2030 तक पॉपकॉर्न मक्का उत्पादन में आत्मनिर्भरता की ओर भारत, उत्पादन बढ़ाने में मिली कामयाबी
भारत 2030 तक पॉपकॉर्न मक्का के आयात पर अपनी निर्भरता खत्म करने की ओर अग्रसर है। उन्नत बीज, अनुसंधान-उद्योग साझेदारी और किसानों की भागीदारी ने आयात-निर्भर बाजार को मजबूत घरेलू वैल्यू चेन में बदल दिया है।
भारत वर्ष 2030 तक पॉपकॉर्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बनने की राह पर है। एक दशक पहले तक भारत पॉपकॉर्न मक्का के लिए पूरी तरह से आयात पर निर्भर था, क्योंकि घरेलू उत्पादन बहुत कम था। लेकिन देश में मक्का की उन्नत किस्मों के विकास और निजी कंपनी व किसानों की भागीदारी से इस क्षेत्र में बड़ा बदलाव आया है।
कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) के सचिव और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक डॉ. एम. एल. जाट ने बताया कि भारत का पॉपकॉर्न मक्का बाजार 2014-15 के 50 हजार टन से बढ़कर 2025-26 में 1.30 लाख टन तक पहुंच गया है। वर्ष 2030 तक इसके करीब 1.80 लाख टन तक पहुंचने की संभावना है। वर्तमान में देश की लगभग 70 प्रतिशत मांग की पूर्ति घरेलू उत्पादन से हो रही है, जिससे आयात पर निर्भरता में उल्लेखनीय कमी आई है और किसानों के लिए आय के नए अवसर बने हैं।
डॉ. जाट के अनुसार, पॉपकॉर्न मक्का के घरेलू उत्पादन में वृद्धि के कारण आयात में आई गिरावट से 2025-26 में लगभग 810 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा की बचत हुई है। देश में करीब 90,000 टन पॉपकॉर्न मक्का का उत्पादन इस उपलब्धि का संकेत है। यह बढ़ोतरी भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल उच्च गुणवत्ता वाली किस्मों के विकास और अनुसंधान संस्थानों, निजी कंपनियों तथा किसानों के बीच मजबूत साझेदारी का परिणाम है।
अनुसंधान और उद्योग की साझेदारी
पॉपकॉर्न मक्का उत्पादन में आए बदलाव के पीछे आईसीएआर के लुधियाना स्थित भारतीय मक्का अनुसंधान संस्थान (IIMR) और देश की प्रमुख पॉपकॉर्न कंपनी गॉरमेट पॉपकॉर्निका एलएलपी के बीच साझेदारी की अहम भूमिका रही है। इसके जरिए पॉपकॉर्न मक्का की किस्मों में सुधार, बुवाई क्षेत्र में विस्तार और वैल्यू चेन विकसित करने पर जोर दिया गया।

आईसीएआर-आईआईएमआर द्वारा विकसित स्वदेशी हाइब्रिड किस्म LPCH 3 को लेकर फरवरी 2021 में हुए समझौतों के बाद इन प्रयासों में तेजी आई। यह हाइब्रिड किस्म उच्च उपज, अच्छी पॉपिंग गुणवत्ता और प्रमुख कीट एवं रोगों के प्रति सहनशीलता के लिए जानी जाती है। बाद में, गॉरमेट पॉपकॉर्निका ने भारतीय और अमेरिकी पॉपकॉर्न के गुणों को मिलाकर नए हाइब्रिड विकसित किए, जिसका उद्देश्य उपज और गुणवत्ता को और बेहतर बनाना था।
वैल्यू चेन का विस्तार
गॉरमेट पॉपकॉर्निका देश में नौ राज्यों के 17,500 से अधिक किसानों के साथ काम कर रही है और 36,000 एकड़ से अधिक क्षेत्र में पॉपकॉर्न मक्का की खेती कराई जा रही है। कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग, कृषि सहायता और प्रशिक्षण कार्यक्रमों के जरिए कंपनी ने एक संगठित और भरोसेमंद बाजार तैयार करने में मदद की है। इससे किसानों को बेहतर आय के अवसर मिल रहे हैं, वहीं प्रसंस्करण उद्योग और उपभोक्ताओं के लिए स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित हो रही है।
मजबूत अनुसंधान और जमीनी स्तर पर प्रभावी क्रियान्वयन के जरिए भारत न केवल अपनी घरेलू मांग पूरी करने के लिए तैयार है, बल्कि 2030 तक उच्च गुणवत्ता वाले पॉपकॉर्न मक्का का भरोसेमंद निर्यातक बनने की स्थिति में पहुंच सकता है।
भावी संभावनाएं
पॉपकॉर्न मक्का में कामयाबी की यह कहानी उदाहरण है कि कैसे फसल विविधीकरण, अनुसंधान और उद्योग की साझेदारी एक आयात-निर्भर उत्पाद को घरेलू मूल्य श्रृंखला में बदल सकती है। यह मॉडल किसानों की आय बढ़ाने, आयात पर निर्भरता घटाने और विशेष खाद्य आपूर्ति श्रृंखला विकसित करने का उदाहरण बन रहा है।
भारत की पॉपकॉर्न मक्का पर आयात निर्भरता एक दशक पहले शत-प्रतिशत से घटकर आज लगभग 30 फीसदी रह गई है। यदि वर्तमान रुझान जारी रहते हैं, तो भारत 2030 तक अपनी लगभग 1.80 लाख टन की पूरी घरेलू मांग को खुद पूरा कर सकता है।

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