एथेनॉल की आपूर्ति बढ़ने के बावजूद किसान और इंडस्ट्री के स्तर पर चुनौतियां बरकरार

ऊर्जा की मांग में वृद्धि संरचनात्मक तथा जीवनशैली से प्रेरित है और इससे बचा नहीं जा सकता। यही कारण है कि भारत के लिए बायोएनर्जी कोई विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता है। इसी वजह से कृषि की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

एथेनॉल की आपूर्ति बढ़ने के बावजूद किसान और इंडस्ट्री के स्तर पर चुनौतियां बरकरार

भारत के ऊर्जा क्षेत्र में बदलाव एक कृषि-कथा बनता जा रहा है। इसलिए नहीं कि किसान अधिक ऊर्जा की खपत कर रहे हैं, बल्कि इसलिए कि कृषि से अब ऊर्जा उत्पादन में योगदान की अपेक्षा की जा रही है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) का अनुमान है कि अगले एक दशक में वैश्विक ऊर्जा मांग में होने वाली वृद्धि में सबसे बड़ा योगदान भारत का होगा। बढ़ती ऊर्जा जरूरतों पर इन दिनों हो रही चर्चा का बड़ा हिस्सा एआई और डेटा सेंटर पर केंद्रित है। लेकिन ऊर्जा की मांग में वृद्धि इससे कहीं व्यापक और संरचनात्मक है। बढ़ती आय, शहरीकरण, विद्युतीकरण और गर्म होती जलवायु, ये सभी घरेलू उपभोक्ताओं, परिवहन और उद्योगों में ऊर्जा की जरूरत बढ़ा रहे हैं। कूलिंग की मांग इसका एक उदाहरण है। वैश्विक स्तर पर एयर कंडीशनर की संख्या ही आज की लगभग 1.6 अरब यूनिट से बढ़कर 2050 तक करीब 5.6 अरब यूनिट (आईईए) होने की उम्मीद है। यानी अगले तीन दशकों तक हर सेकंड लगभग दस नए यूनिट जोड़े जाएंगे। हाल के इंडिया एनर्जी वीक 2026 में भी इसका उल्लेख किया गया।

ऊर्जा की मांग में वृद्धि संरचनात्मक तथा जीवनशैली से प्रेरित है और इससे बचा नहीं जा सकता। यही कारण है कि भारत के लिए बायोएनर्जी कोई विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता है। इसी वजह से कृषि की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

अनिवार्यताओं पर आधारित बायोफ्यूल परिकल्पना
पिछले एक दशक में भारत की ऊर्जा नीति ने ब्लेंडिंग की अनिवार्यताओं और विभिन्न क्षेत्रों के लिए तय लक्ष्यों के माध्यम से बायोफ्यूल की मांग को लगातार मजबूत किया है। पेट्रोल में एथेनॉल ब्लेंडिंग लगभग 20 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। डीजल के लिए बायोडीजल ब्लेंडिंग के लक्ष्य भी जारी हैं। सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क में कंप्रेस्ड बायोगैस (सीबीजी) के मिश्रण को अनिवार्य किया गया है। कोयला आधारित बिजली संयंत्रों में बायोमास को-फायरिंग की भी अनिवार्यता है। हाल ही अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल के लक्ष्य भी घोषित किए गए हैं। ये केवल पायलट योजनाएं नहीं हैं। ये परिवहन, बिजली और विमानन तीनों क्षेत्रों में बायोमास आधारित ईंधनों के लिए सुनिश्चित और नीति-प्रेरित मांग पैदा करती हैं।

जैव-ईंधन नीति में ‘बायोमास’
नीतिगत भाषा में जैव-ईंधन बायोमास पर निर्भर करता है। व्यवहार में इसमें फसल अवशेष, गोबर, पोल्ट्री कचरा, प्रेस-मड, बगास, नगरपालिका का जैविक कचरा, स्लॉटर हाउस का कचरा, उपयोग किए हुए खाद्य तेल, कृषि उद्योग के बायप्रोडक्ट तथा ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में उपलब्ध अन्य जैविक स्रोत शामिल हैं। हालांकि बायोमास में नगरपालिका और उद्योगों का जैविक कचरा भी आता है, लेकिन भारत की जैव ईंधन अनिवार्यताओं के लिए पैमाना, भौगोलिक फैलाव और निरंतर उपलब्धता की आवश्यकता के कारण कृषि आधारित बायोमास ही प्रमुख आधार है। कागज पर तो यह बायोमास प्रचुर मात्रा में उपलब्ध दिखाई देता है, लेकिन जमीनी स्तर पर यह बिखरा हुआ, मौसमी और नमी वाला होता है। इसके अलावा, यह पहले से ही ग्रामीण आजीविकाओं का अभिन्न हिस्सा बना हुआ है।

एथेनॉल से सबक
एथेनॉल मिश्रण का स्तर तेजी से बढ़ा है (चित्र 1) और देश के कई हिस्सों में अब यह 20 प्रतिशत से भी अधिक हो गया है। एथेनॉल सप्लाई वर्ष 2018-19 में ईंधन मिश्रण के लिए तेल विपणन कंपनियों को 1.9 अरब लीटर बायो-एथेनॉल की आपूर्ति हुई थी, वहीं 2024-25 में यह बढ़कर 10 अरब लीटर हो गई। वर्ष 2024-25 में तेल कंपनियों को प्राप्त कुल एथेनॉल का 68 प्रतिशत हिस्सा अनाज-आधारित एथेनॉल से आया, जिसमें मक्का और चावल से क्रमशः 4.8 अरब लीटर और 2.1 अरब लीटर की आपूर्ति हुई। चीनी क्षेत्र की हिस्सेदारी 32 प्रतिशत रही। वर्ष 2024-25 में ईंधन में एथेनॉल के लिए लगभग 126 लाख मीट्रिक टन मक्का और 48 लाख टन चावल का इस्तेमाल हुआ।

हालांकि एथेनॉल की आपूर्ति की जा रही है, लेकिन ब्लेंडिंग मिश्रण से जुड़ी प्रणालियों पर स्पष्ट रूप से दबाव है। डिस्टिलरी इकाइयों को फसल चक्र से जुड़ी मौसमी कच्चे माल की कमी का सामना करना पड़ रहा है। तेल कंपनियां अधिक ब्लेंडिंग के लिए भंडारण और वितरण से जुड़ी चुनौतियों से अब भी जूझ रही हैं। वाहनों के ‘ई-20’ की ओर बढ़ने के कारण इंजन के घिसाव, रखरखाव और ईंधन दक्षता को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं।

चार संरचनात्मक चुनौतियां
1.  एग्रीगेशन और लॉजिस्टिक्स: बायोमास लाखों खेतों, पशुशालाओं, मिलों और नगरपालिका यार्डों में बिखरा पड़ा होता है। इसे इकट्ठा करने, सुखाने, भंडारण करने और परिवहन करने के लिए ऐसे स्थानीय ढांचे की जरूरत है जो फिलहाल लगभग मौजूद ही नहीं है। प्रसंस्करण से पहले की व्यवस्था और एग्रीगेशन सिस्टम के बिना जैव-ईंधन संयंत्रों को साल भर भरोसेमंद आपूर्ति सुनिश्चित करना मुश्किल और महंगा होता है।

2. खाद्य-ईंधन-चारा पर बहस: सरप्लस बायोमास का बड़ा हिस्सा पहले ही कई तरह के उपयोग में है- फसल अवशेष का चारे और पशुओं की बेडिंग के रूप में, गोबर का खाद और रसोई में ईंधन के तौर पर, तथा फसल सामग्री का मिट्टी के पोषण और छप्पर बनाने में। जब मक्का, धान और गन्ना जैसी फसलों का इस्तेमाल सीधे एथेनॉल बनाने में होता है, तो मुद्दा केवल अवशेषों तक सीमित न रहकर भूमि, जल, चारा और खाद्य प्रणालियों तक फैल जाता है। हालिया आर्थिक सर्वेक्षण में ओईसीडी-एफएओ के विश्लेषण का हवाला देते हुए बताया गया है कि विभिन्न देशों में जैव-ईंधन की अनिवार्यता ने फसल क्षेत्रफल में ऐतिहासिक रूप से स्थायी बदलाव किए हैं, क्योंकि किसान मांग के अनुरूप प्रतिक्रिया देते हैं। भूमि के सावधानीपूर्वक उपयोग की योजना और बायोमास बाजार के उचित आकार निर्धारण के बिना, ऊर्जा नीति से मिलने वाले संकेत अनजाने में फसल पैटर्न को बदल सकते हैं।

3. जैव-ईंधनों के बीच फीडस्टॉक टकराव: जैव-ईंधन अब एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करने लगे हैं। एक ही प्रकार के अवशेषों को 2जी एथेनॉल, सीबीजी, पेलेट्स, को-फायरिंग और यहां तक कि सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल के लिए गिना जा रहा है। नगर निगम का कचरा और उपयोग किए गए तेलों को भी कई तरह के ईंधन के योग्य माना जा रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर फीडस्टॉक आवंटन की स्पष्ट नीति के अभाव में भारत कागजों पर ही बायोमास क्षमता का आकलन कर रहा है। इससे जमीनी स्तर पर अनुपयोगी जैव ईंधन एसेट खड़ा होने का जोखिम है।

4. एकीकृत बायोमास बाजार और गवर्नेंस ढांचे का अभाव: भारत में अभी तक बायोमास की गुणवत्ता के मानक, पारदर्शी मूल्य निर्धारण व्यवस्था, दीर्घकालिक अनुबंध या बायोमास की उपलब्धता का राष्ट्रीय स्तर का मैपिंग तंत्र मौजूद नहीं है। बायोमास बाजार स्थानीय और बिखरे हुए हैं। निवेशकों के लिए फीडस्टॉक से जुड़ा जोखिम ऊंचा है, जबकि किसानों के लिए बाजार तक पहुंच भी अनिश्चित है।

केंद्रीय बजट में क्या है प्रावधान
बजट इस असंतुलन को और मजबूत करता है। जैव ईंधन उत्पादन क्षमता के लिए समर्थन जारी है, जिसमें 2जी एथेनॉल के लिए अधिक आवंटन और बायोगैस मिश्रित ईंधनों के लिए प्रोत्साहन शामिल हैं। बायोगैस मिश्रित सीएनजी पर उत्पाद शुल्क में कटौती जैसे उपाय बायोगैस संयंत्रों की व्यवहार्यता सुधारने की दिशा में एक स्वागत योग्य कदम हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत सरकार ने बायोमास के संग्रह के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करने की एक योजना के तहत पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय को लगभग 150 करोड़ रुपये आवंटित किए थे, लेकिन 2026-27 में यह आवंटन घटाकर 100 करोड़ रुपये कर दिया गया है। संयंत्रों को जिस गति से वित्त पोषण मिल रहा है, उस तुलना में बायोमास सिस्टम का निर्माण धीमी गति से हो रहा है। यह असंतुलन मामूली नहीं, बल्कि मूलभूत और केंद्रीय समस्या है।

भारत के जैव-ईंधन का भविष्य खेत तय करेंगे
जैव-ईंधन भारत को किसानों की आय को स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन से जोड़ने का, जीवाश्म ईंधन आयात पर निर्भरता घटाने का और जलवायु प्रतिबद्धताओं को एक साथ पूरा करने का दुर्लभ अवसर देते हैं। लेकिन केवल अधिक रिफाइनरियां बनाने से यह संभावना साकार नहीं होगी। इसके लिए ग्रामीण स्तर पर एग्रीगेशन के लिए विशेष उद्यमों का गठन, भंडारण प्रणाली, बायोमास के लिए मूल्य निर्धारण तंत्र और विभिन्न ईंधन स्रोतों के बीच स्पष्ट प्राथमिकताओं की आवश्यकता है। भारत के जैव-ईंधन का भविष्य सिर्फ संयंत्रों में नहीं, बल्कि खेतों में भी तय होगा। 

(श्वेता सैनी कृषि अर्थशास्त्री और आर्कस पॉलिसी रिसर्च की संस्थापक एवं सीईओ हैं। पुलकित खत्री कृषि अर्थशास्त्री और आर्कस पॉलिसी रिसर्च में लीड कैपेसिटीज हैं)

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