होर्मुज जलडमरूमध्य संकट के बीच भारत को कृषि इनपुट आयात पर निर्भरता घटाने के उपायों की जरूरत

भारत की इनपुट प्रधान कृषि होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में व्यवधान के कारण गंभीर संकट में है। इससे न सिर्फ उर्वरक आयात बाधित हुआ बल्कि ऊर्जा लागत भी बढ़ी है। आयातित यूरिया, डीएपी और प्राकृतिक गैस पर भारी निर्भरता के कारण खरीफ उत्पादकता और खाद्य सुरक्षा खतरे में है। यह लेख दीर्घकालिक समाधान के लिए घरेलू उर्वरक उत्पादन, नवीकरणीय ऊर्जा, मृदा स्वास्थ्य और संसाधन उपयोग की दक्षता बढ़ाने पर जोर देता है।

होर्मुज जलडमरूमध्य संकट के बीच भारत को कृषि इनपुट आयात पर निर्भरता घटाने के उपायों की जरूरत

विश्व के कुल भू-भाग का मात्र 2.4 प्रतिशत और जल संसाधनों का 4 प्रतिशत होने के बावजूद भारत में विश्व की 18 प्रतिशत मानव आबादी और लगभग एक-तिहाई पशुधन है। भारत की कृषि उपलब्धियां सफलता की मिसाल हैं। वर्ष 1947 से 2020 के बीच भारत का खाद्यान्न उत्पादन 6 गुना, बागवानी 10 गुना, दूध 9 गुना और मछली उत्पादन 13 गुना बढ़ा है। अनाज का निर्यात लगभग 2 करोड़ टन प्रति वर्ष (लगभग 40 अरब डॉलर) है, जबकि अनाज का बफर स्टॉक 5 करोड़ टन है। गरीबी दर 70 प्रतिशत से घटकर 20 प्रतिशत रह गई है। यहां शुद्ध बुआई क्षेत्र लगभग 14 करोड़ हेक्टेयर, सकल बुआई क्षेत्र लगभग 20 करोड़ हेक्टेयर और शुद्ध सिंचित क्षेत्र लगभग 7 करोड़ हेक्टेयर तथा उर्वरक-पोषक तत्वों का उपयोग करीब 260 लाख टन है। यहां उन्नत फसल किस्मों का भी उपयोग किया जा रहा है। इस उत्पादन स्तर को बनाए रखने के लिए भारत हर वर्ष लगभग 40 प्रतिशत यूरिया और फॉस्फेट उर्वरकों का आयात करता है।

वित्त वर्ष 2025 में भारत ने 6.52 अरब डॉलर की 102 लाख टन यूरिया का आयात किया। भारत के यूरिया आयात का 60 प्रतिशत से अधिक और अमोनिया का 80 प्रतिशत खाड़ी क्षेत्र से आता है, जिसका बड़ा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से होकर गुजरता है। जून में मानसून की शुरुआत के साथ शुरू होने वाला खरीफ बुवाई सीजन धान, कपास, सोयाबीन, ज्वार, मोटे अनाज और दालों की खेती के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। इसलिए वर्तमान होर्मुज संकट और उर्वरकों की कमी के कारण ग्रीष्मकालीन फसलों की उत्पादकता गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है। हालांकि भारत की खाद्यान्न उत्पादन क्षमता लगभग 55 करोड़ टन प्रति वर्ष आंकी गई है, लेकिन यह काफी हद तक सैद्धांतिक ही है। जैसा कि नॉर्मन बोरलॉग ने कहा था, “संभावनाओं को खाकर कोई नहीं जी सकता।” इसके अलावा, मौजूदा जटिल जैव-भौतिक परिस्थितियों और राजनीतिक व संस्थागत चुनौतियों के कारण इस संभावित उत्पादन को पूरी तरह हासिल करना संभव नहीं है।

होर्मुज जलडमरूमध्य में अस्थिरता के कारण कृषि आपूर्ति श्रृंखला में बाधा उत्पन्न हो रही है। इससे ऊर्जा की कीमतें बढ़ रही हैं और परिणामस्वरूप लॉजिस्टिक्स तथा कृषि इनपुट की लागत में भी वृद्धि हो रही है। इससे भारत की कृषि क्रांति गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है। यह सच है कि उर्वरकों पर जीवाश्म ईंधनों (तेल या प्राकृतिक गैस) जितनी चर्चा नहीं होती, लेकिन कृषि उत्पादकता और खाद्य की पोषण गुणवत्ता बनाए रखने में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। संकट शुरू होने के बाद से उर्वरकों की कीमतों में पहले ही 20 से 30 प्रतिशत तक की वृद्धि हो चुकी है। तरल अमोनिया उत्पादन में सबसे प्रमुख संसाधन प्राकृतिक गैस से प्राप्त ऊर्जा है, जिसका उपयोग H₂O अणु को तोड़ने और 400 डिग्री सेल्सियस तापमान तथा 200 वायुमंडलीय दबाव पर लोहे (Fe) को उत्प्रेरक के रूप में इस्तेमाल करते हुए हाइड्रोजन (H) को नाइट्रोजन (N) के साथ मिलाने में किया जाता है (हेबर-बॉश विधि)। यूरिया उत्पादन लागत का 70 से 80 प्रतिशत हिस्सा प्राकृतिक गैस पर ही निर्भर करता है।

भारत डाय-अमोनियम फॉस्फेट [(NH4)2 HPO4, जिसमें 18% नाइट्रोजन (N) और 46% P2O5 होता है] का भी लगभग 60 प्रतिशत आयात करता है। यह मुख्यतः सऊदी अरब और मध्य पूर्व से आता है। इसके अलावा, DAP बनाने के लिए तरल अमोनिया (NH3) की आवश्यकता होती है, जो प्राकृतिक गैस पर आधारित है। इसमें सल्फ्यूरिक एसिड (H2SO4) की भी जरूरत होती है, जो सल्फर से बनता है और उसका भी आयात होता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत के पास व्यावसायिक रूप से उपलब्ध पोटाश के भंडार नहीं हैं, इसलिए इसका भी आयात करना पड़ता है। 

होर्मुज से जुड़ा संकट, खाद्य और पोषण आत्मनिर्भरता हासिल करने की दिशा में भारत के लिए बड़ी चुनौती है, क्योंकि इसके व्यापक प्रत्यक्ष (स्थानीय), परोक्ष (दूरस्थ) और मानवीय प्रभाव हैं (देखें चित्र)। 

युद्ध के कारण मृदा एवं पर्यावरणीय क्षरण पर प्रत्यक्ष एवं परोक्ष प्रभाव।

आगे की राह

आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान, एक परोक्ष और दूरस्थ नकारात्मक प्रभाव है। यह पहले ही भारत की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रहा है और इससे खाद्य व पोषण सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ सकता है। यह जीवन की बुनियादी संरचना तक को प्रभावित कर सकता है। वास्तव में कोई भी युद्ध शरीर, मन, आत्मा और पूरे व्यक्तित्व पर नकारात्मक प्रभाव डालता है। भारत विशेष रूप से उन दूरस्थ प्रभावों के प्रति संवेदनशील है, जो पहले से मौजूद संरचनात्मक और सामाजिक-आर्थिक कमजोरियों को और बढ़ा सकते हैं। इस संदर्भ में भारत के लिए अपनी तैयारी को मजबूत करना अत्यंत आवश्यक है, ताकि न केवल वर्तमान संकट का समाधान किया जा सके, बल्कि भविष्य में मानव-जनित व्यवधानों के खिलाफ भी लचीलापन विकसित किया जा सके।

जहां एक ओर पश्चिम एशिया में शांति और स्थिरता बहाल करने के लिए कूटनीतिक प्रयास जारी रहने चाहिए, वहीं भारत को घरेलू उर्वरक उत्पादन के विस्तार के लिए एक सुदृढ़ रणनीति भी विकसित करने की आवश्यकता है। इसमें स्थानीय संसाधनों का उपयोग करते हुए हेबर-बॉश विधि (Haber–Bosch process) के माध्यम से नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों तथा डीएपी जैसे फॉस्फेटिक उर्वरकों के उत्पादन में वृद्धि शामिल है। इन प्रक्रियाओं को संचालित करने के लिए विश्वसनीय और टिकाऊ ऊर्जा स्रोतों की उपलब्धता सुनिश्चित करना भी समान रूप से महत्वपूर्ण है। इस संदर्भ में, निम्नलिखित प्राथमिकताओं पर तुरंत और केंद्रित ध्यान देने की आवश्यकता है:

1. वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों (जैसे सौर, पवन, पनबिजली, जियो, परमाणु, जैव ऊर्जा) की पहचान करना तथा आवासीय, औद्योगिक, शैक्षणिक व सरकारी भवनों और परित्यक्त/बंजर भूमि पर सोलर पैनल स्थापित करना, ताकि घरेलू और औद्योगिक उपयोग के साथ विशेष रूप से सिंचाई पंपों के लिए ऊर्जा उपलब्ध कराई जा सके।
2. कृषि में बिजली के लिए पवन ऊर्जा संयंत्र (विंड फार्म) स्थापित करना।
3. अनुपयोगी कृषि सह-उत्पादों (जैसे धान की भूसी, गन्ने की बगास, नारियल के खोल, ऑयल पाम के बीज, खाद्य अपशिष्ट, जलकुंभी) से जैव-ऊर्जा उत्पादन बढ़ाना।
4. मृदा स्वास्थ्य बहाली और सतत भूमि उपयोग के माध्यम से उर्वरकों और सिंचाई जल के उपयोग की दक्षता (30% से बढ़ाकर 60% या अधिक) को बढ़ाना।
5. कार्बन खेती को बढ़ावा देना और उससे आय सृजन कर भूमि प्रबंधकों के लिए आर्थिक रूप से लाभकारी बनाना।
6. कम संसाधनों से अधिक उत्पादन करने वाली तकनीक अपनाने पर भूमि प्रबंधकों को प्रोत्साहन/पुरस्कार देना।
7. मृदा स्वास्थ्य को वापस लाने के लिए कम्पोस्ट, हरित खाद, जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण तथा बायो-स्टिमुलेंट्स सहित जैव उर्वरकों के उपयोग को प्रोत्साहित करना।
8. पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील ईकोसिस्टम (जैसे जल, उपजाऊ मिट्टी, वन्यजीव आवास, स्थानीय वनस्पति) को शहरी और औद्योगिक अतिक्रमण, युद्ध तथा नागरिक अशांति से संरक्षित करना, ताकि इन को “शांति पार्क” के रूप में चिह्नित कर सशस्त्र संघर्षों से बाहर रखा जा सके।
9. आम जनता को स्वस्थ आहार अपनाने के प्रति जागरूक करना, “वन हेल्थ” अवधारणा को बढ़ावा देना तथा सभी स्तरों पर खाद्य अपव्यय को कम करना।
10. कृषि-केंद्रित, पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ और किसानों की आजीविका व कल्याण के लिए वास्तविक रूप से सहायक नीतियों के माध्यम से किसानों और सभी कृषि व्यवसायों के प्रति सम्मान और गरिमा को सुदृढ़ करना।

तत्काल कार्रवाई आवश्यक

होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग बाधित होने का सबसे अधिक प्रभाव भारत, अफ्रीका और अन्य विकासशील देशों पर पड़ने की आशंका है। एक बड़े लोकतंत्र और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में भारत को उर्वरक उत्पादन, सिंचाई जल के स्तर में वृद्धि, पोषक तत्वों की रीसाइक्लिंग तथा रोग-प्रतिरोधी मिट्टी विकसित कर कीटनाशकों के उपयोग को कम करने के प्रयास करने चाहिए ताकि ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल की जा सके। प्रकृति में “कोई अपशिष्ट नहीं होता” इसलिए सभी सह-उत्पादों की इनोवेटिव प्रोसेसिंग सिस्टम से रीसाइक्लिंग की जानी चाहिए।

भारत को उप-सहारा अफ्रीका, मध्य अमेरिका और कैरेबियन जैसे क्षेत्रों के साथ व्यावहारिक और विस्तार योग्य समाधान साझा कर दक्षिण-दक्षिण सहयोग में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए। वर्तमान कलियुग या एंथ्रोपोसीन (अविश्वास, स्वार्थ, अहंकार, विस्तारवाद और कानूनों के प्रति अनादर) के दौर में विवेकपूर्ण और समावेशी नीतियों का क्रियान्वयन अत्यंत महत्वपूर्ण है। नीतियां ऐसी हों कि कोई भी किसान पीछे न छूटे और कोई भी व्यक्ति भूखा न सोए। ये हमारी प्राचीन सभ्यता के मूल सिद्धांत हैं, जो आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हैं।

होर्मुज जलडमरूमध्य में उत्पन्न यह मानव-जनित संकट खाद्य-ऊर्जा-जल-मृदा (FEWS) के परस्पर जुड़े तंत्र के महत्व को समझने और उसके प्रति सम्मान बढ़ाने की तात्कालिक आवश्यकता को रेखांकित करता है। भारत का कृषि को सफल बनाने और विश्व में शांति व सद्भाव को बढ़ावा देने का उत्कृष्ट इतिहास रहा है। यह समय भारत के संकल्प और इच्छाशक्ति की परीक्षा का है, कि वह स्वयं को इस संकट से उबारे और पूरी मानवता का मार्गदर्शन करे- जैसा कि प्राचीन संतों और दार्शनिकों, गौतम बुद्ध, अशोक, महावीर, गुरु नानक, अकबर, स्वामी विवेकानंद और महात्मा गांधी ने किया था। एकजुट होकर कुछ भी असंभव नहीं है; और ऐसी एकता अधिक सशक्त और सहयोगी विश्व व्यवस्था का निर्माण कर सकती है।
“जय खेती, जय किसान”

(प्रो. रतन लाल द ओहायो स्टेट यूनिवर्सिटी में सीएफएईएस डॉ. रतन लाल कार्बन मैनेजमेंट एंड सीक्वेसट्रेशन सेंटर के डायरेक्टर और मृदा विज्ञान के विशिष्ट यूनिवर्सिटी प्रोफेसर हैं। वे 2020 के वर्ल्ड फूड प्राइज लॉरिएट भी हैं)



Subscribe here to get interesting stuff and updates!