भारत-ईयू एफटीए: यूरोप के प्रीमियमों उत्पादों को बाजार मिलने से बढ़ेंगी भारतीय कृषि की चुनौतियां

इंटरनेशनल ट्रेड के जानकारों का साफ कहना है कि फ्रूट जूस, वाइन, खाद्य तेल और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों की एक लंबी फेहरिस्त है, जिनको हमने ईयू से आयात के लिए खोल दिया है और उन पर सीमा शुल्क में भारी कटौती से लेकर उन्हें शुल्क मुक्त तक किया है।

भारत-ईयू एफटीए: यूरोप के प्रीमियमों उत्पादों को बाजार मिलने से बढ़ेंगी भारतीय कृषि की चुनौतियां

भारत और यूरोपीय यूनियन (ईयू) ने फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफटीए) को दोनों पक्षों के लिए बड़े फायदे वाला बताया है। यह समझौता दुनिया की करीब 25 फीसदी अर्थव्यवस्था को कवर करता है। दोनों ओर से शुल्क दरों में भारी कटौती की गई है। साथ ही, दोनों पक्षों का कहना है कि संवेदनशील क्षेत्रों को अपने-अपने स्तर पर संरक्षित रखा गया है।

भारत सरकार ने साफ किया है कि उसने अपने कृषि क्षेत्र को पूरी तरह संरक्षण दिया है और किसानों को इससे केवल फायदा होगा, नुकसान नहीं। लेकिन हकीकत पूरी तरह वैसी नहीं है जैसी सरकार दावा कर रही है। इस एफटीए से भारत के प्रीमियम कृषि उत्पाद बाजार में ईयू देशों के उत्पादों की एंट्री हो जाएगी। यह बात अलग है कि अभी इस फैसले को यूरोपीय संसद की मंजूरी मिलनी है और उसके बाद वहां अदालत का रास्ता भी खुला है।

जहां तक भारत की बात है, यहां ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं है और सरकार का लिया गया फैसला सीधे लागू हो जाएगा। इस बात की भी कोई संभावना नहीं दिखती कि प्रक्रिया पूरी होने से पहले संसद में इस पर चर्चा होगी। उद्योग और सेवा क्षेत्र को छोड़ दें तो कृषि से जुड़े हितधारकों की राय लेने के लिए अब तक कोई ठोस पहल सामने नहीं आई है।

अंतरराष्ट्रीय व्यापार के जानकारों का कहना है कि फ्रूट जूस, वाइन, खाद्य तेल और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों की एक लंबी सूची है, जिन्हें ईयू से आयात के लिए खोल दिया गया है। इनमें से कई उत्पादों पर सीमा शुल्क में भारी कटौती की गई है, जबकि कुछ को पूरी तरह शुल्क मुक्त कर दिया गया है।

भारत में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग उस स्तर पर विकसित नहीं है, जिस स्तर पर यूरोपीय देशों में है। उदाहरण के तौर पर जूस बाजार को देखें तो भारतीय बाजार में पहले से ही आयातित जूस की बड़ी हिस्सेदारी है। ईयू के साथ एफटीए के बाद यह आयात और बढ़ना तय है। कृषि उत्पादों के प्रसंस्करण का हमारा स्तर, जो पहले ही कुल उत्पादन के करीब 10 फीसदी पर अटका है, उसके विकास में इससे मुश्किलें आ सकती हैं। वाइन और फ्रूट बीयर जैसे उत्पादों के सस्ते आयात का मतलब है कि देश में खड़ी हो रही इस इंडस्ट्री को झटका लगेगा, जबकि यही उद्योग देश के फल उत्पादकों को बाजार उपलब्ध करा रहा था।

खाद्य तेलों की हमारी 60 फीसदी से अधिक जरूरत आयात से पूरी होती है। अब जैतून तेल के सस्ते आयात के चलते खाद्य तेलों का एक प्रीमियम बाजार इस आयात के हिस्से जा सकता है। हिमाचल प्रदेश के सेब किसानों के संगठनों का कहना है कि न्यूजीलैंड के साथ एफटीए में सेब पर ड्यूटी घटाने से वे पहले ही प्रभावित हो रहे हैं। ईयू के साथ एफटीए को लेकर भी वे इसी तरह की आशंका जता रहे हैं।

सरकार का कहना है कि इस समझौते में खाद्यान्न, सोयाबीन और चावल जैसे उत्पादों को शामिल नहीं किया गया है। हालांकि इन फसलों की कीमतें भारत में पहले से ही काफी कम हैं और ये उत्पाद प्रतिस्पर्धी हैं। ऐसे में यूरोप से इनके आयात की संभावना सीमित ही है।

हमारी निर्यात संभावनाओं को जिस तरह पेश किया जा रहा है, उनकी सफलता पर भी सवाल हैं। ईयू ने हमारे प्रमुख निर्यात उत्पादों जैसे चावल, चीनी और डेयरी उत्पादों पर किसी भी तरह की रियायत देने से साफ इनकार कर दिया है। इसके अलावा ईयू ने खाद्य मानकों को लेकर किसी भी प्रकार का समझौता करने से भी मना कर दिया है। ऐसे में ताजा सब्जियों और अंगूर के निर्यात को लेकर जो उम्मीदें जताई जा रही हैं, उनके लिए सख्त खाद्य मानकों और ट्रेसेबिलिटी की शर्तों का पालन करना अनिवार्य होगा। वैसे भी गर्किन और अंगूर का निर्यात हम पहले से यूरोप को कर रहे हैं, क्योंकि निर्यात करने वाली कंपनियां इन मानकों को पूरा करती हैं। इस समझौते में भेड़ के मांस को शामिल करने से पशुपालन के उस सेगमेंट को झटका लग सकता है, जिसमें तेज ग्रोथ की संभावना थी।

फिलहाल एफटीए की पूरी जानकारी सामने आनी बाकी है और उसके बाद ही स्थिति स्पष्ट होगी। कृषि क्षेत्र में किसानों की आय बढ़ाने की सबसे ज्यादा संभावना हॉर्टिकल्चर उत्पादों में है। लेकिन समझौते में जिन उत्पादों के आयात को छूट दी गई है, वे भी इसी क्षेत्र से आते हैं। देश में हॉर्टिकल्चर उत्पादन अब खाद्यान्न उत्पादन से आगे निकल चुका है। ऐसे में केवल फसल उत्पादों को संरक्षण देने की बात करना पर्याप्त नहीं है।

सरकार ने बड़े पैमाने पर एफटीए किए हैं और चालू साल में ही चार समझौते हुए हैं। न्यूजीलैंड के साथ एफटीए में बेबी फूड और इंटरमीडियरी उत्पादों के आयात की छूट दी गई है, जो परोक्ष रूप से डेयरी उत्पादों के आयात का रास्ता खोलती है। देश के बेबी फूड बाजार पर पहले से ही बहुराष्ट्रीय कंपनियों का दबदबा है, और इस तरह की छूट से वह और बढ़ेगा। इससे साफ है कि ये एफटीए मुख्य रूप से उद्योग और सेवा क्षेत्र को ध्यान में रखकर किए गए हैं। संरक्षण के नाम पर कृषि क्षेत्र को इनमें आधा-अधूरा ही शामिल किया गया है। बदलते कृषि परिदृश्य के संदर्भ में इस नीति पर दोबारा विचार करने की जरूरत है।

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