दुनिया के सबसे बड़े डेयरी आयातक चीन की अब निर्यात में चुनौती
दूध उत्पादन में चीन के तेज विस्तार ने उसे दुनिया के सबसे बड़े आयातक से सरप्लस उत्पादक और उभरते निर्यातक में बदल दिया है। चीन की घरेलू खपत में सुस्ती और आयात में गिरावट से वैश्विक डेयरी बाजार का स्वरूप बदल रहा है, प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, कीमतों पर दबाव बन रहा है और न्यूजीलैंड, यूरोपीय यूनियन तथा अमेरिका के निर्यातकों को अपनी दीर्घकालिक रणनीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
दशकों तक वैश्विक डेयरी बाजार एक सामान्य नियम पर चलते रहे। जब चीन अधिक खरीद करता था, तो दुनिया भर में डेयरी कीमतें बढ़ जाती थीं। दूध पाउडर का दुनिया का सबसे बड़ा आयातक होने के कारण चीन की मांग न्यूजीलैंड, यूरोपीय यूनियन, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के डेयरी किसानों की आय तय करती थी। चीन की खरीद में किसी भी तरह की सुस्ती तुरंत वैश्विक कीमतों को गिरा देती थी।
अब यह नियम टूटता नजर आ रहा है। चीन का डेयरी क्षेत्र एक गहरे संरचनात्मक बदलाव से गुजर रहा है। वह डेयरी आयातक से बदलकर अब सरप्लस उत्पादन से जूझ रहा है और निर्यात बाजारों की ओर तेजी से देख रहा है। इस बदलाव ने वैश्विक डेयरी व्यापार की दिशा बदली है, प्रतिस्पर्धा को तेज किया है और अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर दबाव बना रहा है।
आत्मनिर्भरता के लिए एक दशक की कोशिश
चीन के डेयरी क्षेत्र में आए बदलाव की जड़ें खाद्य आत्मनिर्भरता को लेकर की गई एक निरंतर और दीर्घकालिक नीतिगत पहल में हैं। महामारी के दौर में आपूर्ति शृंखला में आए व्यवधानों के बाद इस प्रयास को और तेज किया गया। इसके तहत बीजिंग ने बड़े पैमाने, तकनीक और औद्योगिकीकरण के जरिए घरेलू दूध उत्पादन के तेज विस्तार को बढ़ावा दिया।
धीरे-धीरे छोटे घरेलू डेयरी फार्मों की जगह बड़े औद्योगिक “मेगा-फार्म” लेते गए। उद्योग और सरकारी अनुमानों के अनुसार, अब चीन के कुल दूध उत्पादन का दो-तिहाई से अधिक हिस्सा इन्हीं औद्योगिक इकाइयों से आता है। ये फार्म अधिक उत्पादन देने वाली आयातित नस्लों, बेहतर जेनेटिक्स, दूध दुहने की स्वचालित मशीनों और केंद्रीकृत चारा प्रबंधन पर निर्भर हैं। इससे अधिकतम दक्षता हासिल करने में मदद मिली।
इसका नतीजा उत्पादन में तेज उछाल के रूप में सामने आया। 2023 में चीन का दूध उत्पादन लगभग 4.2 करोड़ टन तक पहुंच गया, जो सरकार के 4.1 करोड़ टन के लक्ष्य से दो साल पहले ही हासिल हो गया। नीति निर्माताओं के लिए यह आयात पर निर्भरता कम करने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि थी। (तुलनात्मक रूप से भारत का दूध उत्पादन 24.5 करोड़ टन से अधिक हो चुका है, हालांकि इसका अधिकांश हिस्सा घरेलू खपत में ही उपयोग होता है।)
मांग से अधिक हो गई आपूर्ति
चीन में दूध उत्पादन की वृद्धि ने खपत को काफी पीछे छोड़ दिया है। हाल के वर्षों में चीन में प्रति व्यक्ति डेयरी खपत में गिरावट आई है, जो 2021 में 14.4 किलोग्राम से घटकर 2022 में 12.4 किलोग्राम रह गई। यह सुस्ती कई संरचनात्मक कारणों को दर्शाती है- कमजोर होती अर्थव्यवस्था, घरेलू खर्च में सतर्कता, बदलती खानपान की आदतें और सबसे अहम, चीन की रिकॉर्ड स्तर पर कम जन्म दर, जिससे तरल दूध और शिशु पोषण उत्पादों की मांग घट गई है। आपूर्ति और मांग के बीच यह बढ़ता अंतर घरेलू बाजार में लगातार सरप्लस की स्थिति पैदा कर रहा है।
कच्चे दूध की कीमतें उत्पादन लागत से नीचे चली गई हैं और यह 3.8 युआन प्रति किलोग्राम से भी कम रही हैं। यह किसानों की लागत के बराबर है। घाटे में चल रहे डेयरी ऑपरेशन को पशुओं की संख्या घटाने, विस्तार टालने या पूरी तरह कारोबार बंद करने पर मजबूर होना पड़ा है। इसका सबसे ज्यादा असर छोटे किसानों पर पड़ा है, हालांकि बड़े कॉरपोरेट उत्पादकों ने भी कटौती की है।
घरेलू उत्पादन बढ़ा, आयात घटा
घरेलू स्तर पर दूध की उपलब्धता तेजी से बढ़ने के साथ ही चीन की आयातित डेयरी उत्पादों की मांग कमजोर पड़ी है। वर्ष 2023 में कुल डेयरी आयात में करीब 12 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जबकि होल मिल्क पाउडर का आयात - जो कभी चीन के डेयरी व्यापार की रीढ़ हुआ करता था - लगभग 38 प्रतिशत तक घट गया।
न्यूजीलैंड अब भी चीन का सबसे बड़ा डेयरी आपूर्तिकर्ता बना हुआ है, लेकिन वहां से होने वाली आपूर्ति में तेज गिरावट आई है। यूरोपीय यूनियन और ऑस्ट्रेलिया भी इसी तरह के दबाव का सामना कर रहे हैं। लंबे समय से चीनी मांग पर निर्भर रहे निर्यातकों के लिए इस गिरावट ने अपनी बाजार रणनीतियों पर पुनर्विचार को मजबूर कर दिया है।
चीन ने निर्यात बाजार में कदम रखा
चीन के डेयरी सरप्लस का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यह है कि यह अब मामूली रूप से ही सही, निर्यातक के रूप में उभर रहा है। हाल के वर्षों में चीनी डेयरी उत्पादों, विशेषकर दूध पाउडर, का निर्यात तेजी से बढ़ा और 2024 में लगभग 70,000 टन तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग एक-तिहाई अधिक है। इन शिपमेंट्स का लगभग आधा हिस्सा पाउडर दूध का है, और इसके गंतव्य हांगकांग, दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ्रीका, मध्य पूर्व और मध्य एशिया के देश हैं।
हालांकि चीन का निर्यात वॉल्यूम न्यूजीलैंड, यूरोपीय यूनियन और अमेरिका जैसे वैश्विक दिग्गजों की तुलना में छोटा है, लेकिन यह बदलाव प्रतीकात्मक और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। जो कभी दुनिया का सबसे बड़ा खरीदार था, अब वह विशेष रूप से उभरते बाजारों में प्रतिस्पर्धा कर रहा है। यिली और मेंगनियू जैसी प्रमुख चीनी डेयरी कंपनियां विदेशी बाजारों में विस्तार कर रही हैं, अपने पैमाने और प्रतिस्पर्धी कीमतों का लाभ उठाकर नए क्षेत्रों में पैठ बनाने की कोशिश कर रही हैं।
चीन की डेयरी में यह बदलाव वैश्विक बाजारों में हलचल पैदा कर रहा है। चीन से अतिरिक्त आपूर्ति वैश्विक दूध पाउडर की कीमतों पर और दबाव डाल रही है। दूसरे, एशिया, अफ्रीका और मध्य पूर्व जैसे उभरते बाजारों में प्रतिस्पर्धा तीव्र हो रही है। ये क्षेत्र कभी ओशिनिया, यूरोप और अमेरिका के निर्यातकों के लिए थे। चीन की भौगोलिक नजदीकी, कम लॉजिस्टिक लागत और आक्रामक मूल्य निर्धारण पारंपरिक आपूर्तिकर्ताओं के लिए नई चुनौतियां पेश कर रहे हैं।
फिर भी एक विरोधाभास बरकरार है। चीन के पास तरल दूध और दूध पाउडर का सरप्लस है, फिर भी वह अभी तक उच्च मूल्य वाले डेयरी उत्पादों - विशेष किस्म के चीज, मक्खन और प्रीमियम शिशु आहार फार्मूला - के लिए आयात पर निर्भर है। शहरी उपभोक्ता विदेशी ब्रांडों को गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रतिष्ठा से जोड़ते हैं, जिससे ये आयातित उत्पाद का सेगमेंट अपेक्षाकृत स्थिर बना है।
चीन का डेयरी क्षेत्र में बदलाव केवल उसके अपने किसानों के लिए नहीं, बल्कि वैश्विक डेयरी अर्थव्यवस्था के लिए भी एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो रहा है। यह बदलाव ऐसे समय में हो रहा है जब अमेरिका और यूरोपीय यूनियन भी दूध और अन्य कृषि उत्पादों के निर्यात को वैश्विक बाजारों में बढ़ाने के दबाव में हैं। घरेलू सरप्लस, बढ़ती लागत का दबाव और उपभोक्ता खपत में धीमी वृद्धि जैसी चुनौतियों का सामना करते हुए, अमेरिका और ईयू दोनों ने एशिया, अफ्रीका और मध्य पूर्व में बाजार पहुंच सुनिश्चित करने के लिए व्यापार समझौते और निर्यात प्रोत्साहन को तेज कर दिया है। इस परिदृश्य में चीन का एक निर्यातक के रूप में उभरना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। यह सीधे पश्चिमी उत्पादकों से प्रतिस्पर्धा कर रहा है। इससे निर्यात रणनीतियां जटिल होती जा रही हैं और वैश्विक कृषि व्यापार में कीमतों पर दबाव बढ़ रहा है।

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