सूखा, बाढ़ और खाद्य संकट: दुनिया भर के देशों को कैसे प्रभावित कर सकता है सुपर अल नीनो

इस वर्ष शुरू होकर 2027 तक बने रहने की आशंका वाला सुपर अल नीनो दुनिया भर में सूखा, फसलों को नुकसान, महंगाई, जंगल की आग, बिजली संकट और मत्स्य उत्पादन में गिरावट ला सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका सबसे अधिक असर किसानों, श्रमिकों और विकासशील देशों पर पड़ेगा।

सूखा, बाढ़ और खाद्य संकट: दुनिया भर के देशों को कैसे प्रभावित कर सकता है सुपर अल नीनो

दुनिया एक शक्तिशाली “सुपर अल नीनो” की ओर बढ़ रही है, जिसके 2027 तक बने रहने की आशंका है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह जलवायु घटना दुनिया के अनेक हिस्सों में सूखा, खाद्य संकट, जंगल की आग, बिजली संकट, मत्स्य उत्पादन में गिरावट और आर्थिक नुकसान का कारण बन सकती है। यह नुकसान लाखों करोड़ डॉलर में हो सकता है। 

प्रशांत महासागर के सतह के तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक वृद्धि होने पर उसे सुपर अल नीनो की श्रेणी में रखा जाता है। इस बार की घटना पिछले कई दशकों की सबसे गंभीर जलवायु घटनाओं में से एक साबित हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, अल नीनो तब विकसित होता है जब गर्म समुद्री जल मध्य तथा पूर्वी प्रशांत महासागर में फैल जाता है। इससे वैश्विक मौसम चक्र प्रभावित होता है और दुनिया भर में वर्षा तथा तापमान के पैटर्न बदल जाते हैं।

कृषि पर सबसे बड़ा खतरा

सुपर अल नीनो का सबसे गंभीर प्रभाव कृषि क्षेत्र पर पड़ने की आशंका है। दक्षिण एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया, ऑस्ट्रेलिया और उप-सहारा अफ्रीका के बड़े हिस्सों में सामान्य से कम वर्षा होने का अनुमान है। भारत, इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस और ऑस्ट्रेलिया के किसान पहले से ही मानसूनी बारिश में देरी और घटते जल भंडार को लेकर चिंतित हैं।

भारत में लगभग 45 प्रतिशत खेती मानसूनी वर्षा पर निर्भर है। कमजोर मानसून और बढ़ते तापमान के कारण धान, मक्का, सोयाबीन, दलहन और तिलहन जैसी फसलों की पैदावार प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि अत्यधिक गर्मी अब केवल सब्जियों ही नहीं बल्कि अनाज और पशुधन उत्पादन को भी प्रभावित करने लगी है।

वैश्विक उर्वरक संकट स्थिति को और गंभीर बनाता है। उर्वरकों की कमी और ऊंची कीमतें किसानों की लागत बढ़ा रही हैं और उत्पादन पर अतिरिक्त दबाव डाल रही हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ ससेक्स के प्रोफेसर बेंजामिन सेल्विन के अनुसार, जलवायु संकट और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान का सबसे अधिक असर गरीब किसानों और उपभोक्ताओं पर पड़ेगा।

वैश्विक खाद्य आपूर्ति श्रृंखला पर असर

गेहूं, चावल, मक्का और सोयाबीन दुनिया की कुल कैलोरी खपत का 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा उपलब्ध कराते हैं। सुपर अल नीनो के कारण इन प्रमुख फसलों के उत्पादन में गिरावट आ सकती है, जिससे वैश्विक खाद्य आपूर्ति पर दबाव बढ़ेगा और कीमतें ऊंची हो सकती हैं।

फिलीपींस के किसान धान उत्पादन में भारी नुकसान की आशंका जता रहे हैं, जबकि मलेशिया में कई किसान मौसम की अनिश्चितता के कारण बुआई टाल रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया के गेहूं और कैनोला उत्पादक भी मौसम पूर्वानुमानों पर नजर बनाए हुए हैं।

जंगल की आग और वायु प्रदूषण

अल नीनो के दौरान सूखे की स्थिति जंगलों में आग लगने की आशंका बढ़ा देती है। दक्षिण अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण-पूर्व एशिया इसके प्रमुख प्रभावित क्षेत्र हो सकते हैं। 

इंडोनेशिया और मलेशिया विशेष रूप से संवेदनशील हैं क्योंकि वहां के पीटलैंड सूखे के दौरान आसानी से आग पकड़ लेते हैं। वर्ष 2015 में इंडोनेशिया में लगी भीषण आग से उठी धुंध पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया में फैल गई थी। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि उस प्रदूषण के कारण एक लाख से अधिक लोगों की समयपूर्व मृत्यु हुई थी। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस बार सुपर अल नीनो अधिक शक्तिशाली साबित हुआ तो ऐसी घटनाएं और गंभीर हो सकती हैं।

कुछ क्षेत्रों में बाढ़ का खतरा

जहां कई क्षेत्र सूखे का सामना करेंगे, वहीं अमेरिका का दक्षिण हिस्सा, दक्षिण अमेरिकी देश, अफ्रीका के कुछ क्षेत्र और मध्य एशिया के कुछ हिस्सों में सामान्य से अधिक वर्षा हो सकती है। अत्यधिक बारिश से जलाशयों और भूजल भंडारों को लाभ मिल सकता है, लेकिन तीव्र वर्षा बाढ़, भूस्खलन और बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाने का खतरा भी बढ़ाती है। तेज बारिश होने पर अधिकांश पानी बह जाता है, जिससे मिट्टी में नमी लंबे समय तक नहीं रह पाती है।

ऊर्जा क्षेत्र पर दबाव

सूखे के कारण जलविद्युत उत्पादन प्रभावित हो सकता है। कोलंबिया जैसे देशों में, जहां बिजली उत्पादन का बड़ा हिस्सा जलविद्युत पर आधारित है, बिजली कटौती और ऊर्जा संकट का खतरा बढ़ सकता है। दूसरी ओर, बढ़ती गर्मी एयर कंडीशनिंग की मांग बढ़ाएगी। भारत और चीन जैसे देशों में, जहां बिजली उत्पादन का बड़ा हिस्सा कोयले पर आधारित है, इससे कोयले की खपत और कार्बन उत्सर्जन दोनों बढ़ सकते हैं। जल की कमी डेटा सेंटरों, उद्योगों और शहरी जल आपूर्ति प्रणालियों पर भी दबाव बढ़ा सकती है।

मत्स्य क्षेत्र को झटका

अल नीनो प्रशांत महासागर में पोषक तत्वों से भरपूर ठंडे जल के ऊपर आने की प्रक्रिया को बाधित कर देता है। इससे एन्कोवी, सार्डिन जैसी छोटी मछलियों की संख्या घटती है और पूरी समुद्री खाद्य श्रृंखला प्रभावित होती है। पेरू, इक्वाडोर, कैलिफोर्निया, मैक्सिको, पापुआ न्यू गिनी जैसे क्षेत्रों की मत्स्य अर्थव्यवस्था पर इसका प्रतिकूल असर पड़ सकता है। मछली पकड़ने की मात्रा घटने से तटीय समुदायों की आय में कमी आने की आशंका है।

स्वास्थ्य और सामाजिक चुनौतियां

अत्यधिक गर्मी से हीट स्ट्रोक और अन्य गर्मी संबंधी बीमारियों के मामले बढ़ सकते हैं। कृषि और निर्माण जैसे क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिक सबसे अधिक जोखिम में रहेंगे। दिल्ली जैसे शहरों में तापमान अक्सर 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच जाता है, जिससे स्वास्थ्य संबंधी खतरे बढ़ जाते हैं।

इतिहास बताता है कि लंबे समय तक सूखा, खाद्य संकट और महंगाई सामाजिक तनाव और राजनीतिक अस्थिरता को जन्म दे सकते हैं। कई अध्ययनों के अनुसार अल नीनो प्रभावित उष्णकटिबंधीय देशों में नागरिक संघर्ष की संभावना सामान्य वर्षों की तुलना में दोगुनी हो सकती है।

सरकारों की क्या है तैयारी

इंडोनेशिया भूजल स्तर की निगरानी बढ़ा रहा है और कृत्रिम वर्षा जैसे उपायों की तैयारी कर रहा है। मलेशिया पानी की राशनिंग जैसी योजनाओं पर विचार कर रहा है, जबकि भारत ने सिंचाई सुविधाओं का विस्तार और जलवायु-सहिष्णु फसल किस्मों को बढ़ावा देने जैसे कदम उठाए हैं। फिर भी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सुपर अल नीनो अपेक्षा के अनुसार विकसित होता है, तो उसके आर्थिक प्रभाव खरबों डॉलर तक पहुंच सकते हैं।

प्रोफेसर बेंजामिन सेल्विन के शब्दों में, यह केवल एक जलवायु घटना नहीं है, बल्कि वैश्विक खाद्य, ऊर्जा और व्यापार प्रणालियों की मजबूती की परीक्षा है। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि दुनिया इस संभावित जलवायु संकट का सामना कितनी प्रभावी ढंग से कर पाती है।

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