भारत में स्कूल एनरोलमेंट तो बढ़ा, लेकिन बच्चों को स्कूल में बनाए रखना अब भी चुनौती
भारत ने प्राथमिक शिक्षा तक लगभग शत-प्रतिशत पहुंच हासिल कर ली है, लेकिन विद्यार्थियों को माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर तक शिक्षा प्रणाली में बनाए रखना अब भी एक बड़ी चुनौती है। स्कूल बदलने की आवश्यकता, आर्थिक कठिनाइयां, माइग्रेसन, शिक्षकों की कमी तथा विद्यालयों की दूरी जैसी समस्याएं विद्यार्थियों के स्कूल छोड़ने (ड्रॉपआउट) का प्रमुख कारण बन रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि एकीकृत विद्यालयों की स्थापना, बेहतर बुनियादी ढांचे का विकास और शिक्षा तक आसान पहुंच सुनिश्चित करके अधिक से अधिक बच्चों को उनकी शैक्षिक यात्रा पूरी करने में मदद दी जा सकती है।
स्नेहिल चौबे
भारत की स्कूली शिक्षा प्रणाली दुनिया की सबसे बड़ी प्रणालियों में से एक है। यहां 14.71 लाख स्कूलों के माध्यम से 24.69 करोड़ से अधिक छात्रों को शिक्षा प्रदान की जा रही है। पिछले एक दशक में देश ने यह सुनिश्चित करने में उल्लेखनीय प्रगति की है कि लगभग हर बच्चे को बुनियादी शिक्षा तक पहुंच मिले। हालांकि, शुरुआती स्तर पर नामांकन में मिली इस सफलता के बावजूद एक बड़ी चुनौती अब भी बनी हुई है - छात्रों को उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी होने तक विद्यालयों में बनाए रखना।
यह लेख आधिकारिक आंकड़ों के आधार पर भारत के शिक्षा परिदृश्य को प्रभावित करने वाली संरचनात्मक चुनौतियों, कक्षाओं के बीच संक्रमण संबंधी बाधाओं और हाल के नीतिगत परिवर्तनों का विश्लेषण करता है।
1. पिरामिड समस्या एवं संरचनात्मक विखंडन
भारतीय शिक्षा प्रणाली की एक प्रमुख संरचनात्मक समस्या वह है जिसे नीति आयोग की मई 2026 की रिपोर्ट में “पिरामिड समस्या” (Pyramid Problem) कहा गया है। देश का स्कूली ढांचा अत्यधिक विखंडित है, जिसमें प्राथमिक विद्यालयों का आधार बहुत बड़ा है, लेकिन उच्च स्तरों पर विद्यालयों की संख्या तेजी से घट जाती है।
वर्तमान में भारत में लगभग 7.3 लाख प्राथमिक विद्यालय हैं, लेकिन उच्च माध्यमिक स्तर पर यह संख्या घटकर केवल 1.64 लाख विद्यालयों तक रह जाती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि देश के केवल 5.4 प्रतिशत विद्यालय ऐसे हैं, जहां कक्षा 1 से 12 तक की निरंतर शिक्षा एक ही परिसर में उपलब्ध है।
इसके परिणामस्वरूप छात्रों को अपनी स्कूली शिक्षा के दौरान बार-बार विद्यालय बदलने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जिससे पढ़ाई छोड़ने (ड्रॉपआउट) का जोखिम काफी बढ़ जाता है। यही कारण है कि हर 10 में से 4 बच्चे उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने से पहले ही विद्यालय छोड़ देते हैं।
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संरचनात्मक पैरामीटर/इंडिकेटर |
आधारभूत आंकड़े |
मौजूदा स्थिति (नीति आयोग, 2026 का विश्लेषण) |
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कुल संचालित स्कूल |
15.58 लाख (2017-18) |
14.71 लाख |
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कुल छात्रों का एनरोलमेंट |
26.95 करोड़ (2014-15) |
24.69 करोड़ |
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प्राइमरी स्कूल (कक्षा 1-5) |
- |
7.3 लाख |
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हायर सेकंडरी स्कूल (कक्षा 11-12) |
- |
1.64 लाख |
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निरंतर कक्षा वाले स्कूल (ग्रेड 1-12) |
- |
5.4% |
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ग्रॉस एनरोलमेंट अनुपात (GER) हायर सेकंडरी |
- |
58.4% |
स्रोत: नीति आयोग, "भारत की स्कूली शिक्षा प्रणाली — समयगत विश्लेषण एवं गुणवत्ता संवर्धन के लिए नीतिगत रोडमैप" (मई 2026 रिपोर्ट)।
2. राष्ट्रीय ड्रॉपआउट दर
पिछले तीन शैक्षणिक वर्षों के दौरान कुल ड्रॉपआउट (पढ़ाई बीच में छोड़ने वाले छात्रों) की संख्या में धीरे-धीरे कमी आई है, लेकिन उच्च कक्षाओं में पहुंचने के साथ छात्रों के स्कूल छोड़ने की समस्या अब भी गंभीर बनी हुई है। यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस (UDISE+) 2024-25 की रिपोर्ट के अनुसार, प्रारंभिक वर्षों में ड्रॉपआउट दर अपेक्षाकृत कम रहती है, लेकिन छात्रों के माध्यमिक स्तर तक पहुंचते-पहुंचते यह दर काफी बढ़ जाती है।
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शिक्षा का चरण |
ड्रॉपआउट दर (2022-23) |
ड्रॉपआउट दर (2023-24) |
ड्रॉपआउट दर (2024-25) |
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प्रिपरेटरी (कक्षा 3-5) |
3.7% |
3.1% |
2.3% |
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मिडिल (कक्षा 6-8) |
5.2% |
4.3% |
3.5% |
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सेकंडरी (कक्षा 9-10) |
10.9% |
9.6% |
8.2% |
स्रोत: शिक्षा मंत्रालय, यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस (UDISE+) 2024-25 रिपोर्ट।
3. स्कूलों में रिटेंशन का संकट
रिटेंशन रेट यानी प्रतिधारण दर यह दर्शाती है कि शिक्षा प्रणाली एक शैक्षणिक वर्ष से अगले शैक्षणिक वर्ष तक विद्यार्थियों को बनाए रखने में कितनी सक्षम है। उपलब्ध आंकड़े इसमें कमजोरी को उजागर करते हैं। प्रारंभिक (Foundational) स्तर पर प्रतिधारण दर 98.9 प्रतिशत तक है, लेकिन जैसे-जैसे छात्र उच्च कक्षाओं में आगे बढ़ते हैं, यह दर तेजी से गिरती जाती है। माध्यमिक स्तर तक पहुंचते-पहुंचते प्रतिधारण दर घटकर मात्र 47.2 प्रतिशत रह जाती है। इसका अर्थ है कि शिक्षा प्रणाली में प्रवेश करने वाले विद्यार्थियों में से आधे से भी कम छात्र माध्यमिक शिक्षा तक लगातार बने रहते हुए सफलतापूर्वक पहुंच पाते हैं।
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शिक्षा स्तर |
रिटेंशन रेट (2022-23) |
रिटेंशन रेट (2023-24) |
रिटेंशन रेट (2024-25) |
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प्रारंभिक |
92.1% |
98.0% |
98.9% |
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प्रिपरेटरी |
90.9% |
85.4% |
92.4% |
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मिडिल |
75.8% |
78.0% |
82.8% |
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सेकंडरी |
44.1% |
45.6% |
47.2% |
स्रोत: शिक्षा मंत्रालय, यूडीआईएसई+ (UDISE+) शैक्षिक संकेतक एवं फ्लैश स्टैटिस्टिक्स 2024-25
4. संक्रमण चरण के संकेतक
एक स्कूली स्तर से अगले स्तर पर जाने की प्रक्रिया को संक्रमण कहा जाता है। यह छात्रों के पढ़ाई छोड़ने की दृष्टि से सबसे संवेदनशील चरण होता है। यूडीआईएसई+ के आंकड़े दर्शाते हैं कि आधारभूत (Foundational) स्तर से तैयारी (Preparatory) स्तर में संक्रमण काफी सहज है, जहां संक्रमण दर 98.6% है। लेकिन मिडिल स्तर से माध्यमिक (Secondary) स्तर में प्रवेश के दौरान छात्रों की संख्या में उल्लेखनीय गिरावट देखने को मिलती है। वर्ष 2024-25 में माध्यमिक शिक्षा में संक्रमण दर 86.6% दर्ज की गई। इसका अर्थ है कि 13 प्रतिशत से अधिक छात्र इस महत्वपूर्ण शैक्षणिक संक्रमण को पूरा नहीं कर सके और माध्यमिक स्तर तक नहीं पहुंच पाए।
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संक्रमण का चरण |
संक्रमण दर (2022-23) |
संक्रमण दर (2023-24) |
संक्रमण दर (2024-25) |
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फाउंडेशनल से प्रिपरेटरी |
92.2% |
98.1% |
98.6% |
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प्रिपरेटरी से मिडिल |
87.9% |
88.8% |
92.2% |
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मिडिल से सेकंडरी |
86.7% |
83.3% |
86.6% |
स्रोत: शिक्षा मंत्रालय, UDISE+ 2024-25 ट्रांजिशन इंडिकेटर ब्रीफ्स
Source: Ministry of Education, UDISE+ 2024-25 Transition Indicator Briefs.
5. निजी स्कूलों का विस्तार बनाम सरकारी स्कूलों का युक्तीकरण
देश में छात्रों के स्कूल चुनने के पैटर्न में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। पिछले दो दशकों में सरकारी स्कूलों में नामांकन का हिस्सा 2005 के 71% से घटकर 2024-25 में 49.2% रह गया है। वहीं, निजी स्कूलों में नामांकन तेजी से बढ़ा है और अब लगभग 38.8% छात्र निजी स्कूलों में पढ़ रहे हैं। इसके पीछे अभिभावकों की अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा और बेहतर अनुशासन की धारणा जैसे कारण प्रमुख हैं।
इसी दौरान विभिन्न राज्य सरकारों ने शिक्षा व्यवस्था को अधिक दक्ष बनाने के उद्देश्य से “स्कूल युक्तिकरण” (रैशनलाइजेशन) अथवा स्कूल विलय कार्यक्रम लागू किए हैं। 2014 से 2024 के बीच लगभग एक लाख सरकारी स्कूल बंद या अन्य स्कूलों में विलय कर दिए गए, जिससे सरकारी स्कूलों की कुल संख्या में कमी आई।
हालांकि, कुछ विशेषज्ञों और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगों ने चिंता जताई है कि छोटे ग्रामीण स्कूलों को बंद कर छात्रों को दूर स्थित विद्यालयों में भेजने से ड्रॉपआउट दर बढ़ सकती है। विशेष रूप से लड़कियों के लिए यह समस्या अधिक गंभीर हो सकती है, क्योंकि कई परिवार उन्हें लंबी दूरी तय कर स्कूल भेजने में संकोच करते हैं।
6. जमीनी हकीकतः उत्तर प्रदेश की कक्षाओं से उठती आवाजें
इन व्यापक आंकड़ों के पीछे छिपी कहानियों को समझने के लिए उत्तर प्रदेश चलते हैं। वहां के सरकारी प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षकों के हालिया अनुभव यह बताते हैं कि आखिर किन कारणों से बच्चे शिक्षा व्यवस्था से बाहर हो रहे हैं।
- आर्थिक दबावः बाराबंकी जिले के सआदतगंज स्थित फैजान उल उलूम इंटर कॉलेज (कक्षा 1 से 8 तक, सरकारी प्रबंधन वाला विद्यालय) में शिक्षकों के अनुसार आर्थिक कठिनाइयां छात्रों के पढ़ाई छोड़ने का प्रमुख कारण हैं। हाल के वर्षों में कई छात्र पारिवारिक आर्थिक संकट के चलते पढ़ाई जारी नहीं रख सके। इनमें मोबिश (2026 में कक्षा 8 उत्तीर्ण), सादिया बानो और मोहम्मद अजीम (2026 में कक्षा 5 उत्तीर्ण) तथा मोहम्मद बिलाल (2019 में कक्षा 5 उत्तीर्ण) शामिल हैं।

फैजान उल उलूम इंटर कॉलेज, बाराबंकी (फोटोः स्नेहिल चौबे)
- पारिवारिक माइग्रेशन और श्रमः बहराइच जिले के रिसिया स्थित कंपोजिट विद्यालय (कक्षा 1 से 8) में आर्थिक कारणों से कई बच्चों को अचानक स्कूल छोड़ना पड़ा है। उदाहरण के तौर पर, कक्षा 8 की छात्रा जाम्बी और उसके छोटे भाई समीर अहमद (कक्षा 7) को पारिवारिक व्यवसाय के लिए मुंबई जाना पड़ा। उनके माता-पिता ने उन्हें अंतिम परीक्षा में शामिल होने से पहले ही स्कूल से निकाल लिया।
- दूरी और संसाधनों की कमीः स्कूल की दूरी और बुनियादी संसाधनों की कमी भी छात्रों को निजी स्कूलों की ओर धकेल रही है। रिसिया के कंपोजिट विद्यालय में कक्षा 6 के छात्र दक्ष कुमार राय ने केवल लंबी दूरी की वजह से स्कूल छोड़ दिया और कम शुल्क वाले एक निजी विद्यालय में दाखिला ले लिया। यह समस्या विद्यालय में शिक्षकों की भारी कमी के कारण और गंभीर हो जाती है। यहां कक्षा 1 से 5 तक लगभग 90 छात्रों के लिए केवल एक शिक्षक उपलब्ध है, जबकि कक्षा 6 से 8 के बड़े छात्र समूह के लिए प्रधानाध्यापक सहित मात्र दो शिक्षक कार्यरत हैं।
हालांकि नई शिक्षा नीति (NEP) 2020 शिक्षा प्रणाली में बुनियादी सुधारों के केंद्र में शिक्षकों को रखती है, लेकिन UDISE+ 2024-25 रिपोर्ट बताती है कि देश में अब भी 1,04,125 एकल-शिक्षक विद्यालय (Single-Teacher Schools) मौजूद हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और छात्रों की निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए केवल नामांकन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि स्कूलों में पर्याप्त शिक्षकों और संसाधनों की उपलब्धता भी उतनी ही आवश्यक है।
7. स्कूल विलय पर विशेषज्ञों की राय
हालांकि आंकड़े सरकारी स्कूलों की कुल संख्या में कमी दिखाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर काम करने वाले शिक्षा विशेषज्ञ स्कूलों के विलय के प्रभाव को अधिक संतुलित और व्यापक नजरिए से देखते हैं।
टीच फॉर इंडिया के वरिष्ठ निदेशक अश्वथ भरत ने रूरल वॉयस से कहा कि स्कूल विलय का मुद्दा जटिल है और इसे केवल स्कूल बंद करने की रणनीति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार, “स्कूलों के एकीकरण का मुख्य उद्देश्य शिक्षा तक पहुंच और उसकी गुणवत्ता में सुधार करना है।” वे बताते हैं कि अभिभावक अक्सर बड़े “हब स्कूलों” को प्राथमिकता देते हैं क्योंकि वहां बेहतर बुनियादी ढांचा, विषय-विशेषज्ञ शिक्षकों की उपलब्धता और एक ही परिसर में उच्च माध्यमिक स्तर तक पढ़ाई जारी रखने की सुविधा मिलती है। भरत का यह भी कहना है कि आमतौर पर स्कूलों का विलय विभिन्न हितधारकों से परामर्श के बाद ही किया जाता है। उन्होंने कहा कि दीर्घकालिक साक्ष्यों के बिना यह सामान्य निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि स्कूल विलय का हाशिए पर रहने वाले समुदायों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन के सीईओ अनुराग बेहर भी व्यापक रूप से इसी दृष्टिकोण से सहमत हैं। 59 जिलों और 350 विकासखंडों में फाउंडेशन के व्यापक अनुभव के आधार पर उन्होंने कहा कि अधिकांश तथाकथित “स्कूल बंदी” वास्तव में व्यावहारिक रूप से स्कूलों का विलय है, न कि उनका पूर्ण बंद होना। उन्होंने विशेष रूप से यह रेखांकित किया कि फाउंडेशन ने बहुत कम ऐसे मामले देखे हैं, जहां स्कूल विलय के कारण बच्चे पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हुए हों। उनके अनुसार, स्कूलों के एकीकरण का वास्तविक प्रभाव अधिकांश मामलों में लाभकारी हो सकता है, जबकि कुछ परिस्थितियों में इसके प्रतिकूल परिणाम भी हो सकते हैं। रूरल वॉयस के साथ बातचीत में उन्होंने कहा, “इसलिए इस विषय का मूल्यांकन इस आधार पर किया जाना चाहिए कि क्या बच्चों को अंततः बेहतर शैक्षिक अवसर उपलब्ध हो रहे हैं या नहीं।”
निष्कर्ष
भारत की शिक्षा व्यवस्था ने लाखों बच्चों को प्राथमिक विद्यालयों तक पहुंचाने में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है, लेकिन उन्हें शिक्षा प्रणाली में बनाए रखना अब एक बड़ी चुनौती बन गया है। ड्रॉपआउट संकट से निपटने के लिए नीति आयोग ने “सिलिंड्रिकल स्कूलों” की अवधारणा की सिफारिश की है। ये ऐसे एकीकृत विद्यालय होंगे जो कक्षा 1 से कक्षा 12 तक निरंतर शिक्षा प्रदान करेंगे।
विशेषज्ञों के अनुभवों को ध्यान में रखते हुए, स्कूल संसाधनों को बेहतर सुविधाओं वाले हब स्कूलों में समेकित करके तथा कक्षाओं के बीच संक्रमण में आने वाली भौतिक और संरचनात्मक बाधाओं को दूर करके नीति-निर्माता यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि अधिक से अधिक विद्यार्थी अपनी शैक्षिक यात्रा सफलतापूर्वक पूरी कर सकें।
(स्नेहिल दिल्ली स्थित डॉ. बी.आर. आंबेडकर विश्वविद्यालय के पब्लिक पॉलिसी एंड गवर्नेंस में मास्टर्स की दूसरे वर्ष की छात्रा हैं। अभी वे रूरल वॉयस में इंटर्नशिप कर रही हैं)

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