चुनौतियों से जूझते छोटे किसानों की जरूरत बनता जा रहा है कृषि मशीनीकरण
कृषि मशीनीकरण भारतीय कृषि में तेजी से बदलाव ला रहा है और श्रम संकट तथा समय की चुनौतियों से जूझ रहे छोटे किसानों के लिए आवश्यकता बनता जा रहा है। किफायती और छोटे कृषि उपकरणों की बढ़ती उपलब्धता के कारण यह बाजार वित्त वर्ष 2031 तक लगभग 20,000 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। सरकारी नीतियों और किराये की सेवाओं के समर्थन से यह बदलाव उत्पादकता, ग्रामीण उद्यमिता और किसानों की आय बढ़ाने में मदद कर रहा है।
भारतीय कृषि की कहानी पारंपरिक रूप से बीज, उर्वरक, सिंचाई और बाजार तक पहुंच जैसे मुद्दों के इर्द-गिर्द रही है। हालांकि ये सभी कारक आज भी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वर्तमान में जमीनी स्तर पर हो रहे सबसे बड़े बदलावों में से एक को अपेक्षाकृत कम ध्यान मिल रहा है - कृषि मशीनीकरण का लगातार बढ़ता प्रसार।
दशकों तक मशीनीकरण को मुख्य रूप से बड़े किसानों और बड़े खेतों की आवश्यकता माना जाता था। ऐसे देश में, जहां लगभग 86 प्रतिशत किसान दो हेक्टेयर से कम भूमि पर खेती करते हैं, कृषि मशीनों को अक्सर महंगा, पहुंच से बाहर और छोटे किसानों की जरूरतों के अनुरूप नहीं माना जाता था। लेकिन अब यह धारणा तेजी से बदल रही है।
भूमि की तैयारी में कुछ दिनों की देरी भी सीधे तौर पर उत्पादन और लाभप्रदता को प्रभावित कर सकती है। अधिकांश व्यवसायों के विपरीत, कृषि में खोया हुआ समय वापस पाने की बहुत कम गुंजाइश होती है। यही वास्तविकता आज कृषि मशीनीकरण को आगे बढ़ा रही है।
किसान केवल इसलिए उपकरण नहीं अपना रहे हैं कि वे आधुनिक हैं; वे उन्हें इसलिए अपना रहे हैं क्योंकि वे उनकी वास्तविक समस्याओं का समाधान करते हैं। महत्वपूर्ण कृषि कार्यों को कम समय में, अधिक सटीक तरीके से और श्रम पर कम निर्भरता के साथ पूरा करने की क्षमता बेहतर परिणाम देती है। सीमित लाभ मार्जिन पर काम करने वाले छोटे किसानों के लिए ये लाभ कागज पर दिखने वाले आंकड़ों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण होते हैं।
सौभाग्य से, उद्योग ने भी किसानों की बदलती जरूरतों के अनुरूप खुद को विकसित किया है। इस बदलाव को संभव बनाने में सबसे बड़ी भूमिका छोटे और किफायती कृषि उपकरणों के विकास की रही है, जिन्हें विशेष रूप से छोटी जोत वाले किसानों के लिए डिजाइन किया गया है। पारंपरिक कृषि मशीनों के विपरीत, आज के पावर वीडर, मिनी टिलर और कॉम्पैक्ट हार्वेस्टिंग उपकरण भारतीय कृषि की वास्तविकताओं को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं। इनमें निवेश कम लगता है, इन्हें चलाना आसान होता है और ये तुरंत उत्पादकता बढ़ाने में सक्षम हैं।
जैसे-जैसे अधिक संख्या में किसान इन समाधानों को अपना रहे हैं, उनके लाभ भी बढ़ते जा रहे हैं। यही कारण है कि कृषि मशीनीकरण अब एक विकल्प से आगे बढ़कर आवश्यकता बनता जा रहा है।
यह बदलाव केवल किसानों के साथ होने वाली बातचीत में ही नहीं, बल्कि आंकड़ों में भी स्पष्ट दिखाई देता है। मशीनीकरण अब कुछ राज्यों या फसलों तक सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय कृषि में एक संरचनात्मक प्रवृत्ति बनता जा रहा है। आज भारत का लघु कृषि मशीनीकरण उद्योग लगभग 3.16 लाख करोड़ रुपये के संभावित बाजार का प्रतिनिधित्व करता है, जो भारतीय कृषि के विशाल आकार और लाखों खेतों में उत्पादकता बढ़ाने की अपार संभावनाओं को दर्शाता है।
इस व्यापक अवसर के भीतर छोटे कृषि उपकरणों का बाजार भी बढ़ रहा है। यह वित्त वर्ष 2026 के लगभग 7,000 करोड़ रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 2031 तक 19,800–20,000 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। यह लगभग 23 प्रतिशत की मजबूत वार्षिक चक्रवृद्धि वृद्धि दर को दर्शाता है। इतनी तेज वृद्धि आमतौर पर अल्पकालिक कारणों से नहीं होती, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में हो रहे गहरे संरचनात्मक बदलावों का परिणाम होती है।
श्रमिकों की कमी लगातार बढ़ रही है, किसान मशीनीकरण के लाभों के प्रति अधिक जागरूक हो रहे हैं, उपकरण अधिक किफायती और सुलभ बन रहे हैं, वित्तपोषण के विकल्प बेहतर हो रहे हैं और डिजिटल प्लेटफॉर्म किसानों को अपनी जरूरत के अनुरूप उपकरण खोजने, तुलना करने और खरीदने में मदद कर रहे हैं। ये सभी कारक मिलकर एक स्थायी मांग पैदा कर रहे हैं। इस तरह कृषि मशीनीकरण अब उभरती प्रवृत्ति नहीं बल्कि भारतीय कृषि के दीर्घकालिक विकास का प्रमुख चालक बन रहा है।
साथ ही, किसानों की नई पीढ़ी भी इस परिवर्तन को गति दे रही है। आज के किसान अधिक जागरूक, अधिक जुड़े हुए और दक्षता बढ़ाने वाली तकनीकों में निवेश करने के इच्छुक हैं। जैसे-जैसे कृषि परिणाम आधारित होती जा रही है, विश्वसनीय और कुशल कृषि उपकरणों की मांग और मजबूत होने की संभावना है।
एक और महत्वपूर्ण बदलाव संगठित और भरोसेमंद ब्रांडों की ओर बढ़ता रुझान है। वर्तमान में भारत के छोटे कृषि उपकरण बाजार का 50 प्रतिशत से अधिक हिस्सा असंगठित क्षेत्र के पास है, जिससे गुणवत्ता-आधारित कंपनियों के लिए बड़े अवसर मौजूद हैं। किसान अब केवल कीमत की तुलना तक सीमित नहीं हैं।
विश्वसनीयता, टिकाऊपन, बिक्री-पश्चात सेवा, तकनीकी सहायता और स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता भी खरीद निर्णय में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। आखिरकार, बुवाई या कटाई जैसे महत्वपूर्ण समय में खराब होने वाली मशीन का नुकसान शुरुआती खरीद मूल्य में हुई बचत से कहीं अधिक हो सकता है। यही कारण है कि किसान अब ऐसे ब्रांडेड उपकरणों को प्राथमिकता दे रहे हैं जो बेहतर प्रदर्शन, भरोसेमंद सेवा और दीर्घकालिक मूल्य प्रदान करते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मशीनीकरण के लाभ केवल खेत तक सीमित नहीं हैं। मशीनीकरण में हर वृद्धि उपकरणों की डीलरशिप, सेवा केंद्रों, मरम्मत नेटवर्क, स्पेयर पार्ट्स आपूर्तिकर्ताओं, किराये के ऑपरेटरों और कस्टम हायरिंग सेंटरों के माध्यम से नए अवसर पैदा करती है। कई मायनों में, मशीनीकरण कृषि उत्पादकता बढ़ाने के साथ-साथ ग्रामीण उद्यमिता को भी बढ़ावा दे रहा है।
हर किसान के लिए मशीनों का मालिक होना आवश्यक नहीं है। छोटे और सीमांत किसानों के लिए स्वामित्व से अधिक महत्वपूर्ण उनकी पहुंच है। कस्टम हायरिंग सेंटरों का बढ़ता नेटवर्क इस अंतर को पाट रहा है। इससे किसानों को भारी प्रारंभिक निवेश किए बिना जरूरत के समय मशीनें उपलब्ध हो रही हैं। यह भारत की मशीनीकरण यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू साबित हो सकता है।
सकारात्मक बात यह है कि सरकारी नीतियां भी इसी दिशा में आगे बढ़ रही हैं। कृषि उपकरणों पर सब्सिडी और कस्टम हायरिंग सेंटरों को समर्थन जैसी योजनाओं ने मशीनीकरण अपनाने की राह में आने वाली बाधाओं को कम किया है। बढ़ती डिजिटल पहुंच के साथ मिलकर ये प्रयास कृषि उपकरणों को पहले से अधिक सुलभ बना रहे हैं।
निश्चित रूप से चुनौतियां अभी मौजूद हैं। वहनीयता, जागरूकता, वित्तपोषण और अंतिम छोर तक पहुंच जैसे मुद्दों पर अभी और काम करने की जरूरत है। फिर भी, मशीनीकरण को समर्थन देने वाला व्यापक तंत्र हर वर्ष अधिक मजबूत, संगठित और समावेशी होता जा रहा है।
कृषि मशीनीकरण को केवल एक तकनीकी ट्रेंड के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह उत्पादकता की कहानी है, किसानों की आय वृद्धि की कहानी है और तेजी से ग्रामीण विकास की कहानी भी बन रही है। सही उपकरणों को अधिक सुलभ और किफायती बनाकर हम लाखों छोटे किसानों को उत्पादकता और आय बढ़ाने तथा अधिक टिकाऊ एवं लचीला भविष्य बनाने में मदद कर सकते हैं।
(रोहित बजाज बलवान कृषि के सह-संस्थापक हैं।)

Join the RuralVoice whatsapp group















