बजट 2026: कृषि के बेहतर भविष्य के लिए तात्कालिक राहत और दीर्घकालिक सुधारों का संतुलित समावेश जरूरी

केंद्रीय बजट 2026-27 कृषि क्षेत्र की तात्कालिक चुनौतियों को हल करने के लिए आत्मनिर्भरता, जलवायु अनुकूलता और निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ावा देने एक महत्वपूर्ण अवसर है। भारतीय कृषि के बेहतर भविष्य के लिए बजट को तात्कालिक राहत और दीर्घकालिक सुधारों के संतुलित मिश्रण के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

बजट 2026: कृषि के बेहतर भविष्य के लिए तात्कालिक राहत और दीर्घकालिक सुधारों का संतुलित समावेश जरूरी
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वित्त वर्ष 2026-27 के केंद्रीय बजट से भारत के कृषि और संबद्ध क्षेत्रों की अपेक्षाएं बहुत अधिक हैं। कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग 16 प्रतिशत हिस्सा है और लगभग 46 प्रतिशत कार्यशील आबादी को रोजगार देता है। जलवायु परिवर्तन, किसानों की स्थिर आय, वस्तुओं की कीमतों में उतार-चढ़ाव, खाद्य तेलों, दालों और उर्वरकों के लिए आयात पर निर्भरता, बढ़ती इनपुट लागत और किसानों पर कर्ज जैसी चुनौतियों के समाधान के लिए केंद्रित और इनोवेटिव बजट उपायों की आवश्यकता है। एक दूरदर्शी और समावेशी बजट भारतीय कृषि को अधिक टिकाऊ, प्रतिस्पर्धी और निर्यात-उन्मुख बनाने में मदद कर सकता है।

महत्वपूर्ण उपाय

पहला, कृषि अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) में निवेश को लंबे समय से नजरअंदाज किया गया है। भारत वर्तमान में कृषि जीडीपी का केवल 0.4 प्रतिशत आरएंडडी पर खर्च करता है, जो वैश्विक औसत एक प्रतिशत से काफी कम है और चीन तथा ब्राजील जैसे देशों से भी पीछे है। बजट में कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) के लिए फंडिंग को दोगुना करने का लक्ष्य होना चाहिए। जलवायु-सहनशील और बायो-फोर्टिफाइड फसल किस्मों का विकास, दालों और तिलहनों का उत्पादन बढ़ाना, कृषि निर्यात को प्रोत्साहित करना, कीट एवं रोग प्रतिरोधी बीज विकसित करना, पोषक तत्व प्रबंधन तथा कम इनपुट वाली टिकाऊ खेती को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। लक्षित कर प्रोत्साहन और सह-वित्तपोषण (को-फंडिंग) निजी क्षेत्र के आरएंडडी निवेश को बढ़ावा दे सकते हैं, जिससे नवाचार और व्यावसायीकरण में तेजी आएगी। भारतीय कृषि की आत्मनिर्भरता विज्ञान से शुरू होती है, इसलिए “विज्ञान-नेतृत्व वाली आत्मनिर्भरता” को लक्ष्य बनाया जाना चाहिए।

दूसरा, कृषि उत्पादकता बढ़ाने और फसल कटाई के बाद नुकसान को कम करने के लिए कृषि अवसंरचना अत्यंत महत्वपूर्ण है। फसल कटाई के बाद का नुकसान, खासकर जल्द खराब होने वाली उपजों में, सालाना कुल कृषि उत्पादन का लगभग 18–20 प्रतिशत है। वित्त वर्ष 2025-26 में सरकार ने कृषि और संबद्ध क्षेत्रों के लिए लगभग 1.52 लाख करोड़ रुपये का आवंटन किया। यह एक बड़ी राशि है, लेकिन ग्रामीण भंडारण, कोल्ड चेन, पैकिंग हाउस, ग्रेडिंग इकाइयों और निचले स्तर पर लॉजिस्टिक्स की कमियों के कारण यह पर्याप्त नहीं है। शोध से पता चलता है कि आधुनिक वेयरहाउसिंग, एकीकृत कोल्ड चेन और डिजिटल मार्केट प्लेटफॉर्म में निवेश से बर्बादी कम की जा सकती है, कीमतों में स्थिरता लाई जा सकती है, निर्यात बढ़ाया जा सकता है और किसानों की आय में वृद्धि हो सकती है। विशेषकर फल, सब्जी, मसाले और मत्स्य क्षेत्र में।

तीसरा, जलवायु परिवर्तन भारतीय कृषि के लिए एक बड़ा खतरा बन चुका है। शुद्ध बोए गए क्षेत्र के 60 प्रतिशत से अधिक हिस्से में चरम मौसम की घटनाओं का जोखिम बढ़ रहा है, जिससे जलवायु जोखिम सहने की क्षमता पैदा करना जरूरी हो गया है। पंजाब और हरियाणा में पानी की अधिक खपत वाली धान और गेहूं की फसलों पर लंबे समय तक निर्भरता के कारण 75 प्रतिशत से अधिक भूजल ब्लॉक अति-शोषित या गंभीर स्थिति में पहुंच गए हैं। मिट्टी का क्षरण हुआ है और फसल अवशेष जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ गया है। 2026-27 के बजट में फसल विविधीकरण, प्राकृतिक और जैविक खेती, प्रिसीजन कृषि और जलवायु-स्मार्ट प्रथाओं को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। वर्षा सिंचित क्षेत्रों में पीएमकेएसवाई (PMKSY) का विस्तार और सौर सिंचाई के लिए पीएम-कुसुम (PM-KUSUM) के तहत मजबूत प्रोत्साहन से जल उपयोग दक्षता बढ़ेगी, ऊर्जा लागत घटेगी और जलवायु के जोखिम से निपटने में मदद मिल सकती है।  

चौथा, पशुधन, मत्स्य पालन और बागवानी जैसे संबद्ध क्षेत्र आय विविधीकरण में अहम भूमिका निभाते हैं, विशेषकर छोटे और सीमांत किसानों के लिए, जो कुल किसान परिवारों का लगभग 85 प्रतिशत हैं। पशुधन कृषि सकल मूल्य वर्धन (GVA) का लगभग 28 प्रतिशत योगदान करता है और 7 करोड़ से अधिक ग्रामीण रोजगार उपलब्ध कराता है। इसके बावजूद यह पशु चिकित्सा सेवाओं, गुणवत्तापूर्ण चारे, ऋण और प्रसंस्करण सुविधाओं की कमी से जूझ रहा है। वित्त वर्ष 2025-26 में एएचआईडीएफ (AHIDF) के तहत 14,413.88 करोड़ रुपये की फंडिंग को डेयरी, मांस और मूल्य-वर्धित व्यवसायों के लिए बढ़ाया जाना चाहिए। मत्स्य पालन लगभग 2.8 करोड़ लोगों को रोजगार देता है, लेकिन इसमें कटाई के बाद 20–25 प्रतिशत नुकसान होता है, जिससे पीएमएमएसवाई (PMMSY) के तहत अधिक आवंटन की आवश्यकता है। बागवानी कृषि उत्पादन में एक तिहाई से अधिक योगदान देती है, लेकिन कोल्ड स्टोरेज कवरेज 10 प्रतिशत से भी कम है, जिससे इसकी निर्यात क्षमता सीमित रहती है। इसलिए नुकसान कम करने, निर्यात बढ़ाने और आय में स्थिरता लाने के लिए लक्षित निवेश की आवश्यकता है।

पांचवां, छोटी जोत (औसतन 1.08 हेक्टेयर) वाले क्षेत्रों में उत्पादकता, बाजार दक्षता और आय वृद्धि के लिए डिजिटल कृषि महत्वपूर्ण है। वर्ष 2027 तक 10,000 एफपीओ (FPOs) के गठन की सरकारी योजना को मजबूत डिजिटल अवसंरचना, कार्यशील पूंजी तक पहुंच और बाजार एकीकरण के माध्यम से समर्थन देने की जरूरत है। ई-नाम (e-NAM) 23 राज्यों में 1,522 से अधिक मंडियों को जोड़ता है और इसके माध्यम से 3 लाख करोड़ रुपये से अधिक का व्यापार होता है। इसे अंतर-राज्यीय व्यापार और पारदर्शी मूल्य निर्धारण के लिए और सुदृढ़ किया जाना चाहिए। एआई आधारित सलाह, ब्लॉकचेन ट्रेसेबिलिटी और डिजिटल फसल बीमा लेनदेन लागत कम कर सकते हैं, निर्यात अनुपालन बढ़ा सकते हैं और किसानों का विश्वास मजबूत कर सकते हैं।

छठा, सस्ते औपचारिक ऋण तक सीमित पहुंच एक गंभीर समस्या बनी हुई है। लगभग 85 प्रतिशत किसान अनौपचारिक साहूकारों पर निर्भर हैं, जो 24–60 प्रतिशत तक ब्याज लेते हैं। किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) योजना लगभग 10 करोड़ किसानों को कवर करती है, लेकिन यह केवल 71 प्रतिशत परिचालन जोत तक ही पहुंच पाई है। कई किरायेदार किसान और संबद्ध गतिविधियां अभी भी इससे बाहर हैं। वित्त वर्ष 2025-26 के लिए 32.50 लाख करोड़ रुपये का कृषि ऋण लक्ष्य, जिसमें पशुपालन, डेयरी और मत्स्य पालन के लिए 5 लाख करोड़ रुपये शामिल हैं, एक सकारात्मक कदम है। हालांकि ऋण विस्तार के साथ जोखिम प्रबंधन को भी मजबूत करना होगा। पीएमएफबीवाई (PMFBY) वर्तमान में केवल 30–35 प्रतिशत फसली क्षेत्र को कवर करती है। दावा निपटान में तेजी, गैर-ऋणी किसानों को शामिल करना और तकनीक आधारित नुकसान आकलन से इसमें सुधार किया जा सकता है।

सातवां, महिलाएं कृषि कार्यबल में 50 प्रतिशत से अधिक योगदान देती हैं, लेकिन भूमि, ऋण और तकनीक तक उनकी पहुंच सीमित है। कृषि भूमि का लगभग 33 प्रतिशत उनके नाम होने के बावजूद निर्णय लेने की शक्ति कम है। बजट प्राथमिकताओं में महिला-केंद्रित कौशल विकास, ऋण उत्पाद और भूमि अधिकार सुधार शामिल किए जाने चाहिए, जिससे खाद्य सुरक्षा और पोषण में उनकी भूमिका को मजबूती मिलेगी।

आठवां, वैश्विक कृषि व्यापार का आकार सालाना 1.91 लाख करोड़ (ट्रिलियन) डॉलर से अधिक है। इस व्यापार में भारत की हिस्सेदारी लगभग 2.2–2.4 प्रतिशत है और वह आठवें स्थान पर है। वर्ष 2024-25 में भारत का कृषि निर्यात 51.2 अरब डॉलर रहा, जिसमें वृद्धि की काफी गुंजाइश है। परीक्षण प्रयोगशालाओं को उन्नत करने, ट्रेसेबिलिटी प्रणालियों में सुधार और वैश्विक एसपीएस मानकों को पूरा करने के लिए 10,000 करोड़ रुपये का समर्पित निर्यात सुविधा कोष (EFF) बनाया जाना चाहिए। जैविक, जीआई-टैग वाले और मूल्य-वर्धित उत्पादों के लक्षित प्रचार तथा स्थिर व्यापार नीतियों से भारत की वैश्विक हिस्सेदारी बढ़ाई जा सकती है।

प्याज, गैर-बासमती चावल और गेहूं के निर्यात पर हालिया प्रतिबंधों से किसानों की आय को नुकसान हुआ और बाजार में अस्थिरता बढ़ी। गैर-बासमती चावल का निर्यात 2023-24 में 6.36 अरब डॉलर से घटकर 2024-25 में 4.57 अरब डॉलर रह गया। इसी तरह प्याज पर निर्यात शुल्क और न्यूनतम निर्यात मूल्य (MEP) अप्रैल 2025 तक किसानों के लिए नुकसानदेह साबित हुए। इससे निपटने के लिए कृषि व्यापार, मूल्य निर्धारण और बाजार सुधारों पर एक सुसंगत और साक्ष्य-आधारित नीति की जरूरत है। जीएसटी परिषद की तर्ज पर एक वैधानिक कृषि विकास परिषद की तत्काल आवश्यकता है।

महत्वपूर्ण उपज और निर्यात प्रतिस्पर्धा

भारत कई आवश्यक वस्तुओं के आयात पर बहुत अधिक निर्भर है और खाद्य तेल की लगभग 60 प्रतिशत जरूरत (सालाना 20 अरब डॉलर से अधिक) आयात से पूरा करता है। साथ ही 20–30 लाख टन दालों का आयात करता है। राष्ट्रीय मिशन फॉर एडिबल ऑयल एवं ऑयल पाम (NMEO-OP) और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (दालें) को घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए अधिक फंडिंग की आवश्यकता है। वित्त वर्ष 2024-25 में उर्वरक सब्सिडी 1.75–1.95 लाख करोड़ रुपये से अधिक रही, जो आयात निर्भरता कम करने, संतुलित पोषक तत्व उपयोग, नैनो उर्वरकों और फॉस्फेटिक व पोटाश उर्वरकों के घरेलू उत्पादन की आवश्यकता को रेखांकित करती है। महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए दालों, तिलहनों और उर्वरकों पर केंद्रित एक विशेष मिशन आवश्यक है।

केंद्रीय बजट 2026-27 कृषि क्षेत्र की तात्कालिक चुनौतियों को हल करने के लिए आत्मनिर्भरता, जलवायु अनुकूलता और निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ावा देने एक महत्वपूर्ण अवसर है। भारतीय कृषि के बेहतर भविष्य के लिए बजट को तात्कालिक राहत और दीर्घकालिक सुधारों के संतुलित मिश्रण के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

(डॉ. नवीन पी सिंह कृषि लागत एवं मूल्य आयोग के पूर्व सदस्य हैं और वर्तमान में नई दिल्ली स्थित आईसीएआर-एनआईएपी में प्रधान वैज्ञानिक हैं। यहां व्यक्त विचार उनके व्यक्तिगत हैं।)

 

 

 

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