पश्चिम एशिया संकट और भारत के कृषि व्यापार की मुश्किलें

ईरान युद्ध भारत के कृषि निर्यात पर असर डाल रहा है, जिससे बाजारों में अनिश्चितता और लागत बढ़ रही है। अनाज व बफेलो मीट जैसे क्षेत्रों पर दबाव बढ़ सकता है। यह स्थिति किसानों की आय बचाने के लिए निर्यात विविधीकरण, मजबूत आपूर्ति श्रृंखला और लागत पर नियंत्रण की जरूरत को रेखांकित करती है।

पश्चिम एशिया संकट और भारत के कृषि व्यापार की मुश्किलें

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बारे में आम तौर पर तेल और उर्वरकों के दृष्टिकोण से चर्चा होती है। हालांकि ये पहलू महत्वपूर्ण हैं, लेकिन भारतीय कृषि के लिए चिंता का विषय यह भी है कि इन व्यवधानों का कृषि व्यापार, बाजार पहुंच और घरेलू मूल्य व्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ता है। पश्चिम एशिया केवल एक सामान्य निर्यात गंतव्य नहीं; यह भारत के सबसे महत्वपूर्ण कृषि बाजारों में से एक है। भारत के कुल कृषि निर्यात का लगभग 22% पश्चिम एशिया को ही जाता है। इस क्षेत्र को भारत के कुल 66.86 अरब डॉलर के निर्यात (2023-24 और 2024-25 का औसत) में से लगभग 16% कृषि और संबद्ध वस्तुओं (एचएस चैप्टर 1-23) का हिस्सा है। इससे स्पष्ट है कि यह क्षेत्र किसानों की आय और व्यापार स्थिरता दोनों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

साथ ही, पश्चिम एशिया यूरोप और अन्य क्षेत्रों तक माल भेजने के लिए एक प्रमुख ट्रांजिट कॉरिडोर के रूप में भी कार्य करता है। इसलिए यहां किसी भी प्रकार का व्यवधान न केवल सीधे निर्यात को प्रभावित करता है, बल्कि उस व्यापक व्यापार ढांचे पर भी असर डालता है, जिस पर भारत निर्भर करता है।

वैल्यू चेन, ऊर्जा और लागत का दबाव

पश्चिम एशिया भारत के ऊर्जा आयात के लिए बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र बना हुआ है। वहां से आने वाले लगभग 78% आयात में खनिज तेल, बहुमूल्य धातु और रत्न शामिल हैं। इसके अलावा, भारत लगभग 31% उर्वरक आयात इसी क्षेत्र से करता है। हालांकि चिंता तत्काल आपूर्ति बाधित होने की नहीं है, बल्कि बढ़ती ऊर्जा कीमतों और शिपिंग जोखिमों के कारण आयात की कुल लागत (लैंडेड कॉस्ट) में वृद्धि की है।

यह बढ़ती लागत कृषि वैल्यू चेन के विभिन्न स्तरों पर असर डालती हैं। केवल खेत स्तर पर नहीं, बल्कि कटाई के बाद की प्रक्रियाओं जैसे सुखाने, भंडारण और प्रसंस्करण में भी ऊर्जा की अहम भूमिका होती है। उदाहरण के लिए, मक्का जैसी फसलों में गुणवत्ता बनाए रखने और बाजार मानकों को पूरा करने के लिए सुखाना आवश्यक होता है, जो अक्सर ईंधन या गैस आधारित प्रणालियों पर निर्भर करता है।

ऐसे में ऊर्जा लागत में वृद्धि या अनिश्चितता से हैंडलिंग लागत बढ़ सकती है और संचालन में बाधाएं उत्पन्न हो सकती हैं। इसका असर घरेलू आपूर्ति श्रृंखलाओं के साथ-साथ निर्यात की तैयारियों पर भी पड़ता है। ये अचानक आने वाले झटके नहीं, बल्कि धीरे-धीरे बढ़ने वाले दबाव हैं। ये झटके कम मुनाफे वाली फसलों के लिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं, खासकर तब जब निर्यात बाजार भी अनिश्चित हो जाएं।

कृषि निर्यात: उच्च निर्भरता, सीमित घरेलू खपत

भारत से पश्चिम एशिया को कृषि निर्यात में अनाज, मांस (विशेष रूप से भैंस का मांस) तथा कॉफी, चाय और मसाले प्रमुख हैं। इस क्षेत्र को होने वाले कुल निर्यात का 66% हिस्सा इन उत्पादों का है। ये ऐसे क्षेत्र हैं जहां कीमतों के निर्धारण में बाहरी मांग की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

अनाज के मामले में समस्या संरचनात्मक है। भारत में समय-समय पर सरप्लस उत्पादन होता रहता है और घरेलू मांग अपेक्षाकृत कम लचीली है। ऐसे में जब निर्यात प्रवाह बाधित होता है या कम लाभकारी रह जाता है, तो इसका असर घरेलू कीमतों पर दबाव के रूप में सामने आता है। घरेलू महंगाई को नियंत्रित करने के लिए अतीत में लगाए गए निर्यात प्रतिबंध भी इस बात को दर्शाते हैं कि कीमतों पर इनका कितना गहरा प्रभाव होता है।

भैंस के मांस के निर्यात को लेकर चिंता और अधिक गंभीर है, क्योंकि यह लगभग पूरी तरह निर्यात-आधारित है और इसकी घरेलू खपत बहुत कम है। इसलिए पश्चिम एशिया जैसे प्रमुख बाजारों में किसी भी प्रकार का व्यवधान सीधे तौर पर कीमतों और मूल्य श्रृंखला को प्रभावित करता है। चाय और मसाले जैसी फसलों में प्रभाव अपेक्षाकृत कम हो सकता है, लेकिन फिर भी महत्वपूर्ण है। खासकर तब जब गुणवत्ता के प्रति संवेदनशील निर्यात समय पर आपूर्ति और स्थिर मांग पर निर्भर करते हैं।

खाद्य सुरक्षा की परस्पर निर्भरता और भारत की भूमिका

इस व्यापार का महत्व एकतरफा नहीं है। पश्चिम एशिया संरचनात्मक रूप से खाद्य आयात पर निर्भर है, विशेष रूप से चावल जैसे मुख्य खाद्य पदार्थों और प्रोटीन स्रोतों के लिए। इसलिए आपूर्तिकर्ता के रूप में भारत की भूमिका व्यापक खाद्य सुरक्षा परिदृश्य में निहित है। भारत से होने वाली सतत आपूर्ति इस क्षेत्र में उपलब्धता और कीमतों की स्थिरता में योगदान देती है। उदाहरण के लिए, ईरान अपनी घरेलू चावल खपत का लगभग 30% आयात के माध्यम से पूरा करता है, जिसमें से करीब 43% आपूर्ति भारत से होती है। ऐसे में व्यापार प्रवाह में व्यवधान न केवल निर्यातकों के लिए, बल्कि आयात करने वाले देशों की खाद्य सुरक्षा के लिए भी गंभीर संकट पैदा कर सकते हैं।

आर्थिक सहभागिता में किसान

एक महत्वपूर्ण लेकिन अक्सर कम आंका जाने वाला पहलू यह है कि पश्चिम एशिया में भारत की स्थिति मूल रूप से उसके किसानों की सरप्लस उत्पादन क्षमता पर आधारित है। इसी अतिरिक्त उत्पादन ने भारत को इस क्षेत्र के लिए आवश्यक खाद्य वस्तुओं का एक विश्वसनीय आपूर्तिकर्ता बनाया है। वास्तव में, किसान केवल घरेलू बाजारों के सहभागी नहीं हैं, बल्कि वे भारत की बाहरी आर्थिक सहभागिता के भी प्रमुख साझीदार हैं।

आवश्यक वस्तुओं के मामले में व्यापारिक संबंध केवल नीतियों या समझौतों के माध्यम से नहीं, बल्कि निरंतर और समय पर आपूर्ति की विश्वसनीयता के आधार पर भी टिकते हैं। यही आधार भारत को इस क्षेत्र के विभिन्न देशों के साथ विश्वास बनाए रखने में सक्षम बनाता है। हालांकि यह स्थिति स्वतः नहीं बनती। इसके लिए प्रतिस्पर्धात्मकता बनाए रखना, लागत का प्रबंधन करना और विश्वसनीयता सुनिश्चित करना आवश्यक है। ये सभी पहलू तब और चुनौतीपूर्ण हो जाते हैं जब व्यापार की परिस्थितियां बाधित होती हैं।

निष्कर्ष

पश्चिम एशिया में जारी युद्ध यह दर्शाता है कि कृषि व्यापार में व्यवधान केवल तात्कालिक कमी का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह अनिश्चितता, बढ़ती लागत और कीमत पर पड़ने वाले दबाव से अधिक जुड़ा हुआ है। भारत के लिए मुख्य चिंता किसानों की आय पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर है। अनाज और भैंस के मांस जैसे उत्पादों में, जहां घरेलू खपत सीमित है, निर्यात बाजारों में व्यवधान सीधे तौर पर कीमतों पर गिरावट का दबाव बना सकता है। वहीं पश्चिम एशिया के लिए चिंता का स्वरूप अलग है, लेकिन वह भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उसकी चिंता खाद्य सुरक्षा को लेकर है क्योंकि यह क्षेत्र आवश्यक खाद्य वस्तुओं के लिए आयात पर निर्भर है।

यह परस्पर निर्भरता एक संतुलित और सावधानीपूर्वक नीतिगत प्रतिक्रिया की आवश्यकता को रेखांकित करती है। उत्पादन और मूल्य श्रृंखला के स्तर पर, सिंचाई, प्रसंस्करण और फसल कटाई के बाद के कार्यों में नवीकरणीय ऊर्जा के अधिक उपयोग से तथा जैव उर्वरकों और हरित खाद का इस्तेमाल बढ़ाकर ऊर्जा झटकों के प्रति संवेदनशीलता को कम किया जा सकता है। इससे लागत कम करने में मदद मिलेगी।

व्यापार के मोर्चे पर, निर्यात बास्केट और गंतव्य देशों में विविधता लाने की आवश्यकता है। कुछ चुनिंदा वस्तुओं का विशिष्ट बाजारों में अत्यधिक केंद्रित रहना जोखिम को बढ़ाता है। जब व्यवधान उत्पन्न होते हैं, तो वैकल्पिक बड़े बाजारों को तेजी से खोजना या सरप्लस को घरेलू स्तर पर खपाना आसान नहीं होता, जिससे किसानों की आय प्रभावित हो सकती है।

तेजी से अनिश्चित होते वैश्विक परिदृश्य में कृषि व्यापार को बनाए रखने के लिए केवल उत्पादन क्षमता ही पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि मूल्य श्रृंखला और बाजार पहुंच, दोनों में लचीलापन आवश्यक होगा। तभी देश के भीतर किसानों की आय और हमारे व्यापारिक साझीदार क्षेत्रों में खाद्य सुरक्षा दोनों सुनिश्चित की जा सकेगी। 

(स्मिता सिरोही आईसीएआर नेशनल प्रोफेसर, एम.एस. स्वामीनाथन चेयर हैं। लव त्यागी आईसीएआर-एनआईएपी में यंग प्रोफेशनल हैं)

Subscribe here to get interesting stuff and updates!