नई सरकार के गठन के बाद पश्चिम बंगाल में लौट रही है शांति, लेकिन जगह-जगह तनाव बरकरार, सरकारी ‘भत्ता’ न मिलने से लोग परेशान भी

पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में नई भाजपा सरकार के गठन के बाद राजनीतिक हिंसा में कमी आई है, लेकिन कई इलाकों में तनाव और डर का माहौल बना हुआ है। तृणमूल कांग्रेस के कार्यालय बंद पड़े हैं और कार्यकर्ता गायब हैं। दूसरी ओर, विधवा पेंशन और लक्ष्मी भंडार जैसी सरकारी सहायता राशि नहीं मिलने से महिलाएं चिंतित हैं। लोग उद्योग और रोजगार की उम्मीद भी जता रहे हैं।

नई सरकार के गठन के बाद पश्चिम बंगाल में लौट रही है शांति, लेकिन जगह-जगह तनाव बरकरार, सरकारी ‘भत्ता’ न मिलने से लोग परेशान भी
कोलकाता। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद राजनीतिक हिंसा का जो दौर शुरू हुआ था, शनिवार को नई सरकार के गठन के बाद वह थमता नजर आ रहा है। हालांकि कुछ अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में तनाव बरकरार है। लोग चुप, लेकिन सहमे हुए हैं। देर रात तक गुलजार रहने वाले इलाके शाम होते ही सुनसान होने लगे हैं। प्रदेश में राजनीति की सबसे छोटी इकाई माने जाने वाले मोहल्ले के जिन क्लबों पर चंद रोज पहले तक तृणमूल कांग्रेस का झंडा लहराता था, उनमें ज्यादातर बंद हैं। यही हाल तृणमूल कांग्रेस के दफ्तरों का भी है, जिनमें अनेक जगहों पर तोड़फोड़ की घटनाएं हुई हैं। प्रदेश में हुए राजनीतिक बदलाव से अनेक लोग खुश हैं। उन्हें लगता है कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद प्रदेश में उद्योग आएंगे। लेकिन ‘विधवा पेंशन’ और ‘लक्ष्मी भंडार’ पाने वाली महिलाएं चिंतित भी हैं क्योंकि हर महीने 3-4 तारीख तक खाते में जमा होने वाला पैसा इस बार अभी तक नहीं आया है। राज्य में बड़े स्तर पर प्रशासनिक फेरबदल किए जा रहे हैं। संभवतः उसके बाद प्रशासन पूरी तरह सक्रिय होगा। 
 
निजी क्षेत्र से रिटायर हुए, उत्तर 24 परगना जिला निवासी 64 वर्षीय लक्ष्मण रूरल वॉयस से कहते हैं, “आमतौर पर माहौल शांत है, मुस्लिम बहुल इलाकों में जरूर कुछ तनाव है। अभी केंद्रीय बल तैनात हैं, इसलिए आम लोगों को कोई दिक्कत नहीं है।”
 
राज्य में लेफ्ट फ्रंट का शासन करीब 34 साल रहा। उसके बाद 15 वर्षों तक ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस की सरकार थी। लेफ्ट के समय से ही राज्य में क्लब कल्चर चला आ रहा है। हर मोहल्ले में आपको कई क्लब मिल जाएंगे जहां राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं की बैठकी लगती है। प्रदेश में 2011 में जब तृणमूल कांग्रेस की सरकार बनी थी, तब ऐसे अधिकतर क्लबों पर रातों-रात लेफ्ट की जगह तृणमूल का नियंत्रण हो गया था। लक्ष्मण कहते हैं, “ऐसे ज्यादातर क्लब और स्थानीय पार्टी कार्यालय बंद पड़े हैं। तृणमूल के नेता घरों से कम ही निकल रहे हैं।”
 
15 साल पहले जब वाम मोर्चा को हटाकर तृणमूल कांग्रेस की सरकार बनी थी, तब बड़ी संख्या में लेफ्ट के कार्यकर्ता तृणमूल में शामिल हो गए थे। लेकिन इस बार स्थानीय भाजपा नेतृत्व ने घोषणा की है कि तृणमूल कांग्रेस के लोगों को बीजेपी में शामिल नहीं किया जाएगा। 
 
हालांकि यह नियम शायद निचले स्तर के कैडर के लिए नहीं है। कोलकाता के भवानीपुर इलाके, जहां भाजपा नेता और मौजूदा मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने तृणमूल नेता और पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को 15 हजार से अधिक वोटों से पराजित किया, के निवासी 57 वर्षीय राजेश राय के अनुसार, “तृणमूल सरकार बनने पर जिस तरह वाम मोर्चा के कार्यकर्ता तृणमूल में गए थे, उसी तरह तृणमूल के अनेक कार्यकर्ता भी भाजपा में जा रहे हैं। हालांकि यह निचले स्तर पर हो रहा है। काउंसलर या उससे बड़े पदों पर बैठे तृणमूल नेताओं के लिए भाजपा के दरवाजे अभी बंद हैं।”
 
राजेश अपने काम के सिलसिले में रोजाना राजा बाजार और गार्डन रीच जैसे मुस्लिम बहुल इलाकों से गुजरते हैं। उन्हें वहां का माहौल कुछ तनावपूर्ण लगता है। वे बताते हैं कि “नतीजे आने के बाद तृणमूल कांग्रेस के अनेक दफ्तरों में तोड़फोड़ की घटनाएं हुईं। उस समय माहौल भी तनाव भरा हो गया था। लेकिन शुभेंदु अधिकारी और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य की घोषणा के बाद स्थिति सामान्य हो रही है।” इन दोनों नेताओं ने कहा था कि अगर भाजपा का कोई कार्यकर्ता हिंसा करता है तो पुलिस उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई करे।
 
हुगली जिले के चुचुड़ा निवासी 58 वर्षीय रहमान खान भी कहते हैं, “तृणमूल कांग्रेस के दफ्तरों में तोड़फोड़ हुई, बदला लेने की कोशिश की गई, लेकिन खास कर शपथ ग्रहण के बाद शांति लौटती दिख रही है। इसका एक कारण भाजपा के बड़े नेताओं का समर्थन नहीं मिलना है। शायद कार्यकर्ताओं में यह डर है कि अगर पुलिस का मामला बनता है तो उन्हें पार्टी की तरफ से सुरक्षा नहीं मिलेगी।”
 
एक नर्सिंग होम में काम करने वाले रहमान के मुताबिक, मोहल्ले के क्लबों और पार्टी ऑफिसों में जो तोड़फोड़ हुई उसमें भाजपा के नेता स्तर के लोग कम, कार्यकर्ता ज्यादा शामिल थे। हालांकि वे यह भी बताते हैं कि मुस्लिम बहुल इलाकों में लोग डरे हुए हैं। उनके साथ हिंसा की घटनाएं भी हुई हैं। कुर्बानी के लिए जानवर ले जाने वालों को पकड़ा गया। लेकिन यह सब भी निचले स्तर के लोग कर रहे हैं। 
 
वैसे रहमान के अनुसार, “आप कह सकते हैं कि 60% लोग खुश हैं और मानते हैं कि यह राजनीतिक बदलाव जरूरी था। जमीनी स्तर पर तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के प्रति लोगों में काफी नाराजगी थी। वे हर काम में कमीशन वसूलते थे, जिससे लोग चिढ़े हुए थे। उनकी यह नाराजगी वोट में बदली है।”
 
महिलाएं तृणमूल कांग्रेस का मजबूत वोट बैंक रही हैं। लेकिन रहमान बताते हैं कि इस बार यह वोट बैंक टूटा है। वे इसके दो प्रमुख कारण बताते हैं। तृणमूल सरकार घरेलू महिलाओं को लक्ष्मी भंडार ‘भत्ते’ में डेढ़ हजार रुपए दे रही थी, भाजपा ने न सिर्फ तीन हजार रुपए देने का वादा किया, बल्कि उसका अच्छे से प्रचार भी किया। दूसरी वजह आरजी कर अस्पताल में महिला डॉक्टर के साथ बलात्कार और हत्या की घटना है। डॉक्टर की मां रत्ना देबनाथ ने पानिहाटी सीट पर भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ते हुए तृणमूल कांग्रेस के तीर्थांकर घोष को हराया है।
 
हालांकि ऐसे ‘भत्ते’ पाने वाली अनेक महिलाएं चिंतित भी हैं। हुगली निवासी 72 वर्षीय विधवा सुमित्रा को विधवा पेंशन हर महीने की 3-4 तारीख तक मिल जाती थी, लेकिन इस बार अभी तक उनके खाते में पैसा नहीं आया है। उन्हें चिंता है कि अब पैसे मिलेंगे या नहीं। उनके आस-पास रहने वाली महिलाओं को मिलने वाला लक्ष्मी भंडार का पैसा भी अभी नहीं आया है। सुमित्रा को लगता है कि हफ्ते भर में बाजार में चीजों के दाम बढ़े हैं- सब्जियां महंगी हुई हैं, जो आलू 10 से 15 रुपए किलो मिलता था वह 20 से 30 रुपए हो गया है। खाने के तेल के दाम भी बढ़े हैं।
 
हुगली में मशहूर इमामबाड़ा भी है जहां अमिताभ बच्चन ने 2015 में फिल्म तीन (Te3n, 2016 में रिलीज) की शूटिंग की थी। इसी इमामबाड़े पास ई-रिक्शा चलाने वाले 65 वर्षीय प्रदीप रहते हैं। वे बताते हैं कि उनके इलाके में किसी तरह की गड़बड़ी तो नहीं हुई, लेकिन लोग सहमे हुए हैं। यह उनके चेहरे और बातचीत से भी झलकता है। बाजारों में भीड़ कम हो गई है। पहले की तुलना में कम यात्री मिलने से उनकी कमाई भी प्रभावित हुई है। वे कहते हैं, “देर रात तक चहल-पहल वाले इलाकों में भी शाम 8:00 बजे के बाद सुनसान हो जाता है। शाम होते ही केंद्रीय बलों के जवान सड़कों पर गश्त लगाने लगते हैं।”
 
लेफ्ट और तृणमूल, दोनों का शासनकाल देखने वाले उत्तर 24 परगना जिला निवासी 65 वर्षीय शंकर बताते हैं कि नतीजे आने के बाद कुछ जगहों पर गड़बड़ियां हुई थीं। तृणमूल कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं को भगाया गया। उनके कुछ नेताओं के साथ मारपीट भी हुई। फिलहाल तृणमूल के नेता घरों से नहीं निकल रहे हैं। उनके कार्यकर्ता भी एक तरह से भूमिगत हो गए हैं।
 
दो महीने पहले एक निजी कंपनी में नौकरी शुरू करने वाले उत्तर 24 परगना जिले के नैहाटी निवासी 25 वर्षीय अभिषेक को भी लगता है कि लोग सहमे और चुपचाप हैं। यहां तक कि हमेशा शोर-शराबा वाली लोकल ट्रेनों में भी कुछ ऐसा ही माहौल देखने को मिलता है। वे कहते हैं, “ऐसा लगता है जैसे किसी की मौत हो गई हो और लोग शोक में डूबे हुए हैं।” तृणमूल के क्लब तो खाली हैं ही, मोहल्ले की चाय दुकानों पर बैठे रहने वाले तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता भी बिल्कुल नजर नहीं आते हैं। 
 
वे कहते हैं, “यहां तक कि नैहाटी की बड़ी मां (काली) मंदिर में रोजाना पूजा के लिए लगने वाली कतार भी छोटी हो गई है। मंदिर की पूजा कमेटी में पहले तृणमूल कांग्रेस के लोग थे। अब पूजा समिति की बैठक बुलाई गई है। कहा जा रहा है कि उसमें भी पदाधिकारी बदले जा सकते हैं।”
 
अभिषेक रोजाना नौकरी के लिए कोलकाता जाते हैं। अपने होशो-हवास में उन्होंने पहली बार राज्य में सरकार बदलते देखा है। वे एक रोचक बात बताते हैं, “सड़कों के रंग बदले जा रहे हैं। कोलकाता में सड़कों के किनारे पहले नीला और सफेद रंग होता था (जो तृणमूल का भी रंग है), लेकिन अब उन्हें गेरुआ और सफेद रंगों से रंगा जा रहा है।”
बदलाव सिर्फ रंगों में नहीं है। उत्तर 24 परगना जिले के कांचरापाड़ा, जहां रेलवे का बड़ा कारखाना भी है, में ज्वैलरी की दुकान चलाने वाले 59 वर्षीय किशोर बताते हैं कि अनेक तृणमूल कार्यकर्ता स्टेशनों के बाहर अवैध साइकिल और बाइक स्टैंड चलाते थे, उन्हें हटाने का आदेश दिया गया है। इससे बाजार के व्यवसायी और आम लोग खुश हैं। दुकानों में काम करने वाले कर्मचारियों को भी अपने वाहन उन्हीं स्टैंड में रखने पड़ते थे और पैसे देने पड़ते थे। 
 
पूर्व केंद्रीय मंत्री मुकुल राय कांचरापाड़ा के ही रहने वाले थे। यह शहर बीजपुर विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता है। यहां से मुकुल राय के बेटे शुभ्रांशु राय दो बार विधायक रह चुके हैं। 2026 के चुनाव से पहले यहां तृणमूल नेता सुबोध अधिकारी विधायक थे। मतगणना और नतीजे आने के बाद उनके साथ भी मारपीट की खबरें आई हैं। उनके भाई कमल अधिकारी नगरपालिका में चेयरमैन और शुभ्रांशु राय वाइस चेयरमैन थे। चेयरमैन के साथ मतभेद के कारण शुभ्रांशु दफ्तर नहीं जाते थे। नतीजे आने के बाद चेयरमैन ने आना बंद कर दिया है, तो अब शुभ्रांशु राय ऑफिस जाने लगे हैं। उन्होंने कहा है कि विभिन्न दलों के लोगों को साथ लेकर चलेंगे।
 
किशोर के मुताबिक, कुछ जगहों पर तोड़फोड़ की घटनाएं हुई हैं। एक तृणमूल नेता के करीबी के पेट्रोल पंप पर भी हमला हुआ। हालांकि अब अनेक भाजपा नेता घूम-घूम कर लाउडस्पीकर से घोषणा कर रहे हैं कि कार्यकर्ता हिंसा न करें। उन्होंने यह भी कहा है कि मोहल्लों के क्लब रहेंगे, लेकिन उन पर किसी भी पार्टी का झंडा नहीं होगा। उन क्लबों में कोई भी आकर बैठ सकता है। 
 
भवानीपुर के राजेश मानते हैं, “यह बदलाव जरूरी था। पहले लेफ्ट के 34 साल और उसके बाद तृणमूल के 15 साल के शासनकाल में यहां इंडस्ट्री का अधिक विकास नहीं हुआ। यहां जो भी इंडस्ट्री आना चाहती थी उन्हें तृणमूल कांग्रेस के स्थानीय स्तर के नेताओं और कार्यकर्ताओं को कमीशन देना पड़ता था। इसलिए इंडस्ट्री ज्यादा नहीं पनप रही थी। अगर यह स्थिति बदलती है और उद्योग धंधे खड़े होते हैं तो लोगों को रोजगार मिलेगा।” 
 
किशोर कहते हैं, “डनलप जैसी बड़ी फैक्ट्री और सैकड़ों जूट मिलें बंद पड़ी हैं। नदिया जिले के कल्याणी में ही अनेक फैक्ट्रियां बंद हैं। अगर पुरानी फैक्ट्रियां ही चालू हो जाएं तो लाखों लोगों को रोजगार मिल सकता है।”
 
राजेश का मानना है कि नंदीग्राम से टाटा मोटर्स का प्रोजेक्ट वापस जाने के कारण ममता बनर्जी की छवि इंडस्ट्री विरोधी हो गई थी। वैसे यह भी सच है कि नंदीग्राम के उस आंदोलन में ममता के सबसे मजबूत सिपाही शुभेंदु अधिकारी ही थे, जो दिसंबर 2020 में तृणमूल को छोड़कर भाजपा में शामिल हुए और 9 मई 2026 को पश्चिम बंगाल में पहली भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री बने।
(खबर में सभी नाम बदले हुए हैं)

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