ईरान-अमेरिका युद्ध की आंच में भारत की कृषि; उर्वरक उत्पादन से लेकर कृषि निर्यात तक प्रभावित

पश्चिम एशिया संकट से उर्वरक, ऊर्जा और निर्यात तीनों पर दबाव; बढ़ती लागत और आपूर्ति बाधाओं ने खेती और खाद्य सुरक्षा को जोखिम में डाला। आयात पर भारी निर्भरता से यूरिया उत्पादन प्रभावित हुआ है, आपूर्ति अटकी है और इनपुट लागत तेजी से बढ़ी है।

ईरान-अमेरिका युद्ध की आंच में भारत की कृषि; उर्वरक उत्पादन से लेकर कृषि निर्यात तक प्रभावित

अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच दो माह से भी ज्यादा समय से जारी तनाव ने भारत के कृषि और ऊर्जा क्षेत्र के लिए गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। कृषि में संकट का दायरा उर्वरक और कीटनाशक जैसे इनपुट के आयात से लेकर कृषि उत्पादों के निर्यात तक है। उर्वरक के तौर पर भारत में सबसे अधिक खपत यूरिया की होती है और 2024-25 में करीब 75 प्रतिशत यूरिया आयात पश्चिम एशियाई देशों से हुआ। युद्ध के कारण तैयार उर्वरक और इनके कच्चे माल, दोनों की आपूर्ति बाधित हुई है। आने वाले दिनों में उर्वरकों और कीटनाशकों की उपलब्धता की समस्या खड़ी हो सकती है। उर्वरकों के दाम तो नियंत्रित हैं, लेकिन कीटनाशक और पैकेजिंग मैटेरियल कंपनियां अपने उत्पादों के दाम बढ़ा सकती हैं। जहां तक निर्यात की बात है, तो पश्चिम एशियाई देशों को 2025 में भारत से 11.8 अरब डॉलर के कृषि और खाद्य उत्पादों का निर्यात किया गया, जो भारत के कुल कृषि निर्यात का 21.8% है। 

दरअसल, ईरान के जवाबी हमलों के बाद कतर, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, बहरीन और सऊदी अरब के गैस संयंत्रों में उत्पादन बाधित होने से गैस की सप्लाई पर असर पड़ा है। इस कारण भारत के अधिकांश यूरिया संयंत्रों में क्षमता से कम उत्पादन होने लगा। वैसे भी, संकट को देखते हुए सरकार ने 9 मार्च को आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत उर्वरक क्षेत्र के लिए छह माह के औसत का 70% गैस उपलब्ध कराने का आदेश जारी किया, जिसे बाद में बढ़ाया गया। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय की तरफ से 2 मई को जारी अपडेट के अनुसार उर्वरक संयंत्रों को उनकी छह माह की औसत खपत के 98 प्रतिशत के बराबर गैस उपलब्ध कराई जा रही है।

एक और संकट माल ढुलाई का है। भारत और खाड़ी देशों के बीच व्यापार के लिए ईरान से सटा होर्मुज जलडमरूमध्य प्रमुख मार्ग है। यहां ईरान की नाकेबंदी के कारण कंटेनर भाड़ा दो से तीन गुना बढ़ गया है। जोखिम बढ़ने के साथ बीमा और वॉर रिस्क प्रीमियम में भी बढ़ोतरी हो गई। समुद्री जहाजों का ईंधन भी 520 डॉलर से बढ़कर 700 डॉलर प्रति टन हो गया। सुरक्षा कारणों से जो जहाज वैकल्पिक मार्ग अपना रहे हैं उनका ट्रांजिट समय 25-30 दिनों से बढ़कर 35-45 दिन हो गया है। इन सबसे माल ढुलाई महंगी हुई है। 

दुनिया का लगभग 30 प्रतिशत कच्चा तेल और एलएनजी व्यापार होर्मुज के रास्ते होता है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 60% एलपीजी आयात करता है, 90 प्रतिशत एलपीजी खाड़ी देशों से खरीदता है और लगभग 50% एलएनजी के लिए कतर और यूएई पर निर्भर है। हालांकि भारत सरकार ने ईरान के साथ बातचीत करके तेल और गैस के कुछ कंटेनर निकालने में सफलता हासिल की है, लेकिन स्थिति जल्दी सामान्य होती नहीं लग रही।

भारतीय रुपये में गिरावट ने स्थिति और खराब कर दी है। रुपया कमजोर होकर प्रति डॉलर 95 के पार चला गया। इससे दूसरे स्रोतों से कृषि इनपुट का आयात तो महंगा हुआ ही, दाल, खाद्य तेल आदि की आयात लागत भी बढ़ी है। कनाडा और अफ्रीका से आयातित दालों के दाम 10-15% बढ़ गए हैं। इसका असर घरेलू महंगाई पर दिख सकता है। 

भारत अपनी जरूरत का 85-90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। भारत के कुल आयात बिल का 25-30 प्रतिशत पेट्रोलियम ही होता है। युद्ध शुरू होने से पहले अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड 70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास था। यह 50 प्रतिशत से अधिक बढ़कर 110 डॉलर के आसपास चल रहा है। 

उर्वरक क्षेत्र पर असर

कृषि तीन मुख्य पोषक तत्वों - नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश पर निर्भर करती है। नाइट्रोजन का उत्पादन प्राकृतिक गैस से होता है, जबकि फॉस्फोरस के लिए रॉक फॉस्फेट और फॉस्फोरिक एसिड जरूरी है। पोटाश अलग खनिज स्रोतों से प्राप्त होता है। यह अपने आप में अभूतपूर्व है कि ये तीनों पोषक तत्व एक साथ दबाव में हैं। होर्मुज मार्ग बाधित होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया के दाम 700 डॉलर प्रति टन पर पहुंच गए, जो युद्ध से पहले 500 डॉलर से कम थे। 

30 मार्च को एक अंतर-मंत्रालयी बैठक में उर्वरक मंत्रालय की अतिरिक्त सचिव अपर्णा एस. शर्मा ने बताया कि भारत ने अपने उर्वरक स्रोतों में विविधता लाते हुए रूस, मोरक्को, ऑस्ट्रेलिया, अल्जीरिया, मिस्र, इंडोनेशिया, मलेशिया और कनाडा जैसे देशों से आयात शुरू किया है, लेकिन कीमतों में वृद्धि हुई है। उन्होंने बताया कि वर्तमान में देश में 1.8 करोड़ टन का उर्वरक भंडार है, जो पिछले वर्ष इस समय 1.4 करोड़ टन था। हालांकि आगामी खरीफ सीजन के लिए कुल मांग 3.9 करोड़ टन रहने का अनुमान है।

भारत में सालाना करीब 400 लाख टन यूरिया की खपत होती है और हर साल लगभग 100 लाख टन यूरिया का आयात होता है। दूसरा सबसे अधिक आयात होने वाला उर्वरक डाई अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) है। इसमें आयात पर भारत की निर्भरता लगभग शत-प्रतिशत है। इसकी सालाना खपत करीब 100 लाख टन की है।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर डॉ. बिस्वजीत धर कहते हैं, “भारत पारंपरिक रूप से नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों की आपूर्ति के लिए खाड़ी क्षेत्र पर निर्भर रहा है। वर्ष 2024-25 में 75 प्रतिशत यूरिया आयात इसी क्षेत्र से हुआ। कृषि जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र की जरूरतों को पूरा करने के लिए एक ही क्षेत्र पर इतनी अधिक निर्भरता अपने आप में बड़ा जोखिम है। पश्चिम एशिया के युद्ध ने इस वास्तविकता को गंभीर रूप से उजागर कर दिया है।”

फॉस्फेट उर्वरकों के लिए भी जोखिम बढ़ा है। सेंटर फॉर स्ट्रैटजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (सीएसआईएस) के अनुसार, वैश्विक फॉस्फेट उर्वरक व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा उन देशों से आता है जो होर्मुज के व्यवधान से प्रभावित हैं। वैश्विक फॉस्फेट उर्वरक निर्यात में लगभग 17 प्रतिशत हिस्सेदारी सऊदी अरब और इजरायल की है। 
इसके अलावा तेल और गैस प्रसंस्करण का एक सह-उत्पाद सल्फर, फॉस्फेट उर्वरक उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण है। 

ग्लोबल रिसर्च फर्म नेटिक्सिस की मुख्य अर्थशास्त्री एलिसिया गार्सिया हेरेरो बताती हैं, वैश्विक समुद्री सल्फर व्यापार का लगभग 45% हिस्सा यहीं से आता है। तेल और गैस के डी-सल्फराइजेशन (सल्फर हटाने की प्रक्रिया) के दौरान प्राप्त कच्चे सल्फर को सल्फ्यूरिक एसिड में परिवर्तित किया जाता है, जो फॉस्फेट उर्वरक, भारी धातुओं की प्रोसेसिंग और सेमीकंडक्टर वेफर निर्माण के लिए आवश्यक कच्चा माल है। लेकिन युद्ध के कारण इसका निर्यात काफी हद तक ठप हो गया है।

नाइट्रेट्स का संकट भी तेजी से गहराता दिख रहा है। नाइट्रोजन आधारित केमिकल, विशेष रूप से नाइट्रिक एसिड और नाइट्रेट उत्पाद, मुख्य रूप से खाड़ी क्षेत्र की उन इकाइयों में तैयार होते हैं, जो प्राकृतिक गैस पर निर्भर हैं। ईरान नाइट्रेट इंटरमीडिएट्स के प्रमुख वैश्विक निर्यातकों में शामिल है। मौजूदा संकट के कारण खाड़ी क्षेत्र में नाइट्रिक एसिड उत्पादन में तेजी से गिरावट दर्ज की गई है।

खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा

नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटैशियम उर्वरकों में सबसे ज्यादा नाइट्रोजन उर्वरक की खपत होती है। सीएसआईएस के मुताबिक 2023 में दुनिया में 59 प्रतिशत नाइट्रोजन उर्वरकों का इस्तेमाल हुआ। इसके बाद फॉस्फेट 21 प्रतिशत और पोटाश 20 प्रतिशत थे। दुनिया में 45 प्रतिशत नाइट्रोजन उर्वरकों का प्रयोग गेहूं, चावल और मक्का जैसी रोजाना इस्तेमाल वाले अनाज की खेती में होता है।

एशियाई विकास बैंक (एडीबी) का कहना है कि ऊर्जा आपूर्ति और उर्वरक जैसे प्रमुख कृषि इनपुट में व्यवधान का असर वैश्विक बाजारों में साफ दिख रहा है। मध्य पूर्व वैश्विक यूरिया निर्यात में लगभग आधा और अमोनिया आपूर्ति में करीब 30% हिस्सा रखता है। आपूर्ति बाधित होने से उर्वरकों की उपलब्धता घटने और कीमतें तेजी से बढ़ने की आशंका है।

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के मुख्य अर्थशास्त्री मैक्सिमो टोरेरो होर्मुज मार्ग में व्यवधान को हाल के वर्षों में वैश्विक कमोडिटी ट्रेड के सबसे गंभीर झटकों में से एक मानते हैं। उनका कहना है कि इसका असर खाद्य सुरक्षा, कृषि उत्पादन और वैश्विक बाजारों पर गहरा पड़ेगा। युद्ध के कुछ ही दिनों के भीतर होर्मुज से गुजरने वाला टैंकर ट्रैफिक 90 प्रतिशत से अधिक गिर गया। सामान्य परिस्थितियों में इस मार्ग से प्रतिदिन लगभग 2 करोड़ बैरल कच्चा तेल गुजरता है। यह दैनिक वैश्विक तेल व्यापार का करीब 35 प्रतिशत है।

अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान (IFPRI) के रिसर्च फेलो एमिरेटस जोसेफ ग्लॉबर के अनुसार, वर्ष 2023 में फारस की खाड़ी से 109 लाख टन यूरिया का निर्यात किया गया। इसमें से 44 प्रतिशत कतर ने, 31 प्रतिशत सऊदी अरब ने, 19 प्रतिशत ओमान ने, 5 प्रतिशत बहरीन ने और बाकी एक प्रतिशत दूसरे देशों ने किया। डीएपी के पूरे 29 लाख टन का निर्यात अकेले सऊदी अरब ने किया। एनहाइड्रस अमोनिया के भी 23 लाख टन निर्यात में सऊदी का हिस्सा 61 प्रतिशत था। कतर ने 29 प्रतिशत, ओमान ने 8 प्रतिशत और बाकी अमोनिया दूसरे देशों ने निर्यात किया। इन सभी देशों से सप्लाई बाधित हुई है। यह स्थिति दुनिया को खाद्य असुरक्षा की ओर ले जा रही है।

खाद्य सुरक्षा का संकट खाड़ी देशों के लिए भी है, जहां भारत एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता है। आईसीएआर नेशनल प्रोफेसर और एम.एस. स्वामीनाथन चेयर स्मिता सिरोही कहती हैं, “पश्चिम एशिया संरचनात्मक रूप से खाद्य आयात पर निर्भर है, विशेष रूप से चावल जैसे मुख्य खाद्य पदार्थों और प्रोटीन स्रोतों के लिए। भारत से होने वाली आपूर्ति इस क्षेत्र में उपलब्धता और कीमतों की स्थिरता बनाए रखने में मदद करती है। उदाहरण के लिए, ईरान अपनी घरेलू चावल खपत का लगभग 30% आयात के माध्यम से पूरा करता है, जिसमें से करीब 43% आपूर्ति भारत से होती है।”

दूसरे देशों से उर्वरकों की सप्लाई 

वैकल्पिक स्रोत तलाशना आसान नहीं है। विश्व का 14 प्रतिशत नाइट्रोजन उर्वरक निर्यात करने वाला रूस घरेलू मांग पूरी करने में लगा है। यूक्रेन के साथ युद्ध में हमले से उसका कुछ उत्पादन प्रभावित भी हुआ है। चीन ने यूरिया निर्यात पहले ही रोक रखा है, घरेलू उपलब्धता बढ़ाने के लिए उसने अपने निर्यातकों को कुछ नाइट्रोजन-पोटाश कॉम्प्लेक्स उर्वरकों की खेप रोकने के भी निर्देश दिए हैं। चीन एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका सहित कई क्षेत्रों को उर्वरक आपूर्ति करता रहा है। नाइट्रोजन उर्वरकों का अमेरिका भी बड़ा आयातक है। वहां नए सीजन (स्प्रिंग) की बुवाई शुरू होने वाली है।

सीएसआईएस के मुताबिक वैसे तो इस व्यवधान से दुनिया का कोई क्षेत्र अछूता नहीं, लेकिन एशियाई देश ज्यादा प्रभावित होंगे। वर्ष 2024 में होर्मुज से गुजरने वाला 83 प्रतिशत एलएनजी एशियाई देशों को गया। इसमें से 52 प्रतिशत गैस चीन, भारत और दक्षिण कोरिया ने खरीदी। ब्राजील ने 2025 में लगभग 491.1 लाख टन उर्वरक का आयात किया, और वह दुनिया का सबसे बड़ा उर्वरक आयातक है। उसके प्रमुख आपूर्तिकर्ता मध्य पूर्व के देश ही हैं। 

एफएओ के टोरेरो मानते हैं कि यदि यह संकट जारी रहता है तो 2026 की पहली छमाही में वैश्विक उर्वरक कीमतें औसतन 15 से 20 प्रतिशत तक बढ़ सकती हैं, जिससे खेती की लागत और खाद्य महंगाई पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा। एडीबी ने भी चेतावनी दी है कि बढ़ती लागत का असर खाद्य महंगाई के रूप में सामने आ सकता है। 

उर्वरकों की बिक्री की निगरानी

भारत में उर्वरकों की उपलब्धता के आसन्न संकट को भांपते हुए सरकार इनकी बिक्री में सख्ती बरतने की तैयारी कर रही है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 25 मार्च को विभागीय अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक में उर्वरक वितरण प्रणाली को पारदर्शी बनाने के लिए किसान आईडी विस्तार में तेजी लाने के निर्देश दिए। सूत्रों के अनुसार, उर्वरक मंत्रालय हाल में चार राज्यों में किए गए पायलट प्रोजेक्ट के डेटा की समीक्षा कर रहा है, जिसमें उर्वरक खरीदने वाले किसानों का आधार और किसान आईडी के माध्यम से सत्यापन किया गया और उर्वरक उपयोग का डेटा तैयार किया गया।

एग्रीस्टैक, जिसमें राज्यों ने अपने-अपने डेटा को एकीकृत किया है, में लगभग 9.24 करोड़ डिजिटल किसान आईडी शामिल हैं। एग्रीस्टैक का उद्देश्य सब्सिडी वाले कृषि-रसायनों के दुरुपयोग, अत्यधिक उपयोग या औद्योगिक उपयोग के लिए अवैध रूप से डायवर्जन को रोकना है। जो किसान एग्रीस्टैक में पंजीकृत नहीं हैं उन्हें उर्वरक मिलते रहेंगे, लेकिन प्वाइंट ऑफ सेल (पीओएस) मशीनों के जरिए खरीद की सख्त जांच की जाएगी।

कीटनाशक महंगे होने के आसार

एग्रोकेमिकल कंपनियों का कहना है कि लागत में वृद्धि के कारण उन्हें दाम बढ़ाने पड़ेंगे और अब नया उत्पादन बढ़ी हुई कीमतों के साथ ही बाजार में आएगा। एक बड़ी एग्रोकेमिकल कंपनी के शीर्ष अधिकारी के अनुसार कच्चे तेल की कीमतों में इजाफे के कारण रिफाइनरियों ने पेट्रोकेमिकल उत्पादों के दाम 25-30 फीसदी बढ़ा दिए हैं। साथ ही, पैकेजिंग उत्पादों की कीमतों में भी 15 से 30 फीसदी की वृद्धि हुई है। सप्लायरों ने पहले से तय अनुबंधों की कीमतें भी बढ़ा दी हैं। कीटनाशकों में इस्तेमाल होने वाले सॉल्वेंट और इमल्सीफायर महंगे हो गए हैं, जो एग्रोकेमिकल्स का मुख्य हिस्सा होते हैं। खरीफ में कीटनाशकों की खपत अधिक होती है, इसलिए किसानों की लागत बढ़ना निश्चित है। 

मध्य पूर्व के हालात पर निगरानी के लिए सरकार ने सात एम्पावर्ड ग्रुप का गठन किया है, जिसमें एक समूह कृषि इनपुट के लिए है। जैसा सरकार कह रही है, उर्वरकों की फिलहाल कोई समस्या नहीं है। लेकिन युद्ध लंबा खिंचने पर हालात बिगड़ सकते हैं। युद्ध से पहले भी उर्वरकों के लिए किसानों के जूझने की खबरें आती रही हैं। उनके सामने एक तरफ इनपुट की उपलब्धता की समस्या है तो दूसरी तरफ उपज के घटते दाम का संकट है। 

हर बड़े आर्थिक संकट में कृषि और संबद्ध क्षेत्र ही इकोनॉमी को उबारने का काम करता रहा है। मौजूदा हालात में कृषि क्षेत्र कैसे उबरेगा, सरकार ने अभी तक उसका कोई रोडमैप नहीं दिया है। इस बार सिर्फ उर्वरक सब्सिडी शायद नाकाफी होगी, सरकार को इससे कुछ अधिक करने की जरूरत पड़ेगी। 

निर्यात में खाड़ी देशों पर निर्भरता

युद्ध के कारण भारत से बासमती चावल, फल और मसाले जैसे कृषि उत्पादों का निर्यात प्रभावित हुआ है। थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) के अनुसार, भारत ने 2025 में पश्चिम एशियाई देशों को 4.43 अरब डॉलर का चावल निर्यात किया, जो कुल चावल निर्यात का 36.7% है। भारत का 70 प्रतिशत बासमती निर्यात ईरान, सऊदी अरब, इराक और यूएई जैसे मध्य-पूर्व के देशों को होता है। ईरान अकेले भारतीय बासमती का 15-20% खरीदता है। शिपमेंट रुकने से अकेले ईरान को 1.2 अरब डॉलर का निर्यात खतरे में है।

पिछले साल भारत के 39.65 करोड़ डॉलर के केला निर्यात में से 79.6% पश्चिम एशिया को गया। तमिलनाडु, महाराष्ट्र और गुजरात के केला उत्पादक किसान इस बाजार पर काफी निर्भर हैं। प्याज और लहसुन का निर्यात 11.1 करोड़ डॉलर का तथा अन्य सब्जियों का 9.15 करोड़ डॉलर का था। इनके कुल निर्यात में से क्रमशः 26.9% और 50.8% हिस्सा पश्चिम एशिया को गया। इसी तरह चाय, कॉफी और प्रोसेस्ड फल-मेवों के निर्यात का भी बड़ा हिस्सा इन देशों को जाता है। ईरान भारत की 15-20% चाय खरीदता है। 

कई और उत्पादों में भी खाड़ी देशों पर निर्भरता काफी अधिक है। वर्ष 2025 में जायफल, जावित्री और इलायची जैसे मसालों का 70% से अधिक, भेड़-बकरी के मांस का 98.9% हिस्सा खाड़ी देशों को गया। डेयरी में 58.1% मक्खन और 81% बीयर का निर्यात इसी क्षेत्र को किया गया।

Subscribe here to get interesting stuff and updates!