बजट 2026-27 में किसानों के लिए कुछ नहीं बदला
किसानों की आय बढ़ाने की कोई स्पष्ट रणनीति के अभाव से लेकर बजट में कई चूक, आरएंडडी फंड में कमी सबसे निराशाजनक।
इस वर्ष के बजट से किसानों की क्या अपेक्षाएं थीं? इसका उत्तर इस बात पर निर्भर करता है कि आप किससे पूछ रहे हैं। उद्योग संगठनों के विपरीत, किसानों के पास कोई एकीकृत ‘व्यावसायिक’ संगठन नहीं है जो बजट से पहले या बाद में सरकार और मीडिया के साथ प्रभावी संवाद कर सके। कुछ आवाजें जरूर हैं, लेकिन इतनी प्रभावशाली नहीं कि किसानों के पक्ष में नीतिगत दिशा बदल सकें। इसलिए यह निश्चित रूप से कहना कठिन है कि किसानों की अपेक्षाएं क्या थीं और निराशा कहां हुई। संभव है कि किसानों ने उम्मीद की हो, या कहना अधिक उपयुक्त होगा कि उन्होंने ‘दुआ की’ हो, कि बजट में ऐसा कुछ होगा जो उनकी आय बढ़ाए और उनके जोखिम को कम करे। अधिक सब्सिडी? बेहतर दाम? आसान और सुलभ व्यवस्था? इन सवालों पर खुद किसानों की राय भी एक जैसी नहीं है। लेकिन बजट में उन्हें इनमें से कुछ भी नहीं मिला- और यही उनकी निराशा का कारण हो सकता है। वास्तव में, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के बजट में ‘किसान कल्याण’ को लेकर कोई ठोस बात नजर नहीं आती।
यहां हम यथार्थ को परख सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय और घरेलू दोनों बाजार बदल रहे हैं, और सरकार जितना कर सकती है या जितना उसे करना चाहिए, उसकी भी एक सीमा है। यह अलग सवाल है कि सरकार ने वास्तव में उतना किया या नहीं जितना वह कर सकती थी! क्या अब समय आ गया है कि किसान घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों बाजारों में तकनीक, वित्त और बाजारों तक बिना रोक-टोक पहुंच की मांग करे और उससे जुड़े जोखिम भी स्वयं उठाए? क्या नई तकनीक, कुशल संस्थाओं और अधिक स्वतंत्रता की ओर बढ़ने का वक्त आ गया है? अगर ऐसा है, तो रणनीति और उसका नैरेटिव दोनों स्पष्ट होने चाहिए।
फिलहाल बजट और उसके आंकड़ों की बात करें। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय को बजटीय आवंटन में लगभग कोई बढ़ोतरी नहीं मिली है। इसके उलट, मत्स्य पालन, डेयरी और पशुपालन क्षेत्रों को उल्लेखनीय बढ़त मिली है। पशुपालन एवं डेयरी विभाग का बजट आवंटन 5,302.83 करोड़ से बढ़कर 6,153.46 करोड़ रुपये हो गया है, यानी लगभग 16 प्रतिशत की वृद्धि है। वहीं मत्स्य विभाग का आवंटन 1,732.95 करोड़ से बढ़कर 2,761.80 करोड़ हो गया है, जो 59 प्रतिशत की बढ़ी बढ़ोतरी है। दोनों ही पूरी तरह जायज हैं। सहकारिता क्षेत्र को भी बड़ा प्रोत्साहन मिला है, जिसका अधिकांश हिस्सा एनसीईएल (राष्ट्रीय स्तर की शीर्ष निर्यात सहकारी संस्था) को गया है। एनसीईएल क्या करेगा (उम्मीद है निर्यात अवसंरचना के लिए) यह अभी स्पष्ट नहीं है। यह किसानों तक ‘समृद्धि’ कैसे पहुंचाएगा, यह भी फिलहाल अज्ञात है। इसलिए अभी इंतजार करें और देखें।
वास्तविक निराशा अनुसंधान एवं विकास के लिए आवंटन में कटौती को लेकर है। कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (डेयर/आईसीएआर) का आवंटन 2025-26 के संशोधित अनुमान 10,280.83 करोड़ रुपये से घटकर 2026-27 के बजट अनुमान में 9,967.40 करोड़ रह गया है। यानी 313.43 करोड़ या लगभग 3 प्रतिशत की कमी। मुझे आरएंडडी बजट में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की उम्मीद थी, इसके कई कारण थे: 1) कृषि क्षेत्र में आरएंडडी में किया गया कोई भी निवेश सबसे अधिक प्रतिफल देता है। 2) आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए कृषि एवं सहयोगी क्षेत्रों में गहन शोध प्रयास आवश्यक हैं। 3) जलवायु अनुकूलन और टिकाऊ कृषि के लिए कहीं अधिक विकेंद्रीकृत और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप अनुसंधान की जरूरत है। इन सभी चुनौतियों की अनदेखी का खामियाजा लंबे समय में भारी कीमत चुकाकर भुगतना पड़ सकता है।
उर्वरक सब्सिडी (1,70,781 करोड़) और खाद्य सब्सिडी (2,27,629 करोड़), ये दोनों प्रमुख सब्सिडी यथावत रखी गई हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि संशोधित अनुमान में इन दोनों में बढ़ोतरी की जाएगी। लेकिन इतने ऊंचे उर्वरक सब्सिडी बोझ के कारण प्राकृतिक खेती के लिए मात्र 750 करोड़ का प्रावधान किया गया है।
मनरेगा के विवादास्पद विकल्प वीबी जी राम जी के लिए 95,692 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। लेकिन इसमें एक बड़ी शर्त जुड़ी है। यह राशि कुल प्रावधान का केवल 60% है; शेष 40%, यानी लगभग 60,000 करोड़ रुपये, राज्यों को स्वयं जुटाने होंगे। ऐसे में संभावना है कि यह योजना चालू वित्त वर्ष में अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाएगी। वर्ष के अंत में जब वास्तविक खर्च के आंकड़े सामने आएंगे, तब इसमें गिरावट साफ दिखाई देगी।
अब कृषि और सहयोगी क्षेत्रों के लिए की गई प्रमुख घोषणाओं पर एक त्वरित नजर डालते हैं।
मत्स्य पालन: (i) 500 जलाशयों और अमृत सरोवरों का एकीकृत विकास, (ii) तटीय क्षेत्रों में फिशरीज वैल्यू चेन को सशक्त करना तथा स्टार्टअप और महिला नेतृत्व वाले समूहों को मत्स्य किसान उत्पादक संगठनों के साथ जोड़ते हुए बाजार से जुड़ाव सक्षम करना।
पशुपालन: उद्यमिता विकास के लिए (क) क्रेडिट-लिंक्ड सब्सिडी कार्यक्रम, (ख) पशुधन उद्यमों का विस्तार और आधुनिकीकरण, (ग) पशुधन, डेयरी और पोल्ट्री पर केंद्रित एकीकृत मूल्य शृंखला के सृजन को बढ़ावा, तथा (घ) पशुधन किसान उत्पादक संगठनों के गठन को प्रोत्साहन।
उच्च मूल्य कृषि: तटीय क्षेत्रों में नारियल, चंदन, कोको और काजू जैसी उच्च मूल्य वाली फसलों को समर्थन, जिसमें प्रमुख नारियल उत्पादक राज्यों में पुराने और गैर-उत्पादक पेड़ों की जगह नई उन्नत किस्म के पौधे लगाना शामिल है।
कच्चे काजू और कोको के उत्पादन व प्रसंस्करण में भारत को आत्मनिर्भर बनाने, निर्यात प्रतिस्पर्धा बढ़ाने तथा भारतीय काजू और भारतीय कोको को वर्ष 2030 तक प्रीमियम वैश्विक ब्रांड के रूप में स्थापित करने के लिए एक समर्पित कार्यक्रम प्रस्तावित किया गया है। भारतीय चंदन पारिस्थितिकी तंत्र की खोई हुई प्रतिष्ठा बहाल करने के लिए लक्षित खेती और कटाई-पश्चात प्रसंस्करण को बढ़ावा दिया जाएगा।
भारत-विस्तार की शुरुआतः यह एक बहुभाषी एआई टूल होगा, जो एग्रीस्टैक पोर्टल और आईसीएआर कृषि पद्धतियों से जुड़े पैकेज को एआई प्रणालियों के साथ एकीकृत करेगा। इससे कृषि उत्पादकता बढ़ेगी, किसानों को बेहतर निर्णय लेने में मदद मिलेगी और अनुकूलित सलाह सेवाओं के माध्यम से जोखिम में कमी आएगी।
इनमें से भारत विस्तार एक गेम-चेंजर के रूप में उभर सकता है। यदि कृषि से जुड़ी प्रमुख सलाह सेवाओं, जैसे मौसम, मृदा में नमी, मृदा में पोषक तत्वों की स्थिति, कीट प्रकोप और बाजार परिस्थितियों के साथ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का एकीकरण किया जाए, तो यह किसानों को अमूल्य सहयोग प्रदान कर सकता है। हालांकि, इसकी रूपरेखा स्थानीय फसलों, मौसम और मृदा स्थितियों के अनुरूप होना अनिवार्य है। ‘वन-साइज-फिट्स-ऑल’ मॉडल अपनाने में खतरा निहित है। इसके लिए निरंतर डेटा अपग्रेड और बदलती जरूरतों व उभरती चुनौतियों के अनुरूप एक बेहतर, आईसीएआर-प्रेरित टेक्नोलॉजी एवं एडवाइजरी प्रणाली की आवश्यकता होगी।
तटीय क्षेत्रों में नारियल, काजू, कोको और चंदन के लिए की गई घोषणाएं मुख्यतः केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे दक्षिणी राज्यों को लक्षित प्रतीत होती हैं। नारियल के लिए एक केंद्रीय नारियल बोर्ड पहले से मौजूद है, जिसने अतीत में इसी तरह की योजनाएं चलाई हैं, लेकिन उन्हें बहुत अधिक सफलता नहीं मिली। नई योजना किस तरह से तैयार की जाती है, यही निर्णायक होगा। चूंकि इसका विस्तृत विवरण उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए इस पर टिप्पणी करना कठिन है। हालांकि, यह कहना आवश्यक है कि पुनरुद्धार और पुनःरोपण की योजनाएं नई नहीं हैं। विभिन्न फसलों में इन्हें अलग-अलग स्तर की सफलता के साथ आजमाया जा चुका है।
कच्चे काजू में आत्मनिर्भरता एक दीर्घकालिक लक्ष्य है। काजू के बागानों का पुनरुद्धार, नई किस्मों के साथ पुनःरोपण, पौधशालाओं और रोपण सामग्री की व्यवस्था के लिए एक समेकित परियोजना की आवश्यकता है। चूंकि किसान उपजाऊ भूमि पर काजू लगाना आकर्षक नहीं मानते, इसलिए आंशिक रूप से खराब भूमि पर बड़े पैमाने के बागानों की ओर ध्यान देना होगा। काजू को प्लांटेशन फसल घोषित करना और भूमि सीमा कानूनों के तहत छूट देना काजू उत्पादन में आवश्यक निवेश ला सकता है। प्रसंस्करण की गुणवत्ता और दक्षता में सुधार कर निर्यात प्रतिस्पर्धा बढ़ाने का विचार सही है। हालांकि, इसके लिए प्रौद्योगिकी, बाहरी बाजारों में गुणवत्ता मानकों की स्पष्ट समझ जरूरी है और नीति का फोकस चुनिंदा ‘एक्सपोर्ट लीडर्स’ पर होना चाहिए, न कि इसे ‘सभी के लिए सब्सिडी’ वाली व्यवस्था बना दिया जाए।
कोको का मामला अधिक जटिल है। कोको बीन्स की अंतर्निहित गुणवत्ता से लेकर उसके प्री-प्रोसेसिंग और अंततः घटक के रूप में उपयोग होने वाले अंतिम उत्पाद तक, प्रभावी परिणामों के लिए कई उपाय करने की आवश्यकता होगी। पिछले तीन दशकों में किए गए प्रयोगों की गलतियां इस दिशा में महत्वपूर्ण संकेत दे सकती हैं। आदर्श रूप से, अनुसंधान एवं विकास, उत्पादन, प्रसंस्करण और बाजार, इन सभी को मिशन मोड में एक साथ जोड़ा जाना चाहिए था।
पशुपालन और मत्स्य क्षेत्र पर दिया गया जोर काफी समय से अपेक्षित था। ये दोनों क्षेत्र तेजी से बढ़ रहे हैं और इन्हें अधिक स्तर के समर्थन की आवश्यकता है। पशु प्रोटीन की मांग लगातार बढ़ रही है और ये क्षेत्र कृषि एवं सहयोगी क्षेत्रों की वृद्धि को तेज कर सकते हैं। अंतर्देशीय मत्स्य पालन के लिए जल निकायों में निवेश, यदि पर्याप्त अनुसंधान एवं विकास तथा बुनियादी ढांचा समर्थन के साथ किया जाए, तो इस क्षेत्र को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकता है।
फसल क्षेत्र की तुलना में डेयरी और पोल्ट्री क्षेत्रों की वृद्धि दर अधिक रही है। पूरे देश में पोल्ट्री के लिए एकीकृत वैल्यू चेन की जरूरत है, जिन्हें निजी क्षेत्र द्वारा अपेक्षाकृत आसानी से स्थापित किया जा सकता है। भारत के बड़े हिस्से में डेयरी वैल्यू चेन सहकारी क्षेत्र में पहले से मौजूद हैं। सवाल यह है कि क्या उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में, जहां सहकारी संस्थाएं कमजोर हैं, उन्हें मजबूत किया जाएगा, या फिर यह कार्यक्रम डेयरी वैल्यू चेन में अधिक निजी निवेश लाने का माध्यम बनेगा? हालांकि डेयरी क्षेत्र निजी निवेश के लिए काफी आकर्षक बन चुका है, लेकिन सहकारी संस्थाएं विकास के लिहाज से कहीं अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसलिए इस कार्यक्रम को लागू करते समय सामाजिक उद्देश्यों और शुद्ध मुनाफे के लक्ष्यों के बीच स्पष्ट अंतर करना जरूरी है।
क्या कमी रह गई?
किसानों की आय बढ़ाने के लिए कोई स्पष्ट रणनीति नहीं, टिकाऊ खेती के लिए कोई ठोस रोडमैप नहीं, जलवायु और बाजार-जनित जोखिमों से कृषि को सुरक्षित करने की कोई स्पष्ट योजना नहीं, और प्राकृतिक व जैविक खेती पर वास्तविक अर्थों में जोर, ये इस बजट की बड़ी चूक हैं। सबसे निराशाजनक पहलू कृषि अनुसंधान एवं विकास के लिए आवंटन में कमी, टिकाऊ खेती के लिए बेहद कम प्रावधान और गवर्नेंस में सुधार के लिए किसी नए विचार का अभाव है।
मेरा मानना है कि वित्त मंत्री इससे कहीं अधिक कर सकती थीं। हमेशा की तरह किसान बेहतर दिनों की उम्मीद करेंगे और उत्पादन जारी रखेंगे ताकि उपभोक्ताओं को भोजन मिलता रहे। लेकिन क्या हमें इसी से संतुष्ट हो जाना चाहिए? सवाल अब भी कायम है।
(लेखक भारत सरकार में कृषि मंत्रालय और खाद्य मंत्रालय के पूर्व सचिव हैं)

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