भारत की दीर्घकालिक खाद्य तेल सुरक्षा के लिए सस्टेनेबल तरीके से पाम ऑयल उत्पादन जरूरी
लेख में कहा गया है कि भारत को खाद्य तेल आयात पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए पाम ऑयल के रकबे का अंधाधुंध विस्तार करने के बजाय उसकी उत्पादकता बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए। जलवायु-अनुकूल खेती, अधिक उत्पादकता, सस्टेनेबल उत्पादन मानकों और आईपीओएस (IPOS) ढांचे के तहत जिम्मेदार आयात को बढ़ावा देकर प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करते हुए देश की भविष्य की खाद्य तेल जरूरतों को सुरक्षित किया जा सकता है।
सुमित रॉय एवं निशात शिरीन बरभुइया
भारत की ग्रामीण आबादी के लिए कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। यही क्षेत्र 140 करोड़ लोगों की खाद्य आवश्यकताओं को पूरा करता है और देश की खाद्य सुरक्षा का आधार है। लेकिन खाद्य तेल के मामले में भारत बढ़ती उपभोक्ता मांग और घरेलू उत्पादन क्षमता के बीच लगातार बढ़ती खाई का सामना कर रहा है। बढ़ती आय और वसा युक्त प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की खपत बढ़ने के कारण एक भारतीय की औसत वार्षिक खाद्य तेल खपत वर्ष 2001 के 8.2 किलोग्राम से बढ़कर अब 23.5 किलोग्राम हो गई है।
इस बढ़ती खपत ने खाद्य तेलों की घरेलू मांग पूरी करने के लिए आयात पर भारत की निर्भरता को काफी बढ़ा दिया है। इसके कारण देश की खाद्य सुरक्षा अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव के प्रति अधिक संवेदनशील हो गई है। इसका सरकारी खजाने पर भी अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है।
सभी खाद्य तेलों में पाम ऑयल कम कीमत के कारण भारत के आयातित खाद्य तेलों में सबसे प्रमुख बन गया है। एक तरफ इसकी खपत बढ़ रही है तो दूसरी तरफ घरेलू तिलहन उत्पादकता वैश्विक औसत से कम बनी हुई है। ऐसे में आयातित पाम ऑयल पर देश की निर्भरता आर्थिक आवश्यकता के साथ-साथ रणनीतिक कमजोरी भी बन गई है।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा पाम ऑयल आयातक है। देश हर वर्ष 80 से 100 लाख मीट्रिक टन पाम ऑयल आयात करता है, जो वैश्विक पाम ऑयल आयात का लगभग 21 प्रतिशत है। यह यूरोपीय संघ के कुल पाम ऑयल आयात का लगभग दोगुना है।
इस निर्भरता को कम करने के लिए सरकार ने राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन-ऑयल पाम (NMEO-OP) शुरू किया है, जिसका उद्देश्य घरेलू उत्पादन में तेजी से वृद्धि करना है। लेकिन असली सवाल यह नहीं कि भारत को अधिक पाम ऑयल पैदा करना चाहिए या नहीं, बल्कि यह है कि क्या वह पर्यावरण संतुलन बनाए रखते हुए इसका सस्टेनेबल तरीके से उत्पादन कर सकता है। यदि भारत को खाद्य सुरक्षा और जलवायु प्रतिबद्धताओं के बीच संतुलन बनाना है तो राष्ट्रीय रणनीति का केंद्र केवल खेती का क्षेत्र बढ़ाना नहीं, बल्कि प्रति इकाई क्षेत्र उत्पादकता बढ़ाना होना चाहिए।
उत्पादकता की चुनौती: पाम ऑयल की यील्ड बढ़ाना जरूरी
वर्तमान में भारत में ऑयल पाम की खेती पांच लाख हेक्टेयर से भी कम क्षेत्र में होती है, जो देश के कुल फसल क्षेत्र का मात्र 0.2 प्रतिशत है। हालांकि ऑयल पाम दुनिया की सबसे अधिक तेल देने वाली तिलहन फसल है, लेकिन भारत में इसकी उत्पादकता वैश्विक मानकों की तुलना में काफी कम है।
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देश |
पाम ऑयल यील्ड |
ऑयल एक्सट्रैक्शन रेट |
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भारत |
2.4 |
17.6% |
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इंडोनेशिया |
3.4 |
19 – 20% |
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मलेशिया |
3.4 |
19 – 20% |
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वैश्विक स्तर पर उच्चतम |
5.0 |
19 – 20% |
स्रोत: एग्रीकल्चर स्टैटिस्टिक्स - एट के ग्लांस, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय; रिपोर्टलिंकर: ग्लोबल पाम ऑयल यील्ड; तथा चार्टिंग द पाथ ऑफ पाम ऑयल सेल्प सफिसिएंसी इन इंडिया (सितंबर 2025), सॉलिडेरिडाड एशिया।
उत्पादकता में यह अंतर सीधे तौर पर भारत की आयात निर्भरता को बढ़ाता है। स्थिति इसलिए और गंभीर हो जाती है क्योंकि भारत का ऑयल एक्सट्रैक्शन रेट (OER) भी कम है। यह वह अनुपात है, जो ताजे फलों के गुच्छों (FFB) से प्रसंस्करण के बाद प्राप्त कच्चे पाम ऑयल की मात्रा को दर्शाता है।
भारत में ऑयल एक्सट्रैक्शन रेट केवल 17.6 प्रतिशत है, जबकि इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे प्रमुख उत्पादक देशों में यह 19 से 20 प्रतिशत के बीच है। यदि बेहतर पौध सामग्री, किसानों के प्रशिक्षण और आधुनिक प्रसंस्करण मिलों के माध्यम से इस अंतर को कम किया जाए तो खेती का क्षेत्र बढ़ाए बिना ही घरेलू उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि की जा सकती है। आयात और घरेलू उत्पादन के बीच की खाई को पाटने के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण है।
भविष्य की मांग और आत्मनिर्भरता की सीमाएं
सॉलिडेरिडाड, सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन और एशियन पाम ऑयल अलायंस की संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2047 तक भारत में पाम ऑयल की मांग बढ़कर 2.16 करोड़ मीट्रिक टन तक पहुंच सकती है। सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं के बावजूद निकट भविष्य में भारत पूरी तरह पाम ऑयल आयात से मुक्त नहीं हो सकेगा। यदि वर्ष 2047 तक भारत अपनी कुल आवश्यकता का 50 प्रतिशत पाम ऑयल घरेलू स्तर पर भी उत्पादन करने लगे, तब भी शेष मांग पूरी करने के लिए उसे आयात करना ही पड़ेगा।
आत्मनिर्भरता की राह पर्यावरणीय और भौगोलिक सीमाओं से भी बंधी हुई है। देश में उपयुक्त भूमि सीमित है और ऑयल पाम की सफल खेती के लिए उष्णकटिबंधीय जलवायु तथा सुनिश्चित सिंचाई की आवश्यकता होती है। इसलिए भारत की खाद्य तेल सुरक्षा इस बात पर निर्भर करेगी कि वह घरेलू उत्पादन और आयात के बीच संतुलित रणनीति अपनाए।
इससे बहस का केंद्र "देश में उत्पादन बनाम आयात" से हटकर एक अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न पर आ जाता है - भारत पर्यावरण और सामाजिक लागत बढ़ाए बिना अपनी दीर्घकालिक खाद्य तेल जरूरतों को कैसे सुरक्षित कर सकता है?
यदि पाम ऑयल भविष्य में भी भारत के खाद्य तेल उपभोग का प्रमुख हिस्सा बना रहता है, चाहे उसका उत्पादन देश में हो या आयात के माध्यम से पूर्ति हो, तो सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना होगी कि उसका उत्पादन और खरीद दोनों टिकाऊ विकास के सिद्धांतों के अनुरूप हों।
पाम ऑयल के पक्ष में पर्यावरण संबंधी तर्क
पाम ऑयल की टिकाऊ खेती पर होने वाली बहस में अक्सर एक महत्वपूर्ण तथ्य नजरअंदाज कर दिया जाता है। यदि पाम ऑयल का स्थान अन्य वनस्पति तेलों से भरने की कोशिश की जाए, तो इससे वैश्विक स्तर पर पर्यावरण पर पड़ने वाला दबाव कम होने के बजाय और बढ़ सकता है।
भूमि उपयोग दक्षताः उच्च उत्पादकता के कारण ऑयल पाम का भूमि उपयोग अन्य तिलहनी फसलों की तुलना में बेहद कम है। यदि सोयाबीन जैसी वैकल्पिक फसलों से समान मात्रा में खाद्य तेल उत्पादन करना हो, तो उसके लिए दो से पांच गुना अधिक भूमि की आवश्यकता पड़ेगी। ऐसे में यदि पाम ऑयल का उपयोग समाप्त कर दिया जाए, तो इससे दुनिया के अन्य हिस्सों में कम उत्पादक तिलहनी फसलों के लिए बड़े पैमाने पर वनों की कटाई और नई भूमि को खेती योग्य बनाने का दबाव बढ़ जाएगा।
जल उपयोग दक्षताः वैश्विक स्तर पर ऑयल पाम के फलों का वाटर फुटप्रिंट (Water Footprint) 719 घन मीटर प्रति टन है। यह सोयाबीन के 1,601 घन मीटर प्रति टन वाटर फुटप्रिंट के आधे से भी कम है। भारत में पारंपरिक रूप से उगाई जाने वाली सरसों की तुलना में तो यह बहुत कम है, जिसके लिए 3,658 घन मीटर प्रति टन पानी की आवश्यकता होती है। ऑयल पाम के ताजे फलों (FFB) में तेल की मात्रा अधिक होती है, इसलिए प्रति इकाई खाद्य तेल उत्पादन के आधार पर इसका जल उपयोग सोयाबीन और सरसों से प्राप्त तेल की तुलना में और भी कम हो जाता है। यही कारण है कि ऑयल पाम को दुनिया की सबसे अधिक वाटर-एफिसिएंट खाद्य तेल फसल माना जाता है।
कम ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जनः यदि ऑयल पाम की खेती कार्बन-समृद्ध पीटलैंड के बजाय सामान्य कृषि भूमि पर की जाए - जैसा कि भारत में किया जाता है - तो प्रति इकाई तेल उत्पादन पर इसका ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन रेपसीड, सूरजमुखी और सोयाबीन जैसी फसलों की तुलना में कम होता है। इसके अलावा, यदि पाम ऑयल मिलों से निकलने वाले अपशिष्ट (Palm Oil Mill Effluents-POME) के प्रबंधन के लिए मीथेन कैप्चर तकनीक अपनाई जाए, तो प्रत्यक्ष ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को और अधिक कम किया जा सकता है।
इस प्रकार पाम ऑयल की जलवायु-अनुकूलता केवल फसल पर निर्भर नहीं करती, बल्कि इस बात पर निर्भर करती है कि इसकी खेती कहां और कैसे की जाती है।
भारत में सस्टेनेबल पाम ऑयल उत्पादन का ढांचा
घरेलू पाम ऑयल उत्पादन को टिकाऊ बनाने के लिए भारत के पास अपना स्वयं का समाधान मौजूद है - इंडियन पाम ऑयल सस्टेनेबिलिटी (IPOS) फ्रेमवर्क। यह भारत का पहला ऐसा राष्ट्रीय स्तर का सस्टेनेबल पाम ऑयल ढांचा है, जिसे भारतीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। यह वैधानिक अनुपालन, ट्रेसबिलिटी (उत्पाद की स्रोत तक पहचान), पर्यावरण संरक्षण और छोटे किसानों की भागीदारी जैसे प्रमुख सिद्धांतों पर आधारित है।
इस ढांचे को सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन (SEA) ऑफ इंडिया ने सॉलिडेरिडाड और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ऑयल पाम रिसर्च (IIOPR) के तकनीकी सहयोग से विकसित किया है। यह वैश्विक पर्यावरणीय सिद्धांतों को भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप व्यावहारिक मानकों में परिवर्तित करता है। विशेष रूप से इसे उन छोटे किसानों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है, जिनकी औसत जोत लगभग दो हेक्टेयर है।
यदि सरकार IPOS फ्रेमवर्क को औपचारिक रूप से राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन - ऑयल पाम (NMEO-OP) जैसी योजनाओं का अभिन्न हिस्सा बना दे, तो शुरुआत से ही जैव विविधता संरक्षण, मृदा स्वास्थ्य सुधार और री-जेनरेटिव कृषि को अनिवार्य बनाया जा सकता है। इसके साथ-साथ भारत को वैश्विक स्तर पर अपने ‘बड़े खरीदार की ताकत’ का भी प्रभावी उपयोग करना होगा।
केवल घरेलू स्तर पर टिकाऊ उत्पादन पर्याप्त नहीं होगा। दुनिया का सबसे बड़ा पाम ऑयल आयातक होने के नाते भारत के पास वैश्विक पाम ऑयल बाजार में टिकाऊ उत्पादन को बढ़ावा देने की भी क्षमता है। यदि भारत आयात के लिए ऐसे न्यूनतम मानक निर्धारित करे, जो IPOS के अनुरूप प्रमाणित पाम ऑयल - जैसे मलेशिया सस्टेनेबल पाम ऑयल (MSPO), इंडोनेशिया सस्टेनेबल पाम ऑयल (ISPO) और राउंडटेबल ऑन सस्टेनेबल पाम ऑयल (RSPO) - को प्राथमिकता दें, तो वह अपनी आयात निर्भरता को वैश्विक पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने के प्रभावी साधन में बदल सकता है।
भारत की खाद्य तेल सुरक्षा सुनिश्चित करना
भारत की खाद्य तेल सुरक्षा हासिल करने का रास्ता पर्यावरण पर अतिरिक्त बोझ डालने वाला नहीं होना चाहिए। यदि देश ‘सस्टेनेबिलिटी-बाय-डिजाइन’ (Sustainability-by-Design) मॉडल अपनाता है, जिसमें खेती के रकबे का अंधाधुंध विस्तार करने के बजाय प्रति इकाई क्षेत्र उत्पादकता बढ़ाने को प्राथमिकता दी जाए, ऑयल पाम के विस्तार को कम उत्पादक कृषि भूमि, सीमांत धान क्षेत्रों और कृषि योग्य बंजर भूमि तक सीमित रखा जाए तथा देश में विकसित IPOS फ्रेमवर्क को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए, तो भारत अपनी पाम ऑयल की आवश्यकताओं को अधिक समझदारी से पूरा कर सकता है।
सवाल केवल यह नहीं है कि ऑयल पाम की खेती के तहत कितना नया क्षेत्र लाया जाए, इससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह है कि भारत किस प्रकार अपनी उत्पादकता बढ़ाता है, टिकाऊ उत्पादन मानकों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करता है और पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप टिकाऊ आयात व्यवस्था विकसित करता है।
लेखकों का परिचय
सुमित रॉय सॉलिडेरिडाड एशिया में असिस्टेंट जनरल मैनेजर (पाम ऑयल प्रोग्राम) हैं। इस भूमिका में वे एशिया भर में सॉलिडेरिडाड के पाम ऑयल कार्यक्रमों की रणनीतिक योजना तैयार करने और उनके क्षेत्रीय क्रियान्वयन का नेतृत्व करते हैं।
निशात शिरीन बरभुइया पोस्ट ग्रेजुएट हैं और टिकाऊ कमोडिटी वैल्यू चेन की प्रबल समर्थक हैं। वे सॉलिडेरिडाड एशिया की टिकाऊ पाम ऑयल पहलों में सक्रिय योगदान देती हैं।
(इस लेख में व्यक्त विचार लेखकों के व्यक्तिगत हैं)

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