ईरान युद्ध से सबक, उर्वरक आयात पर निर्भरता घटाने की जरूरत
ईरान युद्ध से उर्वरकों और गैस की आपूर्ति जो बाधित हुई तथा कीमतों में जो तेज बढ़ोतरी हुई, उसने भारत की आयात निर्भरता को उजागर किया है। बढ़ती सब्सिडी और आपूर्ति संबंधी चुनौतियों के बीच अब घरेलू उत्पादन बढ़ाने, संतुलित उर्वरक उपयोग, अनुसंधान को बढ़ावा देने और आयात निर्भरता घटाने की दीर्घकालिक रणनीति की आवश्यकता है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जब चालू वर्ष (2026-27) का बजट संसद में पेश किया, तब उन्हें इस बात का अहसास नहीं था कि उसी माह के अंत में देश किस तरह के उर्वरक संकट का सामना करने वाला है। यही वजह है कि जहां उन्होंने बजट में उर्वरक सब्सिडी में कटौती का प्रावधान किया, वहीं उर्वरक आयात को चरणबद्ध तरीके से कम करने के लिए घरेलू स्तर पर उपलब्ध विकल्पों के उपयोग संबंधी भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के प्रस्ताव को बजट में शामिल नहीं किया। लेकिन 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के साथ शुरू हुए खाड़ी युद्ध ने भारत ही नहीं, पूरी दुनिया को उर्वरकों और कृषि के मोर्चे पर मुश्किल में डाल दिया।
गैस और उर्वरकों की वैश्विक आपूर्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले कतर, यूएई, ओमान और सऊदी अरब समेत कई देशों पर ईरान के हमलों के कारण जहां उर्वरकों और गैस का उत्पादन प्रभावित हुआ, वहीं विश्व की करीब 25 प्रतिशत गैस और उर्वरकों की आवाजाही वाले मार्ग, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, ने सबसे बड़ा संकट पैदा किया। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश उर्वरक, गैस और कच्चा तेल इन्हीं खाड़ी देशों से आयात करता है, इसलिए हमारी मुश्किल भी बड़ी है।
खाड़ी युद्ध से पहले वैश्विक बाजार में उर्वरकों की जो कीमतें थीं, उनके मुकाबले यूरिया के दाम दोगुने से अधिक हो गए। जबकि डाई-अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) के दाम करीब 40 प्रतिशत बढ़ गए। अन्य उर्वरकों और उनके कच्चे माल की कीमतों में भी भारी बढ़ोतरी हुई और आपूर्ति संकट पैदा हो गया। गैस की कीमतें भी 55 से 60 प्रतिशत तक बढ़ गईं। भारत अपनी जरूरत की लगभग 50 प्रतिशत तरल प्राकृतिक गैस (एलएनजी) आयात करता है और कतर इसका सबसे बड़ा स्रोत रहा है। लेकिन इस युद्ध ने हालात बदल दिए।
भारत के लिए उर्वरक लेकर आ रहे दो दर्जन से अधिक जहाज स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में अटक गए। फरवरी के अंत में शुरू हुए युद्ध का समाधान इस अंक के प्रेस में जाने तक नहीं निकल सका और देश में किसानों तथा सरकार की चिंता उर्वरकों की उपलब्धता और कीमतों को लेकर बढ़ती गई। यदि उपलब्धता का गंभीर संकट पैदा होता है, तो चालू खरीफ सीजन के उत्पादन पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
हालांकि रूरल वर्ल्ड (रूरल वॉयस की सहयोगी संस्था) की जानकारी के अनुसार सरकार ने वैकल्पिक स्रोतों के माध्यम से उर्वरक और गैस की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए बड़े प्रयास किए तथा ऊंची कीमतों पर आयात सौदे किए। यूरिया के सौदे 959 डॉलर प्रति टन और डीएपी के सौदे 930 डॉलर प्रति टन तक की कीमत पर हुए। हालांकि ऊंची कीमतों के कारण खरीदारों के प्रतिरोध से कीमतों में कुछ नरमी का रुख बना है, लेकिन स्थिति अब भी चुनौतीपूर्ण है।
देश के यूरिया संयंत्रों में एक समय उत्पादन क्षमता उपयोग 70 प्रतिशत तक सिमट गया था। बाद में कुछ सुधार हुआ और देश में प्रतिमाह यूरिया उत्पादन 25 लाख टन की सामान्य क्षमता के मुकाबले लगभग 18 लाख टन तक पहुंच सका। बात केवल भारत की नहीं है। इस संकट के चलते दुनिया भर में करीब 49 उर्वरक संयंत्रों में उत्पादन बंद हुआ है। इसका असर वैश्विक आपूर्ति पर पड़ा है। जहां यूरिया उत्पादन के लिए गैस की कमी ने संकट पैदा किया, वहीं सल्फ्यूरिक एसिड, सल्फर, फॉस्फोरिक एसिड और अमोनिया की उपलब्धता घटने से डीएपी और अन्य एनपीके उर्वरकों का उत्पादन भी प्रभावित हुआ।
देश में सालाना लगभग 400 लाख टन यूरिया की खपत होती है, जिसमें करीब 100 लाख टन का आयात किया जाता है। वहीं लगभग 100 लाख टन खपत वाले डीएपी का आधे से अधिक हिस्सा आयात से आता है। देश में जो 40 से 45 प्रतिशत डीएपी का उत्पादन होता है, उसके लिए आवश्यक अधिकांश कच्चा माल, जैसे रॉक फॉस्फेट, सल्फ्यूरिक एसिड, फॉस्फोरिक एसिड और अमोनिया, भी आयात से ही प्राप्त होता है। कॉम्प्लेक्स उर्वरक एनपीके के विभिन्न ग्रेडों की स्थिति भी लगभग ऐसी ही है।
इस अप्रत्याशित घटनाक्रम ने उर्वरकों के मामले में किसानों की चिंता बढ़ा दी है। उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में उन्हें यूरिया और डीएपी की उपलब्धता से जूझना पड़ रहा है। सरकार के लिए भी राजकोषीय मोर्चे पर मुश्किलें बढ़ी हैं। उर्वरक और उसके कच्चे माल के आयात का बिल वर्ष 2022-23 के रिकॉर्ड 33 अरब डॉलर के स्तर को पार कर सकता है। साथ ही उर्वरक सब्सिडी भी बढ़ सकती है। कुछ विशेषज्ञ इसके साढ़े तीन लाख करोड़ रुपये से अधिक रहने का अनुमान लगा रहे हैं।
सरकार इस समस्या से निपटने की कोशिश कर रही है, लेकिन अब तक उठाए जा रहे कदम मुख्य रूप से तात्कालिक हैं और कोई स्पष्ट दीर्घकालिक रणनीति दिखाई नहीं देती। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में कमी लाने और जैविक खेती अपनाने की अपील की है। वहीं अर्थशास्त्री उर्वरक सब्सिडी को सीधे किसानों के खातों में भेजने (डीबीटी) की वकालत कर रहे हैं। कंपनियां भी इसके पक्ष में हैं।
सब्सिडी वाले उर्वरकों की बिक्री को किसान आईडी से जोड़कर फसलवार वितरण सुनिश्चित करने के लिए एक राष्ट्रीय ढांचे पर काम चल रहा है। हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि नई व्यवस्था का स्वरूप क्या होगा। हरियाणा और मध्य प्रदेश में इस संबंध में पायलट परियोजनाएं चल रही हैं। सरकार भी उर्वरकों की खपत में कटौती को लेकर पूरी तरह तैयार नहीं है।
चिंता यह है कि उर्वरकों के उपयोग में कमी से कहीं कृषि उत्पादन में गिरावट न आ जाए। कृषि मंत्री ‘खेत बचाओ अभियान’ शुरू कर चुके हैं। पूरा सरकारी तंत्र मिट्टी की सेहत सुधारने में लगा है। उर्वरकों का संतुलित उपयोग समझाने के लिए कृषि वैज्ञानिकों को किसानों के बीच भेजा जा रहा है।
फिलहाल सारा जोर इस बात पर है कि सब्सिडी का बोझ अत्यधिक न बढ़े और उर्वरकों की उपलब्धता का संकट न पैदा हो, क्योंकि इससे राजनीतिक नुकसान भी हो सकता है। इस वर्ष अल नीनो के प्रभाव से मानसून सामान्य से कम रहने की आशंका है। इससे चालू खरीफ सीजन में उर्वरकों की मांग कुछ कम हो सकती है। पूरी कोशिश है कि आगामी रबी सीजन में उर्वरकों की उपलब्धता बेहतर रहे, क्योंकि उस मौसम में कई महत्वपूर्ण फसलें बोई जाती हैं और उसके बाद उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में चुनाव भी होने हैं।
हमारी अधिकांश फसलों की उत्पादकता भी चीन, अमेरिका तथा यूरोपीय देशों से कम है। इसलिए रासायनिक उर्वरकों का उपयोग आवश्यक रहेगा, हालांकि असंतुलित उपयोग को सुधारने की जरूरत है। सबसे बड़ी आवश्यकता देश में उपलब्ध संसाधनों के माध्यम से आयात निर्भरता कम करने की है। इसके लिए घरेलू और वैश्विक स्तर पर हुए शोध और नवाचारों की मदद ली जा सकती है। वैज्ञानिक और नीतिगत प्रयासों से उर्वरक आयात 30-40 प्रतिशत तक घटाया जा सकता है।
इसके लिए रासायनिक उर्वरकों के विकल्पों को बढ़ावा देने तथा दीर्घकालिक उर्वरक नीति बनाने की आवश्यकता है। मौजूदा खाड़ी युद्ध ने भारत को एक महत्वपूर्ण सबक दिया है। यह केवल एक अस्थायी संकट नहीं, बल्कि उर्वरक आत्मनिर्भरता की दिशा में गंभीर कदम उठाने का अवसर भी है।

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