अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद रुबियो का भारत को 500 अरब डॉलर के निर्यात का दावा कितना तर्कसंगत?
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा रेसिप्रोकल टैरिफ के कानूनी आधार को खारिज किए जाने के बाद भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) का आधार भी कमजोर पड़ गया है। जीटीआरआई का कहना है कि अमेरिका से 500 अरब डॉलर की खरीद की भारत की कथित प्रतिबद्धता व्यापार घाटा, डॉलर आउटफ्लो और रुपये पर दबाव बढ़ा सकती है।
23-26 मई 2026 तक भारत दौरे पर आए अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो (Marco Rubio) ने आज सोशल मीडिया एक्स पर भारत द्वारा अगले पांच वर्षों में 500 अरब अमेरिकी डॉलर के अमेरिकी उत्पाद खरीदने की प्रतिबद्धता का उल्लेख किया।
उन्होंने लिखा, “@USAmbIndia सर्जियो गोर और हमारे अमेरिकी राजनयिकों के प्रयासों के लिए बहुत धन्यवाद। उनके उत्कृष्ट कार्यों की वजह से भारत ने अगले पांच वर्षों में ऊर्जा, प्रौद्योगिकी और कृषि क्षेत्रों पर केंद्रित 500 अरब डॉलर के अमेरिकी सामान खरीदने की प्रतिबद्धता जताई है।”
भारत द्वारा 500 अरब डॉलर के अमेरिकी सामान खरीदने का इरादा 6 फरवरी 2026 को जारी भारत-अमेरिका संयुक्त बयान का हिस्सा था, जो अभी तक जारी द्विपक्षीय व्यापार समझौता (BTA) वार्ताओं के तहत सामने आया था।
भारत की ओर से कई रियायतों के बदले वाशिंगटन ने भारतीय निर्यात पर प्रस्तावित रेसिप्रोकल टैरिफ को 25 प्रतिशत से घटाकर लगभग 18 प्रतिशत करने पर सहमति जताई थी। लेकिन इस समझौते की पूरी बुनियाद 20 फरवरी 2026 को ढह गई, जब अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन के टैरिफ के कानूनी आधार को अमान्य करार दे दिया।
इस फैसले ने उन टैरिफ-आधारित ढांचों को प्रभावी रूप से समाप्त कर दिया, जिनके आधार पर अमेरिका की नई पीढ़ी की व्यापार संधियों पर बातचीत की जा रही थी। फैसले के कुछ घंटों के भीतर ही ट्रंप प्रशासन ने 1974 के अमेरिकी ट्रेड एक्ट की धारा 122 का उपयोग करते हुए सभी व्यापारिक साझेदार देशों से आयात पर समान 10 प्रतिशत टैरिफ लागू कर दिया। यह टैरिफ 24 फरवरी से प्रभावी हुआ और जुलाई 2026 के अंतिम सप्ताह तक लागू रहने वाला है।
इसका परिणाम यह हुआ कि अब हर देश, चाहे उसने वाशिंगटन के साथ कोई समझौता किया हो या नहीं, अमेरिकी बाजार में प्रवेश के लिए सामान्य एमएफएन टैरिफ के अतिरिक्त 10 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क का सामना कर रहा है। इससे उन देशों को मिलने वाला संभावित लाभ समाप्त हो गया, जो अमेरिका को बड़ी रियायतें देने के बदले विशेष व्यापारिक लाभ की उम्मीद कर रहे थे।
इससे भारत-अमेरिका बीटीए के पीछे की मूल भावना काफी कमजोर हो गई है। यदि भारत को कृषि, डिजिटल व्यापार, खरीद नीति और टैरिफ में व्यापक रियायतें देने के बावजूद वही 10 प्रतिशत टैरिफ व्यवस्था मिलती है, तो इस समझौते का व्यावसायिक औचित्य सवालों के घेरे में आ जाता है।
इसके प्रभाव 15 मार्च 2026 को दिखाई दिए, जब मलेशिया अमेरिका के साथ अपने व्यापार समझौते से पीछे हट गया। मलेशिया ने पहले बाजार पहुंच और नीतिगत प्रतिबद्धताओं के बदले 19 प्रतिशत टैरिफ दर स्वीकार की थी। लेकिन सभी देशों पर समान 10 प्रतिशत टैरिफ लागू होने के बाद कुआलालंपुर ने इस समझौते को “निरर्थक” घोषित कर दिया।
भारत के लिए यह मुद्दा और अधिक संवेदनशील हो गया है क्योंकि रुपये पर दबाव बढ़ रहा है। बढ़ती आयात लागत, ऊंची तेल कीमतों, विदेशी निवेश निकासी और भुगतान संतुलन पर लगातार दबाव के कारण पिछले 12 महीनों में भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगभग 12 प्रतिशत कमजोर हो चुका है।
नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक जीटीआरआई का तर्क है कि पारस्परिक टैरिफ ढांचा समाप्त होने के बाद भारत-अमेरिका बीटीए का आर्थिक आधार भी खत्म हो जाता है, इसलिए 500 अरब डॉलर की खरीद प्रतिबद्धता का सवाल अप्रासंगिक हो जाता है। संस्था का कहना है कि भारत सरकार को रुबियो के बयान पर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
जीटीआरआई का मानना है कि इस तरह की खरीद प्रतिबद्धता ऐसे समय में भारत से डॉलर के आउटफ्लो को काफी बढ़ा सकती है, जब देश का विदेशी मुद्रा संतुलन पहले से दबाव में है। अमेरिकी ऊर्जा, रक्षा उपकरण, विमान और कृषि उत्पादों के बड़े पैमाने पर आयात से भारत का व्यापार घाटा और बढ़ सकता है तथा रुपये पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
संस्था का सुझाव है कि भारत को औपचारिक रूप से इन वार्ताओं पर पुनर्विचार करना चाहिए। उसका कहना है कि 20 फरवरी के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद पारस्परिक टैरिफ ढांचा ढहने के साथ ही इस समझौते का मूल आर्थिक औचित्य प्रभावी रूप से समाप्त हो गया है।

Join the RuralVoice whatsapp group















