटना है; डीजल जलाना दैनिक। 15-20 साल के जीवनकाल में संचयी डीजल कर बोझ, जीएसटी बचत से कई गुना अधिक है।
दुनिया में कृषि डीजल पर कर की स्थिति
- जर्मनी: 1 जनवरी 2026 से 21.48 यूरो सेंट/लीटर की कृषि डीजल छूट — लगभग 4,000 करोड़ रुपये की वार्षिक राहत।
- फ्रांस: अप्रैल 2026 में कृषि डीजल पर सभी उत्पाद शुल्क एक माह के लिए निलंबित।
- यूनाइटेड किंगडम: 'रेड डीजल' पर 80% कर छूट (10.18 पेंस बनाम 52.95 पेंस प्रति लीटर)।
- आयरलैंड: 100 मिलियन यूरो का विशेष कोष — 20 सेंट/लीटर सब्सिडी (मार्च-जुलाई 2026)।
- ऑस्ट्रेलिया: ईंधन कर क्रेडिट (FTC) — कृषि में उपयोग डीजल पर उत्पाद शुल्क पूर्णतः वापस।
- कनाडा (सस्केचेवान): किसानों को 80% कर रियायत।
- दक्षिण अफ्रीका: 1 अप्रैल 2026 से कृषि और वानिकी के लिए 100% डीजल छूट।
- अमेरिका-कनाडा: ऑफ-रोड उपयोग के लिए रंगीन डीजल पर कम दरें।
- सर्बिया: पंजीकृत किसानों को निर्धारित मूल्य पर डीजल।
कर सुधार का अर्थशास्त्र
मार्च 2026 में उत्पाद शुल्क कटौती से वित्त वर्ष 2027 में लगभग एक लाख करोड़ रुपये के राजस्व नुकसान का अनुमान है। इसी दबाव में अप्रैल 2026 में विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क (SAED) और सड़क एवं इन्फ्रास्ट्रक्चर सेस (RIC) फिर बढ़ाए गए। सवाल है कि क्या इस घाटे को किसानों की कीमत पर पाटना उचित है? एक समाधान मौजूद है: केंद्र सरकार कृषि डीजल पर वैट कटौती के लिए राज्यों को जीएसटी राजस्व-घाटे जैसा मुआवजा दे सकती है।
किसानों की तीन मांगें
पहली मांग: ट्रैक्टर डीजल पर शून्य कर हो। यूरोप, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया की तरह 'रेड डीजल' या टैक्स क्रेडिट प्रणाली लागू कर किसानों को उत्पाद शुल्क वापस दिया जाए।
दूसरी मांग: ट्रैक्टरों को लग्जरी कारों के बराबर वर्गीकृत करने की प्रथा समाप्त करें। संसद ट्रैक्टरों को 'कृषि उपकरण' की स्वतंत्र कानूनी श्रेणी दे।
तीसरी मांग: कृषि डीजल को सड़क एवं इन्फ्रास्ट्रक्चर सेस से छूट दें। एग्रीकल्चर इन्फ्रा डेवलपमेंट सेस का पारदर्शी उपयोग सुनिश्चित करें। केंद्र सरकार राज्यों को कृषि डीजल पर वैट 1-4% करने के लिए पत्र लिखे।
श्रमजीवी किसान और भारत का प्रथम नागरिक
पंजाब के गेहूँ किसान से लेकर महाराष्ट्र के गन्ना-कपास उत्पादक तक, प्रत्येक किसान के लिए ट्रैक्टर खेत का एक हिस्सा है। छोटे किसान के लिए ईंधन व्यय उत्पादन लागत का 12-18% है। कर माफी से प्रति परिवार सालाना 4,000-5,000 रुपये की बचत होगी।
भारत की GDP में कृषि 18% योगदान करती है। एफएओ के अनुसार, 70 करोड़ भारतीय पौष्टिक आहार वहन नहीं कर सकते। प्रति ट्रैक्टर वार्षिक कर बोझ 56,000 रुपये से अधिक है। सरकार एयरलाइनों के लिए 'जनहित' में बजट आवंटित करती है — तो क्या खाद्य उत्पादन जनहित नहीं?
(लेखक अखिल भारतीय किसान सभा के अध्यक्ष हैं, लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं)

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