नया शुगरकेन कंट्रोल ऑर्डर: 25 किमी होगी चीनी मिलों की दूरी, खांडसारी इकाइयों पर सख्ती, FRP भुगतान अनिवार्य
केंद्र सरकार लगभग 60 साल बाद देश के चीनी उद्योग को नियंत्रित करने वाले कानून शुगरकेन (कंट्रोल) ऑर्डर, 1966 में बदलाव करने जा रही है।
केंद्र सरकार ने देश के चीनी क्षेत्र को नियंत्रित करने वाले प्रमुख कानून शुगरकेन (कंट्रोल) ऑर्डर, 1966 में संशोधन के लिए नया ड्राफ्ट जारी किया है। प्रस्तावित शुगरकेन (कंट्रोल) ऑर्डर, 2026 के तहत चीनी मिलों के बीच न्यूनतम दूरी 15 किलोमीटर से बढ़ाकर 25 किलोमीटर करने, खांडसारी इकाइयों को सख्त नियमन के दायरे में लाने और 14 दिनों के भीतर गन्ना भुगतान सुनिश्चित करने जैसे प्रावधान किए गए हैं।
उपभोक्ता मामलों, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने शुगरकेन (कंट्रोल) ऑर्डर, 2026 का ड्राफ्ट 20 अप्रैल को जारी किया है और राज्यों, उद्योग संगठनों तथा अन्य हितधारकों से 20 मई तक सुझाव मांगे हैं। यह कदम पिछले करीब 60 वर्षों से लागू व्यवस्था में व्यापक बदलाव का संकेत माना जा रहा है।
खांडसारी इकाइयों पर कड़ा नियंत्रण
ड्राफ्ट में पारंपरिक ‘खांडसारी’ इकाइयों के लिए लाइसेंस अनिवार्य करने और नियमित जांच-निरीक्षण का प्रावधान किया गया है। साथ ही, इन इकाइयों को भी गन्ना किसानों को तय फेयर एंड रिम्यूनरेटिव प्राइस (FRP) का भुगतान करना होगा।
चीनी मिलों को गन्ना जुटाने में हो रही दिक्कतों के पीछे गुड़ और खांडसारी इकाइयों द्वारा गन्ने की बढ़ती खरीद को भी एक बड़ी वजह माना जा रहा है। पिछले वर्ष सरकार ने शुगर कंट्रोल ऑर्डर में संशोधन कर 500 टीसीडी से अधिक क्षमता वाली खांडसारी इकाइयों को नियमन के दायरे में शामिल किया था।
किसानों के भुगतान पर सख्ती
ड्राफ्ट में यह प्रावधान भी बरकरार रखा गया है कि गन्ना खरीद के 14 दिनों के भीतर भुगतान न करने पर मिलों को बकाया राशि पर सालाना 14-15 प्रतिशत ब्याज देना होगा। हालांकि, व्यवहार में यह प्रावधान प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो पाया है और किसानों को इस ब्याज का लाभ नहीं मिल पाता।
इसके अलावा, यदि चीनी वर्ष के अंत तक किसानों का भुगतान नहीं किया जाता है, तो संबंधित मिल को तीन महीने के भीतर पूरी राशि जिला कलेक्टर के पास जमा करनी होगी। कलेक्टर इस राशि से किसानों के दावों का निपटान करेंगे और तीन वर्षों के भीतर यदि कोई राशि शेष रहती है, तो उसे राज्य की संचित निधि में जमा किया जाएगा। राज्यों को इस राशि का उपयोग गन्ना विकास कार्यों में करने की सलाह दी गई है।
नई मिलों के लिए 25 किमी दूरी
ड्राफ्ट में स्पष्ट किया गया है कि किसी भी नई चीनी मिल को मौजूदा मिल से 25 किलोमीटर के दायरे में स्थापित करने की अनुमति नहीं होगी। राज्य सरकारें केंद्र की पूर्व अनुमति से ही इस दूरी में बदलाव कर सकेंगी।
नई परियोजनाओं के लिए 2 करोड़ रुपये की बैंक गारंटी और पांच वर्षों के भीतर उत्पादन शुरू करने की शर्त भी रखी गई है।
एथेनॉल को प्रमुख उत्पाद का दर्जा
यह ड्राफ्ट देश के चीनी क्षेत्र में दशकों का सबसे बड़ा नियामक बदलाव माना जा रहा है। इसमें इथेनॉल को चीनी मिलों का एक प्रमुख उत्पाद मानते हुए स्पष्ट परिभाषा दी गई है। गन्ने के जूस, सिरप या मोलासेस से सीधे 600 लीटर इथेनॉल उत्पादन को 1 टन चीनी के बराबर माना जाएगा। इससे मिलों के उत्पादन और मूल्य निर्धारण के तरीके में बड़ा बदलाव आ सकता है। बगास, मोलासेस और प्रेस मड जैसे उप-उत्पादों को भी मूल्यांकन में शामिल किया जाएगा।
संशोधन का महत्व
शुगरकेन कंट्रोल ऑर्डर, 1966 में संशोधन को चीनी क्षेत्र की तकनीकी प्रगति, इथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम और गन्ना क्षेत्र की चुनौतियों के मद्देनज़र एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इसका गन्ना किसानों और चीनी मिलों दोनों पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा।
उद्योग और विशेषज्ञों का कहना है कि ड्राफ्ट के कई प्रावधान पिछले 60 वर्षों से लागू 1966 के आदेश में पहले से मौजूद हैं, जबकि कुछ नए बदलावों का विस्तृत अध्ययन आवश्यक है।
यूपी चुनाव और गन्ना राजनीति
यह ड्राफ्ट उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले लाया गया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गन्ना और चीनी अर्थव्यवस्था एक अहम राजनीतिक मुद्दा है। इस वर्ष प्रदेश की चीनी मिलों को करीब 63 लाख टन कम गन्ना आपूर्ति हुई है। ऐसे में शुगरकेन कंट्रोल ऑर्डर में प्रस्तावित बदलाव गन्ना अर्थव्यवस्था के लिए काफी महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। साथ ही, नया ड्राफ्ट चीनी उद्योग को आधुनिक तकनीकी बदलावों और एथेनॉल आधारित अर्थव्यवस्था के अनुरूप ढालने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

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