कृषि में बदलाव के लिए केवीके को नवाचार का गतिशील इंजन बनाने की जरूरत
कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके), जो कभी कृषि नवाचार का प्रमुख आधार थे, अब स्टाफ की कमी, कमजोर बुनियादी ढांचे और पुरानी कार्यप्रणालियों के कारण अपनी प्रासंगिकता खोते जा रहे हैं। कुछ केंद्र प्रभावी कार्य कर रहे हैं, लेकिन अधिकांश केंद्र किसानों की जरूरतों से पीछे चल रहे हैं। केवीके के सामने अब अप्रासंगिक होने का खतरा है।
1960 के दशक में भारत ने एक साहसिक प्रयोग की कल्पना की थी- ऐसी संस्थाओं की, जो कृषि विज्ञान को शोध प्रयोगशालाओं से निकालकर सीधे किसानों के हाथों तक पहुंचाएं। इन संस्थाओं को कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) कहा गया और इन्हें ग्रामीण भारत की जमीनी प्रयोगशालाओं के रूप में विकसित करने का उद्देश्य था। पहला केवीके 1970 के दशक में स्थापित हुआ था और आज देशभर में ऐसे लगभग 730 केंद्र कार्यरत हैं।
कागज पर यह एक उपलब्धि नजर आती है, लेकिन वास्तविकता में यह प्रणाली अपनी दिशा खोती हुई प्रतीत होती है। कभी ग्रामीण नवाचार के इंजन माने जाने वाले केवीके अब नौकरशाही ढांचे में सिमटने का जोखिम झेल रहे हैं। यदि इन्हें समय रहते पुनर्गठित नहीं किया गया, तो भारत की कृषि तकनीकी सहायता प्रणाली अतीत में ही अटकी रह जाएगी, जबकि किसान जलवायु परिवर्तन, बाजार की अस्थिरता और तकनीकी बदलाव जैसी अभूतपूर्व चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।
वादे जो धुंधले पड़ गए
केवीके (KVK) को स्पष्ट उद्देश्य के साथ स्थापित किया गया था:
• प्रयोगशालाओं से खेतों तक नवाचारों का हस्तांतरण।
• किसानों, ग्रामीण युवाओं और विस्तार (एक्सटेंशन) कर्मियों को व्यावहारिक कौशल का प्रशिक्षण।
• स्थानीय परिस्थितियों में तकनीक का परीक्षण।
• फ्रंटलाइन डेमोंस्ट्रेशन के माध्यम से आधुनिक तकनीक का प्रदर्शन।
इनका उद्देश्य भारत की कृषि विस्तार प्रणाली की तकनीकी रीढ़ बनना था, जो समन्वय तंत्र ATMA का पूरक हो। लेकिन दशकों बाद, अनेक केवीके अब केवल नियमित प्रशिक्षण केंद्र बनकर रह गए हैं। किसान सलाह के लिए अक्सर निजी इनपुट डीलरों या अनौपचारिक नेटवर्क पर निर्भर हो जाते हैं।
मूल डिजाइन में केवीके की समस्या-समाधान भूमिका का अभाव था। यह व्यवस्था मुख्यतः एकतरफा थी- प्रयोगशाला से खेत तक, न कि इसके विपरीत। यही कारण हो सकता है कि ये अपनी पूरी क्षमता के अनुरूप काम नहीं कर पा रहे हैं।
सफलता की प्रेरणादायक कहानियां
अनेक केवीके के नाम सफलता की मिसाल है। यहां कुछ उदाहरण हैं:
• बारामती, महाराष्ट्र: डेयरी किसान रमेश पाटिल कहते हैं, “साइलेज से पहले हर गर्मी में हमारा आधा चारा नष्ट हो जाता था। केवीके की मदद से अब हम चारे को संरक्षित करते हैं और दूध उत्पादन स्थिर रखने में कामयाब हुए हैं।”
• लातूर, महाराष्ट्र: महिला स्वयं सहायता समूह की सदस्य मीना बाई बताती हैं, “केवीके ने हमें कचरे को वर्मी-कम्पोस्ट में बदलना सिखाया, और अब हमें नियमित आय हो रही है।”
• जालना, महाराष्ट्र: किसान श्यामराव जाधव याद करते हैं, “पानी की कमी हमारी सबसे बड़ी समस्या थी। केवीके की जल संरक्षण तकनीकों ने हमारे खेतों और उम्मीद दोनों को फिर से जीवित कर दिया।”
• त्रिशूर और कोझिकोड, केरल: भूमिहीन किसान अनिल कुमार कहते हैं, “इन्क्यूबेशन सेंटर ने मुझे पट्टे की जमीन पर लाभकारी खेती करने के लिए कौशल और आत्मविश्वास दिया।”
• बीकानेर, राजस्थान: कमला देवी बताती हैं, “सूखा-रोधी फसलों ने हमारी पैदावार बचाई। केवीके के प्रशिक्षण ने हमें अधिक मजबूत बनाया।”
ये उदाहरण दिखाते हैं कि जब केवीके सक्रिय, नवाचारी और किसान-केंद्रित होते हैं, तो वे कृषि क्षेत्र में परिवर्तनकारी भूमिका निभा सकते हैं।
ऐसा नहीं कि सभी केवीके कम प्रदर्शन कर रहे हैं। कुछ ने यह दिखाया है कि जब विज्ञान वास्तव में व्यवहार में उतरता है, तो क्या संभव है:
• बारामती, महाराष्ट्र: केवीके बारामती ने साइलेज उत्पादन तकनीक की शुरुआत की, जिससे डेयरी किसानों को चारा संरक्षित करने और दूध उत्पादन को बनाए रखने में मदद मिली। इस नवाचार ने मौसमी चारे की कमी को कम किया और पशुधन उत्पादकता में बदलाव लाया। जो किसान पहले अनियमित चारा आपूर्ति से जूझते थे, वे अब नियमित आय का लाभ उठा रहे हैं।
• लातूर, महाराष्ट्र: बकरी पालन, यंत्रीकृत गन्ना कटाई और महिलाओं द्वारा संचालित वर्मी-कम्पोस्ट उद्यमों में केवीके के हस्तक्षेप ने ग्रामीण आजीविका को मजबूत किया है। केवीके के सहयोग से महिला स्वयं सहायता समूहों (SHGs) ने कचरे को संपत्ति में बदलकर स्थायी आय के स्रोत बनाए हैं।
• त्रिशूर और कोझिकोड, केरल: एकीकृत कृषि प्रदर्शन और भूमिहीन किसानों के लिए इन्क्यूबेशन केंद्रों ने दिखाया है कि केवीके कैसे स्थानीय जरूरतों के अनुसार तकनीक को अनुकूलित कर सकते हैं और हाशिए पर मौजूद समूहों को सशक्त बना सकते हैं। कोझिकोड के इन्क्यूबेशन केंद्र ने पट्टे की जमीन पर खेती करने वाले भूमिहीन किसानों को लाभप्रदता बढ़ाने में मदद की।
• बीकानेर: केवीके बीकानेर ने सूखा-रोधी फसल किस्में पेश कीं और किसानों को पानी के कम प्रयोग वाले सिंचाई तरीकों का प्रशिक्षण दिया। ऐसे राज्य में, जहां जल संकट एक स्थायी चुनौती है, इन हस्तक्षेपों ने खेती को अधिक लचीला बनाया है।
ये उदाहरण दिखाते हैं कि जब केवीके सक्रिय, नवोन्मेषी और किसान-केंद्रित होते हैं, तो उनमें परिवर्तनकारी क्षमता होती है।
कहानी का दूसरा पहलू
दुर्भाग्य से अनेक केवीके अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरते:
• राष्ट्रीय स्तर पर स्टाफ की कमी: एक संसदीय समिति ने केवीके में लगभग 30% पद रिक्त होने की बात कही है, जिससे उनके मुख्य कार्य प्रभावित हो रहे हैं। पर्याप्त वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों के बिना केवीके अपने दायित्वों को पूरा नहीं कर पा रहे हैं।
• बिहार (लखीसराय): केस स्टडी से पता चलता है कि यहां स्टाफ की कमी, आईसीएआर और गैर-आईसीएआर केवीके के बीच वेतन असमानता, तथा कर्मचारियों में कम मनोबल जैसी समस्याएं हैं। ये मुद्दे कार्यक्षमता और किसानों तक पहुंच को सीमित करते हैं। इन जिलों में किसान अक्सर अपने स्थानीय केवीके की बजाय निजी विक्रेताओं पर अधिक निर्भर रहते हैं।
• देशभर में अवसंरचना की कमी: 2024 की एक संसदीय समिति ने बढ़ती जलवायु चुनौतियों के बावजूद अपर्याप्त बुनियादी ढांचे की आलोचना की। कई केवीके किराए के भवनों में सीमित सुविधाओं के साथ संचालित हो रहे हैं, जिससे प्रदर्शन (डेमोंस्ट्रेशन) और प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने की उनकी क्षमता प्रभावित होती है।
• ATMA के साथ दोहराव: कई राज्यों में KVK और ATMA के बीच प्रशिक्षण और विस्तार कार्यों में ओवरलैप होता है, जिससे अक्षमता बढ़ती है। एक-दूसरे के पूरक बनने के बजाय, वे कभी-कभी एक ही क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा करते हैं, जिससे किसान भ्रमित होते हैं।
• डेयरी, पोल्ट्री और मत्स्य पालन पर अपर्याप्त ध्यान: केवीके अब भी फसलों पर केंद्रित हैं, जबकि आय और वृद्धि का बड़ा हिस्सा डेयरी, पोल्ट्री और मत्स्य पालन से आ रहा है।
इन कमियों का परिणाम यह है कि भारी फंडिंग, लगभग 1500 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष, के बावजूद अनेक केवीके किसानों की नजरों से दूर हैं।
सुधार क्यों जरूरी हैं
भारत की कृषि एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। जलवायु परिवर्तन वर्षा के पैटर्न को बदल रहा है, वैश्विक बाजार अस्थिर हैं, और नई तकनीकें दुनिया भर में खेती को बदल रही हैं। यदि केवीके 1970 के दशक के प्रदर्शन और कक्षा-आधारित प्रशिक्षण मॉडल तक सीमित रहते हैं, तो वे अप्रासंगिक हो जाएंगे।
किसानों को ऐसे संस्थानों की जरूरत है जो उन्हें खेतों की समस्याएं हल करने, जलवायु जोखिमों के अनुकूल बनने, बाजारों से जुड़ने और नवाचार अपनाने में मदद कर सकें।
पुनरुद्धार की रूपरेखा
तो फिर सुधार कैसा हो? यहां सात तात्कालिक सुधार बताए गए हैं:
1.प्रदर्शन-आधारित वित्तपोषण
बजट को मापनीय परिणामों से जोड़ा जाना चाहिए- जैसे जिले की समस्याओं का समाधान, किसानों की आय में वृद्धि और स्थिरता के संकेतक। प्रभावी कार्य के लिए केवीके को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
2. डिजिटल-प्रथम विस्तार
केवीके को ऐप, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और दूरस्थ सलाहकारी प्लेटफॉर्म अपनाने होंगे, ताकि उनकी विशेषज्ञता केवल भौतिक प्रशिक्षण तक सीमित न रहे। दूर-दराज के गांवों का किसान भी अपने स्मार्टफोन पर केवीके से जानकारी प्राप्त कर सके।
3. किसान-केंद्रित नवाचार
सामान्य प्रदर्शनों से हटकर स्थानीय समस्याओं के समाधान पर ध्यान देना होगा। जैसे जलवायु अनुकूलन, बाजार से जुड़ाव और प्रिसिजन खेती। हर KVK के पास जिले के अनुसार एक नवाचार एजेंडा होना चाहिए।
4. स्टार्टअप और FPO के साथ एकीकरण
प्रासंगिक बने रहने के लिए एग्री-टेक नवाचारकर्ताओं और किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) के साथ साझेदारी करें। केवीके को जमीनी स्तर के किसानों और अत्याधुनिक स्टार्टअप के बीच सेतु बनना चाहिए।
5. पारदर्शिता और दृश्यता
हर KVK को वार्षिक रिपोर्ट प्रकाशित करनी चाहिए, जो किसानों और नीति-निर्माताओं के लिए सुलभ हो। दृश्यता विश्वसनीयता बढ़ाती है और विश्वसनीयता भरोसा पैदा करती है।
6. एटीएमए-केवीके समन्वय की पुनर्संरचना
जिला स्तर पर केवीके द्वारा स्थापित किए जा रहे सतत विकास मॉडल को समर्थन देने के लिए ATMA प्लेटफॉर्म का पुनर्गठन आवश्यक है।
7. पारंपरिक ज्ञान को पुष्ट करना
केवीके को जिले में प्रचलित सभी पारंपरिक टिकाऊ कृषि पद्धतियों का दस्तावेजीकरण करना चाहिए और स्थिरता, कृषि आय और पोषण के दृष्टिकोण से उनकी पुष्टि करनी चाहिए।
केवीके को विज्ञान और किसानों के बीच सेतु के रूप में परिकल्पित किया गया था। लेकिन यदि वे खुद को पुनर्गठित नहीं करते, तो तेजी से बदलते कृषि परिदृश्य में उनके अप्रासंगिक होने का खतरा है। भारत अपने इस जमीनी तंत्र को नौकरशाही की बलि चढ़ने की अनुमति नहीं दे सकता। अब समय आ गया है कि केवीके में नई जान फूंकी जाए, उन्हें निष्क्रिय प्रशिक्षण केंद्रों से बदलकर कृषि नवाचार का गतिशील इंजन बनाया जाए। यदि भारत कृषि परिवर्तन को लेकर गंभीर है, तो उसे अपने इन ‘सोए हुए दिग्गजों’ को जगाना होगा। केवीके इतने महत्वपूर्ण हैं कि उन्हें पीछे नहीं छोड़ा जा सकता।
(लेखक भारत सरकार में कृषि एवं खाद्य के पूर्व सचिव हैं)

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